कुंडलिनी योग से आदमी जागृति और स्वप्न के बीच झूलता रहता है

दोस्तों, खाली दिमाग सच में ही शैतान का घर होता है। इसीलिए मैं हर समय कुछ ना कुछ करता रहता हूं। अगर करने के लिए कुछ ना दिखे तो लिखने लग जाता हूं। मेरा बेटा इसलिए जागकर काम करता है ताकि उसे अच्छे सपने आए। वाह जागृति की दुनिया को नकली और सपने की दुनिया को असली मानता है। उसकी यह बात सुनकर मेरा माथा ठनका। एक नया विचार उमड़ पड़ा  सभी ऋषि मुनी और वेद पुराण भी तो यही कहते हैं। वे कहते हैं कि अनासक्ति और अद्वैत से भरा जीवन ही असली है। सपने में भी तो ऐसा ही जीवन होता है। उसमें दुख सुख सभी लगभग एक जैसे ही महसूस होते हैं। सभी कुछ अनुभव रूप होता है। शुद्ध अनुभव। सभी अनुभव सुख रूप होते हैं। पीछे से शेर दौड़ जाए तो भय होते हुए भी भय नहीं लगता। कोई अगर लड़ने लग जाए तो गुस्सा आके भी गुस्सा नहीं आता। पहाड़ से गिर जाए तो दुख होते हुए भी दुख नहीं होता। अगर राज्य भी मिल जाए तो भी सुख होते हुए भी सुख नहीं होता। मतलब एकसार सुख तो हर जगह होता है, पर भौतिकता वाला प्रदूषित सुख नहीं होता। वह सूक्ष्म अनुभवरूप सुख होता है। भौतिक स्थूल जगत सुख दुख के सूक्ष्म अनुभव को प्रदूषित कर देता है। स्थूल जगत से सुख बढ़ तो जाता है, पर उससे दुख भी बढ़ जाता है। गेंद जितनी ऊपर जाती है, उतनी ही नीचे भी गिरती  है। सुख तो आत्मा का अपना स्वरूप है। पर जगत उसे अपने अधीन करके उस एकसार आत्मसुख में तरंग पैदा करता है। फिर कालांतर में स्थूल जगत के अभाव में वह तरंग नष्ट हो जाती है। इससे बेशक आदमी एकसार या तरंगहीन आत्मसुख में पुनः पहुंच जाता है, पर उस अवस्था में दुखरूप अंधेरा महसूस होता है। ऐसा भ्रम से प्रतीत होता है। असल में ऐसा नहीं होता। यह ऐसे ही है जैसे अपने शरीर के चारों ओर गोल गोल घूमने से या भ्रमण से रुकने के बाद अपने चारों तरफ सब कुछ थोड़ी देर के लिए घूमता हुआ सा महसूस होता है। इसे चक्कर आना भी कहते हैं। इसी से अज्ञान के लिए भ्रम शब्द का इस्तेमाल हुआ है।

दुनिया में रहते हुए भ्रम से तो कोई बच ही नहीं सकता। हां उसे कम जरूर किया जा सकता है। शायद इसीलिए तो लोग दुनिया छोड़कर साधु संन्यासी बनते हैं, ताकि जगत भ्रम को पैदा ही न कर सके। पर इससे यह नुकसान होता है कि इससे आत्मविकास भी नहीं होता। क्योंकि दुनिया इसके लिए जरूरी है। दुनिया को आवश्यक बुराई भी कह सकते हैं इस मामले में। इसीलिए जिन्हें अच्छी तरह से आत्मजागृति मिल गई है, उनका ही संन्यास लेना उचित माना गया है। मतलब वो आत्म विकास के चरम बिंदु पर पहुंच गए हैं, और उन्हें दुनिया में उलझने की कोई अवशयकता नहीं है। वैसे आवश्यकता तो है। पर सिर्फ शरीर को जिंदा रखने के लिए, क्योंकि जब तक पूर्वकर्मों से निर्धारित आयु पूरी नहीं होती, तब तक तो प्रारब्ध कर्म से जुड़े संस्कार परेशान करते ही रहेेंगे। हां, इससे अगले जन्म के लिए संस्कार नहीं बन पाएंगे।

सपना भी तो आत्मसुख को तरंग देता है, पर जागृति अवस्था जितना ज्यादा नहीं। इसीलिए सपने में उस तरंग के हटने पर भ्रम भी जागृत अवस्था जितना नहीं होता। कुछ भ्रम तो होता ही है। इसीलिए शास्त्रों में कहा गया है कि दुनिया स्वप्न जैसी है, और इसे स्वप्नवत ही समझना चाहिए। वास्तव में ऐसा ही है क्योंकि भौतिक दुनिया मस्तिष्क के अंदर तो घुसती नहीं है। हम तो केवल उसका सूक्ष्म चित्र ही महसूस कर रहे होते हैं, जैसा स्वप्न में करते हैं। पर उसको स्थूल और भौतिक मान लेने से सारी गड़बड़ हो जाती है। आदमी बेशक सुखतरंग के लालच में ही उसे स्थूल और भौतिक मानता है, ताकि तरंग का सुख ज्यादा मिल सके। उस समय उसे उससे कालांतर में आने वाले दुख का एहसास नहीं होता। दरअसल बड़ी तरंग को ही स्थूल जगत कहते हैं और छोटी तरंग को सूक्ष्म जगत। सिनेमा देखते समय स्थूल कुछ नहीं होता पर कई लोग उससे ज्यादा ही आसक्त हो जाते हैं। मतलब उसमें ज्यादा ही डूब जाते हैं। और उससे भरपुर सुख की तरंग बनाते हैं। इससे परदे पर दिख रहे दृश्य सूक्ष्म होते हुए भी उनके लिए स्थूल बन जाते हैं। इसीलिए तो ऐसा वैसा दृश्य आने पर कई बार थिएटर में हंगामा और तोड़फोड़ भी कर देते हैं। कई लोग स्थूल जगत में रहते हुए भी उससे आसक्त नहीं होते। वे बिल्कुल शांत बने रहते हैं चाहे कुछ भी हो जाए। मतलब
उनके मन में उससे प्रचंड या ताबड़तोड़ तरंगें नहीं बनतीं। उनके लिए स्थूल जगत भी सपाlने की तरह सूक्ष्म होता है। इससे ही वे सुख दुख में एकसमान से बने रहते हैं। पर वही बात है न कि आत्म जागृति के लिए प्रचंड मानसिक तरंगें भी जरूरी होती हैं।

यह दुनिया दोनों तरफ बहने वाली नदी की तरह है। इसीलिए अच्छे से समझ नहीं आती। किसी को यह ऊपर उठाती है, तो किसी को बहाकर नीचे ले जाती है। यह कह सकते हैं कि आसक्तिपूर्ण दुनियादारी को शरीरविज्ञान दर्शन जैसे अद्वैतपरक दर्शनों से शांत भी करते रहना चाहिए। इससे आत्मजागृति भी मिलेगी और भ्रम भी पैदा नहीं होगा। कुंडलिनी योग से यह लाभ मिल सकता है कि उससे अद्वैत भावना के समय महसूस होने वाले समाधि चित्र को धारण करने की शक्ति बढ़ेगी और साथ में मस्तिष्क को ऊर्जा मिलने से दुनियादारी के साथ शरीरविज्ञान दर्शन की भावना अच्छे से कर पाएंगे। क्योंकि हरेक चक्र किसी न किसी किस्म की दुनियादारी से जुड़ा है, इसलिए हर किस्म के काम के समय कोई न कोई चक्र क्रियाशील हो जाएगा। मतलब उस चक्र तक शक्ति का प्रभाव बढ़ जाएगा। इससे उस काम के साथ शरीरविज्ञान दर्शन की भावना आसान हो जाएगी, क्योंकि सब काम शक्ति से होते हैं। वह अतिरिक्त शक्ति हमें मामूली लग सकती है, पर वह बड़े काम की होती है। प्रतिदिन के कुंडलिनी योग के अभ्यास से सभी चक्रों तक नाड़ियां खुली रहेंगी। जब चक्र तक शक्ति जाएगी तो कुछ न कुछ मस्तिष्क के चक्रों तक भी जाएगी ही, क्योंकि सभी चक्र आपस में जुड़े होते हैं। और मस्तिष्क से ही भावना होती है, द्वैतपरक हो या अद्वैतपरक।

बीच-बीच में शरीरविज्ञान दर्शन की भावना से आदमी लगातार जागृत अवस्था और स्वप्न के बीच में झूलता रहेगा। इससे दोनों के लाभ मिलेंगे। जागृत अवस्था के भी और स्वप्न अवस्था के भी। जागृत अवस्था वाले लाभों में कुंडलिनी जागरण के साथ भौतिक दुनियादारी वाले लाभ और स्वप्न अवस्था वाले लाभों में संन्यास वाले लाभ शामिल हैं। मतलब कुंडलिनी योग से जागृत अवस्था स्वप्न अवस्था में बदल जाती है। हालांकि उससे स्वप्न भी जागृत अवस्था में बदल जाता है। जब शरीर में थकान हो, अर्थात अक्षमता अर्थात शक्ति की कमी हो तो आदमी की नशे या स्वप्न के जैसी अवस्था हो जाती है। कुंडलिनी योग से शक्ति मिलने पर वह फिर से दुनियादारी में जागृत जैसा हो जाता है। बेशक बाद में उससे परेशान सा होकर वह पुनः  शरीरविज्ञान दर्शन की भावना से अपनी जागृत अवस्था को स्वप्न अवस्था में बदल देता है, और अपने भ्रम को न्यूनतम कर देता है। उस समय शक्ति तो उसमें होती है। वह अवस्था उस नशे या नींद के जैसी अवस्था नहीं होती, जिसमें शक्ति ही नहीं होती। इसलिए उसकी अतिरिक्त शक्ति समाधि के मानसिक चित्र के रूप में रूपांतरित हो जाती है। मतलब उस अतिरिक्त शक्ति से उसकी समाधि लग जाती है। 

जब शरीर में अपनी वर्तमान अवस्था की भावना की जाती है, तो सांस तेजी से पेट से बाहर निकलती है, खासकर अगर मस्तिष्क में दबाव ज्यादा हो। इससे ऊर्जा फ्रंट चैनल से नीचे उतरने से मस्तिष्क हल्का हो जता है। मुझे महसूस होता है कि यह नीचे गई ऊर्जा मूलाधार से वापिस मुड़कर रीढ़ की हड्डी से होते हुए पुनः मस्तिष्क को चढ़ जाती है। मतलब ऊर्जा का एक क्लोज सरकट लूप सा बन जाता है। हैरानी यह कि यह ऊपर गई ऊर्जा फिर मस्तिष्क के भार को बढ़ाती नहीं पर हल्का करती है। वैसे भी भार तो ऊर्जा की कमी से बढ़ना चाहिए। शायद मस्तिष्क का पीछे का भाग भावना बनाने में ज्यादा मदद करता है, या यह पूरे मस्तिष्क का मुख्य नियंत्रिक है। इसीलिए इसके पिछले हिस्से को रीढ़ की हड्डी से मिल रही ऊर्जा ज्यादा कारगर होती है। ऐसा भी हो सकता है कि नीचे धकेली गई ऊर्जा ऑक्सीजन से भरी नहीं होती। हृदय चक्र से होकर नीचे गुजरते समय ऑक्सीजन से भरपूर होकर शुद्ध होकर पीठ से ऊपर चढ़ती है। शायद इसीलिए कहते हैं कि ऊर्जा माइक्रोकॉसमिक ऑर्बिट लूप में घूमती रहनी चाहिए। अगर दिमाग में सुस्ती है या कम दबाव है, तो सांस गहरा अंदर भरा जाता है। इससे ऊर्जा ऊपर चढ़कर मस्तिष्क को शक्तिमान कर देती है। मतलब मस्तिष्क में ऊर्जा ही नहीं है तो नीचे क्या उतरेगा। इसीलिए उस समय उसे नीचे से ऊपर चढ़ाने पर ही जोर होता है। यह खुद ही होता है। मतलब जैसे स्थूल भौतिक शरीर संतुलन में रहता है, वैसे ही यह मन को भी बना देता है, अगर सही से इसका ध्यान किया जाए।

कुंडलिनी जागरण भी भौतिक जागृति की तरह ही है। इसे भौतिक जागृत अवस्था का शिखर बिंदु भी कह सकते हैं। क्योंकि इसमें चेतन मन के साथ अवचेतन मन भी जाग जाता है। मतलब कुंडलिनी जागरण के लिए जागृत एवस्था से भी ज्यादा जागना पड़ता है। ऐसा जागृत अवस्था से ही हो सकता है, स्वप्न अवस्था से तो नहीं। हालांकि जागृत अवस्था को स्वप्न अवस्था बनाने से जो शक्ति की बचत होती है उससे इसे प्राप्त किया जा सकता है। मतलब स्वप्न का इसमें भी योगदान है। पर वह स्वप्न शक्तिहीनता वाला या सुस्ती वाला या मजबूरी वाला स्वप्न नहीं पर जानबूझ कर किया गया स्वप्न है। उस अतिरिक्त शक्ति से किसी गुरु, देवता आदि के रूप के मानसिक चित्र का ध्यान किया जाता है। अभ्यास से वह ध्यान इतना ज्यादा बढ़ जाता है कि वह मानसिक चित्र जाग जाता है। वैसे तो आमतौर पर मानसिक चित्र स्वप्न की अवस्था में होता है, पर कुंडलिनी जागरण के समय वह जागृत अवस्था में आ जाता है। मतलब उस चित्र को बनाने वाली मानसिक तरंग इतनी मजबूत बन जाती है कि वह स्वप्न अवस्था की सीमा को पार कर के जागृत अवस्था के दायरे में प्रविष्ट हो जाता है। उसे जागृत करने वाली शक्ति इतनी ज्यादा होती है कि वह साथ में अवचेतन मन अर्थात आत्मा को भी जगा देती है। इसीलिए सब कुछ अद्वैतपूर्ण अर्थात एक जैसा अर्थात अपना ही रूप लगता है क्योंकि तब पहले वाला सोया हुआ अंधेरानुमा आत्मा जागृत कुंडलिनी चित्र जितना जाग कर उसके जितना ही प्रकाशमान बन जाता है। दरअसल जागृत तो आत्मा ही होता है। मानसिक ध्यान चित्र तो उसे जगाने का माध्यम भर ही है। क्योंकि कुंडलिनी चित्र तो एक मानसिक तरंग है, जो पहले ही एक जागृत अवस्था का रूप है। बेशक वह तरंग इतनी हल्की है कि स्वप्न अवस्था के दायरे में आती है। फिर भी तरंग तो तरंग ही है। स्वप्न अवस्था और जागृत अवस्था की मानसिक तरंगें एक ही चीज हैं, सिर्फ उनमें प्रगाढ़ता का अंतर है, अन्य कुछ नहीं। प्रकाश तो एक ही है, उसे कम करने पर वह बदल तो नहीं जाता। बोलने का मतलब है कि ध्यान चित्र सोया ही कहां था जो जागेगा। सोया हुआ तो अवचेतन मन से जुड़ा हुआ आत्मा होता है जो ध्यान चित्र की सहायता से जागता है। ध्यान चित्र तो शक्ति को मस्तिष्क में पहुंचाने का काम करता है। जब वह शक्ति एक निश्चित सीमा से ऊपर पहुंच जाती है तो वह अवचेतन मन को जगा देती है। इसे हम कुंडलिनी जागरण कहते हैं।

आत्मा ही है जो सोया होता है, और जो कुंडलिनी जागरण के समय जाग जाता है। वास्तव में उसका सुषुप्ति का भ्रम दूर होता है, क्योंकि भ्रम से ही वह सोया हुआ प्रतीत होता है। बेशक कुंडलिनी जागरण के कुछ क्षणों के अनुभव के बाद फिर से सो जाता है, पर वह सुषुप्ति उतनी प्रभावी नहीं रहती जितनी पहले थी क्योंकि अब उसने सच्चाई जान ली है। आदमी का अवचेतन मन उस दग्धबीज की तरह हो जाता है जिसमें नया जीवन या जन्म पैदा करने की शक्ति नहीं रहती। वह आत्मा के प्रकाश से जल गया होता है। जले हुए बीज की तरह वह रहता तो है पर नया जन्म नहीं दे सकता। फिर कहते हैं कि जो कुंडलिनी जागरण के बाद कर्म होंगे, वे तो अवचेतन मन को बनाएंगे ही फल देने के लिए। पर जब अवचेतन मन ही जल गया तब उसमें नए कर्म भी कैसे जुड़ सकते हैं। जब अवचेतन मन के अस्तित्व का आधार ही खत्म हो गया तो नया भी कैसे बनेगा। पर फिर कर्म का फल कैसे मिलेगा। फिर तो आत्मजागृत आदमी कुछ भी पाप कर्म बिना किसी भय के कर सकता है। तो इसके जवाब में कहते हैं कि अवचेतन मन के न रहने से उसकी कर्म और फल के प्रति आसक्ति नहीं रहती। प्रकाश की प्रकाश के प्रति कैसी आसक्ति। प्रकाश के प्रति तो अंधकार की ही आसक्ति होती है। वह तो समय के साथ बहता रहता है। यदि अज्ञानवश या मजबूरी में उससे पाप कर्म हो भी जाएं तो उसे उसका फल जल्दी से और हल्के रूप में मिलता है क्योंकि उसकी आसक्ति भी हल्की ही थी। अगर उसे उस जीवन में फल न मिल सके तो भी वह उन्हें प्रकृति को सौंप कर मुक्त हो जाता है। अब प्रकृति की मर्जी कि वह उसके फल किसको दे। शायद इसीलिए कहते हैं कि महापुरुषों द्वारा किए गए कर्मों का फल पूरी सृष्टि या पूरे समाज को भुगतना पड़ता है। ऐसे बहुत से धर्म संस्थापकों, धर्मगुरुओं और महान या वैश्विक नेताओं के उदाहरण हैं। क्यों कई धर्म आजतक एक दूसरे के खून के प्यासे बने हुए हैं, इसे भी इससे जोड़ा जा सकता है। ये सभी अनुभव और विचार शास्त्रों के हैं, जिनका हम यहां यथासंभव वैज्ञानिक विश्लेषण कर रहे हैं। जब आत्मा प्रकाशित या प्रकाशमान हो गया तब तो हर एक वस्तुचित्र या मनतरंग या पूरी दुनिया अपने जैसे ही लगेगी क्योंकि सभी चीजें प्रकाशमान ही हैं। प्रकाश से प्रकाश की कैसी भिन्नता। यह प्रकाश आम प्रकाश से भी बहुत ऊपर मतलब चेतना का प्रकाश होता है।

कुंडलिनी योग से ईरानी फिल्म गाव या द काऊ के हसन नामक गौप्रेमी के मनोविज्ञान को समझा जा सकता है

दोस्तो, हाल ही में ,,’गाव’,’the cow’ नाम की ईरानी फिल्म देखी, जो यूट्यूब पर ‘ओल्ड फिल्म्स रिवाइवल प्रोजैक्ट’ नामक चैनल पर उपलब्ध है। उसमें एक हसन नाम का व्यक्ति गाय के प्यार में इतना ज्यादा डूब जाता है कि उसके मरने के बाद पहले उसे वह अपने बाड़े में दिखने लगती है, और फिर वह पूरी तरह से उस गाय की तरह व्यवहार करने लगता है। यह कुंडलिनी योग ही तो है सैद्धांतिक रूप से। कुंड मतलब अंधेरा कुआं जो गाय के मरने से उसके अवसाद के रूप में पैदा हुआ। कुंडलिनी मतलब गाय का मानसिक चित्र। वह बारबार उसके मूलाधार के अंधेरे से उसके सहस्रार को चढ़कर उसे बावले बाबा जैसा बना रहा था। कुंड का शाब्दिक अर्थ ही कुआं या गड्ढा है। गड्ढा अंधेरा ही होता है। कुंडलिनी का मतलब है, एक मानसिक छवि जो अपने सीमित या सांप के कुंडल जैसे सिकुड़े स्वरूप में है। पूरा मन तो बहुत विस्तृत है, जो परमात्मा की असीमता तक जाता है। पर उसकी एक अकेली छवि बहुत सीमित होती है। मतलब कि जेसे एक लंबा सर्प अपना कुंडल बनाकर अपने को सिकोड़ लेता है, वैसे ही अनंत विस्तृत मन एक मानसिक छवि के आकार तक संकुचित हो जाता है, एकाग्र ध्यान के दौरान। उसे ही ध्यान छवि भी कहते हैं। अब बहुत सी ऐसी चीजें हैं, जो अपने विस्तृत रूप को सिकोड़ देती हैं, फिर सांप का ही उदाहरण क्यों दिया। इसकी दो मुख्य वजहें हैं।एक तो वह छवि फन उठाए सांप के जैसी सुषुम्ना नाड़ी से गुजर कर जागृत होती है। दूसरा, गहन एकांत और अभाव जैसे अंधेरे कुंड में अर्थात गड्ढे में उसका ध्यान किया जाता है, ठीक वैसे ही जैसे एक सफेद बिंदु गहरे काले रंग की पृष्ठभूमि पर सबसे अच्छा दिखाई देता है। श्मशान का घोर एकांत भी गड्ढे जैसा ही है, जहां भगवान शिव साधना करते हैं। गड्ढा मूलाधार का स्वरूप है। इसीलिए शास्त्रों में बहुत जगह वर्णन है कि फलां राक्षस या योगी ने फलां गड्ढे में इष्ट देवता या गुरु का पूजन और ध्यान किया। उसी गड्ढारूपी मूलाधार में ध्यान की गई छवि को ही वैज्ञानिक व संक्षिप्त नाम कुंडलिनी दिया गया है। यह अकेला शब्द ही योग का विस्तृत वर्णन करता है। अब उक्त फिल्म में हसन नाम का वह गौप्रेमी शायद अपनी गौरूपी कुंडलिनी को पर्याप्त शक्ति नहीं दे पाया, इसलिए दुनिया की नजरों में पागल जैसा हो गया। हालांकि वह गाय के मानसिक चित्र के साथ पूरी तरह से एकाकार हो गया था, इसीलिए उसकी तरह व्यवहार करता था। यह तो समाधि की तरह ही है, पर यह जागृति तक पहुंचनी चाहिए। मुझे नहीं पता कि क्या यह असली कहानी है, जिसे फिल्माया गया है, या कोई कोरी कल्पना, पर विषय रोचक है। समस्या सिरे तक पहुंचने की ही तो है। जब तक आदमी के मन में ध्यानचित्र जागृत न हो जाए, तब तक उसे ज्यादा से ज्यादा एकांत और पर्याप्त शक्ति चाहिए होती है, ताकि आम लोग उसे अन्यथा या मजाकरूप न समझें। जागृति के बाद तो सब समझ आ जाता है, और संतुष्टि भी हो जाती है। फिर तो चाहे उसके सामने ढोल नगाड़े बजाते रहो, उसे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। जागृति के बाद ध्यानचित्र धीरे धीरे शांत हो जाता है, और आदमी का पीछा छोड़ देता है। पहले वह आदमी के मन से जोंक की तरह चिपका रहकर उसकी शक्ति को चूसता रहता है। कई लोग अपने मृत संबंधी की याद में पागल जैसे हो जाते हैं। कोई साधक जानबूझ कर अपने प्रेमी दिवंगत गुरु के ध्यान में साधना करते हैं, और उसे सिरे तक पहुंचाकर जागृत भी कर लेते हैं। कई लोग जागृत न भी कर पाए, तो उसे नियंत्रण में रखकर उससे बहुत से लाभ लेते हैं, और दुनिया में अपनी भौतिक और आध्यात्मिक तरक्की का परचम लहराते हैं। एक ही चाकू भिन्नभिन्न तरीकों और मकसदों से इस्तेमाल होने पर भिन्नभिन्न परिणाम देता है।

कुंडलिनी योग के अभ्यास से हमारा ब्रह्मांड भी एकदिन मुक्त हो जाएगा

दोस्तों पिछली पोस्ट में बात हो रही थी कि कैसे आदमी को मुक्ति के लिए प्रकृति की चाल के उलट चलना पड़ता है। प्रकृति ने झूठ का सहारा लेकर ही जीवविकास किया, जो आज आदमी के लगभग उच्चतम विकास तक पहुंच गया है। पर अब इस कुदरत के झूठे प्रवाह पर रोक लगाने की जरूरत है, प्रकृति के झूठ यानि मोहमाया को उजागर करने की जरूरत है, सच का सहारा लेने की जरूरत है। ऐसा सब मिलजुल कर करे तो ज्यादा अच्छा होगा, क्योंकि मुक्ति की जरूरत सबको है। ऐसा साक्षीभाव या विपश्यना से ही संभव है, जो योग के दौरान ही सबसे ज्यादा प्रभावपूर्ण है। इस पोस्ट में हम ब्लैकहोल की मदद से आदमी की मुक्ति को समझाएंगे। आदमी के बारे में यह कोई नहीं बोलता कि जितने आदमी है, उतने अंतरिक्ष या ब्रह्मांड क्यों हैं, सिर्फ भौतिक अंतरिक्षों की ही खोज होती रहती है। हरेक आदमी एक अनंत अंतरिक्ष है, जिसमें अपने अलग ही किस्म का ब्रह्मांड है। कहीं सभी अनेकों जीव, एक ही अनंत आकाश में अनेक गड्ढे या ब्लैकहोल तो नहीं हैं। एक ब्लैकहोल से एक नया अनंत अंतरिक्ष बन जाता है। मूल अंतरिक्ष वैसा ही रहता है। उसमें कोई कमी नहीं आती। विज्ञान कहता है कि एक ब्लैकहोल से अंतरिक्ष अनंत रूप में मुड़ जाता है, मतलब अंतरिक्ष का वह गड्ढा कभी खत्म नहीं होता। इसीलिए उसमें गया हुआ प्रकाश कभी मुड़कर वापिस नहीं आता। वह आगे से आगे ही उस नई दिशा में जाता रहता है। मूल अंतरिक्ष में कोई कमी नहीं आती, क्योंकि वह अनंत विस्तृत त्रिआयामी चादर की तरह है। जीवात्मा के बारे में भी शास्त्रों में ऐसा ही कहा गया है कि वह अनंत व पूर्ण है, वह जिस परमात्मा से निकलती है, वह भी अनंत और पूर्ण है, फिर भी उसके निकलने से मूल अनंत अंतरिक्ष में कोई कमी नहीं आती। यह एक मंत्र है,”ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदम…..” , जो एक पुरानी पोस्ट में भी लिखा था। लोग कहते हैं कि इतनी जीवात्माएं कहां से आती हैं, कहां जाती हैं आदि। यह ऐसा ही प्रश्न है कि इतने ब्लैकहोल कहां से आते हैं और कहां जाते हैं। दोनों ही असीम और एकजैसे हैं। जब एकबार कोई जीवात्मा परमात्मा से निकल कर अपना सफर शुरु करती है, तो वह अपने अंदर सूचना इकट्ठी करती जाती है। पर चिदाकाश में शुरुआती गड्ढा करने वाली वैसी सूचना कहां से आती है, जैसे तारे का द्रव्यमान ब्लैकहोल का गड्ढा बनाता है। यह आगे बताएंगे। विज्ञान भी कहता है कि सूचना कभी नष्ट नहीं होती, वह कभी प्रकट और कभी अप्रकट हो जाया करती है। इस तरह जीवात्मा सूचनाओं के जाल में फंस कर रह जाती है, और बारबार जन्मती और मरती रहती है। अंत में कभी वह योग आदि से अपनी मनरूपी सूचनाओं को परमात्मा में मिला देती है, और वह मुक्त हो जाती है। वे सूचनाएं नष्ट नहीं होतीं, पर परमात्मा से एकाकार हो जाती हैं। नष्ट होते रहने से तो वे फिर से उसी रूप में पैदा होती रहती हैं। मतलब साफ़ है कि मरने के बाद आदमी फिर से जन्म लेता है। पर जो योगी मरता ही नहीं, क्योंकि वह शरीर नष्ट होने से पहले ही योग से अपने मन को परमात्मा में मिला लेता है, वह फिर से जन्म नहीं लेता। सबका मूल अंतरिक्ष जो सबकुछ खत्म होने पर भी बचा रहता है, वही परमात्मा है।

तारे के साथ भी ऐसा ही घटित होता है। उसके नष्ट होने से उसकी सूचना अर्थात उसका मैटीरियल नष्ट नहीं होता, अपितु ब्लैकहोल के रूप में सूक्ष्मरूप में एनकोड हो जाता है। ग्रेविटी से जो और सूचनाएं भी उसके अंदर समाती रहती हैं, वे भी एनकोड होती रहती हैं। ब्लैकहोल के अंदर किसी दूसरे तारे या ब्रह्मांड के जन्म के रूप में वे सूचनाएं फिर से प्रकट हो जाती हैं। कभी वे फिर नष्ट होती हैं, और फिर पुनः प्रकट हो जाती हैं। यह सिलसिला चलता रहता है। कभी ऐसा जरूर होता होगा, जब वे सूचनाएं परमात्मा अर्थात मूल या पितृ अनंत आकाश में विलीन हो जाती हों, नष्ट न होकर। उसे ही शायद तारे की मुक्ति कहा जाए। अभी वैज्ञानिकों को शायद ऐसा कुछ नहीं मिला है, क्योंकि वे अभी तक यही मानकर चले हैं कि सूचना कभी खत्म या नष्ट नहीं होती। वे भी ठीक हैं क्योंकि नष्ट तो अंत में भी नहीं हुई, मूल अंतरिक्ष से एकाकार ही हुई। पर शायद यह पता नहीं चला है कि वह सूचना फिर मूल अंतरिक्ष से कभी वापिस नहीं आएगी, अन्य नई सूचनाएं बेशक आती रहें। पर मनोवैज्ञानिक सिद्धांत तो कहता है कि सूचनाएं कभी पूरी तरह से नष्ट भी हो सकती हैं। बिना पृथक चिह्न या एनकोडिंग के रूप में, अर्थात पृथक अस्तित्व के बिना, परमसूक्ष्म मूलरूप में रहना सूचना का नष्ट होना नहीं है, बल्कि यह भी सूचना का पृथक रूप से अप्रकट होना ही है, जहां से वह पहले सूक्ष्म और फिर स्थूलरूप में प्रकट हो जाती है। इसका मतलब है कि कभी इस ब्रह्मांड की सभी सूचनाएं, लौकिक भाषा में कहें तो नष्ट हो जाएंगी। फिर एक बिल्कुल नया ब्रह्मांड बनेगा, जिसमें सभी सूचनाएं नई होंगी। अब पता नहीं कि किस रूप में होंगी। मतलब कि ब्रह्मांड अनगिनत किस्म व रूपाकार के हो सकते हैं। यानी अनगिनत संसारों के रूप में अनगिनत द्रव्यमान और ऊर्जा उस अंतरिक्ष से निकल सकती है, जिसका कोई मूल नहीं है, क्योंकि अंतरिक्ष स्वयं द्रव्यमान और ऊर्जा का अनंत रूप है, अनंत से अनंत निकल रहा है, इस तरह से भी सब कुछ संरक्षित ही है, सब कुछ हमेशा अनंत ही है। मतलब ब्रह्मांड भी कभी कुंडलिनी योग करेगा, और मुक्त हो जाएगा। फिर नए ब्रह्मांड की वह जाने। मतलब कभी ऐसा समय आएगा कि ब्रह्मांड ब्लैकहोल के रूप में एनकोड न होकर महाकाश में पूरी तरह समा जाएगा, मतलब ब्रह्मांड या ब्रह्मा की मुक्ति। शास्त्रों में भी कहा गया है कि ब्रह्मा की भी एक निश्चित आयुसीमा होती है, जिसके बाद वह मुक्त हो जाता है, मरता नहीं है। पर मैंने शास्त्रों में यह नहीं पढ़ा कि ब्रह्मा भी आम आदमी की तरह बारबार जन्मता और मरता है, ब्रह्माण्ड की तरह। आत्मविकास की सीढ़ियां चढ़ते हुए चींटी भी ब्रह्मा बन सकती है। शायद ब्रह्मा के जन्ममरण को इसलिए नहीं दिखाया गया है क्योंकि वह ब्रह्मांड से ऐसे बद्ध नहीं है, जैसे आम जीव अपने शरीर से होता है। ब्रह्मा तो हमेशा मुक्त ही है। शायद ब्रह्मांड की मुक्ति को ही ब्रह्मा की सांकेतिक मुक्ति कह दिया गया हो। यह भी हो सकता है कि ब्रह्मा ब्रह्मांड के साथ बहुत कच्चे बंधन से जुड़ा होता हो। जब ब्रह्मांड एनकोड हो जाता है, तो वह ब्रह्मा मुक्त हो जाता है, और एनकोडिड ब्रह्मांड के साथ नया स्तरोन्नत ब्रह्मा जुड़ जाता है, अगली बार के लिए। वैसे भी ब्लैकहोल के अंदर जो ब्रह्मांड बनता है, वह मूल ब्रह्मांड से छोटा ही होगा। वैसे ऐसा नहीं भी हो सकता, क्यों, यह आगे बताएंगे। इसका मतलब कि उसके तारे भी आगे से आगे छोटे होते जाएंगे। ब्लैकहोल की एक ऐसी पीढ़ी आएगी, जिसके अंदर के ब्रह्मांड के तारे इतने छोटे हो जाएंगे कि वे ब्लैकहोल नहीं बना पाएंगे। फिर तो ब्रह्मांड एनकोड न होकर मूल आकाश में विलीन हो जाएगा, मतलब मुक्त हो जायेगा। एक प्रकार से ऐसा समझ सकते हैं कि ब्रह्मांड लगातार कुंडलिनी योग के अभ्यास से अपने अंदर से सूचनाओं का कचरा हटाता गया। एक स्तर पर उसका कचरा इतना कम हो गया कि वह उससे दुबारा जन्म नहीं ले सका, बल्कि सीधा मुक्त हो गया। मतलब कि जैसे आदमी योगसाधना से मुक्त होता है, उसी तरह ब्रह्मांड भी। वैसे भी जो तारे एक निश्चित द्रव्यमान से कम द्रव्यमान के होते हैं, वे ब्लैकहोल नहीं बना सकते और आकाश में विलीन हो जाते हैं मतलब मुक्त हो जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार राजा खटवांग ने ढाई घड़ी मतलब एक घंटे के अंदर मुक्ति प्राप्त कर ली थी, जब उन्हें पता चला था कि वे एक घंटे में मृत्यु को प्राप्त हो जाएंगे। एक घंटे में तो कोई मन का सारा कचरा खत्म नहीं कर सकता। हां इतना कम जरूर किया जा सकता है, जिससे बंधन और पुनर्जन्म न होए। राजा खटवांग को एक बड़े द्रव्यमान का तारा मान लो। उन्होंने किसी अन्य पिंड आदि से अपने को टकराकर अपना द्रव्यमान उस सीमा के नीचे कर दिया, जितना ब्लैकहोल बनाने के लिए जरुरी है। उस टकराव को आप कोई भी ऊर्जासंपन तीव्र योगसाधना समझ सकते हो। इसीलिए योग करते रहना चाहिए, चाहे जागृति मिले या न। भगवान श्रीकृष्ण ने भी योग को ही सर्वाधिक महत्त्व दिया है और अर्जुन को कहा है कि हे अर्जुन, तू योगी बन। क्योंकि मनोवैज्ञानिक सिद्धांत कहता है कि जब आदमी के मन का सूचना का कचरा अर्थात अहंकार एक निश्चित सीमा के नीचे पहुंच जाएगा, तो वह जरूर मुक्त हो जाएगा, जैसा कि एक तारे के साथ भी होता हुआ हमने बताया। अगर मुक्ति के लिए सिर्फ जागृति ही जरूरी होती, तब तो दुनिया में उथलपुथल मच गई होती। इतने कम लोगों की मुक्ति से इतनी सारी जीवात्माओं का जीवनप्रवाह रुक सा गया होता।

कुण्डलिनीछवि ही भगवान वामन का अवतार लेकर, जागृत होकर और अहंकाररूपी राजा बलि को पाताललोक भेजकर पूरी सृष्टि पर कब्जा कर लेती है

दोस्तों, पिछली पोस्ट में धर्म बारे थोड़ी बात चल पड़ी थी। धर्म का शास्त्रीय मतलब है लाइफस्टाइल। जिसका लाइफस्टाइल कट्टर है, वह पिछड़ जाता है। नोकिया ने समय के साथ बदलाव नहीं किया। साथ में, यह निष्कर्ष भी निकला था कि जिन बहुत से लोगों को मनोरोगी समझकर उनके ऊपर दवाईयों से, शोषण से या सामाजिक बहिष्कार से उन्हें दबाया जाता है, वे दरअसल जागृति के रोगी होते हैं। काश कि मनोविज्ञान कुंडलिनी के लक्षणों और मनोरोग या मूर्खता के लक्षणों के बीच अंतर कर पाता। मुझे लगता है कि यह अंतर कर पाना पश्चिमी सभ्यता जैसी संस्कृति के लिए कठिन है, पर पूर्वी संस्कृति वालों को तो इसका अनुभव प्राचीन काल से ही है। खैर, आपने देखा होगा, हाल ही की पिछली एक पोस्ट में शेर कैसे योगी बना था। वैसे तो सिंघासन नाम का एक योगासन भी होता है। वैसे भी कुंडलिनी योगी को अजगर या ड्रेगन जैसा रूप दिया गया है, जिसका मुंह भी शेर की तरह खुला हुआ है। योग सांसों का खेल है, और शेर भी सांसों की ताकत से दहाड़ता है और अपने चेहरे को खतरनाक बना लेता है। हिंदू पुराणों में इसी तरह की एक दंतकथा आती है कि वामन भगवान ने तीन पग में सारी धरती माप ली थी। दरअसल तीन कदम सत्त्व, रज और तम, तीन गुणों के प्रतीक हैं। इड़ा नाड़ी देवी अदिति है, और पिंगला नाड़ी देवी दिति है। पिंगला दुनियावी भेद बुद्धि और अहंकार को बढ़ाती है, मतलब राक्षसी द्वैत भाव, रजोगुण व तमोगुण को बढ़ाती है। पर इड़ा नाड़ी शांति, तनावरहित्य, अद्वैतभाव व सत्वगुण जैसे दैवीय भाव पैदा करती है। इसीलिए कहते हैं कि अदिति सभी देवताओं की मां है और दिति सभी राक्षसों की मां। कश्यप मुनि की ये दोनों पत्नियां थीं। कश्यप ब्रह्मा के पुत्र थे। ब्रह्मा मन ही है। क्योंकि मन ही सारे संसार को रचता है। वह कमल पर बैठता है, सहस्रार रूपी कमल पर। जब आत्मा का स्थान सहस्रार बताया जाता है, तो मन का भी यही हुआ क्योंकि दोनों आपस में जुड़े हैं, एक के बिना दूसरा नहीं। ऋषि कश्यप अवचेतन मन है, क्योंकि वह मन से ही पैदा होता है। वह मूलाधार में रहता है। क का मतलब जल होता है, और श्य शयन शब्द से बना है, मतलब जल में सोने वाला। जल वीर्य द्रव और रीढ़ की हड्डी में बहने वाले सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूड के रूप में है, और अवचेतन मन को सोए हुए आदमी के रूप में दिखाया गया है, क्योंकि इसमें ही सभी भावनाएं दबी–सोई रहती हैं। यह अवचेतन मन मूलाधार व स्वाधिष्ठान चक्रों जैसे गहरे व अंधेरे गड्ढों जैसे स्थानों में रहता है। जब इसके जागते हुए भावों या विचारों को अद्वैत भाव अर्थात इड़ा नाड़ी का साथ मिलता है, तब वे भाव देवता बन जाते हैं, पर जब द्वैत भाव अर्थात पिंगला नाड़ी का साथ मिलता है, तब वे राक्षस बन जाते हैं। ये जागते विचार ही कश्यप और अदिति या दिति के पुत्र हैं। अदिति और दिति के रूप में क्रमशः इड़ा और पिंगला नाड़ियाँ ही उसकी दो पत्नियां हैं, क्योंकि वह इन्हीं की मदद से पुत्ररूप में जागता है, मतलब शक्तिमान होता है। मानसिक कुंडलिनी छवि ही वामन भगवान है। यह सभी विचाररूपी पुत्रों में श्रेष्ठ है, इसलिए इसे भगवान विष्णु का अवतार कहा गया है। एकदम मस्त मनोविज्ञान है। ब्रह्मा मूल मन है। वास्तव में वही किस्म किस्म की सांसारिक रचनाएं जैसे घर, बाग, सड़क, पुल आदि बनाता है। वह सीधा विचाररूपी पुत्रों को पैदा नहीं करता। वह पहले अवचेतन मनरूपी कश्यप मुनि को पैदा करता है। उसीसे विचाररूपी पुत्र बनते हैं। आपने भी देखा होगा कि अगर आप दुनिया में कुछ काम न करो तो सीधे कोई मजबूत विचार नहीं बनेंगे। काम करने से उसकी यादें अवचेतन मन में समा जाती हैं, जो बाद में शक्तिशाली विचारों के रूप में उमड़ती रहती हैं। पिंगला नाड़ी के अधिकार क्षेत्र में आने वाला बायां मस्तिष्क राक्षसराज बलि के अधिकार में है, इड़ा–शासित दायां मस्तिष्क देवताओं के अधिकार में है। राजा बलि अहंकार है। अहंकार बलवान ही होता है। बलि नाम उसको इसलिए भी दिया हुआ लगता है क्योंकि अहंकार अपनी ताकत को बनाए रखने के लिए जीवों की बलि लेता है, हिंसा करता है। कुण्डलिनी छवि इड़ा के प्रभाव से बनती है। वैसे तो इड़ा और पिंगला दोनों संतुलित रूप में होनी चाहिए, क्योंकि दोनों का अस्तित्व एकदूसरे पर निर्भर है, पर इड़ा तुलनात्मक रूप से ज्यादा प्रभावी होनी चाहिए। इड़ा नाड़ी के प्रभाव में आदमी शांत, तनावरहित, अच्छी भूख व अच्छे पाचन से सम्पन्न हो जाता है। इसी चैन की अवस्था में शुभ विचार के रूप में कुण्डलिनी चित्र मन में डेरा डालता है, मतलब देवमाता अदिति से वामन भगवान का जन्म होता है। देखने को तो वह एक छोटा सा अकेला मानसिक चित्र है, इसीलिए उसे बौना कहा है। वह राजा बलि से ब्रह्माण्ड में अपने लिए सिर्फ तीन पग भूमि मांगता है। एक मानसिक छवि कितना स्थान लेगी। हरेक मानसिक वस्तु की तरह वह ध्यानचित्र भी तीन गुणों से ही बना है, सत्त्व, रज और तम। यही तीन पग हैं। आदमी का अहंकार रूपी बलि उसे उतनी जगह भी दे देता है, और सोचता है कि उससे उसका क्या नुकसान होगा। अहंकार बहुत बलशाली होता है। वह दुनिया के बड़े से बड़े काम करता है। छोटे से एकमात्र कुण्डलिनी चित्र को वह मजाक में लेता है। रीढ़ की हड्डी शंख है। इसका शंख जैसा ही रूप है, सिर के भाग में चौड़ी और निचले भाग में पतली। इसमें स्थित मेरुदंड या सुषुम्ना नाड़ी ही शंख के अंदर की ड्रेन या नाली है। नाड़ी शब्द नदी शब्द से ही बना है। उस ड्रेन में बहने वाला जल ही कुंडलिनी शक्ति की संवेदना है। शक्ति भी जल प्रवाह की तरह बहती है। क्योंकि इसमें कुण्डलिनी ध्यान या संकल्प मिश्रित होता है, इसलिए इसे संकल्पजल कहा गया है। ध्यान को ही संकल्प कहते हैं। हिंदु धर्म में हरेक धार्मिक अनुष्ठान के दौरान शंख या अर्घे (पूजा का एक विशेष बर्तन) या आचमन से जल गिराते हुए संकल्प किया जाता है, मतलब उस अनुष्ठान के कारण, विधि, पुरोहित, और फल अर्थात उद्देश्य के बारे में कुछ क्षणों के लिए गहरा ध्यान किया जाता है। यज्ञ में बैठे हुए बलि ने शंख से जल गिराते हुए वामन भगवान को तीन कदम भूमि देने का संकल्प लिया था। संभवतः जल गिराने से कुण्डलिनी शक्ति बहने लगती है, क्योंकि दोनों में समानता है, जिससे ध्यान मजबूत होता है। अरघे या शंख से जल की गिरती धारा के साथ कुण्डलिनी शक्ति भी फ्रंट चैनल से नीचे की ओर बहने लगती है, जिसके दबाव से वह बैक चैनल में से गुजरते हुए पीठ से ऊपर चढ़ जाती है, और अपने साथ मूलाधार की अतिरिक्त व विशेष कुण्डलिनी शक्ति भी ले जाती है। कुण्डलिनीसंकल्प रूपी वामन, पतली मेरुदंड रूपी सुषुम्ना–शंख में, बह रहे शक्तिरूपी संकल्पजल की मदद से योगसाधना से बढ़ता ही रहता है, और अंत में जागृत होकर सम्पूर्ण सृष्टि को व्याप्त कर लेता है। यही तीन पग से तीनों लोकों को मापना है। इससे अहंकार खुद ही अवचेतन रूपी पाताल लोक में दब जाता है। जिसे ऐसे कहा गया है कि तीसरा पग वामन ने बलि के सिर पर रखा। यह कथा आने वाली अगली पोस्ट में भी जारी है।

कुंडलिनी तंत्र धर्म-जनित मानसिक बीमारी को नियंत्रित कर सकता है

दोस्तों, मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि कैसे कुंडलिनी योग मेरी मानसिक स्थिति को स्थिर व तंदुरुस्त बना के रखता था। एक मित्र बोल रहे थे कि अपंग दिमाग प्रेम आदि से स्वस्थ नहीं हो सकता। इस हिसाब से तो प्रेम से कुंडलिनी जागरण भी नहीं हो सकता। पर वह होता है। दिमागी विकृति के विभिन्न स्तर होते हैं। हम यह नहीं कहते कि सभी स्वस्थ हो जाएंगे, पर कुछ न कुछ सुधार तो सबमें होगा। यहां तक कि सभी शारीरिक रोगी खासकर जन्मजात या आनुवंशिक रोगी भी दवा से कहां ठीक होते हैं। मेरे कहने का मतलब था कि जब कुंडलिनी योग एक मानसिक बिमारी जैसा लगता है, तब मानसिक बिमारी भी तो कुंडलिनी योग जैसी बनाई जा सकती है। शायद इसीलिए अधिकांश धर्मों में मानसिक रोग को दैवीय दृष्टि से देखा जाता है। एक बात और है। जब ध्यान को बोला जाए, पर उसके लिए जरूरी ऊर्जा का प्रबंध न किया जाए, तो मानसिक रोग तो फैलेंगे ही। मैं किसी खास धर्म को पिनपोइंट नही करूंगा। पर यह सबको पता है कि ज्यादातर धर्म और अध्यात्म को अंधे जैसे होकर मानने वाले कट्टर किस्म के लोग ही इस समय मानसिक रोगी या मानसिक रोगी जैसे दिखाई देते हैं। पाकिस्तान इसका एक जीता जागता उदाहरण है, जहां एक रिपोर्ट के मुताबिक लगभग पाँच करोड़ से ज्यादा मानसिक रोगी हैं। ऐसा लगता है कि अगर किसी धर्म में पर्याप्त अतिरिक्त ऊर्जा है, तो सही तरीके से ध्यान नहीं है, या फिर ध्यान है ही नहीं। केवल कुंडलिनी तंत्र ही मुझे इसमें अपवाद लगता है, क्योंकि यह ध्यान के लिए भी बोलता है, और उसके लिए जरूरी अतिरिक्त ऊर्जा का प्रबंध भी करता है। सही तरीके से ध्यान और ऊर्जा की कमी से धर्म या अध्यात्म कुछ से कुछ बन जाता है, बिल्कुल उल्टा हो जाता है, अपने असली मूलरूप में रहता ही नहीं है। एकहोर्ट टाले को अवसाद के शिखर पर ही जागरण की अनुभूति मिली। मतलब वे मानसिक रोगी नहीं थे बल्कि कुदरती कुंडलिनी साधना के दौर से गुजर रहे थे, जिसे उन्होंने और दुनिया के लोगों ने गलती से अवसाद समझा हुआ था, इसीलिए वे उसे ढंग से नहीं संभाल पा रहे थे। ऐसे बहुत से उदाहरण हैं। एक दिमागी अपंग आदमी हमारे कार्यालय में अपने पैर के जूतों को अपने सिर पर रखकर दौड़ता हुआ अक्सर आता था। उसके साथ प्रसन्नता और हंसीमजाक के साथ हाथ मिलाना पड़ता था, या फिर उसे एक रुपया देना पड़ता था। न मिले तो साबुन का छोटा सा टुकड़ा उठाकर वैसे ही भाग जाता था। एकबार हमारे सामने उसने एक अजनबी को जोर का तमाचा जड़ा था, जिससे वह पूरा हिल गया था। मुझे लगा कि वह मुझसे नाराज़ था पर मेरी तांत्रिक शक्ति से डरकर उसने मेरा गुस्सा उसपर उतार दिया। आजतक मैं उसके चेहरे पर उस घटना का पछतावा देखता हूं। यह प्यार ही है जो उसे लाइन पर रख रहा था। इसी तरह एक हल्के स्तर का अविवाहित व दिव्यांग व्यक्ति मेरी कुंडलिनी योगशक्ति से प्रभावित होकर मेरे लिए बहुत से काम लगभग बिना मेहनताने के करता था, पर मैं उसके परिवार वालों को उसके नाम पर पैसे दे देता था। ऐसा क्यों न समझा जाए कि अल्जाइमर जैसे मानसिक रोगों में मस्तिष्क के मुख्य पुर्जों के खराब होने से जो अतिरिक्त नाड़ी रसायन अर्थात न्यूरोकैमिकल्स जमा हो जाते हैं, वे हैलुसिनेशन के रूप में असली लगने वाला काल्पनिक चित्र बनाते हैं। इसी तरह योग द्वारा मन पर लगाम लगने से भी ऐसा ही होता होगा, तभी तो स्थायी समाधि चित्र बनता है। पर पहली स्थिति में यह समाधि जैसा मानसिक चित्र अस्वस्थ, अनियंत्रित और जागरण के उद्देष्य से रहित है, पर दूसरी स्थिति में यह नियंत्रित व स्वस्थ ध्यानसमाधि चित्र है, जो जागृति को दिलाता है। क्या साम्यवादियों ने इसी भ्रम के कारण “धर्म की अफीम का नशा” वाक्य ईजाद किया है? शेष, इस विषय को हम मनोवैज्ञानिकों और मनोचिकित्सकों के लिए छोड़ते हैं, क्योंकि हम अपने मूल विषय से भटकना नहीं चाहते।

कुंडलिनीपरक संभोग योग ही मस्तिष्क को जागरण के लिए तैयार करती है

दोस्तों, पिछली पोस्ट में कुंडलिनी ध्यान और मनोरोग के बीच तुलनात्मक अध्ययन के बारे में बात हो रही थी। उसी कड़ी में ऐसा भी लगता है कि ऐसे मनोरोगियों का इलाज प्रेमचिकत्सा से भी हो सकता है। इसलिए अक्सर यह कहावत आम है कि प्यार व्यक्ति को नशामुक्ति में मदद करता है। प्यार एक सुपरटोनिक है। मानसिक रोग हमेशा ही बुरे नहीं होते, जैसी कि आम मान्यता है, पर एक गॉडगिफ्ट भी हो सकते हैं। संभवतः हिंदु धर्म में इसीलिए मानसिक रोगियों को विशेष दैवीय नजरिए से देखा जाता है, सम्मान से देखा जाता है। यहां उन्हें मानसिक हस्पताल कम ही भेजा जाता है, जब तक कोई गंभीर खतरा ही पैदा न हो जाए। वे मनोरंजन का मुख्य स्रोत होते हैं, और समारोह आदि में आकर्षण का मुख्य बिंदु होते हैं। फिर भी ज्यादातर उनके साथ सम्मानजनक व्यवहार किया जाता है, और उन्हें पीड़ा नहीं पहुंचाई जाती। उन्हें समाज पर बड़ा बोझ भी नहीं समझा जाता।
मुझे लगता है कि मूलाधारवासिनी कुंडलिनी शक्ति मस्तिष्क को दबाव झेलने में सक्षम बनाती है। यह शायद रक्तवाहिनियों का लचीलापन बढ़ाकर उन्हें ज्यादा और बिना दबाव के रक्त प्रवाह बढ़ाने में मदद करती है। विचित्र सा लगता था जब ध्यान के नाम से ही आम लोग सिर पकड़कर बैठ जाते थे, पर मेरे मस्तिष्क में हर समय ध्यान–समाधि लगी होती थी, यौनयोग के बल से। जब मुझे क्षणिक कुंडलिनी जागरण हुआ था, उस समय मैं तांत्रिक यौनयोग के पूरे प्रभाव में था। नहीं तो वह मुझे होता ही न। शरीर को पता होता है कि अपने साथ कब क्या करना है। इसने तभी जागृति के लिए बैक चैनल पूरी तरह से खोली, जब मस्तिष्क दो तीन महीनों से लगातार यौनयोग की कुंडलिनी शाक्ति के प्रभाव में रहकर ज्यादा से ज्यादा दबाव झेलने में सक्षम बन गया था। मैंने अनजाने में कुंडलिनी को इसलिए नीचे नहीं उतारा कि मैं उसका दबाव सहन नहीं कर पा रहा था, बल्कि इसलिए क्योंकि मुझे यह भय था कि कहीं मैं भौतिक रूप से पिछड़ न जाऊं। क्योंकि ऐसा ही मेरा एक पुराना अनुभव भी था। यह ऑर्गेज्मिक शक्ति पता नहीं क्या जादू करती है। यह एक आन्नदमयी शक्ति है।
सेक्सुअल यिनयांग एकदूसरे के प्रति समर्पण से बढ़ता है। इसीलिए समर्पण भाव पर बहुत जोर दिया जाता है। होता क्या है कि एकदूसरे के प्रति पूरे समर्पण से ही यिन और यांग आपस में एकदूसरे से पूरी तरह से मिश्रित हो पाते हैं। यौन समर्पण से बड़ा भला कौनसा समर्पण हो सकता है। यिनयांग तो हरेक वस्तु में होता है, पर समर्पण केवल पुरुष और स्त्री के ही बीच में होता है। जितना निकटता और अंतर्संबंध एक प्रेमी पुरुष और स्त्री के जोड़े के बीच बनता है, उतना किसी और के बीच में नहीं बनता। इसीलिए प्रेमसंबंध और समर्पण से भरा हुआ संभोग ही सर्वोत्तम यिनयांग एकत्व का भंडार है। इसलिए स्वाभाविक है कि यही भौतिक और आध्यात्मिक प्रगति का भी सर्वोत्तम आधार है। यिनयांग ही पूर्णता है, कुंडलिनी जागरण ही पूर्णता है, ईश्वरत्व ही पूर्णता है। भौतिक संसार भी इसी पूर्णता के अंतर्गत आता है, इससे अलग नहीं है।

जाएं तो आखिर जाएं कहां~ एक भावपूर्ण कविता

है कौन यहाँ, है कौन वहाँ 
जाएं तो आखिर जाएं कहाँ।
है नीचे भीड़ बहुत भारी पर
ऊपर मंजिल खाली है।
हैं भीड़ में लोग बहुत सारे
कुछ सच्चे हैं कुछ जाली हैं।
मंजिल ऊपर तो लगे नरक सी
न दाना न पानी है।
निचली मंजिल की भांति न
उसमें अपनी मनमानी है।
है माल बहुत भेजा जाता पर
अंधा गहरा कूप वहाँ।
न यहाँ के ही न वहाँ के रह गए
पता नहीं खो गए कहाँ।
है कौन यहाँ, है कौन वहाँ
जाएं तो आखिर जाएं कहाँ।

नीचे पूरब वाले हैं पर
ऊपर पश्चिम (ही) बसता है।
ऊपर है बहुत महंगा सब कुछ
नीचे सब कुछ सस्ता है।
हैं रचे-पचे नीचे फिरते सब
ऊपर हालत खस्ता है।
बस अपनी अपनी डफली सबकी
अपना अपना बस्ता है।
हैं सारे ग्रह तारे सूने बस
धरती केवल एक जहाँ।
है कौन यहाँ, है कौन वहाँ
जाएं तो आखिर जाएं कहाँ।

अंधों का इक हाथी है हर
कोई (ही) उसका साथी है।
बहुते पकड़े हैं पूँछ तो कोई
सूंड पैर सिर-माथी है।
सब लड़ते रहते आपस में कह
मैं तो कहाँ, पर तू है कहाँ
है कौन यहाँ, है कौन वहाँ
जाएं तो आखिर जाएं कहाँ।

है कटता समय-किराया हरपल
संचित धन ही काम करे।
जा नई कमाई कोष में केवल
खर्च से वो रहती है परे।
है कैसा अजब वपार (व्यापार) है जिसका
तोड़ यहाँ न तोड़ वहाँ।
है कौन यहाँ, है कौन वहाँ
जाएं तो आखिर जाएँ कहाँ।

है नीचे रोक घुटन भारी पर
ऊपर शून्य हनेरा है।
ऊपर तो भूखे भी रहते पर
नीचे लंगर डेरा है।
है अंधा एक तो इक लंगड़ा
दोनों में कोई प्रीत नहीं।
ले हाथ जो थामे इकदूजे का
ऐसा कोई मीत नहीं।
है कैसी उल्टी रीत है कैसा
उल्टा मंजर जहाँ-तहाँ।
है कौन यहाँ, है कौन वहाँ
जाएं तो आखिर जाएँ कहाँ।

है बुद्धि तो धन है थोड़ा
पर धन है तो बुद्धि माड़ी।
है बुद्धि बिना जगत सूना
बिन चालक के जैसे गाड़ी।
बस अपने घर की छोड़ कथा हर
इक ही झांके यहाँ-वहाँ।
है कौन यहाँ, है कौन वहाँ
जाएँ तो आखिर जाएँ कहाँ।

आ~राम तो है सत्कार नहीं
सत्कार जो है आराम नहीं।
है पुष्प मगर वो सुगंध नहीं
है गंध अगर तो पुष्प नहीं।
इस मिश्रण की पड़ताल में मित्रो
भागें हम-तुम किधर कहाँ।
है कौन यहाँ, है कौन वहाँ
जाएँ तो आखिर जाएँ कहाँ।

है कर्म ही आगे ले जाता
यह कर्म ही पीछे को फ़ेंके।
है जोधा नहीँ कोई ऐसा जो
कर्म-तपिश को न सेंके।
न कोई यहाँ, न कोई वहां बस
कर्म ही केवल यहाँ-वहाँ।
है कौन यहाँ, है कौन वहाँ
जाएँ तो आखिर जाएँ कहाँ।
अनुमोदित व सर्वपठनीय भावपूर्ण कविता संग्रह

कुण्डलिनीयोग दुनिया ठुकराने की बात नहीं करता

दोस्तों, लिखने को बहुत है, शब्द थोड़े हैं। बहुत अजीब हैं अध्यात्म की पहेलियां, बिन बूझे जो लिख दी गई हैं, कोई माने तो कैसे माने, सबको तो यकीन होता नहीँ। ये जो कहा गया है कि बाहर मत दौड़ो, अपने अंदर महसूस करो, यह एक दोगली तलवार की तरह है। अगर कोई बिल्कुल आंख बंद करके बैठ गया, वह तो मरा, पर यदि कोई आंख खोलकर भी बंद रखने का नाटक कर गया, वह तरा। अब मैं तो प्रेमयोगी वज्र ठहरा। मेरे पास अपने बारे में छुपाने के लिए कुछ नहीं है। मैंने हर किस्म के अनगिनत खूबसूरत नजारे देखे हैं। पर मैंने उन नजारों से दूरी बनाए रखी। यहाँ तक कि कइयों से एक लफज़ बात भी नहीँ की, पर मन की आँखों से उन्हें पी ही लिया। यह मेरे पारिवारिक आध्यात्मिक परिवेश से भी हुआ, और अन्य भी कई अनुकूल परिस्थितियाँ रही होंगी पिछले जन्मों के प्रभाव से। पर सिद्धांत तो सिद्धांत ही होता है, यह जानबूझकर भी उतना ही लागू होता है जितना अनजाने में। हुआ क्या कि खूबसूरत नजारों की तरफ आसक्तिपूर्वक न भागने से सिद्धांत को यह लगा कि मैं सभी नजारे अपने अंदर, अपने मन के अंदर, अपने शरीर के अंदर या अपनी आत्मा के अंदर महसूस कर रहा हूँ। सच्चाई भी यही होती है। बाहर के नजारे तो अपने अंदर के नज़ारे को प्रकट करने का जरियाभर होते हैं। जैसा कि मैं शरीर के आनंदमय कोष की जड़ तक जाने की पिछली कई पोस्टों से कोशिश कर रहा हूँ। पता नहीं क्यों लगता है कि कुछ अधूरा है। शास्त्रीय वचनों को वैज्ञानिक व्याख्या की जरूरत है। योग वैज्ञानिक है ऐसा कहा जाता है। पर सिर्फ कहने से नहीं होता। आज इसको सिद्ध करने की जरूरत है। दुनियावी रंगीनियों व नजारों में यौनप्रेम शीर्ष पर है। अगर कोई यौनप्रेम के साथ भी उससे तठस्थ रह सके, तो उससे बड़ी अनासक्ति क्या हो सकती है। उससे तो आत्मा को चमत्कारिक बल मिलेगा और वह सबसे तेजी से जागृत हो जाएगी, सिर्फ एकदो साल के अंदर ही। भगवान शिव भी तो ऐसे ही थे। देवी पार्वती उनके ऊपर जान छिड़कती थीं, पर वे अपने ध्यान में डूबे अनासक्त रहते थे। देवी पार्वती से प्यार तो वे भी अतीव करते थे, पर तटस्थ रहने का अभिनय करते थे। इससे उपरोक्त मनोवैज्ञानिक सिद्धांत के अनुसार उनका सारा प्रेम उनकी आत्मा को खुद ही लग जाता था। फिर भला उनकी आत्मा क्यों हमेशा जागृत न रहती। इससे जाहिर होता है कि एक योगी विशेषकर तंत्रयोगी से बड़ा अभिनयकर्ता नहीँ हो सकता कोई। देव शिव से उल्टा अगर कोई कट्टर या आदर्शवादी या शास्त्रवादी वगैरह या नासमझ ही होता तो देवी पार्वती जैसी प्रेमिका को ठुकरा कर चला जाता या उस पर फूल पे भौरे की तरह आसक्त हो गया होता। आप समझ ही सकते हैं कि फिर क्या होता। मतलब साफ है कि शिव या बुद्धिस्ट वाला मध्यमार्ग ही श्रेष्ठ है। वैसे कहना आसान है, करना मुश्किल। शास्त्रों में अनासक्ति को ठुकराना इसलिए कहा है, क्योंकि वह अपनाने की बजाय ठुकराने के ज्यादा करीब होती है। शास्त्र भावप्रधान हैं। लोग उनके भावों को न समझकर उनका अंधानुकरण करने लगते हैं। अगर कोई आम आदमी महादेव शिव को देखता तो बोलता कि उन्होंने देवी पार्वती को ठुकराया हुआ है। विवाह तो उनका बाद में मतलब कहलो कि ज्ञानप्राप्ति के बाद हुआ। पहले तो वे कहीं और ध्यानमग्न रहते थे, और उनको ढूंढते हुए देवी पार्वती कहीं ओर। बेशक शिव ने पार्वती के रूप की ध्यानमूर्ति अपने मन में बसा ली थी और हमेशा उसके ध्यान में आनंदमग्न रहते थे। लोगों को वह उनकी तपस्या लगती होगी। उन्हें क्या पता कि मामला कुछ और ही है। मन में जाके किसने देखा। दरअसल असली अनासक्त आदमी ने पूरी दुनिया को अपनी आत्मा के रूप में अपनाया होता है। उसे नहीं लगता कि उसने दुनिया को ठुकराया हुआ है। पर दुनिया वालों को ऐसा लगता है। इसलिए कम समझ वाले आम आदमी उनकी देखादेखी दुनिया को ठुकराने की बातें करने लग जाते हैं। यहाँ तक कि प्रेमी को भी कई बार यह लगता है कि उसका प्रेमी उसे ठुकरा रहा है या नजरन्दाज कर रहा है। इसीलिए तो ऐसा होने पर शिव पार्वती को दिलासा देने के लिए कुछ क्षणों के लिए पार्वती के सामने प्रकट हो जाया करते थे, और फिर अंतर्धान हो जाया करते थे। यह बता दूँ कि आत्मा को कुण्डलिनी अर्थात ध्यानचित्र के माध्यम से अभिव्यक्ति की शक्ति पहुंचती है। अगर आप बोलें कि अनासक्ति से मुझे ध्यान चित्र अभिव्यक्त होता महसूस होता है, कोई आत्मा वगैरह नहीं। शुद्ध आत्मा शून्य आकाश की तरह है, वह शरीर के रहते सीधी महसूस हो भी नहीं सकती, वह केवल ध्यानचित्र के रूप में ही महसूस हो सकती है। शिव ठहरे सबसे बड़े रासबिहारी। उनका कोई कैसे मुकाबला करे। आम आदमी को प्रेम से ज्ञान प्राप्त करने में अनेकों वर्ष लग जाते हैं। तब तक वह शिव की तरह प्रेमिका को दिलासा भी नहीं दें सकता। अगर देने लग जाए तो भावना में बह जाए और ज्ञान प्राप्ति से वँचित रह जाए। सांसारिक बंदिशें होती हैं सो अलग। सालों बाद सबकुछ बदल जाता है, प्रेमिका का मन भी। कई तो बेवफाई का आरोप लगाकर शुरु में ही किनारा कर लेती हैं। हाहा। वाह रे प्रभु शिव की किस्मत और लीला कि देवी पार्वती के प्रेम से पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति, फिर उनसे ही विवाह और उनसे ही विहार। प्रेम डगरिया में दूजा न कोई आए। ऐसा आम दुनियादारी में होने लग जाए तो स्वर्गों और अमृत की बौछार होती रहे। इसी तरह ईश्वर को बेवफा न समझकर उससे प्रेम करते रहना चाहिए। वे मनुष्य से बहुत प्रेम करते हैं, इसीलिए हवा, धूप, पानी आदि अनगिनत सुविधाएं आदमी पर लुटाते रहते हैं, बेशक पूरी तरह अनासक्त व दूर जैसे बने रहते हैं। कभी न कभी वे जरूर अपनाएंगे।

कुण्डलिनीयोग आत्मरूप को पाने की कुदरती चेष्ठा के तरीके को सीधा करता है

कई बार आदमी मन-पतंग में इतना डूब जाता है कि उसे यह एहसास ही नहीं रहता कि वह उसके शरीर से जुड़ी है। न धागा दिखता है, न उसको खींचने वाला, सिर्फ पतंग दिखती है। सम्भवतः यही अज्ञान है। इसमें ऐसा लगता है कि मन के दृश्यों का अपना पृथक अस्तित्व है, और हम उन्हें बनावटी भूत बनाकर उनसे डरने लगते हैं। वैसे तो कुण्डलिनीयोग में भी ध्यानचित्र ही दिखता है, पर वह एक ही होता है, और उसे अपने रूप में और अपने शरीर के अंदर देखा जाता है। साथ में, ज्यादातर मामलों में उसका भौतिक अस्तित्व नहीं होता या उसके भौतिक अस्तित्व को नकार दिया जाता है। उदाहरण के लिए अगर कोई देवता, पूर्वज, दिवंगत या पूर्णतः बिछड़ा प्रेमी ध्यान चित्र के रूप में है, तब तो उसके प्रति भौतिक सत्यता की बुद्धि खुद ही नहीं होगी। पर अगर कुण्डलिनी चित्र किसी जीवित प्रेमी, गुरु या अन्य भौतिक वस्तु के रूप में है, तो उसके भौतिक रूप से अनासक्ति रखनी पड़ती है, और उसके साथ अद्वैतमय व्यवहार रखना पड़ता है। वैसे ऐसा स्वभाव व व्यवहार कुण्डलिनी योग से खुद ही बनने लगता है। जैसा कि मैंने एक पिछली पोस्ट में बताया था कि कुण्डलिनी योग से कैसे महसूस होता है कि अन्नमय कोष, प्राणमय कोष, मनोमय कोष, विज्ञानमय कोष और आनंदमय कोष सब आपस में जुड़े हैं। इससे यह विश्वास पक्का बना रहता है कि कुण्डलिनी चित्र अपने मन के ही अंदर है, अपने ही देहसंघात का हिस्सा है, अपना ही स्वरूप है, कोई बाहरी पृथक भौतिक वस्तु नहीं। यह स्वयं आदमी की अनासक्ति और अद्वैत की प्रकृति को बढ़ाता है। क्योंकि अपने आप से किसी को आसक्ति नहीं हो सकती है, और न ही अपने आप में किसीको द्वैत महसूस हो सकता है। किसी को नहीँ लगता कि वह एक आदमी नहीं बल्कि दो आदमियों का मिश्रण है। अपने कर्म का फल उसी अकेले आदमी को भोगना पड़ता है, कोई दूसरा नहीं आता। अगर कोई दिनरात भी आईने में बनता-ठनता रहे तो भी वह किसी दूसरे के या ईश्वर के प्रेम में पड़कर करता है, अपने लिए नहीं। प्रेम के लिए दो का होना जरूरी है। अकेले में प्रेम नहीं होता। आसक्ति और प्रेम में सैद्धांतिक अंतर नहीं है केवल स्तर, व्यवहार व दृष्टिकोण का ही अंतर है। इसी मनोवैज्ञानिक सिद्धांत के अनुसार कुण्डलिनी चित्र के प्रति स्वयं ही हो रही आत्मभावना से आत्मा शुद्ध होती रहती है। मतलब कि कुण्डलिनी चित्र को अपने पूर्ण आत्मरूप को जानने के लिए सहारे के रूप में अपनाया जाता है। मुझे तो लगता है कि जब कुंडलिनी ध्यान एक विशेष महत्वपूर्ण या शीर्ष बिंदु तक पहुँचता है, तब यह आत्मा को अस्तित्वगत स्व-अभिव्यक्ति की इतनी अधिक शक्ति देता है कि वह उस बिंदु से परे अव्यक्त रहने में अस्मर्थ हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप कुंडलिनी जागरण होता है। सम्भवतः आत्मरूप को जानने की कुदरती चेष्ठा के रूप में ही मन में विचार आते हैं। पर उन विचारों को समझने का और अपनाने का तरीका उल्टा होता है। हम उन्हें अपना आत्मरूप न समझकर बाहरी,  पराया, स्थूल और भौतिक समझने लगते हैं। इससे उन विचारों से आत्मरूप को शक्ति मिलने की बजाय उनसे संसार की उलझनें और भी आगे से आगे बढ़ती रहती हैं। मतलब कि आत्मा शुद्ध होने की बजाय ज्यादा से ज्यादा अशुद्ध होता जाता है। सम्भवतः यही मोहमाया है। कुण्डलिनी योग इस तरीके को सीधा करने की कोशिश करता है। इससे आदमी का रोजाना का व्यवहार भी सकारात्मक रूप से रूपान्तरित होने लगता है। उसके जीवन में अनासक्ति और अद्वैत का प्रभाव बढ़ने लगता है। इससे स्वाभाविक है कि उसके मन की उलझनें सुलझने लगती हैं। मन स्वस्थ रहने से शरीर भी स्वस्थ रहने लगता है। व्यक्तिगत स्वास्थ्य से सामाजिक स्वास्थ्य में भी सुधार होता है। सामाजिक स्वास्थ्य से समाज के सभी लोग भी अपने अच्छे स्वास्थ्य को महसूस करते हैं। इस तरह समाज से व्यक्ति में और व्यक्ति से समाज में सुधार एक चेन रिएक्शन की तरह आगे से आगे बढ़ता हुआ पूरे विश्व में फैल जाता है, जिसे युग परिवर्तन भी कहते हैं।

कुण्डलिनीयोगानुसार शरीर कभी भी नहीँ मरता, कभी यह दिखता है, कभी नहीं दिखता, रहता हमेशा है, अनुभव के रूप में

सभी मित्रों को होली की शुभकामनाएं

मित्रों, मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि कैसे मन की गतिशीलता पतंग की उड़ान की तरह है। ऐसा लगता है कि प्राणायाम पतंग की डोरी को नियंत्रित गति देने की तरह है, जिससे पतंगरूपी मन अच्छे से और आत्मविकासरूपी आनंद पैदा करते हुए उड़ सके। मुझे तो यहाँ तक लगता है कि जो आनंद यौनक्रीड़ा के दौरान आता है, उसमें भी अनाच्छादित अर्थात नग्न शरीर के सम्पूर्ण उद्घाटन का काफी योगदान है। उसमें तो अन्नमय शरीर और प्राणमय शरीर दोनों एकसाथ उच्चतम अभिव्यक्ति के करीब होते हैं। कई लोग बोलते हैं कि असली प्यार मन से होता है, शरीर से नहीं। ये क्या बात हुई। सीधे कोई कैसे बाहरी तहखानों को लांघे बिना ही सबसे अंदरूनी तहखाने में पहुंच सकता है। जब लड़की के शरीर से हल्की यौन छेड़छाड़ होती है, बेशक अप्रत्यक्ष या मानसिक रूप में ही, तब लड़की का अन्नमय कोष सक्रिय हो जाता है। होली पर इसका अच्छा मौका मिलता है, उसे गवाएं नहीँ। हाहा। उसे पहली बार अपने शरीर की सबसे गहरी पहचान महसूस होती है। वह शरीर से ज्यादा ही सक्रिय व क्रियाशील होने लगती है। उसके मुख पर लाली और मुस्कान छा जाती है। इससे उसका प्राणमय कोष भी सक्रिय हो जाता है। प्राणों से उपलब्ध शक्ति को पाकर उसका मन रंगीनियों में बहुत दौड़ता है। वह हसीन सपने देखती है। सपनों में विभिन्न लोकों और परलोकों का भ्रमण करती है। इससे उसका मनोमय शरीर भी सक्रिय हो जाता है। क्योंकि यौन आकर्षण के कारण उसका ध्यान हर समय अपने शरीर और प्राणों पर भी बना रहता है, इसलिए उसका विज्ञानमय कोष भी खुद ही सक्रिय बना रहता है। उससे स्वाभाविक है, आनंदमय शरीर भी सक्रिय ही रहेगा। यह सब चेन रिएक्शन की तरह ही है। यही तो प्रेमानन्द है। यह आनंदमय कोष लम्बे समय तक सक्रिय बना रहता है। उसके पूरा खुल जाने के बाद तो आत्मा ही बचता है पाने को। वह भी विवाह के बाद तांत्रिक कुण्डलिनीयोग आधारित सम्भोगयोग से मिल ही जाता है। ऐसा नहीं कि यह स्त्री के साथ ही होता है। पुरुष के साथ भी ऐसा ही होता है। मुझे तो लगता है कि स्त्री की लावण्यमयी भावभंगिमा को देखकर जो पुरुष का तन और मन उससे देहसंबंध बनाने को उछालें मारने लगता है, वही उसके प्राणों का क्रियाशील होना है। यह अलग बात है कि कोई उस प्राणशक्ति का सदुपयोग करता है, तो कोई दुरुपयोग। कोई उसे आध्यात्मिक विकास में लगाता है, कोई भौतिक विकास में, और कोई संतुलित रुप से दोनों में।

थोड़ा मन की पतंग को उड़ने दें, एकदम न उतारें। हल्की सी तिरछी सी यह भावना रखें कि यह जुड़ी है। फिर थोड़ी देर बाद पतंग खुद आराम से लैंड करेगी। कोई झटका नहीँ लगेगा। मजा भी आएगा। लैंड होके उसे वापस भी जाने दें इच्छानुसार। खुद वापिस आएगी। अगर पतंग तूफानी जोर से ऊपर जा रही हो, और आप उसे जबरदस्ती नीचे खींचोगे, तो या तो पतंग फट सकती है, या धागा टूट सकता है। दोनों कमजोर तो पड़ेंगे ही, और उन पर दबाव भी बनेगा। ऐसा ही मन के साथ भी जबरदस्ती कर के होता है।

जिस समय दिमाग में थकान, दबाव या सिरदर्द जैसी हो रही हो, उस समय कपालभाति जैसी साँस खुद चलती है। उससे बाहर निकलती साँस पर ध्यान जाता है, जिससे कुण्डलिनी नीचे उतरती है। मतलब बाहर निकलती साँस धागे को नीचे खींचने मतलब खींच की तरह है, जिससे उड़ती हुई मनरूपी पतंग नीचे आती है, और दिमागी थकान रूपी तेज तूफ़ान से फटने से बचती है ।

विचारों के प्रकाश में ही नहीं, उनके अभाव के अंधकार में भी अनुभव शरीर से ही जुड़ा होता है, क्योंकि कुछ न कुछ मस्तिष्क की हलचल उसमें भी रहती ही है। यहाँ तक कि मृत्यु के बाद भी आत्मा का जो विशेष रूप में अनुभव होता है, वह भी शरीर से ही जुड़ा होता है, क्योंकि वह शरीर से ही निर्मित हुआ है। इसका मतलब है कि शरीर कभी भी नहीँ मरता। कभी यह दिखता है, कभी नहीं दिखता, रहता हमेशा है, अनुभव के रूप में।