संस्कृत शायरी {#Sanskritshayari}

जय माँ वीणावादिनी, जय माँ सरस्वती।
ज्ञान भी देती, प्रेम भी देती, तेेरी उतारें हम आरती।।

मित्रों, संस्कृत हमारे देश भारत की मूल सांस्कृतिक भाषा है। इस भाषा से हमें उच्च कोटि की माने जाने वाली प्राचीन भारतीय सभ्यता की झलक मिलती है। संस्कृत को आजकल लोग कठिन समझकर इससे दूर होते जा रहे हैं। वास्तव में संस्कृत बहुत सरल भाषा है। शुद्ध हिंदी के शब्द संस्कृत के ही शब्द हैं। इसलिए शुद्ध हिंदी जानने वाले के लिए संस्कृत समझना बहुत आसान है। संस्कृत के पतन का एक मुख्य कारण शुद्ध हिंदी का पतन भी है। अधिकतर कलाओं में खिचड़ी हिंदी का प्रयोग किया जाता है। उसमें उर्दू, पारसी, अंग्रेजी आदि विभिन्न भाषाओं के शब्द मिले होते हैं। उदाहरण के लिए फिल्मी संवादों, शेरो-शायरी, ग़ज़ल आदि को ही लें, जो आजकल के युवाओं में बहुत लोकप्रिय हैं। वास्तव में, इन सभी कलाओं के लिए संस्कृत सबसे उपयुक्त भाषा है। संस्कृत को कविता, धुन आदि के रूप में बहुत अच्छी तरह से बांधा जा सकता है। संस्कृत का शब्द भंडार भी बहुत विस्तृत और विविधतापूर्ण है। आम जनमानस तक संस्कृत को पहुंचाने के लिए हमने संस्कृत भाषा में शायरी करने का एक छोटा सा प्रयास शुरु किया है। आशा है कि इससे संस्कृत के प्रति लोगों का रुझान बढ़ेगा, और वे संस्कृत भाषा में लिखे गए देशकालातीत वेद-पुराणों में समाहित अमृत का अपने नयनों व कर्णो से भरपूर पान करने के योग्य बन पाएंगे। इस पेज पर कुछ शेयर हिंदी-उर्दू भाषाओं में भी हैं।

सामान्य प्रेम तो पशु-पक्षी भी करते हैं, प्रेमी द्वारा वधक को विक्रय कर दिए जाते हैं।
मनुष्य-सुलभ प्रेम-निर्देशक बुद्धि का प्रयोग करने में हम प्रमादी क्यों बने रहे।।
प्रेम अथवा सम्मान, दोनों में से एक से संतुष्ट हो जाते। 
अन्यथा भावनाओं के भंडार की राह को प्रकाशित कर देते, हम स्वयं अन्वेषण कर लेते।।
सम्भवतः हम ही अनुचित थे रे मन मदिरालय, मरु में तेल की आस जो लगा बैठे थे।
इधर देवी-ध्यान में समाधिस्थ थे, 
उधर उद्वहन-मोदक स्फुटित हो रहे थे।
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भविष्य हेतु अंधस्पर्धा थी, वर्तमान हस्तच्युत हो गया।
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वो जीवनहेतु श्वासरत थे, हम श्वासहेतु जीवनरत थे।
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पुष्प लाए कामराज, फलचिंतन क्यों करे मस्तराम।
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गृध्रोत्सव सज्जमान था, भावग्राही चले गए।
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प्रेम तो अखण्ड था, कालखण्डित हो गया।
मित्रत्व भी अचल था, कालचालित हो गया।।
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वियोग से योग होगा, सीता से राम होगा। 
भोग से रोग होगा, परिश्रम से आराम होगा।।
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परजनघृणा तो स्वीकार्य थी,
स्वयं से घृणा क्यों।
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कालग्रस्तपथिक ही कालाभावरुदन कर रहे हैं।
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गोपनीय था प्रेमबीज कालसुरक्षितगहनमानसकंदरा में, प्रविष्ट हो गया बहुवर्षपर्यंतवंचितकालमूषक वहाँ भी।
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कालजयी कविताएं

प्रतीक्षा थी प्रातःकाल की, मिल गया ब्रह्ममुहूर्त।
ईक्षा थी प्रेमीमित्र की, मिल गया महाधूर्त।।
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प्रेममधु की प्रतीक्षा में, कामपुष्प निर्जीव हो गया।
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प्रेमविष से भय क्यों, महौषध भी तो यही है।
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एकमाता बहुजनकल्याणप्रदा, एकभार्या मात्रैककल्याणप्रदा।
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विश्वासनिर्माण आयुसापेक्ष है, विश्वासभंजन क्षणसापेक्ष है।
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परभावनाद्वेष करके, निजभावनाघात कर बैठे।
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काश कि चेहरे की कड़वाहट जुबान पर आ जाती, इंसाफ की जिम्मेदारी इंसान पर आ जाती।
#shayari
पागल हैं बेहतर उनके लिए हम, समझ सकते नहीं हमको जो।
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ताउम्र जूझते रहे दोराहे से दोस्तों।
इंसान एक तरफ था, तस्वीर एक तरफ।।
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