बाबा बाबा कहते हैं खुद,
वीआईपी बन रहते हैं।
बाबा गर अच्छा लगता तो,
चलते उसके कदमों पर।
छोड़ के माया मोह जगत का,
पिंड अपना खुद अर्पण कर।
छोड़ के घर छूटा करता तो,
स्मृति-रोगी बाबे होते।
भांग-नशे में डूबे रहकर,
भंगड़ भी पूजित होते।
माना बुरा पकड़ना है पर,
छोड़ना भी तो बात बुरी।
क्यों न निकट में रहकर भी हम,
सबसे रखें उचित दूरी।
दोनों का संतुलित मिश्रण ही,
असली दुनिया असली त्याग।
दोनों से दोनों मिल जाते,
असली प्रेम और विराग।
जा-जा-जा-जा कहते हैं खुद,
दुनिया में आ रहते हैं।
बाबा-बाबा कहते हैं खुद,
वीआईपी बन रहते हैं।
जगत-त्याग से शक्ति मिलती,
बात किसी से छिपी नहीं।
सिर का बोझ हटा लेने से,
राहत किसको मिली नहीं?
खाली सिर भी भार लगा जब,
पुनः बोझ को रख लेते।
बाबा बन के थक जाने पर,
पुनः गृहस्थ परख लेते।
खाली सिर की शक्ति से,
सोना या चांदी पा लेता।
बाबा कोई पूर्ण को कोई,
उसके पथ को पा लेता।
कोई भांग-चरस में रहकर,
चिलम लगाता है भर भर।
दुनिया में देखा जाता,
खाली दिमाग शैतान का घर।
स्थायी कोई स्थिति नहीं है,
दुनिया हो या मठ-मंदिर।
पुनः जगत में आना पड़ता,
खिले ना पुष्प अगर अंदर।
आईआईटी हो या आईआईएम,
नियम हमेशा रहते हैं।
बाबा-बाबा कहते हैं खुद,
वीआईपी बन रहते हैं।
दुनिया हो या हो आनन,
चक्र हमेशा चलता है।
सबको हर जीवन-हालत में,
हर इक मौका मिलता है।
मौका चूके जो दुनिया में,
वह वन में कैसे पाए।
सुविधा में न जा पाए जो,
दुविधा में कैसे जाए।
उस तक जाना बात दूर की,
इस तक भी कैसे जाए।
शक्ति से ही होता सब कुछ,
वन में ये कैसे आए।
हारे हुऎ खिलाड़ी अक्सर,
पिच को दोषी कहते हैं।
बाबा-बाबा कहते हैं खुद,
वीआईपी बन रहते हैं।
साभार~🙏 भाव सुमन ~एक आधुनिक काव्यसुधा सरस
#Kavita, #Poetry, #ViralPoem, #HindiKavita.
Category: प्रेम
कुंडलिनी जागरण दीपावली और राम की योगसाधना रामायण महाकाव्य के मिथकीय रूपक में निरूपित
शुभ दीपावली!
कुंडलिनी देवी सीता और जीवात्मा भगवान राम है
सीता कुंडलिनी ही है जो बाहर से आंखों की रौशनी के माध्यम से वस्तु के चित्र के रूप में प्रविष्ट होती है। वास्तव में शरीर की कुंडलिनी शक्ति नेत्रद्वार से बाहर गई होती है। शास्त्रों में कहा भी है कि आदमी का पूरा व्यक्तित्व उसके मस्तिष्क में रहता है, जो बाह्य इन्द्रियों के रास्ते से बाहर निकलकर बाहरी दुनिया में भटकता रहता है। बाहर हर जगह भौतिक दोषों अर्थात रावण का साम्राज्य है। वह शक्ति उसके कब्जे में आ जाती है, और उसके चंगुल से नहीं छूट पाती। मस्तिष्क में बसा हुआ जीवात्मा अर्थात राम उस बाहरी दुनिया में भटकती हुई सीता शक्ति को लाचारी से देखता है। यही जटायु के भाई सम्पाति के द्वारा उसे अपनी तेज नजर से समुद्र पार देखना और उसका हालचाल राम को बताना है। फिर राम योगसाधना में लग जाता है, और किसी मंदिर वगैरह में बनी देवता की मूर्ति को या वहाँ पर रहने वाले गुरु की खूब संगति करता है, औऱ तन-मन-धन से उनको प्रसन्न करता है। इससे धीरे-धीरे उसके मन में अपने गुरु के चित्र की छाप गहरी होती जाती है, और एक समय ऐसा आता है जब वह मानसिक चित्र स्थायी हो जाता है। यही लँका के राजा रावण से सीता को छुड़ाकर लाना, और उसे समुद्र पर बने पुल को पार कराते हुए अयोध्या पहुंचाना है। प्रकाश की किरण ही वह पुल है, क्योंकि उसीके माध्यम से बाहर का भौतिक चित्र मन के अंदर प्रविष्ट हुआ। मन ही अयोध्या है, जिसके अंदर राम रूपी जीवात्मा रहता है। मन से कोई भी युद्ध नहीं कर सकता, क्योंकि वह भौतिकता के परे है। हर कोई किसीके शरीर से तो युद्ध कर सकता है, पर मन से नहीं। इसका दूसरा अर्थ यह भी है कि मन को समझा-बुझा कर ही सीधे रास्ते पर लगाना चाहिए, जोरजबरदस्ती या डाँट-डपट से नहीं। टेलीपैथी आदि से भी दूसरे के मन का बहुत कम पता चलता है। वह भी एक अंदाज़ा ही होता है। किसी दूसरे के मन के बारे में पूरी तरह से कभी नहीं जाना सकता। पहले तो राम रूपी जीवात्मा लंबे समय तक बाहर की दुनिया में अर्थात रावण की लँका में भटकते हुए अपने हिस्से को अर्थात सीता माता को दूर से ही देखता रहा। मतलब उसने उस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। अगर वह बाहर गया भी, तो अधूरे मन से गया। अर्थात उसने शक्ति को वापिस लाने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए। फिर जब राम उसके वियोग से बहुत परेशान हो गया, तब वह दुनियदारी में जीजान से कूद गया। यही राक्षसों के साथ उसके युद्ध के रूप में दिखाया गया है। दरअसल असली और जीवंत जीवन तो युद्धस्तर के जैसा संघर्षमयी और बाह्यमुखी जीवन ही होता है। मतलब कि वह मन रूपी अयोध्या से बाहर निकलकर आँखों की रौशनी के पुल से होता हुआ लँका में प्रविष्ट हो गया। दुनिया में वह पूरे जीजान से व पूरे ध्यान के साथ मेहनत करने लगा। यही तो कर्मयोग है, जो सभी आध्यात्मिक साधनाओं के मूल व प्रारंभ में स्थित है। मतलब कि वह लँका में सीता को ढूंढने लगा। फिर किसी सत्संगति से उसमें दैवीय गुण बढ़ने लगे। मतलब कि अष्टाङ्ग योग के यम-नियमों का अभ्यास उससे खुद ही होने लगा। यह सत्संग राम और राक्षस संत विभीषण की मित्रता के रूप में है। इससे जीवात्मा को कोई वस्तु बहुत पसंद आई, और वह लगातार उसी एक वस्तु के संपर्क में बना रहने लगा। मतलब कि राम की नजर अपनी परमप्रिय सीता पर पड़ी, और वह उसीके प्रेम में मग्न रहने लगा। मतलब कि इस रूपक कथा में साथ में तंत्र का यह सिद्धांत भी प्रतिपादित किया गया है कि एक स्त्री अर्थात पत्नी ही योग में सबसे ज्यादा सहायक होती है। पुराणों का मुख्य उद्देश्य तो आध्यात्मिक और पारलौकिक है। लौकिक उद्देश्य तो गौण या निम्न है। पर अधिकांश लोग उल्टा समझ लेते है। उदाहरण के लिए, वे इस आध्यात्मिक मिथक से यही लौकिक आचार वाली शिक्षा लेते हैं कि रावण की तरह पराई स्त्री पर बुरी नजर नहीं डालनी चाहिए। हालांकि यह शिक्षा भी ठीक है, पर वे इसमें छिपे हुए कुंडलिनी योग के मुख्य और मूल उद्देश्य को या तो समझ ही नहीं पाते या फिर नजरअंदाज करते हैं। फिर जीवात्मा के शरीर की पोज़िशन और सांस लेने की प्रक्रिया स्वयं ही इस तरह से एडजस्ट होने लगी, जिससे उसका ज्यादा से ज्यादा ध्यान उसकी प्रिय वस्तु पर बना रहे। इससे योगी राम का विकास अष्टाङ्ग योग के आसन और प्राणायाम अंग तक हो गया। इसका मतलब है कि राम सीता को दूर से व छिप-छिप कर देखने के लिए कभी बहुत समय तक खड़ा रहता, कभी डेढ़ा-मेढ़ा बैठता, कभी उसे लंबे समय तक सांस रोककर रखनी पड़ती थी, कभी बहुत धीरे से साँसें लेनी पड़ती थी। ऐसा इसलिए था ताकि कहीं दुनिया में उलझे लोगों अर्थात लँका के राक्षसों को उसका पता न चलता, और वे उसके ध्यान को भंग न करते। वास्तव में जो भौतिक वस्तु या स्त्री होती है, उसे पता ही नहीं चलता कि कोई व्यक्ति उसका ध्यान कर रहा है। यह बड़ी चालाकी से होता है। यदि उसे पता चल जाए, तो वह शर्मा कर संकोच करेगी और अपने विविध रूप-रंग व भावनाएं ढंग से प्रदर्शित नहीं कर पाएगी। इससे ध्यान परिपक्व नहीं हो पाएगा। अहंकार पैदा होने से भी ध्यान में क्षीणता आएगी। ऐसा ही गुरु के मामले में भी होता है। इसी तरह मन्दिर में जड़वत खड़ी पत्थर की मूर्ति को भी क्या पता कि कोई उसका ध्यान कर रहा है। क्योंकि सीता के चित्र ने ही राम के मन की अधिकांश जगह घेर ली थी, इसलिए उसके मन में फालतू इच्छाओं और गैरजरूरी वस्तुओं को संग्रह करने की इच्छा ही नहीं रही। इससे अष्टाङ्ग योग का पांचवां अंग, अपरिग्रह खुद ही चरितार्थ हो गया। अपरिग्रह का अर्थ है, वस्तुओं का संग्रह या उनकी इच्छा न करना। फिर इस तरह से योग के इन प्रारंभिक पांच अँगों के लंबे अभ्यास से जीवात्मा के मन में उस वस्तु या स्त्री का चित्र स्थिर हो जाता है। यही योग के धारणा और ध्यान नामक एडवांस्ड व उत्तम अंग हैं। इसका मतलब है कि राम ने लँका के रावण से सीता को छुड़ा लिया, और उसे वायुमण्डल रूपी समुद्र पर बने उसी प्रकाश की किरण रूपी पुल के माध्यम से आँख रूपी समुद्रतट पर पहुंचाया और फिर अंदर मनरूपी अयोध्या की ओर ले गया या जैसा कि रामायण में लिखा गया है कि लँका से उनकी वापसी पुष्पक विमान से हुई। यही समाधि या कुंडलिनी जागरण का प्रारंभ है। इससे उसकी इन्द्रियों के दस दोष नष्ट हो गए। इसे ही दशहरा त्यौहार के दिन दशानन रावण को जलाए जाने के रूप में मनाया जाता है। फिर जीवात्मा ने कुंडलिनी की जागृति के लिए उसे अंतिम व मुक्तिगामी छलांग या एस्केप विलोसिटी प्रदान करने के लिए बीस दिनों तक तांत्रिक योगाभ्यास किया। उस दौरान वह घर पहुंचने के लिए सुरम्य और मनोहर यात्राएं करता रहा। वैसे भी अपने स्थायी घर के ध्यान और स्मरण से कुंडलिनी को और अधिक बल मिलता है, क्योंकि कुंडलिनी स्थायी घर से भी जुड़ी होती है, जैसा मैंने एक पिछले लेख में बताया है। मनोरम यात्राओं से भी कुंडलिनी को अतिरिक्त बल मिलता है, इसीलिए तो तीर्थयात्राएं बनी हैं। उस चौतरफा प्रयास से उसकी कुंडलिनी बीस दिनों के थोड़े समय में ही जागृत हो गई। यही राम का अयोध्या अर्थात कुंडलिनी के मूलस्थान पहुंचना है। यही कुंडलिनी जागरण है। कुंडलिनी जागरण से जो मन के अंदर चारों ओर सात्त्विकता का प्रकाश छा जाता है, उसे ही प्रकाशपर्व दीपावली के रूप में दर्शाया गया है। क्योंकि कुंडलिनी जागरण का प्रभाव समाज में, विशेषकर गृहस्थान में चारों तरफ फैलकर आनन्द का प्रकाश फैलाता है, इसलिए यही अयोध्या के लोगों के द्वारा दीपावली के प्रकाशमय त्यौहार को मनाना है।
कुंडलिनी योग के लिए ही आत्मा शरीर ग्रहण करती है
दोस्तों, अंधेरे में किसी का पूरा व्यक्तित्व कैसे दिख सकता है? मतलब पूरा जीवित व्यक्ति उसकी आत्मा के अंधेरे में कैसे महसूस हो सकता है। ऐसा तभी हो सकता है अगर उसके द्वारा उसके जीवन काल में कही गई व सोची गई सभी बातें, किए गए सभी व्यवहार व किए गए सभी काम उस अंधेरे में दर्ज हों। उस अंधेरे में सभी कुछ अलग अलग दर्ज होना चाहिए। अगर सब से एक ही अंधेरा कम या ज्यादा होता रहा, तब तो वह अंधेरा आम भौतिक अंधेरे जैसा होने से जड़ माना जाएगा। जैसे किस्म किस्म की वस्तुओं के रूप में किस्म किस्म का प्रकाश खत्म होकर रात के एक ही अंधेरे को बढ़ाता रहता है। अंधेरे को देखने से यह पता नहीं चलता कि इसमें कौन-कौन सी किस्म की वस्तुओं के रूप में कौन कौन से किस्म का प्रकाश समाया हुआ है। पर किसी आदमी की आत्मा के अंधेरे को महसूस करते हुए हमें उस आदमी के मन में विद्यमान किस्म किस्म की वस्तुओं के रूप में किस्म किस्म के प्रकाश समाए हुए लगते हैं। हालांकि फिर भी एक ही अविभाजित अंधेरा महसूस होता है। यह आश्चर्य ही है। शायद ब्लैकहोल में भी ऐसा ही होता हो। है तो उसमें एक ही अविभाजित अंधेरा, पर अगर कोई उसे योग आदि से गहराई से महसूस करे तो शायद उसमें उसके सभी निगले हुए पदार्थ महसूस होए, बेशक सूक्ष्मरूप में ही। विज्ञान भी कहता है कि सूचना कभी नष्ट नहीं होती। हो सकता है कि ब्लैकहोल में भी सभी पृथक पृथक पदार्थों की सूचना पृथक पृथक रूप में दर्ज या एनकोडिड हो। फिर जब उस ब्लैकहोल से नया ब्रह्मांड या तारा बनता हो तो वह सूचना फिर से पहले के जैसे स्थूल रूप में प्रकट हो जाती हो। हालांकि विज्ञान इसे नहीं मानता। इसलिए इसे एक विचारप्रयोग ही समझ लो। वैसे भी बहुत से क्षेत्र हैं, जो आधुनिक विज्ञान की समझ से परे है। अध्यात्म भी इनमें से एक है। इसीलिए कहते हैं कि आत्मा चेतन है। मतलब इसमें वह सबकुछ है जो जीवित प्राणी के मन में विविध प्रकार से है। बेशक मन में वह स्थूल रूप में होता है और आत्मा में सूक्ष्म रूप में। पर यह सिर्फ कहने की बात है और यह सापेक्ष है। आत्मा को महसूस करते हुए हमें स्थूल सूक्ष्म का जरा भी अंतर महसूस नहीं होता। हमें पूरा जीवित व्यक्ति उस अंधकारमय आत्मा के रूप में महसूस होता है। यहां तक कि स्वयं आत्मा को भी ऐसा लगता है कि वह तो पहले की तरह पूर्ण जीवित है। पता तो उसे होता है कि अब वह शरीर के बंधन से छूट गई है, पर उसे वह कोई अपने में बदलाव नहीं दिखता। मतलब वही पुराना व्यक्तित्व पर कुछ नए रूप में जैसे कि उसमें व्यापकता, अनश्वरता जैसे अतिरिक्त गुण आ जाते हैं, बेशक परमात्मा की तरह पूर्णतः नहीं पर सापेक्ष रूप में। मतलब शास्त्रों में जिसे सूक्ष्म शरीर कहा गया है उसके रूप में स्वयं आत्मा ही होती है।
शास्त्रों का सूक्ष्म शरीर आत्मा ही है। थोड़ा शब्दों को श्रृंगार देने के लिए ही सूक्ष्म शरीर का विस्तार से वर्णन है। सूक्ष्म शरीर आत्मा, बुद्धि, मन, अहंकार, पांच ज्ञानेंद्रियों, पांच कर्मेंद्रियों और पांच प्राणों से युक्त कहा गया है। इसका मतलब है कि आत्मा सोच सकती है, निर्णय ले सकती है, अपने अहम को महसूस कर सकती है, सुन सकती है, बोल सकती है, सूंघ सकती है, स्पर्श को महसूस कर सकती है, देख सकती है, हाथ से काम कर सकती है, पैर से चल सकती है, जीभ से चख सकती है, जननेंद्रिय और उपस्थेंद्रिय का कर्म कर सकती है। फिर आत्मा शरीर को क्यों धारण करती है। शायद इसीलिए ताकि उसे लहरें मिल सके। और इसलिए भी ताकि वह विकास कर के परमात्मा तक पहुंच सके। शास्त्रों में कहते हैं कि प्रेम की प्राप्ति के लिए ही आत्मा जन्म ग्रहण करती है। बात एक ही है। मन की लहरों से ही तो प्रेम बनता है। सीधे शब्दों में यही क्यों न कहें कि आत्मा कुंडलिनी योग के लिए ही शरीर ग्रहण करती है, क्योंकि कुंडलिनी योग से ही प्रेम बढ़ता है और इसी से आत्मा की मलिनता दूर होने से आत्मा का विकास भी होता है।
तो मैं वही कह रहा हूं कि आत्मा ने मेरे साथ बात की थी। अगर बात की तो उसने सोचा भी होगा। सोचा होगा तो निर्णय भी लिया होगा। अगर मेरे से बात की तो मुझे देखा भी होगा और मेरी बात भी सुनी होगी। अपने को या अपने अहंकार को तो वह महसूस करेगी ही, तभी बात कर पाएगी। मतलब उसमें सभी ज्ञानेंद्रियां थी। वाणी मतलब वाक एक कर्मेंद्रिय मानी जाती है। मतलब उसमें कर्मेंद्रिय भी थी। साथ में वह मुझे एक दूर जगह पर चल रही उस विशेष क्रियाशीलता के बारे में बता रही थी जिससे मैं प्रभावित हो सकता था। मतलब वह पैरों से चलकर वहां गई। उसके बारे में पता किया और मुझे उसकी सूचना दी। पैर भी एक कर्मेंद्रिय है। अपने शरीर वाली अवस्था के समय उस आत्मा को उस क्रियाशीलता के बारे में कुछ पता नहीं था। शरीर को इतने सारे काम करने के लिए प्राणों की और प्राणवायु की आवश्यकता होती है। बिना वायु के तो पत्ता भी नहीं हिलता। मतलब आत्मा बिना प्राणवायु ग्रहण किए या बिना सांस लिए ही प्राणों का काम भी कर रही थी। प्रकारांतर से या समझाने के लिए ऋषियों ने ऐसा लिखा है कि सूक्ष्म शरीर अर्थात जीवात्मा में पांच प्राण भी होते हैं, जो सूक्ष्मशरीर के विभिन्न काम करने में मदद करते हैं। आत्मा तो सूक्ष्म शरीर का आधार होने से उसमें सबसे प्रमुख तत्व है ही। बाकि शेष सारे तत्व तो आत्मा के ऊपर आधारित होने से आधेय ही हैं।
कुंडलिनी योग से सतोगुण और तमोगुण के बीच का रजोगुण रूपी विभवांतर कम हो जाता है
आदमी चाह कर भी अपने गुणों की हलचल को नहीं रोक सकता। प्राणवायु गुणों में ऐसे ही लहरें पैदा करती रहती है, जैसे वायु समुद्र में तूफान पैदा करती है। हालांकि जिन योगियों ने प्राणायाम आदि से प्राणवायु को वश में कर लिया होता है, वे काफी हद तक इन लहरों को नियंत्रित कर के अपने असली व गुणों के आधारभूत स्तर वाले जीवात्म स्वरूप को जान भी लेते हैं। एक आदमी को लें जिसने हमेशा तूफान वाला समुद्र ही देखा है, और कभी भी शांत और निश्चल समुद्र नहीं देखा है। वह समझेगा कि समुद्र हमेशा ऐसा ही होता है और वही उसका असली स्वरूप है। उसे समुद्र के, बिना लहर वाले, असली व आधारभूत रूप के जैसे निश्चल जीवात्मा रूप का कोई ज्ञान नहीं होगा। उसे अगर उसकी जगह कभी बिल्कुल शांत समुद्र दिख गया या मान लो कि पोलर रीजन का ठंड से जमा हुआ समुद्र दिख गया, तो वह कहेगा कि समुद्र सूख गया या खत्म हो गया। ऐसे ही जिंदा आदमी को मरा हुआ देखने पर लोग कहते हैं कि वह तो मर गया, पर आदमी कभी नहीं मरता। यहां यह उल्लेखनीय है कि यह शरीर के प्रति लापरवाही जैसे कि स्वयं को नुकसान पहुंचाने की प्रवृत्ति या आत्महत्या आदि का सकारात्मक मूल्यांकन नहीं है। शरीर तो मरता ही है। फिर पता नहीं कब नया शरीर मिले, कैसा जैसा मिले, क्या पता कितनी कठिनाइयों के साथ मिले, मिलने के बाद भी पता नहीं कितने समय जिंदा रहे, किसको पता। इसलिए शरीर का भलीभांति ख्याल तो रखना ही चाहिए। इस बात का असली मतलब यह है कि आदमी की आत्मा कभी नहीं मरती, क्योंकि आत्मा ही आदमी का असली रूप है। यह ऐसे ही है, जैसे एक आदमी ने हमेशा मन की लहरों के रूप वाले अर्थात बदलते गुणों वाले अपने स्वरूप को ही महसूस किया है। उसे पता ही नहीं है कि यह लहरों वाला स्वरूप उसका आधारभूत स्वरूप नहीं है। उसने कभी योग, ध्यान आदि से मन को शांत नहीं किया। तूफान वाले सभी समुद्र एक जैसे ही लगते हैं, क्योंकि उनमें पानी ढंग से नजर नहीं आता। पर जब तूफान शांत हो जाता है, तब किसी का पानी नीला तो किसी का हरा नजर आता है। किसी का पानी कम तो किसी का ज्यादा नमकीन होता है। किसी में शैवाल आदि समुद्री वनस्पति कम होती है तो किसी में ज्यादा। किसी में किसी किस्म के समुद्री जलचर होंगे तो किसी में किसी अन्य किस्म के। इसी तरह ताबड़तोड़ मानसिक तूफान वाले आदमी भी एक जैसे लगते हैं। जैसे ही हम उनके किसी गुण पर ध्यान केंद्रित करने लगते हैं, वह गुण उसी पल बदल जाता है। इसी वजह से तो मृत्यु के बाद की आत्मा के साक्षात्कार से ही उसके आधारभूत गुणों वाले स्वरूप के बारे में सही और विस्तृत सूचना मिल सकती है। हालांकि ऐसा नहीं कि टीवी की तरह सबकुछ दिखता है, पर उसके औसत सूक्ष्म स्वरूप का अनुभव होता है। बेशक वह रूप हमें कुछ घुटन भरा लग सकता है, क्योंकि हमें उसकी आदत नहीं है। पर उस जीवात्मा को तो ऐसा नहीं लगेगा क्योंकि वह तो अपने उस स्वरूप की अभ्यस्त हो चुकी होगी।
सृष्टि में जितनी जीवात्माएं हैं, समुद्र भी उतने ही हैं
यह बहुत रोचक विषय है और लिखते रहने से नई से नई गुत्थियां सुलझती रहती हैं। और अगर साथ में थोड़ा बहुत अनुभव भी हो तब तो कहने ही क्या। ऊंची उठी लहर को सुख या सतोगुण मान लो और समुद्र की सामान्य सतह से नीचे गिरी हुई लहर को दुख या तमोगुण मान लो। जीवन भर मन में ऐसा ही चलता रहता है। मरने के बाद मन या आत्मा समुद्र की सामान्य सतह जैसा हो जाता है। न लहर ऊपर को और न नीचे को। न सुख, न दुख। पर ऐसा नहीं है, क्योंकि अगर गुण हैं तो सुख और दुख तो साथ रहेंगे ही। यह तो त्रिगुणातीत परमात्मा ही है जिसमें न सुख है न दुख, सिर्फ़ निरपेक्ष आनंद है। ऐसा समझ लो कि इसमें सतोगुण और तमोगुण दोनों ही हैं। हालांकि दोनों कम मात्रा में हैं क्योंकि उनको उठाने या गिराने वाला अर्थात उनमें लहरें पैदा करने वाला शरीर नहीं है। यही गुणों की साम्यावस्था है। मतलब सतोगुण भी एक बराबर और तमोगुण भी एक बराबर। कोई कहेगा कि फिर सभी लोगों में तीनों गुणों की मात्रा अलग अलग कैसे होगी। देखो, जिसमें मृत्यु के समय ज्यादा सतोगुण होगा, वह मृत्यु के बाद वहीं फिक्स हो जाएगा मतलब बाद में भी ज्यादा बना रहेगा। यह ऐसे ही कि अगर ध्रुवीय समुद्र के जमते समय उसकी लहर ऊपर को उठी होगी तो वह जमने के बाद भी उतनी ही ऊपर उठी रहेगी, वहां से बदलेगी नहीं। यह भी सत्य है कि मृत्यु के समय अक्सर गुण वैसे ही रहते हैं जैसे उसके पिछले सारे गुणों और कर्मों का औसत रूप होता है। मतलब सब लोगों की आत्मा में अंधेरे की अलग अलग मात्रा होगी। चाहे दो व्यक्ति आपस में कितने ही ज्यादा नजदीकी क्यों न हों, दोनों की आत्माओं में अंधेरे की मात्रा एकसमान हो ही नहीं सकती। यह असंभव है। कुछ न कुछ फर्क तो रहेगा ही। इसीलिए तो कभी आत्मा के मामले में धोखा नहीं होता कि फलां की आत्मा गलती से फलां के शरीर में चली गई। जो कथा कहानियों में होता है, वो शिक्षात्मक रूपक ही लगता है। जब किसी के शरीर पर प्रेत आदि का कब्जा होता है तो वह साफ बताता है कि वह प्रेत है। इसीलिए उसे तांत्रिक आदि से भगाया जाता है। अगर किसी की आत्मा की फोटोकॉपी बनने की किसी में ताकत होती तो प्रेत भी बन जाता। फिर किसी को पता न चलता और उसे दूसरे के शरीर से कोई भगाता भी न। पर ऐसा नहीं होता। इसीलिए कहते हैं कि मृत्यु के समय की मानसिक स्थिति मृत्यु के बाद की गति को निर्धारित करती है। इसीलिए कई लोग मरने के लिए काशी जैसे तीर्थों में जाते हैं, कई मृत्यु के समय गीता आदि आध्यात्मिक ग्रंथ सुनते हैं। यहां पर एक पेच और खुलता है। बेशक मरने के बाद जीवात्मा परमात्मा के जैसा परिवर्तनरहित और हलचल से रहित, शांत और व्यापक बन जाता है, पर दोनों में बहुत बड़ा अंतर है। जीवात्मा निर्गुण जैसा लगता हुआ भी तीनों गुणों से बंधा होता है, पर परमात्मा असली निर्गुण अर्थात गुणातीत होता है। इसीलिए वह जीवात्मा से भी ज्यादा और यूं कहो कि परम सूक्ष्म, परम व्यापक, परम परिवर्तनरहित, परम शांत, और परम सच्चिदानंद रूप होता है। यह खासकर उन लोगों को समझना चाहिए जो परमात्मा और जीवात्मा को करीब एकजैसा मानने के धोखे में पड़े होते हैं। कई दफनाए हुए मृत शरीर आदि की पूजा करते हैं। कई ऐसा समझते हैं कि मरने के बाद उनका जन्नत का टिकट कटा हुआ है।
कुंडलिनी योग कामयाब संभोग में मदद करता है
कुंडलिनी योग सेक्स का एक अभिन्न अंग है
एक और रहस्यपूर्ण तथ्य जो मैं आपको बताता हूँ, वह यह है कि यौन संपर्क के दौरान भी यह मूल स्तर की आत्मा का संपर्क सबसे गहरा होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि सेक्स के समय व्यक्ति दो यौन साथियों को छोड़कर पूरी तरह से अकेला रहना चाहता है। न दुनिया की और न ही दुनियावी विचारों की दखलंदाजी चाहता है। यह प्रवृत्ति ही यौन मामलों में शर्मीलेपन की उत्पत्ति करती है। कोई भी सार्वजनिक रूप से सेक्स नहीं करना चाहता क्योंकि तब वह सेक्स नहीं बल्कि केवल एक नाटक होता है। यहाँ तक कि कोई भी अपने वास्तविक यौन अनुभव के बारे में बात नहीं करना चाहता, धोखेबाज़ों द्वारा प्रचारित यौन नाटक की तो बात ही छोड़िए। तो सोचो कि सांसारिक अराजकता से पूरी तरह से दूर मूल आत्मा के रूप से अधिक अकेलापन क्या हो सकता है। यहाँ तक कि संभोग के समय यौन ऊर्जा भी इतनी अधिक होती है कि यह उस अल्पकालिक मूल आत्मा के संपर्क के समय पर्याप्त से अधिक आनंद प्रदान करती है। इस तरह प्रेम भी बढ़ता है। यह आम तौर पर देखा जाता है कि दिवंगत आत्मा का संपर्क अक्सर तांत्रिक मिश्रित यौन वातावरण में होता है। इसका कारण एक ही है कि तंत्र की तीव्र यौन ऊर्जा उस अल्पकालिक घुटन भरे आत्मिक संपर्क को झेलने के लिए पर्याप्त शक्ति प्रदान करती है। साधारण सेक्स पर्याप्त नहीं होता, क्योंकि इसमें मन पर कम नियंत्रण होता है और साथ ही, यह कम अवधि का होता है। कुंडलिनी योग आधारित तंत्र यौन अनुभव को बढ़ाता है क्योंकि यह कुंडलिनी ध्यान की मदद से अकेलेपन के स्तर को और ज्यादा बढ़ाता है जो आनंदमय और सफल सेक्स के लिए आवश्यक है। कुंडलिनी ध्यान एक मानसिक कुंडलिनी छवि को छोड़कर हर सांसारिक अराजकता को खत्म कर देता है। यह आवश्यक भी है क्योंकि हम मानसिक शक्ति को रोक कर नहीं रख सकते हैं, और ऐसा करते समय यह घुटन भरा होता है और आनंद भी रुक सा जाता है। फिर आनंद के बिना सेक्स कैसा। लेकिन कुंडलिनी छवि को ध्यान में रखते हुए, यह गहन आनंद का स्रोत बन जाता है। यह पूरी तरह से अकेलेपन के समान है क्योंकि मानसिक कुंडलिनी छवि कुछ भी भौतिक नहीं बल्कि केवल एक मानसिक रचना है। इसीलिए कहते हैं कि असली प्रेम एकबार में एक से ही हो सकता है, दो से नहीं। तंत्र भी लंबे समय तक एक ही साथी के साथ रहने की वकालत करता है। हालांकि यह जानना महत्वपूर्ण और दिलचस्प है कि एक व्यक्ति जिसे कई साथियों द्वारा बुरी तरह से फटकार लगाई जाती है, वही केवल एक ही साथी के साथ पूर्ण शांति में रहना चाहता है। शायद संभोग में आनंद भी इसीलिए है क्योंकि यह आत्मा की सर्वाधिक गहराई तक जाने का प्रयास करता है, और आत्मा तो आनंद का खजाना है ही। वास्तव में सेक्स विज्ञान जितना जाना जाता है उससे कहीं अधिक गहरा और विशाल है जैसा कि ओशो महाराज ने सच ही कहा है।
आत्मा और जगत प्रकाश और अंधकार का परस्पर खेल है
मुझे तो लगता है कि जिसे हम सतोगुण समझते हैं, वही नेपथ्य में तमोगुण बन रहा होता है। यह ऐसे है जैसे धूप से ही छांव बनती है। इसका मतलब है कि जीवात्मा ने शुरु से जो कुछ भी अनुभव किया है, वह सभी कुछ उसमें तमोगुण अर्थात अंधेरे के रूप में मौजूद है। आगे भी वह जो महसूस करती रहेगी, वह भी अंधेरे के रूप में दर्ज होता रहेगा। यह ऐसे ही है जैसे जितनी अधिक और जैसी धूप होगी, छांव भी उतनी ही ज्यादा और वैसी ही बनेगी। वृक्ष की जैसी पत्तियां होंगी, छांव भी वैसी ही बनेगी। अर्थात जैसा शरीर या मन या मस्तिष्क होगा, तमोगुण रूपी छांव भी उसकी वैसी ही बनेगी। मतलब कि छांव में उसको बनाने वाली धूप या रौशनी या उसकी पत्तियों से छनकर आई हुई धूप के बारे में पूरी सूचना दर्ज है। सतोगुण तो आत्मा का अपना शुद्ध रूप है ही। वह तो रहेगा ही। वह तो मिट नहीं सकता। यह हो सकता है कि तमोगुण की मात्रा के अनुसार वह कम या ज्यादा महसूस होए। अगर तमोगुण ज्यादा होगा तो सतोगुण कम होगा और अगर तमोगुण कम होगा तो सतोगुण ज्यादा होगा। रजोगुण भी आत्मा की उस स्वाभाविक चेष्टा के रूप में होगा जिसके तहत वह तमोगुण से सतोगुण की तरफ जाना चाहती है। इसका मतलब है कि हम अगर दुनिया को महसूस न करें, तो वह आत्मा में तमोगुण के रूप में दर्ज नहीं होगी। पर दुनिया से किनारा कर पाना भी संभव नहीं है। तमोगुण की बात तो बाद में आएगी, पहले भूखे मरने की नौबत आ सकती है। बीच वाला मध्य मार्ग है अनासक्ति का। मतलब दुनियादारी को बिना आसक्ति के अनुभव करना है। इससे दुनियादारी भी चलती रहेगी और उसकी छांव भी आत्मा पर नहीं जम पाएगी या कम जमेगी। ऐसा योग से आसानी से संभव है। शास्त्रों में आसक्तिरहित सात्त्विक तरीकों को अपनाने के लिए इसलिए बोला जाता है ताकि इसके सात्त्विक संस्कार मन में पड़ते रहें। सात्विक संस्कारों को मन से निकालने में कम मेहनत लगती है जिससे मुक्ति की संभावना बढ़ जाती है। यदि इनको मन में न डाला जाए तो ऊटपटांग संस्कार मन में पड़ते रहेंगे क्योंकि मन खाली नहीं रह सकता। इन्हें बाहर निकालना बहुत मुश्किल होता है जिससे मुक्ति की संभावना काफी घट जाती है। पर इसी से बात नहीं बनेगी। पिछ्ले अनगिनत जन्मों की दुनियादारी की छाप की कालिख जो आत्मा पर जमी है, उसे भी साफ करना पड़ेगा। वह भी कुंडलिनी योग से ही होगा, खासकर एग्रेसिव तांत्रिक कुंडलिनी योग से। इससे आत्मा में सतोगुण बढ़ेगा और तमोगुण और रजोगुण कम हो जाएगा। रजोगुण इसलिए कम होगा क्योंकि अब नाममात्र के तमोगुण में इतना पोटेंशल नहीं है कि वह तेज गति से सतोगुण की तरफ जा सके। यह लेटेंट रजोगुण भी बिजली के दो विपरीत ध्रुवों के बीच के विभवांतर की तरह होता है। जितना ज्यादा अंतर उनके विपरीत आवेश के बीच में होगा, उतनी ही रफ्तार और अधिकता से विद्युत प्रवाह उनको जोड़ने वाले परिपथ में दौड़ेगा। शुद्ध आत्मा का सतोगुण तो सर्वोच्च और निश्चित निर्धारित है। बद्ध जीवात्मा के तमोगुण की मात्रा ही निर्धारित करेगी कि उनके बीच में रजोगुण रूपी विभवांतर कम होगा या ज्यादा। देखो, दोनों के बीच परिपथ तो तभी जुड़ेगा जब जीवात्मा को शरीर मिलेगा। फिर उनके बीच में मानसिक विचारों के रूप में खूब विद्युत प्रवाह बहेगा। वह जीवात्मा के तमोगुण के अनुसार कम ज्यादा होता रहेगा। इसीलिए तो पार्टी आदि में ड्रिंक आदि करने के बाद लोग तरोताजा होकर नई उमंग और जोश से अपने काम धंधे में पहले से भी ज्यादा लग जाते हैं। यह तो सिर्फ एक उदाहरण है और अध्यात्म के मामले में हानिकारक भी हो सकता है। कई लोग लंबे समय तक अकेलापन बिताने के बाद नई और बढ़ी हुई शक्ति के साथ दुनियादारी में उतरते हैं। यह अकेलेपन की तमोगुण की ही शक्ति होती है। कुंडलिनी योग से तमोगुण घट जाता है। इससे सतोगुण और तमोगुण के बीच रजोगुण रूपी विभवांतर कम हो जाता है। इसीलिए योगी का व्यवहार इंपलसिव या तुनकमिजाजी या अंध प्रगतिशील नहीं होता, बल्कि धीर, गंभीर और व्यवस्थाशील होता है। कई बार तंत्रयोगी देशकाल की मांग के अनुसार अस्थायी इंपलसिव व्यवहार प्राप्त करने के लिए अस्थाई रूप से तमोगुण को स्वीकार भी कर सकते हैं। बिना शरीर की जीवात्मा में यह रजोगुण लेटेंट विभवांतर के रूप में रहता है। मतलब अंधेरे से प्रकाश की तरफ जाने का बल तो लग रहा होता है, पर शरीररूपी विद्युत परिपथ न होने के कारण अंधकार प्रकाश तक जा नहीं पाता। मतलब तमोगुण सतोगुण नहीं बन पाता।
कुंडलिनी तंत्र का मूल आधार शिव-लिंग
मित्रों, शिवपुराण की एक कथा के अनुसार एकबार कुछ शिष्यों ने कथावक्ता से पूछा कि क्या शिवलिंग लिंग होने के कारण ही हर जगह पूजित है या कोई अन्य कारण है। इस पर वे एक कथा सुनाते हैं कि दारुक नाम के एक श्रेष्ठ वन में शिवजी के ध्यान में नित्य तत्पर शिवभक्त रहा करते थे। किसी समय वे समिधा लेने वन में गए हुए थे। उसी समय शिव उन्हें शिक्षा देने और उनकी परीक्षा लेने के लिए एक तांत्रिक अवधूत के वेष में आए, जो लिंग को हाथ में धारण कर के दुष्ट चेष्टा कर रहे थे। उनको देखकर ऋषिपत्नियां बहुत डर गईं। और अन्य बेताब और आश्चर्यचकित होकर वहां चली आईं। कुछ अन्य स्त्रियों ने एकदूसरे का हाथ पकड़कर परस्पर आलिंगन किया। कुछ स्त्रियां उस आलिंगन के घर्षण से आनंदमग्न हो गईं। उसी समय ऋषिवर आ गए और उस आचरण को देखकर दुखी और क्रोध से व्याकुल हो गए। वे आपस में कहने लगे, यह कौन है, यह कौन है। जब तांत्रिक अवधूत ने कुछ नहीं कहा तो उन्होंने उसे यह कहते हुए श्राप दिया कि वह वेदविरुद्ध आचरण कर रहा था इसलिए उसका लिंग भूमि पर गिर जाए। ऐसा ही हुआ। उस लिंग ने अग्नि की तरह सामने स्थित सभी वस्तुओं को जला दिया। जहां वह जाता, वहां सबकुछ जला देता। वह पाताल में गया, स्वर्ग में गया, भूमि पर भी सर्वत्र गया, पर कहीं स्थिर नहीं हुआ। सभी लोक व्याकुल हो गए, और वे ऋषिगण भी बहुत दुखी हुए। किसी भी देवता या ऋषि को शांति नहीं मिली। जिन देवों और ऋषियों ने शिव को नहीं पहचाना, वे ब्रह्मा की शरण में गए। ब्रह्मा ने यह कहते हुए उन्हें खूब लताड़ा कि आम आदमी अगर शिव को न पहचान पाए तो बात समझ आती है पर उनके जैसे ज्ञानी लोग शिव को कैसे नहीं पहचान पाए, और कहा कि अगर देवी पार्वती योनिरूपा बन जाए तो यह स्थिर हो जाएगा। देवी को प्रसन्न करने को यह निम्न विधि उनको बताई। अष्टदल वाला कमल बनाकर उसके ऊपर एक कलश स्थापित कर उसमें दूर्वा तथा यवांकुरों से युक्त तीर्थ का जल भरना चाहिए। फिर वेदमंत्रों के द्वारा उस कुंभ को अभिमंत्रित करना चाहिए। फिर वेदोक्त रीति से उसका पूजन करके शिव का स्मरण करते हुए शतरुद्रीय मंत्रों से कलश के जल से उस शिवलिंग का अभिषेक करना चाहिए। फिर उन्हीं मंत्रों से लिंग का प्रोक्षण मतलब छिड़काव करें, तब वह शांत हो जाएगा। फिर गिरिजायोनि रूपी बाण को स्थापित करके उस पर लिंग को स्थापित करना चाहिए, और फिर उसको अभिमंत्रित करना चाहिए। फिर षोडशोपचार मतलब सोलह किस्म की सामग्रियों से परमेश्वर का पूजन करना चाहिए, और फिर उनकी स्तुति करनी चाहिए। इससे लिंग स्थिर और स्वस्थ हो जाएगा, तथा तीनों लोक विकार से रहित और सुखी हो जाएंगे।
वैसे इस कथा का स्पष्टीकरण नहीं हो सकता। यह आस्था से जुड़ा हुआ एक संवेदनशील धार्मिक मामला है। इसे खुद ही समझा जा सकता है। हां इतना जरूर कह सकते हैं कि हरेक आदमी अपने यौनसाथी की खोज में कभी न कभी जरूर भटकता है। उस दौरान उसके मन में जो समाधि चित्र बना होता है, वह उसे चिड़चिड़ा सा और जलाभुना सा जरूर बना सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि समाधि के लिए अतिरिक्त ऊर्जा की जरूरत होती है, जो किसी नजदीकी साथी के सहयोग से ही मिल सकती है। अष्टदल कमल अनाहत चक्र का प्रतीक है, और प्रेम उस पर ही उपजता है। उस पर तीर्थों के जल से भरे कलश को रखने का मतलब उस पर ध्यान शक्ति को इकट्ठा करके केंद्रित करना है। विभिन्न तीर्थ मतलब विभिन्न चक्र। दूर्वा घास प्रजनन, वृद्धि और विकास का प्रतीक है। यव अंकुर मतलब अंकुरित हुए जौ चढ़दी कला मतलब चहुंमुखी विकास का प्रतीक हैं, क्योंकि उसमें हर किस्म के टॉनिक, विटामिंस और मिनरल्स होते हैं, इसीलिए इसे ग्रीन ब्लड भी कहते हैं। इसका आम भाषा में यही मतलब लगता है कि दिल पर अर्थात प्यार पर अपना सबकुछ न्यौछावर कर देना। जोगी भी ऐसे ही होते हैं, जो घरबार छोड़कर अपने देवता की पूजा अर्चना में लग जाते हैं, और ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं। उस कलश के पूजन का मतलब है, हृदय से शक्ति के साथ जुड़े देवरूप आदि ध्यानचित्र का पूजन। जिससे वह ज्यादा प्रकाशित अर्थात प्रसन्न होता है, जैसे किसी आदमी की सेवा से वह आदमी प्रसन्न हो जाता है। वेदमंत्राें से पूजन का मतलब है, उस चित्र को और ज्यादा धार देते हुए और स्पष्ट, शुद्ध और प्रकाशमान बनाना। बीजमंत्र भी ऐसा ही करते हैं। वह मानसिक ध्यान चित्र गुरु, प्रेमिका, देवता, बीजमंत्र आदि किसी का भी हो सकता है। उस पूजित चित्र से मिश्रित शक्ति को फिर अनाहत चक्र से स्वाधिष्ठान और मूलाधार चक्र को उतारा जाता है। यही कलश के जल से उस दिव्य लिंग का अभिषेक है। अभिषेक में पवित्र जलरूपी शक्ति की धारा निरंतर चलती है। प्रोक्षण जल के छिड़काव को कहते हैं। हृदयकलश से शक्ति को सुबहशाम की साधना से बारंबार नीचे उतारना ही ही दिव्य प्रोक्षण है। शतरुद्रीय मंत्र में विभिन्न बीजमंत्र आदि हैं, जो विभिन्न अदृश्य तरंगें छोड़ते हैं, जो आदमी के मन पर अदृश्य दिव्य आध्यात्मिक प्रभाव डालते हैं। वैसे कुदरती बाणलिंग नर्मदा नदी में मिलते हैं, पर लगता है कि कथा में बाण को लिंग के आसन अर्थात पीठ के रूप में कहा गया है। मैंने जब बिंग एआई से पता किया तो उसने जवाब दिया कि एक अभिमंत्रित बाण को जमीन के अंदर गाड़ा जाता है, और उसके ऊपर शिवलिंग को स्थापित किया जाता है। हो सकता है कि यह ठीक कह रहा हो। क्योंकि कई स्थानों पर ऐसे शिवलिंग देखे जाते हैं जिनकी पीठ या आधार ही नहीं होता। पूछने पर वहां के पुजारी आदि बताते हैं कि यह शिवलिंग जमीन में गहराई तक गढ़ा होता है। हो सकता है, जमीन के अन्दर बाण ही उसकी पीठ हो। वैसे पीठ का आकार भी बाण से मिलता जुलता सा होता है। फिर उसके आगे तो आम आदमी की भाषा में तांत्रिक या दैवीय संभोगयोग ही लगता है। वैसे सबकी अपनी अपनी सोच हो सकती है। उससे तीनों लोक मतलब पूरा शरीर शांत और स्वस्थ मतलब अपने शुद्ध आत्मरूप में स्थित हो जाता है, क्योंकि सब लोक शरीर में ही हैं। यह दुनिया में अक्सर देखा जाता है इसीलिए बिगड़े हुए या बिगड़ रहे नौजवानों का विवाह उनके परिवार वाले जल्दी में करते हैं। उसके बाद मैंने बहुत से सुधरते हुए देखे हैं। पर कुछ नहीं भी सुधरते। इसमें उनकी पत्नियों का कसूर भी लगता है मुझे, शायद हालांकि ज्यादा कसूरवार तो पुरुष ही होते हैं। इसीलिए कहा है कि शिवलिंग को पार्वती रूपी पीठ ही धारण कर सकती है। इसीलिए तो स्त्री को अध्यात्मिक संस्कार देना पुरुष से भी ज्यादा जरूरी समझा जाता था, क्योंकि स्त्री ही पूरे परिवार की नींव होती है। मैंने एक व्यस्क आदमी को अपनी निजी राय जाहिर करते सुना था कि अगर पुरुषों का विवाह न हुआ करता तो वे एकदूसरे को कच्चा ही खा जाया करते, क्योंकि पत्नियां ही पुरुषों को नियंत्रित करती हैं। उन्होने खुद अपनी पहली पत्नि की मृत्यु के बाद एक अन्य महिला से विवाह क्रिया हुआ था। बात सही भी है। एक मित्र भी कह रहे थे कि तांत्रिक संभोग तो संभोग ही नहीं लगता, वह तो कोई और ही अति पवित्र अध्यात्मिक कर्म बन जाता है। मुझे लगता है कि मूर्ख, नकारात्मक, असफल और विधर्मी लोग ही दोनों को एक श्रेणी में रखकर अपने दिल की भड़ास निकालते हैं। एक पुस्तक लव स्टोरी ऑफ ए योगी में तो लेखक एक महिला के द्वारा उसके कुंडलिनी जागरण की मुख्य वजह पूछे जाने पर अपना अनुभव प्रश्नकर्ता को चिह्नित करने की बजाय सबको सुनाते हुऐ कहता है कि उसने वज्रशिखा की संवेदना पर कुंडलिनी चित्र का ध्यान करते हुए उसे उसके पूरक अंग में अंदरबाहर करते हुए ही जागृति प्राप्त की, पर जो उसने किया वह संभोग नहीं था। इस पर ऑनलाइन कुंडलिनी ग्रुप पर मौजूद वह प्रश्न पूछने वाली पाश्चात्य या संभवतः अमेरिकन महिला प्रेमभरी हैरानी और कुछ मजाकिया लहजे से उसे पिनपोइंट करते हुए उससे कहती है कि हमारे देश में तो उसे संभोग ही कहते हैं, वह पता नहीं कौनसी अचरजभरी संस्कृति या भूमि से ताल्लुक रखता है। उसके बाद उस विषय पर उस ग्रुप में सबके संवाद बंद हो गए थे, और तंत्र की उपयोगिता का विषय सामने आ गया था, जिसमें जागृति के लिए तंत्र की सर्वाधिक महत्ता को सभी स्वीकार कर रहे थे। मतलब लेखक ने अपने दिल की बात भी रख दी थी और अप्रत्यक्ष तौर पर मुख्य प्रश्न का जवाब भी दे दिया था। वैसे यह कथा मिस्र की अंखिंग तकनीक की तरह भी लग रही है।
मतलब यह साफ है कि इस कथा में विधर्मियों या हिंदु विरोधियों द्वारा फैलाए गए दुष्प्रचार का खंडन किया गया है। ऋषि बहुत दूरदर्शी होते थे। उन्हें पता था कि आने वाले समय में ऐसा हो सकता था। यह कथा भी समाज में घटने वाली आम घटना को दर्शाती है, कोई दिव्य पारलौकिक आदि नहीं। अविवाहित किशोर व्यक्ति ऐसे ही होते हैं। वे मौका मिलने पर युवतियों से लिंगोन्मुखी मजाक करते रहते हैं। उनमें से कोई शिव किस्म का तंत्र का असली हकदार भी होता है। पर लोग तो सबको एक जैसा लंपट बदमाश समझते हैं। कहते हैं कि दाने के साथ घुन भी पिसता है। उन्हें क्या पता कौन सच्चा है और कौन झूठा। इसलिए औरों के साथ वे शैव का भी अपमान करके शाप दे देते हैं, मतलब उसे भी बुरी नजर से देखते हैं। वस्तुतः शैव का लिंग कोई सामान्य लिंग नहीं होता। शैवतंत्र के प्रभाव से वह साक्षात इष्ट देवता होता है। एक प्रकार से साधना के प्रभाव से वह शैव व्यक्ति लिंगरूप बन जाता है। वह जहां भी जाता है, एक किस्म से उसके रूप में उसका इष्टदेवरूपी लिंग ही जा रहा होता है। उस इष्टदेव की नाराजगी सबको परेशान करती है, मतलब जलाती है। ऐसा भी हो सकता है, क्योंकि सारा विश्व लोगों के भटकते मन में है, और उस शैवलिंगरूपी इष्टदेव के सान्निध्य से उनका अपने भटकते मन से मोहभंग हो रहा होता है, इसीको जगत का जलना कहा गया हो सकता है। उस माहेश्वर लिंग को पार्वती के जैसी तंत्रयोगिनी ही सही से धारण कर सकती है, ताकि उसके साथ इष्टदेव रूपी ध्यानचित्र का ध्यान भी हो सके। आम महिला तो ध्यान में सहयोग कर ही नहीं पाएगी। मतलब इससे इष्टदेव नाराज मतलब बिना जागृति के ही रहेगा। बिना जागृति की कुंडलिनी क्रियाशीलता नुकसानदायक भी हो सकती है, क्योंकि वह नियंत्रण से बाहर भी हो सकती है। अनियंत्रित शक्ति सबको जलाएगी ही। जागृति आदमी को शक्ति का असली और पूर्ण रूप दिखाती है। और वह रूप सबसे सुंदर और शक्तिशाली होने पर भी परम शांत होता है। इससे आदमी शांत रहता है, मतलब जागृति के नियंत्रण में रहता है।
यह कथा मुझे शिवपुराण की सबसे सारगर्भित कथा लगी। इस पर कोई जितना चाहे लिख सकता है। ऋषियों ने जो शुरु में पूछा था कि क्या शिवलिंग लिंग होने के कारण ही पूजित है, या कोई अन्य कारण है, इसका उत्तर बहुत सभ्य तरीके से दिया गया है इसमें। यह ऐसा ही है जैसा उत्तर उपरोक्त लेखक ने दिया था। मतलब शिवलिंग सामान्य लौकिक लिंग नहीं है, जैसा कि मूर्ख, दुष्ट, लंपट बदमाश, भौतिकवाद की मोहमाया में उलझे हुए, अति कर्मप्रधान, धर्मविरोधी या सैक्सी किस्म के लोग समझते हैं या बोलते हैं। हैरानी तब होती है जब बहुत से हिंदु भी उनके बहकावे और उकसावे में आ जाते हैं, और वैसा ही समझने लगते हैं। वे सोशल मीडिया आदि पर हर जगह शिवलिंग को शिव के शरीर का अंग समझने पर ही पाबंदी लगा देते हैं, कहने लगते हैं कि यह तो केवल शिव का चिह्न या प्रतीक है, या केवल शिवशक्ति मिलन का प्रतीक है, किसी शारीरिक कर्म आदि का नहीं आदि आदि। वैसे अपनी जगह पर और अध्यात्मवैज्ञानिक सोच के हिसाब वे सही ही कह रहे होते हैं, क्योंकि साधारण सांसारिक वस्तु या अंग जैसी इसमें कोई बात ही नहीं है। उनसे सीखकर बिंग एआई भी ऐसा ही कहता है। इस मामले में अगर विधर्मी लोग अति नीचे गिरते हैं, तो वे तथाकथित हिंदुरक्षक अति ऊपर उठ जाते हैं। व्यावहारिक दुनिया के बीच में अर्थात मध्यमार्ग पर कोई नहीं रहते। अति सर्वत्र वर्जयेत। मध्यमार्ग ही सर्वोत्तम है। इसको एक उदाहरण से समझ सकते हैं। एक ही बंदूक होती है। एक सभ्य आदमी उससे आतंकवादी को मारता है, तो दूसरा सिरफिरा व्यक्ति आम जनता को। इसमें बंदूक का क्या दोष। इसी तरह शिवनियंत्रित शिवलिंग अज्ञानरूपी राक्षस को मारता है, तो इसके विपरीत आमजनप्रयुक्त इसका साधारण रूप ज्ञानरूपी देवता को। एकबार मेरी मुलाकात एक तांत्रिक व्यक्ति से हुई थी, जो मेरे मित्र का मित्र था। उसने कामाक्षी मंदिर में गुरु से दीक्षा ली हुई थी। वह बता रहा था कि उसके सामने एक तांत्रिक ने भीड़ भरी सड़क से गुजर रही आम व अनजानी महिला पर अपनी वशीकरण विद्या चलाई थी, जिससे वह उसके बुलाने पर उसके पीछे आकर उसके साथ कुछ भी करने को तैयार थी। हालांकि वह तो अपनी विद्या का परीक्षण कर रहा था, इसलिए उसने वशीकरण को बंद कर दिया, जिससे वह महिला वापिस अपने रास्ते चली गई। सच्चे तांत्रिक तो कभी गलत काम करते भी नहीं हैं, अगर करते हैं तो सीधे नरक को जाते हैं। बोलने का मतलब है कि उपरोक्त पौराणिक कथा के अन्दर भी कोई ऐसा ही वशीकरण रहस्य छिपा हुआ, क्योंकि पुराने जमाने के लोगों के लिए तो जागृति ही सबसे अहम उपलब्धि हुआ करती थी, जिसके लिए वे सबसे अधिक प्रयास किया करते थे। आजकल तो और भी बहुतेरी विद्याओं और कलाओं का बोलबाला है, जिसके लिए लोग बहुत संघर्ष करते हैं। फिर भी वे पौराणिक विद्याएं अभी भी गुरुपरंपराओं में जीवित हो सकती हैं, जिन्हें यदि राजसहायता मिले तो उन्हें खोजा जा सकता है, और उन्हें भविष्य के लिए संरक्षित किया जा सकता है।
कुंडलिनी वामन भगवान बनके शुक्राचार्य की द्वैतरूपी आंख फोड़ती है
दोस्तों, पिछली पोस्ट को जारी रखते हुए, वह बलिरूपी अहंकार वामन को मजबूरन आने देता है, और उसे अंदेशा भी हो जाता है कि वह कुंडलिनी जागरण के बाद बच नहीं सकता। वैसे महिमा ऐसे गाई गई है कि राजा बलि सबसे बड़ा दानवीर था, जिसने अपना भावी नाश जानते हुए भी वामन को तीन पग जमीन दान में दी। हरेक जीव राजा बलि की तरह परम दानवीर होता है। वह यह जानकर कि कुंडलिनी योग से उसका अहंकार नष्ट हो जाएगा, उसका असीमित भौतिक संसार नष्ट हो जाएगा, फिर भी वह कभी न कभी जरूर कुंडलिनी साधना करता है। जब आदमी राजा बलि की तरह अच्छे कर्मों में लगा होता है, तब कभी न कभी भगवान विष्णु उसका भला करने एक ध्यानचित्र के रूप में उसके पास आते हैं। वे मित्र, प्रेमी, गुरु या देवता किसी भी रूप में हो सकते हैं। गुरु को भी तो भगवान का ही रूप समझा जाता है। वैसे भी हर किसी के लिए अपना प्रेमी भगवान ही होता है। उदाहरण के लिए मान लो कि किसी पुरुष की जिंदगी में एक स्त्री का प्रवेश होता है। पुरुष के बीसों कारोबार होते हैं, और सैंकड़ों रिश्ते। उनके कारण उसके मन में अनगिनत विचारचित्र बने होते हैं। इसलिए वह उस स्त्री को हल्के में ले लेता है, और सोचता है कि उसके विस्तृत भौतिक संसार के सामने एक स्त्री कुछ भी नहीं है। वह उसे अपने मन में जगह बनाने देता है, मतलब वह उससे जुड़े भाव या सत्त्वगुणरूपी पहले कदम, गति या रजोगुणरूपी दूसरे कदम, और अंधकार या तमोगुणरूपी तीसरे कदम को अपने मनरूपी साम्राज्य में पड़ने देता है। पर धीरेधीरे उसका उसके प्रति प्यार बढ़ता रहता है, और समय के साथ वह उसके मन में ज्यादा से ज्यादा जगह घेरती रहती है। आखिर में वह उसके पूरे साम्राज्य में फैल जाती है, और फिर जागृत होकर आदमी के राजाबलिरूपी अहंकार को खत्म ही कर देती है। कुंडलिनी योग में भी ऐसा ही होता है। इसका मतलब है कि योग और प्रेम के बीच में तत्त्वतः कोई अंतर नहीं है। राजा बलि भी बहुत बड़ा यज्ञ मतलब अच्छा काम ही कर रहा था। आदमी को पता चल जाता है कि वह ध्यानचित्र के चक्कर में पड़कर बावला प्रेमी या योगी या प्रेमयोगी या प्रेमरोगी बन जाएगा, फिर भी वह उसे अपनाता है, और आगे बढ़ाता है। उसने कुण्डलिनी जागरण के माध्यम से एक कदम से मतलब सत्वगुण से सारा स्वर्ग कब्जे में कर लिया। स्वर्ग सतोगुण प्रधान होता है। क्योंकि कुंडलिनी जागरण के समय तीनों गुण अनंत हो जाते हैं, इसीलिए कहा गया है कि कुंडलिनी या वामन से तीनों लोक पूरी तरह से व्याप्त हो गए मतलब भर गए। दूसरे कदम मतलब रजोगुण से कुण्डलिनी चित्र पूरी धरती में फैल गया, क्योंकि धरती रजोगुणप्रधान है। तमोगुणरूपी तीसरे कदम से अहंकार व उससे जुड़े कर्मविचार मूलाधार के अँधेरे अवचेतन अर्थात पाताल में चले जाते हैं। क्योंकि तमोगुण किसी को मारकर या नष्ट करके ही बनता है, इसलिए वह अहंकार और उससे पोषित मानसिक सृष्टि को नष्ट करने से बनता है। पाताल लोक के द्वारपाल के रूप में भगवान विष्णु के स्थित हो जाने का मतलब है कि ध्यानचित्र कुंडलिनीयोग के माध्यम से उन राक्षसों को अर्थात अवचेतन में दबे विचारों को ऊपर अर्थात मस्तिष्क या स्वर्ग की तरफ जाने देकर शुद्ध करता रहता है, ताकि सब देवता ही बन जाएं। साथ में, विष्णुस्वरूप ध्यानचित्र को कुंडलिनी योग से स्वाधिष्ठान और मूलाधार चक्रों पर केंद्रित किया जाता रहता है, जिससे उनमें दबी हुई राक्षसरूपी भावनाएं उजागर होकर उसके संपर्क में आने से शुद्ध बनी रहती हैं, जिससे वे योगी को बंधन में नहीं डाल पातीं, मतलब राक्षस देवताओं को परेशान नहीं कर पाते, क्योंकि शरीर में ही सभी देवता बसे हुए हैं। वैसे भी स्वाधिष्ठान चक्र को इमोशनल बैगेज मतलब भावनाओं की गठरी कहते हैं।
यज्ञ में बलि के पुरोहित बने हुए राक्षसगुरु शुक्र आचार्य पहले बलि को बहुत समझाते हैं कि वह वामन पर भरोसा न करे क्योंकि वह तीन कदमों में ही उसका सबकुछ छीन लेंगे। पर जब बलि नहीं मानता तो शुक्राचार्य संकल्पजल गिरा रहे शंख के सुराख़ में घुस जाते हैं, पर वामन उसमें कुशा डालकर उसकी आंख फोड़ देते हैं? एक बात और, क्योंकि शंख भी जीव की पीठ पर होता है, और रीढ़ की हड्डी की तरह ही उसे सुरक्षा देता है, इससे भी पक्का हो जाता है कि सुषुम्ना नाड़ी को ही शंख कहा गया है। साथ में, शंख का आकार भी एक फन उठाए नाग या ड्रेगन के जैसा ही होता है, जिसकी समानता मेरुदंड व उसमें स्थित सुषुम्ना के साथ की जाती है। एक अनुभवी कुलपुरोहित कभी भी अपने यजमान को अध्यात्म के बीहड़ में नहीं खोने देना चाहता, बेशक उससे यजमान का फायदा ही क्यों न हो। उसे पता होता है कि अगर यजमान को सत्य का पता चल गया तो उसे ठगकर उससे यज्ञ आदि कर्मकांड के नाम पर पैसा ऐंठना आसान नहीं रहेगा। हालांकि अपनी जगह पर कर्मकाण्ड सही है और जागरण के लिए महत्त्वपूर्ण सीढ़ी है, पर मंजिल मिलने पर कौन सीढ़ी की परवाह करता है। वैसे भी वह भौतिकवादी गुरु है। शुक्राचार्य अर्थात भौतिक विज्ञानवादी व्यक्ति या गुरु द्वारा शुक्र अर्थात वीर्य को बाहर बहा कर सुषुम्ना के शक्ति प्रवाह को ब्लॉक करना ही शंख में घुसना है। वामन का उसको कुशा डंडी द्वारा खोलना ही योगी द्वारा कुण्डलिनी ध्यानचित्र के माध्यम से मूलाधार से शक्ति को ऊपर चढ़ाना है। यह मूलाधार से लेकर सहस्रार तक फैली हुई संवेदना की रेखा जैसी होती है जो रीढ़ की हड्डी में होती है। यह झाड़ू या कुशा की सींक जैसी पतली फील होती है। यही सुषुम्ना जागरण है। अगर संभोग से पहले पीठ की विशेषकर मेरुदंड की ढंग से मालिश करवा ली जाए, तो यह संवेदना रेखा आसानी से और आनंद के साथ महसूस होती है। फिर वीर्य शक्ति आसानी से ऊपर चढ़ती है, जिससे संभोग बहुत आनंदमय और आध्यात्मिक बन जाता है। यौनांगों का दबाव भी एकदम से खत्म हो जाता है। आदमी अक्सर ऐसा कुंडलिनीजनित आनंद के लालच से प्रेरित होकर करता है, इसीलिए मिथक कथा में कहा गया है कि वामन ने ऐसा किया। इससे शुक्राचार्य की आंख फूटना मतलब कुण्डलिनी के प्रभाव से वीर्यशक्ति की द्वैत दृष्टि अर्थात दोगली नजर नष्ट होना है। जब वीर्यशक्ति द्वैत से भरे संसार की तरफ न बहकर अद्वैत से भरी आत्मा की तरफ बहेगी, तो स्वाभाविक है कि वीर्यशक्ति की दोगली नजर नष्ट होगी ही। बलि या अहंकार पाताल को चला जाता है, मतलब कुंडलिनी जागरण के बाद आदमी व्यक्त अर्थात प्रकाशमान जगत का अहंकार नहीं कर सकता क्योंकि उसने सबसे अधिक प्रकाशमान कुंडलिनी जागरण का अनुभव कर लिया है। इसलिए वह स्थूल जगत से उपरत सा होकर अपने सूक्ष्म शरीर के रूप में अव्यक्त अन्धकार सा बन जाता है। यही उसका पातालगमन है। हालांकि सूक्ष्म शरीर के धीरे-धीरे स्वच्छ होने से स्वच्छ होता रहता है। इसे ही ऐसे कहा गया है कि भगवान विष्णु उसके द्वारपाल के रूप में पहरा देते हैं।
कुंडलिनी तंत्र धर्म-जनित मानसिक बीमारी को नियंत्रित कर सकता है
दोस्तों, मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि कैसे कुंडलिनी योग मेरी मानसिक स्थिति को स्थिर व तंदुरुस्त बना के रखता था। एक मित्र बोल रहे थे कि अपंग दिमाग प्रेम आदि से स्वस्थ नहीं हो सकता। इस हिसाब से तो प्रेम से कुंडलिनी जागरण भी नहीं हो सकता। पर वह होता है। दिमागी विकृति के विभिन्न स्तर होते हैं। हम यह नहीं कहते कि सभी स्वस्थ हो जाएंगे, पर कुछ न कुछ सुधार तो सबमें होगा। यहां तक कि सभी शारीरिक रोगी खासकर जन्मजात या आनुवंशिक रोगी भी दवा से कहां ठीक होते हैं। मेरे कहने का मतलब था कि जब कुंडलिनी योग एक मानसिक बिमारी जैसा लगता है, तब मानसिक बिमारी भी तो कुंडलिनी योग जैसी बनाई जा सकती है। शायद इसीलिए अधिकांश धर्मों में मानसिक रोग को दैवीय दृष्टि से देखा जाता है। एक बात और है। जब ध्यान को बोला जाए, पर उसके लिए जरूरी ऊर्जा का प्रबंध न किया जाए, तो मानसिक रोग तो फैलेंगे ही। मैं किसी खास धर्म को पिनपोइंट नही करूंगा। पर यह सबको पता है कि ज्यादातर धर्म और अध्यात्म को अंधे जैसे होकर मानने वाले कट्टर किस्म के लोग ही इस समय मानसिक रोगी या मानसिक रोगी जैसे दिखाई देते हैं। पाकिस्तान इसका एक जीता जागता उदाहरण है, जहां एक रिपोर्ट के मुताबिक लगभग पाँच करोड़ से ज्यादा मानसिक रोगी हैं। ऐसा लगता है कि अगर किसी धर्म में पर्याप्त अतिरिक्त ऊर्जा है, तो सही तरीके से ध्यान नहीं है, या फिर ध्यान है ही नहीं। केवल कुंडलिनी तंत्र ही मुझे इसमें अपवाद लगता है, क्योंकि यह ध्यान के लिए भी बोलता है, और उसके लिए जरूरी अतिरिक्त ऊर्जा का प्रबंध भी करता है। सही तरीके से ध्यान और ऊर्जा की कमी से धर्म या अध्यात्म कुछ से कुछ बन जाता है, बिल्कुल उल्टा हो जाता है, अपने असली मूलरूप में रहता ही नहीं है। एकहोर्ट टाले को अवसाद के शिखर पर ही जागरण की अनुभूति मिली। मतलब वे मानसिक रोगी नहीं थे बल्कि कुदरती कुंडलिनी साधना के दौर से गुजर रहे थे, जिसे उन्होंने और दुनिया के लोगों ने गलती से अवसाद समझा हुआ था, इसीलिए वे उसे ढंग से नहीं संभाल पा रहे थे। ऐसे बहुत से उदाहरण हैं। एक दिमागी अपंग आदमी हमारे कार्यालय में अपने पैर के जूतों को अपने सिर पर रखकर दौड़ता हुआ अक्सर आता था। उसके साथ प्रसन्नता और हंसीमजाक के साथ हाथ मिलाना पड़ता था, या फिर उसे एक रुपया देना पड़ता था। न मिले तो साबुन का छोटा सा टुकड़ा उठाकर वैसे ही भाग जाता था। एकबार हमारे सामने उसने एक अजनबी को जोर का तमाचा जड़ा था, जिससे वह पूरा हिल गया था। मुझे लगा कि वह मुझसे नाराज़ था पर मेरी तांत्रिक शक्ति से डरकर उसने मेरा गुस्सा उसपर उतार दिया। आजतक मैं उसके चेहरे पर उस घटना का पछतावा देखता हूं। यह प्यार ही है जो उसे लाइन पर रख रहा था। इसी तरह एक हल्के स्तर का अविवाहित व दिव्यांग व्यक्ति मेरी कुंडलिनी योगशक्ति से प्रभावित होकर मेरे लिए बहुत से काम लगभग बिना मेहनताने के करता था, पर मैं उसके परिवार वालों को उसके नाम पर पैसे दे देता था। ऐसा क्यों न समझा जाए कि अल्जाइमर जैसे मानसिक रोगों में मस्तिष्क के मुख्य पुर्जों के खराब होने से जो अतिरिक्त नाड़ी रसायन अर्थात न्यूरोकैमिकल्स जमा हो जाते हैं, वे हैलुसिनेशन के रूप में असली लगने वाला काल्पनिक चित्र बनाते हैं। इसी तरह योग द्वारा मन पर लगाम लगने से भी ऐसा ही होता होगा, तभी तो स्थायी समाधि चित्र बनता है। पर पहली स्थिति में यह समाधि जैसा मानसिक चित्र अस्वस्थ, अनियंत्रित और जागरण के उद्देष्य से रहित है, पर दूसरी स्थिति में यह नियंत्रित व स्वस्थ ध्यानसमाधि चित्र है, जो जागृति को दिलाता है। क्या साम्यवादियों ने इसी भ्रम के कारण “धर्म की अफीम का नशा” वाक्य ईजाद किया है? शेष, इस विषय को हम मनोवैज्ञानिकों और मनोचिकित्सकों के लिए छोड़ते हैं, क्योंकि हम अपने मूल विषय से भटकना नहीं चाहते।
कुंडलिनीयोग और सिगमंड फ्रायड का मनोविज्ञान एक ही बात कहता है
दोस्तो, हाल की पिछली कुछ पोस्टों के विश्लेषण से लगता है कि हो सकता है कि जिन्हें हम मानसिक बिमारी समझते हों, वे दरअसल जागृति की तरफ बढ़ रहे मन के लक्षण हों, पर उन्हें हम ढंग से संभाल न पाने के कारण वे मानसिक रोग बन जाते हों। मैं इसे अपनी आपबीती से भी सिद्ध कर सकता हूं। जिस किसी स्थान विशेष पर मुझे यौनबल मिलता था, वहां मेरा ध्यानचित्र मुझे हर क्षेत्र में अव्वल बनाता था, चाहे वह आध्यात्मिक हो या भौतिक। पर जहां मुझे वह नहीं मिलता था, वहां वह मुझे एक मनोरोगी जैसा भी बना देता था। बेशक वह यौनबल काल्पनिक संभोग ही क्यों न हो, काल्पनिक यौनसाथी का समाधि जैसा स्थायी मानसिक चित्र क्यों न हो। यहां तक कि बेशक वह स्त्री की बजाय पुरुष ही क्यों न हो। ऐसे में तो मुझे समलैंगिकता में भी कोई बुराई महसूस नहीं हुई। हालांकि यह अलग बात है और जैसा मुझे लगता है कि कुंडलिनी जागरण स्त्रीपुरुष प्रेम से ही मिलता है, क्योंकि यिन और यांग का संपूर्ण सम्मिलन पुरुष और स्त्री के बीच ही हो सकता है। पाठकों को यह अजीब लग सकता है।
महान पाश्चात्य मनोवैज्ञानिक सिगमंड फ्रायड कहते हैं कि शरीर के हरेक हिस्से में यौन-उन्माद अर्थात ऑर्गेज्म है। यह तो तंत्र में बहुत पहले से कहा गया है। तभी तो कुण्डलिनी शक्ति का चक्रोँ पर आना मतलब वहाँ पर यौन उन्माद को अनुभव करना ही है। कुंडलिनी योग का मतलब ही उस मूलाधार की यौनोन्माद या ऑर्गेस्मिक से भरी संवेदना को ऊपर चढ़ाते हुए उसे सभी चक्रों को बारीबारी से प्रदान करना है। यह ऑर्गेस्मिक व आनंदपूर्ण संवेदना एक सुपर टॉनिक की तरह है। यह जिस चक्र पर पहुंचती है, उसकी सभी जैविक गतविधियों को बढ़ाते हुए उन्हें सुधारती भी है और संतुलित भी करती है। उस चक्र के प्रभावक्षेत्र में जितने भी अंग व जैवीय भाग आते हैं, वे भी खुद ही चक्र की तरह लाभान्वित हो जाते हैं। क्योंकि सातों चक्रों में सारा शरीर कवर हो जाता है, इसलिए पूरा शरीर स्वस्थ व संतुलित हो जाता है, बिमारियां इससे दूर रहती हैं। दरअसल जननांगों का यौनोन्माद तो चक्रों के अपने स्वाभाविक या इन्हेरेंट यौनोन्माद को बढ़ाने का ही काम करते हैं, अपना यौनोन्माद तो उनके अंदर पहले से ही है। उनका यह आंतरिक यौनोन्माद विभिन्न जैविक अभिक्रियाओं व प्रक्रियाओं के आधारभूत रूप में है। जननांगों से तो उसे बस अतिरिक्त धक्का ही मिलता है। ऐसा समझ लो कि उनका अपना यौनोन्माद आइडलिंग पर स्वतः घूम रहे इंजिन की तरह है, और जननांगों का यौनोन्माद गाड़ी के एकसेलरेटर पैडल की तरह है। अगर जननांगों का यौनोन्माद ही सबकुछ होता, तब तो फेल हो रहा हार्ट भी उससे चालू हो जाता। पर ऐसा नहीं होता। यह ऐसे ही है, जैसे अगर इंजन बंद हो या पिस्टन आदि पुर्जों की खराबी से वह बंद हो रहा हो, तो एकसेलरेटर पैडल को दबाने से भी वह चालू नहीं होगा।
एक जगह सिगमंड फ्रायड थोड़ा हट कर विचार रखते हैं। वे कहते हैं कि संभोग शक्ति सबसे बड़ी है, मतलब प्राइम मोटिवेटर या प्रमुख प्रेरक है, पर हमारे तंत्र दर्शन में शुरु से ही कहा गया है कि संकल्प शक्ति उससे भी बड़ी प्रेरक है। अगर फ्रायड बिल्कुल सही होते तो हरेक व्यक्ति को जागृति मिला करती, क्योंकि संभोग तो सभी लोग करते हैं। सच्चाई यह है कि संभोग से भी जागृति उन्हीं को मिलती है, जिन्होंने योगसाधना और अन्य आध्यात्मिक तरीकों से गुरु और जागृति की प्राप्ति के लिए मन में पहले से ही दृढ़ संकल्प बना कर धारण कर रखा हो। इस बारे में किसी नई पोस्ट में विस्तार से चर्चा की कोशिश करेंगे।
कुंडलिनी ध्यानसाधना और जागरूकता ध्यान एकदूसरे से भिन्न नहीं हैं
मित्राें, पिछली पोस्ट में सच्चे व समर्पित प्यार से उपजे चमत्कार को हमने देखा। अगर इसका उल्टा हो जाए, तो क्या होगा, आप खुद ही अंदाजा लगा सकते हैं। लवजिहाद में यही उल्टा खेल चल रहा है। ऐसे ही भयानक संक्रामक रोगों के कारण सदियों से स्त्री और पुरुष के बीच अविश्वास की खाई बनी हुई है। यह आज से नहीं, बल्कि सदियों से न्यूनाधिक रूप से, इस नाम से या उस नाम से चल रहा है। आज तो यह ढंग से दुनिया के सामने आ रहा है। विश्वास बनाने में वर्षों लग जाते हैं, पर तोड़ने में कुछ ही पल। बल से शरीर को तो जीता जा सकता है, पर दिल को तो प्रेम और विश्वास से ही जीता जा सकता है। इसी पर बनी हुई लाजवाब फिल्म “केरला स्टोरी” आजकल अन्तर्राष्ट्रीय चर्चा व आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। पर यह इस ब्लॉग का विषय नहीं है, यह तो ऐसे ही पोस्ट के संबंध में बात चली थी, तो यह वर्तमानकालिक मुद्दा खुद ही जुड़ गया।
जब किसी मूर्ति आदि पर ध्यान केंद्रित किया जाता है, तब भटकते विचारों की शक्ति वहाँ केंद्रित हो जाती है। विचारों की शक्ति को प्रकट होने का एक ही रास्ता बचता है, ध्यानचित्र के रूप में प्रकट होने का। योगी मूर्ति की बजाय अपने शरीर के चक्रोँ पर ध्यान केंद्रित करते है। उससे भी वैसा ही होता है। साथ में शरीर भी स्वस्थ रहता है। जो इनको नहीं मानते, वे आसमान पर या उसमें रहने वाले किसी अदृश्य भगवान पर ध्यान केंद्रित करते हैं। उससे भी वैसा ही होता है। मतलब साफ है कि कोई भी काफ़िर नहीं है।
साथ में, नदी, पर्वत, वृक्ष पर ध्यान लगाने से अर्थात उनकी पूजा करने से वे सभी भी शरीर के चक्रों की तरह स्वस्थ रहते हैं, क्योंकि फिर चक्रों की तरह ही आदमी की प्राणशक्ति उनको भी लगती है। पर्यावरण की सुरक्षा इसी मूलमंत्र में छुपी हुई है।
अवयरनेस मेडिटेशन अर्थात जागरूकता ध्यान पर भी यही सिद्धांत लागू होता है। कहते हैं कि एवयरनेस मेडिटेशन से बहुत लाभ मिलता है। मुझे हाल ही में एक नए मित्र से मिलने का मौका मिला। वे होम्योपैथिक मेडिसिन की अच्छी प्रेक्टिस भी करते हैं। वैसे भी होम्योपेथी भारतीय ऋषि परम्परा से बहुत मेल खाती है। इसी सिलसिले में वहाँ गया था तो थोड़ा परिचय हो गया। उनके साहित्य व अध्यात्म के शौक को जानकर मैं भी अध्यात्म की बातें करने लग गया। कहते हैं कि जौहरी को ही हीरा दिखाना चाहिए, आम आदमी तो उसे पत्थर समझकर नाले में फैक देगा। मैं उनकी इस बात से बहुत प्रभावित हुआ कि हर समय अवेयरनेस के साथ रहना चाहिए। ओशो महाराज भी बिल्कुल यही कहते हैं कि हरेक काम अवेयरनेस के साथ करो। वे खुद भी ओशो के अनुयायी लगे मुझे। सतसंग से लाभ तो मिलता ही है, जैसा मुझे मिला। मैं इसके मनोवैज्ञानिक सिद्धांत की तह तक पहुंच सका। मुझे लगता है कि जब हम वर्तमान के रियल टाइम में शरीर को महसूस हो रही किसी भी संवेदना पर ध्यान दे रहे होते हैं, तब मनोमय कोष, अन्नमय कोष और प्राणमय कोष आपस में मिश्रित हो रहे होते हैं, जैसा मैंने पिछली कुछ पोस्टों में विस्तृत रूप से वर्णन किया था। वर्तमान की संवेदना की तरफ ध्यान देने से शरीर और सांस पर भी खुद ही ध्यान चला जाता है, क्योंकि तीनों आपस में जुड़े हुए हैं। वैसे तो बीती हुई और आने वाली घटनाओं के ख्याल भी मानसिक संवेदना के ही अंतर्गत आते हैं, पर उनके साथ शरीर और सांस कम जुड़ते हैं, क्योंकि न भूतकाल में यह वर्तमान काल में स्थित भौतिक शरीर था, और न ही भविष्यकाल में होगा, यह तो केवल वर्तमान काल में ही स्थित है। इसीलिए कहते हैं कि वर्तमान में ही स्थित रहना चाहिए। मुझे लगता है कि जब किसी के द्वारा वर्तमान स्थिति के साथ जुड़ी भौतिक संवेदनाओं का ध्यान किया जाता है, तो इससे यह विश्वास पक्का होता रहता है कि वे उसके शरीर से ही जुड़ी हैं, क्योंकि वे शरीर और सांसों की बदलती स्थिति के साथ बदलती रहती हैं। इससे यह विश्वास भी खुद ही हो जाता है कि उसकी सभी मानसिक संवेदनाएं जैसे कि विभिन्न भावनाएं और विचार भी उसके शरीर के ही भाग हैं, क्योंकि संवेदना चाहे शारीरिक हो या मानसिक, वर्तमानकालिक हो या भूतकालिक या भविष्यकालिक, उन सभी का गुणस्वभाव व अनुभव बिल्कुल एकसमान ही होता है। इससे वे शांत हो जाती हैं, क्योंकि अपने आप से किसीको आसक्तिभाव, लगाव या प्रेम नहीं होता। क्योंकि स्वयं तो स्वयं से हमेशा के लिए जुड़ा हुआ है, उसे कोई अलग नहीं कर सकता, क्योंकि वह अपना ही रूप है। आसक्ति केवल दूसरे से या अलग व्यक्ति या पदार्थ से होती है मतलब तब काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर जैसे मानसिक दोष शांत होकर जीवन को अपने लिए और औरों के लिए सुखमय बना देते हैं। इसी शान्त माहौल में ही आध्यात्मिक प्रगति भी होती है, भौतिक प्रगति तो होती ही है। इसका प्रमाण है ऐसी अवस्था में कुंडलिनी ध्यानचित्र का आदमी के मन में सुस्पष्ट अभिव्यक्त होना। साथ में, कुंडलिनी ध्यानसाधना से मस्तिष्क इतना ज्यादा चुस्त और संवेदनशील हो जाता है कि वह हरेक भौतिक संवेदना को गहराई से महसूस करने लगता है, जिससे खुद ही जागरूकता साधना की आदत पड़ जाती है। साथ में आदमी को ऐसा भी लगता है कि जब सभी संवेदनाएं एकजैसी ही हैं, तब वह किसी संवेदना पर ज्यादा तो किसी पर कम आसक्त क्यों है। उसे तो सबके प्रति बराबर रहना चाहिए। इसलिए वह निष्पक्ष व निरपेक्ष होकर शान्त हो जाता है। या ऐसा समझ लो कि आसक्ति वाली संवेदनाओं से सामान्य भौतिक संवेदनाओं की तरफ ध्यान डाईवर्ट हो जाता है।
कुंडलिनीपरक संभोग योग ही मस्तिष्क को जागरण के लिए तैयार करती है
दोस्तों, पिछली पोस्ट में कुंडलिनी ध्यान और मनोरोग के बीच तुलनात्मक अध्ययन के बारे में बात हो रही थी। उसी कड़ी में ऐसा भी लगता है कि ऐसे मनोरोगियों का इलाज प्रेमचिकत्सा से भी हो सकता है। इसलिए अक्सर यह कहावत आम है कि प्यार व्यक्ति को नशामुक्ति में मदद करता है। प्यार एक सुपरटोनिक है। मानसिक रोग हमेशा ही बुरे नहीं होते, जैसी कि आम मान्यता है, पर एक गॉडगिफ्ट भी हो सकते हैं। संभवतः हिंदु धर्म में इसीलिए मानसिक रोगियों को विशेष दैवीय नजरिए से देखा जाता है, सम्मान से देखा जाता है। यहां उन्हें मानसिक हस्पताल कम ही भेजा जाता है, जब तक कोई गंभीर खतरा ही पैदा न हो जाए। वे मनोरंजन का मुख्य स्रोत होते हैं, और समारोह आदि में आकर्षण का मुख्य बिंदु होते हैं। फिर भी ज्यादातर उनके साथ सम्मानजनक व्यवहार किया जाता है, और उन्हें पीड़ा नहीं पहुंचाई जाती। उन्हें समाज पर बड़ा बोझ भी नहीं समझा जाता।
मुझे लगता है कि मूलाधारवासिनी कुंडलिनी शक्ति मस्तिष्क को दबाव झेलने में सक्षम बनाती है। यह शायद रक्तवाहिनियों का लचीलापन बढ़ाकर उन्हें ज्यादा और बिना दबाव के रक्त प्रवाह बढ़ाने में मदद करती है। विचित्र सा लगता था जब ध्यान के नाम से ही आम लोग सिर पकड़कर बैठ जाते थे, पर मेरे मस्तिष्क में हर समय ध्यान–समाधि लगी होती थी, यौनयोग के बल से। जब मुझे क्षणिक कुंडलिनी जागरण हुआ था, उस समय मैं तांत्रिक यौनयोग के पूरे प्रभाव में था। नहीं तो वह मुझे होता ही न। शरीर को पता होता है कि अपने साथ कब क्या करना है। इसने तभी जागृति के लिए बैक चैनल पूरी तरह से खोली, जब मस्तिष्क दो तीन महीनों से लगातार यौनयोग की कुंडलिनी शाक्ति के प्रभाव में रहकर ज्यादा से ज्यादा दबाव झेलने में सक्षम बन गया था। मैंने अनजाने में कुंडलिनी को इसलिए नीचे नहीं उतारा कि मैं उसका दबाव सहन नहीं कर पा रहा था, बल्कि इसलिए क्योंकि मुझे यह भय था कि कहीं मैं भौतिक रूप से पिछड़ न जाऊं। क्योंकि ऐसा ही मेरा एक पुराना अनुभव भी था। यह ऑर्गेज्मिक शक्ति पता नहीं क्या जादू करती है। यह एक आन्नदमयी शक्ति है।
सेक्सुअल यिनयांग एकदूसरे के प्रति समर्पण से बढ़ता है। इसीलिए समर्पण भाव पर बहुत जोर दिया जाता है। होता क्या है कि एकदूसरे के प्रति पूरे समर्पण से ही यिन और यांग आपस में एकदूसरे से पूरी तरह से मिश्रित हो पाते हैं। यौन समर्पण से बड़ा भला कौनसा समर्पण हो सकता है। यिनयांग तो हरेक वस्तु में होता है, पर समर्पण केवल पुरुष और स्त्री के ही बीच में होता है। जितना निकटता और अंतर्संबंध एक प्रेमी पुरुष और स्त्री के जोड़े के बीच बनता है, उतना किसी और के बीच में नहीं बनता। इसीलिए प्रेमसंबंध और समर्पण से भरा हुआ संभोग ही सर्वोत्तम यिनयांग एकत्व का भंडार है। इसलिए स्वाभाविक है कि यही भौतिक और आध्यात्मिक प्रगति का भी सर्वोत्तम आधार है। यिनयांग ही पूर्णता है, कुंडलिनी जागरण ही पूर्णता है, ईश्वरत्व ही पूर्णता है। भौतिक संसार भी इसी पूर्णता के अंतर्गत आता है, इससे अलग नहीं है।