काम तो है आ~राम को, योगा के विश्राम को

चूल्हा कैसे जलेगा
जीवन कैसे चलेगा।
आज का दिन तो चल पड़ा पर
कल कैसे दिन ढलेगा।
चूल्हा कैसे जलेगा।

बचपन बीता खेलकूद में
सोया भरी जवानी में।
सोचा उमर कटेगी यूँ ही
अपनी ही मनमानी में।
नहीं विचारा पल भर को भी
वक़्त भी ऐसे छलेगा।
चूल्हा कैसे ----

सोचा था कुछ काम करेंगे
खून पसीना एक करेंगे।
पढ़ लिख न पाए तो भी तो
भूखे थोड़ा ही मरेंगे।
सोचा नहीं हमारे हक से
पेट मशीन का पलेगा।
चूल्हा कैसे ----

नायाबी न थमी है, पर
काम की फिर भी कमी है।
काम वहाँ पर नहीं है मिलता
जहाँ गृहस्थी जमी है।
गृहसुख त्याग के इस मानुष का
पैसा कैसे फलेगा।
चूल्हा कैसे-----

काश कि ऐसा दिन होता सब
को पैसा मुमकिन होता।
उसके ऊपर वो पाता जो
जितना भी दाना बोता।
झगड़े मिटते इससे क्यों नर
इक-दूजे संग खलेगा।
चूल्हा कैसे ----

काम तो है आ~राम को
योगा के विश्राम को।~2
इसके पीछे उमर कट गई
आखिर कब ये फलेगा।
चूल्हा कैसे ---