कुंडलिनी के नवीनतम अवतार के रूप में कोरोना वायरस (कोविद-19); संभावित कोरोना-पुराण की मूलभूत रूपरेखा

दोस्तों, कोरोना ने एंड्रॉइड फोन पर वेबपोस्ट बनाना सिखा दिया है। इस हफ्ते मेरा डेस्कटॉप कम्प्यूटर भी लोकडाऊन में चला गया। वास्तव में कोरोना से दुनिया को बहुत कुछ सीखने को मिला है। कोरोना ने लोगों की अंधी भौतिक दौड़ पर लगाम लगाई है। इसने लोगों को जीवन जीने का तरीका सिखाया है। इसने मानवता को बढ़ावा दिया है। इसने प्रकृतिको स्वस्थ होने का अवसर प्रदान किया है। इसीलिए हम कोरोना को ईश्वर का अवतार मान रहे हैं, क्योंकि ईश्वर के अवतार ही इतने कम समय में ऐसे आश्चर्यजनक काम करते हैं।

कुंडलिनी और ईश्वर साथ-साथ रहते हैं

कुंडलिनी-अवतार कहो या ईश्वर-अवतार। बात एक ही है। कुंडलिनी ही शक्ति है। ईश्वर ही शिव है। वही अद्वैत है। शिव और शक्ति सदैव साथ रहते हैं। अद्वैत औऱ कुंडलिनी हमेशा साथ रहते हैं। कोरोना के डर से सभी लोग अद्वैतवादी बन गए हैं। वे जन्म-मृत्यु, यश-अपयश, और सुख-दुख में एकसमान रहना सीख गए हैं। इस प्रकार से हर जगह कुंडलिनी का बोलबाला हो गया है। हर जगह कुंडलिनी चमक रही है।

कुंडलिनी किसी भी रूप में अवतार ले सकती है

पुराणों में ईश्वर के विभिन्न अवतारों का वर्णन आता है। ईश्वर ने कभी मत्स्य अवतार, कभी वराह अवतार, कभी कच्छप अवतार, कभी वराह अवतार और कभी मनुष्य अवतार ग्रहण किया है। सभी अवतारों में उन्होंने अधर्म का नाश करके धर्म की स्थापना की है। जब ईश्वर मछली के रूप में अवतार ले सकता है, तब वायरस (कोरोना) के रूप में क्यों नहीं। कोरोना वायरस भी तो अधर्म का ही नाश कर रहा है।

कुंडलिनी के कोरोना अवतार के द्वारा अधर्म का नाश

सबसे पहले तो इसने उन धार्मिक कट्टरपंथियों के जमघट पर लगाम लगाई है, जो धर्म के नाम पर घोर अमानवतावादी बने हुए थे। इससे उनकी शक्ति क्षीण हुई है। दूसरा, इसने उन बड़े-2 विकसित देशों की हेकड़ी निकाल दी है, जो विज्ञान व तकनीक के घमंड में चूर होकर व्यापक जनसंहार के हथियार बना रहे थे। आज उनके हथियार उनके किसी काम नहीं आ रहे हैं, और उन्हीं के लिए मुसीबत बन गए हैं। हाल यह है कि कभी दुनिया को हथियार बेचने वाला सुपरपावर अमेरिका कोरोना के खिलाफ दवाई (हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन) के लिए भारत के आगे हाथ फैला रहा है। तीसरा, इसने लोगों के अंधाधुंध माँस भक्षण पर रोक लगाने का काम किया है। कोरोना के डर से लोग जीव हिंसा और मांस भक्षण से किनारा करने लगे हैं।

कुंडलिनी दुष्टों को अपनी ओर आकर्षित करके वैसे ही मारती है, जैसे कीड़ों-मकोड़ों को दीपक

विश्वस्त सूत्रों के अनुसार पाकिस्तान अपने आतंकवादियों को कोरोना से संक्रमित करवा कर भारत की सीमाओं में उनकी घुसपैठ करवा रहा है। इससे वही नष्ट होगा। भगवान विष्णु के मोहिनी अवतार में भी दुष्ट राक्षस सुंदर मोहिनी देवी की तरफ आकृष्ट होकर उसी के द्वारा नष्ट हो गए थे।

कुंडलिनी के हाथ बहुत लंबे हैं

आजकल के लोगों का पुराणों के ऊपर से विश्वास उठ सा गया था। वे पुराणों के अवतारों की कहानियों को झूठा समझने लग गए थे। वे समझने लग गए थे कि आजकल के मिसाइल व परमाणु बम के युग में धनुष बाण या तलवार धारण करने वाला ईश्वर अवतार क्या कर लेगा। वे मान रहे थे कि मछली या कछुए जैसे अवतार भी आज क्या कर लेंगे। अब कुंडलिनी (ईश्वर) ने ऐसे लोगों का परिचय अपने उस विषाणु (विष्णु नहीं, विषाणु) अवतार से कराया है, जिसका नाम कोरोना है। उसको आज आदमी का कोई भी हथियार नुकसान नहीं पहुंचा पा रहा है, और न ही उसे रोक पा रहा है। ठीक ही कहा है, “न जाने किस रूप में नारायण मिल जाए”। इसलिए आज आदमी के लिए यही ठीक है कि वह कोरोना वायरस को कुंडलिनी समझ कर उसे नमस्ते करे, उससे अपने अपराधों के लिए क्षमा मांगे, भविष्य के लिए उससे सबक ले, और अधर्म को छोड़कर धर्म के रास्ते पर चलना शुरु करे।

कोरोना पुराण से मिलती जुलती पुस्तक है “शरीरविज्ञान दर्शन”

आजकल तो इसके पढ़ने का विशेष फायदा है, क्योंकि आजकल स्वास्थ्य संबंधी आपदा (कोरोना) चरम पर है। इस पुस्तक में पूरे शरीर विज्ञान को एक पौराणिक उपन्यास की तरह रोचक ढंग से समझाया गया है। इसलिए इस पुस्तक को कोरोना पुराण भी कह सकते हैं। इससे जहां एक ओर भौतिक विकास होता है, वहीं दूसरी ओर आध्यात्मिक विकास भी। इसमें कोरोना जैसे विषाणु के मानवता के ऊपर हमले की घटना का भी भविष्यवाणी की तरह वर्णन किया है। वह श्वास प्रणाली को अवरुद्ध करता है। उससे बहुत से लोग बड़ी दीनता के साथ मर जाते हैं, और बहुत से बच भी जाते हैं। मानवशरीर को इसमें एक देश की तरह दिखाया गया है। विषाणु को उग्रपंथी शत्रु मनुष्य की तरह दिखाया गया है। शरीर की रोगाणुओं से रक्षा करने वाले व्हाईट ब्लड सेल्स, देहदेश के वीर सैनिक हैं। श्वास नलिकाएं कन्दराएँ हैं। फेफड़े एक विशाल जलाशय के रूप में हैं। बहुत सुंदर दार्शनिक चित्रण है। ऐसे बहुत से दार्शनिक आख्यान पूरी पुस्तक में हैं, जो समस्त शरीर की सभी वैज्ञानिक गतिविधियों को कवर करते हैं। लगता है कि इस पुस्तक के लेखक को इस कोरोना महामारी का अचिंत्य पूर्वाभास हो गया हो, जिसे वह बता न सकता हो। उसी धुंधले पूर्वाभास ने उसे पुस्तक लिखने के लिए प्रेरित किया हो। पुस्तक लगभग 2017 में छपी है। पुस्तक को समीक्षा में सर्वपठनीय, सर्वोत्तम व विलक्षण आंका गया है।

कोरोना से सबक लेकर अब लोग फिर से वेद पुराणों पर विश्वास करने लगे हैं। आशा है कि पाठकों को यह संक्षिप्त कोरोना पुराण पसंद आया होगा।

हम किसी भी धर्म का समर्थन या विरोध नहीं करते हैं। हम केवल धर्म के वैज्ञानिक और मानवीय अध्ययन को बढ़ावा देते हैं।

इस पोस्ट में दी गई समाचारीय सूचना को सबसे अधिक विश्वसनीय माने जाने वाले सूत्रों से लिया गया है। इसमें लेखक या वैबसाईट का अपना कोई योगदान नहीं है।

यह पोस्ट चिकित्सा विज्ञान का विकल्प नहीं है, अपितु उसकी अनुपूरक है। कृपया कोरोना से लड़ने के लिए डाक्टर की सलाह का पालन अवश्य करते रहें।

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कुण्डलिनी के विकास के लिए कोरोना (कोविड-19) से सहायता प्राप्त करना; नई दिल्ली की निजामुद्दीन-मस्जिद में तबलीगी जमात के मरकज की घटना; एक आध्यात्मिक-मनोवैज्ञानिक विश्लेषण

हम किसी भी धर्म का समर्थन या विरोध नहीं करते हैं। हम केवल धर्म के वैज्ञानिक और मानवीय अध्ययन को बढ़ावा देते हैं।

इस पोस्ट में दी गई समाचारीय सूचना को सबसे अधिक विश्वसनीय माने जाने वाले सूत्रों से लिया गया है। इसमें लेखक या वैबसाईट का अपना कोई योगदान नहीं है।

दोस्तों, अभी दुनियाभर में लौक डाऊन का सख्ती से पालन किया जा रहा है, ताकि कोरोना महामारी से बचा जा सके। भारत में भी पूरे देश में 14 अप्रैल तक संपूर्ण लौकडाऊन है। यह लौकडाऊन 21 दिनों का है। सभी लोग अपने घरों में कैद हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कह रहे हैं कि उससे कुछ दिनों के लिए तो महामारी कम हो जाएगी, पर लगभग 45 दिनों के लगातार लौकडाऊन से ही महामारी से पूरी तरह से बचा जा सकता है।

ऐसी लौकडाऊन की स्थिति में इस्लाम को मानने वाली कट्टरपंथी तबलीगी जमात के लोग कोरोना वायरस से दोस्ती निभा रहे हैं। नई दिल्ली में अनेक कोरोना संक्रमित देशों के लोग अभी हाल ही में इकट्ठे हुए, जब नई दिल्ली में कर्फ्यू लगा हुआ था। ये लोग टूरिस्ट वीजा पर भारत आए हुए थे, पर यहाँ पर वे धर्म-प्रचार कर रहे थे, जो कि अवैध है। इन्होंने पुलिस की चेतावनी को भी नहीं माना। अनेकों बार पुलिस भी इनसे डरती है, क्योंकि ये सामने तो खुली हिंसा पर उतारू हो जाते हैं, पर पीठ के पीछे प्रताड़ित होने का ढोंग करते हैं। अधिकाँश देशी-विदेशी मीडिया भी इन्हें प्रताड़ित की तरह प्रस्तुत करते हैं। सूक्ष्म परजीवियों (कोरोना वायरस) की भी शरीर के अन्दर ऐसी ही स्ट्रेटेजी होती है। मीडिया टेप के सामने आने से यह खुलासा हुआ है कि निजामुद्दीन की उस तबलीगी मस्जिद में उसके अध्यक्ष मौलाना साद लोगों को भड़का रहा है। वह सभी को कह रहा है कि मुसलामानों को आपस में नजदीकी बनाए रखना चाहिए, और एक थाली में खाना खाना नहीं छोड़ना चाहिए। और कहता है कि कोरोना वायरस का प्रोपेगेंडा मुसलमानों को अलग-थलग करने के लिए फैलाया गया है। अल्लाह ने अगर कोरोना से मौत लिखी है, तो कोई नहीं बचा सकता। मस्जिद में मरने से अच्छा क्या काम हो सकता है। अल्लाह को मानने वाले डाक्टर से ही अपना इलाज करवाएं। फिर वे लोग उस मस्जिद से निकलकर पूरे देश में फैल गए। उनमें से बहुत से लोग कोरोना से संक्रमित पाए गए। कुछ मर गए। बहुत से लोग अभी भी मस्जिद आदि में छुपे हुए हैं, जो पकड़ में नहीं आ रहे हैं। यहाँ तक कि जब कुछ लोगों को क्वारनटाइन में रखने का प्रयास किया गया, तो वे हरेक हिदायत को ठुकराने लगे, दुर्व्यवहार करने लगे, पत्थरबाजी करने लगे (कुछ तो फायरिंग करते हुए भी सुने गए), और कर्मचारियों पर थूकने लगे, ताकि कोरोना वायरस हर जगह फैल सके। इस घटना के बाद पूरे देश में कोरोना मरीजों की संख्या एकदम से बढ़ी है, जिसने लौकडाऊन की सफलता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है।

कुण्डलिनी जीवन और मृत्यु के संगम में निहित है       

धार्मिक शास्त्रों में मृत्यु से संबंधित युद्ध, दुर्भिक्ष आदि आपदाओं की बहुत सी कहानियां आती हैं। साथ में, उन्हीं शास्त्रों में ही जीवन से भरपूर कथा-रस भी बहुतायत में है। इससे जीवन और मृत्यु के संगम की अनुभूति होती है। उसी संगम को अद्वैत कहते हैं। उसी अद्वैत के साथ कुण्डलिनी भी विद्यमान होती है। यह धार्मिकता कथा-कहानियों तक ही सीमित रहनी चाहिए। जब उन्हें असली जीवन में हूबहू उतारने का प्रयास किया जाता है, तब उसे अतिवादी या कट्टर धार्मिकता कहा जाता है।

कुण्डलिनी की प्राप्ति के लिए अति लालसा से प्रेरित होकर ही अमानवीय काम होते हैं

इसी वजह  से ही कई बार कुण्डलिनी योगी नीरस, उबाऊ, कट्टर, अमानवीय, व उग्रवादी जैसे लगते हैं। ऐसा इसलिए लगता है, क्योंकि उनमें मृत्यु का भय नहीं होता। अपनी कुण्डलिनी के प्रभाव से वे जीवन-मृत्यु में, यश-अपयश में, व सुख-दुःख में समान होते हैं। उनके मन में यह समता कुण्डलिनी योग साधना से छाई होती है। परन्तु धार्मिक कट्टरवादी इस समता/अद्वैत को अमानवीय कामों से पैदा करते हैं। वे गलत काम करते हैं, ताकि उनके मन से मृत्यु, अपयश व दुःख का भय ख़त्म हो ज्जाए।  इससे वे भी जीवन-मृत्यु में, यश-अपयश में, व सुख-दुःख में समान रहने लगते हैं। इस अद्वैत से उनके मन में कुण्डलिनी अप्रत्यक्ष तरीके से आकर बस जाती है।

मतलब साफ है कि कुण्डलिनी योगी कुण्डलिनी की मदद से अद्वैत को प्राप्त करता है, परन्तु धार्मिक कट्टरवादी आमानवीय कामों से अद्वैत को प्राप्त करता है। किसी कारणवश धार्मिक कट्टरवादी कुण्डलिनीयोग नहीं कर पाते हैं। उनके पास मध्य मार्ग के अनुसार संतुलित व तांत्रिक जीवन जीने का अवसर होता है, पर वे उस पर विशवास नहीं करते, और उसे बहुत धीमा तरीका भी मानते हैं। आध्यात्मिक मुक्ति के प्रति इसी अति लालसा से प्रेरित होकर वे अमानवतावादी बन जाते हैं। उनमें से बहुत कम लोग ही सफल हो पाते हैं, बाकि सारे तो नरक की आग में गिर जाते हैं। तभी  तो कई धर्मों में पुनर्जन्म को माना गया है, ताकि आदमी निरुत्साहित होकर अमानवीय न बन जाए, और वह यह समझ सके कि उसकी साधना की कमी उसके अगले जन्म में पूरी हो जाएगी।

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कुण्डलिनी ही सहस्रार चक्र से नीचे झरने वाले अमृत के रूप में कोरोना (कोविड-19) के खिलाफ काम कर सकती है

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मस्तिष्क ही हमारे शरीर का बोस है। वह पूरे शरीर के सुचारु संचालन के लिए पूरे शरीर में सन्देश प्रसारित करता रहता है। कुछ सन्देश होरमोन के रूप में होते हैं, तो कुछ सन्देश नर्व सिग्नल के रूप में होते हैं।

हम उन संदेशों को महसूस नहीं कर सकते, इसलिए हम उन्हें मस्तिष्क में पैदा करके वहां से पूरे शरीर की तरफ बलपूर्वक नहीं धकेल सकते। जिस चीज को हम मस्तिष्क में महसूस कर सकते हैं, हम उसे ही शरीर की तरफ रवाना कर सकते हैं। हम विचारों को मस्तिष्क में महसूस कर सकते हैं। हम उन्हें शरीर के विभिन्न चक्रों तक ध्यान से उतार सकते हैं। इससे भी मस्तिष्क में संदेशवाहक रसायनों के निर्माण को बल मिलता है, जो पूरे शरीर में प्रसारित हो जाते हैं। परन्तु यह बल बहुत कम होता है, क्योंकि कभी-कभार उठने वाले व बदलते विचारों की चमक धुंधली होती है। साथ में, भिन्न-२ विचारों का सहारा लेने से आदमी का मन पैरानोइक या विचलित भी रह सकता है। इस समस्या का हल कुण्डलिनी में निहित है। कुण्डलिनी एकमात्र इष्ट की छवि है, जो रोज के अभ्यास से बहुत चमकीली बनी होती है। उसकी तीव्र चमक से मस्तिष्क में तेजी से रसायन बनते हैं। जब उस कुण्डलिनी को विभिन्न चक्रों तक उतारा जाता है, तब साथ में वे सभी रसायन भी वहां पहुँच जाते हैं, जो शरीर की बहुत मदद करते हैं। एकमात्र छवि का सहारा लेने से आदमी का मन भी विचलित नहीं होता। साथ में, कुण्डलिनी से आध्यात्मिक उन्नति भी प्राप्त होती है, जिससे मुक्ति मिलती है।

कुण्डलिनी ही सहस्रार से झरने वाला अमृत (एम्ब्रोसिया) है

योग शास्त्रों में लिखा है कि चन्द्रमा से पैदा हुए अमृत को सूर्य खाता है। सहस्रार ही वह चंद्रमा है। उसे बिंदु भी कहते हैं। विशुद्धि चक्र सूर्य है। कुण्डलिनी को ही अमृत कहा गया है, क्योंकि वही प्रकाश, आनंद व मुक्ति प्रदान करती है। साथ में, संभवतः कुण्डलिनी कोरोना जैसी प्राणघातक बीमारियों से भी हमारी रक्षा करती है, जैसा कि आगे बताया गया है।

योग साधना में भी यह सिखाया जाता है कि कुण्डलिनी को मूलाधार (शक्ति-उत्पादक चक्र) से उठाकर पीठ (महान नाग) के रास्ते से सहस्रार (नाग का फण) तक उठाना चाहिए। फिर उसे आगे के सभी चक्रों से होकर धीरे-२ नीचे उतारना चाहिए। इसका भी यही अर्थ है।

कुण्डलिनी को सहस्रार से नीचे उतारने के लिए विभिन्न रेखा-चित्रों का सहारा लिया जा सकता है

सिर-गर्दन की बाऊंडरी से बाहर निकलने वाली तिरछी-खड़ी रेखा गलती से बनी है

कुण्डलिनी को इन रेखा-चित्रों की रेखाओं पर घुमाया जाता है, जिससे वह उत्तरोत्तर चमकती जाती है।

कुण्डलिनी को नाग के माध्यम से भी नीचे उतारा जा सकता है

विशुद्धि चक्र से नीचे के चक्रों तक कुण्डलिनी को नाग की सहायता से भी पहुँचाया जा सकता है। विशुद्धि चक्र तक गर्दन सीधी रहती है, परन्तु उसके नीचे के चक्रों के लिए गर्दन को आगे को मोड़कर ठोड़ी को छाती से लगाया जाता है। इसे जालंधर बंध (चिन लौक) कहते हैं। इसके साथ कल्पना की जा सकती है कि नाग अपना फण नीचे करके अनाहत चक्र का चुम्बन कर रहा है। इससे सहस्रार व अनाहत चक्र कुण्डलिनी के पुल से आपस में जुड़ जाते हैं। इसी तरह, सहस्रार और मणिपुर चक्र; सहस्रार और स्वाधिष्ठान चक्र; और सहस्रार व मूलाधार चक्र भी आपस में जुड़ जाते हैं। इससे मस्तिष्क के सारे जैव-रसायन भी कुण्डलिनी के साथ सभी चक्रों पर पहुँच जाते हैं, जिससे शरीर और मन दोनों स्वस्थ रहते हैं।

कुण्डलिनी से कोरोना के खिलाफ लड़ने में मदद मिल सकती है

पुराने जमाने में एंटीबायोटिकस व वैक्सीन नहीं होती थीं। फिर भी लोग स्वस्थ रहते थे। उनके अच्छे स्वास्थ्य के लिए कुण्डलिनी काफी हद तक जिम्मेदार थी, जो उनके दैनिक जीवन में शामिल होती थी। योगी तो कभी बीमार होते ही नहीं थे।

पुराने जमाने में ही अधिकाँश जानें श्वास-रोगों से जाती थीं। कोरोना वायरस भी श्वास रोग पैदा करता है। श्वास रोग गले के रोगों से शुरू होते हैं। विशुद्धि चक्र गले में ही स्थित है। अमृत का झरना भी सहस्रार से विशुद्धि चक्र तक ही मुख्य रूप से दिखाया जाता है। सीधी सी बात है कि उससे गले के रोग ठीक होते थे, जिससे योगियों की जान बच जाती थी। तभी कुण्डलिनी को अमृत अर्थात जान बचाने वाला कहा गया है।

कुण्डलिनी ही देवी-देवताओं के रूप में रोगों से हमारी रक्षा करती है

पुराने जमाने में विशेष रोग से बचाव के लिए एक विशेष देवता का मंदिर होता था, जैसे कि बच्चों के छोटी माता रोग (small pox) से बचाव के लिए शीतला माता। उस देवी माता का मंदिर बहते पानी के पास, ठंडी जगह पर होता था। मतलब है कि रोग के बुखार को उस ठंडी जगह से ठंडक मिलती थी। आज भी ऐसे बहुत से मंदिर हाई। वास्तव में उन देवी-देवताओं की पूजा से कुण्डलिनी संपुष्ट होती है, जो हमारे इम्यून सिस्टम को मजबूत करती है।    

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कुण्डलिनी से कोरोना से बचाव; कुण्डलिनी ही जीवन के लिए जोखिम भरी परिस्थितियों में सबसे अधिक साथ निभाती है, चाहे वह कोरोना वायरस हो या अन्य कोई भयंकर परिस्थिति

कुछ पहुंची हुई बातें हमें विश्वास करके माननी ही पड़ती हैं, क्योंकि उन्हें प्रत्यक्ष विज्ञान के द्वारा सिद्ध नहीं किया जा सकता। इन्हीं में से एक बात है, परलोकगमन के समय कुण्डलिनी की सहायता प्राप्त होना। सभी धर्मों में यह बात बताई गई है कि एक इष्ट का ध्यान करते रहना चाहिए। वही इष्ट परलोक यात्रा को सुगम बनता है। यदि अंत समय में उस इष्ट का स्मरण हो जाए, तो मुक्ति निश्चित है। यदि मुक्ति न भी हो, तो इतना तो जरूर है कि वह जीवात्मा को धरती के बंधन से छुड़ाता है, जिससे परलोक यात्रा सुगम व शीघ्र हो जाती है। यह तो विज्ञान से भी सिद्ध है कि अंतरिक्ष यान को धरती के गुरुत्वाकर्षण से छूटने के लिए ही महान बल चाहिए होता है। उसके बाद वह स्वयं ही ऊपर जाता रहता है। वैसा ही बल इष्ट के स्मरण से मिलता है। उसी इष्ट को कुण्डलिनी कहते हैं।

राजा परीक्षित को इसी इष्ट-ध्यान से एक सप्ताह में मुक्ति मिल गई थी

राजा परीक्षित को पता चल गया था कि एक सप्ताह में उनकी मृत्यु होने वाली थी। इसलिए उन्होंने अपना पूरा ध्यान श्री कृष्ण में लगा दिया था। इससे उन्हें मुक्ति मिल गई। इसी तरह रजा खट्वांग को पता चल गया था कि उनकी मृत्यु 1 घंटे बाद होने वाली है। इसलिए उन्होंने अपना पूरा ध्यान अपने इष्ट में लगा दिया था। इससे उन्हें मुक्ति मिल गई।

इसीलिए मेरी नानी जी कहा करती थीं कि आजकल तो मुक्ति को प्राप्त करना बहुत आसान है। आजकल डाक्टर लोग पहले से बता देते हैं कि किस बीमार व्यक्ति के मरने की सम्भावना कब और कितनी है।

कुण्डलिनी ध्यान से कोरोना वायरस से निपटने में भौतिक और आध्यात्मिक, दोनों प्रकार से मदद मिल सकती है

कोरोना वायरस से भी पता चल ही गया है कि आदमी की जिंदगी बहुत अस्थायी है। इससे शिक्षा लेते हुए लोगों को कुण्डलिनी साधना शुरू कर देनी चाहिए। पहले तो कुण्डलिनी आदमी को कोरोना से बचाने की पूरी कोशिश करेगी, जैसा कि पिछली एक और अन्य स्वास्थ्य संबंधी कुंडलिनी पोस्टों में बताया गया है। यदि आदमी फिर भी बच न पाया, तो यह उसे मुक्ति प्रदान करेगी या परलोक यात्रा को तो आसान बनाएगी ही।

कुण्डलिनी को तालु और गले पर विशेष रूप में केन्द्रित करें

वैसे तो कुण्डलिनी को प्रत्येक चक्र पर बारी-बारी से केन्द्रित करना चाहिए, फिर भी तालु चक्र, विशुद्धि चक्र और अनाहत चक्र पर विशेष ध्यान देना चाहिए। कोरोना वायरस का हमला इन्हीं क्षेत्रों पर होता है। कुण्डलिनी को इन क्षेत्रों में केन्द्रित करने से वहां पर सकारात्मक रक्त संचार बढ़ेगा। रक्त संचार के सकारात्मक होने का अर्थ है कि रक्त संचार के साथ कुण्डलिनी भी विद्यमान होगी। वही कुण्डलिनी अद्वैत शक्ति है। शरीर के सूक्ष्म सैनिक उसी अद्वैत शक्ति की सहायता से कीटाणुओं व विषाणुओं के साथ लड़ते हैं, तथा उनका संहार करते हैं। साधारण व्यायाम से रक्त संचार में तो वृद्धि होती है, पर उसमें वह दिव्य कुण्डलिनी शक्ति नहीं होती। तालु चक्र मुख के अन्दर बिलकुल पीछे होता है, जहां पर एक मांस की अंगुली जैसी संरचना नीचे लटकी होती है। वहां पर गला ख़राब होने पर खारिश जैसी भी होती है। विशुद्धि चक्र गर्दन के बिलकुल केंद्र में होता है, जहाँ पर थायरायड ग्रंथि भी होती है। अनाहत चक्र छाती में तथा दोनों स्तनों के बिलकुल बीचोंबीच होता है। विशुद्धि और अनाहत, दोनों ही चक्रों के आगे और पीछे के दो चक्र होते हैं, जो एक सीधी काल्पनिक रेखा से आपस में जुड़े होते हैं। दो-चार दिन के अभ्यास से इन चक्रों का खुद ही पता लगने लगता है। इन चक्रों पर कुण्डलिनी का ध्यान करने से उन पर संकुचन जैसा अनुभव होता है, और एक सरसराहट जैसी संवेदना भी अनुभव होती है। इसका अर्थ है कि वे चक्र क्रियाशील हो गए हैं।

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कुंडलिनी एक शिल्पकार के रूप में कार्य करती है, जो कि खराब मौसम द्वारा उत्पन्न द्वैत को अद्वैत में परिवर्तित करती है, जिससे यह बदलते मिजाज वाले मौसम के हानिकारक प्रभावों (शीतकालीन अवसाद सहित) से हमारी रक्षा करती है

दोस्तों, इस साल मौसम ने आम लोगों को बहुत परेशान किया। कड़ाके की ठण्ड बार-२ हमला करती रही। पर मुझे मेरी कुण्डलिनी ने इस समस्या का ज़रा भी आभास नहीं होने दिया। वास्तव में कोई मौसम खराब नहीं होता। हरेक मौसम में अपनी खूबसूरती होती है। गर्मियों में तनावहीनता, ढीलेपन, हल्केपन व शान्ति का एक अलग ही अहसास होता है। इसी प्रकार सर्दियों में चुस्ती का अहसास होता है। बरसात के मस्तीपने का एक अलग ही अंदाज होता है।

बदलता मौसम शरीर और मन के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है

हमारे शरीर और मन को मौसम के अनुसार अपने आपको ढालने के लिए कुछ दिनों के समय की जरूरत पड़ती है।  वे दिन शरीर और मन के लिए जोखिम भरे होते हैं, क्योंकि उन दिनों में वे पुराने मौसम के अनुसार चल रहे होते हैं, और नए मौसम से सुरक्षा के लिए जरूरी बदलाव उनमें नहीं आए होते हैं। ऐसे जोखिम भरे दिनों में कुण्डलिनी हमें अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान कर सकती है।

मौसम में ऐसे अचानक बदलाव पहाड़ों में बहुत होते हैं। वहां धूप लगने पर एकदम से गर्मी बढ़ जाती है, और ज़रा से बादल के टुकड़े से सूरज के ढक जाने पर एकदम से ठण्ड पड़ जाती है। ऐसा लगातार चलता रहता है। जैसे-२ पहाड़ों की ऊँचाई बढ़ती जाती है, मौसम के बदलाव भी बढ़ते जाते हैं। इसीलिए तो तिब्बत में तांत्रिक योग बहुत कामयाब और लोकप्रिय हुआ, क्योंकि वही एकदम से कुण्डलिनी को चमकाने में सक्षम है।

कुण्डलिनी मौसम के बदलाव से उत्पन्न द्वैत को अद्वैत में बदल देती है

यह तो हम पहले ही सिद्ध कर चुके हैं कि अद्वैत और कुण्डलिनी का चोली-दामन का साथ है। बदलता मौसम उतनी मार शरीर पर नहीं करता, जितनी मन पर करता है। बदलता मौसम खुद भी द्वैत-रूप (अच्छा-बुरा में बंटा हुआ) है, इसलिए वह मन को भी द्वैत से भर देता है। मन अच्छाई और बुराई (प्रकाश और अन्धकार) के बीच में झूलने लगता है। मन के रोगों की जड़ द्वैत ही तो है। और शरीर के रोगों की जड़ बीमार मन ही है।

नियमित कुण्डलिनी योग से अद्वैत लगातार पैदा होता रहता है, जो बदलते मौसम से पैदा द्वैत को मन पर हावी नहीं होने देता। यहाँ तक कि बदलते मौसम के द्वैत को भी अद्वैत में बदल कर प्रचंड अद्वैत पैदा करता है। वास्तव में द्वैत से ही अद्वैत निर्मित होता है, केवल कुण्डलिनी के रूप में कुशल कारीगर की जरूरत होती है। इसीलिए तो मानव इतिहास के शुरू से ही लोग योग साधना के लिए पहाड़ों का रुख करते आ रहे हैं। यह इसलिए, क्योंकि वहां बहुत द्वैत होता है, जिसे  कुण्डलिनी-मिस्त्री अद्वैत में बदल देता है।   

कुंडलिनी सर्दियों के अवसाद के खिलाफ प्रभावी उपकरण है

विशेष रूप से सुबह के समय उज्ज्वल प्रकाश का अभाव सर्दियों के अवसाद को उत्पादन करता है। कुंडलिनी का जब सुबह-सुबह ध्यान किया जाता है, तब मन में चेतना की तीव्र उज्ज्वल रोशनी पैदा होती है। यह अवसाद को रोकता है, और पहले से पैदा हुए सर्दियों के अवसाद को ठीक करता है।

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कुण्डलिनी ही तांत्रिक सैक्सुअल योग के माध्यम से इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना नाड़ियों; चक्रों, और अद्वैत को उत्पन्न करती है।

सभी मित्रों को शिवरात्रि पर्व की बहुत-2 बधाइयां । यह तांत्रिक पोस्ट तंत्र के आदिदेव भगवान शिव व तंत्र गुरु ओशो को समर्पित है।

प्रमाणित किया जाता है कि इस तांत्रिक वैब पोस्ट में किसी की भावना को ठेस पहुंचाने का प्रयास नहीं किया गया है। इसमें तांत्रिक वैबसाइट के अपने स्वतंत्र विचार जनहित में प्रस्तुत किए गए हैं। हम यौनिहिंसा की पुरजोर खिलाफत करते हैं।

कुण्डलिनी ही सबकुछ है। उसी का ध्यान जब शरीर के विशेष बिन्दुओं पर किया जाता है, तब वे बिंदु चक्र कहलाते हैं। उसी को गति देने से जब काल्पनिक मार्ग  बनते हैं, तब वे भी नाड़ियाँ कहलाते  हैं। उसी का ध्यान करने से अद्वैत स्वयं उत्पन्न होता है। इसी तरह अद्वैत का ध्यान करने से कुण्डलिनी स्वयं ही मन में प्रकट हो जाती है।

हमारी रीढ़ की हड्डी में दो आपस में गुंथे हुए सांप बहुत से धर्मों में दिखाए गए हैं। बीच में एक सीधी नाड़ी होती है।

आपस में गुंथे हुए दो नाग यब-युम आसन में जुड़े हुए दो तांत्रिक प्रेमी हैं

जैसा कि आप नीचे दिए गए चित्रों में देख पा रहे हैं। एक नाग पुरुष है, और दूसरा नाग स्त्री है। यह पहले भी हमने बताया है कि मनुष्य का समग्र रूप उसके तंत्रिका तंत्र में ही है, और वह फण उठाए हुए नाग की शक्ल से मिलता-जुलता है। हमारे तंत्रिका  तंत्र का मुख्य भाग मस्तिष्क समेत पीठ (मेरुदंड) में  होता है। इसीलिए हमारी पीठ फण उठाए नाग की तरह दिखती है। क्योंकि कुण्डलिनी (संवेदना) इसी नाग के शरीर (तंत्रिका तंत्र) पर चलती है, इसलिए जिस किसी और रास्ते से भी जब  कुण्डलिनी चलती है, तो अधिकांशतः उस रास्ते को भी नाग का रूप दिया जाता है। वास्तव में  एक नाग एक तांत्रिक प्रेमी की पीठ को रिप्रेसेन्ट करता है, और दूसरा नाग दूसरे तांत्रिक प्रेमी की पीठ को। पुरुष प्रेमी स्त्री के मूलाधार चक्र से कुण्डलिनी का ध्यान शुरू करता है।  फिर वह कुण्डलिनी को सीधा पीछे लाकर अपने मूलाधार पर स्थापित करता है। इस तरह से दोनों  प्रेमियों के मूलाधार आपस में जुड़ जाते हैं, और एक केन्द्रीय नाड़ी का शाक्तिशाली मूलाधार चक्र बनता है, जिसे चित्र में क्रोस के चिन्ह से मार्क किया गया है। वह केन्द्रीय नाड़ी बीच वाले सीधे दंड के रूप में  दिखाई  गई है, जिसे सुषुम्ना कहते हैं। पुरुष नाग को पिंगला, व स्त्री नाग को इड़ा कहा गया है। फिर पुरुष प्रेमी कुण्डलिनी को ऊपर चढ़ा कर  अपने स्वाधिष्ठान चक्र पर स्थापित करता है। वहां  से वह उसे सीधा आगे ले जाकर स्त्री के स्वाधिष्ठान पर स्थापित करता है। इस तरह से सुषुम्ना का स्वाधिष्ठान भी क्रियाशील  हो जाता है। फिर वह उसे स्त्री के स्वाधिष्ठान से ऊपर चढ़ा कर उसीके मणिपुर चक्र पर स्थापित करता है। उससे इड़ा का मणिपुर सक्रिय हो जाता है। वहां से उसे सीधा पीछे ले जाकर अपने मणिपुर चक्र पर स्थापित करता है। उससे पिंगला का मणिपुर भी सक्रिय हो जाता है। दोनों नाड़ियों के मणिपुर चक्रों के एकसाथ क्रियाशील होने से सुषुम्ना का मणिपुर चक्र स्वयं ही क्रियाशील हो जाता है। इस तरह से यह क्रिया ऐसी ही सहस्रार चक्र तक चलती है। स्त्री प्रेमी भी इसी तरह कुण्डलिनी को चलाती है। इस तरह से दो नाग आपस में गुंथे हुए और ऊपर की ओर जाते हुए प्रतीत होते हैं, तथा सुषुम्ना के माध्यम से सहस्रार तक पहुँच जाते हैं।

कैड्यूसियस का चिन्ह (symbol of caduceus) भी तांत्रिक यौनयोग को ही रेखांकित करता है

इस चिन्ह में दो सांप आपस में इसी तरह गुंथे हुए होते हैं। उनके बीच में एक सीधा स्तम्भ होता है, जिसके शीर्ष पर पंख लगे होते हैं। वास्तव में वे पंख कुण्डलिनी के सहस्रार की तरफ जाने का इशारा करते हैं। वैसे भी जागरण के समय कुण्डलिनी फरफराहट के साथ व ऊपर की ओर भारी दबाव के साथ उड़ती हुई महसूस होती है। वह स्तम्भ नीचे की तरफ टेपर करता है। इसका अर्थ है कि ऊपर चढ़ते हुए कुण्डलिनी  अधिक शक्तिशाली होती जाती है।

अपने ही शरीर में दो लिपटे हुए नाग अपने ही शरीर के तंत्रिका तंत्र के सिम्पैथेटिक व पैरासिम्पैथेटिक भागों की संतुलित हिस्सेदारी को भी इंगित करते हैं

इड़ा को पैरासिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम कह सकते हैं। वह ल्यूनर, शांत, पेसिव, व फैमिनाइन है। पिंगला नाड़ी को सिम्पैथेटिक नर्वस सिस्टम कह सकते हैं। वह सोलर, भड़कीला, एक्टिव, व मैस्कुलाइन है। जब दोनों सिस्टम बराबर मात्रा में आपस में मिले हुए होते हैं, तब जीवन में संतुलन व अद्वैत छा जाता है। वैसी स्थिति में भी कुण्डलिनी विकसित होने लगती है, क्योंकि हमने पहले भी कहा है कि अद्वैत के साथ कुण्डलिनी हमेशा ही रहती है। 

(केवल प्रतीकात्मक चित्र)
(केवल प्रतीकात्मक चित्र)

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कुण्डलिनी से लेखक की लेखन कला/कौशल, व्यक्तित्व, अनुभव, मस्तिष्क व सम्पूर्ण स्वास्थ्य का विकास

दोस्तों, लिखना आसान है, पर लिखी हुई बात का पाठकों के दिलो-दिमाग पर राज करना आसान नहीं है। लिखी हुई बातें जरूरतमंद लोगों तक पहुंचनी चाहिए। यदि वे गैर जरूरतमंद लोगों के पास पहुँचती हैं, तो उनसे लाभ की बजाय नुक्सान ही है। वैसे लोग उनको पढ़ने के लिए केवल अपना समय ही बर्बाद करेंगे। कई बार तो वैसे लोग उलटी शिक्षा भी ले लेते हैं। इससे लेखक का भी नुक्सान होता है। एक लेखक की किस्मत पाठकों के हाथ में होती है। इसलिए हमेशा अच्छा ही लिखना चाहिए। वैसा लिखना चाहिए, जिससे सभी लोगों को लाभ मिले। यदि केवल एक आदमी भी लेखन से लाभ प्राप्त करे, तो वह भी लाखों केजुअल पाठकों से बेहतर है। इसलिए एक लेखक को ज्यादा पाठकों की आकांक्षा नहीं करनी चाहिए, बल्कि जरूरतमंद और काबिल पाठकों की ख्वाहिश रखनी चाहिए। इसीलिए प्राचीन समय में कई गुरु केवल एक ही आदमी को अपना शिष्य बनाते थे, और उसे अपने समान पूर्ण कर देते थे। मैंने अपने कोलेज टाईम में चिकित्सा विज्ञान के ऊपर आध्यात्मिक शैली में एक लेख लिखा था। जाहिर है कि उसके सभी पाठक चिकित्सा विज्ञान से जुड़े हुए थे। उसे इवल 100-200 पाठकों ने पढ़ा। मुझे नहीं पता कि उससे उन्हें क्या लाभ मिला। पर इतना जरूर अंदाजा लगता हूँ कि वे जरूरतमंद व काबिल थे, इसलिए उन्हें उससे उन्हें जरूर लाभ मिला होगा। मैं भी उन पाठकों की तरह ही उस लेख के लिए जरूरतमंद और काबिल था, इसीलिए मुझे भी लाभ मिला। इसका मतलब है कि लेखक पहले अपने लिए लिखता है, अपनी जरूरत को पूरा करने के लिए लिखता है। बाद में उससे पाठकों की जरूरत पूरी होती है। अगर अपनी ही जरूरत पूरी नहीं होगी, तो पाठकों की जरूरत कैसे पूरी होगी।ब्लाक। मुझे तो उसे लिखने से बहुत से लाभ मिले। उससे मेरे जीवन की दिशा और दशा बदल गई। मेरा जीवन सकारात्मक, जोशीला, मेहनती व लगन वाला बन गया। इससे लगता है कि उस लेख से पाठकों को बहुत फायदा हुआ होगा। वह इसलिए, क्योंकि लेखक पाठकों का दर्पण होता है। उसमें पाठकों की ख़ुशी भी झलकती है, और गम भी। इसलिए अच्छा और फायदेमंद ही लिखना चाहिए।

कुण्डलिनी से फालतू दिमागी शोर थमता है, जिससे लाभपूर्ण विचारों के लिए मस्तिष्क में नई जगह बनती है

कुण्डलिनी पर ध्यान केन्द्रित करने से मस्तिष्क की फालतू शक्ति कुण्डलिनी पर खर्च हो जाती है। इससे वह विभिन्न प्रकार के फालतू विचारों को बना कर नहीं रख पाती। यदि वैसे विचार बनते भी हैं, तो वे बहुत कमजोर होते हैं, जिन पर कुण्डलिनी हावी हो जाती है। फालतू विचारों के थमने से मस्तिष्क में नए, सुन्दर, व्यावहारिक, अनुभवपूर्ण व रचनात्मक विचारों के लिए जगह बनती है। उन विचारों को जब हम लिखते हैं, तो बहुत सुन्दर लेख बनता है।

कुण्डलिनी से लेखक की दिमागी थकान दूर होती है, जिससे नए विचारों के लिए दिमाग की स्फूर्ति पुनः जाग जाती है

लिखने के लिए लेखक को ताबड़तोड़ विचारों का सहारा लेना पड़ता है। वे विचार विभिन्न प्रकार के होते हैं। कुछ नए होते हैं, कुछ पुराने, कुछ बहुत पुराने। उन विचारों की बाढ़ से लेखक अशांत, बेचैन, तनावयुक्त व भ्रमित सा हो जाता है। उसकी भूख-प्यास घट जाती है। उसका रक्तचाप बढ़ जाता है। वह थका-२ सा रहता है। वह चिड़चिड़ा सा हो जाता है। वैसी हालत में कुण्डलिनी योग उसके लिए संजीवनी का काम करता है। कुण्डलिनी उसे एकदम से रिफ्रेश कर देती है, और वह नया लेख लिखने के लिए तैयार हो जाता है।

कुण्डलिनी से लेखक का अपना वह शरीर स्वस्थ रहता है, जो ज्यादातर समय गतिहीन सा रहने से रोगग्रस्त बन सकता है

लेखक को अधिकाँश समय बैठना पड़ता है, तभी वह लिख पाता है। यदि आदमी अपनी जीवनी-शक्ति/प्राण-शक्ति को गतिशील कामों में ज्यादा लगाएगा, तो वह लेखन के लिए कम पड़ जाएगी। वैसे तो लेखक अपना संतुलन बना कर रखते हैं, पर फिर भी कई बार बहुत बैठना पड़ता है। वैसे समय में तो कुण्डलिनी उसके लिए औषधि का काम करती है। वह शरीर के सभी हिस्सों पर रक्त संचार को कायम रखती है, क्योंकि जहाँ कुण्डलिनी है, वहां रक्त-संचार/प्राण-संचार है।

कुण्डलिनी लेखक के द्वारा अक्सर की जाने वाली पाठकों को खोजने वाली अंधी दौड़ पर लगाम लगाती है

कुण्डलिनी मन की इच्छाओं की छटपटाहट पर लगाम लगाती है। उन इच्छाओं में पाठकों को पाने की महत्त्वाकांक्षी इच्छा भी शामिल है। वैसी इच्छाओं से लेखक को बहुत सी परेशानियाँ घेर लेती हैं। कुण्डलिनी आदमी को अद्वैत का बोध करा कर यथाप्राप्त जीवन से संतुष्ट करवाती है। इससे लेखक अपने लेखन के व्यर्थ के प्रचार-प्रसार से भी बचा रहता है। इससे वह अपना पूरा ध्यान अपने लेखन पर लगा पाता है। जिस पाठक को जिस प्रकार के लेख की जरूरत होती है, वह उसे ढूंढ ही लेता है। उसे तो बस मामूली सा इशारा चाहिए होता है।

पाठकों का काम भी लेखक की तरह ही दिमागी होता है। इसलिए उन्हें भी कुण्डलिनी से ये सारे लाभ मिलते हैं। इसी तरह, अन्य दिमागी या शारीरिक काम करने वाले लोगों को भी कुण्डलिनी से ये सारे लाभ मिलते हैं, क्योंकि दिमाग/मन ही सबकुछ है।   

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कुण्डलिनी से रचनात्मक संकल्पों की उत्पत्ति ही भगवान् नारायण (विष्णु) के नाभि कमल से ब्रम्हा (ब्रम्हदेव) की उत्पत्ति बताई गई है

यह प्रमाणित किया जाता है कि हम किसी भी धर्म का समर्थन या विरोध नहीं करते हैं। हम केवल धर्म के वैज्ञानिक और मानवीय अध्ययन को बढ़ावा देते हैं।

दोस्तों, इस हफ्ते मैं कुछ राईटर-ब्लोक को महसूस कर रहा था। फिर हफ्ता ख़त्म होने को आते ही मुझे अपनी मानवीय जिम्मेदारी का अहसास हुआ। हम सभी को अच्छी, सच्ची और वैज्ञानिक बातों का प्रचार-प्रसार करना चाहिए। यह हम सभी का फर्ज है। हिन्दुवाद कोई धर्म नहीं है। यह एक शुद्ध विज्ञान है। यह मानवतावादी विज्ञान है। यह कुण्डलिनी विज्ञान है। यह आध्यात्मिक मनोविज्ञान है। क्योंकि शरीर और संसार मन के ही अधीन हैं, इससे सिद्ध होता है कि हिन्दुवाद एक भौतिक विज्ञान भी है। इसकी अनेक बातें विज्ञान की कसौटी पर खरी उतरी हैं। सैंकड़ों सालों से विभिन्न कट्टर धर्मवादियों व अधर्मवादियों द्वारा इसे नष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है। आज तो वे इसे जड़ से उखाड़ने के लिए चारों और से एकजुट हो गए हैं। इस्लामिक राष्ट्र बनने का तेजी से बढ़ रहा ख़्वाब इसका एक जीता-जागता उदाहरण है। इसी तरह, विभिन्न धर्मों (इसाई धर्म समेत) द्वारा जबरदस्ती या छलपूर्वक धर्मांतरण इसका दूसरा उदाहरण है। भारत में ये दोनों प्रकार के हिन्दूविरोधी वैचारिक अभियान (एजेंडे) हाल के वर्षों में तेजी से बढ़े हैं। हाल ही में शरजिल इमाम (जेएनयू में आईआईटी ग्रेजुएट और पीएचडी स्कोलर) ने अपने भड़काऊ भाषण के बाद पुलिस के सामने बिना पछतावे के ये बातें कबूली भी हैं।  यदि समय रहते हुए हमने हिन्दुवाद को विज्ञान के साथ प्रस्तुत नहीं किया, तो हमारी आने वाली पीढियां इससे वंचित रह सकती हैं।

हिन्दुवाद का सभी कुछ कुण्डलिनी आधारित है। सारा हिन्दुवाद कुण्डलिनी के चारों और घूमता है। कुण्डलिनी ही इसकी धुरी में है। कुण्डलिनी की प्राप्ति के लिए ही पूरा हिन्दुवाद समर्पित है। इसी प्रकार का एक वैज्ञानिक तथ्य है, कुण्डलिनी और ब्रह्मा-विष्णु के बीच का वैज्ञानिक अंतर्संबंध। इसे हम इस पोस्ट में वर्णित करेंगे।

भगवान् विष्णु/नारायण ही कुण्डलिनी के रूप में हैं

जैसे कि मैंने पूर्व में भी वर्णित किया है कि जैसे भगवान् विष्णु शेषनाग पर शयन करते हैं, उसी प्रकार कुण्डलिनी भी तंत्रिका तंत्र (शेषनाग जैसी आकृति वाले) में विराजमान रहती है। नारायण ही कुण्डलिनी हैं, कुण्डलिनी ही नारायण है। दोनों एक ही हैं। अब चाहे उसे सुवर का, मछली का, कछुए का, देवता का, प्रेमी का, गुरु का आदि किसी का भी रूप दिया जाए। वैसे भी नारायण ने ऐसे अनेकों रूपों में अवतार लिया भी है।

रचनात्मक विचार व संकल्प ही भगवान् ब्रह्मा/ब्रह्मदेव के रूप में हैं

यह वेदों में साफ लिखा है कि सृष्टि के मन को ही ब्रह्मा कहते हैं। वह रचनात्मक समष्टि-मन/ब्रह्मांडीय मन, जिसने इस सृष्टि का निर्माण किया है, वही ब्रह्मा है।

कुण्डलिनी से रचनात्मक विचार व संकल्प उत्पन्न होते हैं

जो विचार क्रिया के रूप में प्रकट हो जाएं, वे संकल्प कहलाते हैं। शक्तिशाली विचार को ही संकल्प कहते हैं। एक अकेला व कार्यकारी विचार तभी संकल्प बन सकता है, जब मन में अन्य विचारों का शोरशराबा न हो। मतलब कि जब मन शांत हो। तब मन की शक्ति उस अकेले विचार को लगती है, जिससे वह पुष्ट होकर संकल्प बन जाता है, और रचनात्मक काम को पैदा करता है। मन की शान्ति कुण्डलिनी से ही प्राप्त होती है। यह देखा भी गया है कि बहुत से लोगों की कामयाबी के पीछे कुण्डलिनी ही होती है। किसी गुरु, प्रेमी आदि से प्रेरणा लेकर कामयाबी प्राप्त करने का भी यही अर्थ है कि गुरु आदि की छवि आदमी के मन में लगातार बसी रही। वह चिरस्थायी मानसिक छवि ही तो कुण्डलिनी है। इसका मतलब है कि प्रेरणा से कामयाबी भी कुण्डलिनी के माध्यम से ही मिलती है। ऐसा मैंने खुद अनुभव किया है। वैज्ञानिक तौर से भी सिद्ध हो गया है कि योग (कुण्डलिनी) रचनात्मकता को बढ़ाता है।

कुण्डलिनी की नाभि में ही विचार व संकल्प पैदा होते हैं

नाभि केंद्र को कहते हैं। कुण्डलिनी के ध्यान के साथ विविध नए-पुराने विचार प्रकट होते हैं। उनमें से फालतू विचार शांत हो जाते हैं। उससे लाभदायक विचार ताकतवर बनकर संकल्प बन जाते हैं। इसी प्रकार भगवान् नारायण की नाभि से भगवान् ब्रह्मा (संकल्प-रूप) उत्पन्न होते हुए बताए गए हैं। जब मैं रचनात्मक कामों में व्यस्त रहता था, तब मुझे अपनी कुण्डलिनी से बहुत सहयोग मिलता था। इस प्रकार सिद्ध हो जाता है कि पुराणों में जो भगवान् विष्णु की नाभि से ब्रह्मा की उत्पत्ति बताई गई है, वह कुण्डलिनी से उत्पन्न रचनात्मकता की ही व्याख्या की गई है। ऐसा दोनों मामलों में होता है, क्योंकि जो हमारे शरीर में घटित हो रहा  है, वह सभी कुछ ब्रह्माण्ड में भी वैसा ही घटित हो रहा है।

only indicative image (केवल संकेतात्मक चित्र)

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कुण्डलिनी जागरण केवल तांत्रिक सैक्सुअल योगा/यौनयोग-सहायित कुण्डलिनी योग से ही सभी के लिए प्राप्त करना संभव है

यह तांत्रिक पोस्ट तंत्र के आदिदेव भगववान शिव व तंत्र गुरु ओशो को समर्पित है।

प्रमाणित किया जाता है कि इस तांत्रिक वैब पोस्ट में किसी की भावना को ठेस पहुंचाने का प्रयास नहीं किया गया है। इसमें तांत्रिक वैबसाइट के अपने स्वतंत्र विचार जनहित में प्रस्तुत किए गए हैं। हम यौनिहिंसा की पीड़िताओं के साथ गहरी सम्वेदना प्रकट करते हैं।

यह प्रमाणित किया जाता है कि इस वेबसाईट के अंतर्गत हम सभी किसी भी धर्म का समर्थन या विरोध नहीं करते हैं। हम केवल धर्म के वैज्ञानिक और मानवीय अध्ययन को बढ़ावा देते हैं। यह वैबसाइट तांत्रिक प्रकार की है, इसलिए इसके प्रति गलतफहमी नहीं पैदा होनी चाहिए। पूरी जानकारी व गुणवत्ता के अभाव में इस वेबसाईट में दर्शाई गई तांत्रिक साधनाएं हानिकारक भी हो सकती हैं, जिनके लिए वैबसाइट जिम्मेदार नहीं है।

मित्रो, इस पोस्ट समेत पिछली दोनों पोस्टें कुण्डलिनी विषय की आत्मा हैं। ये तीनों पोस्टें यदि क्रमवार पढ़ी जाएं, तो कुण्डलिनी विषय का विशेषज्ञ बना जा सकता है। अगर तीनों पर अमल भी किया जाए, तब तो कुण्डलिनी जागरण भी प्राप्त किया जा सकता है। इस पोस्ट में मैं यह बताने की कोशिश करूंगा कि कुण्डलिनी जागरण का सबसे आसान, कारगर और शीघ्र फलदायी तरीका क्या है? यौनयोग-सहायित कुण्डलिनी योग ही वह तरीका है।

पिछली पोस्ट में मैंने बताया कि वे छः महत्त्वपूर्ण कारक कौन से हैं, जिनके एकसाथ इकट्ठा होने से कुण्डलिनी जागरण होता है। इस पोस्ट में मैं यह बताऊंगा कि यौनयोग से वे छः कारक कैसे प्रवर्धित/बूस्ट होकर अति शीघ्रता से व आसानी से कुण्डलिनी को जागृत करते हैं।

तांत्रिक सैक्सुअल योगा (यौनयोग) से कुण्डलिनी ध्यान को बल

सैक्सुअल योगा के समय वज्र प्रसारण अपने चरम पर होता है। वज्र में भरपूर रक्त प्रवाहित हो रहा होता है। इससे वज्र-शिखा की संवेदना अपने चरम पर होती है। वज्र-शिखा ही तो वह मूलाधार चक्र है, जिस पर कुण्डलिनी शक्ति का निवास बताया गया है। वास्तव में जब वज्र शिथिल होकर नीचे लटका होता है, तब वज्र शिखा उस बिंदु को छू रही होती है, जिसे मूलाधार चक्र का स्थान बताया गया है। वह स्थान वज्र के आधार व मलद्वार को जोड़ने वाली रेखा के केंद्र में बताया गया है। फिर वज्र-शिखा की तीव्र संवेदना के ऊपर कुण्डलिनी-छवि का आरोपण किया जाता है। दोनों तांत्रिक प्रेमियों के यब-युम/yab-yum में जुड़े होने पर वह वज्र संवेदना लोटस के अन्दर ब्लोक हो जाती है, जिससे वह वीर्यपात के रूप में बाहर नहीं भाग पाती। दोनों एक-दूसरे के शरीर पर आगे और पीछे के चक्रों को हाथों से क्रमवार स्पर्श करके उन पर कुण्डलिनी का ध्यान करते हैं। उसके बाद सम्भोग क्रीड़ा के दौरान वज्र-संवेदना को चरम तक पहुँचाया जाता है। फिर योग-बंधों से उसे ऊपर उठाया जाता है। उससे संवेदना के साथ कुण्डलिनी एकदम से मस्तिष्क को कूद जाती है, और वहां तेजी से जगमगाने लगती है। साथ में वज्र शिथिल हो जाता है। उससे वीर्यपात भी रुक जाता है। ऐसा बार-२ करने से मस्तिष्क में कुण्डलिनी जीवंत जैसी हो जाती है। इसे प्राणोत्थान या कुण्डलिनी-उत्थान भी कहते हैं। इसी तरह, मिस्र वाली अन्खिंग विधि का भी प्रयोग किया जा सकता है। महिला में वज्र का काम क्लाईटोरिस करता है, क्योंकि वहीं पर सबसे बड़ी यौन-संवेदना पैदा होती है। बाकि अन्य काम महिला में पुरुष के समान ही किया जाता है। महिला में भी क्लाईटोरिस की संवेदना को चरम तक पहुंचा कर ऊपर चढ़ाया जाता है। उससे संवेदना के ऊपर आरोपित कुण्डलिनी भी ऊपर चढ़ जाती है। उससे रजोपात भी रुक जाता है, और पूर्ण यौन तृप्ति भी मिल जाती है।

तांत्रिक सैक्सुअल योग (यौनयोग) से प्राणों को बल

यह पहले से ही सिद्ध है कि कुण्डलिनी के साथ प्राण भी विद्यमान रहते हैं। यौनयोग से जब वज्र पर कुण्डलिनी प्रचंड हो जाती है, तब वहां प्राण भी खुद ही प्रचंड हो जाते हैं। जब उस कुण्डलिनी को सभी चक्रों तक ले जाया जाता है, तब प्राण भी खुद ही सभी चक्रों तक चले जाते हैं।

तांत्रिक सैक्सुअल योगा (यौनयोग) से इन्द्रियों की अंतर्मुखता को बल

सैक्सुअल योगा से पूरे शरीर में प्राणों का संचार हो जाता है। इससे शरीर व मन, दोनों स्वस्थ हो जाते हैं। इससे स्वस्थ विचार पैदा होते हैं, जिससे आनंद की अनुभूति होती है। इससे आदमी अपने तन-मन से ही संतुष्ट रहता हुआ बाहरी जगत के प्रति अनासक्त हो जाता है। इसी अनासक्ति को ही तो अंतर्मुखता कहते हैं। वह जरूरत के हिसाब से दुनियादारी चलाता तो है, पर उसमें उसके प्रति फालतू की छटपटाहट/क्रेविंग नहीं रहती। साथ में, यौनयोग से प्रचंड बने हुए उसके प्राण भी उसे दुनिया में निर्लिप्त रहने में मदद करते हैं।

तांत्रिक सैक्सुअल योगा (यौनयोग) से वीर्यशक्ति को बल

यदि सम्भोग ही नहीं किया जाए, तो वीर्य कैसे उत्पन्न होगा। यदि वीर्य ही उत्पन्न न होए, तो उसकी शक्ति कैसे प्राप्त की जा सकती है। इसका अर्थ है कि केवल सैक्सुअल योग से ही वीर्यशक्ति पैदा होती है, और वह कुण्डलिनी को प्राप्त होती है। साधारण सम्भोग से तो वीर्यशक्ति की बर्बादी होती है, और सम्भोग ही न करने से वीर्यशक्ति पैदा ही नहीं होती।

तांत्रिक सैक्सुअल योगा (यौनयोग) से ट्रिगर को बल

सैक्सुअल योगा से ट्रिगर के लिए संवेदनात्मकता/सेंसिटिविटी बहुत बढ़ जाती है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि सैक्सुअल योगा से मस्तिष्क में कुण्डलिनी पहले से ही बहुत मजबूत बनी होती है। उसे मामूली सी ट्रिगर चाहिए होती है। इसलिए हलकी सी व साधारण सी ट्रिगर भी काम कर जाती है।

उपरोक्त सभी छह कारकों के एकसाथ इकट्ठा होने से उत्पन्न कुण्डलिनी-जागरण (जिन्हें यौनयोग/सैक्सुअल योगा से प्रवृद्ध किया गया) के वास्तविक समय के अनुभव को पढ़ने के लिए निम्नलिखित लिंक पर जाएं।

प्रेमयोगी वज्र अपनी उस समाधि(कुण्डलिनीजागरण/KUNDALINI AWAKENING) का वर्णन अपने शब्दों में इस प्रकार करता है

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कुण्डलिनी की प्राप्ति के लिए आवश्यक छह महत्त्वपूर्ण कारक- आध्यात्मिक जागरण सभी के लिए संभव है!

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दोस्तों, मैंने पिछली पोस्ट में लिखा था कि कुण्डलिनी जागरण को अपनी इच्छा से प्राप्त नहीं किया जा सकता। परन्तु ऐसा भी नहीं है। यदि दृढ़ निश्चय से व सही ढंग से प्रयास किया जाए, तो उसे अपनी इच्छा से भी प्राप्त किया जा सकता है। कुण्डलिनी जागरण एक अजीबोगरीब घटना है। यह सबसे साधारण भी है, और साथ में सबसे जटिल भी। इसे अपनी इच्छा से भी प्राप्त किया जा सकता है, और नहीं भी। इसे अपने प्रयास से प्राप्त भी किया जा सकता है, और नहीं भी। परिस्थिति के अनुसार इसमें विभिन्न विरोधी भावों का समावेश प्रतीत होता है।

आज हम बताएंगे कि कुण्डलिनी जागरण के लिए किन पांच चीजों का एकसाथ इकट्ठा होना जरुरी है।

कुण्डलिनी जागरण के लिए कुण्डलिनी ध्यान का महत्त्व

कुण्डलिनी ध्यान कुण्डलिनी जागरण के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण कारक है। कुण्डलिनी चित्र मन में स्पष्टता, आनंद, और अद्वैत के साथ बना होना चाहिए। वास्तव में कुण्डलिनी से आदमी में सभी मानवीय या आध्यात्मिक गुण स्वयं ही प्रकट हो जाते हैं। इन गुणों का आकलन करके भी यह पता लगाया जा सकता है कि कुण्डलिनी ध्यान कितना मजबूत है। ऐसा भी नहीं है कि योगसाधना से ही कुण्डलिनी का ध्यान होता हो। वास्तव में अद्वैत भावना (कर्मयोग) से पैदा होने वाला कुण्डलिनी ध्यान ज्यादा व्यावहारिक, ज्यादा मजबूत और ज्यादा मानवीय होता है।

अलग-२ चक्रों पर कुण्डलिनी-ध्यान करने से सभी चक्र भी मजबूत हो जाते हैं। फिर जब तांत्रिक प्रक्रिया से कुण्डलिनी को सभी चक्रों से गुजारते हुए मस्तिष्क तक उठाया जाता है, तब चक्रों की शक्ति भी स्वयं ही मस्तिष्क में पहुँच जाती है। इस तरह से हम कह सकते हैं कि चक्रों की शक्ति कुण्डलिनी जागरण के लिए छटा महत्त्वपूर्ण कारक है।

कुण्डलिनी जागरण के लिए प्राणों का महत्त्व

प्राण शक्ति (शारीरिक व मानसिक शक्ति) का ही पर्यायवाची रूप है। जैसे शक्ति के बिना कोई भौतिक कार्य संभव नहीं होता है, उसी तरह कुण्डलिनी जागरण भी प्राणों की मजबूती के बिना संभव नहीं है। कमजोर, सुस्त व बीमार आदमी को कुण्डलिनी जागरण की प्राप्ति नहीं हो सकती।

कुण्डलिनी और प्राण साथ-साथ रहते हैं। जब योग साधना से कुण्डलिनी को शरीर के निचले चक्रों से मस्तिष्क को चढ़ाया जाता है, तब उसके साथ प्राण भी अपने आप ऊपर चढ़ जाते हैं। यदि शरीर में प्राणों की कमी होगी, तो मस्तिष्क में पहुँच कर भी कुण्डलिनी कमजोर जैसी बनी रहेगी, और जागृत नहीं हो पाएगी।

कई लोग मानते हैं कि आराम से बैठकर, और खा-पी कर हमारे शरीर में प्राण शक्ति इकट्ठी हो जाएगी। परन्तु ऐसा नहीं है। यदि ऐसा होता, तो सभी बड़े-२ सेठ कब के कुण्डलिनी जागरण प्राप्त कर चुके होते। प्राण वास्तव में शरीर और मन की क्रियाशीलता, सामाजिकता, अद्वैत व मानवता से ही संचित होते हैं। इसीलिए तो पुराने समय में राजा लोग कई वर्षों तक सर्वोत्तम विधि से राज-काज चलाने के बाद एकदम से वनवास को चले जाया करते थे। उससे उनकी पुरानी क्रियाशीलता से मजबूत बने हुए प्राण उनकी कुण्डलिनी को शीघ्र ही जागृत कर दिया करते थे।

प्रेमयोगी वज्र के साथ भी ऐसा ही हुआ था। उपरोक्त प्रकार की भरपूर दुनियादारी के बाद वह योग साधना करने के लिए एकांत में चला गया। वहां उसकी संचित प्राण शक्ति उसकी कुण्डलिनी को लग गई, और वह जागृत हो गई।

कुण्डलिनी जागरण के लिए इन्द्रियों की अंतर्मुखता का महत्त्व

यदि इन्द्रियों का मुंह बाहर की ओर खुला रहेगा, तो संचित प्राण बाहर निकल जाएंगे। इससे वे कुण्डलिनी को जागृत नहीं कर पाएंगे। अंतर्मुखता का मतलब गूंगे-बहरे बनना नहीं है। इसका अर्थ तो बाहरी दुनिया में कम से कम उलझना है।

प्रेमयोगी वज्र भी जब दुनियादारी से दूर होकर एकांत में योग साधना करने लगा, तब वह अपने गुजारे लायक ही बहिर्मुखी रहने लगा, जरूरत से ज्यादा नहीं। वैसे तंत्र ने भी उसकी काफी सहायता की। उसकी जो शक्ति दुनियादारी में बर्बाद हो जाती थी, वह उसकी तांत्रिक जीवन पद्धति से पूरी हो जाती थी। अपनी उस तंत्र-संवर्धित प्राण शक्ति से वह कुण्डलिनी व योग के बारे में गहरा अध्ययन करता था, योग करता था, हलके-फुल्के भ्रमण करता था, और हलके-फुल्के काम करता था। फिर भी उसमें काफी प्राण शक्ति शेष बची रहती थी, जो उसकी कुण्डलिनी को जगाने में काम आई।

कुण्डलिनी जागरण के लिए वीर्य शक्ति का महत्त्व

वीर्य शक्ति तंत्र का प्रमुख आधार है। वीर्य शक्ति के बिना कुण्डलिनी को जागरण के लिए अपेक्षित मुक्तिगामी वेग (escape velocity) प्राप्त नहीं होता। तांत्रिक साधना के माध्यम से वीर्य शक्ति को आधार चक्रों से ऊपर उठाकर मस्तिष्क तक पहुँचाया जाता है। वीर्यशक्ति के साथ प्राण भी ऊपर चला जाता है। वीर्य शक्ति के नाश के साथ बहुत सा प्राण भी नष्ट हो जाता है। वीर्य शक्ति के बचाव से प्राण का बचाव हो जाता है, जो तंत्र के माध्यम से मस्तिष्क स्थित कुण्डलिनी को प्रदान कर दिया जाता है।

कुण्डलिनी जागरण के लिए एक ट्रिगर का महत्त्व

यदि उपरोक्त सभी अनुकूल परिस्थितियाँ मस्तिष्क में मौजूद हों, पर साथ में यदि एक मानसिक झटका/ट्रिगर न मिले, तो भी कुण्डलिनी जागरण नहीं होता। मैं उस ट्रिगर को एक उदाहरण से समझाता हूँ। मान लो कि दो गुरुभाई कुण्डलिनी योगी हों, और दोनों अलग-२ जगहों पर अपने गुरु के रूप की कुण्डलिनी का ध्यान कर रहे हों। फिर वे वर्षों बाद अचानक किसी मेले/समारोह आदि में आपस में प्यार से मिलें, तो वह मुलाक़ात उन दोनों के लिए एक ट्रिगर का काम करेगी। उससे उन दोनों का ध्यान अपने गुरु पर जाएगा, जिससे पहले से उनके मन में बसी हुई गुरु के रूप की कुण्डलिनी प्रचंड होकर एकदम से जागृत हो जाएगी। यदि उस ट्रिगर में सैक्सुअल अंश भी हो, तो वह और ज्यादा मजबूत बन जाती है।

उपर चडकर हरेक चक्र क्रमवाईझ पांच से छे मास की अंतराल पे एक-एक चक्र का वेधन करते करते मस्तक मे एकठी हो जाएगी अब ये टाईम पे मस्तक मे कुल तीन प्रकार की एकरुप होती है. (1):- प्राण-अपान की उर्जा, (2):- दशेय ईन्द्रियाकी शक्ति की उर्जा, (3):- कुंडलीनी शक्ति की उर्जा .ये तीनो शक्तियां की उर्जा जब मस्तक मे एकरुप एकत्रित होकर बहती है तब मानव को गाढ ध्यान लग जाता है…….

कुण्डलिनी जागरण भाग-4

उपरोक्त सभी छह कारकों के एकसाथ इकट्ठा होने से उत्पन्न कुण्डलिनी-जागरण के वास्तविक समय के अनुभव को पढ़ने के लिए निम्नलिखित लिंक पर जाएं।

प्रेमयोगी वज्र अपनी उस समाधि(कुण्डलिनीजागरण/KUNDALINI AWAKENING) का वर्णन अपने शब्दों में इस प्रकार करता है

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