कुण्डलिनी-ध्यान का मनोविज्ञान

मस्तिष्क में कुण्डलिनी का ध्यान

सीधे तौर पर हम मस्तिष्क में कुण्डलिनी के ऊपर ज्यादा देर तक गहरा ध्यान नहीं लगा सकते। ऐसा करने से मस्तिष्क में दबाव बढ़ जाता है, जिससे बेचैनी पैदा होती है, और चक्कर भी आ सकता है। मस्तिष्क के दबाव में होने से रोजमर्रा के काम-काज दुष्प्रभावित होने लगते हैं। याददाश्त घट सी जाती है। सांसारिक कार्यों में मन नहीं लगता। मन व शरीर में थकान जैसी रहती है। सिर घूमता हुआ जैसा महसूस होता है। अनभ्यस्त होने पर इससे मस्तिष्क को हानि पहुँचने का डर भी बना रहता है, जिससे अल्जाईमर जैसे मस्तिष्क के रोग भी पैदा हो सकते हैं।

निचले चक्रों पर कुण्डलिनी का ध्यान

उपरोक्त समस्या का हल चक्र-साधना से किया गया है। इसमें कुण्डलिनी का ध्यान शरीर के निचले चक्रों पर किया जाता है। चक्रों पर ध्यान की मात्रा ऊपर की तरफ बढ़ती रहती है। इसीलिए तो कुण्डलिनी-योगी मूलाधार से प्रारम्भ करते हैं, ताकि धीरे-२ अभ्यस्त हो सकें।

वैदिक संस्कृति में कुण्डलिनी का ध्यान प्रकृति के अन्दर किया जाता था

प्राचीन वैदिक युग में जन-जीवन बहुत अस्त-व्यस्त होता था। बहुत सी समस्याएँ होती थीं। उससे आदमी बहिर्मुखी व भौतिकवादी होता था। कोई मशीनें नहीं होती थीं। सभी काम हाथों से करने पड़ते थे। जंगली जानवरों का आतंक होता था। वैसी परिस्थिति में आम जन-मानस के लिए गहरा ध्यान करना संभव नहीं था। इसीलिए उन्होंने प्रकृति की पूजा करना प्रारम्भ किया, तथा कुण्डलिनी का ध्यान प्राकृतिक पदार्थों के भीतर किया। सूर्यदेव, वायुदेव, अग्निदेव आदि के रूप में इसके बहुत से उदाहरण हैं। उस प्रणाली में कुण्डलिनी मस्तिष्क से सर्वाधिक दूरी पर स्थित होती थी, जिससे उसका ध्यान बहुत सरल होता था। प्रकृति के बीच में पल-बढ़ रहे मनुष्य को उसका लाभ भी अनायास ही मिलता रहता था।

मूर्ति-परम्परा ने ध्यान को और अधिक बढ़ाने में मदद की

धीरे-२ मनुष्य विकसित होता गया, जिससे उसके लिए बहुत सा अतिरिक्त समय उपलब्ध हो गया। उससे मूर्तिवाद का जन्म हुआ। अब मनुष्य प्रकृति से दूर रहकर, एकांत में भी ध्यान लगा सकता था। मूर्ति-ध्यान के स्थान मंदिरों के रूप में उभर आए। देवमूर्ति के ऊपर ध्यान अधिक लगता था, क्योंकि वह मस्तिष्क के अधिक निकट होती थी, और उसकी बनावट मनुष्य की तरह होती थी।

कुण्डलिनीयोग की शुरुआत से ध्यान को पंख लग गए

कालान्तर में मनुष्य ने इतना अधिक विकास कर लिया था कि उसके द्वारा जुटाए गए अतिरिक्त अन्न से व अतिरिक्त संसाधनों से उसके भण्डार भर गए थे। इससे वह लम्बे समय तक गहन ध्यान-साधना कर सकता था। इसलिए कुण्डलिनी-योग की खोज हुई। उसमें शरीर के विभिन्न भागों/चक्रों पर कुण्डलिनी का ध्यान करना होता था। कुण्डलिनी की मस्तिष्क से दूरी बहुत अधिक घट गई थी, और कुण्डलिनी व्यक्ति के अपने ही शरीर में पहुँच गई थी। इससे ध्यान को असीमित ऊँचाई मिली, जो सहस्रार चक्र में अपने चरम पर पहुँच गई, कुण्डलिनी-जागरण के रूप में।

ध्यान सदैव मस्तिष्क में ही लगता है

चाहे कहीं भी कुण्डलिनी का ध्यान कर लो, वह होता तो मस्तिष्क में ही है, क्योंकि मस्तिष्क ही सभी अनुभवों का स्थान है। यह अलग बात है कि कुण्डलिनी मस्तिष्क/सहस्रार के जितनी नजदीक होती है, उस पर ध्यान उतना ही मजबूत लगता है।

आज के युग में हर प्रकार के व्यक्ति के लिए उपयुक्त साधना-पद्धति मौजूद है

आज विविधताओं वाला युग है। कई लोग बहुत व्यस्त हैं। उनके लिए वैदिक संस्कृति वाला कुण्डलिनी-ध्यान (कर्मयोग) उपलब्ध है। जिनके पास थोड़ा अतिरिक्त समय है, उनके लिए देव-मूर्तियों पर ध्यान लगाने के लिए बहुत से मंदिर मौजूद हैं। जिनके पास सर्वाधिक अतिरिक्त समय है, उनके लिए पूर्ण विकसित कुण्डलिनी योग भी उपलब्ध है।

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अवसादरोधक दवा से कुण्डलिनी लाभ

अवसादरोधक दवा कैसे काम करती है

प्रेमयोगी वज्र प्रचंड दुनियादारी में उलझा हुआ व्यक्ति था। उससे उसका मन बहुत अशांत हो गया था। यद्यपि वह शरीरविज्ञान दर्शन की सहायता से उसे काफी हद तक काबू कर रहा था। परन्तु फिर भी वह पूरी तरह से काबू नहीं हो पा रहा था। एक बार वह गंभीर गैस्ट्राइटीस के वहम से एंडोस्कोपी करवाने गया। चिकित्सक ने उसकी मनोदशा को समझते हुए उसे डेढ़ महीने की अवसादरोधक व क्रोधनाशक दवा (नाम याद नहीं) प्रेस्क्राईब कर दी। उसे उसको खाते हुए अपने अवसाद व क्रोध में काफी कमी महसूस हो रही थी। उसने गूगल पर पढ़ लिया था कि एक महीने तक रोजाना खाने पर ही इस दवा का प्रभाव स्थाई बन पाता है। अतः वह दवा को खाता रहा। उसे लग रहा था कि जो काम आध्यात्मिक पुस्तक शरीरविज्ञान करती थी, वही काम वह दवा भी कर रही थी। यद्यपि दवा का काम कुछ ज्यादा ही जड़ता, उग्रता, स्मरणशक्ति की कमी, और कृत्रिमता से भरा हुआ था। उसे आत्मजागरण व कुण्डलिनीजागरण का अद्वैतकारक प्रभाव भी अवसादरोधी दवा के अद्वैतकारक प्रभाव से मिलता-जुलता लगा, यद्यपि शुद्धता और स्तर में अंतर के साथ। एकहार्ट टोल्ले ने भी लगभग ऐसा ही बयान किया है कि अवसादरोधी दवा का प्रभाव आत्मजागरण के प्रभाव जैसा होता है, यद्यपि तुलनात्मक रूप से बहुत निम्न दर्जे का और उग्रता के साथ।

वह लम्बी खांसी से परेशान था

उसने बहुत सी एंटीबायोटिक दवाइयां खाईं, पर खांसी ठीक नहीं हुई। वह समझ रहा था कि एंटीबायोटिक दवाइयाँ काम नहीं कर रही थीं, जीवाणुओं के प्रतिरोध के कारण। वास्तव में उसकी खांसी की वजह क्रोनिक गेस्ट्राइटीस थी। जब उसने 1 महीने तक पेंटोपराजोल और डॉमपेरिडोन दवाइयां खाईं तथा योग करने के साथ कुछ सावधानियां बरतीं; तब उसकी खांसी जड़ से ख़त्म हो गई। आजकल के तनाव भरे जीवन में यह समस्या विकराल हो गई है, जिस बारे में अधिकाँश लोग गलतफहमी का शिकार हो जाते हैं।

I don’t see it as a road to true and lasting awakening, but it can give people a glimpse of freedom from the prison of their conceptual mind (a worth reading interview with Eckhart tolle)…………..

INTERVIEW WITH ECKHART TOLLE

मस्तिष्कप्रभावी दवाओं से रूपांतरण

शरीरविज्ञान दर्शन एक अद्वैतवादी सोच है। इससे सिद्ध होता है कि वह दवा अद्वैत को उत्पन्न कर रही थी। माईंड अल्टरिंग ड्रग्स भावनाओं को नियंत्रित करने के लिए पावर ब्रेक की तरह काम करती है, जिससे मस्तिष्क के सॉफ्ट टिशू को नुक्सान पहुँच सकता है। उसे अपनी स्मरणशक्ति कम होती हुई महसूस हो रही थी। क्रोध के समय तो उसका मस्तिष्क जवाब देने लगता था, इसलिए वह क्रोध कर ही नहीं पाता था। क्रोध से उसका मस्तिष्क दबावयुक्त, भारी, सुस्त, और अंधकारमय सा हो जाता था। शारीरिक रूप से भी वह  शिथिल व कमजोर जैसा रहने लग गया था। उसकी कार्यक्षमता काफी घट गई थी। वह अपने अचानक  हुए परिवर्तन को देखकर हैरान था। इसलिए उसने 30-35 दिन के बाद वह दवा बंद कर दी, और बची हुई दवा कूड़ेदान में डाल दी। यद्यपि उसका रूपांतरण स्थायी रूप से हो गया था। वह पिछली अवस्था में कभी भी वापिस नहीं लौट पाया।

अवसादरोधक दवा आनंद व अद्वैत को कैसे उत्पन्न करती है?

इससे व्यक्ति किसी के भी बारे में गहराई से नहीं सोच पाता, और न ही ढंग से विश्लेषण या जजमेंट कर पाता है। इससे सभी वस्तु-विचारों के प्रति स्वयं ही साक्षीभाव पैदा हो जाता है। उससे आनंद पैदा होता है। साथ में, विश्लेषण व जजमेंट की कमी से सभी वस्तु-विचारों के बीच का अंतर मिटने लगता है, जिससे सभी कुछ एक जैसा लगने लगता है। यही तो अद्वैत है। यह सब ऐसे ही होता है, जैसे शराब के हल्के नशे में होता है। सीधा सा मतलब है कि मेडीटेशन बुद्धि-शक्ति को बढ़ा कर अद्वैतभाव को उत्पन्न करती है, जबकि मस्तिष्क-परिवर्तक दवाएं बुद्धि-शक्ति को घटा कर। फिर भी ये दवाएं आध्यात्मिक जागरण की झलक तो दिखा ही देती हैं। उस झलक का पीछा करते हुए आदमी वास्तविक आत्म-जागरण को भी प्राप्त कर सकता है।

मस्तिष्क-परिवर्तक दवाओं से ध्यान लगाने में कैसे सहायता मिलती है?

अपनी मानसिक गतिविधियों के अचानक ही बहुत धीमा पड़ने से प्रेमयोगी वज्र को आश्चर्य भी हुआ, और कुछ दुःख भी। वह अपनी पूर्ववत मानसिकता को प्राप्त करने के उपाय सोचने लगा। वह मानसिकता उसकी याददाश्त से जुड़ी हुई थी, जो ड्रग के प्रभाव से काफी कम हो गई थी। उसे कुछ समय के लिए एक ऐसे व्यक्ति की संगति मिल गई, जो नियमित रूप से योगासन करता था। उसे देखकर वह भी करने लगा। धीरे-२ उसे अभ्यास हो गया। वह इंटरनेट व पुस्तकों की मदद भी लेने लगा। उसमें मानसिक शक्ति तो पहले की तरह प्रचुर थी, परन्तु वह कहीं लग नहीं रही थी। इसका कारण यह था कि वह दवा के प्रभाव से उन पिछली बातों व घटनाओं को भूल गया था, जिनसे उसकी मानसिक शक्ति जुड़ कर क्षीण होती रहती थी। दवा से उसका पिछला संसार मिट जाने से उसकी प्रचंड मानसिक शक्ति उससे मुक्त हो गई थी। इसीलिए उसे महसूस नहीं हो रही थी। योग की सहायता से वह छुपी हुई व भरपूर मानसिक शक्ति उसकी कुण्डलिनी को स्वयं ही लगने लगी। इससे वह समय के साथ जागृत हो गई।

दुनियादारी की मानसिकता का कुण्डलिनी-मानसिकता के रूप में प्रकट होना

कुण्डलिनीयोग से उसे अपनी खोई हुई पुरानी मानसिकता प्राप्त हो गई। यद्यपि वह पहले की तरह अद्वैतपूर्ण दुनियादारी के रूप में नहीं थी, अपितु वह अकेली कुण्डलिनी के रूप में थी। समस्त मानसिक शक्ति एकमात्र कुण्डलिनी को लगने से वह जागृत हो गई।

प्रबल मानसिकता की प्राप्ति केवलमात्र अद्वैतभाव से संभव

यह ध्यान देने योग्य बात है कि प्रबल, अविरल व स्थायी मानसिकता केवल अद्वैतपूर्ण दुनियादारी से ही संभव है। द्वैतपूर्ण व्यवहार से मानसिकता चरम के निकट पहुँचने से पहले ही क्षीण होती रहती है। इससे सिद्ध होता है कि प्रेमयोगी वज्र का अद्वैतपूर्ण जीवन-व्यवहार (geetaa-ukt karmayoga)  भी उसके कुण्डलिनी-जागरण में सहायक बना।

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द्वैत और अद्वैत दोनों एक-दूसरे के पूरक के रूप में

द्वैत क्या है?

दुनिया की विविधताओं को सत्य समझ लेना ही द्वैत है। दुनिया में विविधताएं तो हमेशा से हैं, और सदैव रहेंगी भी, परन्तु वे सत्य नहीं हैं। दुनिया में जीने के लिए विविधताओं का सहारा तो लेना ही पड़ता है। फिर भी उनके प्रति आसक्ति नहीं होनी चाहिए।

अद्वैत क्या है?

उपरोक्तानुसार, दुनिया की विविधताओं के प्रति असत्य बुद्धि या अनासक्ति को ही अद्वैत कहते हैं। वास्तव में द्वैताद्वैत को ही संक्षिप्त रूप में द्वैत कहते हैं। अद्वैत अकेला नहीं रह सकता। यह एक खंडन-भाव है। अर्थात यह द्वैत का खंडन करता है। यह खंडन “द्वैत” से पहले लगने वाले “अ” अक्षर से होता है। जब द्वैत ही नहीं रहेगा, तब उसका खंडन कैसे किया जा सकता है? इसलिए जाहिर है कि द्वैत व अद्वैत दोनों साथ-२ रहते हैं। इसीलिए अद्वैत का असली नाम द्वैताद्वैत है।

एक ही व्यक्ति के द्वारा द्वैत व अद्वैत का एकसाथ पालन

ऐसा किया जा सकता है। यद्यपि ऐसा जीवनयापन विरले लोग ही ढंग से कर पाते हैं, क्योंकि इसके लिए बहुत अधिक शारीरिक व मानसिक बल की आवश्यकता पड़ती है। इससे लौकिक कार्यों की गुणवत्ता भी दुष्प्रभावित हो सकती है, यदि सतर्कता के साथ उचित ध्यान न दिया जाए।

द्वैताद्वैत को बनाए रखने के लिए श्रमविभाजन

ऐसा विकसित सभ्यताओं में होता है, व बुद्धिमान लोगों के द्वारा किया जाता हहै। वैदिक सभ्यता भी इसका एक अच्छा उदाहरण है। इसमें द्वैतमयी लौकिक कर्मों का  उत्तरदायित्व एक भिन्न श्रेणी के लोगों पर होता है, और अद्वैतमयी धार्मिक क्रियाकलापों  का उत्तरदायित्व एक भिन्न श्रेणी के लोगों पर। वैदिक संस्कृति की जाति-परम्परा  इसका एक अच्छा उदाहरण है। इसमें ब्राम्हण श्रेणी के लोग पौरोहित्य (धार्मिक कार्य) का कार्य करते हैं, और अन्य शेष तीन श्रेणियां विभिन्न लौकिक कार्य करती हैं।

द्वैताद्वैत में श्रम-विभाजन के लाभ

इससे व्यक्ति पर कम बोझ पड़ता है। उसे केवल एक ही प्रकार का भाव बना कर रखना पड़ता है। इससे परस्पर विरोधी भावों के बीच में टकराव पैदा नहीं होता। इसलिए कार्य की गुणवत्ता भी बढ़ जाती है। वैसे भी दुनिया में देखने में आता है कि जितना अधिक द्वैत होता है, कार्य उतना ही अच्छा होता है। अद्वैतवादी के अद्वैतभाव का लाभ द्वैतवादी को मिलता रहता है, और द्वैतवादी के द्वैतभाव का लाभ अद्वैतवादी को मिलता रहता है।  यह ऐसे ही होता है, जैसे एक लंगड़ा और एक अंधा एक-दूसरे की सहायता करते हैं। यद्यपि इसमें पूरी सफलता के लिए दोनों प्रकार के वर्गों के बीच में घनिष्ठ व प्रेमपूर्ण सम्बन्ध बने रहने चाहिए।

गुरु-शिष्य का परस्पर सम्ब्बंध भी ऐसा ही द्वैताद्वैत-सम्बन्ध है

प्रेमयोगी वज्र को भी इसी श्रमविभाजन का लाभ मिला था। उसके गुरू (वही वृद्धाध्यात्मिक पुरुष) एक सच्चे ब्राम्हण-पुरोहित थे। प्रेमयोगी वज्र स्वयं  एक अति  भौतिकवादी व्यक्ति तथा। दोनों के बीच में लम्बे समय तक नजदीकी व प्रेमपूर्ण  सम्बन्ध बने रहे। इससे प्रेमयोगी वज्र का द्वैत उसके गुरु को प्राप्त हो गया, और गुरु  का अद्वैत उसको प्राप्त हो गया। इससे दोनों का द्वैताद्वैत अनायास ही  सिद्ध हो गया, और दोनों मुक्त हो गए। इसके फलस्वरूप प्रेमयोगी वज्र को क्षणिक आत्मज्ञान के साथ क्षणिक कुण्डलिनीजागरण की उपलब्धि भी अनायास ही हो गई। साथ में, उसकी कुण्डलिनी तो उसके पूरे जीवन भर क्रियाशील बनी रही।

यही द्वैताद्वैत समभाव ही सर्वधर्म समभाव है

कोई धर्म द्वैतप्रधान होता है, तो कोई धर्म अद्वैतप्रधान होता है। इसीलिए दोनों प्रकार के धर्मों के बीच में मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बने रहने चाहिए। इससे दोनों एक-दूसरे को शक्ति प्रदान करते रहते हैं। इससे वास्तविक द्वैताद्वैत भाव पुष्ट होता है। विरोधी भावों के बीच में परस्पर समन्वय ही वैदिक संस्कृति की सफलता के पीछे एक प्रमुख कारण था। शरीरविज्ञान दर्शन में इसका विस्तार के साथ वर्णन है।

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On the holy occasion of Gandhi anniversary / गांधी जयंती के पावन अवसर पर

Mr. M.K. Gandhi, a peaceful Indian freedom fighter was a man of practicality, not mere that of a theory. Whatever he said in his life, he proved all that practically. He translated and explained the Geeta, a Hindu sacred text, practically while he was there inside a prison. The compilation arose in the form of a book named as “Anasakti Yoga” in Hindi. He has described in that the scientific and practical meaning of the teachings of Geeta.Therein he has given full stress on the unattached attitude of living a fully functional and practical human life. He has uncovered this deep secret lying inside Geeta. Although I haven’t read that fully myself but I have read that’s modern and Tantric variety in the name of book “Shareervigyan darshan- ek aadhunik kundalini tantra (ek yogi ki premkatha)” by Premyogi vajra in Hindi. Premyogi vajra has proved scientifically that everything including every religion and philosophy exist there inside our own human body. Although there is total environment of unattached / nondual attitude there inside this micro society against the duality / attachment filled environment in our so famous day to day macro society. He has utilized the health science related knowledge fully to unveil this secret. As a result, the book appears resembling a Hindu Purana although in a more comprehensible, scientific and widely acceptable way comparatively. The full information of this book is available here at the webpage-
It’s also the birth anniversary of Mr. Laal bahaadur shaastri, the second prime minister of Independent India today, therefore salute to both of these great men.
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श्री मोहनदास कर्मचंद गांधी, एक शांतिपूर्ण भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और व्यावहारिकता से भरे हुए आदमी थे, न कि केवल एक सिद्धांतवादी। जो कुछ भी उन्होंने अपने जीवन में कहा, उसे व्यावहारिक रूप से साबित करके भी दिखाया। उन्होंने गीता का सरलीकृत अनुवाद तब किया, जब वे जेल में थे। वह संकलन हिंदी में “अनासक्ति योग” नामक पुस्तक के रूप में उभरा। उन्होंने गीता की शिक्षाओं को वैज्ञानिक और व्यावहारिक अर्थ में वर्णित किया है। उन्होंने इसमें पूरी तरह कार्यात्मक व व्यावहारिक मानव जीवन जीने के साथ अनासक्तिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाने पर पूरा जोर दिया है। उन्होंने गीता के अंदर बसने वाले इस गहरे रहस्य को उजागर किया है। यद्यपि मैंने इसे स्वयं विस्तार से नहीं पढ़ा है, केवल इसकी प्रस्तावना ही पढ़ी है, लेकिन मैंने प्रेमयोगी वज्र द्वारा “शरीरविज्ञान दर्शन-एक आधुनिक कुंडलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)” नामक किताब को अच्छी तरह से पढ़ा है, जो उपरोक्त पुस्तक का आधुनिक व तांत्रिक रूपान्तर ही प्रतीत होती है। प्रेमयोगी वज्र ने वैज्ञानिक रूप से साबित कर दिया है कि हर धर्म और दर्शन सहित सब कुछ हमारे अपने मानव शरीर के अंदर बसा हुआ है। यद्यपि इस सूक्ष्म शरीर-समाज के भीतर हमारी रोजमर्रा की मैक्रो सोसाइटी/स्थूल समाज के विपरीत पूर्ण अनासक्ति व अद्वैत का वातावरण विद्यमान है। इस रहस्य का अनावरण करने के लिए उन्होंने स्वास्थ्य विज्ञान से संबंधित ज्ञान का भी पूरी तरह से उपयोग किया है। नतीजतन, पुस्तक एक हिंदु-पुराण जैसी दिखती है, हालांकि तुलनात्मक रूप से एक अधिक समझपूर्ण, वैज्ञानिक, व्यापक व सर्वस्वीकार्य तरीके से। इस पुस्तक की सम्पूर्ण जानकारी यहां निम्नोक्त वेबपृष्ठ पर उपलब्ध है-
आज स्वतंत्र भारत के द्वितीय प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी का जन्मदिवस भी है, इसलिए इन दोनों महापुरुषों को कोटि-2 नमन।
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Happy janamaashtami/जन्माष्टमी पर्व की बधाइयाँ

Geetaa philosophy dictated by Lord Krishna is a wonderful treatise of worldwide spirituality. Every religion, philosophy, spirituality seems to be emerging out of it. It’s Karmyoga is an amazing gift to the world. Today, it’s most necessary for people are becoming more and more lethargic, workless and paranoiac/depressed due to today’s mechanized work style. Many types of strange diseases like diabetes, heart ailments, thyroid ailments etc. are gaining their strong foot hold.

Actually, karmyoga teaches us how to be busy physically and mentally along with the development of spirituality round the clock. It helps in achieving worldly as well as spiritual goals, both together in a quickest possible time. Karmayoga is equal to tantra, but with additional sexual element added in tantra for super fast spiritual success. Lord Krishna was also a tantric. Keeping so many gopa-girls happy and even arranging raas in the lonely night with too many of them isn’t possible without tantra.

In karmyoga/tantra, one need to maintain non duality/mental awareness every moment. This is done through practices of vedas-puranas, shareervigyaan darshan/body science philosophy or any other suitable means. It’s a psychic principle that non duality, kundalini and bliss remains always together and enrich each other. So, there are four options for karmayogi. Either enrich kundalini with Kundalini yoga or enrich non duality through philosophical contemplation or through increasing his bliss through humanely relationships or all of these. Last is the best for it incorporates all the spiritual fundamentals. For detailed experiential information, please visit this website.

श्रीकृष्ण के द्वारा उच्चारित गीता दुनियाभर में आध्यात्मिकता का एक अद्वितीय खजाना है। प्रत्येक प्रकार का धर्म, दर्शन, आध्यात्मिक जीवन इससे निकलता हुआ प्रतीत होता है। इसका कर्मयोग दुनिया के लिए एक अद्भुत तोहफा है। आजकल यह सर्वाधिक प्रासंगिक है, क्योंकि आजकल के मशीनी युग में लोग सुस्त, कर्महीन, आलसी व अवसादग्रस्त से हो रहे हैं, जिसकी वजह से मधुमेह, उच्च रक्तचाप, उच्च कोलेस्ट्रॉल आदि विचित्र बीमारियां बढ़ रही हैं।

वास्तव में, कर्मयोग हमें सिखाता है कि कैसे हमने शारीरिक व मानसिक रूप, दोनों से दिन-रात व्यस्त रहना है, और साथ में अवसाद खत्म करके आध्यात्मिक विकास भी तीव्रतम गति से करना है। कर्मयोग से सर्वाधिक शीघ्रता से भौतिक व आध्यात्मिक विकास, दोनों हो जाते हैं। कर्मयोग व तन्त्र एक ही चीज है, यद्यपि तंत्र में अतिरिक्त भाग के रूप में यौनसंबंध भी जुड़ा होता है, ताकि आध्यात्मिक विकास तीव्रतम वेग से हो जाए।

अद्वैत, कुंडलिनी व आनंद , तीनों एकसाथ रहते हैं, और एक -दूसरे को बढ़ाते रहते हैं। इसलिए  आध्यात्मिक विकास की चार विधियाँ मुख्य है। कुंडलिनी योग से कुंडलिनी को बढ़ाओ या वेद-पुराणों, शरीरविज्ञान दर्शन आदि उचित अद्वैतकारी दर्शनों के अभ्यास से निरंतर अद्वैत को धारण किया जाए या मानवीय व्यवहारों से आनंद बढ़ाया जाए या तीनों प्रयासों को एकसाथ किया जाए। अन्तिम विधि सर्वाधिक बलवान है, क्योंकि इसके अंदर अध्यात्म के सभी मूलभूत सिद्धांत हैं।

वास्तव में भगवान श्रीकृष्ण एक तांत्रिक भी थे। इतनी सारी गोप कन्याओं को खुश रखना, व उनमें से अनेकों के साथ रात्रि के एकांत में रास रचाना तंत्र ज्ञान के बिना संभव नहीं है।

अतरिक्त व अनुभवात्मक जानकारी के लिए कृपया इस वेबसाइट को प्रारंभ से व विस्तार से पढ़ें।

अटल जी को श्रद्धा सुमन/ Tribute to Atal ji

अटल जी की याद में कुछ पंक्तियाँ

मैं अटल जी के सम्मान में कुछ पंक्तियाँ लिखना चाहूंगा-

उठ जाग होनहार, प्रकाश हो या अंधकार।

बाँध तरकस पीठ पर, भर तीर में फुंकार।।

झुका दे शीश दोनों का, कर ना पाए फिर कभी भी वार।

उठ जाग होनहार, प्रकाश हो या अंधकार।।

यह कविता कुण्डलिनीयोग से भी स्वतः ही सम्बंधित प्रतीत होती है। यह कविता अज्ञानरूपी निद्रा में डूबे हुए एक आम साधारण मनुष्य से कहती है कि हे बहादुर मनुष्य, नींद से जाग जा और उठ खड़ा हो जा। तू डर मत, चाहे तेज रौशनी का माहौल हो या चाहे घनघोर अन्धकार ही क्यों न हो। इसका मतलब है कि तू प्रकाश व अन्धकार की परवाह न करते हुए दोनों को एक नजर से देख, अर्थात तू अद्वैतपूर्ण बन जा। बाँध तरकस पीठ पर का मतलब है कि तू कुण्डलिनीयोग साधना में जुट जा। उस साधना से जो चित्र-विचित्र विचार-संकल्प उसके मन में उभरेंगे, वे ही उस साधना रुपी तरकस के विभिन्न तीर होंगे। वह कुण्डलिनी साधना बैठकपूर्ण योग से भी की जा सकती है, और कर्मपूर्ण कर्मयोग से भी। फिर कविता कहती है कि भर तीर में फुंकार। इसका अर्थ है कि एक सबसे मजबूत व गुणसंपन्न मानसिक चित्र को तू कुण्डलिनी बना ले, और नित्य निरंतर उसका ध्यान करने लग जा। उससे वह कुण्डलिनी एक विषबुझे तीर की तरह प्रचंड हो जाएगी। “झुका दे शीश दोनों का” का अर्थ है कि उस प्रचंड कुण्डलिनी के आगे प्रकाश व अन्धकार दोनों निष्प्रभावी होने लग जाएंगे। कुण्डलिनी-जागरण से वे पूरी तरह से निष्प्रभावी हो जाएंगे, क्योंकि उस जागृत कुण्डलिनी में प्रकाश व अन्धकार दोनों के सभी उत्कृष्ट गुण विद्यमान होंगे। ऐसा इसलिए होगा क्योंकि वह परम प्रकाशमान कुण्डलिनी साधक को अपनी आत्मा से अभिन्न प्रतीत होगी। पूर्णतः निष्प्रभावी होने पर वे दोनों कभी वार नहीं कर पाएंगे, क्योंकि फिर उन दोनों के किसी भी रूप में साधक के मन में कभी आसक्ति उत्पन्न नहीं होगी।

Tribute in the memory of Atal ji

Rise up brave, whether it is light or dark grave;

Tie arrow-box on the back, fill up hiss to that pack.

Make bow down heads of both, could never then hit when you be in sloth;

Rise up brave, whether it is light or dark grave. 

This poem seems to be related to Kundalini Yoga itself. This poem says to an spiritually ignorant sleepy man means a  common man, “O brave man, wake up from sleep and rise up!” Do not be afraid, whether there is a bright light environment or a dark darkness. This means that if you do not care light and darkness, watch them both at a glance, that is, you become untainted. On the back, tie up arrow box means that you will get involved in cultivation of Kundalinioga. The painting / different ideas / thoughts that arise in his mind from that sadhana / meditation will be different arrows of that technique. The Kundalini cult can also be done through sitting yoga ie. full yoga, and also through action-yoga / karmayoga. Then the poem says that apply poison to the arrow to make that a hissing serpent. This means that you make a most qualified and beautiful mental picture as your Kundalini, and always start meditating / concentrating on it or visualizing it. From that, the Kundalini will be powerful like a poisoned arrow. “make bow down heads” means that both the light and the dark will appear to be neutral in front of that huge and all light full kundalini. With Kundalini-Jagaran / awakening, they will become completely neutral, because in that awakening of the Kundalini, all the excellent qualities of light and darkness will exist. This will be because that ultimate luminous Kundalini  will appear to be the integral to seeker’s soul. If they both are completely neutral, they will never be able to fight, because then in any form of both of them the attachment will never be generated in the mind of that seeker.