गृह- 6

कुंडलिनी के संबंध में विवाद

रूट चक्र में कोई भौतिक गड्ढा नहीं है, जहां एक वलायाकृत सांप के आकार में कोई भी शारीरिक कुंडलिनी निष्क्रिय के रूप में लेती हुई हो। इन सभी अलंकृत प्रकारों में साधारण सांसारिक लोगों को खुश / प्रेरित करने के लिए केवल दार्शनिक तुलना और सौंदर्यीकरण किया गया है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि कुण्डलिनीप्रकरण के साथ जैव-भौतिक क्रियाएं भी चलती हों, लेकिन कुंडलिनीयोग में वर्णित सबकुछ केवल अनुभवात्मक ही है। दरअसल, प्रत्येक मानसिक छवि सर्वव्यापक चेतना का एक प्रकार का कुंडलित या संकुचित या घटा हुआ रूप ही है। जब सभी चक्र स्पष्ट होते हैं, तो वह छवि एक सांप, एक कीड़ा इत्यादि रूपों में मस्तिष्क की ओर, ऊपर चढ़ते हुए दिखाई दे सकती है, अन्यथा वह पथ के बीच में दिखे बिना ही बंदर की तरह अचानक कूद सकती है, जैसा कि प्रेमयोगी वज्र के साथ हुआ था। एक बार प्रेमयोगी वज्र ने अपनी मानसिक छवि (वह आध्यात्मिक बूढ़ा आदमी) को अपने बेस चक्रों से गर्म हवा के गुब्बारे की तरह उभरकर अपने मस्तिष्क की ओर जाते हुए, अदृश्य रास्ते की यात्रा करते हुए व लगभग 3-4 सेकंड का कुल समय लेते हुए अनुभव किया। संभवतः इन सभी विस्तारों को अभ्यास के साथ अनुभव किया जाता है, हालांकि कुंडलिनी-जागृति के लिए ये आवश्यक प्रतीत नहीं होते। कुंडलिनी भौतिक चीज़ की तरह कुछ भी नहीं है, हालांकि वह जागृत होने पर किसी भी भौतिक इकाई की तुलना में अधिक वास्तविक और स्पष्ट दिखाई देती है। दरअसल, कुंडलिनी की कल्पना की जानी चाहिए। इसी प्रकार, चक्र कोई भौतिक चीजें नहीं हैं, लेकिन ये केवल अनुभवात्मक हैं। वे शरीर बिंदु जहां आसपास के क्षेत्र की तुलना में वह छवि अधिक स्पष्ट है, उन्हें चक्र कहा जाता है। यह अभ्यास के साथ सब स्पष्ट हो जाता है। इसी तरह, नाड़ियाँ भी (कल्पनाओं / संवेदनाओं के मस्तिष्कीय / गैर-मस्तिष्कीय रास्ते) कोई भौतिक वस्तु नहीं हैं। वे केवल सूक्ष्म पथ हैं, जिनका केवल छवि के साथ अनुमान लगाया जा सकता है, जैसे कि आकाश मार्ग का उस पर चल रहे एक विमान के साथ निर्णय लिया जाता है / अनुमान लगाया जाता है, उसे अलग रूप में वैसे अनुभव नहीं किया जाता है, जैसे कि कोई भौतिक इकाई हो। आप उस काल्पनिक / आभासी / अनुमानित पथ को नाड़ी कह सकते हैं, जिस पर कुंडलिनी छवि ऊपर की ओर बढ़ती है। मस्तिष्क तो केवल मस्तिष्क है। यह केवल एक चक्र है। आज्ञा और सहस्रार चक्रों में इसे विभाजित करने की कोई आवश्यकता नहीं है। चक्रों पर लोटस / कमल (तंत्र में भी इसका एक यौन-अर्थ है), रंगों, मन्त्रों इत्यादि को केवल चक्रों पर कुंडलिनी-छवि की पूजा करने के लिए स्थापित किया गया है, ताकि उसे और अधिक संतुष्ट और व्यक्त किया जा सके। आज लोगों के पास इस तरह की विस्तृत और भ्रमित करने वाली औपचारिकताओं को निष्पादित करने के लिए पर्याप्त खाली समय और मस्तिष्क उपलब्ध नहीं है। एक सामान्य तरीके से, कुंडलिनी-जागरण ऐसी गतिविधियों के बिना एक दुःस्वप्न की तरह प्रतीत होता है। केवल तंत्र ही इन औपचारिक गतिविधियों का उल्लंघन कर सकता है, और इस प्रकार कुंडलिनी योग को बहुत सरल बना सकता है। इसलिए बुनियादी और सरल कुंडलिनी योग को तांत्रिक प्रथाओं के साथ आगे बढ़ाया गया है, जो आज के व्यस्त व तकनीकी समय के लायक है। कुंडलिनी योग का अपना अलग आधार नहीं है, लेकिन यह केवल शास्त्रीय पतंजलियोग या राजयोग का तकनीकी संवर्धन ही है। शायद राज योग मस्तिष्क के अंदर सीधे और निरंतर रूप से कल्पित की गई कुंडलिनी-छवि को पोषित करने की सलाह देता है। यह सामान्य सांसारिक लोगों के लिए बहुत अधिक अव्यवहारिक, अप्रभावी और मुश्किल हो जाता है। इन समस्याओं को हल करने के लिए, कुंडलिनी योग तैयार किया गया है, जो कुंडलिनी को बढ़ाने और मूल राजयोग को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए यौनसिद्धांत को उसके साथ नियोजित करता है। वह यौन सिद्धांत कहता है कि यौन क्षेत्र में पोषित मानसिक छवि को, उसके सक्रियण के लिए मस्तिष्क तक उठाना और उसे लगातार अभ्यास के साथ जागृत करना बहुत आसान है। यह हमारे दैनिक जीवन में भी स्पष्ट है, जहां यौनाकर्षण या यिन-यांग आकर्षण सामाजिक जीवन के सबसे शक्तिशाली और निर्णायक कारक के रूप में देखा जाता है। कुंडलिनी योग में मुख्य रूप से वही प्राकृतिक और तांत्रिक सिद्धांत नियोजित किया गया है। यही कारण है कि शक्तिशाली यौनयोग को कुंडलिनीयोग की चोटी के रूप में जाना जाता है, और यह उसकी शुरुआत के एकदम बाद से ही कई सनकी लोगों के द्वारा उसमें नियोजित किया जाता है, हालांकि सैद्धांतिक रूप से और नैतिक रूप से, इसे कुंडलिनीयोग के अंतिम चरण में, कुण्डलिनी को आवश्यक भागने का वेग (एस्केप विलोसिटी) प्रदान करने के लिए शामिल किया जाता है, ताकि कुण्डलिनी जागृत हो सके। ऊपर बताए गए शरीर के चक्रों व शरीर के अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भी कुण्डलिनी-छवि को पोषित किया जा सकता है, हालांकि यौन चक्रों की तुलना में उनके पास कम प्रभावशीलता है।

चित्र-विचित्र कुंडलिनी-अनुभव

प्रेमयोगी वज्र का कहना है कि उस उपयुक्त, जाने-माने और प्यारे व्यक्ति के व्यक्तित्व की मानसिक छवि की कल्पना (ध्यान) की जानी चाहिए अपनी कुंडलिनी के रूप में, जो कि एक बड़े आध्यात्मिक व्यक्ति / परिवार के सदस्य / मास्टर / गुरु के रूप में प्रभावशाली होता है, और / या हमेशा संपर्क में रहता है। उससे उस कुण्डलिनी पर स्वाभाविक रूप से या ध्यान के माध्यम से मानसिक एकाग्रता अच्छी तरह से बनी रहती है। इस तरह, मानसिक कुंडलिनी छवि को और अधिक दक्षता / दृढ़ता प्राप्त हो जाती है, और साथ ही, भावनात्मक, व्यवहारिक, ध्यान-उन्मुख, सामाजिक, मानवीय और एक अच्छी तरह से योग्य / आध्यात्मिक व्यक्ति के कई अन्य गुण भी प्राप्त होते हैं। वह एकल, अत्यधिक मजबूत और लगातार मन में बनी हुई कुंडलिनी-छवि अधिकांश मामलों में आत्मज्ञान के लिए अत्यावश्यक है। चित्र-विचित्र रोशनियों, ध्वनियों या अन्य अजीबोगरीब वस्तुओं को कुण्डलिनी-छवि के रूप में अनुभव करने से मानसिक ऊर्जा इधर-उधर बिखर जाती है, और उपरोक्त एकल प्रकार की कुंडलिनी छवि पर फोकस / केन्द्रित नहीं हो पाती है, जिससे कुंडलिनी-शक्ति कम हो जाती है। साथ में, उन अजीब व मनुष्याकृति-रहित अनुभवों से मानवीय गुणों का भी कम ही विकास हो पाता है।

एक कुंडलिनी-जागरण के बाद (बाह्य लिंक- क्वोरा) परिवर्तन / आत्मरूपांतरण

सामान्य सांसारिक आयाम (कुंडलिनी की निद्रावस्था) में, एक व्यक्ति का स्वयं का अधिकांश भाग (आत्मा) अनुपस्थित रूप (अभाव रूप) में होता है, जिससे वह अपना आत्मा पूरी तरह से अंधेरे जैसा दिखाई देता है। लेकिन जब कुंडलिनी वास्तविक की जागृति-प्रक्रिया के तहत कुछ सेकंड (क्षणों) तक के लिए होती है, तो उस सीमित समय के दौरान, कुंडलिनी-छवि उस ध्यानकर्ता के अपने स्वयं (अपनी आत्मा) के साथ पूरी तरह से एकजुट हो जाती है। उस समय, ऊपर वर्णित-अनुसार स्वयं की सामान्य रूप से अनुभव की जाने वाली उदासीन और अंधेरी स्थिति के विपरीत, अपने आप में एक महान आनंद और चमक दिखाई देती है। चूंकि उस आनंद / चमक की कभी भी सांसारिक या कामुक आनंद / चमक से तुलना नहीं की जा सकती है, इसलिए सहजता या स्वाभाविक प्रकृति उस ध्यानकर्ता के मस्तिष्क को बाहरी स्रोतों में उस आनंद / चमक की खोज करने को कम करने के लिए निर्देशित करती है, ताकि वह अपने स्वयं के न्यूरोनल सर्किट (मस्तिष्कीय संवेदना-परिपथ) विकसित कर सके, ताकि कुंडलिनी-छवि हमेशा उसके मस्तिष्क में व्यक्त रहे। इस तरह, लगातार अपने स्वयं के मस्तिष्क के अंदर विद्यमान कुंडलिनी छवि, उसे समाधि (कुंडलिनी-जागृति) के उस सुपर (परम) आनंद के स्मरण सहित निरंतर आनंद का अनुभव कराती है। परिवर्तन (आत्मरूपांतरण) प्रक्रिया के दौरान, प्रेमयोगी वज्र का सांस लेने के लिए प्रयास ऊंचा उठा रहता था, वह खुद को पर्याप्त थका हुआ / नींद में महसूस कर रहा था, और उसकी कुंडलिनी छवि उसके मस्तिष्क में अनुभव रूप से बढ़ रही थी, मुख्य रूप से उसकी अपनी सांसारिक गतिविधियों के समय।

कुंडलिनी जागरण या निरंतर समाधि के बाद, बाह्य लिंक- क्वोरा (विभिन्न टोनों / उपभेदों के साथ, एक विशेष मानसिक छवि / एकल छवि के साथ स्वयं / आत्मा के संघ से होते हुए) आत्मज्ञान तक

कुंडलिनी छवि पर सभी भौतिक और मानसिक दुनिया स्वचालित रूप से आरोपित हो जाती हैं। इस चरण को सम्प्रज्ञात समाधि भी कहा जाता है। सम्प्रज्ञात का अर्थ “समान रूप से और सही ढंग से जाना गया” होता है (संस्कृत शब्द, सम-समान रूप से, और प्रज्ञात-ठीक से जाना गया)। इसका मतलब है कि इस चरण में गहन अद्वैत और आनंद होता है। यह स्तर अलग-अलग समय अवधि के लिए बन सकता है। प्रेमयोगी वज्र में, यह स्तर लगभग 2 वर्षों तक चलाता रहा। उसके बाद कुंडलिनी छवि के एक निश्चित सीमा-स्तर तक पहुंचने / पकने के बाद, अंततः उसका रिग्रेशन / पतन होता है। कुंडलिनी छवि के पतन के साथ, कुण्डलिनी पर आरोपित दुनिया भी आभासिक रूप से पतित हो जाती है। अंततः इसके कारण, आनंददायक शून्य ही अनुभव किया जाता है (नोट- इस अवस्था में अवसाद भी हो सकता है, यदि उससे अच्छी तराह से न निपटा जाए- बाह्य लिंक / क्वोरा)। इस चरण को असम्प्रज्ञात समाधि के रूप में भी जाना जाता है, क्योंकि इसमें कुंडलिनी की अनुपस्थिति के कारण कुछ भी समान रूप से और गहराई से ज्ञात नहीं होता है। इसमें अज्ञात स्रोत से समाधि का गहन आनंद होने के कारण, इस चरण को भी समाधि ही कहा जाता है। योगी को समर्थन देने और उसे और ऊपर उठाने के लिए, सहजता / प्रकृति द्वारा प्रदत्त आत्मज्ञान योगी द्वारा अचानक या आश्चर्यजनक रूप से अनुभव किया जाता है (जैसे कि किसी की नींद में आत्मज्ञान की बहुत छोटी सी झलक भी हो उत्पन्न हो सकती है, खासकर अगर कोई व्यक्ति स्वयं के पर्याप्त अपरिपक्व या गैर-सांसारिक होने के कारण, उसके पूर्ण रूप को सहने में सक्षम नहीं है, जैसा कि प्रेमयोगी वज्र के मामले में हुआ था)। यही तभी होता है, जब कोई व्यक्ति अपने गुरु की कृपा और / या अनुकूल प्रकृति / पर्यावरण की सहायता से अपने आत्मज्ञान तक इस अंतिम चरण को पूरी तरह से सहन कर लेता है, और योग से स्वतःप्राप्त सभी साधारण शक्तियों / जादुई शक्तियों / सिद्धियों को सिरे से नकार देता है।

कुंडलिनी-उत्थान के बाद सुपर पावर / दिव्य शक्तियां

प्रकृति कभी भी किसी भी व्यक्ति को कुंडलिनी ऊर्जा के लिए सहायक सिंक / मामूली सिंक / सहायक अवशोषक के रूप में जानी जाने वाली सुपर शक्तियों को प्रदान नहीं करना चाहती है, जैसा करना उस परमज्ञान / आत्मज्ञान को अनुभव करने से रोकता है; जो मानसिक कुंडलिनी ऊर्जा की विशाल मात्रा के लिए एक सबसे बड़े, अंतिम और मुक्तिकारी सिंक / अवशोषक के रूप में कार्य करता है। इस संबंध में, प्रेमयोगी वज्र अपने स्वयं के अनुभवों का वर्णन अपने शब्दों में निम्नलिखित प्रकार से करते हैं-

मैं हमेशा आश्चर्यचकित हूं कि कुछ लोगों को एक बार के लिए भी सुपर शक्तियां कैसे मिलती हैं (बाह्य लिंक- क्वोरा), क्योंकि मैंने खुद को अपने झलकमात्र आत्मज्ञान के बाद एक तरह से भगवान की तरह महसूस किया, और ऐसा लगा जैसे कि मैं हर तरह से पूरी तरह से संतुष्ट हो गया था। उस समय, मुझे सुपर शक्तियों की तत्काल आवश्यकता थी, लेकिन भगवान ने मुझे उनको प्रदान नहीं किया। इससे मुझे लगता है जैसे कि भगवान सुपर शक्तियों की पेशकश नहीं करता है, बल्कि अन्य सभी उपलब्ध शक्तियों को छीनने का भी प्रयास करता है, वह इसलिए क्योंकि सभी विशेष उपलब्धियां आत्मज्ञान को पर्याप्त गंभीर रूप से रोकती हैं। आत्मज्ञान एक सबसे बड़े मानसिक ऊर्जा के सिंक के रूप में कार्य करता है। मेरे मनमंदिर में मेरी तांत्रिक देवीरानी की एक सतत छवि के रूप में मेरी मानसिक ऊर्जा, मेरी झलक-प्रबुद्धता /आत्मज्ञान के बाद पर्याप्त क्षीण हो गई थी, हालांकि वह क्षणिक आत्मज्ञान पूरी तरह से उस मानसिक ऊर्जा को अवशोषित करने के लिए पर्याप्त मजबूत नहीं था। उसासे वह ऊर्जा मेरे सांसारिक जीवन के माध्यम से धीरे-धीरे बढ़ती जा रही थी, जैसे कि नदी विभिन्न इलाकों को पार करते हुए बढ़ती जाती है। अंत में मेरे द्वारा बर्दाश्त से बाहर होने पर, मेरे द्वारा वह संचित मानसिक ऊर्जा एकल-वाक्यांश शविद के रूप में, दुनिया को लाभान्वित करने वाले शब्दों के रूप में स्वतः ही वैसे ही उत्सर्जित हो गई, जैसे कि पूरी तरह से लोड / जलभारपूर्ण नदी खुद को महान समुद्र में उत्सर्जित / भारविहीन करती है। वह वाक्यांश बाद में मेरे लिए सच साबित होता हुआ प्रतीत हुआ। असल में, कभी-कभी भगवान / प्रकृति एक प्रबुद्ध व्यक्ति के शब्दों के माध्यम से अपनी सांसारिक इच्छाओं को पूरा करते हैं। हो सकता था कि यदि मैंने उस ऊर्जा को उस तरह से उत्सर्जित नहीं किया होता, तो वो मेरी सुपर पावर के रूप में अभिव्यक्त होने के लिए जमा हो जाती। यह भी हो सकता था कि मेरी मानसिक ऊर्जा मेरे दूसरे और पूर्ण आत्मज्ञान के रूप में रिलीज / उत्सर्जित होने के लिए होती रहती। यह केवल एक ऊर्जा-खेल है। कुछ भी मुफ्त में नहीं आता है। परिस्थिति के अनुसार इन उपर्युक्त परिणामों में से किसी के रूप में भी अभिव्यक्ति प्राप्त करने के लिए ऊर्जा को बूंद-2 करके इकट्ठा करना पड़ता है।

अगली बार, दैव के द्वारा मेरे तांत्रिक मास्टर की एक सतत छवि के रूप में मेरी संचित मानसिक ऊर्जा को कुंडलिनी जागृति के रूप में उत्सर्जित किया गया था। अभी मैं उस ऊर्जा को स्वचालित रूप से और तेजी से जमा कर रहा हूं। अब मेरे पास किसी भी तरह की सुपर पावर के रूप में मेरी संचित ऊर्जा को मुक्त करने के प्रति मेरे झुकाव के कई अवसर सामने आ सकते हैं, लेकिन अंतिम ऊर्जा-अवशोषक रूपी आत्मज्ञान तक पहुंचने के लिए, मेरे द्वारा उन अवसरों का सावधानीपूर्वक प्रतिरोध करना अत्यावश्यक है। असल में, कोई व्यक्ति उस अंतिम ऊर्जा सिंक तक तभी पहुंचता है, जब वह किसी भी सांसारिक लाभ के लिए अपनी ऊर्जा को मुक्त करने के लिए सांसारिक प्रलोभनों का विरोध करता है, परन्तु इसके परिणामस्वरूप, संचित मानसिक ऊर्जा आगे से आगे बढ़ती हुई, सहन करने के लिए बहुत बड़ी हो जाती है। हालांकि, आध्यात्मिक गुरु / गुरु / गाइड (पथप्रदर्शक) / मित्र की अच्छी कंपनी / संगति के बिना उसे हासिल करना बहुत मुश्किल है।

अपने आत्मज्ञान के बारे में दूसरों को बताया जाना चाहिए या नहीं

कुछ लोग कहते हैं कि अपने अहंकार को बढ़ने से रोकने के लिए अपनी कुंडलिनी-जागृति या अपना आत्मज्ञान दूसरों के लिए बहुत जल्दी नहीं बताया जाना चाहिए। लेकिन मुझे लगता है कि बोधिसत्व प्रकार के लोग अपने बारे में कम ख्याल रखते हैं, और दूसरों को आध्यात्मिक रूप से लाभान्वित करते रहते हैं। इसके अलावा, उपहार में दिया गया ज्ञान एक अर्जित ज्ञान ही है। प्रेमयोगी वज्र के साथ भी यही हुआ था। जब उन्होंने अपने आत्मज्ञान के बारे में ऑनलाइन घोषित किया (बाह्य लिंक- क्वोरा), तो उन्हें बदले में अपने लिए कुंडलिनी-जागृति मिली, जैसे कि वह एक इनाम हो। कुछ छिपाने से किसी के लिए कुछ खास अच्छा नहीं होता है, बल्कि उससे ऐसा करने वाले की छवि केवल एक ऐसे आतंकवादी या गुंडा प्रकार की बनती है, जो अक्सर कुछ महत्वपूर्ण चीजों / सूचनाओं को छुपाता है, और हमेशा किसी को नुकसान पहुंचाने के या कुछ छीनने के सही अवसर की तलाश में रहता है। निश्चित रूप से इसे सड़कों पर या किसी के अपने जीवन सर्कल / सम्बंधित जीवनक्षेत्र में घोषित नहीं किया जाना चाहिए, ताकि दूसरों की हंसी और ईर्ष्या से संभावित प्रभावों से बचा जा सके; इसके बजाय इसे अच्छी तरह से मान्यता प्राप्त सोशल मीडिया जैसे कि क्वोरा, अन्य प्रसिद्ध / आध्यात्मिक वेबसाइटों / ब्लॉग इत्यादि पर ही घोषित किया जाना चाहिए। साथ में छद्म नाम के पक्ष में अप्रत्यक्ष रूप से आध्यात्मिक उपलब्धि को बताने की कोशिश की जानी चाहिए, ताकि करीबी सर्कल के लोग भी वास्तविकता को समझ सकें, और साथ ही जागृत व्यक्ति का अहंकार भी बहुत विकसित न हो सके। हालांकि, जागृत व्यक्ति को अहंकार जागृत होने से ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचता है। उसके अहंकार का उसकी कुंडलिनी के साथ विलय हो चूका होता है, इसलिए उसका बढ़ता अहंकार / मैं, उसके बढ़ने के रूप में कुछ और नहीं बल्कि उसकी बढ़ती कुंडलिनी ही है। असल में, यह जागृत होने का केवल आभासी / झूठा अहंकार है,  जो संपर्क में स्थित लोगों द्वारा प्रतिबिंबित होता है, और उनके द्वारा सत्य रूप में अनुभव किया जाता है। यही कारण है कि जागृत व्यक्ति के लिए भी अहंकार को धारण करने से मना किया जाता है। जागृत होने के कारण व्यक्ति को एक जागरूक सामाजिक आचरण का पालन करना पड़ता है, क्योंकि वह उन कई लोगों के लिए अनुसरणीय होता है, जो जाने या अनजाने में उसके आचरण का पालन करते रहते हैं।

क्या कुंडलिनी-मशीन कभी संभव है

हाँ, यह शायद सबसे अधिक है। कुंडलिनी घटना एक शुद्ध मानसिक विज्ञान है, जिसमें इसके अंदर कुछ भी रहस्यमय नहीं है। वैज्ञानिक रूप से, कुंडलिनी-जागृति कुछ खास नहीं है, लेकिन संभवतः उन न्यूरोकेमिकल्स की अचानक एक भी केंद्रित छवि की ओर अचानक दौड़ होती है, जो आम तौर पर पूरे मस्तिष्क के अंदर बिखरी हुई होती है। वह तंत्रिकावैज्ञानिक प्रक्रिया आंखों के सामने एक दृश्यमान भौतिक इकाई की तरह उसे जीवंत बनाती है। यही कारण है कि इस जागृति प्रक्रिया को तीसरी आंखों के उद्घाटन के रूप में भी जाना जाता है। यदि वर्तमान में कुल वैज्ञानिक बजट का 1% भी कुंडलिनी-शोध में बदल दिया जाता है, तो कुंडलिनी-मशीन वास्तविक सपने के रूप में दिखाई देती है।

सोशल मीडिया-प्लेटफार्म से विकास

प्रेमयोगी वज्र ने अपनी कुंडलिनी को एक मूल (गैर-संपादित) रूप में, निम्नलिखित चर्चा के अंत में जागृत किया, जो पूरे वर्ष 2016-18 (26-10-2016 से 08-05-2018) में ब्रिलियानो कुंडलिनी-रिसर्च /खोजबीन के ऑनलाइन मंच पर चला था, लगभग डेढ़ साल। इसलिए, इस चर्चा में सूक्ष्म शक्ति छिपी हो सकती है। इस वास्तविक समय चर्चा का वर्णन इसी वेबसाईट के “Love story of a Yogi / एक योगी की प्रेम कहानी” में किया गया है। उनके साऊल मेट / जीवन साथी, लेखक / सह-लेखक ने क्वोरा- 2018 से अपने कई आध्यात्मिक उत्तरों को शामिल किया है, जिसके लिए उन्हें “Top Writer 2018 / शीर्ष लेखक 2018” (बाह्य लिंक- क्वोरा) के रूप में भी सम्मानित किया गया है।

दोस्तो, व्यक्तिगत रूप से इकट्ठा होने और आध्यात्मिक विचारों को विकसित करने के लिए एक आध्यात्मिक कंपनी / समूह बनाने की परंपरा पुरानी थी। आज एक आधुनिक और बहुत व्यस्त युग है, जहां ऑनलाइन सोशल मीडिया ने मानसिक उपस्थिति के साथ भौतिक उपस्थिति की मजबूरी को लगभग समाप्त ही कर दिया है, चाहे जो भी काम / व्यवसाय हो, और चाहे भौतिक हो या आध्यात्मिक हो। यह आज का चमत्कार है कि पहले से प्रचलित भौतिक संगति की तुलना में ऑनलाइन बातचीत के साथ आध्यात्मिक रूप से बेहतर विकास हो सकता है। इसका जीवंत उदाहरण प्रेमयोगी वज्र है। उन्होंने अपनी कुंडलिनी को डेढ़ सालों तक ऑनलाइन आध्यात्मिक वार्तालाप के माध्यम से जागृत किया, जिसे मेरे दूसरे लॉन्गरीड / वृहदपठन / लम्बे लेख, “Love story of a Yogi / एक योगी की प्रेम कहानी” में मूल रूप में लिखा गया है। कोई भी उस पूरे लेख को एक सांस में भी पढ़ सकता है, लेकिन शायद वह केवल तभी सर्वोत्तम काम करता है, अगर उसे लंबे समय तक छोटी किस्तों में नियमित रूप से परस्पर बातचीत (comments / टिप्पणियों, likes / पसंद आदि के साथ) के साथ नियमित रूप से पढ़ा जाता है, और साथ में अन्य नियमित आध्यात्मिक प्रयासों (ई-किताबों के अध्ययन इत्यादि) को भी यदि इच्छा के मुताबिक किया जाता रहे, जैसा कि प्रेमयोगी वज्र ने किया था। यदि आध्यात्मिक दृष्टिकोण को ऑनलाइन रूप के छोटे और नियमित आध्यात्मिक एक्सपोजरों के साथ लंबे समय तक बना कर रखा जाता है, तो यह आश्चर्यजनक परिणाम उत्पन्न करता है, जैसा कि प्रेमयोगी वज्र के मामले में स्पष्ट है।

कोई सिंगल बुक / अकेली पुस्तक सम्पूर्ण नहीं है

प्रेमयोगी वज्र ने कई कुंडलिनी से संबंधित किताबें / ई-किताबें पढ़ीं, जिससे उन्हें पता चला कि इस संबंध में कोई भी पुस्तक पूरी नहीं है, इसके बजाय कुंडलिनी योग के आत्म-अभ्यास के साथ-साथ विभिन्न पुस्तकों से एकत्रित किए गए मुख्य बिंदु ही अधिक गुणवत्ता से काम करते हैं। उन्होंने इन सभी कुण्डलिनी-जागरण के कारकों को इस व्यापक ई-बुक के कच्चे माल के रूप में एक साथ एकत्रित किया, और इन सभी उपरोक्त प्रथाओं / कारकों के माध्यम से उत्पन्न अपनी कुंडलिनी-जागृति (वास्तव में उस जागृति से प्राप्त शक्ति के माध्यम से) के तुरंत बाद उन्हें पुस्तक-रूप में संकलित किया। कई कारणों से कुंडलिनी के संबंध में अच्छी तरह से मान्यता प्राप्त शास्त्रों में भी महान गोपनीयता को रखा गया है। यहां तक कि कुंडलिनी को भी ठीक से परिभाषित नहीं किया गया है। इस अंतर को भरने के लिए, प्रेमयोगी वज्र ने कुंडलिनी को सबसे अच्छे व मान्यताप्राप्त तरीकों में से एक तरीके के माध्यम से रहस्योद्घाटित कर दिया है।

नियमित update / अपडेट और नई post / पोस्ट प्राप्त करने के लिए इस blog / ब्लॉग को follow / पालित करना न भूलें।

पूर्वपृष्ठ- तंत्र, अद्वैत व गुरु का अनुभूत  विवरण