कुण्डलिनी जागरण के लिए पंचमकारों (मदिरा, माँस, मैथुन, मत्स्य व मुद्रा) का प्रयोग

कुण्डलिनी के लिए पंचमकारों का प्रयोग एक विवादित विषय रहा है। हम न तो इसकी अनुशंसा करते हैं, और न ही इसका खंडन। हम केवल इसके आध्यात्मिक मनोवैज्ञानिक पहलू पर विचार कर रहे हैं।

पंचमकारों से अद्वैत भाव को विकसित करने का अवसर प्राप्त होता है

वैसे तो पंचमकारों से द्वैतभाव में ही वृद्धि होती है। मदिरा को ही लें। इससे आदमी अंधकार व प्रकाश में बंट जाता है। इसी तरह से, माँस से हिंसा/क्रोध व अहिंसा/शान्ति में विभक्त हो जाता है। मैथुन से वह रोमांच व अवसाद के बीच में झूलने लगता है। मुद्रा किसी विशेष आसन, चिन्ह आदि के साथ लम्बे समय तक बैठने को कहते हैं। इससे आदमी आलस या निकम्मेपन और मेहनत की स्थिति के बीच में बंट जाता है। यह निर्विवादित सत्य है कि द्वैत में ही अद्वैत पनप सकता है। समुद्र की गंभीरता उसकी लहरों के ही आश्रित है। यदि समुद्र में लहरें गगनचुंबी हिचकोले न मारा करतीं, तो कौन कहता कि आज समुद्र शांत या निश्चल है। इसलिए अद्वैत द्वैत के ही आश्रित है। यदि मूल भाव द्वैत ही नहीं होगा, तो उसको नकारने वाला “अ” अक्षर हम उसके साथ कैसे जोड़ पाएंगे। जो चीज है ही नहीं, उसे हम कैसे नकार सकते हैं। यदि द्वैत ही नहीं होता, तो हम उसे कैसे नकार पाते। इसलिए पंचमकारों से दो प्रकार के प्रभाव पैदा होते हैं। जो आदमी उनसे पैदा हुए द्वैत को पूर्णतः स्वीकार करके उसी में रम जाते हैं, वो अपनी कुण्डलिनी को भूल जाते हैं। जो लोग पंचमकारों से उत्पन्न द्वैत को शुरु में स्वीकार करके उसे चालाकी से अद्वैत में रूपांतरित करते रहते हैं, वे कुण्डलिनी योगी बन कर अपनी कुण्डलिनी को मजबूत करते हैं। यह निर्विवादित व सबके द्वारा अनुभूत तथ्य है कि कुण्डलिनी और अद्वैत सदैव साथ रहते हैं। दोनों में से एक चीज को बढ़ाने पर दूसरी चीज खुद ही बढ़ जाती है।

वास्तव में अद्वैत केवल द्वैत के साथ ही रह सकता है, अकेले में नहीं। इसलिए “अद्वैत” का असली अर्थ “द्वैताद्वैत” है।

पंचमकारों का पूजन

सेवन से पहले पंचमकारों का विधिवत पूजन किया जाता है। यह बुद्धिस्ट तंत्र और हिंदु वाममार्गी आध्यात्मिक प्रणाली में आज भी आम प्रचलित है। पंचमकारों में कुण्डलिनी का ध्यान किया जाता है, और उन्हें बहुत सम्मान दिया जाता है। उनके सेवन के समय भी जितना हो सके, कुण्डलिनी व अद्वैत का ध्यान किया जाता है। जब तक शरीर पर पंचमकारों का प्रभाव रहे, तब तक कोशिश करनी चाहिए कि कुंडलिनी व अद्वैत का ध्यान बना रहे। इससे क्या होता है कि जब दैनिक जीवन में उन पंचमकारों का प्रभाव पैदा होता है या यूँ कहें कि जब उनका फल मिलता है, तब कुण्डलिनी स्वयं ही विवर्धित रूप में ध्यानपटल पर आ जाती है। यह ऐसे ही होता है, जैसे कि पैसा जमा करने पर वह ब्याज जुड़ने से बढ़ता रहता है।

पंचमकारों का प्रयोग न्यूनतम मात्रा के साथ अधिकतम कुण्डलिनी लाभ के लिए किया जा सकता है

आम बोलचाल की भाषा में पंचमकार पाप रूप ही हैं। इसलिए इनसे दुखदायी फल भी अवश्य मिलता है, क्योंकि कर्म का फल तो मिल कर ही रहता है। उस बुरे फल से अपने शरीर व मन को बचाने के लिए इनका न्यूनतम सेवन किया जा सकता है। इनको अधिकतम कुण्डलिनी या अद्वैत भाव से जोड़कर अधिकतम आध्यात्मिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है। जो लोग पहले से ही पंचमकारों का प्रयोग गलत तरीके से करते हैं, वो अपना तरीका सुधार सकते हैं। जो लोग इसे शुरु करना चाहते हैं, हम उन्हें योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही ऐसा करने की सलाह देते हैं। 

एक पुस्तक जो पंचमकारों से उत्पन्न द्वैत भाव को जादुई तरीके से अद्वैतभाव में रूपांतरित कर देती है

वह पुस्तक है “शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)”। इस पुस्तक को एमेजॉन की एक गुणवत्तापूर्ण समीक्षा में फाइव स्टार के साथ सर्वश्रेष्ठ, सर्वोत्कृष्ट व सबके द्वारा पढ़ा जाने योग्य आंकलित किया गया है। इसमें चिकित्सा विज्ञान के अनुसार हमारे अपने शरीर में संपूर्ण ब्रम्हांड को दर्शाया गया है। इसको पढ़ने से सारा द्वैतभाव अद्वैतभाव में रूपांतरित हो जाता है, और आनंद के साथ कुंडलिनी परिपुष्ट हो जाती है। योगसाधना से तो अतिरिक्त लाभ मिलता ही है। पंचमकारिक तंत्र को “सब कुछ” या “कुछ नहीं” साधना भी कहते हैं। इससे यदि कुंडलिनी जागरण मिल गया तो सब कुछ मिल गया, अगर नहीं मिला तो कुछ नहीं मिला और यहां तक कि नर्क भी जाना पड़ सकता है।

कुंडलिनी ही जादूगर का वह तोता है, जिसमें उसकी जान बसती है

दोस्तों, रशिया में एक कहावत है कि जादूगर की जान उसके तोते में बसती है। यह बात पूर्णतः सत्य न भी हो, तो भी इसका मैटाफोरक महत्त्व है। कुंडलिनी ही वह तोता है, जिससे जादूगर को शक्ति मिलती रहती है।

किसी भी चीज को कुंडलिनी बनाया जा सकता है

जादूगर एक तोते को कुंडलिनी बनाता है। तोता रंगीन व सुंदर होता है, इसलिए आसानी से ध्यानालम्बन या ध्यान-कुंडलिनी बन जाता है। तोता एक मैटाफोर भी हो सकता है। तोते का अर्थ कोई सुंदर रूप वाली चीज भी हो सकता है। जैसे कि प्रेमी, गुरु या कोई अन्य सुंदर चीज। सुंदर चीज से आसानी से प्यार हो जाता है और वह मन में बस जाती है। जादूगर योगी का मैटाफोर भी हो सकता है। जैसे योगी की शक्तियां उसकी कुंडलिनी के कारण होती हैं, वैसे ही जादूगर की शक्तियां उसके तोते के आश्रित होती हैं।


जादूगर/योगी अपने तोते/कुंडलिनी की सहायता से ही भ्रमजाल फैलाता है


जैसे योगी अपनी कुंडलिनी से अद्वैत को प्राप्त करता है, वैसे ही जादूगर अपने तोते से अद्वैत प्राप्त करता है। जादूगर जब भ्रम के जादू को फैलाता है, तब अद्वैत की शक्ति से ही वह भ्रम के जाल में नहीं फंसता। वैसा ही योगी भी करता है। आम लोग योगी की दुनियावी लीलाओं से भ्रमित होते रहते हैं, परंतु वह स्वयं भ्रम से अछूता रहता है।


तोते/कुंडलिनी के मरने से जादूगर/योगी निष्क्रिय सा हो जाता है


इसीसे भावनात्मक सदमा लगता है, जैसा कि मैंने पिछली पोस्टों में बयान किया है। वास्तव में, तोते/कुंडलिनी के साथ जादूगर/योगी का पूरा जीवनक्रम जुड़ा होता है। तोते/कुंडलिनी के नष्ट होने से उससे जुड़ी सारी घटनाएं, यादें व मनोवृत्तियां नष्ट सी हो जाती हैं। इससे वह घने अंधेरे में पूरी तरह से शांत सा हो जाता है। इसे भावनात्मक सदमा कहते हैं। इसे ही पतंजलि की असम्प्रज्ञात समाधि भी कहते हैं। इसी परिस्थिति में कुंडलिनी जागरण हो सकता है। यदि इसे कुछ लंबे समय तक धारण किया जाए, तो आत्मज्ञान भी प्राप्त हो सकता है। औसतन लगभग छः महीने के अंदर आत्मज्ञान हो सकता है। इस स्थिति को संभालने के लिए यदि योग्य गुरु का सहयोग मिले, तो भावनात्मक सुरक्षा मिलती है।

ईश्वर सबसे बड़ा जादूगर है, जो तोते/कुंडलिनी से इस दुनिया के जादू को चलाता रहता है

हिंदु समेत विभिन्न धर्मों में ईश्वर को एक जादूगर या ऐंद्रजालिक माना गया है, जो अपने जादू या इंद्रजाल को खुले आसमान में फैलाता है। उससे यह दुनिया बन जाती है। वह पूर्ण अद्वैतशील है। इससे स्वयं सिद्ध हो जाता है कि उसके साथ उसकी कुंडलिनी (तोता) भी रहती है। उसी तोते को मायाशक्ति कहा गया है।

कुंडलिनी योगसाधना से उत्पन्न शक्ति या उर्जा को स्तरोन्नत करती है

दोस्तों, मैं इस पोस्ट में कुंडलिनी से जुड़ा हुआ सबसे बड़ा रहस्य उजागर करने जा रहा हूँ। योग साधना से जिस चीज को बढ़ाया जाता है, उसको भिन्न-2 स्थानों पर भिन्न-2 नाम दिए गए हैं। कहीं इसे ऊर्जा, कहीं पर संवेदना, कहीं पर प्रकाश, और कहीं पर कुंडलिनी कहा जाता है। वास्तव में ये सभी नाम सही हैं। ये सभी नाम एक ही साधना का वर्णन ऐसे कर रहे हैं, जैसे बहुत से अंधे एक हाथी का वर्णन उसके एक-2 अंग से करते हैं।

संवेदना-ऊर्जा के ऊर्ध्वगमन का मेरा अपना अनुभव

मैंने पिछली पोस्ट में बताया था कि भावनात्मक सदमे से कैसे मेरी संवेदना-ऊर्जा मूलाधार से सहस्रार तक लगातार प्रवाहित हो रही थी। वह प्रकाशमान ऊर्जा एक पुल की तरह लग रही थी, जो इन दोनों चक्रों को आपस में जोड़ रही थी। इसका अर्थ है कि मेरी सुषुम्ना नाड़ी खुल गई थी। वास्तव में यह ऊर्जा एक खारिश की अनुभूति जैसी ही साधारण सेंसेशन थी, पर बहुत घनीभूत थी। मैं पहले ऐसे ऊर्जा चैनेल पर कम ही विश्वास करता था, पर इस अनुभव से मेरा विश्वास पक्का हो गया। यह ऊर्जा प्रवाह लगभग 10 सेकेंड तक बना रहा, जिसके दौरान मुझे एक अति प्रकाशमान मंदिर का साक्षात अनुभव हुआ। जैसे कि मैं उस मंदिर से जुड़कर एकाकार हो गया था। फिर मेरी कुंडलिनी मेरे उस अनुभव क्षेत्र में आई, और मैं उससे एकाकार हो गया। यद्यपि यह पूर्ण एकाकार नहीं था। अर्थात यह खंडित या अल्प कुंडलिनी जागरण था, पूर्ण नहीं। सम्भवतः ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि मेरी सुषुम्ना पूरी तरह नहीं खुली थी, और ज्यादा समय तक खुली नहीं रही। 

कुंडलिनी से एकाकार होने के अतिरिक्त लाभ

जिस समय संवेदना ऊर्जा मूलाधार से सहस्रार तक सुषुम्ना नाड़ी से प्रवाहित हो रही हो, उस समय जो मानसिक चित्र बनता है, वह उतना तीव्र व स्पष्ट होता है कि आदमी उससे जुड़कर एकाकार हो जाता है। उससे आदमी को जीवन का वह सबसे बड़ा सुख मिलता है, जो कि सम्भव है। उससे आदमी संतुष्ट हो जाता है। उससे वह जीवन के प्रति अनासक्त होकर अद्वैतशील बन जाता है। उससे उसके मन में कुंडलिनी का बसेरा हो जाता है, क्योंकि अद्वैत के साथ कुंडलिनी सदैव रहती है। यदि आदमी पहले से ही कुंडलिनी साधना कर रहा हो, तब सुषुम्ना प्रवाह के दौरान अन्य चित्रों की बजाय कुंडलिनी का चित्र बनता है, और उससे आदमी एकाकार हो जाता है। इससे कुंडलिनी को अतिरिक्त शक्ति मिल जाती है। यदि प्रारंभ से ही संवेदना के साथ कुंडलिनी को जोड़ा जाता रहे, तब दोनों एक दूसरे को बढ़ाते रहते हैं। सुषुम्ना प्रवाह के दौरान जब कुंडलिनी मेरे मन में आई, तब मुझे उसके साथ मंदिर से अधिक जुड़ाव महसूस हुआ। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि रोज के कुंडलिनी ध्यान से मैं कुंडलिनी के साथ जीने का अभ्यस्त हो गया था। इन बातों से सिद्ध होता है कि सम्पूर्ण साधना कुंडलिनी योग ही है।

यदि चक्र अवरोधित न हों, तो सुषुम्ना के ऊर्जा प्रवाह के अनुभव के बिना ही कुंडलिनी जागरण होता है, और वह जागरण संपूर्ण होता है

उपरोक्त तथ्य को सिद्ध करने के लिए मैं अपना ही उदाहरण देता हूँ। अपने आत्मज्ञान के अनुभव के दौरान मैं सपने में दिख रहे दृश्य के साथ एकाकार हुआ था, किसी विशेष कुंडलिनी चित्र के साथ नहीं। परंतु उसके बाद मेरी वह महिला मित्र कुंडलिनी के रूप में मेरे मन में दृढ़ता से संलग्न हो गई थी, जिसकी सर्वाधिक सहायता से मैं उस आत्मज्ञान के अनुभव तक पहुंचा था।

उसके कई वर्षों बाद मैं कुंडलिनी साधना करने लगा। मैंने उन्हीं वृद्ध आध्यात्मिक पुरुष को अपनी कुंडलिनी बनाया हुआ था। उस दौरान जब मेरी सुषुम्ना खुली और उसमें ऊर्जा का प्रवाह हुआ (यद्यपि मुझे वह प्रवाह अनुभव नहीं हुआ, क्योंकि मेरे सभी चक्र अनब्लॉक थे, इसी वजह से वह जागरण संपूर्ण था, यद्यपि मैंने डर कर उसे एकदम नीचे उतार दिया), तब कुंडलिनी चित्र मेरे मन में प्रकट हुआ और मैं उससे पूरी तरह से एकाकार हो गया। हालांकि बैकग्राउंड के अन्य दृष्यों से भी मैं एकाकार ही था, पर मुख्य तो कुंडलिनी ही थी। इसी तरह, आत्मज्ञान के समय भी मुझे पीठ में एनर्जी फलो का भान नहीं हुआ, इसीलिए वह जागरण भी पूर्ण शक्तिशाली लग रहा था।

विशेष प्रकार का श्वास होने पर ही सुषुम्ना नाड़ी खुलती है

कहते हैं कि जब श्वास डायफ्रागमेटिक अर्थात एब्डोमिनल, गहरी, धीमी और बिना आवाज के चले; तभी सुषुम्ना के खुलने की ज्यादा संभावना होती है। मेरे भावनात्मक सदमे के दौरान मेरी सांसें बिल्कुल ऐसी ही हो गई थीं। इसीसे मेरी सुषुम्ना नाड़ी खुली। इससे यह जनप्रचलित बात सिद्ध हो जाती है कि सांसों के नियमन से ही योग होता है। 

सुषुम्ना के थ्रू एनर्जी राईज के लिए मूलाधार और सहस्रार चक्र के बीच में बहुत ज्यादा विभवांतर अर्थात पोटेंशियल डिफरेंस पैदा होना चाहिए

भावनात्मक सदमे से ये फायदा हुआ कि मेरा मस्तिष्क फुली डिस्चार्ज होकर नेगेटिव पोटेंशियल में आ गया था। मूलाधार तांत्रिक योगसाधना के कारण फुली पोसिटिव पोटेंशियल में था। इससे मूलाधार और सहस्रार के बीच में बहुत ज्यादा पोटेंशियल डिफरेंस पैदा हुआ। इससे मूलाधार और सहस्रार के बीच में सेंसेशनल इलेक्ट्रिक स्पार्क पैदा हुआ, जिसे हम एनर्जी राइज कह रहे हैं।

और हां, पूर्व पोस्ट में जिस मित्र से मुझे भावनात्मक सदमा मिला था, उससे प्यारा समझौता हो गया है। सप्रेम।

कुंडलिनी जागरण के लिए भावनात्मक सदमे की आवश्यकता

दोस्तों, मान्यता है कि भावनात्मक सदमे से भी कुंडलिनी जागरण होता है। यदि पहले से ही कुंडलिनी योग किया जा रहा हो, तब तो वह ज्यादा प्रभावी हो जाता है। आज मैं इसी से संबंधित अपना ताजा अनुभव बताऊंगा।

27 साल बाद व्हाट्सएप पर मुलाकात

सीनियर सेकंडरी स्कूल एजुकेशन के बाद कई सहपाठियों से पहली बार मुलाकात 27 साल बाद व्हाट्सएप पर हुई। अच्छा लग रहा था। पुरानी भावनाओं पर हरियाली छा रही थी। उसी क्लास के दौरान मेरी कुंडलिनी सबसे तेजी से विकसित हुई थी। कुंडलिनी का दूसरा नाम प्रेम भी है। सीधी सी बात है कि ग्रुप के सभी सदस्यों के साथ मेरा अच्छा प्रेमपूर्ण संबंध था। ग्रुप मैंने शुरु किया था, हालांकि सदस्यों को जोड़ने का अधिकांश काम एक अनुभवी सदस्या ने किया था। कुछ दिन ग्रुप अच्छा चला। कुंडलिनी का मनोविज्ञान समझने के लिए मैं एक भावनात्मक सदस्या के बारे में विस्तार से जानना चाहता था। लेखन का औऱ कुंडलिनी रिसर्च का मुझे पहले से ही शौक है। सदस्या ने मेरा मेसेज पढ़ा और ट्यूशन आदि के लिए आए बच्चों की पढ़ाई खत्म होने के बाद बात करने का भरोसा उदासीन भाव के साथ दिया। यद्यपि वह पढ़ाई आज तक खत्म नहीं हो सकी। मैंने मान लिया कि पारिवारिक या अन्य मनोवैज्ञानिक कारणों से उसने ठीक ही किया होगा। क्योंकि विश्वास ही कुंडलिनी की पहचान है। पर मुझे उससे भावनात्मक सदमा लगा। वैसा भावनात्मक सदमा मुझे 2-3 बार पहले भी लग चुका था। वास्तव में ऐसा धोखा तब होता है, जब हम मन के संसार को असली मानने लगते हैं। पर वास्तव में दोनों में बहुत अंतर हो सकता है। मन में जो आपका सबसे बड़ा मित्र है, वह असल जीवन में आपका सबसे बड़ा शत्रु हो सकता है। इससे साफ जाहिर है कि प्रेम ही सबसे बड़ा मित्र है, और प्रेम ही सबसे बड़ा शत्रु भी है। एक पालतु पशु अपने मालिक से बहुत ज्यादा प्रेम करता है, और उससे दूर नहीं होना चाहता, पर वही मालिक उसे कसाई के हाथों सौंप देता है। तभी तो कहते हैं कि प्यार या विश्वास अंधा भी होता है। 

मानसिक आघात के बाहरी लक्षणों का पैदा होना

उस आघात से मैं बहुत सेंसिटिव व इमोशनल हो गया था। मैं ग्रुप में कुछ न कुछ लिखे जा रहा था। अन्य सदस्यों की छोटी-2 बातें मुझे चुभ रही थीं। इस वजह से मैंने दो सदस्यों को ग्रुप से निकाल दिया। उससे नाराज होकर एडमिन सदस्या भी निकल गई। हालाँकि मैंने उन्हें उसी समय दुबारा ग्रुप में शामिल कर दिया औऱ कहा कि वे चाहें तो निकाले गए सदस्यों को दुबारा दाखिल कर दें। मैं इमोशनल तो था ही , उससे मुझे उसके बाहर निकलने में भी पार्शियलिटी की बू आई, जिससे मेरा मन और डिस्टर्ब हो गया। उसके बाद उपरोक्त ट्यूशन मैडम जी भी बिना वजह बताए ग्रुप छोड़कर चली गईं। एक-एक करके लोग ग्रुप से बाहर जाने लगे। मैं ग्रुप से बाहर होने के उनके दुख को महसूस करने लगा। वही वजह बता कर मैंने भी भावनात्मक आवेश में आकर ग्रुप से किनारा कर लिया। हालांकि ऐसा चलता रहता है सोशल मीडिया में, पर यहाँ पर कुंडलिनी से जुड़ी संवेदनशीलता की बात हो रही है। उस शाम को मैं काफी रोया। रात को मुझे अपने सिरहाने के के नीचे रुमाल रखना पड़ा। दरअसल वो आँसू खुशी के थे, जो लंबे अरसे बाद दोस्तों से मिलकर आ रहे थे। मेरे पूरे शरीर और मन में थकान छा गई। मेरी पाचन प्रणाली गड़बड़ा गई। 

भावनात्मक सदमे के दौरान कुंडलिनी सर्ज

उसी भावनात्मक आघात वाली शाम को मेरी एनर्जी बार-2 मेरी पीठ से चढ़कर शरीर के आगे के भाग से नीचे उतर रही थी, एक बंद लूप में। कभी-कभी उस एनर्जी के साथ कुंडलिनी भी जुड़ जाती थी। रात को नींद में अचानक बहुत सारी एनर्जी मेरी पीठ में ऊपर चढ़ी। उसके साथ में ऐसा स्वप्न आया कि मैं बहुत बड़े औऱ सुंदर मंदिर के द्वार से अंदर प्रविष्ट हो रहा हूँ। वह एनर्जी मेरे मस्तिष्क में समा रही थी। विशेष बात यह थी कि उस एनर्जी से मेरे मस्तिष्क में बिल्कुल भी दबाव पैदा नहीं हो रहा था, जैसा अक्सर होता है। शायद कई दिनों तक भरपूर नींद लेने से मेरा मस्तिष्क तरोताजा हो गया था। दूसरी वजह यह थी कि भावनात्मक सदमे से दिमाग खाली सा हो गया था। फिर मस्तिष्क में उस एनर्जी के साथ कुंडलिनी जुड़ गई। वह कुंडलिनी जागरण जैसा अनुभव था, यद्यपि उसके स्तर तक नहीं पहुंच सका। 

कुंडलिनी के बारे में वर्णन केवल इसी वैबसाइट में मिलेगा

मैंने हर जगह अध्ययन किया। हर जगह केवल एनर्जी का ही वर्णन है, कुंडलिनी का कहीं नहीं। अधिकांश जगह एनर्जी को ही कुंडलिनी माना गया है। पर दोनों में बहुत अंतर है। बिना कुंडलिनी की एनर्जी तो वैसी भारतीय मिसाइल है, जिस पर भारत का राष्ट्रीय ध्वज अंकित नहीं है। विशेष चीज, जो प्यार की निशानी है, और मानवता का असली विकास करने वाली है, वह कुंडलिनी ही है। एनर्जी तो केवल कुंडलिनी को जीवन्तता प्रदान करने का काम करती है। इस वेबसाइट के इलावा यदि कहीं कुंडलिनी का वर्णन है, तो वह “पतंजलि योगसूत्र” पुस्तक है। उसमें कुंडलिनी को ध्यानालम्बन कहा गया है। अधिकांश लोगों के मन में कुंडलिनी व शक्ति (एनर्जी) के स्वभाव के बीच में कन्फ्यूजन बना रहता है।

एक पुस्तक जिसने मुझे हर बार भावनात्मक सदमे से बचाया और उससे बाहर निकलने में मेरी मदद की

वह पुस्तक है, “शरीरविज्ञान दर्शन”, जो इस वेबसाइट के “शॉप (लाईब्रेरी)” वेबपेज पर उपलब्ध है। विस्तृत जानकारी के लिए इस लिंक पर जाएं।

अद्वैत भाव के साथ मदिरा ही सोमरस या एलिकसिर ऑफ़ लाइफ है

उपरोक्त पुस्तक के साथ मदिरा ने मेरे रूपांतरण के साथ मेरी कुंडलिनी या आत्मा का विकास भी किया। खाली मदिरा कुंडलिनी को हानि पहुंचाती है। इस भावना के साथ थोड़ी सी मदिरा का भी बहुत ज्यादा असर होता था, और मदिरा की लत भी नहीं लगती थी। इसका अर्थ है कि पुराने समय में जो सोमरस या एलिकसिर ऑफ़ लाइफ बताया गया है, वह अद्वैत भावना वाले विधिविधान के साथ व उचित मात्रा में सेवन की गई उच्च कोटि की मदिरा ही है, कोई अन्य जादुई द्रव नहीं। देवता भी इसका पान करते हैं। 

प्रेम या सम्मान, दोनों में से एक से संतुष्ट हो जाते।
अन्यथा अपनी भावनाओं के भंडार की राह को प्रकाशित कर देते, हम स्वयं ही अन्वेषण कर लेेते।।

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कुण्डलिनी भी आत्महत्या के लिए प्रेरित कर सकती है?

सहलेखक: डा० भीष्म शर्मा {पशु चिकित्सक, हि. प्र. राज्य}

सह संपादक: मास्टर विनोद शर्मा {अध्यापक, हि. प्र. राज्य}

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अभी कुछ दिन पहले बौलीवुड के मशहूर सितारे सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या का मामला सामने आया। सबसे पहले हम उनकी आत्मा की शान्ति की कामना करते हैं। वह बुलंदियों पर था। बुलंदियां कुण्डलिनी से हासिल होती हैं। तो क्या कुण्डलिनी भी आत्महत्या की वजह बन सकती है? इस पोस्ट में हम इसका विश्लेषण करेंगे।

अवसाद एक छुआछूत वाले रोग की तरह है, जिसे कुंडलिनी योग की सहायता से दूर भगाया जा सकता है: एक अदभुत आध्यात्मिक मनोविज्ञान

एक ब्लयू व्हेल नाम की वीडियोगेम आई थी, जिसे खेलते हुए बहुत से बच्चों ने आत्महत्या की थी। सुशान्त ने एक आत्महत्यारे की पेंटिंग अपनी सोशल मीडिया वाल पर कई दिनों से लगाई हुई थी। उनकी छिछोरे फिल्म में वह अपने बेटे को इस रोग से बचने के लिए पूरी फिल्म में समझाते रहे। इसी तरह, एक खबर के अनुसार एक बिहार राज्य का लड़का देर रात तक अकेले में सुशांत की खुदकुशी की खबरें देखता रहा औऱ सुबह को वह भी लटका हुआ मिला। यह सब मन का खेल है। ऐसे आत्महत्या से संबंधित चिंतन से विशुद्धि चक्र पर एक कसाव सा पैदा होता है। गला दबा हुआ सा लगता है, और गले पर एक घुटन सी महसूस होती है। कुंडलिनी योगी को तो विशुद्धि चक्र पर ध्यान करने की पहले से ही आदत होती है। वह बार-2 वहां कुंडलिनी को फोकस करता है। उससे गले को जीवनी शक्ति मिलती है, और कुंडलिनी भी मजबूत होती है। गले की घुटन में गेस्ट्राइटिस का भी रोल हो सकता है। तनावपूर्ण और अनहेल्थी जीवनशैली से गेस्ट्राइटिस होती है। आजकल इसके इलाज के लिए सुरक्षित दवाई मौजूद है। ऐसी दवाइयां योग अभ्यास करने वाले लोगों को नुकसान पहुंचा सकती हैं। इसलिए इनका आधा डोज खाकर उनका अपने ऊपर असर परख लेना चाहिए। अवसाद-रोधी दवाएं तो बहुत से लोगों का अवसाद बढ़ा भी सकती हैं, क्योंकि उनसे आदमी की स्मरणशक्ति व कार्यक्षमता काफी घट जाती है। वे दवाईयां लम्बे समय से बनी हुई कुण्डलिनी को नुकसान पहुंचाती हैं, जिससे उससे जुड़े सभी काम दुष्प्रभावित हो सकते हैं। अगर किस्मत अच्छी हो, और परिश्रम किया जाए, तो उससे नए कुण्डलिनी-चित्र के निर्माण का और उसे जागृत करने का सुअवसर भी प्राप्त होता है। नई कुंडलिनी से एडजस्ट होने में समय लगता है। सूत्रों के अनुसार, सुशांत भी लम्बे अरसे से अवसाद रोधी दवाएं खा रहे थे, हालांकि कुछ समय से उन्होंने उन्हें खाना छोड़ा हुआ था। जितना हो सके मौन रहना चाहिए औऱ जीभ को तालु के साथ टाईटली जोड़कर रखना चाहिए ताकि मस्तिष्क की कुंडलिनी या विचार आसानी से नीचे बह सके। जिसने आत्महत्या की भावनाओं के बीच में रहते हुए भी उसे दबा दिया, वह असली योगी है।

सुशांत सिंह राजपूत कई बार अपनी स्वर्गवासिनी माँ की याद में खोकर भावुक हो जाते थे

वह अपनी माँ से सर्वाधिक प्रेम करते थे। यह बहुत अच्छी बात है, और बड़ों-बुजुर्गों से प्यार होना ही चाहिए। उनकी आखिरी सोशल मीडिया पोस्ट भी अपनी माँ की याद की थी। ऐसा हमें मीडिया से सुनने को मिला। सर्वाधिक प्रिय वस्तु ही मन में निरंतर बस कर कुण्डलिनी बन जाती है। इसका अर्थ है कि उनके मन में अपनी माँ की छवि कुण्डलिनी के रूप में बसी हुई हो सकती है। इसीसे उन्हें निरंतर सफलताएं मिलती गईं। वैसे तो पूर्वजों व पारिवारिक लोगों या बुजुर्गों से संबंधित शुद्ध कुंडलिनी हमेशा शांत औऱ कल्याणकारी ही होती है। परंतु कई बार वैसी कुंडलिनी का सहारा लेकर इश्क-मोहब्बत वाली कुंडलिनी मन पर हावी हो जाती है। वह बहुत भड़कीली होती है औऱ कई बार खतरनाक हो सकती है। सुशांत का कुछ स्टार लड़कियों से प्यार और ब्रेकअप भी सुनने में आया। कुंडलिनी को सकारात्मक व सही दिशा देने के लिए एक स्थिर दाम्पत्य जीवन बहुत जरूरी होता है। हालांकि सिने जगत में ऐसा चलता रहता है, पर सभी एक जैसे नहीं होते, और ऐसा सभी को सूट भी नहीं करता। इश्क-मुहब्बत के चक्कर में हुई आत्महत्याएं इसी कुदरती कुण्डलिनी से सम्बंधित होती हैं। डॉक्टर के अनुसार वह बाईपोलर डिसीस से पीड़ित थे। यह कुण्डलिनी-अवसाद का ही एक दूसरा रूप है। इसमें तीव्र उत्तेजना के दौर के बाद तीव्र अवसाद का दौर आता है।अगर ढंग से किया जाए, तो कुंडलिनी योग ही बाइपोलर रोग का सबसे बढ़िया इलाज है। कथित कलाकार ने थोड़े दिनों के लिए उसे इलाज के लिए किया था, फिर छोड़ दिया था।अगर ढंग से किया जाए, तो कुंडलिनी योग ही बाइपोलर रोग का सबसे बढ़िया इलाज है। कथित कलाकार ने थोड़े दिनों के लिए उसे इलाज के लिए किया था, फिर छोड़ दिया था। कुंडलिनी मन के विकारों को बाहर निकाल रही होती है। वास्तव में विकार ही अवसाद पैदा कर सकते हैं, कुंडलिनी नहीं।कुंडलिनी अवसाद से बचने के लिए हर समय काम में व्यस्त रहना चाहिए। कथित कलाकार कई दिनों से कामधाम छोड़कर कमरे में बंद हो गए थे।

किसीसे बिछुड़ने का गम भी कुंडलिनी अवसाद का ही एक प्रकार है। उस गम को खुशी में बदलने के लिए बिछुड़े हुए व्यक्ति के मानसिक चित्र को कुंडलिनी बनाकर कुंडलिनी योग साधना शुरु कर देनी चाहिए।

कुण्डलिनी से उस सिने कलाकार की आध्यात्मिक प्रगति भी तीव्रता से हो रही थी

प्रत्यक्षदर्शी कहते हैं कि वे अध्यात्मिक रुझान वाले व बेहद संवेदनशील व्यक्ति थे। उनकी कम उम्र के शरीर में एक बुजुर्ग का दिमाग था। ऐसे गुण कुण्डलिनी से ही उत्पन्न होते हैं।

कुण्डलिनी आदमी को जीवन के प्रति लापरवाह बना सकती है

कुण्डलिनी के कारण आदमी अद्वैत से भर जाता है। इसका मतलब है कि उसे रात-दिन, जीवन-मृत्यु, दोस्त-दुश्मन, सुख-दुःख आदि सभी विपरीत चीजें एकसमान जैसी लगने लगती हैं। इससे यह अर्थ निकलता है कि आदमी को किसी चीज से डर नहीं लगता। जब कोई आदमी अपनी मौत से नहीं डरेगा, तब वह अपनी जिंदगी के प्रति लापरवाह हो जाएगा। वही लापरवाही जब सीमा पार कर जाती है, तब वह आत्महत्या का रूप ले लेती है। वास्तव में तो अद्वैत से सतर्कता बढ़ती है, लापरवाही नहीं। पर कई लोग अद्वैत को गलत तरीके से ग्रहण करते हैं।

कुण्डलिनी को संभालने के लिए बाहरी सहारे की आवश्यकता होती है

उपरोक्त स्थिति में आदमी को बाहरी सहारा मिलना चाहिए। लोगों से मेल-जोल जारी रहना चाहिए। परिवार व दोस्तों के साथ खूब समय बिताना चाहिए। घूमना-फिरना चाहिए। सामाजिक समारोहों व कार्यों में शामिल होते रहना चाहिए। इससे कुण्डलिनी योगी को लोगों के मन में जीवन के प्रति लगाव नजर आएगा। लोगों के मन में अनहोनी का डर नजर आएगा। इससे उसे सही ढंग से जीवन जीने की प्रेरणा मिलेगी। आजकल के कोरोना लौकडाऊन ने बहुत सारे लोगों से यह सामाजिक सहारा छीन लिया है।

गुरु कुण्डलिनी के लिए सर्वोत्तम सहारा है

गुरु कुण्डलिनी के दौर से पहले ही गुजर चुका होता है। इसलिए उसे सब कुछ पता होता है। इसलिए वह नए-२ कुण्डलिनी योगी को अकेला ही पूरे समाज की शक्ति दे सकता है।

कुण्डलिनी अवसाद ही समुद्रमंथन से निकला हुआ विष है

समुद्रमंथन का वर्णन हिन्दू पुराणों में मिलता है। मंदराचल पर्वत कुण्डलिनी है। कुण्डलिनी-ध्यान वासुकी नाग है। मन समुद्र है। उससे निकली हुई अच्छी चीजें अच्छे विचार हैं, जो आदमी को देवता बनाते हैं। उससे निकली हुई गन्दी चीजें गंदे विचार हैं, जो आदमी को राक्षस बनाते हैं। मन के देवताओं और राक्षसों के परिश्रम व सहयोग से मंथन चलता रहता है। अंत के करीब जो विष निकलता है, वह कुण्डलिनी से पैदा हुआ अवसाद है। उसे पीने वाले शिव गुरु हैं। वे उसे गले में धारण करते हैं। इसका मतलब है कि वे शिष्य का अवसाद हर लेते हैं, पर स्वयं उससे प्रभावित नहीं होते। उसके बाद जो अमृत निकलता है, वह कुण्डलिनी से मिलने वाला आनंद है। समुद्र मंथन से जो लक्ष्मी मिलती है, उसका अर्थ तांत्रिक प्रतीत होता है। वह भगवान् नारायण तक ले जाती है।

कुण्डलिनी योग से सम्बंधित मेरा अपना अनुभव

जो मैंने इस पोस्ट में लिखा, वह मेरा अपना ही कुण्डलिनी अवसाद का, और उससे बाहर निकलने का अनुभव है। खुशकिस्मती से मुझे एक पड़ौसी सज्जन का सहारा मिल गया था, जिनके घर मैं बिना पूछे और खुलकर आ-जा सकता था, तथा जिनके साथ जितना चाहे समय बिता सकता था। दूसरे अधिकाँश लोग तो मुझे मंगल ग्रह से आए हुए प्राणी की तरह ट्रीट करते थे। अच्छा जोक कर दिया।

कुण्डलिनी मेडिटेशन की अवस्था ज्ञान की चरम अवस्था होती है, अवसाद तो वह दूसरे लोगों को लगती है

कुण्डलिनी अवसाद सापेक्ष होता है। स्वयं कुण्डलिनी योगी को वह ज्ञान की शीर्ष अवस्था लगती है। कुण्डलिनी के अन्य जानकारों को भी यह ऐसी ही लगती है। कुण्डलिनी से अनजान लोगों को ही वह अवसाद लगती है। इसलिए वैसे लोग कुण्डलिनी योगी की आलोचना करते रहते हैं, और उसे अवसाद से भर देते हैं। लोग तो उसके भले के लिए उसकी आलोचना करते हैं ताकि वह कुंडलिनी के बिना जीना सीख सके, पर वह इस बात को अक्सर समझ नहीं पाता। अवसाद उसे कुंडलिनी को मन से हटाने से होता है, क्योंकि उसे कुंडलिनी के नशे की लत लग जाती है। कुंडलिनी प्रकाश के सामने तो अवसाद का प्रश्न ही पैदा नहीं होता। इसीलिए या तो कुंडलिनी को किसी हालत में नहीं छोड़ना चाहिए या फिर कुंडलिनी से आसक्ति नहीं होनी चाहिए और उसके बिना जीने की आदत भी बनी रहनी चाहिए। नहीं तो वैसा ही अवसाद पैदा होने की संभावना है, जैसा नशेड़ी में एकदम से नशा छोड़कर पैदा होता है। जितनी ज्यादा रौशनी होगी, जब वह बुझेगी तब उतना ही ज्यादा अंधेरा भी होगा। कुंडलिनी शरीर औऱ मन की शक्ति को खींचती है। उससे पैदा हुई कमजोरी ही अवसाद की वजह बन सकती है। इसीलिए तंत्र में उस कमजोरी से बचने के लिए पंचमकारों के सेवन का प्रावधान है।इसीलिए अच्छी संगति को अपनाने पर जोर दिया गया है। अच्छा हो, यदि औरों के रास्ते में फूल न बो सको, तो कांटे भी नहीं बोने चाहिए। इससे फूल खुद उग आएँगे। महात्मा बुद्ध ने भी ऐसा ही कहा है।

यह ध्यान रखना चाहिए कि कुंडलिनी अवसाद प्राकृतिक तौर से उभरी कुंडलिनी से ज्यादा होता है। यद्यपि प्राकृतिक कुंडलिनी बहुत तेजी से आध्यात्मिक विकास करती है। इसलिए प्राकृतिक कुंडलिनी के इस खतरे से बचे रहने के लिए कृत्रिम कुंडलिनी योग करते रहना चाहिए।

एक पुस्तक जिससे मुझे कुण्डलिनी अवसाद से पूरी तरह से बाहर आने में मदद मिली

वह पुस्तक है “शरीरविज्ञान दर्शन”। उसका पूरा विवरण निम्नलिखित लिंक पर उपलब्ध है।

https://demystifyingkundalini.com/shop/

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कुण्डलिनी से प्रेमी की मृत आत्मा का ईश्वर अर्थात मुक्ति की ओर दिशा निर्देशन; कुंडलिनी योग द्वारा ड्रीम विजिटेशन में सहायता प्राप्त होना

कोरोना महामारी(कोविड-19) के कारण बहुत सी आत्माएं अपने-2 शरीरों से विदा ले रही हैं। सभी आत्माएं अपने सूक्ष्म शरीर के अनुसार नया जन्म लेंगीं।कुछ आत्माएं मुक्त भी हो जाएंगीं। मुझे लगता है कि यह अपनी सोच के अनुसार होता है। मरने के बाद सूक्ष्म शरीर खुद ही धीरे-2 साफ होता रहता है। कुछ आत्माओं का शुरुआती अंधेरे में दम घुटने लगता है, और वे लंबा वेट नहीं कर सकतीं। इसलिए वे शरीर ग्रहण कर लेती हैं। मृत्यु के बाद की उस डरावनी स्थिति को”तिब्बतन बुक ऑफ डैडस” में बारडो कहा गया है। बारडो की स्थिति में बड़े डरावने अनुभव होते हैं। उनसे डरना नहीं चाहिए, तथा यह मान कर चलना चाहिए कि वे असली नहीं हैं, बल्कि सब मन में हो रहे हैं। कुण्डलिनी योग की अद्वैत शक्ति से उस बारडो अवस्था को पार करने में बहुत मदद मिलती है।


ड्रीम विजिटेशन साधारण स्वप्नों से अलग होते हैं


भावनाप्रधान लोगों का अपने प्रियजनों से गहरा दिल का रिश्ता बना होता है। वे मृत्यु के बाद भी प्रेमी जनों से मेलजोल बनाए रखना चाहते हैं। इसलिए वे प्रेमीजनों के सपनों में अक्सर प्रकट होते रहते हैं। इसे ड्रीम विजिटेशन कहते हैं। कई बार वे सहायता मांगने आते हैं, और कई बार सहायता प्रदान करने। उन प्रेमीजनों में अधिकांशतः परिवार के लोग या रिश्तेदार होते हैं। ज्यादातर मामलों में शरीर विहीन आत्मा अपने एक ही परम प्रिय और परम विश्वसनीय आदमी को चुनती है। इसीलिए वह एक ही आदमी के सपने में बार-2 आती रहती है। ऐसा कुण्डलिनी सिद्धांत के अनुसार ही होता है।

मृत आत्मा का साक्षात्कार साधारण स्वप्न से अलग होता है

इसमें ऐसा लगता है कि सचमुच के जीवित आदमी से मुलाकात हो रही है। यहाँ तक कि वह जीवित आदमी से भी ज्यादा वास्तविक लगती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जिस कोड रूप में उस आत्मा के पिछले और आगे होने वाले जन्मों और शरीरों का ब्यौरा छुपा होता है, उस मूलभूत कोड (सूक्ष्म शरीर) से साक्षात्कार हो रहा होता है। ड्रीम विजिटेशन के समय डरना नहीं चाहिए। आगे के लिए भी मन पक्का कर लेना चाहिए, क्योंकि वह आत्मा बार-2 सपने में आती है।धीरे-2 आदत पड़ जाती है।अभ्यास होने पर तो आत्मा के साथ लंबे समय तक बातें की जा सकती हैं, नहीं तो वह शीघ्र ही ओझल हो जाती है। कुण्डलिनी योग साधना की अद्वैत शक्ति से उस डर पर विजय पाने में मदद मिलती है।

आत्माओं को नया शरीर अपने सूक्ष्म शरीर के अंधेरे के अनुसार छोटा या बड़ा मिलता है

जो आत्माएं बारडो के अंधेरे के छंटने का जितना लंबा वेट करती हैं, उन्हें उतना ही अच्छा शरीर मिलता है। कई आत्माएं बहुत साफ हो जाती हैं, इसलिए वे देवता बन जाती हैं। बहुत कम सहनशील व खुशनसीब आत्माएं जो पूरी तरह से अपनी सफाई का वेट कर लेती हैं, केवल वे ही मुक्त होकर ईश्वर में मिल जाती हैं। इसलिए परिस्थिति व विश्वास के अनुसार यह गैर हिंदू मत भी सत्य है कि आदमी का पुनर्जन्म नहीं होता, और यह हिंदु मत भी सत्य है कि मृत्यु के बाद आदमी का पुनर्जन्म होता है। हालांकि मुक्त होने के लिए अच्छे कर्मों का होना भी जरूरी होता है। यदि ऐसा न होता तब तो महाप्रलय काल में सभी आत्माएं अपने आप मुक्त हो जातीं। उस काल में तो करोड़ों वर्षों तक शरीर नहीं मिलता। वेद कहते हैं कि उस काल में भी आत्मा आप अपने आप मुक्त नहीं होती। दूसरी बात वेदों में यह भी कही गई है कि मृत्यु के समय ईश्वर का स्मरण होने से मुक्ति मिल जाती है। पर यह भी सत्य है कि जीवन भर शुभ कर्म करने से ही मृत्यु के समय ईश्वर का स्मरण हो पाता है। इसका मतलब है कि शुभ कर्मों की कतई अनदेखी नहीं करनी चाहिए।

अगली पोस्ट में मैं अपने ड्रीम विजिटेशन के उन निजी अनुभवों के बारे में बताऊंगा जिनसे मैंने उपरोक्त तथ्य निकाले हैं।

कुंडलिनी के नवीनतम अवतार के रूप में कोरोना वायरस (कोविद-19); संभावित कोरोना-पुराण की मूलभूत रूपरेखा

दोस्तों, कोरोना ने एंड्रॉइड फोन पर वेबपोस्ट बनाना सिखा दिया है। इस हफ्ते मेरा डेस्कटॉप कम्प्यूटर भी लोकडाऊन में चला गया। वास्तव में कोरोना से दुनिया को बहुत कुछ सीखने को मिला है। कोरोना ने लोगों की अंधी भौतिक दौड़ पर लगाम लगाई है। इसने लोगों को जीवन जीने का तरीका सिखाया है। इसने मानवता को बढ़ावा दिया है। इसने प्रकृतिको स्वस्थ होने का अवसर प्रदान किया है। इसीलिए हम कोरोना को ईश्वर का अवतार मान रहे हैं, क्योंकि ईश्वर के अवतार ही इतने कम समय में ऐसे आश्चर्यजनक काम करते हैं।

कुंडलिनी और ईश्वर साथ-साथ रहते हैं

कुंडलिनी-अवतार कहो या ईश्वर-अवतार। बात एक ही है। कुंडलिनी ही शक्ति है। ईश्वर ही शिव है। वही अद्वैत है। शिव और शक्ति सदैव साथ रहते हैं। अद्वैत औऱ कुंडलिनी हमेशा साथ रहते हैं। कोरोना के डर से सभी लोग अद्वैतवादी बन गए हैं। वे जन्म-मृत्यु, यश-अपयश, और सुख-दुख में एकसमान रहना सीख गए हैं। इस प्रकार से हर जगह कुंडलिनी का बोलबाला हो गया है। हर जगह कुंडलिनी चमक रही है।

कुंडलिनी किसी भी रूप में अवतार ले सकती है

पुराणों में ईश्वर के विभिन्न अवतारों का वर्णन आता है। ईश्वर ने कभी मत्स्य अवतार, कभी वराह अवतार, कभी कच्छप अवतार, कभी वराह अवतार और कभी मनुष्य अवतार ग्रहण किया है। सभी अवतारों में उन्होंने अधर्म का नाश करके धर्म की स्थापना की है। जब ईश्वर मछली के रूप में अवतार ले सकता है, तब वायरस (कोरोना) के रूप में क्यों नहीं। कोरोना वायरस भी तो अधर्म का ही नाश कर रहा है।

कुंडलिनी के कोरोना अवतार के द्वारा अधर्म का नाश

सबसे पहले तो इसने उन धार्मिक कट्टरपंथियों के जमघट पर लगाम लगाई है, जो धर्म के नाम पर घोर अमानवतावादी बने हुए थे। इससे उनकी शक्ति क्षीण हुई है। दूसरा, इसने उन बड़े-2 विकसित देशों की हेकड़ी निकाल दी है, जो विज्ञान व तकनीक के घमंड में चूर होकर व्यापक जनसंहार के हथियार बना रहे थे। आज उनके हथियार उनके किसी काम नहीं आ रहे हैं, और उन्हीं के लिए मुसीबत बन गए हैं। हाल यह है कि कभी दुनिया को हथियार बेचने वाला सुपरपावर अमेरिका कोरोना के खिलाफ दवाई (हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन) के लिए भारत के आगे हाथ फैला रहा है। तीसरा, इसने लोगों के अंधाधुंध माँस भक्षण पर रोक लगाने का काम किया है। कोरोना के डर से लोग जीव हिंसा और मांस भक्षण से किनारा करने लगे हैं।

कुंडलिनी दुष्टों को अपनी ओर आकर्षित करके वैसे ही मारती है, जैसे कीड़ों-मकोड़ों को दीपक

विश्वस्त सूत्रों के अनुसार पाकिस्तान अपने आतंकवादियों को कोरोना से संक्रमित करवा कर भारत की सीमाओं में उनकी घुसपैठ करवा रहा है। इससे वही नष्ट होगा। भगवान विष्णु के मोहिनी अवतार में भी दुष्ट राक्षस सुंदर मोहिनी देवी की तरफ आकृष्ट होकर उसी के द्वारा नष्ट हो गए थे।

कुंडलिनी के हाथ बहुत लंबे हैं

आजकल के लोगों का पुराणों के ऊपर से विश्वास उठ सा गया था। वे पुराणों के अवतारों की कहानियों को झूठा समझने लग गए थे। वे समझने लग गए थे कि आजकल के मिसाइल व परमाणु बम के युग में धनुष बाण या तलवार धारण करने वाला ईश्वर अवतार क्या कर लेगा। वे मान रहे थे कि मछली या कछुए जैसे अवतार भी आज क्या कर लेंगे। अब कुंडलिनी (ईश्वर) ने ऐसे लोगों का परिचय अपने उस विषाणु (विष्णु नहीं, विषाणु) अवतार से कराया है, जिसका नाम कोरोना है। उसको आज आदमी का कोई भी हथियार नुकसान नहीं पहुंचा पा रहा है, और न ही उसे रोक पा रहा है। ठीक ही कहा है, “न जाने किस रूप में नारायण मिल जाए”। इसलिए आज आदमी के लिए यही ठीक है कि वह कोरोना वायरस को कुंडलिनी समझ कर उसे नमस्ते करे, उससे अपने अपराधों के लिए क्षमा मांगे, भविष्य के लिए उससे सबक ले, और अधर्म को छोड़कर धर्म के रास्ते पर चलना शुरु करे।

कोरोना पुराण से मिलती जुलती पुस्तक है “शरीरविज्ञान दर्शन”

आजकल तो इसके पढ़ने का विशेष फायदा है, क्योंकि आजकल स्वास्थ्य संबंधी आपदा (कोरोना) चरम पर है। इस पुस्तक में पूरे शरीर विज्ञान को एक पौराणिक उपन्यास की तरह रोचक ढंग से समझाया गया है। इसलिए इस पुस्तक को कोरोना पुराण भी कह सकते हैं। इससे जहां एक ओर भौतिक विकास होता है, वहीं दूसरी ओर आध्यात्मिक विकास भी। इसमें कोरोना जैसे विषाणु के मानवता के ऊपर हमले की घटना का भी भविष्यवाणी की तरह वर्णन किया है। वह श्वास प्रणाली को अवरुद्ध करता है। उससे बहुत से लोग बड़ी दीनता के साथ मर जाते हैं, और बहुत से बच भी जाते हैं। मानवशरीर को इसमें एक देश की तरह दिखाया गया है। विषाणु को उग्रपंथी शत्रु मनुष्य की तरह दिखाया गया है। शरीर की रोगाणुओं से रक्षा करने वाले व्हाईट ब्लड सेल्स, देहदेश के वीर सैनिक हैं। श्वास नलिकाएं कन्दराएँ हैं। फेफड़े एक विशाल जलाशय के रूप में हैं। बहुत सुंदर दार्शनिक चित्रण है। ऐसे बहुत से दार्शनिक आख्यान पूरी पुस्तक में हैं, जो समस्त शरीर की सभी वैज्ञानिक गतिविधियों को कवर करते हैं। लगता है कि इस पुस्तक के लेखक को इस कोरोना महामारी का अचिंत्य पूर्वाभास हो गया हो, जिसे वह बता न सकता हो। उसी धुंधले पूर्वाभास ने उसे पुस्तक लिखने के लिए प्रेरित किया हो। पुस्तक लगभग 2017 में छपी है। पुस्तक को समीक्षा में सर्वपठनीय, सर्वोत्तम व विलक्षण आंका गया है।

कोरोना से सबक लेकर अब लोग फिर से वेद पुराणों पर विश्वास करने लगे हैं। आशा है कि पाठकों को यह संक्षिप्त कोरोना पुराण पसंद आया होगा।

हम किसी भी धर्म का समर्थन या विरोध नहीं करते हैं। हम केवल धर्म के वैज्ञानिक और मानवीय अध्ययन को बढ़ावा देते हैं।

इस पोस्ट में दी गई समाचारीय सूचना को सबसे अधिक विश्वसनीय माने जाने वाले सूत्रों से लिया गया है। इसमें लेखक या वैबसाईट का अपना कोई योगदान नहीं है।

यह पोस्ट चिकित्सा विज्ञान का विकल्प नहीं है, अपितु उसकी अनुपूरक है। कृपया कोरोना से लड़ने के लिए डाक्टर की सलाह का पालन अवश्य करते रहें।

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कुण्डलिनी के विकास के लिए कोरोना (कोविड-19) से सहायता प्राप्त करना; नई दिल्ली की निजामुद्दीन-मस्जिद में तबलीगी जमात के मरकज की घटना; एक आध्यात्मिक-मनोवैज्ञानिक विश्लेषण

हम किसी भी धर्म का समर्थन या विरोध नहीं करते हैं। हम केवल धर्म के वैज्ञानिक और मानवीय अध्ययन को बढ़ावा देते हैं।

इस पोस्ट में दी गई समाचारीय सूचना को सबसे अधिक विश्वसनीय माने जाने वाले सूत्रों से लिया गया है। इसमें लेखक या वैबसाईट का अपना कोई योगदान नहीं है।

दोस्तों, अभी दुनियाभर में लौक डाऊन का सख्ती से पालन किया जा रहा है, ताकि कोरोना महामारी से बचा जा सके। भारत में भी पूरे देश में 14 अप्रैल तक संपूर्ण लौकडाऊन है। यह लौकडाऊन 21 दिनों का है। सभी लोग अपने घरों में कैद हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कह रहे हैं कि उससे कुछ दिनों के लिए तो महामारी कम हो जाएगी, पर लगभग 45 दिनों के लगातार लौकडाऊन से ही महामारी से पूरी तरह से बचा जा सकता है।

ऐसी लौकडाऊन की स्थिति में इस्लाम को मानने वाली कट्टरपंथी तबलीगी जमात के लोग कोरोना वायरस से दोस्ती निभा रहे हैं। नई दिल्ली में अनेक कोरोना संक्रमित देशों के लोग अभी हाल ही में इकट्ठे हुए, जब नई दिल्ली में कर्फ्यू लगा हुआ था। ये लोग टूरिस्ट वीजा पर भारत आए हुए थे, पर यहाँ पर वे धर्म-प्रचार कर रहे थे, जो कि अवैध है। इन्होंने पुलिस की चेतावनी को भी नहीं माना। अनेकों बार पुलिस भी इनसे डरती है, क्योंकि ये सामने तो खुली हिंसा पर उतारू हो जाते हैं, पर पीठ के पीछे प्रताड़ित होने का ढोंग करते हैं। अधिकाँश देशी-विदेशी मीडिया भी इन्हें प्रताड़ित की तरह प्रस्तुत करते हैं। सूक्ष्म परजीवियों (कोरोना वायरस) की भी शरीर के अन्दर ऐसी ही स्ट्रेटेजी होती है। मीडिया टेप के सामने आने से यह खुलासा हुआ है कि निजामुद्दीन की उस तबलीगी मस्जिद में उसके अध्यक्ष मौलाना साद लोगों को भड़का रहा है। वह सभी को कह रहा है कि मुसलामानों को आपस में नजदीकी बनाए रखना चाहिए, और एक थाली में खाना खाना नहीं छोड़ना चाहिए। और कहता है कि कोरोना वायरस का प्रोपेगेंडा मुसलमानों को अलग-थलग करने के लिए फैलाया गया है। अल्लाह ने अगर कोरोना से मौत लिखी है, तो कोई नहीं बचा सकता। मस्जिद में मरने से अच्छा क्या काम हो सकता है। अल्लाह को मानने वाले डाक्टर से ही अपना इलाज करवाएं। फिर वे लोग उस मस्जिद से निकलकर पूरे देश में फैल गए। उनमें से बहुत से लोग कोरोना से संक्रमित पाए गए। कुछ मर गए। बहुत से लोग अभी भी मस्जिद आदि में छुपे हुए हैं, जो पकड़ में नहीं आ रहे हैं। यहाँ तक कि जब कुछ लोगों को क्वारनटाइन में रखने का प्रयास किया गया, तो वे हरेक हिदायत को ठुकराने लगे, दुर्व्यवहार करने लगे, पत्थरबाजी करने लगे (कुछ तो फायरिंग करते हुए भी सुने गए), और कर्मचारियों पर थूकने लगे, ताकि कोरोना वायरस हर जगह फैल सके। इस घटना के बाद पूरे देश में कोरोना मरीजों की संख्या एकदम से बढ़ी है, जिसने लौकडाऊन की सफलता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है।

कुण्डलिनी जीवन और मृत्यु के संगम में निहित है       

धार्मिक शास्त्रों में मृत्यु से संबंधित युद्ध, दुर्भिक्ष आदि आपदाओं की बहुत सी कहानियां आती हैं। साथ में, उन्हीं शास्त्रों में ही जीवन से भरपूर कथा-रस भी बहुतायत में है। इससे जीवन और मृत्यु के संगम की अनुभूति होती है। उसी संगम को अद्वैत कहते हैं। उसी अद्वैत के साथ कुण्डलिनी भी विद्यमान होती है। यह धार्मिकता कथा-कहानियों तक ही सीमित रहनी चाहिए। जब उन्हें असली जीवन में हूबहू उतारने का प्रयास किया जाता है, तब उसे अतिवादी या कट्टर धार्मिकता कहा जाता है।

कुण्डलिनी की प्राप्ति के लिए अति लालसा से प्रेरित होकर ही अमानवीय काम होते हैं

इसी वजह  से ही कई बार कुण्डलिनी योगी नीरस, उबाऊ, कट्टर, अमानवीय, व उग्रवादी जैसे लगते हैं। ऐसा इसलिए लगता है, क्योंकि उनमें मृत्यु का भय नहीं होता। अपनी कुण्डलिनी के प्रभाव से वे जीवन-मृत्यु में, यश-अपयश में, व सुख-दुःख में समान होते हैं। उनके मन में यह समता कुण्डलिनी योग साधना से छाई होती है। परन्तु धार्मिक कट्टरवादी इस समता/अद्वैत को अमानवीय कामों से पैदा करते हैं। वे गलत काम करते हैं, ताकि उनके मन से मृत्यु, अपयश व दुःख का भय ख़त्म हो ज्जाए।  इससे वे भी जीवन-मृत्यु में, यश-अपयश में, व सुख-दुःख में समान रहने लगते हैं। इस अद्वैत से उनके मन में कुण्डलिनी अप्रत्यक्ष तरीके से आकर बस जाती है।

मतलब साफ है कि कुण्डलिनी योगी कुण्डलिनी की मदद से अद्वैत को प्राप्त करता है, परन्तु धार्मिक कट्टरवादी आमानवीय कामों से अद्वैत को प्राप्त करता है। किसी कारणवश धार्मिक कट्टरवादी कुण्डलिनीयोग नहीं कर पाते हैं। उनके पास मध्य मार्ग के अनुसार संतुलित व तांत्रिक जीवन जीने का अवसर होता है, पर वे उस पर विशवास नहीं करते, और उसे बहुत धीमा तरीका भी मानते हैं। आध्यात्मिक मुक्ति के प्रति इसी अति लालसा से प्रेरित होकर वे अमानवतावादी बन जाते हैं। उनमें से बहुत कम लोग ही सफल हो पाते हैं, बाकि सारे तो नरक की आग में गिर जाते हैं। तभी  तो कई धर्मों में पुनर्जन्म को माना गया है, ताकि आदमी निरुत्साहित होकर अमानवीय न बन जाए, और वह यह समझ सके कि उसकी साधना की कमी उसके अगले जन्म में पूरी हो जाएगी।

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कुण्डलिनी ही दंगों के लिए जिम्मेदार है, और कुण्डलिनी ही दंगों से सुरक्षा के लिए भी जिम्मेदार है; एनआरसी के विरोध में दिल्ली दंगों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण

हम किसी भी धर्म का समर्थन या विरोध नहीं करते हैं। हम केवल धर्म के वैज्ञानिक और मानवीय अध्ययन को बढ़ावा देते हैं।

पिछली पोस्ट में हमने पढ़ा कि किस प्रकार से दिल्ली दंगों की तैयारी बेहतरीन बारीकी, तालमेल और गोपनीयता से लम्बे समय से चल रही थी। हिंसक अभियान को अंजाम देने वाली ऐसी उम्दा कार्यशैली तो हमारे अपने शरीर में ही दिखाई देती है, अन्यत्र कहीं नहीं। क्योंकि हमारा पूरा शरीर कुण्डलिनी शक्ति (अद्वैत शक्ति) के द्वारा चलायमान है, इससे सिद्ध होता है कि दिल्ली की जेहादी मानसिकता वाली घटना के पीछे भी कुण्डलिनी शक्ति का ही मुख्य योगदान था।

कुण्डलिनी से ही पिंड (माईक्रोकोस्म) और ब्रह्माण्ड (मैक्रोकोस्म) की सत्ता है

शरीरविज्ञान दर्शन में शरीर के सूक्ष्म समाज और मनुष्य के स्थूल समाज के बीच में पूर्ण समानता सिद्ध की गई है। जब-२ मैं उस दर्शन के बारे में विचार करते हुए काम करता था, तब-२ मेरे मन में कुण्डलिनी (अद्वैत शक्ति) छा जाया करती थी। इस दर्शन के 15 साल के अभ्यास से मेरी कुण्डलिनी एकबार क्षणिक रूप से जागृत भी हुई थी। इससे सिद्ध होता है कि शरीर अद्वैत तत्त्व या कुण्डलिनी से चलायमान है, क्योंकि जहाँ अद्वैत तत्त्व है, वहां पर कुण्डलिनी भी विद्यमान है। क्योंकि हमारा शरीर सृष्टि की हूबहू नक़ल है, इसलिए सृष्टि के मामले में भी कुण्डलिनी ही पूरी तरह से जिम्मेदार है।

हमारे अपने शरीर की सुरक्षा प्रणाली बड़ी जटिलता और सटीकता प्रदर्शित करती है

हमारे शरीर की सुरक्षा प्रणाली में भी सूक्ष्म सैनिक (श्वेत रक्त कण), सूक्ष्म अधिकारी (होरमोन आदि), सूक्ष्म सैन्य वाहन (ब्लड फ्लो से मोबिलिटी), सूक्ष्म हथियार (टोक्सिन आदि), सूक्ष्म गुप्तचर (विभिन्न सन्देश प्रणालियाँ) व अन्य सभी कुछ सूक्ष्म रूप में होता है। चालाकी से भरी हुई सूक्ष्म योजनाएं (जैव रासायनिक अभिक्रियाएँ आदि) बनती हैं। शरीर पर हमला करने वाले सूक्ष्म उग्रपंथियों (कीटाणुओं) को मारने के लिए अनेक प्रकार के हथकंडे अपनाए जाते हैं। यदि दिल्ली के सुरक्षाबलों के पास भी ऐसी ही कार्यशैली होती, तो उग्रपंथी दंगे न कर पाते। यदि वे भी देह-देश की तरह ही कुण्डलिनी की सहायता लेते, तो अवश्य सहायता मिलती।

शरीर पर हमला करने वाले कीटाणु (जैसे कि कोरोना वायरस) भी कुण्डलिनी की मदद से ही कई बार शरीर की सुरक्षा व्यवस्था को धूल चटा देते हैं

कीटाणुओं (उग्रपंथियों, उदाहरण के लिए कोरोना वायरस) की कार्यप्रणाली भी बड़ी जटिल व चतुराई से भरी होती है। वे शरीर को तबाह करने का प्रयास पूरी तत्परता व धर्म-निष्ठा से करते हैं। वैसा वे कुण्डलिनी की सहायता लेकर करते हैं। फर्क सिर्फ यह है कि वे अमानवीय काम को अंजाम देने के लिए कुण्डलिनी की मदद लेते हैं, जबकि श्वेत रक्त कण (सुरक्षक सैनिक) मानवता को बचाने के लिए।

हर बार शरीर-समाज के सैनिक अपने समाज पर हमला करने वाले उग्रपंथियों को मुंहतोड़ जवाब देकर उन्हें तबाह करते हैं। विरले मामलों में वे उग्रपंथी शरीर-समाज पर भारी पड़ जाते हैं, जिससे शरीर रोगी बन जाता है। वैसी हालत में भी शरीर उनका डट कर मुकाबला करता है। वैसे मामलों में भी बहुत विरले मामलों में ही सूक्ष्म उग्रपंथी शरीर को तबाह कर पाते हैं।

परन्तु हमारे अपने स्थूल समाज में इससे उलट हो रहा है। धार्मिक उग्रपंथी धर्म के नाम से कुण्डलिनी की मदद लेते हुए हर बार जान-माल का बहुत नुक्सान कर जाते हैं। विरले मामलों में ही सुरक्षाबल उनकी योजनाओं को विफल कर पाते हैं। इसका मतलब है कि हमारे सुरक्षाबलों को सशक्त होने की जरूरत है, जिसके लिए कुण्डलिनी की भरपूर सहायता प्राप्त की जानी चाहिए।  

अनगिनत संख्या में युद्ध, इस शरीर-देश के अंदर और बाहर चल रहे हैं, हर पल। घृणा से भरे कई दुश्मन, लंबे समय तक सीमा दीवारों के बाहर जमे रहते हैं, और शरीर-मंडल/देश पर आक्रमण करने के सही अवसर की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं। जब किसी भी कारण से इस जीवित मंडल की सीमा-बाड़ क्षतिग्रस्त हो जाती है, तो वे दुश्मन सीमा पार कर जाते हैं। वहां पर वे रक्षा विभाग की पहली पंक्ति के द्वारा हतोत्साहित कर दिए जाते हैं, जब तक कि रक्षा-विभाग की दूसरी पंक्ति के सैनिक उन दुश्मनों के खिलाफ कड़ी नफरत और क्रोध दिखाते हुए, वहां पहुँच नहीं जाते। फिर महान युद्ध शुरू होता है। अधिकांश मामलों ………..

हमारा अपना शरीर एक अद्वैतशाली ब्रम्हांड-पुरुष

यह पोस्ट “शरीरविज्ञान दर्शन” पुस्तक से साभार ली गई है।

शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)

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कुण्डलिनी से प्रेरित होकर ही धर्म या परंपरा का निर्माण हुआ, जिससे पैदा होने वाले अद्वैत के नशे के अन्दर कुछ स्वार्थी धार्मिक कट्टरपंथियों ने नफरत का इतना जहर घोल दिया, जिससे पैदा होने वाली हिंसा से कई सभ्यताएं व संस्कृतियाँ समूल नष्ट हो गईं, और कई नष्ट होने की कगार पर हैं

हम किसी भी धर्म का समर्थन या विरोध नहीं करते हैं। हम केवल धर्म के वैज्ञानिक और मानवीय अध्ययन को बढ़ावा देते हैं।

दोस्तों, अभी हाल ही में दिल्ली में आम आदमी पार्टी (AAP) के विधायक ताहिर हुसैन के घर की छत से बहुत से देसी हथियार बरामद हुए हैं, जिनसे दिल्ली में मासूम लोगों की भीड़ को निशाना बनाया गया, जिससे बहुत से लोगों की जानें भी गईं। वास्तव में वह एकाएक नहीं हुआ। उसके लिए कट्टरपंथियों की योजना बड़े सुनियोजित तरीके से लम्बे समय से चल रही थी। वास्तव में उस साजिश को रचने के लिए इस्लामिक कट्टरपंथियों के द्वारा कुण्डलिनी-सिद्धांत का ही सहारा लिया गया, हालांकि दुनिया के सामने ये कुण्डलिनी को सिरे से नकारते हैं।

कुण्डलिनी एक शक्ति है, जो कुछ धार्मिक परंपरागत मामलों में अच्छे कामों की तरह ही बुरे काम भी करवा सकती है

हमें इस भ्रम में कभी नहीं रहना चाहिए कि कुण्डलिनी आदमी से बलपूर्वक अच्छे काम करवाती रहती है। यह सत्य है कि कुछ सीमा तक कुण्डलिनी आदमी को अच्छे काम करने के लिए प्रेरित करती है। परन्तु अंतिम निर्णय लेने की स्वतंत्रता आदमी के अपने पास ही होती है। आदमी कुण्डलिनी के इशारे को बलपूर्वक नजरअंदाज करके कुण्डलिनी शक्ति से बुरे काम को भी अंजाम दे सकता है। यद्यपि उससे उसे बहुत बड़े पाप का भागी बनना पड़ता है। कुण्डलिनी का ऐसा ही दुरुपयोग कुछ काले तांत्रिक करते हैं। तभी तो कहा है कि कुण्डलिनी तंत्र यदि स्वर्ग दे सकता है, तो नरक भी दे सकता है। परन्तु डरने की बात नहीं। ऐसा अक्सर तभी होता है, जब लम्बी परंपरा के वशीभूत होकर कुण्डलिनी के इशारे को लम्बे समय तक दबाया जाता है। ऐसी ही एक विकृत परम्परा धार्मिक कट्टरपंथियों व उग्रपंथियों की है, जो धर्म के नाम पर अमानवीय काम करते हैं। वैसे कुण्डलिनी आदमी को सुधरने के अवसर लागातार देती रहती है। जब-२ आदमी गलत काम करने वाला होता है, तब-२ यह एक सच्चे गुरु की तरह आदमी के सामने आने लगती है, और उसे समझाने जैसे लगती है। अच्छे काम करने पर यह शाबाशी भी देती है।

कुण्डलिनी को आसानी से सबके लिए उपलब्ध करवाने के लिए ही नियमबद्ध परंपरा या धर्म का निर्माण होता है

परंपरा या धर्म की रचना भी कुण्डलिनी सिद्धांत से ही प्रेरित थी। आम आदमी कुण्डलिनी को नहीं समझ सकता था। इसलिए धर्म या परम्परा के नाम से आदमी को बाँधने वाला मानसिक खूंटा बनाया गया। उसमें आदमी के हरेक काम व व्यवहार के नियम बनाए गए, जिनसे आदमी का मन हर समय उस धर्म विशेष से बंधा रहता। उससे आदमी नशे के जैसी मस्ती व आनंद में डूबा रहने लगा। अवसादरोधी (एंटीडिप्रेसेंट) दवाओं (ड्रग्स) को खाने से भी वैसा ही कुण्डलिनी जैसा नशा महसूस होता है। तभी तो साम्यवादी लोग धर्म को एक प्रकार का नशा मानते हुए उसका विरोध करते हैं। हालांकि नशे से उत्पन्न अद्वैत और कुण्डलिनी से उत्पन्न अद्वैत के बीच में गुणवत्ता का बहुत फर्क होता है।

इतिहास गवाह है कि धर्म के नशे से कई सभ्यताएं रक्तरंजित हुईं

धर्म के नशे के कारण आदमी अंधा जैसा हो गया। वह धर्म पर इतना विश्वास करने लगा कि उसे उसमें बताई गई गलत बातें भी सही लगने लगीं। इसी धर्म के नशे की कड़वाहट में छुपाकर कई स्वार्थी व अमानवीय तत्त्वों ने इतना ज्यादा नफरत का जहर घोला, जिससे कई संस्कृतियाँ व सभ्यताएं रक्तरंजित हुईं।

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