इसाई धर्म में कुण्डलिनी

कुण्डलिनी और होली स्पिरिट एक ही वस्तु-विशेष के दो नाम हैं। इसाई धर्म में होली स्पिरिट के साथ बैप्टिस्म का वर्णन आता है। इसी तरह हिन्दू धर्म में कुण्डलिनी की क्रियाशीलता व जागरण का वर्णन आता है। मैं अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि होली स्पिरिट व कुण्डलिनी, दोनों एक ही चीज को दर्शा रहे हैं। इस बात को हम निम्नलिखित वैज्ञानिक तर्कों से भी सिद्ध कर सकते हैं।

होली स्पिरिट को ईश्वर की चलायमान शक्ति कहा गया है। इसी तरह कुण्डलिनी को भी जीवनी शक्ति कहा गया है। जैसे ईश्वर अपनी शक्ति को होली स्पिरिट के रूप में किसी भी स्थान पर प्रोजेक्ट करके उस शक्ति से अपनी इच्छा पूरी करवाता है, उसी तरह वह कुण्डलिनी के माध्यम से भी अपनी शुभ इच्छा पूरी करवाता है।

जैसे होली स्पिरिट को सांस, हवा, जीवन-धारियों में सबसे महत्त्वपूर्ण या प्राणशक्ति, देवता या फरिश्ते के रूप में पर्सोनीफाईड आदि नाम दिए गए हैं; उसी तरह से कुण्डलिनी को भी ये सभी नाम दिए गए हैं। जिस तरह होली स्पिरिट को गॉड का हाथ या अंगुली कहा गया है, उसी तरह कुण्डलिनी शक्ति को भी भगवान् शिव का क्रियात्मक अंश या आधा शरीर कहा गया है।

इसाई धर्म में कहा गया है कि गॉड अपनी होली स्पिरिट की सहायता से बहुत से महान कार्य करता व करवाता है। उदाहरण के लिए, सृष्टि का निर्माण, बाईबल की रचना, पुराने समय के महान लोगों व उपदेशकों के द्वारा किए गए आश्चर्यजनक काम। इसी तरह से कुण्डलिनी भी महान कार्य करती व करवाती है। इसी धर्म के अनुसार होली स्पिरिट किसी मानव-रूप में नहीं है, परन्तु उसे अन्य चीजों की तरह मानवीकृत किया गया है। इसी तरह कुण्डलिनी को भी एक देवी या सर्पिणी का रूप दिया गया है, हालांकि इसका कोई भौतिक रूप नहीं है।

होली स्पिरिट एक सहायक है, जिसे क्रिस्ट के नाम से भेजा गया है, जो क्रिस्ट के फोलोवर्स को सभी चीजें सिखाएगी, और उन्हें क्रिस्ट की टीचिंग्स की याद दिलाएगी। इसका अर्थ है कि क्रिस्ट का नाम जपने से मन में क्रिस्ट की छवि बस जाएगी, जो होली स्पिरिट बन जाएगी। कुण्डलिनी भी तो इसी तरह गुरु, देवता आदि के ध्यान से विकसित होती है।

होली स्पिरिट सिखाती है कि क्रिस्ट वास्तव में कौन है। अर्थात होली स्पिरिट अद्वैत का साक्षात्कार करवाती है। क्रिस्ट का रूप भी अद्वैतवान ही है। ऐसा ही अद्वैत कुण्डलिनी से भी तो उत्पन्न होता है।

होली स्पिरिट बाईबल को समझना आसान कर देती है। होली स्पिरिट वही सिखाती है, जो बाईबल में है। होली स्पिरिट बाईबल का स्मरण करवाती है। इसी तरह का काम कुण्डलिनी से भी होता है, व उसको जान लेने से भी सभी धार्मिक ग्रन्थ स्वयं ही, बिना पढ़े ही जाने हुए बन जाते हैं।

होली स्पिरिट पापों से लड़ने की शक्ति देती है। इसी तरह, कुण्डलिनी भी पुराने पापों को नष्ट करती है, और नए पापों को पनपने नहीं देती। होली स्पिरिट को प्राप्त करने वाला आदमी स्पिरिट में ही स्थित रहता है, और माँसमय शरीर की लिप्सा को पूरा नहीं करता। इसका मतलब है कि वह ननड्यूल व अनासक्त हो जाता है। कुण्डलिनी भी आदमी को अद्वैतशील व अनासक्त बना देती है। होली स्पिरिट भी कुण्डलिनी की तरह ही हमारे दिल में रहना चाहती है। इसका अर्थ है कि दोनों से ही बहुत गहरा प्यार हो जाता है, क्योंकि दोनों की याद निरंतर बनी रहती है। होली स्पिरिट व कुण्डलिनी, दोनों ही हमारा मार्गदर्शन करती हैं।

होली स्पिरिट या कुण्डलिनी बहुत बड़े बोझ व प्रतिकूलता को भी सहने की शक्ति देती है। दोनों ही नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर ले जाती हैं, तथा दोनों से पड़ौसी खुश रहते हैं। हिन्दू-ग्रंथों में भी आता है कि कुण्डलिनी-योगी के सभी लोग प्रेमी मित्र बन जाते हैं, कोई उसका शत्रु नहीं रहता।

वाक इन स्पिरिट का अर्थ है कि डैविल द्वारा आप मिसगाईड न किए जाएं, और हमेशा होली स्पिरिट के आज्ञाकारी बने रहें। इसी तरह कुण्डलिनी-योगी के लिए भी निरंतर कुण्डलिनी-ध्यान करना जरूरी माना गया है।

होली स्पिरिट में चलते रहने के वही लाभ मिलते हैं, जो कुण्डलिनी से उत्पन्न रूपांतरण से मिलते हैं। गॉड ने हमें डर की स्पिरिट (सामान्य द्वैतपूर्ण सोच) नहीं दी है, अपितु शक्ति, प्रेम, व स्वस्थ मन (अद्वैतपूर्ण व अनासक्त भाव) की स्पिरिट दी है। कुण्डलिनीयोग भी यही कहता है।

होली स्पिरिट के प्रवेश का अनुभव भी कुण्डलिनी-जागरण के अनुभव के सामान हो सकता है। दोनों के अनुभव रहस्यात्मक हैं। उदाहरण के लिए, पूरे शरीर में एक करंट के या सुनहरे जल के दौड़ने के साथ अनंत ख़ुशी का अनुभव। गिफ्ट ऑफ़ टंग भी प्राप्त हो सकता है। यह कुण्डलिनीयोग की वाक्-सिद्धि की तरह ही है, जिसमें कही गई बात सच हो जाती है। कुण्डलिनी के एक्टिवेशन की तरह ही होली स्पिरिट का एक्टिवेशन साईलेंट रूप में भी हो सकता है।

अब होली स्पिरिट के बैप्टिस्म व कुण्डलिनी जागरण के लिए जिम्मेदार कारणों के बीच समानता पर विचार करते हैं। जब कोई अपने अपराध पर पश्चाताप करता है, तब होली स्पिरिट एक्टिवेट हो जाती है। योग के अनुसार भी जब कोई आदमी अपने बीते जीवन को अपनी यादों में बार-२ साक्षीभाव के साथ उजागर करता है, तब स्वयं ही अच्छा पश्चाताप हो जाता है। उससे कुण्डलिनी क्रियाशील हो जाती है। जब कोई अपने को गॉड या क्रिस्ट के समर्पित कर देता है, तब होली स्पिरिट एक्टिवेट हो जाती है। योग में भी ईश्वर-समर्पण व कुण्डलिनी के प्रति समर्पण को सबसे अधिक महत्त्व दिया गया है।

यहां तक कि भगवान या देवता को याद करने से भी होली स्पिरिट या कुंडलिनी सक्रिय हो जाती है। मैंने हमेशा खुद इसको स्पष्ट रूप से अनुभव किया है। जब भी मैंने शरीरविज्ञान दर्शन की मदद से अद्वैतवादी होने की कोशिश की है, तब-2 मुझे कुंडलिनी का अनुभव हुआ है। ईश्वर अद्वैत का ही एक आधिकारिक नाम है। दोनों नाम एक ही चीज को दर्शाते हैं। मैं पहले से ही अनुभवात्मक रूप से साबित कर चुका हूं कि अद्वैत और कुंडलिनी हमेशा साथ-2 रहते हैं। यह वह इसाई धर्म-सम्मत बिंदु है, जहां से ईश्वर और पवित्र आत्मा (होली स्पिरिट/कुण्डलिनी) के बीच संबंध उपजा है। इसके अतिरिक्त, मैंने खुद भी अनुभव किया है कि अगर किसी भी चीज को बार-बार याद किया जाता है, तो वह चीज कुंडलिनी बन जाती है। उसी आधार पर, ईसा मसीह और बाइबल को बार-बार याद करने से वे पवित्र आत्मा / होली स्पिरिट के रूप में उपलब्ध हो जाते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि पवित्र आत्मा वही सिखाती है, जैसा कि ईसा मसीह और बाइबल ने सिखाया है, क्योंकि ये तीनों एकसमान ही हैं। उसी प्रकार, गुरु, देवता, या वेद-पुराणों का स्मरण करने से वे कुंडलिनी के रूप में प्रकट हो जाते हैं।

होली स्पिरिट को प्राप्त करने के लिए नया जन्म लेना पड़ता है। इसी तरह कुण्डलिनी को क्रियाशील करने के लिए योग-साधना के द्वारा रूपांतरित होना पड़ता है। नया जन्म क्रिस्ट से सम्बंधित होना चाहिए। इसका मतलब यह है कि योग के अनुसार रूपांतरण सकारात्मक होना चाहिए, नकारात्मक नहीं। इसका यह अर्थ भी है कि घर में शुरू से लेकर आध्यात्मिक माहौल होना चाहिए। वैसे भी कुण्डलिनी-जागरण के बाद पुनर्जन्म की तरह रूपांतरण होता है। ब्रेन में नए सरकट बनते हैं।

होली स्पिरिट की आज्ञा को मानना चाहिए। यह कुण्डलिनी योग के महत्त्व को रेखांकित करता है। जो योगी कुण्डलिनीयोग के माध्यम से कुण्डलिनी का बारम्बार स्मरण कर रहा है, वह उसकी आज्ञा का पालन करने के लिए हरदम तैयार ही तो है। होली स्पिरिट की प्राप्ति के लिए बिलीव करना अति आवश्यक है। कुण्डलिनीयोग के माध्यम से कुण्डलिनी के निरंतर स्मरण का मतलब ही यह है कि योगी का कुण्डलिनी के प्रति अपार विश्वास है।

होली स्पिरिट में बैप्टिस्म या सैल्वेशन के प्रत्येक मामले में ‘स्पीकिंग ऑफ़ टंग’ की प्राप्ति नहीं होती। यह ऐसा ही है, जैसे कि कुण्डलिनी जागरण व मोक्ष के लिए सिद्धियाँ जरूरी नहीं हैं।

अब हम कुण्डलिनी व होली स्पिरिट की एकरूपता का विरोध करने वाली बातों पर विचार करते हैं। होली स्पिरिट बाहर से आती है, परन्तु कुण्डलिनी शरीर के अन्दर ही होती है। ऐसा इसलिए है ताकि क्रिश्चियनिटी में योग के प्रसार पर रोक लग सके। योग का दुरुपयोग हो सकता है, जिस कारण उससे कर्महीनता व आलस्य का प्रसार हो सकता है। यह भी संभव है कि आत्मज्ञान व उस जैसे अनुभव को ही होली स्पिरिट का प्रवेश कहा गया हो। आत्मज्ञान बाहर से अर्थात ईश्वर से आता है, जबकि कुण्डलिनी-जागरण अपने अन्दर के प्रयास से उपलब्ध होता है। आत्मज्ञान के बाद कुण्डलिनी या होली स्पिरिट स्वयं ही विकसित हो जाती है, और निरंतर बनी रहती है। प्रेमयोगी वज्र के साथ भी ऐसा ही हुआ था। इसी तरह, ईश्वर से प्रार्थना व उसके प्रति समर्पण से कई प्रकार के अलौकिक अनुभव होते हैं, जैसे कि पूर्वोक्तानुसार शरीर में बहते हुए करंट या प्रकाश की नदी का अनुभव। ऐसे अनुभवों से भी कुण्डलिनी या होली स्पिरिट क्रियाशील हो जाती है।

मानवीय कर्म व प्रेम से कुण्डलिनी या होली स्पिरिट शरीर के अन्दर प्रविष्ट होती है। तभी तो इसाई धर्म में मानवता व प्रेम पर सर्वाधिक बल दिया गया है।

साथ में, ईसाई धर्म में 12 फलों वाले जीवन-वृक्ष का उल्लेख है। यह फ्रक्टिफाइड ट्री 7-12 चक्रों के साथ रीढ़ की हड्डी ही है।

क्रिश्चियनिटी में गॉड व सृष्टि के बीच में द्वैत का भाव है। ऐसा केवल इसलिए है ताकि गॉड को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध किया जा सके, जिससे उसमें मजबूत विश्वास पैदा हो जाए। हिंदू धर्म भी यह कहता है कि भगवान इस दुनिया के समान है, और साथ ही अलग भी है। वास्तव में अद्वैत ही सत्य है। क्योंकि जो अच्छी आदतें होली स्पिरिट के बैप्टिस्म के बाद विकसित होती हैं, वे केवल अद्वैत से ही उत्पन्न होती हैं।

कई लोग सोचते हैं कि योग में क्रिश्चियनीटी की तरह इविल स्पिरिट नहीं है। परन्तु यह सत्य नहीं है, क्योंकि योग में भी ‘माया’ नाम से इविल स्पिरिट को स्वीकार किया गया है, जो योगी को साधना व शुभ प्रयासों से विचलित करती रहती है।

वास्तव में चीज एक ही है, जिसे हम ऑब्जेक्ट ऑफ़ मेडिटेशन या ध्येय वस्तु कहते हैं। इसाई धर्म में इसे प्राकृतिक, सांसारिक व साधारण-संक्षिप्त रूप में बखान किया गया है; जबकि हिन्दू धर्म में त्यागपूर्णता, कृत्रिमता व दार्शनिक साज-सज्जा के साथ। परन्तु दुर्भाग्य से बहुत से लोग इस दार्शनिक विस्तार में असली, व्यावहारिक, व मूल वस्तु को भूल जाते हैं। इससे धर्मों में विभिन्नता प्रतीत होती है, परन्तु वास्तव में सभी धर्म मूल रूप से एकसमान हैं, और सभी मानवता व प्रेम के पक्ष में हैं।

अब मैं इसाई धर्म व हिंदु धर्म के मिश्रण के बारे में बात करता हूँ। पहले आदमी इसाई धर्म की नीति के अनुसार कर्मयोग से अपनी कुण्डलिनी को विकसित करे। फिर जब उसकी उम्र बढ़ जाए, वह मानवीय रूप से संसार को समृद्ध कर ले, तथा कुण्डलिनी में निपुण हो जाए; तब उसकी पदोन्नति कुण्डलिनीयोग में हो जाए। तब वह समर्पित व बैठकपूर्ण कुण्डलिनीयोग पर अधिक ध्यान दे, ताकि उसकी कुण्डलिनी और अधिक परिपक्व होकर जागृत हो जाए। प्रेमयोगी वज्र ने भी ईश्वरीय प्रेरणा से ऐसा ही किया था, जिससे उसे अतिशीघ्र कुण्डलिनीजागरण का अनुभव हो सका था। इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि सभी धर्मों में वह सभी कुछ है, जो अन्य धर्मों में भी है। कई धर्मों में उनका संकेतों में वर्णन है, तो कई धर्मों में विस्तार से।

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देवपूजा में कुंडलिनी

सभी धार्मिक गतिविधियाँ कुण्डलिनी में वैसे ही समा जाती हैं, जैसे नदियाँ समुद्र में। जब हम किसी देवी-देवता की पूजा कर रहे होते हैं, तब हम अप्रत्यक्ष रूप से कुण्डलिनी की ही पूजा कर रहे होते हैं। शरीरविज्ञान दर्शन के अनुसार देवता की मूर्ति, चित्र आदि के रूप में स्थित मानव-देह में अद्वैतशाली देहपुरुष विद्यमान होते हैं। अतः देवता की पूजा से उनकी पूजा स्वतः ही हो जाती है। उससे पूजा करने वाले व्यक्ति के मन में अद्वैतभाव पुष्ट हो जाता है। शरीरविज्ञान दर्शन के अनुसार यह सिद्धांत है कि कुण्डलिनी व अद्वैत साथ-२ रहते हैं। अतः देवपूजन से कुण्डलिनी-पूजन स्वयं ही हो जाता है, जिससे कुण्डलिनी क्रियाशील होकर विकसित होती रहती है, और कभी भी अनुकूल परिस्थितियों को पाकर जागृत भी हो सकती है।

यदि हम देव-मूर्ति में देहपुरुषों की सत्ता को न भी मानें, तब भी कोई बात नहीं। क्योंकि प्रकृति की सभी चीजें जिन्हें हम जड़ कहते हैं, वे जड़ (निर्जीव) नहीं, अपितु अद्वैतभाव के साथ चेतन (सजीव) होती हैं। प्रकृति के सभी अणु-परमाणु या मूलकण मूर्ति में भी विद्यमान होते हैं। अतः देव-मूर्ति के पूजन से सम्पूर्ण अद्वैतमयी प्रकृति की पूजा स्वयं ही हो जाती है। देहपुरुष की सत्ता की वैज्ञानिक कल्पना तो सम्पूर्ण प्रकृति व मानवाकार मूर्ति के बीच में पूर्ण समानता को प्रदर्शित करने के लिए ही की गई है। इससे अद्वैतभाव की प्रचंडता भी बढ़ जाती है।

जैसे ही मूर्ति-पूजन के साथ कुण्डलिनी प्रकट हो जाती है, तथा पूजन व कुण्डलिनी के बीच के सम्बन्ध का तनिक विचार कर लिया जाता है, वैसे ही पूजन पर ध्यान देने से वह ध्यान कुण्डलिनी को स्वयं ही लगता रहता है। उससे कुण्डलिनी उत्तरोत्तर चमकती रहती है। उदाहरण के लिए, देव-मूर्ति के सामने घंटी बजाने से व घंटी की आवाज पर ध्यान लगाने से, व ऐसा समझने से कि वह आवाज देवमूर्ति में स्थित कुण्डलिनी की सेवा कर रही है, स्वयं ही बीच-२ में कुण्डलिनी पर ध्यान लगता रहता है। ऐसा ही तब भी होता है, जब पितरों का पूजन किया जा रहा होता है। क्योंकि पितरों की देह भी देवता या प्रकृति की तरह शुद्ध, निर्विकार व अद्वैतवान होती है।

इसका अर्थ है कि जिसे कुण्डलिनी का ज्ञान नहीं है, उसे पूजा का सम्पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता। एक कुण्डलिनी-योगी ही उत्तम प्रकार का पुजारी सिद्ध हो सकता है।

यदि किसी के मन में कुण्डलिनी नहीं बनी हुई है, तो उसके द्वारा की गई पूजा उलटी भी पड़ सकती है। पूजा से उसके मन में चित्र-विचित्र प्रकार के विचार उठेंगे, क्योंकि पूजा से शान्ति व मानसिक शक्ति प्राप्त होती है। इससे पूजा की शक्ति घटिया किस्म के विचारों को भी मिल सकती है, जो हानि पहुंचा सकते हैं। जो पूजा-शक्ति कुण्डलिनी-रूपी एकाकी व लाभदायक विचार को पुष्ट कर सकती है, वह विचारों के हानिकारक झमेले को भी पुष्ट कर सकती है। इसीलिए कहते हैं कि पुजारी या गुरु का योग्य होना बहुत जरूरी है।

मैं अपने दादा के साथ लोगों के घरों में वैदिक पूजा-पाठ कराने जाया करता था। उस पूजा से मेरी पहले से विद्यमान तांत्रिक कुण्डलिनी बहुत अधिक बलवान हो जाया करती थी। उससे मुझे बहुत अधिक आनंद के साथ भरपूर सकारात्मक शक्ति प्राप्त होती थी। वह शक्ति वैसी ही यजमान को भी प्राप्त हो जाया करती थी, क्योंकि वे मेरे दादा के साथ मेरे प्रति भी प्रेमभाव सहित आदर-बुद्धि व सेवाभाव रख रहे होते थे।

इसी तरह प्रत्येक कर्म भी बड़ी आसानी से पूजा बन सकता है, यदि शरीरविज्ञान दर्शन के अनुसार यह सत्य सिद्धांत समझा जाए कि प्रत्येक कर्म अद्वैतशाली देहपुरुष की प्रसन्नता के लिए ही किया जाता है।

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कुण्डलिनी व साँसों पर ध्यान के बीच में संबंध

कुण्डलिनी-ध्यान में साँसों का बहुत महत्त्व है। कुण्डलिनी के ध्यान से साँसें भी खुलकर चलने लगती हैं, व शरीर का मैटाबोलिजम भी सुधर जाता है। इसी तरह, गहरी व नियमित साँसों पर (उससे गति कर रहे शरीर के साथ) ध्यान देने से शरीर के चक्रों पर (विशेषकर अनाहत व मणिपुर चक्र पर), व नासिकाग्र पर कुण्डलिनी प्रकट हो जाती है। नासिकाग्र पर विशेषतः तब प्रकट होती है, जब नासिकाग्र का स्पर्श करती हुई साँसों की हवा का ध्यान किया जाता है। यही बात गीता में भी लिखी है। उसमें “नासिकाग्र पर ध्यान” नामक एक विषय आता है। कई विद्वान इसे भौहों के बीच का आज्ञाचक्र मानते हैं, अर्थात वे नासिका के शुरू के भाग को आज्ञाचक्र बताते हैं, क्योंकि उनकी दृष्टि में नाक वहां से शुरू होती है। पर वास्तव में नासिका का अग्र होठों के साथ लगा होता है, जहां से नाक शुरू होती है। मैं इसे प्रमाण के साथ कह सकता हूँ। मैं जब सुबह की सैर पर जाता हूँ, और नाक के शुरू के संवेदनशील भाग का स्पर्श सुबह की ठंडी हवा के साथ अनुभव करता हूँ, तो मेरे नासिकाग्र पर, नाक की शिखा (टिप) पर या उसके थोड़ा बाहर मेरी कुण्डलिनी प्रकट हो जाती है। जब मैं उस सांस के ध्यान के साथ पांच बार पूरी सांस (अन्दर व बाहर दोनों तरफ की) को एक से पांच तक की गिनती के साथ गिनता हूँ (अधिकाँश तौर पर कदमों को भी साँसों के साथ मिलाकर), तथा पांच बार सांस बिना गिनती के लेता हूँ, और इस तरह के क्रम को बार-२ दोहराता हूँ, तब कुण्डलिनी और भी अधिक स्थिर व स्पष्ट हो जाती है।

इसी प्रकार, साँसों के ध्यान के साथ “सोSहम” का भी मन में उच्चारण कर सकते हैं। इससे ॐ की शक्ति भी प्राप्त हो जाती है। संस्कृत शब्द “सो” का उच्चारण सांस भरते समय, व “हम” का उच्चारण सांस छोड़ते समय करें। “सो / सः” का अर्थ है, “वह (ईश्वर)”। संस्कृत शब्द “हम / अहम्” का अर्थ है, मैं। अर्थात मैं ही वह ईश्वर / ब्रम्ह हूँ। योग में हर प्रकार की साँसों का महत्त्व है। यदि साँसें उथली हो, तो नासिकाग पर उनका ध्यान आसान होता है। कुछ अधिक गहरी होने पर विशुद्धि चक्र पर, उससे अधिक गहरी होने पर अनाहत चक्र पर, उससे भी अधिक गहरी होने पर मणिपुर चक्र पर व सर्वाधिक गहरी होने पर स्वाधिष्ठान-मूलाधार चक्र पर उन साँसों का ध्यान करना आसान होता है। पेट से सांस लेते हुए, नाभि चक्र पर साँसों का ध्यान करना सर्वाधिक आसान व प्रभावशाली प्रतीत होता है।

देहपुरुष की तरह अद्वैतभाव को धारण करने से कुण्डलिनी भी उजागर हो जाती है, तथा साँसें (मैटाबोलिजम के साथ) सुधर जाती हैं। साँसें नियमित व गहरी हो जाती हैं। साँसों की हवा मीठी लगने लगती है, व उससे संतुष्टि महसूस होने लगती है। तनाव समाप्त होने लगता है। शरीर की कार्यप्रणालियाँ तनावमुक्त हो जाती हैं। हृदय की गति सुधर जाती है। हृदय का बोझ कम हो जाता है। मन में एक शान्ति सी छा जाती है, आनंद के साथ।

दोहरा तरीका भी अपनाया जा सकता है। इसमें अद्वैतभाव (मुख्यतः शरीरविज्ञान दर्शन की सहायता से) को धारण करके साँसों को किंचित गहरा व नियमित किया जाता है। फिर उन साँसों पर ध्यान देते हुए, और अधिक लाभ प्राप्त किया जाता है। अद्वैतभाव के अतिरिक्त कुण्डलिनी के सीधे ध्यान से भी साँसों को सुधारा जा सकता है। अद्वैतभाव व कुण्डलिनी-ध्यान, दोनों की एक साथ सहायता भी ली जा सकती है। अद्वैतभाव से तो कुण्डलिनी वैसे भी प्रकट हो ही जाती है। उस उजागर हुई कुण्डलिनी पर अतिरिक्त ध्यान भी दिया जा सकता है। फिर लम्बे समय तक साँसों पर ध्यान देने से कुण्डलिनी, ध्यान के अंतर्गत स्थिर व स्पष्ट जैसी हो जाती है। वह कुण्डलिनी फिर पूरे शरीर को तरोताजा, तनावमुक्त, व रोगमुक्त कर देती है।

साँसों पर ध्यान देते हुए, सांस से गति करते हुए शरीर के भागों पर स्वयं ही ध्यान चला जाता है। शरीर के लगभग सभी मुख्य भाग सांस के साथ गति करते हैं। इस तरह से पूरा शरीर ही ध्यान में आ जाता है। पूरा शरीर अद्वैतपूर्ण पुरुषों से भरा हुआ है। अतः उनके अप्रत्यक्ष ध्यान से मन स्वयं ही अद्वैतभाव से भर जाता है। “शरीरविज्ञान दर्शन” के अनुसार ये देहपुरुष शरीर की कोशिकाओं, व शरीर के जैव-रसायनों के रूप में विद्यमान हैं। ये देहपुरुष प्राणियों की तरह ही समस्त व्यवहार करते हैं। क्योंकि अद्वैतभाव रखने वाला कोई प्राणी एक मनुष्य ही हो सकता है, अन्य जीव नहीं। अन्य जीवों में तो भावों की भी न्यूनता होती है, द्वैत-अद्वैत का तो प्रश्न ही नहीं उठता। इसलिए देहपुरुष के ऊपर एक मनुष्य का रूप आरोपित होने लगता है। क्योंकि एक योगी ने एक मनुष्य (गुरु या प्रेमी) को अपनी कुण्डलिनी बनाया हुआ होता है, इसलिए वह उसी मनुष्य के रूप का सर्वाधिक अभ्यस्त होता है। इससे उस विशेष मनुष्य का रूप अर्थात उस ध्यान करने वाले योगी की कुण्डलिनी देहपुरुष के ऊपर आरोपित हो जाती है। योग-प्राणायाम के अभ्यास से भी साँसें कुण्डलिनी के साथ जुड़ जाती हैं। इससे भी साँसों के ध्यान से कुण्डलिनी स्वयं ही प्रकट हो जाती है। इस तरह से, विभिन्न प्रयासों से कुण्डलिनी लगातार पुष्ट होती रहती है, जिससे मन व शरीर, दोनों हृष्ट-पुष्ट बने रहते हैं। कालान्तर में कुण्डलिनी जागृत भी हो सकती है। इन सभी प्रयासों में शरीरविज्ञान दर्शन की एक अहम भूमिका होती है।

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कुण्डलिनी का यिन-याँग से संबंध- kundalini associated with Yin-Yang

कुण्डलिनी का यिन-याँग से संबंध (please browse down or click here to view this post in English)

कुण्डलिनी के लिए यिन-यांग आकर्षण बहुत आवश्यक है। चुम्बक के विपरीत ध्रुव एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं। घनात्मक विद्युत् आवेश ऋणात्मक विद्युत् आवेश को आकर्षित करता है, तथा ऋणात्मक घनात्मक को। प्रकाश अन्धकार को आकर्षित करता है, और अन्धकार प्रकाश को। भाव व अभाव एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं। इसी तरह, स्त्री व पुरुष एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं। विपरीत भावों के बीच में परस्पर आकर्षण को यिन-यांग आकर्षण कहते हैं, और यह कुण्डलिनी के विकास में अहम् भूमिका निभाता है।

प्रेमयोगी वज्र अपने बचपन में एक गंभीर, निर्बल सा, रोगग्रस्त सा, गहरे रंग वाला, लम्बे शरीर वाला, आलसी सा, व छोटी नाक वाला बालक था। वह एक एक ऐसे बालक के प्रति आकर्षित हो गया था, जो चंचल, चुस्त, बलवान, नीरोग, हलके रंग वाला, लम्बी-तीखी नाक वाला, व छोटे शरीर वाला था। वह बालक उसका दूर-पार का रिश्तेदार भी था, व मित्र भी था। वह उम्र में कुछ बड़ा था। दोनों एक ही परिवार में निवास करते थे। यह यिन-यांग आकर्षण का एक अच्छा उदाहरण था। सभी गुण उन दोनों में एक-दूसरे के विपरीत प्रतीत होते थे, फिर भी दोनों के बीच में प्यार था। प्यार के साथ हल्का-फुल्का झगड़ा, या हलकी-फुल्की नोंक-झोंक तो चलती ही रहती है। पर वे दोनों क्षणिक कटुता को भूलकर एकदम से सामान्य हो जाया करते थे। कई बार तो लम्बे समय के लिए भी मनमुटाव हो जाता था, यद्यपि अनासक्ति व अद्वैत के साथ। यह अनासक्ति व अद्वैत परिवार के आध्यात्मिक माहौल के कारण था। इस तरह से, प्रेमयोगी वज्र के मन में उस बालक की छवि एक मजबूत कुण्डलिनी के रूप में प्रतिष्ठित हो गई थी।

कुछ बड़े होने पर दोनों का वियोग हो गया। प्रेमयोगी वज्र को शून्यता का पहला चरण महसूस हुआ। वास्तव में उसके मन के सभी भाव उस कुण्डलिनी के साथ जुड़ गए थे, और कुण्डलिनी के क्षीण होने से वे भी क्षीण जैसे हो रहे थे। उसी दौरान उसे एक अन्य समाज के साथ रहने का मौका मिला। उस समाज में एक देवीरानी ऐसी थी, जो प्रेमयोगी वज्र को उस बालक के जैसी लगी। अतः बालक के रूप वाली मानसिक कुण्डलिनी के साथ लगने वाली उसकी समाधि देवीरानी के रूप को स्थानांतरित होने लगी। देवीरानी-निर्मित कुण्डलिनी बालक-निर्मित कुण्डलिनी का स्थान लेने लगी। यह समाधि-स्थानान्तरण पतंजलि योगसूत्र के भाष्य (संभवतः शंकराचार्य-कृत) में भी उल्लिखित है। वह समाधि पहले वाली समाधि से भी मजबूत थी, क्योंकि उसमें स्त्री-पुरुष आकर्षण भी पहले से विद्यमान यिन-यांग आकर्षण के साथ जुड़ गया था। इसलिए वह समाधि दो सालों में ही शिखर-स्तर तक पहुँच गई।

फिर दोनों प्रकार के समाजों का वियोग हो गया। इससे प्रेमयोगी वज्र को शून्यता का दूसरा चरण महसूस हुआ। वह पहले वाले चरण से भी बहुत मजबूत था। उन्हीं वृद्ध आध्यात्मिक पुरुष (वैबसाईट में वर्णित) के सान्निध्य से उसे उसी चरण के दौरान क्षणिक आत्मज्ञान हो गया।

कहने का तात्पर्य है कि स्त्री-पुरुष आकर्षण ही यिन-यांग आकर्षण का शीर्ष स्तर है। समाज में अन्य स्तरों के यिन-यांग आकर्षण पर तो कुछ जोर दिया भी जाता है, परन्तु स्त्री-पुरुष आकर्षण की उपेक्षा की जाती है। अगर स्त्री-पुरुष आकर्षण एक-दूसरे के रूप की कुण्डलिनी को पुष्ट न भी कर सके, तो भी यह किसी तीसरे व्यक्तित्व (गुरु, देव या अन्य प्रेमी) के रूप की कुण्डलिनी को शक्ति देता है, और उसे जागृत भी कर सकता है। यही वाक्य तंत्रयोग का सार है। यहाँ तक कि अन्य स्तरों के यिन-यांग आकर्षण भी इसी प्रकार का अप्रत्यक्ष रूप का कुंडलिनी-वर्धक प्रभाव पैदा कर सकते हैं, मस्तिष्क के आध्यात्मिक केन्द्रों को क्रियाशील करके। दरअसल, यिन-यांग घटना द्वैत पैदा करती है। यह जल्द ही अद्वैत के द्वारा प्रतिस्थापित किया जाता है, खासकर के आध्यात्मिक (नॉनडुअल) वातावरण में। अद्वैत के साथ कुंडलिनी विकास होता है, क्योंकि दोनों एक साथ रहते हैं।

अधिकाँश समाजों में, विभिन्न सामजिक पहलुओं का हवाला देते हुए साधारण प्रकार के यिन-यांग आकर्षण को भी हतोत्साहित किया जाता है। उन पहलुओं में मुख्य है रूढ़ीवाद। रूढ़ीवाद में जातिवाद, नस्लवाद, अर्थवाद, व्यवसायवाद, लिंगवाद आदि विभिन्न भेदभावकारी वाद आते हैं। भेदभाव तो वैसे यिन-यांग आकर्षण के लिए आवश्यक हैं, परन्तु यह प्रेमभाव पर हावी नहीं होना चाहिए। भेदभाव व प्रेमभाव, दोनों भाव एकसाथ होने चाहिए। यही तो द्वैताद्वैत है। यिन-यांग आकर्षण द्वैत का प्रतीक है, और प्रेम अद्वैत का। द्वैताद्वैत ही सत्य है। खाली अद्वैत तो अधूरा है। यदि प्रेमभाव ही नहीं होगा, तो भेदभाव से उत्पन्न यिन-यांग आकर्षण का लाभ कैसे मिल पाएगा?

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kundalini associated with Yin-Yang

Yin-Yang attraction is very important for Kundalini. The contrasting poles of a magnet attract each other. Positive electrical charge attracts the negative electrical charge, and the negative attracts the positive one. The light attracts the darkness, and the darkness attracts the light. Presence and absence attract each other. Similarly, men and women attract each other. Yin-yang attraction is called attraction between opposite expressions, and it plays an important role in the development of Kundalini.

Premyogi vajra was a child with a serious / sober, weak, diseased, dark colored, tall, lazy, and small blunt nosed body / personality in his childhood. He was attracted to a child who was playful, agile, strong, healthy, light-colored, having long-pointed nose, and having a comparatively short body. That child was his distant relative and friend too. He was little elder in age. Both used to live in the same family. This was a good example of Yin-yang charm. All the qualities were in contrast to each other in both of them, yet there was love between the two. Light fight with love, or fluttering, keeps on going everywhere. However, they both used to forget the momentary bitterness and become completely normal. Many times, even for a long time there was a disturbed relation, though with unattached and non-dual attitude. This was due to the spiritual environment of the family. In this way, the image of that child in the heart of Premyogi vajra became distinguished as a strong kundalini.

When they grew up somewhat, they were separated. Premyogi vajra felt the first phase of emptiness. Indeed, all the expressions of his mind were attached to that Kundalini, and due to the weakness of the Kundalini, they were also becoming weak. At the same time, he got an opportunity to live with another society. There was such a goddess-queen in that society, which seemed like that naughty child to Premyogi vajra. Therefore, the Samadhi, which began with the mental Kundalini in the form of that child began to be transferred to the form of devirani / goddess-queen. Devirani-built Kundalini started to replace child-made Kundalini. This Samadhi-transfer is also mentioned in Patanjali Yoga Sutra’s commentary (possibly that by Shankaracharya). That later Samadhi was stronger than the earlier Samadhi, because the male and female attraction in that was also associated with the already existing Yin-yang attraction. That is why Samadhi reached peak level in two years.

Then the two types of societies were separated. From this, Premyogi vajra felt the second phase of emptiness. That was much stronger than the first one. With the proximity of that same spiritual old man (as mentioned in website), he got momentary enlightenment during that second phase.

To say, it means that feminine attraction is the top level of Yin-yang charm. There is some emphasis on the Yin-Yang attraction of other levels in society, but gender attraction is neglected. Even if the male and female attraction cannot strengthen the Kundalini of each other, even then it gives strength to the Kundalini of the form of a third person (Guru, God or other lover) and can also awaken that. This sentence is the essence of the tantra. Even other levels of yin-yang attraction can also produce this indirect kundalini potentiating effect through activating the brain centres (mainly spirituality related). Actually, yin-yang phenomenon produces duality. This is soon replaced by non-duality, especially in a right kind of spiritual (nondual) environment. Non duality brings kundalini growth along with for non duality and kundalini live together.

In most societies, yin-yang attraction of ordinary type is also discouraged while citing various social aspects. In those aspects, the main is stereotype. In stereotype, different rituals arise like castism, racism, economism, businessism, genderism etc. Discrimination is essential for yin-yang attraction, but it should be dominated by love. Discrimination and love, both expressions should be together. This is Dwaitadwaita / duality plus non-duality. Yin-yang attraction is a symbol of duality, and love is symbol of non-duality / Advaita. Dwaitadwait is the only truth. Empty Advaita is incomplete. If there is no love, how can you get the benefits of Yin-Yang attraction generated from discrimination?

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कुण्डलिनी का पुरातन जीवनशैली से सम्बन्ध- relationship between Kundalini and antiquity

यह पोस्ट देवी माता व उनके नवरात्रि त्यौहार को समर्पित है।

कुण्डलिनी का पुरातन जीवनशैली से सम्बन्ध (please browse down or click here to view this post in English)

कुण्डलिनी-विषय को पुरातन-पंथी कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। “कुण्डलिनी” शब्द भी संस्कृत भाषा का है। संस्कृत भाषा को पुरातन पंथी वैसे भी कहा जाता है। मन में निरंतर बस रही सबसे प्यारी छवि को ही कुण्डलिनी कहा जाता है। वह छवि देवता की भी हो सकती है, किसी प्रेमी / प्रेमिका की भी हो सकती है, गुरु की भी हो सकती है, और यहाँ तक कि शत्रु की भी हो सकती है। बिना प्रेम किए ही शत्रु की छवि मन में बस जाती है। कंस के मन में कृष्ण की छवि बस गई थी। इसी तरह, शिशुपाल के मन में भी भगवान् श्रीकृष्ण की छवि बस गई थी। यह अपवाद-स्वरूप है। इसी तरह, तांत्रिक आकर्षण से निर्मित मानसिक छवि बिना प्रेम के या कम प्रेम के साथ भी मन में बस सकती है। अधिकाँश मामलों में परम प्रेमी लोगों की छवि ही मन में बसी होती है। फिर भी, छवि को मन में बसाने वाले मूल साधन के रूप में तांत्रिक आकर्षण (यिन-याँग आकर्षण) ही प्रतीत होता है। ओशो महाराज भी ऐसा ही कहते हैं। कृष्ण के प्रेम में दीवानी मीरा के मन में कृष्ण की छवि बस गई थी। इसी तरह, गोपियों के मन में भी कृष्ण की छवि बस गई थी। रांझा के मन में हीर की छवि बस गई थी, और हीर के मन में रांझा की छवि बस गई थी। लैला के मन में मजनू की, व मजनू के मन में लैला की छवि बस गई थी। इसी तरह से रोमियो के मन में जूलियट की छवि बस गई थी, व जूलियट के मन में रोमियो की छवि बस गई थी। यदि पहाड़ों के प्रेम-प्रसंगों को लें, तो रान्झू के मन में फूलमाँ की, व फूलमाँ के मन में रान्झू की छवि बस गई थी। दुर्योधन के मन में उसके मित्र कर्ण की छवि बस गई थी, व कर्ण के मन में दुर्योधन की। योगी श्री रामकृष्ण परमहंस के मन में माता काली की छवि बस गई थी। इसी तरह, स्वामी विवेकानंद के मन में उनके अपने गुरु व योगी श्री रामकृष्ण परमहंस के रूप वाली कुण्डलिनी-छवि बस गई थी। भक्त हनुमान के मन में भगवान राम के रूप की कुण्डलिनी बस गई थी

तो क्या प्रेम का नाम ही कुण्डलिनी है? हाँ, प्रेम ही कुण्डलिनी है। कुण्डलिनी कोई विशेष नाड़ी, विशेष हड्डी या कोई अन्य भौतिक वस्तु नहीं है। हाँ, विभिन्न भौतिक वस्तुओं से कुण्डलिनी को पुष्ट करने में, व उसे जागृत करने में सहायता अवश्य मिलती है। मन में निर्बाध रूप से बनी हुई प्रेमी की छवि ही कुण्डलिनी है। जब कभी भी कोई आदमी उस छवि में कुछ क्षणों के लिए इतना अधिक खो जाता है कि उसे अपने पृथक अस्तित्व का बोध ही नहीं रहता, और वह कुण्डलिनी के साथ एकाकार हो जाता है, तब उसे ही कुण्डलिनीजागरण या पूर्ण समाधि कहते हैं। तो फिर हठयोगी की कुण्डलिनी कैसे विकसित होती है? हठयोगी तो किसी से प्रेम नहीं करता।

हठयोगी योग के निरंतर अभ्यास से अपने मन में कुण्डलिनी को पुष्ट करता है। जो काम प्रेम के कारण स्वयं होता है, वही काम वह योग के बल से करता है। तभी तो वह अपने मन में वैसी कुण्डलिनी छवि को भी जागृत कर सकता है, जिसके प्रति आमतौर पर प्रेम नहीं पनपता। उदाहरण के लिए, वह सूर्य की छवि को, वायु-स्पर्श की अनुभूति की छवि को, ध्वनि की छवि आदि-2 किसी भी प्रकार की छवि को अपने मन में जागृत कर सकता है। यद्यपि उसके लिए प्रेमी मनुष्य की छवि को जागृत करने के लिए लगाए जाने वाले योगबल की तुलना में कहीं अधिक योगबल लगाने की आवश्यकता होती है। वैसा प्रचंड योगबल केवल पहुंचे हुए योगी ही उत्पन्न कर सकते हैं, जो बहुत विरले होते हैं। सबसे सुगम तरीका यह होता है कि पहले अनन्य प्रेमी की छवि को प्रेम-व्यवहार से मन में पुष्ट किया जाए, फिर अतिरिक्त योगबल की सहायता से उसे जागृत किया जाए। प्रेमी मनुष्य की  कुण्डलिनी-छवि सर्वाधिक मानवतापूर्ण भी है, क्योंकि उससे मानवमात्र के प्रति आदरबुद्धि व प्रेम अत्यधिक रूप से बढ़ जाते हैं।

अब पुरातन व आधुनिक पक्ष की बात करते हैं। किसी व्यक्ति के साथ लम्बे समय तक परस्पर सद्भाव, सद्व्यवहार, सहयोग, मेल-मिलाप, निःस्वार्थ भाव व तारतम्य को बनाए रखकर ही उसके प्रति प्रेम उपजता है। ऐसा करने को पुरातन पंथ कहा जाता है, और ऐसा करने वाले को पुरातनपंथी। अवसरवाद को आधुनिकता कहा जाता है। अवसरवाद से प्रगाढ़ प्रेम-सम्बन्ध को बनने का अवसर ही नहीं मिल पाता है, साथ में उससे बना-बनाया प्रेम-सम्बन्ध भी नष्ट हो जाता है। जब तक दूसरा व्यक्ति अपने लिए हितकारक लगेगा, तभी तक उससे प्रेमसम्बन्ध बना रहेगा। जैसे ही वह अहितकारक लगने लगेगा, वैसे ही बना-बनाया प्रेमसम्बन्ध टूट जाएगा। इसे ही अवसरवाद कहते हैं। अपने मन में किसी व्यक्ति की छवि को स्थिर कुण्डलिनी का रूप प्रदान करने के लिए, अपने हित-अहित को दरकिनार करते हुए उससे लम्बे समय तक प्रेमसम्बन्ध बना कर रखना पड़ता है। इसे पुराना फैशन कहा जाता है। तभी तो मैंने कुण्डलिनी को पुरातन-पंथी कहा है।

आत्मज्ञान व अद्वैतभाव भी पुरातन-पंथी ही हैं। आत्मज्ञान कुण्डलिनी से ही उपलब्ध होता है। आत्मज्ञान के बाद भी कुण्डलिनी मन में निरंतर बसी रहती है। इसी तरह, पिछली पोस्टों में सिद्ध किया गया है कि अद्वैत व कुण्डलिनी एक-दूसरे को बढ़ाते रहते हैं। इसी तरह, सभी धार्मिक क्रियाकलाप भी पुराने तौर-तरीके के रूप में जाने जाते हैं, क्योंकि सभी का एकमात्र उद्देश्य कुण्डलिनी ही है।

अतः सिद्ध होता है कि जीवन की पुरानी शैली कुण्डलिनी-सम्मुखता के रूप में है, जबकि तथाकथित आधुनिक शैली कुण्डलिनी-विमुखता के रूप में है। पुराने और नए तौर-तरीकों के बीच में कोई भी भौतिक विभिन्नता नहीं है। केवल दृष्टिकोण, विचारधारा, व जीवन-व्यवहार का ही अन्तर है। इस तरह से हम देख सकते हैं कि जीवन के नए तौर-तरीके से आध्यात्मिक उन्नति बहुत दुर्लभ है। आजकल सर्वाधिक व्यावहारिक तरीका यह है कि आधुनिक व पुराने तौर-तरीकों को मिश्रित रूप में अपनाया जाए। यही तंत्रात्मक जीवन-पद्धति प्रेमयोगी वज्र द्वारा रचित “शरीरविज्ञान दर्शन” का मुख्य आधार है।

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This post is dedicated to the Goddess Mother and her Navaratri festival.

relationship between Kundalini and antiquity

It will not be an exaggeration to mention the subject of Kundalini as an archaeologist. The word “Kundalini” is also of Sanskrit language. Sanskrit language is also called an archaeologist. The most beloved image that is constantly sitting in mind is called Kundalini. That image can also be of God, can also be of a boyfriend / girlfriend, it can be of a master (guru), and even an enemy can be. Without love, the image of the enemy settles in the mind. Krishna’s image was settled in his enemy Kans’s mind. Similarly, in the mind of Shishupala, Lord Krishna’s image was settled. This is an exception. Similarly, a mental image created by a tantric love affair can sit in the mind without love or with less love. In most cases, the image of the ultimate lover is in the mind. Even so, the tantric attraction (yin-yang attraction) appears to be the basic means of settling the image in the mind. Osho maharaj says the same thing. In Krishna’s love, the divine image of Krishna was settled in the mind of Mira. Similarly, the image of Krishna in the Gopis’ mind was settled. The image of Heer was settled in Ranjha’s mind, and the image of Ranjha was settled in Heer’s mind. In the mind of Laila, the image of Majnu was settled, and in Majnu’s mind, the image of Layla was settled. Similarly, the image of Juliet was settled in Romeo’s mind, and the image of Romeo in Juliet’s mind was settled. If you take the love affairs in the mountains, then in the mind of the Ranju, the image of Phoolman was settled and vice versa. In Duryodhana’s mind, the image of his friend Karna was settled, and in Karna’s mind, the image of Duryodhana was settled. The image of Mata Kali was settled in the mind of yogi Shri Ramkrishna Paramahansa. Similarly, in the mind of Swami Vivekananda, the Kundalini-image of Shri Ramkrishna Paramahansa, his own master and yogi, settled. In the mind of the devotee Hanuman, the Kundalini of Lord Rama was settled.

Therefore, Kundalini is the name of love. Yes, love is Kundalini. Kundalini is not a special pulse, special bone or any other physical object. Yes, it is possible to reinforce the Kundalini with various physical objects, and those help in its awakening too. The uninterrupted image of the lover in one’s mind is the Kundalini. Whenever a person is lost so much for a few moments in that image that he does not realize his separate existence, and he becomes united with the Kundalini, then he is called having Kundalini awakening or full Samadhi. Then how does the Kundalini of Hath yogi grow? Hath yogi does not love anyone.

Hath yogi reinforces the Kundalini in his mind with continuous practice of yoga. The work that is done by love itself is done by the power of yoga. Only then can he awaken that type of kundalini image in his mind, which usually does not grow in love. For example, he can awaken the image of the sun, the image of the sensation of the air-touch, the image of the sound etc., any type of image in its mind. Although it requires the addition of more yogic power than the yogic power needed to awaken the image of a loving human. Such a huge yogic power can be produced only by the yogis of far reaching, which are very rare. The easiest way is to first confirm the image of the unique lover in love with love-full interactions, and then awaken it with the help of the additional Yoga. The Kundalini-image made of a humanely lover is also the most humanitarian, because it greatly increases the respect and love towards humankind.

Now talk about the old and the modern side of living. Long-term mutual goodness, goodwill, cooperation, reconciliation, selflessness, brotherhood, and coordination are accompanied by a person’s love for a loving being. To do so, it is called an ancient cult, and the doer who is doing this is a fundamentalist. Opportunism is called modernism. Opportunism does not get the opportunity to create a strong love relationship, together with it destroys the already created love-relationships. As long as the other person will feel good for himself, that long he will remain in love. As soon as he starts to feel harm from him, the love-made love relationship will be broken. This is called opportunism itself. In order to give the image of a person the form of a stable Kundalini in your mind, bypassing your interests, it has to be kept affectionate for a long time. This is called old fashion. That is why I have called the Kundalini as the antiquity.

Enlightenment and advaita (non-duality) are also ancient. Enlightenment is available only from the Kundalini. Even after enlightenment, the Kundalini remains in the mind continuously. Similarly, in previous posts it has been proven that Advaita and Kundalini keep increasing each other. Likewise, all religious activities are also known as old ways, because the only purpose of all is Kundalini.

Therefore, it proves that the old style of life is in the form of a Kundalini-oriented lifestyle, whereas the so-called modern style is in the form of a Kundalini-opposing lifestyle. There is no physical variation between old and new modes. The only difference is there in the form of approach, ideology, and life-style. In this way, we can see that spiritual advancement in the new way of life is very rare. Nowadays, the most practical way is to adopt modern and old ways in mixed form. This tantric method of life is the main basis of “Shareeravigyan darshan” written by Premyogi vajra.

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शिव-अराधना से सर्वधर्मसमभाव- Love and brotherhood between all religions through Shiva-worship

पावन शिवरात्रि के अवसर पर सभी मित्रों को बहुत-२ शुभकामनाएं। (please browse down or click here to view this post in English)

आशुतोष शंकर बहुत जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं। इसका अर्थ है कि उनके द्वारा उपदिष्ट तंत्र-साधना अतिशीघ्र मुक्ति प्रदान करती है। तंत्रसाधना हमारे दैनिक जीवन की गतिविधियों को आध्यात्मिक रूप देकर ही बनी है। उदाहरण के लिए निपुण तंत्रयोगियों का शरीर स्वयं ही मुड़ता, सिकुड़ता, फैलता व ऊपर की ओर उठता हुआ सा रहता है। ऐसा कुण्डलिनी को चक्रों पर स्थापित करने के लिए स्वयं ही होता रहता है। जब थकान होती है या कन्फ्यूजन होता है, तब भी ऐसा होता है, जिससे कुण्डलिनी मस्तिष्क-चक्र पर स्वयं ही प्रतिष्ठित हो जाती है। उससे एकदम चैन के साथ एक लम्बी सांस शरीर के अन्दर स्वयं ही प्रविष्ट होती है। नींद आने पर या बोरियत होने पर शरीर के उठने जैसे (अंगड़ाई) के साथ जम्हाई आने के पीछे भी यही रहस्य छिपा हुआ है।

शिव की मूर्ति मानवाकार होती है। इसका अर्थ है कि उस मूर्ति के अन्दर की कोशिकाएं (देहपुरुष) भी वैसी ही होती हैं, जैसी हमारे अपने शरीर के अन्दर की। इसका अर्थ है कि शिवमूर्ति की पूजा के समय हम उसमें स्थित देहपुरुष की ही पूजा कर रहे होते हैं। उस अद्वैतस्वरूप देहपुरुष को हमने अपनी मानसिक कुण्डलिनी का रूप दिया होता है। सीधा सा अर्थ है कि शिव-पूजन से भी कुण्डलिनी ही पुष्ट होती है। कुण्डलिनी-रूपी मानसिक चित्र किसी की व्यक्तिगत रुचि के अनुसार शिव का रूप लिए हुए भी हो सकता है, गुरु का रूप लिए भी हो सकता है, या प्रेमी / प्रेमिका का रूप लिए भी हो सकता है। कई बार तो कुण्डलिनी-चित्र शिव के जैसी वेशभूषा में भी अनुभव होता है, जैसे की बैल पर सवार, गले में सर्प की माला के साथ व डमरू के साथ, एक औघड़ तांत्रिक की तरह आदि-2। ऐसा शिव-पूजन के प्रभाव से होता है।

भगवान शिव दुनिया के सभी लोगों व धर्मों के आराध्य हैं। शिव-पूजन से दुनिया में सर्वधर्मसमभाव स्थापित हो सकता है। इससे धार्मिक उन्माद, कट्टरपंथ, व आतंकवाद पर रोक लग सकती है। सभी धर्म व दर्शन शिव से ही निकले हैं। इसका प्रमाण है कि भगवान शिव खान-पान के मामले में, पूजा के विधि-विधान के मामले में किसी से भेदभाव नहीं करते। उन्हें भूत-प्रेतों जैसे लोग भी उतने ही प्रिय हैं, जितने देवता जैसे लोग। वे सभी को प्रेम से व समान भाव से स्वीकार करते हैं, चाहे कोई किसी भी धर्म आदि का क्यों न हो। उनके द्वारा प्रदत्त तांत्रिक-साधना से यह स्पष्ट हो जाता है। शिवप्रदत्त तांत्रिक साधना ही सर्वाधिक वैज्ञानिक, प्रासंगिक, आधुनिक, सामाजिक, कर्मठतापूर्ण व मानवतापूर्ण है।

शिव-शक्ति अवधारणा सभी धर्मों में किसी न किसी रूप में मानी जाती है। जो सत्य है, वह शिव है। वही पूर्ण है। उसमें सभी भाव-अभाव हैं। उसमें स्त्रीभाव व पुरुषभाव, दोनों एकसाथ विद्यमान हैं। एक प्रकार से शिव का स्वरूप मनुष्य के उस रूप के करीब है, जिसमें वह समाधि में स्थित रहता है। यह सभी जानते हैं कि सर्वाधिक मजबूत समाधि तांत्रिक यौनसंबंध के साथ ही लगती है। अतः एक ही भगवान शिव को शिव-पार्वती के रूप में काल्पनिक रूप से विभक्त किया गया है, ताकि समझने में आसानी हो। वास्तव में शिव-पार्वती सदैव एकाकार ही हैं, इससे यह भी कल्पित हो जाता है कि शिव-पार्वती सदैव पूर्णरूप से तांत्रिक-साधना में लीन रहते हैं। शिवलिंग इस साधना का प्रतीक है।

रशिया में भी इसी तरह की एक लोककथा प्रचलित है कि आदमी कभी पूर्ण हुआ करता था। उससे देवताओं का राजा डर गया और उसने आदमी को दो हिस्सों में बाँट दिया। एक हिस्सा पुरुष बना, और एक हिस्सा स्त्री बना। तभी से लेकर दोनों हिस्से एकाकार होने के लिए व्याकुल होते रहते हैं, ताकि पुनः पूर्ण होकर देवताओं पर राज कर सकें।

कई लोगों को शंका हो सकती है कि शिव तो हमेशा ही तांत्रिक साधना में लीन रहते हैं, फिर उन्हें कामारि, यह नाम क्यों दिया गया है? वास्तव में, एक तांत्रिक ही यौन-दुर्भावना को जीत सकता है। यौनता से दूर भागने वाला आदमी यौन-दुर्भावना को नहीं जीत सकता। उसके अन्दर यौनता के प्रति इच्छा बहुत बलवान होती है, बेशक वह बाहर से उससे अछूता होने का दिखावा करता रहे। काम को वही जीत सकता है, जो काम के रहस्य को समझता हो। काम के रहस्य को एक सच्चे तांत्रिक से अधिक कोई नहीं समझ सकता।

भगवान शिव को भूतनाथ भी इसीलिए कहते हैं, क्योंकि वह उन तांत्रिकों का नाथ भी होता है, जो बाहर के आचारों-विचारों से भूत-प्रेत की तरह ही प्रतीत होते हैं। यद्यपि अन्दर से वे शिव की तरह ही पूर्ण होते हैं।

भगवान शिव को भोला इसलिए कहा जाता है, क्योंकि वह अपनी नित्य तांत्रिक-साधना के बल से पूर्ण अद्वैत-भाव में स्थित रहते हैं। अर्थात वे एक बच्चे की तरह होते हैं। उनके लिए काष्ठ, लोष्ठ व स्वर्ण आदि सब कुछ एकसमान है। यद्यपि वे जीवन-व्यवहार के लिए ही बाहर से भेदभाव का प्रदर्शन करते हैं, अन्दर से नहीं।

मुझे एक बार भगवान स्शिव स्वप्न में दिखे थे। वे एक ऊंचे चबूतरे जैसी जगह पर बैठे हुए थे। वे कुछ गंभीर यद्यपि शांत लग रहे थे, एक औघड़ व अर्धवृद्ध तांत्रिक की तरह। साथ में वे मस्त-मौले जैसे भी लग रहे थे। फिर भी, उनका पहरावा शिव के जैसा लग रहा था। उनके चारों तरफ बहुत से भूत-प्रेत धूम-धड़ाके व जोर के हो-हल्ले के साथ नाच-गा रहे थे। वह आवाज जोर की व स्पष्ट थी। वह विशेष, रोमांचकारी, व संगीतमयी आवाज (खासकर ढोल की डिगडिगाहट) मुझे आजतक कुछ याद सी आ जाती है। उन भूत-प्रेतों से तनिक भी डर नहीं लग रहा था, अपितु बहुत आनंद आ रहा था। ऐसा लगा कि मेरे कुछ जानने में आने वाले व दिवंगत लोग भी उस भूत-प्रेतों के टोले में शामिल हो गए थे। उस स्वापनिक घटना से मेरी कुण्डलिनी को बहुत शक्ति मिली, और उसके लगभग डेढ़ से दो वर्षों के बाद वह जागृत भी हो गई।

इसी तरह, लगभग 30 वर्ष पूर्व मैं अपने चाचा की बरात के साथ जा रहा था। एक बड़े पहाड़ के नीचे से गुजरते हुए मुझे भगवान शिव एक अर्धवृद्ध के रूप में शांति से एक बड़ी सी चट्टान पर पालथी लगा कर बैठे हुए दिखे। वहां पर लोग फूल-पत्ते चढ़ा रहे थे, क्योंकि उसके थोड़ा ऊपर व पेड़ों के पीछे एक शिव-पार्वती का मंदिर था, जो वहां से दिखाई नहीं देता था। मैंने भी पत्ते चढ़ाए, तो मुझे उन्होंने प्रसाद के रूप में कुछ दिया, शायद चावल के कुछ दाने थे, या वहीँ से कुछ पत्ते उठाकर दे दिए थे। मुझे पूरी तरह से याद नहीं है। वे मुस्कुराते हुए, कुछ गंभीर जैसे, साधारण वेशभूषा में, व एक औघड़-गुरु के जैसे लग रहे थे। फिर भी वे एक साधारण मनुष्य ही लग रहे थे। तभी तो शायद मैंने उनसे बात नहीं की। वैसे भी, तंग पगडंडी पर लोगों की लम्बी पंक्ति में जल्दी-२ चलते हुए बात करने का समय ही नहीं था।

भगवान शिव की महिमा का कोई अंत नहीं है, पर निष्कर्ष के रूप में यही कह सकते हैं, शिव है तो सब कुछ है; शिव नहीं है तो कुछ नहीं है।

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Best wishes to all friends on the occasion of holy Shivratri.

Ashutosh Shankar becomes happy very easily. It means that the tantra-oriented technique provided by him gives liberation very quickly. The tantric techniques are made of the simple activities of our daily lives by giving those a spiritual shape. For example, the body of skilled tantric turns, shrinks, spreads and remains rising upward (tucking) itself. Such happen for kundalini to be installed on the chakras itself. When there is fatigue or confusion, this happens, due to which the Kundalini becomes distinguished itself on the cerebral chakra. With this, a long breath is drawn inside the body itself with a sudden relief. This secret is hidden behind the yawning with the body’s rise (body tucking up), when it comes to relieve of sleep or boredom.

Shiva’s idol is a human-form. It means that the cells (dehpurush) inside the body of that idol are also similar, as those in the inside of our own body. It means that while worshiping Shiva-idol, we are worshiping the non-dual dehpurush inside it. We have given the form of our mental Kundalini to that  dehpurush having non-dual attitude. It means straightforward that the Kundalini becomes strong even from Shiva-worship. Kundalini (mental image) can be having a form of Shiva according to somebody’s personal interest, can also be the form of a guru, or the form of boyfriend / girlfriend too. Many times, Kundalini-image is also experienced in Shiva-like costumes, such as one riding a bull, with a snake’s necklace and with a damroo (special drum), like a soft tantric etc. This happens with the influence of Shiva-Pooja (worship).

Lord Shiva is adorable of all people and religions of the world. Shiva-poojan can establish universal harmony in the world. It can prevent religious mania, fundamentalism, and terrorism. All religions and philosophies have come from Shiva. Its proof is that Lord Shiva does not discriminate against anyone in the case of eating-drinking and in the case of law and order of worship. He loves the people who are like the ghosts just equal to those people who are like God. He accepts all with love and with the same emotion, no matter how religious one is or what type the religion one has. It is clear from the tantric-sadhana given by him. Shiva-provided Tantric Sadhana is the most scientific, relevant, modern, social, productive, and humanistic.

Shiva-Shakti concept is considered in some form in all religions. That which is truth that is Shiva. That is the whole thing. There are all emotions in it. In it, both femininity and maleness are present together. In a sense, the nature of Shiva is close to that form of man, in which he lives in Samadhi. All of us know that the strongest Samadhi (meditation) seems to be accompanied by tantric sexual intercourse. Therefore, the only Lord Shiva has been conceptually divisible in the form of Shiva-Parvati that is easy to understand. In fact, Shiva-Parvati is always united as one, but it is also assumed that Shiva-Parvati are always completely absorbed in tantric-sadhana. Shiva lingam is a symbol of this sadhana.

In Russia, a similar folktale is prevalent that a man used to be perfect. From him the king of the gods was scared and he divided the man into two halves. One part is made of man, and one part becomes a woman. From then on, both sides are anxious to be united, so that they can rule over the gods once they are completed again.

Many people may doubt that Shiva is always absorbed in Tantric meditation, then why he has been given this name as kamari? In fact, only a tantric can conquer sex-malice. A man escaping sexuality cannot win sexually ill thought. His desire for sex in him is very strong, of course, he pretends to be untouched from the outside. Only one can win the sexuality, who understands its secret. Nobody can understand the secret of sexuality more than a true tantric.

Bhootnath (lord of ghosts) is also a name given to Lord Shiva, because he is also the master of those tantrics, who seem to be like ghosts from outside. Although from inside they are fulfilled just like Shiva.

Lord Shiva is also called as Bhola (innocent), because he is situated in full Advaita Bhava (non-dual attitude) with the force of his daily Tantric-Sadhana. That is, he is like a child. For him wood, lumber, and gold etc. everything is the same. Although he demonstrates discrimination from outside to live a mundane life-style, not having it inwardly.

I once saw Lord Shiva in my dream. He was sitting at a place like a table-type rock. He looked somewhat quiet though, like a soft, and semi-old Tantric. Together he seemed like a mast man (easy going). Even so, his dress looked like Shiva. Around him, many of the ghosts were dancing, singing with loud, and mast sound. That voice was loud and clear. That particular exhilarating musical voice (especially low pitch beats of the drum) makes me remember that a little today. I was not feeling frightened at all from those ghosts, but I was feeling very happy and a bliss. It seemed that the people who came to know me and were the departed ones also joined the group of those ghosts. My Kundalini got very much power from that automatic incident, and after about one and half a year to two years, she became awakened too.

Likewise, about 30 years ago, I was going with my uncle’s marriage procession. Passing under a big mountain, I saw Lord Shiva sitting in squatting posture in peace on a big rock in the form of a half-old man. There people were offering flowers and leaves, because there was a Shiva-Parvati temple behind the trees and a little above that place, which was not visible from there. I also offered him the leaves, then he gave me something in the form of a gift maybe that was in the form of some grains of rice or he picked up some leaves. I do not remember completely. He was smiling, looking like something serious, in ordinary costumes, and like a softhearted guru. Yet he seemed to be an ordinary man. Then maybe I did not talk to him. Anyway, there was no time to talk about while moving in the long line of people on the tight footpath for early running.

There is no end to the glory of Lord Shiva, but in the form of conclusions it can be said, Shiva is everything; if there is no Shiva, then there is nothing.

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पुलवामा के आतंकी हमले में शहीद सैनिकों के लिए सैद्धांतिक श्रद्धांजलि- Theological tribute to martyr soldiers in the Pulwama terror attack

पुलवामा के आतंकी हमले में शहीद सैनिकों के लिए सैद्धांतिक श्रद्धांजलि (please browse down or click here to view this post in English)

इतिहास गवाह है कि हमलावर ही अधिकाँश मामलों में विजयी हुआ है। यदि वह जीतता है, तब तो उसकी कामयाबी सबके सामने ही है, परन्तु यदि वह हारता है, तब भी वह कामयाब ही होता है। इसके पीछे गहरा तांत्रिक रहस्य छिपा हुआ है। हमला करने से पहले आदमी ने मन को पूरी तरह से तैयार किया होता है। हमले के लिए मन की पूरी तैयारी का मतलब है कि वह मृत्यु के भय को समाप्त कर देता है। मृत्यु का भय वह तभी समाप्त कर पाएगा, यदि उसे जीवन व मरण, दोनों बराबर लगेंगे। जीवन-मरण उसे तभी बराबर लगेंगे, जब वह मृत्यु में भी जीवन को देखेगा, अर्थात मृत्यु के बाद जन्नत मिलने की बात को दिल से स्वीकार करेगा। दूसरे शब्दों में, यही तो अद्वैत है, जो सभी दर्शनों व धर्मों का एकमात्र सार है। उसी अद्वैतभाव को कई लोग भगवान्, अल्लाह आदि के नाम से भी पुकारते हैं। तब सीधी सी बात है कि हरेक हमलावर अल्लाह का बन्दा स्वयं ही बन जाता है, चाहे वह अल्लाह को माने, या ना माने। अगर तो वह भगवान या अल्लाह को भी माने, तब तो सोने पे सुहागा हो जाएगा, और दुगुना फल हासिल होगा।

अब हमला झेलने वाले की बात करते हैं। वह मानसिक रूप से कभी भी तैयार नहीं होता है, लड़ने व मरने-मारने के लिए। इसका अर्थ है कि वह द्वैतभाव में स्थित होता है, क्योंकि वह मृत्यु से डरता है। वह जीवन के प्रति आसक्ति में डूबा होता है। इसका सीधा सा प्रभाव यह पड़ता है कि वह खुल कर नहीं लड़ पाता। इसलिए अधिकाँश मामलों में वह हार जाता है। यदि कभी वह जीत भी जाए, तो भी उसका डर व द्वैतभाव बना रहता है, क्योंकि विजयकारक द्वैत पर उसका विश्वास बना रहता है। सीधा सा अर्थ है कि वह हार कर भी हारता है, और जीत कर भी हार जाता है। बेहतरी से अचानक का हमला झेलने में वही सक्षम हो सकता है, जो अपने मन में हर घड़ी, हर पल अद्वैतभाव बना कर रखता है। अर्थात जो मन से साधु-संन्यासी की तरह की अनासक्ति से भरा हुआ जीवन जीता है, समर्थ होते हुए भी हमले की शुरुआत नहीं करता, और अचानक हुए हमले का सर्वोत्तम जवाब भी देता है। वैसा आदमी तो भगवान को सर्वप्रिय होता है। तभी तो भारत ने हजारों सालों तक ऐसे हमले झेले, और हमलावरों को नाकों चने भी चबाए। तभी भारत में शुरू से ही धर्म का, विशेषतः अद्वैत-धर्म का बोलबाला रहा है। इसी धर्म-शक्ति के कारण ही भारत को कभी भी किसी के ऊपर हमला करने की आवश्यकता नहीं पड़ी। अपने धर्म को मजबूत करने के लिए हमला करने की आवश्यकता उन्हें पड़ती है, जो अपने दैनिक जीवन में शांतिपूर्वक ढंग से धर्म को धारण नहीं कर पाते। यह केवलमात्र सिद्धांत ही नहीं है, बल्कि तांत्रिक प्रेमयोगी वज्र का अपना स्वयं का अनुभव भी है। जीवन के हरेक पल को अद्वैत से भरी हुई, भगवान की पूजा बनाने के लिए ही उसने इस वेबसाईट को बनाया है।

अब एक सर्वोत्तम तरीका बताते हैं। यदि अद्वैत-धर्म का निरंतर पालन करने वाले लोग दुष्टों पर हमला करके भी अद्वैत-धर्म की शक्ति प्राप्त करने लग जाए, तब तो सोने पर सुहागे वाली बात हो जाएगी। विशेषकर उन पर तो हमला किया ही जा सकता है, जिनसे अपने को खतरा हो, और जो अपने ऊपर हमला कर सकते हों। हमारा देश आज ऐसे ही मोड़ पर है। यहाँ यह तरीका सबसे सफल सिद्ध हो सकता है। भारत के सभी लोगों को ऋषियों की तरह जीवन बिताना चाहिए। भारत के सैनिकों को भी ऋषि बन जाना चाहिए, और हर-हर महादेव के साथ उन आततायियों पर हमले करने चाहिए, जो धोखे से हमला करके देश को नुक्सान पहुंचाते रहते हैं। एक बार परख लिया, दो बार परख लिया, चार बार परख लिया। देश कब तक ऐसे उग्रपंथियों को परखता रहेगा?

आतंकवादियों के आश्रयस्थान के ऊपर जितने अधिक प्रतिबन्ध संभव हो, उतने लगा देने चाहिए, अतिशीघ्रतापूर्वक। उन प्रतिबंधों में शामिल हैं, नदी-जल  को रोकना, व्यापार को रोकना, संयुक्त राष्ट्र संघ में आतंकवादी देश घोषित करवाना आदि-2।

एक सैद्धांतिक व प्रेमयोगी वज्र के द्वारा अनुभूत सत्य यह भी है कि जब मन में समस्या (कुण्डलिनी चक्र अवरुद्ध) हो, तभी संसार में भी दिखती है। यही बात यदि उग्रपंथी समझें, तो वे दुनिया को सुधारने की अंधी दौड़ को छोड़ दें।

भगवान करे, उन वीरगति-प्राप्त सैनिकों की आत्मा को शांति मिले।

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https://demystifyingkundalini.com/2018/12/23/योग-व-तंत्र-एक-तुलनात्मक-अ

https://demystifyingkundalini.com/2018/07/18/religious-extremism

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Theological tribute to martyr soldiers in the Pulwama terror attack

History is the witness that the attacker has won in most of the cases. If he wins, then his success is in front of everyone, but if he loses, he still succeeds. The deep tantric mystery is hidden behind this. Before attacking other, man had prepared the mind completely. The complete preparation of the mind for the attack means that he eliminates the fear of death. He will be able to destroy the fear of death only if both life and death will be equal for him. Life and death will be equal to him, when he will see life in death also, that means, after death, he will accept the matter of getting the Paradise. In other words, this is the Advaita (non-duality), which is the only essence of all philosophies and religions. Many people call the same adwaita as the name of God, Allah etc. Then it is a straightforward thing that every attacker is the man of Allah itself, whether he believe in Allah or does not believe. If he also obeys God or Allah, then he will be blessed with borax on gold, means double reward will be achieved.

Now talk about the attacked. He is never mentally prepared regarding fighting and do or die. This means that he is present inside duality, because he is afraid of death. He is immersed in attachment to life. Its direct effect is that he does not openly fight. Therefore, in most cases he loses. Even if he wins, even then his fear and duality will remain, because his faith remains on the victorious duality. Straightforward it means that he loses even after defeating, and also loses by winning. He can be able to withstand the sudden attack better, who keeps non-duality in his mind at each moment of his life. That means, the mind that lives in a way filled with non-attachment like a Sage-Sannyasi. Even when capable, he does not start the attack, and gives a most appropriate answer to the sudden attack. Such a person is most loved by God. Only then did India take such attacks for thousands of years, and even shown stars in the daytime to the attackers. Only then India has religion dominated, especially Advaita Dharma (non duality-religion). Because of this same power, India never needed to attack anyone. Those need to attack to strengthen their own religion, who cannot hold religion in peace in their daily life. It is not only a mere theory, but also a tantric, Premyogi Vajra has this type of own experience. He has created this website to make every moment of one’s life full of Advaita, the unique and real worship of God.

Now tell a best way. If people, who constantly follow the Advaita Dharma, also continue to get the power of Advaita Dharma by attacking the evil ones, then there will be again borax over the gold. Especially those attackers can be attacked, who are a threat to one’s security, and those who can attack suddenly. Our country is on the same twist today. Here this method can be proven most successful. All people of India should spend life like sages. The soldiers of India should become sages, and with slogan of Har- Har Mahadev, they should attack those terrorists, who continue to harm the country by attacking deceptively. Once those have been tested, tested twice, tested four times. How long will the country test such extremists?

The restrictions on the shelter of the terrorists should be imposed as much as possible, in the fastest way possible. Those restrictions include stopping river-water, preventing trade, declaring a terrorist country in the United Nations etc.

The truth that is perceived by Premyogi vajra is that when there is a problem in the mind (Kundalini Chakra is blocked), then only in the world it is also visible. If extremists understand the same thing, then they should leave the blind race to improve the world.

May God bestow peace to the departed soul of those martyrs.

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