काफी दिनों से मौन था कविता-मन, आज फिर मन बोला — और कविता बन गई।
परमात्मा तो पता नहीं पर,
कण-कण रहता तू है जरूर।
मूलकणों ने सबकुछ देखा जो,
कुछ देख रहा है तू।
काम भी सारे करते हैं वो,
जो कुछ भी करता है तू।।
काम, क्रोध और लोभ, मोह,
मत्सर के जैसे सारे भाव।
सारे मूल कणों में रहते,
जैसे दिखलाता है तू।।
वो तो भवबंधन से दूर,
तुझको इसका क्यों सरूर।
परमात्मा तो पता नहीं पर,
कण-कण रहता तू है जरूर।।
मूल कणों का वंशज है तू,
वे ही ब्रह्मा-प्रजापति।
उनके बिना न जन्म हो तेरा,
न ही कोई कर्म-गति।।
वे ही तेरे कर्ता-धर्ता,
वे ही हैं पालनहारी।
वे ही हैं शरणागत-वत्सल,
रक्षक, स्वामी, और पति।।
अहंकार बिल्कुल न उनमें,
पर तुझको किसका गरूर।
परमात्मा तो पता नहीं पर,
कण-कण रहता तू है जरूर।।
सृष्टि के आदि में बनते,
परम पिता परमात्मा से।
परमात्मा तो दिख नहीं सकते।
वे ही निकटतम आत्मा से।।
बना के मूर्ति पूजो या फिर,
ऐसे ही चिंतन करो।
सबकुछ कर भी अछूते रहते,
तुम भी ऐसा जतन करो।।
झांका करो उन्हें भी नित पल,
रहो न दुनिया में मगरूर।।
परमात्मा तो पता नहीं पर,
कण-कण रहता तू है जरूर।।
योग से ऐसा चिंतन होता,
सुलभ किसी से छिपा नहीं।
कर्म ही है आधार योग का,
वाक्य कहां ये लिपा नहीं।।
क्वांटम दर्शन निर्मित कर लो,
अपने या जग हित खातिर।
चमत्कार देखो फिर कैसे,
हार के मन झुकता शातिर।।
मेरा दर्शन न सही पर,
अपना तो गढ़ लो हजूर।
परमात्मा तो पता नहीं पर,
कण-कण रहता तू है जरूर।।
डाक्टर हो या हो इंजिनीयर,
नियम समान ही रहते हैं।
अच्छे चिंतन बिना अधूरे,
काम हमेशा रहते हैं।।
कर्म से स्वर्ग तो मिल सकता है,
मुक्ति बिना न चिंतन के।।
यूनिवर्सटी शिक्षा दे सकती।
ज्ञान बिना न संतन के।।
उसके आगे सब समान हैं,
गडकरी हो या हो थरूर।
परमात्मा तो पता नहीं पर,
कण-कण रहता तू है जरूर।
🌸 मेरी नई कविता प्रकाशित 🌸
मुझे खुशी है कि मेरी कविता
“परमात्मा तो पता नहीं, पर कण-कण रहता तू है जरूर”
एक अंतर्राष्ट्रीय हिंदी साहित्यिक पत्रिका साहित्य कुञ्ज में प्रकाशित हुई है, जो मूलतः कनाडा से प्रकाशित होती है।
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