The non dual, tantric, Kundalini yoga technique (the real meditation) including Patanjali Yogsutras, Kundalini awakening, spiritual Enlightenment (self-realization), and spiritual liberation explained, verified, clarified, simplified, justified, taught, guided, defined, displayed, summarized, and proved in experiential, exhilarating, story like, biography like, philosophical, practical, humanely, scientific, and logical ways altogether best over- अद्वैतपूर्ण, तांत्रिक, कुंडलिनी योग तकनीक (असली ध्यान) सहित पतंजलि योगसूत्र, कुण्डलिनीजागरण, आत्मज्ञान और अध्यात्मिक मोक्ष को एक अनुभवपूर्ण, रोमांचक, कथामय, जीवनचरित्रमय, दार्शनिक, व्यावहारिक, मानवीय, वैज्ञानिक और तार्किक तरीके से; सबसे अच्छे रूप में समझने योग्य, सत्यापित, स्पष्टीकृत, सरलीकृत, औचित्यीकृत, सीखने योग्य, निर्देशित, परिभाषित, प्रदर्शित, संक्षिप्त, और प्रमाणित किया गया है
सीता कुंडलिनी ही है जो बाहर से आंखों की रौशनी के माध्यम से वस्तु के चित्र के रूप में प्रविष्ट होती है। वास्तव में शरीर की कुंडलिनी शक्ति नेत्रद्वार से बाहर गई होती है। शास्त्रों में कहा भी है कि आदमी का पूरा व्यक्तित्व उसके मस्तिष्क में रहता है, जो बाह्य इन्द्रियों के रास्ते से बाहर निकलकर बाहरी दुनिया में भटकता रहता है। बाहर हर जगह भौतिक दोषों अर्थात रावण का साम्राज्य है। वह शक्ति उसके कब्जे में आ जाती है, और उसके चंगुल से नहीं छूट पाती। मस्तिष्क में बसा हुआ जीवात्मा अर्थात राम उस बाहरी दुनिया में भटकती हुई सीता शक्ति को लाचारी से देखता है। यही जटायु के भाई सम्पाति के द्वारा उसे अपनी तेज नजर से समुद्र पार देखना और उसका हालचाल राम को बताना है। फिर राम योगसाधना में लग जाता है, और किसी मंदिर वगैरह में बनी देवता की मूर्ति को या वहाँ पर रहने वाले गुरु की खूब संगति करता है, औऱ तन-मन-धन से उनको प्रसन्न करता है। इससे धीरे-धीरे उसके मन में अपने गुरु के चित्र की छाप गहरी होती जाती है, और एक समय ऐसा आता है जब वह मानसिक चित्र स्थायी हो जाता है। यही लँका के राजा रावण से सीता को छुड़ाकर लाना, और उसे समुद्र पर बने पुल को पार कराते हुए अयोध्या पहुंचाना है। प्रकाश की किरण ही वह पुल है, क्योंकि उसीके माध्यम से बाहर का भौतिक चित्र मन के अंदर प्रविष्ट हुआ। मन ही अयोध्या है, जिसके अंदर राम रूपी जीवात्मा रहता है। मन से कोई भी युद्ध नहीं कर सकता, क्योंकि वह भौतिकता के परे है। हर कोई किसीके शरीर से तो युद्ध कर सकता है, पर मन से नहीं। इसका दूसरा अर्थ यह भी है कि मन को समझा-बुझा कर ही सीधे रास्ते पर लगाना चाहिए, जोरजबरदस्ती या डाँट-डपट से नहीं। टेलीपैथी आदि से भी दूसरे के मन का बहुत कम पता चलता है। वह भी एक अंदाज़ा ही होता है। किसी दूसरे के मन के बारे में पूरी तरह से कभी नहीं जाना सकता। पहले तो राम रूपी जीवात्मा लंबे समय तक बाहर की दुनिया में अर्थात रावण की लँका में भटकते हुए अपने हिस्से को अर्थात सीता माता को दूर से ही देखता रहा। मतलब उसने उस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। अगर वह बाहर गया भी, तो अधूरे मन से गया। अर्थात उसने शक्ति को वापिस लाने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए। फिर जब राम उसके वियोग से बहुत परेशान हो गया, तब वह दुनियदारी में जीजान से कूद गया। यही राक्षसों के साथ उसके युद्ध के रूप में दिखाया गया है। दरअसल असली और जीवंत जीवन तो युद्धस्तर के जैसा संघर्षमयी और बाह्यमुखी जीवन ही होता है। मतलब कि वह मन रूपी अयोध्या से बाहर निकलकर आँखों की रौशनी के पुल से होता हुआ लँका में प्रविष्ट हो गया। दुनिया में वह पूरे जीजान से व पूरे ध्यान के साथ मेहनत करने लगा। यही तो कर्मयोग है, जो सभी आध्यात्मिक साधनाओं के मूल व प्रारंभ में स्थित है। मतलब कि वह लँका में सीता को ढूंढने लगा। फिर किसी सत्संगति से उसमें दैवीय गुण बढ़ने लगे। मतलब कि अष्टाङ्ग योग के यम-नियमों का अभ्यास उससे खुद ही होने लगा। यह सत्संग राम और राक्षस संत विभीषण की मित्रता के रूप में है। इससे जीवात्मा को कोई वस्तु बहुत पसंद आई, और वह लगातार उसी एक वस्तु के संपर्क में बना रहने लगा। मतलब कि राम की नजर अपनी परमप्रिय सीता पर पड़ी, और वह उसीके प्रेम में मग्न रहने लगा। मतलब कि इस रूपक कथा में साथ में तंत्र का यह सिद्धांत भी प्रतिपादित किया गया है कि एक स्त्री अर्थात पत्नी ही योग में सबसे ज्यादा सहायक होती है। पुराणों का मुख्य उद्देश्य तो आध्यात्मिक और पारलौकिक है। लौकिक उद्देश्य तो गौण या निम्न है। पर अधिकांश लोग उल्टा समझ लेते है। उदाहरण के लिए, वे इस आध्यात्मिक मिथक से यही लौकिक आचार वाली शिक्षा लेते हैं कि रावण की तरह पराई स्त्री पर बुरी नजर नहीं डालनी चाहिए। हालांकि यह शिक्षा भी ठीक है, पर वे इसमें छिपे हुए कुंडलिनी योग के मुख्य और मूल उद्देश्य को या तो समझ ही नहीं पाते या फिर नजरअंदाज करते हैं। फिर जीवात्मा के शरीर की पोज़िशन और सांस लेने की प्रक्रिया स्वयं ही इस तरह से एडजस्ट होने लगी, जिससे उसका ज्यादा से ज्यादा ध्यान उसकी प्रिय वस्तु पर बना रहे। इससे योगी राम का विकास अष्टाङ्ग योग के आसन और प्राणायाम अंग तक हो गया। इसका मतलब है कि राम सीता को दूर से व छिप-छिप कर देखने के लिए कभी बहुत समय तक खड़ा रहता, कभी डेढ़ा-मेढ़ा बैठता, कभी उसे लंबे समय तक सांस रोककर रखनी पड़ती थी, कभी बहुत धीरे से साँसें लेनी पड़ती थी। ऐसा इसलिए था ताकि कहीं दुनिया में उलझे लोगों अर्थात लँका के राक्षसों को उसका पता न चलता, और वे उसके ध्यान को भंग न करते। वास्तव में जो भौतिक वस्तु या स्त्री होती है, उसे पता ही नहीं चलता कि कोई व्यक्ति उसका ध्यान कर रहा है। यह बड़ी चालाकी से होता है। यदि उसे पता चल जाए, तो वह शर्मा कर संकोच करेगी और अपने विविध रूप-रंग व भावनाएं ढंग से प्रदर्शित नहीं कर पाएगी। इससे ध्यान परिपक्व नहीं हो पाएगा। अहंकार पैदा होने से भी ध्यान में क्षीणता आएगी। ऐसा ही गुरु के मामले में भी होता है। इसी तरह मन्दिर में जड़वत खड़ी पत्थर की मूर्ति को भी क्या पता कि कोई उसका ध्यान कर रहा है। क्योंकि सीता के चित्र ने ही राम के मन की अधिकांश जगह घेर ली थी, इसलिए उसके मन में फालतू इच्छाओं और गैरजरूरी वस्तुओं को संग्रह करने की इच्छा ही नहीं रही। इससे अष्टाङ्ग योग का पांचवां अंग, अपरिग्रह खुद ही चरितार्थ हो गया। अपरिग्रह का अर्थ है, वस्तुओं का संग्रह या उनकी इच्छा न करना। फिर इस तरह से योग के इन प्रारंभिक पांच अँगों के लंबे अभ्यास से जीवात्मा के मन में उस वस्तु या स्त्री का चित्र स्थिर हो जाता है। यही योग के धारणा और ध्यान नामक एडवांस्ड व उत्तम अंग हैं। इसका मतलब है कि राम ने लँका के रावण से सीता को छुड़ा लिया, और उसे वायुमण्डल रूपी समुद्र पर बने उसी प्रकाश की किरण रूपी पुल के माध्यम से आँख रूपी समुद्रतट पर पहुंचाया और फिर अंदर मनरूपी अयोध्या की ओर ले गया या जैसा कि रामायण में लिखा गया है कि लँका से उनकी वापसी पुष्पक विमान से हुई। यही समाधि या कुंडलिनी जागरण का प्रारंभ है। इससे उसकी इन्द्रियों के दस दोष नष्ट हो गए। इसे ही दशहरा त्यौहार के दिन दशानन रावण को जलाए जाने के रूप में मनाया जाता है। फिर जीवात्मा ने कुंडलिनी की जागृति के लिए उसे अंतिम व मुक्तिगामी छलांग या एस्केप विलोसिटी प्रदान करने के लिए बीस दिनों तक तांत्रिक योगाभ्यास किया। उस दौरान वह घर पहुंचने के लिए सुरम्य और मनोहर यात्राएं करता रहा। वैसे भी अपने स्थायी घर के ध्यान और स्मरण से कुंडलिनी को और अधिक बल मिलता है, क्योंकि कुंडलिनी स्थायी घर से भी जुड़ी होती है, जैसा मैंने एक पिछले लेख में बताया है। मनोरम यात्राओं से भी कुंडलिनी को अतिरिक्त बल मिलता है, इसीलिए तो तीर्थयात्राएं बनी हैं। उस चौतरफा प्रयास से उसकी कुंडलिनी बीस दिनों के थोड़े समय में ही जागृत हो गई। यही राम का अयोध्या अर्थात कुंडलिनी के मूलस्थान पहुंचना है। यही कुंडलिनी जागरण है। कुंडलिनी जागरण से जो मन के अंदर चारों ओर सात्त्विकता का प्रकाश छा जाता है, उसे ही प्रकाशपर्व दीपावली के रूप में दर्शाया गया है। क्योंकि कुंडलिनी जागरण का प्रभाव समाज में, विशेषकर गृहस्थान में चारों तरफ फैलकर आनन्द का प्रकाश फैलाता है, इसलिए यही अयोध्या के लोगों के द्वारा दीपावली के प्रकाशमय त्यौहार को मनाना है।
दोस्तों, आदमी एक उन्नत प्राणी है। इसमें उन्नतम कॉग्निशन विद्यमान है। पर उन्नत कॉग्निशन का एक दुष्प्रभाव यह है कि इससे आसक्ति पैदा हो जाती है, जिससे आदमी इससे बंध जाता है। यह ऐसे ही है जैसे जीवन रक्षक दवा सबसे ज्यादा मददगार भी होती है, पर उसका दुष्प्रभाव भी सबसे ज्यादा होता है।
हमारे शरीर की सभी कोशिकाओं में बेसिक कॉग्निशन अर्थात बुनियादी अनुभूति होती है। इसी तरह सभी निम्नतम और सूक्ष्मतम जीवों में भी बेसिक कॉग्निशन होती है। ये सभी, वातावरण के अनुसार अपने को ढालते हैं। जीवित रहने के लिए हमारी तरह ही जीवनचर्या करते हैं। नई चीजें सीखते हैं, और पुरानी चीजों को याद रखते हैं। पर इसके लिए उनमें दिमाग जैसी संरचना नहीं देखी गई है, अभी तक। मतलब कि वे विभिन्न व अनगिनत रासायनिक क्रियाओं की श्रृंखलाओं से नियंत्रित होते हैं। तो क्यों ना उन रासायनिक क्रियाओं को ही उनका दिमाग मान लें। हमारा दिमाग भी तो रासायनिक क्रियाओं से ही चलता है। हो सकता है कि पत्थर, हवा जैसे निर्जीव पदार्थों में भी इससे कमतर स्तर की बेसिक कॉग्निशन हो, जिसे विज्ञान अभी तक समझ नहीं पाया हो। हवा का प्रवाह वातावरण के दबाव से नियंत्रित होता है। तो क्यों ना वायुदाब को हवा का बेसिक कॉग्निशन माना जाए। इसी तरह हर बार एक खास वायुदाब पर हवा की एक खास प्रतिक्रिया होती है। तो क्यों ना इसे वायुदाब की स्मरणशक्ति माना जाए। बेसिक कॉग्निशन के साथ अच्छे और बुरे की भावना नहीं होती। जैसे कि किसी स्थान पर कम वायुदाब होने से हवा का वहां पर प्रविष्ट होना हवा को अच्छा अनुभव नहीं देता। ना ही वहां उच्च वायुदाब होने पर वहां से हवा का रुखसत होना हवा को बुरा अनुभव देता है। इसी तरह जीवाणु को भोजन का कण प्राप्त होने पर खुशी नहीं होती और शत्रु का सामना होने पर उसे दुख नहीं होता। मतलब कि बेसिक कॉग्निशन के साथ राग, द्वेष नहीं होता। वहीं पर उच्च कोगनिशन में वह बीच वाली समान अवस्था राग और द्वेष में बदल जाती है। वैसे ही जैसे एक न्यूट्रॉन एक पॉजिटिव प्रोटॉन और एक नेगेटिव इलेक्ट्रॉन में रूपांतरित हो जाता है। जब दोनों को मिलाया जाए तो फिर से न्यूट्रल न्यूट्रॉन बन जाता है। प्लस और माइनस के चार्ज को अलग-अलग रहते नष्ट नहीं किया जा सकता। यह दोनों तभी नष्ट होंगे, जब आपस में मिलेंगे। इसी तरह हम राग को और द्वेष को अलग, अलग रखकर खत्म नहीं कर सकते। अगर राग और द्वेष को आसक्ति से बनाकर रखेंगे, तो ये अलग-अलग बने रहेंगे और मजबूत होते रहेंगे। जब राग पैदा होगा तो कहीं न कहीं द्वेष भी जरूर पैदा होगा, क्योंकि ये भी विद्युत चार्ज की तरह जोड़ों में पैदा होते हैं, अकेले नहीं। अनासक्ति ही वह सरकट है, जो पॉजिटिव राग और नेगेटिव द्वेष को आपस में जोड़ कर दोनों को खत्म कर देती है। पॉजिटिव को यांग कह लो, और नेगेटिव को यिन कह लो। इनका मिलन ही बहुचर्चित संगम है, अद्वैत है।
कॉग्निशन का विकास एक आवश्यक बुराई की तरह है। जब आदमी केवल हवा, पानी या सूक्ष्म जीव के रूप में था, तब तक उसमें बेसिक कॉग्निशन थी। उसमें न राग था, न द्वेष था। वह तटस्थ होता था। वह न सुखी था, न दुखी था। पर जैसे-जैसे कॉग्निशन विकसित हुई, उसे अच्छे और बुरे का अनुभव होने लगा। इससे उसमें सुख-दुख की उत्पत्ति हुई। जीवन, मरण की उत्पत्ति हुई। पहले ना वह जीता था, ना मरता था। शायद यही वह अनिर्वचनीय मुक्ति है, जिसे पाने की बात वेदों में कही गई है। उसमें ना प्रकाश था, न अंधकार था। मतलब उसमें कुछ भी द्वंद्व नहीं थे। उस स्थिति को ऐसे भी समझ सकते हैं कि उस स्थिति में सब द्वंद्व एकसाथ थे। न्यूट्रॉन में प्रोटोन और इलेक्ट्रॉन दोनों होते हैं, फिर भी दोनों ही नहीं होते। इसी तरह कहते हैं कि परमात्मा में सब कुछ है भी और नहीं भी है।
अब जो वेदों में ब्रह्मांड का वर्णन मानव समाज के जैसा है, और उसमें विभिन्न चेतन देवताओं और राक्षसों आदि का वर्णन भी बिल्कुल मानव समाज के लोगों की की तरह ही है, वह दरअसल बेसिक कॉग्निशन की तरफ लौटने का प्रयास ही लगता है। इसी तरह तंत्र आधारित शरीर विज्ञान दर्शन में जो शरीर का वर्णन ब्रह्मांड और मानव समाज की तरह है, वह भी उसी आदिम बेसिक कॉग्निशन को प्राप्त करने का प्रयास है। दोनों की थीम एक ही है, पर शरीरविज्ञान दर्शन ज्यादा समकालीन और वैज्ञानिक लगता है। हालांकि दोनों ही तरीके एकदूसरे का साथ होने पर ज्यादा अच्छे से काम करते हैं। एक पिछली पोस्ट के अनुसार कुंडलिनी योग से शरीर विज्ञान दर्शन पुष्ट होता है। इसका मतलब है कि कुंडलिनी योग से आधारभूत अर्थात शुद्ध अनुभूति पुष्ट होती है।
तो क्या हम केवल इलेक्ट्रॉन और प्रोटॉन का ही अस्तित्त्व मानेंगे, न्यूट्रॉन का नहीं? मतलब कि क्या हम केवल उन्नत जीवों में ही चेतना का अस्तित्त्व मानेंगे, निम्न जीवों में और जड़ पदार्थों में नहीं? मतलब साफ है कि सृष्टि में ऐसे कोई समय, स्थान और पदार्थ नहीं हैं, जिनमें चेतना नहीं है।
दोस्तों, पिछली पोस्ट में धर्म बारे थोड़ी बात चल पड़ी थी। धर्म का शास्त्रीय मतलब है लाइफस्टाइल। जिसका लाइफस्टाइल कट्टर है, वह पिछड़ जाता है। नोकिया ने समय के साथ बदलाव नहीं किया। साथ में, यह निष्कर्ष भी निकला था कि जिन बहुत से लोगों को मनोरोगी समझकर उनके ऊपर दवाईयों से, शोषण से या सामाजिक बहिष्कार से उन्हें दबाया जाता है, वे दरअसल जागृति के रोगी होते हैं। काश कि मनोविज्ञान कुंडलिनी के लक्षणों और मनोरोग या मूर्खता के लक्षणों के बीच अंतर कर पाता। मुझे लगता है कि यह अंतर कर पाना पश्चिमी सभ्यता जैसी संस्कृति के लिए कठिन है, पर पूर्वी संस्कृति वालों को तो इसका अनुभव प्राचीन काल से ही है। खैर, आपने देखा होगा, हाल ही की पिछली एक पोस्ट में शेर कैसे योगी बना था। वैसे तो सिंघासन नाम का एक योगासन भी होता है। वैसे भी कुंडलिनी योगी को अजगर या ड्रेगन जैसा रूप दिया गया है, जिसका मुंह भी शेर की तरह खुला हुआ है। योग सांसों का खेल है, और शेर भी सांसों की ताकत से दहाड़ता है और अपने चेहरे को खतरनाक बना लेता है। हिंदू पुराणों में इसी तरह की एक दंतकथा आती है कि वामन भगवान ने तीन पग में सारी धरती माप ली थी। दरअसल तीन कदम सत्त्व, रज और तम, तीन गुणों के प्रतीक हैं। इड़ा नाड़ी देवी अदिति है, और पिंगला नाड़ी देवी दिति है। पिंगला दुनियावी भेद बुद्धि और अहंकार को बढ़ाती है, मतलब राक्षसी द्वैत भाव, रजोगुण व तमोगुण को बढ़ाती है। पर इड़ा नाड़ी शांति, तनावरहित्य, अद्वैतभाव व सत्वगुण जैसे दैवीय भाव पैदा करती है। इसीलिए कहते हैं कि अदिति सभी देवताओं की मां है और दिति सभी राक्षसों की मां। कश्यप मुनि की ये दोनों पत्नियां थीं। कश्यप ब्रह्मा के पुत्र थे। ब्रह्मा मन ही है। क्योंकि मन ही सारे संसार को रचता है। वह कमल पर बैठता है, सहस्रार रूपी कमल पर। जब आत्मा का स्थान सहस्रार बताया जाता है, तो मन का भी यही हुआ क्योंकि दोनों आपस में जुड़े हैं, एक के बिना दूसरा नहीं। ऋषि कश्यप अवचेतन मन है, क्योंकि वह मन से ही पैदा होता है। वह मूलाधार में रहता है। क का मतलब जल होता है, और श्य शयन शब्द से बना है, मतलब जल में सोने वाला। जल वीर्य द्रव और रीढ़ की हड्डी में बहने वाले सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूड के रूप में है, और अवचेतन मन को सोए हुए आदमी के रूप में दिखाया गया है, क्योंकि इसमें ही सभी भावनाएं दबी–सोई रहती हैं। यह अवचेतन मन मूलाधार व स्वाधिष्ठान चक्रों जैसे गहरे व अंधेरे गड्ढों जैसे स्थानों में रहता है। जब इसके जागते हुए भावों या विचारों को अद्वैत भाव अर्थात इड़ा नाड़ी का साथ मिलता है, तब वे भाव देवता बन जाते हैं, पर जब द्वैत भाव अर्थात पिंगला नाड़ी का साथ मिलता है, तब वे राक्षस बन जाते हैं। ये जागते विचार ही कश्यप और अदिति या दिति के पुत्र हैं। अदिति और दिति के रूप में क्रमशः इड़ा और पिंगला नाड़ियाँ ही उसकी दो पत्नियां हैं, क्योंकि वह इन्हीं की मदद से पुत्ररूप में जागता है, मतलब शक्तिमान होता है। मानसिक कुंडलिनी छवि ही वामन भगवान है। यह सभी विचाररूपी पुत्रों में श्रेष्ठ है, इसलिए इसे भगवान विष्णु का अवतार कहा गया है। एकदम मस्त मनोविज्ञान है। ब्रह्मा मूल मन है। वास्तव में वही किस्म किस्म की सांसारिक रचनाएं जैसे घर, बाग, सड़क, पुल आदि बनाता है। वह सीधा विचाररूपी पुत्रों को पैदा नहीं करता। वह पहले अवचेतन मनरूपी कश्यप मुनि को पैदा करता है। उसीसे विचाररूपी पुत्र बनते हैं। आपने भी देखा होगा कि अगर आप दुनिया में कुछ काम न करो तो सीधे कोई मजबूत विचार नहीं बनेंगे। काम करने से उसकी यादें अवचेतन मन में समा जाती हैं, जो बाद में शक्तिशाली विचारों के रूप में उमड़ती रहती हैं। पिंगला नाड़ी के अधिकार क्षेत्र में आने वाला बायां मस्तिष्क राक्षसराज बलि के अधिकार में है, इड़ा–शासित दायां मस्तिष्क देवताओं के अधिकार में है। राजा बलि अहंकार है। अहंकार बलवान ही होता है। बलि नाम उसको इसलिए भी दिया हुआ लगता है क्योंकि अहंकार अपनी ताकत को बनाए रखने के लिए जीवों की बलि लेता है, हिंसा करता है। कुण्डलिनी छवि इड़ा के प्रभाव से बनती है। वैसे तो इड़ा और पिंगला दोनों संतुलित रूप में होनी चाहिए, क्योंकि दोनों का अस्तित्व एकदूसरे पर निर्भर है, पर इड़ा तुलनात्मक रूप से ज्यादा प्रभावी होनी चाहिए। इड़ा नाड़ी के प्रभाव में आदमी शांत, तनावरहित, अच्छी भूख व अच्छे पाचन से सम्पन्न हो जाता है। इसी चैन की अवस्था में शुभ विचार के रूप में कुण्डलिनी चित्र मन में डेरा डालता है, मतलब देवमाता अदिति से वामन भगवान का जन्म होता है। देखने को तो वह एक छोटा सा अकेला मानसिक चित्र है, इसीलिए उसे बौना कहा है। वह राजा बलि से ब्रह्माण्ड में अपने लिए सिर्फ तीन पग भूमि मांगता है। एक मानसिक छवि कितना स्थान लेगी। हरेक मानसिक वस्तु की तरह वह ध्यानचित्र भी तीन गुणों से ही बना है, सत्त्व, रज और तम। यही तीन पग हैं। आदमी का अहंकार रूपी बलि उसे उतनी जगह भी दे देता है, और सोचता है कि उससे उसका क्या नुकसान होगा। अहंकार बहुत बलशाली होता है। वह दुनिया के बड़े से बड़े काम करता है। छोटे से एकमात्र कुण्डलिनी चित्र को वह मजाक में लेता है। रीढ़ की हड्डी शंख है। इसका शंख जैसा ही रूप है, सिर के भाग में चौड़ी और निचले भाग में पतली। इसमें स्थित मेरुदंड या सुषुम्ना नाड़ी ही शंख के अंदर की ड्रेन या नाली है। नाड़ी शब्द नदी शब्द से ही बना है। उस ड्रेन में बहने वाला जल ही कुंडलिनी शक्ति की संवेदना है। शक्ति भी जल प्रवाह की तरह बहती है। क्योंकि इसमें कुण्डलिनी ध्यान या संकल्प मिश्रित होता है, इसलिए इसे संकल्पजल कहा गया है। ध्यान को ही संकल्प कहते हैं। हिंदु धर्म में हरेक धार्मिक अनुष्ठान के दौरान शंख या अर्घे (पूजा का एक विशेष बर्तन) या आचमन से जल गिराते हुए संकल्प किया जाता है, मतलब उस अनुष्ठान के कारण, विधि, पुरोहित, और फल अर्थात उद्देश्य के बारे में कुछ क्षणों के लिए गहरा ध्यान किया जाता है। यज्ञ में बैठे हुए बलि ने शंख से जल गिराते हुए वामन भगवान को तीन कदम भूमि देने का संकल्प लिया था। संभवतः जल गिराने से कुण्डलिनी शक्ति बहने लगती है, क्योंकि दोनों में समानता है, जिससे ध्यान मजबूत होता है। अरघे या शंख से जल की गिरती धारा के साथ कुण्डलिनी शक्ति भी फ्रंट चैनल से नीचे की ओर बहने लगती है, जिसके दबाव से वह बैक चैनल में से गुजरते हुए पीठ से ऊपर चढ़ जाती है, और अपने साथ मूलाधार की अतिरिक्त व विशेष कुण्डलिनी शक्ति भी ले जाती है। कुण्डलिनीसंकल्प रूपी वामन, पतली मेरुदंड रूपी सुषुम्ना–शंख में, बह रहे शक्तिरूपी संकल्पजल की मदद से योगसाधना से बढ़ता ही रहता है, और अंत में जागृत होकर सम्पूर्ण सृष्टि को व्याप्त कर लेता है। यही तीन पग से तीनों लोकों को मापना है। इससे अहंकार खुद ही अवचेतन रूपी पाताल लोक में दब जाता है। जिसे ऐसे कहा गया है कि तीसरा पग वामन ने बलि के सिर पर रखा। यह कथा आने वाली अगली पोस्ट में भी जारी है।
दोस्तों, लिखने को बहुत है, शब्द थोड़े हैं। बहुत अजीब हैं अध्यात्म की पहेलियां, बिन बूझे जो लिख दी गई हैं, कोई माने तो कैसे माने, सबको तो यकीन होता नहीँ। ये जो कहा गया है कि बाहर मत दौड़ो, अपने अंदर महसूस करो, यह एक दोगली तलवार की तरह है। अगर कोई बिल्कुल आंख बंद करके बैठ गया, वह तो मरा, पर यदि कोई आंख खोलकर भी बंद रखने का नाटक कर गया, वह तरा। अब मैं तो प्रेमयोगी वज्र ठहरा। मेरे पास अपने बारे में छुपाने के लिए कुछ नहीं है। मैंने हर किस्म के अनगिनत खूबसूरत नजारे देखे हैं। पर मैंने उन नजारों से दूरी बनाए रखी। यहाँ तक कि कइयों से एक लफज़ बात भी नहीँ की, पर मन की आँखों से उन्हें पी ही लिया। यह मेरे पारिवारिक आध्यात्मिक परिवेश से भी हुआ, और अन्य भी कई अनुकूल परिस्थितियाँ रही होंगी पिछले जन्मों के प्रभाव से। पर सिद्धांत तो सिद्धांत ही होता है, यह जानबूझकर भी उतना ही लागू होता है जितना अनजाने में। हुआ क्या कि खूबसूरत नजारों की तरफ आसक्तिपूर्वक न भागने से सिद्धांत को यह लगा कि मैं सभी नजारे अपने अंदर, अपने मन के अंदर, अपने शरीर के अंदर या अपनी आत्मा के अंदर महसूस कर रहा हूँ। सच्चाई भी यही होती है। बाहर के नजारे तो अपने अंदर के नज़ारे को प्रकट करने का जरियाभर होते हैं। जैसा कि मैं शरीर के आनंदमय कोष की जड़ तक जाने की पिछली कई पोस्टों से कोशिश कर रहा हूँ। पता नहीं क्यों लगता है कि कुछ अधूरा है। शास्त्रीय वचनों को वैज्ञानिक व्याख्या की जरूरत है। योग वैज्ञानिक है ऐसा कहा जाता है। पर सिर्फ कहने से नहीं होता। आज इसको सिद्ध करने की जरूरत है। दुनियावी रंगीनियों व नजारों में यौनप्रेम शीर्ष पर है। अगर कोई यौनप्रेम के साथ भी उससे तठस्थ रह सके, तो उससे बड़ी अनासक्ति क्या हो सकती है। उससे तो आत्मा को चमत्कारिक बल मिलेगा और वह सबसे तेजी से जागृत हो जाएगी, सिर्फ एकदो साल के अंदर ही। भगवान शिव भी तो ऐसे ही थे। देवी पार्वती उनके ऊपर जान छिड़कती थीं, पर वे अपने ध्यान में डूबे अनासक्त रहते थे। देवी पार्वती से प्यार तो वे भी अतीव करते थे, पर तटस्थ रहने का अभिनय करते थे। इससे उपरोक्त मनोवैज्ञानिक सिद्धांत के अनुसार उनका सारा प्रेम उनकी आत्मा को खुद ही लग जाता था। फिर भला उनकी आत्मा क्यों हमेशा जागृत न रहती। इससे जाहिर होता है कि एक योगी विशेषकर तंत्रयोगी से बड़ा अभिनयकर्ता नहीँ हो सकता कोई। देव शिव से उल्टा अगर कोई कट्टर या आदर्शवादी या शास्त्रवादी वगैरह या नासमझ ही होता तो देवी पार्वती जैसी प्रेमिका को ठुकरा कर चला जाता या उस पर फूल पे भौरे की तरह आसक्त हो गया होता। आप समझ ही सकते हैं कि फिर क्या होता। मतलब साफ है कि शिव या बुद्धिस्ट वाला मध्यमार्ग ही श्रेष्ठ है। वैसे कहना आसान है, करना मुश्किल। शास्त्रों में अनासक्ति को ठुकराना इसलिए कहा है, क्योंकि वह अपनाने की बजाय ठुकराने के ज्यादा करीब होती है। शास्त्र भावप्रधान हैं। लोग उनके भावों को न समझकर उनका अंधानुकरण करने लगते हैं। अगर कोई आम आदमी महादेव शिव को देखता तो बोलता कि उन्होंने देवी पार्वती को ठुकराया हुआ है। विवाह तो उनका बाद में मतलब कहलो कि ज्ञानप्राप्ति के बाद हुआ। पहले तो वे कहीं और ध्यानमग्न रहते थे, और उनको ढूंढते हुए देवी पार्वती कहीं ओर। बेशक शिव ने पार्वती के रूप की ध्यानमूर्ति अपने मन में बसा ली थी और हमेशा उसके ध्यान में आनंदमग्न रहते थे। लोगों को वह उनकी तपस्या लगती होगी। उन्हें क्या पता कि मामला कुछ और ही है। मन में जाके किसने देखा। दरअसल असली अनासक्त आदमी ने पूरी दुनिया को अपनी आत्मा के रूप में अपनाया होता है। उसे नहीं लगता कि उसने दुनिया को ठुकराया हुआ है। पर दुनिया वालों को ऐसा लगता है। इसलिए कम समझ वाले आम आदमी उनकी देखादेखी दुनिया को ठुकराने की बातें करने लग जाते हैं। यहाँ तक कि प्रेमी को भी कई बार यह लगता है कि उसका प्रेमी उसे ठुकरा रहा है या नजरन्दाज कर रहा है। इसीलिए तो ऐसा होने पर शिव पार्वती को दिलासा देने के लिए कुछ क्षणों के लिए पार्वती के सामने प्रकट हो जाया करते थे, और फिर अंतर्धान हो जाया करते थे। यह बता दूँ कि आत्मा को कुण्डलिनी अर्थात ध्यानचित्र के माध्यम से अभिव्यक्ति की शक्ति पहुंचती है। अगर आप बोलें कि अनासक्ति से मुझे ध्यान चित्र अभिव्यक्त होता महसूस होता है, कोई आत्मा वगैरह नहीं। शुद्ध आत्मा शून्य आकाश की तरह है, वह शरीर के रहते सीधी महसूस हो भी नहीं सकती, वह केवल ध्यानचित्र के रूप में ही महसूस हो सकती है। शिव ठहरे सबसे बड़े रासबिहारी। उनका कोई कैसे मुकाबला करे। आम आदमी को प्रेम से ज्ञान प्राप्त करने में अनेकों वर्ष लग जाते हैं। तब तक वह शिव की तरह प्रेमिका को दिलासा भी नहीं दें सकता। अगर देने लग जाए तो भावना में बह जाए और ज्ञान प्राप्ति से वँचित रह जाए। सांसारिक बंदिशें होती हैं सो अलग। सालों बाद सबकुछ बदल जाता है, प्रेमिका का मन भी। कई तो बेवफाई का आरोप लगाकर शुरु में ही किनारा कर लेती हैं। हाहा। वाह रे प्रभु शिव की किस्मत और लीला कि देवी पार्वती के प्रेम से पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति, फिर उनसे ही विवाह और उनसे ही विहार। प्रेम डगरिया में दूजा न कोई आए। ऐसा आम दुनियादारी में होने लग जाए तो स्वर्गों और अमृत की बौछार होती रहे। इसी तरह ईश्वर को बेवफा न समझकर उससे प्रेम करते रहना चाहिए। वे मनुष्य से बहुत प्रेम करते हैं, इसीलिए हवा, धूप, पानी आदि अनगिनत सुविधाएं आदमी पर लुटाते रहते हैं, बेशक पूरी तरह अनासक्त व दूर जैसे बने रहते हैं। कभी न कभी वे जरूर अपनाएंगे।
कुण्डलिनी योग ही आदमी की सीखने की और आगे बढ़ने की जिज्ञासा को पूरा कर सकता है
दोस्तों मैं पिछली पोस्ट में आत्मा की अंतरिक्ष-रूपता के बारे में बता रहा था। व्यवहार में देखने में आता है कि हरेक चीज नीचे से नीचे टूटती रहती है। अंत में सबसे छोटी चीज भी बनेगी जो नहीं टूटेगी। वह आकाश ही है। फिर सृष्टि के आरम्भ में पुनः जब इससे चीज बननी शुरु होएगी और पहली चीज बनेगी वह आकाश में आभासी तरंग ही होगी क्योंकि आकाश के इलावा कुछ भी नहीं था। इसके लिए एक ही तरीका है कि रनिंग या स्टेंडिंग वेव बना कर तरंग या कण जैसा दिखा दिया जाए। वैसे भी तरंग को कण के रूप में दिखा सकते हैं, कण को तरंग के रूप में नहीं। इससे भी सिद्ध होता है कि जगत का तरंग रूप ही सत्य है, कण या भौतिक रूप कल्पित व अवास्तविक है, जैसा शास्त्रों में हर जगह कहा गया है। मैं पिछली पोस्ट में भी बता रहा था कि जब मीडियम और पार्टिकल एक ही चीज हो और कण मीडियम के इलावा अन्य कुछ न हो तो पार्टिकल को भी वेव ही बोलेगे। हवा के अंदर पानी का कण बन सकता है, पर पानी के अंदर पानी का कण कैसे बन सकता है। एक ही तरीका है कि आभासी रनिंग या स्टेंडिंग वेव बना कर कण जैसा दिखा दिया जाए। इसलिए शास्त्रों में उस चिदाकाश अर्थात चेतन आकाश को नेति-नेति कह कर पुकारा गया है। नेति शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है, न और इति। न का मतलब नहीं, और इति का मतलब यह है। इसलिए नेति का मतलब हुआ, यह नहीं, मतलब यह परमात्मा नहीं है। जो भी दिखेगा, वह नेति ही माना जाएगा। सभी मूलकणों को भी नेति ही माना जाएगा, जब तक जो भी मिलते जाएंगे। अंत में जो अदृष्य जैसा काला आसमान बचेगा, वह भी नेति ही होगा। वह इसलिए क्योंकि उसे भी हम अन्य रूप में देख पा रहे हैं या जान पा रहे हैं। यदि काला या अचेतन आसमान अपने आप के रूप में अनुभव हो तो यह आत्मा नहीं है, क्योंकि अँधेरे आसमान में प्रकाशमान जगतरूपी तरंगें पैदा नहीं हो सकतीं। तरंग और तरंग का आधार एकदूसरे से अलग नहीं हो सकते जैसे तरंग सागर से अलग नहीं। इसलिए वही अपनी आत्मा का असली अनुभव हैं, जिसमें जगतरूपी विचार, दृश्य आदि तरंग की तरह अपृथक दिखें। किसी भी तरह का कोई भी विचार या भाव नेति ही माना जाएगा। अंत में ऐसा तत्त्व बचेगा, जिसकी तरफ हम इशारा नहीं कर पाएंगे, मतलब वह हमारा अपना आत्मरूप होएगा। क्योंकि हम उसे इति अर्थात यह कहकर सम्बोधित नहीं कर पाएंगे, इसलिए वह नेति भी नहीं हो सकता। नेति वही हो सकता है, जिसे हम इति कह पाते हैं। यह कुण्डलिनी जागरण के दौरान अनुभव होता है। अर्थात एक मानसिक अनुभूति में स्थित प्रकाश और चेतना उसके अनंत सागर के भीतर एक छोटी सी लहर है, असंबद्ध आधार माध्यम के अंदर एक कण के रूप में नहीं, भौतिक प्रयोगों और जागृति के अनुभवों के अनुसार। दोनों इसको पूरी तरह से साबित करने के लिए कंधे से कंधा मिलाकर चलते हैं। हालांकि अधिक दार्शनिकों और बुद्धिजीवियों के लिए जागृति का आंतरिक अनुभव ही काफी है। इससे बड़ा क्या प्रमाण होगा परमात्मा के बारे में। इसीलिए कहते हैं कि मौन ही ब्रह्म है। अधिकांश वैज्ञानिक व आधुनिकतावादी जो सोचते हैं कि फलां कण मिलेगा या फलां बल का पता चलेगा या फलां थ्योरी सिद्ध होएगी तो सम्भवतः ब्रह्माण्ड के सभी रहस्यों से पर्दा उठ जाएगा। पर ऐसा सच नहीं है। जो भी मिलेगा वह इति ही होगा, इसलिए नेति के दायरे में आएगा। कुछ न कुछ हमेशा बचा रहेगा ढूंढने को। मतलब सृष्टि के मूल का पता नहीं चलेगा। परम मूल मतलब परम आत्मा का पता तभी चलेगा जब कोई इति अर्थात अपने से अलग चीज न मिलकर अपना आत्म रूप महसूस होएगा। यह कुण्डलिनी योग से ही संभव है। इससे सिद्ध होता है कि कुण्डलिनी योग से ही सृष्टि के सभी रहस्यों से पर्दा उठ सकता है और वही आदमी की सीखने की और आगे बढ़ने की जिज्ञासा को पूरा कर सकता है। वही एक लम्बे अरसे की मानसिक प्यास बुझा सकता है।
जितने जीव उतने यूनिवर्स मतलब मल्टीवर्स
ब्रह्माण्ड तो चिदाकाश के अंदर विकाररहित तरंग की तरह है। यह बिल्कुल शुद्ध है ब्रह्म की तरह। जल और जलतरंग के बीच क्या अंतर हो सकता है। पर आदमी अपनी भावनाओं, मान्यताओं, व विचारों के साथ इसे रंग देता है। इसलिए यह ब्रह्माण्ड हरेक आदमी या जीव के लिए अलग है। इसीलिए कहते हैं कि सृष्टि बाहर कहीं नहीं, यह सिर्फ आदमी के मन की उपज है। यह बात पूरे योगवासिष्ठ ग्रंथ में अनेकों कहानियों और उदाहरणों से स्पष्ट की गई है। इसे ही हम मल्टीवर्स भी कह सकते हैं। कुण्डलिनी योग से जब मन की सोच व भावनाएँ शुद्ध होने से मन की चंचलता का शोर शांत हो जाता है, मतलब उनके प्रति आसक्ति नष्ट हो जाती है, तभी असली माने ओरिजिनल ब्रह्मरूपी ब्रह्माण्ड का अनुभव होता है, जिससे आदमी आत्मसंतुष्ट सा रहने लगता है । कुण्डलिनी ही अद्वैत है। अद्वैत ही जगत की सभी चीजों को एक जैसा व आत्म-आकाश में तरंग की तरह देखना है। क्वांटम वैज्ञानिक भी सूक्ष्म पदार्थों को इसी तरह अंतरिक्ष से अभिन्न, तरंगरूप व एकरूप देखता है। इलेक्ट्रोन तरंग और फोटोन तरंग अर्थात प्रकाश तरंग एक जैसी ही हैं। कण रूप में ही दोनों अलग-अलग दिखते हैं। मतलब कि तरंग-दृष्टि ही सत्य व अद्वैतपूर्ण है, जबकि कण-दृष्टि ही असत्य व द्वैतपूर्ण है। स्थूल जगत में भी सत्य दृष्टि यही तरंगदृष्टि है, क्योंकि सूक्ष्म पदार्थ ही आपस में जुड़कर स्थूल जगत का निर्माण करते हैं। कण वाली द्वैतपूर्ण दृष्टि मिथ्या, भ्रम से भरी, दुनिया में भटकाने वाली व दुःख देने वाली है, और यह आसक्ति के साथ दुनिया को देखने से पैदा होती है। यह ऐसे ही है जैसे अगर डबल स्लिट एक्सपेरिमेंट में मूलकणों को देखने की कोशिश करें, तो वे कण की तरह व्यवहार करते हैं, अन्यथा अपने असली तरंग के रूप में होते हैं। डबल मजा लेना हो तो डबल स्लिट के पास खड़े होकर कभी उसे तिरछी नजर से तनिक देख लो और कभी शर्मा कर मुंह फेर लो। हहा।
एक ही स्थान पर अनगिनत ब्रह्मान्डों मतलब पैरालेल यूनिवर्स का अस्तित्व
अनगिनत आयामों का अस्तित्व
क्योंकि भौतिक संसार अंतरिक्ष के अंदर एक आभासी तरंग है, इसलिए एक ही स्थान पर अनगिनत किस्म की आभासी तरंगें बन सकती हैं। हो सकता है कि एक किस्म की तरंग दूसरे किस्म की तरंग से बिल्कुल भी प्रतिक्रिया न करे। फिर तो एक ही स्थान पर एकसाथ अनगिनत स्वतंत्र ब्रह्माण्ड स्थित हो सकते हैं। इससे हो सकता है कि जहाँ मैं इस समय बैठा हूँ, बिल्कुल वहीं पर मतलब मेरे द्वारा घेरे हुए स्थान में ही ब्रह्माण्ड की सभी चीजें और ब्रह्माण्ड के सभी क्रियाकलाप मौजूद हों, क्योंकि किसी आयाम के ब्रह्माण्ड में कुछ होगा, तो किसी में कुछ, इस तरह अनगिनत ब्रह्मान्डों में सबकुछ कवर हो जाएगा। ऐसा भी हो सकता है कि इसी स्थान पर भरेपूरे अनगिनत ब्रह्माण्ड मौजूद हों, क्योंकि छोटा-बड़ा भी सापेक्ष ही होता है, वास्तविक नहीं। इसका मतलब है कि इस तरह से असंख्य आयामों का अस्तित्व है। उन्हें हम कभी जान ही नहीं सकते, क्योंकि जिस आभासी तरंग के आयाम में हमारा ब्रह्माण्ड स्थित है, वह दूसरे किस्म की आभासी तरंगों से निर्मित आयामों से बिल्कुल भी प्रभावित नहीं होगा। हो सकता है कि जो ग्रेट अट्रेक्टर माने महान आकर्षक बल ब्रह्माण्ड को गुब्बारे की तरह फुला रहा है, वह अज्ञात आयामों वाले अनगिनत व भारीभरकम ब्रह्मान्डों के रूप में हों। हम उसे अंतरिक्ष की इन्हेरेंट माने स्वाभाविक गुरुत्वाकर्षण शक्ति मान रहे हों, जबकि वह अदृष्य ब्रह्मान्डों से निर्मित हो रही हो।
पदार्थ के ड्यूल नेचर होने का व्यक्तिगत अनुभव रूपी वैज्ञानिक प्रयोग
एकबार मेरे हाथ पर आसमानी बिजली गिरने की एक चिंगारी टकराई थी। मुझे ऐसे महसूस हुआ कि किसी ने जोर से एक पत्थर मेरे हाथ की पिछली सतह पर मारा हो। यहाँ तक कि मैं इधरउधर देखने लगा कि किसने पत्थर मारा था। वह बिजली का चक्र लगभग दस मीटर दूर एक लोहे की चद्दर पर गिरा था जिसके आसपास बच्चे भी खेल रहे थे पर वे सौभाग्यवश सुरक्षित बच गए। अद्भुत बात कि उस लोहे की चद्दर पर खरोच तक नहीं आई थी, वह बिल्कुल पहले की तरह थी। कोई चीज वगैरह टकराने की भी कोई आवाज नहीं हुई। इसका मतलब है कि पदार्थ के मूल कण इलेक्ट्रोन ने मेरे हाथ पर कण की तरह व्यवहार किया, जबकि उसीने लोहे की चद्दर के ऊपर तरंग के रूप में व्यवहार किया। फोटोइलेक्ट्रीक इफेक्ट व डबल स्लिट एक्सपेरिमेंट तो बेजान पदार्थों वाला प्रयोग था, पर यह प्रयोग मैंने अपने जिन्दा शरीर के ऊपर महसूस किया। आपने भी देखा होगा कि कैसे आसमानी बिजली गिरने से पूरी इमारत धराशायी हो जाती है, या उसके छत पर बड़ा सा छेद हो जाता है, ऊँचे पेड़ की काफी लकड़ी बीच में से छिल जाती है, या पूरा पेड़ बीच में से टूट कर दो हिस्सों में बंट जाता है। इसे संस्कृत में वज्रपात कहते हैं, मतलब एक लोहे के जैसे गोले का आसमान से गिरना, जैसे कोई बम गिरता है। इसका मतलब है कि पुराने समय के लोगों को इलेक्ट्रोन-तरंग के कण-प्रभाव का ज्ञान था। हिमाचल प्रदेश के कुल्लूमें एक बिजली महादेव मंदिर है। इसमें स्थित पत्थर के शिवलिंग पर हर साल एकबार बिजली गिरती है, जिससे यह दो टुकड़ों में बंट जाता है। फिर उन दोनों टुकड़ों को मंदिर के पुजारियों के द्वारा मक्खन से जोड़ दिया जाता है। यह भी तो इलेक्ट्रोन का कण-रूप ही है। मूलकण इतना सूक्ष्म होता है कि लार्ज हैडरोन कोलायडर में उसका अंदाजा अप्रत्यक्ष रूप से उसके टकराने से हुए प्रभाव को मापकर लगाया जाता है, वैसे ही जैसे मेरे हाथ पर उसने टकराने की संवेदना पैदा की, प्रत्यक्ष रूप से तो उसे कभी नहीं जाना जा सकता, देखा जाना तो दूर की बात है।
दोस्तों, मैं पिछली पोस्ट में नाक व इड़ापिंगला से जुड़े कुछ आध्यात्मिक रहस्य साझा कर रहा था। इसी से जुड़ी एक पौराणिक कथा का स्मरण हो आया तो सोचा कि इस पोस्ट में उसका योग आधारित रहस्योद्घाटन करने की कोशिश करते हैं। कहते हैं कि पुराने युग में राक्षस हिरण्याक्ष धरती को चुरा के ले गया था और उसे समुद्र के अंदर गहराई में छिपा दिया था। इससे सभी देवता परेशान होकर ब्रह्मा को साथ लेकर भगवान विष्णु के पास गए और उनसे सहायता का वचन प्राप्त किया। तभी ब्रह्मा की नाक से एक छोटा सा सूअर निकला। दरअसल भगवान विष्णु ने ही उस वराह का रूप धारण किया हुआ था। वह देखते ही देखते बड़ा होकर समुद्र में घुस गया। वहाँ उसने गहराई में छुपे दैत्य हिरण्याक्ष को देख लिया और उससे युद्ध करने लगा। देखते ही देखते उसने हिरण्याक्ष को मार दिया और वेदों समेत धरती को अपने मुंह के दोनों किनारों वाली लंबी और पैनी दो दाढ़ें आगे करके उन पर गोल धरती को बराबर संतुलित करके टिका दिया। फिर वे समुद्र के ऊपर आए और उन्होंने धरती को यथास्थान स्थापित कर दिया। फिर भी वराह भगवान शांत नहीं हो रहे थे। उनको भगवान शिव ने एक अवतार लेकर शांत किया।
वराह अवतार कथा का योग आधारित रहस्यात्मक विश्लेषण
नासिका पर और विशेषकर नासिका से अंदरबाहर आतीजाती साँस पर ध्यान देने से शक्ति केंद्रीय रेखा में सुषुम्ना नाड़ी की सीध में आ जाती है। कहते हैं कि नासिका से बाहर जाती साँस से होकर ही वराह बाहर निकला। बाहर जाती साँस पर ध्यान देने से शक्ति आगे वाले चैनल से नीचे उतरती है, और सभी चक्रोँ को भेदते हुए मूलाधार में पहुंच जाती है। यही वराह का समुद्र के नीचे पाताल लोक में पहुंचना है। अगर उसे पाताल लोक की बजाय समुद्र ही मानें तो भी संसार सागर का सबसे निचला पायदान मूलाधार ही है, क्योंकि विभिन्न चक्रोँ में ही सारा संसार बसा हुआ है। सम्भवतः इसलिए भी समुद्र कहा गया हो क्योंकि वीर्यरूपी जल के भंडार मूलाधार क्षेत्र के अंतर्गत ही आते हैं, जिसमें सारा संसार के रूप में दबा सा पड़ा होता है। हिरण्याक्ष का मतलब द्वैतभाव रूपी अज्ञान। हिरण्य मतलब सोना, अक्ष मतलब आंख। जिसकी नजर में सुवर्ण अर्थात समृद्धि के प्रति आदरभाव है, और उसके पीछे द्वैत भाव से अंधा सा होकर पड़ा हुआ है, वही हिरण्याक्ष है। उससे कुण्डलिनी शक्ति मूलाधार के अँधेरे में छुप अर्थात सो जाती है। मतलब जो मन के विचारों की शक्ति है, वह अवचेतन विचारों के रूप में अव्यक्त होकर मूलाधार में दब जैसी जाती है। यही तो कुंडलिनी है। उस मानसिक संसार के साथ वेद भी मूलाधार में दब जाते हैं, क्योंकि शुद्ध व सत्त्वगुणी आचार-विचार ही तो वेदों के रूप में हैं। शक्ति मूलाधार पर पहुँचने के बाद पीठ से होते हुए वापिस ऊपर मुड़ने लगती है। शक्ति इड़ा और पिंगला, ज्यादातर इड़ा नाड़ी से ऊपर चढ़ने की कोशिश करती है, क्योंकि इसमें अवरोध कम होता है। कई बार शक्ति इड़ा और पिंगला में कुछ क्षणों के लिए प्रत्येक में बारीबारी से झूलने लगती है। ऐसे में आज्ञा चक्र पर भी ध्यान बनाकर रखने से शक्ति बीचबीच में कुछ क्षणों के लिए सुषुम्ना में भी ठहरती रहती है। इड़ा और पिंगला ही वराह के मुंह के दोनों किनारों वाले दो नुकीले दाँत हैं। सुषुम्ना नाड़ी या आज्ञा चक्र ही उन दोनों दांतों के ऊपर संतुलित करके रखी हुई गोल पृथ्वी है। चक्र भी गोल ही होता है। सुषुम्ना को पृथ्वी इसलिए कहा गया है क्योंकि दुनिया के सारे अनुभव मस्तिष्क में ही होते हैं, बाहर कहीं नहीं, और सुषुम्ना नाड़ी से होकर ही मस्तिष्क को शक्ति संप्रेषित होती है। वराह कुण्डलिनी-पुरुष अर्थात ध्यान-छवि है। यह भगवान विष्णु का ध्यान ही है। उसको भी विष्णु की तरह ही शंख, चक्र, गदा, पद्म के साथ चतुर्भुज रूप में दिखाया गया है।इसीलिए कहा है कि भगवान विष्णु ने वराह रूप में अवतार लिया। रूपक के लिए वराह को इसलिए भी चुना गया है क्योंकि सूअर ही जमीन को खोदकर गहराई में भोजन के रूप में छिपी अपनी शक्ति की तलाश करता रहता है। सूअर को पृथ्वी इसीलिए प्यारी होती है। इसीलिए उसे लाने वह समुद्र में भी घुस जाता है। मूलाधार में सोई हुई या दबी हुई धरती अर्थात मन रूपी शक्ति को पाने के लिए वह इड़ा और पिंगला रूपी दांतों के साथ उस शक्ति को वहाँ पर टटोलता और खोदता है। फिर उसको सुषुम्ना रूपी संतुलन देकर जल के बाहर ले आता है, और उसे अपने पूर्ववत असली स्थान पर स्थापित कर देता है। जल से बाहर ले आता है माने नाड़ी के शिखर पर उससे बाहर सहस्रार में पहुंचा देता है, क्योंकि नाड़ी भी जल की तरह ही बहती है। उसका असली स्थान मस्तिष्क का सहस्रार ही है, क्योंकि वही सभी अनुभवों का केंद्र है। सुषुम्ना नाड़ी भी सीधी मूलाधार से सहस्रार को जाती है। इससे अवचेतन मन में दबे हुए विचार फिर से अनुभव में आने लगते हैं, और आनंदमयी शून्य-आत्मा में विलीन होने लगते हैं। मतलब अवचेतन विचारों के रूप में सोई हुई शक्ति जागने लगती है। यह विपासना ही तो है। विपासना मस्तिष्क के किसी भी हिस्से में हो सकती है, सहस्रार को छोड़कर, क्योंकि इसके लिए कम शक्ति चाहिए होती है। होती सहस्रार में ही है, पर कम ऊर्जा के कारण बाहर जान पड़ती है। जिस विचार में जितनी कम शक्ति होती है, वह सहस्रार से उतना ही दूर प्रतीत होता है। वैसे भी आत्मा का स्थान सहस्रार में ही बताया गया है। सहस्रार में केवल कुण्डलिनी चित्र का ही ध्यान किया जाता है, जोकि किसी मूर्ति या गुरु या पारलौकिक देह आदि के रूप में होता है। यह चित्र लगभग असली भौतिक रूप की तरह महसूस होता है अभ्यास से, इसीलिए इसके लिए विपासना की अपेक्षा काफी ज्यादा शक्ति लगती है। यदि कोई किसी आम लौकिक आदमी या औरत के रूप की छवि को सहस्रार में जागृत करने लगे, तब तो वह रात को ही नींद में चलता हुआ उसके पास पहुंच जाएगा। तब ध्यान कैसे होगा। फिर सभी देवता और ऋषिगण प्रसन्न होकर वराह भगवान की हाथ जोड़कर स्तुति करते हैं। वैसे भी इन सभी का उद्देष्य जीवमात्र को जन्ममरण रूपी दुःख से दूर करना ही है, जो सहस्रार चक्र में ही संभव है, इसीलिए खुश होते हैं। शिवजी के द्वारा वराह को शांत करने या मारने का मतलब है कि योगी कुण्डलिनी का भी मोह छोड़कर शिव के जैसा अद्वैतवान तांत्रिक बन गया। वैसे भी सिद्धांत यही है कि ज्ञान अर्थात कुण्डलिनी जागरण होने के बाद या वैसे भी अद्वैतमय तंत्र ही सर्वोच्च समझ अर्थात सुप्रीम अंडरस्टेंडिंग है, जिसे ओशो महाराज भी अपनी एक पुस्तक ‘tantra- a supreme understanding’ के रूप में दुनिया के सामने स्पष्ट करते हैं।
विपासना साधना के लिए अति उपयोगी प्राणायाम कपालभाति
पिछली से पिछली पोस्ट में ही मैं विपासना के बारे में भी बता रहा था। मेरे अनुभव के अनुसार कपालभाति प्राणायाम भी विपासना में बहुत मदद करता है। सिर्फ सांस को बाहर ही धकेलना है। अंदर जैसी जाती हो, जाने दो। अपने को थकान न होने दो। तनावरहित बने रहो। जो रंगबिरंगे विचार उमड़ रहे हों, उन्हें उमड़ने दो। जो पुरानी यादें आ रही हों, उन्हें आने दो। वे खुद शून्य आत्मा में विलीन होती जाएंगी। दरअसल ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि मस्तिष्क में बिना किसी भौतिक वस्तुओं की सहायता के उनके प्रकट होने से आदमी को यह पता चल जाता है कि वे असत्य व आकाश की तरह सूक्ष्म हैं, पर भौतिक संसार के सम्पर्क में आने से भ्रम से सत्य व स्थूल जान पड़ते हैं। विपासना का सिद्धांत भी यही है। इसीलिए शास्त्रों में बारबार यही कहा गया है कि संसार असत्य है। सम्भवतः यह विपासना के लिए लिखा गया है, क्योंकि जब विपासना से संसार असत्य जान पड़ता है, तब संसार को असत्य जान लेने से विपासना खुद ही हो जाएगी। कपालभाति प्राणायाम से इसलिए विपश्यना ज्यादा होती है, क्योंकि व्यस्त दैनिक व्यवहार में भी हम ऐसे ही तेजी से और झटकों से सांस लेते हैं। जैसे ही कोई विचार आता है, ऐसा लगता है कि सांस के लिए भूख बढ़ गई, और अंदर जाने वाली सांस भी गहरी, मीठी, स्वाद व तृप्त करने वाली लगती है। अगर विचार को बलपूर्वक न दबाओ, तो इससे आगे से आगे जुड़ने से विचारों की श्रृंखला बन जाती है, और लगभग सारा ही मन घड़े से बाहर आ जाता है, जिसे पिछली पोस्ट की कथा में कहा गया है कि एक घड़े से सैंकड़ो या हजारों पुत्रों ने जन्म लिया। जो विचार-चित्र पहले से ही हल्का जमा हो, वह कम उभरता है। मतलब साफ है कि आसक्ति भरे व्यवहार से ही मन में कचरा जमा होता है। उसको विपासना से बारबार बाहर निकालना मतलब कचरा साफ करना। जैसे कढ़ाई में पक्के जमे मैल को बारबार धोकर बाहर निकलना पड़ता है, वैसे ही आसक्ति वाले विचार को बारबार निकालना पड़ता है।
आदमी को घूमककड़ की तरह रहना चाहिए, क्योंकि विपश्यना साधना नए-नए स्थानों व व्यक्तियों के सम्पर्क में आने से मजबूत होती है
पिछली पोस्ट में कहे रंगारंग कार्यक्रम को देखते हुए मेरे मन में नए-पुराने विचार साक्षीभाव व आनंद के साथ उमड़ रहे थे, और आत्मा में विलीन हो रहे थे। मतलब विपश्यना साधना खुद ही हो रही थी। दरअसल वह क्षेत्र मेरे लिए खुद ही विपश्यना क्षेत्र बना था। ऐसा होता है जब किसी स्थान के साथ एक पुराना व अज्ञात सा संबंध जुड़ता है, जो अपने गृहक्षेत्र से मिलता जुलता तो है, पर वहाँ के लोग नए आदमी को अजनबी व बाहरी सा समझ कर उसके प्रति तटस्थ से रहते हैं। विरोध तो नहीं कर पाते क्योंकि उन्हें भी नए व्यक्ति से अपनापन सा लगता है। इससे आदमी की शक्ति खुद ही दुappearing व रिश्तों के फालतू झमेलों से बची रहकर विपश्यना में खर्च होती रहती है। हमारे गाँव के जो देवता हैं, वे हमारे पुराने राजा हुआ करते थे। वे एकप्रकार से हमारे पूर्वज भी थे। उनके साथ हमारे पूर्वज पुरानी रियासत से नई रियासत को आए थे। नई रियासत में उन्होंने अपना घर उस जगह पर बनवाया, जहाँ से उन्हें अपनी पुरानी रियासत वाली पहाड़ी सीधे और हर समय नजर आती थी। अपने घर के ज्यादातर द्वार और खिड़कियां भी उन्होंने उसी पहाड़ी की दिशा में बनवाए थे। उनकी मृत्यु के बाद जब वहाँ उनका मंदिर बनवाया गया, तब भी उसका द्वार उसी दिशा में रखा गया। इसी तरह मेरी दादी माँ बताया करती थीं कि एक वैरागी साधु बाबा उनके गाँव में रहते थे, जो उन्हें बेटी की तरह प्यार देते थे। दादी का गाँव एक ऊँचे पहाड़ के शिखर के पास ही था। वह पहाड़ बहुत ऊँचा था, और आसपास के पहाड़ उसके सामने कहीं नहीं ठहरते थे। उस पहाड़ के शिखर पर आने का उनका मुख्य मकसद था, नीचाई पर बसे उनके अपने पुराने गांव का लगातार नजर में बने रहना, ताकि अच्छे से साधना हो पाती, और पुराने घर की याद विपासना के साथ बनी रहती अर्थात वह याद उनकी साधना में विघ्न न डालकर लाभ ही पहुंचाती। वास्तव में, दुर्भाग्य से, धीरे-धीरे उनके परिवार के सभी सदस्य विभिन्न आपदाओं से कालकवलित हो गए थे। इस वजह से ढेर सारी दौलत भी मौत की भेंट चढ़ गई थी। इससे वे संसार के मोह से बिल्कुल विरक्त हो गए थे। व्यक्तिगत संबंध के मामले में भी यही आध्यात्मिक मनोविज्ञान काम करता है। किसी व्यक्ति के प्रति आकर्षण हो पर यदि वह बाहरी व विदेशी समझ कर प्यार करने वाले को ठुकरा दे तो विपश्यना खुद ही होती रहती है। मुझे बताते हुए कोई संकोच नहीं कि इस दूसरे किस्म की व्यक्तिगत संबंध की विपशयन से मेरी नींद में जागृति में बहुत बड़ा हाथ था।
हिंदु शास्त्रीय कथाएं एकसाथ दो अर्थ लिए होती हैं, भौतिक रूप में प्रकृति संरक्षक व आध्यात्मिक रूप में मनोवैज्ञानिक
हम इस पर भी बात रहे रहे थे कि इन कथाओं को पढ़ने का पूरा मजा तब आता है जब इनके पहेली जैसे रूप के साथ असली मनोवैज्ञानिक अर्थ भी समझ में आता है। कोई यह कह सकता है कि इन कथाओं से अंधविश्वास बढ़ता है। पर इनको मानने वालों ने इनके असली या भौतिक रूप पर ज्यादा अमल नहीं किया, इन पर अटूट श्रद्धा करके इनकी दिव्यता और पारलौकिकता को बनाए रखा। इनको पवित्र व पारलौकिक कथाओं की तरह समझा, लौकिक और भौतिक नहीं। वैसे ये कथाएं ज्यादा अमानवीय भी नहीं हैं। गंगा नदी को पूजने को ही कहा है, उसे गंदा करने को तो नहीं। इससे प्रकृति के प्रति प्रेम जागता है। वैसे भी नाड़ी विशेषकर सुषुम्ना नाड़ी नदी की तरह बहती है। नदी के ध्यान से संभव है कि नाड़ी की तरफ खुद ही ध्यान चला जाए। मतलब जो भी कथाएं हैं, दोनों प्रकार से फायदा ही करती हैं, भौतिक रूप से प्रकृति का संरक्षण करती हैं, और आध्यात्मिक रूपक के रूप में आध्यात्मिक उत्थान करती हैं। कुछ गिनेचुने मामले में मानवता के अहित में प्रतीत भी हो सकती हैं, जैसे कि मनु स्मृति के कुछ वाक्यों पर आरोप लगाया जाता है। पर आरोप के जवाब में ज्यादातर उनका आध्यात्मिक या पारलौकिक अर्थ ही लगाया जाता है, भौतिक नहीं। हमने तो अपने जीवन में उनके अनुसार चलते हुए कोई देखा नहीं, सिर्फ उन पर आरोप ही लगते देखे हैं। बहुत सम्भव है कि वे वाक्य मूल ग्रंथ में नहीं थे और बाद में उनको साजिश के तहत जोड़ दिया गया हो। इसके विपरीत कुछ अन्य धर्मों में मुझे अधिकांश लोग वैसी रहस्यात्मक कथाओं पर हूबहू चलते दिखाई देते हैं, उनके विकृत जैसे भौतिक रूप में। यहाँ तक कि वे उन कथाओं के आध्यात्मिक विश्लेषण व रहस्योद्घाटन की इजाजत भी नहीं देते, और जबरदस्ती ऐसा करने वालों को जरा भी नहीं बख्शते। जेहाद, काफीरों की अकारण हत्या, जबरन धर्मान्तरण जैसे उदाहरण आज सबके सामने हैं। हमने एक पोस्ट लिखी थी, जिसमें होली स्पिरिट व कुंडलिनी के बीच में समानता को प्रदर्शित किया गया था। दो-चार लोग किसी भी वैज्ञानिक तर्क को नकारते हुए उस पोस्ट को नकारने लगे। एक जेंटलमेन तो उसे शैतान व डेमन या शत्रु की कारगुजारी बताने लगे। वे इस बात को नहीं समझ रहे थे कि वह विभिन्न धर्मों के बीच मैत्री व समानता पैदा करने का प्रयास था। वे इस वैबसाईट में दर्शाए तंत्र को ओकल्ट या भूतिया प्रेक्टिस समझ रहे थे। हमें किसी भी विषय में पूर्वाग्रह न रखकर ओपन माइंडड होना चाहिए। हिंदु दर्शन में अन्य की अपेक्षा विज्ञानवादी सोच व तर्कशीलता को ज्यादा महत्त्व दिया गया है, और जबरदस्ती अंधविश्वास को बनाए रखने को कम, जहाँ तक मैं समझता हूँ। वैसे कुछ न कुछ कमियाँ तो हर जगह ही पाई जाती हैं। साथ में वे महोदय मुझे कहते हैं कि मैं किसी धर्म वगैरह से अपनी पहचान बना कर रखता हूँ। मैं जब हिंदु हूँ तो अपने हिंदु धर्म से पहचान बना कर क्यों नहीं रखूंगा। सभी धर्मों में अपनी विशिष्टताएं हैं। विभिन्न धर्मों से दुनिया विविध रंगों से भरी व सुंदर लगती है, हालांकि उनमें अवश्यँभावी रूप से अनुस्यूत मानव धर्म सबके लिए एकसमान ही है। पर फिर भी मैं अपने स्वतंत्र विचार रखता हूँ, और जो मुझे गलत या अंधविश्वास लगता है, उसे मैं नहीं भी मानता। मेरी लगभग हरेक पोस्ट में किसी न किसी हिंदु मान्यता का वैज्ञानिक व मानवीय स्पष्टीकरण होता है। मेरे धर्म की उदार और सर्वधर्मसमभाव वाली सोच का भला इससे बड़ा सीधा प्रमाण क्या होगा। एकबार हिंदी भाषा पढ़ाने वाले एक विद्वान व दार्शनिक अध्यापक से व्हट्सएप्प पर मेरी मुलाक़ात हुई थी। मैंने उन्हें बताया कि कैसे पाश्चात्य लोग योग में यहाँ के स्थानीय हिंदु लोगों से ज्यादा रुचि ले रहे हैं। तो उन्होंने लिखा कि उनमें संस्कार नहीं होते। संस्कार मतलब पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक परम्परा। अब मुझे उनकी वह बात समझ आ रही है कि कैसे संस्कारों की कमी से आदमी एकदम से उस परम्परा के खिलाफ जा सकता है, जिसको वह जीजान से मान रहा हो। संस्कार आदमी को परम्परा से जोड़ कर रखते हैं।
आक्रमणकारियों से शास्त्रों की रक्षा करने में ब्राह्मणों की मुख्य भूमिका थी
कई बार कट्टर किस्म के लोग छोटीछोटी विरोधभरी बातों का बड़ा बवाल बना देते हैं। अभी हाल ही में दिल्ली के जवाहर लाल यूनिवर्सिटी (जेएनयू) की दीवारों पर लिखे ब्राह्मण विरोधी लेख इसका ताज़ा उदाहरण है। यह सबको पता है कि यह तथाकथित पिछड़े वर्णों ने नहीं लिखा होगा। हिंदु समुदाय के बीच दरार पैदा करने के लिए यह तथाकथित निहित स्वार्थ वाले बाहरी लोगों की साजिश लगती है। ऐसा सैंकड़ों सालों से होता चला आ रहा है। दरअसल यह सामाजिक कर्मविभाजन था, जिसे वर्ण व्यवस्था कहते थे। इसमें सभी बराबर होते थे, केवल यही विशेष बात होती थी कि वंश परम्परा से चले आए काम को करना ही अच्छा समझा जाता था, जैसे व्यापारी का बेटा भी अपने पिता के व्यापार को संभालता है। जबरदस्ती कोई नहीं थी, क्योंकि शूद्र वर्ण के बाल्मीकि ने रामायण लिखी है, विश्वामित्र क्षत्रिय से ब्राह्मण बन गए थे। ऐसे बहुत से उदाहरण हैं। हालांकि ज्यादातर लोग अपने ही वर्ण का काम सँभालने में ज्यादा गौरव, सम्मान और गुणवत्तापूर्णता महसूस करते थे। जैसे वर्णमाला के वर्ण अपना अलग-अलग विशिष्ट रूप-आकार लिए होते हैं, वैसे ही समाज के लोग भी अलग-अलग रूपाकार के कर्म करते हैं। अगर कर्म के अनुसार ही किसी का स्वभाव बन जाता हो, तो यह अलग बात है, पर ऐसा कभी नहीं हुआ कि सबको पंक्ति में खड़ा किया गया और शरीर के रंगरूप के अनुसार विभिन्न किस्म के समूह बनाए गए। वर्ण या वर्णभेद से मतलब रंग या रंगभेद बिल्कुल नहीं है, क्योंकि हरेक वर्ण के लोगों में हरेक किस्म के त्वचा-रंग के लोग मिलेंगे। इसी तरह यह परम्परा विदेशी कास्ट या जाति परम्परा की तरह भी नहीं है। यह नाम भी इसको गलतफहमी से दिया गया लगता है। रही बात ब्राह्मणों की तो यह बता दूँ कि सबसे कठिन जीवन उन्हीं का होता था। उनको विलासिता भरे जीवन से अपने को कोसों दूर रखना पड़ता था। फिर धनसम्पत्ति किस काम की अगर उसे भोग ही न सको। अधिकांशतः उनकी कमाई संपत्ति औरों के या परमार्थ के काम ही आती थी। दुनिया में ठगों की कमी न आज है, न पुराने समय में थी। पहली बात तो उनके पास सम्पत्ति होती ही नहीं थी। भिक्षाजीवी की तरह वे दक्षिणा में मिले मामुली से मेहनताने से अपना और अपने परिवार का गुजारा मुश्किल से चलाते थे। फिर बोलते कि राजा उन्हें बहुत सारी धनसंपत्ति दान में दिया करते थे। राजा भी कितनों को देंगे। कर वसूलने वाले इतनी आसानी से दान दिया करते तो आज कोई गरीब न होता। कुछेक ब्राह्मणों को अगर मुहमाँगा दिया गया होगा तो उसको हमेशा गिनते हुए सब पर तो लागू नहीं करना चाहिए। मुफ्त में तो राजा भी नहीं देते थे। जब उन्हें ब्राह्मण से कोई बड़ा ज्ञान प्राप्त होता था, तभी वे अपने आध्यात्मिक कल्याण के लिए दान देते थे। कहावत भी है कि फ्री लंच का अस्तित्व ही नहीं है। मैं ऐसा इसलिए लिख रहा हूँ, क्योंकि मुझे पता है। मेरे दादा खुद एक आदर्श हिंदु पुरोहित थे, जो लोगों के घरों में पूजापाठ किया करते थे। मैंने उनके साथ काम करते हुए खुद महसूस किया है कि आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करना और उसे दुनिया में बाँटना कितना मुश्किल और आभारहीन माने थैंकलेस काम है। ये काम ही ऐसा है, इसमें लोगों की गल्ती नहीं है। ये बातें अधिकांश लोगों को अब पुनः समझ में आने लग गई हैं। इसीका परिणाम है कि ब्राह्मणों के खिलाफ उक्त भड़काऊ लेखन के विरोध में सोशल मीडिया में “हैशटैग ब्राह्मण लाइफ मैटर्स” ट्रैण्ड किया। इसी तरह “हैशटैग मैं भी ब्राह्मण हूँ” भी ट्विटर पर काफी ट्रैण्ड रहा, जब क्रिकेटर सुरेश रैना के अपने आप को ब्राह्मण कहने का बहुत से वामपंथी किस्म के लोगों ने विरोध किया था। हम ये नहीं कह रहे कि सभी ब्राह्मण आदर्श हैं। पर इससे ब्राह्मणवाद को गलत नहीं ठहरा सकते। ब्राह्मणवाद ज्ञानवाद, बुद्धिवाद या अध्यात्मवाद का पर्याय है। अगर कहीं पर चिकित्सक निपुण नहीं हैं, तो उससे चिकित्सा विज्ञान झूठा नहीं हो जाता। आज जो हम इस ब्लॉग पर आध्यात्मिक ज्ञान से भरी जिन रहस्यवादी कथाओं के विश्लेषण का आनंद लेते हैं, वे अधिकांशतः ब्राह्मणों ने ही बनाई हैं। इन्हें आजतक सुरक्षित भी इन्होंने ही रखा है। अगर ब्राह्मण हमलावरों के आगे झुक जाते तो न तो हिंदु धर्म का नामोनिशान रहता और न ही इस धर्म के रहस्यमयी ग्रंथों का। क्षत्रिय भी किसके लिए लड़ते, अगर ब्राह्मण ही डर के मारे धर्म बदल देते। किसी पर मनगढंत इल्जाम लगाना आसान है, पर अपने अहंकार को नीचे रखकर सच्ची प्रशंसा करना मुश्किल। फिर कहते हैं कि ब्राह्मण विदेशों से यहाँ आकर बसे। एक तो इसके स्पष्ट प्रमाण नहीं हैं, हमला करके आने के तो बिल्कुल भी नहीं, और अगर मान लो कि वे आए ही थे, तो यहाँ प्रेम से घुलमिलकर यहाँ की सरजमीं के सबसे बड़े रखवाले और हितैषी सिद्ध हुए। इसमें बुरा क्या है। हाँ, यह जरूर है कि जिस कुंडलिनी योग के आधार पर बने शास्त्रों और उनकी परम्पराओं का वे निर्वहन करते हैं, उसे वे समझें, प्रोत्साहित करें और हठधर्मिता छोड़कर उसके खिलाफ जाने से बचें।
विश्व के सभी धर्म और सम्प्रदाय कुंडलिनी योग पर ही आधारित हैं
शिवपुराण में भगवान शिव कहते हैं कि वे विभिन्न युगों में विभिन्न योगियों का अवतार लेकर उन-उन युगों के वेदव्यासों की वेद-पुराणों की रचना में सहायता करते हैं। वे लगभग 5-6 पृष्ठ के दो अध्यायों में यही वर्णन करते हैं कि किस युग में कौन वेद व्यास हुए, उन्होंने किस योगी के रूप में अवतार लेकर उनकी सहायता की और उनके कौन-कौन से शिष्य हुए। इससे स्पष्ट हो जाता है कि ध्यान योग माने कुंडलिनी योग ही सनातन धर्म की रीढ़ है। मुझे तो अन्य सारे धर्म सबसे प्राचीन सनातन धर्म की नकल करते हुए जैसे ही लगते हैं। इससे यह भी सिद्ध हो जाता है कि सभी धर्म योग पर ही आधारित हैं, और योग को सरल, लोकप्रिय व व्यावहारिक बनाने का काम करते हैं। जब सबसे योग ही हासिल होता है, तो क्यों न सीधे योग ही किया जाए। अन्य धर्म भी यदि साथ में चलते रहे, तो भी कोई बुराई नहीं है, बल्कि योग के लिए फायदेमंद ही है।
ध्यान ही सबकुछ है
साथ में महादेव शिव कहते हैं कि ध्यान के बिना कुछ भी संभव नहीं है। वे कहते हैं कि केवल ध्यान से ही मोक्ष मिल सकता है, यदि ध्यान न किया तो सारे शास्त्र और वेदपुराण निष्फल हैं।
नए धर्म व नए योग स्टाइल बदलते दौर के साथ अध्यात्म को ढालने के प्रयास से पैदा होते रहते हैं
जमाने के अनुसार सुधार धर्म में भी होते रहने चाहिए। मतलब सुधार का मौका मिलता रहना चाहिए, यह जनता पर निर्भर करता है कि सुधार को स्वीकार करती है या नहीं। हालांकि इसके साथ षड्यंत्र से भी बचना जरूरी होगा, क्योंकि कई लोग दुष्प्रचार आदि तिकड़में लगाकर किसी घटिया सी रचना को भी बहुत मशहूर कर देते हैं। इसके लिए कोई निष्पक्ष संस्था होनी चाहिए जो रचनाओं की सही समीक्षा करके जनता को अवगत करवाती रहे। कट्टर बनकर यदि सुधार का मौका ही नहीं दोगे, तो धर्म जमाने के साथ कंधा से कंधा मिला कर कैसे चल पाएगा। सुधार का मतलब यह नहीं है कि पुरानी रचनाओं को नष्ट किया जाए। सम्भवतः इसी डर से सुधार नहीं होने देते कि इससे पुरानी रचना नष्ट हो जाएगी। पर यह सोच मिथ्या और भ्रमपूर्ण है। नए सुधारों से दरअसल पुरानी रचनाओं को बल मिलता है क्योंकि इनसे वे बाप का दर्जा हासिल करती हैं। आइंस्टीन के गुरुत्वाकर्षण के नए सिद्धांत से न्यूटन का पुराना सिद्धांत नष्ट तो नहीं हुआ। गुरुत्वाकर्षण तो वही है, बस उसको समझने के दो अलगलग तरीके हैं। इसी तरह ध्यान व अद्वैत को अध्यात्म की मूल विषयवस्तु मान लो। इसको प्राप्त कराने के लिए ही विभिन्न पुराण, मंत्र व पूजा पद्धतियाँ बनी हैं। हो सकता है कि इनमें सुधार कर के जमाने के अनुसार नई रचनाएं बन जाएं, जो इनसे भी ज्यादा प्रभावशाली हों, और ज्यादा लोगों के द्वारा स्वीकार्य हों। शरीरविज्ञान दर्शन भी एक ऐसा ही छोटा सा प्रयास है, हालांकि उसमें भी विकास की गुंजाईश है। मेरा व्यक्तिगत अनुभवरूपी शोध इसके साथ जुड़ा है। मतलब यह ऐसा दर्शन नहीं कि मन में आया और बना दिया। जब मुझे इसकी मदद से जागृति का अनुभव हुआ, तभी इस पर प्रमाणिकता की मुहर लगी। यह अलग बात है कि साथ में उस सनातन धर्म वाली सांस्कृतिक जीवनचर्या का भी योगदान रहा होगा, जिसमें मैं बचपन से पला-बढ़ा हूँ। पर इतना जरूर लगता है कि कम से कम पचास प्रतिशत योगदान शरीरविज्ञान दर्शन का रहा ही होगा। अब आम जीवन में इतना शुद्ध शोध तो कहाँ हो सकता है कि अन्य सभी सहकारी कारणों को ठुकरा कर केवल एक ही कारण के असर को परखा जाए। दरअसल एक मेरे जैसे आम आदमी के पास इतना समय नहीं होता कि ऐसे सुधारों और विकास के लिए विस्तृत शोध किया जाए। जैसे ज्ञानविज्ञान के अन्य क्षेत्रों में विशेषज्ञ व अनुभवशाली शोध-वैज्ञानिकों की सेवा ली जाती है, वैसी ही अध्यात्म के क्षेत्र में भी ली जा सकती है। इसमें बुरा क्या है। पर समस्या यह है कि समर्पित शोधार्थी से ज्यादा पार्ट टाइम या हॉबी शोधार्थी ज्यादा अच्छा काम कर सकते हैं। मतलब कि अध्यात्म रोजाना के व्यवहार से ज्यादा जुड़ा होता है। एकाकीपन के शोध से व्यावहारिक नतीजे नहीं निकलते। यह भी समस्या है कि शोध के लिए जागृत व्यक्ति कहाँ से लाए। परीक्षा लेने वाले भी जागृत ही चाहिए। जागृत व्यक्ति को ही असली लक्ष्य का पता होता है। जिसको लक्ष्य की ही पहचान नहीं है, वह उसके लिए शोध कैसे करेगा। आज तक कोई मशीन नहीं बनी जो किसी की जागृति का पता लगा सके। अध्ययन के बल पर कुछ टोटके तो कोई भी ईजाद कर सकता है, पर ज्यादा असली व प्रामाणिक तो जागृत व्यक्ति का शोध ही माना जाएगा।
पुराण व अन्य धर्म संबंधित लौकिक साहित्य शहद के साथ मिश्रित की हुई कड़वी दवाई की तरह काम करते हैं
पिछली पोस्ट में मैं बता रहा था कि कैसे राजा भागीरथ गंगा नदी के प्रवाह में आई रुकावटों को हटा रहा था। हमारे दादा उस बात को शास्त्रों का हवाला देते हुए ऐसे कहा करते थे कि भागीरथ हाथ में कुदाली को लेकर गंगा के आगे-आगे चलता रहा और उसके जलप्रवाह के लिए जमीन खोद कर रास्ता बनाता रहा, जैसे कोई किसान सिंचाई की कूहल के लिए रास्ता मतलब चैनल बनाता है। मत भूलो, शरीर में शक्ति संचालन मार्ग को भी अंग्रेजी में चैनल ही कहते हैं। शब्दावली में भी कितनी समानता है। वे खुद एक छोटे से किसान भी थे। वैसे तो आलोचक विज्ञानवादी को यह बात अजीब लग सकती है, पर इसमें एक गहरा मनोवैज्ञानिक सबक छिपा हुआ है। यह बात मनोरंजक और हौसला बढ़ाने वाली है। साथ में यह अध्यात्मवैज्ञानिक रूप से बिल्कुल सत्य भी है, जैसा कि पिछली पोस्ट में दिखाया गया है। बेशक यह बात हमें स्थूल रूप में समझ नहीं आती थी, पर हमारे अवचेतन मन पर एक गहरा प्रभाव छोड़ती थी। उसी का परिणाम है कि कालांतर में हमारे को खुद ही यह रहस्य अनुभव रूप में समझ आया। पौराणिक ऋषि बहुत बड़े व्यावहारिक मनोवैज्ञानिक होते थे। वे जानते थे कि अनपढ़ और बाह्यमुखी जनता को सीधे तौर पर गहन आध्यात्मिक तकनीकें नहीं समझाई जा सकतीं, इसीलिए वे उन तकनीकों को व्यावहारिक, रहस्यात्मक और मनोरंजक तरीके से प्रकट करते थे, ताकि वे अवचेतन मन पर गहरा असर डालती रहें, जिससे आदमी धीरेधीरे उनकी तरफ बढ़ता रहे। सहज पके सो मीठा होय। एकदम से पकाया हुआ फल मीठा नहीं होता। ऐसी मिथकीय कथाओं पर लोगों की अटूट आस्था का ही परिणाम है कि वे आज तक समाज में प्रचलित हैं। किसीसे अगर पूछो कि उसे इन कथाओं से क्या लाभ मिला, तो वह पुख्ता तौर पर कुछ नहीं बता पाएगा, पर उन्हें पूजनीय व अवश्य पढ़ने योग्य जरूर कहेगा। कई कथाएं ऋषियों ने जानबूझ कर ऐसी बनाई हैं कि उनका रहस्योद्घाटन नहीं किया जा सकता। अगर सभी कुछ का पता चल गया तो विश्वास करने के लिए बचेगा क्या। ऋषि विश्वास और सस्पेंस की शक्ति को पहचानते थे। होता क्या है कि जब कुछ कथाओं के रहस्य से परदा उठता है, तो अन्य कथाओं की सत्यता पर भी विश्वास हो जाता है। वैसे गैरजरूरी कथाओं को उजागर करना ही नामुमकिन लगता है। जो कथा-रहस्य जितना ज्यादा जरूरी है, उसे उजागर करना उतना ही आसान है। वैसे धर्म के बारे ज्यादा कहने का मुझे बिल्कुल शौक नहीं है, पर कई बारे सीमित रूप में कहना पड़ता है, क्यकि अध्यात्म को धर्म के साथ बहुत पक्के से जोड़ा गया है, और कई बारे इनको अलग करना मुश्किल हो जाता है।आज जब विभिन्न धर्मों के बीच इतना अविश्वास बढ़ गया है, तो यह जरूरी हो गया है कि उनका आध्यात्मिक व वैज्ञानिक रूप में वर्णन करके विरोधियों की शंका दूर कर दी जाए।
मित्रो, मैं इस पोस्ट में शिवपुराण में वर्णित राक्षस अंधकासुर, दैत्यगुरु शुक्राचार्य, देवासुर संग्राम और शिव के द्वारा देवताओं की सहायता का रहस्योदघाटन करूंगा।
शिवपुराणोक्त अन्धकासुर कथा
एक बार भगवान शिव पार्वती के साथ काशी से निकलकर कैलाश पहुंचते हैं, और वहाँ भ्रमण करने लगते हैं। एकदिन शिव ध्यान में होते हैं कि तभी देवी पार्वती पीछे से आकर उनके मस्तक पर हाथ रखती हैं, जिससे शिव के माथे की गर्मी से उनकी अंगुली से एक पसीने की बूंद जमीन पर गिर जाती है। उससे एक बालक का जन्म होता है, जो बहुत कुरूप, रोने वाला और अंधा होता है। इसलिए उसका नाम अंधकासुर रखा जाता है। उधर राक्षस हिरण्याक्ष पुत्र न होने से बहुत दुखी रहता है। वह शिव को प्रसन्न करने के लिए घोर तप करता है, और उनसे पुत्र-प्राप्ति का वर मांगता है। शिव अंधक को उसे सौंप देते हैं। वह शिवपुत्र अंधक की प्राप्ति से अति प्रसन्न और उत्साहित होकर स्वर्ग पर चढ़ाई कर देता है, जिससे देवता स्वर्ग से भागकर धरती पर छिप कर रहने लगते हैं। वह धरती को समुद्र में डुबोकर पाताल लोक में छुपा देता है। फिर भगवान विष्णु देवताओं की सहायता करने के लिए वाराह के रूप में अवतार लेकर हिरण्याक्ष को मार देते हैं और धरती को अपने दाँतों पर रखकर पाताल से ऊपर उठाकर पूर्ववत यथास्थान रख देते हैं। उधर बालक अंधक जब अपने भाई प्रह्लाद आदि अन्य राक्षस बालकों के साथ खेल रहा होता है, तो वे उसे यह कह कर चिढ़ाते हैं कि वह अंधा और कुरूप है इसलिए वह अपने पिता हिरण्याक्ष की जगह राजगद्दी नहीं संभाल सकता। इससे अन्धक दुखी होकर भगवान शिव को खुश करने के लिए घोर तप करने लगता है। वह धुएं वाली अग्नि को पीता है, अपने मांस को काटकाट कर हवनकुण्ड में हवन करता है। इससे वह हड्डी का कंकाल मात्र बच जाता है। शिवजी उससे प्रसन्न होकर उसके मांगे वर के अनुसार उसे बिल्कुल स्वस्थ व आँखों वाला कर देते हैं, और कहते हैं कि वह केवल तभी मरेगा जब किसी महान योगी की पतिव्रता स्त्री को अपनी स्त्री बनाने का प्रयास करेगा। वर से खुश और दंभित होकर अन्धक उग्र भोगविलास में डूब जाता है, अनेकों कामिनियों के साथ विभिन्न रतिवर्धक स्थानों में रमण करता है, और अपनी आयु का दुरुपयोग करता है। वह साधुओं और देवताओं पर भी बहुत अत्याचार करता है। वे सब इकट्ठे होकर भगवान शिव के पास जाते हैं। शिव उनकी मदद करने के लिए कैलाश पर पार्वती के साथ विहार करने लगते हैं। एकदिन अन्धक के सेवक की नजर देवी पार्वती पर पड़ती है, और वह यह बात अन्धक को बताता है। अंधक पार्वती पर आसक्त होकर शिव को गंदा तपस्वी, जटाधारी आदि कह कर उनका अपमान करता है और कहता है कि उतनी सुंदर नारी उसी के योग्य है, न कि किसी तपस्वी के। फिर वह सेना के साथ शिव से युद्ध करने चला जाता है। उसे शिव का गण वीरक अकेले ही युद्ध में हरा कर भगा देता है, और उसे शिवगुफा के अंदर प्रविष्ट नहीं होने देता। फिर शिव पाशुपत मंत्र प्राप्त करने के लिए दूर तप करने चले जाते हैं। मौका देखकर अंधक फिर हमला करता है। पार्वती अकेली होती है गुफा में। उसे वीरक भी नहीं रोक पा रहा होता है। डर के मारे पार्वती सभी देवताओं को सहायता के लिए बुलाती है, जो फिर स्त्री रूप में अस्त्रशस्त्र लेकर पहुंच जाते हैं। स्त्री रूप इसलिए क्योंकि देवी के कक्ष में पुरुष रूप में जाना उन्हें अच्छा नहीं लगता। घोर युद्ध होता है। अंधक का सैनिक विघस सूर्य चन्द्रमा आदि देवताओं को निगल जाता है। चारों ओर अंधेरा छा जाता है। हालांकि वे किसी दिव्य मंत्र के जाप से उसके मुंह में घूँसे मारकर बाहर भी निकल आते हैं। तभी शिव भी वहाँ पहुँच जाते हैं। उससे उत्साहित गण राक्षसों को मारने लगते हैं। पर राक्षस गुरु शुक्राचार्य अपनी संजीवनी विद्या से सभी मृत राक्षसों को पुनर्जीवित कर देते हैं। शिव को यह बात शिवगण बता देते हैं कि शुक्राचार्य उनकी दी हुई विद्या का कैसे दुरूपयोग कर रहा है। इससे नाराज होकर शिव उसे पकड़ कर लाने के लिए नंदी बैल को भेजते हैं। नंदी राक्षसों को मारकर उसे पकड़कर ले आता है। शिव शुक्राचार्य को निगल जाते हैं। वह शिव के उदर में बाहर निकलने का छेद न पाकर चारों तरफ ऐसे घूमता है, जैसे वायु के वेग से घूम रहा हो। वह वहाँ से निकलने का वर्षों तक प्रयास करता है, पर निकल नहीं पाता। फिर शिव उसे शुक्र अर्थात वीर्य रूप में अपने लिंग से बाहर निकालते हैं। इसीलिए उनका नाम शुक्राचार्य पड़ा।
दरअसल संजीवनी विद्या उन्हें एक बहुत पुराने समय में शिव ने दी होती है। वह एक बहुत सुंदर स्थान पर शिव का लिंग स्थापित करते हैं। उस पर वे शिव की कठिन अराधना करते हैं। अग्निधूम को पीते हैं, और कठिन तप करते हैं। उससे शिव लिंग से प्रकट होकर उन्हें संजीवनी विद्या देते हैं, और वर देते हैं कि वे भविष्य में उनके उदर में प्रविष्ट होकर उनके वीर्य रूप में जन्म लेंगे। वे लिंग का नाम शुक्रेश और उनके द्वारा स्थापित कुएँ का नाम शुक्रकूप रख देते हैं। वे भक्तों द्वारा उस कूप में स्नान करने का अमित फल बताते हैं।
अंधकासुर कथा का कुंडलिनी-आधारित विश्लेषण
शुक्र मतलब ऊर्जा या तेज। शुक्र, ऊर्जा और तेज तीनों एकदूसरे के पर्याय हैं। शुक्राचार्य को निगल गए, मतलब योगी शिव ने खेचरी मुद्रा में जिह्वा तालु से लगाकर कुंडलिनी ऊर्जा को आगे के नाड़ी चैनल से नीचे उतारा, जिससे वीर्यशक्ति के रूपान्तरण से निर्मित कुंडलिनी ऊर्जा मूलाधार चक्र से पीठ की सुषुम्ना नाड़ी से होते हुए ऊपर चढ़ गई। वायु के वेग से वे इधरउधर भटकने लगे, मतलब साँसों की गति से कुंडलिनी ऊर्जा माइक्रोकोस्मिक औरबिट लूप में गोल-गोल घूमने लगी। शुक्राचार्य को बहुत समय तक घुमाने के बाद योगी शिव ने उन्हें वीर्य मार्ग से बाहर निकाल दिया, मतलब बहुत समय तक शक्ति को चक्रोँ में घुमाते हुए व उससे चक्रोँ पर इष्ट देव या गुरु आदि के रूप में कुंडलिनी चित्र का ध्यान करने के बाद जब वह शक्ति क्षीण होने लगी मतलब शुक्राचार्य शिथिल पड़ने लगे, तब उसे वीर्यरूप में बाहर निकाल दिया। उन्हें योगी शिव ने पुत्र रूप में स्वीकार किया, मतलब कि जिसे ओशो महाराज कहते हैं, ‘संभोग से समाधि’, वह तरीका अपनाया। इस यौनतंत्र में सहस्रार चक्र के समाधि चित्र को स्खलन-संवेदना के ऊपर आरोपित किया जाता है। इससे वही बात हुई जैसी एक पिछली पोस्ट में लिखी गई है कि गंगा नदी के किनारे पर उगी सरकंडे की घास पर शिववीर्य से बालक कार्तिकेय का जन्म हुआ, मतलब शुक्राचार्य ने कार्तिकेय के रूप में शिवपुत्रत्व प्राप्त किया। उपरोक्त कथा के ही अनुसार सबसे प्रसिद्ध, प्रिय व शक्तिशाली लिंग शुक्रलिंग ही माना जाएगा, क्योंकि यह पूरी तरह से असली है, अन्य तो प्रतीतात्मक ज्यादा हैं, जैसे कोई पाषाणलिंग होता है, कोई पारदलिंग, तो कोई हिमलिंग आदि। शुक्रकूप आसपास में एक ठंडे जल का कुआँ है, जो संभोगतंत्र में सहयोगी है, क्योंकि जैसा एक पिछली पोस्ट में दिखाया गया है कि कैसे ठंडे जल से स्नान यौनऊर्जा को गतिशील व कार्यशील बनाने का काम करता है।
शुक्राचार्य जो राक्षसों को जिन्दा कर रहे थे, उसका यही मतलब है कि वीर्यशक्ति बाह्यगामी होने के कारण संसारमार्गी मानसिक दोषों, आसक्तिपूर्ण भावनाओं और विचारों को बढ़ावा दे रही थी। शिव ने नंदी को शुक्राचार्य को पकड़ कर लाने को कहा, इसका मतलब है कि नंदी अद्वैत भाव का परिचायक है क्योंकि वह एक ऐसा शिवगण है जिसमें बैल के रूप में पशु और गण के रूप में मनुष्य एक साथ विद्यमान है। वह एक यिन-यांग मिश्रण है। अद्वैत से कुंडलिनी शक्ति को मूलाधार से ऊपर चढ़ने में मदद मिलती है।
देवी पार्वती ने महादेव शिव की आँखें बंद कीं, इससे वे अंधे जैसे हो गए। इसको यह समझाने के लिए कहा गया है कि कोई भावी योगी अज्ञान वाली अवस्था में था, न तो उसे लौकिक व्यवहार का ज्ञान था, और न ही आध्यात्मिक ज्ञान। फिर वह इश्कविश्क़ के चक्कर में पड़ गया। उससे उसकी शक्ति तो घूमने लगी, पर वह बिना कुंडलिनी चित्र के थी। कुंडलिनी चित्र माने ध्यान चित्र आध्यात्मिक ज्ञान की उच्चावस्था में बनता है। आध्यात्मिक ज्ञान लौकिक ज्ञान व अनुभव के उत्कर्ष से प्राप्त होता है। ऐसा होने में जीवन का लम्बा समय बीत जाता है। ज्ञानविज्ञानरहित प्यार-मोहब्बत से क्या होता है कि आदमी यौन शक्ति को ढंग से रूपान्तरित और निर्देशित नहीं कर सकता, जिससे उसका क्षरण या दुरुपयोग होता है। वही दुरुपयोग अंधक नाम वाला पुत्र है। इसका सीधा सा अर्थ है कि अमुक भावी योगी ने शक्ति को घुमाया तो जरूर। ऐसा उक्त कथानक की इस बात से सिद्ध होता है कि पार्वती ने दोनों नेत्रों को एकसाथ बंद किया, मतलब यिन-यांग संतुलित हो गए। पर परिपक्वता की कमी से इस संतुलन से किंचित चमक रहे कुंडलिनी चित्र को समझ नहीं पाया और उसे जानबूझकर व्यर्थ समझ कर त्याग दिया। चमक बुझने से स्वाभाविक है कि अंधेरा छा गया, जिसे आँखों को बंद करने के रूप में दिखाया गया है। क्योंकि शक्ति से मस्तिष्क में जो उच्च स्पष्टता के साथ छवि बनती है, उसे ही पुत्र कहा जाता है, जैसे कि इस ब्लॉग की एक पोस्ट में सिद्ध भी किया गया था। बिना किसी भौतिक सहवास के असली या भौतिक पुत्र तो पैदा हो ही नहीं सकता, वह भी मिट्टी-पत्थर से भरी जमीन के ऊपर या सरकंडों के ऊपर। क्योंकि इस पोस्ट के भावी योगी के मस्तिष्क में उस शक्ति से अंधेरा ही घनीभूत हुआ, इसलिए उसे पुत्र अंधक के रूप में दिखाया गया। चूंकि अँधेरे से भरा व्यक्ति किसी को प्रिय व कार्यक्षम नहीं लगता, इसलिए इसे ऐसा दिखाया गया है कि वह अंधकासुर सबको अप्रिय था और उसके बालमित्र उसे राजगद्दी के अयोग्य बताकर उसका मजाक उड़ाते थे। स्वाभाविक है कि भावी योगी दुनिया में सम्मान, सुखसमृद्धि और यहाँ तक कि जागृति के रूप में सम्पूर्णता को प्राप्त करने के लिए भरपूर प्रयास करता है, क्योंकि उसमें बहुत शक्ति होती है, केवल स्थिर ध्यानचित्र की ही कमी होती है। उसे दुनिया में ठोकरें खाने के बाद इस कमी का अप्रत्यक्ष अहसास हो ही जाता है, इसलिए वह कुंडलिनी ध्यानयोग के लिए एकांत में चला जाता है। इसे ही ऐसे दिखाया गया है कि अंधक फिर वन में जाकर शिव या ब्रह्मा का ध्यान करते हुए घोर तप करता है। अपने मांस को टुकड़ों में काटकाट कर वह उन्हें अग्नि में होम करता रहता है। साथ में अग्निधूम का पान करता है। इसका मतलब है कि भावी योगी कठिन हठयोग करता है, जिससे उसकी अतिरिक्त चर्बी तो घुलती ही है, साथ में मांसल शरीर भी योगाग्नि से जलकर दुबला हो जाता है। इस दहन से जो कार्बन डायक्साइड गैस निकलती है, उसे ही धुआँ कहा है। क्योंकि योग में अक्सर सांस को अंदर रोक कर रखा जाता है, इसलिए उसे ही धुएं को पीना कहा गया है। जब वह इतना कमजोर हो जाता है कि वह हड्डी का ढांचा जैसा दिखने लगता है, तब भगवान शिव उसे दर्शन दे देते हैं। इसका मतलब है कि जब हठयोगाभ्यास करते हुए काफी समय हो जाता है, जिससे योगी को अपने सहस्रार चक्र में बढ़ी हुई सात्विकता के कारण अपना शरीर अस्थिपंजर की तरह हल्का लगने लगता है, तब कुंडलिनी जागृत हो जाती है। मतलब अदृश्य या सुप्त कुंडलिनी शक्ति मानसिक शिवचित्र के रूप में जागृत हो जाती है। अब शिव अंधक को बिल्कुल स्वस्थ व सुंदर बना देते हैं। ठीक है, कुंडलिनी जागरण से ऐसा ही अकस्मात और सकारात्मक रूपान्तरण होता है। अब वह शिव से वर मांगता है कि वह कभी न मरे। शिव कहते हैं कि ऐसा सम्भव नहीं। विश्व की रक्षा के लिए भी यह जरूरी है। अमरता पाकर तो कोई भी अत्याचारी बनकर दुनिया को तबाह कर सकता है, क्योंकि उसे रोकने व डराने वाला कोई नहीं होगा। इसलिए ब्रह्मा उससे कोई न कोई मौत का कारण चुनने को कहते हैं, बेशक वह असम्भव सा ही क्यों न लगे। इस पर ब्रह्मा कहते हैं कि जब वह माँ के समान आदरणीय महिला को पत्नि बनाना चाहेगा, वह तब मरेगा। अब ये तंत्र की गूढ़ बातें हैं, जिनके यदि रहस्य से पर्दा उठाया जाए, तो आम जनमानस को अजीब लग सकता है। तिब्बतन यौनतंत्र में गुरु की यौनसाथी उनकी अनुमति से उनके शिष्यों को तांत्रिक यौनकला प्रयोगात्मक रूप में सिखाती है। गुरुपत्नि को माँ के समान माना गया है। मतलब कि तांत्रिक यौनयोग सीखने के बाद अंधक अंधी दुनियादारी से उपरत होकर अपनी आत्मा या अपने आप में शांत हो जाएगा, मतलब वह एक प्रकार से मर जाएगा। बाद में हुआ भी वैसा ही, मरने के बाद उसे शिव ने अपना गण बना लिया, मतलब वह मुक्त हो गया। आम मृत्यु के बाद तो कोई मुक्त नहीं होता। इसका एक मतलब यह भी है कि जब विवाह या सम्भोग के अयोग्य सम्मानित नारी से प्यार होता है, तब उसका रूप बारबार मन में आने लगता है, जिससे वह समाधि का रूप ले लेता है, जैसा कि प्रेमयोगी वज्र के साथ भी हुआ था। ब्रह्मा के वर को पाकर अन्धक राजा बन गया, और बहुत अय्याश हो गया। सुंदर व सुडोल शरीर तो उसे मिला ही था, इसलिए वह अनगिनत कामिनियों के साथ विभिन्न मनोहर स्थानों में रमण करते हुए अपना बहुमूल्य समय नष्ट करने लगा। इस यौन शक्ति के बल से वह बहुत पाप भी करने लगा। देवताओं को स्वर्ग से भगा कर वहाँ खुद राज करने लगा। जब कोई बुरे काम करेगा तो शरीर रूपी स्वर्ग में स्थित देवता दुखी होकर भागेंगे ही, क्योंकि देवताओं का मुख्य उद्देश्य है शरीर से अच्छे काम करवाना। अब मैं इससे जुड़ी हाल की घटना बताता हूँ और फिर पोस्ट को खत्म करता हूँ क्योंकि नहीं तो यह बहुत लंबी होकर पढ़ने में मुश्किल हो जाएगी। अगले हफ्ते तक शेष कथा के रहस्य को उजागर करने की कोशिश करूंगा, क्योंकि अभी मैं लगभग इतना ही समझ सका हूँ। हो सकता है कि आप मेरे से पहले उजागर कर दें, यदि ऐसा है तो कमेंट बॉक्स में जरूर लिखना।
आफताब-श्रद्धा से जुड़ा बहुचर्चित लवजिहाद काण्ड
आजकल बहुचर्चित आफताब पूनावाला से संबंधित मर्डर मिस्ट्री उपरोक्त अंधक कथा से बहुत मेल खा रही है। सूत्रों के अनुसार वह मुस्लिम युवक श्रद्धा नामक हिंदु लड़की के साथ लिव इन रिलेशनशिप में था। वह डेटिंग ऐप के माध्यम से अपना घरपरिवार छोड़कर उसके साथ लम्बे अरसे से रह रही थी। कई मकान मालिकों को तो वह उसे अपनी पत्नि तक बता कर साथ रखता था, क्योंकि यहाँ के परिवेश में लिव इन रिलेशनशिप को अच्छा नहीं समझा जाता। चोरी छुपे उसके 20 अन्य हिंदु लड़कियों के साथ भी प्रेमसंबंध थे। श्रद्धा को शायद यह बात पता चली होगी और वह उसे ऐसा करने से रोककर उससे शादी करना चाहती होगी। इसको लेकर झगड़े भी हुए और मारपीट भी। अंततः उसने उसका गला दबाकर हत्या कर दी और बिना अफ़सोस के उसके पेंतीस टुकड़े करके उन्हें फ्रिज में पैक कर दिया। धीरेधीरे करके वह उन्हें निकट के जंगल में फ़ेंकता रहा। छः महीने बाद श्रद्धा के पिता द्वारा लिखी शिकायत के बाद पुलिस उसे पकड़ सकी। यहाँ यह ध्यान देने योग्य बात है कि आज की तथाकथित आधुनिक महिलाओं को प्रसन्न करने के लिए कैसे आफताब की तरह शातिर, बेईमान, नशेड़ी, धूम्रपानी, मांसभक्षी, हिंसक और धोखेबाज बनना पड़ता है, हालाँकि ऐसे अतिवाद को कोई सभ्य व पढ़ालिखा समाज कभी बर्दाश्त नहीं कर सकता, जिसमें मानवता का हनन होता हो। दूसरी ध्यान देने योग्य बात यह है कि बहुत से हिन्दुओं द्वारा शिवपुराण का कहीं गलत अर्थ तो नहीं निकला जा रहा, या बिना जानेबूझे कहीं वैसी विकृत सोच अवचेतन मन में तो नहीं बैठी हुई है। पुराण से प्राप्त आम धारणा के अनुसार महादेव शिव बिना कुलपरम्परा वाले एक भूतिया किस्म के आदमी थे, जिनको पति रूप में पाने के लिए पार्वती कई जन्मों तक घरपरिवार को छोड़कर भटकती रही। पति-पत्नि के परस्पर प्रेम को परवान चढ़ाने के लिए कुछ हद तक ऐसा पागलपन ठीक भी है, पर वह भी कुछ जरूरी शर्तों के साथ ही पूरा सफल होता है, और वैसे भी अति तो कहीं भी अच्छी नहीं है, ख़ासकर उस कौम के व्यक्ति के साथ तो बिल्कुल भी संबंध अच्छा नहीं है, जिनके तथाकथित लवजिहाद से जुड़े जालिमपने और जाहिलियत के उदाहरण आए दिन मिलते रहते हैं। सब पता होते हुए भी बारम्बार गलती करना तो ऐसा लगता है कि या तो परिवार में बच्चों को सही व संस्कारपूर्ण शिक्षा नहीं दी जा रही या ऐसी लड़कियों के ऊपर जादूटोना कर दिया गया है, या यह हिन्दुओं के पवित्र और ज्ञानविज्ञान से भरे शास्त्रों और पुराणों को बदनाम करने की एक सोचीसमझी और बहुत बड़ी साजिश चल रही है। कई लोग सख्त कानून की कमी को भी मुख्य वजह बता रहे हैं। कुछ लोग विकृत दूरदर्शन, ऑनलाइन व बॉलीवुड कल्चर को भी बड़ी वजह मानते हैं। कई लोग लिव इन रिलेशनशिप और डेटिंग एप्स को दोष दे रहे हैं। इससे हिंदु पुरुषों को भी शिक्षा लेनी चाहिए और महिलाओं की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की कोशिश करनी चाहिए। जिसके अंदर ध्यान-कुंडलिनी चित्र नहीं है, यदि वह भी यौनतंत्र का अभ्यास करे, तो उसका हाल भी अंधक जैसा हो सकता है, जैसा आपने ऊपर पढ़ा, फिर यदि जिसको यौनतंत्र का कखग भी पता नहीं, यदि वह यौनसंबंधों के मामले में मनमर्जी करे, तो उसका उससे भी कितना बुरा हाल हो सकता है, यह उपरोक्त हाल की घटना से प्रत्यक्ष देखने को मिल रहा है।
प्रेमरोग से बचने का बेजोड़ उपाय
दोस्तों, इस समस्या का हल भी है। सौभाग्य से आज “शरीरविज्ञान दर्शन~एक आधुनिक कुंडलिनी तंत्र(एक योगी की प्रेमकथा)” नामक पुस्तक ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरह से उपलब्ध है। यह ईबुक के रूप में भी और प्रिंट पुस्तक के रूप में भी उपलब्ध है। इसमें ऐसा लगता है कि शिवपुराण का विवेचन आधुनिक शैली में किया गया है, जो हर किसी को समझ आ जाए, और उसके बारे में गलतफहमी दूर हो जाए। यह सत्य जीवनी और सत्य घटनाओं पर आधारित है। इसमें आधारभूत यौनयोग पर सामाजिकता के साथ प्रकाश डाला गया है। इस पुस्तक में स्त्री-पुरुष संबंधों का आधारभूत सिद्धांत भी छिपा हुआ है। यदि कोई प्रेमामृत का पान करना चाहता है, तो इस पुस्तक से बढ़िया कोई भी उपाय प्रतीत नहीं होता। इस पुस्तक में प्रेमयोगी वज्र ने अपने अद्वितीय आध्यात्मिक व तांत्रिक अनुभवों के साथ अपनी सम्बन्धित जीवनी पर भी थोड़ा प्रकाश डाला है। इस उपरोक्त “शरीरविज्ञान दर्शन” पुस्तक को एमाजोन डॉट इन पर एक गुणवत्तापूर्ण व निष्पक्षतापूर्ण समीक्षा में पांच सितारा, सर्वश्रेष्ठ, सबके द्वारा अवश्य पढ़ी जाने योग्य व अति उत्तम (एक्सेलेंट} पुस्तक के रूप में समीक्षित किया गया है। गूगल प्ले बुक की समीक्षा में भी इसे फाईव स्टार व शांतिदायक (कूल) आंका गया है। कुछ गुणग्राही पाठक तो यहाँ तक कहते हैं कि अगर इस पुस्तक को पढ़ लिया तो मानो जैसे सबकुछ पढ़ लिया। आशा है कि पुस्तक पाठकों की अपेक्षाओं पर खरा उतरेगी।
हम गाँवों के गबरू हैं तुम सा शहर में जीना क्या जानें। है गांव शहर में भी बसता तन से न सही मन से मानें। बस सूखी रोटी खाई है तुम सा शहद में पला नहीं। हमने न झेली न टाली ऐसी भी कोई बला नहीं। हमने न पेड़ से खाया हो फल ऐसा कोई फला नहीं। तब तक सिर को दे मारा है जब तलक पहाड़ भी टला नहीं। सिर मत्थापच्ची करते जब तुम थे भरते लंबी तानें। हम गाँवों ----- दिल-जान से बात हमेशा की तुम सी घुटन में जिया नहीं। है प्यार बाँट कर पाया भी नफ़रत का प्याला पिया नहीं। इक काम जगत में नहीं कोई भी हमने है जो किया नहीं। है मजा नहीं ऐसा कोई भी हमने हो जो लिया नहीं। फिर अन्न-भरे खेतों में खड़ के दाना-दाना क्यों छानें। हम गाँवों के ---- है इज्जत की परवाह नहीं बेइज्जत हो कर पले बढ़े। अपनों की खातिर अपने सर सबके तो ही इल्जाम मढ़े। कागज की दुनिया में खोकर भी वेद-पुराण बहुत ही पढ़े। हैं असली जग में भी इतरा कर खूब तपे और खूब कढ़े। बस बीज को बोते जाना था कि स्वर्ण कलश मिलते न गढ़े इस सोच के ही बलबूते हम तो हर पल निशदिन आगे बढ़े। फिर छोटा मकसद ठुकरा कर हम लक्ष्य बड़ा क्यों न ठानें। हम गाँवों के ----- जो शहर न होते फिर अपनी हम काबिलियत को न पाते। रहते अगर न वहाँ तो क्या है घुटन पता कैसे पाते। न लोकतंत्र से जीते गर ये नियम-व्यवस्था न ढाते। फिर बेर फली तरु न भाते गर भेल पकौड़े न खाते। हम साइलेंट जोन में न बसते तो घाट मुरलिया न गाते। हम रिमझिम स्नान भी न करते गर नगर में न तनते छाते। है रात के बाद सुबह आती तम से ही लौ दमखम पाती। है सुखदुख का चरखा चलता वह न देखे जाति-पाति। फिर अहम को अपने छोड़ के हम यह सत्य नियम क्यों न मानें। हम गाँवों ---- है ढोल-गंवार यही कहते बस तुलसी ताड़न-अधिकारी। है अन्न उगाता जो निशदिन वो कैसे है कम अधि-कारी। जो दुनिया की खातिर जाता हो खेतों पर ही बलिहारी। वो कम कैसे सबसे बढ़कर वो तो मस्ती में अविकारी। फिर ऊंच-नीच ठुकरा क्यों न हम इक ही अलख को पहचानें। हम गाँवों ---