कुंडलिनी योग उन्नत अनुभूति को बेसिक कॉग्निशन मतलब बुनियादी अनुभूति में बदलता है

दोस्तों, आदमी एक उन्नत प्राणी है। इसमें उन्नतम कॉग्निशन विद्यमान है। पर उन्नत कॉग्निशन का एक दुष्प्रभाव यह है कि इससे आसक्ति पैदा हो जाती है, जिससे आदमी इससे बंध जाता है। यह ऐसे ही है जैसे जीवन रक्षक दवा सबसे ज्यादा मददगार भी होती है, पर उसका दुष्प्रभाव भी सबसे ज्यादा होता है।

हमारे शरीर की सभी कोशिकाओं में बेसिक कॉग्निशन अर्थात बुनियादी अनुभूति होती है। इसी तरह सभी निम्नतम और सूक्ष्मतम जीवों में भी बेसिक कॉग्निशन होती है। ये सभी, वातावरण के अनुसार अपने को ढालते हैं। जीवित रहने के लिए हमारी तरह ही जीवनचर्या करते हैं। नई चीजें सीखते हैं, और पुरानी चीजों को याद रखते हैं। पर इसके लिए उनमें दिमाग जैसी संरचना नहीं देखी गई है, अभी तक। मतलब कि वे विभिन्न व अनगिनत रासायनिक क्रियाओं की श्रृंखलाओं से नियंत्रित होते हैं। तो क्यों ना उन रासायनिक क्रियाओं को ही उनका दिमाग मान लें। हमारा दिमाग भी तो रासायनिक क्रियाओं से ही चलता है। हो सकता है कि पत्थर, हवा जैसे निर्जीव पदार्थों में भी इससे कमतर स्तर की बेसिक कॉग्निशन हो, जिसे विज्ञान अभी तक समझ नहीं पाया हो। हवा का प्रवाह वातावरण के दबाव से नियंत्रित होता है। तो क्यों ना वायुदाब को हवा का बेसिक कॉग्निशन माना जाए। इसी तरह हर बार एक खास वायुदाब पर हवा की एक खास प्रतिक्रिया होती है। तो क्यों ना इसे वायुदाब की स्मरणशक्ति माना जाए। बेसिक कॉग्निशन के साथ अच्छे और बुरे की भावना नहीं होती। जैसे कि किसी स्थान पर कम वायुदाब होने से हवा का वहां पर प्रविष्ट होना हवा को अच्छा अनुभव नहीं देता। ना ही वहां उच्च वायुदाब होने पर वहां से हवा का रुखसत होना हवा को बुरा अनुभव देता है। इसी तरह जीवाणु को भोजन का कण प्राप्त होने पर खुशी नहीं होती और शत्रु का सामना होने पर उसे दुख नहीं होता। मतलब कि बेसिक कॉग्निशन के साथ राग, द्वेष नहीं होता। वहीं पर उच्च कोगनिशन में वह बीच वाली समान अवस्था राग और द्वेष में बदल जाती है। वैसे ही जैसे एक न्यूट्रॉन एक पॉजिटिव प्रोटॉन और एक नेगेटिव इलेक्ट्रॉन में रूपांतरित हो जाता है। जब दोनों को मिलाया जाए तो फिर से न्यूट्रल न्यूट्रॉन बन जाता है। प्लस और माइनस के चार्ज को अलग-अलग रहते नष्ट नहीं किया जा सकता। यह दोनों तभी नष्ट होंगे, जब आपस में मिलेंगे। इसी तरह हम राग को और द्वेष को अलग, अलग रखकर खत्म नहीं कर सकते। अगर राग और द्वेष को आसक्ति से बनाकर रखेंगे, तो ये अलग-अलग बने रहेंगे और मजबूत होते रहेंगे। जब राग पैदा होगा तो कहीं न कहीं द्वेष भी जरूर पैदा होगा, क्योंकि ये भी विद्युत चार्ज की तरह जोड़ों में पैदा होते हैं, अकेले नहीं। अनासक्ति ही वह सरकट है, जो पॉजिटिव राग और नेगेटिव द्वेष को आपस में जोड़ कर दोनों को खत्म कर देती है। पॉजिटिव को यांग कह लो, और नेगेटिव को यिन कह लो। इनका मिलन ही बहुचर्चित संगम है, अद्वैत है।

कॉग्निशन का विकास एक आवश्यक बुराई की तरह है। जब आदमी केवल हवा, पानी या सूक्ष्म जीव के रूप में था, तब तक उसमें बेसिक कॉग्निशन थी। उसमें न राग था, न द्वेष था। वह तटस्थ होता था। वह न सुखी था, न दुखी था। पर जैसे-जैसे कॉग्निशन विकसित हुई, उसे अच्छे और बुरे का अनुभव होने लगा। इससे उसमें सुख-दुख की उत्पत्ति हुई। जीवन, मरण की उत्पत्ति हुई। पहले ना वह जीता था, ना मरता था। शायद यही वह अनिर्वचनीय मुक्ति है, जिसे पाने की बात वेदों में कही गई है। उसमें ना प्रकाश था, न अंधकार था। मतलब उसमें कुछ भी द्वंद्व नहीं थे। उस स्थिति को ऐसे भी समझ सकते हैं कि उस स्थिति में सब द्वंद्व एकसाथ थे। न्यूट्रॉन में प्रोटोन और इलेक्ट्रॉन दोनों होते हैं, फिर भी दोनों ही नहीं होते। इसी तरह कहते हैं कि परमात्मा में सब कुछ है भी और नहीं भी है।

अब जो वेदों में ब्रह्मांड का वर्णन मानव समाज के जैसा है, और उसमें विभिन्न चेतन देवताओं और राक्षसों आदि का वर्णन भी बिल्कुल मानव समाज के लोगों की की तरह ही है, वह दरअसल बेसिक कॉग्निशन की तरफ लौटने का प्रयास ही लगता है। इसी तरह तंत्र आधारित शरीर विज्ञान दर्शन में जो शरीर का वर्णन ब्रह्मांड और मानव समाज की तरह है, वह भी उसी आदिम बेसिक कॉग्निशन को प्राप्त करने का प्रयास है। दोनों की थीम एक ही है, पर शरीरविज्ञान दर्शन ज्यादा समकालीन और वैज्ञानिक लगता है। हालांकि दोनों ही तरीके एकदूसरे का साथ होने पर ज्यादा अच्छे से काम करते हैं। एक पिछली पोस्ट के अनुसार कुंडलिनी योग से शरीर विज्ञान दर्शन पुष्ट होता है। इसका मतलब है कि कुंडलिनी योग से आधारभूत अर्थात शुद्ध अनुभूति पुष्ट होती है।

तो क्या हम केवल इलेक्ट्रॉन और प्रोटॉन का ही अस्तित्त्व मानेंगे, न्यूट्रॉन का नहीं? मतलब कि क्या हम केवल उन्नत जीवों में ही चेतना का अस्तित्त्व मानेंगे, निम्न जीवों में और जड़ पदार्थों में नहीं? मतलब साफ है कि सृष्टि में ऐसे कोई समय, स्थान और पदार्थ नहीं हैं, जिनमें चेतना नहीं है।

कुंडलिनीयोग डार्क मैटर को डार्क एनर्जी में बदलता है

दोस्तो, पिछली पोस्ट में बात हो रही थी कि डार्क एनर्जी मुक्त होने के लिए बाहर भागती है, और डार्क मैटर बंधन में पड़ने के लिए अंदर को सिमटता है। इसलिए योग करना चाहिए ताकि डार्क एनर्जी का अंश मन में ज्यादा बना रहे, और आदमी की मुक्ति की संभावना ज्यादा बनी रहे, अंधेरे को पूरी तरह से तो खत्म नहीं किया जा सकता। साथ में कुल मिलाकर यह निष्कर्ष भी निकलता है कि ब्रह्मांड के अनगिनत ब्लैकहोल धरती के अनगिनत जीवों की तरह हैं। जैसे हरेक जीव के अंदर एक भरापूरा सूक्ष्म ब्रह्मांड है, उसी तरह हरेक ब्लैकहोल के अंदर एक भरापूरा स्थूल ब्रह्मांड है। इस तरह एक ही अनंत आकाश में अनगिनत ब्रह्मांड हैं। जैसे विभिन्न जीवों के मस्तिष्क के भीतर अलग अलग आकार व प्रकार के सूक्ष्म ब्रह्मांड हैं, इसी तरह अलग अलग ब्लैकहोलों के अंदर अलग अलग आकार व प्रकार के स्थूल अर्थात भौतिक ब्रह्मांड हैं।
ब्लैकहोल अपने अंधेरे से ऊब कर बाहर के चमकीले पिंडों को खाने लगता है, ताकि उसके अंदर की चमक बढ़ सके। पर क्षणिक चमक के बाद वह पिंड उसके अंधेरे में प्रविष्ट होकर उस अंधेरे को बढ़ाते ही हैं। कभी लंबे समय तक ब्लैकहोल को कुछ खाने को न मिले, तो वह सूक्ष्मरूप हॉकिंस रेडिएशनस को धीरे धीरे छोड़ते हुए मूल आकाश में विलीन होकर मुक्त भी हो जाता है।

जीव या आदमी भी तो इसी तरह का व्यवहार करता है। वह अपने मन के अंधेरे को कम करने के लिए विभिन्न इंद्रियों के माध्यम से बाहर की दुनिया को ग्रहण करता है। आंखों से दृष्य रूप में, कानों से श्रव्य रूप में, जीभ से स्वाद रूप में, व जननेन्द्रिय से संभोग रूप में दुनिया को ग्रहण करता है। थोड़ी देर तो उसे आनंद के साथ प्रकाश महसूस होता है, पर वह दुनिया भी उसके अंतर्मन के घनघोर अंधेरे में विलीन होकर उसे बढ़ाने का ही काम करती है। शास्त्रों में भी तो यही बारबार कहा गया है कि आदमी जितना भी प्रयास भौतिक सुख प्राप्त करने के लिए करता है, वह उतना ही दुखी होता जाता है। फिर कभी वह दुनियादारी की मोहमाया से बचकर योगाभ्यास करता है। इससे उसके मन का कचरा बाहर निकलता रहता है, जिससे वह कभी काफी साफ होकर मुक्त भी हो ही जाता है।

हो सकता है कि हमारा ब्रह्मांड किसी दूसरे बहुत बड़े ब्रह्मांड के अंदर बहुत बड़े ब्लैकहोल के अंदर बना हो। हमारे ब्रह्मांड में भी जितने ब्लैकहोल हैं, उनमें भी उनके अपने आकार और निगले गए पदार्थों के अनुरूप अलग अलग आकार प्रकार के ब्रह्मांड हैं ही। उनके अंदर भी जो ब्लैकहोल हैं, उनमें भी अलग ब्रह्मांड हैं। इस तरह यह परंपरा बहुत सूक्ष्म आकार के ब्लैकहोल और सूक्ष्म ब्रह्मांड तक जा सकती है, या हो सकता है कि यह परंपरा कहीं खत्म ही न होती हो। पर ब्लैकहोल बनने के लिए तारे का निश्चित द्रव्यमान होना चाहिए। हो सकता है कि दूसरे ब्रह्मांड में वह सीमा और हो या छोटी हो। हमारे ब्रह्मांड की सीमा ब्लैकहोल की बाउंड्री है, इसके बाहर हम नहीं देख सकते क्योंकि उसके बाहर से जो प्रकाश की किरण आती है वह फ्रीली नहीं आती बल्कि ब्लैकहोल की ग्रेविटी के आकर्षण से आती है, इसलिए वह ऐसी अदृश्य तरंग के रूप मे हो सकती है जिसे अभी तक देखा न गया हो। या वह तरंग के रूप में न होकर इंडिविजुअल व वर्चुअल फोटोन कणों के रूप में हो। सबसे बड़ी वजह तो दूरी की लगती है। ब्रह्मांड की सीमा बहुत दूर है। वहां से हम तक आतेआते प्रकाश किरण इतनी क्षीण हो जाती होगी कि पकड़ में ही न आए। इसके विपरीत, ऐसा लगता है कि हम न तो ब्लैकहोल से बाहर जा सकते हैं और न ही इसके बाहर से कुछ प्राप्त कर सकते हैं, क्योंकि यह पहले से ही अनंत आकाश है और अनंत का कभी अंत नहीं होता है। इससे ऐसा भी लगता है कि ब्रह्मांड में पदार्थों की मात्रा सीमित व निर्धारित है। वही बारंबार चक्रवत प्रकट व अप्रकट होती रहती है। ऐसा भी हो सकता है कि जब ब्लैकहोल में ब्रह्मांड बनने लग जाए, तब वह अपनी ग्रेविटी छोड़ देता हो या कम कर देता हो, क्योंकि तब उसमें बिगबैंग से ब्रह्मांड बाहर की तरफ़ फैल रहा होता है। ग्रेविटी वैसी ही रहे, तब भी उसका प्रभाव नहीं दिखेगा, क्योंकि बिगबैंग का धक्का भी बाहर की तरफ लग रहा होगा। यह शायद तब होगा जब ब्लैक होल का डार्क मैटर डार्क एनर्जी में रूपांतरित हो जाएगा। यही डार्क एनर्जी बिगबैंग के बाद सभी पदार्थों और पिंडों को एकदूसरे से दूर धकेलती रहती है, जिससे ब्रह्मांड गुब्बारे की तरफ फूलता रहता है। आदमी में भी तो ऐसा ही घटित होता है। जब वह दुनियादारी से थक जाता है, तो सारी दुनिया को अपने मन के अंधेरे में समेट लेता है। कुछ समय के लिए वैसा ही रहता है। फिर किसी कारणवश योग की तरफ मुड़ता है। योग से उसके मन का अंधेरा कम हो जाता है, या हल्का पड़ जाता है। उसे मन में खाली खाली सा महसूस होता है। उससे प्रेरित होकर वह फिर से अपने मन की दुनिया को बढ़ाने में लग जाता है। ब्लैकहोल से शायद हॉकिंस रेडिएशन बाहर निकलने से या अन्य किसी निकासी से उसका डार्क मैटर हल्का होकर डार्क एनर्जी में बदल जाता है। फिर उसके अंदर बिगबैंग और ब्रह्मांड का विस्तार शुरु हो जाता है।

आदमी ब्लैकहोल से बहुत ज्यादा समानता रखता है। जो आदमी जितनी ज्यादा सूचनाओं से भरा होता है, उससे उसके मरने के बाद उतना ही बड़ा ब्लैकहोल बनता है। उससे फिर वे सूचनाएं प्रकट हो जाती हैं उसके पुनर्जन्म के रूप में। मुझे लगता है कि मरने के बाद उसके पुराने जीवन को समेट कर रखने वाला डार्क मैटर कुछ समय वैसा ही रहता है। फिर समय की चाल से वह डार्क एनर्जी में तब्दील हो जाता है। वह उसकी मानसिक दुनिया को बढ़ाना चाहती है, पर उसके लिए पहले किसी जीव के शरीर में जन्म लेना जरूरी होता है। इसे नए सूक्ष्म ब्रह्मांड का निर्माण कह सकते हैं। आगे जाकर वह किसी अन्य मनुष्य जीवन का निर्माण भी करता है, किसीको रोजगार देकर, या किसीको शिक्षा देकर। कोई अपने पुत्र के रूप में नए मनुष्य का निमार्ण करता है। मतलब वह आगे भी ब्लैकहोल बनाता है, कोई आदमी कम संख्या में बनाता है, तो कोई ज्यादा। वह पुत्र ब्लैकहोल सूचना के मामले में उससे छोटा ही कहा जाएगा। एक प्रकार से एक सूक्ष्म ब्रह्मांड अपने अंदर के ब्लैकहोल से पुत्र या अन्य आश्रित के रूप में एक नया ब्लैकहोल पैदा करता है। वह भी फिर उस परंपरा को आगे बढ़ाता है। मन में जो सूचनाएं दबी पड़ी हैं, वही ब्लैकहोल है। मतलब अवचेतन मन ही ब्लैकहोल है। वह कभी नहीं रजता। वह ब्लैकहोल की तरह सभी सूचनाओं को खाता रहता है। उसमें आदमी के अनगिनत जन्मों से लेकर अनगिनत सूचनाएं दबी होती हैं। और कहें तो ब्लैकहोल भी बिल्कुल स्थिर नहीं हैं, बल्कि अन्य आकाशीय पिंडों की तरह अंतरिक्ष में चलायमान प्रतीत होते हैं। मतलब उनके चलने से उनके अंदर समाया अनंत अंतरिक्ष भी चलता रहता है। पर इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए, क्योंकि जब जीव चलते हैं, उस समय भी तो उनके अंदर समाया हुआ अनंत अंतरिक्ष चल रहा होता है।

कुंडलिनीयोग का संकल्पपुरुष ब्लैकहोल के अन्दर ब्रह्मांड की उत्पत्ति की पुष्टि करता है

अनंताकाश का गड्ढा भी तो वही अनंताकाश हुआ न। उसे दूसरा अनंताकाश कैसे कह सकते हैं। चादर में बना गड्ढा भी उसी चादर से बना है, उसे दूसरी चादर थोड़ी न कहेंगे। सीमित चादर तो सीमित गड्ढा ही बना सकती है। असीमित आकाश में असीमित गड्ढा क्यों नहीं बन सकता। जब छोटे, बड़े द्रव्यमान वाले पिंड आकाश में छोटे, बड़े गड्ढे बना सकते हैं, तो अनंत द्रव्यमान का पिंड अनंत आकाश में अनंत आकार वाला गड्ढा भी बना सकता है। क्योंकि तारे के सिकुड़ने से बनी सिंगुलरिटी का आकार अनंत छोटा है, इसलिए उसका द्रव्यमान भी अनंत ज्यादा है। इसीलिए उससे अंतरिक्ष में अनंत आकार का गड्ढा मतलब ब्लैकहोल बनता है। ब्लैकहोल इसीलिए तो गड्ढा है। मतलब बेशक मूल आकाश में ही है, पर खाली है, अर्थात उसकी सृष्टि से अछूता है। ॐ के आकार को अनंत छोटा कैसे मानेंगे। माना कि अनंत बड़ा आकार तो शून्य आकाश है। पर अनंत छोटा आकार भी तो शून्य आकाश ही है। दोनों के अभासिक अनुभव में अंतर हो सकता है, जैसे पहले वाला परम प्रकाश परमात्मा है, तो बाद वाला परम अंधकार जीवात्मा। मतलब एक मृत तारे से नए आकाश का निर्माण हो गया। इसीलिए तो ब्लैकहोल का आकाश खत्म नहीं होता, क्योंकि उसमें तारे के निरंतर सिकुड़ने से नया अनंत आकाश जो बन गया। पर एक से ज्यादा आकाश का होना असम्भव है, इसीलिए वह अलग अनंत आकाश नहीं बल्कि उसमें अनंत आकार का गड्ढा है। ओम शायद आकाश का नाम और रूप है। क्योंकि ध्वनि एक तरंग है, जो आकाश में हर जगह फैलती है प्रकाश तरंग की तरह। यह अलग बात है कि उसे हर जगह डिटेक्ट नहीं किया जा सकता। वैसे भी शब्द या आवाज को आकाश का गुण कहा गया है। फिर सिर्फ ओम ध्वनि को ही आकाश का रूप क्यों दिया गया है। शायद इसलिए क्योंकि यह सबसे साधारण और आधारभूत है। ओम शब्द तीन अक्षरों अ, उ और म से बना है, जिनका मतलब क्रमशः सृजन, पालन और विनाश है। आकाश भी यही करता है। यह पहले अपने अंदर दुनिया को बनाता है, कुछ समय तक उसको कायम रखता है, और फिर अपने में ही विलीन कर लेता है। मतलब ओम अनंत आकाश का ही नाम है। सटीकता से बोलें तो शायद अनंत गड्ढे का, क्योंकि यही सबसे मूलभूत विचार से बनता है। पर आकाश में गड्ढा, यह बात इतनी सरल नहीं है। कुछ तो रहस्य छिपा है इसमें। फिर तो अगर परमात्मा अनंत आकाश है, तो जीवात्मा उसमें अनंत श्याम गड्ढा। शून्य आकाश में गड्ढा भी कोई विशेष होगा, साधारण नहीं। हम तो आकाश में गढ्ढा नहीं बना सकते। हां एक तरीका है, भ्रम से गड्ढे जैसा दिखा दिया जाए। फिर तो अनंत आकाश भी रहेगा, और उसमें अनंत गढ्ढा भी, दोनों एकसाथ। जीवात्मा तो परमात्मा में ऐसा ही भ्रमपूर्ण है, असली नहीं, जैसा कि शास्त्रों में लिखा है। पर अगर भौतिक आकाश में भी ऐसा भ्रमपूर्ण गढ्ढा बनता है, तब तो सभी पदार्थ और यहां तक कि प्रकाश भी भ्रमित होकर उसमें गिर जाते हैं। जीवात्मा रूपी गड्ढे में भी तो बाहर की दुनिया गिरती रहती है, बेशक सूक्ष्म रूप में। विभिन्न इंद्रियां बाहर से विभिन्न सूचनाएं इकट्ठा करके जीवात्मा का प्रभाव बढ़ाती रहती हैं। बेशक ब्लैकहोल जीवात्मा की तरह भ्रम को महसूस नहीं करते। अंधेरे कुएं की तरफ हरकोई गिरता है, बेशक गिरने वाला महसूस करे या न। अब ये पता नहीं, उस गड्ढे को क्या चीज़ रेखांकित करती है। हो सकता है, आकाश की आभासी अर्थात वर्चुअल तरंग हो। जैसे चादर धागे की बनी है, इसी तरह आकाश भी आभासी धागों या तरंगों से भरा हुआ है। चादर के गड्ढे की खाली जगह में हवा भर जाती है, जो धागे जितनी घनी नहीं है, इसलिए चादर पर रखी गेंद उसके गड्ढे की तरफ़ लुढ़कती है। इसी तरह भारी पिंड के वजन से आकाश के आभासी तानेबाने में गड्ढा बन जाता है। उस गड्ढे की खाली जगह में बाहर के अटूट आकाश की तुलना में कम घना आभासी तानाबाना बुना होता है। इसीलिए आसपास के अन्य छोटे पिंड उस गड्ढे की तरफ़ लुढ़कते हैं, पर हमें ऐसा लगता है कि बड़ा पिंड छोटे पिंड को गुरुत्व बल से अपनी तरफ खींच रहा है। यह ऐसे ही है जैसे हवा उच्च दाब वाले क्षेत्र से निम्न दाब वाले क्षेत्र की तरफ़ बहती है। शून्य आकाश वही एकमात्र है, पर आभासी तरंगों के कारण उसमें आभासी गड्ढा बन जाता है। इसका मतलब है कि अंतरिक्ष में हर समय बनने वाली आभासी तरंगें व कण वस्तुओं पर दबाव डालते हैं। केसीमिर इफेक्ट के प्रयोग में यह सिद्ध भी किया गया है। संभवतः यह दबाव भी पिंडों को आकाश में बने गड्ढों की तरफ़ धकेलने में मदद करता है, जिसे गुरुत्वाकर्षण कहते हैं।
आदमी दरअसल विशेष किस्म का आकाश है। उसका शरीर तो केवल उस आभासी आकाश का निर्माण करने वाली मशीन है, ब्लैकहोल की तरह। आकाश में सदैव आभासी तरंगे बनती, मिटती रहती हैं, पर उन्हें कोई भी, परमात्मा भी अनुभव नहीं करता, ऐसे ही जैसे समुद्र अपनी तरंगों को महसूस नहीं करता। यह समुद्र और उसकी तरंग का उदाहरण शास्त्रों में अनेक स्थानों पर मिलता है। मस्तिष्क भी उसमें वैसी ही आभासी तरंगें बनाता है, पर उसे जीवात्मा अनुभव करता है, और भ्रम में पड़कर अपने पूर्ण परमात्माकाश रूप को भूलकर जीवात्माकाश बन जाता है। इसे ब्लैकहोल की तरह आकाश में अनंत गड्ढा मान लो।
ऐसा लगता है कि फिर ब्लैकहोल के आकाश में ब्रह्मांड नहीं बनेगा। क्योंकि वह आभासी तरंगों का जाल तो बाहरी मूल आकाश में है जिससे पदार्थ बनते हैं, वह ब्लैकहोल में नहीं है या कम है। पर ब्लैकहोल के आकाश में तारे का द्रव्यमान भी एनकोडिड है, शायद डार्क एनर्जी या डार्क मैटर के रूप में। वह नया ब्रह्माण्ड बनाता हो। या ब्लैकहोल के आकाश में दूसरे व हल्के किस्म की आभासी तरंगें पैदा हो जाती हों जो पदार्थ व ब्रह्माण्ड बनाती हों। फिर उसमें भी कभी ब्लैकहोल बनेगा। जो फिर से नया ब्रह्माण्ड बनाएगा। यह सिलसिला पता नहीं कहां रुकेगा। कुंडलिनी योग से तो सिलसिला जल्दी ही रुक जाता है। योगवासिष्ठ में संकल्पपुरुष शब्द कई जगह लिखा आता है। शायद यह आदमी के लिए कहा गया है कि वह ब्रह्मा के मन के संकल्प या स्वप्न का आदमी है, असली नहीं। इसी तरह आदमी जब किसी देवता, गुरु आदि का ध्यान करता है, तो वह उसका संकल्पपुरुष बन जाता है। पर क्या वह संकल्पपुरुष अपना पृथक अस्तित्व महसूस करता है हमारी तरह, यह विचारणीय है। कई सभ्यताओं में मान्यता है कि जबतक किसी पूर्वज को उसके वंशजों द्वारा याद किया जाता है और श्राद्ध आदि धार्मिक समारोहों के माध्यम से पूजा जाता है, वह तब तक स्वर्ग में निवास करता है। इस पर कोको नाम की बेहतरीन एनिमेशन फिल्म भी बनी है। इसका मतलब है कि हम ध्यान से नया अस्तित्व तो नहीं बना सकते, पर यदि पूर्वनिर्मित अस्तित्व का ध्यान करते हैं, तो उसे उससे पोषण प्राप्त होता है। फिर तो यह भी हो सकता है कि एक उच्च कोटि का योगी ब्रह्मा की तरह अपने मन से नए मनुष्य की रचना कर दे। शास्त्रों में ऐसी बहुत सी कथाएं आती हैं। एक ऋषि ने तो अपने विवाहोत्तर विहार के लिए मनोवांछित दुनियावी साजोसामान और प्राकृतिक नजारे अपनी योगशक्ति से पैदा कर दिए थे। यह तो ऐसे ही है जैसे ब्लैकहोल में बिल्कुल अपने पितृ ब्रह्मांड के जैसा एक अन्य ब्रह्मांड का निर्माण होता है। अगर शास्त्रों का संकल्पपुरुष संभव है, तब तो ब्लैकहोल के अंदर ब्रह्मांड की उत्पत्ति भी संभव है।
ब्लैकहोल इसीलिए तो गड्ढा है, क्योंकि वह मूल आकाश की आभासी तरंगों से रहित मतलब खाली है। मतलब बेशक मूल आकाश में ही है, पर खाली है, अर्थात उसकी सृष्टि से अछूता है।हालाँकि, मूल आकाश की आभासी तरंगें अभी भी अपने मूल स्थान पर हैं, लेकिन इसके ऊपर एक नया आकाश भी बन गया है, पर वह मूल आकाश की आभासी तरंगों के प्रभाव से रहित है। यह कैसे हो सकता है। सीधे शब्दों में कहें तो यह केवल एक और एक ही आकाश है, लेकिन इसके अनगिनत रूप एक ही समय में आभासी तरंगों की विविधता के रूप में मौजूद हैं। अद्भुत मामला है। मैं पिछली एक पोस्ट में भी बता रहा था कि एक ही अनन्त आकाश में एक ही स्थान पर अनगिनत ब्रह्माण्ड हो सकते हैं। संभवतः उन सभी की आभासी तरंगें एकदूसरे से अप्रभावित रहती हों। आत्मा के मामले में भी ऐसा ही होता है। एक ही अनंत अंतरिक्ष में असंख्य आत्माएं अर्थात अलग-अलग जीवों के अपनेअपने अनंत अंतरिक्ष हैं, जो विचारों के रूप में एक-दूसरे की आभासी और सूक्ष्म सृष्टिरचनाओं अर्थात ब्रह्मांडों को नोटिस नहीं कर पाते अर्थात उन्हें प्रभावित नहीं कर पाते। जीवों के मामले में तो सभी जीवों की आभासी तरंगें एकसमान स्वभाव की हैं, फिर भी वे एकदूसरे की पहुंच से परे हैं, शायद स्थूल ब्रह्मांडों के मामले में भी ऐसा ही हो, मतलब वर्चुअल तरंगें एकसमान किस्म की हैं, पर एक ही स्थान पर एक ब्रह्मांड अन्य सभी ब्रह्मांडों से पूरी तरह अप्रभावित और कटा हुआ है। दिवंगत जीवात्मा में सबकुछ सूक्ष्म मतलब अनभिव्यक्त रूप में रहता है, इसलिए उसमें अंधेरा है। ब्लैकहोल में भी इसीलिए अंधेरा है। संभवतः यह अंधकारमय अनुभूति ही श्याम ऊर्जा अर्थात डार्क एनर्जी है, कोई भौतिक वस्तु नहीं। इसीलिए ऐसा प्रतीत होता है कि यही तथाकथित सबसे छोटी भौतिक इकाई अर्थात सिंगुलैरिटी अर्थात ओम है। डार्क मैटर कहना ज्यादा बेहतर होगा, क्योंकि इसका द्रव्यमान है, जिसमें गुरुत्व बल है। मुझे तो लगता है कि दोनों एक ही चीज़ है, कभी यह एनर्जी के रूप में व्यवहार करती है, तो कभी मैटर के रूप में, ऐसे ही जैसे आदमी के मन का अंधेरा कभी शांत, हल्का और आनंदप्रद सा प्रतीत होता है, तो कभी घना, भारी और दुखप्रद सा। पहले किस्म के अंधेरे से आदमी योग आदि की तरफ़ मुड़कर दुनिया से दूर भागने की कोशिश करता है, पर दूसरे किस्म के अंधेरे से दुनियादारी को अपनी तरफ आकृष्ट करता है। योग की यह विशेष खासियत है कि यह डार्क मैटर को हल्का करके डार्क एनर्जी में परिवर्तित करने की कोशिश करता है। यह ऐसे ही है, जेसे डार्क एनर्जी में धकेलने का गुण होता है, पर डार्क मैटर में आकर्षित करने का। इसका वर्णन हमें शास्त्रों में मिलता है जब कोई एक ऋषि से पूछता है कि प्रलय के बाद सृष्टि कैसी होती है, तो ऋषि कहते हैं कि इतना घनीभूत अंधेरा होता है कि अगर कोई चाहे तो उसे मुट्ठी में भर ले। यह डार्क मैटर की बात हो रही है, क्योंकि पदार्थ ही मुट्ठी में भरा जा सकता है, खाली आसमान नहीं। मुझे तो लगता है कि बेशक यह साधारण पदार्थ नहीं होता पर उसके जैसा सॉलिड महसूस होता है, वैसे ही जैसे क्वांटम कण दरअसल पदार्थ नहीं तरंगरूप होते हैं, पर पदार्थ के जैसा व्यवहार भी करते हैं।

चंद्रयान-3 प्रक्षेपण हेतु शुभकामनाएं

कुंडलिनीयोगानुसार ओम ॐ ही वह सिंगुलेरटी है जिसमें ब्लैकहोल समा जाता है

ब्लैकहोल में जो भी पदार्थ रूपी सूचना जाती है, वह नष्ट या अज्ञात रूप में रहती है। उसी तरह आदमी का अवचेतन मन भी उसकी सभी विचाररूपी सूचना को अनादिकाल से लेकर अपने अंदर नष्ट रूप में संजोकर रखता है। जब उन विचारों को साक्षीभाव साधना आदि से प्रकट या अभिव्यक्त रूप में वापिस लाया जाता है, तब वे धीरे धीरे ढीले होकर परमात्मा में विलीन होने लगते हैं। जब सभी विचार विलीन हो जाते हैं, तो जीवात्मा या सूक्ष्मश्रीर मुक्त हो जाता है। संभवतः ब्लैकहोल से भी इसी तरह बारबार स्थूल सृष्टि बनते रहने से वे सूचनाएं ढीली होती रहती हैं और अंत में महाकाश रूपी परमात्मा से एकाकार हो जाती हैं और पुनः कभी वापिस नहीं आतीं। मतलब ब्लैकहोल मुक्त हो जाता है। यहां एक पेच है। बारबार स्थूल सृष्टि बनने से ब्लैकहोल मुक्त नहीं होता, जैसे आदमी बारबार जन्म लेने से खुद मुक्त नहीं हो जाता। जब ब्लैकहोल से सूचनाएं सूक्ष्मरूप में लगातार बाहर निकलती रहती हैं, उन्हीं के रूप में वह महाकाश में विलीन होता है, सीधा नहीं। संभवतः वे सूक्ष्म सूचनाएं ही हॉकिंस रेडिएशन हैं, जिनके रूप में कभी पूरा ब्लैकहोल विलीन हो जाएगा। बेशक इसमें बहुत ज्यादा समय लगता है। जीव की मुक्ति में भी कम समय कहां लगता है। ब्लैकहोल से हॉकिंस रेडिएशन भी निकलती रहती हैं, और वह साथसाथ में नई सृष्टि भी बनाता रहता है, बेशक नई सृष्टियों का आकार धीरे धीरे घटता जाता है। इसी तरह आदमी की साक्षीभाव साधना भी कम या ज्यादा रूप में चलती रहती है, और साथसाथ में उसके नए नए जन्म भी होते रहते हैं, बेशक आगे आगे के जन्म में मन के विचारों का शोर कम होता जाता है, अहंकार घटता जाता है।
विज्ञान कहता है कि ब्लैकहोल के अंदर जितना पदार्थ घुसता जाएगा, उसका गुरुत्व बल उतना ही बढ़ता जाएगा, और उसके बाहर की एकरीशन डिस्क उतनी ही मोटी होती जाएगी। पहले मैंने सोचा कि ऐसा कैसे हो सकता है कि जब नया अनंत आकाश बन गया, तब तो उसमें घुसे हुए पदार्थ अनंत आकाश में फैल जाने चाहिए, और उनका प्रभाव एकरीशन डिस्क पर नहीं पड़ना चाहिए। साथ में, जब एकबार मूल अनंत आकाश में अनंत गड्ढा बन गया, तब अंदर और पदार्थ घुसने से वह गड्ढा और ज्यादा कैसे बढ़ सकता है, क्योंकि अनंत से बड़ा तो कुछ भी नहीं है। और ग्रेविटी बढ़ने का मतलब ही अंतरिक्ष में गड्ढे की गहराई बढ़ने से है वास्तव में। पर मुझे इसका हल जीवात्मा से इसकी तुलना करने पर मिला। जब पहली बार जीवात्मा रूपी व्यष्टि-अनन्ताकाश बनता है, तो वह नए बने ब्लैकहोल की तरह  होता है। पहली बात, जीवात्मा कैसे बनता है। जब किसी सबसे छोटे जीव में मन का पहला विचार बनता है, तो चिदाकाश अर्थात परमाकाश परमात्मा उसे अपने अंदर महसूस करता है। उस विचार की तरफ़ आसक्त होकर वह तुरंत अपने परमाकाश या महाकाश रूप को भूल जाता है। रहता वह महाकाश ही है, पर भ्रम से अपने परम सत्ता, ज्ञान (सत्य ज्ञान) और आनंद को काफी हद तक भूल जाता है। यह महाकाश के अंदर जीवाकाश की उत्पत्ति हो गई। हालांकि महाकाश परमात्मा बिना परिवर्तन का, वैसा ही, अपने मूलरूप में रहता है। मतलब यह परमात्मा के अंदर जीवात्मा की उत्पत्ति हो गई। अब ब्लैकहोल पर आते हैं। मूलाकाश के अंदर किसी बड़े तारे का ईंधन खत्म हो गया। तो उसके अंदर की तरफ़ के गुरुत्व बल का मुकाबला करने के लिए बाहर की तरफ़ का गर्म गैसों का बल नहीं रहता। इससे वह अपने भीतर ही भीतर लगातार सिकुड़ कर सबसे छोटे संभावित रूप तक पहुंच जाता है। मुझे तो लगता है कि वह रूप मन का सबसे सूक्ष्म विचार ही है। क्योंकि उसके सामने तो प्रोटोन, इलेक्ट्रॉन आदि मूलकण भी स्थूल ही है। सबसे छोटा विचार ॐ की मानसिक आवाज है। इसका प्रमाण यह है कि इसके साथ आत्मा को अपने पूर्ण रूप का सबसे कम भ्रम पैदा होता है। यहां तक कि भ्रम खत्म भी होने लगता है। इसीलिए ब्रह्मज्ञानी व पूर्ण योगियों के मुंह से ॐ का उच्चारण अनायास ही होता रहता है। दूसरे विचार तो जितना बढ़ते रहते हैं, भ्रम भी उतना ही बढ़ता रहता है। तो सबसे छोटी चीज ओम ध्वनि हुई। जीवात्मा की उत्पत्ति भी संभवतः ॐ से ही होती है, क्योंकि यत्पिंडे तत् ब्रह्मांडे। स्थूल वस्तु आकाश में छेद नहीं कर सकती। अगर ऐसा होता तो हरेक पत्थर एक अलग जीव या जीवात्मा होता, हरेक मूलकण जिंदा होता, और अपना अलग से अनंत आकाश वाला पृथक अस्तित्व महसूस करता। पर ऐसा नहीं होता। केवल मन का विचार ही आकाश में छेद कर सकता है। इसीलिए जितने शरीर अर्थात मस्तिष्क या मन हैं, उतने ही अनंताकाश रूपी जीव हैं। इसीलिए नया ब्रह्मांड बनाने के लिए मन की जरूरत पड़ती है, क्योंकि वह तभी बनेगा जब आकाश में छेद होगा। ॐ वही सूक्ष्मतम मन है। इसीलिए कहते हैं कि ईश्वर या ब्रह्मा के संकल्प या विचार से ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हुई। तारे से बने ओम से उसके दायरे का मूलाकाश अपना मूलरूप भूलकर नया ही पूर्ण आकाश बन जाता है। हालांकि मूलाकाश वैसा ही रहता है। इसीको विज्ञान की भाषा में कहा गया है कि तारे से बनी सिंगुलरिटी से अंतरिक्ष में अनंत गहराई का गड्ढा बन जाता है। शायद ॐ को ही विज्ञान में सिंगुलरिटी कहा गया है, क्योंकि पता ही नहीं कि वह क्या है। बस यह अंदाजा लगाया है कि वह सबसे छोटी चीज है। सम्भवतः हमने सिद्ध कर दिया कि वह सबसे छोटी चीज ॐ ही है। फिर कहते हैं कि उसी सिंगुलरीटी में विस्फोट से सृष्टि का निर्माण फैलने लगता है। शास्त्रों में भी यही कहा है कि ॐ से सृष्टि की उत्पत्ति होती है। इस सबसे यह अर्थ भी निकलता है कि एक छोटे से विचार में भी सैंकड़ों सूर्यों के बराबर द्रव्यमान समाया हुआ है, इसी वजह से तो वह मूल आकाश की त्रिआयामी चादर में इतना बड़ा गड्ढा कर देता है कि एक नया ही आकाश बन जाता है, मतलब एक नया स्वतंत्र जीव रूपी नया स्वतंत्र ब्रह्माण्ड अस्तित्व में आ जाता है। पर यह आश्चर्य की बात है कि ब्रह्माण्ड की रचना कर सकने वाला जीव कैसे दयनीय, और परतंत्र सा बना रहता है। तो अगर कल को वार्प ड्राइव बनी, तो वह ऐसी ही कोई ॐ मशीन होगी, जो आकाश को जितना चाहे मोड़कर अन्तरिक्ष की सैर करवाएगी। हो सकता है कि एलियंस ऐसी ही मशीन की सहायता से धरती पर आते हों। तथाकथित यूएफओ क्रैश के बाद एलियन से साक्षात्कार के मामले से जुड़े लोग दावा करते हैं कि एलियंस के पास आध्यात्मिक तकनीकें होती हैं, और वे योगी की तरह अपने असली रूप को अच्छे से पहचानते हैं। उनके लिए धरती की मानव सभ्यता एक बंदरों की सभ्यता की तरह है। फिर
उत्पत्ति के बाद जीवात्मा अपना दायरा बढ़ाता है। वह आंख, कान आदि विभिन्न इंद्रियों से सूचनाएं ग्रहण करता रहता है, और बढ़ता रहता है। यह ऐसे ही है जैसे ब्लैकहोल बाहर के पदार्थ निगलता रहता है, और अपना द्रव्यमान बढ़ाता रहता है। जीवात्मा जितना महान होता है, उसके प्रभाव का दायरा भी उतना ही बड़ा होता है। जहां कीड़ों मकोड़ों का दायरा कुछ इंच या फीट तक होता है, वहीं महापुरुषों के मन के अंदर इतनी ज्यादा सूचनाएं होती हैं कि उनके प्रभाव का दायरा पूरे राष्ट्र या विश्व तक फैला होता है। पूरी दुनिया से लोग उनकी तरफ़ खिंचे चले आते हैं। उनके प्रभाव के दायरे की तुलना ब्लैकहोल की इकरीशन डिस्क से की जा सकती है।
ओम से सृष्टि बनती रहती है और उसमें समाती भी रहती है। कभी केवल एक तारे की जगह पूरी सृष्टि का द्रव्यमान सिकुड़कर ॐ के अंदर समा जाएगा। इसे परम ब्लैकहोल का बनना कहेंगे। उसे निगलने के लिए कुछ मिलेगा ही नहीं। इससे वह जल्दी ही भूखा मर जाएगा, मतलब फ़िर वह ॐ भी परमाकाश परमात्मा में समा जाएगा। इसे प्रलय कहते हैं। लंबे समय तक प्रलय बनी रहेगी। फिर सृष्टि के आरंभ में सारी पुरानी सृष्टि का द्रव्यमान समेटे हुए ॐ पुनः प्रकट हो जाएगा। उसमें बिग बैंग या महाविस्फोट होगा और सृष्टि की रचना पुनः प्रारंभ हो जाएगी। यह प्रक्रिया बारंबार दोहराई जाती रहती है।
अब कई लोग कहेंगे कि ब्लैकहोल ने तो ब्रह्मांड की तुलना में नगण्य सा ही पदार्थ निगला होता है, उससे इतना बड़ा नया ब्रह्मांड कैसे बन सकता है। पर भई अनन्त आकाश तो बन ही गया होता है। उसमें नए पदार्थ खुद भी तो बन सकते हैं। पुराने ब्रह्मांड से निगले हुए पदार्थ तो सिर्फ एक शुरुआत करते हैं। यह ऐसे ही है जैसे एक बच्चा अपने पिछले जन्म की सूचनाएं बहुत सूक्ष्म रूप में लाया होता है, जो कि पिछले पूरे जन्म की तुलना में नगण्य जितनी दिखती है। फिर वह बाहर से भी कुछ सूचनाएं इकट्ठा करता है, वह भी नगण्य जैसी ही होती हैं। अधिकांश सूचनाएं तो वह खुद अपने अंदर तैयार करता है अपनी रचनात्मकता से, अपने कर्मों से। इसी तरह सबसे पहले बनने वाले सूक्ष्म जीव में सिर्फ सूक्ष्मतम ओम विचार होता है, पर विकास करते करते वह ब्रह्मा भी बन जाता है, जिसमें पूरा ब्रह्माण्ड समाया होता है। इससे तो यह मतलब भी निकलता है कि ब्लैकहोल चाहे कितना ही छोटा क्यों न हो, वह बड़ा से बड़ा ब्रह्मांड बना सकता है, क्योंकि वह अनंत आकाश के रूप में अनंत आकार का बर्तन बना लेता है। और जहां बर्तन है, वहां बारिश का पानी भी इकट्ठा हो ही जाता है।

कुण्डलिनी चित्र विज्ञानमय कोष को विकसित करता है

शास्त्रों में ऐसा बहुत वर्णन है कि आनंद भीतर है अर्थात आत्मा में है, बाहर नहीँ। पर इसका वैज्ञानिक स्पष्टीकरण मुझे कहीं नहीँ मिला। सम्भवतः आत्मा का स्वरूप सत्तामयी शून्य या आकाश की तरह है। अविद्या या अंधकार में आत्मा का एक गुण होता है, शून्य या आकाश या सत्ता वाला। प्रकाश का गुण इसमें गायब होता है। इसलिए उसमें आनंद काफी कम हो जाता है, क्योंकि आत्मा के सभी गुण एकदूसरे से जुड़े होते हैं। किसी भी रूप में जगत की अनुभूति से जो प्रकाश की अनुभूति होती है, वह आत्मा के प्रकाश की कमी को पूरा करने का प्रयास करती है। होता क्या है कि जब वह अनुभूति बहुत तेज, बदलती हुई अर्थात गतिशील जैसी या भड़कीली या वास्तविक जैसी हो, तब यह आत्मा से मिश्रित नहीँ हो पाती, क्योंकि आत्मा है तरंगरहित या परिवर्तनरहित आसमान के जैसे स्वभाव वाली पर इसके विपरीत तेज अनुभूतियाँ ताबड़तोड़ उतार-चढ़ाव की लहरों अर्थात परिवर्तन के स्वभाव वाली होती हैं। इनसे क्षणिक सुख तो मिलता है, जब तक ये रहती हैं, पर इनके हटते ही आत्मा का अंधेरा और भी ज्यादा घना होता हुआ महसूस होता है। यह ऐसे ही होता है, जैसे रात को तेज रौशनी से बाहर निकलते ही आदमी थोड़ी देर के लिए अंधा जैसा हो जाता है। जब अनासक्ति या कुण्डलिनी आदि से वे प्रकाशमय अनुभूतियाँ मंद या कम गतिशील जैसी हो जाती हैं, तब वे शून्य आत्मा से मेल खाने लगती हैं। इससे वे आत्मा को अपना प्रकाश प्रदान करती हैं। इससे आत्मा की कमी पूरी होने से आनंद प्रकट होता है, क्योंकि उपरोक्त शास्त्रानुसार आत्मा में ही आनंद है, बाहर नहीं। इसे ही सतोगुणी अविद्या कहा गया है। सतोगुण प्रकाशप्रधान होता है। यह कोई आध्यात्मिक महत्त्व ही नहीँ बल्कि व्यावहारिक महत्त्व का विषय भी है। हर कोई ऐसे आदमी को पसंद करता है, जो शांत स्वभाव का हो, न कि भड़कीले स्वभाव वाले को। शांत स्वभाव वाले का मानसिक अंधेरा भी शांत होता है, जबकि भड़कीले स्वभाव वाले की मानसिक अँधेरे के रूप में रजोगुणी अविद्या भी भड़कीली, गहरी और दुखदाई होती है। सज्जन और दुष्ट में यह मुख्य अंतर होता है। साधु की अविद्या सत्त्वगुण से उत्पन्न होने के कारण सत्त्वगुण सम्पन्न होती है, जबकि दुष्ट की रजोगुणतमोगुण से उत्पन्न होने के कारण वैसी ही होती है।

जब रजोगुण के कारण विचार या मानसिक चित्र जल्दी जल्दी बदल रहे हों, तब अपने प्राणमय और अन्नमय कोष के साथ उनके एकरूप होने की भावना नहीं की जा सकती। मतलब उन्हें अपने एक ही मिलेजुले शरीरसंघात के साथ एकरूप मानना कठिन होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि मन की तुलना में शरीरसंघात के अन्य सभी भाग बहुत धीमी गति वाले या स्थिर जैसे होते हैं। साथ में आम दुनियादारी या जीविका से संबंधित मानसिक चित्र भौतिक होते हैं, क्योंकि वे तथाकथित भौतिक दुनिया से जुड़े होते हैं, पर आत्मा अभौतिक है, इसलिए भी इनका मिलान नहीं होता। स्थिर या धीमे जैसे व अभौतिक समझे गए मानसिक चित्र को इस संघात के साथ मिलाना आसान होता है। पंजाबी भाषा में और संस्कृत भाषा में धीमापन या घुमाव होता है, जिससे सतोगुण बढ़ता है। इसीलिए इन भाषाओं के प्रयोग से आनंद पैदा होता है। इनके माध्यम से दुनियादारी के दौरान जो अविद्या का अंधकार पैदा होता रहता है, वह सतोगुणी अविद्या रूप होता है। वह आनंदरूप होता है। इसी तरह साधु बाबा की तरह दाढ़ी रखने से भी आदमी का वर्ताव धीमा, चिंतनशील अर्थात सात्विक हो जाता है। इसी वजह से बाबा आनंद के नशे में मस्त रहते हैं।

जब कोई आदमी उच्च पद या वस्तु प्राप्त करता है, तो उसे घर के बड़े-बूढ़े लोग ज्यादा उछलने से रोककर शांत बनाए रखते हैं। हमें बचपन में हमारी माताजी किसी बड़ी उपलब्धि के बाद एकदम से आसमान से जमीन पर उतार दिया करती थीं। ज्यादातर मामले में तो हमें अहंकार के आसमान में उड़ने ही नहीँ देती थीं। वे अच्छे व वैदिक संस्कारों वाले परिवार के वंश से संबंध रखती थीं। किसी के दायरे में अगर बुजुर्गों और साधुओं का सम्पर्क न हो, तो वह उपलब्धियों से थोड़े समय तो उड़ता ही है। फिर उड़ान का नशा टूटने पर जब गिरकर पाताल के गर्त में डूबने लगता है, और दुनिया उसे क्रेजी या पागल जैसा समझने लगती है, तब उसे होश आता है। पर तब तक वह काफी आनंद को और आत्मा की उन्नति को गवां भी चुका होता है। इसलिए ऐसा नहीँ कि यह सत्त्वगुणी अविद्या वाला मनोवैज्ञानिक सिद्धांत अध्यात्म में ही लागू होता है। यह दुनियावी व्यवहार में भी उतना ही लागू होता है। शायद इसीलिए शास्त्रों में यह बहुतायत में आता है कि ज्ञानप्राप्ति के लिए कष्ट उठाना पड़ता है, या तप करना पड़ता है। तप के कष्टों से परेशान आदमी जरूर आत्मा में आनंद ढूंढेगा, ऐसा शास्त्रों का विश्वास है।

जब विचारों के साथ स्थूल शरीर की भी भावना की जाती है तब उनकी शक्ति शरीर को मिलती है और मस्तिष्क का बोझ कम होता है। मतलब जो शक्ति मस्तिष्क में दबाव पैदा कर रही थी, वह मांसपेशियों की सिकुड़न के रूप में तब्दील हो जाती है। विचार रहते हैं पर आनंद के साथ हल्के पड़ते हुए विभिन्न चक्रोँ पर आकर विलीन हो जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि चक्रोँ पर बदलते विचारों की बाढ़ नहीँ उमड़ती जैसी मस्तिष्क या मन में उमड़ती है। क्योंकि चक्र विचारों के लिए समर्पित अंग नहीं हैं मस्तिष्क की तरह। चक्रोँ पर तो एक ही चित्र मुख्यतः कुण्डलिनी चित्र लम्बे समय तक बना रहता है। यह सतोगुण का प्रतीक है। इससे जो अविद्या पैदा होती है, वह सतोगुणी अविद्या है। यही आनंदमय कोष है। यह ऐसे है जैसे घुप्प और शांत अँधेरे में एक अभौतिक, शांत और हल्का, हालांकि अनौखा दिया जल रहा है। लम्बे समय तक स्थिर बना रहने वाला कुण्डलिनी चित्र ही सर्वोत्तम विज्ञानमय कोष बनाता है। वह आत्मा के जैसा स्थिर सत्ता का ज्ञान है, पर फिर भी विशेष ज्ञान है। मतलब न तो यह आत्मज्ञान है, और न साधारण लौकिक ज्ञान है, पर विशेष ज्ञान या विज्ञान है जो बेशक आत्मज्ञान के करीब है।

कुण्डलिनीयोग में कपालभाति प्राणायाम की अहम भूमिका है

बाएं और दाएं नथुने से बारीबारी साँस ली जाती है, और छोड़ी जाती है, ताकि इड़ा और पिंगला, दोनों साइड की नाड़ियों में कुण्डलिनी शक्ति झूलती रहे, और धीरे-धीरे बीच वाली सुषुम्ना नाड़ी में ऊपर चढ़ती रहे। पतंग भी इसी तरह उड़ती है। डोरी को ढील देने पर कभी वह बहती हवा के थपेड़े से दाईं तरफ के आकाश में फैल जाती है, और फिर खींच देने पर सीधी ऊपर चढ़ती है। कभी विपरीत दिशा में हवा बहने से वह बाईं तरफ के आकाश में पसर जाती है, और फिर खींच देने पर सीधी ऊपर उठती है। दोनों साइड को झूलने से वह बहुत ऊँचाई में पहुंच जाने पर भी आदमी के सिर के ऊपर सीधी बनी होती है। यह सीधाई ही सुषुम्ना नाड़ी के समकक्ष है। कुण्डलिनी योग के समय भी, जब शरीर के बाएं हिस्से में प्राण की कमी होती है, और शरीर को ढीला छोड़ा जाता है, तो कुण्डलिनी शरीर के बाएं हिस्से मतलब इड़ा नाड़ी में बहने लगती है। इसी तरह जब शरीर के दाएं भाग में प्राणों की कमी हो जाती है, तो कुण्डलिनी दाएं भाग अर्थात पिंगला नाड़ी में बहती महसूस होती है। ऐसा लगता है कि जैसे आनंदमयी जैसी हलचल हो रही है, कोई करेंट वाली पतली तार जैसी नाड़ी मुझे तो महसूस होती नहीं। हो सकता है कि यह अव्यवहारिक किताबी बातें हों या उच्च स्तर के अभ्यास में महसूस होती हो। मुझे तो साधारण अनुभव से ही काफ़ी शक्ति महसूस होती है। आकाश में भी उस हिस्से की तरफ हवा चलती है, जिस हिस्से में वायु का दबाव कम हो जाता है, मतलब प्राण कम हो जाता है, क्योंकि वायु ही प्राण है। इससे स्वाभाविक है कि प्राण या हवा के बहाव के साथ कुण्डलिनी या मन या पतंग उसी तरफ चली जाती है। फिर जब वहाँ हवा या प्राण ज्यादा बढ़ जाता है, तो वह थोड़ा उल्टी दिशा की तरफ वापिस भागता है, जिसके साथ पतंग या कुण्डलिनी भी उसके साथ बह जाती है, और मान लो सीधी सिर के ऊपर या सुषुम्ना में आ जाती है। क्षणभर वहाँ रुक के वायु या प्राण दाएं आसमान में या पिंगला में पहुंच जाता है, जिसके साथ पतंग या कुण्डलिनी भी होती है। वहाँ से फिर बाईं ओर का सफर शुरु होता है। कुण्डलिनीरूपी मन या पतंग का इस तरह का पेंडुलम के जैसा दोलन चलता रहता है, और वह सुषुम्ना में या आसमान में ऊपर उठती रहती है।

जब पतंग बहुत ऊपर उठ जाती है, तब डोर पर खींच लगाकर उसे नीचे उतारते हैं। इसी तरह जब कुण्डलिनी काफी ऊँचाई तक उठकर दिमाग़ में दबाव, थकान, और सिरदर्द पैदा करती है, तब निःश्वास झटके के साथ चलने लगते हैं। ऐसा कपालभाती प्राणायाम में होता है, जहाँ बाहर जाती सांस झटके और दबाव से चलती है, पर अंदर जाती साँस इतनी शांति से व धीरे चलती है कि उसका पता ही नहीँ चलता। इससे निःश्वास पर ज्यादा अवेयरनेस रहती है। साथ में, इसमें शरीर की मांसपेशियां भी नीचे की तरफ धक्का लगाती हैं। इन दोनों बातों से कुण्डलिनी शक्ति फ्रंट चैनल से नीचे उतरती है, जिससे मस्तिष्क का दबाव कम होने से आदमी पुनः तरोताज़ा होकर फिर से दिमागी काम के लिए तैयार हो जाता है। चमत्कारी प्रभाव पैदा करता है कपालभाती। इसलिए काम के दबाव व समय की कमी के दौरान केवल इसी तरह की साँस ली जाए, तो बहुत लाभ प्रदान करती है। यहाँ एक बात बता दें कि मन-पतंग स्थायी तौर पर नीचे नहीं रहती, यह फिर बैक चैनल से ऊपर चढ़ जाती है। यह लगातार उपरनीचे घूमती रहती है। यह ऐसे ही है जैसे पतंग को हल्की खींच या तुनका लगाया जाता है, तो वह और ऊपर उठती है। साँसें तो यथार्थ में ही मन की डोर हैं, जैसा अक्सर कहा भी जाता है कि फलां की सांसों की डोर लंबी खिंच गई मतलब कोई जिन्दा बचगया, या सांसों की डोर टूट गई मतलब कोई मर गया। श्रीमदभागवत गीता में जब अर्जुन श्रीकृष्ण से कहते हैं कि भगवन, मन को वश में करना तो बहुत कठिन है, वायु को वश में करने से भी कठिन है, तब भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि हे कौन्तेय, मन अभ्यास से वश में आ जाता है, विशेषकर प्राणायाम के अभ्यास से।

ठंडे पानी से नहाते समय साँस तेजी से और झटकों से बाहर की ओर चलने लगती है। अधिकांश समय मुंह भी पूरा खुला होता है, जिससे साँसें धौकनी की तरह बाहर निकलती हैं। इससे दिमाग़ का दबाव नीचे उतरता है जिससे सिरदर्द से बचाव होता है। सम्भवतः ब्रेन हीमोरेज का खतरा भी कम हो जाता है। इससे ठंडा पानी झेलने की क्षमता बढ़ती है और वह आनंद दायी लगने लगता है। इसी तरह खाना खाने के बाद वज्र-आसन से भी लगभग ऐसा ही होता है। इससे दिमाग़ की शक्ति पाचन अंगों तक उतरती है जिससे पाचन दुरस्त होता है। साँस का ये स्टाइल कपालभाती ही है।

कुण्डलिनीयोगानुसार शरीर कभी भी नहीँ मरता, कभी यह दिखता है, कभी नहीं दिखता, रहता हमेशा है, अनुभव के रूप में

सभी मित्रों को होली की शुभकामनाएं

मित्रों, मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि कैसे मन की गतिशीलता पतंग की उड़ान की तरह है। ऐसा लगता है कि प्राणायाम पतंग की डोरी को नियंत्रित गति देने की तरह है, जिससे पतंगरूपी मन अच्छे से और आत्मविकासरूपी आनंद पैदा करते हुए उड़ सके। मुझे तो यहाँ तक लगता है कि जो आनंद यौनक्रीड़ा के दौरान आता है, उसमें भी अनाच्छादित अर्थात नग्न शरीर के सम्पूर्ण उद्घाटन का काफी योगदान है। उसमें तो अन्नमय शरीर और प्राणमय शरीर दोनों एकसाथ उच्चतम अभिव्यक्ति के करीब होते हैं। कई लोग बोलते हैं कि असली प्यार मन से होता है, शरीर से नहीं। ये क्या बात हुई। सीधे कोई कैसे बाहरी तहखानों को लांघे बिना ही सबसे अंदरूनी तहखाने में पहुंच सकता है। जब लड़की के शरीर से हल्की यौन छेड़छाड़ होती है, बेशक अप्रत्यक्ष या मानसिक रूप में ही, तब लड़की का अन्नमय कोष सक्रिय हो जाता है। होली पर इसका अच्छा मौका मिलता है, उसे गवाएं नहीँ। हाहा। उसे पहली बार अपने शरीर की सबसे गहरी पहचान महसूस होती है। वह शरीर से ज्यादा ही सक्रिय व क्रियाशील होने लगती है। उसके मुख पर लाली और मुस्कान छा जाती है। इससे उसका प्राणमय कोष भी सक्रिय हो जाता है। प्राणों से उपलब्ध शक्ति को पाकर उसका मन रंगीनियों में बहुत दौड़ता है। वह हसीन सपने देखती है। सपनों में विभिन्न लोकों और परलोकों का भ्रमण करती है। इससे उसका मनोमय शरीर भी सक्रिय हो जाता है। क्योंकि यौन आकर्षण के कारण उसका ध्यान हर समय अपने शरीर और प्राणों पर भी बना रहता है, इसलिए उसका विज्ञानमय कोष भी खुद ही सक्रिय बना रहता है। उससे स्वाभाविक है, आनंदमय शरीर भी सक्रिय ही रहेगा। यह सब चेन रिएक्शन की तरह ही है। यही तो प्रेमानन्द है। यह आनंदमय कोष लम्बे समय तक सक्रिय बना रहता है। उसके पूरा खुल जाने के बाद तो आत्मा ही बचता है पाने को। वह भी विवाह के बाद तांत्रिक कुण्डलिनीयोग आधारित सम्भोगयोग से मिल ही जाता है। ऐसा नहीं कि यह स्त्री के साथ ही होता है। पुरुष के साथ भी ऐसा ही होता है। मुझे तो लगता है कि स्त्री की लावण्यमयी भावभंगिमा को देखकर जो पुरुष का तन और मन उससे देहसंबंध बनाने को उछालें मारने लगता है, वही उसके प्राणों का क्रियाशील होना है। यह अलग बात है कि कोई उस प्राणशक्ति का सदुपयोग करता है, तो कोई दुरुपयोग। कोई उसे आध्यात्मिक विकास में लगाता है, कोई भौतिक विकास में, और कोई संतुलित रुप से दोनों में।

थोड़ा मन की पतंग को उड़ने दें, एकदम न उतारें। हल्की सी तिरछी सी यह भावना रखें कि यह जुड़ी है। फिर थोड़ी देर बाद पतंग खुद आराम से लैंड करेगी। कोई झटका नहीँ लगेगा। मजा भी आएगा। लैंड होके उसे वापस भी जाने दें इच्छानुसार। खुद वापिस आएगी। अगर पतंग तूफानी जोर से ऊपर जा रही हो, और आप उसे जबरदस्ती नीचे खींचोगे, तो या तो पतंग फट सकती है, या धागा टूट सकता है। दोनों कमजोर तो पड़ेंगे ही, और उन पर दबाव भी बनेगा। ऐसा ही मन के साथ भी जबरदस्ती कर के होता है।

जिस समय दिमाग में थकान, दबाव या सिरदर्द जैसी हो रही हो, उस समय कपालभाति जैसी साँस खुद चलती है। उससे बाहर निकलती साँस पर ध्यान जाता है, जिससे कुण्डलिनी नीचे उतरती है। मतलब बाहर निकलती साँस धागे को नीचे खींचने मतलब खींच की तरह है, जिससे उड़ती हुई मनरूपी पतंग नीचे आती है, और दिमागी थकान रूपी तेज तूफ़ान से फटने से बचती है ।

विचारों के प्रकाश में ही नहीं, उनके अभाव के अंधकार में भी अनुभव शरीर से ही जुड़ा होता है, क्योंकि कुछ न कुछ मस्तिष्क की हलचल उसमें भी रहती ही है। यहाँ तक कि मृत्यु के बाद भी आत्मा का जो विशेष रूप में अनुभव होता है, वह भी शरीर से ही जुड़ा होता है, क्योंकि वह शरीर से ही निर्मित हुआ है। इसका मतलब है कि शरीर कभी भी नहीँ मरता। कभी यह दिखता है, कभी नहीं दिखता, रहता हमेशा है, अनुभव के रूप में।

कुण्डलिनी योग से मनोमय कोष रूपी पतंग प्राणमय कोष और अन्नमय कोष रूपी माँझे और चकरी से जुड़कर विज्ञानमय कोष रूपी उड़ान भरकर आनंदमय कोष रूपी मजा देती है

होता क्या है कि जब योग करते समय अन्नमय शरीर और प्राणमय शरीर के क्रियाशील होते ही मनोमय शरीर क्रियाशील होता रहता है, तब यह विश्वास पक्का होता रहता है कि मनोमय शरीर बेशक बाहरी और अनंत अंतरिक्ष में फैला महसूस होए, पर वह हमारे शरीर से जुड़ा हमारा ही स्वरूप है। हालांकि दुनियादारी के सभी कामों, खेलों, व व्यायामों के दौरान भी अन्नमय कोष, प्राणमय कोष और मनोमय कोष एकसाथ सक्रिय हो जाते है, पर वे इतनी तेजी से सक्रिय होते हैं कि उनकी आपस में एकत्व भावना करने का मौका ही नहीं मिलता। साथ में आदमी का ध्यान काम की पेचीदगी, उससे जुड़ी तकनीक, उससे जुड़े फल पर और अन्य लौकिक दुनियादारी पर भी रहता है, जिससे भी एकत्व की भावना की तरफ ध्यान नहीं जाता। वैसे भी एकत्व की भावना द्वैत से भरी दुनियादारी की विरोधी है। दो विरोधी चीजें साथ नहीं रह सकतीं। जल और अग्नि साथ नहीं रह सकते। मनोमय शरीर के प्रति इसी आत्मभावना से विज्ञानमय शरीर भी क्रियाशील हो जाता है। दुनियादारी का हर किस्म का ज्ञान साधारण ज्ञान की श्रेणी में आता है। किसी को डॉक्टरी का ज्ञान है, किसी को दर्जी का, किसी को नाई का, किसी को अध्यापन का, किसी को उपदेश देने का, किसी को यज्ञ या कर्मकांड करने या अन्य धार्मिक परम्परा निभाने का है। सब साधारण ज्ञान में आते हैं क्योंकि सभी रोजीरोटी के लिए और लौकिक व्यवहार के लिए हैं। विशेष ज्ञान या विज्ञान इन सबसे हटकर व अकेला है, जो न तो जीविकोपार्जन के लिए है, और न ही लौकिक व्यवहार की सिद्धि के लिए है, बल्कि केवल आत्मा की पूर्ण व प्रत्यक्ष अनुभूति के लिए है। विज्ञानमय शरीर का मतलब ही विशेष ज्ञान वाला शरीर है। इसमें स्थित होने पर साधक को ऐसा महसूस होता है कि वह स्थूल शरीर, प्राण, और मन का मिलाजुला रूप माने संघातमात्र है। जैसा मैंने पिछली पोस्ट में भी पतंग के उदाहरण से स्पष्ट किया था। अगर भटकते मन को अपना आत्मरूप न भी समझ सको तो यह तो समझ ही सकते हैं कि वह शरीर से साँस के माध्यम से ऐसे ही जुड़ा है जैसे एक पतंग मांझे के माध्यम से गट्टू या चकरी से जुड़ी होती है। पतंग उड़ाने का बहुत मजा आएगा। कभी बादलों के ऊपर, कभी दूर देश, कभी दूर ग्रह या तारे पर, कभी दूसरे ब्रह्माण्ड में, कभी परलोक में, तो कभी बिल्कुल पास में या चकरी में लिपटी हुई, कभी आँखों से ओझल होगी और सिर्फ चकरी और धागा ही नजर आएगा, फिर एकदम कहीं प्रकट हो जाएगी, कभी तूफ़ान में जैसी फँसी हुई बेढंगी उड़ेगी और बेढंगी दिखेगी, इस तरह अनंत आकाश में वह हर जगह उड़ेगी, पर हमेशा जुड़ी रहेगी शरीर के चक्रोँ के साथ। शायद चकरी से ही चक्र नाम पड़ा हो। हाहा। अब मनोवैज्ञानिक भी कह रहे हैं कि सूक्ष्मशरीर स्थूलशरीर के साथ एक चांदी के धागे से जुड़ा होता है। यह धागा नाभि से जुड़ा होता है। जैसे मांझा चकरी से बँधा होता है, वैसे ही योगा सांस नाभि से ही चलती है। सीधी सी बात है, अनुभव रूपी पतंग हमेशा अपने से अर्थात आत्मा से अर्थात अपने शरीर से जुड़ी हुई है। सम्भवतः इसीलिए नाभि चक्र को आदमी के शरीर का केंद्र बिंदु कहते हैं। नाभि पर एक अंदर की तरफ भिंचाव सा महसूस भी होता है, जब सूक्ष्म शरीर के साथ स्थूल शरीर का ध्यान भी किया जाता है। सम्भवतः नाभि चक्र से ही पतंग की चकरी का नाम पड़ा हो। उससे भौतिक दुनिया का प्रकाश आत्मा को मिलेगा ही, क्योंकि आत्मभावना जुड़ी है सबके साथ। फिर पूर्वोक्तानुसार आनंद भी पैदा होगा ही और कुण्डलिनी भी अभिव्यक्त होगी ही, क्योंकि कुण्डलिनी चित्र ही ऐसी भौतिक वस्तु है, जो ध्यान के माध्यम से आत्मा से सबसे ज्यादा जुड़ी होती है। मतलब कुण्डलिनी आत्मा से भौतिक दुनिया के जुड़ाव की प्रतिनिधि है। विशेष ज्ञान या विज्ञान के विपरीत साधारण ज्ञान दुनियादारी के मामले में होता है। ज्ञान जल्दी ही अज्ञान में परिवर्तित हो जाता है अगर उसे विज्ञान का साथ प्राप्त न हो। यह साइंस वाला विज्ञान नहीं है। प्राणमय शरीर का मतलब साँस पर ही ध्यान नहीं है, पर साँस से उत्पन्न शरीर की गति और शरीर के अन्य हिलने-डुलने पर ध्यान भी है। इस मामले में पैदल चलना एक सर्वोत्तम अध्यात्मवैज्ञानिक व्यायाम लगता है। इसमें पूरे शरीर पर, उसकी गति पर, उसकी संवेदनाओं पर और सांसों पर अच्छे से ध्यान जाता है। साथ में मन में भी सात्विकता के साथ विचारों की क्रियाशीलता भी काफी अच्छी होती है।

कुंडलिनी योग डीएनए को सूक्ष्म शरीर और डार्क एनर्जी या डार्क मैटर के रूप में दिखाता है

सूक्ष्म शरीर पांच ज्ञानेन्द्रियों, पांच कर्मेंद्रियों, पांच प्राण, एक मन और एक बुद्धि के योग से बना है। 

यह सूक्ष्मशरीर ही परलोकगमन करता है, हाड़मांस से बना स्थूलशरीर नहीं। कोई बोल सकता है कि जब स्थूल शरीर नष्ट हो गया, तब ये इन्द्रियां, प्राण आदि कैसे रह सकते हैं, क्योंकि ये सभी स्थूलशरीर के आश्रित ही तो हैं। यही तो ट्रिक है। इसे आप लेखन की वर्णन करने की कला भी कह सकते हैं। लेखक अगर चाहता तो सीधा लिख सकता था कि शरीर और उसके सारे क्रियाकलाप उसके सूक्ष्मशरीर में दर्ज हो जाते हैं। पर यह वर्णन आकर्षक और समझने में सरल न होता। क्योंकि शरीर और उसके सभी क्रियाकलाप उसके मन, बुद्धि, कर्मेंद्रियों, ज्ञानेन्द्रियों, और पांचोँ प्राणों के आश्रित रहते हैं, इसलिए कहा गया कि सूक्ष्मशरीर इन पांचोँ किस्म की चीजों से मिलकर बना है। मुझे तो ऐसा अनुभव नहीं हुआ था। मुझे तो ये चीजें सूक्ष्मशरीर में अलगअलग महसूस नहीँ हुई, बल्कि एक ही अविभाजित अंधेरा महसूस हुआ, जिसमें इन सभी चीजों की छाप महसूस हो रही थी। मतलब साफ है कि सूक्ष्मशरीर अनुभवरूप अपनी आत्मा के माध्यम से ही चिंतन करता है, आत्मा से ही निश्चय करता है, आत्मा से ही काम करता है, आत्मा के माध्यम से ही सभी इन्द्रियों के अनुभव लेता है, और आत्मा से ही दैनिक जीवन के सभी शारीरिक क्रियाकलाप करता है। मतलब सूक्ष्मशरीर में जीव के पिछले सभी जीवन पूरी तरह से दर्ज रहते हैं, जिनको वह लगातार आत्मरूप से अपने में अनुभव करता रहता है। ये अनुभव स्थूल शरीर की तरंगों की तरह बदलते नहीं। एक प्रकार से ये पिछले सभी जन्मों का मिलाजुला औसत रूप होता है। कई लोग सोचते होंगे कि सूक्ष्मशरीर एक बिना शरीर का मन होता होगा, जिसमें खाली अंतरिक्ष में विचारों की तरंगें उठती रहती होंगी, पर फिर स्थूल और सूक्ष्म शरीर में क्या अंतर रहा। वैसे भी बिना स्थूल शरीर के आधार के स्थूल मन का अस्तित्व संभव नहीं है। उदाहरण के लिए आप अपनी अंगूठी में जड़े हुए हीरे को सूक्ष्मशरीर मान लो। इसमें इसके जन्म से लेकर सभी सूचनाएं दर्ज हैं। कभी यह शुद्ध ऊर्जा था। सृष्टि निर्माण के साथ यह धरती पर वृक्ष बन गया। फिर भूकंप आदि से वृक्ष धरती के अंदर सैंकड़ो किलोमीटर नीचे दब कर कोयला बना। फिर पत्थर का कोयला बना। लाखों वर्षो तक यह भारी तापमान और दबाव झेलता रहा। इसमें अनगिनत परिवर्तन हुए। इसने अनगिनत क्रियाएं कीं। इसने अनगिनत वर्ष बिताए। फिर वह खोद कर निकाला गया। फिर तराशा गया। फिर आपने इसे खरीदा और अपनी अंगूठी में लगाया। ये सभी सूचनाएं इस हीरे में दर्ज हैं। हालांकि हीरे को देखकर हमें इन सूचनाओं का स्थूलरूप में पता नहीं चलता, पर वे सूचनाएं सूक्ष्मरूप में हमें जरूर अनुभव होती हैं, तभी हमें हीरा बहुत सुंदर, आकर्षक और कीमती लगता है। ऐसे ही किसीके सूक्ष्म शरीर के अनुभव से उसका पूरा पिछला ब्यौरा स्थूल रूप में मालूम नहीं होता, पर सूक्ष्मरूप में अनुभव होता है, उसके औसत स्वभाव को अनुभव करके। गीता में योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे अर्जुन के पिछले सभी जन्मों को जानते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि उन्हें अपने मन में दूरदर्शन की तरह सभी दृष्य महसूस हो रहे थे, बल्कि यह मतलब है कि उन सबका निचोड़ सूक्ष्मशरीर के रूप में महसूस हो रहा था। शास्त्रों की शैली ही ऐसी है कि वे अक्सर तथ्यों का पूर्ण विश्लेषण न करके उन्हें चमत्कारिक रूप में रहने देते हैं, ताकि पाठक हतप्रभ हो जाए।
ये अनुभव स्थूलशरीर से लिए अनुभवों से सूक्ष्म होते हैं, हालांकि हमें ऐसा लगता है, सूक्ष्मशरीर के लिए तो वह स्थूल अनुभव की तरह ही शक्तिशाली लगते होंगे, क्योंकि उस अवस्था में जीवित अवस्था के उन विचारों के शोर का व्यवधान नहीं होता, जो अनुभवों को कुंठित करते हैं। साथ में, पिछले सारे जन्मों का अनुभव भी आत्मा में हर समय सूक्ष्म रूप में बना रहता है, जबकि स्थूलशरीर में स्थूल विचारों के शोर में दबा रहता है। हाँ, वह नए अनुभव नहीँ ले सकता, क्योंकि उसके लिए स्थूलशरीर जरूरी होता है। इसलिए उसका आगे का विकास भी नहीँ होता। आगे के विकास के लिए ही उसे स्थूलशरीर के रूप में पुनर्जन्म लेना पड़ता है। मुझे तो सूक्ष्मशरीर डीएनए की तरह जीव की सारी सूचनाएं दर्ज करने वाला लगता है। इसी तरह मुझे डार्क एनर्जी या डार्क मैटर भी स्थूल ब्रह्माण्ड का शाश्वत डीएनए लगता है।

डार्क एनर्जी और सूक्ष्मशरीर की समतुल्यता तभी सिद्ध हो सकती है, अगर उसे हम विभागों में न बांटकर एकमात्र अंधेरभरे आसमान की तरह मानें जिसमें इनके स्थूल रूप की सभी सूचनाएं सूक्ष्म अर्थात आत्म-अनुभवरूप में दर्ज होती हैं। कृपया इसे पूर्ण आत्मानुभव अर्थात आत्मज्ञान न समझ लिया जाए। यह आत्म-अनुभव की सर्वोच्च अवस्था है, जो एक ही किस्म का होता है, और जिसमें कोई सूचना दर्ज नहीँ होती मतलब शुद्ध आत्म-रूप होता है, जबकि सूक्ष्मशरीर वाला आत्म-अनुभव बहुत हल्के दर्जे का होता है, और उसमें दर्ज गुप्त सूचनाओं के अनुसार असंख्य प्रकार का होता है। यह “यत्पिंडे तत् ब्रह्मान्डे” के अनुसार ही होगा।

कुण्डलिनीयोगानुसार क्वांटम एन्टेंगलड पार्टिकल्स डार्क मैटर से आपस में ऐसे ही जुड़े होते हैं जैसे दो प्रेमी सूक्ष्मशरीर से आपस में जुड़े होते हैं

दोस्तों, सूक्ष्मशरीर से सम्पर्क अक्सर होता रहता है। जिससे प्रेमपूर्ण संबंध हो, उसके सूक्ष्मशरीर से सम्पर्क जुड़ा होता है। इसी तरह जिसके सूक्ष्मशरीर से सम्पर्क जुड़ा होता है, उससे प्यार भी होता है। खाली स्थूलशरीर से प्यार नहीं हो सकता। सऊलमेट को ही देख लो। उनको ऐसा लगता है कि वे एकदूसरे की मिरर इमेज़ हैं। बेशक उनकी शक्ल आपस में न मिलती हो, पर उनके मन आपस में बहुत ज्यादा मेल खाते हैं। उनमें एक लड़का होता है, और एक लड़की। बेशक यौन आकर्षण भी उन्हें एकदूसरे के नजदीक लाते हैं, पर इससे एकदूसरे से नजदीकी से रूबरू ही हो सकते हैं, इससे प्यार पैदा नहीँ किया जा सकता। तभी तो आपने देखा होगा कि आदमी सेक्स से संतुष्ट ही नहीं होता। यदि सम्भोग में प्यार पैदा करने की शक्ति होती तो आदमी का कभी तलाक न हुआ करता, आदमी एक से ज्यादा शादियां न करता, और न ही एक से ज्यादा महिलाओं से यौनसंबंध बनाता। मुझे लगता है कि सेकसुअल सम्पर्क एक निरीक्षण अभियान है, जिससे आदमी नजदीक जाकर यह पता लगाता है कि उसे अमुक से प्यार है कि नहीँ। यह अलग बात है कि कई लोग इस सर्वे में इतना गहरा घुस जाते हैं कि बाहर ही नहीं निकल पाते और मजबूरी में वहीं रहकर समझौता कर लेते हैं। कइयों को लगता होगा कि मैं विरोधी बातें करता हूँ। मैं ओपन माइंड रहना पसंद करता हूँ, किसी भी विशेष सोच से चिपके रहना नहीं। कई जगह मैंने कहा है कि संभोग में प्यार को पैदा करने की शक्ति है। यह भी सही है, पर शर्त लागू होती है। इसके लिए काफी समय, प्रयास व संसाधनों की आवश्यकता होती है। जब बना बनाया खाना मिलने की उम्मीद हो, तो खुद क्यों बनाना भाई।

गहरे स्त्रीपुरुष प्यार में सूक्ष्मशरीर बेशक आपस में जुड़े हों, पर वे एकदूसरे से बदले नहीँ जा सकते। गहरे प्यार में एकदूसरे से टेलीपेथीक सम्पर्क बन जाता है, एकदूसरे की सोच और जीवन एकदूसरे को प्रभावित करने लगते हैं। अगर एक पार्टनर कुछ सोचे तो दूसरे के साथ वैसा ही होने लगता है, बेशक वह कितना ही दूर क्यों न हो। मतलब साफ है कि वे एकदूसरे के सूक्ष्मशरीर से प्रभावित होते हैं। पर पता नहीँ क्यों तीसरे सूक्ष्मशरीर के अखाड़े में प्रवेश करने से सभी परेशान होने लगते हैं। हाहा। इससे यह भी सिद्ध होता है कि सूक्ष्मशरीर अनंत आकाश की तरह सर्वव्यापी है। एकबार मेरे विश्वविद्यालय के मित्र के पिता का देहावसान हुआ था। उनसे मैं कई बार प्रेमपूर्ण माहौल में मिला भी था। वह मुझसे सैंकड़ों किलोमीटर दूर थे। मुझे कुछ पता नहीँ था। उसी रात मुझे नींद में अपने पिता की मृत्यु की जीवंत तस्वीर दिखी थी। मैं उसकी वजह नहीँ समझ पा रहा था। अगले दिन जब मुझे खबर मिली तब बात समझ में आई। उस दौरान मैं गहन तांत्रिक कुण्डलिनी योग अभ्यास करता था, संभवतः उससे ही इतना जीवंत महसूस हुआ हो। लगता है कि क्वांटम एन्टेंगलमेंट भी यही है। दोनों एन्टेंगलड क्वांटम पार्टिकल्स आपस में सूक्ष्मशरीर जैसी चीज से जुड़े हो सकते हैं। यह तो जाहिर ही है कि दृश्य ब्रह्माण्ड के आधार में डार्क मैटर और डार्क एनर्जी से भरा अनंत अंतरिक्ष होता है। यह भी पता है कि वही दृश्य जगत के रूप में उभरता है, उसी के नियंत्रण में रहता है, और नष्ट होने पर वही बनकर उसी में समा जाता है। इसका मतलब है कि डार्क मेटर और दृश्य जगत केवल आपस में बारबार रूप बदलता रहता है, कभी न तो कुछ नया बनता है, और न ही बना हुआ नष्ट होता है। यह दुनिया पहले भी हनेशा थी, आज भी है, और आगे भी हमेशा रहेगी। इसमें रोल प्ले करने वाले नए-नए कलाकार आते रहेंगे, और मुक्तिरूपी परमानेंट नेपथ्य में जाते रहेंगे। एन्टेंगलड क्वांटम पार्टिकल्स का सूक्ष्मशरीर एक ही होता है। वह सूक्ष्म शरीर उन पार्टिकल्स का डार्क मेटर है, जिससे वे बने हैं। इसीलिए जब एक पार्टिकल से छेड़छाड़ होती है, तो वह दूसरे को भी उसी समय प्रभावित करती है, बेशक वे दोनों एकदूसरे से कितनी ही दूरी पर क्यों न हो, बेशक एक कण गेलेक्सी के एक छोर पर हो और दूसरा दूसरे छोर पर। इसका मतलब है कि हरेक फंडामेन्टल पार्टिकल का अपना अलग डार्क मेटर है, जो अनंत अंतरिक्ष में फैला होकर अनंत अंतरिक्षरूप ही है। इसी तरह जैसे हरेक जीव एक अलग अनंत अंतरिक्षरूप है, अपनी किस्म का। जैसे आदमी का हरेक क्रियाकलाप उसके सूक्ष्मशरीर में दर्ज हो जाता है, और उसीके अनुसार वह उसीके जैसा बारबार बनाता रहता है, उसी तरह हरेक मूलकण का हरेक क्रियाकलाप उसके डार्क मेटर में दर्ज होता रहता है। प्रलय के बाद जब पुनः सृष्टि प्रारम्भ होने का समय आता है, तब उस डार्क मेटर से पुनः वह मूलकण बन जाता है, और उसमें दर्ज सूचनाओं के अनुसार आगे से आगे सृष्टि निर्माण करने लगता है। इसी तरह से सभी मूलकणों के सहयोग से सृष्टि पुनः निर्मित हो जाती है। शास्त्रों में इसे ऐसे कहा है कि पहले ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई, उनसे प्रजापतियों की उत्पत्ति हुई आदि-आदि। मतलब शास्त्रों में भी मूलकणों को मनुष्यों का रूप दिया गया है, क्योंकि दोनों के स्वभाव एकजैसे हैं। लगता है कि भौतिक विज्ञान सूक्ष्मशरीर को अलग तरीके से समझ रहा है। इसके अनुसार एन्टेंगलड क्वांटम पार्टिकल्स की तरंग आपस में जुड़ी होती है। वह अनंत अंतरिक्ष की दूरी तक भी आपस में जुड़ी ही रहती है।

फिर कहते हैं कि दो मूलकणों को एन्टेगल किया जा सकता है, अगर उन्हें एकदूसरे के काफी नजदीक कर दिया जाए। सम्भवतः इससे उनके डार्क मेटर आपस में एकदूसरे तक पहुंच बना लेते हैं। यह ऐसे ही है, जैसे दो नजदीकी प्रेमियों के सूक्ष्मशरीर एकदूसरे तक पहुंच बना लेते हैं, जैसा ऊपर बताया गया है।

उपरोक्त विवरण से कुछ वैज्ञानिकों और शास्त्रों का यह दावा भी सिद्ध हो जाता है कि भूत, भविष्य और वर्तमान सब आपस में जुड़े हैं, मतलब समय का अस्तित्व नहीं है। जो आज हो रहा है, और जो आगे होगा, वैसा ही पहले भी हुआ था, कुछ अलग नहीँ। सबकुछ पूर्वनिर्धारित है। हालांकि आदमी के कर्म और प्रयास का महत्त्व भी है।