कब तक सत्य छिपाओगे~दशहरा विशेष कविता

कब तक सत्य छुपाओगे
कब तक प्रकाश दबाओगे।

खड़ा है रावण धर्म में
पड़ा है खंजर मर्म में।
पाप है अपने चरम में
मनुता डूबी शर्म में।
हिंसा का ढूंढोगे
कब तक बहाना।
जैसा करोगे
वैसा पाओगे।
कब तक सत्य छुपाओगे
कब तक प्रकाश दबाओगे।

पूजा पंडाल सज चुके
अपना धर्म भज चुके।
रावण धर्म के लोगों के
हिंसक कदम नहीँ रुके।
पुतले को जलाओगे
अपना मन बहलाओगे।
कब तक सत्य छुपाओगे
कब तक प्रकाश दबाओगे।

अगला वर्ष आएगा
यही बहारें लाएगा।
राज करेगा वीर बुजदिल
ये ही मंजर पाएगा।
मानवता को बुजदिली
कब तक तुम कह पाओगे।
कब तक सत्य छुपाओगे
कब तक प्रकाश दबाओगे।
साभार~भीष्म🙏@bhishmsharma95

जय माता दुर्गे जय माता तारा हम पापी मानुष को तेरा सहारा~भक्तिगीत कविता

जय माता दुर्गे
जय माता तारा।
हम पापी मानुष को
तेरा सहारा।।
जय माँ भवानी
तेरा जयकारा।
भव-सा-गर का
तू ही किनारा।।
जय माता दुर्गे------
हिंगलाज नानी
जय हो जयकारा
तेरे लिए मेरा
जीवन पहारा।।
जय माता---
भटकूँ अवारा
बेघर बिचारा।
तेरे सिवा नहीं
अब कोई चारा।।
जय माता---
जग देख सारा
भटका मैं हारा।
भूलूँ कभी न
तेरा नजारा।।
जय माता---
हे अम्बे रानी
जय जय जयकारा
पागल सुत तेरा
नकली खटारा।।
जय माता----
तू ही जगमाता
तू ही विधाता।
तू जो नहीं हमें
कुछ भी न आता।।
हम थरमामीटर
तू उसमें पारा
तू क्षीरसागर
हम पानी खारा।।
जय माता---
किसमत का मारा
जग में नकारा
तू जो मिले जग
पाए करारा।।
हे माता---
जो है हमारा
सब है तुम्हारा।
दूँ क्या मैं तुझको
जो हो हमारा।।
जय माता दुर्गे
जय माता तारा।
हम पापी मानुष को
तेरा सहारा।।
साभार~भीष्म🙏@bhishmsharma95

जहाँ भी देखो वहीं दक्ष हैं

	जहाँ भी देखो वहीं दक्ष हैं।
        अहंकार से भरे हुए
	अपने-अपने पक्ष हैं।
	
        कोई याग-यज्ञ में डूबा
	कोई दुनिया का अजूबा।
	कोई बिजनेसमेन बना है
	हड़प के बैठा पूरा सूबा।
	एक नहीँ धंधे लक्ष हैं
	जहां भी देखो वहीँ दक्ष हैं।
	अहंकार से भरे हुए
	अपने-अपने पक्ष हैं।
	
	कर्म-मार्ग में रचे-पचे हैं
	राग-रागिनी खूब मचे हैं।
	नाम-निशान नहीं है सती का
	शिव भी उस बिन नहीं जचे हैं।
	अंधियारे से भरे कक्ष हैं
	जहां भी देखो वहीँ दक्ष हैं।
	अहंकार से भरे हुए
	अपने-अपने पक्ष हैं।
	
	ढोंग दिखावा अंतहीन है
	मन की निष्ठा अति महीन है।
	फल पीछे लट्टू हो रहते
	फलदाता को झूठा कहते।
	चमकाते बस नयन नक्श हैं
	जहां भी देखो वहीँ दक्ष हैं।
	अहंकार से भरे हुए
	अपने-अपने पक्ष हैं।
	
	प्रेम-घृणा का झूला झूले
	दर्शन वेद पुराण का भूले।
	बाहु-बली नहीं कोई भी
	नभ के पार जो उसको छू ले।
	शिवप्रकोप से न सरक्ष हैं
	जहाँ भी देखो वहीँ दक्ष हैं।
	अहंकार से भरे हुए
	अपने-अपने पक्ष हैं।
	~भीष्म🙏

Photo by Plato Terentev from Pexels

हे! पर्वतराज करोल [भक्तिगीत-कविता]

King Mount Karol 【Parvatraj Karol】 rising with Sun
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
जब जग ने ठुकराया
तू-ने अपनाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
जब जग ने ठुकराया
तू-ने अपनाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
हे! पर्वतराज करोल।

सुबह-सवेरे जब भी उठता
तू ही सबसे पहले दिखता।
सुबह-सवेरे जब भी उठता
तू ही सबसे पहले दिखता।
सूरज का दीपक मस्तक पर
ले के जग को रौशन करता।
सूरज का दीपक मस्तक पर
ले के जग को रौशन करता।
सूरज को डाले जल से तू
सूरज को डाले जल से तू
सूरज संग नहाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
जब जग ने ठुकराया
तू-ने अपनाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
जब जग ने ठुकराया
तू-ने अपनाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
हे! पर्वतराज करोल।

काम बोझ से जब भी थकता
सर ऊपर कर तुझको तकता।
काम बोझ से जब भी थकता
सर ऊपर कर तुझको तकता।
दर्शन अचल वदन होने से
काम से हरगिज़ न रुक सकता।
दर्शन अचल वदन होने से
काम से हरगिज़ न रुक सकता।
कर्मयोग का पावन झरना
कर्मयोग का पावन झरना
पल-पल तूने बहाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
जब जग ने ठुकराया
तू-ने अपनाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
जब जग ने ठुकराया
तू-ने अपनाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
हे! पर्वतराज करोल।

बदल गए सब रिश्ते नाते
बदल गया संसार ये सारा।
बदल गए सब रिश्ते नाते
बदल गया संसार ये सारा।
मित्र-मंडली छान के रख दी
हर-इक आगे काल के हारा।
मित्र-मंडली छान के रख दी
हर-इक आगे काल के हारा।
खुशकिस्मत हूँ तेरे जैसा
खुशकिस्मत हूँ तेरे जैसा
मीत जो मन का पाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
जब जग ने ठुकराया
तू-ने अपनाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
जब जग ने ठुकराया
तू-ने अपनाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
हे! पर्वतराज करोल।

सबसे ऊंचे पद पर रहता
कहलाए देवों का दे-वता।
सबसे ऊंचे पद पर रहता
कहलाए देवों का दे-वता।
उठकर मूल अधार से प्राणी
रोमांचित मस्तक पर होता।
उठकर मूल अधार से प्राणी
रोमांचित मस्तक पर होता।
सब देवों ने मिलकर तेरा 
सब देवों ने मिलकर तेरा
प्यारा रूप बनाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
जब जग ने ठुकराया
तू-ने अपनाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
जब जग ने ठुकराया
तू-ने अपनाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
हे! पर्वतराज करोल।

जटा बूटियाँ तेरे अंदर
नाग मोरनी मानुष बंदर।
जटा बूटियाँ तेरे अंदर
नाग मोरनी मानुष बंदर।
गंगा नद नाले और झरने
नेत्र तीसरा भीषण कन्दर।
गंगा नद नाले और झरने
नेत्र तीसरा भीषण कन्दर।

चन्द्र मुकुट पर तोरे सोहे
बरबस ही मोरा मन मोहे।
चन्द्र मुकुट पर तोरे सोहे
बरबस ही मोरा मन मोहे।
उपपर्वत नीचे तक जो है
नंदी वृष पर बैठे सो है।
उपपर्वत नीचे तक जो है
नंदी वृष पर बैठे सो है।

बिजली सी गौरा विराजे
कड़कत चमकत डमरू बाजे।
बिजली सी गौरा विराजे
कड़कत चमकत डमरू बाजे।
आंधी से हिलते-डुलते वन
नटराजन के जैसे साजे।
आंधी से हिलते-डुलते वन
नटराजन के जैसे साजे।

बाघम्बर बदली का फूल
धुंध बनी है भस्म की धूल।
बाघम्बर बदली का फूल
धुंध बनी है भस्म की धूल।
गणपत जल बन बरसे ऊपर
ऋतु मिश्रण का है तिरशूल।
गणपत जल बन बरसे ऊपर
ऋतु मिश्रण का है तिरशूल।

मन-भावन इस रूप में तेरे
मन-भावन इस रूप में तेरे
शिव का रूप समाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
जब जग ने ठुकराया
तू-ने अपनाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
जब जग ने ठुकराया
तू-ने अपनाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
हे! पर्वतराज करोल।
-हृदयेश बाल🙏🙏bhishm

स्कूल चले हम

घर को चले हम, घर को चले हम
स्कूल से अपने घर को चले हम।
को-रो-ना से डर हरदम
अपने-अपने घर चले हम।।
घर को चले हम, घर को चले हम
स्कूल से अपने-घर को चले हम।

खेल नहीं अब सकते हम
स्कू-ल के मैदान में।
कूद नहीं अब सकते हम
खेलों के जहान में।।
अब तो मजे करेंगे हम
खेत पर खलिहान में।
बूढ़ी अम्मा के संग-संग
बतियाएंगे हम हरदम।।
घर को चले हम, घर को चले हम
स्कूल से अपने घर को चले हम।
को-रो-ना से डर हरदम
अपने-अपने घर चले हम।।
घर को चले हम, घर को चले हम
स्कूल से अपने-घर को चले हम।

ऑनलाइन से पढ़ेंगे हम
ऑलराउंडर बनेंगे हम।
फालतू मीडिया छोड़कर
नॉलेज ही चुनेंगे हम।।
घर में योग करेंगे हम
इंडोर खेल करेंगे हम।
प्रातः जल्दी उठ करके
वॉकिंग भी करेंगे हम।।
घर को चले हम, घर को चले हम
स्कूल से अपने घर को चले हम।
को-रो-ना से डर हरदम
अपने-अपने घर चले हम।।
घर को चले हम, घर को चले हम
स्कूल से अपने-घर को चले हम।

स्कूल तो अपने जाएंगे
वैक्सी-नेशन के बाद।
फिर तो हम हो जाएंगे
जेल से जैसे हों आजाद।।
फिर तो नहीं करेंगे हम
व्यर्थ समय यूँ ही बरबाद।
पढ़-लिख कर व खेल कर
हम होंगे बड़े आबाद।।
शिक्षार्थ स्कूल जाएं हम
सेवार्थ हो आएं हरदम।
स्कूल का नाम रौशन करके
देश को रौशन करदें हम।।
स्कूल चले हम, स्कूल चले हम
घर से अपने- स्कूल चले हम।
हरा के उस को-रो-ना को
अपने-अपने स्कूल चले हम।।
स्कूल चले हम, स्कूल चले हम
घर से अपने-स्कूल चले हम।

बीच का बंदर खेलेंगे
स्टप्पू भी अब खेलेंगे।
लुक्का-छुप्पी खेलेंगे
चोर-सिपाही खेलेंगे।।
इक-दूजे संग दौड़ें हम
प्रेम के धागे जोड़ें हम।
मिलजुल रहना सीखें हम
कदम से सबके मिला कदम।।
स्कूल चले हम, स्कूल चले हम
घर से अपने-स्कूल चले हम।
हरा के उस को-रो-ना को
अपने-अपने स्कूल चले हम।।
स्कूल चले हम, स्कूल चले हम
घर से अपने-स्कूल चले हम।
-हृदयेश बाल

भाई विनोद शर्मा द्वारा रचित कालजयी, भावपूर्ण व दिल को छूने वाली कुछ कविताएँ- भाग 4

स्वयं की तू तलाश कर

क्षणिक सुखों की चाह में           
भटक रहा इधर-उधर
कस्तूरी की खुशबू के लिए
हिरण की तरह बेख़बर
वज़ूद क्या तू कौन है?
इतनी-सी पहचान कर
हृदय में अपने झांक ले
स्वयं की तू पहचान कर।

राह में बिखरे हुए
कांटे भी चुन लें कभी
रोते हुए इन्सान का
दर्द भी सुन ले कभी
क्या तू मुंह दिखाएगा
जाएगा जब उसके घर
हृदय में अपने झांक ले
स्वयं की तू तलाश कर।

मर गया है कौन ये
पास जा के देख ले
ज़ुल्म क्या इस पर हुआ
चिन्तन में चिता सेंक लें
आवाज़ उठा अर्श तक
किसका तुझे इतना डर
हृदय में अपने झांक ले
स्वयं की तू तलाश कर।

बस्ती में ख़ुदग़र्जों की
निराश होना छोड़ दें
कर दे बुलन्द हस्ती को
हवाओं का रुख मोड़ दे
गुज़रेगा जिन राहों से
लोग झुकाएंगे सर
हृदय में अपने झांक ले
स्वयं की तू तलाश कर।

शान्ति-ध्वज को छोड़ दें
शमशीर उठा तन के चल
मसीहा बन कमज़ोर का
पड़ने दें माथे पे बल
आग़ाज़ कर जीवन का तू
अन्जाम की फ़िक्र न कर
हृदय में अपने झांक ले
स्वयं की तू तलाश कर।

सांसें मिली संसार में
मक़सद कोई ज़रूर है
शाख़ पर पत्ता भी वरना
हिलता नहीं हुज़ूर है
लगा दे यहाँ हाज़िरी
दिन-रात अपना कर्म कर
हृदय में अपने झांक ले
स्वयं की तू तलाश कर।

तरकश में अभी कई बाण पड़े हैं

हंसा कौन ये दूर गगन में
क्या सुन पाए तुम भी यारो
मौन व्याप्त है चहुं दिशा में
अब तो सम्भलो अहम के मारो

अति का बुरा सर्वत्र सुना था
आज घटित हुए देख लिया है
फिसला जब जीवन मुट्ठी से
फिर तुमने उसे याद किया है।

जीवनदायी धरा पर तुमको
जीना रास नहीं आया है
जीवन सम्भव नहीं जहां था
वो मंगल-चाँद तुम्हें भाया है

प्रकृति विरुद्ध जो काम किए हैं
उसका दण्ड तो पाना होगा
तुमने सोचा शाश्वत हैं हम
अब समय से पूर्व जाना होगा।

भूमि,नभ,जल,वायु,अग्नि
पंच तत्वों को भी न छोड़ा
विधि निर्मित जो नियम बने थे
उन नियमों का पालन तोड़ा

विज्ञान नहीं भगवान से ऊपर
इतना अगर तुम जाने होते
आज नहीं अपने कन्धो पर
मानवता की लाशें ढोते।

प्रमाद भरा है कैसा तुम में
दानवता तुमसे हारी है
भक्ष लिया हर जीव जगत का
अब सोचो किसकी बारी है

शर्मसार है जगत नियन्ता
महसूस हुई लाचारी है
सख्त़ फैसला अब वो लेगा
सृष्टि की ज़िम्मेदारी है।

अभी तो ये आरम्भ हुआ है
क्यों इतने बेचैन हो रहे
समय है ये कर्मों के फल का
वर्षौं से जिसका बीज बो रहे

किसके मद में उन्मत थे तुम
अब शीश झुकाए मौन खड़े हैं
एक ही तीर चलाया उसने
तरकश में अभी कई बाण पड़े हैं।

मानव जीवन के विरोधाभास पर छोटी सी गजल

जब से कसम ली उसने शराफ़त से जीने की
 पैमाईश लगे अब करने बुज़दिल भी सीने की।
 
हिक़ारत से देखते थे जो मयख़ानों की तरफ़
 आदत उन्हें अब हो गई हर रोज़ पीने की।
 
फ़ितरत में जिनकी डूबना बचाए उन्हें कौन
 समन्दर में ज़रूरत नहीं उनको सफ़ीने की।
 
नहीं वास्ता मेहनत से जिनका दूर तलक यार
 करते नहीं इज्ज़त वो किसी के पसीने की।
 
इकट्ठा किए रहे जो कौड़ियों को अपने पास
 कीमत क्या जाने नासमझ उजले नगीने की।
 
भरे हैं जो बारूद से हर वक़्त बेशुमार
 देते हैं नसीहत वो सभी को सकीने की।

भाई विनोद शर्मा द्वारा रचित कालजयी, भावपूर्ण व दिल को छूने वाली कुछ कविताएँ- भाग 3

“भाव सुमन”, इस लघु पुस्तिका में हमारे दैनिक जीवन से जुड़े हुए भौतिक और आध्यात्मिक पहलुओं को सुन्दर, स्मरणीय, और कर्णप्रिय कविताओं के रूप में छुआ गया है। ये कवितायेँ बहुआयामी हैं। प्रत्येक कविता अनेक प्रकार के विषयों को एकसाथ छूती है। कविता हमारे अवचेतन मन तक आसानी से पहुँच बना लेती हैं। इसीलिए कहा जाता है कि “जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि”। बहुत सी पुस्तकों को पढ़ने से भी जो बात मन-स्वभाव में न बैठे, वह मात्र एक कविता के पठन-चिंतन से आसानी से बैठ सकती है। बहुत न लिखते हुए इसी आशा के साथ विराम लगाता हूँ कि प्रस्तुत कविता-संग्रह कविता-प्रेमी पाठकों की आकांक्षाओं पर खरा उतरेगा।

निःशुल्क लघु कविता संग्रह ‘भाव सुमन’ को प्राप्त करने की लिए क्लिक करें

भाई विनोद शर्मा द्वारा रचित कालजयी, भावपूर्ण व दिल को छूने वाली कुछ कविताएँ- भाग 3

मोक्ष नहीं मुझे लक्ष्य चाहिए

शुष्क कण्ठ की बनूं तरलता
  जटिल भूमि की बनूं सरलता
  उमड़-घुमड़ कर नभ पर छाए
  उस बादल का जल बन जाऊं।
  मोक्ष नहीं मुझे लक्ष्य चाहिए,
  जब भी मैं धरा पर आऊं।

  वीरों के माथे का चन्दन
  जग करता है जिसका वन्दन
  प्रस्फुटित हुआ है अंकुर जिसमें
  उस माटी का कण बन जाऊं।
  मोक्ष नहीं मुझे लक्ष्य चाहिए,
  जब भी मैं धरा पर आऊं।

  सुमन-सौरभ को बिखराता
  संतप्त (तप्त) हृदय को हर्षाता
  जो दग्ध वपु को कर दे शीतल
  वो समीर झोंका बन जाऊँ  मोक्ष नहीं मुझे लक्ष्य चाहिए,
  जब भी मैं धरा पर आऊं।

  सुलगाए साहस की ज्वाला
  झुलसाए आतंक का जाला
  बुझी आशा (आस) का दीप जलाए
  वो अग्नि-स्फुलिंग बन जाऊं।
  मोक्ष नहीं मुझे लक्ष्य चाहिए,
  जब भी मैं धरा पर आऊं।

  उज्ज्वल चन्द्र-सितारों वाला
  पर्वत की दीवारों वाला
  जिसके नीचे जीव सृजन हो
  उस नभ का हिस्सा बन जाऊं।
  मोक्ष नहीं मुझे लक्ष्य चाहिए
  जब भी मैं धरा पर आऊं।

  जन्म-मरण के बन्धन से
  उस दिन मुक्ति देना ईश्वर!
  पर-नयनों के अश्रु से
  जिस दिन द्रवित न होने पाऊं
  मोक्ष नहीं मुझे लक्ष्य चाहिए,
  जब भी मैं धरा पर आऊं। 

हकीकत में जिंदगी तो काँटों ने संवार दी

चाहत में हमने गुल की
उम्रें गुज़ार दी।
हकीक़त में ज़िन्दगी तो
कांटों ने संवार दी।
इल्ज़ाम क्यों दें वक्त को
हम चल न पाए साथ।
इसने दी गर ख़िज़ा तो
किसने बहार दी?

सब बन बैठे नाव खवैया

हवा चली ये कैसी भैया
कूद पड़े सब एक ही नैया
पता नहीं, पतवार चीज़ क्या?
सब बन बैठे नाव खवैया।
लय और ताल समझ न आई
नाच पड़े सब ता-ता थैया
आँख मूंद सब दौड़ लगाए
मन्ज़िल सबकी भूल-भूलैया।

पल में क्या हो? खबर नहीँ है
सबका एक ही नाच नचैया।

भाई विनोद शर्मा द्वारा रचित कालजयी, भावपूर्ण व दिल को छूने वाली कुछ कविताएँ- भाग 2

भाई विनोद शर्मा द्वारा रचित कालजयी, भावपूर्ण व दिल को छूने वाली कुछ कविताएँ- भाग 2

बताते हुए हर्ष हो रहा है कि “भाई विनोद शर्मा द्वारा रचित व दिल को छूने वाली कुछ कविताएँ-1” को पाठकों व कविता-प्रेमियों का अप्रत्याशित प्यार मिला। कुछ ही घंटों में उस पोस्ट को सैंकड़ों वियूस, लाईक्स व शेयर प्राप्त हो गए। उसीसे प्रोत्साहित होकर हमने कवि महोदय से इस कविता-श्रृंखला के दूसरे भाग की रचना का अनुरोध किया, जिसे कवि महोदय ने सहर्ष स्वीकार किया। उसी भाग को हम इस पोस्ट के माध्यम से अपने प्रिय पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं।

परवाज़ रहता है क्यों इतना उत्सुक

 परवाज़                                                            
 रहता है क्यों इतना उत्सुक
 तारीख़ नई लिखने को हरदम।
                                
 एक नए रिश्ते की ख़ातिर
 अपना ही लहराए परचम।
 उसको ही सर्वस्व मानकर
 सबसे करे किनारा है।
 काट स्वयं जड़ों को अपनी
 ढूंढे नया सहारा है।
  
 याद नहीं बिल्कुल भी उसको
 बचपन में खेल जो खेले थे।
 एहसास नहीं ज़रा भी उसको
 माँ-बाप ने जो दु:ख झेले थे।
  
 मिलकर भाई-बहन कभी
 तितली के पीछे भागे थे
 नई सुबह के इन्तज़ार में
 रात-रात भर जागे थे।
  
 एक-दूसरे के दु:ख-सुख से
 जब एक साथ रो पड़ते थे।
 मिलते ही एक नई ख़ुशी
 तब फूल हंसी के झड़ते थे।
  
 छोटे-छोटे कदमों से हम
 धूल उड़ाया करते थे।
 गाँव की पगडण्डी से
 जब पढ़ने जाया करते थे।
  
 उस वक़्त हमें मालूम नहीं था
 वक़्त भी क्या दिखलाएगा।
 दोस्त-भाई गाँव छोड़कर
 शहरों का हो जाएगा।
  
 भाग रहा है धन के पीछे
 भूल के पिछली बातों को।
 आ जाती जब याद कभी तो
 तन्हा रोता रातों को।
  
 छोड़ केअपनी जन्मस्थली
 ढूंढे है प्यार परायों में।
 त्याग मुसाफिर घर को अपने
 ज्यों रात बिताए सरायों में।
  
 खेत पड़े हैं बंजर सारे
 माँ-बाप की आँखें सूखी हैं।
 ताक रही रस्ता बेटे का
 बस उसके दरस की भूखी हैं।
  
 आई घर की याद उसे
 बदला जब सारा परिवेश।
 इतिहास दोहराया ज़माने ने
 बच्चे भी उड़ गए परदेस।
  
 पंछी भी उड़कर रातों को
 आ जाते हैं नीढ़ में
 पर खोया रहा तू क्यों बरसों तक
 इन नगरों की भीड़ में?
  
 छोड़ जवानी शहरों में
 बूढ़ा लौटे गाँव को।
 वृक्ष नहीं जो बचे हुए हैं
 ढूंढे उनकी छाँव को।
  
 जैसा बोया वैसा काटा
 बचा नहीं अब कुछ भी शेष।
 झुकी कमर से लाठी टेके
 खोजे गत जीवन अवशेष।
  
 यन्त्र बना है मानव अब तो
 बलि चढ़ा जज़्बातों की।
 कभी नहीं करता तहलील
 उत्पन्न हुए हालातों की।
  
 कट के अपनी डोर से
 पतंग कोई उड़ न पाए।
 परवाज़ भरी थी जिस ज़मीन से
 उसी ज़मीन पे गिर जाए।  

ऐ ज़िन्दगी ! तू बेहद खूबसूरत है।

ऐ ज़िन्दगी ! तू बेहद खूबसूरत है।  
 तेरा हर नाज़ो नख़रा सह लेते हैं।
                                        
 रुलाए तू हंसाए तू,
 नश्तर चुभा,सहलाए तू।
  
 तेरी लौ की तपिश मेंपरवाने बन जल जाते हैं,
 कुर्बान हुए जाते हैं ।
 ऐ ज़िन्दगी!....
 मयस्सर हुई तू बहुत खुशनसीबी से 
 नहीं कोई ताल्लुक अमीरी-ग़रीबी से 
 तड़पाए तू,लहराए तू।
 सपने दिखा,तरसाए तू।
 तेरी रौ की कशिश में
 तिनके बन बह जाते हैं,भँवर में फंस जाते हैं।
 ऐ ज़िन्दगी!…..
  
 तमाशाई हैं सब अजब तेरी रियासत के
 नहीं कोई मालिक तेरी इस विरासत के
 ललचाए तू,भरमाए तू,
 दिल से लगा,ठुकराए तू।
 तेरी हवा की जुम्बिश से
 पत्ते बन उड़ जाते हैं,ख़ाक में मिल जाते हैं।
 ऐ ज़िन्दगी!….
  
   

फिर से तेरी रहमतों की बारिश का इंतज़ार मुझको

फिर से 
 तेरी रहमतों की बारिश का इंतज़ार मुझको      
 उम्मीद के ये बादल घिरने लगे हैं फिर से।
                                          
 जो ज़ख़्म अब से पहले नासूर बन गए थे
 रिस्ते हुए ज़ख़्म वो भरने लगे हैं फिर से।
 सफर में ज़िन्दगी के थी धूप चिलचिलाती
 झुलसे हुए पैरों से थी चाल डगमगाती।
 तपती हुई ज़मीं पर चलते हुए अचानक
 दरख़्तों की घनी छाया आने लगी है फिर से।
  
 ख़ौफ़ से भरा था इन्सानियत का मंज़र
 ख़ून से सना था हैवानियत का ख़ंज़र।
 फैली हुई थी हरसु दहशत की धुन्ध गहरी
 हिम्मत की हवा से वो छटने लगी है फिर से।
  
 अन्धेरों में भटकता था वो राह से अन्जाना  
 शम्मा को तड़पता है जैसे कोई परवाना।
 काली अन्धेरी रातें जो राह रोकती थी
 जुगनू के कारवां से रोशन हुई हैं फिर से।
  
 काली घटा ने घिर के ऐलान कर दिया है
 सागर का पानी उसने जी भर के पी लिया है।
 हर शाख़ पत्ते पत्ते पे लगी बौछारें गिरने
 कुदरत के ज़र्रे-ज़र्रे में छाया ख़ुमार फिर से। 

यदि आपने इस लेख/पोस्ट को पसंद किया तो कृपया लाईक बटन दबाएँ, इसे शेयर करें व इस वार्तालाप/ब्लॉग को अनुसृत/फॉलो करें, व साथ में अपना विद्युतसंवाद पता/ई-मेल एड्रेस भी दर्ज करें, ताकि इस ब्लॉग के सभी नए लेख एकदम से सीधे आपतक पहुंच सकें। साथ में, कमेंट में अपनी राय देना न भूलें। धन्यवादम।

काल का प्रहार
आकाश अश्रु रो रहा
सृष्टि के पाप धो रहा

धरा मिलनकी इच्छासे
पर्वत भी धैर्य खो रहा

चारों दिशा अवरुद्ध है
जल धाराएँ क्रुद्ध हैं

नर कंकाल बह रहे ——-

उपरोक्त “भाई विनोद शर्मा जी द्वारा रचित जगत्प्रसिद्ध, व दिल को छूने वाली कुछ कविताएँ- भाग 1” को पढ़ने के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें

भाई विनोद शर्मा द्वारा रचित कालजयी, भावपूर्ण व दिल को छूने वाली कुछ कविताएँ- भाग 3

कवि महोदय का संक्षिप्त परिचय

कवि विनोद शर्मा एक हरफनमौला व्यक्ति हैं, और साथ में एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी भी हैं। ये हिमाचल प्रदेश के सोलन जिला में अध्यापन के क्षेत्र से जुड़े हैं। सोलन पहाड़ों का प्रवेष-द्वार भी कहलाता है। यह हिमालयी उतुंग शिखरों को आधुनिक रूप से विकसित मैदानी भूभागों से जोड़ता है। विनोद भाई कला, संगीत व साहित्य के क्षेत्रों में बहुत रुचि रखते हैं। रंग-बिरंगी कविताएँ तो इनके दिल की आवाज की तरह हैं, जो बरबस ही इनके मुख से निस्सृत होती रहती हैं। ये सोलन जिला के एक छोटे से हिमशिखराँचलशायी गाँव से सम्बन्ध रखते हैं। इनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि ही अध्यापन के क्षेत्र से जुड़ी हुई है। इनकी कविताएँ वास्तविकता का परिचय करवाते हुए अनायास ही दिल को छूने वाली होती हैं। आशा है कि ये भविष्य में भी अपने देहजगत के अमृतकुंड से झरने वाले कवितामृत से अंधी भौतिकता के जहर से अल्पप्राण मरूभूमि को सिंचित करते रहेंगे। facebook

चित्रकार
हृदयेश गर्ग (कक्षा-3)

भाई विनोद शर्मा द्वारा रचित व दिल को छूने वाली कुछ कविताएँ- भाग 1

ये काल का प्रहार है

काल का प्रहार
आकाश अश्रु रो रहा
सृष्टि के पाप धो रहा

धरा मिलनकी इच्छासे
पर्वत भी धैर्य खो रहा

चारों दिशा अवरुद्ध है
जल धाराएँ क्रुद्ध हैं

नर कंकाल बह रहे
हकीकत बयान कर रहे

कुदरत की गहरी मार है
ये काल का प्रहार है।


रिश्तों में अपनापन नहीं
बच्चों में भोलापन नहीं

शीतल रुधिर शिराओं में
धीरज नहीं युवाओं में

वाणी मधु से रिक्त है
हरएक स्वार्थ सिक्त है

अविश्वास से भरा हुआ
हर शख्स है डरा हुआ

इन्सानियत की हार है
ये काल का प्रहार है।


दहक रही भीषण अग्न
झुलस रहा है बाग-वन

सूरज के रक्त नयन से
बरस रहे अंगार हैं

गुलों में वो महक नहीं
परिंदों की वो चहक नहीं

ठूंठ बन गए तरू
भूखंड हो गए मरू

आबोहवा बेज़ार है
ये काल का प्रहार है।


जागृति के नाम पर
विलुप्त शिष्टाचार है

सभ्यता ठगी खड़ी
सुषुप्त संस्कार है

श्रेष्ठता के ढोंग का
ओढ़े हुए नक़ाब है

कर्तव्य बोध शून्य है
अधिकारों का हिसाब है

निश्छलता तार-तार है
ये काल का प्रहार है।

शब्दों से कैसे खेलूं मैं

शब्दों से कैसे खेलूं मैं
अन्तर में भावों की ज्वाला
धधक-धधक सी उठती है।

असह्य अखण्डित दाह-वेदना
जिह्वा पर मेरे ठिठकती है।

प्राकट्य जटिल सा हो जाता है
बस भीतर -भीतर झेलूं मैं।

अब तू ही बता हमदर्द मेरे!
शब्दों से कैसे खेलूं मैं?


इस जगती में हर श्वास की
परिमित एक कड़ी होती है।

हृदय निकट गहन रिश्तों की
चिन्ता -व्यथा बड़ी होती है।

धीर धरूं क्यों?मन करता है
सबकी पीड़ा ले लूं मैं।

अब तू ही बता हमदर्द मेरे!
शब्दों से कैसे खेलूं मैं?


कोकिल की मीठी स्वर लहरी में
झींगुर की झिन-झिन दोपहरी में

मस्त मयूरों के नृत्यों में
गुंजित भवरों के कृत्यों में

प्रच्छन्न सरस जीवन-पय घट से
मधु वंचित प्याले भर लूं मैं।

अब तू ही बता हमदर्द मेरे!
शब्दों से कैसे खेलूं मैं?


काल सरित की अविरल धारा
अबल-सबल हर कोई हारा।


मूर्ख है जो धारा संग उलझे 
लहरें ऐसी जो न सुलझे। 

अब तक कोई पार न पाया 
कैसे वेग को ठेलूं मैं?
 
अब तू ही बता प्रियबन्धु मेरे! 
शब्दों से कैसे खेलूं मैं? 

ऐ ज़िन्दगी ! तू बेहद खूबसूरत है।

ऐ ज़िन्दगी ! तू बेहद खूबसूरत है।
तेरा हर नाज़ो नख़रा सह लेते हैं।

रुलाए तू हंसाए तू,
नश्तर चुभा,सहलाए तू।

तेरी लौ की तपिश में
परवाने बन जल जाते हैं,कुर्बान हुए जाते हैं ।
ऐ ज़िन्दगी!….

भीड़ न बनो जुदा हों भीड़ से खड़े

भीड़ न बनो जुदा हों भीड़ से खड़े,
जिधर भी तुम चलो काफ़िला साथ चल पड़े।
है ज़िन्दगी की राह मुश्किलात से भरी,
ये रास्ते न होंगे हीरे-मोती से जड़े।
भीड़ न बनो…….

मेहनत से ही मिलेगा मुक़द्दर में जो लिखा,
नहीं मिलेंगे स्वर्ण-कलश खेत में गढ़े।
भीड़ न बनो……

पढ़े लिखों का दौर यही शोर चारों ओर,
इन्सां वही है जो दिलों के ज़ज्बों को पढ़े।
भीड़ न बनो…..

हर लम्हा है बदलाव ये मन्ज़ूर तुम करो,
तोड़ रूढ़ियों की बन्दिशें आगे चलो बढ़े।
भीड़ न बनो…..

ज़हनी संगीनें तन चुकी हैं होश में आओ,
जिस्मानी जंग छोड़ के हम खुद से ही लड़ें।
भीड़ न बनो…..

मतलबी हर शख़्स यहाँ घात में बैठा,
मालूम नहीं किस ग़रज़ से शानों पे चढ़े।
भीड़ न बनो…..

करता है वो इन्साफ बिना भेदभाव के,
अपनी कमी का दोष हम किसी पे क्यों मढ़ें।
भीड़ न बनो…..

लियाक़त नहीं मोहताज किसी धन की दोस्तो!
खिलते हैं वे कमल भी जो कीचड़ में हों पड़े।
भीड़ न बनो…..।

दिल के इस मयखाने में जज़्बात ये साक़ी बनते हैं

दिल के इस मयखाने में जज़्बात ये साक़ी बनते हैं
आँखों के पैमाने से फिर दर्द के जाम छलकते हैं।

तेरी रहमतों की बारिश का इन्तज़ार मुझको

तेरी रहमतों की बारिश का इन्तज़ार मुझको
उम्मीद के ये बादल घिरने लगे हैं फिर से ।

जो ज़ख़्म अब से पहले नासूर बन गए थे
रिस्ते हुए ज़ख़्म वो भरने लगे हैं फिर से।

दो अश्क

बैठ कहीं सुनसान जगह पर
ख़ुदग़रज़ी के इस आलम से
माज़ी के गुज़रे लम्हों में
कुछ देर मैं खोना चाहता हूँ
दो अश्क बहाना चाहता हूँ।

जाड़े की ठण्डी सुबह में
ठिठुरते हुए बाहों को बांधे
प्राची से उगते सूरज को
बेसब्री से तकना चाहता हूँ
दो अश्क बहाना चाहता हूँ।

पशु चराने दादी के संग
सुनसान सघन जंगल के भीतर
सर रखकर उनकी गोदी में
वही कथा मैं सुनना चाहता हूँ
दो अश्क——————-।

सुबह सबेरे खेत जोतते
पिता के पद-चिह्नों के पीछे
‘चल’ ‘हट’ कर उन बैलों को
सही दिशा दिखाना चाहता हूँ
दो अश्क——————-।

व्यर्थ उलझकर भाई-बहन से
सच्चे-झूठे आँसू लेकर
स्नेह भरे माँ के आँचल में
वो दुलार मैं पाना चाहता हूँ
दो अश्क—————-।

शहर गए अब्बू के संग
भीड़ भरी सड़क पर उनकी
विश्वास भरी उँगली को थामे
उस भीड़ में खोना चाहता हूँ
दो अश्क—————–।

कोई बड़ी शरारत हो जाने पर
सहमे हुए घबराए मन से
घास गई उस माँ की मैं
वही बाट जोहना चाहता हूँ
दो अश्क—————-।

बिना बताए माँ-अब्बू जब
आँखों से ओझल हो जाते
घर आने पर कहीं दुबककर
मैं उनसे रूठना चाहता हूँ
दो अश्क—————-।

मासूम बचपना कहीं छोड़कर
हरपल मरता है शख़्स यहाँ
इतराता अपने जन्म दिवस पर
क्यों? यही जानना चाहता हूँ
दो अश्क——————।

यदि आपने इस लेख/पोस्ट को पसंद किया तो कृपया लाईक बटन दबाएँ, इसे शेयर करें व इस वार्तालाप/ब्लॉग को अनुसृत/फॉलो करें, व साथ में अपना विद्युतसंवाद पता/ई-मेल एड्रेस भी दर्ज करें, ताकि इस ब्लॉग के सभी नए लेख एकदम से सीधे आपतक पहुंच सकें। साथ में, कमेंट में अपनी राय देना न भूलें। धन्यवादम।

यन्त्र बना है मानव अब तो बलि चढ़ा जज़्बातों की। कभी नहीं करता तहलील उत्पन्न हुए हालातों की।  

कट के अपनी डोर से पतंग कोई उड़ न पाए। परवाज़ भरी थी जिस ज़मीन से उसी ज़मीन पे गिर जाए —-

उपरोक्त “भाई विनोद शर्मा द्वारा रचित कालजयी, भावपूर्ण व दिल को छूने वाली कविताएँ- भाग 2″ का आनंद उठाने के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें” 

अटल जी को श्रद्धा सुमन/ Tribute to Atal ji

अटल जी की याद में कुछ पंक्तियाँ

मैं अटल जी के सम्मान में कुछ पंक्तियाँ लिखना चाहूंगा-

उठ जाग होनहार, प्रकाश हो या अंधकार।

बाँध तरकस पीठ पर, भर तीर में फुंकार।।

झुका दे शीश दोनों का, कर ना पाए फिर कभी भी वार।

उठ जाग होनहार, प्रकाश हो या अंधकार।।

यह कविता कुण्डलिनीयोग से भी स्वतः ही सम्बंधित प्रतीत होती है। यह कविता अज्ञानरूपी निद्रा में डूबे हुए एक आम साधारण मनुष्य से कहती है कि हे बहादुर मनुष्य, नींद से जाग जा और उठ खड़ा हो जा। तू डर मत, चाहे तेज रौशनी का माहौल हो या चाहे घनघोर अन्धकार ही क्यों न हो। इसका मतलब है कि तू प्रकाश व अन्धकार की परवाह न करते हुए दोनों को एक नजर से देख, अर्थात तू अद्वैतपूर्ण बन जा। बाँध तरकस पीठ पर का मतलब है कि तू कुण्डलिनीयोग साधना में जुट जा। उस साधना से जो चित्र-विचित्र विचार-संकल्प उसके मन में उभरेंगे, वे ही उस साधना रुपी तरकस के विभिन्न तीर होंगे। वह कुण्डलिनी साधना बैठकपूर्ण योग से भी की जा सकती है, और कर्मपूर्ण कर्मयोग से भी। फिर कविता कहती है कि भर तीर में फुंकार। इसका अर्थ है कि एक सबसे मजबूत व गुणसंपन्न मानसिक चित्र को तू कुण्डलिनी बना ले, और नित्य निरंतर उसका ध्यान करने लग जा। उससे वह कुण्डलिनी एक विषबुझे तीर की तरह प्रचंड हो जाएगी। “झुका दे शीश दोनों का” का अर्थ है कि उस प्रचंड कुण्डलिनी के आगे प्रकाश व अन्धकार दोनों निष्प्रभावी होने लग जाएंगे। कुण्डलिनी-जागरण से वे पूरी तरह से निष्प्रभावी हो जाएंगे, क्योंकि उस जागृत कुण्डलिनी में प्रकाश व अन्धकार दोनों के सभी उत्कृष्ट गुण विद्यमान होंगे। ऐसा इसलिए होगा क्योंकि वह परम प्रकाशमान कुण्डलिनी साधक को अपनी आत्मा से अभिन्न प्रतीत होगी। पूर्णतः निष्प्रभावी होने पर वे दोनों कभी वार नहीं कर पाएंगे, क्योंकि फिर उन दोनों के किसी भी रूप में साधक के मन में कभी आसक्ति उत्पन्न नहीं होगी।

Tribute in the memory of Atal ji

Rise up brave, whether it is light or dark grave;

Tie arrow-box on the back, fill up hiss to that pack.

Make bow down heads of both, could never then hit when you be in sloth;

Rise up brave, whether it is light or dark grave. 

This poem seems to be related to Kundalini Yoga itself. This poem says to an spiritually ignorant sleepy man means a  common man, “O brave man, wake up from sleep and rise up!” Do not be afraid, whether there is a bright light environment or a dark darkness. This means that if you do not care light and darkness, watch them both at a glance, that is, you become untainted. On the back, tie up arrow box means that you will get involved in cultivation of Kundalinioga. The painting / different ideas / thoughts that arise in his mind from that sadhana / meditation will be different arrows of that technique. The Kundalini cult can also be done through sitting yoga ie. full yoga, and also through action-yoga / karmayoga. Then the poem says that apply poison to the arrow to make that a hissing serpent. This means that you make a most qualified and beautiful mental picture as your Kundalini, and always start meditating / concentrating on it or visualizing it. From that, the Kundalini will be powerful like a poisoned arrow. “make bow down heads” means that both the light and the dark will appear to be neutral in front of that huge and all light full kundalini. With Kundalini-Jagaran / awakening, they will become completely neutral, because in that awakening of the Kundalini, all the excellent qualities of light and darkness will exist. This will be because that ultimate luminous Kundalini  will appear to be the integral to seeker’s soul. If they both are completely neutral, they will never be able to fight, because then in any form of both of them the attachment will never be generated in the mind of that seeker.