कर्म से भी अच्छा साक्षीभाव होता है। कर्म से वर्तमान में सबसे ज्यादा उपस्थिति मिलती है क्योंकि इसमें लगभग सभी इंद्रियां काम कर रही होती हैं। जितना ज्यादा और जितना महान कर्म, उतना ज्यादा वर्तमान में जागरूकता। इसीलिए कहते हैं कि हर समय कर्म करते रहो चाहे कुछ भी करो। कर्म का मतलब यहां मानवीय काम ही है। कहते हैं कि जो एक पल भी निकम्मा नहीं रहता वह सौ साल जीता है। उम्र तनाव से घटती है। मतलब कर्म से उत्पन्न विपासना से तनाव घटता है। मेरे दादाजी हर समय कुछ न कुछ करते रहते थे चाहे बेहद हल्काफुल्का काम क्यों न हो। उनके चेहरे पर हमेशा ज्ञान के तेज की चमक होती थी। दरअसल साक्षीभाव और आत्मभाव एकदूसरे से जुड़े हैं। आम जनधारणा हो सकती है कि साक्षीभाव पराएपन का भाव है। क्योंकि लगता है कि हम दूसरे को ही तटस्थ होकर देख सकते हैं, अपने को नहीं। पर ऐसा नहीं है। आपका बेटा अगर मैच खेल रहा हो तो आप उसे एकसाथ साक्षीभाव और अपनेपन के भाव से देखेंगे न कि पराएपन के भाव से। साक्षीभाव मतलब अनासक्ति का भाव। अपने आप से या अपने आप से जुड़ी वस्तु से भला कैसी आसक्ति। क्या आदमी कभी अपने क्रियाकलापों से आसक्ति करता है। नहीं। तभी तो कहते हैं कि घर की मुर्गी दाल बराबर। अपने प्रति या अपनी चीज के प्रति महत्वबुद्धि नहीं होती। आसक्ति हमेशा दूसरे से ही होती है। महत्त्वबुद्धि हमेशा परायों के प्रति होती है। घर का जोगी जोगड़ा और परदेसी जोगी सिद्ध। दूसरे से इसलिए क्योंकि दूर के ढोल सुहाने। तो शास्त्रों में जिस आत्मभाव का अक्सर जिक्र होता है वह एक प्रकार से साक्षीभाव ही है। और वह कैसे वर्तमान में स्थित होने से संभव होता है यह हमने ऊपर सिद्ध कर दिया है। मतलब वर्तमान क्षण से प्रकाशित आदमी को विचारों का प्रकाश महत्त्वहीन सा लगता है। प्रकाश को अपने में क्या महत्त्वबुद्धि होगी भला।
जब हम वर्तमान क्षण या कर्म रूपी प्रकाश से दूर रहकर अंधेरे से आवृत्त जीवात्मा बने होते हैं, उस समय प्रकाश रूप विचारों के प्रति हमारा साक्षीभाव अर्थात अनासक्ति भाव नहीं हो सकता। क्योंकि उस समय हम अचेतन होते हैं, और विचार चेतन होते हैं। दोनों की प्रकृति बिल्कुल एकदूसरे के विपरीत है। उस समय साक्षीभाव का भ्रम हो सकता है, पर वह असल में होता नहीं। उससे तो उल्टा अनासक्तिभाव और साक्षीभाव घटेगा। लोहा चुंबक को खींचता है पर लोहे को नहीं। प्लस चार्ज माइनस को खींचता है, प्लस या न्यूट्रल को नहीं। प्रकाश अंधेरे को खींचता है, प्रकाश को नहीं। इसीलिए कहा है कि अपनी वर्तमान भौतिक स्थिति पर ध्यान लगाकर रखो ताकि आत्मा में अंधेरा न पसर पाए। वर्तमान स्थिति के दृश्य, शरीर और उसकी संवेदनाएं, सांसें और उनकी शरीर पर हलचल, विविध आवाजें, अन्य दुनियादारी के कामकाज, ये सब प्रकाशरूप ही हैं। इनके अनुभव होते हुए जो प्रकाशरूप विचार उठेंगे, उनके प्रति साक्षीभाव पैदा होगा और अनासक्ति भी पैदा होगी। ऐसा इसलिए क्योंकि दोनों किस्म की चीजें प्रकाशरूप हैं। इससे वर्तमान की जागरूकता और विचारों की जागरूकता दोनों एकदूसरे को हल्का करेंगे। हल्का होना ही अनासक्ति या साक्षीभाव है। वैसे इसे जागरूकता न कह कर अनुभव या ज्ञान कहना चाहिए, क्योंकि अनुभव के ही विभिन्न स्तर होते हैं। जागरूकता का तो एक ही हल्का सा स्तर होता है। हल्के अनुभव को ही जागरूकता कहते हैं। इसमें आदमी सतही तौर पर अनुभव भी कर रहा होता है और नहीं भी। जैसे कहते भी हैं कि फलां आदमी अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक है। मतलब उसकी स्वास्थ्य की ओर नजर है, न कि वह स्वास्थ्य को एक चिकित्सक की तरह विस्तार से समझता है। जागरूकता ही आध्यात्मिक है। यही साक्षीभाव और आत्मभाव के साथ होती है। मतलब जब वर्तमान का अनुभव और विचारों का अनुभव, दोनों एकदूसरे को हल्का करते हैं, तो दोनों जागरूकता बन जाते हैं। ज्ञान से अहंकार बढ़ता है जबकि जागरूकता से अहंकार घटता है।
माला जाप, मंत्र जाप, या अन्य धार्मिक क्रियाकलाप और कुछ ज्यादा नहीं करते, बस वर्तमान से जोड़कर रखते हैं। सबका मूल विज्ञान एक ही है। मतलब सब में समानता है। सब जो अपनी अपनी रुचि और संस्कृति के अनुसार करते हैं, ठीक ही करते हैं। लोग विचित्र तप भी करते हैं। कई लोग लेट लेट कर मीलों दूर मंदिर तक पहुंचते हैं। कई अपने शरीर पर कीलें चुभाते हैं। एक तपस्वी को देखा जो दस सालों से अपने सिर पर पैंतालिस किलो की रुद्राक्ष की माला धारण किए हुए है। वह प्रतिदिन कम से कम बारह घंटे उसको सिर पे धारण करके रखता है। मन में ध्यान चित्र को बना के रखना भी अपनी अंधकारमय जीवात्मा को एक प्रकाश का सहारा प्रदान करके रखना ही है। इसीलिए पतंजलि योगसूत्र में इसे ध्यानालंबन कहा है, मतलब ध्यान के प्रकाश के लिए सहारा। इससे भी आते जाते प्रकाशरूप विचारों से अनासक्ति हो जाती है और साक्षीभाव भी यही है। प्रकाश की प्रकाश से भला कैसी आसक्ति। अंधकार की तो प्रकाश से आसक्ति हो सकती है। निर्धन की धन से हो सकती है। धनी की धन से कैसी आसक्ति। साक्षीभाव मतलब दर्शक बन कर दृश्य को सिर्फ देखना है, उसमें घुसना नहीं है। दृश्य के प्रति यदि आसक्ति होगी तो क्या उसमें घुसे बिना कोई रह पाएगा। नत्थूराम क्रिकेट मैच को दूर से देखकर मजा ले सकता है। उसे किसीकी जीत हार से कोई मतलब नहीं। न ही वह किसी को कुछ समझाएगा, क्योंकि उसे क्रिकेट का गहरा ज्ञान नहीं है। कम ज्ञान और अनासक्ति साथसाथ रहते हैं। पशु एकदूसरे से अनासक्ति से रहते हैं क्योंकि उनमें ज्ञान की कमी होती है। पर असली अनासक्ति तो ज्ञान के साथ होती है जब ज्ञान को जानबूझकर नजरंदाज किया जाता है। इससे आत्मा को ज्ञान का प्रकाश हासिल होता है। जब दिव्यांग या मंदबुद्धि या पशु की तरह ज्ञान ही नहीं है, तो उससे उत्पन्न अनुभवहीनता को मूर्खता कहेंगे, अनासक्ति नहीं। विचार न होना ही अज्ञान है। जब ज्ञानरूप या प्रकाशरूप विचार ही नहीं, तो उसके प्रति कैसे तटस्थ रहेंगे और फिर कैसे उसका प्रकाश आत्मा से जुड़ पाएगा। पर उपरोक्त क्रिकेट मामले में क्या क्रिकेट का अंधा दीवाना दूर बैठा रह पाएगा। वह तो खुद बल्ला पकड़ लेगा। या क्रिकेट खेलने वालों को डिक्टेट करने लग जाएगा। पर अगर क्रिकेट का अच्छा जानकार सबकुछ जानते समझते भी अनासक्त और तटस्थ रह लेगा तो वह सबसे बड़ी अनासक्ति होगी।
पुराने ज़माने में काम की रफ्तार धीमी होती थी। यह इसलिए क्योंकि तकनीक आज की तरह विकसित नहीं थी। वैसे तो विकास के अलग अलग पैमाने होते हैं पर चलो कह लेते हैं कि तथाकथित विकसित नहीं थी। इससे लोगों का मन व्यर्थ के विचारों में भटका रहता था। भारत जैसे देश में तो बरसात में खूब पैदा कर लिया तो उसे पूरे साल भर लगभग बैठ के खाया जाता था। ऐसा इसलिए क्योंकि फसल के लिए पर्याप्त पानी यहां बरसात में ही बरसता है। साल के बाकि समय तो छिटपुट बारिश ही होती रहती है, वह भी कभीकभार ही और बहुत बार तो सूखा जैसा ही पड़ा रहता है। इससे जाहिर है कि खाली बैठकर फालतू विचार लोगों को भटकाते होंगे। संभवतः इस से परेशान होकर ही विस्तृत वेदशास्त्र बने और कर्मकांड पद्धतियां बनीं। इससे दो फायदे हुए। एक तो इनसे आदमी वर्तमान से जुड़ा रहता था और साथ में भगवान की भक्ति भी हो जाती थी। इससे ज्यादा और क्या चाहिए। आम के आम और गुठलियों के दाम। तभी कहते हैं कि वेदशास्त्रों के अनुसार आचरण करने से आदमी का पतन नहीं होता। मतलब इसके बिना मन के विचार उसे भ्रमित करके उसे अंधेरे में धकेल देते हैं। फिर वह उस अंधेरे से प्रभावित होकर पापकर्म करने लगता है, ऊटपटांग खानेपीने लग जाता है। इससे उसकी आत्मा की हानि तो होती ही है, साथ में शरीर को भी नुकसान पहुंचता है। अगर ऐसा होता तो आप ही सोचिए, अगली बरसात आने पर लोग क्या कमाते और क्या खाते। इसलिए दिल को बहलाने का अच्छा और आत्मवर्धक उपाय किया गया था। यह आज तक प्रासंगिक है क्योंकि इसके साथ ईश्वर अराधना जुड़ी है। जिसके साथ ईश्वर अराधना जुड़ जाती है, वह चीज उसी की तरह सनातन हो जाती है।
वैज्ञानिक कहते हैं कि ध्यान से डी एम एन अर्थात डिफॉल्ट मोड न्यूरल नेटवर्क पर रोक लगती है। मस्तिष्क का यह न्यूरल नेटवर्क आमतौर के अनर्गल विचार पैदा करता है। शायद ध्यान से इसको एनर्जी की आपूर्ति कम पड़ जाती है, क्योंकि ध्यान की प्रक्रिया भी एनर्जी का अच्छा खासा हिस्सा ले लेती है। मतलब मूल चीज तो अनुभवात्मक मनोविज्ञान है। भौतिक विज्ञान तो उस पर आधारित है। सभी भौतिक खोजों का बीज मन में ही पैदा होता है। बाद में वे भौतिक रूप में दिखाई देती हैं। क्योंकि मन की खोजों की चमक आम लोगों को दिखाई नहीं देती, इसीलिए वे उनको नजरअंदाज करके भौतिक खोजों का ही डंका बजाते रहते हैं। पर योगी लोग मन में झांक लेते हैं, क्योंकि वे खुद भी मन के असीम संसार के खोजी वैज्ञानिक होते हैं।
दोस्तो, आज के आधुनिक परिवेश में हर आध्यात्मिक पहलू की जड़ में जाना जरूरी है। आज की वैज्ञानिक माइंडसेट वाली पीढ़ी सतही ज्ञान पे यकीन नहीं करती। वह हर बात की वैज्ञानिक सिद्धि चाहती है। उपरोक्त तरीका कितना ज्यादा वैज्ञानिक है, इसे समझकर हैरानी होती है। पहले मैं भी इन्हें हल्के में लेता था पर जब गहराई में गया तो पूरी सच्चाई पता चली। दुष्प्राप आत्मा को पाने का कितना सरल तरीका है। और तो और इससे भौतिक समृद्धि भी मिलती है। जब साक्षीभाव के अभ्यास से मन का कचरा साफ होता है तो नए और विकसित और वर्तमान से जुड़े विचार पैदा होते हैं जिससे भौतिक तरक्की भी होती है। आत्मा को पाने का यह उल्टा या अप्रत्यक्ष तरीका है। बात सीधे से न बने तो उल्टा चलो। विचारों के प्रति आत्मभाव बना कर रखने से एक समय ऐसा भी आता है कि आत्मा ही अनुभव में आ जाता है। समुद्र अगर सीधा ढूंढने में न आ रहा हो तो नदी के साथ आगे बढ़ते रहो। समुद्र तक पहुंच ही जाएंगे। गुफा में अगर बाहर निकलने का रास्ता न मिल रहा हो तो रौशनी की दिशा में जाते रहो। खुद बाहर पहुंच जाएंगे। जितना ज्यादा ठंडा अंधेरा होगा वह उतना ही ज्यादा गर्म प्रकाश की तरफ आकर्षित होगा। इसलिए तो सर्दियों में रसोई में चूल्हा बुझाते ही वहां एकदम से ठंड पसर जाती है। यह इसलिए क्योंकि बाहर की ठंड एकदम से चूल्हे की गर्मी की तरफ दौड़ पड़ी और उसे भी ठंडा कर दिया। मतलब अंधेरे और प्रकाश के बीच आसक्ति है। अगर बाहर भी गर्मी है तो वह अंदर को नहीं दौड़ेगी। दूसरे तरीके से बोलें तो अगर बाहर का वातावरण अंदर को नहीं दौड़ रहा है तो इसका मतलब है कि बाहर भी वह गर्म है। इसी तरह अगर आदमी अपनी आत्मा को अंधेरमयी समझते हुए विचारों को अनुभव करेगा तो उनके लिए लट्टू हो जाएगा। मतलब उनमें आसक्त हो जाएगा। उनकी तरफ भागेगा। अपनी दुनियादारी को उनकी तरफ भगाएगा। उनसे आसक्त हो जाएगा। दूसरे तरीके से बोलें तो अगर आदमी विचारों के प्रति आसक्त होता है तो उसकी आत्मा अंधेरा बन जाती है। पर अगर वह वर्तमान पे केंद्रित रहकर उनके प्रति आसक्त नहीं होता तो उसकी आत्मा विचारों की तरह उजली होने लगती है। क्योंकि वर्तमान में जागरूकता से ध्यान वर्तमान और विचारों, दोनों में बंट जाता है, इसलिए दोनों के प्रति अनासक्ति पैदा हो जाती है। यह ऐसे ही है कि अगर पानी को आग पे डालो तो आग भी बुझ जाती है और पानी भी भाप बनकर उड़ जाता है।
शरीरविज्ञान दर्शन की यही खासियत है कि इससे लगातार शरीर पर ध्यान बना रहता है जिससे वर्तमान में जागरूकता बनी रहती है। कुंडलिनी योग से भी ऐसा ही होता है। नादब्रह्म शास्त्रों में इसलिए प्रमुखता से वर्णित है क्योंकि आवाज पर ध्यान से सबसे ज्यादा साक्षी भाव होता है। इसीलिए बातूनी लोग ज्यादा छाए रहते हैं दुनिया में।
दोस्तो, सब शक्ति का खेल है। शक्ति की थोड़ी सी कमी भी बहुत बड़ा अंतर पैदा कर सकती है, जीवन मरण का अंतर या बंधन मोक्ष का अंतर भी। इसीलिए कहते हैं कि शक्ति ही शिव से मिलती है, मतलब शिव से मिलाती है। शक्ति के बिना शिव को पाना नेक्स्ट टू इंपोसिबल जैसा ही है। क्यों प्राणायाम, ध्यान और योग के लिए कहा गया है। शक्ति के लिए ही। वर्तमान में जागरूक रहते हुए भी विचारों को निर्बाध रूप से चलने देने के लिए दोगुनी नहीं तो ज्यादा शक्ति की जरूरत तो पड़ेगी ही। डबल इंजन जो चल रहा होता है। सिंगल इंजन वाले अल्पशक्ति आम आदमी या तो एक समय में वर्तमान में ही व्यस्त रहते हैं या विचारों में ही खोए होते हैं। दोनों मानसिक इंजनों को वे एकसाथ नहीं चला पाते। परिणाम, बंधन।