कुण्डलिनी से कौशल विकास एवं रचनात्मकता

आजकल का युग वैज्ञानिक युग है। कौशल व विज्ञान एक दूसरे के प्रमुख सहयोगी हैं। कुशलता के बिना विज्ञान अधूरा है, और विज्ञान के बिना कुशलता अधूरी है। किसी भी काम में वैज्ञानिक तकनीकें भी नाकामयाब या नुकसानदेह/जानलेवा हो जाती हैं, यदि कौशलता का अभाव हो। विज्ञान आज लगभग हर जगह विद्यमान है, परन्तु कुशलता हर जगह विद्यमान नहीं है। अविकसित देशों में अधिकाँश स्थानों पर कुशलता का अभाव होता है। इसी तरह, विकसित देशों के दूर-दराज के व जनजातीय क्षेत्रों में भी कुशलता का भाव होता है। हर रोज जब मैं आसपास नजर दौड़ाता हूँ, तो मुझे कौशल की भारी कमी महसूस होती है। उदाहरण के लिए, मेसनरी वर्क को ही लें। यह मुझे कहीं पर भी गुणवत्तापूर्ण नहीं दिखता। छोटी-२ बातों का ध्यान नहीं रखा जाता, जिससे बड़े-२ नुक्सान हो जाते हैं। अधिकाँश मिस्त्री वैज्ञानिक तथ्यों से परिचित नहीं होते। जो परिचित होते हैं, वे उन्हें व्यावहारिक रूप में लागू करने में आलस करते हैं। कई तो उन्हें लागू करने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाते। कईयों को प्रशिक्षण का अभाव खलता है। कई रूढ़ीवादी सोच के कारण उन्हें जानबूझ कर लागू नहीं करते।

कुण्डलिनी से कौशल विकास कैसे होता है

यह तो सर्वविदित ही है कि अद्वैतभाव के साथ मन में बसी रहने वाली छवि को ही कुण्डलिनी कहते हैं। यह गुरु की, प्रेमी-प्रेमिका की, पुत्र की, माता-पिता की, दादा-दादी की, मित्र की, किसी मनपसंद स्थान या वस्तु आदि किसी की भी हो सकती है।

किसी के मन में कुण्डलिनी के बारम्बार प्रकट होने का सीधा सा अर्थ है कि वह किसी भी चीज की गहराई तक जाता है, और उसे ऊपर-२ से जानकार छोड़ नहीं देता। इससे गहराई तक जाने का उसका स्वभाव स्वयं ही बन जाता है। इस धीर स्वभाव से यह होता है कि जब वह कोई भी काम करता है, तब उसे पूरे विस्तार के साथ सम्पादित करता है। वह उसमें कोई कमी नहीं रहने देना चाहता। वह उस काम से लम्बे समय तक चिपका रहता है। इससे उसे उस काम के बारे में ज्यादा से ज्यादा ज्ञान व अनुभव प्राप्त करने का मौक़ा मिल जाता है। इससे उसकी कुण्डलिनी भी मजबूत होती रहती है, क्योंकि कुण्डलिनी को भी तो चिपकू स्वभाव की ही जरूरत होती है। इससे दोनों सिद्धियाँ एकसाथ प्राप्त हो रही होती हैं। एकतरफ उसे कौशल विकास के साथ भौतिक काम की उच्च गुणवत्ता के रूप में भौतिक सिद्धि प्राप्त हो रही होती है, तो दूसरी तरफ कुण्डलिनी विकास के रूप में आध्यात्मिक सिद्धि भी।

कुण्डलिनी व कौशल विकास के आपसी रिश्ते के बारे में प्रेमयोगी वज्र का अपना अनुभव

जब प्रथम देविरानी के रूप की कुण्डलिनी उसके मन में फुली ब्लोन अप थी, तब वह सभी काम बड़ी बारीकी से करता था। वह अपना अकादैमिक अध्ययन बहुत गहरी व स्पष्टता से करता था। वह हरेक विषय की जड़ तक चला जाता था। उसे औरों के द्वारा ऊपर-२ से किया गया काम पसंद नहीं आता था। वह उसके लिए उन्हें कई बार ताने भी मार देता था, जिससे बहुत से लोग उसे अव्यावहारिक, आलोचक, नकारात्मक, बड़ी-२ बातें बनाने वाला, व घमंडी मानने लग गए थे। परन्तु वह औरों की सहायता के बिना कैसे बदलाव ला सकता था। अकेला चना भांड नहीं फोड़ सकता। अतः उसे अनेकों बार परिस्थिति के साथ समझौता करना पड़ता था।

कालान्तर में जब उसके मन में गुरु के रूप की कुण्डलिनी चमकने लगी, तब वह बहुत ज्यादा व्यावहारिक व स्वावलंबी बन गया। तब उसने जो भी काम किए, वे पूरी गुणवत्ता के साथ किए। वह छोटे-२ सभी काम स्वयं कर लेता था, क्योंकि उसकी बारीक और गहरी नजर को कोई समझ ही नहीं पाता था। जब लोगों ने उसके चमत्कारिक परिणाम देखे, तब लोगों को असलियत का पता चला, और वे उसकी तारीफ करने लगे।

सौहार्दपूर्ण वातावरण में कौशल अधिक विकसित होता है

ऐसे वातावरण में लोग एक-दूसरों को वस्तु-सेवाओं व व्यावहारिक जानकारियों का आदान-प्रदान करते रहते हैं। कुण्डलिनी विकास के लिए भी सौहार्दपूर्ण वातावरण की आवश्यकता होती है। इससे भी यही सिद्ध होता है कि कुण्डलिनी कौशल विकास में मदद करती है।

कुण्डलिनी योग को कौशल विकास के प्रशिक्षण में शामिल किया जाना चाहिए

प्रेमयोगी वज्र को प्राकृतिक रूप से इतना अधिक प्यार मिला कि उसके मन में स्वयं ही कुण्डलिनी विकसित हो गई। उसे योग करने की जरूरत ही नहीं पड़ी। यह अलग बात है कि उसने बाद में दूसरों के लाभ के लिए कुण्डलिनी योग से भी कुण्डलिनी जागरण प्राप्त किया, ताकि सभी लोगों को कुण्डलिनी की उपलब्धि हो सके। सभी लोग उसकी तरह तो खुशकिस्मत नहीं होते।     

सबसे प्रिय वस्तु को ही कुण्डलिनी कहते हैं। जब कौशल प्रशिक्षण कुण्डलिनी के साथ जुड़ जाता है, तब वह भी कुण्डलिनी की तरह ही सर्वाधिक प्रिय बन जाता है। यही कौशल व कुण्डलिनी के आपसी गठजोड़ का मूलभूत सिद्धांत है। इससे कौशल व कुण्डलिनी आजीवन एक-दूसरे को एकसाथ बढ़ाते रहते हैं, और एकसाथ बुलंदियां छूते रहते हैं।    

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कुण्डलिनी के साथ संगीत

संगीत के लाभदायक प्रभाव सभी जानते हैं। भौतिक रूप से तो संगीत लाभदायक है ही, आध्यात्मिक रूप से भी इसका प्रमुख योगदान है। कुण्डलिनी और संगीत का आपस में बहुत गहरा सम्बन्ध है।

संगीत से साक्षीभाव का विकास

संगीत से हमारे मन में चित्र-विचित्र व नए-पुराने विचार चित्रों के रूप में मन में उभरने लगते हैं। इसमें विशेष बात यह है कि उन चित्रों के साथ साक्षीभाव या अनासक्ति का भाव विद्यमान रहता है। वे कुछ-२ स्पष्ट व सुखपूर्ण स्वप्न के चित्रों की तरह प्रतीत होते हैं। इससे मन की निर्मलता में इजाफा होता है, और साथ में आनंद भी प्राप्त होता है। संगीत से आनंद मिलने की मुख्य वजह यही है। वास्तव में, संगीत प्रत्यक्ष रूप से आनंद नहीं देता, अपितु उन चित्रों के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से ही देता है। एक बात और है। जो संगीत हमें अधिक रोचक लगता है, वह हमें अधिक आनंद प्रदान करता है। वास्तव में, वह संगीत अधिक मात्रा में स्पष्ट मानसिक चित्र उत्पन्न करता है, और उनमें अधिक मात्रा में साक्षीभाव भी पैदा करता है। तभी तो किसी एक को उबाऊ लगने वाला संगीत किसी दूसरे को बहुत रोचक लगता है। यदि आनंद संगीत में होता, तब तो कोई भी संगीत हर किसी को रोचक लगा करता। ऐसा भी होता है कि कभी कोई संगीत रोचक लगता है, तो कभी कोई दूसरा। मन की भावावस्था के अनुसार ही संगीत के प्रति पसंद भी बदलती रहती है। इसका यही अर्थ है कि संगीत में अपना आनंद नहीं होता, अपितु यह मन के भावों से ही आनंद उपलब्ध करवाता है। यह सभी को पता है कि अनासक्ति या साक्षीभाव के साथ ही मन के भावों से आनंद पैदा होता है।

संगीत से कुण्डलिनी का विकास

जैसा कि ऊपर बताया गया है कि संगीत से साक्षीभाव पैदा होता है। साक्षीभाव अद्वैत का ही दूसरा नाम है। यह भी अक्सर अनुभव में आता ही रहता है कि अद्वैत व कुण्डलिनी साथ-२ रहने का प्रयास करते हैं। अद्वैतभाव से कुण्डलिनी मानसपटल पर उभर आती है, तथा कुण्डलिनी के विचार से अद्वैत उत्पन्न हो जाता है। इससे स्वयं ही सिद्ध हो जाता है कि संगीत से कुण्डलिनी का विकास होता है। जब संगीत से कुण्डलिनी बारम्बार मानसपटल पर आती रहेगी, तब उससे उसका निरंतर विकास तो होगा ही।

कुण्डलिनी के बारे में प्रेमयोगी वज्र का अपना अनुभव

उसके घर में रेडियो, कैसेट प्लेयर आदि का संगीत अक्सर बजता ही रहता था। आते-जाते, बस के अन्दर भी गाने सुनने को मिलते रहते थे। उन गानों से उसके मन में चमकती हुई स्पष्ट कुण्डलिनी प्रकट हो जाया करती थी। रोमांटिक गानों से उसके मन में तांत्रिक प्रेमिका के रूप की कुण्डलिनी उमड़ा करती थी, जबकि गंभीर व आध्यात्मिक गानों से गुरु के रूप की। ज्यादातर समय प्रेमिका की कुण्डलिनी ही बलवान रहती थी, क्योंकि उसमें यौनाकर्षण विद्यमान होता था, और वह स्वयं भरी जवानी में भी था। इसकी दूसरी वजह यह थी कि उस समय उसके मन में गुरु के रूप की कुण्डलिनी जागृत नहीं हुई थी।

कई वर्षों के बाद, जब उसके मन में गुरु के रूप की कुण्डलिनी जागृत हुई, तब वह ज्यादा प्रभावशाली बनने लगी। फिर उसके सामने प्रेमिका के रूप की कुण्डलिनी गौण पड़ने लगी। उससे हर प्रकार के संगीत के समय उसके मन में गुरु की ही कुण्डलिनी प्रकट होती थी। देवीरानी के रूप की कुण्डलिनी भी कभी-कभार प्रकट हो जाती थी, यद्यपि बहुत हलके रूप में। यह सिलसिला यूं ही चलता रहा, और गुरु के रूप की कुण्डलिनी उत्तरोत्तर बलवान होती गई। इसका कारण यह भी है कि वह प्रतिदिन की सुबह-शाम की एक-२ घंटे की कुण्डलिनीयोग साधना में गुरु के रूप की कुण्डलिनी का ध्यान करता था। इससे उत्साहित होकर वह दिन-रात ब्लूटुथ पोर्टेबल स्पीकर पर इंटरनेट के माध्यम से रंग-बिरंगे गाने सुनता रहता था। इससे उसे और भी बहुत से लाभ मिलते थे। ध्यान रहे कि लगातार लम्बे समय तक ऊंची आवाज में संगीत सुनना कानों के लिए नुकसानदायक है।

संगीत के विभिन्न स्वरों से विभिन्न चक्र जागृत होते हैं

ऐसा योग चर्चा में अक्सर कहा जाता है, और यह स्वाभाविक भी है। प्रत्येक स्वर एक भाव को पैदा करता है। किसी स्वर से उत्पन्न भाव मूलाधार चक्र के भाव से मेल खाते हैं, तो किसी से उत्पन्न भाव स्वाधिष्ठान से या ह्रदय चक्र से आदि। बच्चों के गानों से सबसे अधिक प्रभाव हृदय पर पड़ता है, तो रोमांटिक गानों का सर्वाधिक प्रभाव यौनचक्रों पर पड़ता है। वास्तव में, कुण्डलिनी तो मन में ही बन रही होती है, चाहे कोई भी चक्र क्रियाशील हो रहा हो। इसीलिए तो कहते हैं कि हर प्रकार का संगीत लाभदायक ही होता है। इसी तरह, सृष्टि की प्रत्येक ध्वनी में संगीत है, क्योंकि सभी प्रकार की ध्वनियाँ कुण्डलिनी को उत्तेजित करती हैं।

प्रत्येक संवेदना विचारों के प्रति साक्षीभाव के साथ अपने ऊपर कुंडलिनी को व्यक्त करने में मदद करती है। श्रवण सबसे शुद्ध और शक्तिशाली संवेदनाओं में से एक है।

कुण्डलिनी योग के साथ संगीत सुनना एक अद्भुत अनुभव है। उदाहरण के लिए, ऊपर वाले भाग की अन्य संवेदनाओं के साथ श्रवण की संवेदना भी हृदय चक्र पर केन्द्रित हो जाती है। बंधों के माध्यम से नीचे वाली संवेदनाएं/प्राण भी ऊपर आती हुई, ह्रदय चक्र पर केन्द्रित हो जाती हैं। ऊपर व नीचे वाली संवेदनाएं आपस में टकरा कर सूक्ष्म विस्फोट पैदा करती हैं, जिससे हृदय चक्र पर कुण्डलिनी चमकने-दमकने लगती है, और आनंद पैदा करते हुए बहुत स्पष्ट हो जाती है। इसी तरह, सहस्रार चक्र के लिए, नीचे से ऊपर जाती हुई संवेदनाएं/प्राण श्रवण संवेदना को भी ऊपर ले जाती हैं, तथा सहस्रार पर कुण्डलिनी को चमकाती हैं। इसी तरह अन्य चक्रों के मामले में भी समझना चाहिए।

वास्तव में हमने संगीत को कभी समझा ही नहीं, भंवरे की गुंजन भी एक प्रकार से संगीत ही हैं  जिसे रोज सुना जाये तो आदमी धीरे धीरे विचार शून्य हो जाता हैं ।

संगीत से हो सकता है कुंडलिनी जागरण

जिस प्रकार आतशी कांच द्वारा एक-दो इंच जगह की सूर्य किरणें एकत्र कर देने से अग्नि उत्पन्न हो जाती है, उसी प्रकार आहत नाद पर ध्यान एकाग्र होने से मन की बिखरी शक्तियां एकाग्र होकर साधक को सिद्धावस्था में ले जाती हैं

यौगिक चक्र एवं संगीत- डॉ. मृत्युंजय शर्मा तथा भूपेश ठाकुर

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पहाड़ों में कुण्डलिनी

मित्रो, पहाड़ों का अपना एक अलग ही आकर्षण है। वहां पर मन प्रफुल्लित, साफ, हल्का, शांत व आनंदित हो जाता है। पुराना जीवन रंग-बिरंगे विचारों के रूप में मस्तिष्क में उमड़ने लगता है, जिससे बड़ा ही आनंद महसूस होता है। चिंता, अवसाद व तनाव दूर होने लगते हैं। गत जीवन के मानसिक जख्म भरने लगते हैं। प्रेमयोगी वज्र को भी अपने व्यावसायिक उत्तरदायित्वों के कारण कुछ वर्षों तक ऊंचे पहाड़ों में रहने का मौक़ा मिला था। उसे वहां के लोगों से व प्राकृतिक परिवेश से भरपूर प्यार, सहयोग व सम्मान मिला।

पहाड़ों में अपने आप विपासना साधना होती रहती है

उपरोक्त तथ्यों से जाहिर है कि पहाड़ों में विपासना के लिए सर्वाधिक अनुकूल परिस्थितियाँ मौजूद होती हैं। यदि आदमी योग आदि के माध्यम से अपना बल भी लगाए, तब तो शीघ्र ही आध्यात्मिक सफलता मिलती है। प्रेमयोगी वज्र को भी उपरोक्त मानसिक सद्प्रभावों का अनुभव पहाड़ों के इसी गुण के कारण हुआ।

कुण्डलिनी ही पहाड़ों में स्वयम्भूत विपासना को पैदा करती है

आश्चर्य की बात है कि प्रेमयोगी वज्र की मानसिक कुण्डलिनी, जो पहले दब जैसी गई थी, वह पहाड़ों में बहुत मजबूत हो गई थी। वह तांत्रिक कुण्डलिनी थी, और उसकी मानसिक प्रेमिका के रूप में थी। उसके साथ ही उसकी मानसिक गुरु के रूप वाली कुण्डलिनी भी वहां पर ज्यादा चमकदार बन गई थी। पर उसने देखा कि पहाड़ों के लोग प्रेमिका के रूप वाली कुण्डलिनी को बहुत ज्यादा महत्त्व दे रहे थे, गुरु के रूप वाली कुण्डलिनी की अपेक्षा। गुरु के रूप वाली कुण्डलिनी को वहां के पंडित वर्ग के आध्यात्मिक लोग ज्यादा महत्त्व दे रहे थे, यद्यपि प्रेमिका की कुण्डलिनी के साथ ही, अकेली गुरु के रूप वाली कुण्डलिनी को नहीं। इसका कारण यह है कि पहाड़ मन के काम-रस या श्रृंगार-रस को उत्तेजित करते हैं। इसी वजह से तो काम शास्त्रों में ऊंचे पहाड़ों का सुन्दर वर्णन बहुतायत में पाया जाता है। उदाहरण के लिए विश्वप्रसिद्ध साहित्यिक रचना “मेघदूत”।

दूसरा प्रमाण यह है कि मैदानी भागों में कुण्डलिनी योग साधना के बाद जब प्रेमयोगी वज्र पर्वत-भ्रमण पर गया, तब पहाड़ों में उसकी कुण्डलिनी प्रचंड होकर जागृत हो गई, जैसा कि इस वैबसाईट के “गृह-2” वैबपेज पर वर्णित किया गया है। इसके अतिरिक्त, प्रेमयोगी वज्र को क्षणिक आत्मज्ञान का अनुभव भी पहाड़ों में ही हुआ था, जो उसने इस वैबसाईट के “गृह-2” वेबपेज पर वर्णित किया है । इसी वजह से तो अनादिकाल से लेकर योग साधक शीघ्र सिद्धि के लिए मैदानों से पहाड़ों की तरफ पलायन करते आए हैं।

पहाड़ों में कुण्डलिनी क्यों चमकने लगती है?

वास्तव में, पहाड़ देवता की मूर्ति की तरह काम करते हैं। तभी तो कई धर्मों में पहाड़ को देवता माना गया है। एक प्रकार से देवता की मूर्ति पहाड़ के रूप में प्रतिक्षण आँखों के सामने विद्यमान रहती है। पहाड़ मैं विद्यमान अद्वैत तत्त्व आदमी के मन में भी अद्वैतभाव पैदा कर देता है। उस अद्वैत के प्रभाव से कुण्डलिनी मन-मंदिर में छा जाती है।

यदि किसी के मन में कुण्डलिनी न भी हो, तो भी अद्वैतभाव से बहुत से आध्यात्मिक लाभ मिलते हैं। साथ में, उससे धीरे-२ कुण्डलिनी भी बनना शुरू हो जाती है।

यह बात इस वैबसाईट में पहले भी सिद्ध की जा चुकी है कि सृष्टि के कण-कण में अद्वैत तत्त्व विद्यमान है। वास्तव में, वही भगवान् है। इसे समझने के लिए सबसे बढ़िया पुस्तक “शरीरविज्ञान दर्शन” है।

मौन, ध्यान एवं जप आदि कार्यों के लिए एकांत की जरूरत होती है और इसके लिए पहाड़ों से अच्छा कोई स्थान नहीं हो सकता।

क्यों बनाए गए हैं ऊंचे पहाड़ों पर देवी नंदिर, आखिर क्या है इसका रहस्य?

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कुण्डलिनी से विपासना या विपश्यना

विपश्यना क्या है

क्वोरा पर बहुत से लोग विपासना के बारे में प्रश्न पूछते रहते हैं। इसलिए सोचा कि क्यों न इस बार विपासना पर ही एक एक सुन्दर ब्लॉग-पोस्ट लिख लूं।

विपश्यना का अर्थ है विशेष पश्यना अर्थात एक विशेष प्रकार की नजर। सामान्य नजर तो वही बहिर्मुखी नजर है, जिससे हम-आप सभी लोग देखते हैं। विशेष नजर अंतर्मुखी नजर है, जिससे अपने अन्दर मौजूद विचारों-भावों को देखा जाता है। सामान्य नजर में द्रष्टा का साक्षी भाव नहीं होता, परन्तु विपश्यना में द्रष्टा का साक्षीभाव होता है। सामान्य नजर से बंधन होता है, जबकि विपश्यना से मुक्ति प्राप्त होती है। सामान्य नजर से असली सुख नहीं मिलता, जबकि विपश्यना से असली सुख मिलता है। सामान्य नजर से असली शान्ति नहीं मिलती, जबकि विपश्यना से असली शान्ति मिलती है। यद्यपि यह बात ध्यान रखने योग्य है की विपश्यना का आधार सामान्य नजर ही है, क्योंकि सामान्य नजर से ही मन में वह ढेर सारी सूक्ष्म सामग्री इकट्ठी हो पाती है, जिसके प्रति हम विपश्यना की विशेष नजर को केन्द्रित कर पाते हैं। इसलिए सामान्य नजर का भी अपना अलग महत्त्व है। तभी तो कहा जाता है कि विज्ञान के बिना अध्यात्म लंगड़ा है, तथा अध्यात्म के बिना विज्ञान अंधा है। इसलिए जीवन में विज्ञान व अध्यात्म, दोनों का समुचित मिश्रण होना चाहिए।

विपश्यना से साधना-लाभ कैसे मिलता है

जब हम मन के विचारों-भावों के प्रति अनासक्त हो जाते हैं, तब उससे यह अर्थ निकलता है कि जो कुछ विचारों-भावों से हासिल होता है, वह हमारे अपने पास पहले से ही तो है। अपने विचारों-भावों के इलावा हमारे पास अपना स्वयं का निरपेक्ष रूप/आत्मा ही तो है। अतः विचारों-भावों के सभी गुण आत्मा में उजागर होने लगते हैं, जैसे कि प्रकाश, आनंद, शान्ति आदि। वास्तव में, वे गुण आत्मा में पहले से ही विद्यमान होते हैं, परन्तु भौतिक व मानसिक दुनिया के प्रति आसक्ति के कारण दबे होते हैं। आत्मा के इसी शुद्धीकरण को “भ्रम के काले बादलों का छंटना” या “अज्ञान के काले परदे का हटना” आदि नामों से भी जाना जाता है।

आत्मा के ऊपर से अज्ञान के काले बादल का हटना

हालांकि ऐसा प्रतीत नहीं होता कि आत्मा धीरे-२ साफ हो रही है, जैसे कि रात का अँधेरा सुबह के साथ-२ धीरे-२ साफ होता है। नगण्य मात्रा में आत्मा की सफाई हो भी सकती है (जो प्रत्यक्ष तौर पर नजर नहीं आती), जिससे अद्वैत व शान्ति का अनुभव होता है, पर यह क्षणिक/अस्थायी होती है। सच्चाई यह है कि अचानक ही घुप अन्धकार से भरी आत्मा में प्रकाश छा जाता है, जैसे कि अँधेरे कमरे में प्रकाश बल्ब का स्विच ऑन करने से छा जाता है। वास्तव में सफाई तो मन की होती है, आत्मा की नहीं। आत्मा तो हमेशा साफ है। जब मन पूरी तरह से साफ हो जाता है, या यूं कहो कि मन विचारों के कचरे से रहित हो जाता है, तभी आत्मा के ऊपर पड़ा हुआ काला पर्दा अचानक से हट जाता है। आम आदमी यह देखकर हतोत्साहित हो जाता है कि उसकी आत्मा तो साफ ही नहीं हो रही है। इससे वह साधना के प्रयास को छोड़ देता है।

आम इंसान को एक अन्य गलतफहमी यह होती है कि व्यक्त रूप में ही मन के विचार आत्मा पर पर्दा डालते हैं, अव्यक्त या संस्कार रूप में नहीं। तभी तो अधिकाँश लोग अपने विचारों को बलपूर्वक दबाकर इस भ्रम में रहते हैं कि वे योगी हैं। वास्तव में मन के विचार (आसक्ति के साथ) बड़े दुष्ट होते हैं। ये अपनी सुप्त अवस्था में भी आत्मा को अँधेरे से ढक कर रखते हैं। तभी तो विभिन्न साधनाओं से इन दबे हुए विचारों को उघाड़ कर नष्ट करना पड़ता है। विपासना से यह काम सबसे आसानी से होता है। तभी तो सरल विपासना से सीधे ही, बिना किसी अन्य साधना के आत्मज्ञान हो सकता है, जैसे बुद्ध को हुआ। यह अलग आत है कि आम सांसारिक जीवन में कुण्डलिनी के बिना ऐसा होना संभव प्रतीत नहीं होता।

विपश्यना के प्रकार व उसके लिए सहयोगी कारक

विपश्यना दो प्रकार की है, ऐक्टिव (सक्रिय) और पैसिव (निष्क्रिय)। ऐक्टिव विपश्यना में मन को जिस मानसिक खूंटे (ऐंकर) से बांधा जाता है, वह बलपूर्वक निर्मित किया जाता है। उससे मन हर समय उस खूंटे से चिपका रहता है। उससे मन अपने अन्दर उमड़ने वाले विचारों-भावों की तरफ गहराई से ध्यान नहीं दे पाता, जिससे उसका उनके प्रति अनासक्ति के साथ साक्षीभाव बना रहता है। मन्त्र-जाप, माला-जाप, साँसें, कुण्डलिनी, जप-तप, उपवास, तथा अन्य सभी आध्यात्मिक गतिविधियाँ इसी खूंटे का काम करती हैं।

पैसिव विपश्यना में रोजमर्रा के क्रियाकलापों के दौरान स्वयं ही मन के लिए खूंटा निर्मित होता रहता है। उदाहरण के लिए, ड्राईविंग के दौरान मन सड़क पर लगा होता है, इसलिए उस दौरान उमड़ रहे विचारों-भावों के प्रति स्वयं ही विपश्यना होती रहती है। इसी तरह, अन्य साहसिक गतिविधियों, खेलों, स्पर्धाओं, कलाओं, विद्याओं आदि के दौरान भी होता है। इन गतिविधियों के साथ जितनी अधिक विपश्यना होती है, उतनी ही अधिक उनकी गुणवत्ता मानी जाती है। इनके साथ विपश्यना की मात्रा ही इनकी गुणवत्ता की मात्रा की सूचक हैं। प्रतिभागी की यह विपश्यना साथ रहने वाले लोगों, दर्शकों में भी इंडयूस होती रहती है।

कुण्डलिनी से विपश्यना

कुण्डलिनी (मन में स्थायी रूप से बसने वाली एकाकी छवि) विपश्यना के लिए सर्वोत्तम खूंटा है। यह मानसिक खूंटा ढीला होता रहता है, अतः प्रतिदिन के कुण्डलिनी-योग से इसे मजबूती देते रहना चाहिए।

कुण्डलिनी की सहायता से निष्क्रिय विपश्यना सर्वाधिक प्रभावशाली

प्रेमयोगी वज्र के अन्दर स्वयं ही तांत्रिक कुण्डलिनी चिपक गई थी। वह बहुत मजबूत व स्पष्ट थी। वह लगातार बनी रहती थी। वह एक आकर्षक मानसिक प्रेमिका (तांत्रिक गुरु की संगति में) के रूप में थी। वह मन के लिए एक सर्वाधिक शक्तिशाली खूंटा बनी। अपनी आकर्षकता के कारण, वह मानसिक खूंटे के साथ मानसिक वीडियो प्लेयर का काम भी कर रही थी। उससे प्रेमयोगी वज्र के मन में अपने पिछले जीवन की घटनाएं रंग-बिरंगे चित्रों के रूप में उमड़ रही थीं। सभी चित्र उस आकर्षक खूंटे के सामने फीके पड़ गए थे। सभी के प्रति स्वयं ही विपश्यना हो रही थी, जिससे वे तेजी से आत्मा में विलीन हो रहे थे। उससे उसका आत्मा बहुत तेजी से शुद्ध हो रहा था। अंततः दो साल के भीतर ही वह शून्य जैसा हो गया। अंत में, दिव्य परिस्थितियों के कारण उसका वह अंतिम विचार-रूपी मानसिक खूंटा भी उखड़ गया, जिससे उसे क्षणिक आत्मज्ञान की झलक मिली। इस घटना का विस्तृत वर्णन उसकी हिंदी में पुस्तक “शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)” व अंग्रेजी में पुस्तक “Love story of a Yogi- what Patanjali says” में किया गया है।

इससे सिद्ध होता है कि मानसिक खूंटे का आकर्षक होना भी आवश्यक है, ताकि वह मन की गहराइयों में दबे पड़े विचारों-भावों के स्पष्ट चित्रों को उघाड़ता रहे, और वे सभी उसके आगे फीके पड़ने लगे। कुण्डलिनी (विशेषतः तांत्रिक कुण्डलिनी) सबसे अधिक आकर्षक होती है, इसलिए विपश्यना के लिए कुण्डलिनी एक सर्वोत्तम मानसिक खूंटा है। निरंतर ध्यान के साथ इसका आकर्षण बढ़ता ही जाता है। जब सभी कुछ शून्यप्राय हो जाता है, तब आत्मज्ञान के लिए अंतिम छलांग के रूप में उस अंतिम मानसिक खूंटे को भी त्यागना पड़ता है। इसी मूलभूत मनोवैज्ञानिक सिद्धांत के आधार पर ही लाखों पुस्तकें व साधनाएं बनी हैं।

विपस्‍सना का अर्थ है: अपनी श्‍वास का निरीक्षण करना, श्‍वास को देखना।      

 
विपस्‍सना ध्‍यान की तीन विधियां: ओशो

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कुण्डलिनी के प्रति समर्पण ही असली समर्पण है

सभी धर्मों में ईश्वर के प्रति समर्पण/सरेंडर पर बहुत जोर दिया गया है। वास्तव में कुण्डलिनी के प्रति समर्पण ही ईश्वर के प्रति समर्पण है। ईश्वर निराकार है। उसे कोई देख नहीं सकता, जान नहीं सकता, और न ही उसे कोई अनुभव कर सकता है। जिसका कोई अता-पता ही नहीं है, उसके प्रति कोई कैसे समर्पित हो सकता है? वास्तव में कुण्डलिनी ही ईश्वर का छोटा रूप है, जो जानने में आ सकता है। यह कुण्डलिनी क्राइस्ट के मानसिक चित्र के रूप में हो सकती है, भगवान् राम के मानसिक चित्र के रूप में हो सकती है, किसी के मन में उसके अपने गुरु/मित्र/प्रेमी के चित्र के रूप में हो सकती है आदि-2।

अद्वैत के प्रति समर्पित होने का अर्थ भी कुण्डलिनी के प्रति समर्पित होना ही है

जैसा कि हमने पहले भी बताया है की अद्वैत और कुण्डलिनी साथ-2 रहते हैं । एक के बढ़ने से दूसरा स्वयं ही बढ़ जाता है। अनासक्ति भी अद्वैत का ही रूप है। इसका सीधा सा अर्थ है की ईश्वर सीधे नहीं, अपितु अद्वैत/अनासक्ति/साक्षीभाव {साक्षी भाव से अद्वैत व अनासक्ति बढ़ते हैं}/कुण्डलिनी के रूप में रहता है। ये चारों भाव एकसमान ही हैं, क्योंकि एक के भी बढ़ने से अन्य भाव स्वयं बढ़ने लगते हैं। यदि सभी भाव एकसाथ बढ़ाए जाएं, तब तो और भी अच्छा, क्योंकि तब बहुत तेज आध्यात्मिक प्रगति होती है।

प्रेमयोगी वज्र ने जब शरीरविज्ञान दर्शन के माध्यम से अद्वैत को लम्बे समय तक अपनाया, तब उसमें बहुत से आध्यात्मिक गुण बढ़ोत्तरी को प्राप्त हुए, और कुण्डलिनी भी परिवृद्ध हुई, जो अंततः जागृत हो गई।

ईश्वर के प्रति समर्पण से कुण्डलिनी के प्रति समर्पण स्वयं ही हो जाता है

वास्तव में भगवान् के ध्यान से भी कुण्डलिनी का ही ध्यान होता है। निराकार भगवान् के ध्यान से अद्वैत का ध्यान स्वयं ही हो जाता है, क्योंकि भगवान् सभी स्थितियों में एकसमान हैं। और यह निर्विवाद सत्य है कि अद्वैत के ध्यान से कुण्डलिनी का ध्यान स्वयं ही होने लगता है। इससे भी सिद्ध हो जाता है कि ईश्वर के प्रति समर्पण स्वयं ही अप्रत्यक्ष रूप में कुण्डलिनी के प्रति समर्पण बन जाता है। फिर क्यों न सीधे ही कुण्डलिनी-साधना की जाए।

इसीलिए कहा जाता है कि गुरु भगवान् से बढ़कर हैं

गुरु गोबिंद दोनों मिले, काके परूं पाए।
बलिहारी गुरु आपकी, गोबिंद दियो मिलाए।।

तुलनात्मक रूप से गुरु को भगवान् से बढ़कर बताया गया है, क्योंकि भगवान की प्राप्ति गुरु से ही तो होती है। कुण्डलिनी वास्तव में गुरु/प्रेमी की मन में बसी हुई छवि/कुण्डलिनी ही तो है। इससे भी सिद्ध होता है कि कुण्डलिनी के प्रति समर्पण अधिक आसान, मानवीय, व्यावहारिक व कारगर होता है।  

हिंदु धर्म और इस्लाम एक ही बात बोलते हैं

इस्लाम धर्म में अल्लाह/निराकार ईश्वर के प्रति समर्पण पर जोर दिया गया है। इसके विपरीत, हिन्दू धर्म में मुख्यतः साकार ईश्वर/मूर्ति/कुण्डलिनी के प्रति समर्पण पर अधिक जोर दिया गया है। ऊपर हमने यह भी सिद्ध कर दिया है कि निराकार ईश्वर के ध्यान से कुण्डलिनी का ध्यान स्वयं होने लगता है। इसी तरह, कुण्डलिनी/मूर्ति का ध्यान करने से निराकार ईश्वर/अल्लाह का ध्यान स्वयं ही हो जाता है। साथ में, इससे यह भी स्वयं सिद्ध हो जाता है कि इस्लाम में मूर्ति/कुण्डलिनी-पूजा का विरोध वास्तविक नहीं, अपितु काल्पनिक है, जो किसी गलतफहमी के कारण पैदा हुआ है।  

इसीलिए आजकल के बौद्धिक युग में हर जगह कुण्डलिनी योग का बोलबाला है।

और अज्ञानी गुरु भी कभी काम आ सकता है, अगर आप समर्पण कर दें। क्योंकि समर्पण करना ही घटना है, गुरु तो सिर्फ बहाना है।

ओशो प्रवचन- समर्पण की छलांग

मां कुंडलिनी के सम्मुख पूर्ण समर्पण की भावना भी रखनी चाहिए ।

आंतरिक शक्ति को जगाएं- speakingtree.in

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सौंदर्य के आधार के रूप में कुंडलिनी

सुन्दरता क्या है

यह अक्सर कहा जाता है कि सुन्दरता किसी दूसरे में नहीं, अपितु अपने अन्दर होती है। ध्यान योग से यह बात बखूबी सिद्ध हो जाती है। सुन्दर वस्तु को इसलिए सुन्दर कहा जाता है क्योंकि वह हमारे मन में आनंद के साथ लम्बे समय तक दृढ़तापूर्वक बसने की सामर्थ्य रखती है। मन में वैसी आकर्षक व स्थायी छवि को ही कुण्डलिनी भी कहते हैं।

सुन्दर वस्तु के प्रति अनायास ध्यान

लम्बे समय तक मन में बैठी हुई वस्तु की तरफ ध्यान स्वयं ही लगा रहता है। इससे अनादिकाल से लेकर मन में दबे पड़े चित्र-विचित्र विचार व रंग-बिरंगी भावनाएं उमड़ती रहती हैं। उनके प्रति साक्षीभाव व अनासक्ति-भाव स्वयं ही विद्यमान रहता है, क्योंकि मन में बैठी हुई उपरोक्त वस्तु निरंतर अपनी ओर व्यक्ति का ध्यान खींचती रहती है। इससे वे भावनामय विचार क्षीण होते रहते हैं, जिसके फलस्वरूप व्यक्ति उत्तरोत्तर शून्यता की ओर बढ़ता जाता है। अंततः व्यक्ति पूर्ण शून्यता या आत्मज्ञान को प्राप्त कर लेता है।

सबसे अधिक सुन्दर वस्तु

लौकिक परिपेक्ष्य में एक सर्वगुणसंपन्न स्त्री को एक उसके योग्य व उसके रुचिकर पुरुष के लिए सर्वाधिक सुन्दर माना जाता है। ऐसा इसीलिए है क्योंकि वैसी स्त्री का चित्र वैसे पुरुष के मन में सर्वाधिक मजबूती से बस जाता है। दोनों के बीच में प्रतिदिन के संपर्क से वह चित्र मजबूती प्राप्त करता रहता है। अंततः वह इतना अधिक माजबूत व स्थायी बन जाता है कि वह एक योग-समाधि का रूप ले लेता है। यदि बीच में स्वस्थ आकर्षण में (सच्चे प्यार में) खलल पड़े, तो मानसिक चित्र कमजोर भी पड़ सकता है। ऐसा जरूरत से ज्यादा इंटरेक्शन, शारीरिक सम्बन्ध आदि से हो सकता है। लौकिक व्यवहार में यह नजर भी आता है कि विवाह के बाद परस्पर आकर्षण कम हो जाता है। यदि अनुकूल परिस्थितियाँ मिलती रहें, तो ऐसे यिन-यांग आकर्षण को समाधि व आत्मज्ञान के स्तर तक पहुँचाने के लिए २ साल काफी हैं। ऐसे ही बहुत सारे मामलों में हैरान कर देने वाली अनुकूल परिस्थितियों को देखकर ईश्वर पर व अच्छे कर्मों पर बरबस ही विश्वास हो जाता है।

सुन्दरता की प्राप्ति सांसारिक वस्तुओं पर नहीं, अपितु अच्छे कर्मों व ईश्वर-कृपा पर निर्भर

कई लोगों के पिछले कर्म अच्छे नहीं होते, और उन पर  ईश्वर की कृपा भी नहीं होती। ऐसे लोगों को ऐसा मजबूत यिन-यांग आकर्षण उपलब्ध ही नहीं होता। कई लोगों को यदि उपलब्ध हो भी जाता है, तो भी अनुकूल परिस्थितियाँ न मिलने के कारण वह लम्बे समय तक स्थिर नहीं रह पाता। ऐसे में समाधि नहीं लग पाती। बहुत से लोग वर्तमान में बहुत अच्छे कर्म कर रहे होते हैं। वे सदाचारी होते हैं। वे बड़ों-बूढ़ों को व गुरुओं को प्रसन्न रखते हैं, एवं उनकी आज्ञा का पालन करते हैं। वे उनके सामने नतमस्तक बने रहते हैं। वे सभी कठिनाईयों व दुर्व्यवहारों को प्रसन्नता के साथ सहते हैं। इससे उनके मन में अपने गुरुओं, वृद्धों व परिवारजनों की छवियाँ बस जाती हैं। उनमें से कोई अनुकूल छवि उनकी कुण्डलिनी बन जाती है। कई बार अप्रत्यक्ष रूप से कुण्डलिनी को पुष्ट करने वाला यिन-यांग आकर्षण भी कई किस्मत वालों को प्राप्त हो जाता है।

अवसरों से रहित लोगों के लिए कुण्डलिनी-योग एक बहुत बड़ी राहत

जिन अधिकाँश व बदकिस्मत लोगों को प्राकृतिक रूप से भरपूर ध्यान का अवसर नहीं मिलता, उन्हीं के लिए कुण्डलिनी योग बनाया गया है, मुख्य रूप से। कई हतोत्साहित व निराशावादी लोग इसे “रेत में से तेल निकालने” की संज्ञा भी देते हैं। यद्यपि यह अब सच्चाई है कि रेत में भी तेल (पैट्रोल) होता है। इसमें उपयुक्त समय पर तंत्र के प्रणय-योग के सम्मिलन से यह बहुत आसान, व्यावहारिक व कारगर बन जाता है।

बनावटी प्यार

किसी विशेष वस्तु से प्रतिदिन  के लौकिक प्यार की कमी को मेडीटेशन से पूरा करना भी एक जादुई कारीगरी ही है। इसे हम “प्रेम का कृत्रिम निर्माण (synthesis of love)” भी कह सकते हैं। योग एक ऐसी फैक्टरी है, जो प्रेम का कृत्रिम उत्पादन करती है। यह कारीगरी मुझे बचपन से लेकर प्रभावित करती आई है। इससे लौकिक प्यार की तरह पतन की भी सम्भावना नहीं होती, क्योंकि वस्तु से सारा इंटरेक्शन मन में ही तो होता है। अति तो इन्द्रियों से ही होती है हमेशा।

सुन्दरता सापेक्ष व आभासिक होती है

यदि सुन्दरता निरपेक्ष होती, तो एक सुन्दर स्त्री सभी प्रकार के लोगों को एकसमान सुन्दर लगा करती, और हिंसक जानवर भी उसके पीछे लट्टू हो जाया करते। इसी तरह, यदि सुन्दरता भौतिक रूप-आकार पर निर्भर होती, तब योग से प्रवृद्ध की गई वृद्ध गुरु व काली माता (बाहरी तौर पर कुरूप व डरावनी) के रूप की कुण्डलिनी सबसे अधिक सुन्दर न लगा करती, और वह योगी के मन में सबसे ज्यादा मजबूती से न बस जाया करती।

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द्वैत और अद्वैत दोनों एक-दूसरे के पूरक के रूप में

द्वैत क्या है?

दुनिया की विविधताओं को सत्य समझ लेना ही द्वैत है। दुनिया में विविधताएं तो हमेशा से हैं, और सदैव रहेंगी भी, परन्तु वे सत्य नहीं हैं। दुनिया में जीने के लिए विविधताओं का सहारा तो लेना ही पड़ता है। फिर भी उनके प्रति आसक्ति नहीं होनी चाहिए।

अद्वैत क्या है?

उपरोक्तानुसार, दुनिया की विविधताओं के प्रति असत्य बुद्धि या अनासक्ति को ही अद्वैत कहते हैं। वास्तव में द्वैताद्वैत को ही संक्षिप्त रूप में द्वैत कहते हैं। अद्वैत अकेला नहीं रह सकता। यह एक खंडन-भाव है। अर्थात यह द्वैत का खंडन करता है। यह खंडन “द्वैत” से पहले लगने वाले “अ” अक्षर से होता है। जब द्वैत ही नहीं रहेगा, तब उसका खंडन कैसे किया जा सकता है? इसलिए जाहिर है कि द्वैत व अद्वैत दोनों साथ-२ रहते हैं। इसीलिए अद्वैत का असली नाम द्वैताद्वैत है।

एक ही व्यक्ति के द्वारा द्वैत व अद्वैत का एकसाथ पालन

ऐसा किया जा सकता है। यद्यपि ऐसा जीवनयापन विरले लोग ही ढंग से कर पाते हैं, क्योंकि इसके लिए बहुत अधिक शारीरिक व मानसिक बल की आवश्यकता पड़ती है। इससे लौकिक कार्यों की गुणवत्ता भी दुष्प्रभावित हो सकती है, यदि सतर्कता के साथ उचित ध्यान न दिया जाए।

द्वैताद्वैत को बनाए रखने के लिए श्रमविभाजन

ऐसा विकसित सभ्यताओं में होता है, व बुद्धिमान लोगों के द्वारा किया जाता हहै। वैदिक सभ्यता भी इसका एक अच्छा उदाहरण है। इसमें द्वैतमयी लौकिक कर्मों का  उत्तरदायित्व एक भिन्न श्रेणी के लोगों पर होता है, और अद्वैतमयी धार्मिक क्रियाकलापों  का उत्तरदायित्व एक भिन्न श्रेणी के लोगों पर। वैदिक संस्कृति की जाति-परम्परा  इसका एक अच्छा उदाहरण है। इसमें ब्राम्हण श्रेणी के लोग पौरोहित्य (धार्मिक कार्य) का कार्य करते हैं, और अन्य शेष तीन श्रेणियां विभिन्न लौकिक कार्य करती हैं।

द्वैताद्वैत में श्रम-विभाजन के लाभ

इससे व्यक्ति पर कम बोझ पड़ता है। उसे केवल एक ही प्रकार का भाव बना कर रखना पड़ता है। इससे परस्पर विरोधी भावों के बीच में टकराव पैदा नहीं होता। इसलिए कार्य की गुणवत्ता भी बढ़ जाती है। वैसे भी दुनिया में देखने में आता है कि जितना अधिक द्वैत होता है, कार्य उतना ही अच्छा होता है। अद्वैतवादी के अद्वैतभाव का लाभ द्वैतवादी को मिलता रहता है, और द्वैतवादी के द्वैतभाव का लाभ अद्वैतवादी को मिलता रहता है।  यह ऐसे ही होता है, जैसे एक लंगड़ा और एक अंधा एक-दूसरे की सहायता करते हैं। यद्यपि इसमें पूरी सफलता के लिए दोनों प्रकार के वर्गों के बीच में घनिष्ठ व प्रेमपूर्ण सम्बन्ध बने रहने चाहिए।

गुरु-शिष्य का परस्पर सम्ब्बंध भी ऐसा ही द्वैताद्वैत-सम्बन्ध है

प्रेमयोगी वज्र को भी इसी श्रमविभाजन का लाभ मिला था। उसके गुरू (वही वृद्धाध्यात्मिक पुरुष) एक सच्चे ब्राम्हण-पुरोहित थे। प्रेमयोगी वज्र स्वयं  एक अति  भौतिकवादी व्यक्ति तथा। दोनों के बीच में लम्बे समय तक नजदीकी व प्रेमपूर्ण  सम्बन्ध बने रहे। इससे प्रेमयोगी वज्र का द्वैत उसके गुरु को प्राप्त हो गया, और गुरु  का अद्वैत उसको प्राप्त हो गया। इससे दोनों का द्वैताद्वैत अनायास ही  सिद्ध हो गया, और दोनों मुक्त हो गए। इसके फलस्वरूप प्रेमयोगी वज्र को क्षणिक आत्मज्ञान के साथ क्षणिक कुण्डलिनीजागरण की उपलब्धि भी अनायास ही हो गई। साथ में, उसकी कुण्डलिनी तो उसके पूरे जीवन भर क्रियाशील बनी रही।

यही द्वैताद्वैत समभाव ही सर्वधर्म समभाव है

कोई धर्म द्वैतप्रधान होता है, तो कोई धर्म अद्वैतप्रधान होता है। इसीलिए दोनों प्रकार के धर्मों के बीच में मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बने रहने चाहिए। इससे दोनों एक-दूसरे को शक्ति प्रदान करते रहते हैं। इससे वास्तविक द्वैताद्वैत भाव पुष्ट होता है। विरोधी भावों के बीच में परस्पर समन्वय ही वैदिक संस्कृति की सफलता के पीछे एक प्रमुख कारण था। शरीरविज्ञान दर्शन में इसका विस्तार के साथ वर्णन है।

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