दोस्तों, खाली दिमाग सच में ही शैतान का घर होता है। इसीलिए मैं हर समय कुछ ना कुछ करता रहता हूं। अगर करने के लिए कुछ ना दिखे तो लिखने लग जाता हूं। मेरा बेटा इसलिए जागकर काम करता है ताकि उसे अच्छे सपने आए। वाह जागृति की दुनिया को नकली और सपने की दुनिया को असली मानता है। उसकी यह बात सुनकर मेरा माथा ठनका। एक नया विचार उमड़ पड़ा सभी ऋषि मुनी और वेद पुराण भी तो यही कहते हैं। वे कहते हैं कि अनासक्ति और अद्वैत से भरा जीवन ही असली है। सपने में भी तो ऐसा ही जीवन होता है। उसमें दुख सुख सभी लगभग एक जैसे ही महसूस होते हैं। सभी कुछ अनुभव रूप होता है। शुद्ध अनुभव। सभी अनुभव सुख रूप होते हैं। पीछे से शेर दौड़ जाए तो भय होते हुए भी भय नहीं लगता। कोई अगर लड़ने लग जाए तो गुस्सा आके भी गुस्सा नहीं आता। पहाड़ से गिर जाए तो दुख होते हुए भी दुख नहीं होता। अगर राज्य भी मिल जाए तो भी सुख होते हुए भी सुख नहीं होता। मतलब एकसार सुख तो हर जगह होता है, पर भौतिकता वाला प्रदूषित सुख नहीं होता। वह सूक्ष्म अनुभवरूप सुख होता है। भौतिक स्थूल जगत सुख दुख के सूक्ष्म अनुभव को प्रदूषित कर देता है। स्थूल जगत से सुख बढ़ तो जाता है, पर उससे दुख भी बढ़ जाता है। गेंद जितनी ऊपर जाती है, उतनी ही नीचे भी गिरती है। सुख तो आत्मा का अपना स्वरूप है। पर जगत उसे अपने अधीन करके उस एकसार आत्मसुख में तरंग पैदा करता है। फिर कालांतर में स्थूल जगत के अभाव में वह तरंग नष्ट हो जाती है। इससे बेशक आदमी एकसार या तरंगहीन आत्मसुख में पुनः पहुंच जाता है, पर उस अवस्था में दुखरूप अंधेरा महसूस होता है। ऐसा भ्रम से प्रतीत होता है। असल में ऐसा नहीं होता। यह ऐसे ही है जैसे अपने शरीर के चारों ओर गोल गोल घूमने से या भ्रमण से रुकने के बाद अपने चारों तरफ सब कुछ थोड़ी देर के लिए घूमता हुआ सा महसूस होता है। इसे चक्कर आना भी कहते हैं। इसी से अज्ञान के लिए भ्रम शब्द का इस्तेमाल हुआ है।
दुनिया में रहते हुए भ्रम से तो कोई बच ही नहीं सकता। हां उसे कम जरूर किया जा सकता है। शायद इसीलिए तो लोग दुनिया छोड़कर साधु संन्यासी बनते हैं, ताकि जगत भ्रम को पैदा ही न कर सके। पर इससे यह नुकसान होता है कि इससे आत्मविकास भी नहीं होता। क्योंकि दुनिया इसके लिए जरूरी है। दुनिया को आवश्यक बुराई भी कह सकते हैं इस मामले में। इसीलिए जिन्हें अच्छी तरह से आत्मजागृति मिल गई है, उनका ही संन्यास लेना उचित माना गया है। मतलब वो आत्म विकास के चरम बिंदु पर पहुंच गए हैं, और उन्हें दुनिया में उलझने की कोई अवशयकता नहीं है। वैसे आवश्यकता तो है। पर सिर्फ शरीर को जिंदा रखने के लिए, क्योंकि जब तक पूर्वकर्मों से निर्धारित आयु पूरी नहीं होती, तब तक तो प्रारब्ध कर्म से जुड़े संस्कार परेशान करते ही रहेेंगे। हां, इससे अगले जन्म के लिए संस्कार नहीं बन पाएंगे।
सपना भी तो आत्मसुख को तरंग देता है, पर जागृति अवस्था जितना ज्यादा नहीं। इसीलिए सपने में उस तरंग के हटने पर भ्रम भी जागृत अवस्था जितना नहीं होता। कुछ भ्रम तो होता ही है। इसीलिए शास्त्रों में कहा गया है कि दुनिया स्वप्न जैसी है, और इसे स्वप्नवत ही समझना चाहिए। वास्तव में ऐसा ही है क्योंकि भौतिक दुनिया मस्तिष्क के अंदर तो घुसती नहीं है। हम तो केवल उसका सूक्ष्म चित्र ही महसूस कर रहे होते हैं, जैसा स्वप्न में करते हैं। पर उसको स्थूल और भौतिक मान लेने से सारी गड़बड़ हो जाती है। आदमी बेशक सुखतरंग के लालच में ही उसे स्थूल और भौतिक मानता है, ताकि तरंग का सुख ज्यादा मिल सके। उस समय उसे उससे कालांतर में आने वाले दुख का एहसास नहीं होता। दरअसल बड़ी तरंग को ही स्थूल जगत कहते हैं और छोटी तरंग को सूक्ष्म जगत। सिनेमा देखते समय स्थूल कुछ नहीं होता पर कई लोग उससे ज्यादा ही आसक्त हो जाते हैं। मतलब उसमें ज्यादा ही डूब जाते हैं। और उससे भरपुर सुख की तरंग बनाते हैं। इससे परदे पर दिख रहे दृश्य सूक्ष्म होते हुए भी उनके लिए स्थूल बन जाते हैं। इसीलिए तो ऐसा वैसा दृश्य आने पर कई बार थिएटर में हंगामा और तोड़फोड़ भी कर देते हैं। कई लोग स्थूल जगत में रहते हुए भी उससे आसक्त नहीं होते। वे बिल्कुल शांत बने रहते हैं चाहे कुछ भी हो जाए। मतलब
उनके मन में उससे प्रचंड या ताबड़तोड़ तरंगें नहीं बनतीं। उनके लिए स्थूल जगत भी सपाlने की तरह सूक्ष्म होता है। इससे ही वे सुख दुख में एकसमान से बने रहते हैं। पर वही बात है न कि आत्म जागृति के लिए प्रचंड मानसिक तरंगें भी जरूरी होती हैं।
यह दुनिया दोनों तरफ बहने वाली नदी की तरह है। इसीलिए अच्छे से समझ नहीं आती। किसी को यह ऊपर उठाती है, तो किसी को बहाकर नीचे ले जाती है। यह कह सकते हैं कि आसक्तिपूर्ण दुनियादारी को शरीरविज्ञान दर्शन जैसे अद्वैतपरक दर्शनों से शांत भी करते रहना चाहिए। इससे आत्मजागृति भी मिलेगी और भ्रम भी पैदा नहीं होगा। कुंडलिनी योग से यह लाभ मिल सकता है कि उससे अद्वैत भावना के समय महसूस होने वाले समाधि चित्र को धारण करने की शक्ति बढ़ेगी और साथ में मस्तिष्क को ऊर्जा मिलने से दुनियादारी के साथ शरीरविज्ञान दर्शन की भावना अच्छे से कर पाएंगे। क्योंकि हरेक चक्र किसी न किसी किस्म की दुनियादारी से जुड़ा है, इसलिए हर किस्म के काम के समय कोई न कोई चक्र क्रियाशील हो जाएगा। मतलब उस चक्र तक शक्ति का प्रभाव बढ़ जाएगा। इससे उस काम के साथ शरीरविज्ञान दर्शन की भावना आसान हो जाएगी, क्योंकि सब काम शक्ति से होते हैं। वह अतिरिक्त शक्ति हमें मामूली लग सकती है, पर वह बड़े काम की होती है। प्रतिदिन के कुंडलिनी योग के अभ्यास से सभी चक्रों तक नाड़ियां खुली रहेंगी। जब चक्र तक शक्ति जाएगी तो कुछ न कुछ मस्तिष्क के चक्रों तक भी जाएगी ही, क्योंकि सभी चक्र आपस में जुड़े होते हैं। और मस्तिष्क से ही भावना होती है, द्वैतपरक हो या अद्वैतपरक।
बीच-बीच में शरीरविज्ञान दर्शन की भावना से आदमी लगातार जागृत अवस्था और स्वप्न के बीच में झूलता रहेगा। इससे दोनों के लाभ मिलेंगे। जागृत अवस्था के भी और स्वप्न अवस्था के भी। जागृत अवस्था वाले लाभों में कुंडलिनी जागरण के साथ भौतिक दुनियादारी वाले लाभ और स्वप्न अवस्था वाले लाभों में संन्यास वाले लाभ शामिल हैं। मतलब कुंडलिनी योग से जागृत अवस्था स्वप्न अवस्था में बदल जाती है। हालांकि उससे स्वप्न भी जागृत अवस्था में बदल जाता है। जब शरीर में थकान हो, अर्थात अक्षमता अर्थात शक्ति की कमी हो तो आदमी की नशे या स्वप्न के जैसी अवस्था हो जाती है। कुंडलिनी योग से शक्ति मिलने पर वह फिर से दुनियादारी में जागृत जैसा हो जाता है। बेशक बाद में उससे परेशान सा होकर वह पुनः शरीरविज्ञान दर्शन की भावना से अपनी जागृत अवस्था को स्वप्न अवस्था में बदल देता है, और अपने भ्रम को न्यूनतम कर देता है। उस समय शक्ति तो उसमें होती है। वह अवस्था उस नशे या नींद के जैसी अवस्था नहीं होती, जिसमें शक्ति ही नहीं होती। इसलिए उसकी अतिरिक्त शक्ति समाधि के मानसिक चित्र के रूप में रूपांतरित हो जाती है। मतलब उस अतिरिक्त शक्ति से उसकी समाधि लग जाती है।
जब शरीर में अपनी वर्तमान अवस्था की भावना की जाती है, तो सांस तेजी से पेट से बाहर निकलती है, खासकर अगर मस्तिष्क में दबाव ज्यादा हो। इससे ऊर्जा फ्रंट चैनल से नीचे उतरने से मस्तिष्क हल्का हो जता है। मुझे महसूस होता है कि यह नीचे गई ऊर्जा मूलाधार से वापिस मुड़कर रीढ़ की हड्डी से होते हुए पुनः मस्तिष्क को चढ़ जाती है। मतलब ऊर्जा का एक क्लोज सरकट लूप सा बन जाता है। हैरानी यह कि यह ऊपर गई ऊर्जा फिर मस्तिष्क के भार को बढ़ाती नहीं पर हल्का करती है। वैसे भी भार तो ऊर्जा की कमी से बढ़ना चाहिए। शायद मस्तिष्क का पीछे का भाग भावना बनाने में ज्यादा मदद करता है, या यह पूरे मस्तिष्क का मुख्य नियंत्रिक है। इसीलिए इसके पिछले हिस्से को रीढ़ की हड्डी से मिल रही ऊर्जा ज्यादा कारगर होती है। ऐसा भी हो सकता है कि नीचे धकेली गई ऊर्जा ऑक्सीजन से भरी नहीं होती। हृदय चक्र से होकर नीचे गुजरते समय ऑक्सीजन से भरपूर होकर शुद्ध होकर पीठ से ऊपर चढ़ती है। शायद इसीलिए कहते हैं कि ऊर्जा माइक्रोकॉसमिक ऑर्बिट लूप में घूमती रहनी चाहिए। अगर दिमाग में सुस्ती है या कम दबाव है, तो सांस गहरा अंदर भरा जाता है। इससे ऊर्जा ऊपर चढ़कर मस्तिष्क को शक्तिमान कर देती है। मतलब मस्तिष्क में ऊर्जा ही नहीं है तो नीचे क्या उतरेगा। इसीलिए उस समय उसे नीचे से ऊपर चढ़ाने पर ही जोर होता है। यह खुद ही होता है। मतलब जैसे स्थूल भौतिक शरीर संतुलन में रहता है, वैसे ही यह मन को भी बना देता है, अगर सही से इसका ध्यान किया जाए।
कुंडलिनी जागरण भी भौतिक जागृति की तरह ही है। इसे भौतिक जागृत अवस्था का शिखर बिंदु भी कह सकते हैं। क्योंकि इसमें चेतन मन के साथ अवचेतन मन भी जाग जाता है। मतलब कुंडलिनी जागरण के लिए जागृत एवस्था से भी ज्यादा जागना पड़ता है। ऐसा जागृत अवस्था से ही हो सकता है, स्वप्न अवस्था से तो नहीं। हालांकि जागृत अवस्था को स्वप्न अवस्था बनाने से जो शक्ति की बचत होती है उससे इसे प्राप्त किया जा सकता है। मतलब स्वप्न का इसमें भी योगदान है। पर वह स्वप्न शक्तिहीनता वाला या सुस्ती वाला या मजबूरी वाला स्वप्न नहीं पर जानबूझ कर किया गया स्वप्न है। उस अतिरिक्त शक्ति से किसी गुरु, देवता आदि के रूप के मानसिक चित्र का ध्यान किया जाता है। अभ्यास से वह ध्यान इतना ज्यादा बढ़ जाता है कि वह मानसिक चित्र जाग जाता है। वैसे तो आमतौर पर मानसिक चित्र स्वप्न की अवस्था में होता है, पर कुंडलिनी जागरण के समय वह जागृत अवस्था में आ जाता है। मतलब उस चित्र को बनाने वाली मानसिक तरंग इतनी मजबूत बन जाती है कि वह स्वप्न अवस्था की सीमा को पार कर के जागृत अवस्था के दायरे में प्रविष्ट हो जाता है। उसे जागृत करने वाली शक्ति इतनी ज्यादा होती है कि वह साथ में अवचेतन मन अर्थात आत्मा को भी जगा देती है। इसीलिए सब कुछ अद्वैतपूर्ण अर्थात एक जैसा अर्थात अपना ही रूप लगता है क्योंकि तब पहले वाला सोया हुआ अंधेरानुमा आत्मा जागृत कुंडलिनी चित्र जितना जाग कर उसके जितना ही प्रकाशमान बन जाता है। दरअसल जागृत तो आत्मा ही होता है। मानसिक ध्यान चित्र तो उसे जगाने का माध्यम भर ही है। क्योंकि कुंडलिनी चित्र तो एक मानसिक तरंग है, जो पहले ही एक जागृत अवस्था का रूप है। बेशक वह तरंग इतनी हल्की है कि स्वप्न अवस्था के दायरे में आती है। फिर भी तरंग तो तरंग ही है। स्वप्न अवस्था और जागृत अवस्था की मानसिक तरंगें एक ही चीज हैं, सिर्फ उनमें प्रगाढ़ता का अंतर है, अन्य कुछ नहीं। प्रकाश तो एक ही है, उसे कम करने पर वह बदल तो नहीं जाता। बोलने का मतलब है कि ध्यान चित्र सोया ही कहां था जो जागेगा। सोया हुआ तो अवचेतन मन से जुड़ा हुआ आत्मा होता है जो ध्यान चित्र की सहायता से जागता है। ध्यान चित्र तो शक्ति को मस्तिष्क में पहुंचाने का काम करता है। जब वह शक्ति एक निश्चित सीमा से ऊपर पहुंच जाती है तो वह अवचेतन मन को जगा देती है। इसे हम कुंडलिनी जागरण कहते हैं।
आत्मा ही है जो सोया होता है, और जो कुंडलिनी जागरण के समय जाग जाता है। वास्तव में उसका सुषुप्ति का भ्रम दूर होता है, क्योंकि भ्रम से ही वह सोया हुआ प्रतीत होता है। बेशक कुंडलिनी जागरण के कुछ क्षणों के अनुभव के बाद फिर से सो जाता है, पर वह सुषुप्ति उतनी प्रभावी नहीं रहती जितनी पहले थी क्योंकि अब उसने सच्चाई जान ली है। आदमी का अवचेतन मन उस दग्धबीज की तरह हो जाता है जिसमें नया जीवन या जन्म पैदा करने की शक्ति नहीं रहती। वह आत्मा के प्रकाश से जल गया होता है। जले हुए बीज की तरह वह रहता तो है पर नया जन्म नहीं दे सकता। फिर कहते हैं कि जो कुंडलिनी जागरण के बाद कर्म होंगे, वे तो अवचेतन मन को बनाएंगे ही फल देने के लिए। पर जब अवचेतन मन ही जल गया तब उसमें नए कर्म भी कैसे जुड़ सकते हैं। जब अवचेतन मन के अस्तित्व का आधार ही खत्म हो गया तो नया भी कैसे बनेगा। पर फिर कर्म का फल कैसे मिलेगा। फिर तो आत्मजागृत आदमी कुछ भी पाप कर्म बिना किसी भय के कर सकता है। तो इसके जवाब में कहते हैं कि अवचेतन मन के न रहने से उसकी कर्म और फल के प्रति आसक्ति नहीं रहती। प्रकाश की प्रकाश के प्रति कैसी आसक्ति। प्रकाश के प्रति तो अंधकार की ही आसक्ति होती है। वह तो समय के साथ बहता रहता है। यदि अज्ञानवश या मजबूरी में उससे पाप कर्म हो भी जाएं तो उसे उसका फल जल्दी से और हल्के रूप में मिलता है क्योंकि उसकी आसक्ति भी हल्की ही थी। अगर उसे उस जीवन में फल न मिल सके तो भी वह उन्हें प्रकृति को सौंप कर मुक्त हो जाता है। अब प्रकृति की मर्जी कि वह उसके फल किसको दे। शायद इसीलिए कहते हैं कि महापुरुषों द्वारा किए गए कर्मों का फल पूरी सृष्टि या पूरे समाज को भुगतना पड़ता है। ऐसे बहुत से धर्म संस्थापकों, धर्मगुरुओं और महान या वैश्विक नेताओं के उदाहरण हैं। क्यों कई धर्म आजतक एक दूसरे के खून के प्यासे बने हुए हैं, इसे भी इससे जोड़ा जा सकता है। ये सभी अनुभव और विचार शास्त्रों के हैं, जिनका हम यहां यथासंभव वैज्ञानिक विश्लेषण कर रहे हैं। जब आत्मा प्रकाशित या प्रकाशमान हो गया तब तो हर एक वस्तुचित्र या मनतरंग या पूरी दुनिया अपने जैसे ही लगेगी क्योंकि सभी चीजें प्रकाशमान ही हैं। प्रकाश से प्रकाश की कैसी भिन्नता। यह प्रकाश आम प्रकाश से भी बहुत ऊपर मतलब चेतना का प्रकाश होता है।
