कुंडलिनी योग से आदमी जागृति और स्वप्न के बीच झूलता रहता है

दोस्तों, खाली दिमाग सच में ही शैतान का घर होता है। इसीलिए मैं हर समय कुछ ना कुछ करता रहता हूं। अगर करने के लिए कुछ ना दिखे तो लिखने लग जाता हूं। मेरा बेटा इसलिए जागकर काम करता है ताकि उसे अच्छे सपने आए। वाह जागृति की दुनिया को नकली और सपने की दुनिया को असली मानता है। उसकी यह बात सुनकर मेरा माथा ठनका। एक नया विचार उमड़ पड़ा  सभी ऋषि मुनी और वेद पुराण भी तो यही कहते हैं। वे कहते हैं कि अनासक्ति और अद्वैत से भरा जीवन ही असली है। सपने में भी तो ऐसा ही जीवन होता है। उसमें दुख सुख सभी लगभग एक जैसे ही महसूस होते हैं। सभी कुछ अनुभव रूप होता है। शुद्ध अनुभव। सभी अनुभव सुख रूप होते हैं। पीछे से शेर दौड़ जाए तो भय होते हुए भी भय नहीं लगता। कोई अगर लड़ने लग जाए तो गुस्सा आके भी गुस्सा नहीं आता। पहाड़ से गिर जाए तो दुख होते हुए भी दुख नहीं होता। अगर राज्य भी मिल जाए तो भी सुख होते हुए भी सुख नहीं होता। मतलब एकसार सुख तो हर जगह होता है, पर भौतिकता वाला प्रदूषित सुख नहीं होता। वह सूक्ष्म अनुभवरूप सुख होता है। भौतिक स्थूल जगत सुख दुख के सूक्ष्म अनुभव को प्रदूषित कर देता है। स्थूल जगत से सुख बढ़ तो जाता है, पर उससे दुख भी बढ़ जाता है। गेंद जितनी ऊपर जाती है, उतनी ही नीचे भी गिरती  है। सुख तो आत्मा का अपना स्वरूप है। पर जगत उसे अपने अधीन करके उस एकसार आत्मसुख में तरंग पैदा करता है। फिर कालांतर में स्थूल जगत के अभाव में वह तरंग नष्ट हो जाती है। इससे बेशक आदमी एकसार या तरंगहीन आत्मसुख में पुनः पहुंच जाता है, पर उस अवस्था में दुखरूप अंधेरा महसूस होता है। ऐसा भ्रम से प्रतीत होता है। असल में ऐसा नहीं होता। यह ऐसे ही है जैसे अपने शरीर के चारों ओर गोल गोल घूमने से या भ्रमण से रुकने के बाद अपने चारों तरफ सब कुछ थोड़ी देर के लिए घूमता हुआ सा महसूस होता है। इसे चक्कर आना भी कहते हैं। इसी से अज्ञान के लिए भ्रम शब्द का इस्तेमाल हुआ है।

दुनिया में रहते हुए भ्रम से तो कोई बच ही नहीं सकता। हां उसे कम जरूर किया जा सकता है। शायद इसीलिए तो लोग दुनिया छोड़कर साधु संन्यासी बनते हैं, ताकि जगत भ्रम को पैदा ही न कर सके। पर इससे यह नुकसान होता है कि इससे आत्मविकास भी नहीं होता। क्योंकि दुनिया इसके लिए जरूरी है। दुनिया को आवश्यक बुराई भी कह सकते हैं इस मामले में। इसीलिए जिन्हें अच्छी तरह से आत्मजागृति मिल गई है, उनका ही संन्यास लेना उचित माना गया है। मतलब वो आत्म विकास के चरम बिंदु पर पहुंच गए हैं, और उन्हें दुनिया में उलझने की कोई अवशयकता नहीं है। वैसे आवश्यकता तो है। पर सिर्फ शरीर को जिंदा रखने के लिए, क्योंकि जब तक पूर्वकर्मों से निर्धारित आयु पूरी नहीं होती, तब तक तो प्रारब्ध कर्म से जुड़े संस्कार परेशान करते ही रहेेंगे। हां, इससे अगले जन्म के लिए संस्कार नहीं बन पाएंगे।

सपना भी तो आत्मसुख को तरंग देता है, पर जागृति अवस्था जितना ज्यादा नहीं। इसीलिए सपने में उस तरंग के हटने पर भ्रम भी जागृत अवस्था जितना नहीं होता। कुछ भ्रम तो होता ही है। इसीलिए शास्त्रों में कहा गया है कि दुनिया स्वप्न जैसी है, और इसे स्वप्नवत ही समझना चाहिए। वास्तव में ऐसा ही है क्योंकि भौतिक दुनिया मस्तिष्क के अंदर तो घुसती नहीं है। हम तो केवल उसका सूक्ष्म चित्र ही महसूस कर रहे होते हैं, जैसा स्वप्न में करते हैं। पर उसको स्थूल और भौतिक मान लेने से सारी गड़बड़ हो जाती है। आदमी बेशक सुखतरंग के लालच में ही उसे स्थूल और भौतिक मानता है, ताकि तरंग का सुख ज्यादा मिल सके। उस समय उसे उससे कालांतर में आने वाले दुख का एहसास नहीं होता। दरअसल बड़ी तरंग को ही स्थूल जगत कहते हैं और छोटी तरंग को सूक्ष्म जगत। सिनेमा देखते समय स्थूल कुछ नहीं होता पर कई लोग उससे ज्यादा ही आसक्त हो जाते हैं। मतलब उसमें ज्यादा ही डूब जाते हैं। और उससे भरपुर सुख की तरंग बनाते हैं। इससे परदे पर दिख रहे दृश्य सूक्ष्म होते हुए भी उनके लिए स्थूल बन जाते हैं। इसीलिए तो ऐसा वैसा दृश्य आने पर कई बार थिएटर में हंगामा और तोड़फोड़ भी कर देते हैं। कई लोग स्थूल जगत में रहते हुए भी उससे आसक्त नहीं होते। वे बिल्कुल शांत बने रहते हैं चाहे कुछ भी हो जाए। मतलब
उनके मन में उससे प्रचंड या ताबड़तोड़ तरंगें नहीं बनतीं। उनके लिए स्थूल जगत भी सपाlने की तरह सूक्ष्म होता है। इससे ही वे सुख दुख में एकसमान से बने रहते हैं। पर वही बात है न कि आत्म जागृति के लिए प्रचंड मानसिक तरंगें भी जरूरी होती हैं।

यह दुनिया दोनों तरफ बहने वाली नदी की तरह है। इसीलिए अच्छे से समझ नहीं आती। किसी को यह ऊपर उठाती है, तो किसी को बहाकर नीचे ले जाती है। यह कह सकते हैं कि आसक्तिपूर्ण दुनियादारी को शरीरविज्ञान दर्शन जैसे अद्वैतपरक दर्शनों से शांत भी करते रहना चाहिए। इससे आत्मजागृति भी मिलेगी और भ्रम भी पैदा नहीं होगा। कुंडलिनी योग से यह लाभ मिल सकता है कि उससे अद्वैत भावना के समय महसूस होने वाले समाधि चित्र को धारण करने की शक्ति बढ़ेगी और साथ में मस्तिष्क को ऊर्जा मिलने से दुनियादारी के साथ शरीरविज्ञान दर्शन की भावना अच्छे से कर पाएंगे। क्योंकि हरेक चक्र किसी न किसी किस्म की दुनियादारी से जुड़ा है, इसलिए हर किस्म के काम के समय कोई न कोई चक्र क्रियाशील हो जाएगा। मतलब उस चक्र तक शक्ति का प्रभाव बढ़ जाएगा। इससे उस काम के साथ शरीरविज्ञान दर्शन की भावना आसान हो जाएगी, क्योंकि सब काम शक्ति से होते हैं। वह अतिरिक्त शक्ति हमें मामूली लग सकती है, पर वह बड़े काम की होती है। प्रतिदिन के कुंडलिनी योग के अभ्यास से सभी चक्रों तक नाड़ियां खुली रहेंगी। जब चक्र तक शक्ति जाएगी तो कुछ न कुछ मस्तिष्क के चक्रों तक भी जाएगी ही, क्योंकि सभी चक्र आपस में जुड़े होते हैं। और मस्तिष्क से ही भावना होती है, द्वैतपरक हो या अद्वैतपरक।

बीच-बीच में शरीरविज्ञान दर्शन की भावना से आदमी लगातार जागृत अवस्था और स्वप्न के बीच में झूलता रहेगा। इससे दोनों के लाभ मिलेंगे। जागृत अवस्था के भी और स्वप्न अवस्था के भी। जागृत अवस्था वाले लाभों में कुंडलिनी जागरण के साथ भौतिक दुनियादारी वाले लाभ और स्वप्न अवस्था वाले लाभों में संन्यास वाले लाभ शामिल हैं। मतलब कुंडलिनी योग से जागृत अवस्था स्वप्न अवस्था में बदल जाती है। हालांकि उससे स्वप्न भी जागृत अवस्था में बदल जाता है। जब शरीर में थकान हो, अर्थात अक्षमता अर्थात शक्ति की कमी हो तो आदमी की नशे या स्वप्न के जैसी अवस्था हो जाती है। कुंडलिनी योग से शक्ति मिलने पर वह फिर से दुनियादारी में जागृत जैसा हो जाता है। बेशक बाद में उससे परेशान सा होकर वह पुनः  शरीरविज्ञान दर्शन की भावना से अपनी जागृत अवस्था को स्वप्न अवस्था में बदल देता है, और अपने भ्रम को न्यूनतम कर देता है। उस समय शक्ति तो उसमें होती है। वह अवस्था उस नशे या नींद के जैसी अवस्था नहीं होती, जिसमें शक्ति ही नहीं होती। इसलिए उसकी अतिरिक्त शक्ति समाधि के मानसिक चित्र के रूप में रूपांतरित हो जाती है। मतलब उस अतिरिक्त शक्ति से उसकी समाधि लग जाती है। 

जब शरीर में अपनी वर्तमान अवस्था की भावना की जाती है, तो सांस तेजी से पेट से बाहर निकलती है, खासकर अगर मस्तिष्क में दबाव ज्यादा हो। इससे ऊर्जा फ्रंट चैनल से नीचे उतरने से मस्तिष्क हल्का हो जता है। मुझे महसूस होता है कि यह नीचे गई ऊर्जा मूलाधार से वापिस मुड़कर रीढ़ की हड्डी से होते हुए पुनः मस्तिष्क को चढ़ जाती है। मतलब ऊर्जा का एक क्लोज सरकट लूप सा बन जाता है। हैरानी यह कि यह ऊपर गई ऊर्जा फिर मस्तिष्क के भार को बढ़ाती नहीं पर हल्का करती है। वैसे भी भार तो ऊर्जा की कमी से बढ़ना चाहिए। शायद मस्तिष्क का पीछे का भाग भावना बनाने में ज्यादा मदद करता है, या यह पूरे मस्तिष्क का मुख्य नियंत्रिक है। इसीलिए इसके पिछले हिस्से को रीढ़ की हड्डी से मिल रही ऊर्जा ज्यादा कारगर होती है। ऐसा भी हो सकता है कि नीचे धकेली गई ऊर्जा ऑक्सीजन से भरी नहीं होती। हृदय चक्र से होकर नीचे गुजरते समय ऑक्सीजन से भरपूर होकर शुद्ध होकर पीठ से ऊपर चढ़ती है। शायद इसीलिए कहते हैं कि ऊर्जा माइक्रोकॉसमिक ऑर्बिट लूप में घूमती रहनी चाहिए। अगर दिमाग में सुस्ती है या कम दबाव है, तो सांस गहरा अंदर भरा जाता है। इससे ऊर्जा ऊपर चढ़कर मस्तिष्क को शक्तिमान कर देती है। मतलब मस्तिष्क में ऊर्जा ही नहीं है तो नीचे क्या उतरेगा। इसीलिए उस समय उसे नीचे से ऊपर चढ़ाने पर ही जोर होता है। यह खुद ही होता है। मतलब जैसे स्थूल भौतिक शरीर संतुलन में रहता है, वैसे ही यह मन को भी बना देता है, अगर सही से इसका ध्यान किया जाए।

कुंडलिनी जागरण भी भौतिक जागृति की तरह ही है। इसे भौतिक जागृत अवस्था का शिखर बिंदु भी कह सकते हैं। क्योंकि इसमें चेतन मन के साथ अवचेतन मन भी जाग जाता है। मतलब कुंडलिनी जागरण के लिए जागृत एवस्था से भी ज्यादा जागना पड़ता है। ऐसा जागृत अवस्था से ही हो सकता है, स्वप्न अवस्था से तो नहीं। हालांकि जागृत अवस्था को स्वप्न अवस्था बनाने से जो शक्ति की बचत होती है उससे इसे प्राप्त किया जा सकता है। मतलब स्वप्न का इसमें भी योगदान है। पर वह स्वप्न शक्तिहीनता वाला या सुस्ती वाला या मजबूरी वाला स्वप्न नहीं पर जानबूझ कर किया गया स्वप्न है। उस अतिरिक्त शक्ति से किसी गुरु, देवता आदि के रूप के मानसिक चित्र का ध्यान किया जाता है। अभ्यास से वह ध्यान इतना ज्यादा बढ़ जाता है कि वह मानसिक चित्र जाग जाता है। वैसे तो आमतौर पर मानसिक चित्र स्वप्न की अवस्था में होता है, पर कुंडलिनी जागरण के समय वह जागृत अवस्था में आ जाता है। मतलब उस चित्र को बनाने वाली मानसिक तरंग इतनी मजबूत बन जाती है कि वह स्वप्न अवस्था की सीमा को पार कर के जागृत अवस्था के दायरे में प्रविष्ट हो जाता है। उसे जागृत करने वाली शक्ति इतनी ज्यादा होती है कि वह साथ में अवचेतन मन अर्थात आत्मा को भी जगा देती है। इसीलिए सब कुछ अद्वैतपूर्ण अर्थात एक जैसा अर्थात अपना ही रूप लगता है क्योंकि तब पहले वाला सोया हुआ अंधेरानुमा आत्मा जागृत कुंडलिनी चित्र जितना जाग कर उसके जितना ही प्रकाशमान बन जाता है। दरअसल जागृत तो आत्मा ही होता है। मानसिक ध्यान चित्र तो उसे जगाने का माध्यम भर ही है। क्योंकि कुंडलिनी चित्र तो एक मानसिक तरंग है, जो पहले ही एक जागृत अवस्था का रूप है। बेशक वह तरंग इतनी हल्की है कि स्वप्न अवस्था के दायरे में आती है। फिर भी तरंग तो तरंग ही है। स्वप्न अवस्था और जागृत अवस्था की मानसिक तरंगें एक ही चीज हैं, सिर्फ उनमें प्रगाढ़ता का अंतर है, अन्य कुछ नहीं। प्रकाश तो एक ही है, उसे कम करने पर वह बदल तो नहीं जाता। बोलने का मतलब है कि ध्यान चित्र सोया ही कहां था जो जागेगा। सोया हुआ तो अवचेतन मन से जुड़ा हुआ आत्मा होता है जो ध्यान चित्र की सहायता से जागता है। ध्यान चित्र तो शक्ति को मस्तिष्क में पहुंचाने का काम करता है। जब वह शक्ति एक निश्चित सीमा से ऊपर पहुंच जाती है तो वह अवचेतन मन को जगा देती है। इसे हम कुंडलिनी जागरण कहते हैं।

आत्मा ही है जो सोया होता है, और जो कुंडलिनी जागरण के समय जाग जाता है। वास्तव में उसका सुषुप्ति का भ्रम दूर होता है, क्योंकि भ्रम से ही वह सोया हुआ प्रतीत होता है। बेशक कुंडलिनी जागरण के कुछ क्षणों के अनुभव के बाद फिर से सो जाता है, पर वह सुषुप्ति उतनी प्रभावी नहीं रहती जितनी पहले थी क्योंकि अब उसने सच्चाई जान ली है। आदमी का अवचेतन मन उस दग्धबीज की तरह हो जाता है जिसमें नया जीवन या जन्म पैदा करने की शक्ति नहीं रहती। वह आत्मा के प्रकाश से जल गया होता है। जले हुए बीज की तरह वह रहता तो है पर नया जन्म नहीं दे सकता। फिर कहते हैं कि जो कुंडलिनी जागरण के बाद कर्म होंगे, वे तो अवचेतन मन को बनाएंगे ही फल देने के लिए। पर जब अवचेतन मन ही जल गया तब उसमें नए कर्म भी कैसे जुड़ सकते हैं। जब अवचेतन मन के अस्तित्व का आधार ही खत्म हो गया तो नया भी कैसे बनेगा। पर फिर कर्म का फल कैसे मिलेगा। फिर तो आत्मजागृत आदमी कुछ भी पाप कर्म बिना किसी भय के कर सकता है। तो इसके जवाब में कहते हैं कि अवचेतन मन के न रहने से उसकी कर्म और फल के प्रति आसक्ति नहीं रहती। प्रकाश की प्रकाश के प्रति कैसी आसक्ति। प्रकाश के प्रति तो अंधकार की ही आसक्ति होती है। वह तो समय के साथ बहता रहता है। यदि अज्ञानवश या मजबूरी में उससे पाप कर्म हो भी जाएं तो उसे उसका फल जल्दी से और हल्के रूप में मिलता है क्योंकि उसकी आसक्ति भी हल्की ही थी। अगर उसे उस जीवन में फल न मिल सके तो भी वह उन्हें प्रकृति को सौंप कर मुक्त हो जाता है। अब प्रकृति की मर्जी कि वह उसके फल किसको दे। शायद इसीलिए कहते हैं कि महापुरुषों द्वारा किए गए कर्मों का फल पूरी सृष्टि या पूरे समाज को भुगतना पड़ता है। ऐसे बहुत से धर्म संस्थापकों, धर्मगुरुओं और महान या वैश्विक नेताओं के उदाहरण हैं। क्यों कई धर्म आजतक एक दूसरे के खून के प्यासे बने हुए हैं, इसे भी इससे जोड़ा जा सकता है। ये सभी अनुभव और विचार शास्त्रों के हैं, जिनका हम यहां यथासंभव वैज्ञानिक विश्लेषण कर रहे हैं। जब आत्मा प्रकाशित या प्रकाशमान हो गया तब तो हर एक वस्तुचित्र या मनतरंग या पूरी दुनिया अपने जैसे ही लगेगी क्योंकि सभी चीजें प्रकाशमान ही हैं। प्रकाश से प्रकाश की कैसी भिन्नता। यह प्रकाश आम प्रकाश से भी बहुत ऊपर मतलब चेतना का प्रकाश होता है।

कुंडलिनी शक्ति कभी नहीं सोती

शरीर में शक्ति गुप्त रहकर सब काम करती है। यह भोजन का पाचन करती है, दिल को धड़काती है, और भी शरीर के छोटे बड़े अनगिनत काम करती है। यह सोई हुई नहीं हो सकती। अगर यह सोई होती तो इतने काम कैसे करती। शायद हम उसे सोई हुई इसलिए कहते हैं क्योंकि आदमी का शरीर गहरी नींद में होने पर भी अनगिनत काम करता रहता है जीवन के, अन्यथा मर न जाता क्या। उससे एक ही काम नहीं होता बस, चेतन विचारों को पैदा करना। इसी तरह सोई हुई शक्ति का मतलब है कि उससे शरीर के सभी काम हो रहे हैं, पर जागृत विचार पैदा नहीं हो रहे। इसे अर्धसुशुप्त अवस्था कह सकते हैं क्योंकि साधारण या धुंधले विचार तो पैदा हो ही रहे हैं। हल्के विचार तो आदमी को नींद में भी आते हैं स्वप्न के रूप में। शक्ति को जगाने का मतलब है उसे सबसे ज्यादा अभिव्यक्त रूप में लाना और वह है कुंडलिनी जागरण। जैसे आदमी के जागने के अनगिनत स्तर हो सकते हैं पर असली जागृति वही है जिसमें वह सबसे ज्यादा अभिव्यक्त होता है, जो कुंडलिनी जागरण ही है। अन्य अवस्थाओं को सुषुप्ति भी कहा जा सकता है। शास्त्रों में अनेक जगह आता है कि यह दुनिया स्वप्न की तरह है। हम जो साधारण जीवन जी रहे हैं, वह स्वप्न ही है, मतलब हम नींद में हैं। असली जागना तो कुंडलिनी जागरण की अवस्था है। सहस्रार से नीचे सब कुंड ही है, मूलाधार सबसे बड़ा कुंड है। क्योंकि अन्य कुंडों से थोड़ा बहुत शक्ति का रिसाव सहस्रार को होता रहता है इसलिए वहां घुप्प अंधेरा नहीं होता। पर मूलाधार में कुंडलिनी होने पर सबसे ज्यादा अंधेरा होता है, क्योंकि यह सहस्रार से सबसे ज्यादा दूर है। आदमी में ही यह ऊर्जा का घूमना खास महत्त्व का है, क्योंकि वह खड़ा होकर चलता है, और मस्तिष्क तक रक्त को पहुंचाने के लिए विशेष ताकत चाहिए होती है। योग से या शारीरिक क्रियाशीलता से जब चक्र पर शक्ति पहुंचने से वहां मांसपेशियों का संकुचन सा होता है, तब वहां खुराक की खपत बढ़ जाती है, इससे वहां खुद ही रक्तसंचार बढ़ जाता है। इसीलिए कहते हैं कि शक्ति रक्तसंचार को नियंत्रित करती है। वैसे सीधे तौर पर वह मांसपेशियों के संकुचन और प्रसारण की गति को नियंत्रित करती है, जिससे रक्तसंचार खुद ही नियंत्रित हो जाता है। पशुओं में पीठ सीधी होने से ऐसा नहीं होता। क्योंकि बंदर, लंगूर , चिंपांजी आदि भी काफी सीधे हो जाते हैं, इसीलिए वे भी चंचल होते हैं ताकि शक्ति बहती रहे व पूरे शरीर में रक्तसंचार सुचारु रूप से चलता रहे।

शरीरविज्ञान के अनुसार शरीर को सिर्फ नर्व फाइबर ही नियंत्रित नहीं करते, बल्कि हार्मोन नामक जैवरसायन भी नियंत्रित करते हैं और अंगों का कुछ अपना स्थानीय नियंत्रण भी होता है। पर नाड़ियां तो पूरे शरीर को सुचारु कर देती हैं। ऐसा तो कभी नहीं सुना गया कि फलां योगी में नाड़ी चालन से कुछ अंग तो दुरस्त हो गए, पर कुछ अंगों पर विशेषकर हार्मोन से नियंत्रित होने वाले अंगों पर कोई असर नहीं पड़ा। इससे तो यह भी लगता है कि नर्व फाइबर को नाड़ियां नहीं कहा गया है। कहते हैं कि नर्व फाइबर में विद्युत ऊर्जा और नाड़ी में प्राण ऊर्जा या शक्ति प्रवाहित होती है। वैसे जब चक्र में हलचल होगी तो वहां हार्मोन बनाने वाले सेल्स भी सक्रिय होंगे और स्थानीय प्रणालियां भी सक्रिय होंगी ही।

शक्ति और ऊर्जा में काफी समानताएं हैं, पर दोनों अलग अलग हैं। ऊर्जा जड़ है, जबकि शक्ति शिव की सन्निधि से चेतन है। ऊर्जा तो किसी भी जड़ चीज या मशीन आदि में हो सकती है, पर शक्ति चेतन प्राणी में ही हो सकती है। कुंडलिनी योग से मूलाधार से ऊपर चढ़ने वाली संभोग आधारित ऊर्जा को इसलिए शक्ति कहा जाता है क्योंकि इससे समाधि जैसी लगती है। साफ शब्दों में कहें तो इससे समाधि चित्र या कुंडलिनी चित्र पुष्ट होता है। और साधारण शब्दों में कहें तो यह परमात्मा की तरफ ले जाती है। क्योंकि इससे दिमाग को ऊर्जा मिलती है, इसलिए अवचेतन मन में दबी ऊर्जा बाहर निकलकर या अभिव्यक्त होकर नष्ट हो जाती है। हालांकि ऐसा शारीरिक क्रियाशीलता से भी होता है, पर इससे भी शक्ति उसी रास्ते से चलती है। मतलब कि शारीरिक हलचल से मूलाधार पर शक्ति इकट्ठी होती रहती है और पीठ से ऊपर चढ़ती रहती है। इसीलिए शरीर से मेहनती लोगों के लिए भी कुंडलिनी योग बहुत फायदेमंद होता है।

कुण्डलिनीयोगानुसार शरीर कभी भी नहीँ मरता, कभी यह दिखता है, कभी नहीं दिखता, रहता हमेशा है, अनुभव के रूप में

सभी मित्रों को होली की शुभकामनाएं

मित्रों, मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि कैसे मन की गतिशीलता पतंग की उड़ान की तरह है। ऐसा लगता है कि प्राणायाम पतंग की डोरी को नियंत्रित गति देने की तरह है, जिससे पतंगरूपी मन अच्छे से और आत्मविकासरूपी आनंद पैदा करते हुए उड़ सके। मुझे तो यहाँ तक लगता है कि जो आनंद यौनक्रीड़ा के दौरान आता है, उसमें भी अनाच्छादित अर्थात नग्न शरीर के सम्पूर्ण उद्घाटन का काफी योगदान है। उसमें तो अन्नमय शरीर और प्राणमय शरीर दोनों एकसाथ उच्चतम अभिव्यक्ति के करीब होते हैं। कई लोग बोलते हैं कि असली प्यार मन से होता है, शरीर से नहीं। ये क्या बात हुई। सीधे कोई कैसे बाहरी तहखानों को लांघे बिना ही सबसे अंदरूनी तहखाने में पहुंच सकता है। जब लड़की के शरीर से हल्की यौन छेड़छाड़ होती है, बेशक अप्रत्यक्ष या मानसिक रूप में ही, तब लड़की का अन्नमय कोष सक्रिय हो जाता है। होली पर इसका अच्छा मौका मिलता है, उसे गवाएं नहीँ। हाहा। उसे पहली बार अपने शरीर की सबसे गहरी पहचान महसूस होती है। वह शरीर से ज्यादा ही सक्रिय व क्रियाशील होने लगती है। उसके मुख पर लाली और मुस्कान छा जाती है। इससे उसका प्राणमय कोष भी सक्रिय हो जाता है। प्राणों से उपलब्ध शक्ति को पाकर उसका मन रंगीनियों में बहुत दौड़ता है। वह हसीन सपने देखती है। सपनों में विभिन्न लोकों और परलोकों का भ्रमण करती है। इससे उसका मनोमय शरीर भी सक्रिय हो जाता है। क्योंकि यौन आकर्षण के कारण उसका ध्यान हर समय अपने शरीर और प्राणों पर भी बना रहता है, इसलिए उसका विज्ञानमय कोष भी खुद ही सक्रिय बना रहता है। उससे स्वाभाविक है, आनंदमय शरीर भी सक्रिय ही रहेगा। यह सब चेन रिएक्शन की तरह ही है। यही तो प्रेमानन्द है। यह आनंदमय कोष लम्बे समय तक सक्रिय बना रहता है। उसके पूरा खुल जाने के बाद तो आत्मा ही बचता है पाने को। वह भी विवाह के बाद तांत्रिक कुण्डलिनीयोग आधारित सम्भोगयोग से मिल ही जाता है। ऐसा नहीं कि यह स्त्री के साथ ही होता है। पुरुष के साथ भी ऐसा ही होता है। मुझे तो लगता है कि स्त्री की लावण्यमयी भावभंगिमा को देखकर जो पुरुष का तन और मन उससे देहसंबंध बनाने को उछालें मारने लगता है, वही उसके प्राणों का क्रियाशील होना है। यह अलग बात है कि कोई उस प्राणशक्ति का सदुपयोग करता है, तो कोई दुरुपयोग। कोई उसे आध्यात्मिक विकास में लगाता है, कोई भौतिक विकास में, और कोई संतुलित रुप से दोनों में।

थोड़ा मन की पतंग को उड़ने दें, एकदम न उतारें। हल्की सी तिरछी सी यह भावना रखें कि यह जुड़ी है। फिर थोड़ी देर बाद पतंग खुद आराम से लैंड करेगी। कोई झटका नहीँ लगेगा। मजा भी आएगा। लैंड होके उसे वापस भी जाने दें इच्छानुसार। खुद वापिस आएगी। अगर पतंग तूफानी जोर से ऊपर जा रही हो, और आप उसे जबरदस्ती नीचे खींचोगे, तो या तो पतंग फट सकती है, या धागा टूट सकता है। दोनों कमजोर तो पड़ेंगे ही, और उन पर दबाव भी बनेगा। ऐसा ही मन के साथ भी जबरदस्ती कर के होता है।

जिस समय दिमाग में थकान, दबाव या सिरदर्द जैसी हो रही हो, उस समय कपालभाति जैसी साँस खुद चलती है। उससे बाहर निकलती साँस पर ध्यान जाता है, जिससे कुण्डलिनी नीचे उतरती है। मतलब बाहर निकलती साँस धागे को नीचे खींचने मतलब खींच की तरह है, जिससे उड़ती हुई मनरूपी पतंग नीचे आती है, और दिमागी थकान रूपी तेज तूफ़ान से फटने से बचती है ।

विचारों के प्रकाश में ही नहीं, उनके अभाव के अंधकार में भी अनुभव शरीर से ही जुड़ा होता है, क्योंकि कुछ न कुछ मस्तिष्क की हलचल उसमें भी रहती ही है। यहाँ तक कि मृत्यु के बाद भी आत्मा का जो विशेष रूप में अनुभव होता है, वह भी शरीर से ही जुड़ा होता है, क्योंकि वह शरीर से ही निर्मित हुआ है। इसका मतलब है कि शरीर कभी भी नहीँ मरता। कभी यह दिखता है, कभी नहीं दिखता, रहता हमेशा है, अनुभव के रूप में।

कुंडलिनी जागरण के लिए भावनात्मक सदमे की आवश्यकता

दोस्तों, मान्यता है कि भावनात्मक सदमे से भी कुंडलिनी जागरण होता है। यदि पहले से ही कुंडलिनी योग किया जा रहा हो, तब तो वह ज्यादा प्रभावी हो जाता है। आज मैं इसी से संबंधित अपना ताजा अनुभव बताऊंगा।

27 साल बाद व्हाट्सएप पर मुलाकात

सीनियर सेकंडरी स्कूल एजुकेशन के बाद कई सहपाठियों से पहली बार मुलाकात 27 साल बाद व्हाट्सएप पर हुई। अच्छा लग रहा था। पुरानी भावनाओं पर हरियाली छा रही थी। उसी क्लास के दौरान मेरी कुंडलिनी सबसे तेजी से विकसित हुई थी। कुंडलिनी का दूसरा नाम प्रेम भी है। सीधी सी बात है कि ग्रुप के सभी सदस्यों के साथ मेरा अच्छा प्रेमपूर्ण संबंध था। ग्रुप मैंने शुरु किया था, हालांकि सदस्यों को जोड़ने का अधिकांश काम एक अनुभवी सदस्या ने किया था। कुछ दिन ग्रुप अच्छा चला। कुंडलिनी का मनोविज्ञान समझने के लिए मैं एक भावनात्मक सदस्या के बारे में विस्तार से जानना चाहता था। लेखन का औऱ कुंडलिनी रिसर्च का मुझे पहले से ही शौक है। सदस्या ने मेरा मेसेज पढ़ा और ट्यूशन आदि के लिए आए बच्चों की पढ़ाई खत्म होने के बाद बात करने का भरोसा उदासीन भाव के साथ दिया। यद्यपि वह पढ़ाई आज तक खत्म नहीं हो सकी। मैंने मान लिया कि पारिवारिक या अन्य मनोवैज्ञानिक कारणों से उसने ठीक ही किया होगा। क्योंकि विश्वास ही कुंडलिनी की पहचान है। पर मुझे उससे भावनात्मक सदमा लगा। वैसा भावनात्मक सदमा मुझे 2-3 बार पहले भी लग चुका था। वास्तव में ऐसा धोखा तब होता है, जब हम मन के संसार को असली मानने लगते हैं। पर वास्तव में दोनों में बहुत अंतर हो सकता है। मन में जो आपका सबसे बड़ा मित्र है, वह असल जीवन में आपका सबसे बड़ा शत्रु हो सकता है। इससे साफ जाहिर है कि प्रेम ही सबसे बड़ा मित्र है, और प्रेम ही सबसे बड़ा शत्रु भी है। एक पालतु पशु अपने मालिक से बहुत ज्यादा प्रेम करता है, और उससे दूर नहीं होना चाहता, पर वही मालिक उसे कसाई के हाथों सौंप देता है। तभी तो कहते हैं कि प्यार या विश्वास अंधा भी होता है। 

मानसिक आघात के बाहरी लक्षणों का पैदा होना

उस आघात से मैं बहुत सेंसिटिव व इमोशनल हो गया था। मैं ग्रुप में कुछ न कुछ लिखे जा रहा था। अन्य सदस्यों की छोटी-2 बातें मुझे चुभ रही थीं। इस वजह से मैंने दो सदस्यों को ग्रुप से निकाल दिया। उससे नाराज होकर एडमिन सदस्या भी निकल गई। हालाँकि मैंने उन्हें उसी समय दुबारा ग्रुप में शामिल कर दिया औऱ कहा कि वे चाहें तो निकाले गए सदस्यों को दुबारा दाखिल कर दें। मैं इमोशनल तो था ही , उससे मुझे उसके बाहर निकलने में भी पार्शियलिटी की बू आई, जिससे मेरा मन और डिस्टर्ब हो गया। उसके बाद उपरोक्त ट्यूशन मैडम जी भी बिना वजह बताए ग्रुप छोड़कर चली गईं। एक-एक करके लोग ग्रुप से बाहर जाने लगे। मैं ग्रुप से बाहर होने के उनके दुख को महसूस करने लगा। वही वजह बता कर मैंने भी भावनात्मक आवेश में आकर ग्रुप से किनारा कर लिया। हालांकि ऐसा चलता रहता है सोशल मीडिया में, पर यहाँ पर कुंडलिनी से जुड़ी संवेदनशीलता की बात हो रही है। उस शाम को मैं काफी रोया। रात को मुझे अपने सिरहाने के के नीचे रुमाल रखना पड़ा। दरअसल वो आँसू खुशी के थे, जो लंबे अरसे बाद दोस्तों से मिलकर आ रहे थे। मेरे पूरे शरीर और मन में थकान छा गई। मेरी पाचन प्रणाली गड़बड़ा गई। 

भावनात्मक सदमे के दौरान कुंडलिनी सर्ज

उसी भावनात्मक आघात वाली शाम को मेरी एनर्जी बार-2 मेरी पीठ से चढ़कर शरीर के आगे के भाग से नीचे उतर रही थी, एक बंद लूप में। कभी-कभी उस एनर्जी के साथ कुंडलिनी भी जुड़ जाती थी। रात को नींद में अचानक बहुत सारी एनर्जी मेरी पीठ में ऊपर चढ़ी। उसके साथ में ऐसा स्वप्न आया कि मैं बहुत बड़े औऱ सुंदर मंदिर के द्वार से अंदर प्रविष्ट हो रहा हूँ। वह एनर्जी मेरे मस्तिष्क में समा रही थी। विशेष बात यह थी कि उस एनर्जी से मेरे मस्तिष्क में बिल्कुल भी दबाव पैदा नहीं हो रहा था, जैसा अक्सर होता है। शायद कई दिनों तक भरपूर नींद लेने से मेरा मस्तिष्क तरोताजा हो गया था। दूसरी वजह यह थी कि भावनात्मक सदमे से दिमाग खाली सा हो गया था। फिर मस्तिष्क में उस एनर्जी के साथ कुंडलिनी जुड़ गई। वह कुंडलिनी जागरण जैसा अनुभव था, यद्यपि उसके स्तर तक नहीं पहुंच सका। 

कुंडलिनी के बारे में वर्णन केवल इसी वैबसाइट में मिलेगा

मैंने हर जगह अध्ययन किया। हर जगह केवल एनर्जी का ही वर्णन है, कुंडलिनी का कहीं नहीं। अधिकांश जगह एनर्जी को ही कुंडलिनी माना गया है। पर दोनों में बहुत अंतर है। बिना कुंडलिनी की एनर्जी तो वैसी भारतीय मिसाइल है, जिस पर भारत का राष्ट्रीय ध्वज अंकित नहीं है। विशेष चीज, जो प्यार की निशानी है, और मानवता का असली विकास करने वाली है, वह कुंडलिनी ही है। एनर्जी तो केवल कुंडलिनी को जीवन्तता प्रदान करने का काम करती है। इस वेबसाइट के इलावा यदि कहीं कुंडलिनी का वर्णन है, तो वह “पतंजलि योगसूत्र” पुस्तक है। उसमें कुंडलिनी को ध्यानालम्बन कहा गया है। अधिकांश लोगों के मन में कुंडलिनी व शक्ति (एनर्जी) के स्वभाव के बीच में कन्फ्यूजन बना रहता है।

एक पुस्तक जिसने मुझे हर बार भावनात्मक सदमे से बचाया और उससे बाहर निकलने में मेरी मदद की

वह पुस्तक है, “शरीरविज्ञान दर्शन”, जो इस वेबसाइट के “शॉप (लाईब्रेरी)” वेबपेज पर उपलब्ध है। विस्तृत जानकारी के लिए इस लिंक पर जाएं।

अद्वैत भाव के साथ मदिरा ही सोमरस या एलिकसिर ऑफ़ लाइफ है

उपरोक्त पुस्तक के साथ मदिरा ने मेरे रूपांतरण के साथ मेरी कुंडलिनी या आत्मा का विकास भी किया। खाली मदिरा कुंडलिनी को हानि पहुंचाती है। इस भावना के साथ थोड़ी सी मदिरा का भी बहुत ज्यादा असर होता था, और मदिरा की लत भी नहीं लगती थी। इसका अर्थ है कि पुराने समय में जो सोमरस या एलिकसिर ऑफ़ लाइफ बताया गया है, वह अद्वैत भावना वाले विधिविधान के साथ व उचित मात्रा में सेवन की गई उच्च कोटि की मदिरा ही है, कोई अन्य जादुई द्रव नहीं। देवता भी इसका पान करते हैं। 

प्रेम या सम्मान, दोनों में से एक से संतुष्ट हो जाते।
अन्यथा अपनी भावनाओं के भंडार की राह को प्रकाशित कर देते, हम स्वयं ही अन्वेषण कर लेेते।।

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कुंडलिनी सभी प्रकार के अनुभवों को सुरक्षित रूप से झेलने की शक्ति देती है; और कुण्डलिनी जागरण तो सबसे बड़ा अनुभव है, जिसके आगे सभी अनुभव बौने हैं; प्रेत आत्मा से सामना होने की कुछ घटनाएं

दोस्तों, पिछली पोस्ट में मैंने ड्रीम विजिटेशन के बारे में बताया था। इस पोस्ट में मैं उससे संबंधित अपने अनुभवों के बारे में बताऊंगा।

आदमी (आत्मा) की मृत्यु नहीं होती, वह केवल रूप बदलता रहता है

आज से दो वर्ष पहले मेरी दादी जी का देहांत हो गया था। बुढ़ापा मृत्यु का मुख्य कारण रहा, हालांकि उसमें एक अनजानी सी लंबी बीमारी का भी योगदान था। यह भी संयोग ही है कि उन्हें श्वासरोग की भी समस्या थी, और कोरोना(कोविड-19) भी श्वासरोग ही फैला रहा है। बहुत से शारीरिक व मानसिक कष्टों के बीच में उन्होंने अपने प्राण छोड़े। स्वभाव से वे कोमल, भावनाप्रधान, सुखप्रधान व भीरु स्वभाव की थीं। कई बार तो वे अपनेपन की मोहमाया से ग्रस्त लगती थीं, पर वे उसे प्रेमभावना कहती थीं। दयालु, मानवतापूर्ण व ममतामयी स्वभाव की मूर्ति थीं। मेहनती थीं और अच्छे-बुरे की अच्छी परख रखती थीं। अपनों के सुख व भले के लिए चिंतित रहा करती थीं। वे बच्चों से बहुत प्यार करती थीं। बच्चों को वे जरा भीडांटने नहीं देती थीं, उन्हें गुस्से में हाथ भी लगाना तो दूर की बात रही। वे पालतु जानवरों की भी बहुत देखरेख रखती थीं। वे बहुत सोच-विचार करा करती थीं। मरने से और उसके बाद की दुर्गति से बहुत डरती थीं। उनकी मृत्यु के लगभग 15 दिन बाद मेरी उनसे सपने में मुलाकात हुई। अजीब सा शांतिपूर्ण अंधेरा था। मुट्ठी में भरने लायक घना अंधेरा था। पर आम अंधेरे के विपरीत उसमें चमक थी चमकीले काजल की तरह। वह मोहमाया या अज्ञान से दबी हुई आत्मा की स्वाभाविक चमक होती है। उस अंधेरे के रूप में भी मैं उन्हें स्पष्ट पहचान रहा था। इसका मतलब है कि उस अंधेरे में उनके रूप की एनकोडिंग थी। मतलब कि किसी आदमी की आत्मा का अंधेरा उसके गुण और रूप के अनुसार होता है। उसी अंधेरे से अगले जन्म में वही गुण और कर्म फिर से प्रकट हो जाते हैं। इसका अर्थ है कि सभी अंधेरे एक जैसे नहीं होते।

उनका वह रूप मुझे अच्छा लगा। वह आकाश की तरह पूरा खुला हुआ और विस्तृत था। वह मुझे अपनी क्षणिक आत्मज्ञान की अनुभूति की तरह लगा। परन्तु उसमें प्रकाश व आनंद वाला गुण किसी चीज के दबाने से ढका हुआ जैसा लग रहा था। शायद यही दबाव अज्ञान, आसक्ति, द्वैत, मोहमाया, कर्मसंस्कार आदि के नाम से जाना जाता है। ऐसा लगा जैसे ग्रहण काल में आसमान के आकार का सूर्य पूरा ढका हुआ हो, और नीचे का प्रकाश उस काले आसमान को कुछ अजीब सी या चमकीले काजल जैसी चमक देता हुआ बाहर की तरफ उमड़ना चाह रहा हो। इसे ही अज्ञान के पर्दे से आत्मा का ढकना कहते हैं। इसे ही अज्ञान रूपी बादल से आत्मा रूपी सूर्य का ढकना भी कहते हैं।

मैंने उनसे उनका हालचाल पूछा तो उन्होंने कहा कि वहाँ पर तो ऐसी-वैसी कोई दिक्कत नहीं थी। उन्होंने मेरा हाल पूछा तो मैंने कहा कि मैं ठीक था। उन्होंने कहा, “मैं तो वैसे ही डरती थीं  कि मरने के बाद पता नहीं क्या होता होगा। पर मैं तो यहाँ ठीक हूँ”। उन्हें वह स्थिति कुछ शक के साथ पूर्ण जैसी लग रही थी, पर मुझे उसमें कमी लग रही थी। शायद वे उस स्थिति को भगवान ही समझ रही हों। शायद वह उस स्थिति के बारे में जानने के लिए मुझसे संपर्क कर रही हों। मैंने प्रसन्न मुद्रा में आसमान की तरफ ऊपर हाथ उठाकर और ऊपर देखते हुए उन्हें उनके अंत समय के निकट कहा भी था कि वे सबसे ऊपर के आकाश लोक में जाएंगी, जिसे उन्होंने गौर से व विश्वास के साथ सुना था। ऐसा मैंने उनके ऐसा पूछने पर कहा था कि उस लाईलाज बिमारी के बाद वह कहाँ जा रही थीं। उनके उस विश्वास की एक वजह यह भी थी कि मेरे दादाजी ने लगभग 25 वर्ष पहले उन्हें मेरे सामने मेरे आत्मज्ञान के बारे में प्रसन्नता व बड़े आत्मगौरव के साथ बताया था। मेरी कुंडलिनी के निर्माण में मेरे दादाजी का बहुत बड़ा योगदान रहा था।

फिर उस ड्रीम विजिटेशन में मेरी दादीजी ने मुझसे कहा, “तेरे बहुत से अहितचिंतक पीठ पीछे तेरे विरुद्ध बोल रहे हैं”। तो मैंने उनसे कहा, “आप भगवान के बहुत नजदीक हो, इसलिए कृपया उनसे स्थिति सामान्य करने के लिए प्रार्थना करो”। उन्होंने कहा, “ठीक है”। मैं उस समय प्रतिदिन कुण्डलिनी योग कर रहा था। इसका अर्थ है कि कुंडलिनी (अद्वैत) मृत्यु के बाद ईश्वर की तरफ ले जाती है।

प्रेतात्मा के द्वारा भगवान का स्मरण करना बहुत बड़ी बात है, क्योंकि उस समय वह पूरी तरह से भूखी-प्यासी व आश्रय विहीन होती है। हो सकता है कि उससे उन्हें भगवान की तरफ गति मिल गई हो। आश्चर्य की बात है कि जिस स्थान पर उन प्रेतात्मा के लिए धार्मिक रीति के अनुसार जल का कलश रखा हुआ था, वहीं पर उनसे मुलाकात हुई। वहां पर एक शिवलिंग टेलीफोन सेट का काम कर रहा था, जिसके माध्यम से उनसे बात हो रही थी। बड़ी स्पष्ट,भावपूर्ण व जीवंत आवाज थी उनकी। वह मुंह से निकली हुई आवाज नहीं थी। वह सीधी उनकी आत्मा से आ रही थी और मेरी आत्मा को छू रही थी। ऐसा लग रहा था कि जैसे कोई स्विच दबा और मैं शरीर रहित आयाम में प्रविष्ट हो गया था। फिर मैंने परिवार के और सदस्यों से उनकी बात करानी चाही। पर वे लोग उन्हें मरा हुआ मान रहे थे। फिर मुझे भी उनके मरे हुए होने का भान हुआ। मैं तनिक दुखी होकर विलाप करने लगा और थोड़ा डर सा गया। उससे वह आत्मा ओझल हो गई और मैं एकदम से आत्मा के आयाम से बाहर आ गया।

प्रियजनों की आत्मा आने वाले खतरे का बोध भी करवाती है

कुछ महीनों बाद मैंने उन्हें बड़ी भयावह अवस्था में देखा। वह शायद वैसी ही स्थिति थी, जैसी उन्होंने अपनी मृत्यु के समय महसूस की होगी। मैंने उन्हें अपने पुश्तैनी घर के बरामदे में मृत रूप में जीवित बैठे देखा। वह बड़ा विचित्र व क्लेशपूर्ण अनुभव था। शायद वह मुझे अगले दिन होने वाली दुर्घटना के बारे में बताना चाह रही हों, पर बोल नहीं पा रही हों। अगले दिन मेरे कमरे की खिड़की पर एक जहरीला कोबरा सांप था, जिससे मेरा कर्मचारी बाल-बाल बच गया।

एकबार मैंने उन सूक्ष्म शरीर को फिर से भगवान की याद दिलाई

वह किसी रिश्तेदार के यहाँ आराम से सबके साथ बाहर बैठी थीं। मेरी मुलाकात होने पर मैंने उन्हें ईश्वर की याद दिलाई। वह धीरे-2 भवन के अंदर को सरक गईं और ओझल हो गईं। उनका रूप पहले से कुछ अधिक स्वच्छ लग रहा था। सूक्ष्म शरीर भगवान के तेज को ज्यादा देर सहन नहीं कर सकता।

अंतिम बार मैंने उन सूक्ष्म शरीर को बहुत निर्मल देखा

वे मेरे पुश्तैनी घर के मुख्य गेट से बरामदे में प्रविष्ट हो रही थीं। उन्होंने उज्ज्वल सफेद कपड़े पहन रखे थे। वे बहुत निर्मल, शान्त व आनन्दमयी लग रही थीं। उनसे मिल कर मेरा रोम-2 खिल उठा। उन्होंने मुझसे पूछा कि मैं कहाँ गया था। मैंने कहा कि मैं हरिद्वार गया था। हरिद्वार भगवान का सबसे बड़ा तीर्थ माना जाता है। यह विश्वप्रसिद्ध योग राजधानी ऋषिकेश के नजदीक स्थित है। वे मुस्कुराते हुए व मुझसे यह पूछते हुए भवन के अंदर प्रविष्ट हुईं कि क्या मैं उससे पहले हरिद्वार नहीं गया था। उनका पूछने का मतलब था कि मैं पहले भी तो हरिद्वार गया हुआ था।

जब मेरे चाचा का सूक्ष्म शरीर मुझे चेतवानी देने आया था

उससे कुछ समय पहले मेरे चाचा की मृत्यु हाईपर थायरेडिसम बीमारी के कारण अचानक हृदय गति रुकने से हुई थी। वे बड़े मिलनसार व सामाजिक होते थे। ड्रीम विजिटेशन में मुझे वे अपनी मित्रमण्डली के साथ होहल्ला व हंसी मजाक करते हुए एक विचित्र सी अंधेरी पर शांत गुफा के अंदर चलते मिले। मैं और मेरी 5 साल की बेटी भी कुछ अजीब, चन्द्रमा की रौशनी से मिश्रित अंधेरे वाली और आनंद वाली जगह पर कुछ सीढ़ियां चढ़ कर उनके पीछे चल दिए। गुफा के दूसरे छोर पर बहुत तेज स्वर्ग के जैसा प्रकाश था। चाचा ने मुझसे मुस्कुराते हुए अपने साथ चलने के लिए पूछा। मैंने अनहोनी की आशंका से मना कर दिया। मेरी बेटी को वह नजारा बड़ा भा रहा था, इसलिए वह उनके साथ चलने के लिए जिद करने लगी। मैंने उसे बलपूर्वक रोका और हम गुफा से बाहर वापिस लौट आए। अगले दिन मेरी कार सड़क से बाहर निकलने से बाल-2 बच गई। साथ बैठी हुई मेरी फैमिली ने मुझे समय रहते चेता दिया था।

अपरिचित की आत्मा भी ड्रीम विजिटेशन में सहायता माँग सकती है

मेरे एक रिश्तेदार के लड़के को सपने में एक मंदिर के साधु बार-2 आकर अपना अंतिम संस्कार करने के लिए कहते थे। खोजबीन करने पर पता चला कि उन साधु की हत्या हो गई थी और उनकी लाश को नाले में फेंक दिया गया था। मेरे उन रिश्तेदार ने साधु का पुतला बनवाया और उसका विधिवत अंतिम संस्कार करवाया। उसके बाद उन साधु का सपने में आना बंद हो गया। मैं उस बात पर यकीन नहीं करता था। पर अपने खुद के उपरोक्त ड्रीम विजिटेशन के अनुभव के बाद वैसी अलौकिक घटनाओं पर विश्वास होने लग गया।

कुण्डलिनी से प्रेमी की मृत आत्मा का ईश्वर अर्थात मुक्ति की ओर दिशा निर्देशन; कुंडलिनी योग द्वारा ड्रीम विजिटेशन में सहायता प्राप्त होना

कोरोना महामारी(कोविड-19) के कारण बहुत सी आत्माएं अपने-2 शरीरों से विदा ले रही हैं। सभी आत्माएं अपने सूक्ष्म शरीर के अनुसार नया जन्म लेंगीं।कुछ आत्माएं मुक्त भी हो जाएंगीं। मुझे लगता है कि यह अपनी सोच के अनुसार होता है। मरने के बाद सूक्ष्म शरीर खुद ही धीरे-2 साफ होता रहता है। कुछ आत्माओं का शुरुआती अंधेरे में दम घुटने लगता है, और वे लंबा वेट नहीं कर सकतीं। इसलिए वे शरीर ग्रहण कर लेती हैं। मृत्यु के बाद की उस डरावनी स्थिति को”तिब्बतन बुक ऑफ डैडस” में बारडो कहा गया है। बारडो की स्थिति में बड़े डरावने अनुभव होते हैं। उनसे डरना नहीं चाहिए, तथा यह मान कर चलना चाहिए कि वे असली नहीं हैं, बल्कि सब मन में हो रहे हैं। कुण्डलिनी योग की अद्वैत शक्ति से उस बारडो अवस्था को पार करने में बहुत मदद मिलती है।


ड्रीम विजिटेशन साधारण स्वप्नों से अलग होते हैं


भावनाप्रधान लोगों का अपने प्रियजनों से गहरा दिल का रिश्ता बना होता है। वे मृत्यु के बाद भी प्रेमी जनों से मेलजोल बनाए रखना चाहते हैं। इसलिए वे प्रेमीजनों के सपनों में अक्सर प्रकट होते रहते हैं। इसे ड्रीम विजिटेशन कहते हैं। कई बार वे सहायता मांगने आते हैं, और कई बार सहायता प्रदान करने। उन प्रेमीजनों में अधिकांशतः परिवार के लोग या रिश्तेदार होते हैं। ज्यादातर मामलों में शरीर विहीन आत्मा अपने एक ही परम प्रिय और परम विश्वसनीय आदमी को चुनती है। इसीलिए वह एक ही आदमी के सपने में बार-2 आती रहती है। ऐसा कुण्डलिनी सिद्धांत के अनुसार ही होता है।

मृत आत्मा का साक्षात्कार साधारण स्वप्न से अलग होता है

इसमें ऐसा लगता है कि सचमुच के जीवित आदमी से मुलाकात हो रही है। यहाँ तक कि वह जीवित आदमी से भी ज्यादा वास्तविक लगती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जिस कोड रूप में उस आत्मा के पिछले और आगे होने वाले जन्मों और शरीरों का ब्यौरा छुपा होता है, उस मूलभूत कोड (सूक्ष्म शरीर) से साक्षात्कार हो रहा होता है। ड्रीम विजिटेशन के समय डरना नहीं चाहिए। आगे के लिए भी मन पक्का कर लेना चाहिए, क्योंकि वह आत्मा बार-2 सपने में आती है।धीरे-2 आदत पड़ जाती है।अभ्यास होने पर तो आत्मा के साथ लंबे समय तक बातें की जा सकती हैं, नहीं तो वह शीघ्र ही ओझल हो जाती है। कुण्डलिनी योग साधना की अद्वैत शक्ति से उस डर पर विजय पाने में मदद मिलती है।

आत्माओं को नया शरीर अपने सूक्ष्म शरीर के अंधेरे के अनुसार छोटा या बड़ा मिलता है

जो आत्माएं बारडो के अंधेरे के छंटने का जितना लंबा वेट करती हैं, उन्हें उतना ही अच्छा शरीर मिलता है। कई आत्माएं बहुत साफ हो जाती हैं, इसलिए वे देवता बन जाती हैं। बहुत कम सहनशील व खुशनसीब आत्माएं जो पूरी तरह से अपनी सफाई का वेट कर लेती हैं, केवल वे ही मुक्त होकर ईश्वर में मिल जाती हैं। इसलिए परिस्थिति व विश्वास के अनुसार यह गैर हिंदू मत भी सत्य है कि आदमी का पुनर्जन्म नहीं होता, और यह हिंदु मत भी सत्य है कि मृत्यु के बाद आदमी का पुनर्जन्म होता है। हालांकि मुक्त होने के लिए अच्छे कर्मों का होना भी जरूरी होता है। यदि ऐसा न होता तब तो महाप्रलय काल में सभी आत्माएं अपने आप मुक्त हो जातीं। उस काल में तो करोड़ों वर्षों तक शरीर नहीं मिलता। वेद कहते हैं कि उस काल में भी आत्मा आप अपने आप मुक्त नहीं होती। दूसरी बात वेदों में यह भी कही गई है कि मृत्यु के समय ईश्वर का स्मरण होने से मुक्ति मिल जाती है। पर यह भी सत्य है कि जीवन भर शुभ कर्म करने से ही मृत्यु के समय ईश्वर का स्मरण हो पाता है। इसका मतलब है कि शुभ कर्मों की कतई अनदेखी नहीं करनी चाहिए।

अगली पोस्ट में मैं अपने ड्रीम विजिटेशन के उन निजी अनुभवों के बारे में बताऊंगा जिनसे मैंने उपरोक्त तथ्य निकाले हैं।

कुण्डलिनी से सुहाने सपने

दोस्तों, अब मुझे हर हफ्ते नई पोस्ट लिखने के लिए खुद ही हिंट मिल जाती है, और नई घटना भी। आज रात को मैंने एक तंत्र से सम्बंधित स्वप्न देखा। वह जीवंत, स्पष्ट व असली लग रहा था। वह स्वप्न सुबह के समय आया। ऐसा लग रहा था कि वह मेरी किसी पूर्वजन्म की घटना पर आधारित रहा होगा। तभी तो मैं उसमें भावनात्मक रूप से बहुत ज्यादा बह गया था, और मुझे आनंद भी आया। उस स्वप्न से प्राचीनकाल के तंत्र के बारे में मेरे मन में तस्वीर स्पष्ट हो गई। वैसे भी एक कुण्डलिनी योगी का पुरानी या अपने पूर्वजन्मों की घटनाओं से सामना उसके स्वप्न में होता ही रहता है। वे सारे स्वप्न बहुत मीनिंगफुल होते हैं।

प्राचीनकाल में तंत्र बहुत उन्नत था

उस सपने में मैंने देखा कि मैं अपने परिवार सहित एक ऊंचे पहाड़ के किसी पर्यटक स्थल जैसे स्थान पर था, जहां पर चहल-पहल थी, व बहुत आनंद आ रहा था। कुछ पुराने परिचितों से भी वहां मेरी मुलाक़ात हुई। उस पहाड़ की तलहटी एक मैदानी जैसे भूभाग से जुड़ी हुई थी। उस जोड़ पर एक विशालकाय मंदिर जैसा स्थान था। हम नीचे उतर कर उस मंदिर परिसर में प्रविष्ट हो गए। चारों और बहुत सुन्दर चहल-पहल थी। बहुत आनंद आ रहा था। परिसर में एक प्रकाशमान गुफा जैसी संरचना भी थी, जिसके अन्दर भी बाजार सजे हुए थे। मेरी पत्नी उसमें घुमते-फिरते और शौपिंग करते हुए कहीं मुझसे खो गई थी। मैं उसे भी खोज रहा था। उस खोजबीन में मैंने मंदिर के बहुत से कमरे देखे, जो लाइन में थे. हालांकि कुछ कमरे सीढ़ियों से कुछ ऊपर चढ़कर भी थे। ऐसा लग रहा था, जैसे कि सारा मंदिर परिसर किसी विशालकाय छत के नीचे था। नीचे की पंक्ति के एक कमरे में मैं घुस गया। वहां पर बहुत से लोग नीचे, एक दरी पर बैठे थे। वहां पर बीच में जैसे मैंने अपना बैग पीठ से उतार कर रख दिया, और मैं भी बैठ गया। तभी एक महिला अन्दर आई, और मुझे बड़े प्यार व अपनेपन से अपने साथ, गलियों से होते हुए, सीढ़ियों के ऊपर के एक कमरे तक ले गई। उससे कुछ पुरानी जान-पहचान भी महसूस हो रही थी, पर वह स्पष्ट नहीं थी। शायद इसीलिए मुझे उसके साथ आनंद आ रहा था। एक-दो स्थान पर उसने मुझे अपना स्पर्श भी करवाया। वह उस कमरे में एक कुर्सी पर बैठ गई। उसके सामने मेज पर बहुत से कागजात पड़े थे। उसके समीप ही दो-चार पुरुष लोग भी कुर्सियों पर बैठे हुए थे। महिला ने किसी बीमा जैसी योजना के कुछ कागजात जैसे दिखाए, और मुझसे कहा कि मेरी पत्नी ने उस योजना के लिए हामी भरी थी। मैं मुकरने लगा, तो उसके चेहरे पर कुछ हलकी मायूसी जैसी दिखी। तभी वे लोग कुछ अन्य ग्राहकों का काम निपटाने लगे, जिससे मैं मौक़ा पाकर वहां से खिसक गया। मैं वापिस उसी कमरे में आ गया, जहां पहले बैठा था, क्योंकि मैं अपना बैग वहीं भूल गया था। पर मुझे अपना बैग वहां नहीं मिला। मैं काफी उदास हुआ, क्योंकि उसमें कुछ अन्य जरूरी चीजों के साथ मेरा महँगा किन्डल ई-रीडर भी था। मैं बहुत निराश होकर बैग खोजने लगा। मैंने कई कमरों में तलाश की, यह सोचकर कि कहीं मैं दूसरे कमरों में तो नहीं बैठा। मैं फिर बीच वाली खुली लॉबी में गया, जिसके अन्दर वे कमरे खुलते थे। वह एक रेलवे स्टेशन की तरह बहुत खुली-डुली जगह थी, जहाँ पर काफी चहल-पहल थी। वहां एक-दो पुलिस वाले भी सीमेंट के बेंच पर बैठे हुए थे। उनसे पूछा, तो उन्होंने लापरवाही से व मुझसे पीछा छुड़ाने के लिए कहा कि मेरा बैग कभी नहीं मिलेगा, और उसे किसी ने उठा लिया होगा। मैंने फिर से उसी कमरे का दरवाजा खोला, जहां मैं बैठा हुआ था। वहां पर दो भद्र पुरुष नाईट सूट में मदिरा पीने का आनंद ले रहे थे। वे दोनों पालथी लगा कर आराम से बैठे फुए थे। वे मध्यम कद-काठी के और कुछ सांवले लग रहे थे। मदहोशी की ख़ुशी की मुस्कान उनके चेहरे पर साफ झलक रही थी। पूछने पर उन्होंने मुझे बताया कि मेरा बैग वहीं कमरे में पड़ा था। मैं बहुत खुश हुआ और उनसे कहा कि शराब से आपके अन्दर ज्ञान की आँख खुली, जिससे आप मेरा बैग ढूंढ सके। वे बहुत खुश होकर मुस्कुराने लगे, और एक पेग हाथ में पकड़ कर मुझसे बोले कि मैं भी उसे देवी माता के नाम पर पी लेता। मैंने उन्हें मुस्कुराते हुए धन्यवाद कहा, और चल दिया। यद्यपि मेरा मन लगातार कर रहा था कि मैं एक पेग देविमाता के नाम पर लगा लेता। परन्तु मैं उन्हें मना कर चुका था, इसलिए वापिस नहीं मुड़ना चाहता था। परिसर से बाहर निकल कर ही दुकानों की एक कतार लगी हुई देखी। मैं एक मिठाई की दुकान में कुछ मिठाई खरीदने के लिए घुस गया। वहां पर दुकान के शुरू में ही खड़े मुझे कुछ चिर-परिचित दोस्त मिले, जो ख़ुशी के साथ शराब के बारे में कुछ आपसी बातें करने लगे। मैंने कहा कि ऐसी बातें न करो, नहीं तो मेरा मन भी देवी माता के नाम पर एक पेग लगाने का कर जाएगा। ऐसा सुनकर सब हंसने लगे। उन दुकानों की कतार वाली सड़क चढ़ाई की दिशा में बाहर जा रही थी। कुछ चढ़ाई चढ़ कर मैं निचले तरफ की एक दुकान के सीमेंट से बने पक्के प्लेटफोर्म पर चढ़ गया। तभी मुझे विचित्र व दिल को छूने वाले गाजे-बाजे/संगीत की आवाजें सुनाई देने लगीं। वह सजे हुए रथ पर देवी माता की झांकी निकल रही होगी। मैं देवी माता के प्यार मैं इतना बह गया कि मेरी आँखों में प्रेम के आंसुओं की बाढ़ आ गई, और मैं हलकी आवाज में रुक-२ कर रोने लगा। मैं बार-बार अपनी दाहिनी बाजू को फोल्ड करके, उससे अपनी आँखों को पोंछ रहा था, और आँखों को ढक भी रहा था। वह मैं इसलिए कर रहा था, ताकि कोई मुझे रोता हुआ जानकार अजीब न समझे, और उससे मेरे प्यार की भावना में बहने में रुकावट न पैदा हो। फिर मैंने सोचा कि उस अजनबी स्थान पर मुझे कोई नहीं पहचानता होगा। इसलिए मैं खुले दिल से जोर-जोर से रोने लगा। तभी मुझे एक लेटा हुआ भक्त सड़क पर दिखा, जो रोल होकर ऊपर की तरफ आ रहा था। वह देवी माता का कोई महान भक्त होगा। वह भी मध्यम से सांवले रंग का था। उसने खड़े होकर मुझे बड़ी-बड़ी व भावपूर्ण आँखों से देखा, और वह भी मानो भावना में बह गया। तभी मैंने देखा कि एक सांवले व ताकतवर आदमी ने एक बकरी के बच्चे को एक हाथ से सीधा अपने सिर से भी ऊपर, गले से पकड़ कर उठाया हुआ था, और उसे देवी माता की भक्ति के साथ मिश्रित क्रोध व हिंसक भाव के साथ देख रहा था। किड मिमिया रहा था। उसका दूसरा हाथ सीधा नीचे की ओर था, जिसमें उसने एक बड़ा सा खंजर पकड़ा हुआ था। वह बार-बार देवी माता का नाम ले रहा था। मैं पीछे हट कर दुकान की ओट में आ गया, ताकि वह निर्दयी दृश्य मुझे न दिखता। थोड़ी देर बाद, मैं आगे को खिसका ताकि मैं देख सकता कि क्या वहां पर किड के जुदा किए हुए धड़ और सिर थे, और चारों तरफ फैला हुआ खून था। परन्तु वहां पर सभी किड पहले की तरह ज़िंदा थे, और ख़ुशी से हिल-डुल रहे थे। उससे मैंने चैन की सांस ली, और ख़ुशी महसूस की। शायद सांकेतिक रूप में ही देवी माता को भेंट चढ़ा दी गई थी। तभी अलार्म बजा, और मेरा स्वप्न टूट गया।

उस स्वप्न से मुझे प्राचीनकाल के उन्नत तंत्र, विशेषकर काले तंत्र के बारे में स्पष्ट अनुभूति हुई। प्राचीनकाल में तंत्र एक उन्नत विज्ञान के रूप में था, और जन-जन में व्याप्त था। परन्तु उसके साथ हिंसा, व्यभिचार आदि के बहुत से दोष भी बढ़ जाते थे, विशेषतः जब उसे उचित तरीके से नहीं अपनाया जाता था। तंत्र के दुरूपयोग के कारण ही इसकी अवनति हुई। इस्लाम भी एक प्रकार का अतिवादी तंत्र ही है। यह इतना कट्टर है कि लोग इस बारे बात करने से भी कतराते हैं। इसीलिए यह जस का तस बना हुआ है। हिन्दु तंत्र में भी प्राचीनकाल में नरबली की प्रथा था, परन्तु उसका व्यापक विरोध होने पर उसे बंद कर दिया गया।

प्रेमयोगी वज्र का तंत्र सम्बंधित अपना अनुभव

उसने कुण्डलिनी के विकास के लिए किसी विशेष तंत्र का सहारा नहीं लिया। उसने वही काम किए, जो दूसरे सामान्य लोग भी करते हैं, पर उसने उन कामों को अद्वैतपूर्ण/तांत्रिक दृष्टिकोण के साथ किया। यही तरीका उचित भी है। इससे तंत्र का दुरुपयोग नहीं होता।    

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