कुंडलिनी ही रति है और कुंडलिनी के द्वारा कामवासना को शांत किया जाना ही रति-कामदेव का विवाह है

Rati-kamadeva

दोस्तों, मुझे प्रतिदिन रहस्यात्मक साहित्य पढ़ने की आदत है। इससे मेरा दायाँ मस्तिष्क क्रियाशील रहता है, क्योंकि रहस्यात्मक कथाओं में लॉजिक लगाना कठिन होता है। हमारा दायाँ मस्तिष्क भी एक सिरफिरे आदमी की तरह मस्त मलंग स्वभाव वाला होता है। हिन्दू पुराणों के कथा-कथानक भी एक पहेली की तरह होते हैं। यदि उन्हें बूझ गए, तो उससे बायाँ मस्तिष्क क्रियाशील हो जाता है, और यदि नहीँ तो दायाँ मस्तिष्क। मतलब कि वे हर परिस्थिति में फायदा ही करते हैं।ऐसे ही एक कथानक के रहस्य को मैं इस हफ्ते पहचान सका हूँ। मैं प्रतिदिन शिवपुराण का केवल एक पृष्ठ पढ़ता हूँ, मूल संस्कृत में और हिंदी में। मूल संस्कृत का मजा ही कुछ और है। इस हफ्ते मुझे एक महत्त्वपूर्ण तांत्रिक रहस्य हाथ लगा है। इसे मैं यहाँ साझा कर रहा हूँ।

ब्रह्मा द्वारा कामदेव को श्राप देना व रति को उत्पन्न करके उसका विवाह कामदेव से करना

जब ब्रह्मा ने कामदेव की उत्पत्ति की, तब कामदेव को अपने ऊपर गर्व हो गया। वह अपनी शक्ति का परीक्षण ब्रह्मा पर ही करने लगा। इससे ब्रह्मा कामविह्वल होकर अपनी ही पुत्री के श्रृंगार का गुणगान करते हुए उस पर आसक्त हो गए। दरअसल ब्रह्मा द्वारा रचित यह सुंदर सृष्टि ही उसकी वह पुत्री है। कामदेव यहाँ भोगेच्छा का प्रतीक भी है। फिर शिव ने उन्हें रोका। जब उन्हें कामदेव की हरकत का बोध हुआ तो उसे यह कह कर श्राप दे दिया कि यदि उसे अपनी शक्ति का परीक्षण ही करना था तो उनकी पुत्री के सामने ही क्यों किया। वह श्राप था कामदेव का शिवजी के द्वारा भस्म किए जाने का। भगवान शिव तंत्रयोग के सर्वोच्च शिरोमणि हैं, उनके आगे काम भस्मीभूत ही है। फिर ब्रह्मा ने अपने शरीर के पसीने से अपनी रति नाम की एक अन्य पुत्री को उत्पन्न किया। वह सृष्टि में सबसे सुंदर थी। उसका विवाह ब्रह्मा ने कामदेव के साथ कर दिया। कामदेव तो उसके सौंदर्य को देखकर अपनी मोहिनी विद्या को जैसे भूल ही गया।

कामदेव मनुष्य के मन की वासना है और रति कुंडलिनी है

शास्त्रों में भी आता है कि यहाँ तक कि अपनी बेटी और बहन से भी नितांत अकेले में नहीं मिलना चाहिए, क्योंकि यह काम बहुत प्रबल है। तो इसमें आश्चर्य नहीँ कि ब्रह्मा अपनी पुत्री पर आसक्त हो गए थे। उस काम को वश में करने के लिए उन्होंने कठिन योगाभ्यास किया। उनके पसीने की बूंदें इसी अथक कुंडलिनी-योगाभ्यास की प्रतीक हैं। उसी अथक कुंडलिनी योग से जो कुंडलिनी क्रियाशील या जागृत हुई, वही रति नाम से कही जा रही है। कुंडलिनी को रति नाम इसलिए दिया गया है, क्योंकि यह योग में निरंतर रत रहने से ही मिलती है। रत शब्द एक प्रमुख आध्यात्मिक शब्द है, जैसे ध्यान रत, भक्ति रत आदि। इसका अर्थ लीन भी है। कुंडलिनी किसी के प्यार में या ध्यान में लीन होकर ही मिलती है। रति क्रीड़ा नाम भी इसीसे बना है। क्योंकि कामक्रीड़ा से मन और उसका सबसे प्रिय अंश कुंडलिनी, दोनों प्रफुल्लित होते हैं, इसीलिए कुंडलिनी को रति नाम दिया गया है। यह रूपक के रूप में समझाया गया है, क्योंकि पुराने जमाने में रहस्यात्मक विद्याओं को सीधे तौर पर सार्वजनिक नहीँ किया जाता था। इसीलिए ऐसी कई विद्याओं को गुह्य विद्या भी कहते हैं। कामदेव-रति के कथानक से इस बात का भी पता चलता है कि सृष्टि रचयिता ईश्वर कुंडलिनी योगविद्या के बल से ही अपनी सुंदर रचना के मोहक आकर्षण से अछूता बना रहता है।

कुंडलिनी ने रति के रूप में देवताओं व ऋषियों की काम वासना को अपने नियंत्रण में रखा

जब देवताओं व ऋषियों को इस रहस्य का पता चला कि कुंडलिनी से कामवासना को नियंत्रण में रखा जा सकता है, तब उन्होंने नियमित योगाभ्यास करना शुरु कर दिया। इसीलिए उन्होंने रति के रूप में कुंडलिनी को सबसे सुंदर माना है, क्योंकि कामदेव केवल सुंदर भौतिक वस्तुओं की ओर ही जीव को आकृष्ट करवाता है। रति के आगे कामदेव हार गया। इसका मतलब है कि रति या कुंडलिनी सबसे सुंदर है। वह इतनी सुंदर है कि उसके बहकावे में आकर कई लोग अच्छी खासी गृहस्थी व चमक-दमक वाली दुनिया छोड़कर संन्यासी बन जाते हैं। उसने कामदेव का धंधा ही बंद कर दिया। कामदेव का रति से विवाह करने का अर्थ है कि जैसे एक शादीशुदा आदमी एक स्त्री से बंध कर अन्य स्त्रियों पर नजरें नहीँ डालता, उसी तरह वह भी रति नामक कुंडलिनी के द्वारा बाँध दिया गया।  इस रहस्य का थोड़ा स्पष्टीकरण भी एक श्लोक के माध्यम से वहीँ पर किया गया है, जिसमें लिखा गया है कि कामदेव अपनी प्रियतमा रति को अपने हृदय में ऐसे छुपा कर रखता था, जैसे एक योगी अपनी ब्रह्मविद्या को अपने हृदय में छिपा कर रखता है। अब वास्तविक ब्रह्मविद्या कुंडलिनी ही तो है, क्योंकि वही ब्रह्म तक ले जाती है। योगी को सभी लोग भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में देखते हैं, कभी ख़ुशी में, कभी गम में, कभी अवसाद में, तो कभी प्रफुल्लित अवस्था में। पर वे लोग उसके मन की उस कुँडलिनी को पहचान ही नहीं पाते, जो उसकी इन सभी अवस्थाओं में एक जैसी ही बनी रहती है। इसी तरह रति से विवाहित कामदेव के साथ हमेशा रति बनी रहती है। रति से काम के विवाह का यह मतलब भी है कि एकपत्नीव्रत के साथ सामाजिक पत्नी के साथ तांत्रिक योगाभ्यास करना। तन्त्रयोग साहित्य के अनुसार भी कई वर्षों तक केवल कर्मयोग व साधारण कुंडलिनी योग का अभ्यास करना पड़ता है। उस दौरान रति नामक कुंडलिनी का जन्म होता है, वह बढ़ती है, और यौनावस्था में पहुंच जाती है, मतलब बहुत मजबूत हो जाती है। फिर वह काम के साथ विवाह के योग्य हो जाती है। कुंडलिनी के काफी परिपक्व हो जाने पर ही साधारण कुंडलिनी योग को यौनयोग के साथ मिश्रित रूप में करने का विधान है। यही रति और काम का विवाह है। यदि जल्दबाजी में समयपूर्व ही काम के साथ रति का बालविवाह कर दिया जाए, तो लाभ की अपेक्षा हानि भी हो सकती है। ऐसा तंत्रशास्त्र में साफ तौर पर चेताया गया है। यदि काम-रति के दाम्पत्य युगल से युक्त व्यक्ति काम के आवेश में आ जाए, तो लोग उसे साधारण कामासक्त मान लेते हैं। वे काम के साथ खड़ी उस रति को नहीं देख पाते, जो हमेशा कल्याणकारी होती है। बहुत से तंत्रयोगी इसी कारणवश प्रताड़ित हो जाते हैं। वे भोलेपन में आकर काम-रति का प्रदर्शन करने लगते हैं, पर लोग केवल काम को ही देख पाते हैं, उसके साथ खड़ी रति नामक कुंडलिनी को नहीँ।

दरअसल काम के दायरे में सभी भोग लालसाएँ आ जाती हैं। इसलिए रति नामक कुंडलिनी सबसे विवाह करके उनसे जुड़ जाती है। काम के अर्थ में केवल यौन लालसा को इसलिए लिया जाता है, क्योंकि यह सभी भोग लालसाओं में सबसे प्रभावशाली और मुख्य है।

तंत्रयोगी रति को पैदा करने के लिए कामदेव की ही सहायता लेते हैं

इसे कहते हैं, दुश्मन को दुश्मन के ही तीर से मारना। कामदेव का तीर जगत्प्रसिद्ध है। तंत्रयोगी पंचमकारों की सहायता से अपनी कुंडलिनी को अतिरिक्त मजबूती प्रदान करते हैं। वे दरअसल कामशक्ति को कुंडलिनी शक्ति में रूपांतरित कर देते हैं। 

काम-रति विवाह की वैज्ञानिक व्याख्या

काम के आवेश में मस्तिष्क की ओर रक्त संचार बढ़ जाता है। इसीलिए मन प्रफुल्लित हो जाता है। यदि कोई आदमी कुंडलिनी योगी है, तो जाहिर है कि उसके मस्तिष्क का अधिकांश हिस्सा कुंडलिनी ने अधिगृहीत किया हुआ है। ऐसे में यदि मस्तिष्क में रक्त संचार बढ़ेगा, तो इससे सबसे ज्यादा लाभ कुंडलिनी को ही मिलेगा। क्योंकि कुंडलिनी एक प्रकार से हाई डेफिनिशन रिसोल्यूशन का एक मानसिक चित्र ही है, इसलिए वह बहुत ज्यादा प्राण ऊर्जा का उपभोग कर लेता है। इससे काम का वेग अनायास और जल्दी ही आनन्द के साथ शांत हो जाता है।

कुंडलिनी ही शिव को भीतर से सत्त्वगुणी बनाती है, बेशक वे बाहर से तमोगुणी प्रतीत होते हों


दोस्तो, भगवान शिव के बारे में सुना जाता है कि वे तमोगुणी हैं। तमोगुण मतलब अंधेरे वाला गुण। शिव भूतों के साथ श्मशान में रमण करते हैं। अपने ऊपर उन्होंने चिता की भस्म को मला होता है। साथ में यह भी कहा जाता है कि भगवान शिव परम सतोगुण स्वरूप हैं। सतोगुण मतलब प्रकाश वाला गुण। इस तरह दोनों विरोधी गुण शिव के अंदर दिखाए जाते हैं। फिर इसको जस्टिफाई करने के लिए कहा जाता है कि शिव बाहर से तमोगुणी हैं, पर भीतर से सतोगुणी हैं। आज हम इसे तांत्रिक कुंडलिनी योग के माध्यम से स्पष्ट करेंगे।

कुंडलिनी ही शिव के सत्त्वगुण का मूल स्रोत है

दरअसल शिव तन्त्र के अधिष्ठाता देव हैं। उन्हें हम सृष्टि के पहले तांत्रिक भी कह सकते हैं। यदि हम तांत्रिक योगी के आचरण का बारीकी से अध्ययन करें, तो शिव के संबंध में उठ रही शंका भी निर्मूल हो जाएगी। वामपंथी तांत्रिक को ही आमतौर पर असली तांत्रिक माना जाता है। वे पाँच मकारों का सेवन भी करते हैं। बेशक शिव पंचमकारी नहीँ हैं, पर तमोगुण तो उनके साथ वैसे ही रहता है, जैसे पंचमकारी तांत्रिक के साथ। दुनिया के आम आदमी के अंदर इनके सेवन से तमोगुण उत्पन्न होता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वे इससे उत्पन्न ऊर्जा को संभाल नहीं पाते और उसके आवेश में गलत काम कर बैठते हैं। वे गलत काम तमोगुण को और अधिक बढ़ा देते हैं। पंचमकार खुद भी गुणों में तेज हलचल पैदा करते हैं, जिससे स्वाभाविक तौर पर तमोगुण भी उत्पन्न हो जाता है, आम दुनिया के अधिकांश लोग जिसके प्रभाव में आकर निम्न हरकत कर बैठते हैं। परन्तु एक तंत्रयोगी गुणों की हलचल को अपने कुंडलिनी योग की बदौलत हासिल अद्वैत भाव से शांत कर देते हैं। इससे उन्हें बहुत अधिक कुंडलिनी लाभ मिलता है, क्योंकि अद्वैत के साथ कुंडलिनी अक्सर रहती ही है। इससे कुंडलिनी तेजी से चमकने लगती है। तमोगुण से दबी हुई प्राण शक्ति और नाड़ी शक्ति जब कुंडलिनी को लगती है, तो वह जीवंत होने लगती है। यह वैसे ही होता है जैसे अंधेरे में दीपक या चिंगारी अच्छे से चमकते हैं। तभी तो भगवान शिव की तरह श्मशान में किया गया कुंडलिनी योगाभ्यास शीघ्रता से फलीभूत होता है। वैसे भी देखने में आता है कि तमोगुण की अधिकता में मस्तिष्क में विचारों की हलचल रुक सी जाती है। ऐसा किसी भय से, उदासी से, हादसे के नजदीक गुजरने से, तनाव से, अवसाद से, नशे से, तमोगुणी आमिषादि भोजन से, काम आदि से मन व शरीर की थकान से, आदि अनेक कारणों से हो सकता है। ऐसे समय में मस्तिष्क में न्यूरोनल एनर्जी का संग्रहण हो रहा होता है। इसमें जो बीच-बीच में इक्का-दुक्का विचार उठते हैं, वे बहुत शक्तिशाली और चमकीले होते हैं, क्योंकि उन्हें घनीभूत न्यूरोनल एनर्जी मिल रही होती है। योगी लोग इन्हीं विचारों को कुंडलिनी विचार में तब्दील करते रहते हैं। इससे सारी न्यूरोनल एनर्जी कुंडलिनी को मिलती रहती है। बुरे समय में भगवान या कुंडलिनी को याद करने से उत्पन्न महान लाभ के पीछे यही सिद्धांत काम करता है। इस तमोगुण के दौर के बाद सतोगुण व रजोगुण का दौर आता है। यह विचारों के प्रकाश से भरा होता है। दरअसल संग्रहीत न्यूरोनल एनर्जी बाहर निकल रही होती है। इसमें चमकीले विचारों की बाढ़ सी आती है। आम आदमी तो इनमें न्यूरोनल एनर्जी को बर्बाद कर देता है, पर योगी उन विचारों को कुंडलिनी मेँ तब्दील करके सारी एनर्जी कुंडलिनी को दे रहा होता है। योगी ऐसा करने के लिए अक्सर किसी अद्वैत शास्त्र की मदद लेता है। अद्वैत शास्त्रों में देवता संबंधी दार्शनिक पुस्तकें होती हैं, जैसे कि पुराण, स्तोत्र आदि। शरीरविज्ञान दर्शन भी एक उत्तम कोटि का आधुनिक अद्वैत शास्त्र है। वह अद्वैतशास्त्र को अपनी वर्तमान गुणों से भरपूर अवस्था के ऊपर पिरोता रहता है। वह इस सच्चाई को समझता रहता है कि उसके जैसी सभी अवस्थाएँ हर जगह व हर किसी में विद्यमान हैं। इससे शान्ति और आनन्द के साथ कुंडलिनी चमकने लगती है। वह कुंडलिनी, योग के माध्यम से सभी चक्रों पर भ्रमण करते हुए सभी को स्वस्थ और मजबूत करती है। पूरा तन और मन आनन्द व प्रकाश से भर जाता है। इस प्रकार जिन चीजों से आम आदमी के भीतर तमोगुण उत्पन्न होता है, उनसे तन्त्रयोगी के भीतर सतोगुण उत्पन्न हो जाता है। सम्भवतः यही वजह है कि दुनिया वालों को भगवान शिव बाहर से तमोगुणी दिखते हैं, पर असल में वे भीतर से सतोगुणी होते हैं। इससे यिन और यांग का मिलन भी हो जाता है, जिससे ज्ञान पैदा होता है। यिन तमोगुण है, और यांग सतोगुण।

कुंडलिनी जागरण के लिए ही सृष्टिरचना होती है; हिंदु पुराणों में शिशु विकास को ही ब्रह्माण्ड विकास के रूप में दिखाया गया है

मित्रो, पुराणों में सृष्टि रचना विशेष ढंग से बताई गई है। कहीं आकाश के जल में अंडे का फूटना, कहीं पर आधाररहित जलराशि में कमल का प्रकट होना और उस पर एक देवता का अकस्मात प्रकट होना आदि। कहीं आता है कि सीधे ही प्रकृति से महत्तत्व, उससे अहंकार, उससे तन्मात्रा, उससे इंद्रियां और उससे सारी स्थूल सृष्टि पैदा हुई। जब मैं छोटा था, तब अपने दादाजी (जो एक प्रसिद्ध हिंदू पुरोहित और एक घरेलू पुराण वक्ता थे) से पूछा करता था कि अचानक खुले आसमान में बिना आधारभूत संरचना के ये सारी चीजें कैसे प्रकट हो गईं। वे परंपरावादी और रहस्यवादी दार्शनिक के अंदाज में कहते थे, “ऐसे ही होता है। हो गया तो हो गया।” वे ज्यादा बारीकी में नहीं जाते थे। पर अब कुंडलिनी योग की मदद से मैं इस शास्त्रीय उक्ति को ही सभी रहस्यों का मूल समझ रहा हूँ, “यत्पिण्डे तत्ब्रम्हांडे”। इसका मतलब है कि जो कुछ इस शरीर में है, वही सब कुछ ब्रम्हांड में भी है, इसके अतिरिक्त कुछ नहीं। इस उक्ति को पुस्तक”शरीरविज्ञान दर्शन” में वैज्ञानिक रूप से सिद्ध किया गया है। इसलिए प्राचीन दूरदर्शी ऋषियों ने शरीर का वर्णन करके ब्रम्हांड को समझाया है। वे गजब के शरीर वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक थे। दरअसल, एक आदमी कभी भी अपने मन या मस्तिष्क के अलावा कुछ नहीं जान सकता है, क्योंकि वह जो कुछ भी वर्णन करता है, वह उसके मस्तिष्क के अंदर है, बाहर नहीं।

सृष्टि रचना पुराणों में शरीर रचना से समझाई गई है

 कई जगह आता है कि शेषशायी विष्णु की नाभि से कमल पैदा हुआ जिस पर ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई। उसी के मन ने सृष्टि को रचा। माँ को आप विष्णु मान सकते हो। उसका शरीर एक शेषनाग की तरह ही केंद्रीय तंत्रिका तंत्र के रूप में है, जो मेरुदंड में स्थित है। वह नाग हमेशा ही सेरेब्रोस्पाइनल फ्लुइड रूपक समुद्र में डूबा रहता है। उस नाग में जो कुंडलिनी या माँ के मन की संवेदनाएं चलती हैं, वे ही भगवान विष्णु का स्वरूप है, क्योंकि शक्ति और शक्तिमान भगवान में तत्त्वतः कोई अंतर नहीं। गर्भावस्था के दौरान जो नाभि क्षेत्र में माँ का पेट बाहर को उभरा होता है, वही भगवान विष्णु की नाभि से कमल का प्रकट होना है। विकसित गर्भाशय को भी माँ के शरीर की नसें-नाड़ियाँ माँ के नाभि क्षेत्र के आसपास से ही प्रविष्ट होती हैं। खिले हुए कमल की पंखुड़ियों की तरह ही गर्भाशय में प्लेसेंटोमस और कोटीलीडनस उन नसों के रूप में स्थित कमल की डंडी से जुड़े होते हैं। वे संरचनाएं फिर इसी तरह शिशु की नाभि से कमल की डंडी जैसी नेवल कोर्ड से जुड़ी होती हैं। ये संरचनाएं शिशु को पोषण उपलब्ध कराती हैं। यह शिशु ही ब्रह्मा है, जो उस खिले कमल पर विकसित होता है। शिशु का साम्यगुण रूप ही वह मूल प्रकृति है, जिसमें गुणों का क्षोभ नहीं है। पहले मैं समझा करता था कि साम्यावस्था का मतलब है कि सभी गुण (प्रकृति का आधारभूत घटक) एक-दूसरे के बराबर हैं। आज भी बहुत से लोग ऐसा समझते हैं। पर ऐसा नहीं है।अगर ऐसा होता तो मूल रूप में सभी जीव एक जैसे होते, पर वे प्रलय या मृत्यु के बाद भी अपनी अलग पहचान बना कर रखते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि आत्मा के प्रकाश को ढकने वाले तमोगुण की मात्रा सबमें अलग होती है। इससे अन्य गुणों की मात्रा भी खुद ही अलग होती है। यदि तमोगुण ज्यादा है, तो उसी अनुपात में सतोगुण कम हो जाता है, क्योंकि ये एक-दूसरे के विरोधी हैं। दरअसल उसमें सभी गुण साम्यावस्था में अर्थात समान अवस्था में होते हैं। सभी गुणों का समान अवस्था में होने का या उनमें क्षोभ या लहरों के न होने का मतलब है कि सत्त्वगुण (प्रकाश व ज्ञान का प्रतीक) भी घटने-बढ़ने के बजाय एकसमान रहता है, रजोगुण (गति, बदलाव व ऊर्जा का प्रतीक) भी एकसमान रहता है, और तमोगुण (अंधकार व अज्ञान का प्रतीक) भी। इससे वह किसी विशेष गुण की तरफ लालायित नहीं होता। इसीलिए शिशु सबकुछ अनुभव करते हुए भी उदासीन सा रहता है। वह निर्गुण नहीं होता। क्योंकि गुणों में क्षोभ तभी पैदा हो सकता है, यदि गुण पहले से विद्यमान हों। निर्गुण या गुणातीत तो केवल भगवान ही होता है। इसलिए उसमें कभी गुण-क्षोभ सम्भव नहीं हो सकता है। इसीलिए ईश्वर हमेशा ही परिवर्तनरहित हैं। ईश्वर निर्गुण इसीलिए होता है, क्योंकि उसमें आत्म-अज्ञान से उत्पन्न तमोगुण नहीं होता। सभी गुण तमोगुण के आश्रित होते हैं। इसी वजह से तो पंचमकारी या वामपंथी तांत्रिक दुनियादारी और अध्यात्म दोनों में अव्वल लगते हैं। फिर शिशु के थोड़ा बड़ा होने पर चित्त या मस्तिष्क में वृत्तियों या संवेदनाओं के बढ़ने से गुणों में, विशेषकर सतोगुण में क्षोभ पैदा होता है, और वह प्रकाश की ओर आकर्षित होने लगता है। इससे सतोगुण रूप महत्तत्व अर्थात बुद्धि उत्पन्न होती है। उसे लगने लगता है कि उसकी सत्ता के लिए उसका रोना और दूध पीना कितना जरूरी है। उससे शिशु को अपने विशेष और सबसे अलग होने का अहसास होता है, जिसे अहंकार कहते हैं। इसप्रकार अहंकार की उत्पत्ति हो जाती है। उससे तन्मात्राओं की उत्पत्ति होती है। तन्मात्रा पंचमहाभूतों का सूक्ष्म रूप या अनुभव मात्र होती हैं, जिन्हें हम मस्तिष्क में अनुभव करते हैं। जैसे पृथ्वी की तन्मात्रा गंध, जल की रस, वायु की स्पर्श, अग्नि की रूप और आकाश की शब्द होती है। वह दूध के रस के स्वाद को पहचानने लगता है, खिलौने की गंध को पहचानता है, अपने किए मूत्र की गर्मी को स्पर्ष करता है, सुंदर-असुंदर रूप में अंतर समझने लगता है, घुंघरू या खिलौने की आवाज की ओर आकर्षित होता है। फिर शिशु बाहर की तरफ नजर दौड़ाता है कि ये अनुभूतियाँ कहाँ से आईं। उससे इन्द्रियों की उत्पत्ति होती है, क्योंकि वह चक्षु, कान, त्वचा, जीभ, नाक आदि इन्द्रियों की सहायता से ही बाहर को महसूस करता है। इसीके साथ मन रूप इन्द्रिय भी विकसित होती है, क्योंकि वह इसी से ऐसा सब सोचता है। इन्द्रियों से उपरोक्त पंचमहाभूतों की उत्पत्ति होती है, क्योंकि वह इन्द्रियों से ही उनको खोजता है और उन्हें अनुभव करता है। उसे पता चलता है कि दूध, खिलौना, घुंघरू आदि भौतिक पदार्थ भी दुनिया में हैं, जिन्हें वह इन्द्रियों से महसूस करता है। फिर आगे-2 जैसा-2 बच्चा सीखता रहता है, वैसी-2 सृष्टिरचना की उत्पत्ति आगे बढ़ती रहती है। इस तरह से एक आदमी के अंदर ही पूरी सृष्टि का विस्तार हो जाता है। 

कुण्डलिनी जागरण ही सृष्टि विकास की सीमा है

सृष्टि रचना का विस्तार आदमी कुंडलिनी जागरण के लिए ही करता है। यह तथ्य इस बात से सिद्ध होता है कि कुंडलिनी जागरण के बाद आदमी सृष्टि विस्तार से उपरत सा हो जाता है। उसका झुकाव प्रवृत्ति (दुनियादारी) से हटकर निवृत्ति (रिटायरमेंट) की तरफ बढ़ने लगता है। उसकी प्रवृत्ति भी निवृत्ति ही बन जाती है, क्योंकि फिर उसमें आसक्ति से उत्पन्न क्रेविंग या छटपटाहट नहीँ रहती। पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि यह स्थिति मन की होती है, बाहर से वह पूरी तरह से दुनियादारी के कामों में उलझा हो सकता है। कुंडलिनी जागरण के बाद आदमी को लगता है कि उसने पाने योग्य सब कुछ पा लिया है, और करने योग्य सबकुछ कर लिया है। 

शिव पुराण के अनुसार सृष्टि रचना शिव के वीर्य से हुई

शिवपुराण में आता है कि प्रकृति रूपी योनि में शिव के वीर्यस्थापन से एक अंडे की उत्पत्ति हुई। वह अंडा 1000 सालों तक जल में पड़ा रहा। फिर वह बीच में से फटा। उसका ऊपर का भाग सृष्टि का कपोल बना। उससे ऊपर के श्रेष्ठ लोक बने। नीचे वाले भाग से निम्न लोक बने। 
दरअसल शिव यहाँ पिता है, और प्रकृति या पार्वती माता है। दोनों के वीर्य और रज के मिलन से गर्भाशय में अंडा बना। वह गर्भाशय के पोषक जल में लंबे समय तक पड़ा रहा और विकसित होता रहा। फिर वह फटा, अर्थात मनुष्याकृति में उससे अंगों का विभाजन होने लगा। उसमें ऊपर वाला भाग सिर या कपोल की तरह स्पष्ट नजर आया। उसमें सहस्रार चक्र, आज्ञा चक्र और विशुद्धि चक्र के रूप में ऊपर वाले लोक बने। नीचे के भाग में अन्य चक्रों के रूप में नीचे वाले लोक बने।

कुण्डलिनी ही माता पार्वती है, जीवात्मा ही भगवान शिव है, और कुण्डलिनी जागरण ही शिवविवाह है

दोस्तो, पिछली पोस्ट में इस सर्वविदित सिद्धांत की पुष्टि की गई थी कि दरअसल कुंडलिनी विकास को ही जीवविकास की संज्ञा दी गई है। कुंडलिनी मूलाधार में जन्म लेती है, विभिन्न स्थानों पर बढ़ती है, और अंत में सहस्रार में जागृत हो जाती है। इसे ही शिवविवाह कहते हैं। जैसे उच्च कोटि के गृह में विवाह के बाद प्रेमी युगल विभिन्न स्थानों पर भ्रमण करता है, वैसे ही आत्मा-कुंडलिनी का जोड़ा सहस्रार में विवाहित होकर विभिन्न चक्रों पर भ्रमण करता रहता है। इसे ही शास्त्रों में ऋषियों का विभिन्न लोकों में भ्रमण बताया गया है। दरअसल वे लोक विभिन्न चक्रों के रूप में ही हैं। आज हम इस पर चर्चा करेंगे।

कुंडलिनी ही पार्वती है

अहंकार ही राजा दक्ष है। उसकी बेटी सती ही कुंडलिनी है। अहंकार से ही आदमी दुनियादारी में कामयाब होता है। उसी से एक स्थिर चित्र का निर्माण होता है, जो कुंडलिनी है। अहंकार रूपी दक्ष नहीं चाहता कि उसकी पुत्री कुंडलिनी भूतिया शिव के पीछे भागकर उसकी दुनियादारी को नुकसान पहुंचाए। अंत में वह हार जाता है और सती शिव को प्राप्त करने के लिए कुंडलिनी योग रूपी तप करती है। वह उसकी इच्छा के विरुद्ध जाकर शिव से विवाह कर लेती है मतलब कुंडलिनी जाग जाती है। अहंकार काफी कम हो जाता है पर मरता नहीं। वह कुंडलिनी को शिव से दूर करके अपने झमेले में फंसा लेता है। जब कुंडलिनी को यह भान होता है तब तक उसकी उमर पूरी हो चुकी होती है। गुस्से में शिव के द्वारा दक्ष का सिर काटकर बकरे का सिर लगाने का अर्थ है कि अहंकार शरीर के साथ भी नहीं मरता, अपितु कुछ क्षीण जरूर हो जाता है। अगले जन्म में कुंडलिनी रूपी सती पार्वती के रूप में पर्वत राज के घर पैदा होती है। वह शिव की प्राप्ति के लिए फिर तप करती है। कुंडलिनी अपना अभियान अगले जन्म में फिर से शुरु कर देती है। मैटाफोरिक कथा में इसका मतलब है कि उस कुंडलिनी को धारण करने वाला योगी अपने अगले जन्म में अपने अंतिम लक्ष्य की पूर्ति के लिए हिमालय में योगसाधना करने चला जाता है। वहाँ इंद्र अपनी गद्दी खो जाने के डर से कामदेव को शिव की तपस्या भंग करने के लिए भेजता है। शिव उसे अपनी दृष्टि से जला देते हैं। यहाँ शिव, योगी की सुप्त अंतरात्मा हैं। कामदेव दुनिया की रंगरलियों का रूपक है। यदि योगी की कुंडलिनी उसकी आत्मा से मिलन को उत्सुक हो, तो दुनिया की रंगरलियां आत्मा का अहित नहीँ कर सकतीं, बल्कि खुद ही क्षीण हो जाती हैं। पार्वती के माता-पिता प्रारंभ में पार्वती को शिव से विवाह से रोकते हैं। दरअसल मन-बुद्धि ही पार्वती के माता पिता के प्रतीक हैं। कुंडलिनी की उत्पत्ति उन्हीं से होती है। वे कुंडलिनी से दुनियादारी की उपलब्धियों की ही अपेक्षा रखते हैं, उसे ईश्वर की प्राप्ति के लिए तप आदि प्रयास नहीं करने देना चाहते। शिव भी पार्वती को हतोत्साहित करने के लिए उसे घटिया भेष में मिलकर शिव की बुराइयां सुनाते हैं। दरअसल वह अज्ञान से ढकी प्रारंभिक योगी की आत्मा ही है जो भगवान के बारे में भ्रम पैदा करती रहती है। पर पार्वती तप में लगी रहती है। अंत में शिव प्रसन्न होकर उससे विवाह कर लेते हैं, मतलब कुंडलिनी जागरण हो जाता है। फिर पार्वती कैलाश को चली जाती है, मतलब कुंडलिनी सहस्रार में बस जाती है। उसके कार्तिकेय बेटा पैदा होता है। वह दिव्य सेना का अधिपति है। उसके बेटा गणेश भी जन्म लेता है, जो समस्याओं से बचाता है, और विघ्नों को हरता है। वास्तव में ये सभी काम जागृत कुंडलिनी के ही हैं। दिव्य सेना यहाँ शरीर की इन्द्रियों की प्रतीक है। शिवपुराण की मिथक कथा में शिव को भूत की तरह दिखाया गया है, जिसके प्रति पार्वती आकर्षित होती है। उसके माँ बाप उसे रोकते हैं। दरअसल अज्ञान से ढकी आत्मा ही शिव है, जो बाहर से अंधेरे भूत की तरह लगती है। पर असल में अंदर से वह प्रकाशरूप ही होती है। अहंकार और बुद्धि ही पार्वती रूपी कुण्डलिनी के माँ-बाप हैं। ये उसे शिव की ओर जाने से रोकते हैं।कालिदास के कुमारसम्भव के अनुसार पार्वती शिव को गुफा के वीराने से गृहस्थ जीवन की मुख्य धारा में लाना चाहती है। कुण्डलिनी भी इसी तरह से अज्ञाननिद्रा में डूबी आत्मा को जगाना चाहती है। साथ में लिखा है कि कामदेव के भस्म होने से सृष्टि व्यवस्था थम सी गई थी। फिर पार्वती ने शिव से विवाह किया और उनसे कामदेव को पुनर्जीवित करवाया। फिर सृष्टि की प्रक्रिया पुनः प्रारंभ हो गई। जब तक तीव्र कुंडलिनी योगसाधना चली होती है, तब तक योगी दुनियादारी से दूरी सी बना कर रखता है। कुण्डलिनी जागरण के बाद उसका मन पुनः दुनिया में रम जाने का करता है, यद्यपि ज्ञान के साथ। इसे ही कामदेव का पुनर्जन्म कहा गया है।देवीभागवत पुराण के अनुसार, पर्वत राज हिमालय और उसकी पत्नी मैना भगवती आदि पराशक्ति को प्रसन्न करती है। वही पार्वती के रूप में उनकी बेटी बन जाती है। वास्तव में अज्ञान से ढकी आत्मा ही पर्वत राज हिमालय है, और बुद्धि मैना है। जब दोनों अच्छे सांसारिक कर्मों से व मानवता से शक्ति को प्रसन्न करते हैं तो वह कुंडलिनी के रूप में उनके शरीर में स्थायी रूप से बस जाती है। 
पार्वती अपने लास्य नृत्य से शिव को शांत करती हैं, जब वे विनाशकारी तांडव नृत्य करते हैं। असल में अज्ञान से भरी हुई जीवात्मा अशांत व भटकी हुई होती है। वह बहुत से गलत काम करती है। कुंडलिनी ही उसे प्रकाश प्रदान करके सन्मार्ग दिखाती है।
शाक्त के अनुसार, शिव पार्वती के घर पर निवास करते हैं। यहाँ पार्वती को मुख्य और शिव को गौण माना गया है। उनके आपसी विवाद से शिव नाराज होकर घर छोड़कर जाने लगते हैं। तब पार्वती दशमहाविद्याओं को उतपन्न करके उनसे शिव के भागने का हरेक द्वार बंद करवाती है, और शिव को जाने से रोकती है। दरअसल सहस्रार के सिवाय विभिन्न चक्र विशेषकर मूलाधार कुंडलिनी का घर है। वहाँ उसका प्रभुत्व रहता है। वहाँ जीवात्मा ज्यादा सहज नहीं रहता। किसी कारणवश कुंडलिनी के शिथिल पड़ने से वह वहाँ से भागने लगता है। फिर कुण्डलिनी पंचमकारों और उनसे उत्पन्न पाँच वीभत्स भावों का आश्रय लेती है। इससे वह बहुत मजबूत होकर जीवात्मा को जाने से रोकती है। क्योंकि जहाँ कुंडलिनी है, वहाँ जीवात्मा है। उसके भागने के लिए कहे गए विभिन्न मार्ग कुंडलिनी चक्र ही हैं। कई स्थानों पर कुंडलिनी चक्रों की संख्या दस भी बताई गई है।एक मिथक के अनुसार, पार्वती नहा रही होती है। उसने अपने बेटे गणेश को दरवाजे पर पहरेदार के बतौर रखा होता है। गणेश शिव को भी अंदर नहीँ जाने देते। शिव नाराज होकर उसका सिर धड़ से अलग कर देते हैं। इससे पार्वती शिव से बहुत नाराज होती है। फिर उसे प्रसन्न करने के लिए शिव गणेश को हाथी का सिर लगाते हैं। दरअसल, कुंडलिनी चाहती है कि शरीर में उसका सबसे अधिक प्रभुत्व रहे। गणेश इन्द्रियों का नायक है। वह दुनिया की फालतू चीजों को कुंडलिनी का प्रभुत्व नष्ट करने से रोकता है। वह बाहर से आए भगवानों को भी ऐसा करने से रोकता है। इससे बाहरी धार्मिक संगठन नाराज होकर उसे सजा देते हैं। पर उन्हें कुण्डलिनी की शक्ति के आगे झुककर उसे छोड़ना पड़ता है। यद्यपि वह दुनिया के द्वारा की गई उपेक्षा से काफी क्षीण हो जाता है। शाक्त पंथ में यह भी आता है कि शक्ति के बिना शिव एक शव है। यह सत्य ही है क्योंकि कुंडलिनी के संयोग के बिना जीवात्मा अचेतन और अंधकार से भरा हुआ होता है। जब सहस्रार में उसका कुंडलिनी से विवाह होता है, तभी वह शिव बनता है। उपरोक्त सभी तथ्यों से जाहिर है कि कुंडलिनी योग ही शिव व पार्वती से जुड़ी मिथक कथाओं के मूल में है।

कुंडलिनी के लिए ही विभिन्न देवता विभिन्न व्यक्तित्वों के सांचों के रूप में हैं


मित्रो, मुझे कभी कोई देवता अधिक पसंद आता है, कभी कोई। बहुत पहले मुझे देवी माता रानी सर्वाधिक पसंद थी। अब मुझे भगवान शिव सबसे अच्छे लगते हैं। एक बार मैं जब मुंबई घूमने गया था, तब मुझे भगवान गणेश सबसे अच्छे लगे थे। देवताओं से हमेशा ही मेरी कुंडलिनी उजागर हो जाती थी। बात स्पष्ट है कि जो देवता कुंडलिनी को सबसे ज्यादा उजागर करता है, वही देवता सबसे अच्छा लगता है। इसका मतलब है कि असली आनन्द तो कुंडलिनी में ही है। देवता तो कुंडलिनी को उजागर करने में मददगार होते हैं। 

एक विशेष देवता का स्वरूप एक विशेष व्यक्तित्व के स्वरूप का साँचा होता है

वास्तव में विभिन्न देवताओं का अस्तित्व विभिन्न व्यक्तित्वों के बोधक के रूप में है। भगवान शिव एक तांत्रिक, मस्त, अकिंचन, भोले, निस्पृह, प्रकृति-प्रेमी, शीघ्र नाराज व प्रसन्न होने वाले, अनासक्त व उच्च कोटि के आत्मगौरव के अहसास वाले व्यक्तित्व के बोधक हैं। यदि किसी को ऐसा व्यक्तित्व व ऐसे व्यक्तित्व वाला कोई आदमी पसंद है, तो उसे शिव आराधना से लाभ मिल सकता है। शिव का ध्यान करते रहने से ऐसे व्यक्तित्व वाले व्यक्ति की छवि उसके मन मन्दिर में प्रकट होती रहती है, और फिर धीरे-धीरे कुंडलिनी का रूप ले लेती है। जीवन में कोई किसी के साथ भौतिक रूप से तो लगातार नहीं बना रह सकता। परन्तु मानसिक रूप में जरूर हमेशा बना रह सकता है। किसी प्रेमी व्यक्ति के मानसिक चित्र को लगातार बनाए रखने के लिए ही उसके जैसे देवता को चुना जाता है। देवता को मूर्ति, चित्र, प्रतिमा आदि के रूप में पूजा जाता है। इससे प्रेमी का मानसिक चित्र मजबूत होता रहता है। कई बार उल्टा भी घटित होता है। जिस व्यक्तित्व के देवता की अराधना की जाती है, उस व्यक्तित्व वाले आदमी से प्यार होने लगता है। इससे फिर कुंडलिनी का विकास होता है। पुराने युग में योगी किसी प्रेमी व्यक्ति के बिना ही खाली देवता की मूर्ति को भी कुंडलिनी बना लेते थे। परंतु आजकल यह असंभव सा ही लगता है। क्योंकि आजकल का समाज देवप्रधान या मूर्तिप्रधान न होकर व्यक्तिप्रधान है। इसी तरह किसी को भगवान गणेश का व्यक्तित्व रुचिकर लग सकता है, तो किसी को मां काली का। पसंद अपनी-अपनी। सभी की रुचि के अनुसार देवता विद्यमान हैं। जहाँ तक मेरे अपने अनुभव की बात है, तो मेरी कुंडलिनी के रूप में शिव जैसा व्यक्तित्व था। किसी दिव्य घटनाक्रम से एकबार मेरा झुकाव एकदम से भगवान शिव के प्रति बन गया था। मैं पूरी तरह हर तरफ से हारकर अपने आप को उनके प्रति समर्पित महसूस कर रहा था। इससे मुझे विविध अनुकूल परिस्थितियों के साथ अनजाने में ही तंत्रयोग की प्रेरणा मिली, जिससे मेरी कुंडलिनी जल्दी से जागृत हो गई।

देवता भावरूप में हमेशा विद्यमान रहते हैं

उदाहरण के लिए यदि किसी देश-काल में पैदा हुए विशेष तांत्रिक या कहो भैरवनाथ को तन्त्र का देवता माना जाता, तो आजकल के अधिकांश लोगों की उन पर श्रद्धा न होती। ऐसा इसलिए होता, क्योंकि भैरवनाथ एक असली मनुष्य थे, जो बहुत पुराने समय में पैदा हुए थे, और आज नहीं हैं। उनके समय की जीवन-परिस्थितियां आज की जीवन-परिस्थितियों से सर्वथा भिन्न थीं। इस प्रकार लोगों के मन में उमड़ रहा तांत्रिक भाव बाबा भैरव की तरह ही नष्टप्राय हो जाता। परंतु इसके विपरीत भगवान शिव शाश्वत हैं। वे आज भी वैसे ही हैं, जैसे हजारों वर्ष पहले थे। वे आगे भी हमेशा वैसे ही रहेंगे। वास्तव में वे कोई नाशवान व्यक्ति नहीं, अपितु व्यक्तित्व या भाव के रूप में हैं। उनके व्यक्तित्व को ओढ़ने वाले अनगिनत लोग हो चुके हैं। इसलिए उन पर हमेशा विश्वास और इंटरस्ट बना रहता है। उससे तंत्र पर भी विश्वास बना रहता है, और उसके प्रति रुचि भी। 

देवता हमेशा ही कुंडलिनी को शक्ति देते हैं

यदि कोई देवता रुचिकर हो या न हो, वह हमेशा ही कुंडलिनी लाभ देता है। देवता वास्तव में सजीव (यांग/शिव/पुरुष) और निर्जीव (यिन/शक्ति/प्रकृति) के मिश्रण की तरह है। सजीव का गुण उसमें मनुष्य की तरह ही सभी क्रियाकलाप करने के रूप में है। निर्जीव का गुण उनमें निर्जीव वस्तुओं जैसे कि हवा, पानी, आग, सूर्य आदि के रूप में होना है। देवता में सजीव व निर्जीव का मिश्रण तभी संभव हो सकता है, यदि देवता अद्वैतमयी और अनासक्त हों। अद्वैत व अनासक्ति से देवता के सभी क्रियाकलाप उसके मन में शांत हो जाते हैं। हालांकि देवता द्वारा बाहर-बाहर से वे होते रहते हैं। यदि देवता पूरी तरह से सजीव होता, तो एक जीवित मनुष्य की तरह प्रत्यक्ष होता, और दुनिया के बंधन में डूबा रहता। यदि देवता पूरी तरह निर्जीव होता, तो मृतप्राय होता, जो सृष्टि को क़भी भी न चला पाता। और तो और, उसकी पूजा से लाभ की बजाय हानि होती। देवता के इसी अद्वैत रूप के कारण ही उसकी पूजा करने से आदमी के मन में अद्वैत छा जाता है, जिससे कुंडलिनी उजागर हो जाती है। इसीलिए ही वेद-शास्त्रों में लिखा गया है कि देवता की अराधना से दुनिया के सुख-साधनों के साथ मुक्ति की भी प्राप्ति होती है।

कुंडलिनी के लिए ही भगवान शिव काशी में पार्वती के साथ विहार करने के लिए सभी जिम्मेदारियों से मुक्त बने रहते हैं

सभी मित्रों को पावन शिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं

मित्रो, मैंने पिछली पोस्टों में बताया था कि भगवान शिव मस्त-मलंग तांत्रिक की तरह रहते हैं। उनके पास कुछ अति जरूरी चीजों के सिवाय कुछ अतिरिक्त नहीं रहता। उनमें से माता पार्वती भी एक हैं, जिनके साथ वे काशी में स्वच्छन्द रूप से विचरण करते रहते हैं। 

तंत्रसिद्धि के लिए दुनियादारी के झंझटों से दूर रहना जरूरी है

शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव ने दुनियादारी के झमेले से दूर रहने के लिए भगवान विष्णु की उत्पत्ति की। उन्होंने उन्हें दुनिया के पालन और रक्षण की जिम्मेदारियां सौंपी। स्वयं वे पार्वती के साथ सुखपूर्वक योगसाधना करने के लिए काशी में विहार करने लगे। कहते हैं कि वे आज भी वहाँ विचरण करते रहते हैं।

प्रेमयोगी वज्र का एकांत-विहार का अपना निजी अनुभव

प्रेमयोगी वज्र भी भगवान शिव की तरह दुनियादारी के झमेले में फंसा हुआ था। उसने लगभग 20 वर्षों तक कठिन परिश्रम किया, और विकास के अनेक कारनामे स्थापित किए। हालाँकि उसका रुझान तांत्रिक जीवन की तरफ भी रहता था। इससे वह अद्वैत भाव में स्थित रह पाता था। उससे वह थकान महसूस करने लगता था। ऐसा इसलिए होता था क्योंकि अद्वैत भाव या कुण्डलिनी को बनाए रखने के लिए भी कुछ अतिरिक्त शक्ति खर्च होती रहती है। शक्ति के बिना कुछ भी संभव नहीं, भगवान भी नहीं। तभी तो शक्ति को शिव का अभिन्न हिस्सा समझा जाता है। हालांकि कभी-कभार के तांत्रिक खान-पान व रहन-सहन से उस शक्ति की आपूर्ति आसानी से हो जाती थी। आग उसे भी जलाती है, जो उसके बारे में जानता है; और उसे भी उतना ही जलाती है, जो उसके बारे में नहीं जानता। इसी तरह दुनियादारी के झंझट सभी के अंदर2अज्ञान का अंधेरा पैदा कर देते हैं। यह अलग बात है कि अद्वैतयुक्त ज्ञानी में वह अंधेरा कम घना होता है। यह ऐसे ही है जैसे आग के बारे में जानने वाला आदमी उससे बचने का प्रयास करता है, जिससे वह कम जलन प्राप्त करता है। उसी दौरान किसी अचिंत्य परिस्थिति के कारण उसका शिव के प्रति प्रेम जागा था। फिर वैसी ही दिव्य परिस्थितियों के कारण उसे घर से अति दूर सपरिवार एकांत से भरे  स्थान में रहने का अवसर मिला। उससे वह पुराना जीवन लगभग भूल सा गया। एक प्रकार से भगवान शिव ने उसे अपनी तरह दुनियादारी के झंझटों से मुक्त कर दिया। यहाँ ध्यान देने योग्य बात है कि जो दुनिया में उलझा हो, उसे ही त्याग का फल मिलता है। जो पहले से ही सोया हुआ हो, उसे सो कर कोई लाभ नहीं मिलता। तभी तो शिवपुराण में लिखा है कि दुनियादारी के झंझटों को संभालने के लिए शिव ने विष्णु को नियुक्त किया और स्वयं संसार को त्याग कर काशी चले गए। एक अधिकारी अपने मातहत को उन्हीं जिम्मेदारियों को सौंप सकता है, जिनके बारे में वह खुद बखूबी जानता हो और जिन्हें निभाने का उसे लंबा अनुभव हो। यदि भगवान शिव ने दुनिया को लम्बे समय तक न चलाया होता, तो वे विष्णु को अपनी जगह पर कैसे प्रतिनियुक्त कर पाते। जो दुनिया को पुरजोर तरीक़ेसे नहीं स्वीकारते, उन्हें दुनिया के त्याग का फल भी नहीं मिलता। इसलिए जब तक दुनिया में रहो, पूरी तरह डूब के रहो, पर होश संभाल कर रखो। आज विज्ञान भी इस बात को स्वीकारता है कि जब मन की चेतनायुक्त क्रियाशीलता एकदम से 50 प्रतिशत से ज्यादा गिर जाए, तब आत्मजागृति की संभावना काफी बढ़ जाती है। इसीलिए पुराने समय में राजा लोग एकदम से राज्य का त्याग करके तप के लिए वनवास को चले जाया करते थे। चार आश्रम भी इसीलिए बने थे। गृहस्थ आश्रम के झमेले को निभा कर आदमी एकांत में स्थित वानप्रस्थ आश्रम जाया करते थे, जहाँ उन्हें बहुत शान्ति मिलती थी। उस एकांत में प्रेमयोगी वज्र शिव की तरह ही पूर्ण तंत्रमयी जीवन बिताते हुए अपने तांत्रिक साथी के साथ मनोरम व धार्मिक स्थानों पर विहार करने लगा। उससे उसकी कुण्डलिनी क्रियाशील हो गई, और दो वर्षों के अंदर ही जागृत हो गई।

शिव के के द्वारा भाँग का सेवन 

भगवान शिव के बेफिक्री, मस्ती, आनन्दपूर्णता, अद्वैत व भोलेपन आदि गुणों को ही उनके द्वारा भाँग का नशा किए जाने के रूप में दिखाया गया है। लोग इन्हीं गुणों की प्राप्ति के लिए ही नशा करते हैं। पर ज्यादातर लोग सफल नहीं हो पाते, क्योंकि ये गुण आत्मा के आश्रित हैं, नशे के नहीं। यदि तांत्रिक विधि से व गुरु की देखरेख में हल्का नशा किया जाए, तो वह इन गुणों की झलक दिखाकर इनकी स्थायी प्राप्ति के लिए प्रेरित कर सकता है। इन गुणों की वास्तविक व स्थायी प्राप्ति तो आत्मबल से ही सम्भव है।

भगवान शिव के ऊपर दुग्ध व भाँग मिश्रित जल चढ़ाने के पीछे छिपा आध्यात्मिक मनोवैज्ञानिक रहस्य

मैं आज सुबह सपरिवार एक शिवमंदिर घूम कर आया। पैदल ही 4 किलोमीटर का सफर तय किया। मौसम बड़ा सुहाना था। चारों ओर प्रकृति की छटा बिखरी हुई थी। आम के पीले पुष्प गुच्छों पर भौंरे गुंजायमान हो रहे थे। लोगबाग मंदिर आ-जा रहे थे। रास्ते में कुछ पिल्ले हमारे साथ-साथ चलने लगे, फिर कुछ सूंघ कर रुक गए और इधर-उधर देखने लगे। कुछ पुराने और बड़े पेडों पर लताएँ ऐसे घनीभूत होकर लिपटी हुई थीं, जैसे कि कोई प्रियतमा अपने प्रेमी से या माता अपने शिशु से अपना लगाव दिखा रही हो। एक सूखा पेड़ आधा नीचे झुका हुआ था, और एक जिंदगी से थक कर झुके एक बूढ़े इंसान की तरह लग रहा था। वास्तव में अधिकांश समय हम देखकर भी कुछ नहीं देखते। उस रास्ते से मैं कई बार गुजरा हूँ, पर ये चीजें मुझे पहली बार नजर आईं। इसलिए आँखों के साथ दिमाग और मन भी खुले रखने चाहिए। मंदिर से आते हुए रास्ते से कुछ भाँग के पत्ते भी तोड़कर साथ ले आया। घर में उनको करीब 20 मिनट तक शिव के मंत्र के जाप के साथ बारीक पीस। फिर उसे थोड़े पानी, उतने ही दूध और कुछ शहद के साथ मिश्रित किया। उस घोल को मैं लगभ 25 मिनट तक शिव मन्त्र के जाप के साथ फैंटता रह। फिर उस घोल को छान कर साफ किया। उस से थोड़ा सा घोल लेकर मैं पास के दूसरे मंदिर सपत्नीक चला गया। वहां उसे लोटे के जल मैं मिश्रित कर दिया और उससे शिवलिंग का अभिषेक करने लगा। लगभग 15 मिनट तक मैं थोड़ा-थोड़ा करके उस जल को शिवलिंग के ऊपर गिराता रहा। उस जल का रंग कुछ दूधिया और हरा था। एक अन्य दंपत्ति भी नजदीक ही बैठे थे, और शिव की पूजा के साथ शिव की आरती गा रहे थे। जैसे ही शिवलिंग पर मेरा जल गिरता था, मेरी कुण्डलिनी शक्ति प्राप्त करके वहाँ चमकने लगती थी। मन भी कुछ रोमांटिक मूड में जैसा आ गया था। वास्तव में वह जल भगवान शिव का यौन द्रव्य बन गया था। दूध से उसका रंग सफेद हो गया था, और भाँग से उसमें यौनता का नशा चढ़ गया था। एक बार पारद शिवलिंग के दर्शन के समय भी मुझे वैसी ही अनुभूति हुई थी। जब मैंने गूगल पर सर्च किया तो पता चला कि तरल पारे को एक विशेष प्राचीन हर्बल तकनीक से ठोस बनाया जाता है। वह एक प्रकार से भगवान शिव की ठोस बन गया यौन द्रव्य ही है। इससे अवचेतन में यह संदेश भी जाता है कि भटकते हुए तरल मन को ठोस बना कर शांत करना चाहिए। मैं घर वापिस आया और भगवान शिव के नाम से उस द्रव्य का आधा गिलास पी गया।

कुण्डलिनी-लिङ्गों में मूलाधार चक्र ही सर्वश्रेष्ठ लिङ्ग है

दोस्तों, शिवपुराण में भगवान शिव के ध्यान पर ही अधिकांश जोर दिया गया है। उसमें भगवान शिव को ही कुंडलिनी माना गया है। पूरे पुराण में लिंग का बहुतायत में वर्णन है। जब लिंग के ऊपर शिव (कुंडलिनी) का ध्यान किया जाता है, तब वह शिवलिंग या कुंडलिनी-लिंग बन जाता है। शिवलिंग ही शिवपुराण की धुरी है, जिसके चारों ओर पूरा पुराण घूम रहा है।

कुण्डलिनी के साथ जुड़े हुए चिन्ह को ही कुंडलिनी लिंग या शिवलिंग कहते हैं

वास्तव में मुख्य वस्तु के साथ जुड़े हुए चिन्ह को ही उस वस्तु का लिंग कहते हैं। जैसे कि पुरुष के साथ जुड़े हुए पौरुषत्व के चिन्ह को पुलिंग और स्त्री के साथ जुड़े हुए स्त्रीत्व के चिन्ह को स्त्रीलिंग कहते हैं। लिंग के बिना मुख्य वस्तु में कुछ कमी आ सकती है, परंतु वह समाप्त नहीं हो जाती। यदि पुरुष से पुरुष के चिन्ह समाप्त हो जाएं, तो पुरुष के स्वभाव में कुछ कमी आ सकती है, परंतु पुरुष वैसा ही रहेगा। इस हिसाब से तो छिपकली की पूँछ को भी छिपकली का लिंग कह सकते हैं। जब वह उसे गिराती है, तो उससे उसे अपना संतुलन बनाने में कुछ कठिनाई आ सकती है, परंतु छिपकली वैसी ही रहती है। इसी तरह, अध्यात्म में मुख्य वस्तु कुंडलिनी ही है। किसी मूर्ति आदि के चिन्ह से जोड़ने पर कुंडलिनी को अतिरिक्त बल मिलता है। यदि उस चिन्ह या लिंग को हटा दिया जाए, तो कुंडलिनी ध्यान में कुछ कमी आ सकती है, परंतु कुंडलिनी तब भी मन में बनी रहती है।

कुंडलिनी योग चर लिंग के अंतर्गत आता है

शिवपुराण में अनेक प्रकार के लिंगों का वर्णन आता है। चर लिंग कुंडलिनी योगी के लिए विशेष महत्त्व का है। इसमें मूल संवेदना को लिंग माना गया है। शरीर के विभिन्न चक्र उस लिंग के बदलते हुए स्थान हैं। वह संवेदना निचले चक्रों पर उत्पन्न होती रहती है, और अन्य सभी चक्रों से होती हुई चक्राकार घूमती रहती है।

सबसे स्थायी लिंग के रूप में हमारा अपना शरीर

अन्य प्रकार के लिंग अचर होते हैं। उनमें पर्वत या पत्थर से बने लिंग भी शामिल हैं। पर्वत से बने लिंग स्थायी होते हैं। पत्थर से बने लिंग अस्थायी होते हैं। पत्थर से बने लिंग स्त्रियों के लिए बेहतर बताए गए हैं। अन्य प्रकार के लिंग सूक्ष्म लिंग होते हैं। मंत्र लिंग इनमें मुख्य हैं। मंत्रलिंग में मंत्र के ऊपर कुंडलिनी का ध्यान किया जाता है। ॐ भी एक उत्तम प्रकार का मंत्र लिंग है। सूक्ष्म लिंग सन्यासियों के लिए बेहतर बताए गए हैं। पर्वत को इसीलिए स्थायी लिंग कहा गया है, क्योंकि वे लाखों वर्षों तक वैसे ही बने रहते हैं। इस हिसाब से तो हमारा अपना शरीर सबसे स्थायी लिंग हुआ, क्योंकि वह हमें हर जन्म में मिलता ही रहेगा, जब तक हमें मुक्ति नहीं मिल जाती। इसका सीधा सा अर्थ है कि कुंडलिनी योग साधना सर्वश्रेष्ठ साधना है। वास्तव में लिंग का दूसरा अर्थ अनुभूति भी है, जो हमें विभिन्न प्रकार के पदार्थों और भावों की सहायता से प्राप्त होती है। उसी अनुभूति पर कुंडलिनी को आरोपित किया जाता है। क्योंकि सबसे तीखी और मीठी संवेदना की अनुभूति हमें अपने ही शरीर से प्राप्त होती है, कहीं बाहर से नहीं, इसलिए शरीर के अंदर का लिंग ही सर्वश्रेष्ठ लिंग है। यही सिद्धांत तंत्रयोग का मूल सिद्धांत है।  “शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुंडलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)” नामक पुस्तक में इस बात को पुरजोर सिद्ध करके दिखाया गया है।

कुंडलिनी के लिए शिवलिंग के रूप वाले गुम्बदाकार या शंक्वाकार पर्वत का महत्त्व: वर्ष 2020 की अंतिम ब्लॉग पोस्ट

Image by Shalu, Subathu

नया साल चमक और आशा से भरा हो ताकि अंधेरा और उदासी आप से दूर रहें। नववर्ष 2021 की शुभकामना!

दोस्तों, करोल पहाड़ हिमालय का एक बेहद आकर्षक पहाड़ है। यह शिवलिंग के जैसे आकार का है। मैदानी क्षेत्रों से ऊपर चढ़ते समय यह ऊंचे पहाड़ों के प्रवेशद्वार पर स्थित प्रतीत होता है। मेरी कुंडलिनी से जुड़े इसके योगदान पर वैज्ञानिक चर्चा हम आज इस पोस्ट में करेंगे।

करोल पहाड़ के साथ मेरा आजन्म रिश्ता

मैं इसी पहाड़ की नजर में पैदा हुआ, और इसीके सामने बड़ा हुआ। यह आसपास के क्षेत्र में सबसे ऊंचा पहाड़ एक साक्षी की तरह हर समय मेरे सामने खड़ा रहा। यह हमेशा मेरे कर्मों की गवाही देता रहा, और मुझे सन्मार्ग पर प्रेरित करता रहा। इसने मुझे कभी अहंकार नहीं करने दिया। जैसे ही मुझे कभी थोड़ा सा भी अहंकार होने लगता था, तो वह कहता था, “मैं तो सबसे बड़ा और ऊँचा हूँ, फिर भी मैं कभी अहंकार नहीं करता; फिर तू मेरे सामने कीड़े जितना छोटा होकर भी क्यों अहंकार कर रहा है”। उसके इस ताने से मेरा अहंकार समाप्त हो जाता था। उससे मेरे मन की कुंडलिनी चमकने लग जाती थी। इस पहाड़ पर मेरा आना-जाना लगा रहता था, क्योंकि मेरे ज्यादातर मित्र, रिश्तेदार व आजीविका के साधन इसी पहाड़ पर होते थे। प्रतिदिन सुबह जब मैं सूर्य को जल चढ़ा रहा होता था, तब वह इसी पहाड़ के पीछे से उग रहा होता था। इससे वह पूजा का जल उस पहाड़ को भी स्वयं ही लग जाता था। इससे अनजाने में ही वह पहाड़ मेरा इष्ट देवता और मित्र बन गया था।

समय के साथ करोल पहाड़ के साथ मेरी कुंडलिनी मजबूती से जुड़ती गई

सूर्य को जल देते समय मेरे मन में उमड़ने वाली कुण्डलिनी करोल पहाड़ के साथ स्वयं ही जुड़ती गई। सूर्य की तरफ तो सीधा देखा नहीं जा सकता, और न ही सूर्य देव दिनभर नजरों के सामने रहते हैं। परन्तु वह पहाड़ तो हमेशा नजरों के सामने रहता था। उसकी तरफ देर तक सीधी नजर से भी देखा जा सकता था। काम करते हुए जरा सा सिर ऊपर उठाता, तो वह पहाड़ अनायास ही दृष्टिपटल पर आ जाता था, और उसके साथ ही उससे जुड़ी हुई मेरी कुंडलिनी भी। इस तरह से मेरी कुण्डलिनी मेरे जीवनभर मेरे साथ लगातार बनी रही, और उत्तरोत्तर बढ़ती रही। परिणामस्वरूप, मुझे गुरुकृपा से क्षणिक आत्मज्ञान भी उसी खूबसूरत पहाड़ के नजारे के साथ मिला, और कुंडलिनी जागरण भी उसीके चरणों की छत्रछाया में जाकर मिला।

करोल पहाड़ का शिवलिंग के जैसा आकार भी मेरी तांत्रिक कुंडलिनी के विकास में सहायक बना

शिवपुराण में शिवलिंग की आकृति का बहुत ज्यादा आध्यात्मिक महत्त्व बताया गया है। वहाँ शिवलिंग की पूजा को सबसे श्रेष्ठ माना गया है। जरा सोचो कि जब छोटे से घरेलू आकार के शिवलिंग का इतना ज्यादा महत्त्व है, तब शिवलिंग के आकार वाले पहाड़ का महत्त्व क्योंकर नहीं होगा। इससे तो महत्त्व कई गुना बढ़ जाएगा, क्योंकि पहाड़ की विशालता, अचलता, अमरता, और अहंकारविहीनता के कारण उसके प्रति आदरबुद्धि वैसे भी ज्यादा होती है। तभी तो पहाड़ को देवता भी माना जाता है। इसी वजह से ही लोग साधना के लिए सुरम्य पहाड़ों की ओर जाते हैं। वैसे तो विभिन्न कोणों से देखने पर वह पहाड़ विभिन्न आकृतियों में दिखाई देता था, यद्यपि उसकी शिवलिंग के जैसी सुंदर आकृति तो मेरे घर व आसपास के क्षेत्र से ही ज्यादा दिखाई देती थी। इसका मतलब है कि वास्तविक आकृति का उतना महत्त्व नहीं है, जितना कि आकृति के भान होने का है। शिवलिंग के सूक्ष्म तांत्रिक महत्त्व के कारण ही मंदिर के शिखर कुछ शंक्वाकार या गुम्बदाकार लिए होते हैं। यह आकार वास्तव में मूलाधार से जुड़ा होता है, और उसी की शक्ति लिए होता है। कैलाश पर्वत का रूप भी ऐसा ही है, और संभवतः तंत्र के सर्वाधिक अनुरूप है। तभी तो यहाँ पर साक्षात शिव का निवास बताया गया है। इसी वजह से बहुत से लोग करोल पहाड़ को मिनी कैलाश कहकर भी संबोधित करते हैं।

पहाड़ एक साधना में लीन मनुष्य की तरह होता है

इसी वजह से तो पहाड़ के रूप को भगवान शिव के रूप के साथ जोड़ा गया है। उसकी वनस्पति शिव की जटाएं हैं। उससे निकलते नदी-नाले व झरने शिव की जटा से निकलती गंगा नदी है। उस पर उगता चाँद शिव के मस्तक का खूबसूरत अर्धचंद्र है। उसके अंदर बसने वाले लोग व वन्य जीवजंतु शिव के ऊपर लिपटे नाग के रूप में हैं। उसका वनस्पतिविहीन व पथरीला भूभाग शिव के शरीर के नग्न भाग के रूप में है।

पहाड़ का अपना स्वरूप कुंडलिनी जागरण के दौरान की अवस्था है

यह अवस्था भाव, अभाव, व पूर्णभाव का मिश्रित रूप है। नशे आदि की अवस्था में भी भाव व अभाव दोनों एकसाथ होते हैं, परंतु उसमें पूर्णभाव नहीं होता। पर्वत की आत्मा में अभाव की अवस्था अद्वैत व जजमेंट से रहित चेतना के रूप में है, भाव की अवस्था अस्तित्व के आनंद के रूप में है, और पूर्णभाव की अवस्था पूर्ण अस्तित्व के परमानन्द के रूप में है। यह पूर्णभाव सर्वोच्च अनुभव के रूप में है। इसे भावाभावहीनता (न भाव, न अभाव) के रूप में भी जाना जा सकता है। पर्वत की ही तरह अन्य सभी निर्जीव पदार्थ भी जागती हुई कुण्डलिनी के रूप में पूर्णजीवन के रूप में हैं, निर्जीव नहीं। तभी तो कुंडलिनी जागरण के दौरान सभी कुछ अपने जैसा और एकसमान लगता है। भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत के इसी सर्वव्यापी रूप को समझा था, इसीलिए वे इंद्र देवता के कोप से बच पाए और व्रज के ग्रामीणों को भी बचा पाए। ग्रामीण तो गोवर्धन पर्वत को अपना स्थानीय देवता मानते थे, जो सीमित व अलग-थलग रूप वाला था। यह कथा मुझे एक रूपक की तरह भी लगती है। इंद्र विकास व संसाधनों के अहंकार से युक्त शहरवासियों व मैदानी भूभाग में रहने वाले लोगों का प्रतीक है। गोवर्धन पर्वत गांव की हरी-भरी वादियों का प्रतीक है। व्रजवासी एक अनपढ़, ग्रामीण, पहाड़ी, पिछड़े, अन्धविश्वासी व संकुचित सोच के अहंकारी आदमी का प्रतीक है। यहाँ यह ध्यान देने योग्य बात है कि अहंकार शहरवासी और ग्रामवासी, दोनों में है। यद्यपिशहरी में उच्चता व कृत्रिमता का अहंकार है, और ग्रामीण में निम्नता व प्रकृति का। ये दोनों प्रकार के अहंकार आपस में टकराते हैं। इन दोनों प्रकार के अहंकारों से रहित आदमी ज्ञानी कृष्ण की तरह है, जो इन दोनों प्रकार के लोगों के साथ मिश्रित होकर भी उनके दुष्प्रभावों से अछूता रहता है।

कुंडलिनी योगसाधना की सर्वश्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए ही शिवपुराण में शिव-केतकी की कथा के रूपक का वर्णन आता है

दोस्तों, आओ थोड़ा कुंडलिनी ध्यान कर लेते हैं। पिछली पोस्ट में मैंने जो शिव-केतकी की कथा कही थी, वह पुराणों में लिखित रूपकों का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। पुराण ऐसे रूपकों से भरे हुए हैं। रूपकों की सहायता से प्रस्तुत विषय अच्छी तरह से समझ में आ जाता है, और अच्छी तरह से याद रहता है। अधिकांश आध्यात्मिक ज्ञान मन की सीमा से बाहर होता है, और प्रत्यक्ष अनुभव की वस्तु है। इसलिए उसे रूपकों में ढालकर मन के दायरे में लाया जाता है। 

पूर्वोक्त प्रकाशमान स्तंभ के ओर-छोर की खोज करने के लिए ब्रह्मा ऊपर की ओर और भगवान विष्णु नीचे की ओर भागे थे

पूर्वोक्त कथा में हमने विष्णु को ऊपर की ओर तथा ब्रह्मा को नीचे की ओर जाते दिखाया था। पर वास्तविकता इसके विपरीत थी। वैसे इससे कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। रूपकों को हम किसी भी तरफ को ढाल सकते हैं। सत्य का अनुभव तो वही रहता है। रूपक सत्य को नहीं बदल सकते। रूपकों का अपना कोई गणित नहीं होता। रूपक तो केवल सत्य को समझाने के लिए बनाए गए होते हैं। रूपक की इस विपरीत स्थिति में हम सत्य के अनुभव को निम्नलिखित तरीक़े से ढाल सकते हैं। ब्रह्मा प्रकार के लोग क्योंकि अंधाधुंध निर्माण कार्य करवाते हैं, इसलिए वे अपने सकाम कर्मों के फलस्वरूप विभिन्न उच्च लोकों को प्राप्त करते हैं। वे सहस्रार रूपी परम लोक को प्राप्त नहीं करते, क्योंकि वे जगत के प्रति आसक्त होते हैं। इसलिए वे कुंडलिनी योगसाधना नहीं कर पाते। यदि करते हैं, तो वह शीघ्र फलदायी नहीं होती। बाकि तो पूर्वोक्त रूपक में सब ठीक है। इसी तरह, विष्णु प्रकार के लोग नम्रता के, गहन अन्वेषण के, और ज्ञान चिंतन के प्रतीक होते हैं। वे नीचे के लोकों में रहने वाले दीन दुखी लोगों की सेवा में जुट जाते हैं। उनमें भी जगत के पालन और रक्षण का अहंकार आ जाता है। फिर भी वे अपनी झूठी शेखी नहीं बघारते, और न ही अपने प्रभाव का ज्यादा ढिंढोरा पीटते हैं। इसलिए उन्हें नीचे के लोकों या चक्रों में जाने वाला बताया गया है। इसी कारण से उनकी भी कुंडलिनी योग साधना आसानी से सफल नहीं होती। बाकि तो रूपक में सब ठीक ही है। असली तांत्रिक कुंडलिनी योगी तो भगवान शिव की तरह मस्तमौले होते हैं। उन्हें दुनियादारी का कोई फिक्र-फाका नहीं होता। वे अपनी कुंडलिनी के साथ मस्त और आनन्दमग्न होते हैं। वे तांत्रिक साधना से बढ़ाई गई अपनी एनर्जी को दुनियादारी में बर्बाद न करके उससे अपनी कुंडलिनी को जागृत करते हैं। वे ज्यादा पाने की चाहत में नहीं भागते। जो उन्हें मिल जाता है, उसी में संतुष्ट हो जाते हैं। भगवान शिव के पास भी एक बाघम्बर, एक मृगचर्म, एक त्रिशूल, एक सर्प, एक बैल और पार्वती माता के सिवाय कुछ नहीं होता। वे इन्हीं में खुश रहते हुए गहन व आनन्दमयी ध्यान साधना में डूबे रहते हैं।

केतकी का पुष्प ऐसे लोगों का प्रतीक है, जो भगवान के साथ रहकर भी उसे नहीं पहचानते

कथा में आता है कि केतकी का सफेद पुष्प भगवान शिव के मस्तक से नीचे गिरा था, पर वह भी उस ज्योति स्तंभ का आदि-अंत नहीं जानता था। केतकी की तरह साफ-सुथरी छवि वाले लोग भी उन पुजारियों की तरह हैं, जो लगातार मन्दिरों में रहकर भी भगवान को नहीं जानते। आम जनता उन पर विश्वास करती है, इसलिए ब्रह्मा प्रकार के लोग इस बात का नाजायज फायदा उठाते हैं। वे पैसे के दम पर उनसे अपना गुणगान करवाते हैं, और जतवाते हैं कि वे सबकुछ अर्थात भगवान को जानते हैं। बाकी तो रूपक में सब वैसा ही है।

कुंडलिनी ही हिंदू पुराणों की सर्वप्रमुख विषयवस्तु है: शिव व केतकी के फूल की कहानी

दोस्तों, पिछली पोस्ट में मैंने शिवपुराण की एक कथा के बारे में बताया था, जो कि तंत्रशास्त्र के रहस्य का आधारबिंदु है। उसे केतकी के फूल की कहानी कहते हैं। इस पोस्ट में मैं उस कहानी की गहराई से व्याख्या करूँगा।

क्या है केतकी के फूल की कहानी

शिवपुराण के अनुसार एक बार भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के बीच में झगड़ा हो गया था। भगवान ब्रह्मा कहने लगे कि उन्होंने सारे संसार का निर्माण किया है, इसलिए वे ही सबसे बड़े हैं। दूसरी ओर, भगवान विष्णु कहने लगे कि वे ही सारे संसार का पालन और रक्षण करते हैं, इसलिए वे ही सबसे बड़े हैं। जब उनके झगड़े से चारों ओर उथल-पुथल मच गयी, तब उन दोनों के बीच में एक ज्योतिर्मय स्तंभ प्रकट हुआ। आकाशवाणी से आवाज हुई कि जो सबसे पहले इसके ओर-छोर का पता लगाएगा, वही सबसे बड़ा है। भगवान विष्णु ऊपर की तरफ चल पड़े, और भगवान ब्रह्मा नीचे की ओर। परंतु दोनों ही उसके छोर का पता नहीं लगा पाए और खाली हाथ वापिस लौट आए। विष्णु ने अपनी असफलता की सच्ची कहानी ब्रह्मा को बयान कर दी, परंतु ब्रह्मा भगवान विष्णु से झूठ बोलने लगे। ब्रह्मा ने कहा कि वे उसके छोर को छूकर वापिस आए थे। ब्रह्मा ने केतकी के सफेद फूल को साक्षी के रूप में प्रस्तुत किया। तभी इस झूठ से नाराज होकर भगवान शिव वहाँ प्रकट हो गए। उन्होंने कहा कि वे ही सबसे बड़े हैं तथा उनके सिवाय कोई दूसरा इसके आदि-अंत को नहीं जान सका है। केतकी के झूठ से नाराज होकर शिव ने उसको शाप दिया कि वह कभी उनकी पूजा में शामिल नहीं किया जाएगा। साथ में, ब्रह्मा को भी शाप दिया कि कहीं भी उनका मंदिर नहीं होगा, और न ही उनकी पूजा की जाएगी।

शिव-केतकी की कहानी का तांत्रिक रहस्य

ब्रह्मा और केतकी के फूल किसके प्रतीक हैं

वास्तव में उपरोक्त कथा मैटाफोरिक है, और कुंडलिनी योग की सर्वश्रेष्ठता की ओर इशारा कर रही है। ब्रह्मा उन लोगों का प्रतीक है, जो अंधाधुंध निर्माणकार्य से प्रकृति को नुकसान पहुंचा रहे हैं। अहंकार का सहारा लेने वाले बिजनेसमैन, नेता और नकली धर्मगुरु इसी प्रकार के लोग होते हैं। रजोगुणी यज्ञ आदि धार्मिक अनुष्ठान करवाने वाले लोग भी इनमें शामिल हैं। उनके अंदर अहंकार पैदा हो जाता है, और वे अपने आप को सबसे बड़ा समझने लगते हैं। उनके पास धन की कोई कमी नहीं होती, इसलिए वे समाज के प्रतिष्ठित व साफ-सुथरी छवि वाले लोगों को और पत्रकारों को खरीद लेते हैं। केतकी का सफेद फूल ऐसे ही लोगों का परिचायक है। वे ऐसे लोगों से अपना भरपूर गुणगान करवाते हैं, और असली भगवान को अनदेखा करके खुद भगवान बन बैठते हैं। इसीलिए ऐसी साफ सुथरी व सफेद छवि वाले कपटी लोग भगवान शिव को प्रसन्न नहीं कर पाते। उन्हें प्रसन्न करने के लिए तो बच्चे की तरह भोले बनना पड़ता है। तभी तो शिव को भोलेनाथ या भोले बाबा भी कहते हैं। तांत्रिक भी भोले ही होते हैं। ब्रह्मा जैसी छवि वाले उपरोक्त लोग भी लोगों से सच्चा सम्मान नहीं प्राप्त कर पाते। उनके प्रभाव के डर से ही लोग उन्हें झूठा सम्मान देते हैं। जैसे भगवान ब्रह्मा स्तंभ का निचला छोर ढूंढते हैं, वैसे ही उनकी तरह के लोगों का झुकाव भी नीचे अर्थात तमोगुण की तरफ ज्यादा होता है। तमोगुण मदिरा, माँस आदि के अनियंत्रित उपभोग के रूप में हो सकता है। वे ब्रह्मा की तरह ही रजोगुणी होते हैं। रजोगुण का झुकाव तमोगुण की तरफ ज्यादा होता है। वे बहुत नीचे के लोकों या चक्रों तक पहुंच जाते हैं, पर सबसे नीचे के लोक अर्थात मूलाधार चक्र तक नहीं पहुंच पाते। इसका सीधा सा अर्थ है कि वे मूलाधार चक्र पर कुंडलिनी को जगा नहीं पाते। यदि मूलाधार चक्र पर भी कुंडलिनी जागृत हो जाए, तो वह सभी चक्रों या लोकों को भेदते हुए सीधी सहस्रार में चली जाती है, और वहाँ भी जागृत हो जाती है। पर ऐसा तांत्रिक लोग ही कर सकते हैं, साधारण लोग नहीं।

भगवान नारायण सेवादारों व दानवीरों के प्रतीक हैं

समाज के कुछ लोग जनता की सेवा से सीधे जुड़े होते हैं। उनमें सेवादार और दानवीर मुख्य होते हैं। सात्विक धर्म-कर्म आदि करने वाले लोग भी इनमें शामिल हैं। अनेक प्रकार की मानसिक साधनाएं करने वाले लोग भी ऐसे ही होते हैं। हालाँकि वे भोले होते हैं, पर फिर भी वे ज्योतिर्मय स्तंभ का छोर नहीं ढूंढ पाते। वे स्तंभ पर ऊपर की ओर जाते हैं, क्योंकि वे सत्त्वगुणी होते हैं। उनके अंदर मन के दोष नहीं होते। अहंकार भी उनमें कम होता है। वे काफी ऊपर के लोकों या चक्रों तक चले जाते हैं, पर सर्वोच्च लोक या सहस्रार तक नहीं पहुंच पाते। इसका अर्थ है कि वे भी कुंडलिनी को जागृत नहीं कर पाते। फिर शिव ने कहा कि वे ही इसे जानते हैं। साथ में कहा कि इसलिए वे ही सबसे बड़े हैं। इसका सीधा सा अर्थ है कि शिवभक्त तांत्रिक ही अपनी कुंडलिनी को जागृत कर पाते हैं।

ज्योतिर्मय स्तंभ सुषुम्ना नाड़ी का और विभिन्न लोक विभिन्न चक्रों के प्रतीक हैं

वास्तव में सारा संसार हमारे अपने मनुष्य शरीर में बसा हुआ है, “यतपिण्डे तत्ब्रह्मांडे” के अनुसार। ऐसा ही “शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुंडलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)” पुस्तक में भी वैज्ञानिक रूप से सिद्ध किया गया है। जो कथा में विभिन्न ऊपरी और निचले लोक कहे गए हैं, वे हमारे शरीर की रीढ़ की हड्डी में स्थित चक्र ही हैं। जो प्रकाशमय स्तम्भ है, वह सुषुम्ना नाड़ी है। वह भी चमकदार संवेदना के रूप में होती है। वह मूलाधार चक्र से अर्थात सबसे निचले लोक से सहस्रार चक्र अर्थात सबसे ऊपर के लोक तक गुजरती है। बीच में अनेक प्रकार के लोक अर्थात चक्र आते हैं। उसका लघु रूप लिंग या वज्र है। वही उस स्तंभ का सबसे प्रमुख भाग होता है, क्योंकि वहीँ से प्रकाशमय संवेदना स्तंभ उत्पन्न होता है।