कुंडलिनी योग उन्नत अनुभूति को बेसिक कॉग्निशन मतलब बुनियादी अनुभूति में बदलता है

दोस्तों, आदमी एक उन्नत प्राणी है। इसमें उन्नतम कॉग्निशन विद्यमान है। पर उन्नत कॉग्निशन का एक दुष्प्रभाव यह है कि इससे आसक्ति पैदा हो जाती है, जिससे आदमी इससे बंध जाता है। यह ऐसे ही है जैसे जीवन रक्षक दवा सबसे ज्यादा मददगार भी होती है, पर उसका दुष्प्रभाव भी सबसे ज्यादा होता है।

हमारे शरीर की सभी कोशिकाओं में बेसिक कॉग्निशन अर्थात बुनियादी अनुभूति होती है। इसी तरह सभी निम्नतम और सूक्ष्मतम जीवों में भी बेसिक कॉग्निशन होती है। ये सभी, वातावरण के अनुसार अपने को ढालते हैं। जीवित रहने के लिए हमारी तरह ही जीवनचर्या करते हैं। नई चीजें सीखते हैं, और पुरानी चीजों को याद रखते हैं। पर इसके लिए उनमें दिमाग जैसी संरचना नहीं देखी गई है, अभी तक। मतलब कि वे विभिन्न व अनगिनत रासायनिक क्रियाओं की श्रृंखलाओं से नियंत्रित होते हैं। तो क्यों ना उन रासायनिक क्रियाओं को ही उनका दिमाग मान लें। हमारा दिमाग भी तो रासायनिक क्रियाओं से ही चलता है। हो सकता है कि पत्थर, हवा जैसे निर्जीव पदार्थों में भी इससे कमतर स्तर की बेसिक कॉग्निशन हो, जिसे विज्ञान अभी तक समझ नहीं पाया हो। हवा का प्रवाह वातावरण के दबाव से नियंत्रित होता है। तो क्यों ना वायुदाब को हवा का बेसिक कॉग्निशन माना जाए। इसी तरह हर बार एक खास वायुदाब पर हवा की एक खास प्रतिक्रिया होती है। तो क्यों ना इसे वायुदाब की स्मरणशक्ति माना जाए। बेसिक कॉग्निशन के साथ अच्छे और बुरे की भावना नहीं होती। जैसे कि किसी स्थान पर कम वायुदाब होने से हवा का वहां पर प्रविष्ट होना हवा को अच्छा अनुभव नहीं देता। ना ही वहां उच्च वायुदाब होने पर वहां से हवा का रुखसत होना हवा को बुरा अनुभव देता है। इसी तरह जीवाणु को भोजन का कण प्राप्त होने पर खुशी नहीं होती और शत्रु का सामना होने पर उसे दुख नहीं होता। मतलब कि बेसिक कॉग्निशन के साथ राग, द्वेष नहीं होता। वहीं पर उच्च कोगनिशन में वह बीच वाली समान अवस्था राग और द्वेष में बदल जाती है। वैसे ही जैसे एक न्यूट्रॉन एक पॉजिटिव प्रोटॉन और एक नेगेटिव इलेक्ट्रॉन में रूपांतरित हो जाता है। जब दोनों को मिलाया जाए तो फिर से न्यूट्रल न्यूट्रॉन बन जाता है। प्लस और माइनस के चार्ज को अलग-अलग रहते नष्ट नहीं किया जा सकता। यह दोनों तभी नष्ट होंगे, जब आपस में मिलेंगे। इसी तरह हम राग को और द्वेष को अलग, अलग रखकर खत्म नहीं कर सकते। अगर राग और द्वेष को आसक्ति से बनाकर रखेंगे, तो ये अलग-अलग बने रहेंगे और मजबूत होते रहेंगे। जब राग पैदा होगा तो कहीं न कहीं द्वेष भी जरूर पैदा होगा, क्योंकि ये भी विद्युत चार्ज की तरह जोड़ों में पैदा होते हैं, अकेले नहीं। अनासक्ति ही वह सरकट है, जो पॉजिटिव राग और नेगेटिव द्वेष को आपस में जोड़ कर दोनों को खत्म कर देती है। पॉजिटिव को यांग कह लो, और नेगेटिव को यिन कह लो। इनका मिलन ही बहुचर्चित संगम है, अद्वैत है।

कॉग्निशन का विकास एक आवश्यक बुराई की तरह है। जब आदमी केवल हवा, पानी या सूक्ष्म जीव के रूप में था, तब तक उसमें बेसिक कॉग्निशन थी। उसमें न राग था, न द्वेष था। वह तटस्थ होता था। वह न सुखी था, न दुखी था। पर जैसे-जैसे कॉग्निशन विकसित हुई, उसे अच्छे और बुरे का अनुभव होने लगा। इससे उसमें सुख-दुख की उत्पत्ति हुई। जीवन, मरण की उत्पत्ति हुई। पहले ना वह जीता था, ना मरता था। शायद यही वह अनिर्वचनीय मुक्ति है, जिसे पाने की बात वेदों में कही गई है। उसमें ना प्रकाश था, न अंधकार था। मतलब उसमें कुछ भी द्वंद्व नहीं थे। उस स्थिति को ऐसे भी समझ सकते हैं कि उस स्थिति में सब द्वंद्व एकसाथ थे। न्यूट्रॉन में प्रोटोन और इलेक्ट्रॉन दोनों होते हैं, फिर भी दोनों ही नहीं होते। इसी तरह कहते हैं कि परमात्मा में सब कुछ है भी और नहीं भी है।

अब जो वेदों में ब्रह्मांड का वर्णन मानव समाज के जैसा है, और उसमें विभिन्न चेतन देवताओं और राक्षसों आदि का वर्णन भी बिल्कुल मानव समाज के लोगों की की तरह ही है, वह दरअसल बेसिक कॉग्निशन की तरफ लौटने का प्रयास ही लगता है। इसी तरह तंत्र आधारित शरीर विज्ञान दर्शन में जो शरीर का वर्णन ब्रह्मांड और मानव समाज की तरह है, वह भी उसी आदिम बेसिक कॉग्निशन को प्राप्त करने का प्रयास है। दोनों की थीम एक ही है, पर शरीरविज्ञान दर्शन ज्यादा समकालीन और वैज्ञानिक लगता है। हालांकि दोनों ही तरीके एकदूसरे का साथ होने पर ज्यादा अच्छे से काम करते हैं। एक पिछली पोस्ट के अनुसार कुंडलिनी योग से शरीर विज्ञान दर्शन पुष्ट होता है। इसका मतलब है कि कुंडलिनी योग से आधारभूत अर्थात शुद्ध अनुभूति पुष्ट होती है।

तो क्या हम केवल इलेक्ट्रॉन और प्रोटॉन का ही अस्तित्त्व मानेंगे, न्यूट्रॉन का नहीं? मतलब कि क्या हम केवल उन्नत जीवों में ही चेतना का अस्तित्त्व मानेंगे, निम्न जीवों में और जड़ पदार्थों में नहीं? मतलब साफ है कि सृष्टि में ऐसे कोई समय, स्थान और पदार्थ नहीं हैं, जिनमें चेतना नहीं है।

जाएं तो आखिर जाएं कहां~ एक भावपूर्ण कविता

है कौन यहाँ, है कौन वहाँ 
जाएं तो आखिर जाएं कहाँ।
है नीचे भीड़ बहुत भारी पर
ऊपर मंजिल खाली है।
हैं भीड़ में लोग बहुत सारे
कुछ सच्चे हैं कुछ जाली हैं।
मंजिल ऊपर तो लगे नरक सी
न दाना न पानी है।
निचली मंजिल की भांति न
उसमें अपनी मनमानी है।
है माल बहुत भेजा जाता पर
अंधा गहरा कूप वहाँ।
न यहाँ के ही न वहाँ के रह गए
पता नहीं खो गए कहाँ।
है कौन यहाँ, है कौन वहाँ
जाएं तो आखिर जाएं कहाँ।

नीचे पूरब वाले हैं पर
ऊपर पश्चिम (ही) बसता है।
ऊपर है बहुत महंगा सब कुछ
नीचे सब कुछ सस्ता है।
हैं रचे-पचे नीचे फिरते सब
ऊपर हालत खस्ता है।
बस अपनी अपनी डफली सबकी
अपना अपना बस्ता है।
हैं सारे ग्रह तारे सूने बस
धरती केवल एक जहाँ।
है कौन यहाँ, है कौन वहाँ
जाएं तो आखिर जाएं कहाँ।

अंधों का इक हाथी है हर
कोई (ही) उसका साथी है।
बहुते पकड़े हैं पूँछ तो कोई
सूंड पैर सिर-माथी है।
सब लड़ते रहते आपस में कह
मैं तो कहाँ, पर तू है कहाँ
है कौन यहाँ, है कौन वहाँ
जाएं तो आखिर जाएं कहाँ।

है कटता समय-किराया हरपल
संचित धन ही काम करे।
जा नई कमाई कोष में केवल
खर्च से वो रहती है परे।
है कैसा अजब वपार (व्यापार) है जिसका
तोड़ यहाँ न तोड़ वहाँ।
है कौन यहाँ, है कौन वहाँ
जाएं तो आखिर जाएँ कहाँ।

है नीचे रोक घुटन भारी पर
ऊपर शून्य हनेरा है।
ऊपर तो भूखे भी रहते पर
नीचे लंगर डेरा है।
है अंधा एक तो इक लंगड़ा
दोनों में कोई प्रीत नहीं।
ले हाथ जो थामे इकदूजे का
ऐसा कोई मीत नहीं।
है कैसी उल्टी रीत है कैसा
उल्टा मंजर जहाँ-तहाँ।
है कौन यहाँ, है कौन वहाँ
जाएं तो आखिर जाएँ कहाँ।

है बुद्धि तो धन है थोड़ा
पर धन है तो बुद्धि माड़ी।
है बुद्धि बिना जगत सूना
बिन चालक के जैसे गाड़ी।
बस अपने घर की छोड़ कथा हर
इक ही झांके यहाँ-वहाँ।
है कौन यहाँ, है कौन वहाँ
जाएँ तो आखिर जाएँ कहाँ।

आ~राम तो है सत्कार नहीं
सत्कार जो है आराम नहीं।
है पुष्प मगर वो सुगंध नहीं
है गंध अगर तो पुष्प नहीं।
इस मिश्रण की पड़ताल में मित्रो
भागें हम-तुम किधर कहाँ।
है कौन यहाँ, है कौन वहाँ
जाएँ तो आखिर जाएँ कहाँ।

है कर्म ही आगे ले जाता
यह कर्म ही पीछे को फ़ेंके।
है जोधा नहीँ कोई ऐसा जो
कर्म-तपिश को न सेंके।
न कोई यहाँ, न कोई वहां बस
कर्म ही केवल यहाँ-वहाँ।
है कौन यहाँ, है कौन वहाँ
जाएँ तो आखिर जाएँ कहाँ।
अनुमोदित व सर्वपठनीय भावपूर्ण कविता संग्रह

कुन्डलिनी या ध्यान-बिंदु के लिए विज्ञानवादी सोच, गहन अन्वेषण, अभ्यास, धैर्य, प्रेमपूर्ण संपर्कों, अध्ययन-चर्चाओं, और गुरु-देवताओं-महापुरुषों-अवतारों औरमन में बने उनके मानसिक चित्रों की आवश्यकता

दोस्तों, मैंने पिछली पोस्ट में कहा था कि साँसें कैसे लेनी चाहिए। इसीको थोड़ा और जारी रखते हैं। मुझे लगातार समर्पित योग करते हुए लगभग चार साल हो गए हैं। उससे पहले भी मैं लगभग 15 सालों से हल्का फुल्का योग प्रतिदिन करता आ रहा हूँ। अब जाकर मुझे लगता है कि मैं साँस लेना सीखा हूँ। वैसे अभी भी सीख ही रहा हूँ। सीखना कभी खत्म नहीं होता। कहना तो आसान है कि सांस लेने को ही योग कहते हैं। पर इसमें लम्बे अभ्यास की आवश्यकता होती है। अब समझा हूँ कि साँस भरने के बाद सांस को कुछ देर रोकने के लिए क्यों कहते हैं। पहले तो मैं इसे फिजूल का काम समझता था। दरअसल जब साँस भरने से प्राण और अपान का आपस में टकराव हो रहा होता है, तो उस टकराव को चरम तक पहुंचने के लिए थोड़ा सा वक़्त लगता है। उस समय साथ में टकराव का चिंतन भी होता रहे, तो और ज्यादा लाभ मिलता है। उससे कुंडलिनी ऊर्जा शक्तिशाली झटके के साथ ऊपर को चढ़कर आगे से नीचे उतरकर एनर्जी लूप में घूमने लगती है। वह एकदम से तरोताजा कर देती है। इसी तरह, साँस को धीरे-धीरे और लंबे समय तक अंदर भरें, ताकि प्राण और अपान अच्छे से आपस में मिल जाए। सांस को भी धीरे धीरे करके बाहर छोड़े, क्योंकि कुंडलिनी ऊर्जा को नीचे उतरते हुए समय लगता है। कुन्डलिनी भौतिक नाड़ियों में भौतिक द्रव्यों के साथ ही तो चलती है। इसलिए नाड़ियों के प्रवाह को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचने के लिए समय तो लगेगा ही। इसी तरह साँस पूरा छोड़ने के बाद जितनी देर सम्भव हो, उतनी देर सांस को रोककर रखें। इससे कुंडलिनी पूरा नीचे उतरकर स्वाधिष्ठान चक्र पर जमा हो जाती है, और जैसे ही मूलाधार को संकुचित करते हैं, वह मूलाधार को उतरकर पीठ से सहस्रार को चढ़ जाती है। वहाँ से वह साँस भरते समय प्राण के साथ लगभग हृदय चक्र तक नीचे उतरती है। वहां वह नीचे से आ रहे अपान से टकराकर तेज चमकने लगती है। फिर जब सांस छोड़ते समय छाती व पेट नीचे को उतरते हैं, तो वह भी नीचे उतरकर स्वाधिष्ठान चक्र पर पहुंच जाती है। फिर से वही पिछली प्रक्रिया रिपीट होती है। इस तरह से एक ऑटोमेटिक मशीन की तरह यह कुंडलिनी चक्र चलता रहता है, और आदमी आनन्द में मग्न रहता है। उलटी जीभ को नरम तालु से टच करके रखने से प्रवाह ज्यादा अच्छा हो जाता है। पेट व छाती को ऊपर नीचे जाते देखते हुए ध्यान करने में अतिरिक्त सहायता मिलती है। कई लोग तो कुन्डलिनी को नाभि और मूलाधार के बीच में ही घुमाते रहते हैं। कई बार ऐसी परिस्थितियां या शरीर के ऐसे पोस्चर होते हैं, जिसमें पेट से न चलकर साँस छाती से चलती है। उस समय साँस भरने पर छाती फूलती है, जो कुंडलिनी मिश्रित अपान को नीचे से ऊपर खींचती है। अंदर जाती हुई साँस के साथ कुंडलिनी मिश्रित प्राण ऊपर से नीचे छाती तक उतर जाता है। छाती में दोनों के टकराव से वहाँ कुंडलिनी ज्यादा स्पष्ट हो जाती है, और साथ में थकान से पैदा तनाव भी दूर हो जाता है। इसी तरह, कई बार अंदर जाती साँस से छाती और पेट दोनों एकसाथ आगे को फूलते हैं। इससे भी कुंडलिनी ऊर्जा पर अच्छा खिंचाव बनता है।

कुंडलिनी सुषुम्ना से ही ऊपर चढ़ती है, यद्यपि अन्य नाड़ियाँ भी इसमें सहयोग करती हैं

जब मेरी पीठ से कुंडलिनी ऊर्जा ऊपर चढ़ती है, तो मैं उसे रोकता नहीं, बेशक वह किसी भी नाड़ी पर या स्थान पर हो। दरअसल पीठ की केंद्रीय रेखा ही सुषुम्ना नाड़ी है। यह पीठ की अन्य दोनों मुख्य किनारे की रेखाओं या नाड़ियों से भी जुड़ी होती है। और भी कोई भी नाड़ी रेखा या बिंदु हो, सबसे जुड़ी होती है। वास्तव में सभी नाड़ियाँ आपस में नाड़ी जालों से जुड़ी होती हैं। तभी तो जब मुझे पीठ में कहीं भी कुंडलिनी ऊर्जा का आभास होता है, तो मैं उस अनुभव को रोकता नहीं हूँ। केवल इसके साथ अगले आज्ञा चक्र पर औऱ मूलाधार संकुचन पर तिरछी नजर बना कर रखता हूँ। ऐसा करने से धीरे से कुंडलिनी फिसलकर सुषुम्ना में आ जाती है, और ऊपर सहस्रार तक जाकर वहाँ से नीचे जाती है और फिर लूप में घूमने लग जाती है। बस ऐसा ध्यान बना रहना चाहिए। कई बार क्या होता है कि यदि कुंडलिनी ऊर्जा पीठ या सिर में बाईं तरफ हो, तो उपरोक्त ध्यान करने से वह पहले दाईं तरफ जाती है, फिर संतुलित होकर बीच वाली सुषुम्ना में फिट हो जाती है। हालांकि ऐसा थोड़े समय ही रहता है, क्योंकि ऊर्जा का वेग जल्दी से घटता रहता है। इसको कुण्डलिनी जागरण समझ कर भ्रमित नहीँ होना चाहिए। यह तो साधारण सी ऊर्जा की गति है, हालाँकि जागरण में भी ऐसा ही घटनाक्रम होता है, पर वह चरम पर होता है। ऐसी ऊर्जा की गति सभी में चली रहती है। पर सब इसे नहीं पहचानते, और न ही इस पर ध्यान देते हैं। इसी से तो आदमी जिंदा रहता है। सम्भवतः प्राणविद्या भी इसी प्राण के प्रवाह से मृत जीव को जिंदा कर सकती है। मैंने एक पुराने दोस्त से सुना था कि उसने इलाहाबाद के कुम्भ मेले में एक तन्त्रयोगी को एक मृत पक्षी को प्राणविद्या से जिंदा करते देखा था। इसके सच झूठ का तो पता नहीं पर हिंदु पुराणों में इससे संबंधित बहुत सी कथाएं हैं। संजीवनी विद्या भी शायद यही प्राण विद्या रही होगी, जिससे राक्षसगुरु शुक्राचार्य देवताओं से लड़े युद्ध में मरे राक्षसों को जिंदा किया करते थे। ऐसी रूपक कथाओं के आधार में कोई न कोई वैज्ञानिक तथ्य जरूर होता है। ये लोगों को योग की तरफ आकर्षित करने के लिए बनाई होती हैं। पर कई लोग इसका उल्टा मतलब लेकर विज्ञान और योग को नकारने लग जाते हैं। ऐसे ही जम्हाई लेना भी ऐसा ही ऊर्जा का प्रवाह है। तभी उससे थकान दूर होती है। आदमी कैसे हाथ ऊपर उठाकर, पीठ व गर्दन को सीधा करके, नाभि की सीध में गड्ढा बनाकर, मुँह खोलकर, आंखें भींचकर, आज्ञाचक को सिकोड़कर कुंडलिनी ऊर्जा को पीठ में ऊपर चढ़कर मस्तिष्क तक पहुंचने में मदद करता है। यही फर्क है कि योगी इसकी गहराई में जाता है कि यह क्या है, कैसे हुआ, क्यों हुआ और इससे कैसे अधिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है। न्यूटन से पहले भी बहुत से लोगों ने पेड़ से सेब गिरते देखा था, पर उसकी गहराई में न्यूटन ही गया। आम आदमी इसे साधारण समझ कर छोड़ देता है। योगी भी एक वैज्ञानिक होता है, खासकर मनोवैज्ञानिक। जम्हाई तरोताजा करने वाला कुदरत का नायाब तोहफा है।

संगम के समय संगम के साथ संगम करने वाले दोनों घटकों पर ध्यान देने की आवश्यकता

पिछली पोस्ट में मैं संध्या आदि संगम कालों और स्थानों के बारे में बात कर रहा था। उन पर ऐसे ही ध्यान देना पड़ता है जैसे प्राण और अपान के टकराव पर, तभी लाभ मिलता है। ऐसे तो मुर्गा संध्या से पहले ही उठ जाता है, उसे संध्या का लाभ क्यों नहीं मिलता। क्योंकि उसकी संध्या में श्रद्धा नहीं है। आदमी यदि तकनीकी पहलू को न समझे, तो कम से कम श्रद्धा तो होनी ही चाहिए। दरअसल संध्या के मध्यम प्रकाश पर ध्यान की स्थिति में दिन की पूरी चमक और रात के पूरे अंधेरे पर भी ध्यान जाता रहना चाहिए, तभी संध्या में दिन और रात की आपस में टक्कर होगी, और आपस में मिश्रित होकर कुंडलिनी की चमक के साथ आंनद पैदा करेंगे। इसी तरह इलाहाबाद के संगम के पानी में बहुत से मेंढ़क और मछलियां रहती हैं, उनकी तो मुक्ति नहीं होती। वहाँ भी ऐसे ही होता है। यह हरेक संगम के बारे में तो है ही, साथ में हरेक धार्मिक रीत के बारे में भी है। इससे पता चलता है कि धर्म के वैज्ञानिक तकनीकी पहलू का ज्ञान कितना जरूरी है। यही ज्ञान ढूंढना इस वेबसाइट का काम है।

योग को खुद योग ही बेहतर सिखाता है

योग-आसनों के बारे में मुझे इस हफ्ते कुछ नए व्यावहारिक अनुभव मिले। मिले तो पहले भी थे, पर इतने स्पष्ट नहीं थे। पहले मैं जल्दी-जल्दी और उथले साँस लेता था। इस बार प्राणायाम की तरह गहरे और धीरे लिए। एकप्रकार से प्राणायाम भी आसनों के साथ होने लगा। एकसाथ दो लाभ। पहले मैं एक पोज़ में 20–30 बार छोटी, जल्दी और उथली साँसें लेता था। पर अब सिर्फ 2-3 बार ही ले पाया। इतना ज्यादा फर्क था। समय के साथ योग खुद अपने आप को सिखाता है। इसलिए जैसे ठीक लगे, वैसे करते रहना चाहिए। हालाँकि मैंने कहीं ब्लॉग में पढ़ा था कि योग गुरु अय्यंगर योग आसनों के साथ ही प्राणायाम भी सिखाते थे। अब पूरी सच्चाई का पता चला। फिर भी सावधान रहना पड़ता है। अपनी सुखपूर्वक सामर्थ्य को नहीं लांघना चाहिए। मेरा ज्यादातर समय योग अभ्यास में ही बीत जाता है। मेरे लिए यह जरूरी भी है। मैं इसके बिना स्वस्थ नहीं रह सकता। मुझे एनकाइलॉजिंग स्पॉन्डिलाइटिस, एक ऑटोइम्यून डिसीज है। इसमें आदमी हमेशा हरकत में रहना चाहिए। शरीर के जोड़ों खासकर छाती और पीठ के जोड़ों को जाम होने से बचाने के लिए व थकान पर काबू पाने के लिए नियमित व्यायाम होता रहना चाहिए। अवसाद, व अन्य मानसिक दोषों से बचाव के लिए कुंडलिनी ध्यान, प्राणायाम से लाभ मिलता है। यही इसका मुख्य उपचार है। इसीके बहाने मैं थोड़ा बहुत योग सीख पाया। मन को मनाने के लिए कोई बहाना अच्छा रहता है।

कुन्डलिनी, कर्मयोग और विज्ञान आपसी अंतरंग रिश्ते से जुड़े हैं

लोग अक्सर बोलते हैं कि अध्यात्म विज्ञान का विषय नहीं है। मैं कहता हूँ कि बिल्कुल है। कुंडलिनी जागरण तक तो बहुत ज्यादा है, पर उसके बाद भी काफी है। कुन्डलिनी जागरण के बाद व्यक्तिगत विज्ञान की जगह सार्वभौमिक या ब्रह्मांडीय विज्ञान ले लेता है। इससे उसे अनायास ही अनुकूल परिस्थितियां मिलने लगती हैं, और खुद ही उसका भला होने लगता है। ऐसा कुन्डलिनी की ईश्वरीय शक्ति के कारण होता है। हालाँकि इसकी भी अपनी सीमाएं और बाध्यताएं हैं।  इससे व्यक्तिगत विज्ञान का बोझ थोड़ा हल्का हो जाता है। कुन्डलिनी को प्राप्त करने के लिए और उसे क्रियाशील रखने के लिए कर्मयोग की जरूरत पड़ती है। कर्मयोग उतना ही अच्छा होगा, जितनी अधिक काम की गुणवत्ता व विशेषता होगी। विज्ञान ही कर्मों को गुणवत्ता, विशेषता व उच्चता प्रदान करता है। इसलिए अध्यात्म और विज्ञान साथ-साथ ठीक चलते हैं। मैं खुद विज्ञान का एक सनकी खिलाड़ी हुआ करता था। जहाँ कोई विज्ञान की कल्पना नहीं करता था, मैं वहाँ भी विज्ञान को फिट कर लेता था। मेरे अध्यापक मुझे मजाक में कहते कि दोस्त तू तो हर जगह विज्ञान लड़ा देता है। क्योंकि विज्ञान कुंडलिनी के लिए जरूरी है, इसीलिए विज्ञानपरक खासकर पाश्चात्य प्रकार वाली सभ्यता के लोग कुंडलिनी जिज्ञासु होते हैं। पर उनमें से अधिकांश लोग स्वास्थ्य संबंधी बाहरी योग के विज्ञान को ही समझते हैं। वे ध्यान के विज्ञान को कम समझते हैं। वे जितना दिमाग और एनर्जी बाहरी विज्ञान पर लगाते हैं, उसका थोड़ा भी हिस्सा अगर भीतरी विज्ञान पर लगाएं, तो सारे महान कुंडलिनी योगी बन जाएं। पर अब मनोविज्ञान के रूप में धीरे धीरे कुंडलिनी विज्ञान को समझ रहे हैं। इसीलिए तो ध्यान का कोई संतुष्टिजनक अनुवाद अंग्रेजी में नहीं मिलता। मेडिटेशन या कंसन्ट्रेशन शब्द से काम चलाना पड़ता है। दरअसल मेडिटेशन ध्यान को सुगम बनाने वाली पद्धति है, असली ध्यान नहीं। इसी तरह, कंसन्ट्रेशन का मतलब भौतिक वस्तुओं पर और थोड़े समय तक मन को केंद्रित करना है, एकमात्र मानसिक कुंडलिनी पर नहीँ, और बहुत लंबे समय या पूरे जीवन भर एक ही मानसिक चित्र पर नहीं। इसलिए ध्यान शब्द को अंग्रेजी के शब्दभंडार में शामिल किया जाना चाहिए। संस्कृत का केवल एक ध्यान शब्द ही सारे योग को समेटे हुए है। यह है, तो योग है। यदि यह नहीं है, तो योग नहीँ है। योग की बाकी चीजें तो केवल ध्यान की सहायक भर ही हैं। ध्यान और कुंडलिनी को पर्यायवाची शब्द मान सकते हैं। प्रथम विश्व योगदिवस के आसपास एक ब्लॉग में पढ़ रहा था जिसमें एक भौतिकवादी सज्जन बड़े गर्व से कह रहे थे कि आजकल के भौतिकवादी लोग, खासकर पाश्चात्य प्रकार वाली सभ्यता के लोग योग के बाहरी अंगों तक ही सीमित रहेंगे। वे ध्यान की गहराई तक नहीं जाएंगे। तो अब मैं सोचता हूँ कि फिर उनका कुंडलिनी जागरण कैसे होगा। ध्यान के बिना हो ही नहीँ सकता। बीच-2 में तो विरले लोगों को कुदरती संयोग से खुद भी ध्यान लग जाता है। पर बड़े पैमाने पर जागृति प्राप्त करने के लिए कृत्रिम रूप से ध्यान लगाना ही पड़ेगा। कुआं प्यासे के पास नहीँ जाता, प्यासे को कुएँ के पास जाना पड़ता है। यदि प्यासा आदमी कुएँ के पास न जाए, तो आदमी की जान को ही खतरा है, कुएँ को कुछ नहीं होगा। इसी तरह यदि लोग ध्यान को न अपनाए, तो लोगों का नुकसान है, ध्यान का नहीँ। इसलिए लाइफस्टाइल ही ध्यान वाला बनाना पड़ेगा। प्राचीन वैदिक परम्परा में ऐसा लाइफस्टाइल था। लगता तो ऐसा जीवन चरित्र अजीब है, पर सत्य भी यही है। सत्य को नकारा नहीँ जा सकता। 

कुन्डलिनी को बिंदु मानने से उसका ध्यान आसान हो जाता है

पिछली पोस्ट में मैंने बिंदु को कुंडलिनी रूप बताया था। कुंडलिनी का ध्यान बिंदु के रूप में इसलिए किया जाता है ताकि मूलाधार क्षेत्र में स्थित बिंदु की शक्ति कुंडलिनी को मिलती रहे। इससे महसूस होता है कि कुंडलिनी मूलाधार क्षेत्र पर स्थित मुख्य बिंदु स्थान से किसी नाड़ी के माध्यम से जुड़ गई है, बेशक कुंडलिनी कहीं पर भी क्यों न हो। ऐसा लगता है कि बिंदु ऊर्जा ऊपर चढ़ती हुई कुन्डलिनी को पुष्ट कर रही है। इसे ही आसुत यौन ऊर्जा भी कहते हैं। इससे यौनलिप्सा शांत हो जाती है, क्योंकि उसकी ऊर्जा को कुंडलिनी ने सोख लिया होता है। वैसे तो बिंदु की शक्ति पूरे मस्तिष्क को मिलती है, पर कुंडलिनी का ही ध्यान बिंदु के रूप में इसलिए किया जाता है, ताकि कुंडलिनी चित्र सबसे अधिक प्रभावी बना रहे, और दूसरे विचार इसके आगे दबे रहें। बिंदु एक द्रव पदार्थ है, इसलिए इसका प्रवाह अच्छा होता है। यह कुन्डलिनी के प्रवाह को भी बढ़ा देता है। साथ में मैं बता रहा था कि यदि कुंडलिनी का सही अर्थ समझ में आ गया, तो योग का आधे से अधिक सफर तय हो जाता है। जिस किसी बिरले खुशकिस्मत आदमी को अच्छे प्रेम संपर्क मिलते हैं, उसके मन में खुद ही कुंडलिनी चित्र बन जाता है। वह बेशक दुनियादारी में लाभ दिलाए और मन का चैन दे, पर उसे जगाना बहुत मुश्किल होता है। कई बार यौन प्रेमी के मजबूत चित्र के संयोग और वियोग से सीधा आत्मज्ञान भी मिल सकता है, बिना कुंडलिनी जागरण के। पर ऐसा बहुत ही विरले मामले में होता है। जगाने के लिए तो किसी पसंदीदा व काल्पनिक देवता, पुराने और ब्रह्मलीन गुरु आदि के मानसिक रूप के चित्र को कुंडलिनी बनाकर उसका नियमित ध्यान करना पड़ता है। यह आसान होता है, क्योंकि उनका प्रत्यक्ष भौतिक रूप विद्यमान नहीं होता, इसलिए वह ध्यान में बाधा नहीं पहुंचाता। कई वाममार्गी तांत्रिक अपने मन में इनके चित्र को मजबूत बनाने के लिए यौनसाथी का सहारा लेते हैं। कइयों को यह सहारा पिछले जन्मों के अच्छे कर्मों के कारण खुद ही मिल जाता है। दुनियादारी के प्रेम संपर्कों से आदमी को लोगों के चित्रों को मन में खुशी से रखने की आदत पड़ी होती है, जिससे उसे योग करते हुए कुंडलिनी ध्यान आसान लगता है। यह ऐसे ही होता है, जैसे यदि हम साँस रोककर अनाहत चक्र पर कुंडलिनी ध्यान कर रहे हों, तो हम मस्तिष्क के विचारों को नहीं रोकते, बल्कि उसके ध्यान के साथ मूलाधार चक्र का भी ध्यान करते हैं। इससे मस्तिष्क की शक्ति खुद ही नीचे उतरकर अनाहत चक्र पर कुण्डलिनी के रूप में चमकने लगती है। हृदय पर हाथ रखकर वहाँ कुंडलिनी का ध्यान आसान हो जाता है, और सिद्धासन में पैर की एड़ी से मूलाधार चक्र का। इसी तरह, हरेक चक्र पर ध्यान करते समय वहाँ हाथ या अंगुली लगाकर उसे आसान किया जा सकता है।

पतंजलि योगसूत्रों की सार्वभौमिक प्रामाणिकता

कुन्डलिनी खोजने के पीछे मेरा कोई स्वार्थ नहीं छिपा था। मुझे उसकी जरूरत भी नहीं लगती थी, क्योंकि मैं पहले से ही भरपूर आनन्द के साथ अद्वैत भाव वाला जागृत जीवन जी रहा था। हुआ यह कि संयोगवश मुझे कुछ अतिरिक्त समय मिल गया। मेहनती तो मैं था ही, हर समय कुछ न कुछ करता रहता था। उस अतिरिक्त समय में मैंने अध्यात्म के बारे में पढ़ना शुरु किया। पतंजलि योग मुझे समझ आ गया था, पर इश्क-विश्क के और प्राकृतिक रूप वाला। मैं यह नहीं समझ पा रहा था कि बनावटी योगाभ्यास से किसीका मजबूत चित्र मन में कैसे बनाया जा सकता है। प्यार-मुहब्बत में तो वह खुद ही बन जाता है। इसलिए मैंने और भी योग की पुस्तकें पढ़ीं, ऑनलाइन योग मंचों पर चर्चाएं कीं, और साथ में योगाभ्यास भी करता रहा। एक बार तो मैं निराश होकर पतंजलि योगसूत्रों की प्रामाणिकता पर ही प्रश्नचिह्न लगाने लग गया था। फिर मंच पर एक अमेरिका में बसे भारतीय मूल के एक वृद्ध सज्जन ने मुझे थोड़े गुस्से में टोकते हुए बोला था, “आप ये कैसे कह सकते हैं? सैंकड़ों सालों से लोग उस पुस्तक से फायदा उठाते आए हैं। आपको ऐसा नहीं कहना चाहिए”। मैंने झूठा स्पष्टीकरण देते हुए अपना बचाव किया था कि मैंने पतंजली के ऊपर संदेह नहीं किया था, पर मैं उनके बारे में कह रहा था, जो पतंजली योगसूत्रों की गलत व्याख्या करते थे। इससे वे संतुष्ट हो गए। शायद इस चर्चा ने भी मुझे इस पुस्तक की तह तक जाने में मदद की हो। तंत्र की पुस्तकें भी पढ़ीं, और उसका भी सहारा लिया। फिर भी मैं मस्त रहता था। कुन्डलिनी का पता चले तो भी ठीक, न पता चले तो भी ठीक। पर मेहनत रँग लाई, और उसका पता चल गया। बेशक मैं उसे ज्यादा देर नहीं झेल पाया। यदि झेल लेता तो शायद आप लोगों को कुछ बताने लायक  रहता ही नहीं। सब एक दिव्य योजना का हिस्सा है। फिर मुझे पता चला कि पतंजलि योगसूत्रों में बिल्कुल पूरा का पूरा सही लिखा है। यद्यपि उसे व्यावहारिक रूप से आम आदमी के लिए समझना मुश्किल है। इसलिए इसमें थोड़ी मदद कर देता हूँ। यह भी पता चला कि आम समाज में योग के बारे में किताबी ज्ञान ज्यादा फैलता है, योगाभ्यास नहीं। पर योग का अधिकांश हिस्सा व्यावहारिक योगाभ्यास ही है। 

कुंडलिनी जागरण मुख्य ध्येय होना चाहिए, ऊर्जा जागरण या सुषुम्ना जागरण नहीं

मुझे लगता है कि अधिकांश लोग जो कुन्डलिनी जागरण का दावा करते हैं, वह वास्तव में ऊर्जा जागरण या सुषुम्ना जागरण होता है। इसीलिए वे कुन्डलिनी का वर्णन कम, और ऊर्जा का वर्णन ज्यादा करते हैं। कुन्डलिनी जागरण तो बिना सुषुम्ना जागरण के भी हो सकता है। हालांकि ऊर्जा तो सुषुम्ना से होकर ही ऊपर चढ़ती है, पर वह बैकग्राउंड में रहती है, अनुभव में नहीं आती। एकदम से जो ऊर्जा की नदी उनकी पीठ से होकर मूलाधार से सहस्रार तक उनके अनुभव में आती है, वह सुषुम्ना जागरण ही है। जब इतनी ऊर्जा मस्तिष्क में एकसाथ आएगी, तो कोई न कोई चित्र तो वहाँ चमक से कौंधेगा ही। ऐसा ही चित्र एकबार मेरे मस्तिष्क में भी चमका था, जब मेरा क्षणिक सुषुम्ना जागरण हुआ था। इसका विस्तृत वर्णन मैंने एक पुरानी पोस्ट में किया है। वह चित्र एक स्थानीय मन्दिर का था। वह बहुत जीवन्त चित्र था, पर जागरण जैसा नहीं। फिर कुन्डलिनी चित्र भी चमका, पर वह भी जागरण जितना नहीँ था। जागरण के दौरान आदमी कुंडलिनी चित्र के साथ अपना पूर्ण जुड़ाव महसूस करता है, और साथ में महान आनंद व अद्वैत का अनुभव होता है। ज्यादातर लोग ऊर्जा साधना ज्यादा करते हैं, और कुन्डलिनी साधना कम। हालाँकि ये दोनों आपस में जुड़े हैं, पर मुख्य ध्येय तो कुन्डलिनी ही होना चाहिए। कुंडलिनी ही वह मानवीय चित्र है, जो एक सच्चे मित्र की तरह हमेशा साथ देता है। लोक में तो देता ही है, परलोक में भी देता है, क्योंकि यह सूक्ष्म है, जिसकी पहुंच हर जगह है। यही प्रेम और मानवता को बढ़ावा देता है। क्या आपने किसी प्रकाशमान ऊर्जा की नदी को, प्रकाश के चित्र-विचित्र डिसाईनों को किसी का मित्र बन कर सान्त्वना देते देखा है। मन की किसी मनुष्याकृति से पूर्ण जुड़ाव के बिना इस तरह के प्रकाश के अनुभव ऊर्जा जागरण या नाड़ी जागरण या सुषुम्ना जागरण के लक्षण हैं। मेरे को लगता है कि इन चीजों से पूर्ण जुड़ाव या पूर्ण समाधि बहुत कम अनुभव होता है, यदि हो भी जाए तो विशेष लाभ नहीं मिलता। हाँ, इतना जरूर है कि इससे कुंडलिनी साधना में बहुत मदद मिलती है, यदि कोई मदद लेना चाहें तो। मुझे लगता है कि इन चीजों के साथ प्रत्यक्ष और पूर्ण विलय या पूर्ण समाधि के अनुभव के दुर्लभ मामले हैं, और अपूर्ण विलय के साथ कोई तत्काल लाभ नहीं दिखता है। यद्यपि अद्वैतता के कारण प्रत्येक जागृति में अप्रत्यक्ष रूप से संबंधित वस्तुओं के साथ पूर्ण विलय होता है, लेकिन विलय की मुख्य और प्राथमिक वस्तु तो पसंदीदा मानव रूप ही होना चाहिये, इसमें से सबसे अच्छा ईश्वर रूप है, और दूसरे स्थान पर गुरु रूप है। कृत्रिम ध्यान प्रयासों के बिना अचानक ज्ञानोदय में, जागृति के समय मन में जो कुछ भी विचार या चित्र प्रवाहित होते हैं, उन संबंधित वस्तुओं के साथ आत्मा का प्राथमिक विलय होता है। यदि वह आत्मज्ञान किसी व्यक्ति की सहायता से हुआ है, वह प्रेम सम्बन्धी हो सकता है, तो वह मन में बाद में, कुंडलिनी ध्यान के सभी लाभ देते हुए कुंडलिनी के रूप में विकसित होता है। हालांकि, शक्तिपात आदि के द्वारा, स्वयं के प्रयासों के बिना इस प्रकार का अचानक जागरण कम शक्तिशाली और कम स्थिर प्रतीत होता है। वास्तव में, संबद्ध वस्तुएं या विचार मुख्य लक्ष्य नहीं हैं। ये मुख्य ध्येय नहीं हैं। मुख्य ध्येय तो मनुष्याकृति कुंडलिनी ही है। क्योंकि आदमी का सच्चा साथी आदमी ही होता है, इसलिए मानवरूप में देवता को ही ज्यादातर मामलों में कुंडलिनी बनाया जाता है। योग्य गुरु या महापुरुष या कृष्ण आदि अवतार भी कुंडलिनी बनाए जा सकते हैं। एक खास सम्प्रदाय का एक खास देवता इसलिए होता है, क्योंकि एक ही देवता के सामूहिक ध्यान करने से एक-दूसरे को ध्यान का बल मिलता है। जैसे कि शैव सम्प्रदाय, शाक्त सम्प्रदाय, गणपति के उपासक समाज समूह आदि। राज योग में कोई चक्र नहीं होते हैं, और ऊर्जा चैनल भी नहीं होते हैं। मन में केवल कुंडलिनी ध्यान किया जाता है। वहाँ भी कुण्डलिनी जागरण और कुण्डलिनी सक्रियता इसी प्रकार होती है।इसीलिए कुन्डलिनी का विशद वर्णन करना बहुत जरूरी हो गया था। इसी जरूरत को देखते हुए यह वेबसाइट संसारपटल पर आई।