कुंडलिनी योग बनाम जातीय व्यवस्था

मित्रो, गुलामी में प्यार और सहयोग का माहौल नहीं होता, इसीलिए गुलामी को सबसे हेय दृष्टि से देखा जाता है। सुख सुविधाओं वाली गुलामी एक सोने के पिंजरे की तरह लगती है मुझे। शायद इसीलिए इतिहास आजादी के लिए संघर्ष की गाथाओं से भरा पड़ा है। असली और टिकाऊ विकास वही लगता है मुझे, जो परस्पर प्रेमभाव, सहयोग और स्वतंत्रता के साथ हो। आज के युग में मानव प्रबंधन दक्षता मुझे इसी में लगती है कि मानवीय स्वतंत्रता और मानवीय विकास में संतुलन कैसे रखा जाए। स्वतंत्रता के साथ मानवीय शब्द मैने इसलिए जोड़ा क्योंकि स्वतंत्रता भी असीमित नहीं हो सकती। इसे मानवता अर्थात योग के दायरे में रहना ही पड़ेगा। आजादी अगर घृणा, लूटपाट, हिंसा, बलात्कार, धार्मिक और जातीय भेदभाव, और जेहाद जैसे कुकृत्यों के लिए मांगी जाए तो उससे अच्छी वह गुलामी है जिसमें मानवता पनपती और फलती फूलती हो। ऐसी आजादी तो काल्पनिक या आभासी है, और वास्तव में गुलामी से भी बड़ी गुलामी है, क्योंकि ऐसे कुकृत्य आदमी को जन्म मरण के बंधन रूपी परम गुलामी की तरफ ले जाते हैं। आपको पता ही होगा कि ऐसी आजादी कहां कहां मांगी जाती है। हम विस्तार में जाकर वेबसाइट के मूल विषय से भटकना नहीं चाहते और न ही अपने ऊपर पक्षपाती होने का झूठा ठप्पा लगवाना चाहते हैं। इशारों में कहें तो बांग्लादेश को ही देख लो। वहां के बहुसंख्यक लोगों ने कैसे अल्पसंख्यकों पर अत्याचार करने के लिए ही शेख हसीना सरकार से आजादी पाई है, यह सबके सामने है। इसी तरह विकास भी मानवता की हद में ही रहना चाहिए। प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याएं विकास के द्वारा मानवता को लांघने से ही पैदा हो रही हैं।

मुझे लगता है कि प्रेमभाव स्वतंत्रता की कमी का पूरक है। एक पशु प्रेमभाव से बंधा होने के कारण ही प्रतिदिन अपने खूंटे के पास पहुंच जाता है। अगर उसे मालिक के मन में प्रेमभाव न महसूस हुआ करता तो वह प्रतिदिन खूंटे का विरोध किया करता और हर समय मुक्त होकर जंगल में भागने की फिराक में रहता। पशु गहराई में छिपा प्रेमभाव भी समझ जाते हैं। अगर उन्हें मारो भी, तो भी वे उसके आधार में छिपे प्रेम को समझ जाते हैं। प्रेम का यही कमाल है कि वह औरों से अपनी गुलामी को बिना किसी जोर जबरदस्ती से करवा लेता है। मीरा और गोपियां कृष्ण के प्रेम में गुलाम थीं, तो रतनो देवी बाबा बालक नाथ के प्रति मातृभाव की गुलाम थी। मेरे बुजुर्गों के समय मेरे घर में तथाकथित निम्न वर्ग के श्रमिक, गुलामी जैसी करते हुए दिखते थे। वे सुबह दरवाजे के नजदीक पहुंचते ही दरवाजे की दहलीज का और परिवारजनों का हंसमुख होके प्रेमभाव से अभिवादन करते और मेरे बुजुर्ग भी प्रेमभाव से उसका उत्तर देते। वे अलग बर्तन गिलास आदि का प्रयोग करके उन्हें धोकर यथास्थान रखते। जिस स्वच्छ और पौष्टिक खाद्य पेय का प्रयोग स्वामी करता, उसे ही सेवक को अपने जैसा समझते हुए उपलब्ध करवाया जाता। वे अपना काम पूरे श्रद्धाभाव, पूरी ईमानदारी और तत्परता से बिना लापरवाही के करते। जिस भी काम का उन्हें यथायोग्य और प्रेमयुक्त आदेश मिलता उसे प्रसन्नता और शालीनता से स्वीकार करते हुए उसे पूरा करने में जुट जाते। ऐसा नहीं था कि उनसे ऐसा जबरदस्ती करवाया जाता था। बल्कि वे उसे मालिक के द्वारा प्रदर्शित प्रेमभाव के बल से खुद ही वैसा करते थे। यही तो प्रेम का कमाल है। दअरसल प्रेमभाव से आदमी में हर प्रकार का अहंकार भाव नष्ट हो जाता है, स्वामीपन का अहंकार भाव भी। इससे उसके मातहत को यह लगता है कि वह अपना काम स्वामी के लिए नहीं बल्कि प्रेम के लिए कर रहा है। और प्रेम तो ईश्वर का रूप है ही। मतलब वह ईश्वर के लिए काम कर रहा है। इससे बड़ा कर्मयोग क्या हो सकता है, वह भी अनायास ही और हंसी खुशी के साथ भी। ऐसी प्रेममय संस्कृति हर जगह थी। बाद में इसे गलत समझा गया। इसकी तुलना अन्यान्य जगत में प्रचलित गुलामी से की गई। जातिवाद, छुआछूतवाद आदि पता नहीं किन किन शब्दों और उनसे जुड़ी कुत्सित धारणाओं से इसे कलंकित करने का प्रयास किया गया। मुझे तो लगता है कि ज्यादातर मामलों में यह नासमझी या विकृत समझ से खुद ही हुआ। जानबूझकर दुष्प्रचार करने वाले तो मुट्ठी भर लोग ही थे जिनका अपना निजी स्वार्थ विभिन्न वर्गों के बीच वैरविरोध पैदा करने के साथ जुड़ा हुआ था। जातीय भेद और रंगभेद में समानता नहीं है। जातीय व्यवस्था में निम्न जाति के बहुत से लोग भी अपनी आत्मा को परिष्कृत करके महान योगी और संत बने हैं, जिनका सम्मान उच्च जाति के संतों से भी ज्यादा किया गया है, क्योंकि उन्होंने बहुत छोटे दर्जे से शुरु करके बहुत बड़ी उपलब्धि हासिल की है। इस व्यवस्था में आत्मा के रंग को अहमियत दी जाती है, शरीर के रंग को नहीं। वैसे अपवाद और विकृत धारणा जैसे हर जगह है, वैसे ही इसमें भी है। मैं सिर्फ़ मूल अवधारणा और सिद्धांत की बात कर रहा हूं। इस दुनिया में दूध का धुला कोई नहीं है। अन्य संस्कृतियों की गुलामी वाली अवधारणा हो या कुछेक धर्मों की गुलामी वाली अवधारणा हो, दोनों ही प्रेम से नहीं, बल्कि नफरत से भरी थीं, अत्याचारों से भरी थीं। एक विशेष किस्म की अवधारणा तो इससे भी खतरनाक थी, क्योंकि उसके साथ धर्म भी मिला दिया गया था। इसी वजह से इतिहास उनके द्वारा औरों के प्रति खासकर शांतिप्रिय धर्मों के प्रति द्वेष से भरा पड़ा है। हम यह नहीं बोल रहे कि ऐसा हमेशा हुआ ही होगा, पर कर्मों का बीज अवधारणा में ही होता है। मतलब अगर अवधारणा गलत हो, तो उससे गलत काम भी हो ही सकते हैं। जरूरी नहीं कि वे हों ही। देखो, अपवाद तो हर जगह होते हैं। आर्यन संस्कृति में भी गुलामी विकृत अवधारणा वाली रही होगी कई मामलों में, और अन्यान्य संस्कृतियों में भी कई जगह गुलामी मानवीय अवधारणा वाली रही होगी। इसी तरह कुछ छिटपुट मामलों में विशेष धर्म भी काफिरों और अन्य विधर्मियों के प्रति नरम रुख रखते होंगे। पर अगर विस्तृत परिपेक्ष्य में देखें तो दोनों किस्म की संस्कृतियों और धर्मों में गुलामी की मूल अवधारणा एक दूसरे के बिल्कुल विपरीत लगती है। कहीं पर धर्म में ही लिखित विकृत अवधारणा दर्ज है, तो कहीं यह बिना लिखित रूप के ही आम संस्कृति में या खून में विद्यमान है। हालांकि लिखित अवधारणा भी समय और अभ्यास के साथ खून में प्रविष्ट हो ही जाती है। कई धर्मों के मूल में विकृत अवधारणा नहीं है, पर उन्हें मानने वाले लोगों की संस्कृति की छलकपट से सौदेबाजी की अवधारणा उनसे मिश्रित हो गई है। ऐसा नहीं कि आर्यन संस्कृति इससे अछूती है। रामचरितमानस के एक दोहे और मनुस्मृति जैसे धर्मशास्त्रों के कुछ श्लोकों में और रामायण के एक श्लोक में जो विकृत अवधारणा का हवाला दिया जाता है, उसे अपवाद कहा जा सकता है। वह पूरे संस्कृत साहित्य का नगण्य सा अंश है। इसे संस्कृत साहित्य की मूल अवधारणा नहीं कहा जा सकता। इसे तो जुबान का फिसलना भी कह सकते हैं। यह उन विशेष धर्मों की तरह नहीं है जहां विकृत अवधारणा को बारंबार और जानबूझ कर और स्पष्ट रूप में लिखा गया है, ताकि वह विकृत अवधारणा मन में अच्छे से बैठ जाए। जरूर आज के सभ्य समाज में इन सबको मिटा दिया जाना चाहिए क्योंकि बेशक इनका मूल अर्थ कुछ और हो पर मूर्ख लोग तो इन्हें अक्षरशः सत्य समझेंगे। यह भी सत्य है कि हिंदू धर्म में व्यवहार में इनको अक्षरशः माने जाने के ठोस सबूत नहीं मिले हैं और आज तो अधिकांश लोग इनका खंडन और विरोध ही करते हैं। वैसे भी अन्य धर्मों की तरह हिंदू या सनातन धर्म किसी एक किताब के हिसाब से नहीं चला। ये तथाकथित धर्मशास्त्र कभी इसकी मूल पाठ्यपुस्तकों का हिस्सा नहीं रहे। जहां एक अवधारणा में प्रेम की गुलामी है तो दूसरी अवधारणा में डंडे की गुलामी है। दोनों को एक तराजू से नहीं तोला जा सकता। दोनों में जमीन आसमान का फर्क है। पहली किस्म की गुलामी जहां जागृति और मुक्ति की तरफ ले जाती है, वहीं दूसरी किस्म की गुलामी अज्ञान और बंधन की तरफ। योगी लोग भी प्रेम के दीवाने होते हैं, देवता के प्रेम के दीवाने, कुंडलिनी के प्रेम के दीवाने। यह प्रेम की गुलामी स्वतंत्रता से भी बड़ी है। बिना प्रेम की स्वतंत्रता के कोई मायने नहीं है। स्वतंत्रता की सफलता इसी में है कि वह प्रेम करवा सके। अगर गुलामी में ही प्रेम हो जाए तो स्वतंत्रता की क्या जरूरत है, क्योंकि स्वतंत्रता का लक्ष्य तो पहले ही प्राप्त हो चुका है। दअरसल स्वामी खुद भी देवता या कुंडलिनी के प्रेम में दीवाने अर्थात ध्यानमग्न रहा करते थे, इसलिए सेवक भी उस प्रेम से कैसे अछूते रहते।

दोस्तो, ब्राह्मण वर्ग के लोग उच्च कोटि के कुंडलिनी योगी होते थे। मतलब वे कुंडलिनी की पराधीनता से महान आत्मिक सुख प्राप्त करते थे। उस सुख में हिस्सा प्राप्त करने के लिए निम्न वर्ग के लोग खुद ही ब्राह्मण वर्ग के निकट रहते हुए उनकी सेवा करने लग जाते थे। सुख ही वह जैविक चुंबक है जो सभी जीवों को अपनी तरफ खींचता है। यह खुद अपने आप होता था। यह व्यवस्था किसी ने नहीं बनाई है। तभी तो वेदों में लिखा है कि वर्ण व्यवस्था परमात्मा के द्वारा निर्मित है। हैरानी की बात यह है कि कुंडलिनी प्रदत्त आत्मिक सुख कुंडलिनी योगी ब्राह्मण को इतना नहीं मिलता था जितना उसकी सेवा करने वाले को। इत्र की खुशबू दूर से ही महसूस होती है, निकट से नहीं। शायद यह इसलिए क्योंकि अन्य वर्ग दुनियादारी वाले वर्ग थे और उनका हल्का सा आत्मिक सुख भी उनकी प्रचंड दुनियादारी से मिलकर महान आत्मिक सुख बन जाया करता था। इसका मतलब हुआ कि अन्य वर्णों के लोग ब्राह्मण से भी ज्यादा ज्ञानी बन जाया करते थे कालांतर में। ऐसे बहुत से उदाहरण हैं। बाल्मीकि, रविदास और विश्वामित्र आदि उदाहरण तो मुझे याद भी हैं। फिर कहते हैं कि इस व्यवस्था को जन्म से क्यों जोड़ा गया। यह भी किसी ने कर के नहीं किया बल्कि यह भी खुद ही हुआ। भारतवर्ष का महान लोकतंत्र नया नहीं है। यह हजारों वर्ष पुराना है। यहां किसी तानाशाह किस्म के आदमी का फरमान नहीं चलता था। यहां सबकुछ स्वयं ही आम जनमानस की स्वाभाविक सोच और जरूरत के हिसाब से होता था। तभी तो दुनिया के कई लोग भी हैरानी प्रकट करते हैं कि इतने बड़े देश को परमात्मा ही चला रहे हैं क्योंकि यहां स्वतंत्रता और लोकतंत्र की पराकाष्ठा है। खबरों में कुछ होता है पर जो सामने दिखता है वह कुछ और होता है। यहां धर्मप्राण भूमि है और ज्यादातर लोग योगधर्म से प्रेरित होकर खुद ही नियम कानून बना कर रखते हैं। वैसे हर जगह की तरह अपवाद यहां भी हैं।

बढ़ई के बेटे ने अपने जन्म से लेकर अपने ही बढ़ई के काम को संभाला। क्षत्रिय के बेटे ने अपने काम में ही महारत हासिल की। पंडित का बेटा पुरखों की दी गई विद्या को परिष्कृत करके उनसे भी महान पंडित बन गया। इस तरह सभी विद्याएं विकसित होती गईं। कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं है। छोटापन सिर्फ़ और सिर्फ़ काम में निपुणता की कमी में है, और बड़प्पन काम की निपुणता में बढ़ौतरी में है। पुराने ज़माने के आश्चर्य देख लो। एक चट्टान को काट कर बनाए गए मंदिर जैसे मसरूर, दक्षिण के ऐसे आश्चर्यमयी मंदिर जिनको बनाने की कल्पना आज भी इतनी मशीनें होने के बावजूद भी नहीं की जा सकती। ओंकारवाट का महान मंदिर देख लो। ऐसे अनेक उदाहरण हैं। आज स्नातक और यहां तक कि स्नातकोत्तर में भी अपने काम में वह व्यवहारिक और तकनीकी निपुणता नहीं आई है जो पारिवारिक अनुभव को संजोए लोगों में बिना किसी औपचारिक शिक्षा के स्वयं ही आ जाती है। अगर तो उन्हें औपचारिक शिक्षा भी मिले तब तो कहना ही क्या। पूरा विश्व इससे चिंतित है। इसलिए शिक्षा व्यवस्था में रोज़ नए नए परिवर्तन किए जा रहे हैं। घूम फिर कर पहुंचेंगे वे उसी पुरानी वर्णाश्रम व्यवस्था पर। बेशक उसे कोई और नाम, रूप दे दिया जाए।

दोस्तो, जिस लेख को समग्रता से न लिखकर किसी पक्ष को छोड़ दिया गया हो, वह लेखन नहीं दुष्प्रचार होता है। हमारी वैबसाइट की यह खासियत है कि यह बिना किसी भेदभाव के सभी पक्षों को प्रस्तुत करती है इसीलिए जनमानस में इतनी स्वीकार्य है। हम न किसी का समर्थन करते हैं और न विरोध, केवल यथार्थता और उसके पीछे छिपे गूढ़ सिद्धांत को प्रस्तुत करते हैं। हरेक व्यवस्था में गुण दोष होते हैं। कोई पूर्ण नहीं होती। अगर पूर्ण होती तो परिवर्तन ही क्यों होता। पर कुछ शरारती तत्व अपने स्वार्थ के लिए परिवर्तन को बंधक बनाकर अपने पक्ष में मोड़ लेते हैं। इससे सही परिवर्तन नहीं होता और मूल समस्या बनी रहती है। अगर सिर्फ़ परमात्मा की बनाई व्यवस्था ही पूर्ण होती तो आदमी का और उसके प्रयास का कोई औचित्य न रह जाता। इसलिए व्यवस्था का विकास तो होता ही रहना चाहिए पर निष्पक्ष रूप से और व्यापक वैश्विक जनहित को देखते हुए।

कुंडलिनी योग बनाम आजादी

दोस्तों, आजकल मेरा ज्यादातर समय यात्राओं में गुजरता है। यात्राओं के बीच में ही कुछ न कुछ लिखता रहता हुं। मनोरम नजारे होते हैं प्रकृति के। किस्म किस्म के पशु पक्षी अपनी अपनी मर्जी की दुनिया को समेटे हुए आजादी से विचरण कर रहे होते हैं। बेशक उनमें दिमाग कम है, पर आजादी उन्हें भरपूर मिली है। बेशक उनको सुरक्षा भी कम मिलती है। वे आजादी के महत्त्व को भलीभांति पहचानते हैं। इसीलिए तो उन्हें पालतु बनाना लगभग असंभव सा ही होता है। वे समझते हैं कि मनुष्य समाज में बेशक उन्हें बेहतर विकास और सुरक्षा व्यवस्था मिले पर जंगल जैसी आजादी नहीं मिल सकती। विकास और सुरक्षा के साथ सामाजिक बंधन, तनाव, और गुलामी जैसे हानिकारक दोष बिन बुलाए मेहमानों की तरह खुद ही चले आते हैं।

कितना अच्छा हो कि अगर मनुष्य जैसा दिमाग और जंगली जानवर के जैसी स्वतंत्रता एकसाथ मिल जाए। यह तो सोने पे सुहागे जैसी बात हो जाएगी। इससे विकास और सुरक्षा के साथ आजादी भी पूरी प्राप्त होती रहेगी। दोस्तों, जब हम बचपन में होते थे, तब हमारे घर में बहुत से पालतु पशु जैसे गाय, भैंसें, कुत्ते, बिल्लियां आदि हुआ करते थे। हमारे पूर्वजों को पशुओं की स्वतंत्रता की चिंता सबसे ज्यादा हुआ करती थी। सूरज निकलने के साथ ही उन्हें खूंटों से खोलकर हम बच्चों के सुपुर्द कर दिया करते थे कि उन्हें जंगल में चरा कर लाओ। हम सभी बच्चे अपने अपने झुण्डों को पेड़ की पतली टहनियों से हांकते हुए जंगल में इकट्ठे होकर खूब खेल तमाशा किया करते थे। कभी ऊंची पहाड़ी पर चढ़कर खड़ी चट्टानों के बीच में बने छोटे छोटे केबिनों में बैठ जाते ताकि बारिश में भीगने से भी बचाव हो सके। कभी गिरे पड़े पेड़ की टहनी पर चढ़कर झूला झूलते। कभी तालाब में नहाने घुस जाते। उस तालाब के एक कोने में बने एक सुराख से झांकता हुआ एक सर्प हमें अक्सर दिखाई देता था। पर वह कभी बाहर नहीं आता था। उसे हम देवता की तरह मानते थे। बच्चे तो बच्चे ही होते हैं। कहां डरने वाले और नहाने से कहां रुकने वाले। आज वह दृश्य याद करके रूह कांप जाती है। एक बार एक शरारती किस्म के बच्चे ने उस सर्प के बिल के ऊपर पड़ी चट्टान से ऊंची छलांग लगाते हुए तालाब में डुबकी लगाई। वह बड़ी देर तक बाहर नहीं निकला। हमें लगा कि वह दम घुटने से मर गया होगा। हम सभी चिंता में पड़ गए। तभी वह बाहर निकला, वह भी बिल्कुल तरोताजा, जैसे कि कुछ हुआ ही न हो। मुझे आजतक हैरानी होती है कि वह कैसे हुआ। क्या वह सांप सच में कोई देवता था ! वैसे मैं एक अंधविश्वासी नहीं हूं। कई मामले संयोगवश भी हो जाते हैं। इसी तरह, एक बार तो सभी बच्चे एक कोबरा नाग के पीछे दौड़ गए थे और उसे लाठी डंडे से परेशान कर रहे थे। वह नाग भी बचाव में अपना फन ऊंचा उठाता और गुस्से में जोर की फुंकार मारता। तब वे थोड़ा पीछे हट जाते। मैं खतरे को भांप गया था और मुझे उस सांप पर दया भी आ रही थी। मेरे बारंबार समझाने से वे मुश्किल से मान गए और उसे छोड़ दिया। इसी तरह की अजीबोगरीब किस्म की अनेकों शरारतें किया करते जिन्हें यहां लिखा भी नहीं जा सकता।

दोस्तो, यात्राओं के दौरान मुझे एक झील में बने एक छोटे से सुंदर टापू के बारे में पता चला। वहां एक सुंदर विश्राम गृह भी है। वहां साहसिक पर्यटक लोग अक्सर रात्रि निवास के लिए जाकर रुकते हैं। उसे कुछ लोग नागलोक भी कहते हैं। वहां पर जहरीले कोबरा नागों की भरमार है। वे आपको अक्सर वहां रेंगते हुए मिल जाएंगे, एक दो की संख्या में नहीं पर अनेकों। और तो और वे सर्दियों में भी धूप सेकते हुए मिल जाएंगे। वैसे आमतौर पे सांप सर्दियों में नहीं दिखते क्योंकि वे ठंड से बचने के लिए गहरे सुराखों में छिप जाते हैं। उस विश्रामघर में डर के मारे कोई कर्मचारी भी नहीं जाना चाहता। इसीलिए वहां तीस सालों से एक ही स्थानीय व्यक्ति बतौर कर्मचारी नियुक्त हैं। वे ज्यादातर समय वहां रात दिन अकेले ही रहते हैं, क्योंकि पर्यटक तो कभी कभी आते हैं। और वैसे भी, साहसी पर्यटक तो कम ही होते हैं। वे अब वृद्ध भी हो चुके हैं। उनके अनुसार तीस सालों के इतिहास में विश्राम गृह समेत उस टापू में किसी की भी मौत सांप काटने से नहीं हुई है। यह भी आश्चर्य ही है। शायद सांप डर के मारे ही काटते हैं। क्योंकि उस द्वीप पर उन्हें स्वतंत्र माहौल मिलता है, इसलिए वहां डरते नहीं। यदि कोई सर्प विश्राम घर के अन्दर घुस जाए तो वे उसे नंगे हाथों से पूंछ से उठाकर दूर फेंक देते हैं। शायद अभ्यस्त हो चुके हैं। विश्राम घर की रखवाली में जंगली मोर भी उसके आसपास घूमते रहते हैं। उनके डर से भी सांप दूर रहते हैं। शायद पशु पक्षी भी अपने कर्तव्यों को पहचानते हैं। मुझे कईयों ने वहां चलने, वहां घूमने और वहां रुकने के लिए प्रोत्साहित किया पर सच कहूं तो मेरी कभी हिम्मत नहीं हुई। अपनी झूठी शेखी क्यों बघारनी।

दोस्तो, इसी तरह बचपन में कभी हम पहाड़ी की चोटी पर बने गुमनाम से खेतों से मक्की चुरा कर लाते और जंगल में ही आग जलाकर उन्हें भुट्टे बनाकर खा जाते। इससे एक अच्छी सी कैंप फायर पार्टी हो जाती। कभी शहर गए लोगों के बगीचे से केले चुराकर खा जाते। कभी घर से नारियल, गुड़ आदि चुराकर जंगल को ले जाते और वहां सब मिलकर दावत मनाते। कभी कुछ ज्यादा शरारती बच्चे जानबूझकर अपने पशुओं को कांटों की बाड़ लंघवा कर दूसरों की घासनियों में घुसाते ताकि उन्हें एक जगह ही भरपूर घास मिलने से उन्हें लागतार हांकना न पड़े और वे दूध भी ज्यादा दें। कभी बैलों को आपस में लड़ाकर अच्छा खासा मनोरंजन कर लेते। एक बच्चा अपने बैल को सबसे बड़ा चैंपियन मानता था और बड़े गर्व से उसकी बड़ाई किया करता था। एक दिन मेरे दोनों बैलों ने मिलकर उसकी बादशाहत ध्वस्त की। बेशक वह बच्चा चीटिंग चीटिंग करता रहा पर जो होना था वह तो हो गया था। उसके बैल ने मेरे दोनों बैलों की गुलामी स्वीकार कर ली थी। उन दोनों बैलों में बहुत ज्यादा आपसी प्यार होता था। वे दोनों सगे भाई थे। छोटा बैल बहुत ताकतवर था और हर जगह उसका डंका बजता था। पर वह बड़े भाई का सम्मान करते हुए उससे डरा हुआ रहता था और कभी उसकी तरफ आंख नहीं उठाता था। बेशक बड़ा बैल शरीफ और कमजोर था और छोटा बैल उस पर हमला कर रहे बैलों के ऊपर बिजली की तरह टूट पड़ता था। फिर उसका साथ पाकर बड़े बैल में भी लड़ने की हिम्मत आ जाती थी। उनकी जोड़ी मुझे बिल्कुल राम लक्ष्मण की जोड़ी की तरह लगती थी। छोटे बैल को बड़ा बैल ही नियंत्रण में रखता था क्योंकि अति हर जगह खराब होती है। छोटा बैल अक्सर आदमियों को भी मारने दौड़ पड़ता था। उस समय बड़ा बैल भी उसे मारने दौड़ पड़ता था जैसे कि उसे समझा रहा हो। मुझे लगता है कि ये ऐसे ही इशारों से आपस में बातें करते हैं।

दोस्तो, कहने का मतलब है कि स्वतंत्रता के साथ आपसी प्यार और सहयोग से भरे माहौल में समय गुजार कर ही कुंडलिनी अच्छे से विकसित होती है, जिसे समय आने पर अतिरिक्त बल देने से वह जाग भी जाती है। स्वतंत्रता सबको इसलिए अच्छी लगती है क्योंकि आत्मा परम स्वतंत्र है और हर कोई आत्मा को पाना चाहता है। भौतिक स्वतंत्रता का असली सदुपयोग यही है कि उससे आध्यात्मिक स्वतंत्रता मिल सके। नहीं तो कोई फायदा नहीं। जो तनिक फायदा दिखता है, वह भ्रम से दिखता है। वह क्षणिक अर्थात अस्थायी फायदा है। इस अनंत काल की जीवन धारा में अस्थायी चीज का कोई अस्तित्व नहीं है, बेशक वह चाहे कितनी ही बड़ी क्यों न दिखती हो। अगर आजादी मिलने पर भी कुंडलिनी योग नहीं किया तो वह आजादी व्यर्थ है। उससे अच्छी तो वह गुलामी है जिसमें कुंडलिनी योग करने का मौका मिलता हो। बेशक वह बाहर से गुलामी दिखे पर असल में वह परम स्वतंत्रता की ओर ले जा रही होती है। इसीलिए तो पुराने ज़माने में अध्यात्म जिज्ञासु लोग कठिन अनुशासन का पालन करते हुए योग्य गुरु की संगति में रहते थे और उनके बताए हुए मार्ग पर चलते हुए योगसाधना करते थे। बाहर से तो वे गुरु की गुलामी सी करते हुए दिखते थे, पर वास्तव में वे सबसे अधिक या कहो परम स्वतंत्र होते थे। योगी लोग ध्यानयोग से उत्पन्न आत्मा की स्वतंत्रता के बल से ही सारी उम्र एक निर्जन गुफा की कैद या गुलामी में योगसाधना करते हुए बिता देते थे। कई बार जो दिखता है, वह सत्य नहीं होता, और जो सत्य होता है वह दिखता नहीं है। योग और मानवता वाली गुलामी कई बार इसलिए अखरती है क्योंकि उसमें प्रेम की कमी महसूस होती है। इसका अर्थ है कि प्रेम मानवता का सर्वप्रमुख अंग है। साथ में यह भी कि गुलामी की भावना को प्रेम से कम किया जा सकता है। एक तरह से यह कहा जा सकता है कि बच्चे, पशु और अधिकांश महिलाएं सिर्फ प्यार के लिए गुलामी स्वीकार करते हैं। साथ में, इसीलिए तो तांत्रिक योग को सर्वोत्तम योग माना जाता है, क्योंकि इसमें योग, प्रेम के साथ मिश्रित होता है। इससे आम जनमानस में उबाऊ और बंधक जैसा समझा जाने वाला योग परम मनोरंजक और परम स्वतंत्र बन जाता है। दोस्तो, इस पोस्ट को पूर्ण रूप से समझने के लिए इसी ब्लॉग की अगली पोस्ट,”कुंडलिनी योग बनाम जातीय व्यवस्था” भी पढ़ लेनी चाहिए। इस पोस्ट को पूरी तरह से समझने के लिए कृपया इस ब्लॉग की पिछली पोस्ट “कुंडलिनी योग बनाम आजादी” पढ़ें।

कुंडलिनीतंत्र और किन्नरों का परस्पर अटूट रिश्ता

शिव पार्वती सहस्रार में मिलने के बाद विभिन्न चक्रों पर भ्रमण करते हैं। दरअसल असली शिव तो पूर्ण अद्वैत रूप परब्रह्म परमात्मा हैं। असली पार्वती मानसिक ध्यान चित्र है। जो पुरुष और स्त्री के शरीर प्रणयप्रेम में बंधे हैं, वे मात्र एक माध्यम या सहायक हैं, असली शिव और पार्वती का मिलन कराने के लिए। वे दोनों शरीर पहले एकांत स्थान में जाते हैं, जहां किसी का व्यवधान न हो। शिव और पार्वती उसके लिए एक गुफा में गए जहां एक हजार साल तक प्रणय करते रहे। इस एकांत स्थान को सहस्रार चक्र कह सकते हैं। वहां शिव को जागृति प्राप्त हुई। फिर दोनों विभिन्न स्थानों पर घूमने लगे। दरअसल कोई स्थान किसी चक्र विशेष से जुड़ा होता है तो कोई किसी से। इसीलिए कभी कोई चक्र क्रियाशील होता रहा तो कभी कोई। जो चक्र क्रियाशील होता है, वहां ध्यान चित्र अर्थात असली पार्वती भी केंद्रित हो जाती है, यह योग का नियम है। उससे वहां अद्वैतानंदरूप आत्मा अर्थात असली शिव भी ज्यादा अभिव्यक्त होता है, क्योंकि शिव और पार्वती साथ रहना चाहते हैं। शरीरधारी शिवपार्वती अशरीरी शिवपार्वती के सहयोगी हैं, विरोधी नहीं। इसलिए अगर कोई कहे कि असली जागृति तो मन के भीतर असली शिवपार्वती के मिलन से होती है, शारीरिक रोमांस अर्थात प्रणय का इसमें कोई योगदान नहीं, तो यह युक्तियुक्त नहीं लगता है।

शरीरी शिव के अंदर अशरीरी शिव अद्वैतब्रह्म के रूप में है, और अशरीरी पार्वती मानसिक कुंडलिनीध्यानचित्र के रूप में है। शरीरी शिव के अंदर बसी अशरीरी पार्वती जब अशरीरी शिव से पूर्णतः एकाकार हो जाती है, उसे शरीरी शिव का कुंडलिनी जागरण कहते हैं। इसमें शरीरी शिव की मदद शरीरी पार्वती प्रणय संबंध के जरिए करती है। इससे अशरीरी पार्वती को ज्यादा से ज्यादा अभिव्यक्त होने या स्पष्ट मानसिक चित्र बनने के लिए ज़रूरी यौनऊर्जा मिलती है। जिससे वह सहस्रार चक्र तक ऊपर उठकर अशरीरी शिव से एकरूप होकर जागृत हो जाती है।

अब शरीरी पार्वती का वर्णन करते हैं। शरीरी पार्वती का अशरीरी शिव भी उसी अद्वैतब्रह्म अर्थात निराकार ब्रह्म के रूप में ही है, और अशरीरी पार्वती उसका भी मानसिक ध्यानचित्र ही है। शरीरी पार्वती के अंदर बसी अशरीरी पार्वती जब अशरीरी शिव से पूर्णतः एकाकार हो जाती है, उसे ही शरीरी पार्वती का कुंडलिनी जागरण कहते हैं। इसमें शरीरी पार्वती की मदद शरीरी शिव प्रणय संबंध के जरिए करता है। इससे अशरीरी पार्वती को ज्यादा से ज्यादा अभिव्यक्त होने या स्पष्ट मानसिक चित्र बनने के लिए जरूरी ऊर्जा मिलती है। जिससे वह सहस्रार तक ऊपर उठकर अशरीरी शिव से एकरूप होकर जागृत हो जाती है।

अब जब जागृति हो गई है मतलब अशरीरी शिवपार्वती सहस्रार में पूरी तरह से एकजुट हो गए हैं, तो यह मिलन आगे के चैनल के माध्यम से नीचे उतरता है। यद्यपि निचले चक्रों में वे पूरी तरह से एकजुट नहीं होते हैं, पर ऐसा लगता है जैसे तीव्र ध्यान छवि को गहन आनंद के साथ अनुभव किया जा रहा है। सबसे पहले यह मिलन आज्ञा चक्र तक गिरता है। वहां ध्यान सहस्रार को छोड़कर सभी चक्रों में सबसे मजबूत है। फिर यह कंठ चक्र तक उतरता है। फिर हृदय चक्र, फिर मणिपुर चक्र, फिर स्वाधिष्ठान चक्र और अंत में मूलाधार चक्र। यहां यह मिलन बैक चैनल के माध्यम से सहस्रार चक्र में वापस लौटने के लिए तैयार हो जाता है, हालांकि कई कारणों से लंबे समय तक जागृति दोबारा नहीं होती है। शिवपार्वती का यह मिलन या जोड़ा चक्रों के समान विभिन्न स्थानों पर अस्थायी रूप से स्थित होकर पूरे ग्रह पर घूमता रहता है। आप सहस्रार को शिव लोक या कैलाश पर्वत, आज्ञा चक्र को अलकापुरी और इसी तरह अन्य सभी को अन्य लोक कह सकते हैं। आप सभी बारह चक्रों को द्वादश ज्योतिर्लिंग भी कह सकते हैं, जिनमें काशी भी एक है जो शिव को अत्यंत प्रिय है और वहां शिवपार्वती अक्सर आनंदपूर्वक विचरण करते नजर आते हैं।

पुरुष और स्त्री, दोनों के अंदर अशरीरी शिव और पार्वती समान रूप से स्थित हैं। स्त्रीशरीर को पार्वती या ध्यानचित्र का रूप इसलिए दिया गया है, क्योंकि दोनों के गुण ज्यादा मिलते हैं। पुरुषशरीर को शिव या ब्रह्म का रूप इसलिए दिया गया है क्योंकि दोनों के गुण आपस में ज्यादा मिलते हैं। इसका मतलब है कि सभी लोग कुछ न कुछ हद तक उभयलिंगी होते हैं, क्योंकि दोनों के अंदर अशरीरी शिवपार्वती समान रूप में मौजूद हैं, और दोनों के भौतिक शरीर भी अशरीरी शिवपार्वती से मेल खाते हैं, हालांकि अशरीरी शिव और अशरीरी पार्वती का अनुपात कम या ज्यादा होता रहता है। पर जो इन दोनों लिंगों को निडरता के साथ बाहर प्रकट करता है, उसे हिजड़ा या किन्नर कहकर अपमानित किया जाता है। इसके पीछे शरीरवैज्ञानिक दोष भी हो सकते हैं। प्राचीन भारत में इनका बहुत सम्मान होता था, और इन्हें विशिष्ट माना जाता था। गुलामी के दौर में यह सोच बदल गई थी। अब तो तीसरे लिंग को आधिकारिक और कानूनी दर्जा भी प्राप्त हो गया है। किन्नर यिनयांग अर्थात शिवशक्ति सम्मिलन का अच्छा उदाहरण होते हैं। इनमें कुंडलिनी शक्ति कूटकूट के भरी होती है। जब किसी स्त्री के संपर्क में आने से उसी जैसे परिचित पुरुष के संपर्क का भी अहसास हो तो समझ लो उसमें यिनयांग गठजोड़ बहुत ज्यादा और मजबूती से बंधे हैं। जागृति तक पहुंचने के लिए ऐसी पुरुषस्वभावी स्त्री का बड़ा योगदान होता है। उससे मन में हमेशा ही एक ध्यानचित्र मजबूती से बना रहता है, बिना किसी विशेष आध्यात्मिक प्रयास या योगाभ्यास के, या इनका थोड़ा अनुष्ठान ही काफी है। इससे तो यह भी संभव हो सकता है कि जब किसी पुरुष के संपर्क में होने से उसके जैसे स्वभाव वाली स्त्री के संपर्क का अहसास होने लगे, तो वह भी यिनयांग का भंडार है। पक्का ऐसा होता है, क्योंकि बहुतों का अनुभव भी ऐसा ही बोलता है। वे भी ध्यानसाधना और जागृति में सहयोग करते हैं। हां, एक बात और, समलैंगिक, गे, लेस्बियन आदि लोगों के बारे में अलग से लिखने की जरूरत नहीं लगती मुझे, क्योंकि ये भी मुझे किन्नरों की तरह ही उभयलिंगी या शिवशक्ति जैसे ही लगते हैं, मतलब इनमें पुरुष और स्त्री दोनों नजर आते हैं। दरअसल मूलसिद्धांत के रूप में होता यह है कि किन्नरों के प्रति जो संभोग की भावना पैदा होती है, उसमें संयम ज्यादा होता है किसी पूर्ण स्त्री या पुरुष की अपेक्षा। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि स्त्री में पुरुष दिखता रहता है और पुरुष में स्त्री दिखती रहती है। इस विपरीत दर्शन से कामभाव नियंत्रित रूप में हमेशा बना रहता है, मतलब न तो यह आम अवस्था की तरह गायब होता है, और न ही अनियंत्रित रूप से बढ़कर आदमी को यौन अपराध या यौन दुराचार के दलदल में धकेलता है। इससे कामभाव के कारण जो ऊर्जा सहस्रार व अन्य चक्रों से स्वाधिष्ठान व मूलाधार चक्र को जाती है, वह उनसे संबंधित अंगों में क्रियाशीलता पैदा करके बैक चैनल से ऊपर चली जाती है एंप्लीफाय या प्रवर्धित होकर। मतलब वह ऊर्जा संभोग या स्खलन के रूप में बाहर नहीं निकलती। माइक्रोकोस्मिक ऑर्बिट में घूमती हुई ऊर्जा को बेहतरीन समझा जाता है, क्योंकि यह पूरे शरीर को तरोताजा भी करती रहती है, और मूलाधार के प्रभाव से अपने आप को प्रवर्धित भी करती रहती है। अब शायद कोई मुझे किन्नरवैज्ञानिक या किन्नर विशेषज्ञ का दर्जा न दे दे। इसलिए ज्यादा विस्तार में नहीं जाऊंगा। ये दोनों ही किस्म के व्यक्तित्व कुंडलिनी योग और जागृति में बहुत मदद करते हैं। तो क्यों न इसी तर्ज पर किन्नरों को यिनयांग मशीन या कुंडलिनी मशीन की तरह समझा जाए। संभवतः प्राचीन भारत में उनके सम्मान की यही मुख्य वजह थी। इसीलिए भारत में इनकी संख्या काफी है, और यहां इनका अपना पृथक समाज भी है। ये अर्धनारीश्वर की पूजा करते हैं। बाकि तो लोग कहते ही हैं कि उनकी दुआ झूठी नहीं होती, उनकी बोली बात सच साबित होती है आदि, ये सभी कुंडलिनीयोगशक्तिजनित जैसी सिद्धियां ही हैं। अभी हाल ही मैं ताली नाम की बायोपिक वैबसीरीज देखी, जो किन्नर गौरी सावंत के जीवन पर बनी है, जिसने किन्नरों को एक संवैधानिक दर्जा दिलवाने में बड़ी भूमिका निभाई। इसमें दिखाया गया कि कैसे वह अपने उभयलिंगी स्वभाव को प्रकट करने के कारण बचपन से ही ज्यादतियों और नफरत का शिकार बनी रही, और कैसे उसने ऐसे व्यवहार और नजरिए को बदलने में समाज की मदद की।

कुंडलिनी तंत्र धर्म-जनित मानसिक बीमारी को नियंत्रित कर सकता है

दोस्तों, मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि कैसे कुंडलिनी योग मेरी मानसिक स्थिति को स्थिर व तंदुरुस्त बना के रखता था। एक मित्र बोल रहे थे कि अपंग दिमाग प्रेम आदि से स्वस्थ नहीं हो सकता। इस हिसाब से तो प्रेम से कुंडलिनी जागरण भी नहीं हो सकता। पर वह होता है। दिमागी विकृति के विभिन्न स्तर होते हैं। हम यह नहीं कहते कि सभी स्वस्थ हो जाएंगे, पर कुछ न कुछ सुधार तो सबमें होगा। यहां तक कि सभी शारीरिक रोगी खासकर जन्मजात या आनुवंशिक रोगी भी दवा से कहां ठीक होते हैं। मेरे कहने का मतलब था कि जब कुंडलिनी योग एक मानसिक बिमारी जैसा लगता है, तब मानसिक बिमारी भी तो कुंडलिनी योग जैसी बनाई जा सकती है। शायद इसीलिए अधिकांश धर्मों में मानसिक रोग को दैवीय दृष्टि से देखा जाता है। एक बात और है। जब ध्यान को बोला जाए, पर उसके लिए जरूरी ऊर्जा का प्रबंध न किया जाए, तो मानसिक रोग तो फैलेंगे ही। मैं किसी खास धर्म को पिनपोइंट नही करूंगा। पर यह सबको पता है कि ज्यादातर धर्म और अध्यात्म को अंधे जैसे होकर मानने वाले कट्टर किस्म के लोग ही इस समय मानसिक रोगी या मानसिक रोगी जैसे दिखाई देते हैं। पाकिस्तान इसका एक जीता जागता उदाहरण है, जहां एक रिपोर्ट के मुताबिक लगभग पाँच करोड़ से ज्यादा मानसिक रोगी हैं। ऐसा लगता है कि अगर किसी धर्म में पर्याप्त अतिरिक्त ऊर्जा है, तो सही तरीके से ध्यान नहीं है, या फिर ध्यान है ही नहीं। केवल कुंडलिनी तंत्र ही मुझे इसमें अपवाद लगता है, क्योंकि यह ध्यान के लिए भी बोलता है, और उसके लिए जरूरी अतिरिक्त ऊर्जा का प्रबंध भी करता है। सही तरीके से ध्यान और ऊर्जा की कमी से धर्म या अध्यात्म कुछ से कुछ बन जाता है, बिल्कुल उल्टा हो जाता है, अपने असली मूलरूप में रहता ही नहीं है। एकहोर्ट टाले को अवसाद के शिखर पर ही जागरण की अनुभूति मिली। मतलब वे मानसिक रोगी नहीं थे बल्कि कुदरती कुंडलिनी साधना के दौर से गुजर रहे थे, जिसे उन्होंने और दुनिया के लोगों ने गलती से अवसाद समझा हुआ था, इसीलिए वे उसे ढंग से नहीं संभाल पा रहे थे। ऐसे बहुत से उदाहरण हैं। एक दिमागी अपंग आदमी हमारे कार्यालय में अपने पैर के जूतों को अपने सिर पर रखकर दौड़ता हुआ अक्सर आता था। उसके साथ प्रसन्नता और हंसीमजाक के साथ हाथ मिलाना पड़ता था, या फिर उसे एक रुपया देना पड़ता था। न मिले तो साबुन का छोटा सा टुकड़ा उठाकर वैसे ही भाग जाता था। एकबार हमारे सामने उसने एक अजनबी को जोर का तमाचा जड़ा था, जिससे वह पूरा हिल गया था। मुझे लगा कि वह मुझसे नाराज़ था पर मेरी तांत्रिक शक्ति से डरकर उसने मेरा गुस्सा उसपर उतार दिया। आजतक मैं उसके चेहरे पर उस घटना का पछतावा देखता हूं। यह प्यार ही है जो उसे लाइन पर रख रहा था। इसी तरह एक हल्के स्तर का अविवाहित व दिव्यांग व्यक्ति मेरी कुंडलिनी योगशक्ति से प्रभावित होकर मेरे लिए बहुत से काम लगभग बिना मेहनताने के करता था, पर मैं उसके परिवार वालों को उसके नाम पर पैसे दे देता था। ऐसा क्यों न समझा जाए कि अल्जाइमर जैसे मानसिक रोगों में मस्तिष्क के मुख्य पुर्जों के खराब होने से जो अतिरिक्त नाड़ी रसायन अर्थात न्यूरोकैमिकल्स जमा हो जाते हैं, वे हैलुसिनेशन के रूप में असली लगने वाला काल्पनिक चित्र बनाते हैं। इसी तरह योग द्वारा मन पर लगाम लगने से भी ऐसा ही होता होगा, तभी तो स्थायी समाधि चित्र बनता है। पर पहली स्थिति में यह समाधि जैसा मानसिक चित्र अस्वस्थ, अनियंत्रित और जागरण के उद्देष्य से रहित है, पर दूसरी स्थिति में यह नियंत्रित व स्वस्थ ध्यानसमाधि चित्र है, जो जागृति को दिलाता है। क्या साम्यवादियों ने इसी भ्रम के कारण “धर्म की अफीम का नशा” वाक्य ईजाद किया है? शेष, इस विषय को हम मनोवैज्ञानिकों और मनोचिकित्सकों के लिए छोड़ते हैं, क्योंकि हम अपने मूल विषय से भटकना नहीं चाहते।

जाएं तो आखिर जाएं कहां~ एक भावपूर्ण कविता

है कौन यहाँ, है कौन वहाँ 
जाएं तो आखिर जाएं कहाँ।
है नीचे भीड़ बहुत भारी पर
ऊपर मंजिल खाली है।
हैं भीड़ में लोग बहुत सारे
कुछ सच्चे हैं कुछ जाली हैं।
मंजिल ऊपर तो लगे नरक सी
न दाना न पानी है।
निचली मंजिल की भांति न
उसमें अपनी मनमानी है।
है माल बहुत भेजा जाता पर
अंधा गहरा कूप वहाँ।
न यहाँ के ही न वहाँ के रह गए
पता नहीं खो गए कहाँ।
है कौन यहाँ, है कौन वहाँ
जाएं तो आखिर जाएं कहाँ।

नीचे पूरब वाले हैं पर
ऊपर पश्चिम (ही) बसता है।
ऊपर है बहुत महंगा सब कुछ
नीचे सब कुछ सस्ता है।
हैं रचे-पचे नीचे फिरते सब
ऊपर हालत खस्ता है।
बस अपनी अपनी डफली सबकी
अपना अपना बस्ता है।
हैं सारे ग्रह तारे सूने बस
धरती केवल एक जहाँ।
है कौन यहाँ, है कौन वहाँ
जाएं तो आखिर जाएं कहाँ।

अंधों का इक हाथी है हर
कोई (ही) उसका साथी है।
बहुते पकड़े हैं पूँछ तो कोई
सूंड पैर सिर-माथी है।
सब लड़ते रहते आपस में कह
मैं तो कहाँ, पर तू है कहाँ
है कौन यहाँ, है कौन वहाँ
जाएं तो आखिर जाएं कहाँ।

है कटता समय-किराया हरपल
संचित धन ही काम करे।
जा नई कमाई कोष में केवल
खर्च से वो रहती है परे।
है कैसा अजब वपार (व्यापार) है जिसका
तोड़ यहाँ न तोड़ वहाँ।
है कौन यहाँ, है कौन वहाँ
जाएं तो आखिर जाएँ कहाँ।

है नीचे रोक घुटन भारी पर
ऊपर शून्य हनेरा है।
ऊपर तो भूखे भी रहते पर
नीचे लंगर डेरा है।
है अंधा एक तो इक लंगड़ा
दोनों में कोई प्रीत नहीं।
ले हाथ जो थामे इकदूजे का
ऐसा कोई मीत नहीं।
है कैसी उल्टी रीत है कैसा
उल्टा मंजर जहाँ-तहाँ।
है कौन यहाँ, है कौन वहाँ
जाएं तो आखिर जाएँ कहाँ।

है बुद्धि तो धन है थोड़ा
पर धन है तो बुद्धि माड़ी।
है बुद्धि बिना जगत सूना
बिन चालक के जैसे गाड़ी।
बस अपने घर की छोड़ कथा हर
इक ही झांके यहाँ-वहाँ।
है कौन यहाँ, है कौन वहाँ
जाएँ तो आखिर जाएँ कहाँ।

आ~राम तो है सत्कार नहीं
सत्कार जो है आराम नहीं।
है पुष्प मगर वो सुगंध नहीं
है गंध अगर तो पुष्प नहीं।
इस मिश्रण की पड़ताल में मित्रो
भागें हम-तुम किधर कहाँ।
है कौन यहाँ, है कौन वहाँ
जाएँ तो आखिर जाएँ कहाँ।

है कर्म ही आगे ले जाता
यह कर्म ही पीछे को फ़ेंके।
है जोधा नहीँ कोई ऐसा जो
कर्म-तपिश को न सेंके।
न कोई यहाँ, न कोई वहां बस
कर्म ही केवल यहाँ-वहाँ।
है कौन यहाँ, है कौन वहाँ
जाएँ तो आखिर जाएँ कहाँ।
अनुमोदित व सर्वपठनीय भावपूर्ण कविता संग्रह

कुण्डलिनीयोग आत्मरूप को पाने की कुदरती चेष्ठा के तरीके को सीधा करता है

कई बार आदमी मन-पतंग में इतना डूब जाता है कि उसे यह एहसास ही नहीं रहता कि वह उसके शरीर से जुड़ी है। न धागा दिखता है, न उसको खींचने वाला, सिर्फ पतंग दिखती है। सम्भवतः यही अज्ञान है। इसमें ऐसा लगता है कि मन के दृश्यों का अपना पृथक अस्तित्व है, और हम उन्हें बनावटी भूत बनाकर उनसे डरने लगते हैं। वैसे तो कुण्डलिनीयोग में भी ध्यानचित्र ही दिखता है, पर वह एक ही होता है, और उसे अपने रूप में और अपने शरीर के अंदर देखा जाता है। साथ में, ज्यादातर मामलों में उसका भौतिक अस्तित्व नहीं होता या उसके भौतिक अस्तित्व को नकार दिया जाता है। उदाहरण के लिए अगर कोई देवता, पूर्वज, दिवंगत या पूर्णतः बिछड़ा प्रेमी ध्यान चित्र के रूप में है, तब तो उसके प्रति भौतिक सत्यता की बुद्धि खुद ही नहीं होगी। पर अगर कुण्डलिनी चित्र किसी जीवित प्रेमी, गुरु या अन्य भौतिक वस्तु के रूप में है, तो उसके भौतिक रूप से अनासक्ति रखनी पड़ती है, और उसके साथ अद्वैतमय व्यवहार रखना पड़ता है। वैसे ऐसा स्वभाव व व्यवहार कुण्डलिनी योग से खुद ही बनने लगता है। जैसा कि मैंने एक पिछली पोस्ट में बताया था कि कुण्डलिनी योग से कैसे महसूस होता है कि अन्नमय कोष, प्राणमय कोष, मनोमय कोष, विज्ञानमय कोष और आनंदमय कोष सब आपस में जुड़े हैं। इससे यह विश्वास पक्का बना रहता है कि कुण्डलिनी चित्र अपने मन के ही अंदर है, अपने ही देहसंघात का हिस्सा है, अपना ही स्वरूप है, कोई बाहरी पृथक भौतिक वस्तु नहीं। यह स्वयं आदमी की अनासक्ति और अद्वैत की प्रकृति को बढ़ाता है। क्योंकि अपने आप से किसी को आसक्ति नहीं हो सकती है, और न ही अपने आप में किसीको द्वैत महसूस हो सकता है। किसी को नहीँ लगता कि वह एक आदमी नहीं बल्कि दो आदमियों का मिश्रण है। अपने कर्म का फल उसी अकेले आदमी को भोगना पड़ता है, कोई दूसरा नहीं आता। अगर कोई दिनरात भी आईने में बनता-ठनता रहे तो भी वह किसी दूसरे के या ईश्वर के प्रेम में पड़कर करता है, अपने लिए नहीं। प्रेम के लिए दो का होना जरूरी है। अकेले में प्रेम नहीं होता। आसक्ति और प्रेम में सैद्धांतिक अंतर नहीं है केवल स्तर, व्यवहार व दृष्टिकोण का ही अंतर है। इसी मनोवैज्ञानिक सिद्धांत के अनुसार कुण्डलिनी चित्र के प्रति स्वयं ही हो रही आत्मभावना से आत्मा शुद्ध होती रहती है। मतलब कि कुण्डलिनी चित्र को अपने पूर्ण आत्मरूप को जानने के लिए सहारे के रूप में अपनाया जाता है। मुझे तो लगता है कि जब कुंडलिनी ध्यान एक विशेष महत्वपूर्ण या शीर्ष बिंदु तक पहुँचता है, तब यह आत्मा को अस्तित्वगत स्व-अभिव्यक्ति की इतनी अधिक शक्ति देता है कि वह उस बिंदु से परे अव्यक्त रहने में अस्मर्थ हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप कुंडलिनी जागरण होता है। सम्भवतः आत्मरूप को जानने की कुदरती चेष्ठा के रूप में ही मन में विचार आते हैं। पर उन विचारों को समझने का और अपनाने का तरीका उल्टा होता है। हम उन्हें अपना आत्मरूप न समझकर बाहरी,  पराया, स्थूल और भौतिक समझने लगते हैं। इससे उन विचारों से आत्मरूप को शक्ति मिलने की बजाय उनसे संसार की उलझनें और भी आगे से आगे बढ़ती रहती हैं। मतलब कि आत्मा शुद्ध होने की बजाय ज्यादा से ज्यादा अशुद्ध होता जाता है। सम्भवतः यही मोहमाया है। कुण्डलिनी योग इस तरीके को सीधा करने की कोशिश करता है। इससे आदमी का रोजाना का व्यवहार भी सकारात्मक रूप से रूपान्तरित होने लगता है। उसके जीवन में अनासक्ति और अद्वैत का प्रभाव बढ़ने लगता है। इससे स्वाभाविक है कि उसके मन की उलझनें सुलझने लगती हैं। मन स्वस्थ रहने से शरीर भी स्वस्थ रहने लगता है। व्यक्तिगत स्वास्थ्य से सामाजिक स्वास्थ्य में भी सुधार होता है। सामाजिक स्वास्थ्य से समाज के सभी लोग भी अपने अच्छे स्वास्थ्य को महसूस करते हैं। इस तरह समाज से व्यक्ति में और व्यक्ति से समाज में सुधार एक चेन रिएक्शन की तरह आगे से आगे बढ़ता हुआ पूरे विश्व में फैल जाता है, जिसे युग परिवर्तन भी कहते हैं।

कुंडलिनी योग ही सभी धर्मों की रीढ़ है, इसपर आधारित इनका वैज्ञानिक विश्लेषण इनके बीच बढ़ रहे अविश्वास पर रोक लगा सकता है

आक्रमणकारियों से शास्त्रों की रक्षा करने में ब्राह्मणों की मुख्य भूमिका थी

कई बार कट्टर किस्म के लोग छोटीछोटी विरोधभरी बातों का बड़ा बवाल बना देते हैं। अभी हाल ही में दिल्ली के जवाहर लाल यूनिवर्सिटी (जेएनयू) की दीवारों पर लिखे ब्राह्मण विरोधी लेख इसका ताज़ा उदाहरण है। यह सबको पता है कि यह तथाकथित पिछड़े वर्णों ने नहीं लिखा होगा। हिंदु समुदाय के बीच दरार पैदा करने के लिए यह तथाकथित निहित स्वार्थ वाले बाहरी लोगों की साजिश लगती है। ऐसा सैंकड़ों सालों से होता चला आ रहा है। दरअसल यह सामाजिक कर्मविभाजन था, जिसे वर्ण व्यवस्था कहते थे। इसमें सभी बराबर होते थे, केवल यही विशेष बात होती थी कि वंश परम्परा से चले आए काम को करना ही अच्छा समझा जाता था, जैसे व्यापारी का बेटा भी अपने पिता के व्यापार को संभालता है। जबरदस्ती कोई नहीं थी, क्योंकि शूद्र वर्ण के बाल्मीकि ने रामायण लिखी है, विश्वामित्र क्षत्रिय से ब्राह्मण बन गए थे। ऐसे बहुत से उदाहरण हैं। हालांकि ज्यादातर लोग अपने ही वर्ण का काम सँभालने में ज्यादा गौरव, सम्मान और गुणवत्तापूर्णता महसूस करते थे। जैसे वर्णमाला के वर्ण अपना अलग-अलग विशिष्ट रूप-आकार लिए होते हैं, वैसे ही समाज के लोग भी अलग-अलग रूपाकार के कर्म करते हैं। अगर कर्म के अनुसार ही किसी का स्वभाव बन जाता हो, तो यह अलग बात है, पर ऐसा कभी नहीं हुआ कि सबको पंक्ति में खड़ा किया गया और शरीर के रंगरूप के अनुसार विभिन्न किस्म के समूह बनाए गए। वर्ण या वर्णभेद से मतलब रंग या रंगभेद बिल्कुल नहीं है, क्योंकि हरेक वर्ण के लोगों में हरेक किस्म के त्वचा-रंग के लोग मिलेंगे। इसी तरह यह परम्परा विदेशी कास्ट या जाति परम्परा की तरह भी नहीं है। यह नाम भी इसको गलतफहमी से दिया गया लगता है। रही बात ब्राह्मणों की तो यह बता दूँ कि सबसे कठिन जीवन उन्हीं का होता था। उनको विलासिता भरे जीवन से अपने को कोसों दूर रखना पड़ता था। फिर धनसम्पत्ति किस काम की अगर उसे भोग ही न सको। अधिकांशतः उनकी कमाई संपत्ति औरों के या परमार्थ के काम ही आती थी। दुनिया में ठगों की कमी न आज है, न पुराने समय में थी। पहली बात तो उनके पास सम्पत्ति होती ही नहीं थी। भिक्षाजीवी की तरह वे दक्षिणा में मिले मामुली से मेहनताने से अपना और अपने परिवार का गुजारा मुश्किल से चलाते थे। फिर बोलते कि राजा उन्हें बहुत सारी धनसंपत्ति दान में दिया करते थे। राजा भी कितनों को देंगे। कर वसूलने वाले इतनी आसानी से दान दिया करते तो आज कोई गरीब न होता। कुछेक ब्राह्मणों को अगर मुहमाँगा दिया गया होगा तो उसको हमेशा गिनते हुए सब पर तो लागू नहीं करना चाहिए। मुफ्त में तो राजा भी नहीं देते थे। जब उन्हें ब्राह्मण से कोई बड़ा ज्ञान प्राप्त होता था, तभी वे अपने आध्यात्मिक कल्याण के लिए दान देते थे। कहावत भी है कि फ्री लंच का अस्तित्व ही नहीं है। मैं ऐसा इसलिए लिख रहा हूँ, क्योंकि मुझे पता है। मेरे दादा खुद एक आदर्श हिंदु पुरोहित थे, जो लोगों के घरों में पूजापाठ किया करते थे। मैंने उनके साथ काम करते हुए खुद महसूस किया है कि आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करना और उसे दुनिया में बाँटना कितना मुश्किल और आभारहीन माने थैंकलेस काम है। ये काम ही ऐसा है, इसमें लोगों की गल्ती नहीं है। ये बातें अधिकांश लोगों को अब पुनः समझ में आने लग गई हैं। इसीका परिणाम है कि ब्राह्मणों के खिलाफ उक्त भड़काऊ लेखन के विरोध में सोशल मीडिया में “हैशटैग ब्राह्मण लाइफ मैटर्स” ट्रैण्ड किया। इसी तरह “हैशटैग मैं भी ब्राह्मण हूँ” भी ट्विटर पर काफी ट्रैण्ड रहा, जब क्रिकेटर सुरेश रैना के अपने आप को ब्राह्मण कहने का बहुत से वामपंथी किस्म के लोगों ने विरोध किया था। हम ये नहीं कह रहे कि सभी ब्राह्मण आदर्श हैं। पर इससे ब्राह्मणवाद को गलत नहीं ठहरा सकते। ब्राह्मणवाद ज्ञानवाद, बुद्धिवाद या अध्यात्मवाद का पर्याय है। अगर कहीं पर चिकित्सक निपुण नहीं हैं, तो उससे चिकित्सा विज्ञान झूठा नहीं हो जाता। आज जो हम इस ब्लॉग पर आध्यात्मिक ज्ञान से भरी जिन रहस्यवादी कथाओं के विश्लेषण का आनंद लेते हैं, वे अधिकांशतः ब्राह्मणों ने ही बनाई हैं। इन्हें आजतक सुरक्षित भी इन्होंने ही रखा है। अगर ब्राह्मण हमलावरों के आगे झुक जाते तो न तो हिंदु धर्म का नामोनिशान रहता और न ही इस धर्म के रहस्यमयी ग्रंथों का। क्षत्रिय भी किसके लिए लड़ते, अगर ब्राह्मण ही डर के मारे धर्म बदल देते। किसी पर मनगढंत इल्जाम लगाना आसान है, पर अपने अहंकार को नीचे रखकर सच्ची प्रशंसा करना मुश्किल। फिर कहते हैं कि ब्राह्मण विदेशों से यहाँ आकर बसे। एक तो इसके स्पष्ट प्रमाण नहीं हैं, हमला करके आने के तो बिल्कुल भी नहीं, और अगर मान लो कि वे आए ही थे, तो यहाँ प्रेम से घुलमिलकर यहाँ की सरजमीं के सबसे बड़े रखवाले और हितैषी सिद्ध हुए। इसमें बुरा क्या है। हाँ, यह जरूर है कि जिस कुंडलिनी योग के आधार पर बने शास्त्रों और उनकी परम्पराओं का वे निर्वहन करते हैं, उसे वे समझें, प्रोत्साहित करें और हठधर्मिता छोड़कर उसके खिलाफ जाने से बचें।

विश्व के सभी धर्म और सम्प्रदाय कुंडलिनी योग पर ही आधारित हैं

शिवपुराण में भगवान शिव कहते हैं कि वे विभिन्न युगों में विभिन्न योगियों का अवतार लेकर उन-उन युगों के वेदव्यासों की वेद-पुराणों की रचना में सहायता करते हैं। वे लगभग 5-6 पृष्ठ के दो अध्यायों में यही वर्णन करते हैं कि किस युग में कौन वेद व्यास हुए, उन्होंने किस योगी के रूप में अवतार लेकर उनकी सहायता की और उनके कौन-कौन से शिष्य हुए। इससे स्पष्ट हो जाता है कि ध्यान योग माने कुंडलिनी योग ही सनातन धर्म की रीढ़ है। मुझे तो अन्य सारे धर्म सबसे प्राचीन सनातन धर्म की नकल करते हुए जैसे ही लगते हैं। इससे यह भी सिद्ध हो जाता है कि सभी धर्म योग पर ही आधारित हैं, और योग को सरल, लोकप्रिय व व्यावहारिक बनाने का काम करते हैं। जब सबसे योग ही हासिल होता है, तो क्यों न सीधे योग ही किया जाए। अन्य धर्म भी यदि साथ में चलते रहे, तो भी कोई बुराई नहीं है, बल्कि योग के लिए फायदेमंद ही है।

ध्यान ही सबकुछ है

साथ में महादेव शिव कहते हैं कि ध्यान के बिना कुछ भी संभव नहीं है। वे कहते हैं कि केवल ध्यान से ही मोक्ष मिल सकता है, यदि ध्यान न किया तो सारे शास्त्र और वेदपुराण निष्फल हैं।

नए धर्म व नए योग स्टाइल बदलते दौर के साथ अध्यात्म को ढालने के प्रयास से पैदा होते रहते हैं

जमाने के अनुसार सुधार धर्म में भी होते रहने चाहिए। मतलब सुधार का मौका मिलता रहना चाहिए, यह जनता पर निर्भर करता है कि सुधार को स्वीकार करती है या नहीं। हालांकि इसके साथ षड्यंत्र से भी बचना जरूरी होगा, क्योंकि कई लोग दुष्प्रचार आदि तिकड़में लगाकर किसी घटिया सी रचना को भी बहुत मशहूर कर देते हैं। इसके लिए कोई निष्पक्ष संस्था होनी चाहिए जो रचनाओं की सही समीक्षा करके जनता को अवगत करवाती रहे। कट्टर बनकर यदि सुधार का मौका ही नहीं दोगे, तो धर्म जमाने के साथ कंधा से कंधा मिला कर कैसे चल पाएगा। सुधार का मतलब यह नहीं है कि पुरानी रचनाओं को नष्ट किया जाए। सम्भवतः इसी डर से सुधार नहीं होने देते कि इससे पुरानी रचना नष्ट हो जाएगी। पर यह सोच मिथ्या और भ्रमपूर्ण है। नए सुधारों से दरअसल पुरानी रचनाओं को बल मिलता है क्योंकि इनसे वे बाप का दर्जा हासिल करती हैं। आइंस्टीन के गुरुत्वाकर्षण के नए सिद्धांत से न्यूटन का पुराना सिद्धांत नष्ट तो नहीं हुआ। गुरुत्वाकर्षण तो वही है, बस उसको समझने के दो अलगलग तरीके हैं। इसी तरह ध्यान व अद्वैत को अध्यात्म की मूल विषयवस्तु मान लो। इसको प्राप्त कराने के लिए ही विभिन्न पुराण, मंत्र व पूजा पद्धतियाँ बनी हैं। हो सकता है कि इनमें सुधार कर के जमाने के अनुसार नई रचनाएं बन जाएं, जो इनसे भी ज्यादा प्रभावशाली हों, और ज्यादा लोगों के द्वारा स्वीकार्य हों। शरीरविज्ञान दर्शन भी एक ऐसा ही छोटा सा प्रयास है, हालांकि उसमें भी विकास की गुंजाईश है। मेरा व्यक्तिगत अनुभवरूपी शोध इसके साथ जुड़ा है। मतलब यह ऐसा दर्शन नहीं कि मन में आया और बना दिया। जब मुझे इसकी मदद से जागृति का अनुभव हुआ, तभी इस पर प्रमाणिकता की मुहर लगी। यह अलग बात है कि साथ में उस सनातन धर्म वाली सांस्कृतिक जीवनचर्या का भी योगदान रहा होगा, जिसमें मैं बचपन से पला-बढ़ा हूँ। पर इतना जरूर लगता है कि कम से कम पचास प्रतिशत योगदान शरीरविज्ञान दर्शन का रहा ही होगा। अब आम जीवन में इतना शुद्ध शोध तो कहाँ हो सकता है कि अन्य सभी सहकारी कारणों को ठुकरा कर केवल एक ही कारण के असर को परखा जाए। दरअसल एक मेरे जैसे आम आदमी के पास इतना समय नहीं होता कि ऐसे सुधारों और विकास के लिए विस्तृत शोध किया जाए। जैसे ज्ञानविज्ञान के अन्य क्षेत्रों में विशेषज्ञ व अनुभवशाली शोध-वैज्ञानिकों की सेवा ली जाती है, वैसी ही अध्यात्म के क्षेत्र में भी ली जा सकती है। इसमें बुरा क्या है। पर समस्या यह है कि समर्पित शोधार्थी से ज्यादा पार्ट टाइम या हॉबी शोधार्थी ज्यादा अच्छा काम कर सकते हैं। मतलब कि अध्यात्म रोजाना के व्यवहार से ज्यादा जुड़ा होता है। एकाकीपन के शोध से व्यावहारिक नतीजे नहीं निकलते। यह भी समस्या है कि शोध के लिए जागृत व्यक्ति कहाँ से लाए। परीक्षा लेने वाले भी जागृत ही चाहिए। जागृत व्यक्ति को ही असली लक्ष्य का पता होता है। जिसको लक्ष्य की ही पहचान नहीं है, वह उसके लिए शोध कैसे करेगा। आज तक कोई मशीन नहीं बनी जो किसी की जागृति का पता लगा सके। अध्ययन के बल पर कुछ टोटके तो कोई भी ईजाद कर सकता है, पर ज्यादा असली व प्रामाणिक तो जागृत व्यक्ति का शोध ही माना जाएगा।

पुराण व अन्य धर्म संबंधित लौकिक साहित्य शहद के साथ मिश्रित की हुई कड़वी दवाई की तरह काम करते हैं

पिछली पोस्ट में मैं बता रहा था कि कैसे राजा भागीरथ गंगा नदी के प्रवाह में आई रुकावटों को हटा रहा था। हमारे दादा उस बात को शास्त्रों का हवाला देते हुए ऐसे कहा करते थे कि भागीरथ हाथ में कुदाली को लेकर गंगा के आगे-आगे चलता रहा और उसके जलप्रवाह के लिए जमीन खोद कर रास्ता बनाता रहा, जैसे कोई किसान सिंचाई की कूहल के लिए रास्ता मतलब चैनल बनाता है। मत भूलो, शरीर में शक्ति संचालन मार्ग को भी अंग्रेजी में चैनल ही कहते हैं। शब्दावली में भी कितनी समानता है। वे खुद एक छोटे से किसान भी थे। वैसे तो आलोचक विज्ञानवादी को यह बात अजीब लग सकती है, पर इसमें एक गहरा मनोवैज्ञानिक सबक छिपा हुआ है। यह बात मनोरंजक और हौसला बढ़ाने वाली है। साथ में यह अध्यात्मवैज्ञानिक रूप से बिल्कुल सत्य भी है, जैसा कि पिछली पोस्ट में दिखाया गया है। बेशक यह बात हमें स्थूल रूप में समझ नहीं आती थी, पर हमारे अवचेतन मन पर एक गहरा प्रभाव छोड़ती थी। उसी का परिणाम है कि कालांतर में हमारे को खुद ही यह रहस्य अनुभव रूप में समझ आया। पौराणिक ऋषि बहुत बड़े व्यावहारिक मनोवैज्ञानिक होते थे। वे जानते थे कि अनपढ़ और बाह्यमुखी जनता को सीधे तौर पर गहन आध्यात्मिक तकनीकें नहीं समझाई जा सकतीं, इसीलिए वे उन तकनीकों को व्यावहारिक, रहस्यात्मक और मनोरंजक तरीके से प्रकट करते थे, ताकि वे अवचेतन मन पर गहरा असर डालती रहें, जिससे आदमी धीरेधीरे उनकी तरफ बढ़ता रहे। सहज पके सो मीठा होय। एकदम से पकाया हुआ फल मीठा नहीं होता। ऐसी मिथकीय कथाओं पर लोगों की अटूट आस्था का ही परिणाम है कि वे आज तक समाज में प्रचलित हैं। किसीसे अगर पूछो कि उसे इन कथाओं से क्या लाभ मिला, तो वह पुख्ता तौर पर कुछ नहीं बता पाएगा, पर उन्हें पूजनीय व अवश्य पढ़ने योग्य जरूर कहेगा। कई कथाएं ऋषियों ने जानबूझ कर ऐसी बनाई हैं कि उनका रहस्योद्घाटन नहीं किया जा सकता। अगर सभी कुछ का पता चल गया तो विश्वास करने के लिए बचेगा क्या। ऋषि विश्वास और सस्पेंस की शक्ति को पहचानते थे। होता क्या है कि जब कुछ कथाओं के रहस्य से परदा उठता है, तो अन्य कथाओं की सत्यता पर भी विश्वास हो जाता है। वैसे गैरजरूरी कथाओं को उजागर करना ही नामुमकिन लगता है। जो कथा-रहस्य जितना ज्यादा जरूरी है, उसे उजागर करना उतना ही आसान है। वैसे धर्म के बारे ज्यादा कहने का मुझे बिल्कुल शौक नहीं है, पर कई बारे सीमित रूप में कहना पड़ता है, क्यकि अध्यात्म को धर्म के साथ बहुत पक्के से जोड़ा गया है, और कई बारे इनको अलग करना मुश्किल हो जाता है।आज जब विभिन्न धर्मों के बीच इतना अविश्वास बढ़ गया है, तो यह जरूरी हो गया है कि उनका आध्यात्मिक व वैज्ञानिक रूप में वर्णन करके विरोधियों की शंका दूर कर दी जाए।

कुंडलिनी शक्ति गाड़ी है, तो संस्कार उसको दिशानिर्देश देने वाला ड्राइवर~द कश्मीर फाइल्स फिल्म का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण

दोस्तों, इस हफ्ते मैंने बड़े पर्दे पर ‘द कश्मीर फाइल्स’ फिल्म देखी। यह पहली फ़िल्म देखी जो कि सच्ची घटनाओं पर हूबहू आधारित है। ज्यादातर ऐसी ही फिल्में बननी चाहिए, ताकि मनोरंजन के साथसाथ सामाजिक उत्थान भी हो सके। यह फ़िल्म सभी को देखनी चाहिए। इस फ़िल्म में धार्मिक कट्टरवाद और जेहादी बर्बरता का जीवंत चित्रण किया गया है। साथ में, मैं मेडिटेशन के लिए एक झील के पास भी गया। वैसे मैं रोजमर्रा के तनाव व उससे उत्पन्न थकान को दूर करने के लिए गया था, मेडिटेशन तो खुद ही हो गई। मैं पथरीली घास पर विभिन्न शारीरिक पोस्चरों या बनावटों के साथ लम्बे समय तक बैठे और लेटे रहकर झील को निहारता रहा। आती-जाती साँसों पर, उससे उत्पन्न शरीर की, मुख्यतः छाती व पेट की गति पर ध्यान देता रहा। मन के विचार आ-जा रहे थे। विविध भावनाएं उमड़ रही थीं, और विलीन हो रही थीं। मैं उन्हें साक्षीभाव से निहार रहा था, क्योंकि मेरा ध्यान तो साँसों के ऊपर भी बंटा हुआ था, और आसपास के अद्भुत कुदरती नजारों पर भी। सफेद पक्षी झील के ऊपर उड़ रहे थे। बीच-बीच में वे पानी की सतह पर जरा सी डुबकी लगाते, और कुछ चोंच से उठाकर उड़ जाते। सम्भवतः वे छोटी मछलियां थीं। बड़ी मछली के साथ कई बार कोई पक्षी असंतुलित जैसा होकर कलाबाजी सी भी दिखाता। एकबार तो एक पक्षी की चोंच से मछली नीचे गिर गई। वह तेजी से उसका पीछा करते हुए दुबारा से उसे पानी में से पकड़कर ऊपर ले आया और दूर उड़ गया। विद्वानों ने सच ही कहा है कि जीवो जीवस्य भोजनम। एक छोटी सी काली चिड़िया नजदीक ही पेड़ पर बैठ कर मीठी जुबान में चहक रही थी, और इधर-उधर व मेरी तरफ देखते हुए फुदक रही थी, जैसे कि मेरे स्वागत में कुछ सुना रही हो। मुझे उसमें अपनी कुंडलिनी एक घनिष्ठ मित्र की तरह नजर आई। मुझे आश्चर्य हुआ कि इतने छोटे जीव भी किस तरह जीवन और प्रकृति के प्रति आशान्वित और सकारात्मक होते हैं। वे भी अपनी जीवनयात्रा पर बेधड़क होके चले होते हैं। झील के पानी की तट से टकराने की हल्की आवाज को मैं अपने अंदर, अपनी आत्मा के अंदर महसूस करने लगा। चलो कुछ तो आत्मा की झलक याद आई। आजकल ऐसे प्राकृतिक स्थानों की भरमार है, जहाँ लोगों की भीड़ उमड़ी होती है। पर ऐसे निर्जन हालांकि सुंदर प्राकृतिक स्थल कम ही मिलते हैं। कई दूरदराज के लोग जब ऐसी जगहों को पहली बार देखते हैं, तो भावविभोर हो जाते हैं। कई तो शांति का भरपूर लुत्फ उठाने के लिए वहाँ टैंट लगा कर दिन-रात लगातार कई दिनों तक रहना चाहते हैं। हालांकि मैं तो थोड़ी ही देर में शांत, तनावमुक्त और स्वस्थ हो गया, जिससे डॉक्टर से अपॉइंटमेंट लेने का विचार ही छोड़ दिया। खैर मैं फिल्म द कश्मीर फाइल्स के बारे में बात कर रहा था। इसका एक सीन जो मुझे सबसे ज्यादा भावनात्मक लगा, वह है पुष्कर बने अनुपम खेर का दिल्ली की गर्मी में कश्मीर की बर्फ की ठंड महसूस करना। वह अपने पोते को हकीकत बता रहा होता है कि कैसे आजादी के नारे लगाते हुए जेहादी भीड़ ने उन्हें मारा और भगाया था, इसलिए उसे ऐसे लोगों के नारों के बहकावे में नहीं आना चाहिए। वह बूढ़ा होने के कारण उसे समझाते हुए थक जाता है, जिससे वह कांपने लगता है। काँपते हुए वह चारों तरफ नजर घुमाते हुए कश्मीरी भाषा में बड़ी भावपूर्ण आवाज में कहता है कि लगता है कि बारामुला में बर्फ पड़ गई है, अनन्तनाग में बर्फ पड़ गई है, आदि कुछ और ऊंची पहाड़ियों का नाम लेता है। फिर उसका पोता उसे प्यार व सहानुभूति के साथ गले लगाकर उसे स्थिर करता है। गहरे मनोभावों को व्यक्त करने का यह तरीका मुझे बहुत अच्छा लगा। कश्मीरी भाषा वैसे भी बहुत सुंदर, प्यारी और भावपूर्ण भाषा है। इस फ़िल्म के बारे में समीक्षाएं, चर्चाएं और लेख तो हर जगह विस्तार से मिल जाएंगे, क्योंकि आजकल हर जगह इसीका बोलबाला है। मैं तो इससे जुड़े हुए आधारभूत मनोवैज्ञानिक सिद्धांत पर प्रकाश डालूंगा। हम हर बार की तरह इस पोस्ट में भी स्पष्ट करना चाहेंगे कि हम न तो किसी धर्म के विरोधी हैं, और न ही पक्षधर हैं। हम असली धर्मनिरपेक्ष हैं। हम सत्य व मानवता ढूंढते हैं, चाहे कहीं भी मिल जाए। सत्य पर चलने वाला बेशक शुरु में कुछ दिक्कत महसूस करे, पर अंत में जीत उसीकी होती है। हम तो धर्म के मूल में छिपे हुए कुंडलिनी रूपी मनोवैज्ञानिक तत्त्व का अन्वेषण करते हैं। इसीसे जुड़ा एक प्रमुख तत्त्व है, संस्कार।

हिंदु दर्शन के सोलह संस्कार

दोस्तों, हम हिंदु धर्म के बजाय हिंदु दर्शन बोलना पसन्द करेंगे, क्योंकि यह एक आध्यात्मिक मनोविज्ञान लगता है मुझे। दर्शन भी एक मनोविज्ञान या विज्ञान ही लगता है मुझे। इसके सोलह संस्कार आदमी के जन्म लेते ही शुरु हो जाते हैं, और मरते दम तक होते रहते हैं। मृत्यु भी एक संस्कार है, अंतिम संस्कार। हरेक संस्कार के समय कुछ आध्यात्मिक क्रियाएँ की जाती हैं। ये इस तरह से बनाई गई होती हैं कि ये अवचेतन मन पर अपना अधिक से अधिक प्रभाव छोड़े। इससे अवचेतन मन पर संस्कार का आरोपण हो जाता है, जैसे खेत में बीज का रोपण होता है। जैसे समय के साथ जमीन के नीचे से बीज अंकुरित होकर पौधा बन जाता है, उसी तरह कुंडलिनी रूपी अध्यात्म का संस्कार भी अवचेतन मन की गहराई से बाहर निकल कर कुंडलिनी क्रियाशीलता और कुंडलिनी जागरण के रूप में उभर कर सामने आता है। दरअसल संस्कार कुंडलिनी के रूप में ही बनता है। कुंडलिनी ही वह बीज है, जिसे संस्कार समारोह के माध्यम से अवचेतन मन में प्रविष्ट करा दिया जाता है। इस प्रकार, संस्कार समारोह की अच्छी मानवीय शिक्षाएँ भी कुंडलिनी के साथ अवचेतन मन में प्रविष्ट हो जाती हैं, क्योंकि ये इसके साथ जुड़ जाती हैं। इस प्रकार कुंडलिनी और मानव शिक्षाओं का मिश्रण वास्तव में संस्कार है। कुंडलिनी वाहक है, और मानव शिक्षाएं वाह्य हैं अर्थात उनको ले जाया जाता है। समय के साथ दोनों साथ-साथ बढ़ते हैं, और कुण्डलिनी जागरण और मानव समाज की मानवता को एक साथ संभव बनाते हैं। ये संस्कार समारोह मनुष्य की उस जीवन-अवस्था में किए जाते हैं, जिस समय वह बेहद संवेदनशील हो, और उसके अवचेतन मन में संस्कार-बीज आसानी से और पक्की तरह से बैठ जाएं। उदाहरण के लिए विवाह संस्कार। मुझे लगता है कि यह सबसे बड़ा संस्कार होता है, क्योंकि अपने विवाह के समय आदमी सर्वाधिक संवेदनशील होता है। इसी तरह जन्म-संस्कार भी बहुत प्रभावी होता है, क्योंकि अपने जन्म के समय आदमी अंधेरे की गहराइयों से पहली बार प्रकाश में आया होता है, इसलिए वह बेहद संवेदनशील होता है। उपनयन संस्कार आदमी की किशोरावस्था में उस समय किया जाता है, जिस समय उसके यौन हारमोनों के कारण उसका रूपांतरण हो रहा होता है। इसलिए आदमी की यह अवस्था भी बेहद संवेदनशील होती है। संस्कार समारोह अधिकांशतः आदमी की उस अवस्था में किए जाने का प्रावधान है, जब उसमें यौन ऊर्जा का माहौल ज्यादा हो, क्योंकि वही कुंडलिनी को शक्ति देती है। जन्म के संस्कार के समय माँ-बाप की यौन ऊर्जा का सहारा होता है। ‘जागृति की इच्छा’ रूप वाला छोटा सा संस्कार भी कालांतर में आदमी को कुंडलिनी जागरण दिला सकता है, क्योंकि बीज की तरह संस्कार समय के साथ बढ़ता रहता है। इसीको गीता में इस श्लोक से निरूपित किया गया है, “स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात”, अर्थात इस धर्म का थोड़ा सा अनुष्ठान भी महान भय से रक्षा करता है। कुंडलिनी योग के संस्कार को ही यहाँ ‘इस धर्म का थोड़ा सा अनुष्ठान’ कहा गया है।

कुंडलिनी संस्कारों के वाहक के रूप में काम करती है

संस्कार समारोह के समय विभिन्न आध्यात्मिक प्रक्रियाओं से अद्वैत का वातावरण पैदा किया जाता है। अद्वैत के बल से मन में कुंडलिनी मजबूत होने लगती है। उस कुंडलिनी की मूलाधार-वासिनी शक्ति से दिमाग बहुत संवेदनशील और ग्रहणशील अर्थात रिसेप्टिव बन जाता है। ऐसे में जो भी शिक्षा दी जाती है वह मन में अच्छी तरह से बैठ जाती है, और यहाँ तक कि अवचेतन मन तक दर्ज हो जाती है। कुंडलिनी से मन आनन्द से भी भर जाता है। इसलिए जब भी आदमी आनन्दित होता रहता है, तब -तब कुंडलिनी भी उसके मन में आती रहती है, और पुराने समय में उससे जुड़ी शिक्षाएं भी। इस तरह वे शिक्षाएं मजबूत होती रहती हैं। आनंद और कुंडलिनी साथसाथ रहते हैं। दोनों को ही मूलाधार से शक्ति मिलती है। आनन्द की तरफ भागना तो जीवमात्र का स्वभाव ही है। 

शक्ति के साथ अच्छे संस्कार भी जरूरी हैं

शक्ति रूपी गाड़ी को दिशा निर्देशन देने का काम संस्कार रूपी ड्राइवर करता है। हिन्दू धर्म में सहनशीलता, उदारता, अहिंसा आदि के गुण इसी वजह से हैं, क्योंकि इसमें इन्हीं गुणों को संस्कार के रूप में मन में बैठाया जाता है। जिस धर्म में लोगों को जन्म से ही यह सिखाया और प्रतिदिन पढ़ाया जाता है कि उनका धर्म ही एकमात्र धर्म है, उनका भगवान ही एकमात्र भगवान है, वे चाहे कितने ही बुरे काम कर लें, वे जन्नत ही जाएंगे, और अन्य धर्मों के लोग चाहे कितने ही अच्छे काम क्यों न कर लें, वे हमेशा नरक ही जाएंगे, और उनका धर्म स्वीकार न करने पर अन्य धर्म के लोगों को मौका मिलते ही बेरहमी से मार देना चाहिए, उनसे इसके इलावा और क्या अपेक्षा की जा सकती है। वे कुंडलिनी शक्ति का दुरुपयोग करते हैं, क्योंकि उनके मन में जमे हुए अमानवीय संस्कार उस शक्ति की सहायता से उन्हें गलत रास्ते पर धकेलते रहते हैं। इससे अच्छा तो कोई संस्कार मन में डाले ही न जाएं, अर्थात किसी धर्म को न माना जाए मानव धर्म को छोड़कर। जब मानव बने हैं, तो जाहिर है कि मानवता खुद ही पनपेगी। फिर खुद ही मानवीय संस्कार मन में उगने लगेंगे। बुद्ध कहते हैं कि यदि कांटे बोना बंद करोगे, तो फूल खुद ही उग आएंगे। कुंडलिनी शक्ति हमेशा अच्छाई की ओर ले जाती है। पर यदि ज़बरदस्ती ही, और कुंडलिनी के लाख प्रतिरोध के बाद भी यदि बारम्बार बुराइयां अंदर ठूंसी जाए, तो वह भी भला कब तक साथ निभा पाएगी। दोस्तो, सुगन्ध फैलाने वाले गेंदे के फूल के चारों ओर विविध बूटियों से भरा हुआ रंगबिरंगा जंगल उग आता है, जबकि लैंटाना या लाल फूलनू या फूल-लकड़ी जैसी जहरीली बूटी चारों तरफ बढ़ते हुए हरेक पेड़-पौधे का सफाया कर देती है, और अंत में खुद भी नष्ट हो जाती है। मैं शिवपुराण में पढ़ रहा था कि जो शिव का भक्त है, उसका हरेक गुनाह माफ हो जाता है। इसका मतलब है कि ऐसे कट्टर धर्म शिवतंत्रसे ही निकले हैं। तन्त्र में और इनमें बहुत सी समानताएं हैं। इन्हें अतिवादी तन्त्र भी कह सकते हैं। इससे जुड़ी एक कॉलेज टाइम की घटना मुझे याद आती है। एक अकेला कश्मीरी मुसलमान पूरे होस्टल में। उसी से पूरा माहौल बिगड़ा जैसा लगता हुआ। जिसको मन में आया, पीट दिया। माँस-अंडों के लिए अंधा कुआँ। शराब-शबाब की रंगरलियां आम। कमरे में तलवारें छुपाई हुईं। पेट्रोल बम बनाने में एक्सपर्ट। एकबार सबके सामने उसने चुपके से अपनी अलमारी से निकालकर मेरे गर्दन पर तलवार रख दी। मैं उसकी तरफ देखकर हंसने लगा, क्योंकि मुझे लगा कि वो मजाक कर रहा था। वह भी मक्कारी की बनावटी हंसी हंसने लगा। फिर उसने तलवार हटा कर रख दी। मेरे एक प्रत्यक्षदर्शी दोस्त ने बाद में मुझसे कहा कि मुझे हंसना नहीं चाहिए था, क्योंकि वह एक सीरियस मेटर था। मुझे कभी इसका मतलब समझ नहीं आया। हाँ, मैं उस दौरान जागृति और कुंडलिनी के भरपूर प्रभाव में आनन्दमग्न रहता था। इससे जाहिर होता है कि इस तरह के मजहबी कट्टरपंथी वास्तविक आध्यात्मिकता के कितने बड़े दुश्मन होते हैं। जरा सोचो कि जब सैंकड़ों हिंदुओं के बीच में अकेला मुसलमान इतना गदर मचा सकता है, तो कश्मीर में बहुसंख्यक होकर उन्होंने अल्पसंख्यक कश्मीरी हिंदुओं पर क्या जुर्म नहीं किए होंगे। यह उसी के आसपास का समय था। यही संस्कारों का फर्क है। शक्ति एक ही है, पर संस्कार अलग-अलग हैं। इसलिए शक्ति के साथ अच्छे संस्कारों का होना भी बहुत जरूरी है। यही ‘द कश्मीर फाइल्स फ़िल्म’ में दिखाया गया है। यह फिल्म नित-नए कीर्तिमान स्थापित करती जा रही है।

कुंडलिनी के प्रति अरुचि को भी एक मानसिक रोग माना जा सकता है

दोस्तों, मैं पिछले ब्लॉग लेख में कुछ व्यावहारिक जानकारियां साझा कर रहा था। हालाँकि सभी जानकारियां व्यक्तिगत होती हैं। किसीके कुछ जानकारियां काम आती हैं, किसीके दूसरी। पता तो हर किस्म की मानवीय जानकारी का होना चाहिए, क्या पता किस समय कौनसी जानकारी काम आ जाए। व्यक्ति का व्यक्तित्व बदलता रहता है। कभी मैं तन्त्र पर जरा भी यकीन नहीं कर पाता था। हालाँकि उसकी मोटे तौर की जानकारी मुझे थी। वो जानकारी मेरे काम तब आई जब मेरा व्यक्तित्व व कर्म बदला, जिससे मुझे तन्त्र पर विश्वास होने लगा। खैर, तन्त्र का दुरुपयोग भी बहुत हुआ है। जिस तन्त्र की शक्ति से कुंडलिनी जागरण मिल सकता था, उसे भौतिक दुनियादारी को बढ़ावा देने के लिए प्रयोग में लाया गया। परिणाम सबके सामने है। आज का अंध भौतिकवाद और जेहादी किस्म की कट्टर धार्मिकता उसी का परिणाम है। किसी धर्म विशेष के बारे में कहने भर से ही मौत का फतवा जारी हो जाए, और कोई भी आदमी या संस्था डर के मारे कुछ न कह पाए, ये आज के विज्ञान के युग में कितना बड़ा विरोधाभास है। नाम को तो हिंदुस्तान है, पर हिंदुओं की सफाई का अभियान जोरों पर है। एक सुनियोजित अंतरराष्ट्रीय साजिश चल रही है। इसी हिन्दुविरोधी श्रृंखला में अब हिंदूवादी व राष्ट्रवादी सुदर्शन चैनल के प्रमुख सुरेश चव्हाणके जी की हत्या की जेहादी साजिश का खुलासा हुआ है। जबरन धर्मांतरण का सिलसिला जारी है। फिर उन्हें राईस बैग कन्वर्ट भी कहा जाता है। धर्म इसलिए बनाए गए थे ताकि मानवता को बढ़ावा मिले। ऐसा भी क्या धर्म, जो मानवता से न चले। मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है। जो अन्य धर्म और देश इसपर चुप्पी जैसी साध कर इसका अपरोक्ष समर्थन किए हुए हैं, उन्हें यह नहीं पता कि कल को उनका नम्बर भी लग सकता है। डबल स्टैंडर्ड की भी कोई सीमा नहीं आजकल। यदि बैप्टिसम वैज्ञानिक है, तो गंगास्नान भी वैज्ञानिक है। यदि गंगास्नान अंधविश्वास है, तो बैप्टिसम भी अंधविश्वास है। दोगलापन क्यों। जो ट्रूडो सिंघु बॉर्डर पर चले किसान आंदोलन को लोकतांत्रिक बताते हुए उसका समर्थन कर रहे थे, वे आज ट्रक ड्राइवर्स के आंदोलन को अलोकतांत्रिक बता रहे हैं। गहराई से जांचे-परखे बिना कोई भी सतही बयानबाजी नहीं करनी चाहिए। तन्त्र एक शक्ति है। तन्त्र का दुरुपयोग, मतलब शक्ति का दुरुपयोग। प्रकृति को भी इसने विनाश की ओर धकेल दिया है। देवी काली के लिए जो पशु बलि दी जाती थी, वह कुंडलिनी के लिए ही थी। काली कुंडलिनी को ही कहा गया है। पर कितने लोगों ने इसे समझा और इसका सही लाभ उठाया। हालांकि कुछ अप्रत्यक्ष लाभ तो मिलता ही है, पर उसे फलीभूत होने में बहुत वक्त लग जाता है। पर उस शक्ति से कुंडलिनी जागरण के लिए कितने लोगों ने प्रयास किया होगा, और कितना प्रयास किया होगा। शायद बहुत कम या लाखों में से कुछ सौ लोगों ने। उनमें से सही प्रयास भी कितनों ने किया होगा। शायद दस–बीस लोगों ने। उनमें से कितने लोगों को कुंडलिनी जागरण मिला होगा। शायद एक-दो लोगों को। तो फिर काली आदि कुंडलिनी प्रतीकों को समझने और समझाने में कहाँ गलती हुई। इसी का अनुसंधान कराने के लिए ही शायद काल ने वह प्रथा आज लुप्तता की ओर धकेल दी है। वैसे आजकल की अंधी पशु हिंसा से वह प्रथा कहीं ज्यादा अच्छी थी। वैदिक युग में कभी-कभार होने वाली यज्ञबलि से लोग अपने शरीर की अधिकांश जरूरत पूरी कर लिया करते थे। वैसे पशुहिंसा पर चर्चा मानवीय नहीं लगती, पर जिस विषय पर हम बोलेंगे नहीं, उसे दुरस्त कैसे करेंगे। कीचड़ को साफ करने के लिए कीचड़ में उतरना पड़ता है। पशु भी जीव है, उसे भी दुख-दर्द होता है। हिंदु धर्म के अनुसार गाय के शरीर में सभी देवताओं का निवास है। शरीरविज्ञान दर्शन भी तो यही कहता है कि सभी जीवों के शरीर में संपूर्ण ब्रह्मांड स्थित है। इसलिए उसके अधिकारों का भी ख्याल रखा जाना चाहिए। आजकल बहुत सी पशु अधिकारों से जुड़ी संस्थाएँ हैं, पर मुझे तो ज्यादातर निष्पक्ष और निःस्वार्थ नहीं लगतीं। वे जहाँ एक विशेष धर्म में हो रही बड़े तबके की और अमानवीय धार्मिक हिंसा पर मौन रहती हैं, वहीं पर किसी अन्य विशेष धर्म की छोटी सी धार्मिक व मानवतावादी हिंसा पर भी हायतौबा मचा देती हैं। आज तो पशुहिंसा पे कोई लगाम ही नहीं है। मानवाधिकार आयोग की तरह पशु अधिकार आयोग भी होना चाहिए। पर आज मानवाधिकार आयोग भी निष्पक्ष और ठीक ढंग से कार्यशील कहाँ है। अगर मानवाधिकार आयोग की चलती, तो आज धर्म के नाम पर हत्याएँ न हो रही होतीं। आज तो पशुहिंसा के साथ आध्यात्मिक व मानवतावादी प्रतीक भी नहीं जुड़ा है। कोई नियम कायदे नहीं हैं। पशु क्रूरता आज चरम के करीब लगती है, और आध्यात्मिक विकास निम्नतम स्तर पर। आज बहुत से लोग पशुजन्य उत्पादों का बिल्कुल प्रयोग नहीं करते। फिर इतनी ज्यादा पशुहत्या कैसे हो रही है। मतलब साफ है। जो पशुजन्य उत्पाद का उपभोग करते हैं, वे अपनी जरूरत से कहीं ज्यादा उपभोग कर रहे हैं। इससे वे स्वस्थ कम और बीमार ज्यादा हो रहे हैं। आजकल पूरी दुनिया में बढ़ रहा मोटापे का रोग इसका अच्छा उदाहरण है। जो इनका उपयोग नहीं करते, उनकी कमी भी वे पूरी कर दे रहे हैं। तो फिर कुछ लोगों के द्वारा इनको छोड़ने से क्या लाभ। जो ज्यादा उपभोग कर रहे हैं, वे भी बीमार हो रहे हैं, और जो बिल्कुल भी उपभोग नहीं कर रहे हैं, वे भी बीमार हो रहे हैं। ज्यादा उपयोग करने वाले यदि व्यायाम या दवाईयों आदि की सहायता से अपने शरीर को बीमार होने से बचा रहे हैं, फिर भी उनका मन तो बीमार हो ही रहा है। जरूरत से ज्यादा तमोगुण और रजोगुण से मन तो बीमार होगा ही। क्या है कि पाश्चात्य संस्कृति में अधिकांशतः शरीर की बीमारी को ही बीमारी माना जाता है। मन की बीमारी को भी अधिकांशतः अवसाद तक ही सीमित रखा जाता है। वास्तव में अध्यात्म में मन न लगना भी एक मन की बीमारी है। जीवविकास कुंडलिनी के लिए हो रहा है। यदि कोई कुंडलिनी से परहेज कर रहा है, तो वह जीवविकास से विपरीत दिशा में जा रहा है। ऐसी मानसिकता यदि मन की बीमारी नहीं है, तो फिर क्या है। असंतुलित जीवन से ऐसा ही हो रहा है आजकल। संतुलन कहीं नहीं है। इससे अच्छा तो तब होता यदि सभी लोग अपनी भौतिक और आध्यात्मिक जरूरत के हिसाब से इनका उपभोग करते, जैसा अधिकांशतः पुराने समय में होता था। इससे पशुओं पर होने वाला अत्याचार काफी कम होता। और साथ में जो पशु व्यवसाय से जुड़े गरीब लोग हैं, उनके सामने भी रोजी-रोटी का सवाल खड़ा नहीं होता। मेरा एक दोस्त था, जो पशु व्यवसाय से जुड़ा सम्पन्न व्यक्ति था। वह कहता था कि पशुहिंसा से जुड़ा कारोबार वही करता है, जो बहुत गरीब हो, और जिसके पास कमाई का और कोई चारा न हो। पशु मांस का उपभोग भी गरीब और मजदूर तबके के लोग करते हैं, क्योंकि उन्हें सस्ते में इसमें सभी पोषक तत्व आसानी से मिल जाते हैं। उनके पास इतना पैसा नहीं होता है कि वे उच्च पोषकता वाले महंगे शाकाहारी उत्पादों को खरीद सकें। आम मध्यमवर्गीय आदमी ऐसे पाप वाला काम नहीं करना चाहता। उच्चवर्गीय आदमी अगर अपने शौक की पूर्ति के लिए करे, तो वह अलग बात है। पर आज तो लालच इस हद तक बढ़ गया है कि आदमी करोड़पति बनने के लिए पशुहिंसा से जुड़े कारोबार करना चाहता है। पशु कल्याण के नाम पर आदमी को तो भूखों मरने नहीं छोड़ा जा सकता न। मतलब साफ है कि कोई अभियान तभी सफल होता है यदि पूरा समाज उसमें सहयोग करे। मात्र कुछ लोगों से समाज की व्यवस्था में एकदम से पूर्ण परिवर्तन नहीँ आता। हालांकि आ भी जाता है, पर उसमें समय काफी लग सकता है। यदि सभी लोग एकसाथ परिवर्तित हो जाएं, तो समाज भी एकदम से परिवर्तित हो जाएगा। लोगों का समूह ही समाज है। मैं किसी भी जीवनपद्धति के पक्ष या विपक्ष में नहीं बोल रहा। कोई भी व्यक्ति अपनी स्थिति-परिस्थिति के अनुसार अपनी जीवनचर्या चुनने के लिए स्वतंत्र है। किसी को कुछ सूट कर सकता है, तो किसी को कुछ। मैं तो सिर्फ अध्यात्मिक व वैज्ञानिक रूप से वस्तुस्थिति को बयां करके उसे चर्चा में लाने की कोशिश कर रहा हूँ। हम नाजायज जीवहिंसा की कतई वकालत नहीं करते, इसलिए कुछ नियम कायदे तो होने ही चाहिए। यदि कोई कहे कि ये सब तो भौतिकवाद से सम्बंधित बातें हैं, इनसे अध्यात्म कैसे मिलेगा। दरअसल असली अध्यात्म कुंडलिनी जागरण के बाद शुरु होता है। और कुंडलिनी जागरण मानवीय भौतिकवाद के चरम को छूने के बाद मिलता है। असली अद्वैत मानवीय द्वैत के चरम से शुरु होता है। असली अध्यात्म मानवीय विज्ञान के चरम से शुरु होता है। कई लोग अध्यात्म के वैज्ञानिक विश्लेषण का विरोध यह मानकर करते हैं कि कुण्डलिनी की प्राप्ति तर्कशील या लॉजिकल दिमाग से नहीं होती। वे अध्यात्म से बेखबर से बने रहते हैं। वे अध्यात्म के लिए कोई प्रयास नहीं करते। वे एक अनासक्त की तरह दिखावा करते हुए हरेक काम के बारे में लापरवाह व अहंकारपूर्ण व्यवहार से भरे हुए बने रहते हैं, और पूर्णता का ढोंग सा करते रहते हैं। ऐसे लोग आसक्त और अज्ञानी से भी निचले पायदान पर स्थित होते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि असली आसक्त या अज्ञानी आदमी तो कभी न कभी अनासक्ति व ज्ञान व जागृति के लिए प्रयास जरूर करेगा, पर अनासक्ति या ज्ञान का ढोंग करने वाला आदमी उसके लिए कभी प्रयास नहीं करेगा, क्योंकि वह इस धोखे में रहेगा कि वह पहले से ही अनासक्त और ज्ञानी है। असली अनासक्ति में तो आदमी को अनासक्ति के बारे में पता ही नहीं चलता, न ही वह अनासक्ति के नाम पर दुनियादारी से दूर भागता है। कई लोग इसलिए बेपरवाह बने रहते हैं, क्योंकि उन्हें कई लोग बिना प्रयास के ही या उनके बचपन में ही आध्यात्मिक या जागृत दिखते हैं। पर वे इस बात को नहीं समझते कि उनके पिछले जन्म का प्रयास उनके इस जन्म में काम कर रहा है। बिना प्रयास के कुछ नहीं मिलता, सांस भी नहीं। सच्चाई यह है कि दिमाग की वास्तविक तर्कहीन या इलॉजिकल अवस्था वैज्ञानिक तर्कों और अन्वेषणों का चरम छू लेने के बाद ही होती है। जब आदमी अध्यात्म का वैज्ञानिक कसौटी पर पूरा अन्वेषण कर लेता है, तब वह थकहार कर चुप होकर बैठ जाता है। वहीँ से ईश्वर-शरणागति और विश्वास पर आधारित असली तर्कहीनता शुरु होती है। उससे पहले की या अन्वेषण का प्रयास किए बिना ही जबरदस्ती पैदा की गई तर्कहीनता एक ढोंग ही होती है। यह अलग बात है कि लोग औरों की नकल करके आध्यात्मिक बनने का दिखावा करते हैं। वह भी ठीक है। समथिंग इज बैटर देन नथिंग। पर इसमें अटूट विश्वास की आवश्यकता होती है। नहीं तो क्या पता यह परलोक में काम आएगा भी या नहीं। मेरे द्वारा यहाँ पर किसीको निरुत्साहित नहीं किया जा रहा है। केवल संभावना को खुल कर व्यक्त किया जा रहा है। किसको पता कि परलोक में क्या होता है, पर अपनी सीमित बुद्धि से अंदाजा तो लगाया ही जा सकता है। आप्तवचन पर भी आज के वैज्ञानिक युग में सोचसमझ कर ही यकीन किया जा सकता है, आंख बंद करके नहीं। मैं यह दावा नहीं कर रहा कि मुझे कुण्डलिनी जागरण हुआ है। मुझे गुरुकृपा और शिवकृपा से कुंडलिनी जागरण की झलक दिखी है। क्योंकि हर जगह तो क्षणिक, झलक, कुंडलिनी जैसे सहयोजित शब्द नहीं लिखे जा सकते, विस्तार के भय से, इसलिए जल्दी में जागरण या कुण्डलिनी जागरण ही लिखना पड़ता है। यदि कोई मेरी हरेक ब्लॉग पोस्ट ध्यान से पढ़ेगा, तो उसे ही पता चलेगा कि वह जागरण कैसा है। चीज की क्षणिक झलक देखने का यह मतलब नहीं कि उसने उस चीज को ढंग से देख लिया हो। हाँ, कुंडलिनी जागरण की क्षणिक झलक देखकर मुझे यह यकीन हो गया है कि कुंडलिनी जागरण का अस्तित्व है, और वह आध्यात्मिकता के लिए जरूरी है। और यह भी कि वह कैसे प्राप्त हो सकता है। वैसे ही, जैसे किसी चीज की झलक देख लेने के बाद उस चीज के अस्तित्व के बारे में विश्वास हो जाता है, और उसे पाने का तरीका पता चल जाता है। वस्तुतः तो मैं आम आध्यात्मिक व्यक्ति के जैसा ही एक साधारण कुंडलिनी जिज्ञासु हूँ। आध्यात्मिक चर्चा करना मेरा जन्मजात शौक है। जब विद्वान लोग उपलब्ध होते थे, तब आमनेसामने चर्चा कर लेता था। अब ब्लॉग पर लिखता हूँ। ब्लॉग मुझे सबसे अच्छा तरीका लगा। इसमें कोई बेवजह ट्रोलिंग नहीं कर सकता। किसी का कमेंट यदि अच्छा लगे तो अप्रूव कर दो, वरना डिनाय या डिलीट कर दो। आमनेसामने की चर्चा में धोखा लगता है। कई लोग बाहर से आध्यात्मिक जैसा बनने का ढोंग करते हैं। उन पर विश्वास करके यदि उनसे चर्चा करो, तो वे उस समय बगुला भगत की तरह हाँ में हाँ मिलाते हैं, और बाद में धुआँ देने को तैयार हो जाते हैं, क्योंकि वे दूसरे आदमी की आध्यात्मिकता को उसकी कमजोरी समझकर उसका नाजायज फायदा उठाते हैं। यहां तक कि कई लोग तो आध्यात्मिक चर्चा सुनते समय ही सुनाने वाले का मजाक उड़ाने लग जाते हैं। दोस्त भी अजनबी या दुश्मन जैसे बनने लगते हैं। इसलिए जो अच्छे विचार मन में आते हों, उनको किसीको सुनाने से अच्छा लिखते रहो। कम से कम लोग पागल तो नहीं बोलेंगे। अगर लिखने की बजाय उनको अपने में ही बड़बड़ाने लगोगे, तब तो लोग पक्का पागल कहेंगे। दो-चार लोगों के इलावा मेरे अपने दायरे से कोई भी मेरे ब्लॉग के फॉलोवर नहीं हैं। उनमें भी अधिकतर वे हैं, जिन्होंने कभी मेरी एक-आध पोस्ट को या किताब को पसंद किया, और फिर मैंने उनसे अपना ब्लॉग फॉलो करने के लिए कहा। कइयों को तो फॉलो करने के लिए स्टेप बाय स्टेप निर्देशित किया। वैसे उनमें से कोई मेरे ब्लॉग को छोड़कर भी नहीं गया। मतलब साफ है, उन्हें इससे लाभ मिल रहा है। वैसे मैं अपने लाभ के लिए ब्लॉग लिखता हूँ, पर यदि किसी और को भी लाभ मिले, तो मुझे दोगुनी खुशी मिलती है। मेरे अधिकाँश मित्रों व परिचितों को मेरे ब्लॉग के बारे में पता है, पर किसीने उसके बारे में जानने की कोशिश नहीं की, फॉलो करना तो दूर की बात है। मेरे अधिकांश फॉलोवर दूरपार के और विदेशों के हैं। उनमें भी ज्यादातर विकसित देशों के हैं। इससे भी इस धारणा की पुष्टि हो जाती है कि वैज्ञानिक या बौद्धिक या सामाजिक विकास के चरम को छू लेने के बाद ही असली अध्यात्म शुरु होता है। एक कहावत भी है कि घर का जोगी जोगड़ा और दूर का जोगी सिद्ध। वैसे भी मुझे सिद्ध कहलाए जाने का जरा भी शौक नहीं है। मंजिल पर पहुंच गया, तो सफर का मजा खत्म। असली मजा तो तब है अगर मंजिल मिलने के बाद भी सफर चलता रहे। इससे सफर और मंजिल का मजा एकसाथ मिलता रहता है। सच्चाई यह है कि पूर्ण सिद्धि कभी नहीं मिलती। आदमी चलता ही रहता है, चलता ही रहता है, कभी रुकता नहीं। बीच-बीच में जागरण रूपी चैन की सांस लेता रहता है। वैसे अभी विकासशील देशों में वेबसाइट और ब्लॉग का प्रचलन कम है। जागृति वाली वैबसाइट बनाने और पढ़ने के लिए तो वैसे भी अतिरिक्त ऊर्जा की जरूरत पड़ती है। जहाँ रोजमर्रा की आम जरूरतों को पूरा करने के लिए ऊर्जा कम पड़ती हो, वहाँ जागृति के लिए अतिरिक्त ऊर्जा कहाँ से लाएंगे। यहाँ ज्यादातर लोगों को व्हाट्सएप और फेसबुक से ही फुर्सत नहीं है। जो ज्ञान एक विषय समर्पित ब्लॉग व वैबसाइट से मिलता है, वह फेसबुक, क्वोरा जैसे माइक्रोब्लॉगिंग प्लेटफार्म से मिल ही नहीं सकता। शुरुवाती लेखक के लिए तो क्वोरा ठीक है, पर बाद में वैबसाइट-ब्लॉग के बिना मन नहीं भरता। मुझे नेट पर अधिकांश वेबसाइट व ब्लॉग भी पसंद नहीं आते। जरूरत के हिसाब से उनसे जानकारी तो ले लेता हूँ, पर उन्हें फॉलो करने का मन नहीं करता। एक तो वे एक अकेले विषय के प्रति समर्पित नहीं होते। दूसरा, विस्तृत वैज्ञानिक चर्चा के साथ भी नहीं होते। तीसरा, या तो उनमें पोस्टों की बाढ़ सी होती है, या फिर लम्बे समय तक कोई पोस्ट ही नहीं छपती। चौथा, उन पोस्टों में भाषा व व्याकरण की अशुद्धियाँ होती है। उनमें व्यावहारिक दृष्टिकोण भी नहीं होता, और वे किसी दूसरे ग्रह की रहस्यात्मक कहानियाँ ज्यादा लगती हैं। उनमें मनोरंजकता और सकारात्मक या सार्थक संपर्कता कम होती है। समय की कमी भी एक वजह होती है। उनमें सभी विषयों की खिचड़ी सी पकाई होती है। इससे कुछ भी समझ नहीं आता। कहा भी है कि एके साधे सब सधे, सब साधे सब जाए। अगर कोई ज्योतिष का सिर-पैर एक करने वाला पूर्ण समर्पित ब्लॉग, डिमिस्टिफाइंगज्योतिषडॉटकॉम आदि नाम से हो, तो मैं उसे क्यों फॉलो नहीं करूंगा। दूसरा, उनमें विज्ञापनों के झुंड चैन नहीं लेने देते। इसीलिए मैंने अपने ब्लॉग में विज्ञापन नहीं रखे हैं। पैसा ही सबकुछ नहीं है। जो कोई किसी प्रोडक्ट के बारे में विज्ञापन देता है, उसे खुद उसके बारे में पता नहीं होता, क्योंकि उसको उसने प्रयोग करके कहाँ परखा होता है, या कौन सा सर्वे किया होता है। फिर जनता को क्यों ठगा जाए। पर्सनल ब्लॉग के नाम भी प्रोफेशनल व विषयात्मक लगने चाहिए, ताकि लोग उनकी तरफ आकर्षित हो सकें। सक्सेनाडॉटकॉम या जॉनडॉटकॉम नाम से अच्छा तो म्यूसिकसक्सेनाडॉटकॉम या राइटिंगजॉनडॉटकॉम है। इससे पता चलेगा कि इन ब्लॉग्स का विषय संगीत या लेखन है। विषयात्मक लेखों के बीच में अन्य विषय, व्यक्तिगत लेख और व्यक्तिगत घटनाक्रम भी लिखे जा सकते हैं। ऐसी वैबसाइट टू इन वन टाइप कही जा सकती हैं। ये प्रोफेशनल भी होती हैं, और पर्सनल भी। ये ज्यादा प्रभावशाली लगती है। अपनी पर्सनल वैबसाइट के लिए 200-250 रुपए का प्रति महीने का खर्चा लोगों को ज्यादा लगता है। पर वे जो 200 रुपए की अतिरिक्त मोबाइल सिम प्रति माह रिचार्ज करते हैं, उसका खर्चा उन्हें ज्यादा नहीं लगता। वैबसाइट से तो दुनिया भर की जानकारी मिलती है, पर अतिरिक्त सिम से तो कुछ नहीं मिलता, सिर्फ जिम्मेदारी का बोझ ही बढ़ता है। नकारात्मक जैसी किस्म के लोगों की भी आजकल कोई कमी नहीं। मैं क्वोरा पर कुण्डलिनी से संबंधित प्रश्न का एक उत्तर पढ़ रहा था, तो उसमें यह कहकर कुंडलिनी पर ही प्रश्नचिन्ह लगाया गया था कि पुराने धर्मशास्त्रों में कुंडलिनी के बारे में ऐसा कहाँ लिखा गया है, जैसे लोग आजकल सोशल मीडिया पर दावे कर रहे हैं। शायद उसका कहने का मतलब था कि शास्त्रों के कहे के अतिरिक्त अनुभव गलत है, और उसे सोशल मीडिया पर बताना भी गलत है। मतलब, अपनी कमजोरियों का ठीकरा शास्त्रों पर फोड़ना चाहते हैं, और उन्हें अपनी खीज और ईर्ष्या के लिए ढाल की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं। ओपन माइंड नहीँ हैं। शास्त्रों के कंधों पर रखकर बन्दूक चलाना चाहते हैं, अपना कोई योगदान नहीं देना चाहते। यह उस दमनकारी नीति से उपजी सोच है, जैसी विदेशी हमलावरों ने सैंकड़ों सालों तक इस देश में बना कर रखी। यह ऐसी सोच है कि असली कुंडलिनी योगी समाज में दबे हुए से रहे और अपनी आवाज कभी बुलंद न करें। फिर समाज में आध्यात्मिकता कैसे पनपेगी। हैरानी इस बात की कि उस पर ढेर सारे अपवोट और अनुकूल कमेंट मिले हुए थे। मैंने उस पर कुछ कहना ठीक नहीं समझा, क्योंकि जिस मंच ने पहले ही निर्णय ले लिया हो, उस पर चर्चा करके क्यों ट्रोल हुआ जाए।

चलो, फिर से कुण्डलिनी से जुड़ी भगवान कार्तिकेय की कथा पर वापिस चलते हैं। तारकासुर को मारने विभिन्न देवता आए, पर वे उसे मार न सके। फिर शिव का मुख्य गण वीरभद्र आया। उसने अपने अमित पराक्रम से उसे लगभग मरणासन्न कर दिया। पर वह फिर उठ खड़ा हुआ। अंत में सभी देवताओं ने मिलकर कार्तिकेय को उसे मारने भेजा। तब राक्षस तारकासुर ने उस बालक को देखकर हँसते हुए भगवान विष्णु से कहा कि वह बड़ा निर्लज्ज है, इसीलिए उसने बालक को उससे लड़कर मरने के लिए भेजा है। फिर उसने विष्णु को कोसते हुए कहा कि वह प्रारम्भ से ही कपटी और पापी है। उसने रामावतार में धोखे से बाली को मारा था, और मोहिनी अवतार में राक्षसों को ठगा था। इस तरह से तारकासुर ने विष्णु के बहुत से पाप गिनाए, और कहा कि वह उसको मारकर उन सभी पापों की सजा देगा। फिर कार्तिकेय ने तारकासुर पर हमला किया। भयंकर युद्ध हुआ। उससे पवन स्तम्भित जैसी हो गई, और धरती कांपने लगी। सूर्य भी फीका पड़ने लग गया। कार्तिकेय ने अपनी अत्यंत चमकदार शक्ति तारकासुर पर चलाई। इससे तारकासुर मर गया। उसके बहुत से सैनिक मारे गए। कई सैनिकों ने देवसेना की शरणागति स्वीकार करके अपनी जान बचाई। तारकासुर का एक राक्षस बाणासुर युद्ध से जिंदा भाग गया था। वह क्रोंच पर्वत को प्रताड़ित करने लगा। जब उसने उसकी शिकायत कार्तिकेय से करी, तो उसने बाणासुर को भी मार दिया। इसी तरह प्रलम्बासुर राक्षस शेषनाग के पुत्र कुमुद को दुखी करने लगा। कार्तिकेय ने उसका वध भी कर दिया।

तारकासुर वध का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण

वीरभद्र को हम शिव का प्रमुख व्यक्तित्व कह सकते हैं, क्योंकि वह शिव का मुख्य गण है। मुख्य सेनापति में राजा के गुण तो आएंगे ही। एक प्रकार से यह तांत्रिक व्यक्तित्व है। ऐसे व्यक्तित्व से तारकासुर यानी अज्ञान काफी कमजोर या मरणासन्न हो जाता है, पर मरता नहीं है। मरता तो वह शिवपुत्र कार्तिकेय से ही है। कार्तिकेय यहाँ अथक व अटूट संभोग योग से उत्पन्न वीर्यतेज को सहस्रार को चढ़ाने से फलीभूत कुंडलिनी जागरण का प्रतीक है। सात्विक विष्णु भी तारकासुर को मारने आया। पर उसे उसके पुराने पाप कचोटते रहे। दुनिया में अक्सर देखा जाता है कि बहुत सात्विक आदमी अपने द्वारा हुआ छोटा सा पाप भी नहीँ भूल पाते। वे तांत्रिक ऊर्जा का उपभोग भी नहीं करते, जो पापों को नष्ट करने के लिए तांत्रिक बल देती है। अपने पुराने पापों की कुंठा ही उनकी कुंडलिनी को जागृत नहीं होने देती। इसीको ऐसा कहकर बताया गया है कि तारकासुर भगवान विष्णु से उसके पुराने पापों की सजा देने की बात कर रहा है। कार्तिकेय को बालक इसलिए कहा जाता है क्योंकि वह कुण्डलिनी योग से निर्मित मानसिक पुरुष है, जो नया-नया ही पैदा हुआ है, और भौतिक वस्तुओं से कम प्रभावी प्रतीत होता है। सूर्य, चंद्र, वायु आदि देवता बहुत पुराने समय से लेकर हैं। उनका भौतिक अस्तित्व है, जिससे वे कठोर या दृढ़ शरीर वाले हैं। इसीलिए उन्हें तुलनात्मक रूप से वयस्क माना गया है। पर कुण्डलिनी तो शुद्ध मानसिक चित्र है, जिससे वह बच्चे की तरह मुलायम है। क्योंकि कुंडलिनी चित्र मूलाधार की उसी वीर्यशक्ति से पैदा होता है, जिससे सन्तान पैदा होती है। इसीलिए कार्तिकेय को बच्चा कहा गया है। कार्तिकेय ने तारकासुर पर हमला किया, मतलब कुंडलिनी योगी ने शक्तिशाली तांत्रिक योग से प्राणोत्थान को लंबे समय तक बना कर रखा, जिससे चमचमाती कुंडलिनी लम्बे समय तक लगातार सहस्रार में बनी रही। पवन स्तम्भित हो गई, मतलब शक्तिशाली प्राणोत्थान से योगी की साँसें बहुत धीमी और गहरी अर्थात लगभग न के बराबर हो गईं। योग की ऐसी उच्चावस्था में प्राण ही ऑक्सीजन की ज्यादातर जरूरत पूरी करने लगता है। धरती कांपने लगी, मतलब प्राणोत्थान से पूरे शरीर का प्राण सहस्रार में घनीभूत हो गया, जिससे शरीर में प्राण की कमी हो गई। इससे दुनियादारी के तनावयुक्त विविध कार्यों का शरीर पर जरा सा भी भार पड़ने पर शरीर कमजोरी के कारण कांपने लगता है। सूर्य फीका पड़ने लग गया, मतलब सहस्रार में कुण्डलिनी के काबिज होने से पूरे मन में अद्वैत भाव छा गया। अद्वैत में तो सुख और दुख समान लगने लगते हैं, प्रकाश और अंधकार समान लगने लगता है, मतलब सूर्य और चन्द्र समान लगने लगते हैं। यही सूर्य का फीका पड़ना है। कार्तिकेय ने अपनी चमकदार शक्ति तारकासुर के ऊपर चलाई। कार्तिकेय अर्थात कुंडलिनी की अपने आप की चमक ही उसकी वह चमकदार शक्ति है, जो उसने तारकासुर अर्थात अज्ञान के ऊपर चलाई। मतलब उसकी अपनी जागरण की चमक से ही द्वैतरूपी अज्ञान या तारकासुर नष्ट हुआ। अज्ञान रूपी तारकासुर के सैनिक हैं, विभिन्न मानसिक दोष और उनसे उपजे दूषित आचार-विचार। वे नष्ट हो जाते हैं। जो बचे रहते हैं, वे रूपांतरित होकर पवित्र हो जाते हैं। मतलब कि वे देवसेना की शरण में चले जाते हैं। जैसे कि कामभाव तन्त्रभाव में रूपांतरित होकर पवित्र हो जाता है, और मानव के आध्यात्मिक विकास में मदद करता है। राक्षस बाणासुर से यहाँ तात्पर्य बुरी नजरों के बाणों से है। नयन बाण, यह एक प्रसिद्ध शास्त्रीय उक्ति है। क्योंकि आंखें आज्ञाचक्र से जुड़ी होती हैं, इसलिए बुरी नजरों से वह दुष्प्रभावित होता है। यही बाणासुर राक्षस द्वारा क्रोंच पर्वत को प्रताड़ित करना है। दूषित नजर से बुद्धि दूषित होती है। बुद्धि आज्ञाचक्र में निवास करती है। क्योंकि जब तक जागृति से मन को तसल्ली नहीं मिल जाती, तब तक आदमी की नजरों में किसी न किसी तरह से भौतिक आनंद पाने की लालसा बनी रहती है। इसीसे नजर दूषित होती है। जैसे कि पराई नारी से क्षणिक सम्भोगसुख की लालसा होना, जिससे नारी पर गलत नजर पड़ती है। इससे गलत विचार आते हैं, जिससे बुद्धि की कल्पना शक्ति और निर्णय शक्ति भी पापपूर्ण होने लगती है। मतलब बाणासुर क्रोंच पर्वत को रौंदने लगता है, जिससे उसका अधिष्ठातृ देवता प्रताड़ित महसूस करके दुखी होता है।  पिछली पोस्ट में मेरा अनुमान सही था कि आज्ञाचक्र को ही क्रोंच पर्वत कहा गया है। जागृति का ज्ञान होने के बाद बुरी और दूषित नजर का नष्ट होना ही कार्तिकेय के द्वारा बाणासुर का वध है। इसी तरह, शेषनाग मूलाधार से सहस्रार चक्र तक जाने वाली सुषुम्ना नाड़ी को कहा गया है, क्योंकि इसकी आकृति एक कुण्डली लगाए हुए और फन उठाए नाग की तरह है। सहस्रार चक्र को ही उसका पुत्र कुमुद कहा गया है। कुमुद का अर्थ श्वेतकमल होता है। सहस्रार चक्र को भी एक हजार पंखुड़ियों वाले कमल के रूप में दर्शाया जाता है। सुषुम्ना से ही सहस्रार को प्राण अर्थात जीवन मिलता है, इसीलिए दोनों का पिता-पुत्र का सम्बंध दिखाया गया है। प्रलंब माला को कहते हैं। कुंडलिनी भी माला के रूप वाले माइक्रोकोस्मिक ऑर्बिट में घूमती है। यह एक व्यवहारिक अनुभव है कि जब माला पूरी जुड़ी हुई होती है, तभी कुंडलिनी सभी चक्रों में विशेषकर सहस्रार चक्र में अच्छे से प्रवेश कर पाती है। टूटी हुई माला से कुंडलिनी ऊर्जा गति नहीं कर पाती। राक्षस प्रलम्बासुर यही टूटी हुई माला है। वह शेषनाग पुत्र कुमुद को दुखी करने लगा, मतलब टूटा हुआ ऊर्जा परिपथ सहस्रार चक्र तक प्राण ऊर्जा की आपूर्ति को बाधित करने लगा। कार्तिकेय ने प्रलम्बासुर को मारा, मतलब कुंडलिनी जागरण के बाद कुंडलिनी के पीछे के चैनल से ऊपर चढ़ने से और आगे के चैनल से नीचे उतरने से ऊर्जा परिपथ पूर्ण हो गया। साथ में, कुंडलिनी जागरण से उत्साहित आदमी आगे भी नियमित रूप से कुंडलिनी योगाभ्यास करने लगा, जिससे माला रूपी केंद्रीय कुंडलिनी चैनल ज्यादा से ज्यादा खुलता गया। वास्तव में असली माला जाप तो चक्रों की माला में कुंडलिनी का जाप ही है। इसीको गलत समझने के कारण धागे और मनकों की भौतिक माला बनी होगी। या हो सकता है कि कुंडलिनी योग को आम अशिक्षित लोगों की समझ में लाने के लिए ही धागे की माला का प्रचलन शुरु कराया गया होगा। हालांकि इससे भी बहुत से लाभ मिलते हैं। अभ्यास से धागे की बाहरी माला चक्रों की भीतरी माला में रूपांतरित हो जाती है। 

हँस चुगे जब दाना-दुनका, कवूआ मोती खाता है~ समकालीन सामाजिक परिस्थितियों पर आधारित एक आलोचनात्मक, कटाक्षपूर्ण व व्यंग्यात्मक कविता-गीत

ज्ञानीजन कहते दुनिया में
ऐसा कलियुग आता है।
हँस चुगे जब दाना-दुनका
कवूआ मोती खाता है।

ज्ञानी-ध्यानी ओझल रहते
काल-सरित के संग न बहते।
शक्ति-हीनता के दोषों को
काल के ऊपर मढ़ते रहते।
मस्तक को अपने बलबूते
बाहुबली झुकाता है।
हँस चुगे जब दाना-दुनका
कवूआ मोती खाता है।
ज्ञानीजन----

खूब तरक्की है जो करता
नजरों में भी है वो खटकता।
होय पलायित बच जाता या
दूर सफर का टिकट है कटता।
अच्छा काम करे जो कोई
वो दुनिया से जाता है।
हँस चुगे जब दाना-दुनका
कवूआ मोती खाता है।
ज्ञानीजन----

अपनी डफली राग भी अपना
हर इक गाना गाता है।
कोई भूखा सोए कोई
धाम में अन्न बहाता है।
दूध उबाले जो भी कोई
वही मलाई खाता है।
हँस चुगे जब दाना-दुनका
कवूआ मोती खाता है।
ज्ञानीजन----

संघे शक्ति कली-युगे यह
नारा सबको भाता है।
बोल-बोल कर सौ-दफा हर
सच्ची बात छुपाता है।
भीड़ झुंड बन चले जो कोई
वही शिकार को पाता है।
हँस चुगे जब दाना-दुनका
कवूआ मोती खाता है।
ज्ञानीजन----

जितने ढाबे उतने बाबे
हर-इक बाबा बनता है।
लाठी जिसकी भैंस भी उसकी
मूरख बनती जनता है।
शून्य परीक्षा हर इक अपनी
पीठ को थप-थपाता है।
हँस चुगे जब दाना-दुनका
कवूआ मोती खाता है।
ज्ञानीजन----

करतब-बोध का ठेका देता
कोई भी तब पेन न लेता।
मेल-जोल से बात दूर की
अपना भी न रहता चेता।
हर इक अपना पल्ला झाड़े
लदे पे माल चढ़ाता है।
हँस चुगे जब दाना-दुनका
कवूआ मोती खाता है।
ज्ञानीजन----

शिष्टाचार किताबी होता
नौटँकी खिताबी होता।
भीतर वाला सोया होता
सर्व-धरम में खोया होता।
घर के भीतर सेंध लगाकर
घरवाले को भगाता है।
हँस चुगे जब दाना-दुनका
कवूआ मोती खाता है।
ज्ञानीजन----

मेहनत करे किसान बिपारी
खूब मुनाफा पाता है।
बैठ-बिठाय सिंहासन पर वो
पैसा खूब कमाता है।
देकर करज किसानों को वह
अपना नाच नचाता है।
हँस चुगे जब दाना-दुनका
कवूआ मोती खाता है।
ज्ञानीजन----

जात-धरम को ऊपर रख कर
हक अपना जतलाता है।
शिक्षा-दीक्षा नीचे रख कर
शोषित वह कहलाता है।
निर्धन निर्धनता को पाए
पैसे वाला छाता है।
हँस चुगे जब दाना-दुनका
कवूआ मोती खाता है।
ज्ञानीजन----
साभार~@bhishmsharma95🙏

गाने के लिए उपयुक्त वैकल्पिक रचना (मामूली परिवर्तन के साथ)~हँस चुगे है दाना-दुनका, कवूआ मोती खाता है

ज्ञानीजन कहते जगत में
ऐसा कलियुग आता है।
हँस चुगे है दाना-दुनका
कवूआ मोती खाता है।

ज्ञानी-ध्यानी ओझल रहते
काल-सरित तट रहते हैं।
शक्ति-हीनता के दोषों को
काल के ऊपर मढ़ते हैं।
मस्तक को अपने बलबूते-2
बाहु-बली झुकाता है।
हँस चुगे है दाना-दुनका
कवूआ मोती खाता है।
ज्ञानीजन----

खूब तरक्की करता है जो
आँखों में वो खटकता है।
होय पलायित बच जाता जां
दूर-टिकट तब कटता है।
अच्छा काम करे जो कोई-2
वो दुनिया से जाता है।
हँस चुगे है दाना-दुनका
कवूआ मोती खाता है।
ज्ञानीजन----

अपनी डफली राग भी अपना
हर इक गाना गाता है।
कोई भूखा सोए कोई
धाम में अन्न बहाता है।
दूध उबाले है जो कोई-2
वो ही मलाई खाता है।
हँस चुगे है दाना-दुनका
कवूआ मोती खाता है।
ज्ञानीजन----

संघे शकती कली-युगे यह
नारा सबको भाता है।
बोल-बोल के सौ-दफा हर
सच्ची बात छुपाता है।
भीड़-झुंड चलता जो कोई-2
वो ही शिकारी पाता है।
हँस चुगे है दाना-दुनका
कवूआ मोती खाता है।
ज्ञानीजन----

जितने ढाबे उतने बाबे
हर-इक बाबा बनता है।
लाठी जिसकी भैंस भी उसकी
मूरख बनती जनता है।
शून्य परीक्षा हर इक अपनी-2
पीठ को थप-थपाता है।
हँस चुगे है दाना-दुनका
कवूआ मोती खाता है।
ज्ञानीजन----

करतब का ठेका देता है
पेन न कोई लेता है।
मेल-जोल से बात दूर की
अपना भी न चेता है।
हर इक अपना पल्ला झाड़े-2
लदे पे माल चढ़ाता है।
हँस चुगे है दाना-दुनका
कवूआ मोती खाता है।
ज्ञानीजन----

शिष्टाचार किताबी होता
नौटँकी व खिताबी है।
भीतर वाला सोया होता
सर्व-धरम में खोया है।
घर के भीतर सेंध लगाकर-2
घरवाले को भगाता है।
हँस चुगे है दाना-दुनका
कवूआ मोती खाता है।
ज्ञानीजन----

मेहनत करे किसान बिपारी
पैसा खूब कमाता है।
बैठ-बिठाय सिंहासन पर वो
खूब मुनाफा पाता है।
देकर करज किसानों को वो-2
अपना नाच नचाता है।
हँस चुगे है दाना-दुनका
कवूआ मोती खाता है।
ज्ञानीजन----

जात-धरम को ऊपर रख कर
हक अपना जतलाता है।
शिक्षा-दीक्षा नीचे रख कर
शोषित वह कहलाता है।
निरधन निरधनता को पाए-2
पैसे वाला छाता है।
हँस चुगे है दाना-दुनका
कवूआ मोती खाता है।
ज्ञानीजन----
ए जी रे---
ए जी रे---

धुन प्रकार~रामचंद्र कह गए सिया से, ऐसा कलियुग आएगा---

साभार~@bhishmsharma95🙏