कुंडलिनी के लिए किए गए प्रयास के प्रति भी अहंकार के नष्ट होने से ही कुंडलिनी जागरण होता है

मनरूपी आँख को ही तीसरी आँख कहते हैं

जब हमें नींद आ रही हो लेटे-लेटे और उस समय हम खड़े हो जाएं तो एकदम नींद भाग जाती है। दरअसल खड़े होने से व तनिक हिलने-डुलने से पीठ से ऊर्जा ऊपर चढ़ती है। मैं पिछ्ली पोस्ट में कुंडलिनी से पैदा हुई अति संवेदनशीलता के कारण अजीबोगरीब घटनाओं की संभावनाओं के बारे में बात कर रहा था।जब कुंडलिनी मस्तिष्क में क्रियाशील या जागृत होती है, तब मस्तिष्क की संवेदनशीलता बहुत बढ़ जाती है। इंद्रियों के सारे अनुभव तीव्र महसूस होते हैं। उदाहरण के लिए, खाने में स्वाद कई गुना बढ़ जाता है। सुगन्धि भी कई गुना मजबूत महसूस होती है। वास्तव में जिस प्राण ऊर्जा से इन्द्रियातीत कुंडलिनी उजागर हो सकती है, उससे अन्य इन्द्रियातीत अनुभव भी प्रकट हो सकते हैं, जैसे कि उड़ने का अनुभव, पानी पर चलने का अनुभव। इन्हें ही योगसिद्धियाँ कहते हैं। दरअसल ये अनुभव शरीर से नहीं, केवल मन से होते हैं। यह ऐसे ही होता है, जैसे कुंडलिनी के दर्शन आँखों से नहीं, बल्कि मन से होते हैं। इसी जागृत मन को ही तीसरी आँख का खुलना कहा गया है। क्योंकि मन से ही सारा संसार है, इसीलिए प्राचीन योग पुस्तकों में ऐसे मानसिक अनुभवों को शारीरिक अनुभवों की तरह लिखा गया है, ताकि आम आदमी को समझने में आसानी हो। पर अधिकांश लोग इन्हें शारीरिक या असल के भौतिक अनुभव समझने लगते हैं। समर्पित कुंडलिनी योगी अधिकांशतः कुंडलिनी से ही जीवन का महान आनन्द प्राप्त करता रहता है। वह जीवन के आनंद के लिए भौतिक वस्तुओं के अधीन नहीं रहता। इसलिए स्वाभाविक है कि यदि किन्हीं सांसारिक क्लेशों से उसकी कुंडलिनी क्षतिग्रस्त या कमजोर हो जाए, तो वह अवसाद रूपी अंधेरे से घिर जाएगा। ऐसा इसलिए होगा क्योंकि उसे आनन्द प्राप्ति का दुनियादारी वाला तरीका एकदम से समझ नहीं आएगा, और न ही रास आएगा। इसीलिए कहते हैं कि मध्यमार्ग ही सर्वश्रेष्ठ मार्ग है, क्योंकि इसमें अध्यात्म और दुनियादारी साथ-साथ चलते हैं, ताकि किसी की भी कमी से हानि न उठानी पड़े।

सीडेंटरी लाइफस्टाइल भौतिकता और आध्यात्मिकता दोनों का दुश्मन है

योग करते समय अद्वैत चिंतन ज्यादा सफल होता है, क्योंकि अद्वैत का  सदप्रभाव कुंडलिनी के माध्यम से ही प्राप्त होता है। योग करते समय सभी नाड़ियाँ मुख्यतः सुषुम्ना नाड़ी और चक्र खुले हुए रहते हैं। इससे अद्वैत से उजागर होती हुई कुंडलिनी आसानी से उपयुक्त चक्र पर काबिज हो जाती है। यदि मानसिक ऊर्जा का स्तर कम हो, तो कुंडलिनी नीचे के चक्रों पर काबिज होती है, और अगर मानसिक ऊर्जा अधिक हो, तो कुंडलिनी ऊपर के चक्रों की तरफ भागती है। इसी तरह अन्य किसी भी प्रकार की शारीरिक क्रियाशीलता के समय अद्वैत का ध्यान करने से भी इसी वजह से ज्यादा कुंडलिनी लाभ मिलता है। सुस्ती और शिथिलता के मौकों पर नाड़ियाँ और चक्र सोए जैसे रहते हैं, जिससे उनमें कुंडलिनी आसानी से संचरण नहीं कर सकती। इसी वजह से आदमी के बीमार पड़ने का डर भी बना रहता है। इसी वजह से सीडेंटरी लाइफस्टाइल वाले लोग न तो भौतिक रूप से और न ही आध्यात्मिक रूप से समृद्ध होते हैं।

सद्प्रयास कभी विफल नहीं होता

जितने भी विश्वप्रसिद्ध, कलाकार व समृद्ध व्यक्ति हैं, उनसे मुझे अपना गहरा रिश्ता महसूस होता है। वे मुझे अपने बचपन के दोस्तों व परिजनों के जैसे महसूस होते हैं। हो सकता है कि मैं पिछले जन्म में सम्भवतः उन्हीं की तरह भौतिक तरक्की के चरम तक पहुंच गया था। फिर मुझे कुंडलिनी जागरण की इच्छा महसूस हुई होगी और मैंने उसके लिए प्रयत्न भी किया होगा, पर मुझे सफलता न मिली होगी। उसीके प्रभाव से मुझे इस जन्म में पिछले जन्म के सम्पन्न, जगत्प्रसिद्ध व आध्यात्मिक व्यक्तित्वों के बीच में जन्म मिला होगा। क्षणिक कुंडलिनी जागरण की अनुभूति भी उसी के प्रभाव से मिली होगी। मेरे संपर्क के दायरे में आने वाले व्यक्ति भी पिछले जन्म के महान लोग रहे होंगे, और उन्हें कुंडलिनी का भी कुछ न कुछ साथ जरूर मिला होगा। उसी कुंडलिनी प्रभाव से वे मेरे संपर्क के दायरे में आए होंगे। इसका मतलब है कि सद्प्रयास कभी विफल नहीं जाता। वैसे भी स्वाभाविक रूप से कुंडलिनी जागरण की इच्छा भौतिकता का चरम छू लेने पर ही होती है। मनोवैज्ञानिक रूप से ऐसा भी हो सकता है कि कुंडलिनी जागरण की शक्ति से ही मुझे शक्तिशाली व्यक्तियों व वस्तुओं से अपनापन लगता हो, क्योंकि सभी शक्तियों का खजाना कुंडलिनी जागरण ही तो है।

प्रयास के बिना या अपने आप कुछ भी प्राप्त नहीं होता

रहस्यमय दृष्टिकोण ने मनुष्य को लापरवाह बना दिया है। इससे वह चमत्कार होने की प्रतीक्षा करता है। यह ब्लॉग इस रहस्यवाद को तोड़ रहा है। कुंडलिनी जागरण सहित सब कुछ वैज्ञानिक है और इसके लिए भी भौतिक चीजों की तरह लंबे समय तक एक निरंतर तार्किक दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है। इस ब्लॉग व वेबसाइट में किताबों सहित मेरी तथाकथित स्वतःस्फूर्त जागृति की घटना के बारे में पढ़ने के लिए सब कुछ है। मुख्य रूप से, किताब लव स्टोरी ऑफ ए योगी, फिर कुंडलिनी विज्ञान~ एक आध्यात्मिक मनोविज्ञान, भाग १ और २। इसके अलावा, इस ब्लॉग का अनुसरण करने से हर हफ्ते ताज़ा सामग्री भी मिलेगी। मेरे बारे में कई लोग सोचते हैं कि मुझे अपनेआप या बिना किसी प्रयास के उच्च आध्यात्मिक अनुभव हुए। काफी हद तक बात भी सही है, क्योंकि मैंने इनके लिए कोई विशेष प्रयास नहीं किए। मुझे अनुकूल परिस्थितियां मिलती गईं, और सब कुछ खुद से होता रहा। पर मेरे पूर्वजों की जो मेहनत इसमें छुपी हुई है, वह किसी को नहीं दिखाई देती। कम से कम मेरी तीन पीढ़ियों से मेरे परिवार में आध्यात्मिकता और उच्च कोटि के आदर्शवाद का बोलबाला था। इस वजह से समाज में दूर-दूर तक मेरे परिवार का नाम और मान-सम्मान होता था। मेरी दो पीढ़ियों से मेरा परिवार ब्राह्मण पुरोहिताई का काम करता आ रहा है। इस काम में वैदिक कर्मकांड किया जाता है। वैदिक कर्मकांड दरअसल कुंडलिनी योग का प्रथम अध्याय ही है, क्योंकि यह आदमी का कुंडलिनी से परिचय करवाता है, और उसे आसान व दुनियादारी वाले तरीक़े से मन में मजबूती प्रदान करता है। ऐसे आध्यात्मिक परिवार की संगति से ही मेरे मन में कुंडलिनी ने अनायास ही अपना पक्का डेरा जमाया। इसका मतलब है कि मेरे परिवार की सैकड़ों सालों की मेहनत का फल मेरे अंदर प्रकट हुआ। मुझे अपनेआप कुछ नहीं मिला। अपनेआप कुछ नहीं मिलता। यदि हम आध्यात्मिकता के रास्ते पर चलते रहेंगे, तो हमारे बच्चों, पौत्रों, प्रपौत्रों आदि को उसका फल मिलेगा। उन्हें अपनेआप कुछ नहीं मिलेगा। इसका मतलब है कि कुंडलिनी के लिए किया गया प्रयास कभी विफल नहीं होता। यदि प्रयास करने वाले को एकदम से फल मिलता न दिखे, तो समाज व दुनिया को अवश्य मिलता है। कालांतर में प्रयास करने वाले को भी फल मिल ही जाता है।

जागरण के लिए ध्यान या योग करने का अहंकार भी त्याग देना चाहिए

कुंडलिनी जागरण एक दुर्लभ घटना है। इसके लिए शायद ही कभी जोरदार प्रयास की आवश्यकता होती है। हां, जबरदस्त प्रयासों से मानसिक और शारीरिक रूप से इसके लिए तैयार हुआ जा सकता है। बलपूर्वक प्रयास मनुष्य में उपलब्ध प्राण ऊर्जा के स्तर पर होना चाहिए अन्यथा अत्यधिक बलपूर्वक प्रयास शरीर और मन को नुकसान पहुंचा सकता है। मैंने ऐसी ही संतुलित कोशिश की थी। मैं 15 वर्षों तक दुनिया के साथ बहता रहा, हालांकि मेरे अपने स्वयं के अनूठे दर्शन के माध्यम से मेरा हमेशा अद्वैतवादी रवैया बना रहता था। फिर मैंने प्राण शक्ति की अधिकता होने पर एक वर्ष तक बलपूर्वक हठयोग और फिर अगले एक मास तक तांत्रिक योग किया। फिर मैंने अपना यह अहंकार भी त्याग दिया, और मैं फिर से संसार के साथ बहने लगा। योग यथावत चलता रहा। योग आदि करने के इस अहंकार के त्यागने से ही मुझे अंततः कुण्डलिनी जागरण की सहजता से एक झलक मिली। फिर भी कोई बड़ा तीर नहीं चला लिया, क्योंकि जागृति से कहीं ज्यादा महत्त्व तो जागृत जीवनचर्या का ही है। संक्षेप में कहूँ तो केवल झलक इसलिए, क्योंकि मेरा उद्देश्य कोई ज्ञानप्राप्ति नहीं था, बल्कि मैं कुंडलिनी जागरण को वैज्ञानिक रूप में अनुभव करना चाहता था, और लोगों को बताकर उन्हें गुमराही से बचाना चाहता था। आखिर इच्छा पूरी हो ही जाती है। इसका मतलब है कि जागरण के लिए ध्यान या योग या अन्य पुण्य कर्म करने का अहंकार भी त्याग देना चाहिए। यह शास्त्रों में एक प्रसिद्ध उपदेशात्मक वाक्य द्वारा बताया गया है कि सतोगुण से आध्यात्मिकता बढ़ती है और उस सतोगुण के प्रति भी अहंकार को नष्ट करने से ही जागृति प्राप्त होती है। सतोगुण का मतलब है, योगसाधना के प्रभाव से मन व शरीर में प्रकाशमान दैवीय गुणों का प्रकट होना। इससे पहले मैं भी इस उपदेश के रहस्य को नहीं समझता था, परन्तु अब ही मुझे इसका मतलब स्पष्ट, व्यावहारिक व अनुभवात्मक रूप से समझ आया है। मुझे जागृति काल के दौरान न तो यह और न ही वह भावना या इमोशन, किसी विशेष रूप में अनुभव हुई। कोई विशेष संवेदना भी महसूस नहीं हुई, जैसे कि लोग अजीबोगरीब दावे करते रहते हैं। यह सब सिर्फ शक्ति का खेल ही तो है। जानबूझकर जागृति के लिए, लोग अक्सर अहंकार से भरे विभिन्न रास्ते अपनाते हैं, और इसी वजह से इसे कभी हासिल नहीं कर पाते हैं। कुछ अन्य लोग शांत रहते हैं, और सामान्य दुनियावी नदी के बीच बहते रहते हैं, हालांकि अपने अहंकार को मिटा कर रखते हैं। वे इसे विशेष व जानबूझकर किए जाने वाले प्रयास के बिना भी प्राप्त कर लेते हैं। कई दोनों के संतुलन वाला मध्यमार्ग अपनाते हैं, जिससे सबसे जल्दी सफलता मिलती है। मेरे साथ भी सम्भवतः यही मध्यमार्ग चरितार्थ हुआ लगता है।

कुंडलिनी विभिन्न देवताओं, शिव ब्रह्मरूप अखंड ऊर्जा, सहस्रार चक्र वटवृक्ष और मस्तिष्क कैलाश पर्वत के रूप में दर्शाए गए हैं

दोस्तो, मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि ‘चक्र’ नाम कैसे पड़ा है। दरअसल चक्र का शाब्दिक अर्थ भी पहिया ही होता है। उदाहरण के लिए रथचक्र, जलचक्र आदि। यह भी बताया कि चक्र को ऊर्जा का केंद्र क्यों कहा गया है। चक्र के बारे में ऐसा तो हर जगह लिखा होता है, पर यह साबित नहीं किया होता है कि ऐसा क्यों कहा गया है। इससे रहस्यात्मकता की बू आती है। मैंने इसे वैज्ञानिक व अनुभवात्मक रूप से सिद्ध किया कि ऐसा क्यों कहा जाता है। इसीलिए इस वेबसाइट का नाम “कुंडलिनी रहस्योद्घाटन” है। यह भी मनोवैज्ञानिक रूप से सिद्ध किया कि प्राण ऊर्जा और मनस ऊर्जा के मिश्रण से कुंडलिनी कैसे बनती है। दरअसल प्राण ऊर्जा और मनस ऊर्जा के इसी मिश्रित रूप को ही कुंडलिनी कहते हैं। यह कुंडलिनी की सबसे छोटी परिभाषा है। इसे ही टाईम-स्पेस मिश्रण भी कहते हैं। प्राण ऊर्जा टाईम का प्रतिनिधित्व करती है, और मनस ऊर्जा स्पेस का प्रतिनिधित्व करती है। इस पोस्ट में मैं बताऊंगा कि सहस्रार चक्र को शिव के निवास स्थान या कैलाश के वटवृक्ष के रूप में कैसे निरूपित किया गया है।

दक्षयज्ञ से नाराज शिव को मनाने के लिए देवताओं द्वारा कैलाश गमन

भगवान विष्णु दक्ष से नाराज शिव को मनाने के लिए देवताओं सहित कैलाश पर्वत पर गए। वह कैलाश पर्वत मनुष्यों के इलावा किन्नरों, अप्सराओं और योगसिद्ध महात्माओं से सेवित था। वह बहुत ऊंचा था। वह चारों ओर से मणिमय शिखरों से सुशोभित था। वह अनेक प्रकार की धातुओं से विचित्र जान पड़ता था। वह अनेक प्रकार के वृक्षों व लताओं से भरा था। वह अनेक प्रकार के पशु-पक्षियों व झरनों से परिव्याप्त था। उसके शिखर पर सिद्धांगनाएँ अपने-अपने पतियों के साथ विहार करती थीं। वह अनेक प्रकार की कन्दराओं, शिखरों तथा अनेक प्रकार के वृक्षों की जातियों से सुशोभित था। उसकी कांति चांदी के समान श्वेतवर्ण की थी। वह पर्वत बड़े-बड़े व्याघ्र आदि जंतुओं से युक्त, भयानकता से रहित, सम्पूर्ण शोभा से सम्पन्न, दिव्य तथा अत्यधिक आश्चर्य उत्पन्न करने वाला था। वह पर्वत पवित्र गंगा नदी से घिरा हुआ और अत्यंत निर्मल था। उस कैलाश पर्वत के निकट शिव के मित्र कुबेर की अलका नाम की दिव्य नगरी थी। उसी पर्वत के पास ही सौगंधिक नामक दिव्य वन था, जो दिव्य वृक्षों से शोभित था, और जहाँ पक्षियों आदि की अद्भुत ध्वनि हो रही थी। उस पर्वत के बाहर से नन्दा और अलकनन्दा नामक दिव्य व पावन सरिताएं बह रही थीं, जो दर्शन मात्र से ही पापों का नाश करती हैं। देव स्त्रियां प्रतिदिन अपने लोक से आकर उन नदियों का जल पीतीं हैं, और स्नान करके रति से आकृष्ट होकर पुरुषों के साथ विहार करती हैं। फिर उस अलकापुरी और सौगंधिक वन को पीछे छोड़कर, आगे की ओर जाते हुए उन देवताओं ने समीप में ही शंकर जी के वट वृक्ष को देखा। वह वटवृक्ष उस पर्वत के चारों ओर छाया फैलाए हुए था। उसकी शाखाएं तीन ओर फैली हुई थीं। उसका घेरा सौ योजन ऊंचा था। वह घौंसलों से रहित और ताप से वर्जित था। उसका दर्शन केवल पुण्यात्माओं को ही होता है। वह अत्यंत रमणीय, परम पावन, शिवजी का योग स्थल, दिव्य, योगियों के द्वारा सेवन या निवास योग्य, तथा अति उत्तम था। महायोगमयी व मुमुक्षु लोगों को शरण देने वाले उस वटवृक्ष के नीचे बैठे शिवजी को देवताओं ने देखा। शिवभक्ति में लीन, शांत तन-मन वाले, व महासिद्ध जो ब्रह्मा के पुत्र सनक आदि हैं, वे प्रसन्नता के साथ उन शिव की उपासना कर रहे थे। उनके मित्र कुबेर, जो गुह्यकों व राक्षसों के पति हैं, वे अपने परिवार व सेवकों के साथ उनकी विशेष रूप से सेवा कर रहे थे। वे परमेश्वर शिव तपस्वियों के मनपसंद सत्यरूप को धारण किए हुए थे। वे वात्सल्य भाव से विश्वभर के मित्र लग रहे थे, और भस्म आदि से सुसज्जित थे। वे कुशासन पर बैठे हुए थे, और नारद आदि के पूछने पर सभी श्रोता सज्जनों को ज्ञान का उपदेश दे रहे थे। वे अपना बायाँ चरण अपनी दाईं जांघ पर, और बायाँ हाथ बाएँ घुटने पर रखी कलाई में रुद्राक्ष की माला डाले हुए सत्य-सुंदर तर्क मुद्रा में विराजमान थे।  वे सर्वोच्च ज्ञान की बात बताते हैं कि मोक्ष की प्राप्ति कर्म से नहीं, अपितु ज्ञान से होती है। इसलिए अद्वैत ज्ञान के साथ कर्म करना चाहिए, मतलब कि कर्मयोग करना चाहिए। जो लोग उनमें, ब्रह्मा और विष्णु में भेद करते हैं, वे नरक को जाते हैं। मतलब कि भगवान शिव भेददृष्टि को नकारते हैं।

कैलाश पर्वत व मस्तिष्क की परस्पर समकक्षता

कैलाश पर्वत मस्तिष्क है। वहाँ पर आम लोग-बाग, अप्सराएं और नाच-गाना करने वाले कलाकार तो भोगविलास करते ही हैं, ऋषि-मुनि भी वहीँ पर ध्यान का आनंद प्राप्त करते हैं। यह मानव शरीर में सबसे ऊंचाई पर स्थित है। मणिमय शिखरों का मतलब इसकी अखरोट के जैसी आकृति से बने अनेकों रिज या उभार हैं, जो मन के चमकीले विचारों व संकल्पों से चमकते रहते हैं। अनेक प्रकार की धातुओं का मतलब इसके किस्म-किस्म की संरचनाओं व रँगों वाले भाग हैं, जैसे कि खोपड़ी की हड्डी, उसके नीचे व्हाईट मैटर, उसके नीचे ग्रे मैटर, तरलता-पूर्ण नरम आंखें, कान, नाक, दांत आदि। मस्तिष्क का अंदरूनी भाग भी किस्म-किस्म के आकारों व रंगों में बंटा है, जैसे कि पॉन्स, हिप्पोकैम्पस, पिनियल ग्लैंड आदि। अनेक प्रकार के वृक्षों व लताओं का मतलब विभिन्न प्रकार के बाल हैं, जैसे कि सिर के बाल, दाढ़ी के बाल, मूँछ के बाल, कान के बाल, नाक के बाल आदि। यहाँ तक कि मस्तिष्क के अंदर भी रेशेदार माँस होता है, जिसे नर्व फाइबर कहते हैं। इससे लगता है कि प्राचीन ऋषि-मुनि मानव शरीर की एनाटोमी का भी अच्छा ज्ञान रखते थे। इसका विशद वर्णन आयुर्वेद में है। अनेक प्रकार के पशु-पक्षियों का मतलब बालों में पाए जाने वाले सूक्ष्म परजीवी ही हैं। अनेक प्रकार के झरनों का मतलब आँखों, कानों व मुंह आदि की ग्रन्थियों से निकलने वाला जैविक स्राव ही है। इसके शिखरों पर सिद्धांगनाओं के विहार करने का मतलब तंत्र योगिनियों के द्वारा तांत्रिक रोमांस करना ही है, जिससे वे महान आनन्द प्राप्त करती हैं। आनन्द का स्थान तो मस्तिष्क ही है। अनेक प्रकार की कन्दराएँ मस्तिष्क के आसपास अनेक प्रकार के छिद्र हैं, जैसे कि आँख, नाक, कान आदि। शिखरों व वृक्षों के बारे में तो ऊपर बता ही दिया है। उस पर्वत के चांदी की तरह होने का मतलब मस्तिष्क के चेतना से भरे चमकीले विचार ही हैं। व्याघ्र जैसे जंतुओं का मतलब जू, पिस्सू की तरह सूक्ष्म मांसाहारी परजीवी ही हैं, जो बालों की नमी में छिपे रह सकते हैं। ‘भयानकता से रहित’ मतलब उन जंतुओं से भय नहीँ लगता था। दिव्यता तो मस्तिष्क में है ही। सभी दिव्य भाव मस्तिष्क की क्रियाशीलता के साथ ही हैं। कुंडलिनी जागरण सबसे दिव्य है, इसीलिए उसमें मस्तिष्क की क्रियाशीलता चरम पर होती है। इसी तरह मस्तिष्क आश्चर्य का नमूना भी है। इसमें जीवन या चेतना की उत्पत्ति होती है। वैज्ञानिक आज तक इस पहेली को नहीं सुलझा सके हैं। गँगा नदी यहाँ सुषुम्ना नाड़ी का प्रतीक है। क्योंकि वह सहस्रार को सिंचित करती है, जिससे पूरा मस्तिष्क जुड़ा हुआ है, इसीलिए इसे पूरे पर्वत को घेरने वाली कहा है। यह पूरे मस्तिष्क को ऊर्जा से निर्मल कर देती है। शिव के मित्र कुबेर की नगरी अलकापुरी आज्ञा चक्र को कहा गया है। “अलका” शब्द संस्कृत के अलक्षित व हिंदी के अलख शब्दों से बना है। इस चक्र से अदृश्य कुंडलिनी के दर्शन होते हैं। इसीलिए इसे तीसरी आंख भी कहते हैं। दरअसल जब आज्ञाचक्र पर ध्यान लगाया जाता है, तो सहस्रार पर कुंडलिनी प्रकट हो जाती है। क्योंकि शिवपुराण में शिव ही कुंडलिनी के रूप में हैं, इसीलिए आज्ञाचक्र के अभिमानी देवता कुबेर को शिव का मित्र बताया गया है। अगर यहाँ अखण्ड ऊर्जा को ही शिव माना गया है, तब भी कुबेर शिव के मित्र सिद्ध होते हैं, क्योंकि कुंडलिनी से ही अखण्ड ऊर्जा प्राप्त होती है।आज्ञाचक्र बुद्धि का प्रतीक है। इसलिए स्वाभाविक है कि आज्ञाचक्र धनसंपदा से जुड़ा है, क्योंकि बुद्धि से ही संपदा अर्जित होती है। इसीलिए इसके देवता कुबेर सृष्टि में सबसे धनी हैं। उस पर्वत के पास ही सौगंधिक नामक वन है। क्योंकि इसका वर्णन अलकापुरी के एकदम बाद हो रहा है, इसका मतलब है कि वह वन उसके निकट ही है। वह तो नाक ही है। उसके अंदर ही सुगंधिका अनुभव होता है, इसलिए माना गया है कि सुगंधि की उत्पत्ति उसीमें हो रही है। क्योंकि सुगंधि वृक्षों और पुष्पों से ही उत्पन्न होती है, इसलिए नाक को वन का रूप दिया गया है। उस वन को दिव्य इसलिए कहा है, क्योंकि वह आकार में इतना छोटा होकर भी दुनिया भर की सभी दिव्य सुगंधियों को उपलब्ध कराता है। साधारण वन तो ऐसा नहीं कर सकता। उसमें स्थित रोमों को ही दिव्य वृक्ष माना जा सकता है। इन्हें दिव्य इसलिए कहा जा रहा है, क्योंकि आकार में इतना छोटा और कम संख्या में होने पर भी वे दुनिया भर की दिव्य सुगंधियों को उपलब्ध कराने में मदद करते हैं। वे गंध-ग्राही कोशिकाओं को सुरक्षा देते हैं। हो सकता है कि पौराणिक युग में नासिका-रोम को ही सुगन्धि के लिए एकमात्र जिम्मेदार माना जाता हो। उस वन में पक्षियों आदि की अद्भुत ध्वनि हो रही थी। वह ध्वनि दरअसल श्वास-प्रश्वास की धीमी आवाज ही है। इसे मीठी आवाज तो नहीं कही जा सकती। इसीलिए इसे अद्भुत कहा है। उस पर्वत के बाहर नन्दा और अलकनन्दा नामक दो नदियां इड़ा और पिंगला नाड़ियाँ ही हैं। मस्तिष्क के साथ रीढ़ की हड्डी जुड़ी होती है। रीढ़ की हड्डी को यदि नीचे के पर्वत कहेंगे, तो मस्तिष्क शीर्ष के पर्वत शिखर से बना है। उसमें सुषुम्ना बहती है। उसे गंगा कहा गया है। इड़ा नाड़ी रीढ़ की हड्डी के बाहर बाईं ओर बहती है। इसके माध्यम से आदमी दुनियादारी का भौतिक, सीमित, तार्किक या लॉजिकल व जजमेंटल या नुक्ताचीनी वाला आनन्द लेता है। इसीलिए इसका नाम नन्दा है। दूसरी नाड़ी जो पिंगला है, वह मेरुदंड रूपी पर्वत के दाईं ओर बहती है। इसके माध्यम से आदमी आध्यात्मिक जैसा, शून्य या स्पेस या आकाश जैसा, अंधेरे जैसा, तर्कहीन या इलॉजिकल जैसा, असीमित जैसा, ननजजमेंटल जैसा आनन्द लेता है। इसका नाम अलकनन्दा है। जैसा ऊपर बताया, अलक शब्द अलख या अलक्षित का सूचक है। क्योंकि आकाश अनन्त होने से अलक्षित ही है, इसीलिए इसका नाम अलकनन्दा है, मतलब अलक्षित का आनन्द। दोनों नदियों के दर्शन से पाप नष्ट हो जाते हैं। अकेली नदी की बात नहीं हो रही, बल्कि दोनों नदियों की एकसाथ बात हो रही है। इसका मतलब है कि बाएं और दाएं मस्तिष्क के एकसाथ क्रियाशील होने से अद्वैत उत्पन्न होता है, जो निष्पापता रूप ही है। द्वैत ही सबसे बड़ा पाप है, और अद्वैत ही सबसे बड़ी निष्पापता। देव-स्त्रियों से मतलब यहाँ अच्छे व संस्कारवान घर की कुलीन स्त्रियां हैं। क्योंकि वे संपन्न होती हैं, इसलिए वे दुनियादारी के झमेले में ज्यादा नहीं फँसती। इससे वे अद्वैत के आनन्द में डूबी रहती हैं। इसी अद्वैत के आनन्द को उनके द्वारा दोनों नदियों के जल को पीने के रूप में दर्शाया गया है। वे सुंदर व सुडौल शरीर वाली होती हैं। नहाते समय कुंडलिनी ऊर्जा पीठ से ऊपर चढ़ती है, जैसा मैंने एक पिछली पोस्ट में बताया था। ऐसा ही उन देव स्त्रियों के साथ भी होता है। मूलाधार की ऊर्जा ऊपर चढ़ने से उनका मूलाधार ऊर्जाहीन सा हो जाता है। मूलाधार को ऊर्जा देने के लिए ही वे रति की ओर आकर्षित होती हैं, और पुरुषों के साथ विहार करती हैं। एक अन्य रूपक के अनुसार, देवस्त्रियाँ सुंदर व मानवीय विचारों की प्रतीक हैं। ऐसे विचार अद्वैत भाव के साथ होते हैं, मतलब इनके साथ इड़ा और पिंगला, दोनों नाड़ियाँ बहती हैं। जब ये दोनों नाड़ियाँ बहुत तेजी से बहती हैं, तभी दिव्य कामभाव जागृत होता है। ऐसा मूलाधार को ऊर्जा देने के लिए ही होता है, क्योंकि अद्वैत से मूलाधार की ऊर्जा ऊपर चढ़ती रहती है। अद्वैत भाव से मस्तिष्क में अभौतिक कुंडलिनी चित्र का विकास होने लगता है। उसके लिए बहुत ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है, क्योंकि इंद्रियों की पहुंच से बाहर होने के कारण, आम मानसिक चित्रों की तरह इसको मजबूत करने के लिए शारीरिक इंद्रियों का सहयोग नहीं मिलता। इसी आवश्यकता को पूरा करने के लिए मूलाधार से ऊर्जा ऊपर चढ़ती है। उस स्थिति में की गई रति क्रीड़ा बहुत आनन्ददायक व आत्मा का विकास करने वाली होती है, मतलब कि इससे ऊर्जा सुषुम्ना में प्रविष्ट होकर सहस्रार में पहुंच जाती है। इस अतिरिक्त ऊर्जा से कुंडलिनी के साथ मस्तिष्क का भी अच्छा विकास होता है। इसीलिए कहते हैं कि मानव जाति के त्वरित विकास के लिए कुंडलिनी बहुत जरूरी है। उपरोक्त कुण्डलिनीपरक रतिक्रिया को तांत्रिक रतिक्रीड़ा भी कह सकते हैं। जब आदमी दुनियादारी से दूर हो, और ऊर्जा की कम खपत के कारण उसकी ऊर्जा की संचित मात्रा पर्याप्त हो, और वह पहले से ही सुषुम्ना में बह रही हो, वह तो साधु वाली स्थिति होती है। उसमें रतिक्रीड़ा के प्रति ज्यादा मन नहीं करता। देवलोक से वे स्त्रियां आती हैं, मतलब मस्तिष्क से वे मानवीय विचार बाहर आते हैं, और अद्वैत भाव के साथ दुनियादारी के काम निभाने लगते हैं। इसे ही देवस्त्रियों द्वारा नन्दा और अलकनन्दा नदियों में स्नान करना कहा गया है। देवता व देवियाँ वैसे भी अद्वैत भाव के प्रतीक होते हैं। साधारण लोगों में यह ऊर्जा का ऊर्ध्वगामी प्रभाव कम होता है। इसलिए उनकी कामुक भावना क्षणिक सुखदायी ही होती है, जिसे कामवासना कहते हैं। उनमें द्वैत भाव होने के कारण उनके मन में कुंडलिनी नहीं होती। इसलिए ऊर्जा की अतिरिक्त आवश्यकता न होने से मूलाधार की ऊर्जा ऊपर नहीँ चढ़ती। इसीलिए इसमें मूलाधार की ऊर्जा का रक्षण नहीं बल्कि क्षरण होता है। मस्तिष्क में ही दिव्यता होती है।  सौगंधिक वन और अलकापुरी को लाँघ कर आगे बढ़ने पर वे सभी देवता एक वटवृक्ष के पास पहुंचते हैं, जिसकी शाखाएं पूरे पर्वत पर फैल कर छाया पहुंचाए हुए थीं। दरअसल कुंडलिनी को ही उन सभी देवताओं के रूप में दर्शाया गया है। मन में पूरी सृष्टि बसी हुई है। इसका मतलब है कि मन में सभी देवता बसे हुए हैं, क्योंकि देवता ही सृष्टि को चलाते हैं, और पूरी सृष्टि के रूप में भी हैं। एकमात्र कुंडलिनी चित्र या ध्यान चित्र के अंदर पूरा मन ऐसे ही समाया हुआ होता है, जैसे एक चीनी के दाने में चीनी की पूरी बोरी या गन्ने का पूरा खेत समाया होता है। किसी को अगर चीनी के दर्शन कराने हो, तो हम पूरी बोरी चीनी न उठाकर एक दाना चीनी का ले जाते हैं। इससे काम काफी आसान हो जाता है। जितनी ऊर्जा से चीनी की बोरी को एक फुट ऊंचा उठाया जा सकता है, उतनी ही ऊर्जा से एक चीनी के दाने को हजारों फुट ऊंचा उठाया जा सकता है। जो काम चीनी की बोरी से होगा, वही काम चीनी के एक दाने से भी हो जाएगा। इसी तरह यदि शिव से मिलाने के लिए सहस्रार तक मन को ले जाना हो, तो हम मन की पूरी दुनिया को न ले जाकर केवल कुंडलिनी को ले जाते हैं। इससे शिव-मन या शिव-जीव के मिलाप का काम बेहद आसान हो जाता है। जितनी ऊर्जा से पूरे मन को मूलाधार से स्वाधिष्ठान चक्र तक भी ऊंचा नहीं उठाया जा सकता है, उतनी ही ऊर्जा से कुंडलिनी को सहस्रार तक ऊंचा उठाया जा सकता है। जो काम असंख्य चित्रों के ढेर को समेटे मन से होगा, वही काम उस ढेर में से छांटे गए एकमात्र कुंडलिनी चित्र से भी हो जाएगा। कुंडलिनी के स्थान पर बहुत सारे देवता इसलिए दिखाए गए हैं, ताकि इससे इस मनोवैज्ञानिक आख्यान को रोचकता व रहस्यात्मकता मिल सके। वटवृक्ष ही सहस्रार है, क्योंकि सहस्रार पूरे मस्तिष्क से नाड़ियों के माध्यम से जुड़ा है। उन नाड़ियों को सहस्रार चक्र रूपी वृक्ष की शाखाएं कह सकते हैं। उसकी शाखाएँ तीन ओर फैली हुई थीं, इसका मतलब है कि सहस्रार से बाएं मस्तिष्क, दाएँ मस्तिष्क और आगे व फिर नीचे फ्रंट चैनल, तीन दिशाओं में ऊर्जा प्रसारित होती है। पीछे व वहाँ के नीचे स्थित बैक चैनल से तो उसे ऊर्जा मिल रही है। यह चौथी दिशा में है, जिसे हम उस वृक्ष का तना या जड़ कह सकते हैं। ऊर्जा हमेशा जड़ से शाखाओं की तरफ ही बहती है। उसका ऊपरी विस्तार 100 योजन ऊँचा बताया गया है, जो लगभग एक हजार मील की दूरी है। यह बहुत ऊँचाई है, जो बाहरी अंतरिक्ष तक फैली है। दरअसल इसका मतलब है कि सहस्रार चक्र उस अखंड ऊर्जा से जुड़ा हुआ है, जो अनन्त आकाश में फैली हुई है। सहस्रार का शाब्दिक अर्थ भी एक हजार शाखाओं वाला है, सम्भवतः इसीलिए यह संख्या ली गई हो। वह घोंसलों से वर्जित है, मतलब वहाँ कोई सामान्य जीव नहीं पहुंच सकता। वह ताप से वर्जित है, मतलब अत्यंत शांत सहस्रार चक्र है। जिस द्वैत से ताप पैदा होता है, वह वहाँ था ही नहीं। वह अत्यंत रमणीय था। इसका मतलब है कि सभी स्थानों की रमणीयता सहस्रार के कारण ही होती है। रमणीय स्थानों पर ऊर्जा सहस्रार में घनीभूत हो जाती है, इसीलिए वे स्थान रमणीय लगते हैं। तभी तो आपने देखा होगा कि रमणीय स्थान पर घूमने के बाद शरीर में थकावट होने से कुछ समय काम करने को ज्यादा मन नहीं करता। यह इसलिए होता है क्योंकि शरीर की अधिकांश ऊर्जा सहस्रार को चली गई होती है। रमणीय स्थान पर घूमने के बाद आदमी तरोताजा व निर्मल सा हो जाता है। ऐसा लगता है कि पापों का पुराना बोझ हट गया है।इसीलिए दुनियादारी में पर्यटन का इतना ज्यादा क्रेज होता है। विभिन्न तीर्थ स्थल भी इसी रमणीयता के आध्यात्मिक गुण का फायदा उठाते हैं। ऐसा सब सहस्रार चक्र के कारण ही होता है। इसीलिए इसे परम पावन कहा है। उस वृक्ष का दर्शन केवल पुण्यात्माओं को ही होता है। इसमें कोई आश्चर्य वाली बात नहीं। अनुभव से भी यह साफ विदित होता है कि हिंसा आदि कर्मों से कुंडलिनी चेतना नीचे गिरती है, और मानवता रूपी पुण्य कर्मों से ऊपर चढ़ती है। वह दिव्य था। सारी दिव्यता सहस्रार चक्र में ही तो होती है। दिव्य शब्द दिवा या प्रकाश से बना है। प्रकाश का मूल सहस्रार और उससे जुड़ी अखंड ऊर्जा ही है। वह योगमयी था तथा योगियों व शिव का प्रिय निवास स्थान था। शिव भी तो योगी ही हैं। ब्रह्म या एनेर्जी कँटीन्यूवम से जुड़ाव या योग सहस्रार में ही सम्भव होता है। जाहिर है कि मोक्ष की इच्छा रखने वाले मुमुक्षु लोग वहीँ जाएंगे, क्योंकि सहस्रार में ही सीमित चेतना से छुटकारा सम्भव है। उस वृक्ष के मूल में शिव बैठे थे। ब्रह्म या अखंड ऊर्जा या एनर्जी कँटीन्यूवम को भी यहाँ शिव ही कहा है। वे तपस्वियों को प्रिय लगने वाले वेष में थे। मतलब कि वे अद्वैत रूप अखण्ड ऊर्जा के रूप में थे, जो तपस्वियों को अच्छी लगती है। द्वैत में डूबे साधारण लोग कहाँ उसे पसंद करने लगे। ब्रह्मा के पुत्र सनत्कुमार आदि ऋषि जो हमेशा ब्रह्मध्यान में लीन रहते हैं, उन्हें शिव की उपासना करते हुए इसलिए बताया गया है, क्योंकि शिव सृष्टि के सबसे बड़े तन्त्रयोगी भी हैं। आज्ञा चक्र व मूलाधार पर ध्यान केंद्रित करने से मस्तिष्क की ऊर्जा केन्द्रीभूत होकर सहस्रार में आ जाती है। इसे ही कुबेर द्वारा अपने गुह्यक सेवकों और परिवारजनों के साथ शिव की सेवा करना बताया गया है। गुह्यक यहाँ मूलाधार का प्रतीक हैं, क्योंकि मूलाधार और आज्ञाचक्र आपस में जुड़े होते हैं। गुह्यक भी मूलाधार की तरह ही डार्क तमोगुणी जैसे होते हैं। कुबेर के परिवारजन मस्तिष्क में चारों ओर बिखरी हुई मानसिक ऊर्जा के प्रतीक हैं। परिवारजन परिवार के मुखिया के ही वश में होते हैं। वात्सल्य भाव तो शिव में होगा ही। अनन्त चेतना के स्वामी शिव को हमारे जैसे सीमित चेतना वाले प्राणी बच्चे ही लगेंगे। वे भस्म लगाए हुए थे। भस्म वैराग्य, सार और निष्ठा का प्रतीक है। सारे विश्व का निचोड़ भस्म में निहित है। अखण्ड ऊर्जा में रमण करने वाले शिव को जगत नामक सीमित ऊर्जा कहाँ रास आएगी। अनेक लोग शिव से ही तंत्रयोग की प्रेरणा लेते हैं और कुंडलिनी जागरण प्राप्त करते हैं। इसे ही शिव के द्वारा ज्ञानोपदेश के रूप में दर्शाया गया है।

कुंडलिनी ऊर्जा और चक्र नदी के जल प्रवाह और पनचक्की के टरबाइन की तरह हैं

क्या हठयोग को राजयोग पर्यंत ही करना चाहिए

मैं पिछली पोस्ट में हठयोग प्रदीपिका की एक भाषा टीका पुस्तक व अपने आध्यात्मिक अनुभव के बीच के लघु अंतर के बारे में बात कर रहा था। उसमें आता है कि हठयोग की साधना राजयोग की प्राप्ति-पर्यंत ही करें। यह भी लिखा है कि यदि सिद्धासन सिद्ध हो जाए तो अन्य आसनों पर समय बर्बाद करने से कोई लाभ नहीं। पुस्तक निर्माण के समय आध्यात्मिक संस्कृति का ही बोलबाला होता था। भौतिकता की तरफ लोगों की रुचि नहीं होती थी। जीवन क्षणभंगुर होता था। क्या पता कब महामारी फैल जाए या रोग लग जाए। युद्ध आदि होते रहते थे। इसलिए लोग जल्दी से जल्दी कुंडलिनी जागरण और मोक्ष प्राप्त करना चाहते थे। हालांकि खुद हठयोग प्रदीपिका में लिखा है कि विभिन्न आसनों से विभिन्न रोगों से सुरक्षा मिलती है। पर लोगों को स्वास्थ्य की चिंता कम, पर जागृति की चिंता ज्यादा हुआ करती थी। पर आज के वैज्ञानिक युग में जीवन अवधि लंबी हो गई है, और जीवनस्तर भी सुधर गया है, इसलिए लोग जागृतिके लिए लंबी प्रतीक्षा कर सकते हैं। क्योंकि आजकल जानलेवा बीमारियों का डर लगभग न के बराबर है, इसलिए लोगों में अपने शरीर को चुस्त-दुरुस्त और स्वस्थ रखने का उत्साह पहले से कहीं ज्यादा है। इसलिए मेरा विचार है कि यदि राजयोग की उपलब्धि भी हो जाए, तो भी हठयोग करते रहना चाहिए। एक मामले में योगी स्वात्माराम ठीक भी कह रहे हैं। यदि किसी के मन में पहले से ही कुंडलिनी बनी हो, तो हठयोग के अतिरिक्त या अनावश्यक प्रयास से उसे क्यों नुकसान पहुंचने दिया जाए। मेरे साथ भी तो ऐसा ही होता था। मेरे घर के आध्यात्मिक माहौल के कारण मेरे मन में हमेशा कुंडलिनी बनी रहती थी। मुझे लगता है कि यदि मैं उसे बढ़ाने के लिए बलपूर्वक प्रयास करता, तो शायद वह नाराज हो जाती। क्योंकि कुंडलिनी बहुत नाजुक, सूक्ष्म और शर्मीली होती है। कई प्रकार की कुंडलिनी हठयोग को पसंद भी नहीं करती, जैसे कि जीवित प्रेमी-प्रेमिका या मित्र के रूप से निर्मित कुंडलिनी। हठयोग के लिए सबसे ज्यादा खुश तो गुरु या देवता के रूप से निर्मित कुंडलिनी ही रहती है। कई बार आध्यात्मिक व कर्मठ सामाजिक जीवन से ही कुंडलिनी को सबसे ज्यादा बल मिलता है। कर्मयोग से भी बहुत बल मिलता है। ऐसे में यदि हठयोग किया, तो समय की बर्बादी ही होगी। स्वास्थ्य यदि हठयोग से दुरस्त रहता है, तो संतुलित रूप के मानसिक और शारीरिक काम से भी दुरस्त रहता है। हठयोग तो ज्यादातर अति भौतिक समाज या फिर वनों-आश्रमों के लिए ज्यादा उपयोगी है। संतुलन भी बना सकते हैं, हठयोग, राजयोग व कर्मयोग के बीच में। सब समय और परिस्थिति पर निर्भर करता है। ऐसा न हो कि कहीं मन में जमी कुंडलिनी को छोड़कर दूसरी ही कुंडलिनी को जगाने के चक्कर में पड़ जाओ, क्योंकि कुंडलिनी चित्र के क्षणिक जागरण से ज्यादा अहमियत कुंडलिनी चित्र के निरंतर मन में बने रहने की है। हो सकता है कि योगी स्वात्माराम का यह कथन प्रतिदिन के योग के लिए हो। जब प्रतिदिन की साधना के दौरान हठयोग से मन में कुंडलिनी का ध्यान अच्छी तरह से जम जाए, तब राजयोग वाली पद्धति से ध्यान करो। यह स्वाभाविक है कि दिनभर की काम की उलझन से आदमी का मन फिर से अस्थिर हो जाएगा। इससे वह अगले दिन सीधे ही राजयोग से नियंत्रित नहीं हो पाएगा। इसलिए अगले दिन उसे फिर से पहले हठयोग से वश में करना पड़ेगा। ऐसा क्रम प्रतिदिन चलेगा। ऐसा भी हो सकता है कि योगीराज ने यह उनके लिए लिखा हो, जिन्हें दुनियादारी की उलझनें न हों, और एकांत में रहते हुए योग के प्रति समर्पित हों। उनका मन जब लम्बे समय के हठयोग के अभ्यास से वश में हो जाए, तब वे उसे छोड़कर सिर्फ राजयोग करें। संसार की उलझनें न होने से उनका मन फिर से अस्थिर नहीं हो पाएगा। यदि थोड़ा बहुत अस्थिर होगा भी, तो भी राजयोग से वश में आ जाएगा।

हठयोग की शुरुआत प्राण ऊर्जा से और राजयोग की शुरुआत ध्यान चित्र से होती है

कुंडलिनी के बारे में भी विस्तार से नहीं बताया गया है। यही लिखा है कि फलाँ आसन को या फलाँ प्राणायाम को करने से कुंडलिनी जाग जाती है, या मूलाधार से ऊपर चढ़कर सहस्रार में पहुंच जाती है। इसी तरह व्याख्या में कहा गया है कि जब प्राण और अपान आपस में मणिपुर चक्र में टकराते हैं तो वहाँ एक ऊर्जा विस्फोट जैसा होता है, जिसकी ऊर्जा सुषुम्ना से चढ़ती हुई सीधी सहस्रार में जा पहुंचती है। इसका मतलब है कि प्राण ऊर्जा को ही वहाँ कुंडलिनी कहा गया है। क्योंकि यह ऊर्जा मूलाधार के कुंड में सोई हुई रहती है, इसलिए इसे कुंडलिनी कहते हैं। जब यह प्राण ऊर्जा या कुंडलिनी मस्तिष्क में जागेगी, तब इसके साथ मन का कोई चित्र भी जाग जाएगा। इसका मतलब है कि हठयोग में प्राण ऊर्जा को पहले जगाया जाता है, पर राजयोग में मन के चित्र को पहले जगाया जाता है। हठयोग में प्राण ऊर्जा के जागरण से मन का चित्र जागृत होता है, पर राजयोग में मन के चित्र के जागृत होने से प्राण ऊर्जा जागृत होती है। मतलब कि राजयोग में जागता हुआ मन का चित्र अपनी ऊर्जा की आवश्यकता को पूरा करने के लिए मूलाधार से प्राण ऊर्जा की नदी को पीठ से होकर ऊपर खींचता है। इसका मतलब है कि एकप्रकार से कुंडलिनी और प्राण ऊर्जा पर्यायवाची की तरह ही हैं। जिसे मैं कुंडलिनी कहता हूँ, वह हठयोग के प्राण और राजयोग के ध्यान-चित्र का मिश्रित रूप ही है। वास्तव में यही परिभाषा सबसे सटीक और व्यावहारिक है, क्योंकि हठयोग और राजयोग का मिश्रित रूप ही सबसे अधिक व्यावहारिक और फलदायक है। मुझे भी इसी मिश्रण से कुंडलिनी जागरण की अल्पकालिक अनुभूति मिली थी। यदि केवल राजयोग के ध्यान चित्र या मेडिटेशन ऑब्जेक्ट को लें, तब उसमें ऊर्जा की कमी रहने से वह क्रियाशील या जागृत नहीं हो पाएगा। इसी तरह, यदि केवल हठयोग की प्राण ऊर्जा को लिया जाए, तो उसमें चेतनता की कमी रह जाएगी। शायद इसीको मद्देनजर रखकर योगी स्वात्माराम ने कहा है कि राजयोग की उपलब्धि हो जाने पर हठयोग को छोड़ दो। उनका हठयोग को छोड़ने से अभिप्राय हठयोग को एकाँगी रूप में अलग से न कर के उसे राजयोग के साथ जोड़कर अभ्यास करने का रहा होगा। हठयोग के प्रारंभिक अभ्यास में तो मन के सर्वाधिक प्रभावी चित्र या ध्यान चित्र का ठीक ढंग से पता ही नहीं चलता। अभ्यास पूर्ण होने पर ही इसका पूरी तरह से पता चलता है। लगभग 2-3 महीनों में या अधिकतम 1 साल के अंदर यह हो जाता है। तब राजयोग शुरु हो जाता है। हालाँकि राजयोग के साथ जुड़ा रहकर हठयोग फिर भी चलता रहता है, पर इसमें राजयोग ज्यादा प्रभावी होने के कारण इसे राजयोग ही कहेंगे। मैं उस मानसिक चित्र और मूलाधार से ऊपर चढ़ने वाली ऊर्जा के मिश्रण को कुंडलिनी बता कर एक योग जिज्ञासु को शुरु में ही बता रहा हूँ कि बाद में ऐसा होगा, ताकि उसे साधना में कोई दिक्कत न आए। मानसिक चित्र तो पहले ही जागा हुआ अर्थात चेतन है। उस चित्र के सहयोग से जागती तो मूलाधार स्थित प्राण ऊर्जा ही है, जो आम अवस्था में सोई हुई या चेतनाहीन रहती है। इसलिए यह भी ठीक है कि उस ऊर्जा को कुंडलिनी कहा गया है। कुंडलिनी तो सिर्फ जागती है, पर ध्यान चित्र तो परम जागृत हो जाता है, क्योंकि वह आत्मा से एकाकार हो जाता है। मतलब ध्यान चित्र प्राण ऊर्जा से ज्यादा जागता है। इसलिए क्यों न उस ध्यान चित्र को ही कुंडलिनी कहा जाए। वैसे ध्यान चित्र और ऊर्जा का मिश्रण ही कुंडलिनी है, हालांकि उसमें ध्यान चित्र का महत्त्व ज्यादा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ध्यान चित्र राजयोग व हठयोग में समान रूप से अहमियत रखता है। ऊर्जा को अभिव्यक्ति ध्यान चित्र ही देता है। ऊर्जा को अनुभव ही नहीं किया जा सकता। ध्यान चित्र के रूप में ही तो ऊर्जा अनुभव होती है। अधिकांश लोग मानते हैं कि हठयोग केवल शारीरिक स्वास्थ्य से ही जुड़ा हुआ है, इसमें ध्यान का कोई स्थान नहीं है। मैं भी पहले कुछ-कुछ ऐसा ही समझता था। पर लोग वे 2-3 सूत्र नहीँ देखते, जिसमें इसे राजयोग के प्रारम्भिक सहयोगी के रूप में दिखाया गया है, और कहा गया है कि हठयोग की परिणति राजयोग में ही होती है। ध्यान योग का काम तो उसने राजयोग के पास ही रहने दिया है। वह दूसरे की नकल करके श्रेय क्यों लेता। इसका मतलब है कि उस समय भी कॉपीराइट प्रकार का सामाजिक बोध लोगों में था, आज से भी कहीं ज्यादा। तो क्यों न हम हठयोग प्रदीपिका को पतंजलि कृत राजयोग का प्रथम भाग मान लें। सच्चाई भी यही है।  योगी स्वात्माराम ऐसा ही जोर देकर करते अगर उन्हें पता होता कि आगे आने वाली पीढ़ी इस तरह से भ्रमित होगी।

ध्यान चित्र ही कुंडलिनी है

इसका प्रमाण मैं हठयोग की उस उक्ति से दूंगा, जिसके अनुसार कुंडलिनी सुषुम्ना नाड़ी में ऊपर की ओर बहती है। यदि आसनों व प्राणायामों के दौरान किसी चक्र पर ध्यान न किया जाए, तो मस्तिष्क में केवल एक थ्रिल या घरघराहट सी ही महसूस होगी, उसके साथ कोई मानसिक चित्र नहीं होगा। वह थ्रिल मस्तिष्क के दाएं, बाएं आदि किसी भी भाग में महसूस हो सकती है। पर जैसे ही उस थ्रिल के साथ आज्ञा चक्र, मूलाधार, स्वाधिष्ठान आदि चक्रों पर ध्यान लगाया जाता है, उसी समय सहस्रार चक्र में ध्यान किया जाने वाला मानसिक चित्र प्रकट हो जाता है। साथ में थ्रिल भी मस्तिष्क की लम्बवत केंद्रीय रेखा में आ जाती है। दरअसल आज्ञा आदि चक्रों पर ध्यान लगाने से कुंडलिनी ऊर्जा केन्द्रीभूत होकर सुषुम्ना में बहने लगती है, जिससे उसके साथ कुंडलिनी प्रकट हो जाती है। ऐसा दरअसल दाएं और बाएं मस्तिष्क के मिश्रित होने से उत्पन्न अद्वैत के सिद्धांत से होता है। थ्रिल के2रूप में मस्तिष्क को जाती ऊर्जा तो हर हाल में लाभदायक ही है, चाहे उसके साथ कुंडलिनी हो या न हो। उससे दिमाग तरोताजा हो जाता है। पर सम्पूर्ण लाभ तो कुंडलिनी के साथ ही मिलता है।

भगवान कृष्ण के द्वारा अर्जुन को अपने विश्वरूप का दर्शन कराना दरअसल कुंडलिनी जागरण ही था

इसे सम्भवतः श्री कृष्ण ने शक्तिपात से करवाया था। इसीलिए अर्जुन श्रीकृष्ण को कहता है कि उसे वे अनन्त रूप लग रहे हैं। इसका मतलब है कि उनका प्रियतम रूप अर्जुन की आत्मा से एकाकार हो गया था, अर्थात वे अखण्ड ऊर्जा(एनर्जी कँटीन्यूवम) से जुड़ गए थे। समाधि या कुंडलिनी जागरण ऐसा ही होता है। मैं तो एक मामुली सा इंसान हूँ। मुझे तो सिर्फ दस सेकंड की ही झलक मिली थी, इसीलिए ज्यादा नहीं बोलता, पर श्रीकृष्ण की शक्ति से वह पूर्ण समाधि का अनुभव अर्जुन में काफी देर तक बना रहा।

शरीर में नीचे जाते हुए चक्रों की आवृति घटती जाती है

चक्र पर चेतना शक्ति और प्राण शक्ति का मिलन होता है। नीचे वाले चक्र कम आवृति पर घूमते हैं। ऊपर की ओर जाते हुए, चक्रों की आवृति बढ़ती जाती है। आवृति का मतलब यहाँ आगे वाले चक्र से पीछे वाले चक्र तक और वहाँ से फिर आगे वाले चक्र तक कुंडलिनी ऊर्जा के पहुंचने की रप्तार है, अर्थात एक सेकंड में ऐसा कितनी बार होता है। विज्ञान में भी आवृति या फ्रेकवेंसी की यही परिभाषा है। यह तो मैं पिछली एक पोस्ट में बता भी रहा था कि यदि मस्तिष्क में चेतनामयी ऊर्जा की कमी है, तो अद्वैत का ध्यान करने पर कुंडलिनी चित्र नीचे के चक्रों पर बनता है, मतलब नीचे के कम ऊर्जा वाले चक्र क्रियाशील हो जाते हैं। साथ में बता रहा था कि अविकसित छोटे जीवों की कुंडलिनी नीचे के चक्रों में बसती है। इसका मतलब है कि उनके मस्तिष्क में चेतनामयी ऊर्जा की कमी होती है। जैसे-जैसे मस्तिष्क का विकास होता है, वैसे-वैसे कुंडलिनी ऊपर की ओर चढ़ती जाती है।

चक्र नाड़ी में बहने वाले प्राण से वैसे ही घूमते हैं, जैसे नदी में बहने वाले पानी से पनचक्की के चरखे घूमते हैं

सम्भवतः चक्र इसलिए कहा जाता है, क्योंकि जैसे पानी की छोटी नदी या नाली के बीचोंबीच आटा पीसने वाली पनचक्की की पानी से घूमने वाली चरखी घूमती है, उसी तरह सुषुम्ना नाड़ी के बीच में चक्र घूमते हैं। नाड़ी शब्द नदी से ही बना है। ये चक्र भी सुषुम्ना में ऊपर चढ़ रही ऊर्जा से टरबाइन की तरह पीछे से आगे की तरफ घूमते हैं। आज्ञा चक्र से नीचे जाने वाली नाड़ी के प्रवाह से वह फिर पीछे की तरफ घूमते हैं। पीछे से फिर आगे की ओर, आगे से फिर पीछे की ओर, इस तरह से यह चक्र चलता रहता है। आपको विशुद्धि चक्र का उदाहरण देकर समझाता हूँ। गर्दन के बीचोंबीच वह चक्ररूपी टरबाइन है। समझ लो कि इसमें नाड़ी के ऊर्जा प्रवाह को अपनी घूर्णन गति में बदलने के लिए प्रोपैलर जैसे ब्लेड लगे हैं। जब इस चक्र के साथ मूलाधार का ध्यान किया जाता है, तो गर्दन के पिछले भाग के बीच में कुंडलिनी चित्र बनता है। इसका मतलब है कि वहां प्रोपैलर ब्लेड पर दबाव पड़ता है। फिर जब उसके साथ आज्ञा चक्र का ध्यान किया जाता है, तो गर्दन के अगले भाग के बीचोंबीच एक सिकुड़न के साथ वह कुंडलिनी चित्र बनता है। मतलब कि पीछे से प्रोपैलर ब्लेड घूम कर आगे पहुंच गया, जिस पर आज्ञा चक्र से नीचे जा रहे ऊर्जा प्रवाह का अगला दबाव लगता है। फिर मूलाधार का ध्यान करने से वह फिर से गर्दन के पिछले वाले भाग में पहली स्थिति पर आ जाता है। आज्ञा चक्र के ध्यान से वह फिर आगे आ जाता है। इस तरह यह चक्र चलता रहता है। आप यह मान सकते हो कि उसमें एक ही प्रोपैलर ब्लेड लगा है, जो घूमते हुए आगे पीछे जाता रहता है। यह भी मान सकते हैं कि उस टरबाइन में बहुत सारे ब्लेड हैं, जैसे कि अक्सर होते हैं। यह कुछ-कुछ दार्शनिक जुगाली भी है। विशुद्धि चक्र, आज्ञा चक्र और मूलाधार चक्र का एकसाथ ध्यान करने से विशुद्धि चक्र तेजी से घूमने लगता है। हालांकि इसमें कुछ अभ्यास की आवश्यकता लगती है। आप समझ सकते हो कि नीचे से प्राण ऊर्जा उस चक्र को घुमाती है, और ऊपर से मनस ऊर्जा। चक्र पर दोनों प्रकार की ऊर्जाओं का अच्छा मिश्रण हो जाता है। चक्र पर जो सिकुड़न महसूस होती है, वह एकप्रकार से प्राण ऊर्जा से चक्र को लगने वाला धक्का है। चक्र पर जो कुंडलिनी चित्र महसूस होता है, वह चक्र पर मनस ऊर्जा से लगने वाला धक्का है। दरअसल आगे के चक्रों पर धक्का लगाने वाली शक्ति भी प्राण शक्ति ही है, मनस शक्ति नहीं। मनस शक्ति तो प्राण शक्ति के साथ तब मिश्रित होती है, जब वह मस्तिष्क से गुजर रही होती है। यह ऐसे ही होता है, जैसे किसी नदी के एक बगीचे के बीच से गुजरते समय उसके पानी में फूलों की सुगंध मिश्रित हो जाती है। अगले चक्रों में वह सुगन्धि या कुंडलिनी चित्र ज्यादा मजबूत होता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि आगे की नाड़ी में ऊर्जा नीचे जाते समय अपनी ज्यादातर खुशबू गवां देती है। मूलाधार से मुड़कर जब वह पीठ से ऊपर चढ़ती है, तब उसमें बहुत कम कुंडलिनी सुगन्धि बची होती है। मस्तिष्क में पहुंचते ही उसमें फिर से कुंडलिनी सुगंधि मिश्रित हो जाती है। वह फिर आगे से नीचे उतरते हुए चक्रों के माध्यम से चारों ओर कुंडलिनी सुगन्धि फैला देती है। इस तरह से यह चक्र चलता रहता है। सम्भवतः महामृत्युंजय मंत्र का “सुगंधिम पुष्टिम वर्धनम” इसी कुंडलिनी सुगंधि को इंगित करता है। एक पिछली पोस्ट में भी इसी तरह का अपना अनुभव साझा कर रहा था कि यदि सहस्रार को ऊपर वाले त्रिभुज का शिखर मान लिया जाए, आगे के और पीछे के चक्रों को जोड़ने वाली रेखा को त्रिभुज का आधार मान लिया जाए, उससे निचली उल्टी त्रिभुज का आधार जुड़ा हो, जिसका शिखर मूलाधार चक्र हो, तो बीच वाले चक्रों पर बड़ा अच्छा ध्यान लगता है। अब मैं अपने ही उस अनुभव को वैज्ञानिक रूप से समझ पा रहा हूँ कि ऐसा आखिर क्यों होता है। दरअसल ऊपर के त्रिभुज से मनस ऊर्जा ऊपर से नीचे आती है, और नीचे के त्रिभुज से प्राण ऊर्जा ऊपर जाती है। वे दोनों आधार रेखा पर स्थित चक्रों पर आपस में टकराकर एक ऊर्जा विस्फोट सा पैदा करती हैं, जिससे चक्र तेजी से घूमता है और कुंडलिनी जीवंत जैसी हो जाती है। पिरामिड आकृति में जो ऊर्जा का घनीभूत संग्रह होता है, वह इसी त्रिभुज सिद्धांत से होता है। जो यह कहा जाता है कि शरीर के चक्र शरीर के ऊर्जा केंद्र हैं, उसका मतलब यही है कि उन पर कुंडलिनी चित्र मजबूत होता है। वह कुंडलिनी चित्र आदमी के जीवन में बहुत काम आता है। उसी से कुंडलिनी रोमांस सम्भव होता है। उसी से अनासक्ति और अद्वैत की प्राप्ति होती है, जिसे प्राप्त करके आदमी काम करते हुए थकता ही नहीं। दरअसल आदमी के विकास के लिए सिर्फ शारीरिक और मानसिक शक्ति ही पर्याप्त नहीं होती। यदि ऐसा होता तो समृद्ध घर के रचे-पचे लोग ही दुनिया में तरक्की का परचम लहराया करते। पर हम देखते हैं कि अधिकांश मामलों में बुलंदियों को छूने वाले लोग गरीबी और समस्याओं से ऊपर उठे होते हैं। दरअसल सबसे ज़्यादा जरूरी आध्यात्मिक शक्ति होती है, जो कुंडलिनी से प्राप्त होती है। इससे आदमी अहंकार रूपी उस अंधेरे से बचा रहता है, जो काम करने से पैदा होता है, और तरक्की को रोकता है। एक बार मैं डॉक्टरों और हस्पतालों के चक्कर इसलिए लगाने लग गया था, क्योंकि मैं काम से थकता ही नहीं था। आम लोग तो इसलिए हॉस्पिटल जाते हैं क्योंकि वे काम से जल्दी थक जाते हैं। पर मेरे साथ उल्टा हो रहा था। कुंडलिनी मेरे ऊपर भूत बनकर सवार थी। कुंडलिनी शायद वह भूत है, जिसका वर्णन एक कहानी में आता है कि वह कभी खाली नहीं बैठता था, और पलक झपकते ही सब काम कर लेता था। जब उसे काम नहीं मिला तो वह आदमी को ही परेशान करने लगा। फिर किसी की सलाह से उसने उसे खम्बे को लगातार गाड़ते और उखाड़ते रहने का काम दिया। मतलब आदमी लगातार किसी न किसी काम में व्यस्त रहा। वैसे तो कुंडलिनी भली शक्ति है, कभी बुरा नहीं करती, होली घोस्ट की तरह। शायद होली घोस्ट नाम इसीसे पड़ा हो। फिर भी कुंडलिनी को हैंडल करना आना चाहिए। मुझे तो लगता है कि आजकल जो अंधी भौतिक तरक्की हो रही है, उसके लिए अनियंत्रित व मिसगाइडिड कुंडलिनी ही है।

अद्वैत का चिंतन कब करना चाहिए

किसी चक्र पर ध्यान देते हुए यदि अद्वैत की अवचेतन भावना भी की जाए, तो आनन्द व संकुचन के साथ कुंडलिनी उस चक्र पर प्रकट हो जाती है। यदि मस्तिष्क के विचारों या मस्तिष्क के प्रति ध्यान देते समय अद्वैत का ध्यान किया जाए, तो मस्तिष्क में दबाव व आनन्द के साथ कुंडलिनी प्रकट हो जाती है। इससे मस्तिष्क जल्दी ही थक जाता है।

योग में आसनों व प्राणायाम का क्रम

फिर कहते हैं कि पहले आसन करने चाहिए। उसके बाद प्राणायाम करना चाहिए। अंत में कुंडलिनी ध्यान करना चाहिए। प्राणायाम में भी सबसे पहले कपालभाति किया जाता है। मैं भी अपने अनुभव से बिल्कुल इसी क्रम में करता हूँ। आसनों से थोड़ा नाड़ियां खुल जाती हैं। इसलिए प्राणायाम से उनमें आसानी से कुंडलिनी ऊर्जा का प्रवाह प्रारम्भ हो जाता है। कपालभाति से भी नाड़ियों को खोलने के लिए भरपूर ताकत मिलती है, क्योंकि इसमें झटके से श्वास-प्रश्वास चलता है। लगभग 25-30 आसान हैं हठयोग प्रदीपिका में। कुछ मेरे द्वारा किए जाने वाले आसनों से मेल खाते हैं, कुछ नहीं। इससे फर्क नहीं पड़ता। ऐसे आसनों का मिश्रण होना चाहिए, जिससे लगभग पूरे शरीर का व्यायाम हो जाता हो। विशेष ध्यान पीठ और उसमें चलने वाली तीन मुख्य नाड़ियों पर होना चाहिए। मैं भी अपने हिसाब के 15-20 प्रकार के आसन कर ही लेता हूँ। मैं कुर्सी पर ही प्राणायाम करता हूँ। सिद्धासन आदि में ज्यादा देर बैठने से घुटने थक जाते हैं। कुर्सी में आर्म रेस्ट न हो तो अच्छा है, क्योंकि वे ढंग से नहीं बैठने देते। कुर्सी पर गद्दी भी रख सकते हैं। कुर्सी उचित ऊंचाई की होनी चाहिए।

नाड़ीशोधन प्राणायाम मूल प्राणायाम के बीच में खुद ही होता रहता है

प्राणायाम में कपालभाति के बाद कुछ देर बाएं नाक से सांस भरना और दाएं नाक से छोड़ना और फिर साँसों की घुटन दूर करने के लिए नाड़ी शोधन प्राणायाम करना मतलब हर सांस के साथ नथुने को बदलते रहना जैसे कि बाएं नाक से सांस लेना और दाएं से छोड़ना, फिर दाएं से लेना और बाएं से छोड़ना, और इसी तरह कुछ देर के लिए करना जब तक थकान दूर नहीँ हो जाती। फिर कुछ देर विपरीत क्रम में साँसे लेना, और विपरीत क्रम में नाड़ी शोधन प्राणायाम करना मतलब दाएं नथुने से शुरु करना। फिर दोनों नाकों से एकसाथ सांसें लेना और छोड़ना। फिर से साँसों की घुटन दूर करने के लिए कुछ देर एक तरफ से और कुछ देर दूसरी तरफ से नाड़ी शोधन प्राणायाम शुरु करना। इसी तरह, कुंडलिनी ध्यान करते समय जब साँसों को रोका जाता है, उससे साँस फूलने पर भी नाड़ी शोधन प्राणायाम करते रहना चाहिए। इस तरह से नाड़ी शोधन प्राणायाम खुद ही होता रहता है। अलग से उसके लिए समय देने की जरूरत नहीं।

कुंडलिनी प्रेम, आदर, और समर्पण के भावों की भूखी है, जो योग या सामाजिक रिश्तों या दोनों से बढ़ाए जाने योग्य हैं

कुंडलिनी योग के सर्वोच्च महत्त्व को दर्शाती शिवपुराण की शिव-सती व दक्ष-यज्ञ की कथा

दोस्तो, इस हफ्ते मुझे एक नई अंतर्दृष्टि मिली है। शिवपुराण में एक प्रसिद्ध कथा आती है। प्रजापति दक्ष जो ब्रह्मा का पुत्र था, उसने शिवेच्छा और अपने पिता की संस्तुति से प्रेरित होकर अपनी पुत्री सती का विवाह भगवान शिव से कराया था। एकबार किसी तीर्थस्थान पर ऋषियों और राजाओं की बैठक हो रही थी। उस सभा में भगवान शंकर भी बैठे थे। तभी वहाँ ब्रह्मा भी आए। सभी लोग उनके सम्मान में खड़े हो गए और उन्हें नमन किया। परंतु भगवान शिव चुपचाप बैठे रहे। इससे दक्ष उनपर बड़ा गुस्सा हुआ, और उन्हें भला-बुरा कहने लगा। बात यहीं खत्म नहीं हुई। दक्ष के मन में क्रोध और बदले की आग बुझ ही नहीं रही थी। इसलिए उसने शिव को अपमानित करने के लिए एक बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन किया। उसमें उसने अपने जामाता शिव को छोड़कर अपने सभी संबंधियों, सृष्टि के सभी देवताओं और विशिष्ट लोगों को बुलाया। जब पार्वती ने अपनी बहनों को सज-धज कर कहीं जाते हुए देखा, तो अपनी सखी से उनसे पुछवाया कि वे कहाँ जा रही थीं। जब पार्वती को अपने पिता दक्ष के यज्ञ के बारे में पता चला तो वह अपने पति शिव के पास जाकर चलने के लिए कहने लगी। शिव ने बताया कि दक्ष उनसे शत्रुता रखते हैं, इसलिए उन्होंने उन्हें जानबूझकर नहीं बुलाया। सती ने फिर कहा कि शास्त्रों के अनुसार पिता, गुरु और मित्र के यहाँ जाने के लिए किसी निमंत्रण की आवश्यकता नहीं होती। तब शिव ने जवाब दिया कि उसकी बात ठीक है, पर दक्ष की बात और है, वह वहाँ उसका अपमान करेंगे और अपनों के द्वारा किया अपमान मृत्यु से बढ़कर होता है। पर सती नहीँ मानी और वहां चली गई। वहाँ अपने पति शिव का स्थान व भाग न देखकर वह बहुत क्रोधित हुई और अपने पिता दक्ष को फटकारने लगी। सती ने शिव को असली और सबसे बड़ा देवता बताया। दक्ष ने उससे कोई बात नहीं की और न ही औरों को करने दी। फिर जब सती चुप नहीं हुई, तब उसने सती को भूतों के साथ रहने वाले वेदविरुद्ध और गन्दे शिव की पत्नी कहा। फिर सती ने यह सोचकर कि वह शिव को क्या मुंह दिखाएगी और जब वे उसे दाक्षायणी या दक्ष-पुत्री कहेंगे तो वह क्या जवाब देगी, अपना शरीर योगविद्या से त्याग दिया और यज्ञ की अग्नि में प्रविष्ट कर गई। उसके दुख से 10000 शिवगणों ने गुस्से में अपने अस्त्र-शस्त्रों से अपने अंग भंग कर दिए और मृत्यु को प्राप्त हो गए। जब बाकि बचे गणों ने यज्ञ पर हमला किया तो ऋषियों द्वारा यज्ञ से पैदा किए ऋभु देवों से उनका युद्ध हुआ। उसी समय आकाशवाणी हुई जो दक्ष को फटकारने लगी। उसने सती को सबकी माँ, सूर्य-चन्द्र समेत सारी सृष्टि को पैदा करने वाली, शिव की परम प्यारी, शिव के आधे शरीर के रूप वाली, भुक्ति और मुक्ति देने वाली, सभी सुख प्रदान करने वाली, और परम आदरणीय बताया। उसने सती का आदर न करने पर दक्ष को बहुत फटकारा। ऋभुओं ने उस समय तो शिवगणों को भगा दिया पर बाद में शिव के भयानक दूसरे गणों ने आकर दक्ष यज्ञ का विध्वंस कर दिया था। वह सती अपने अगले जन्म में पार्वती नाम से फिर से शिव की पत्नी बनी।

कुंडलिनी शक्ति सती, कार्यकारी मन ब्रह्मा, और भूतिया जीवात्मा शिव के रूप में दर्शाया गया है

अब उपरोक्त कथा का गूढ़ रहस्य समझते हैं। दरअसल कुंडलिनी ही देवी सती है। शिव शून्य आकाश की तरह है। दोनों साथ रहकर ही अपनी सत्ता प्राप्त करते हैं। अलग रहकर तो न होने के सदृश ही हैं। मतलब कि दोनों साथ रहते हैं। सती से ही शिव को चमक प्राप्त होती है। शिव से सती को स्थिरता या सनातनता या अजरता-अमरता, और सर्वव्यापकता प्राप्त होती है। अब यहाँ कुछ दार्शनिक पेंच हैं, जिन्हें अक्सर नजरन्दाज किया जाता है। आदमी बड़े-2 धार्मिक कार्य करता है, पर कुंडलिनी योग को नजरंदाज करता है। ऐसे लोग प्रजापति दक्ष की तरह हैं, जिन्हें उसकी तरह नरक में जाना पड़ता है। इस कथा में कुंडलिनी योग का महत्त्व छिपा हुआ है। भाईसाहब, अब कुंडलिनी क्या है, यही यक्ष प्रश्न हरेक पोस्ट में खड़ा हो जाता है। मन में तो अनगिनत चित्र हैं। अब किसे कुंडलिनी माना जाए। तो इसका यही उत्तर बनता है कि तांत्रिक यौनयोग या पंचमकारों वाले योग के समय जो मन में सबसे मजबूती व सहजता से उभरे, वही चित्र कुंडलिनी है। क्योंकि कुंडलिनी तभी बनती है न जब मन का कोई चित्र मूलाधार स्थित यौन शक्ति से जुड़ता है। वही चित्र कुंडलिनी चित्र है, मन का कोई सामान्य चित्र नहीं। कुंडलिनी की दूसरी पहचान यह है कि उसके साथ आदमी के अंदर शून्यता, और व्यापकता भी हावी हो जाती है। यही शिव या आत्मा है, जिसे भूतों का साथी कहा गया है। भूत मृत्यु को भी कहते हैं। शून्यता और व्यापकता मृत्यु का प्रमुख गुण है। इसीसे शिव या आत्मा भूतों का साथी हुआ। कुंडलिनी की तीसरी पहचान है कि यह एक शुद्ध मानसिक चित्र होता है। मतलब कि वह भौतिक रूप में उपलब्ध नहीं होता। भौतिक रूप में मिलने से वह चित्र कुंडलिनी रहता ही नहीं, क्योंकि भौतिक वस्तुओं में हजारों दोष दिखाई देते हैं। दोषों वाली चीज मन में कहाँ चमकी रह पाएगी। इसीलिए किसी देवता के या गुरु के मानसिक चित्र को कुंडलिनी बनाया जाता है। विशेष आदर बुद्धि होने के कारण गुरु के भौतिक रूप में भी दोष नहीं दिखाई देता। कुंडलिनी की चौथी पहचान यह है कि मन में अद्वैतमयी भाव पैदा होने पर केवल अकेला कुंडलिनी चित्र मन में तेजी से चमकने लगता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि अद्वैत भाव शून्य आकाश जैसा ही होता है। मतलब यह शिव भाव होता है। वहाँ सती तो हर हाल में पहुंचेगी ही, क्योंकि वह शिव के आधे शरीर के रूप में जो है। अगर फिर भी आपको कुंडलिनी का पता न चले, तो मैं कुछ नहीं कर सकता। हाहाहा। शिवपुराण में भी वही लिखा है जो मैं पिछली पोस्टों में बोल रहा था कि कुंडलिनी ही आध्यात्मिक मुक्ति के साथ भौतिक तरक्की व भोग-विलास भी प्रदान करती है। मन से ही सारा संसार है। जो यह कहा गया है कि उससे ही सारी सृष्टि की उत्पत्ति होती है, वह सब मन में ही तो होता है। सारी सृष्टि इस फुटबॉल के जितने आकार वाले सिर के अंदर पसरे मन में ही तो है, बाहर कुछ भी नहीं है। और भाई मन का सर्वप्रमुख प्रतिनिधि होने के कारण कुंडलिनी को मन भी कह सकते हैं। तो हुई न कुंडलिनी से ही सारी सृष्टि की उत्पत्ति और प्रलय। दक्ष यहाँ कर्म में लगे हुए गौण मन का प्रतीक है। वह जगत में प्रसिद्धि व पुण्य प्राप्त करने के लिए अनेक प्रकार के यज्ञ कर्म करता है। वह अनेक प्रकार के देवताओं का पूजन करता है। उससे अद्वैत भाव से मन में कुंडलिनी का उद्भव होता है। वही उसकी सबसे प्रिय पुत्री सती है। शिव उससे शादी करने की इच्छा करते हैं, मतलब वे कुंडलिनी को जागरण के लिए प्रेरित करते हैं। यह भी आता है कि शिव-सती की जोड़ी सनातन है, वे केवल लीला के लिए ही अलग होते रहते हैं, और शादी करते रहते हैं। तभी तो सती अगले जन्म में पार्वती बनकर फिर से शिव की पत्नी बनी। इसका मतलब साफ है कि जीव ईश्वर से अलग होता है, और उसी में विलीन भी हो जाता है। दक्ष शिव की इच्छा का सम्मान करते हुए सती का विवाह शिव से कर देते हैं, मतलब कुंडलिनी जागरण हो जाता है, दक्ष अर्थात गौण मन जिसका पूरा आनंद उठाता है। ब्रह्मा भी सती का विवाह शिव से कराने के लिए दक्ष को मनाते हैं। इसका मतलब है कि जो ब्रह्मा के रूप में मुख्य या मूल मन है, वह अपने अंदर सृष्टि को बढ़ा कर ज्यादा से ज्यादा बड़ा होना चाहता है। उसे पता है कि ईश्वर में मिलकर वह सबसे बड़ा हो जाएगा। इसलिए वह काम-काज में व्यस्त रहने वाले मन अर्थात दक्ष को कुंडलिनी जागरण के लिए प्रेरित करता है। ब्रह्मा यहाँ मूल मन का प्रतीक है। फिर दक्ष सती को यज्ञ में नहीं बुलाता। इसका मतलब है कि कुंडलिनी जागरण के बाद कार्यकारी मन कुंडलिनी योग नहीं करता और दुनिया के कामों में व्यस्त हो जाता है। मतलब साफ है कि यदि कुंडलिनी जागरण के बाद कुंडलिनी योग न किया, तब भी पतन सम्भव है। फिर जिसकी कुंडलिनी जागृत ही नहीं हुई, उसे तो क्यों नहीं करना चाहिए। दक्ष ने शिव को नहीं बुलाया, मतलब उसने अद्वैत भाव को धारण नहीं किया। सती दक्ष से मिलने अकेले गई, मतलब कुंडलिनी मन में बारबार आती है यह देखने कि उसका सम्मान है कि नहीं। शिव उसके साथ तभी आएंगे जब उसे सम्मान दिया जाएगा अर्थात कुंडलिनी से अद्वैत भाव को धारण करके शिव को भी सम्मान दिया जाएगा, मतलब कुंडलिनी योग से उसपर गौर किया जाएगा। हालांकि मन से तो शिव कुंडलिनी के साथ है ही। दक्ष ने कुंडलिनी का सम्मान नहीं किया, मतलब उसने कुंडलिनी योग नहीं किया। सती ने आत्मदाह किया, मतलब कुंडलिनी नष्ट हो गई। उसके साथ शिवगणों ने भी आत्महनन किया, मतलब दक्ष रूपी गौण मन से शिव के बहुत से गुण गायब हो गए। गणों को सुंदर विचार भी कह सकते हैं। वे कुंडलिनी के साथ रहते हैं, और शिव की सहायता से उत्पन्न होते हैं। बाकि बचे गणों ने यज्ञ पर हमला किया, मतलब भगवान के कोप से सांसारिक विघ्न आए। यज्ञ से उत्पन्न ऋभुओं ने गणों को भगाया, मतलब अच्छे कर्मों के पुण्यों से दक्ष का बचाव हुआ। बाद में शिव के महान गणों से ऋभु देव भी नहीं बचा सके, मतलब मृत्यु के समय दक्ष के अच्छे कर्म उसके काम नहीं आए, और कुंडलिनी न होने से शिव ने भी उसका साथ नहीं दिया। शिवगण ने दक्ष का सिर धड़ से अलग कर दिया, मतलब दक्ष को मुक्ति के बिना ही मरना पड़ा। फिर शिव ने उसे बकरे का सिर लगाया जिससे वह  बैं-बैं या बम-बम की आवाज करता हुआ शिव की स्तुति करने लगा। मतलब कुंडलिनी के आंशिक प्रभाव से दक्ष का पुनर्जन्म एक शिवभक्त के रूप में हुआ जिससे शिव की भक्ति करता हुआ वह मुक्त हो गया। बकरे में अहंकार नहीं होता। वह भक्ति का प्रतीक है, क्योंकि वह अपने मालिक के लिए बैं-बैं की प्रेम की रट लगा रखता है। इसका मतलब है कि जो कुंडलिनी योग से कुंडलिनी को सम्मान नहीं देता, वह अगले जन्म में भक्त बनता है। भक्ति उसकी योग की कमी को पूरा करती है। जब बुढ़ापे, बाल्यावस्था व बीमारी की अवस्था में आदमी तांत्रिक कुंडलिनी योग नहीं कर सकता, उस समय भक्ति ही उसका सहारा होती है। भक्ति से वह अपने मन को लगातार इष्ट में लगा कर रखता है। मुझे प्रेम और सम्मान में कोई अंतर प्रतीत नहीं होता। प्रेम और सम्मान वास्तव में पर्यायवाची शब्दों की तरह है। प्रेम से ही असली सम्मान होता है। बिना प्रेम का सम्मान तो दिखावा या जबरदस्ती का सम्मान है। तभी पहाड़ी भाषा में एक कहावत है, “मूंड मेक रौ डाल नी कराऊँदि”। इसका मतलब है कि किसी का सिर मोड़कर उससे प्रणाम नहीं कराई जा सकती। जहां ज्ञान खत्म होता है, वहाँ भक्ति शुरु होती है। भगवान वेदव्यास ने 17 पुराण रच दिए थे। सारी सृष्टि का और ईश्वर का ज्ञान उसमें भर दिया था। पर उन्हें संतुष्टि नहीं मिली। इसलिए उन्होंने भक्तिमय पुराण श्रीमद्भागवत की रचना की। फिर उनकी कुंडलिनी स्थिर हुई, जिससे उन्हें परम संतुष्टि मिली। पर सीधे भक्ति करना भी मुश्किल है। असली भक्ति ज्ञान के बाद ही होती है। जो लोग बचपन से ही प्रेमी स्वभाव के होते हैं, वे पिछले जन्म के कुंडलिनी योगी प्रतीत होते हैं। कुंडलिनी योग को आसन प्राणायाम वाले योग तक ही सीमित नहीं समझना चाहिए। यह प्राकृतिक कारणों से स्वयं भी हो सकता है। कुंडलिनी के प्रति आदर बुद्धि रखने में तो कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिये। वह एक मानसिक चित्र है, आध्यात्मिक चित्र है। उसमें भौतिकता का कोई नामोनिशान नहीँ। अशुद्धि तो भौतिक पदार्थों में ही सम्भव है। अशुद्धि भौतिक ही होती है। यह शारीरिक अपशिष्टों, घृणा, क्रोध,वासना आदि से बनी होती है। आकाश या शून्य में कोई भौतिक वस्तु है ही नहीं। इसीलिए कुंडलिनी चाहे किसी भी रंग-रूप में क्यों न हो, हर हालत में आदरणीय है। इसीलिए आध्यात्मिक व्यक्ति को ही ज्यादातर मामलों में गुरु बनाया जाता है, क्योंकि उनमें आकाश की तरह अशुद्धि या दोष नहीं होते। दोष स्वार्थ से पैदा होते हैं। आकाश को किसी चीज की जरूरत नहीं क्योंकि वह अविनाशी है, इसलिए उसमें दोष नहीं हैं। दूरदर्शन के चरित्र भी इसीलिए प्रिय व आदरणीय लगते हैं, क्योंकि वे भी आकाश की तरह ही शुद्ध हैं। मन में बने चित्र से ज्यादा कुछ नहीं हैं। उनके भौतिक रूप से हमें कोई मतलब नहीं होता। भौतिक रूप के साथ बहुत जिम्मेदारियां जुड़ी होती हैं। तभी तो कई लोग इन चरित्रों के इतने दीवाने हो जाते हैं कि उनके लिए पता नहीं क्या-क्या कर बैठते हैं। यदि वैसे लोग उन्हें कुंडलिनी बना कर साधना करे, तो सफलता क्यों न मिले।

प्रेम, आदर और समर्पण ही मानवता की रीढ़ है

प्रेम, आदर और समर्पण में भावना की मात्रा का ही फर्क है, वैसे तीनों समान हैं। प्रेम तो हम बच्चों के साथ भी करते हैं। विशिष्ट लोगों के लिए प्रेम के साथ आदर जुड़ने से वह और घना हो जाता है। अति विशिष्ट और दिल के सबसे नजदीक लोगों के लिए उसमें समर्पण भी जुड़ जाता है। इससे प्रेम सर्वोच्च कोटि का बन जाता है। कुंडलिनी ऐसे ही सर्वोच्च कोटि के प्रेम या समर्पण की भूखी होती है। हम जो औरों से अपने प्रति समर्पण की आकांक्षा करते हैं, वह कुंडलिनी के लिए ही करते हैं। मुझे बाहुबली फिल्म में बाहुबली के प्रति लोगों का उच्च कोटि का समर्पण दिखा था। महामानव या सुपरहीरो वाली फिल्में इसीलिए अच्छी लगती हैं क्योंकि उनमें समर्पण की घटनाओं से कुंडलिनी को बल मिलता है। इसी तरह मेरे क्षणिक जागरण के समय वहाँ उपस्थित लोग मुझे अपने प्रति समर्पित से लगे। उनकी वह समर्पण की भावना मेरी कुंडलिनी को लगी और वह जागृत हो गई। यदि मैं तांत्रिक कुंडलिनी योग न कर रहा होता, तो वह समर्पण कुंडलिनी के प्रति तो होता और उससे कुंडलिनी चमकती भी पर जागृत न होती। स्त्री प्रेम और प्रणय प्रेम कुंडलिनी को बढ़ाता है, क्योंकि उसमें समर्पण होता है। अगर तो प्रणय प्रेम तांत्रिक किस्म का हो, तब तो और अधिक कुंडलिनी को भड़काता है। इसीलिए शास्त्रों में समर्पण और प्रणय प्रेम से भरी कथाओं की भरमार है। भक्ति भी तो समर्पण ही है। तभी कहते हैं कि जहां ज्ञान हार जाता है, वहाँ भक्ति जीत जाती है। इसी समर्पण के लिए ही हिंदु शास्त्रों में प्रेम और शिष्टाचार का बहुत ज्यादा महत्त्व है। इसीलिए कुंडलिनी संस्कृति एक आदर्श मानवतापूर्ण संस्कृति है, क्योंकि इसमें प्रेम, आदर और समर्पण की भरमार होती है, जो मानवता के सर्वप्रमुख गुण हैं। प्राचीन आर्यन संस्कृति ऐसी ही आदर्श संस्कृति थी। आजकल की पीढ़ी के लोग इन्हें मजाक में लेते हैं। तभी तो एक वीडियो गेम की रिकॉर्डिंग वाले अदने से यू टयूब चैनल को भी कुछ ही महीनों में हजारों-लाखों फ़ॉलोअर मिल जाते हैं, और ज्ञान-विज्ञान से भरे इस कुंडलिनी ब्लॉग को तीन सालों में पांच सौ भी नहीं मिले हैं। मैं आत्मप्रशंसा नहीं कर रहा हूँ, और न ही फॉलोवर्स बढ़ाने की मंशा रखता हूँ, पर आज के समाज की दयनीय दशा की तस्वीर साझा कर रहा हूँ। मैं तो कुछ भी नहीं हूँ। मैं तो बस एक मामूली सा टैन सैकण्ड मैन या दशक्षण व्यक्ति हूँ, मतलब मेरे सारे आध्यात्मिक अनुभव दस सेकंड के लगभग ही रहे हैं। हाहाहा।

तंत्र योग से समर्पण की कमी पूरी की जा सकती है

हिंदु शास्त्रों में जो मांसाहार और मद्य का निषेध है, वह इसी समर्पण की भावना को बचाने के लिए है। बेचारे पालतू पशु आदमी के प्रति पूरी तरह से समर्पित होते हैं, पर आदमी ही उनका गला घोंटता है। यह समर्पण भाव का गला घोंटना ही तो है। इस हिसाब से इससे बढ़िया तो जंगल या झील का शिकार है। उससे समर्पण के साथ धोखा तो नहीं होगा। यह एक दार्शनिक जुगाली है, इसे ज्यादा गम्भीरता से नहीं लेना चाहिए। इसी तरह मद्यपान भी समर्पण को घटाता है, क्योंकि इससे आदमी अनजाने में ही दुर्व्यवहार कर बैठता है। यहाँ पँचमकारी तँत्रविज्ञान काम कर सकता है। तंत्र विज्ञान समर्पण भाव से ज्यादा अपेक्षा नहीं रखता। वह तो बलपूर्वक कुंडलिनी को वश में करके उसे जागृत कर लेता है। यह तो कुंडलिनी को बलात्कार से वश में करने की तरह ही है। हालाँकि कुछ जरूरत तो पड़ती ही है, जैसे मुझे पड़ी थी, जैसा मैंने ऊपर बताया। यदि समर्पण को बिल्कुल नजरन्दाज करना हो, तो तांत्रिक योग बहुत शक्तिशाली होना चाहिये। वैसे जब तन्त्रयोगी का शरीर दुर्बल हो जाता है और उससे उच्च कोटि का तंत्रयोग नहीं हो पाता, तब तो अन्ततः उसे समर्पण या भक्ति के आश्रित होना ही पड़ता है। यही यहाँ ज्ञान पर भक्ति की जीत है। हालाँकि उसे भक्ति भाव बहुत शीघ्रता से प्राप्त हो जाता है, पर फिर उसे अपना खान-पान और आचार-विचार सुधारना पड़ता है।

पूर्ण समर्पण ही कुंडलिनी जागरण के रूप में कुंडलिनी योग की पराकाष्ठा है

कुंडलिनी योग की शुरूआत कुंडलिनी से बलपूर्वक प्रेमपूर्ण सम्बन्ध बनाने से होती है। धीरे-धीरे वह प्रेम आसान हो जाता है। फिर समय के साथ उसके साथ आदर भी जुड़ जाता है, और वह और ज्यादा मजबूत हो जाता है। लगातार कुंडलिनी योग करते हुए बहुत समय बीतने पर कुंडलिनी के प्रति प्रेम और आदर के साथ समर्पण भी जुड़ जाता है। फिर अंत में कुंडलिनी के प्रति समर्पण इतना ज्यादा बढ़ जाता है कि योगी कुंडलिनी के साथ एकाकार हो जाता है। इसे ही समाधि या कुंडलिनी जागरण कहते हैं। तंत्रयोग से बेशक कुंडलिनी जागरण एक झटके में मिल जाता हो, पर बाद में कुंडलिनी जागरण को स्थायी बनाने के लिए उसे योगसाधना के इसी क्रम से गुजरना पड़ता है। इसलिए कुंडलिनी जागरण हुआ हो या न हुआ हो, कुंडलिनी योग सभी को करते रहना चाहिए। जिन्हें नहीं हुआ हो, उन्हें जल्दी सफलता मिलती है, क्योंकि उन्हें उसका अहंकार नहीं होता और नए अनुभव को प्राप्त करने का शौक भी होता है। दुबारा से एक ही अनुभव को प्राप्त करने में इतनी रुचि नहीं होती, जितनी नए अनुभव को प्राप्त करने में होती है।

कुंडलिनी योग और शून्य आकाश~ आम मिथक का पर्दाफाश

कुंडलिनी तंत्र में चित्तवृत्तिनिरोध मूल धयेय न होने से यह पतंजलि योग से थोड़ा भिन्न प्रतीत होता है।

मित्रो, पतंजलि ने कहा है, योगश्चित्तवृत्ति निरोधः। इसका शाब्दिक अर्थ है,”योग चित्त या मन की लहरों या विचारों को रोकना है”। इसका मतलब है कि पतंजलि ने मन को शून्य करके,अर्थात विपासना से ही जागरण को प्राप्त किया होगा। उन्होंने अकस्मात कुंडलिनी जागरण प्राप्त नहीं किया होगा। हुआ क्या कि निरंतर के कुंडलिनी ध्यान से विपासना का काम होता रहा। पुराने विचार उभरने लगे और कुंडलिनी के आगे डिम पड़ने लगे। वे मिटते रहे और शून्य बढ़ता गया। पूर्ण शून्य होने पर अकस्मात मूलाधार से ऊर्जा के ऊपर चढ़ने से समाधि महसूस हुई। यही कुंडलिनी जागरण है। इसमें तांत्रिक यौनबल और अन्य तांत्रिक तरीकों की सहायता नहीं ली गई थी। मैंने यह एक पिछली पोस्ट में भी वर्णित किया है कि जब किसी भावनात्मक आघात से मन अचानक निर्विचार होकर शून्य सा हो जाता है, तब अचानक मूलाधार से ऊर्जा की नदी पीठ से होकर सहस्रार तक चढ़ती है। मेरे साथ भी पहली बार ऐसा ही हुआ था, जिसका वर्णन मैं पहले कर चुका हूँ। इसमें कुछ भी रहस्यात्मक या चमत्कारिक नहीं है। यह शुद्ध वैज्ञानिक घटना होती है। इसीलिए यह घटना धर्म-मर्यादा की सीमाओं से भी नहीं बंधी हुई होती। ऐसा किसी के साथ भी हो सकता है। जैसे बादल और धरती के बीच विभवांतर या ऊर्जा के अंतर के बढ़ने से बादलों से बिजली निकलकर जमीन पर गिरती है, वैसे ही मस्तिष्क या सहस्रार और मूलाधार के बीच होता है। जब तंत्रयोग से मूलाधार में ऊर्जा इकट्ठी हुई हो, और तभी किसी मानसिक सदमे या झटके से मस्तिष्क की ऊर्जा अचानक कम हो जाए, तो मूलाधार से बिजली सहस्रार को गिरती है। वह बिजली रीढ़ की हड्डी के केंद्र से होकर गुजरती है। इसे ही सुषुम्ना का जागरण या कुंडलिनी जागरण कहते हैं। वह मानसिक सदमा बेवफाई, धोखे, परेशानी, हताशा आदि किसी भी प्रकार से लग सकता है। वह ऊर्जा मन के विचार को जागृत कर देती है, अर्थात समाधि पैदा करती है। तो इसका मतलब यह हुआ कि कुंडलिनी योग प्रतिदिन करना चाहिए। क्या पता कब मानसिक सदमे वाली स्थिति पैदा हो जाए। इससे जागृति की संभावना तभी ज्यादा होगी, जब सारे चक्र विशेषकर मूलाधार चक्र ऊर्जावान होगा। साथ में, इससे सभी नाड़ियाँ भी खुली हुई रहेंगी, जिससे ऊर्जा का गमन आसान होगा। विशेष बात यह है कि कुंडलिनी को बनाया ही इसलिए होता है ताकि शून्य आसानी से प्राप्त हो जाए। होता क्या है कि अन्य सभी विचारों की बजाय कुंडलिनी ज्यादा प्रभावी होती है। इसका मतलब है कि कुंडलिनी सभी विचारों के साथ जुड़ी होती है। जैसे ही किसी मानसिक झटके से कुंडलिनी नष्ट होती है, वैसे ही उससे जुड़े हुए सभी विचार भी साथ में एकदम से नष्ट हो जाते हैं। यदि कुंडलिनी न हो, तो सभी अलग-2 सैंकड़ों विचारों को नष्ट करना लगभग असंभव के समान हो जाए। तभी तो कहते हैं कि जागृति उन्हीं को मिलती है, जिनकी कुंडलिनी सक्रिय होती है। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ था। मैं कई वर्षों से कुंडलिनी योग कर रहा था। फिर पुराने सहपाठियों से ऑनलाइन मुलाकात हुई। मैं बहुत खुश हुआ। फिर किन्हीं वजहों से मुझे अपने प्रति बेवफाई महसूस हुई जिससे मुझे अजीब सा मानसिक व भावनात्मक आघात लगा। वह आनन्द व शून्यता से भरा हुआ था। इतने वर्षों से क्रियाशील कुंडलिनी मुझे नष्ट होती हुई सी महसूस हुई। मैं शून्य, खाली और हल्का सा हो गया। मूलाधार और सहस्रार के बीच विभवांतर बहुत बढ़ गया क्योंकि मेरा मूलाधार कुंडलिनी योग से काफी सक्रिय बना हुआ था। एक ऊर्जा की चमकदार लकीर मुझे अपनी रीढ़ की हड्डी से चढ़ी हुई व सहस्रार से जुड़ी हुई महसूस हुई। वहाँ हल्की सी जागृति का आभास भी हुआ, पूर्ण नहीं। हालाँकि मैं उस समय आधी नींद में था, और उसी अर्धनिद्रा की अवस्था में मुझे रात को अपनी आंखों से भावनात्मक अश्रु भी महसूस होते रहे। क्षणिक आत्मज्ञान भी ऐसी ही शून्यता से प्राप्त हुआ था। पर मुझे दुनियादारी में रहने वाले के लिए यह शून्यत्व वाला तरीका ठीक नहीं लगता। इससे आदमी पलायनवादी सा बन जाता है। यह वैज्ञानिक तरीका भी नहीं लगता मुझे। शून्यत्व तो बहुत से लोग महसूस करते रहते हैं, पर समाधि बहुत विरले लोग ही महसूस कर पाते हैं। लोग नशे से भी शून्यत्व जैसी स्थिति प्राप्त करने की कोशिश करते हैं। मेरा जागृति का उपरोक्त पहला तरीका शून्यत्व जैसा लगता है लोगों को, पर वह भी पूरी तरह से शून्यत्व वाला नहीं था। वह भी हरफनमौला तांत्रिक वाला तरीका था। हालांकि वह दूसरी जागृति वाले तरीके से थोड़ा कम तांत्रिक था। जब भी मेरा झुकाव जागृति की तरफ होता था, या मुझे जागृति की याद आती थी, तो यहाँ तक कि अच्छे-खासे तथाकथित विद्वान लोग भी मुझे शून्यपरस्त सा समझकर मेरा मानसिक बहिष्कार जैसा कर देते थे, आम आदमी की बात तो छोड़ो। पता नहीं जागृति को लोग शून्यप्राप्त ही क्यों समझते हैं। ऐसा तंत्र विज्ञान की अनदेखी के कारण हुआ है। अब तो तंत्र विज्ञान लुप्तप्राय जैसा ही लगता है मुझे। तँत्रविज्ञान के मूल सिद्धांत के अनुसार तो जागृति और दुनियादारी, दोनों ही यथोचित गुणवत्ता से व यथोचित गति से एकसाथ दौड़ते हैं। यह कर्मयोग से काफी मिलता जुलता है।
पता नहीं मुझे अंतर्मन में क्यों लगता है कि शून्यत्व वाला कुंडलिनी तरीका कायरों के जैसा तरीका है। पता नहीं यह मुझे भिखारियों और लाचारों के जैसा तरीका क्यों लगता है। इसके लिए दूसरों के सहारे रहना पड़ता है। जब कोई भावनात्मक आघात देगा, तब जागृति होगी। जो भावनात्मक आघात दे, उसे उसके लिए धन्यवाद भी नहीं कर सकते। अजीब सा कंसेप्ट है।  हो सकता है कि मुझे ही ऐसा लगता हो, क्योंकि सबकी शरीर संरचना भिन्न होती है। ये मेरे अपने विचार हैं, और अपने पर अनुभव करके उठे हैं। मैं कोई सिद्धांत प्रस्तुत नहीं कर रहा हूँ। जब आदमी हर तरफ से पिटेगा, तभी शून्यत्व महसूस होगा, और जागृति होगी। किसीके द्वारा पिटने का मतलब किसीके द्वारा दिया जाने वाला भावनात्मक आघात ही है। दोनों में कोई अंतर नहीं है। बल्कि भावनात्मक आघात तो भौतिक पिटाई से भी बुरा है, क्योंकि उससे मन-आत्मा की गहराई तक पिटाई होती है। इसी पिटाई-सिद्धांत की वजह से तो यह कहावत प्रचलित हुई है, “जिसका कोई नहीं है, उसका भगवान है”। इस तरीके में आदमी अपने शरीर को भी अक्सर नुकसान पहुंचाता है। वह संतुलित आहार नहीं लेता, संतुलित जीवन नहीं जीता। वह शरीर का बहुत दमन करता है। यह इसीलिए ताकि भावनात्मक आघात का असर ज्यादा से ज्यादा हो, और वह ज्यादा से ज्यादा शून्य बने। क्योंकि यदि आदमी शक्तिमय जीवन से शक्ति हासिल करेगा, तो शून्यत्व से बचने के लिए इधर-उधर हाथ-पैर मारेगा। यह तरीका तो कोयले की खान से हीरा निकालने की तरह है। यही तरीका मुझे ज्यादातर प्रचलित दिखता है। मुझे लगता है कि यह तरीका विशेष परिस्थितियों में ही काम करता है, पर लोगों ने इसे सामान्य बना दिया है। वास्तव में यह ध्येय या साध्य है, पर लोगों ने इसे साधन बना दिया है। यह शून्य, साधना की चरमावस्था में खुद पैदा होता है, पर लोग इसे साधना किए बिना ही जानबूझकर पैदा करके करते हैं। वास्तव में यह एक आभासिक शून्य की तरह होता है, असली शून्य नहीं, पर लोग अपने लिए एक असली शून्य जैसा पैदा कर लेते हैं, घौंसले की तरह, रहने के लिए। यह प्रकाशमान, आनन्दमयी, चेतन और कुंडलिनी से भरे शून्य की तरह होता है, पर कई लोग इसे अंधकारमयी, दुखमयी, जड़ और कुंडलिनी से रहित शून्य समझकर इसका मजाक उड़ाते हैं। यह शून्य बहुत थोड़े समय के लिए टिकता है और जागृति पैदा करके नष्ट हो जाता है, पर लोग इसे लगातार बना कर रखते हुए अपने मस्तिष्क को औऱ अपनी इंद्रियों को जैसे लॉक रूम में जैसे बन्द कर देते हैं। अगर यह तरीका इतना कारगर होता, तो आज हर जगह जागृत लोग ही दिखते। पर आप को तो लैम्प लेके ढूंढने से भी बिरले ही मिलेंगे। दूसरे, वीरों और राजाओं वाले तांत्रिक कुंडलिनी तरीके वाले लोग भी विरले ही दिखते हैं मुझे। क्योंकि वे इसे ठीक ढंग से व खुल के नहीं करते। उनके मन में इस बारे संदेह रहता है। संदेहात्मा विनश्यति। इस तरीके में अपने आम रोजमर्रा के व्यावहारिक जीवन को नीचे नहीं गिराया जाता, बल्कि तांत्रिक शक्ति से कुंडलिनी को ही इतना ऊपर उठाया जाता है कि उसके सामने भरा-पूरा भौतिक जीवन शून्य जैसा हो जाता है। यह ऐसे ही होता है जैसे सूर्य के सामने दीपक की ज्यादा अहमियत नहीं होती। शून्य बनने की नौबत ही नहीं आती। कुंडलिनी-सूर्य को संसार-दीपक से ज्यादा चमकाने के लिए दो ही तरीके हैं। या तो संसार-दीपक को बुझा दो, या फिर कुंडलिनी-सूर्य को इतना अधिक चमका दो कि संसार-दीपक फीका पड़ जाए। इससे भौतिक व सामाजिक जीवन भी साथ में तरक्की करता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि शक्ति हरेक काम करती है, भौतिक भी और आध्यात्मिक भी। मैं अपनी बात बताऊँ, तो अपने प्राणोत्थान व कुंडलिनी जागरण के दौरान मैं सांसारिक रूप से काफी क्रियाशील था। मैं कुंडलिनी जागरण के लिए जंगल की किसी गुफा की तरफ नहीं भागा। मैं एक मशहूर योगी की बहुचर्चित कुंडलिनी सम्बन्धी किताब पढ़ रहा था। उसमें वे कहते हैं कि वे महानगर को छोड़कर हिमालय के सुनसान व भयानक जंगल में कई महीनों तक साधना करते रहे। अंत में उन्हें जाल बुनती हुई मकड़ी का स्पष्ट चित्र मन में दिखा। आंखें खोली तो बाहर भी हूबहू वही दृश्य था। फिर लिखते कि फिर वे साधना पूर्ण करके अपने घर आ गए। माना कि यह एकाग्रता की उच्च अवस्था है, पर साधना की पूर्णता में कुंडलिनी का और कुंडलिनी जागरण का कहीं जिक्र नहीं था, जिसके लिए वह पुस्तक मूलरूप में बनी थी। पता नहीं वह साधना की पूर्णता क्या थी? मन की आंखों से मकड़ी को जाला बुनते हुए देखने के लिए इतना ज्यादा संघर्ष? मैं यहाँ किसी की आलोचना नहीं कर रहा हूँ, बल्कि तथ्य सामने रख रहा हूँ। आध्यात्मिक विकास इसलिए भी रुकता है जब आदमी तथ्यों की छानबीन इस डर से नहीं करता कि कहीं यह किसी की आलोचना न बन जाए। इसी तरह एक अन्य महोदय अपनी प्रसिद्ध पुस्तक में लिखते हैं कि वे खंडहरनुमा अंधेरे कमरे में सुनसान अकेले में कुंडलिनी साधना करते थे। कई महीनों बाद उन्हें पीठ के आधार पर अंडे जैसे के फूटने और उससे प्रकाशमय तरल पीठ के बीचोंबीच ऊपर चढ़ता हुआ महसूस हुआ। इसी अनुभव के साथ वह कुंडलिनी पुस्तक समाप्त हो जाती है। हालाँकि ये हैरानी भरे अनुभव हैं, पर कुंडलिनी और कुंडलिनी जागरण का कुछ पता नहीं। मैं अपने कुंडलिनी जागरण की झलक के दौरान पूरी तरह से विकसित और सभ्य समाज के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहा था। मैं अपने सांसारिक कर्मों औऱ दायित्वों का निर्वहन पहले की तरह कर रहा था। अत्याधुनिक सुविधाओं का उपभोग कर रहा था। अत्याधुनिक गाड़ी में अत्याधुनिक मार्गों और स्थानों का सपरिवार भ्रमण-आनन्द ले रहा था। अत्याधुनिक बड़े पर्दे पर उच्च गुणवत्ता की फिल्में सपरिवार देखने अक्सर लॉन्ग ड्राइव पे चला जाता। प्राकृतिक और कृत्रिम, दोनों किस्म के नजारों का भरपूर लुत्फ उठाते हम लोग। और तो और, अंतरराष्ट्रीय कुंडलिनी फोरम पर पूरी तरह से सक्रिय था। अब इससे बढ़कर क्या दुनियादारी हो सकती है। मुझे रंगीन दुनिया से कभी अलगाव महसूस नहीं हुआ। साथ में ज्यादा लगाव भी महसूस नहीं हुआ। चमकदार दुनिया के साथ तांत्रिक शक्ति से कुंडलिनी को भी सबसे अधिक चमका भी रखा था। इससे सारा संसार पूरी तरह से चमकता हुआ भी अद्वैतकारी कुंडलिनी के आगे फीका ही रहता था। अद्वैत से सबकुछ एकजैसा लगता था। शायद ड्राइविंग का और भ्रमण का भी अद्वैत को पैदा करने में कुछ योगदान है। कुंडलिनी हर समय मस्तिष्क में रहती थी। ऐसा लगता था कि सबकुछ कुंडलिनी के अंदर है। इसका मतलब यह नहीं कि ऐसे भोगविलास से ही कुंडलिनी जागरण होता है। मैं तो बस उदाहरण दे रहा हूँ। आप शून्यत्व वाले पहले कुंडलिनी तरीके को नेगेटिव प्रेशर तरीका कह सकते हैं। इसका मतलब है कि इसमें शून्यत्व का वैक्यूम कुंडलिनी ऊर्जा को ऊपर की तरफ चूसता है। यह ऐसे ही है जैसे हम स्ट्रॉ से जूस चूसते हैं, या वैक्यूम कलीनर डस्ट को चूसता है। इसी तरह दूसरे वाले तांत्रिक कुंडलिनी तरीके को पॉजिटिव प्रैशर तरीका कह सकते हैं। इसका मतलब है कि इसमें तांत्रिक शक्तियों से कुंडलिनी को नीचे से ऊपर की तरफ बलपूर्वक पम्प किया जाता है। यह ऐसे ही है जैसे नदी के पानी को पहाड़ी की चोटी तक विद्युतचालित मोटर पम्प से चढ़ाया जाता है। कई लोग दोनों तरीकों का संतुलित इस्तेमाल करते हैं। वे मस्तिष्क में भी थोड़ा सा शून्य बनाते हैं, और तांत्रिक शक्ति से चालित कुंडलिनी पम्प से मूलाधार से भी कुंडलिनी ऊर्जा को ऊपर चढ़ाने के लिए अतिरिक्त बल प्रदान करते हैं। सम्भवतः मेरा कुंडलिनी जागरण की झलक प्रस्तुत करने वाला तरीका भी यही था। अद्वैत भाव से मेरे अंदर हल्का सा आभासिक शून्य बना होगा। इसीलिए इतनी आसानी से हो गया। बेशक यह कुंडलिनी जागरण की दस सेकंड की झलक थी, पर था तो कुंडलिनी जागरण ही। एक लीटर पानी और पांच लीटर पानी के बीच में तत्त्वतः कोई अंतर नहीं है। वह झलक इसलिए खत्म नहीं हुई कि मैं उसके योग्य नहीं था या मैं उसके लिए तरसता था। उस झलक को मैंने खुद जानबूझकर खत्म किया। ऐसा इसलिए क्योंकि मैं पारलौकिक आयाम में प्रविष्ट नहीं होना चाहता था। मैं अपने पिछले अनुभव से हताश हो गया था। आजकल इस आयाम का कोई सम्मान नहीं है। ऐसे आदमी को पागल व पलायनवादी समझा जाता है। ऐसे आदमी की वैज्ञानिक व प्रगतिशील सोच को भाँति-2 की अति रूढ़िवादी और अति भौतिकवादी धारणाओं से एकसाथ दबा दिया जाता है। ऐसी धारणाओं वाले लोग समझते हैं कि इसे अंधेरे बिल में सोते-2 ही जागरण प्राप्त हो गया। वे यह नहीं देख-समझ पाते कि इसे इसके लिए इसे बहुत से भौतिक संघर्ष करने पड़े हैं। इसे शून्य पद की उपाधि तब मिली है, जब इसने सबसे ज्यादा भौतिक व सामाजिक उपलब्धियां हासिल की हैं, और यह फिर से विकासवादी भौतिक जगत में प्रविष्ट होने के लिए तैयार है, पर जागृति के साथ। वास्तव में जागृति एक ऐसा पारलौकिक आयाम है, जो किसी को नहीं दिखता, सिर्फ शून्य ही नजर आता है। इसी तरह अधिकांश लोगों को यह पता ही नहीं होता कि जो कुंडलिनी आध्यात्मिक विकास के लिए जरूरी है, वही कुंडलिनी भौतिक विकास के लिए भी जरूरी है। यदि जागरण का आनन्द कुंडलिनी से मिलता है, तो भौतिक भोग-विलास भी कुंडलिनी की सहायता से ही उपलब्ध होता है। उन्हें कुंडलिनी महसूस तो होती रहती है, क्योंकि अपने अनुभव को कोई नहीं झुठला सकता। पर उन्हें उसके बारे में विस्तार से जानकारी नहीं होती। यह ऐसे ही होता है जैसे एक चीनी से अनजान आदमी उसकी मिठास तो अनुभव कर सकता है, पर उसे उसके बारे में विस्तार से पता नहीं होता, जैसे चीनी का रंग-रूप क्या है, यह कहाँ से आई, कैसे बनी, कैसे काम करती है, इसके क्या-2 फायदे हैं, और कहाँ-2 इस्तेमाल होती है। जागृति के बाद आदमी के अपने प्यारे लोग भी बेगाने हो जाते हैं। क्योंकि उसका रूपांतरण होता है। ऐसे आदमी की दिल की गहराई को कोई नहीं समझता। कई मामलों में तो जिगरी दोस्त भी जिगरी दुश्मन बन जाते हैं। ईश्वरीय शक्ति हाथ लगने से आदमी क्रांतिकारी कदम उठाता है। उसे हिंसक क्रांतिकारी तो नहीं कह सकते पर शांतिपूर्ण रेबेलियन या समाज सुधारक कह सकते हैं। पर आम आदमी उसे क्रांतिकारी ही समझते हैं, क्योंकि उनकी नजर ही वैसी होती है। रिवोल्यूशनिस्ट और रेबेलियन के बीच में जो अंतर ओशो ने बताए हैं, वे पढ़ने लायक हैं। इससे जान का ख़तरा हमेशा बना रहता है। मैंने खुद इन्हें पहली जागृति के बाद अनुभव किया है। इतना कुछ करने के बाद भी अगर अपने आदमी ही पराए हो जाएं, तो क्या फायदा। इसलिए इस दुनिया में खुलकर मजे करने चाहिए। जो जितना ज्यादा मूर्ख है, वह इस दुनिया में उतना ही ज्यादा सुखी है। रूपांतरण के झटकों से मूर्ख ही सुरक्षित रहता है। उसके सभी अपने हैं। अध्यात्म और भौतिकता का संतुलन ही सर्वोत्तम है। मध्यमार्ग ही सर्वोत्तम है। ये मेरे अपने विचार हैं, इसीलिए व्यक्तिगत ब्लॉग पर लिख रहा हूँ। यह कोई कथा-उपदेश सुनाने वाला ब्लॉग तो है नहीँ। मुझे लगता है कि नेगेटिव प्रेशर वाला कुंडलिनी तरीका उनके लिए है, जो कमजोर, बीमार, वृद्ध, ऊर्जाहीन और दुनियादारी से दूर हैं। पोजिटिव प्रेशर वाला कुंडलिनी साधना का तरीका उनके लिए है, जो ताकतवर, स्वस्थ, जवान, ऊर्जावान और दुनियादारी में डूबे हुए हैं।
असली और वैज्ञानिक तरीका तो कुंडलिनी ध्यान ही है। इसमें मूलाधार की ऊर्जा-नदी को ऊपर चढ़ाने के लिए विचारों की शून्यता का नहीँ, बल्कि विचारों (कुंडलिनी विचार/चित्र) की प्रचंडता का सहारा लिया जाता है। इसलिए यह मानवीय व प्रेम से भरा तरीका है। यह व्यवहारवादी व लौकिक तरीका है, जो सबके अनुकूल है। भौतिकवादी प्रकार के लोगों के लिए तो यह तरीका सर्वोत्तम ही है। दूसरी ओर, शून्यत्व वाला तरीका जँगली सा तरीका लगता है। मुझे तो लगता है कि सम्भवतः ऋषि पतंजलि के अष्टांग योग के इसी मूल सूत्र के गलतफहमी से भरे प्रचलन से ही हिंदुओं का स्वभाव पलायनवादी जैसा रहा होगा। हालाँकि दोनों ही तरीके कुंडलिनी चालित हैं, पर छोटा सा अहम अंतर है, जिसे लोग आसानी से नहीँ देख पाते। शून्यत्व वाले कुंडलिनी तरीके में कुंडलिनी से शून्यत्व पैदा किया जाता है। इसमें बहुत समय लग जाता है। इसमें तांत्रिक यौनबल का सहारा भी नहीं लिया जाता है। यह शुद्ध अष्टांगयोग वाला या राजयोग वाला तरीका है। तांत्रिक कुंडलिनी तरीके में कुंडलिनी को तांत्रिक यौनबल देकर इतना मजबूत कर दिया जाता है कि कुंडलिनी शून्यत्व को बाईपास करके सीधे ही मूलाधार की ऊर्जा-नदी को सहस्रार तक खींच लेती है। इसीलिए तांत्रिक कुंडलिनी जागरण हमेशा कुंडलिनी से शुरु होता हुआ अनुभव होता है। शून्यत्व वाला जागरण किसी भी विचार या चित्र से शुरु हो सकता है, हालांकि ज्यादातर कुंडलिनी से ही शुरु होता है, और ज्यादा भूमिका कुंडलिनी की ही होती है, क्योंकि उसका ध्यान करने की आदत होती है। तांत्रिक कुंडलिनी जागरण के दौरान तो आदमी दुनियादारी के मजे उड़ा रहा होता है, घूम-फिर रहा होता है। पर शून्यत्व वाले कुंडलिनी जागरण के दौरान वह दुनिया की नजरों में अकेले जैसा, निवृत्त जैसा, और अवसादग्रस्त जैसा होता है। एक सामाजिक प्राणी के लिए शून्यत्व पैदा करना आसान नहीं है। अगर पैदा हो गया, तो उसे बना कर रखना आसान नहीं है, क्योंकि ऐसा तो नहीं है कि शून्यत्व पैदा होते ही जागरण हो जाए। मुझे लगता है कि हिन्दू धर्म में जो भौतिक व बौद्धिक विकास की रप्तार कम हुई, उसके लिए कहीँ न कहीं यह शून्यत्व साधना भी जिम्मेदार है। पतंजलि के चित्तवृत्ति या मन के विचारों के रोधन से लोग यह मतलब लगाने लगे होंगे कि दिमाग का जितना कम प्रयोग करेंगे, उतनी ही जल्दी और बढ़िया जागृति होगी। पर वे पतंजलि के गूढ़ भाव को नहीं समझे होंगे, जिसके अनुसार कुंडलिनी साधना खुद शून्यत्व पैदा करती है, जानबूझकर दिमाग को बंधक बनाने की जरूरत नहीं। पतंजलि योग में यम-नियम आदि चित्त-विरोधी विधियों से दिमाग की बैकग्राउंड सीनरी की डार्कनेस को बढ़ाकर कुंडलिनी चित्र को चमकाने की कोशिश की जाती है। कुंडलिनी को अतिरिक्त ऊर्जा देने के लिए इसमें ऊर्जाघन पदार्थों जैसे कि तांत्रिक पंचमकारों के सेवन का प्रावधान नहीं है। जबकि कुंडलिनी योग में बैकग्राउंड सीनरी की चमक को बढ़ाकर कुंडलिनी को चमकाने के लिए अतिरिक्त ऊर्जा प्रदान की जाती है। साथ में, तांत्रिक तकनीकों से बैकग्राउंड सीन की चमक को भी कुंडलिनी के ऊपर स्थानांतरित किया जाता रहता है। इससे लौकिक ऐशोआराम भी दुष्प्रभावित नहीं होता। हालांकि यह एक वैश्विक सत्य है कि कुछ न होने से कुछ होना बेहतर है। मेरे कहने का मतलब है कि जिस किसी भी मानवीय तरीके से कुंडलिनी जागरण की संभावना हो, उसे झटक लेना चाहिए।

कुंडलिनी तंत्र को उजागर करती लोकप्रिय फिल्म बाहुबली

दोस्तो, मैं एक पिछली पोस्ट में बता रहा था कि कुंडलिनी-पुरुष को अभिव्यक्त करने के लिए ही महामानव को कल्पित किया जाता है। हनुमानजी ने भी एकबार पुराने जमाने के रॉकेट मैन की तरह ही वीरता से भरा कलाकौशल दिखाया था। लंका में जब उनकी पूँछ में लपेटे गए तेल से चुपड़े कपड़े में आग लगाई जाती है, तो वे रॉकेट मैन की तरह उड़ने लगते हैं, और पूरी लंका को आग लगाकर भस्म कर देते हैं। जो यथार्थ आजके महामानव से जुड़ा है, वही पुराने समय के महामानव के साथ भी जुड़ा है। अंतर यही है कि पुराने जमाने के ऋषि जानबूझकर कुंडलिनी-पुरुष को भौतिक अभिव्यक्ति देते थे, पर आजकल के बुद्धिजीवियों से अनजाने में ही आंतरिक प्रेरणा से ऐसा हो रहा है। मैंने अपने कुंडलिनी जागरण के आसपास बड़े और अत्याधुनिक पर्दे पर बाहुबली फ़िल्म सपरिवार देखी थी। हो सकता है कि उसका भी मेरी जागृति में हाथ हो। उस तमिल मूल की हिन्दी में अनुवादित फिल्म में बाहुबली नामक काल्पनिक महामानव का ही बोलबाला था। बाहुबली का शाब्दिक अर्थ है, ‘ऐसा व्यक्ति जिसकी भुजाओं में बहुत बल हो’। वह अपने कन्धे पर सैकड़ों किलो वजन के पत्थर के शिवलिंग को लेके चलता, अकेले ही शत्रुओं की पूरी सेना को पलभर में ही परास्त करता, और नौका को दिव्य विमान की तरह उड़ाकर उस पर अपनी प्रेमिका राजकुमारी से रोमांस करता। उस फिल्म में भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों काल नजर आते थे। विचित्र सी भव्यता थी उसमें, जिसे बहुत पुरानी भी कह सकते हैं, और बहुत नई भी। उसमें एनिमेशन तकनीक, वास्तविक दृश्य और जीवंत अभिनय, तीनों का मिश्रण लाजवाब था। गीत-संगीत भी आत्मा की गहराई को छूता हुआ नजर आता था। एक रोमांटिक गाने की शुरुआत तब होती है जब बाहुबली पानी में खड़ा होकर अपनी दोनों बाजुओं का पुल बनाकर उसके ऊपर से देवसेना को गुजार कर एक बड़ी सी सुंदर किश्ती में बैठाता है। इस दृश्य में कुंडलिनी तंत्र का यह पहला उपदेश छिपा है कि तंत्र में पुरुष और स्त्री बराबर का स्थान रखते हैं, और स्त्री को देवी और गुरु के रूप में पूजनीय भी माना जाता है। बाहुबली और देवसेना का रोमांस एक उड़ती हुई नौका पर दिखाया गया है। दरअसल वह पालों वाली नौका थी जो पानी पर तैर रही थी। सुंदर तटीय पहाड़ियों के बीच से गुजरती हुई वह नौका गहरे समुद्र में पहुंच जाती है। इसका मतलब है कि दोनों का विवाहोपरांत रोमांस हल्के-फुल्के पर्यटन से शुरु होकर दुनियादारी की गहरी जिम्मेदारियों के बीच में पहुंच जाता है। वहाँ बड़े-2 तूफानों से उनकी नौका डगमगाने लगती है। इसका मतलब है कि सांसारिक उलझनों और समस्याओं से उनके प्यार का आधार उनका मनुष्य जीवन संकटग्रस्त होने लगता है। फिर देवसेना आकर्षक मुस्कान के साथ बाहुबली को कुछ गूढ़ इशारा करते हुए अपने हाथ से गुलाबी रंग छोड़ती है, जो पूरे पानी को गुलाबी कर देता है। इसमें गहरा अर्थ छिपा है। मैंने शिव-पार्वती की प्रेम-लीलाओं से सम्बंधित पिछली पोस्ट में भी बताया था कि जब तक आदमी संसारसागर में बुरी तरह से नहीं फंस जाता, तब तक वह उससे बाहर निकलने का प्रयास नहीं करता। गुलाबी रंग वास्तव में स्त्री-प्रेम का प्रतीक है। वह पानी में फैलता है, मतलब संसार से होकर ही स्त्री-प्रेम उसके पात्र तक पहुंच सकता है, संसार से भागकर नहीं। समुद्र और उसका जल यहाँ संसार का प्रतीक है। दूसरा तँत्रसम्मत अर्थ इससे यह निकलता है कि स्त्री ही तंत्र का प्रारंभ करने वाली तँत्रगुरु होती है। उससे प्रेरित बाहुबली भी जोश के साथ अपने हृदय व हाथों से नीला रंग छोड़ता है, जो चारों ओर फैल जाता है। नीला रंग पुरुष-प्रेम का प्रतीक है। ये दोनों रँग आपस में मिल जाते हैं। इसका मतलब कि दोनों का प्रेम (कुंडलिनी) एकदूसरे से और चारों ओर हर चीज से घुल मिल जाता है।  फिर उससे उमंग से भरा बाहुबली उस नौका के स्टीयरिंग को घुमाता हुआ फ्लाईंग गियर लगाता है, जिससे उसके पाल पंख बन जाते हैं, और नौका बादलों के बीच उड़ने लगती है। फ्लाईंग गियर का मतलब यहाँ तांत्रिक योग, और उससे कुंडलिनी का हृदय चक्र से ऊपर उठकर आज्ञा चक्र की तरफ जाना है। उस पर गाने-बजाने वाली और सेवा-शुश्रुषा करने वाली लोगों की पूरी महफिल भी साथ होती है। इसका मतलब है कि कुंडलिनी से आकर्षित होकर सभी लोग कुंडलिनी योगी के सहयोगी बन जाते हैं। इसका यह मतलब भी है कि सभी प्राण कुंडलिनी के साथ होते हैं। ये सभी सुविधाएं प्राणों की प्रतीक भी हैं। बादलों को घोड़ों के आकार में दौड़ते हुए व हिनहिनाते हुए दिखाया गया है। ये दरअसल इन्द्रियाँ हैं, जो तांत्रिक कुंडलिनी शक्ति से अपनी क्रियाशीलता के चरम पर होती हैं। सारस जैसे सफेद पंछियों के झुंड उड़ते व चहकते दिखाए जाते हैं। ये भी उमंग से भरे हुए मन के प्रतीक हैं। मन या जीवात्मा को पंछी की संज्ञा भी दी जाती है। वैसे भी शास्त्रों में इंद्रियों को घोड़ों के रूप में दर्शाया गया है। आसमान को तलाब की तरह दिखा कर उसमें उगे कमल पुष्पों के झुंड दिखाए गए हैं। साथ में चन्द्रमा भी एक सुंदर जमीनी वस्तु की तरह दिखता है, जिस पर भी फूल उगने लगते हैं। बादल उनकी नौका पर स्तंभों, सीढ़ियों आदि से सुंदर आकृतियों में लिपटने लगते हैं। इसका मतलब है कि कुंडलिनी या मन के सहस्रार चक्र में प्रविष्ट होने के बाद सभी जमीनी वस्तुएं औऱ जमीनी भाव दिव्य लगने लगते हैं। जमीन और आसमान एक हो जाते हैं। मूलाधार और सहस्रार एक हो जाते हैं। बादल भी इसका प्रतीक है, क्योंकि उसमें जमीन (पानी) और आसमान (हवा) दोनों के अंश होते हैं। इसीलिए बादल मनभावन लगते हैं। मन अद्वैत भाव से भर जाता है। सबकुछ एक जैसा और आनन्द से भरा हुआ लगता है।  यह तांत्रिक कुंडलिनी रोमांच ही है, जिसे इस तरह आसमानी बगीचे में उड़ती नौका के रूप में दिखाया गया है। नहीं तो मन के कुंडलिनी आनन्द को कोई कैसे दिखाए। बाहुबली और देवसेना साधारण रोमांस को कुंडलिनी रोमांस में बदल देते हैं, जिससे उनकी कुंडलिनी सहस्रार चक्र में पहुंच जाती है। इसे ही बादलों की ऊंचाई में उड़ना दिखाया गया है। पेड़ के इर्दगिर्द सिमटा रोमांस क्या रोमांस होता है? फिल्म निर्माता की दार्शनिक कल्पना शक्ति को दाद देनी पड़ेगी। इन उपरोक्त दृष्यों वाले मात्र एक गाने में ही पूरा तंत्र दर्शन सिमटा हुआ प्रतीत होता है। सम्भव है कि मेरे अवचेतन मन पर बाहुबली फिल्म की छाप पड़ी हो, और अनजाने में ही कुंडलिनी योग की तरफ मेरा आकर्षण बढ़ा हो। और ये तो अधिकांश विद्वान मानते ही हैं कि महामानव और कुछ नहीं, कुंडलिनी-मानव ही है। वैसे मैं यहाँ फ़िल्म की समीक्षा नहीं कर रहा हूँ, प्रकरणवश लिख रहा हूँ।

कुंडलिनी चिंतन ~ गुप्त रहस्य जो अक्सर नजरअंदाज किए जाते हैं

इस पोस्ट में मुख्यतः शिवबिन्दु-ध्यान, स्नान-ध्यान, विपासना से कुंडलिनी बेहतर, कुंडलिनी जागरण की  गोपनीयता, सर्वोत्तम जागृति, मूलाधार में कुण्डलिनी निवास, प्राण-ऊर्जा संचरण का अनुभव, असली याद, हठयोग राजयोग के सहयोगी के रूप में, साँस रोकना, सुषुम्ना में ऊर्जा-संचरण, तांत्रिक शब्दों की गोपनीयता, व महामानव का वर्णन है।

दोस्तो, पिछले हफ्ते मुझे कुछ राईटर ब्लॉक महसूस हुआ। कुछ लिखने को मन नहीं किया। थोड़ा-बहुत लिख पाया, तो उसे पोस्ट के रूप में संकलित नहीं कर पाया। इस पोस्ट में वे मन में बिखरे अनुभवात्मक विचार इकट्ठे हुए। फिर सभी रहस्यात्मक विचारों के कीवर्ड्स को मिलाकर एक सबटाइटल बनाया।

जब मन में आई कुंडलिनी को शिवबिन्दु का रूप दिया जाता है तब पीठ से चढ़ती ऊर्जा के अनुभव के साथ आज्ञा चक्र पर खुद ही संकुचन बनता है। इससे मस्तिष्क में कुंडलिनी सीधी होकर सहस्रार से आज्ञा चक्र तक सीधी रेखा में फैल जाती है। हमारी इतनी छोटी औकात है कि हम शिव के बिंदु का ही चिंतन कर सकते हैं, अन्य कुछ नहीं। शिव तो बहुत दूर हैं। वो सबसे बड़े हैं। वो साक्षात पूर्ण ब्रह्म हैं। शिव बिंदु ही हमें शिव तक ले जाएगा।

बाहर से सभी शिव की नकल करना चाहते हैं पर अंदर से कोई नहीं करता। वे अंदर से कुंडलिनी के ध्यान में मग्न रहते हैं। इसलिए उनकी असली नकल तभी होगी जब किसी का ध्यान होता रहेगा, बेशक उन्हीके रूप की कुंडलिनी का। 

नहाते समय ऊर्जा की गश या थ्रिल बड़ी अच्छी अनुभव होती है। यह मस्तिष्क में बड़ी अच्छी महसूस होती है। इससे ताजगी और माइंडफुलनेस का एहसास होता है। इसीलिए रोज नहाने की सलाह दी जाती है, और नहाते समय मंत्रोच्चार के लिए बोला जाता है, ताकि मन में कुंडलिनी प्रभावी रहे, और ऊर्जा का लाभ कुंडलिनी को मिल सके। शायद यह थ्रिल तभी ज्यादा और अनुभव लायक होती है, अगर प्रतिदिन योग अभ्यास किया जाता रहे। योगाभ्यास के समय बेशक ऊर्जा की थरथराहट महसूस न होए, पर इससे ऊर्जा ढंग से एलाइन हो जाती है, जिससे दिन में कभी भी उपयुक्त माहौल मिलने पर एनर्जी सर्ज महसूस हो सकती है, जैसे कि नहाते समय। यही वजह है कि शौच और स्नान के बाद योग करना अधिक प्रभावशाली माना जाता है।

विपासना से मन के विचारों की शक्ति बनी रहती है। जिन विचारों के प्रति साक्षीभाव रखा जाता है, वे तो कुछ समय के लिए दब जाते हैं, पर साक्षीविचार का भाव हटते ही वही या दूसरे विचार दुगुनी शक्ति से कौंधते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हमने विचारों को तो कुंद कर दिया होता है, पर विचारों की शक्ति कम होने की बजाय बढ़ती है। वह इसलिए क्योंकि विचारों की शक्ति खर्च होने पर रोक लगती है। साथ में एक विशेष चित्र भी मन में नहीं बनाया होता है, जो लगातार फालतू विचारों की शक्ति को सोखता रहे। इसके विपरीत, कुंडलिनी ध्यान में विचारों की शक्ति पर रोक नहीं लगती, पर उसे विचारों से हटा कर कुंडलिनी पर लगाया जाता है। इससे लंबे समय तक विचारों से छुटकारा मिलता है। यदि विचार आने भी लगे तो उनकी शक्ति कुंडलिनी को लगती है, और वे शांत हो जाते हैं, क्योंकि हमें वैसा करने की आदत होती है। कुंडलिनी के साथ विपासना से तो ऐसा ज्यादा होता है, क्योंकि दो प्रकार से एकसाथ साधना होती है। पर कुंडलिनी के बिना विपासना तो बहुत कमजोर और अस्थायी तरीका प्रतीत होता है। इसीलिए कुंडलिनी को अध्यात्म का मूलभूत आधार कहते हैं।

मैं बता रहा था कि वह जागृति सर्वोत्तम है जो कुंडलिनी से शुरु हो। इसकी एक और वजह है। इससे कुंडलनी योग पूरी तरह वैज्ञानिक बन जाता है, और अपने नियंत्रण में आ जाता है। आदमी को पता लग जाता है कि हम अपने प्रयासों से भी जागृति प्राप्त कर सकते हैं, केवल संयोग से ही नहीं। इससे आदमी औरों को भी यह तरीका सिखा सकता है, जिससे बड़े पैमाने पर जागृति संभव हो सकती है। दुर्लभता से होने वाले संयोग से तो सभी को जागृति नहीं मिल सकती न। संयोग से होने वाली जागृति तो बिना प्रयास के ही होती है ज्यादातर। अगर प्रयास हो भी तो वह सामान्य व हल्का प्रयास होता है, जैसे कि अद्वैत व अनासक्ति से भरा हुआ जीवन, व अन्य आध्यात्मिक क्रियाकलाप। वह प्रयास कुंडलनी योग जैसा वैज्ञानिक, मजबूत व समर्पित प्रयास  नहीं होता। जिसको संयोगवश जागरण मिला हो, वह खुद भी उसे अपने प्रयास से दुबारा प्राप्त करना नहीं जानता, औरों को क्या समझाएगा। बेशक जिसने कुंडलनी योग के प्रयास से खुद कुंडलिनी जागरण प्राप्त किया हो, वह उस प्रयास से उसे दुबारा प्राप्त करने के बारे में कई बार सोचेगा, क्योंकि इसमें सुनियोजित ढंग से बहुत मेहनत करनी पड़ती है। पर कम से कम उसे तरीके का तो पता है, जिससे वह औरों का खासकर होनहार, जिज्ञासु, और शक्तिपूर्ण प्रकार के सुयोग्य लोगों का मार्गदर्शन कर सकता है।

अद्वैत के साथ लौकिक कर्मों से मूलाधार क्रियाशील होता है। यह इसलिए होता है क्योंकि अद्वैत से मन में जो कुंडलिनी बनती है, उसके लिए मूलाधार से एनर्जी की सप्लाई शुरु हो जाती है, क्योंकि वह कुंडलिनी के लिए जरूरी होती है। कुंडलिनी के इलावा जो भी मस्तिष्क के काम हैं उनके लिए तो मस्तिष्क की अपनी ऊर्जा बहुत होती है, मूलाधार की अतिरिक्त ऊर्जा की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसीलिए तो कहा जाता है कि कुंडलिनी मूलाधार चक्र में निवास करती है। द्वैतवादियों का मूलाधार इसीलिए सक्रिय नहीं होता, क्योंकि उनमें कुंडलिनी ही नहीं होती, अगर पिछले जन्म के प्रभाव से होती है तो बहुत कमजोर या नाममात्र की।

पीठ से मस्तिष्क को जाती हुई गश या थ्रिल हमेशा महसूस नहीं होती। जब मस्तिष्क को ऊर्जा की ज्यादा जरूरत हो, तभी महसूस होती है। मेरा आजकल रूपांतरण का दौर चल रहा है। इस दौर में मस्तिष्क में नए न्यूरोनल कनेक्शन बनते हैं और पुराने टूटते हैं। मतलब पिछ्ली यादें मिटती हैं, और नई बनती हैं। इसके लिए मस्तिष्क को बहुत ऊर्जा चाहिए होती है। जब मेरे अंदर पुराना जीवन हावी होने लगता है, तब यह थ्रिल बड़ी जोरदार व आनन्द वाली महसूस होती है। एक बच्चे की तरह एकदम ताजगी और नयापन सा महसूस होता है। पर आप योगा करते रहिए, क्योंकि बिना महसूस हुए भी योग से ऊर्जा ऊपर चढ़ती रहती है। आपके ऊपर भी जब कभी भावनाओं का दबाव ज्यादा होगा, तब यह थ्रिल महसूस होगा। रचनात्मक या नया काम होगा, तो भी एनर्जी थ्रिल बढ़ेगा। कुंडलनी साधना को शक्ति साधना के साथ जोड़कर करना चाहिए। तभी दोनों सहस्रार में एकसाथ जुड़ पाते हैं, अन्यथा शंका है।

योग करते हुए यदि कोई क्रिएटिव विचार आए तो उसे मन में ही रहने दो, उसे  नोट करने या एनालाइज करने न लगो, इससे कुंडलनी ऊर्जा की गति में बाधा पहुंच सकती है। पर यदि क्रिएटिव विचार बहुत जरूरी हो, और आप उसे बाद में भूल सकते हो, तो नोट कर भी सकते हो।

यह जो कुंडलिनी को छिपाने की प्रथा थी, वह मुझे असफल लोगों द्वारा अपनी शर्मिंदगी से बचने के लिए बढ़ाई गई लगती हैl हर किसी को अपना अहंकार प्यारा होता है। यदि कोई महान साधक या गुरु कुण्डलिनी जागरण न प्राप्त कर पाए, पर उसका एक निम्न और दुश्मन पड़ौसी कर दे, तो उसके लिए शर्म के कारण सच्चाई को बर्दाश्त करना मुश्किल तो होगा ही न। दूसरी वजह यह भी रही होगी कि कहीं तथाकथित निम्न बिरादरी के आदमी को सम्मान या श्रेय न देना पड़ जाए। क्योंकि यदि ऐसे तथाकथित नीच की कुंडलिनी जागृत हो जाए, तो सामाजिक दबाव के आगे झुकते हुए उसे अपेक्षित सम्मान व श्रेय देना पड़ेगा। इसलिए तथाकथित विद्वान वर्ग ने समाज में यह भ्रम फैला दिया होगा कि अपने कुंडलिनी जागरण को किसीके सामने प्रकट नहीं करना चाहिए, ताकि न बांस रहे और न ही बजे बाँसुरी।

जब साँस रोककर योगासन करते हैं तो शरीर की खुद ही ऊर्जा को घुमाने की इंस्टिंक्ट शुरु हो जाती है ताकि पूरे शरीर को ऑक्सीजन पर्याप्त मिल सके। हाँ, यह भी एक वजह है। दूसरी वजह मैंने पहले भी बताई थी कि साँस भरकर रोकने से ऊर्जा की गति की दिशा खुद ही ऊपर की तरफ रहती है।

जागरण और कुंडलिनी जागरण में कोई अंतर नहीं है। दोनों में पूर्ण आत्मा की अनुभूति होती है। कुंडलिनी जागरण में वह अनुभूति कुंडलिनी के माध्यम से कुंडलिनी से शुरु होती है। दूसरे किस्म का जागरण विपासना से, सदमे से आदि से हो सकता है। यह मुश्किल होता है। क्योंकि मन को शून्य करना पड़ता है। कुंडलिनी वाला जागरण आसान होता है, क्योंकि इसमें मन को शून्य करने की जरूरत नहीं होती। इसमें कुंडलिनी को ही इतना मजबूत बना दिया जाता है कि वह आत्मा के साथ जुड़कर उसे प्रकट कर देती है। वैसे भी दुनिया में रहकर कुंडलिनी वाला तरीका ही सर्वोत्तम है, क्योंकि दुनिया में आदमी का झुकाव प्रवृत्ति की तरफ ही तो होता है, निवृत्ति की तरफ नहीं।

संस्कृत पुराणों के हिंदी अनुवाद में निजी या अंतरंग ज्ञान छुपाया होता है। इसका मतलब है कि संस्कृत भाषा ज्यादा परिपक्व है। संस्कृत में स्पष्ट रूप से रेताः लिखा है शिवपुराण में, जिसे हिंदी अनुवाद में कामवासना लिखा गया है। वैसे इसका मतलब वीर्य होता है। रेताश्चतुर्बिंदु:, मतलब वीर्य की 4 बूंदें। आजकल हरेक किस्म का ज्ञान इंटरनेट पर उपलब्ध है। इसलिए कुण्डलिनी ज्ञान को भी गुप्त रखने की जरूरत नहीं है। यदि इसको गुप्त रखा गया, तो लोग इधर-उधर का भड़काऊ ज्ञान इकट्ठा करते हुए अपना नुकसान ही करेंगे।

लोग बोलते हैं कि पुरानी याद सताती है। दरअसल वह ऊपर-ऊपर की होती है। वह असली याद नहीं होती। यह बाहर-बाहर की व आसक्तिपूर्ण याद होती है। असली याद तो भावों की होती है। उसमें आसक्ति नहीं होती। यह गहन चिंतन के अभ्यास या ध्यान योग के अभ्यास से उत्पन्न होती है।

राजयोग के बिना हठयोग बहुत कम प्रभावी है। पहले मन में कुण्डलिनी राजयोग या साधारण ध्यान से परिपक्व हो जाए, तभी उसको अतिरिक्त बल देने के लिए हठयोग की जरूरत पड़ेगी। यदि पहले से कुण्डलिनी नहीं होगी, तो हठयोग से कुण्डलिनी केवल सतही रूप में ही अभिव्यक्त हो पाएगी, उसे अतिरिक्त बल नहीं मिल पाएगा। जागरण तो ध्यान चित्र का ही होता है। उच्चतम ध्यान को ही जागरण कहते हैं। इसे कुंडलिनी नाम इसको यौन ऊर्जा से जोड़ने से मिला है। यौन ऊर्जा मूलाधार चक्र में रहती है। यह ऊर्जा वहीँ उत्पन्न होकर वहीं पर नष्ट भी होती रहती है। इसीको नागिन के द्वारा अपनी पूंछ को मुंह में दबाना कहते हैं। मतलब कि नागिन की पूंछ से उत्पन्न ऊर्जा (वज्रशिखा पर उत्पन्न सूक्ष्म बिंदु-ऊर्जा) चलकर उसके मुंह में पहुंचती है, जिसको वह पूँछ के पास ही उगल भी देती है। यह वीर्य उत्सर्जन की तरह है। यह नागिन एक नाड़ी है जो अढ़ाई चक्कर पूरे करके कुंडली सी लगाई होती है। यह अढाई चक्कर का रहस्य जब पूरा और ढंग से समझ लूँगा, तब आपको बताऊंगा। वैसे जब आगे के और पीछे के स्वाधिष्ठान चक्रों को जोड़ने वाले घेरे का ध्यान साथ में किया जाता है, तो कुंडलिनी ऊर्जा सुषुम्ना में ज्यादा अच्छी तरह से चढ़ती है। यह अढ़ाई का फेर भी समझ ही लूंगा। इसीलिए इसमें बह रही ऊर्जा और ध्यान चित्र के मेल को ही कुंडलिनी कहते हैं। कुंडलिनी बनने से नागिन की कुण्डलिनी खुलकर वह ऊपर की ओर खड़ी होने लगती है। मतलब टॉप (मस्तिष्क) और बॉटम (मूलाधार) एक हो जाते हैं। इसका अर्थ है, प्राण ऊर्जा को मूलाधार से ऊपर सुषुम्ना के रास्ते से सहस्रार तक ले जाना। यह एक प्रकार से बिंदु संरक्षण ही है।

मानव मस्तिष्क के ऊपर चेतना विकास का भौतिक माध्यम कुछ नहीं है। फिर तो आत्मा ही है, अनंत चेतना का भंडार। ये जो फिल्मों, उपन्यासों या कॉमिक्स में महामानव दिखाए जाते हैं, ये दरअसल कुंडलिनीजागरण से युक्त व्यक्ति के ही भौतिक विकल्प हैं। क्योंकि कुंडलिनी शक्ति को भौतिक रूप में अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता, इसलिए ऐसे महामानवों को कल्पित करना पड़ता है। ऐसा आज ही नहीं, पहले भी होता था। उदाहरण के लिए, हनुमान, नारद, भीम जैसे पौराणिक चरित्र कुंडलिनी-महामानव का भौतिक अभिव्यक्तिकरण ही तो है।

यह जो आता है कि प्राण ऊर्जा के सुषुम्ना में चलने के समय ही कुंडलिनी जागरण होता है, यह सही है। उसमें प्राण से बायाँ और दायाँ मस्तिष्क, दोनों बराबर सक्रिय हो जाते हैं। बाएँ मस्तिष्क से सांसारिक कर्म  होते हैं, और दाएं से शून्य पर नजर रहती है। दोनों के योग से शक्तिशाली अद्वैत पैदा होता है। उससे कुंडलिनी तेजी से अभिव्यक्त होती है। सुषुम्ना में तो बीच-बीच में प्राण चलता ही रहता है। उससे अद्वैत व कुण्डलिनी का आभास होता रहता है। जागरण तो तभी होता है जब इसे साथ में तांत्रिक यौनबल भी मिलता है। इसमें पूरा मस्तिष्क एकसमान कम्पायमान हो जाता है।

कई लोगों को कुंडलिनी ऊर्जा शरीर में इधर-उधर अटकी हुई महसूस होती है, जैसे कि कंधों में आदि में। इससे उन्हें बेचैनी महसूस होती है। दरअसल यह पीठ में इड़ा या पिंगला नाड़ी से ऊर्जा के चढ़ने से होता है। बाएँ भाग व बाएँ कंधे से इड़ा और दाएँ कंधे से पिंगला गुजरती है। ऊर्जा को नहीँ छेड़ना चाहिए। जहाँ जाती हो, वहाँ जाने दो। यह ऊर्जा की कमी से जूझ रहे भाग की ऊर्जा की जरूरत पूरी करके फिर से केंद्रीय नाड़ी में आकर घूमने लगती है। इसमें जल्दी लाने के लिए आज्ञा चक्र, तालु से जीभ के स्पर्श, स्वाधिष्ठान चक्र और मूलाधार संकुचन का एकसाथ ध्यान करना चाहिए या इनमें से जितने बिंदुओं का हो सके, ध्यान करते रहना चाहिए। एक बिंदु से दूसरे बिंदु को भी ध्यान स्थानांतरित करते रह सकते हैं, सुविधा के अनुसार। दरअसल ये पॉइंटस कुंडलिनी के मार्ग के रूप में सीधी रेखा बनाने के लिए एक फुट रूलर का काम करते हैं। साथ में, कुंडलिनी ऊर्जा पर भी ध्यान बना रहना चाहिए। घूमती हुई कुंडलिनी ऊर्जा ही अच्छी होती है, एक जगह पर खड़ी नहीं।

यह जो योग से वजन घटता है, उसकी मुख्य वजह कुंडलिनी ध्यान ही है, न कि भौतिक व्यायाम। टाँगों आदि को मोड़कर रखने से तो बहुत कम ऊर्जा खर्च होती है। चक्र पर कुंडलिनी ध्यान से पैदा हुई मांसपेशियों की सिकुड़न से ही शरीर की अतिरिक्त जमा चर्बी घुलती है, जिससे वजन घटता है। अभ्यास हो जाने पर तो यह कुंडलिनी सिकुड़न दिनभर बनने लगती है।

गले मिलने से जो प्यार बढ़ता है, वह एकदूसरे के साथ अपनी-2 कुंडलिनी के साझा होने से ही बढ़ता है। सभीको अपनी कुण्डलिनी ही सबसे प्यारी होती है। जब कोई किसी के नजदीकी संपर्क में आता है, तो एक अधूरे यब-युम की तरह काल्पनिक पोज बन जाता है, जिसमें कुण्डलिनी एक शरीर से चढ़ती है, और दूसरे शरीर से उतरती है। इस तरह से दोनों शरीरों को कवर करते हुए एक कुण्डलिनी ऊर्जा लूप जैसा बन जाता है। ऐसा ही देवपूजा, सूर्यपूजा आदि के समय भी होता है।

कुन्डलिनी योग में दाढ़ी-मूँछ की भूमिका~ एक आध्यात्मिक हास्यात्मक व्यंग्य

Laughing Buddha

मैं एक पिछली पोस्ट में बता रहा था कि जब मेरी कुन्डलिनी शक्ति जागरण के लिए मूलाधार से ऊपर उठी, उस समय वहाँ महिलाओँ का समूह सामारोहिक नाच गाना कर रहा था। एक महीने से चले आ रहे तीव्र कुन्डलिनी योगाभ्यास से मेरी मध्यम आकार की दाढ़ी उग आई थी। काले बालों के झुंड में उगे कुछेक सफेद बाल दुनिया की भीड़ में साधु पुरुष जैसे भले जान पड़ते थे। इसलिए कई औरतें मुझे भोलेपन, प्यार व अचम्भे से निहार रही थीं। वहाँ पर बढ़ी हुई और मैचिंग दाढ़ी वाले कुछ दूसरे लोग भी थे, जो मुझे विशेष प्यार, आदर और अपनापन दे रहे थे। इससे जाहिर होता है कि दाढ़ी वाले लोग ही असली दाढ़ी की पहचान रखते हैं। हीरे को कौन पहचाने, जौहरी। इसमें हंसने वाली कोई बात नहीं, क्योंकि यह जोक नहीं सच्चाई है। वैसे भी औरतें बढ़ी हुई दाढ़ी से बड़ी प्रभावित और आकर्षित होती हैं। यदि उसके साथ कुन्डलिनी योगाभ्यास भी जुड़ा हो और वह भी तांत्रिक प्रकार का, तब तो कहने ही क्या। इससे भी मेरी सुषुप्त कुन्डलिनी शक्ति को जागने के लिए पर्याप्त बल मिला। असली दाढ़ी वही होती है जो साधना के प्रभाव से खुद उग आए, जिसे उगा के न करना पड़े, और जिसे फैशनेबल बनाने के लिए ज्यादा सौंदर्य प्रसाधन भी न लगाना पड़े। साधना के बल से आंखों में ऐसी चमक पैदा हो जाती है कि बाकि सभी सौंदर्य प्रसाधन उसके आगे फीके पड़ने लगते हैं। दिल में इतना नूर छा जाता है कि चेहरे के नूर पर ध्यान देने का मन ही नहीं करता। बार-बार चेहरे के नकली नूर की तरफ ध्यान न जाए, इसके लिए ही तो आदमी की दाढ़ी अपने आप बढ़ने लगती है। कुछ करने की जरूरत ही नहीं पड़ती। कई लोग ज्यादा आकर्षक बनने के लिए और खासकर महिलाओं को आकर्षित करने के लिए जानबूझ कर दाढ़ी बढ़ाते हैं। साधना का तो वे नाम भी नहीं जानते। कुछ महिलाएं ऊपर ऊपर से तो उनसे आकर्षित होती हैं, पर दिल से उनसे प्रभावित नहीँ होती। पर जो महिला गहरी नजर और साधना का शौक रखती हो, वह तो उससे बेहतर क्लीन शेव आदमी को समझती है। क्योंकि क्लीनशेव पुरुष कम से कम धोखा तो नहीं कर रहा होता है, और बेचारा कम से कम नकली नूर से ही तो काम चला रहा होता है। ये जो कहते हैं न कि समथिंग इज बैटर दैन नथिंग। अब तो मेरी शेविंग किट डब्बे में पड़ी बोर हो रही होगी। पहले मैं नाई की दुकान जाया करता था हेयर ट्रिम करवाने। हफ्ते में एकबार। फेस पर कभी जीरो पर ज्यादातर नंबर एक की ट्रिम सेटिंग रखवाता था। मूछों पर ज्यादातर दो नम्बर की सेटिंग रखवाता था। अब तो मैंने अपना ट्रिमर ले लिया है। अपनी मर्जी से दाढ़ी और मूंछों की लंबाई रखता हूँ। एक दिन तो भाई गजब हो गया। हुआ यह कि दाढ़ी तो मैंने दो नम्बर की सेटिंग से बना ली थी। ट्रिमर के रेगुलेटर व्हील को तीन नंबर की तरफ घुमाने लगा ताकि मूंछें कुछ बड़ी रखता। पर यह क्या, व्हील उल्टा घूम गया। उस समय शाम गहरा जाने से वहाँ रौशनी भी कम थी और मैं भी कुछ ज्यादा ही जल्दी में था। अब इस पापी मन का पेट भरे तब न। वो भी दिन थे जब कई घंटों चल कर नाई की दुकान में पहुंचना पड़ता था। वहाँ भी रंगबिरंगे जंगलों को अपने मुंह पे सजाए लोगों की लंबी लाइन लगी होती थी। एक दाढ़ी के चक्कर में लगभग पूरा दिन बर्बाद हो जाता था। आजकल देवस्वरूप इस ट्रिमर ने घण्टों का काम मिनटों में समेट लिया है, फिर भी चाहिए इस मन को जल्दी। उस जमाने में एकदिन की पूरी कमाई मुंह पर उगे बगीचे की सफाई में लग जाती थी, पर आज यह कंजूस मन बाथरूम मिरर के ऊपर एक अच्छा सा बल्ब लगाने को राजी नहीँ। बगीचा इस आस से बोल रहा हूँ कि शायद कुंडलिनी फल इसीमें पकता हो, क्योंकि अधिकांश योगी बाबा दाढ़ी वाले ही नजर आते हैं मुझे। तीन की बजाय लैंथ सेटिंग एक हो गई थी। एक चौथाई मूँछ एक झटके में साफ हो गई। ट्रिमर कोई कैंची थोड़े ही है, जो संभलने का मौका दे। अधकटी मूँछ रखता तो लोग पता नहीं कौन सी मानसिक बीमारी समझ कर मुझे चिढ़ाते। इसलिए मजबूरी में पूरी मूँछ ही साफ करनी पड़ी और दाढ़ी भी। भला हो इस कोरोना फेसमास्क का जिसने अगली दिन मेरी सेहत को बचा लिया, वरना ताना दे देकर लोग जरूर गिरा देते। अब मार्केट में उपलब्ध स्टाईलिश ट्रिमर मशीनों के आगे रेजर ब्लेड वाला युग बीता हुआ युग लगता है। वैसे भी चिकित्सा विज्ञान के अनुसार क्लीनशेव मुंह ज्यादा गंदा होता है। जब सूक्ष्मदर्शी यंत्र से ऐसे मुंह का निरीक्षण किया गया तब कीटाणुओं की रंगबिरंगी कॉलोनियों के जंगल उसमें पाए गए। मुँह पर रेजर की खरोंच से शरीर के अन्दरूनी सेल्स कीटाणुओं की खुराक बनने के लिए इस तरह से बाहर निकलते रहते हैं, जैसे कि खेत में हल की खुदाई से मिट्टी में दबे कीड़े मकोड़े पक्षियों की खुराक बनने के लिए बाहर निकलते हैं। जब ट्रिमर से साफ किया गया मुँह देखा गया, तब बाहर से तो वह जंगल की तरह लग रहा था, पर अंदर से एकदम चकाचक। इसलिए हम आपको भी यही सलाह देते हैं कि एक अच्छा सा ट्रिमर रख लो और कुन्डलिनी योगी बन जाओ।

मेरे को देखकर बहुत से लोग जटाधारी बन गए। पर यह पता नहीं कि साथ में कुन्डलिनी योगी भी बने या फिर मुंहदिखाई भर के ही योगी बने। अगर योगी भी बनते तो मेरी सूरत के साथ सीरत का भी जायजा लेते। पर यह क्या, दूर-दूर और छिप-छिप के ही उन्होंने मेरी दाढ़ी का नुस्खा चुरा लिया, कुन्डलिनी योग गया तेल लेने। हाँ, तेल से याद आया। कइयों का आरोप है कि मूंछें बहुत तेल पीती हैं। इससे मुझे लगा कि यहाँ वस्तुस्थिति स्पष्ट कर देना जरूरी है, ताकि बेचारी बेकसूर मूंछें यूँ ही बदनाम न होती रहें। दरअसल वे अपनी मर्जी से या अपने ऐशो-आराम के लिए तेल नहीं पीतीं, बल्कि शनिदेव अपनी दिव्य अचिंत्य शक्ति से उनसे अपने लिए तेल पिलवाते हैं। इसलिए उन दाढ़ी-शरणागत लोगों से कुंडलिनी योगा हुआ हो या न हुआ हो, पर उनकी दाढ़ी में लगे तेल से शनिदेव जरूर प्रसन्न हुए होंगे। दोस्तो, आप तो जानते ही हो कि शनिदेव को काला रंग और सरसों का तेल बहोत प्रिय हैं। इसलिए यदि शनि का प्रकोप हो, तो इधर-उधर की जरा भी न सोचें। सरसों के तेल से सींच कर अपने सदाबहार झाड़ को जितना ज्यादा काला, घना और विकराल बनाएंगे, पूज्य शनिदेव उतने ही अधिक फूले नहीं समाएंगे। और आपको यह भी पता होगा कि नाराज शनिदेव जितने बुरे हैं, खुश होने पर उतने ही भले भी हैं। खैर मैं क्या कह रहा था कि अब चिकने चुपड़े लोगों की जगह जटाधारी लोगों का दिखना आम हो गया है। और तो और, नकल करने की होड़ ऐसी लगी कि छोटे बच्चे भी पापा के रेजर से मुँह खंरोचने लग गए, इस आस से कि शायद उनके भी बाल उग आएं। मैं बढ़ी दाढ़ी के फैशन को शुरु करने वाला ऐसा आइकन पीस बन गया कि जब कहीं मुँह की खारिश से परेशान होके मुंह के बाल छोटे करता, तो मिलने वाले लोग बोलते कि भाईसाहब आजकल आप कमजोर हो गए हैं। कमजोर नहीं, बहुत कमजोर। कसूर ट्रिमर का, और उलाहना सुने सेहत। बालों का भला सेहत से क्या रिश्ता। अब तो वे लोग ही जानें कि बालों से ऐसी कौनसी नाड़ी निकलती है, जो सीधी सेहत से जाकर जुड़ती है। और तो और, जो लोग मुझे क्लीनशेव आदमी के रूप में जानते थे, वे भी मेरी दाढ़ी को देखकर बोलते कि मियाँ आप कमजोर हो गए हैं। यह अब एक महान और रहस्यमयी खोजबीन का विषय है कि मुंह के बालों में बदलाव से सेहत कैसे गिर जाती है। सेहत भी सिर्फ उन्हीं लोगों की नजर में गिरती है, जिन्हें चेहरे में बदलाव नजर आता है। उसको खुद को और दूसरे लोगों को सेहत का गिरना जरा भी नजर नहीं आता। मूँछों की बात कोई नहीं करता। पता नहीं क्यों लोगों को मूँछों की बात करना दुखती रग को छूना लगता है। पर सच्चाई यह है कि जो जिंदगी में कभी न हँसा हो, वह भी मूँछों की बात से बतीसी चमकाते हुए हंसी का फव्वारा छोड़ दे। सीधे तौर पर हेयर ट्रिमर को कोई दोष न दे। सबको पता है कि अगर ट्रिमर या बालों को दोष दिया तो उससे लिंगभेद पैदा हो जाएगा। इससे जाहिर होता है कि आजकल के लोग कितने सयाने हो गए हैं, और साथ में लैंगिक समानता के प्रबल पक्षधर भी।

भाईसाहब हम करें भी तो आखिर क्या करें। दाढ़ी मुंडवाएँ तो डाढ़ी वाले लोगों की गैंग से बाहर, और अगर दाढ़ी बढ़ाएं, तो चिकने लोगों की गैंग से बाहर। आगे कुआँ, पीछे खाई। आप मानो न मानो, इस समस्या का हल इलेक्ट्रॉनिक ट्रिमर ही है। इसको लगाके आदमी इधर भी खप जाए और उधर भी। इसको दो नम्बर पर मुंह पर घुमा दो, तो दाढ़ी वाले भी खुश, और चिकने भी खुश। दो नम्बर पर ट्रिमर लगा डाला, तो लाइफ झिंगा-लाला। बौद्धों वाला मध्यमार्ग ही सबसे अच्छा है।  अगर ज्यादा ही असर चाहिए तो नकली दाढ़ी मूँछ रख लो, और चीनी में नमक की तरह हर जगह घुल-मिल जाओ। पर मुंह के बालों से तो व्यक्तित्व की पहचान जुड़ी होती है न। व्यक्तित्व की पहचान गई घास चरने। उसका जरा भी टेंशन नहीँ लेने का। अपुन तो बस मजे का बीन बजाना है। वैसे भी जजमेंटल बोले तो मीनमेख ढूंढते रहना आत्मा के लिए नुकसानदायक होता है। बस देखते रहिए, हंसी-मजाक में ही आप एक महान आध्यात्मिक गुरु बन जाएंगे। आपके तो दोनों हाथों में लड्डू आ जाएंगे।

कहते हैं कि बालों में आत्मा बसती है। आदमी को अपने मुंह के बाल सबसे ज्यादा अजीज होते हैं। मेरा डॉक्टर लोगों से दोस्ताना सम्बंध रहता है, क्योंकि वे बाल की खाल निकालने वाले होते हैं। भला उनसे अच्छा बालों को कौन समझ सकता है। वे बताते हैं कि वेंटिलेटर पर जिंदगी की साँसें गिन रहे लोग भी अपनी मूंछों को साफ नहीँ करवाते। वे अक्सर वेंटिलेटर के काम में भौतिक बाधा पहुंचाया करती हैं। माया मरे न मन मरे, मर-मर गए शरीर; आशा-तृष्णा न मिटे, कह गए दास कबीर। आदमी सब कुछ बर्दाश्त कर सकता है, पर अपने मुँह के बालों की बेइज्जती कभी बर्दाश्त नहीं कर सकता। तभी तो अजीज शख्स को नाक का बाल कहकर भी संबोधित किया जाता है। बेशक नाक का बाल है, पर है तो मूँछ का पड़ौसी ही। और वो पड़ौस ही क्या, जहाँ दिल न मिले। इसी तरह, जब चोर की दाढ़ी में तिनका, यह बोला जाता है, तो आदमी दाढ़ी पे हाथ घुमाए बिना रह ही नहीं पाता, बेशक उसे चोरी की सजा में फाँसी ही क्यों न हो जाए। आपको विश्वास न हो, तो आप प्रयोग करके देख लो। भला किस सच्चे दाढ़ीशुदा आदमी को अपनी प्रियतमा दाढ़ी पर एक अदना सा तिनका बर्दाश्त हो सकता है। बालों विशेषकर मूँछ के बालों के प्रति इस अथाह आकर्षण का ही परिणाम है कि एकबार वनविभाग का छापामार दल बाघ के दांतों और नाखूनों की छानबीन करने लोगों के घर पहुंचा, तो उसे उनकी जगह पर बाघ की मूँछ के बाल छिपाए हुए मिले। और तो और, सिक्ख धर्म में तो केश को धार्मिक महत्त्व का सर्वप्रमुख चिन्ह माना गया है। वहाँ तो केश रक्षा के लिए कटार का चलना भी जायज है। आपने महाभारत की कथा तो सुनी ही होगी न। उसमें पांडव, भगवान श्रीकृष्ण की सलाह पर अश्वत्थामा को मृत्युदंड न देकर उसका पूर्ण मुंडन करते हैं। साथ में माथे की मणि भी निकाल लेते हैं। भाईसाहब, वह मणि और कुछ नहीं, कुंडलिनी ही तो है, जो बालों के साथ खुद ही चलती बनी। वही माथे पर स्थित आज्ञाचक्र पर निवास करती है। अश्वत्थामा ने इसे अपनी मृत्यु से भी ज्यादा अपमानजनक समझा, और फिर देखा नहीं आपने कि कैसे उसने आगे चलकर बदले की कार्यवाही करते हुए ब्रह्मास्त्र चला दिया था, जिससे उत्तरा के गर्भ में झुलसते हुए परीक्षित को कैसे भगवान श्रीकृष्ण ने बाल-बाल बचा लिया था। इधर एक मशहूर नेत्री ने विदेशी मूल की महिला को प्रधानमंत्री बनने से रोकने के लिए अपने पूर्ण मुंडन की धमकी दे डाली, तो उधर एक विश्वविजेता खिलाड़ी ने अपनी कुलदेवी को प्रसन्न करने के लिए अपना पूर्ण मुंडन करा ही डाला। इसी तरह, तिरुपति बालाजी मंदिर में भगवान वेंकटेश्वर को बाल चढ़ाए जाते हैं। मान्यता है कि भगवान वेंकटेश्वर इन बालों की कीमत से कुबेर का कर्ज उतारते हैं। कुबेर सृष्टि के सबसे धनवान देवता हैं। इसका मतलब है कि फिर कर्ज की रकम भी बहुत भारी भरकम रही होगी। तो क्या फिर भगवान वेंकटेश्वर भक्तों से सोना-चांदी नहीं माँग सकते, सिर्फ बाल ही क्यों मांगते हैं। क्योंकि उन्हें पता है कि बाल सृष्टि की सबसे कीमती वस्तु है। वे जानते हैं कि बालों के अंदर आदमी का सारा बॉयोडाटा छिपा होता है। आप गूगल और फेसबुक जैसी कम्पनियों से पूछ कर देख सकते हैं कि डाटा की कीमत क्या होती है। थारे को जवाब मिल जावेगा। इतना इम्पोर्टेन्ट मैटर होने के बाद भी बालों की अचिंत्य शक्ति पर सही ढंग से वैज्ञानिक शोध हुए ही कहाँ हैं अभी तक। मुझे तो लगता है कि आज तक की सबसे कम समझी गई और सबसे जरूरी चीज बाल ही हैं। तो दोस्तो, बात यहीं पर जाकर अटकती है कि दाढ़ी-मूँछ के मामले में लापरवाही बरतना अच्छी बात नहीं है।

कुंडलिनी से भी तो आदमी का इसी तरह का गहरा लगाव होता है। हो न हो, पूरा का पूरा कुंडलिनी रहस्य बालों में ही छुपा हो। तभी तो केशों को पवित्र तीर्थस्थानों पर बहाने का रिवाज है। एक बार मैं दुश्मन इलाके में बैठे नाई से बाल साफ करवाने चला गया। समझ लो, यह मेरा एक रिसर्च प्रोजेक्ट था। मैं एक देसी वैज्ञानिक जो ठहरा। यह अलग बात है कि मेरी इन शुद्ध देसी खोजबीनों पर कोई ध्यान नहीं देता। फिर क्या था, उसके बाद वहां के लोग मेरे अजीज और मैं उनका अजीज। बालों की चमत्कारिक शक्ति को देखकर मैं दंग रह गया। बालों के रहस्यमयी टोटकों पर अभी ढंग से रिसर्च नहीं हुई है भाई साहब। मुझे तो पूर्ण विश्वास है कि बालों में ही सभी समस्याओं का हल मिल जाए। हमारे प्राचीन ऋषि मुनि बड़े पहुंचे हुए वैज्ञानिक हुआ करते थे। न हींग लगाते थे, न फिटकरी, और रिसर्च इतनी गहरी, जिसे छूने तक की हिम्मत आज की बड़ी-बड़ी प्रयोगशालाएं न कर सके है। तांत्रिक टोटकों को ही देख लो। कैसे पहुंचे हुए तांत्रिक, आदमी के सिर्फ एक बाल से पूरे आदमी को वश में कर लेते हैं। महिलाएं ऐसे केशतंत्र का ज्यादा शिकार बनती हैं, क्योंकि उन्हें ही अपने केश सबसे प्रिय होते हैं। बालों के इस छोटे से टोटके के आगे सारा आधुनिक विज्ञान फेल।। यह तो एक छोटा सा उदाहरण है। हमारे साथ बने रहिए, और देखते रहिए, आगे-आगे क्या होता है।

आदमी का त्वरित रूपांतरण जैसे कुंडलिनी जागरण से होता है, वैसे ही मूँछ काटने से भी होता है। इसीलिए पुराने जमाने में लोग अपने पापों से छुटकारा पाने के लिए अपनी मूँछ काट दिया करते थे। तभी से अपनी मूँछ बचाने की कहावतें बनीं। उदाहरण के लिए मूँछ ऊंची रखना, मूँछ न कटने देना, मूँछ का सवाल होना, मूँछ को शर्मिंदा न करना, मूँछ की लाज रखना, मूँछ की शर्म करना आदि बहुत सीं। सच भी है, सोने के जेवर की तरह अच्छी तरह से संभालकर रखी हुई मूँछ बुरे वक्त पे काम आती है। मुझे भी एकबार प्यार-संभाल कर रखी हुई मूंछों ने ही बचाया था। हुआ यह था कि मैं अपने बीते हुए जीवन से पूरी तरह उदास और निराश हो गया था। फिर किसी दैवकृपा से मिले एक गुरु सदृश तजुर्बेदार व्यक्ति ने मुझे मूँछ साफ करने की सलाह दी थी। वे खुद भी अपने नित नए नवेले चेहरे के शौकीन थे। दरअसल वे मेरे कॉलेज टाइम के रंगीन मिजाज के प्रोफेसर ही थे। कॉलेज की लड़कियां तो उनसे बड़ा लगाव रखती थीं। एकबार तो लगाव इस हद तक बढ़ गया था कि कुछेक छात्राओं को अपने साथ छेड़छाड़ की आशंका पैदा हो गई थी। भगवान जाने क्या-क्या मामले रहे होंगे। खैर, वे मूंछों की वजह से मेरे ऊपर ढाए गए सितम से अच्छी तरह वाकिफ थे। आपको तो पता ही है कि कॉलेज लाइफ में चिकने चेहरों की ही तूती बोलती है। मूंछों वालों को तो वहाँ पर बाबा बोला जाता है। बाबा भी अगर असली समझे, तब तो बात भी बने न। अब तो बाबा का मतलब भंगी, पगला, इश्क-विश्क में हारा हुआ और पता नहीं क्या-2। घिन्न आती है सोचकर भी। और तो और जितना भी आप अकल का घोड़ा दौड़ा सकते हो नकारात्मक लफ्जों के मैदान में, दौड़ा लो, सबका पर्यायवाची बाबा ही दिखेगा आपको। लापरवाह तो बाबा, भाँग पिए तो बाबा, शराब पिए तो बाबा, हड्ड चबाए तो बाबा, लुगाई संग घूमण लागे तो बाबा, मार-कुटाई करे तो बाबा। बस-2, समझदारों को इशारा ही काफी होता है। असली बाबा को बाबा कहोगे, तो चिमटा पड़ेगा। बाबा क्या दहेज में मिला शब्द है, जिस मर्जी के साथ मन किया, चिपका दिया। असली बाबाओं में एकता ही कहाँ, जो कोर्ट में पेटिशन दायर कर सके। कहते हैं न कि शेर अकेला चलता है, झुंड में तो भेड़-बकरियां चला करती हैं। इधर असली जाति-वर्ग को असली नाम से नहीं बुला सकते, और उधर जहाँ देखो, बाबा-बाबा-बाबा। तौबा के लिए, न बाबा न। बच्चियां नूं पुचकारण लई, ओ मेरा बाबा। इह तां माड़ा जिहा जचदा वी है, किवें कि बाबा ते बच्चे दोनों ही सौखे हुंदे हन। और अब तो नया ही ट्रेंड चल पड़ा है, माई क्यूटी बाबा। बाबा की मशहूरी का आलम यह कि एकबार मेरी पत्नी देवी ने मुझे प्यार से बाबा क्या कह दिया, मेरा छोटा सा बेटा हँसता ही जाए, हंसता ही जाए। मैंने पूछा मेरे बाबा इतना क्यों हँस रहे हो। तो वह मेरी तरफ अंगुली करके हँसते हुए बोला, बा-बा ब्लैक शीप। आजकल के बच्चे भी न कितने समझदार हो गए हैं। बाबा बरगा यूनिवरसल बोल नी देख्या अड़यो। कभी उस्ताद पहुंचे हुए हुनरमंद को कहते थे। आज भंगी ट्रक ड्राइवर को बोलते हैं। एक बार मैंने एक देसी इंजीनियर को तारीफ में उस्ताद क्या बोल दिया, उसने अगले ही दिन मुझे मानहानि का नोटिस भिजवा दिया। हाय राम, ये शब्द हैं के देसी तोप के गोले। गुरु शब्द बड़ा पवित्र अल्फाज़ माना जाता है। पर एक हिजड़े के निर्माण के दौरान भी इसका बहुत प्रयोग होता है। वहाँ पर कामदेव के शहर को उजाड़ने वाले एक्सपर्ट शख्स को भी गुरु बोला जाता है। कोई गलत काम करके आए, तो सबसे पहले इन्हीं शब्दों से स्वागत होता है, वाह गुरु। अब समय आ गया है कि हम पवित्र शब्दों की मर्यादा को बचाएं। अगर देशद्रोही की नापाक मूँछों को बचाने के लिए आधी रात में कोर्ट खुलवाए जा सकते हैं, तो इन शब्दों को बचाने के लिए क्यों नहीं। जबकि ये शब्द तो सबसे बड़े देशप्रेमी हैं, क्योंकि ये हमारी सनातन संस्कृति की रक्षा करते हैं। मैंने तो अपने समझदार मित्रों से साफ-2 शब्दों में कहलवा दिया है कि या तो वे मेरे आध्यात्मिक लेख न पढें, या फिर मुझे सपने में भी गुरु और बाबा न बोलें। एक चालू सा दोस्त मुझे बार-2 शरीफ कहकर चिढ़ाता था। मैंने उसे खरी-2 सुनाते हुए चेता दिया कि भले ही वह पाकिस्तान जाकर नवाज शरीफ को शरीफ बोल आए, पर मुझे कभी शरीफ न बोले। उसके बाद वो मुझे नेस बोले तो अंग्रेजी का अच्छा बोलने लगा। हाँ, तो मैं क्या मूल प्रवचन दे रहा था कि अब वे हरफनमौला महोदय अपने योग्य शिष्य को कैसे न पहचानते, सो उन बिन बुलाए गुरु ने पहली ही मुलाकात में मुझे प्रेम, गर्व, मुस्कान और गर्मजोशी के साथ सबसे प्रिय या सच्चा शिष्य कुछ ऐसा कहकर संबोधित कर दिया। वो मेरी मूंछों का काला झाड़ देखकर कुछ औंच जैसे भी गए थे, पर ये तो घुल-मिल कर उन्हें बाद में पता चला था कि मेरे दिल पर तो मूंछें थीं ही नहीं। बाद में कभी बता रहे थे कि तू डेंजरस हुआ करता था। मैंने भी स्पष्टीकरण दे दिया था कि वो मेरी मूंछें डेंजरस थीं, मैं नहीं। झाड़-साफ-दिमाग तो थे ही, इसलिए एकदम से समझ गए। फिर जाके ढंग से घुल-मिल पाए, नहीं तो मुच्छड़ों और मुच्छकटों की प्रॉपर हुकिंग कहाँ। कहाँ-2 की सुनाऊँ, इन वफादार मूछों ने कहाँ-2 नहीं बचाया है मुझे। अब तो लगता है कि कुत्ते उनके घने बालों के कारण ही वफादार होते हैं। एक-दो मुच्छकटे और 1-2 मुच्छड़ लोग भी उनके अगल-बगल में, उनसे कुछ इधर-उधर की हांकते कामकाजी चहलकदमी कर रहे थे। अपने प्रति उनके अंदर इतने सारे सुंदर और मजबूत भाव, वो भी एकसाथ देखकर तो मैं दंग ही रह गया। साथ में मैं अपने को खुशकिस्मत भी समझने लगा कि उन्होंने मुझे मुच्छड़ शिष्य नहीँ कहा। वो भाव-प्राकाट्य उन्होंने इतनी तेजी से किया कि जबतक उनके एकदम चिकने चेहरे से मेरी नजर हटती और मैं उनसे कुछ कह पाता, तब तक वे वहाँ से रुखसत भी कर गए थे। उस समय तो मुझे लगा था कि शायद जोक कर रहे होंगे, पर अब समझ आ रहा है कि वह जोक नहीं, उनका सच्चा मुच्छकटा आशीर्वाद था। वे खुद मुच्छड़ों और मुच्छकटों के अघोषित गठबंधन के सताए हुए लगते थे। बाद में तो मुझे उनसे यह गम्भीर शिकायत भी सुनने को मिली कि उन्हींके शिष्यगण उन्हें अपने चेहरे का बंजर मैदान दिखाकर चिढ़ाया करते थे। शायद इसी वजह से कई बार अपनी मुच्छों को टेबल पर सजा देते थे। हो सकता है कि वे कॉलेज टाइम की मेरी तांत्रिक गुरुभक्ति की निष्ठा को संयोगवश ताड़ गए हों। उनको भोले शंकर और कामदेव का एकसाथ आशीर्वाद प्राप्त लगता था। उस समय उनकी जिंदगी का चिकना और फैशनेबल चेहरा रखने का दौर चल रहा था। इसलिए मूँछ-छेदन संस्कार की दीक्षा उनसे लेना ही मैंने सबसे उचित समझा। उन गुरुदेव की सलाह पर मूँछ काटने से मेरा जबरदस्त रूपांतरण हुआ और उस नाजुक दौर में उन्होंने मुझे ऐसे संभाला जैसे एक कुंडलिनी गुरु अपने शिष्य को कुंडलिनी रूपांतरण के नाजुक दौर में संभालता है। मूँछ काट कर चिकना चेहरा बनने से मुझे ऐसा लगा जैसे कि मेरी जिंदगी का रिफ्रेश बटन दबा हो। जैसे कि मूँछों के साथ बीती जिंदगी भी उतर गई हो, और मैंने एक नया सा जनम ले लिया हो। मुंडन साईंस अब कुछ गले उतर रही है। कुंभ में भी नागा साधु बनने आए लोगों के सिर और चेहरे का पूर्ण मुंडन करके ही उनका माईंडवाश किया जाता है, ताकि वे पिछली जिंदगी में कभी वापिस लौट ही न सके। यज्ञोपवीत संस्कार के समय भी तो ऐसा ही पूर्ण मुंडन किया जाता है, बालों की एक लंबी शिखा को छोड़कर। उसके बाद भी आदमी का दूसरा जन्म माना जाता है, मतलब माइंड वाश हो जाता है उसका। बालों की शिखा उसे कुंडलिनी से और घर से जोड़कर रखती है, इसीलिए तो वह घर नहीं छोड़ता, बस कुंडलिनी साधना में लगा रहता है। इसी तरह, बौद्ध भिक्षु इनसे भी एक कदम आगे रहते हैं। वे हमेशा ही पूर्ण मुंडन करवाए रखते हैं, ताकि आम लोग उनके संपर्क में कभी आ ही न सके, और आकर उनकी साधना में विघ्न न डाल सके। अब केशप्रेमी लोग कहाँ जाने लगे मुंडक सभाओं में। कुछ किस्म के मुसलमान भाई तो काफिरों से अलग दिखने के लिए अलग ही नायाब नुस्खा अपनाते हैं। वे मूँछों को तो साफ कर देते हैं, पर दाढ़ी को बड़ा पालते-पोसते हैं। तो कुछेक बकरे के जैसी दाढ़ी रखते हैं। रब खैर करे। कहीँ पर लोग दाढ़ी पर चित्र-विचित्र डिसाईन और नक्शे आदि बनवाते हैं। भाई उनके नेचरल आर्ट को तो दाद देनी पड़ेगी। न रँग लगे, न कैनवास, बस एक बढ़िया सी कैंची चाहिए। कुछ लोग चार्ली चैपलिन की तरह नाक के ठीक नीचे, मधुमक्खी के जितनी मिनी मूँछ रखते हैं। इससे उन्हें नई ही उमंग का एहसास होता है। ऐसी मूँछ रखते हुए भी डर लगता है कि कहीं खुराफाती लोग मधुमक्खी को भगाने का झूठा बहाना बनाकर मुंह पर थप्पड़ ही न मारते रहे। कुछ लोग बहादुरी का प्रदर्शन करने के लिए दोनों तरफ को लम्बी, उठी हुईं और पैनी मूंछें रखते हैं, जैसे कि जाबांज फाइटर पायलट अभिनन्दन। सुनने में तो यह भी आया कि उनकी मूँछों के डर से ही पाकिस्तान को उन्हें चौबीस घंटे के अंदर रिहा करना पड़ा था। कुछ लोग अपने आप को विशिष्ट जताने के लिए दाढ़ी-मूँछ को मेहंदी या बनावटी रसायनों से लाल रँगाते हैं, तो कुछ उन्हें कज्जली काला कर देते हैं। बेचारे आम गरीब आदमी को ही मन मसोस कर झुंड की खाल के अंदर रहना पड़ता है, क्योंकि यदि वे विशेष बनने लगेंगे, तो खाएंगे क्या। लोगों के इस मिजाज से अंदाजा लगाया जा सकता है कि प्राचीन काल में मूँछों का वास्तुशास्त्र जरूर रहा होगा। फिर हो सकता है कि वह मध्ययुग में जिहादियों द्वारा जला दिया गया हो। उसमें उन्हें अपनी अय्याशीपरस्त मूँछों की तौहीन नजर आई हो। भला एक अमनपसंद शख्स को अमन का बेइंतेहा पैग़ाम देने वाली पाक-साफ मूँछों की शान में गुस्ताखी कैसे बर्दाश्त हो सकती थी। तौबा-तौबा। प्रथमद्रष्टया तो यही लगता है कि इस तरह की विकृत मूँछ-विद्या से ही हिंदुओं के अनगिनत धार्मिक स्थल नेस्तनाबूद किए गए हैं, और असंख्य धार्मिक ग्रन्थ सुपुर्दे खाक किए गए हैं। तो भाइयो मैं अपनी मूँछमुंडन से जुड़ी आपबीती बता रहा था कि कैसे उससे डिप्रेस करने वाली वर्तमान की, कॉलेज की और बेरोजगारी की जिंदगी चली गई थी रिसाइकिल बिन में, और बचपन के साथ स्कूल टाइम की जिंदगी आ गई थी रिसाइकिल बिन के कचरे से निकल कर मेरे मस्तिष्क के डेस्कटॉप पर। ऐसा लगा जैसे मेरे दिमाग की वही पुरानी विंडो अपडेटिड वर्शन के साथ रीइंस्टॉल हो गई हो। वही पुराने जीवन के ख्याल, पर अनौखे और हुस्न से भरे अंदाज में। दोस्तो, बहुत तरक्की की मैंने उस दौर में। मेरी तरक्की का बाहरी माहौल तो पहले से ही बना हुआ होगा, बस भीतरी माहौल डगमगा रहा था, जिसे मेरे चिकने चेहरे ने संभाल लिया। जब मेरी हालत स्थिर हो गई, तब मैंने फिर से चेहरे पे फसल उगाना शुरु कर दिया। बर्फबारी के दिनों में तभी तो अनाज मिलेगा न जब पहले से फसल इकट्ठी कर रखी हो। मित्रो, मूंछों के सभी रहस्यों से पर्दा उठाने लगूँ तो एक पूरा मूँछ पुराण बन जाए। हाय, ये लेखन भी भला क्या अजीब बला है न। हाथ थक जाते हैं, पर मन नहीं थकता। और अगर तो मूँछ जैसा रोमांचक विषय हो, तब तो सवाल ही पैदा नहीं होता कि मन थक जाए। तजुर्बेदार बुजुर्ग लोग कहते हैं कि महिलाएं शादी से और पुरुष रण से वापिस नहीं लौटते। इसी तरह मूँछ जैसे दिलछेड़ विषय के लेखक की लेखनी कभी कागज से वापिस नहीं लौटती। इसलिए सब्र बनाकर पढ़ते रहना, ताकि लेख के अंत में आप भी अपने को मूँछ विशेषज्ञ बना हुआ पाओ। दरअसल मूंछों को हटाने से मेरी बरसों पुरानी दबी पड़ी कुंडलिनी ऐसे चमकने लगी थी, जैसे झाड़ को हटाकर उसके अंदर दबी पड़ी सोने की अंगूठी चमकती है। यह भी एक शोध का विषय है कि क्या मूँछों का अंधेरा चमकदार कुंडलिनी को ढक कर रखता है। मूंछें साफ करने का सबसे बड़ा फायदा मुझे यही हुआ कि मैं अपनी कुंडलिनी को अच्छी तरह से पहचान पाया था। फिर मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। वो मुझे जहाँ लेके जाती रही, मैं वहाँ हो आता रहा, और वह हर प्रकार से मेरा भला ही करती रही। कुंडलिनी के आगे जैसे मैं बच्चे की तरह नँगा ही हो गया था। मूँछे उड़ाने और नंगे होने के बीच में कोई ज्यादा अंतर है भी नहीँ। मैंने उसके आगे अपने आप को समर्पित कर दिया था। कुंडलिनी के सहयोग से कड़ी मेहनत करके मैंने कामयाबी के बहुत से कीर्तिमान स्थापित किए दोस्तो। कुंडलिनी स्त्रीलिंग में थी, तभी तो कुंडलिनी को एक स्त्री की तरह संबोधित किया जाता है। ये जो प्यार-व्यार और शादी-ब्याह का खेल भौतिक जगत में चलता रहता है न, बिल्कुल ऐसा ही मन के सूक्ष्म जगत में भी चलता रहता है। फिर क्या था, उस स्त्रीलिंग कुंडलिनी को देखकर पुलिंग गुरु भी पहुंच गए मूँछ-मुस्कुराहट बिखेरते हुए गाजे-बाजे के साथ। दोनों ने शादी की, रोमांस किया, बच्चे पैदा किए और फिर दोनों बुड्ढे होकर एक-दूसरे के प्रति उदासीन जैसे भी हो गए। वो मेरे सूक्ष्म माँ-बाप मुझे छोड़कर जा रहे थे। मैं कुछ उदास रहने लग गया था। तभी मैंने कुंडलिनी योग का अभ्यास शुरु किया और उन मुच्छड़ गुरु (कुंडलिनी) की मूँछ खींचकर उन्हें फिर से जगा दिया बोले तो एकदम मस्त कुंडलिनी जागरण। तब जाकर मैंने कुछ राहत की साँस ली और घर की खेती को फिर से उगाना शुरु कर दिया। पर आज भी मैं बड़े झाड़ से डरता हूँ। पुराना सदमा जो गया नहीँ मेरे दिमाग से पूरी तरह। पता नहीं क्यों अंधेरा जैसा लगता है इसके नीचे। क्या सबको लगता होगा, या मेरेको ही। इसकी सफाई से क्या सबकी कुंडलिनी चमकती होगी, या सिर्फ मेरी ही चमकी थी। यह सब साझे शोध और अनुभव से ही पता चल सकता है। इसलिए मैं इनकी इस तरह से छंटाई करता रहता हूँ, ताकि इनकी जड़ तक हवा और रौशनी जाती रहे। पर मुझे लगता है कि यह मन का वहम भी है। कुंडलिनी जागरण के समय तो मेरे पूरे चेहरे पर झाड़ पसरा हुआ था, हालाँकि वह मध्यम आकार का था, पर था तो घना झाड़ ही। उस समय तो हर जगह प्रकाश ही प्रकाश था। इससे जाहिर होता है कि सबकुछ देश, काल और मानसिकता पर निर्भर करता है। इसलिए जैसा अच्छा लगे, वैसा करना चाहिए, पर कुंडलिनी के लिए प्रयास हमेशा करते रहना चाहिए। यदि घासफूस की तरह हल्की कुंडलिनी को यह मूँछों का झाड़ दबा कर रखता है, तो फनदार कोबरा नागिन की तरह फुफकारे मारने वाली शक्तिशाली कुंडलिनी को दुनिया की नजरों से बचाते हुए संभालकर भी यही रखता है। इसीलिए तो मैंने कहा न कि वक़्त की भाषा पढ़नी आनी चाहिए, और सर्वहितकारी मूँछों का हमेशा सम्मान करना चाहिए। वक्त के अनुसार आदमी खुद चलता नहीं, और दोष मढ़ता है मूँछों के सिर। सबसे ज्यादा दुरुपयोग आदमी ने मूँछों का खुद ही किया है। मूँछों की शक्ति से पता नहीँ कितने अनैतिक काम किए हैं उसने। मूँछों की अथाह शक्ति का अंदाजा इसीसे लगाया जा सकता है कि सिर्फ इनके ऊपर प्यार भरा हाथ फेरने से ही जोश कई गुना बढ़ जाता है। ए लो जी, इस क्रिया के लिए मूँछ-विशेषज्ञों द्वारा प्रदत्त नाम भी याद आ ही गया, मूँछ पर ताव देना। बड़ा गूढ़ नाम है यह। आप सोच भी नहीं सकते कि ताव का अर्थ यहाँ ताप या गर्मी है। जैसे मालिश की गर्मी से सरोबार पहलवान अंगड़ाई लेते हुए उठ खड़ा होता है, ऐसे ही मूंछें भी। उपरोक्त कुछ मुख्य वजहों से मूँछों की इज्जत आज इस कदर गिर गई है कि लड़की वाले सबसे पहले यही पूछते हैं कि कहीं लड़का मूँछों वाला तो नहीं है। कभी मूँछ वाले का समाज में विशिष्ट रुतबा हुआ करता था। आज तो आलम यह है कि मूँछों को यह लोरी-गीत सुनाकर शांत करना पड़ता है, मत रो——-~मेरी मूछ, चुप हो जा——नहीँ तेरी पूछ। जो कुकाल में होता है, बुरे हाल में होता है; ऐ यार मेरे साथ तेरे वही तो हुआ; मत रो—–~~~~—–। दोस्तो, यह ट्रेंड बदलना चाहिए, और हमें बेकसूर को बचाने के लिए मिलकर आगे आना चाहिए। और आगे की कहें, तो डाकुओं का भी मूँछों की बदनामी में भारी हाथ रहा है। हमारे समाज के लेखकों और कवियों ने भी मूँछों को डाकुओं के साथ बहुत जोड़ा है। यह कहीं पढ़ने में नहीं आता कि बड़ी-2 मूँछों वाला विद्वान। और तो और, देवियाँ भी पीछे नहीं रही हैं। उनका भी बच्चों को सुलाने के लिए बड़ी-2 आँखों के साथ, डरावनी मुद्रा में अक्सर यही डायलॉग होता है, बड़ी-2 मूँछों वाला-ला-ला-ला—–। अब इससे ज्यादा क्या कहूं, विलुप्ति की कगार पर खड़ी मूँछों को बचाने के लिए उनकी खोई इज्जत वापिस लौटाना जरूरी है कि नहीँ। यदि जरूरी है, तो मूँछ-संरक्षण के लिए भी कानून बनने चाहिए। आज की इस विकट परिस्थिति में मूँछ-आरक्षण के लिए कानून का बनाया जाना बहुत जरूरी हो गया है। मुच्छड़ों को अल्पसंख्यक वर्ग का दर्जा दे देना चाहिए। मूँछ संरक्षण के लिए कल्याणकारी योजनाएं चलाई जानी चाहिए। मूँछ-भत्ते का विशेष प्रावधान होना चाहिये। अपनी कहूँ, तो मेरे चेहरे पर घनी दाढ़ी आती ही नहीं। इससे इसकी जड़ों में हवा व रौशनी खुद ही लगातार पहुंचती रहती है। हो सकता है कि मेरी सदाबहार कुंडलिनी के पीछे इसी अधमुंडी किस्म की मूँछों का हाथ हो। इसको लेकर मेरी घरवाली बोलती रहती है कि आप दाढ़ी के साथ लड़की जैसे लगते हो। इसलिए कई बार मेरे मन में आता है कि क्यों न इस नपुंसकता की निशानी को जड़ से ही उखाड़ फेंकूँ। पर तभी यह भी सोचता हूँ कि अगर भरी बरसात के बीच खेत को बंजर रहने दिया, तो जालम गर्मी के दिनों में क्या खाएँगे। अगर सर्दियों में ही सारे कपड़े उतार दिए, तो गर्मियों में क्या उतारेंगे।

दोस्तो, मैंने यह भी महसूस किया कि खाली मूँछ की बजाय दाढ़ी-मूँछ का मिश्रण ज्यादा दार्शनिक होता है। कहते हैं न कि चेहरा मन का आइना होता है। आईने के अंदर सुंदर बनने से उसके सामने खड़ा आदमी खुद ही सुंदर बन जाता है। इसलिए चेहरे पर अद्वैत दर्शन बना कर रखने से मन में खुद ही अद्वैत छा जाता है। मुख्य भूभाग को बंजर रखना और पहाड़ी की तलहटी में बनी छोटी सी पथरीली क्यारी में झाड़ ऊगा कर रखना समझदारी का काम भी तो नहीं लगता। तो इस समस्या को देखते हुए मैंने पूरे भूभाग में बिजाई शुरु कर दी थी। पर फिर एक नई समस्या आन पड़ी थी। फसल के एकमुश्त कटान के बाद पूरा भूभाग बंजर और नँगा लगता था। कोई सीधा आसमान से जमीन पर आ गिरे और खजूर भी न मिले अटकने को, तो उसकी व्यथा-पीड़ा आप खुद भी समझ सकते हैं। साथ में, द्वैत या यूँ कह लो कि बदलाव के झटके ऐसे लगे, जैसे सर्द-गर्म के लगते हैं। और भाई ये मनहूस द्वैत तो मन का सबसे बड़ा रोग है न। तो दोस्तो, दोनों समस्याओं से बचने का एक ही मध्यमार्ग वाला तरीका बचा था। क्यारी की फसल को जमीन से न काटकर थोड़ा ऊपर-2 से काटा जाए। इससे क्या हुआ कि फसल कटान के बाद भी थोड़ी-बहुत हरियाली बची रही। उससे लोगों की आंखों का नूर भी बरबस बना रहा, और द्वैत या बदलाव पर भी काफी रोक लग गई। यहाँ एक दार्शनिक पेंच और है। दरअसल अद्वैत का निर्माण द्वैत से ही होता है। इसलिए जो सौ टके का दार्शनिक मिस्त्री है, उसके लिए तो द्वैत पैदा करने वाली विकराल मूंछें किसी सोने की ईंट उगलने वाली खदान से कम नहीं हैं। वह तो उनकी चिनाई करने से पहले उनके साथ मन के काम, क्रोध जैसे दोषों का मिक्चर सीमेंट-मोर्टार की तरह चिपकाता है, फिर उनसे अव्वल दर्जे के अद्वैत-महल तैयार कर लेता है। उसकी बसाई अद्वैत नगरी के आगे कुबेर की अलकापुरी क्या मायने रखती है। हो न हो, अलकापुरी इन्हीं मूँछ-महलों को कहा गया हो। वैसे भी कुबेर की मूंछें भी बड़ी सुंदर बताई जाती हैं। मैंने भी एकबार इसी तरह त्रिलोकलुभावन अद्वैत-नगरी का निर्माण किया था। उस समय मेरे पास बड़े-2 मिस्त्री ज्ञानप्राप्ति के लिए दूर-2 से घुटनों के बल आते थे।

इसी केशप्रेम की विचित्र मानसिकता के कारण ही आदमी अपने जैसे बालों वाले आदमी के साथ ही घुलना-मिलना पसंद करता है। इसी विकृत मानसिकता के परिणामस्वरूप ही तो तालिबानियों ने पूरे अफगानिस्तान में सभी को दाढ़ी रखने का फरमान जारी किया था। पर स्त्री उसे कम से कम बालों वाली चाहिए, खुद वह बेशक कितने ही लंबे बाल क्यों न रखता हो। पर स्त्री के मामले में उसका यौनस्वार्थ जो जुड़ा होता है। वह उसके केशस्वार्थ पर भारी पड़ जाता है। इसी तरह अपने बच्चे कैसे ही बालों वाले क्यों न हो, सभी अच्छे लगते हैं। इसमें भी अप्रत्यक्ष रूप से यौनस्वार्थ ही जुड़ा होता है। इससे साफ जाहिर होता है कि केशभाव और यौनभाव ये दोनों सबसे शक्तिशाली भाव हैं। तांत्रिक इन दोनों का महत्त्व अच्छी तरह से समझते हैं, इसलिए दोनों को संभाल कर रखते हैं। अब कुछ समझ में आ रहा है कि भगवान शिव के जैसे महान तांत्रिक जटाधारी और मस्तमौला क्यों होते हैं।

कई बार तो मुझे लगता है कि यदि कुन्डलिनी जागरण के समय मेरी दाढ़ी न बढ़ी होती, तो मुझे कुन्डलिनी जागरण ही न होता। क्लीनशेव होने से मैं अपना चिकना चुपड़ा मुंह लेकर उन गाने बजाने वाली औरतों के इर्दगिर्द इस प्रकार मंडराता ही रहता, जिस प्रकार एक बार नारद मुनि अपना बंदर का मुख लेकर पूरी स्वयंवर सभा में सबकी आंखों से आंखें मिलाते हुए मंडराते फिरे थे। उससे मुझे उस दोस्त से मिलने का मौका ही न मिलता जिससे मैं कुन्डलिनी की याद में खो गया था। साथ में अगर अपने जैसे नामर्द चिकनू को देखकर कोई औरत इशारे में भी दिल में चुभने वाला ताना कस देती, तब तो जागरण का प्रश्न ही पैदा न होता। ताने से तिलमिलाए नारद ने भी तो कपटी कहकर भगवान विष्णु की खटिया खड़ी नहीँ कर दी थी वैकुंठ में जाके, जागरण गया गेहूँ बीजणे जाँ बांदर भगाणे। हाँ, तो मैं क्या कह रहा था कि उस उलाहने से कुन्डलिनी में खोने की बजाय मेरा दिल उलाहने में खोने लगता। स्त्री की नाराजगी और स्त्री के उलाहने से भयानक चीज इस दुनिया में कुछ नहीँ है यारो। आदमी सब कुछ भूल सकता है, पर एक औरत का उलाहने से भरा नाराज चेहरा कभी नहीं भूल सकता। अगर औरत की नाराजगी से घायल दिल आदमी कुन्डलिनी जागरण क्या भगवान को भी पा ले, तो भी भगवान उसे उस नाराज औरत के चरणों में पड़कर माफी मांगने के लिए भेजते हैं, तभी अपने अनदेखे महल का अनदेखा मेन गेट उसके लिए खोलते हैं। वरना आदमी को उस अनदेखे महल को बाहर-बाहर से ही देख कर संतोष करना पड़ता है। इसकी कोई गारंटी नहीं कि औरत मान ही जाएगी। यह उस पर और आपके मन की पवित्रता पर निर्भर करता है। कई बार औरत माफी मांगने आए मर्द को कोई दूसरा ही उलाहना मार देती है। इससे वह कहीं का नहीं रहता, एक धोबी के कुत्ते की तरह, न घर का न घाट का। वह फिर से वापिस मुड़कर अनदेखे भगवान को दूर खड़े देख कर उसके पास पहुंच जाता है। भगवान उसे थोड़ा सा पुचकारते हैं, और फिर औरत के चिकने चेहरे को शांत करने के लिए वापिस रवाना कर देते हैं। कई बार तो बेचारा मर्द स्त्री और भगवान के बीच में गेंद ही बन कर रह जाता है। यह सिलसिला तब तक चलता है जब तक कोई अन्य दयालु और भाव से भरी स्त्री उस अभागे मर्द को थाम नहीं लेती। ये जो कहते हैं न कि लोहा ही लोहे को काटता है। दरअसल उस स्त्री को भगवान ही भेजता है अपनी दिव्य शक्ति से प्रेरित करके। इसलिए मेरी सलाह मानो, भगवान की कुछ मदद करने के लिए एक अच्छी औरत को भी ढूंढते रहा करो। स्त्री के मामले में डायरेक्ट एक्शन तो भगवान भी नहीं ले सकता। वह भी मामले का निपटारा एक स्त्री को भेजके ही कर सकता है। भगवान भी बेचारा सच्चा है। एक औरत के आगे उसकी भी नहीं चलती। अपनी पत्नी के डर से ही तो वह अपनी सभी मूर्तियों और चित्रों से मूंछें गायब कर देता है, नहीं तो उसके जैसा समदर्शी महानुभाव मुच्छड़ों के साथ क्यों पक्षपात करता। औरत के नाराज चिकने चेहरे की ज्वाला उसके अनछुए महल तक को छूने लगती है। वो करे भी तो क्या करे। यदि वह औरत के साथ सख्ती करे तो उसके बगल में बैठी उसकी पत्नीदेवी उलाहना मारते हुए, नाराज होकर चली जाए। वो भला अपने भक्त को चिकने चेहरे की ज्वाला से बचाने के लिए खुद क्यों उसका शिकार बने। मुझे तो चिकने लोगों पर यह सोचकर तरस आ रहा है कि कहीं वे स्त्री के कोप से बचने के लिए ही तो चिकने नहीं होते। औरत को उनका चिकना चेहरा देखकर उनपर तरस आ जाता होगा। चिकने चेहरे से औरत को बच्चे की याद जो आती है। वैसे भी औरतें बच्चों पर सबसे ज़्यादा मेहरबान होती हैं। पर ये चालाकी ज्यादा दिन नहीं चलती। गलती से अगर चेहरे पर दो बाल भी उग आए, तो वह पिछली सारी कसर सूद समेत निकालती है। इसलिए पुरजोर आवाज से कहता हूँ कि औरत के जैसा चिकना-चुपड़ा चेहरा बनाने से पहले औरत के द्वारा निभाई जाने योग्य जिम्मेदारियां भी समझ लेनी चाहिए। अगर ऐसा न किया गया तो बेचारे अमनपसंद दाढ़ीदार आदमी की आत्मा नाराज चिकने चेहरों के बीच ही भटकती रहेगी, और उसे मरने के बाद भी शांति नहीं मिलेगी। कांटे तो मुरझाए हुए ही अच्छे लगते हैं, पर फूल तो हमेशा खिले हुए ही अच्छे लगते हैं। खिला हुआ फूल चेहरे पे न सही, दिल पर ही सही। इसलिए कहता हूँ कि सिर्फ मुंह पर ही नहीं, दिल पर भी कुन्डलिनी रूपी दाढ़ी उगी होनी चाहिए। इससे जब औरत का प्यार, कामदेव के पुष्पबाण पर सवार होकर दिल तक पहुंचेगा तो वह सीधा कुन्डलिनी को लगेगा, जिससे कुन्डलिनी गलती से जागृत भी हो सकती है। नहीँ तो ऐसा होगा जैसा एकबार अंतरराष्ट्रीय मूँछ प्रतिस्पर्धा में हुआ था। उसमें विजेता घोषित किए गए दिग्गज मूँछ शिरोमणि या बेचारे मुच्छड़ महाशय कह लो, सहज उद्गार प्रकट करते हुए कहने लगे थे कि उन्हें विजेता घोषित होते हुए ऐसा मजा आ रहा था, जैसा एक गैंडे को बार-2 कीचड़ में लोटते हुए आता है। जो इस मूँछ स्तोत्र को श्रद्धापूर्वक पढ़ेगा, उसपर जीवनभर मूँछों की अपार कृपा बनी रहेगी, तथा इस जीवन के बाद उसे मूँछलोक की प्राप्ति होगी। अब कृपा करके इस दिव्य मूँछ संहिता को कहीँ कॉपी पेस्ट न करिएगा, नहीँ तो किन्हीं ताव-(प्र)चोदित मूँछों की गाज कहीँ व्यंग्यकार पर ही न गिर जाए।😂😂😂😂😂😂😂😂😂😂😂😂😂😂😂😂~प्रेमयोगी {व्यंग्यकार~भीष्म}😄😥🙏

कुन्डलिनी ही मन के फालतू शोर को शांत करने के लिए सर्वोत्तम हथियार के रूप में

मन के बकवास विचारों की शांति के लिए कुन्डलिनी ध्यान एक सर्वोत्तम तरीका है

मित्रो, मन के बकवास विचारों को शांत करने के लिए अपने अपने नुस्खे बताते हैं लोग। मुझे तो कुंडलिनी ध्यान सबसे अच्छा तरीका लगता है। एकदम से मन का शोर शांत हो जाता है इससे। यह मैं पिछली कई पोस्टों में लगातार वर्णन करता आ रहा हूँ। इसे मैंने कुंडलिनी चक्रों पर प्राण और अपान की आपसी टक्कर का नाम दिया है। यह मानसिक विचारों और आधार चक्रों का एक साथ ध्यान करने जैसा है। पिछली पोस्ट में मैं बता रहा था कि साँस रोकने वाले प्राणायाम से स्ट्रोक और दिल के रोगों से बचाव हो सकता है। मेरा अनुमान सही निकला। मैं इस हफ्ते एक ऑनलाइन आध्यात्मिक बैठक में शामिल हुआ। उसमें यह रिसर्च दिखा रहे थे जिसके अनुसार श्वास व्यायाम से व साँस भरते समय पूरी छाती फैलाने से रक्तचाप कम हो जाता है। हालाँकि मुझे लगता है कि साँस रोकने से रक्तचाप ज्यादा नीचे गिरता है। जब मैं खाली श्वास व्यायाम करता था, तब मुझे इसका अहसास नहीं हुआ, पर जब प्राणायाम साँस रोककर करने लगा तो मेरा रक्तचाप 70-100 तक गिर गया। सामान्य स्तर 80-120 होता है। जब मैंने बैठक में विशेषज्ञ से पूछा कि क्या ऐसा हो सकता है, तो उन्होंने कहा कि इतना नीचे गिरना तो सामान्य है, पर बहुत ज्यादा नहीं गिरता। बड़ा कुछ बता रहे थे कि रक्तवाहिनी की दीवार में यह रसायन निकलता है, वह अभिक्रिया होती है आदि। मुझे वह ज्यादा समझ नहीं आया। मैं तो काम की बात पकड़ता हूँ। सबसे बड़ी प्रयोगशाला या प्रमाण तो अनुभव ही है। अध्यात्म के क्षेत्र में विज्ञान अनुभव तक ही ज्यादा सीमित रहे, तो ज्यादा अच्छा है। यदि वैज्ञानिक प्रयोग से प्रमाण मिल गया, तो लोग अपने अनुभव के प्रमाण का प्रयोग कम भी कर सकते हैं। मैं वैज्ञानिक प्रयोगों के खिलाफ नहीं हूं, पर यदि कोई किसी बात को सिद्ध करने के लिए अपने अनुभव का हवाला न देकर केवल वैज्ञानिक प्रयोग का हवाला दे, तो उसमें जीवंतता नहीं दिखाई देती। जिसको योग के महत्त्व का पता है, वह बिना वैज्ञानिक प्रयोग के व केवल औरों के अनुभव को प्रमाण मानकर खुद भी उसको अनुभव करने की कोशिश करेगा। फिर मैं बता रहा था कि बड़े पैमाने पर जागृति प्राप्त करने के लिए योगा से भरी हुई वैदिक जीवन परंपरा को अपनाना कितना जरूरी है। एक न एक दिन सभी को जागृत होना पड़ेगा। कब तक सच्चाई को नजरअंदाज करते रहेंगे। बिल्ली के पंजे में फंसा कबूतर अगर आंख बंद कर दे, तो बिल्ली भाग नहीं जाती।

मस्तिष्क के सभी भाव प्राण के रूप में कुन्डलिनी रूपी भगवान को अर्पित हो जाते हैं

जो गीता में भगवान यह कहते हैं कि अपने सभी क्लेश, विचार, सुख, दुख मुझे अर्पण कर। यह कुंडलिनी योग की तरफ इशारा है। भगवान इसमें कुंडलिनी है। प्राण अपान की टक्कर में जो मस्तिष्क का विचार-कचरा व ऊर्जा कुंडलिनी पर डाला जाता है, उससे कुंडलिनी चमकती है। यही वह अर्पण करना या हवन करना है। प्राण को अपान में हवन करने वाला गीता वाला श्लोक भी यही इशारा करता है। प्राण वाला मस्तिष्क-विचार निचले चक्रों पर स्थित अपान वाली कुंडलनी पर डाला जाता है। उससे कुंडलिनी आग भड़कती है। प्राण का प्राण में हवन भी वहीँ लिखा है। उसमें मन में सभी कुछ प्राण है। भगवान के रूप में कुन्डलिनी हृदय चक्र पर है। मन और हृदय दोनों ही स्थानों पर प्राण है। मैंने पिछली पोस्ट में कहा था कि चक्र के ऊपर कुंडलिनी का ज्योतिर्लिंग और शिवबिन्दु के साथ ध्यान करना चाहिए। शायद इसीलिए उन स्थानों का नाम चक्र पड़ा हो, क्योंकि जब पीठ वाले चक्र पर ज्योतिर्लिंग या शिवलिंग का ध्यान करते हैं, तो उसके काऊंटरपार्ट अगले चक्र पर शिवबिन्दु प्रकट हो जाता है। चक्र खोखले पहिए को भी कहते हैं। 

कुन्डलिनी से ही एक आदर्श जागृति शुरु होनी चाहिये, और कुन्डलिनी पर ही खत्म

मैं यह भी बता रहा था कि यदि ऊर्जा की नदी मूलाधार से मस्तिष्क में पहुंचती है, और उस समय मस्तिष्क में कुंडलिनी प्रभावी न हो, तो वहां के विचार या चित्र बड़ी स्पष्टता से कौंधते हैं, पर जागृत नहीं होते। पर यदि वहाँ ऊर्जा काफी अधिक और ज्यादा समय के लिए बनी रहे, तो जागृति भी हो जाती है। उसमें सभी चीजों के साथ अपना पूर्ण जुड़ाव महसूस होता है, जिसे पूर्ण अद्वैत कहते हैं। पर कोई विशेष चित्र पहचान में नहीं आता, जिससे पूर्ण जुड़ाव शुरु हुआ हो। वह इसलिए भी पहचान में नहीं आता क्योंकि आदमी ने कुंडलिनी के रूप में विशेष मानसिक चित्र साधना के लिए बनाया ही नहीं होता है। मतलब वह कुंडलनी साधना कर ही नहीं रहा होता है। बेशक आध्यात्मिकता को अभिव्यक्त करने के लिए बाद में मन में कुन्डलिनी मजबूत हो जाती है, पर वह कामचलाऊ व अस्थायी लगती है मुझे। स्थायी और असली कुन्डलिनी तो वही लगती है मुझे, जिससे मस्तिष्क में जागृति शुरु होती हुई, और जिसमें खत्म होती हुई दिखती है। उस कुन्डलिनी के स्मरण से वह शुरु होती है। फिर जागृति खत्म होते ही कुन्डलिनी मस्तिष्क से नीचे उतरकर आज्ञाचक्र पर आते दिखती है, और वहाँ से नीचे अनाहत चक्र पर। फिर उसे सभी चक्रों पर आसानी से घुमा सकते हैं। वैसे तो हर प्रकार की जागृति फायदेमंद है, पर मैं कुन्डलिनी से शुरु होने वाली जागृति को सर्वोत्तम कहूँगा।

कुन्डलिनी ऊर्जा का प्रवाह बारी-2 से शरीर के दाएं, बाएं और मध्य भाग में चलता रहता है, नथुनों से बहने वाले श्वास की तरह

योगासन इसलिए किए जाते हैं ताकि कहीं न कहीं कुंडलिनी एनर्जी पकड़ में आ जाए। यह ऊर्जा पूरे शरीर में है। पर यह कभी किसी चक्र पर तो कभी किसी दूसरे चक्र पर ज्यादा प्रभावी होती है। इसलिए पूरे शरीर के जोड़ों के बैंड या मोड़ आदि से यह कहीं न कहीं पकड़ में आ ही जाती है। मुझे इस हफ्ते नया प्रेक्टिकल अनुभव मिला है। ये जो बारी बारी से शरीर के बाएं और दाएं, दोनों किनारों का योगासन किया जाता है, वह बाईं और दाईं मुख्य नाड़ी से ऊर्जा को ऊपर चढ़ाने के लिए किया जाता है। इससे ऊर्जा संतुलित होकर खुद ही बीच वाली नाड़ी में आ जाती है। सीधे ही ऊर्जा को बीच वाली नाड़ी से चढ़ाना कठिन होता है। बाईं नाड़ी को इड़ा, दाईं को पिंगला और बीच वाली नाड़ी को सुषुम्ना कहते हैं। उदाहरण के लिए, जब मैं शलभासन को बाईं भुजा और दायाँ पैर उठाकर करता हूँ, उस समय कुन्डलिनी ऊर्जा इड़ा नाड़ी से ऊपर चढ़कर बाएँ मस्तिष्क को जाती है। वहां से उसे मैं आज्ञा चक्र की ओर तिरछा रीडायरेक्ट करता हूँ। इससे वह नीचे उतरकर और फिर मूलाधार से ऊपर चढ़कर सुषुम्ना में आने की कोशिश करती है। जब उसे दाईं भुजा और बायाँ पैर उठाकर करता हूँ, तब पिंगला से ऊपर चढ़ कर दाएँ मस्तिष्क को जाती है। उसे रीडायरेक्ट करने से लगभग वैसा ही होता है। एक हल्की सी अवेयरनेस आज्ञा चक्र पर भी रखता हूँ। उससे वह ऊर्जा केंद्रीय रेखा में आने की कोशिश करती है। आज्ञा चक्र नाम ही इसलिए पड़ा है क्योंकि यह कुंडलिनी शक्ति को सीधा बीच वाली नाड़ी में चलने की आज्ञा देता है। साथ में, मूलाधार संकुचन पर भी हल्की सी मानसिक नजर रखता हूँ। फिर ऊर्जा को जाने देता हूँ अपनी मर्जी से, वह जहाँ जाना चाहे। मैं देखता हूँ कि वह फिर बड़ी विवेक बुद्धि से खुद ही वहाँ जाती है, जहाँ ऊर्जा की कमी है। वह कमी पूरा होने पर उसके विपरीत भाग में चली जाती है, ताकि ऊर्जा संतुलन बना रहे। फिर बीच वाले चैनल में आ जाती है। वहाँ से वह शरीर के दोनों तरफ के हिस्सों को कवर करने लगती है। ये सभी पीठ व मस्तिष्क के हिस्से होते हैं। वह किसी पाईप में पानी की गश की आवाज की तरह चलती है। इसीलिए नाड़ी नाम भी नदी से ही बना है। शरीर के अगले भाग के हिस्से तब कवर होते हैं, यदि मैं हल्का सा ध्यान तालू को छूती हुई उलटी जीभ पर भी रखूं। तब वह आगे की नाड़ी से नीचे उतरकर नाड़ी लूप में घूमने लगती है।

साँस भरकर रोकने से कुन्डलिनी ऊर्जा पीठ में ऊपर चढ़ती है

योगासन इसीलिए बने हैं, ताकि उनसे नाड़ियों में बहती ऊर्जा का अनुभव होए, तथा उस बहती ऊर्जा से पूरा शरीर सिंचित होकर स्वस्थ रह सके। कर्मयोगी की ऊर्जा तो काम करते हुए खुद भी बहती रहती है, हालाँकि योगा द्वारा बहाव जितनी नहीं। इसकी सख्त जरूरत तो ध्यानयोगी को थी, क्योंकि उन्हें ध्यान लगाने के लिए ज्यादातर समय बैठे रहना पड़ता था। वैसे यह स्पष्ट है कि यदि भौतिक रूप से क्रियाशील रहने वाले लोग भी योगा करे, तो उन्हें भी बहुत लाभ होगा। मैंने इस हफ्ते नई बात नोट की। सांस भर कर रोकने से कुण्डलिनी ऊर्जा अच्छे से पीठ से ऊपर चढ़ रही थी, और वह मस्तिष्क में गशिंग पैदा कर रही थी। यही बात उपरोक्त बैठक में भी बता रहे थे कि साँस भरते हुए सेरेब्रोस्पाइनल फ्लुड रीढ़ की हड्डी में ऊपर चढ़ता है। कई वैज्ञानिक प्रकार के लोग बोलते हैं कि कुंडलनी ऊर्जा इसी के थ्रू जाती है। पर संशय होता है, क्योंकि कुंडलनी ऊर्जा तो एकदम से ऊपर चढ़ती है, पर सीएसएफ धीरे धीरे चलता है। हो सकता है कि जब वह मस्तिष्क में पहुंच जाता हो, तभी ऊर्जा के ऊपर चढ़ने का आभास होता हो। इसीलिए तो कुछ समय तक श्वास या अन्य योग अभ्यास करने के बाद ही ऊर्जा ऊपर चढ़ती महसूस होती है, एकदम से नहीं। इसीलिए  सांस रोककर योग करने को कहते हैं। हालांकि इसके लिए शायद पहले सांस लेते हुए योग करने का काफी लम्बा अभ्यास का अनुभव चाहिए होता है। सांस भरकर रोककर दरअसल  पिछले मणिपुर चक्र में गड्ढा बनने से ऊर्जा के प्रवाह की दिशा पीठ में ऊपर की ओर होती है। फिर थोड़े ध्यान से वह ऊर्जा गति पकड़ती है। सांस लेने व छोड़ते रहने से ऊर्जा अपनी दिशा लगातार बदलती रहती है, इससे ऊर्जा को पर्याप्त वेग नहीं मिल पाता। सांस भरने से वह ऊपर की ओर चढ़ती है, और सांस छोड़ते हुए नीचे की तरफ उतरती है।

बाइकिंग कुन्डलिनी योगा

मैं इस हफ्ते एक दिन साईकिल पर अपने काम गया। मैंने महसूस किया कि साईकिल की सीट का अगला नुकीला हिस्सा सिद्धासन में पैर कि एड़ी का काम करता है। जब मैं फिसल कर आगे को होता था, तब मेरी कुण्डलिनी ऊर्जा लूप में घूमने लगती थी। इसलिए मोटरसाइकिल पर भी सबसे आगे, फ्यूल टैंक से सट कर बैठने को कहा जाता है। यह मूलाधार पर तेज दबाव के कारण मोटरसाइकिल की सवारी को सुखद बनाता है। दरअसल प्राण तो इधर उधर के दृश्य मस्तिष्क में पड़ने से पहले ही सक्रिय था। मेरे सिर पर लगे हेलमेट ने उसे और ज्यादा सक्रिय कर दिया था। सीट के द्वारा मूलाधार पर दबाव पड़ने से अपान भी सक्रिय हो गया। मस्तिष्क या प्राण पर तो पहले से ही ध्यान था। मूलाधार पर संवेदना से अपान पर भी ध्यान चला गया। अपान पीठ से ऊपर चढ़ने लगा, तो प्राण आगे से नीचे उतरने लगा। कुण्डलिनी चक्र पूरा होकर प्राण और अपान का मिलन भी हुआ। इससे संगम हुआ और कुण्डलिनी लाभ मिला। बाइकिंग कुन्डलिनी योगा पर मैंने एक पहले भी पोस्ट लिखी है। बाइसाइकिल खासकर स्पोर्ट्स वाली और हल्की बाईसाईकिल से मूलाधार चक्र बहुत बढ़िया क्रियाशील होता है। बाइकिंग के बाद जो कई दिन तक आनन्द व हल्कापन सा छाया रहता है, वह इसी वजह से होता है। ध्यान रहे कि साइक्लिंग वाले दिन न ज्यादा, और न कम खाएं। योग के लिए भी ऐसा ही कहा जाता है। वास्तव में ज्यादा पेट भरने से साँसें भी ढंग से नहीं चलतीं, और कुन्डलिनी ऊर्जा भी ढंग से नहीं घूमती। कम खाने से कमजोरी आ सकती है। पेट पर बोझ महसूस नहीं होना चाहिए। मैंने तो यहाँ तक देखा है कि संतुलित मात्रा में खाने के बाद यदि आधा रोटी या दो चार चम्मच चावल भी ज्यादा खा लो, तो भी पेट पर बोझ आ जाता है। इसलिए एकबार भोजन से तृप्ति का एहसास होने पर उठ जाना चाहिए। बाइकिंग योगा जैसा लाभ हमेशा लिया जा सकता है, यदि आदमी को मूलाधार नियंत्रित करने में महारत हासिल हो जाए। यदि केवल मूलाधार को ही ऊपर की तरफ संकुचित करेंगे, तो थकान ज्यादा महसूस होती है। यदि आगे से पीछे तक के मूलाधार क्षेत्र को हल्का सा संकुचित करेंगे तो उसमें मूलाधार भी शामिल हो जाता है, स्वाधिष्ठान चक्र भी, और थकान भी कम महसूस होती है। प्रभाव भी ज्यादा पैदा होगा। निचले क्षेत्र के किसी भी भाग का संकुचन हो, तो भी काम कर जाता है। पर ध्यान रहे, कोई खास दिमागी काम करते हुए जैसे ड्राईविंग या मशीनरी ऑपरेट करते समय ध्यान मस्तिष्क पर ही रहना चाहिए। इससे ऐसा होगा कि मस्तिष्क की अतिरिक्त ऊर्जा नीचे चली जाएगी, जिससे फालतू विचारों से निजात मिलेगी और कार्यकुशलता में इजाफा होगा। यदि पूरा ध्यान नीचे जाने दिया, तो कार्यकुशलता में गिरावट आ सकती है। मैं देखता हूँ कि अविभाज्य प्राणों का विभाजन भी कितनी वैज्ञानिकता से किया गया है। यदि मस्तिष्क ज्यादा क्रियाशील हो तो प्राण व अपान के मिलान से प्राण के साथ कुंडलिनी अनाहत चक्र पर पहुंच जाती है। इसीलिए प्राणों का क्षेत्र ऊपर से नीचे अनाहत चक्र तक कहा गया है। यदि नीचे के, मूलाधार के आसपास के क्षेत्र ज्यादा क्रियाशील हों, और मस्तिष्क विचारशून्य सा हो, तो दोनों के मिलान से कुंडलनी नाभि चक्र पर स्वाधिष्ठान चक्र पर अभिव्यक्त होती है। इसीलिए कहा गया है कि अपान का क्षेत्र नीचे से ऊपर की ओर मणिपुर चक्र तक है। वैसे तो वहाँ समान प्राण का अधिकार बताया गया है, पर वह भी अपान का ही एक हिस्सा लगता है, या वहां अपान प्राण से ज्यादा ताकतवर लगता है। समान नाम ही इसलिए पड़ा है क्योंकि वहां प्राण और अपान का लगभग समान योगदान प्रतीत होता है।

मूलाधार पंप कुन्डलिनी योग का सर्वप्रमुख औजार है

मैंने यह भी नोट किया कि सिर्फ मूलाधार पंप से कुन्डलिनी को आगे के और पीछे के चक्रों पर आसानी से घुमा सकते हैं। पहले कुन्डलिनी मस्तिष्क से हृदय चक्र तक उतरती है। जरूरत के अनुसार चलाए गए मूलाधार पंप से काफी देर वहाँ स्थिर रहती है। फिर वहां से नीचे मणिपुर चक्र को उतरती है। वहाँ भी इसी तरह काफी देर स्थिर रहके वह स्वाधिष्ठान चक्र तक नीचे उतरती है। मैंने महसूस किया कि वह वह वहाँ से सीधे ही पीठ से ऊपर चढ़कर मस्तिष्क में गशिंग पैदा करती है। वैसे कहते हैं कि मूलाधार चक्र से कुन्डलिनी वापिस मुड़ती है। वैसे भी मूलाधार पंप से वह लगातार सक्रिय बना ही रहता है। आज्ञा चक्र पर हल्का ध्यान लगाने से वह गशिंग और भी ज्यादा हो जाती है, और केंद्रीय रेखा में भी आ जाती है। मुझे लगता है वह गशिंग रक्तवाहिनियों में दौड़ रहे रक्त की आवाज होती है। रक्त वाहिनियाँ भी नाड़ी या नदी की तरह होती हैं। वहाँ पर अन्य विचार भी होते हैं, हालाँकि मूलाधार पंप से उनकी ताकत पहले ही कुन्डलिनी को लग चुकी होती है। इसलिए वे कमजोर होते हैं। फिर जब फिर से मूलाधार पंप लगाया जाता है, तो वह कुन्डलिनी फिर मूलाधार चक्र तक पहुंच जाती है, और फिर पीठ से ऊपर चढ़ जाती है। काफी तरोताजा महसूस होता है। इस तरह यह क्रम काफी देर तक चलता है। अब और देखता हूँ कि और आगे क्या होता है। हाँ, फिर थोड़ी देर कुन्डलिनी मस्तिष्क में क्रियाशील रही, मतलब वह सहस्रार चक्र पर आ गई। जब सहस्रार चक्र थक गया तब वह आगे से आज्ञा चक्र को उतर गई। लगभग 5-10 मिनट तक कुन्डलिनी एक चक्र पर रही। जब चक्र लगातार सिकुड़न लगा कर थक जा रहा था, तब कुन्डलिनी अगले चक्र पर आ रही थी। मैं रिवोल्विंग और बैक पीछे को एक्सटेंड होने वाली चेयर पर आराम से अर्धसुषुप्त सी पोजिशन में लेटा था। जरूरत के हिसाब से हिल भी रहा था। जब मैं कोई अन्य काम कर रहा होता था, या उठकर चल रहा होता था, तब कुन्डलिनी एक ही चक्र पर ज्यादा देर ठहर रही थी। ऐसा इसलिए क्योंकि चक्र पर लगातार सिकुड़न न होने से वह चक्र थक नहीं रहा था। 5 मिनट बाद आज्ञा चक्र शिथिल हो गया, और कुन्डलिनी विशुद्धि चक्र को उतर गई। इस बार अगले चक्र के साथ पिछले चक्र भी एकसाथ क्रियाशील हो रहे थे, ऐसा लग रहा था कि एक लाइन से जुड़कर दोनों चक्र एक हो गए थे। चक्र पर कुन्डलिनी भी ज्यादा स्पष्ट लग रही थी। एक चक्र से दूसरे चक्र को कुन्डलिनी का गमन ज्यादा स्पष्ट अनुभव हो रहा था। शायद ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि कुन्डलिनी के पहले राऊंड से सभी चक्र तरोताजा व अनवरुद्ध हो गए थे। इस बार उल्टी जीभ को तालु से टच करने से कुन्डलिनी विशुद्धि चक्र पर ज्यादा स्पष्ट थी। लगभग 5 मिनट बाद वह अनाहत चक्र को उतर गई। वहाँ वह मूलाधार पम्प के बिना भी बड़ी देर तक स्पष्ट चमक रही थी। चक्र ऐसे तो लगते नहीं मुझे जैसे कोई सीमांकित पहिया हो। मुझे तो सामान्य क्षेत्र के केंद्र का ही भान होता है। जैसे अनाहत चक्र, हृदय के क्षेत्र का लगभग केंद्र। हाँ, कई बार उस क्षेत्र की सिकुड़न से एक बिंदु जैसा जरूर प्रतीत होता है उस क्षेत्र के बिल्कुल केंद्र में, जहाँ सिकुड़न और ऐंठन सबसे ज्यादा और पिनपॉइंटिड सी प्रतीत होती है। शायद इसी बिंदु को चक्र कहते हैं। हालाँकि यह तेज और काफी देर के ध्यान से बनता है। इस पर कुन्डलिनी तेज चमकती है। आमतौर पर तो कुन्डलिनी ध्यान चक्र क्षेत्र में ही होता है, एगजेक्ट चक्र पर नहीं। जैसे रथ के एक हिस्से का पूरा भार उस हिस्से के पहिए पर रहता है, वैसे ही शरीर के एक पूरे चक्र क्षेत्र की ताकत उस क्षेत्र के चक्र में होती है। उसको तन्दरुस्त करके पूरा क्षेत्र तन्दरुस्त हो जाता है। लगभग 5 या 7 मिनट बाद अनाहत चक्र के थकने पर मेरा पेट अंदर को सिकुड़ता है और एक साँस की हल्की गैस्प सी निकलती है। इसके साथ ही कुन्डलिनी मणिपुर या नाभि चक्र पर पहुंच जाती है। वहाँ लगभग 10 मिनट रही। उसके थकने से कुन्डलिनी शक्ति नीचे कहीं उतरती है। उस को थोड़े ध्यान से ढूंढने पर वह स्वाधिष्ठान चक्र पर सैटल हो गई। फिर वह पीठ से सहस्रार को चढ़ने लगी व आगे से उतरकर वहीं पहुंचने लगी। मूलाधार पंप का रोल यहाँ ज्यादा अहम हो गया। गशिंग के साथ वह लगभग 5 मिनट तक सहस्रार व स्वाधिष्ठान चक्र के बीच झूलती रही। फिर वह मूलाधार चक्र पर टिक गई। फिर वह दुबारा सहस्रार में सेटल हो गई। मस्तिष्क में कुन्डलिनी के इलावा अन्य भी हल्के फुल्के विचार रहते हैं। पर कुन्डलिनी ही ज्यादा प्रभावी रहती है, और उनकी शक्ति भी कुन्डलिनी को मिलती रहती है। अन्य चक्रों पर तो केवल कुन्डलिनी ही रहती है। लगभग 5 मिनट सहस्रार में रहकर वह फिर नीचे उतरने लगी। वह इसी क्रम में पहले आज्ञा चक्र को, फिर विशुद्धि चक्र को उतरी। मुझे फिर किसी जरूरी काम से उठना पड़ा। लगभग डेढ़ घण्टे के करीब यह सिलसिला चलता रहा। मैंने यह भी देखा कि जब कुंडलिनी अपने दूसरे और तीसरे दौर में आधार चक्रों में थी, तब एक मामूली सी जननांग सनसनी पैदा हुई थी, जिसमें एक मामूली सा तरल पदार्थ निकलता महसूस हुआ। एकबार मैंने नोट किया कि मस्तिष्क की यादों की झोली से एक आसक्ति से युक्त आदमी का चित्र प्रकट हुआ। वह मूलाधार पंप से भी नीचे नहीं उतर रहा था। कई बार पंप लगाने पड़े। औसत से ज्यादा ऊर्जा खर्च करनी पड़ी। उसके नीचे उतरने से उसकी शक्ति कुन्डलिनी को लग गई और वह चमकने लगी। इसीलिये कहा जाता है कि कुन्डलिनी योग के अभ्यास से पहले काफी समय तक दैनिक जीवन में अनासक्ति व अद्वैत का अभ्यास होना चाहिए। इससे मन के दोष खुद ही खत्म हो जाते हैं। इससे योग करना भी काफी आसान और मनोरंजक हो जाता है। यही बात मैं पिछ्ली पोस्ट में कह रहा था कि सबसे पहले योग प्रशिक्षण लेने के इछुक को मैं शरीरविज्ञान दर्शन पुस्तक पढ़ने की और उसे कुछ सालों तक जीवन में ढालने की सलाह देता हूँ। उससे जब सच्चाई का पता चलता है, तो आदमी खुद ही अपने शौक से कुन्डलिनी योग सीखने लगता है। वह किसी बाध्यता या डर से ऐसा नहीं करता। इससे वह जल्दी और पूरा सीख जाता है। इसलिए कार्य की सफलता में सबसे बड़ा निर्णायक दृष्टिकोण होता है। 90% योग तो इस सकारात्मक दृष्टिकोण से हो जाता है। बाकि का 10% कुंडलिनी योग से पूरा होता है। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ, तभी बता रहा हूँ। दरअसल मानवतावादी लाइफस्टाइल व दृष्टिकोण भी नहीं बदलना है। लाइफस्टाइल व दृष्टिकोण तो समसामयिक परिस्थितियों के अनुसार अपनाना ही पड़ता है। केवल यह करना है कि अपनी वर्तमान हालत पर अद्वैत दृष्टिकोण का अतिरिक्त चोला पहनाना है बस। बदलना कुछ नहीं है। आप जैसे हो, बहुत अच्छे हो।

कुन्डलिनी ही बारडो की भयानक अवस्था से बचाती है

आज भी पहले भी वर्णित किए गए एक मित्र द्वारा भेजा गया गीता का श्लोक मेरे दिल को छू गया। मैं उसे यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ।
प्रयाणकाले मनसाचलेनभक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥८- १०॥वह भक्ति युक्त पुरुष अन्तकाल में भी योगबल से भृकुटी के मध्य में प्राण को अच्छी प्रकार स्थापित करके, फिर निश्चल मन से स्मरण करता हुआ उस दिव्य रूप परम पुरुष परमात्मा को ही प्राप्त होता है॥10॥इसका अर्थ मुझे यही लगता है, जो मैंने ऊपर वर्णित किया है। मस्तिष्क के विचारों पर ध्यान के साथ भौंहों के बीचोंबीच स्थित आज्ञाचक पर भी ध्यान लगने दो। इससे प्राण केंद्रीय नाड़ी लूप में चलने लगता है, और मस्तिष्क में फालतू विचारों का स्थान कुन्डलिनी ले लेती है। प्राण के साथ कुंडलिनी भी होती है। केंद्रीय चैनल में, कुंडलिनी हमेशा प्राण के साथ रहती है। क्योंकि केंद्रीय चैनल अद्वैत चैनल है, और कुंडलिनी हमेशा अद्वैत के साथ होती है। कुंडलिनी ही तो परमात्मा तक ले जाती है। मुझे लगता है कि हर कोई परमात्मा तक पहुंच सकता है, पर ज्यादातर लोग मृत्यु के बाद के अंधेरे से घबराकर जल्दी ही नया शरीर धारण कर लेते हैं। हालाँकि अच्छा बुरा शरीर उन्हें अपने कर्मों के अनुसार मिलता है। शरीर के चुनाव में शायद उनकी मर्जी नहीं चलती। पर कुंडलिनी योगी को कुंडलिनी के प्रकाश से सहारा मिलता है। इसलिए वह लंबे समय तक परमात्मा में मिलने के लिए प्रतीक्षा कर सकता है। बुद्धिस्ट लोग भी लगभग ऐसा ही मानते हैं। वे मृत्यु के बाद की डरावनी अवस्था को बारडो कहते हैं।

कुन्डलिनी डीएनए को भी रूपांतरित कर देती है

मुझे लगता है कि कुंडलिनी आदमी का डीएनए भी रूपांतरित कर देती है। कुंडलिनी जागरण से ऐसा ज्यादा होता है। यदि मन के विचारों को नीचे उतारा जाए तो वे नीचे के सभी चक्रों पर कुंडलिनी में रूपांतरित हो जाते हैं। वैसे भी शरीर के हरेक सेल में दिमाग होता है। इन बातों की ओर वैज्ञानिक प्रयोग भी कुछ इशारा करते हैं।

कुंडलिनी साधना के लिए सन्ध्या या संगम का महत्त्व

करोल पर्वत

रति दक्ष की पुत्री और ब्रह्मा की पौत्री है

मित्रों, पिछली पोस्ट कुछ छोटी थी, इस बार लॉन्गरीड आर्टिकल पढ़ने के लिए तैयार हो जाइए। पिछली पोस्ट में मैंने रति को ब्रह्मा की पुत्री कहा था। वास्तव में वह दक्ष की पुत्री है। बात एक ही है, क्योंकि दक्ष ब्रह्मा का मानस पुत्र है। दक्ष का मतलब होता है निपुण। जब आदमी अपने मन में दुनियादारी में निपुणता अर्थात कर्मयोग का संकल्प लेकर उसे अपनाता है, तो उसके मन में एक कुंडलिनी पैदा हो जाती है। यही दक्ष के पसीने से अर्थात कर्मयोग से रति अर्थात कुंडलिनी का जन्म है। यही मैंने पिछली पोस्ट में भी लिखा है कि कुंडलिनी को पहले कर्मयोग से पैदा करके विकसित करना पड़ता है, तब जाकर ही इसका समर्पित तंत्रयोग के साथ सफलतापूर्वक गठजोड़ बनाया जा सकता है।

धर्म विवेक बुद्धि का प्रतीक है

कथा के अनुसार धर्म ने ब्रह्मा को संध्या के प्रति  कामवासना से रोकना चाहा, पर वे नहीं रुके। तब धर्म ने शिव से ब्रह्मा को रोकने के लिए गुहार लगाई। धर्म या विवेक या बुद्धि भी ब्रह्मा का मानस पुत्र ही है। है तो यह भी विचार रूप ही, बेशक बुद्धि को मन से बड़ा कहा जाता हो। यह वास्तव में अच्छे और बुरे का ज्ञान है। पर कामवासनाओं से पीड़ित आदमी अक्सर इसकी बात नहीं सुनता। जब धर्म यह देखता है कि उससे बात नहीं बन रही, तब वह कुंडलिनी रूप शिव को याद करता है। वह उसी समय प्रकट होकर आदमी को गलत काम करने से रोकता है। तभी तो कहते हैं कि ईश्वर या कुंडलिनी बुद्धि से भी परे है। जहाँ बुद्धि या दिमाग भी हार जाता है, वहाँ कुंडलिनी को याद करके लाभ मिलता है। यदि प्रतिदिन के योगाभ्यास से हमेशा ही कुंडलिनी को याद रखा जाए, तब तो कहने ही क्या।

संध्या काल अद्वैत का प्रतीक है

संध्या स्त्री संध्या काल (डस्क और डान) का ही रूपक है, इसकी ओर इशारा वहीँ एक श्लोक से किया गया है, जिसमें लिखा गया है कि कामदेव रति के साथ ऐसे सुशोभित हो रहा था, जैसे संध्या काल में बादल के साथ चमकती बिजली। संध्या शब्द संस्कृत के संधि शब्द से बना है, जिसका अर्थ होता है, जोड़। संध्या में सभी विपरीत भाव जुड़े होते हैं। इस तरह से संध्या ईश्वर या अद्वैत के समतुल्य है। संध्या के समय दिन-रात के संतुलित होने से आदमी भी संतुलित हो जाता है। दरअसल संध्याकाल में दिन और रात के अंश बराबर होते हैं। संध्याकाल में आदमी का बायाँ व दायाँ मस्तिष्क समान चलने लगते हैं। उसके यिन और यांग बराबर हो जाते हैं। उसके दोनों नथुनों से बराबर साँस चलने लगती है। पिछली पोस्ट में जो मैंने प्राण और अपान को जोड़ने की योग तकनीक का वर्णन किया था, वह भी संध्या के तुल्य ही है। दरअसल जहाँ भी दो परस्पर विपरीत भाव आपस में जुड़ते हैं, वहाँ संध्या बन जाता है। उस शांत स्थिति में सभी काम विशेषकर आध्यात्मिक काम ज्यादा सफल होते हैं। संध्याकाल पूजापाठ से इतना ज्यादा जुड़ा है कि पूजा करने को संध्या करना ही कहा जाता है। इसी तरह ग्रहण काल भी एक संध्या काल है। उसमें किए काम कई गुना फल देते हैं। इसलिए कहते हैं कि ग्रहण काल में अच्छे व आध्यात्मिक काम ही करने चाहिए। पुराने समय में राजा लोग एकदम से राज्य छोड़कर तप के लिए वन चले जाया करते थे। वनवास का कुछ दिनों का शुरुआती समय भी उनके लिए महान संध्या काल की तरह होता था। उस समय वे कुंडलिनी साधना करके शीघ्रता से अपनी कुंडलिनी को जगा दिया करते थे। इसी तरह योगसाधना से बने प्रकाशमान चित्त में जो तांत्रिकों के द्वारा पंचमकारों से उत्पन्न अंधकार प्रविष्ट कराया जाता है, उससे भी उत्तम कोटि का बनावटी संध्या काल बनता है। उसमें वे बहुत सी सिद्धियां प्राप्त करते हैं, कुंडलिनी जागरण भी जिनमें एक है। इलाहाबाद के संगम में गंगा और यमुना नदियां मिलती हैं। ये दोनों नदियां परस्पर विपरीत गुणों वाली हैं। इससे बहुत अच्छा संध्या स्थान बनता है। इसिलए संगम को बहुत पवित्र माना जाता है। योगी लोग योग साधना के लिए गहन पहाड़ों व वनों में इसीलिए जाते हैं क्योंकि वहाँ उन्हें संगम का आभास होता है। कई धर्मों में कन्या को इसीलिए पूजा जाता है क्योंकि कन्या में स्त्री और पुरुष दोनों का संगम होता है।

सांयकालीन संध्या के समय भ्रमण से आनन्द तो मिलता है, पर कुंडलिनी विकास केवल योगी का ही होता है

आदमी के सौंदर्य में वृद्धि हो जाने के कारण वह संध्या काल में आसानी से काम का शिकार बन सकता है। इसकी मुख्य वजह यह है कि यौन प्रेमी के मन में अपने यौन साथी के रूप की कुंडलिनी बसी होती है। संध्या के समय वह प्रबल रूप में चमकने लगती है। उस समय यदि ऐसा व्यक्ति आचारहीन लोगों की संगति में हो, तो वह यौन कुंडलिनी से प्रेरित कामवासना के प्रभाव में आकर गलत कदम उठा सकता है। उससे उसके मन की कुंडलिनी को भी भारी क्षति पहुंच सकती है। परंतु यदि वह सदाचारी मित्रों व लोगों की संगति में हो, तो उनके प्रभाव में रहते हुए वह गलत कदम उठा ही नहीं पाता। वह कुंडलिनी को वश में कर लेता है, कुंडलिनी के वश में नहीं होता। इससे उसकी कुंडलिनी उत्तरोत्तर वृद्धि करती हुई उसे कुंडलिनी जागरण या सीधे ही आत्मज्ञान तक ले जाती है। इसीलिए संध्या के समय में आध्यात्मिक माहौल में रहने के लिए कहा जाता है। वैसे भी लोग संध्या के समय मॉल पर टहलने निकलते हैं। इधर-उधर के फालतू विचार उमड़ने से आनन्द तो मिलता है, पर उससे सांसारिक द्वैत रूप भ्रम में ही वृद्धि होती है। योगी लोग ऐसे समय में आसानी से पहचाने जा सकते हैं। उनके चेहरे पर कुंडलिनी के प्रभाव से विशेष चमक और शान्ति झलकती है। संध्या के समय मस्तिष्क के दोनों गोलार्धों के बराबर व दक्षता से चलने से मानसिक शक्ति चरम पर होती है।

संध्या कालीन काम से यदि आम आदमी भ्रम में पड़ता है, तो तंत्रयोगी कुंडलिनी को मजबूत करता है

वास्तव में ब्रह्मा एक आम आदमी ही है। हरेक चीज की उत्पत्ति आदमी के मन में ही होती है। बाहर कुछ नहीं है। ये पर्वत,महासागर, चाँद, सितारे, सब मन की ही उपज हैं। इसी तरह संध्या का समय भी मन में ही बना। संध्या के समय कामभावना जागृत होने का मतलब है, संध्या के ऊपर आसक्त होना। संध्या ने बाद में लज्जा महसूस करते हुए तप करते हुए देहत्याग का विचार किया। इसका मतलब है कि वह अपने असली पवित्र काल के रूप को खोने जा रही थी। फिर ब्रह्मा, शिव आदि देवताओं ने उसकी शादी आध्यात्मिक ऋषि वसिष्ठ से करवा दी। मतलब कि संध्या काल फिर से आध्यात्मिक काम के लिए निर्धारित हो गया। तांत्रिक क्रियाएं इसमें अपवाद हैं। बेशक वे बाहर से भौतिक व सकाम लगें, पर अंदर से वे आध्यात्मिक ही होती हैं। इसीलिए तांत्रिक क्रियाएं भी ज्यादातर संध्या काल में ही की जाती हैं। कामदेव को ब्रह्मा ने भस्म होकर नष्ट हो जाने का श्राप दिया, क्योंकि उसने संध्या काल में ऋषियों और देवताओं को परेशान किया था। तो यह आम आदमी के लिए डर वाली बात है, क्योंकि वे काम के सहारे ही तो जीते हैं। वैसे भी, पूरे दिनभर के कामकाज से आदमी सन्ध्या के समय थका हुआ सा रहता है। इसी तरह सुबह उठकर नींद से पैदा हुई सुस्ती जैसी रहती है। यही संध्या को मिला शिव का वरदान है कि उसे काम परेशान नहीं करेगा। मतलब कि उस समय उनकी भौतिक कामनाएं व यौन कामनाएं नष्ट जैसी हो जाती हैं। एकप्रकार से काम थका हुआ सा होता है, पूरा नष्ट नहीं हुआ होता है। काम का पूर्ण नाश तो तंत्रयोगी ही कर पाते हैं। इसलिए तंत्रयोगियों के लिए यह काल वरदान है, क्योंकि वे अन्ततः काम को नष्ट करके ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं। वे अपनी तन्त्र विद्या से पहले काम को पैदा करते हैं, फिर उससे मजबूत बनी कुंडलिनी से उसी काम को नष्ट कर देते हैं। वे काम की शक्ति अपनी कुंडलिनी को देते हैं। आम आदमी काम से उत्पन्न शक्ति को कुंडलिनी में रूपांतरित करने की तकनीक नहीं जानते, इसलिए वह शक्ति रंग-बिरंगे विचारों से भ्रम पैदा करती है। दूसरा अर्थ इससे यह निकलता है कि शिव वरदान के रूप में अपने आप को ही दे देते हैं। शिव मस्त मलंग और शून्य रूप हैं, उनके पास अपने सिवाय देने को है ही क्या। पर जब शिव मिल जाते हैं, तो सबकुछ खुद ही मिल जाता है। शिव कुंडलिनी रूप रति के रूप में हैं। इसलिए कुंडलिनी योग से काम खुद ही नष्ट हो जाता है।

कुंडलिनी काम से शक्ति लेकर अंत में काम को ही नष्ट कर देती है, फिर काम को पुनर्जीवित भी कर देती है

अब काम को ही देख लो। वह रति के प्रति इतना मोहित हो गया कि उसे अपने प्रति ब्रह्मा द्वारा दिए गए श्राप की सुध भी नहीं रही, और वह देवताओं के उकसावे में आकर रति से विवाह करने को राजी हो गया। यह उसके भस्म होने की शुरुआत थी, क्योंकि अंततः रति रूपी कुंडलिनी ने काम को नष्ट तो करना ही है। अब कुंडलिनी को ही शिव नाम दिया गया हो, तो आश्चर्य नहीं, क्योंकि शिव और शक्ति तत्त्वतः एक ही हैं। शिव ने काम को भस्म किया, मतलब कुंडलिनी ने काम को भस्म किया। अब यदि कोई कहे कि यह कैसे हो सकता है कि रति भी कुंडलिनी है और शिव भी कुंडलिनी है। तो इसका स्पष्टीकरण यह है कि रति दरअसल मन का भाव है, पर शिव वास्तविकता है। वैसे तो दोनों ही मन के भाव हो सकते हैं, पर मैं इन दोनों की आपसी सापेक्षता के हिसाब से बात कर रहा हूँ। मतलब कि सापेक्ष रूप से शिव रति की अपेक्षा ज्यादा वास्तविक है। इसी तरह रति शिव की अपेक्षा ज्यादा भावप्रधान है। यदि शिव मंदिर में रखी मूर्ति के रूप में हैं, तो रति मन में लग रहे उनके ध्यान के रूप में। रति मतलब लगाव। अब शिवपुराण में शिव से ही लगाव होगा, किसी अन्य देवता से नहीं। शिवपुराण में हर जगह शिव का ही ध्यान करने की सलाह दी गई है। इसी तरह  जब शिव-शक्ति का विवाह मतलब कुंडलिनी जागरण होता है, तब काम को पुनः जीवित हो जाने का वरदान मिला है। इसका मतलब है कि जागृति के बाद फिर से आदमी दुनिया में रम जाता है, हालाँकि ज्ञान व अनासक्ति के साथ। जागरण के बाद आदमी को कुछ पाने की चिंता तो होती नहीं, इसलिए वह खुलकर जीना शुरु करता है।

कामदेव के पुष्पबाण आदमी को प्यार-प्यार में ही घायल कर देते हैं

इस कथानक में यह वृत्तान्त रोचक है कि ब्रह्मदेव के मन से उत्पन्न कामदेव के पास पाँच फूलों के बाण या अस्त्र थे। ब्रह्मा या ब्रह्मदेव यहाँ सभी लोगों या जीवों के सामूहिक रूप का पर्याय है, और कामदेव सभी जीवों की सामूहिक कामवासनाओं का पर्याय है। तभी काम और ब्रह्मा के साथ देव शब्द लगा है। यदि एक आदमी की कामवासना की बात होती, तो सिर्फ काम ही कहते। इस तरह से तत्त्वतः तो काम और कामदेव एक ही हैं। कामदेव के ये पाँच बाण हैं, हर्षन मतलब खुश करना, रोचन मतलब पसंद करवाना, मोहन मतलब मोहित करवाना या एक के ही चक्कर में पागल बनवाना, शोषण मतलब शक्ति को सोखना, और मारण मतलब मरवाना। अब यह हैरानी की बात है कि अंतिम तीनों जानलेवा हथियार भी फूलों के ही हैं। तभी तो इन हथियारों से घायल आदमी प्यार-प्यार में ही बहुत कुछ गवां देता है, और उसे इसका आभास तक नहीँ होता।  इससे प्राचीन ऋषियों की व्यावहारिकता, दूरदर्शिता और सूक्ष्मदर्शिता का पता चलता है। इतने अच्छे रूपक बनाने वाले कोई वनवासी नहीँ हो सकते, जैसी कि आम भ्रांत धारणा है। वे दुनियादारी में सबसे ज्यादा कढ़े हुए और गढ़े हुए होते थे।

काम के साथ भावनाओं का अंबार भी चलता है, जिससे आदमी आनंदमयी मस्ती में डूबा रहता है

फिर लिखा है कि जैसे ही ब्रह्मा ने उत्तेजित होकर कामभाव से संध्या की तरफ देखा, वैसे ही उनके शरीर से उन्चास भाव पैदा हो गए। आम आदमी के साथ भी तो ऐसा ही होता है। कामोत्तेजित होने के बाद वह रंग-बिरंगे भाव दिखाने लगता है। वह यारों का यार, बापों का बाप, पुत्रों का पुत्र और पता नहीं क्या-क्या बनने लगता है। वह चारों ओर छा जाता है। ऐसे कौन से भाव हैं, जो उसके अंदर पैदा नहीं होते। मातृ भाव, भगिनी भाव, गुरु भाव, बुजुर्ग भाव, बाल भाव, नवयुवक भाव, पशु-पक्षी भाव, वृक्ष-लता भाव, पर्वत भाव आदि-आदि। ये भाव संध्या के समय ज्यादा उमड़ते हैं, क्योंकि उस समय मन में शांति छाई होती है। भावों में तो बुराई नहीं है, पर आसक्ति में बुराई है। जिस घर में संध्या योग होता है, वहाँ ये कामजनित भाव कुंडलिनी के साथ मिश्रित होकर आसक्ति और दुर्भावना को नष्ट कर देते हैं। केवल शुद्ध प्रेम बचा रहता है। कुंडलिनी और प्रेमभाव एकदूसरे को उत्तरोत्तर बढ़ाते रहते हैं। इसलिए प्रेम करने में बुराई नहीँ है, यदि उसे शुद्ध और आध्यात्मिक बनाया रखा जाए। बल्कि वह प्रेम तो सबसे बड़ा योग है। प्रेम में दीवाना होकर आदमी भावविभोर होकर आनन्दित हो जाता है। इसे आजकल हाईपर या हॉट या रंगीन होना कहते हैं। यही तो काम का आकर्षण है। इसको बहुत सुंदर शैली में व्यवहारिकता, आधुनिकता व वैज्ञानिकता के साथ समझाया गया है, पुस्तक शरीरविज्ञान दर्शन में। बहुत सुंदर रूपक कथाएँ हैं पुराणों में। मुझे लगता है कि कथा सुनाते समय मूल कथा के साथ उसमें दिए गए रूपक के रहस्य को भी डिकोड करके सुनाना चाहिए। इससे श्रोताओं को अधिक लाभ मिलेगा।

संध्या के द्वारा शिव से मांगे गए वरदान काम भाव से बचाव के लिए थे, शुद्ध प्रेमभाव से बचाव के लिए नहीं

ये मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि कई लोग काम के डर से संध्या के समय आपस में बातें भी नहीँ करते। सन्ध्या के द्वारा लज्जित होकर तप करने का अर्थ है, लंबे समय तक आध्यात्मिक लोगों द्वारा संध्या के समय आध्यात्मिक साधनाएं करना। इसकी जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि उन लोगों ने काम को अपनाया था, शुद्ध प्रेम को नहीं। शुद्ध प्रेम तो अपने आप में तप ही है। संध्या के द्वारा तीन वरदान मांगे गए, जो शिव के द्वारा पूरे किए गए। पहले वरदान, पैदा होते ही किसी जीव में कामवासना पैदा न होने का अर्थ है कि जिस घर मे संध्या वंदन होता है, उस घर मे पैदा हुए बच्चों में उच्च कोटि के आध्यात्मिक संस्कार होते हैं। उनमें जन्म से ही अपने आप ही कुंडलिनी बनी होती है। वह कुंडलिनी उन्हें कामवासना से बचा कर रखती है। या यूँ कहो कि उनकी कुंडलिनी कामभाव को प्रेमभाव में रूपांतरित करती रहती है। दरअसल संध्या के पैदा होते ही कामदेव के प्रभाव से उसपर ब्रह्मा और उनके पुत्र आसक्त हो गए थे। संध्या का समय बहुत छोटा होता है। इसका अपना कोई अस्तित्व नहीं होता। यह दो प्रकार के विपरीत समयों के संयोग से बनता है। इसलिए इसके बड़े और जवान होने का प्रश्न ही नहीं होता, क्योंकि यह पैदा होते ही विलीन होने लगता है। दूसरा वरदान कि मेरे कुल में कोई भी कामासक्त न होए, इसका भी यही अर्थ है कि बेशक संध्या वंदन करने वाले लोगों के घरों के सदस्य किसी कारणवश कामभाव का प्रदर्शन करें, पर वे कामासक्त नहीँ होते, मतलब कामदेव के प्रभाव में आकर किसीके ऊपर लट्टू नहीँ हो जाते। तीसरा वरदान कि मेरे कुल की सभी स्त्रियां पतिव्रता होएं, इसका अर्थ है कि जो लोग संध्यावंदन करते हैं, उनकी कुंडलिनी बहुत विकसित और मजबूत होती है। इसी कुंडलिनी के कारण ही वे अपनी पत्नियों को पूर्ण संतुष्ट रख पाते हैं। यह तो वैज्ञानिक व तांत्रिक रूप से सत्य है कि यौन संतुष्टि और यौन क्रीड़ाओं पर पूरा नियंत्रण कुंडलिनी से ही प्राप्त होता है। एक वरदान शिव ने संध्या को यह भी दिया कि जो उसकी ओर काम भाव से देखेगा, वह नपुंसक हो जाएगा और उसकी शक्ति नष्ट हो जाएगी। इसका भी यही तात्पर्य है कि जो सन्ध्या के समय भोगों को आसक्ति से या उन्हें कुंडलिनी के बिना भोगेगा, वह मोहमाया के भ्रम में पड़कर अपनी आत्मा के अंधकार को बढ़ाएगा। कुंडलिनी के प्रति रति ही कामभाव या आसक्ति भाव को नियंत्रण में रखती है। सन्ध्या शब्द यहाँ ऐसे सभी समयों के लिए इंगित किया हुआ प्रतीत होता है, जिस समय आदमी सन्तुलित होता है, उसकी इड़ा और पिंगला नाड़ी बराबर चलती है, मन की कुंडलिनी मजबूत होती है, और मन में गहरी शांति छाई होती है। 

प्रेम और काम एकदूसरे को बढ़ाते रहते हैं

हर जगह प्रेम करते रहने से काम भाव में वृद्धि होती है। वह काम भाव जीवनसाथी के साथ मिलकर परिपक्व होकर प्रेम को और अधिक बढ़ाता है। तंत्रयोगी उस कामजनित प्रेम को कुंडलिनी प्रेम में रूपांतरित करते रहते हैं। तंत्रयोगी का केवल एक ही जीवनसाथी या यौनसाथी इसलिए होता है, ताकि कामजनित प्रेम उसकी कुंडलिनी को आसानी से हासिल होता रहे। अय्याश किस्म के आदमी का कामजनित प्रेम बहुत से यौनसाथियों में विभक्त हो जाता है, जिससे वह कुंडलिनी को नहीँ मिल पाता। इसीलिए कहते हैं कि एकपत्नीव्रत सबसे बड़ा व्रत है।इसके अलावा, यह यौन ऊर्जा है जिसकी कुंडलिनी के लिए जरूरत पड़ती है, न कि शारीरिक आकर्षण। बल्कि अतिरिक्त शारीरिक आकर्षण तो व्यक्ति को ऊर्जा के वास्तविक स्रोत से विचलित कर सकता है।

कुंडलिनी ही आदमी की असली सेवियर या रक्षक है

शिव के द्वारा संध्या के ऊपर कामासक्त ब्रह्मा को रोकने का अर्थ है कि आदमी को उस समय कुंडलिनी बचा लेती है। शिव यहाँ कुंडलिनी का प्रतीक है। वैसे भी कुंडलिनी आदमी को बुरे काम करने से रोकती ही है। यदि अनजाने या बहुत मजबूरी में कभी गलत काम हो भी जाए, तो कुंडलिनी उसका प्रायश्चित या पश्चाताप भी करवाती है। शिवपुराण में सभी के लिए शिव का ध्यान करना जरूरी बताया गया है। तो स्वाभाविक है कि ब्रह्मा भी शिव का ध्यान करते थे। इससे शिव उनकी कुंडलिनी बन गए, और कुंडलिनी रूप में वे ही ब्रह्मा को गलत काम से रोकने के लिए प्रकट हुए।

शिवपुराण एक तन्त्र पुराण ही है

शिवपुराण में सभी बातें और कथाएँ तन्त्र से सम्बंधित ही हैं। यह अलग बात है कि अधिकांश लोग उन्हें समझ नहीं पाते, क्योंकि वे रूपकों के रूप में हैं। ऐसा तन्त्र के दुरुपयोग को रोकने के लिए किया गया था। पुराण वेदों से निकलते हैं। इसका मतलब है कि तन्त्र का प्राचीनतम मूल स्रोत वेद ही हैं। यद्यपि प्रत्यक्ष नियमावली के साथ व्यावहारिक तन्त्र बौद्धों में ही दिखाई देता है। ऐसा नहीं है कि हिंदुओं में तन्त्र की व्यावहारिक प्रथा लुप्त हो गई हो। अभी भी हिन्दुओं में यह प्रचलित है, पर इसे बहुत गुप्त रखा जाता है, जिससे आम लोगों को इसका पता ही नहीं चलता। बौद्धों में भी इसे छिपा कर रखा जाता था। पर आज के इस मरते ग्रह को देखकर कोई पुनर्जीवन देने वाली विद्या छिपाना मानवता के साथ धोखा होगा, ये बात उन्होंने समझ ली है।

उपरोक्त काम व प्रेम से सम्बंधित सिद्धांतों का अनुभवात्मक साक्ष्य

दोस्तों, मैं बहुत से लोगों से गहरा प्रेम करता था। कई। पर अपना जीवन मैंने संयमपूर्वक ही जिया। अब अपनी बड़ाई में ज्यादा भी क्या कहना, पर यदि इससे किसी को लाभ मिलता हो तो इसमें बुरा भी कुछ नहीं है। जैसा भी मैंने इस पोस्ट में बताया है, वह सब मेरे साथ घटित हुआ। यह सब मेरा अपना अनुभवात्मक वर्णन है, कोई पढ़ा-पढ़ाया नहीं। इन्हीं अनुभवों के बीच में मेरा वह क्षणिक आत्मज्ञान व कुंडलिनी जागरण भी शामिल था, जिसका वर्णन होमपेज पर है। बेशक ये कुछ क्षणों के अनुभव थे, पर कुछ न होने से कुछ तो होना बेहतर है। और वैसे भी आत्म जागृति के अनुभव से ज्यादा महत्त्व तो आत्मजागृति से भरी जीवन दिनचर्या का है।