भाई विनोद शर्मा द्वारा रचित कालजयी, भावपूर्ण व दिल को छूने वाली कुछ कविताएँ- भाग 2

बताते हुए हर्ष हो रहा है कि “भाई विनोद शर्मा द्वारा रचित व दिल को छूने वाली कुछ कविताएँ-1” को पाठकों व कविता-प्रेमियों का अप्रत्याशित प्यार मिला। कुछ ही घंटों में उस पोस्ट को सैंकड़ों वियूस, लाईक्स व शेयर प्राप्त हो गए। उसीसे प्रोत्साहित होकर हमने कवि महोदय से इस कविता-श्रृंखला के दूसरे भाग की रचना का अनुरोध किया, जिसे कवि महोदय ने सहर्ष स्वीकार किया। उसी भाग को हम इस पोस्ट के माध्यम से अपने प्रिय पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं।

परवाज़ रहता है क्यों इतना उत्सुक

 परवाज़                                                            
 रहता है क्यों इतना उत्सुक
 तारीख़ नई लिखने को हरदम।
                                
 एक नए रिश्ते की ख़ातिर
 अपना ही लहराए परचम।
 उसको ही सर्वस्व मानकर
 सबसे करे किनारा है।
 काट स्वयं जड़ों को अपनी
 ढूंढे नया सहारा है।
  
 याद नहीं बिल्कुल भी उसको
 बचपन में खेल जो खेले थे।
 एहसास नहीं ज़रा भी उसको
 माँ-बाप ने जो दु:ख झेले थे।
  
 मिलकर भाई-बहन कभी
 तितली के पीछे भागे थे
 नई सुबह के इन्तज़ार में
 रात-रात भर जागे थे।
  
 एक-दूसरे के दु:ख-सुख से
 जब एक साथ रो पड़ते थे।
 मिलते ही एक नई ख़ुशी
 तब फूल हंसी के झड़ते थे।
  
 छोटे-छोटे कदमों से हम
 धूल उड़ाया करते थे।
 गाँव की पगडण्डी से
 जब पढ़ने जाया करते थे।
  
 उस वक़्त हमें मालूम नहीं था
 वक़्त भी क्या दिखलाएगा।
 दोस्त-भाई गाँव छोड़कर
 शहरों का हो जाएगा।
  
 भाग रहा है धन के पीछे
 भूल के पिछली बातों को।
 आ जाती जब याद कभी तो
 तन्हा रोता रातों को।
  
 छोड़ केअपनी जन्मस्थली
 ढूंढे है प्यार परायों में।
 त्याग मुसाफिर घर को अपने
 ज्यों रात बिताए सरायों में।
  
 खेत पड़े हैं बंजर सारे
 माँ-बाप की आँखें सूखी हैं।
 ताक रही रस्ता बेटे का
 बस उसके दरस की भूखी हैं।
  
 आई घर की याद उसे
 बदला जब सारा परिवेश।
 इतिहास दोहराया ज़माने ने
 बच्चे भी उड़ गए परदेस।
  
 पंछी भी उड़कर रातों को
 आ जाते हैं नीढ़ में
 पर खोया रहा तू क्यों बरसों तक
 इन नगरों की भीड़ में?
  
 छोड़ जवानी शहरों में
 बूढ़ा लौटे गाँव को।
 वृक्ष नहीं जो बचे हुए हैं
 ढूंढे उनकी छाँव को।
  
 जैसा बोया वैसा काटा
 बचा नहीं अब कुछ भी शेष।
 झुकी कमर से लाठी टेके
 खोजे गत जीवन अवशेष।
  
 यन्त्र बना है मानव अब तो
 बलि चढ़ा जज़्बातों की।
 कभी नहीं करता तहलील
 उत्पन्न हुए हालातों की।
  
 कट के अपनी डोर से
 पतंग कोई उड़ न पाए।
 परवाज़ भरी थी जिस ज़मीन से
 उसी ज़मीन पे गिर जाए।  

ऐ ज़िन्दगी ! तू बेहद खूबसूरत है।

ऐ ज़िन्दगी ! तू बेहद खूबसूरत है।  
 तेरा हर नाज़ो नख़रा सह लेते हैं।
                                        
 रुलाए तू हंसाए तू,
 नश्तर चुभा,सहलाए तू।
  
 तेरी लौ की तपिश मेंपरवाने बन जल जाते हैं,
 कुर्बान हुए जाते हैं ।
 ऐ ज़िन्दगी!....
 मयस्सर हुई तू बहुत खुशनसीबी से 
 नहीं कोई ताल्लुक अमीरी-ग़रीबी से 
 तड़पाए तू,लहराए तू।
 सपने दिखा,तरसाए तू।
 तेरी रौ की कशिश में
 तिनके बन बह जाते हैं,भँवर में फंस जाते हैं।
 ऐ ज़िन्दगी!…..
  
 तमाशाई हैं सब अजब तेरी रियासत के
 नहीं कोई मालिक तेरी इस विरासत के
 ललचाए तू,भरमाए तू,
 दिल से लगा,ठुकराए तू।
 तेरी हवा की जुम्बिश से
 पत्ते बन उड़ जाते हैं,ख़ाक में मिल जाते हैं।
 ऐ ज़िन्दगी!….
  
   

फिर से तेरी रहमतों की बारिश का इंतज़ार मुझको

फिर से 
 तेरी रहमतों की बारिश का इंतज़ार मुझको      
 उम्मीद के ये बादल घिरने लगे हैं फिर से।
                                          
 जो ज़ख़्म अब से पहले नासूर बन गए थे
 रिस्ते हुए ज़ख़्म वो भरने लगे हैं फिर से।
 सफर में ज़िन्दगी के थी धूप चिलचिलाती
 झुलसे हुए पैरों से थी चाल डगमगाती।
 तपती हुई ज़मीं पर चलते हुए अचानक
 दरख़्तों की घनी छाया आने लगी है फिर से।
  
 ख़ौफ़ से भरा था इन्सानियत का मंज़र
 ख़ून से सना था हैवानियत का ख़ंज़र।
 फैली हुई थी हरसु दहशत की धुन्ध गहरी
 हिम्मत की हवा से वो छटने लगी है फिर से।
  
 अन्धेरों में भटकता था वो राह से अन्जाना  
 शम्मा को तड़पता है जैसे कोई परवाना।
 काली अन्धेरी रातें जो राह रोकती थी
 जुगनू के कारवां से रोशन हुई हैं फिर से।
  
 काली घटा ने घिर के ऐलान कर दिया है
 सागर का पानी उसने जी भर के पी लिया है।
 हर शाख़ पत्ते पत्ते पे लगी बौछारें गिरने
 कुदरत के ज़र्रे-ज़र्रे में छाया ख़ुमार फिर से। 

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काल का प्रहार
आकाश अश्रु रो रहा
सृष्टि के पाप धो रहा

धरा मिलनकी इच्छासे
पर्वत भी धैर्य खो रहा

चारों दिशा अवरुद्ध है
जल धाराएँ क्रुद्ध हैं

नर कंकाल बह रहे ——-

उपरोक्त “भाई विनोद शर्मा जी द्वारा रचित जगत्प्रसिद्ध, व दिल को छूने वाली कुछ कविताएँ- भाग 1” को पढ़ने के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें

भाई विनोद शर्मा द्वारा रचित कालजयी, भावपूर्ण व दिल को छूने वाली कुछ कविताएँ- भाग 3

कवि महोदय का संक्षिप्त परिचय

कवि विनोद शर्मा एक हरफनमौला व्यक्ति हैं, और साथ में एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी भी हैं। ये हिमाचल प्रदेश के सोलन जिला में अध्यापन के क्षेत्र से जुड़े हैं। सोलन पहाड़ों का प्रवेष-द्वार भी कहलाता है। यह हिमालयी उतुंग शिखरों को आधुनिक रूप से विकसित मैदानी भूभागों से जोड़ता है। विनोद भाई कला, संगीत व साहित्य के क्षेत्रों में बहुत रुचि रखते हैं। रंग-बिरंगी कविताएँ तो इनके दिल की आवाज की तरह हैं, जो बरबस ही इनके मुख से निस्सृत होती रहती हैं। ये सोलन जिला के एक छोटे से हिमशिखराँचलशायी गाँव से सम्बन्ध रखते हैं। इनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि ही अध्यापन के क्षेत्र से जुड़ी हुई है। इनकी कविताएँ वास्तविकता का परिचय करवाते हुए अनायास ही दिल को छूने वाली होती हैं। आशा है कि ये भविष्य में भी अपने देहजगत के अमृतकुंड से झरने वाले कवितामृत से अंधी भौतिकता के जहर से अल्पप्राण मरूभूमि को सिंचित करते रहेंगे। facebook

चित्रकार
हृदयेश गर्ग (कक्षा-3)