यह युद्ध है यह युद्ध है~कविता

यह युद्ध है यह युद्ध है।
न कोई यहाँ पे गाँधी है
न कोई यहाँ पे बुद्ध है।
यह युद्ध है यह युद्ध है।

वीरपने की ऐसी होड़ कि
हिंसा-व्यूह का दिखे न तोड़।
कोई तोप चलाता है तो
कोई देता है बम फोड़।
रुधिर-सिक्त शापित डगरी पर
दया सब्र रूपी न मोड़।
लड़े सांड़ पर मसले घास
जिस पर देते उनको छोड़।
मान पलायन-कायरता न
युद्ध-नीति में इसका जोड़।
असली वीर विरल जगती में
हर इक न होता रणछोड़।
नीति-मार्ग अवरुद्ध है।
यह युद्ध है----

गलती को दुत्कारे फिर भी
नकल उसी की करते हैं।
हमलावर को अँगुली कर के
खुद भी हमला करते हैं।
चिंगारी वर्षों से दबी जो
उसको हवा लगाते हैं।
क्रोध का कारण और ही होता
और को मार भगाते हैं।
खून बहा कर नदियां भर-भर
भी हर योद्धा क्रुद्ध है।
यह युद्ध है---

बढ़त के दावे हर इक करता
आम आदमी है पर मरता।
लाभ उठाए और ही कोई
कीमत उसकी और ही भरता।
जीत का तमगा लाख दिखे पर
न स्वर्णिम न शुद्ध है।
यह युद्ध है----

धर्म का चोला हैं पहनाते
युद्ध को कोमलता से सजाते।
दिलों के महलों को ठुकराकर
पत्थर पर झंडा फहराते।
कैसा छद्म-युद्ध है यह
कैसा धर्म-युद्ध है।
यह युद्ध है---

ज्वाला में सब जलता है और
पानी में सब गलता है।
पेड़ हो चाहे या हो तिनका
नाश न इनका टलता है।
रणभूमि में एकबराबर
मूर्ख है या प्र-बुद्ध है।
यह युद्ध है----

राजा वीर बहुत होता था
रण को कंधे पर ढोता था।
जान बचाने की खातिर वो
गिरि-बंकर में न सोता था।
आज तो प्रजा-खोरों का दिल
राज-धर्म-विरुद्ध है।
यह युद्ध है---

आग बुझाने जाना था जब
आग लगाई क्यों तूने।
आग तपिश के स्वाद की खातिर
लेता जला तू कुछ धूने।
बात ही करनी थी जब आखिर
बात बिगाड़ी क्यों तूने।
सोच सुहाग उजड़ते क्योंकर
क्यों होते आँचल सूने।
परमाणु की शक्ति के संग
प्रलयंकर महा-युद्ध है।
यह युद्ध है--

खून-पसीने की जो कमाई
वो दिखती अब धरा-शायी।
मुक्ति मिलती जिस शक्ति से
क्यों पत्थर में थी वो गंवाई।
बुद्धि नहीं कुबुद्ध है।
यह युद्ध है---

कुंडलिनी-शिव विवाह ही साधारण लौकिक विवाह का उद्गम स्थान है

मित्रो, आप सभी को छठ पर्व की शुभकामनाएं। मैं हाल ही के एक लेख में बता रहा था कि हिंदू त्यौहारों वाली आध्यात्मिक संस्कृति प्रकृति की पुजारी है, और वातावरणीय प्रदूषण के विरुद्ध है। सूत्रों के अनुसार अभी जब 2-3 दिन पहले छठी देवी की पूजा करने के लिए कुछ महिलाएं दिल्ली की यमुना नदी के पानी के बीच में सूर्य को अर्घ्य देने के लिए खड़ी हुईं, तो दुनिया को यमुना के वास्तविक प्रदूषण का पता चला। यमुना का पानी काला था, और उस पर इतनी ज्यादा सफेद झाग तैर रही थी कि वह ध्रुवीय समुद्र के बीच में तैर रहे बर्फ के पहाड़ लग रहे थे। बताने की जरूरत नहीं है कि अब यमुना की सफाई के प्रयास जोरों से शुरु हो गए हैं। पर इसको करवाने के लिए अनजाने में ही व्हिसल ब्लोवर का काम उन हिन्दू परंपरावादी महिलाओं से हो गया जो अपनी जान को जोखिम में डालकर प्रकृति को सम्मान देने और उसकी पूजा करने के लिए ज़हरीली नदी में उतरीं। कुछ तथाकथित अत्याधुनिक लोग तो उन्हें रूढ़िवादी और अंधविश्वासी कह सकते हैं, पर उन्होंने वह काम कर दिखाया जिसे बड़े-बड़े आधुनिकतावादी और तर्कवादी भी न करे। यह एक छोटा सा उदाहरण है। प्रकृति प्रेमी हिंदूवाद की इसी तरह हर जगह बेकद्री होती हुई दिखती है, इसीलिए प्रकृति विनाश की तरफ जाती हुई प्रतीत होती है। मैं यहाँ किसी धर्मविशेष का पक्ष नहीं ले रहा हूँ, और न ही किसी विचारधारा का विरोध कर रहा हूँ, बल्कि जो सत्य घटना घटित हुई है, उसीका वर्णन और विश्लेषण कर रहा हूँ।

राजा हिमाचल मस्तिष्क का और उसका राज्य शरीर का प्रतीक है

शिवपुराण में आता है कि राजा हिमाचल ने विवाह महोत्सव के लिए अपने सभी संबंधी पर्वतों और नदियों को निमंत्रण दिया। विभिन्न प्रकार के अन्नों का भंडारण करवाया। चारों तरफ साज-सज्जा की गई। अपने राज्य के सभी लोगों के लिए खूब सुख-सुविधाएं वितरित कीं। उससे उसके पूरे राज्य के लोग प्रसन्न हो गए। प्रमुख ऋषियों को शिव के पास विवाह का निमंत्रण लेकर कैलाश मिलने भेजा। दरअसल राजा हिमाचल और उसका महल मस्तिष्क ही है। कैलाश सहस्रार चक्र है। धरती ही राजा हिमाचल का राज्य है। वह पूरा शरीर है। वैसे भी पर्वत को भूभृत कहते हैं। इसका मतलब है, धरती को पालने वाला। मस्तिष्क ही शरीर को पालता है। राजा हिमाचल सभी नदियों को अपने महल बुलाता है, मतलब मस्तिष्क शरीर की सभी नाड़ियों की ऊर्जा को अपनी तरफ आकर्षित करता है। वह सभी पर्वतों को भी न्यौता देता है, मतलब मस्तिष्क का मुख्य केंद्र अन्य छोटे-छोटे केंद्रों से संवेदना-शक्ति को इकट्ठा करके कुंडलिनी जागरण की सर्वोच्च संवेदना को अभिव्यक्त करता है। यही शिव विवाह है, और इसीको ही विभिन्न पर्वतों का शिवविवाह में सम्मिलित होना कहा गया है। पर्वतराज हिमाचल विभिन्न खाद्यान्नों का भंडारण करता है, मतलब मस्तिष्क शरीर की सारी ऊर्जा अपनी तरफ खींचता है। भोजन ही ऊर्जा है, ऊर्जा ही भोजन है। प्राण ऊर्जा की प्राप्ति के लिए ही भोजन किया जाता है। तभी तो कहते हैं कि अन्न ही प्राण है। राजा हिमाचल के पूरे राज्य की जनता धन-धान्य से युक्त होकर हर्षोल्लास से भर जाती है, मतलब मस्तिष्क में जब ऊर्जा की भरमार होती है, तब उससे ऐसे रसायन निकलते हैं, जो पूरे शरीर को लाभ पहुंचाते हैं। शरीर और ब्रह्मांड के बीच में इस तरह की समकक्षता पुस्तक ‘शरीरविज्ञान दर्शन’ में सर्वोत्तम रूप में दर्शाई गई है। शिवविवाह के दिन राज्य के सभी लोग विभिन्न भोगों की धाम खाते हैं, और विभिन्न विलासों का भरपूर आनन्द उठाते हैं। इसका मतलब है कि कुंडलिनी जागरण वाले दिन पूरे शरीर में रक्तसंचार बढ़ जाता है। ऋषियों को आम आदमी के जैसे साधारण विवाह को इतने विस्तार से लिखने की क्या जरूरत थी, क्योंकि वे ज्यादातर खुद ब्रह्मचारी या अविवाहित होते थे, और कई तो गृहस्थी से दूर रहकर वनों में तप करते थे। कुंडलिनी के तो माता-पिता हैं, पर शिव के कोई नहीं। वह तो स्वयंभू परमात्मा हैं, इसीलिए शम्भु कहे जाते हैं। इससे जाहिर होता है कि यह साधारण विवाह नहीँ है। कुंडलिनी जागरण को ही शिवविवाह के रूप में वर्णित किया गया है, ताकि गृहस्थी में बंधे हुए आमजन भी उसे समझ सके और उसे आसानी से प्राप्त कर सके।

हिमाचल राज्य का सर्वोच्च महल सहस्रार है, जहाँ पर शिव-शक्ति का वैवाहिक जोड़ा ही स्थायी रूप से निवास कर सकता है

उपरोक्तानुसार सप्तऋषियों को विवाह के निमंत्रण पत्र के साथ शिव के पास कैलाश भेजा। कैलाश सहस्रार चक्र है। वहाँ पर ही अद्वैतभाव रूपी शिव का निवासस्थान है। दरअसल प्राणोत्थान के बाद शरीर की ऊर्जा-नदी का प्रवाह सहस्रार की तरफ ही होता है। उससे स्वाभाविक है कि उस ऊर्जा के बल से सहस्रार क्षेत्र में अद्वैतभाव व आनन्द के साथ सुंदर चित्र प्रकट होते रहते हैं। यह भी स्वाभाविक ही है कि अधिकांशतः वे चित्र भी उन्हीं लोगों या वस्तुओं के बनते हैं, जिनके साथ अद्वैत भाव या आध्यात्मिक भाव जुड़ा होता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कोई व्यक्ति उसी क्षेत्र में जाना चाहता है, जो क्षेत्र उसके अनुकूल या उसके जैसा हो। ऋषि-मुनियों से अधिक अद्वैतरूप या आध्यात्मिक कौन हो सकता है। इसीलिए उन आध्यात्मिक वस्तुओं या व्यक्तियों को सप्तर्षिओं के रूप में दिखाया गया है। वैसे वह गुरु, मंदिर का पुजारी, मंदिर, गाय, गंगा आदि कोई भी आध्यात्मिक वस्तु हो सकती है। शिवजी के नजदीक तो ये चीजें जाती हैं, और उन्हें कुंडलिनी के साथ एकाकार होने के लिए प्रेरित भी करती हैं, पर खुद शिव से एकाकार नहीं हो पातीं। इसीको इनके द्वारा शिव को उन्हीं के विवाह के लिए निमंत्रण देने के रूप में दिखाया गया है। विवाह किससे, कुंडलिनी से। शिव के साथ एकाकार न हो पाने के कारण ही इन्हें निमंत्रण देकर वापिस आते हुए दिखाया गया है। कोई भी चित्र शिव से जुड़े बिना निरन्तर सहस्रार में नहीं बना रह सकता, उसे जल्दी ही मस्तिष्क के निम्नतर ऊर्जा स्तर वाले निचले साधारण क्षेत्रों में आना ही पड़ता है। कुंडलिनी ही शिव के साथ एकाकार होने या जागृत होने के फलस्वरूप शिव के साथ कैलाश में निरंतर बनी रह पाती है। मतलब कि कुंडलिनी जागरण के बाद आदमी को अपनी आत्मा के साथ जुड़ी हुई कुंडलिनी का अनुभव सहस्रार चक्र में निरंतर होता रहता है। यही कुंडलिनी जागरण की सर्वप्रमुख खूबी है, और यही आदमी को मोक्ष की ओर ले जाती है।

प्राण ही सहस्रार में शिव-शक्ति का विवाह रचाते हैं

फिर आता है कि शिव के विवाह समारोह के लिए विश्वकर्मा ने अद्भुत व दिव्य विवाह मंडप, भवन व प्रांगण आदि बनाए। जड़ मूर्तियां सजीव लग रही थीं, और सजीव वस्तुएं जड़ मूर्तियां लग रही थीं। जल में स्थल का और स्थल में जल का भान हो रहा था। दरअसल कुंडलिनी जागरण के आसपास प्राणों के सहस्रार में होने के कारण सब कुछ अद्भुत व दिव्य लगता है। अतीव आनन्द की स्थिति होती है। चारों ओर शांति महसूस होती है। अद्वैत भाव चरम के करीब होता है, और कुंडलिनी जागरण के दौरान तो चरम पर पहुंच जाता है। सभी कुछ एक जैसा लगता है। भेद दृष्टि खत्म सी हो जाती है। यह नशे के जैसी मूढ़ अवस्था नहीं होती, पर परम चेतनता और आनन्द से भरी होती है। इसी आध्यात्मिक भाव को यहाँ उपरोक्त रोचक कथानक के रूप में दर्शाया गया है। जल का थल लगना या थल का जल लगना, मतलब जल और थल के बीच में अभेद का अनुभव। जड़ का चेतन की तरह दिखना व चेतन का जड़ की तरह दिखना, मतलब जड़ और चेतन के बीच में समानता नजर आना। हर जगह झाड़-बुहार के पूरी तरह से साफ व निर्मल कर दी गई थी। इसका मतलब है कि सहस्रार में ही असली व पूर्ण निर्मलता का अनुभव होता है। बाहर से जितना मर्जी सफाई कर लो, यदि सहस्रार में प्राण नहीं हैं, तो सबकुछ मैला ही लगता है। इसी वजह से तो गाय के गोबर से पुते हुए आध्यात्मिक स्थान अति पवित्र महसूस होते हैं, क्योंकि आध्यात्मिकता के प्रभाव से सहस्रार चक्र प्राण से संपन्न होता है। जिन मूल्यवान भवनों में लड़ाई-झगड़ों का बोलबाला हो, वहां की चाकचौबंद सफाई भी रास नहीं आती, और वहाँ दम सा घुटता है। इसके विपरीत एक आध्यात्मिक साधु पुरुष की गोबर से लिपीपुती घासफूस की झौंपड़ी भी बड़ी आकर्षक व संजीदा लगती है।

कुंडलिनी रहस्य पुरुष व स्त्री के बीच के शाश्वत प्रेम संबंध के रूप में ही उजागर होता है

सभी मित्रों को आने वाले दीपावली पर्व की शुभकामनाएं

शिवपार्वती विवाह, दुनिया का महानतम रहस्य

मित्रो, एक अन्य अर्थ भी है शिव पार्वती विवाह का। पार्वती प्रकृति है, जो मन के विचारों के रूप में है। वह परब्रह्म शिव को बांध देती है। यही शिव पार्वती से कहते हैं कि पार्वती, मैं सदा स्वतंत्र हूँ, पर तुमने मुझे परतंत्र बना दिया है, क्योंकि सबकुछ करने वाली महामाया प्रकृति तुम ही हो। पार्वती ने घोर तपस्या की, मतलब प्रकृति ने करोड़ों वर्षों तक जीवविकास किया। तब वह इस काबिल हुई कि परमात्मा को जीवात्मा बना सकी। इससे जीव की उत्पत्ति हुई। पार्वती शिव से कहती है कि वह उसके पिता हिमालय से उसका हाथ मांगे। इसका मतलब है कि प्रकृति नहीं चाहती कि हर जगह जीवात्मा की उत्पत्ति होए। अगर ऐसा होता तो पत्थर, मिट्टी, पानी, कीटाणु आदि में भी जीवात्मा होती और उन्हें भी दुःख दर्द हुआ करता, इससे सृष्टि में अव्यवस्था फैलती। इसलिए प्रकृति चाहती है कि जब जीव का शरीर अच्छी तरह से विकसित हो जाए, तब उसीमें जीवात्मा की उत्पत्ति होए। इसी विकसित शरीर को ही पर्वतराज हिमालय कहा गया है। पार्वती पहले हिमालय का निर्माण करती है, फिर उसकी पुत्री के रूप में पैदा होकर उसी पर रहने लगती है। मतलब कि प्रकृति पहले शरीर का निर्माण करती है, फिर उसीसे पैदा जैसी होकर उसीके अंदर बस जाती है। यह ऐसे ही है, जैसे आदमी पहले अपने लिए घर बनाता है, फिर उसके अंदर खुद रहने लगता है। फिर शिव कहते हैं कि वे निर्विकार और निरीह होकर भी भक्तों के लिए शरीर धारण करते हैं। वास्तव में ये दृश्य जगत शिव का ही शरीर है। इसी के पीछे भागकर दरअसल आदमी शिव के पीछे ही भागता है, मतलब उसीकी भक्ति करता है। पर आदमी को ऐसा नहीं लगता। कुंडलिनी भी परब्रह्म शिव का स्थूल रूप ही है, जिसके ध्यान से शिव का ही ध्यान होता है। सीधे रूप में तो परब्रह्म शिव को कोई नहीं जान-पहचान सकता।

वामपंथी तंत्र के पुरोधा भगवान शिव

शिवपुराण में शिव को अभक्ष्यभक्षी और भूतबलिप्रेमी कहा है। मतलब साफ है। यह पँचमकारी वाममार्गियों की इस मान्यता की पुष्टि करता है कि शिव माँस, मदिरा, भांग आदि का सेवन करते हैं, और मंदिरों में देवताओं को दी जाने वाली पशुबलि से प्रसन्न होते हैं। खैर, सच्चाई तो वे ही जानें। मैं तो संभावना को ही अभिव्यक्त कर रहा हूँ। वास्तव में भगवान ही सबको बचाने वाले हैं, और वही मारने वाले भी हैं। पर मारने वाले हमें भ्रम से ही प्रतीत होते हैं। उनके द्वारा मारने में भी उनके द्वारा बचाना ही छिपा होता है। हम पूरी तरह से भगवान का गुणगान तो कर सकते हैं, पर पूरी तरह उनकी नकल नहीँ कर सकते। ऐसा इसलिए है क्योंकि भगवान कर्म और फल से प्रभावित नहीं होते, पर आदमी को बुरे कर्म का बुरा फल भोगना ही पड़ता है। हो सकता है कि इस्लाम की प्रारंभिक मान्यता भी यही हो, पर वह कालांतर में अतिवादी होकर अन्य धर्मों और संप्रदायों का दुश्मन बन गया हो। यहाँ तक कि एक मुस्लिम मौलवी कासिम ने भी भगवान शिव को इस्लाम के पहले दूत के रूप में संदर्भित किया है। इससे हाल की ही घटना याद आ रही है। सूत्रों के अनुसार, इस क्रिकेट विश्वकप में एक पाकिस्तानी खिलाड़ी बीच मैदान में सबके सामने नीचे बैठकर नमाज पढ़ने लग गया। पाकिस्तान को मैच जीतने से ज्यादा खुशी धर्मप्रचार से मिली।

कुंडलिनी ही एक सच्चे जीवरक्षक के रूप में

यह कहा जाता है कि विभिन्न जीवों में कुंडलिनी विभिन्न चक्रों पर रहती है। विकसित जीवों में यह ऊपर वाले चक्रों में रहती है, जबकि अविकसित जीवों में नीचे वाले चक्रों पर। मैंने इसका वर्णन एक पुरानी पोस्ट में भी किया है। इसका यह मतलब नहीं है कि सभी जीव कुंडलिनी योगी होते हैं और कुंडलिनी ध्यान करते हैं। इसका मतलब यह है कि जब हमारी चेतना का स्तर नीचा होता है, तब यदि अद्वैत का अदृश्य अवचेतन मन से ही सही, हल्का सा ध्यान या ख्याल किया जाए, तब कुंडलिनी आनंदमय शांति पैदा करती हुई नीचे वाले चक्रों पर आ जाती है। अदृश्य ध्यान का हल्का ख्याल मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि चेतनता की न्यूनावस्था में मस्तिष्क में ध्यान करने लायक़ ऊर्जा ही कहाँ होती है। अचेतनता के अंधकार के समय इस अचिंत्य ध्यान भावना से कुंडलिनी ज्यादातर नाभि चक्र पर अनुभव में आती है, और यदि चेतना का स्तर इससे भी अधिक गिरा हुआ हो, तो स्वाधिष्ठान चक्र पर आ जाती है। हालांकि कुछ क्षणों में ही कुंडलिनी मस्तिष्क के चक्रों में आ जाती है, क्योंकि कुंडलिनी का स्वभाव ही ऊपर उठना है। ऐसा करते हुए वह मूलाधार से ऊर्जा भी ऊपर ले आती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि निम्न चेतनता की अवस्था में मस्तिष्क में पर्याप्त ऊर्जा का स्तर नहीं होता, जो कुंडलिनी को ऊपर वाले चक्रों में स्थापित कर सके। मालूम पड़ता है कि कुंडलिनी का निचले चक्रों पर आना मृत्यु के समय सहायक होता है। मृत्यु के समय चेतनता बहुत निम्न स्तर पर होती है। उससे मन में अंधेरा सा छाया रहता है। उस समय अद्वैत की सूक्ष्म भावना से कुंडलिनी निचले चक्रों पर आकर अच्छे मित्र की तरह साथ निभाते हुए आनंदमयी और शांत चेतना प्रदान करती है। वह मृत्यु जनित सभी दुखों और कष्टों को हरते हुए आदमी को मुक्ति प्रदान करती है।

कुंडलिनी के बिना विपश्यना या साक्षीभाव साधना या संन्यास योग करना कठिन व अव्यवहारिक प्रतीत होता है

कर्मयोग

दोस्तों, आजकल मेरे मानस पटल पर गीता के बारे में नित नए रहस्य उजागर हो रहे हैं। दरअसल पूरी गीता एक कुंडलिनी शास्त्र ही है। इसे युद्ध के मैदान में सुनाया गया था, इसीलिए इसमें विस्तार न होकर प्रेक्टिकल बिंदु ही हैं। व्यावहारिकता के कारण ही इसमें एक ही बात कई बार और कई तरीकों से बताई लगती है। मेरा शरीरविज्ञान दर्शन अब मुझे पूरी तरह गीता पर आधारित लगता है। हालांकि मैंने इसे स्वतंत्र रूप से, बिना किसी की नकल किए और अपने अनुभव से बनाया था। 

कुंडलिनी ही सभी प्रकार की योग साधनाओं व सिद्धियों के मूल में स्थित है

योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः। सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते॥५-७॥
अपने मन को वश में करने वाला, जितेन्द्रिय, विशुद्ध अन्तःकरण वाला और सभी प्राणियों को अपना आत्मरूप मानने वाला कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी उससे लिप्त नहीं होता है॥7॥
उपरोक्त सभी गुण अद्वैत के साथ स्वयं ही रहते हैं। अद्वैत कुंडलिनी के साथ रहता है। इसलिए इस श्लोक के मूल में कुंडलिनी ही है।

आजकल के वैज्ञानिक व तर्कपूर्ण युग में हरेक आध्यात्मिक उक्ति का वैज्ञानिक व तर्कपूर्ण दार्शनिक आधार होना जरूरी है

नैव किंचित्करोमीतियुक्तो मन्येत तत्त्ववित्।पश्यञ्श्रृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन्॥५-८॥
तत्व को जानने वाला यह माने कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ । देखते हुए, सुनते हुए, स्पर्श करते हुए, सूँघते हुए, खाते हुए, चलते हुए, सोते हुए, साँस लेते हुए ॥8॥
सीधे तौर पर ऐसा मानना आसान नहीं है कि मैं कुछ नहीं कर रहा हूं। ऐसा मानने के लिए कोई वैज्ञानिक या दार्शनिक आधार तो होना ही चाहिये। ऐसा ही उत्तम आधार शरीरविज्ञान दर्शन ने प्रदान किया है। किसी दिव्य प्रेरणा से इसे बनाने की नींव मैंने तब डाली थी, जब क्षणिक व स्वप्नकालीन आत्मज्ञान के बहकावे में आकर मैं अपने काम से जी चुराने लग गया था। मैं अनायास ही संन्यास योग की तरफ बढ़ा जा रहा था। इससे मैं आसपास के संबंधित लोगों से भौतिक रूप से पिछड़ने लग गया था। इस दर्शन ने मुझे दुनियादारी की तरफ धकेला और मेरे कर्मयोग को सफल किया। इसमें वैज्ञानिक तौर पर सिद्ध किया गया है कि जो कुछ भी आदमी कर रहा है, वह सब हमारे शरीर में भी वैसा ही हो रहा है। जब हमारे शरीर में रहने वाले देहपुरुष अपने को कर्ता नहीं मानते तो हम अपने को कर्ता क्यों मानें। आदमी अपने अवचेतन मन के दायरे में समझे कि उस दार्शनिक पुस्तक के सूक्ष्म रूप की वर्षा हर समय उस पर हो रही है। अवचेतन मन से मैं इसलिए कह रहा हूँ, क्योंकि प्रत्यक्ष या चेतन मन तो दुनियादारी के काम में व्यस्त रहता है, उसे क्यों परेशान करना। उससे त्वरित व चमत्कारिक लाभ होते मैंने स्वयं देखा है। ऐसा चिंतन करते ही आनन्द के साथ कुंडलिनी प्रकट हो जाती है, और आदमी रिलेक्स फील करता है। इसका मतलब है कि इस श्लोक के आधार में भी कुंडलिनी ही है। इससे हम यह भी समझ सकते हैं कि दरअसल आदमी के मन की कुंडलिनी ही कर्ता और भोक्ता है, आदमी खुद नहीँ। 

यदि शरीरविज्ञान दर्शन के ऐसे चिंतन से मस्तिष्क में दबाव व जड़त्व सा लगे, तो दूसरा तरीका आजमाना चाहिए। इसमें शरीरविज्ञान दर्शन की ओर जरा सा ध्यान दिया जाता है, फिर समयानुसार हरेक परिस्थिति को इसका आशीर्वाद समझ कर स्वीकार कर लेना चाहिए, और प्रसन्न रहना चाहिए।।

सांख्ययोग या संन्यास योग विपासना या विटनेसिंग के समकक्ष है और कर्मयोग कुंडलिनी योग के समकक्ष

संन्यासः कर्मयोगश्चनिःश्रेयसकरावुभौ। तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते॥५-२॥

श्री कृष्ण भगवान कहते हैं- कर्म संन्यास और कर्मयोग- ये दोनों ही परम कल्याण के कराने वाले हैं, पर इन दोनों में भी कर्मयोग कर्म-संन्यास से (करने में सुगम होने के कारण) श्रेष्ठ है॥2॥
कर्मयोग व कुंडलिनी योग, दोनों में कुंडलिनी अधिक प्रभावी होती है। इसमें संसार में परिस्थितियों के अनुसार प्रवृत्त रहते हुए कुंडलिनी को ज्यादा अहमियत दी जाती है। यह श्रेष्ठ है, क्योंकि इससे दुनियादारी भी अच्छे से चलती है। बहुत से सर्वोत्तम प्रकार के राजा व प्रशासक कर्मयोगी हुए हैं। संन्यास योग में विचारों के प्रति साक्षीभाव रखकर उन्हें विलीन किया जाता है। अधिकांशतः बुद्धिस्ट लोग इसी तरीके को अपनाते हैं, इसीलिए वे दुनिया से दूर रहकर मठों आदि में अपना ज्यादातर समय बिताते हैं। कई आधुनिक लोग भी अपनी थकान मिटाने के लिए इस तरीके का अल्पकालिक प्रयोग करते हैं।

यह श्लोक अर्जुन जैसे उन लोगों को देखते हुए बना था, जो अपने कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों को छोड़कर साक्षीभाव साधना के नाम पर अकर्मक बनना चाहते थे। इस श्लोक ने ऐसे लोगों की आंख खोल दी। उन्हें इस श्लोक के माध्यम से बताया कि सबसे ज्यादा आध्यात्मिक लाभ कर्म करने से प्राप्त होता है, ज्ञानसाधना के नाम पर कर्म छोड़ने से नहीं। ज्ञानसाधना इतनी आसान नहीँ है। हर कोई बुद्ध नहीं बन सकता। यदि ज्ञानसाधना असफल हो जाए तो नरकप्राप्ति की जो बात शास्त्रों में कही गई है, वह सत्य प्रतीत होती है। वैसे तो कर्मयोग असफल नहीं होता। पर यदि किसी कुचक्र से विरले मामले में हो भी जाए तो भी कम से कम स्वर्ग मिलने की संभावना तो है ही, क्योंकि इसमें आदमी ने अच्छे कर्म किए होते हैं।

जो आध्यात्मिक लाभ विटनेसिंग साधना से प्राप्त होता है, वही कुंडलिनी साधना से भी प्राप्त होता है

यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानंतद्योगैरपि गम्यते। एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स: पश्यति॥५-५॥
ज्ञानयोगियों द्वारा जो गति प्राप्त की जाती है, कर्मयोगियों द्वारा भी वही प्राप्त की जाती है इसलिए जो पुरुष ज्ञानयोग और कर्मयोग को (फल से) एक देखता है, वही ठीक देखता है॥5॥
इस श्लोक का मतलब है कि जो मुक्ति संन्यास योग या विपश्यना से मिलती है, वही कर्मयोग या कुंडलिनी योग से भी मिलती है। मुक्ति से यहाँ तात्पर्य बन्धनकारी विचारों से मुक्ति है। केवल यही आभासिक अंतर है कि विपश्यना या विटनेसिंग से वह मुक्ति ज्यादा प्रतीत होती है। क्योंकि विपश्यना-योगी के अंदर व बाहर, कहीं भी विचारों का तूफान नहीं होता, एक शांत झील की तरह। जबकि कर्मयोगी, समुद्र की तरह बाहर से तूफानी, पर अंदर से शांत होते हैं। यह श्लोक गीता का सर्वोत्तम श्लोक है। अध्यात्म का सम्पूर्ण रहस्य इसमें छिपा है। इसे मैंने खुद अनुभव किया है। कर्मयोग से ही मैं सांख्ययोग तक पहुंचा। यह अलग बात है कि मैं अब भी कर्मयोग को ही महत्त्व देता हूँ। साधारण लोगों को दोनों प्रकार के योग अलग-अलग दिखाई देते हैं, पर दोनों अंदर से एकसमान है, और एकसमान फल प्रदान करते हैं। कर्मयोग ज्यादा प्रभावी है। ऐसा इसलिए है क्योंकि जो विचारों की आनन्दमयी शून्यता संन्यास योग से प्राप्त होती है, वही कर्मयोग से भी प्राप्त होती है। इन दोनों में कर्मयोग की अतिरिक्त विशेषता यह है कि बेशक इसमें अंदर से मन की आनंदमयी व कुंडलिनीमयी शून्यता हो, पर बाहर से दुनियादारी के सभी काम सर्वोत्तम ढंग से होते रहते हैं। यह समुद्र की प्रकृति से मेल खाता है, बाहर से तूफानी, जबकि अंदर से शांत।

कई लोग कर्मयोग और संन्यास योग, दोनों के मिश्रण का प्रयोग करते हैं। वे काम के मौकों पर कर्मयोग पर ज्यादा ध्यान देते हैं, और काम के अभाव में संन्यास योग पर। मैंने भी इस तरीके को आजमाया था। पर मुझे लगता है कि पूर्ण कर्मयोग ही सर्वश्रेष्ठ है। वास्तव में काम की कमी कभी हो ही नहीँ सकती।

दुनियादारी में उलझे व्यक्ति के लिए विटनेसिंग साधना के बजाय कुंडलिनी साधना करना अधिक आसान है

संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः। योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्मनचिरेणाधिगच्छति॥५-६॥

परन्तु हे वीर अर्जुन! कर्मयोग के बिना (कर्म-) संन्यास कठिन है और कर्मयोग में स्थित मुनि परब्रह्म को शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है॥6॥
इस श्लोक का अभिप्राय है कि जब कर्मयोग या कुंडलिनी योग से कुंडलिनी जागरण हो जाता है, तभी हम विचारों का असली संन्यास कर सकते हैं। यदि कुन्डलिनी क्रियाशील भी बनी रहे, तो भी काम चल सकता है। कुंडलिनी जागरण दुनियादारी का उच्चतम स्तर है। इससे मन दुनिया से पूरी तरह तृप्त और संतुष्ट हो जाता है। इसलिए इसके बाद विचारों का त्याग करना बहुत आसान या यूँ कह सकते हैं कि स्वचालित या स्वाभाविक ही हो जाता है। इसके बिना, मन दुनिया में ही रमा रहना चाहता है, क्योंकि उसे इसका पूर्ण रस नहीँ मिला होता है। इसीलिए तो बहुत से बौद्ध भिक्षु व अन्य धर्मों के संन्यासी दुनिया से दूर रहकर एकांत में साधना करना अधिक पसंद करते हैं। इसीसे वे अपने मन को दुनिया के प्रलोभन से बचाकर रख पाते हैं। इससे विपश्यना या विटनेसिंग या संन्यास योग या सांख्ययोग के लिए कुंडलिनी क्रियाशीलता व कुंडलिनी जागरण के महत्त्व का साफ पता चलता है। विपासना, विपश्यना, विटनेसिंग, साक्षीभाव, संन्यास योग, सांख्ययोग, ज्ञानयोग, ये सभी पर्यायवाची शब्द हैं

श्रीमद्भागवत गीता की विस्मयकारी व्यावहारिकता

मुझे लगता है कि गीता के आध्यात्मिक सिद्धांतों को व्यावहारिक रूप से अपने दैनिक जीवन में लागू किया जाना चाहिए, अन्यथा मात्र इसे पढ़ने या इसके दैनिक जप करने से कोई विशेष फायदा प्रतीत नहीं होता। यदि कोई व्यक्ति कर्मयोग के रहस्य को व्यावहारिक रूप से समझता है, तो उसे बहुत ज्यादा पढ़ने की जरूरत नहीं है।

कुंडलिनी ही आध्यात्मिक मुक्ति के लिए पर्याप्त प्रतीत होती है

श्रीमद्भागवत गीता

मित्रों, मैंने पिछ्ली पोस्ट में ऑनलाइन गीता से संबंधित एक महत्त्वपूर्ण पोस्ट डाली थी। उसमें कुंडलिनी योग का पूरा रहस्य किस तरह गीता के दो श्लोकों में छिपा हुआ है, यह बताया गया था। आज मैं इस पोस्ट में गीता में छिपा दूसरा योग रहस्य साझा कर रहा हूँ। 

गीता के पांचवें अध्याय के 18वें व 19वें श्लोक में आध्यात्मिक मुक्ति का रहस्य छिपा हुआ है

विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥५-१८॥
ऐसे ज्ञानी जन विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण में, गाय में, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल को समान देखते हैं॥18॥

इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः। निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः॥५-१९॥
जिनका मन सम भाव में स्थित है, उनके द्वारा यहाँ संसार में ही लय(मुक्ति) को प्राप्त कर लिया गया है; क्योंकि ब्रह्म निर्दोष और सम है, इसलिए वे ब्रह्म में ही स्थित हैं॥19॥

उपरोक्त दोनों श्लोकों से स्पष्ट होता है कि आध्यात्मिक मुक्ति के लिए न तो कुंडलिनी जागरण की आवश्यकता है और न ही आत्मज्ञान की। मुक्ति तो केवल समदर्शिता या अद्वैत से ही मिलती है। तो फिर लोग अद्वैत को छोड़कर आध्यात्मिक जागृति की तरफ ही क्यों भागते हैं। यह इसलिए क्योंकि जागृति के बाद अद्वैतभाव को बना कर रखना थोड़ा आसान हो जाता है। पर ऐसा थोड़े समय, लगभग 3-4 सालों तक ही होता है। उसके बाद आदमी अपने आध्यात्मिक जागरण को काफी भूलने लग जाता है। यदि विभिन्न आध्यात्मिक तरीकों से उच्च कोटि के अद्वैत को निरंतर बना कर रखा जाए, तो वह जागरण के तुल्य ही है। विभिन्न कुंडलिनी साधनाओं से यदि कुंडलिनी को क्रियाशील रखा जाए तो अद्वैत भाव निरंतर बना रहता है, क्योंकि जहाँ कुंडलिनी होती है, वहाँ अद्वैत रहता ही है। कुंडलिनी जागरण के समय पूर्ण अद्वैत भाव व आनन्द की अनुभूति भी यही सिद्ध करती है कि जहाँ कुंडलिनी है, वहाँ अद्वैत या समदर्शिता और आनन्द भी है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि बेशक गीता में कुंडलिनी का नाम न लिया गया हो, पर गीता एक कुंडलिनीपरक शास्त्र ही है।

कुंडलिनी या कुंडलिनी जागरण में से किसको ज्यादा अहमियत देनी चाहिए

कुंडलिनी को ही ज्यादा अहमियत देनी चाहिए। क्योंकि यदि कुंडलिनी क्रियाशील बनी रहती है, तो कुंडलिनी जागरण की ज्यादा आवश्यकता नहीँ। यदि वह हो जाए तो भी अच्छा, और यदि न होए तो भी अच्छा। वैसे भी समय आने पर कुंडलिनी जागरण अपने आप हो ही जाता है, यदि कुंडलिनी साधना निरंतर बना कर रखी जाए। पर यदि आदमी कुंडलिनी साधना को छोड़कर दिग्भ्रमित हो जाए, और कुंडलिनी जागरण के चित्र-विचित्र क्रियाओं के पीछे भागने लगे, तो इसकी पूरी संभावना है कि उसे न तो कुंडलिनी मिलेगी और न ही कुंडलिनी जागरण। वैसे भी, कुंडलिनी जागरण के बाद भी कुंडलिनी साधना को निरंतर रूप से जारी रखना ही पड़ता है। तो फिर क्यों न जागरण से पहले भी उसे निरन्तर जारी रखा जाए। इससे जाहिर होता है कि असली शक्ति तो कुंडलिनी क्रियाशीलता में ही है। कुंडलिनी क्रियाशीलता मतलब कुंडलिनी भाव के साथ आदमी की जगत में पूर्ण व्यावहारिक व मानवीय क्रियाशीलता बनी रहना। जागरण तो केवल कुंडलिनी साधना के प्रति अटूट विश्वास पैदा करता है, और निरन्तर उसे बनाकर रखवाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि कुंडलिनी जागरण कुंडलिनी की आध्यात्मिक शक्ति का साक्षात वैज्ञानिक प्रमाण है। कुंडलिनी जागरण की दूसरी कमी यह है कि उसे प्राप्त करने के लिए आदमी का स्वस्थ व जवान होना बहुत जरूरी है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कुंडलिनी जागरण के लिए बहुत अधिक प्राणशक्ति की आवश्यकता पड़ती है। इसका मतलब है कि दुनियादारी में डूबे हुए, वृद्ध और बीमार लोगों को कुंडलिनी जागरण होने की संभावना बहुत कम होती है। पर वे कुंडलिनी साधना का लाभ उठा सकते हैं। एक तथ्य और है कि कुंडलिनी जागरण उस समय होता है, जिस समय आदमी को न तो उसे प्राप्त करने की इच्छा हो, औऱ न ही उसके प्राप्त होने की उम्मीद हो। इसलिए कुंडलिनी साधना से कुंडलिनी क्रियाशीलता बनाए रखना ही पर्याप्त है। उपरोक्त सभी तथ्यों व सिद्धांतों को शरीरविज्ञान दर्शन नामक पुस्तक में वैज्ञानिक, व्यावहारिक व अनुभवात्मक तौर पर समझाया गया है।

कुंडलिनी जागरण ही सृष्टि विकास का चरम बिंदु है, फिर ब्रह्मांड के विकास का क्रम बंद हो जाता है, और स्थिरता की कुछ अवधि के बाद, प्रलय की प्रक्रिया शुरू हो जाती है

दोस्तों, मैंने पिछली पोस्ट में लिखा था कि सृष्टि का विकास केवल कुंडलिनी विकास के लिए है, और कुंडलिनी जागरण के साथ, सृष्टि का विकास पूरा हो जाता है, और उसके बाद रुक जाता है। आज हम चर्चा करेंगे कि उसके बाद क्या होता है। दरअसल, प्रलय की घटना हमारे शरीर के अंदर ही होती है, बाहर नहीं।

हिंदू पुराणों में प्रलय का वर्णन

हिंदू पुराणों के अनुसार, चार युग बीत जाने पर प्रलय होता है। पहला युग है सतयुग, दूसरा युग है द्वापर, तीसरा है त्रेता और अंतिम युग है कलियुग। इन युगों में मानव का क्रमिक पतन हो रहा है। सतयुग को सर्वश्रेष्ठ और कलियुग को सबसे बुरा बताया गया है। जिस क्रम से संसार का निर्माण होता है, उसी क्रम में प्रलय भी होता है। पंचतत्व इंद्रिय अंगों में विलीन हो जाते हैं। इंद्रियाँ तन्मात्राओं या सूक्ष्म अनुभवों में विलीन हो जाती हैं। पंचतन्मात्राएँ अहंकार में विलीन हो जाती हैं। अहंकार महात्त्व या बुद्धि में विलीन हो जाता है। अंत में, महातत्व प्रकृति में विलीन हो जाता है। आपदा के अंत में, प्रकृति भी भगवान में विलीन हो जाती है।

चार युग मानव जीवन के चार चरणों और चार आश्रमों के रूप में हैं

मनुष्य के बचपन को सतयुग कहा जा सकता है। इसमें मनुष्य सभी मानसिक और शारीरिक विकारों से मुक्त होता है। वह देवता के समान सत्यस्वरूप होता है। फिर किशोरावस्था आती है। इसे द्वापर नाम दिया जा सकता है। इसमें मन में कुछ विकार उत्पन्न होने लगता है। तीसरा चरण परिपक्वता आयु है, जिसमें एक व्यक्ति दुनियादारी की उलझनों से बहुत उदास हो जाता है। अंतिम चरण बुढ़ापे का है। यह कलियुग की तरह है, जिसमें मन और शरीर की विकृति के कारण अंधकार व्याप्त होता है। इसी प्रकार मानव जीवन के चार आश्रम या निवास भी चार युगों के रूप में हैं। ब्रह्मचर्य आश्रम को सतयुग कहा जा सकता है, गृहस्थ का निवास द्वापरयुग है, वानप्रस्थ त्रेतायुग है और संन्यास आश्रम कलियुग है। वास्तव में होलोकॉस्ट या प्रलय को देखकर इन अवस्थाओं का बाहर से मिलान किया जा रहा है। वैसे तो शरीर की किसी भी अवस्था में, कोई भी व्यक्ति मन के किसी भी उच्च स्तर पर हो सकता है।

मानव मृत्यु को ही प्रलय के रूप में दर्शाया गया है

जैसा कि हमने पिछली पोस्ट में स्पष्ट किया था कि मनुष्य अपने मन के बाहर की दुनिया को कभी नहीं जान सकता। उसकी दुनिया उसके दिमाग तक सीमित है। इसका मतलब यह है कि तब सांसारिक निर्माण और प्रलय भी मन में हैं। इस मानसिक संसार का वर्णन पुराणों में मिलता है। हम धोखे में पड़ जाते हैं और इसे भौतिक दुनिया में व बाहर समझ लेते हैं। कुंडलिनी जागरण या मानसिक परिपक्वता के बाद मनुष्य का लगाव बाहरी दुनिया में नहीं होता है। वह अद्वैत भाव और वैराग्य के साथ रहता है। हम इसे ब्रह्मांड के पूर्ण विकास के बाद इसका स्थायित्व कह सकते हैं। फिर उसके जीवन के अंतिम दिनों में, प्रलय की प्रक्रिया शुरू होती है। कमजोरी के कारण, वह दुनियादारी का काम छोड़ देता है और अपने शरीर के रखरखाव में व्यस्त रहता है। एक तरह से हम कह सकते हैं कि पंचमहाभूत या पाँच तत्व इंद्रियों में विलीन हो जाते हैं। फिर समय के साथ उसकी इंद्रियाँ भी कमजोर होने लगती हैं। कमजोरी के कारण उसका ध्यान इंद्रियों से आंतरिक मन की ओर जाता है। वह अपने हाथ से पानी नहीं पी सकता। दूसरे उसे मुँह में पानी भरकर पिलाते हैं। वह पानी के रस को महसूस करता है। आसपास के परिचारक उसके मुंह में खाना डालकर उसे खाना खिलाते हैं। वह भोजन का स्वाद और गंध महसूस करता है। परिजन उसे अपने हाथों से नहलाते हैं। उसे पानी का स्पर्श महसूस होता है। अन्य लोग उसे विभिन्न चित्र आदि दिखाते हैं। दूसरे उसे कथा कीर्तन या ईश्वरीय कहानियाँ सुनाते हैं। वह उनकी मीठी और ज्ञान से भरी आवाज़ को महसूस करके आनन्दित होता है। एक तरह से, इंद्रियाँ पंचतन्मात्राओं या पाँच सूक्ष्म आंतरिक अनुभवों में विलीन हो जाती हैं। यहां तक कि बढ़ती कमजोरी के साथ, आदमी को पंचतन्मात्राओं का अनुभव करने में भी कठिनाई होती है। तब उसके प्यारे भाई उसे नाम से बुलाते हैं। इससे उसके अंदर थोड़ी ऊर्जा का प्रवाह होता है, और वह खुद का आनंद लेने लगता है। हम कह सकते हैं कि पंचतन्मात्राएँ अहंकार में विलीन हो गईं। कमजोरी के और बढ़ने के साथ ही उसके अंदर अहंकार का भाव भी कम होने लगता है। नाम से पुकारे जाने पर भी वह फुर्ती हासिल नहीं करता। अपनी बुद्धि के साथ, वह अंदर ही अंदर अपनी स्थिति के बारे में विश्लेषण करना शुरू कर देता है, क्या इसका कारण है, क्या उपाय और क्या भविष्य का परिणाम है। एक तरह से अहंकार महत्तत्त्व या बुद्धि में विलीन हो जाता है। उसके बाद बुद्धि में भी सोचने की ऊर्जा नहीं रहती है। मनुष्य निर्जीव की तरह हो जाता है। उस अवस्था में वह या तो कोमा में चला जाता है या मर जाता है। हम इसे महत्तत्त्व के प्रकृति में विलय के रूप में कहेंगे। जैसा कि पिछली पोस्ट में बताया गया है, उस स्तर पर सभी गुण संतुलन में आते हैं। न वे बढ़ते हैं, न घटते हैं। वे वही रहते हैं। वास्तव में, यह विचारशील मस्तिष्क है जो प्रकृति के गुणों को बढ़ाने और घटाने के लिए लहरें प्रदान करता है। यह एक साधारण बात है कि जब मस्तिष्क ही मृत हो गया है, तो गुणों को विचारों का झटका कौन देगा। अज्ञानी लोग मूल प्रकृति  जितना ही दूर जा पाते हैं। इस प्रकार के लोग बार-बार जन्म और मृत्यु के रूप में आगे-पीछे आते रहते हैं। शास्त्रों के अनुसार प्रबुद्ध एक कदम आगे बढ़ सकता है। उसके मामले में प्रकृति पुरुष में विलीन हो जाती है। पुरुष पूर्ण और प्रकाशस्वरूप है। उसमें गुण नहीं होते। वह निर्गुण है। वहाँ से पुनर्जन्म नहीं होता।

कुंडलिनी ही यमुना में पौराणिक कालियनाग को मारने वाले भगवान श्रीकृष्ण के रूप में अभिव्यक्त होती है

मित्रों, योग एक वैज्ञानिक विधि है। आम लोग इसे आसानी से नहीं समझ सकते। अभ्यास तो इसका तब करेंगे न, जब इसे समझेंगे। इसीलिए आम जनमानस की सुविधा के लिए पुराण रचे गए हैं। पुराणों में योग को विभिन्न मिथक घटनाओं और कथाओं के रूप में समझाया गया है। हालांकि मिथक रूप होने पर भी ये कथाएं सैद्धांतिक रूप से सत्य होती हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि ये मिथक शास्त्रीय होते हैं, विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए होते हैं, और गैर-शास्त्रीय या साधारण मिथकों के विपरीत होते हैं। कुछ तथाकथित आधुनिकतावादियों की सोच के विपरीत, ये अंधविश्वास की श्रेणी में नहीं आते। सामाजिक, व्यक्तिगत और व्यावहारिक मर्यादाओं के उल्लंघन से बचने के लिए कई बातें सीधे तौर पर नहीँ कही जा सकती हैं, इसलिए उन्हें वैज्ञानिक मिथक के रूप में कहना पड़ता है। योग को एकदम से समझना मुश्किल हो सकता है। लम्बे समय तक यौगिक या अद्वैतमयी जीवनशैली को अपना कर रखना पड़ता है। इसीलिए पुराणों में योग से संबंधित बातों को मनोरंजक मिथक कथाओं के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इससे ये कथाएं लंबे समय तक अपने प्रति आदमी की रुचि बना कर रखती हैं। इनसे आदमी अपनेआप ही अप्रत्यक्ष रूप से योगी बना रहता है, और अनुकूल परिस्थिति मिलने पर थोड़े से अतिरिक्त प्रयास से वह पूर्ण योगी भी बन सकता है। यदि सभी लोग एकसाथ पूर्णकालिक योगी बन गए, तब दुनियादारी के काम कैसे चलेंगे। इसीलिए योग को ऐसी वैज्ञानिक व सुहानी कथाओं के रूप में ढाला जाता है, जिन पर विश्वास बना रहे। इससे दुनियादारी के सारे दायित्वों को निभाते हुए भी आदमी हर समय यौगिक जीवनशैली में बंधा रहता है। ऐसी ही एक प्रसिद्ध कथा श्रीमद्भागवत महापुराण में आती है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण व कालियनाग के बीच हुए युद्ध का वर्णन है। उस कथा के अनुसार भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ के डर से रमणक द्वीप पर कालिय नाम का एक विशाल नाग रहता था, जिसके सैंकड़ों फन थे। उसे किसी संत ने श्राप दिया था कि कृष्ण भगवान उसको मारकर उसका उद्धार करेंगे। इसलिए वह वृन्दावन के समीप बह रही यमुना नदी में आ गया था। उसके जहर से यमुना का पानी जहरीला हो गया था, जिससे आसपास के लोगबाग और पशु-पक्षी मर रहे थे। कृष्ण भगवान अपने गोप मित्रों के साथ वहाँ गेंद खेल रहे थे। तभी उनकी गेंद यमुना के जल में चली गई। श्रीकृष्ण ने तुरंत यमुना में छलांग लगा दी। अगले ही पल वे कालियनाग से कुश्ती लड़ रहे थे। बहुत आपाधापी के बाद श्रीकृष्ण उसके बीच वाले और सबसे बड़े सिर पर चढ़ गए। वहाँ उन्होंने अपना वजन बढ़ा लिया और उसके फनों को मसल दिया। उन्होंने उसके सिर और पूँछ को एकसाथ पकड़कर उसे यहाँ-वहाँ पटका। अंत में उन्होंने कालियनाग को हार मानने पर मजबूर कर दिया। तभी कालियनाग की पत्नियां वहाँ आईं और भगवान कृष्ण से उसके प्राणों की भिक्षा माँगने लगीं। श्रीकृष्ण ने उसे इस शर्त पर छोड़ा कि वह सपरिवार यमुना को छोड़कर रमणक द्वीप पर वापिस चला जाएगा और दुबारा यमुना के अंदर कभी नहीं घुसेगा।

कालियनाग सुषुम्ना नाड़ी या मेरुदंड का प्रतीक है, और भगवान श्रीकृष्ण कुंडलिनी के प्रतीक हैँ

 वास्तव में आदमी की संरचना एक नाग से मिलती है। आदमी का सॉफ्टवेयर उसके केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र से बना होता है, जो आकृति में एक फन उठाए नाग की तरह दिखता है। उसमें मस्तिष्क और मेरुदंड आते हैं। आदमी का बाकी का शरीर तो इसी केंद्रीय तंत्रिका तंत्र पर बाहर-बाहर से मढ़ा गया है। इसी केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में सुषुम्ना नाड़ी प्रवाहित होती है। यहाँ यमुना नदी का पानी मेरुदंड के चारों ओर बहने वाले सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूड का प्रतीक है। रमणक द्वीप में निवास करना दुनियादारी के भोग-विलास में उलझने का प्रतीक है। रमणक शब्द को रमणीक या रमणीय शब्द से लिया गया है, जिसका अर्थ है मनोरंजक। गरूड़ का भय साधु संतों के भय का प्रतीक है। रमणीक जगह पर साधु संत नहीं जाते। यह देखा जाता है कि साधु संत लोगों को दुनियादारी के फालतू झमेलों से दूर रखते हैं। साधु का श्राप किसी सज्जन द्वारा ईश्वर का सही रास्ता दिखाना है। कालियनाग का श्रीकृष्ण के द्वारा मारे जाने के बारे में कहना उसको आसक्ति के बंधन से मुक्ति प्रदान करने का प्रतीक है। श्रीकृष्ण के द्वारा उसे वापिस रमणक द्वीप भेजने का अर्थ है कि वह दुनिया के भोले-भाले लोगों से दूर एकांत में चला जाए और वहाँ पर आसक्ति का विष फैलाता रहे। कालियनाग की पत्नियां दस इन्द्रियों की प्रतीक हैं। इनमें 5 कर्मेन्द्रियां और 5 ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। ये इन्द्रियाँ कालियनाग की पत्नियां इसलिए कही गई हैं, क्योंकि ये दुनियादारी में आसक्त आदमी के सान्निध्य में बहुत शक्तिशाली होकर उससे एकाकार हो जाती हैं। कालियनाग का विष आसक्तिपूर्ण जीवनशैली का प्रतीक है। यह दुनिया का सबसे शक्तिशाली विष है। इससे आदमी जन्म-मरण के चक्कर में पड़कर बार-बार मरता ही रहता है। कालियनाग के सैंकड़ों फनों से निकल रहे विष का अर्थ है कि मस्तिष्क में पैदा हो रही सैंकड़ों इच्छाओं व चिंताओं से यह आसक्ति बढ़ती ही रहती है।  भगवान कृष्ण यहाँ कुंडलिनी के प्रतीक हैं। उनका कालियनाग के बीच वाले मस्तक पर चढ़ने का अर्थ है, कुंडलिनी का सहस्रार चक्र में ध्यान करना। श्रीकृष्ण के द्वारा गेंद खेलने का अभिप्राय कुण्डलिनी योगसाधना से है। गेंद यहाँ प्राणायाम की प्राणवायु की प्रतीक है। कृष्ण के सखा ग्वाल-बाल विभिन्न प्रकार के प्राणायामों व योगसाधना के प्रतीक हैं। जैसे गेंद आगे-पीछे जाती रहती है, वैसे ही साँसें भी। गेंद का नदी में घुसने का अर्थ है, प्राणवायु का चक्रों में प्रविष्ट होना। श्रीकृष्ण का नदी में छलांग लगाने का अर्थ है कि कुंडलिनी भी प्राणवायु के साथ चक्रों में प्रविष्ट हो गई। यमुना पवित्र नदी है, जिसमें श्रीकृष्ण छलांग लगाते हैं। इसका अर्थ है कि प्राणवायु से पवित्र हुए चक्रों में ही कुंडलिनी प्रविष्ट होती है। श्रीकृष्ण के द्वारा कालियनाग के फनों को मसले जाने का अर्थ है कि कुंडलिनी ने मस्तिष्क की फालतू इच्छाओं और चिंताओं पर रोक लगा दी है, तथा अवचेतन मन में दबे पड़े वैचारिक कचरे की सफाई कर दी है। श्रीकृष्ण के द्वारा कालियनाग के सिर और पूँछ को एकसाथ पकड़े जाने का अर्थ है कि कुंडलिनी मूलाधार चक्र से सहस्रार चक्र तक पूरी सुषुम्ना नाड़ी में फैल गई है। मूलाधार से शक्ति लेकर कुंडलिनी सहस्रार में चमक रही है। ऐसा तब होता है जब तालु-जिह्वा के जोड़ या सहस्रार और मूलाधार का ध्यान एकसाथ किया जाता है। ऐसा करने से कालियनाग के पटके जाने का अर्थ है कि उससे दिमाग का फालतू शोर खत्म हो रहा है, जिससे आदमी शाश्वत आनन्द की ओर बढ़ रहा है। कालियनाग को जान से मारने का प्रयास करने का अर्थ है कि शरीर के तंत्रिका तंत्र को नियंत्रित रूप में ही काम करने देना है। कालियनाग का दुबारा यमुना में न प्रविष्ट होने का अर्थ है कि कुंडलिनी जागरण के बाद आदमी कभी आसक्तिपूर्ण व्यवहार नहीं करता।

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कुण्डलिनी-लिङ्गों में मूलाधार चक्र ही सर्वश्रेष्ठ लिङ्ग है

दोस्तों, शिवपुराण में भगवान शिव के ध्यान पर ही अधिकांश जोर दिया गया है। उसमें भगवान शिव को ही कुंडलिनी माना गया है। पूरे पुराण में लिंग का बहुतायत में वर्णन है। जब लिंग के ऊपर शिव (कुंडलिनी) का ध्यान किया जाता है, तब वह शिवलिंग या कुंडलिनी-लिंग बन जाता है। शिवलिंग ही शिवपुराण की धुरी है, जिसके चारों ओर पूरा पुराण घूम रहा है।

कुण्डलिनी के साथ जुड़े हुए चिन्ह को ही कुंडलिनी लिंग या शिवलिंग कहते हैं

वास्तव में मुख्य वस्तु के साथ जुड़े हुए चिन्ह को ही उस वस्तु का लिंग कहते हैं। जैसे कि पुरुष के साथ जुड़े हुए पौरुषत्व के चिन्ह को पुलिंग और स्त्री के साथ जुड़े हुए स्त्रीत्व के चिन्ह को स्त्रीलिंग कहते हैं। लिंग के बिना मुख्य वस्तु में कुछ कमी आ सकती है, परंतु वह समाप्त नहीं हो जाती। यदि पुरुष से पुरुष के चिन्ह समाप्त हो जाएं, तो पुरुष के स्वभाव में कुछ कमी आ सकती है, परंतु पुरुष वैसा ही रहेगा। इस हिसाब से तो छिपकली की पूँछ को भी छिपकली का लिंग कह सकते हैं। जब वह उसे गिराती है, तो उससे उसे अपना संतुलन बनाने में कुछ कठिनाई आ सकती है, परंतु छिपकली वैसी ही रहती है। इसी तरह, अध्यात्म में मुख्य वस्तु कुंडलिनी ही है। किसी मूर्ति आदि के चिन्ह से जोड़ने पर कुंडलिनी को अतिरिक्त बल मिलता है। यदि उस चिन्ह या लिंग को हटा दिया जाए, तो कुंडलिनी ध्यान में कुछ कमी आ सकती है, परंतु कुंडलिनी तब भी मन में बनी रहती है।

कुंडलिनी योग चर लिंग के अंतर्गत आता है

शिवपुराण में अनेक प्रकार के लिंगों का वर्णन आता है। चर लिंग कुंडलिनी योगी के लिए विशेष महत्त्व का है। इसमें मूल संवेदना को लिंग माना गया है। शरीर के विभिन्न चक्र उस लिंग के बदलते हुए स्थान हैं। वह संवेदना निचले चक्रों पर उत्पन्न होती रहती है, और अन्य सभी चक्रों से होती हुई चक्राकार घूमती रहती है।

सबसे स्थायी लिंग के रूप में हमारा अपना शरीर

अन्य प्रकार के लिंग अचर होते हैं। उनमें पर्वत या पत्थर से बने लिंग भी शामिल हैं। पर्वत से बने लिंग स्थायी होते हैं। पत्थर से बने लिंग अस्थायी होते हैं। पत्थर से बने लिंग स्त्रियों के लिए बेहतर बताए गए हैं। अन्य प्रकार के लिंग सूक्ष्म लिंग होते हैं। मंत्र लिंग इनमें मुख्य हैं। मंत्रलिंग में मंत्र के ऊपर कुंडलिनी का ध्यान किया जाता है। ॐ भी एक उत्तम प्रकार का मंत्र लिंग है। सूक्ष्म लिंग सन्यासियों के लिए बेहतर बताए गए हैं। पर्वत को इसीलिए स्थायी लिंग कहा गया है, क्योंकि वे लाखों वर्षों तक वैसे ही बने रहते हैं। इस हिसाब से तो हमारा अपना शरीर सबसे स्थायी लिंग हुआ, क्योंकि वह हमें हर जन्म में मिलता ही रहेगा, जब तक हमें मुक्ति नहीं मिल जाती। इसका सीधा सा अर्थ है कि कुंडलिनी योग साधना सर्वश्रेष्ठ साधना है। वास्तव में लिंग का दूसरा अर्थ अनुभूति भी है, जो हमें विभिन्न प्रकार के पदार्थों और भावों की सहायता से प्राप्त होती है। उसी अनुभूति पर कुंडलिनी को आरोपित किया जाता है। क्योंकि सबसे तीखी और मीठी संवेदना की अनुभूति हमें अपने ही शरीर से प्राप्त होती है, कहीं बाहर से नहीं, इसलिए शरीर के अंदर का लिंग ही सर्वश्रेष्ठ लिंग है। यही सिद्धांत तंत्रयोग का मूल सिद्धांत है।  “शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुंडलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)” नामक पुस्तक में इस बात को पुरजोर सिद्ध करके दिखाया गया है।

कुंडलिनी के लिए ही तांत्रिक भैरव नाथ ने माता वैष्णो देवी का अपमान किया था

दोस्तों, हिंदुओं के पवित्र तीर्थस्थल वैष्णो देवी के मूल में एक कथा आती है कि तांत्रिक भैरव नाथ कन्या वैष्णो के पीछे भागा था। वह उसके माध्यम से अपनी मुक्ति प्राप्त करना चाहता था (सम्भवतः तांत्रिक यौन-योग के माध्यम से)। ऐसा वह अपनी कुंडलिनी को जागृत करके करना चाहता था। कन्या वैष्णो उसकी अच्छी मंशा को नहीं समझ सकी और क्रोध में आकर काली बन गई और उसका वध करने लगी। तब भैरव को उसकी दिव्यता का पता चला और वह उससे क्षमा मांगने लगा। वैष्णो को भी उसकी अच्छी मंशा का पता चल गया। सम्भवतः उसे पछतावा भी हुआ कि उसने अनजाने में एक महाज्ञानी तांत्रिक को मारने का प्रयास किया। इसीलिए तो उसने उसे मुक्ति का वर दिया और यह भी कहा कि भैरव के दर्शन के बिना मेरे दर्शन का कोई फल नहीं मिलेगा। यह प्रसंग सांकेतिक या मैटाफोरिक भी प्रतीत होता है। माता वैष्णो ने भैरव को असलियत में नहीं मारा था। वास्तव में मोक्ष प्राप्त करने के लिए शून्य बनना पड़ता है। अपना सब कुछ खोना पड़ता है। भैरव को भी मुक्ति के लिए ज़ीरो बनना पड़ा। इसी ज़ीरो को ही असम्प्रज्ञात समाधि भी कहते हैं, जिससे आत्मज्ञान होता है। इसी को भैरव का मरना कहा गया है। चूँकि भैरव के मन में वैष्णो के रूप की समाधि के लगने से ही वह आध्यात्मिक रूप से विकसित होकर असम्प्रज्ञात समाधि और आत्मज्ञान के स्तर को पार करता हुआ अपनी मुक्ति के उच्चतम स्तर तक पहुंचा, इसीलिए कथा-प्रसंग में कहा गया कि वैष्णो ने भैरव को मारा।

दूसरे प्रकार से ऐसा भी हो सकता है कि देवी माता की लघु संगति से उसे तांत्रिक प्रेरणा प्राप्त हुई हो। उससे उसने अपनी असली तांत्रिक प्रेमिका की सहायता से कुंडलिनी जागरण की प्राप्ति की हो, जिससे उसका अकस्मात रूपांतरण हो गया हो। इसीको उसका देवी माता के द्वारा मारा जाना कहा गया हो।

तीसरे प्रकार से देवी माता के द्वारा भैरव बाबा का मारा जाना इस सिद्धांत का मैटाफोर भी हो सकता है कि भौतिक समृद्धि के लिए यौन तंत्र का इस्तेमाल करने से भौतिक तरक्की तो प्राप्त होती है, पर मुक्ति नहीं मिलती, अर्थात मरना पड़ता है। 
फिर भी अच्छी मंशा के बावजूद भी बाबा भैरव ने तंत्र के नियमों के विरुद्ध तो काम किया ही था। तंत्र में कभी हमलावर रुख नहीं अपनाया जाता। एक नम्र व विरक्त साधु-संन्यासी या भोले-भाले बच्चे की तरह व्यवहार करना पड़ता है। स्वेच्छा से बने तांत्रिक साथी को देवी-देवता की तरह सम्मान देना पड़ता है, और यहाँ तक कि पूजना भी पड़ता है। दोनों को एक-दूसरे को बराबर मानना पड़ता है। तांत्रिक गुरु की मध्यस्थता भी जरूरी होती है।

विवाहपूर्व प्रेम संबंध वैष्णो-भैरव वाली उपरोक्त कथा का विकृत रूप प्रतीत होता है

विकृत रूप हमने इसलिए कहा क्योंकि अधिकांश मामलों में लड़के-लड़की के बीच का प्रेम संबंध कुंडलिनी जागरण के लिए नहीं होता। अर्थात वह प्रेमसंबंध तांत्रिक प्रकार का नहीं होता। वैसे तो तंत्र में किसी की बेटी या पत्नी से शारीरिक संबंध बनाना वर्जित है। इसलिए विवाहपूर्व या विवाहेतर प्रेमसंबंध को तांत्रिक बनाए रखने के लिए शारीरिक संबंध से परहेज रखना जरूरी है। इससे यह लाभ भी होता है कि आदमी को अपने असली तांत्रिक प्रेमी अथवा पति/पत्नी से ही पूरी तरह संतुष्ट होकर गहन तांत्रिक साधना करने की प्रेरणा मिलती है। वैसे तो तांत्रिक प्रेम का मुख्य कार्य शारीरिक आकर्षण को पैदा करना है, ताकि प्रेमी का अविचल चित्र निरंतर मन में कुंडलिनी के रूप में बना रह सके। यह आकर्षण साधारण बोलचाल, रहन-सहन, हाव-भाव, हँसी-मजाक व सैर-सपाटे आदि से भी पैदा हो सकता है। वास्तव में इनसे पैदा होने वाला शारीरिक आकर्षण प्रत्यक्ष शारीरिक संबंध से पैदा होने वाले शारीरिक आकर्षण से भी कहीं ज्यादा मजबूत और टिकाऊ होता है। साथ में, एक से अधिक साथी के साथ शारीरिक संबंध रखना सामुदायिक स्वास्थ्य व सामुदायिक संबंधों के लिए भी अच्छा नहीं है। इसलिए जहाँ तक संभव हो, इसे केवल एकल साथी तक ही सीमित रखा जाना चाहिए।

वैष्णो कन्या अपने पति परमेश्वर के लिए तपस्या कर रही थीं

वैष्णो में सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती, इन तीनों देवियों की शक्ति का सम्मिलन था। वह परमेश्वर को पति रूप में पाना चाहती थीं। वास्तव में सभी मनुष्य ईश्वर से आए हैं, और उसी को पाना चाहते हैं। इसका मैटाफोरिक अर्थ यह निकलता है कि तंत्रसम्पन्न स्त्री उत्तम पति (ईश्वर-सदृश) की तलाश में रहती है। यदि उसे ऐसा पति न मिल पाए तो वह अपने साधारण पति को भी ईश्वर बना देती है।

विवाहपूर्व प्रेमसंबंध जानलेवा भी हो सकता है, जबकि साऊलमेट सबसे सुरक्षित होता है

मशहूर सिने अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत के साथ सम्भवतः ऐसा ही हुआ। सम्भवतः वे अपने प्रेमसंबंध में बहुत आसक्त व परवश हो गए थे। ऐसी हालत में यदि प्रेमिका सही मार्गदर्शन न करे, तो यह प्रेमी के लिए घातक भी सिद्ध हो सकता है। साऊलमेट (आत्मीय मित्र) इस स्थिति से बचाते हैं। साऊलमेट एक ऐसा प्रेमी/प्रेमिका है, जिसके प्रति बहुत ज्यादा आकर्षण मौजूद होता है, यद्यपि उससे कभी भी मिलन नहीं हो पाता। इसका अर्थ है कि उस आकर्षण में अटैचमेंट नहीं होती। एक व्यक्ति को अपने साऊलमेट में अपना रूप या अपना प्रतिबिंब दिखता रहता है। साऊलमेटस एक दूसरे को एनलाईटनमेंट की तरफ ले जाते हैं।

कुंडलिनी सभी प्रकार के अनुभवों को सुरक्षित रूप से झेलने की शक्ति देती है; और कुण्डलिनी जागरण तो सबसे बड़ा अनुभव है, जिसके आगे सभी अनुभव बौने हैं; प्रेत आत्मा से सामना होने की कुछ घटनाएं

दोस्तों, पिछली पोस्ट में मैंने ड्रीम विजिटेशन के बारे में बताया था। इस पोस्ट में मैं उससे संबंधित अपने अनुभवों के बारे में बताऊंगा।

आदमी (आत्मा) की मृत्यु नहीं होती, वह केवल रूप बदलता रहता है

आज से दो वर्ष पहले मेरी दादी जी का देहांत हो गया था। बुढ़ापा मृत्यु का मुख्य कारण रहा, हालांकि उसमें एक अनजानी सी लंबी बीमारी का भी योगदान था। यह भी संयोग ही है कि उन्हें श्वासरोग की भी समस्या थी, और कोरोना(कोविड-19) भी श्वासरोग ही फैला रहा है। बहुत से शारीरिक व मानसिक कष्टों के बीच में उन्होंने अपने प्राण छोड़े। स्वभाव से वे कोमल, भावनाप्रधान, सुखप्रधान व भीरु स्वभाव की थीं। कई बार तो वे अपनेपन की मोहमाया से ग्रस्त लगती थीं, पर वे उसे प्रेमभावना कहती थीं। दयालु, मानवतापूर्ण व ममतामयी स्वभाव की मूर्ति थीं। मेहनती थीं और अच्छे-बुरे की अच्छी परख रखती थीं। अपनों के सुख व भले के लिए चिंतित रहा करती थीं। वे बच्चों से बहुत प्यार करती थीं। बच्चों को वे जरा भीडांटने नहीं देती थीं, उन्हें गुस्से में हाथ भी लगाना तो दूर की बात रही। वे पालतु जानवरों की भी बहुत देखरेख रखती थीं। वे बहुत सोच-विचार करा करती थीं। मरने से और उसके बाद की दुर्गति से बहुत डरती थीं। उनकी मृत्यु के लगभग 15 दिन बाद मेरी उनसे सपने में मुलाकात हुई। अजीब सा शांतिपूर्ण अंधेरा था। मुट्ठी में भरने लायक घना अंधेरा था। पर आम अंधेरे के विपरीत उसमें चमक थी चमकीले काजल की तरह। वह मोहमाया या अज्ञान से दबी हुई आत्मा की स्वाभाविक चमक होती है। उस अंधेरे के रूप में भी मैं उन्हें स्पष्ट पहचान रहा था। इसका मतलब है कि उस अंधेरे में उनके रूप की एनकोडिंग थी। मतलब कि किसी आदमी की आत्मा का अंधेरा उसके गुण और रूप के अनुसार होता है। उसी अंधेरे से अगले जन्म में वही गुण और कर्म फिर से प्रकट हो जाते हैं। इसका अर्थ है कि सभी अंधेरे एक जैसे नहीं होते।

उनका वह रूप मुझे अच्छा लगा। वह आकाश की तरह पूरा खुला हुआ और विस्तृत था। वह मुझे अपनी क्षणिक आत्मज्ञान की अनुभूति की तरह लगा। परन्तु उसमें प्रकाश व आनंद वाला गुण किसी चीज के दबाने से ढका हुआ जैसा लग रहा था। शायद यही दबाव अज्ञान, आसक्ति, द्वैत, मोहमाया, कर्मसंस्कार आदि के नाम से जाना जाता है। ऐसा लगा जैसे ग्रहण काल में आसमान के आकार का सूर्य पूरा ढका हुआ हो, और नीचे का प्रकाश उस काले आसमान को कुछ अजीब सी या चमकीले काजल जैसी चमक देता हुआ बाहर की तरफ उमड़ना चाह रहा हो। इसे ही अज्ञान के पर्दे से आत्मा का ढकना कहते हैं। इसे ही अज्ञान रूपी बादल से आत्मा रूपी सूर्य का ढकना भी कहते हैं।

मैंने उनसे उनका हालचाल पूछा तो उन्होंने कहा कि वहाँ पर तो ऐसी-वैसी कोई दिक्कत नहीं थी। उन्होंने मेरा हाल पूछा तो मैंने कहा कि मैं ठीक था। उन्होंने कहा, “मैं तो वैसे ही डरती थीं  कि मरने के बाद पता नहीं क्या होता होगा। पर मैं तो यहाँ ठीक हूँ”। उन्हें वह स्थिति कुछ शक के साथ पूर्ण जैसी लग रही थी, पर मुझे उसमें कमी लग रही थी। शायद वे उस स्थिति को भगवान ही समझ रही हों। शायद वह उस स्थिति के बारे में जानने के लिए मुझसे संपर्क कर रही हों। मैंने प्रसन्न मुद्रा में आसमान की तरफ ऊपर हाथ उठाकर और ऊपर देखते हुए उन्हें उनके अंत समय के निकट कहा भी था कि वे सबसे ऊपर के आकाश लोक में जाएंगी, जिसे उन्होंने गौर से व विश्वास के साथ सुना था। ऐसा मैंने उनके ऐसा पूछने पर कहा था कि उस लाईलाज बिमारी के बाद वह कहाँ जा रही थीं। उनके उस विश्वास की एक वजह यह भी थी कि मेरे दादाजी ने लगभग 25 वर्ष पहले उन्हें मेरे सामने मेरे आत्मज्ञान के बारे में प्रसन्नता व बड़े आत्मगौरव के साथ बताया था। मेरी कुंडलिनी के निर्माण में मेरे दादाजी का बहुत बड़ा योगदान रहा था।

फिर उस ड्रीम विजिटेशन में मेरी दादीजी ने मुझसे कहा, “तेरे बहुत से अहितचिंतक पीठ पीछे तेरे विरुद्ध बोल रहे हैं”। तो मैंने उनसे कहा, “आप भगवान के बहुत नजदीक हो, इसलिए कृपया उनसे स्थिति सामान्य करने के लिए प्रार्थना करो”। उन्होंने कहा, “ठीक है”। मैं उस समय प्रतिदिन कुण्डलिनी योग कर रहा था। इसका अर्थ है कि कुंडलिनी (अद्वैत) मृत्यु के बाद ईश्वर की तरफ ले जाती है।

प्रेतात्मा के द्वारा भगवान का स्मरण करना बहुत बड़ी बात है, क्योंकि उस समय वह पूरी तरह से भूखी-प्यासी व आश्रय विहीन होती है। हो सकता है कि उससे उन्हें भगवान की तरफ गति मिल गई हो। आश्चर्य की बात है कि जिस स्थान पर उन प्रेतात्मा के लिए धार्मिक रीति के अनुसार जल का कलश रखा हुआ था, वहीं पर उनसे मुलाकात हुई। वहां पर एक शिवलिंग टेलीफोन सेट का काम कर रहा था, जिसके माध्यम से उनसे बात हो रही थी। बड़ी स्पष्ट,भावपूर्ण व जीवंत आवाज थी उनकी। वह मुंह से निकली हुई आवाज नहीं थी। वह सीधी उनकी आत्मा से आ रही थी और मेरी आत्मा को छू रही थी। ऐसा लग रहा था कि जैसे कोई स्विच दबा और मैं शरीर रहित आयाम में प्रविष्ट हो गया था। फिर मैंने परिवार के और सदस्यों से उनकी बात करानी चाही। पर वे लोग उन्हें मरा हुआ मान रहे थे। फिर मुझे भी उनके मरे हुए होने का भान हुआ। मैं तनिक दुखी होकर विलाप करने लगा और थोड़ा डर सा गया। उससे वह आत्मा ओझल हो गई और मैं एकदम से आत्मा के आयाम से बाहर आ गया।

प्रियजनों की आत्मा आने वाले खतरे का बोध भी करवाती है

कुछ महीनों बाद मैंने उन्हें बड़ी भयावह अवस्था में देखा। वह शायद वैसी ही स्थिति थी, जैसी उन्होंने अपनी मृत्यु के समय महसूस की होगी। मैंने उन्हें अपने पुश्तैनी घर के बरामदे में मृत रूप में जीवित बैठे देखा। वह बड़ा विचित्र व क्लेशपूर्ण अनुभव था। शायद वह मुझे अगले दिन होने वाली दुर्घटना के बारे में बताना चाह रही हों, पर बोल नहीं पा रही हों। अगले दिन मेरे कमरे की खिड़की पर एक जहरीला कोबरा सांप था, जिससे मेरा कर्मचारी बाल-बाल बच गया।

एकबार मैंने उन सूक्ष्म शरीर को फिर से भगवान की याद दिलाई

वह किसी रिश्तेदार के यहाँ आराम से सबके साथ बाहर बैठी थीं। मेरी मुलाकात होने पर मैंने उन्हें ईश्वर की याद दिलाई। वह धीरे-2 भवन के अंदर को सरक गईं और ओझल हो गईं। उनका रूप पहले से कुछ अधिक स्वच्छ लग रहा था। सूक्ष्म शरीर भगवान के तेज को ज्यादा देर सहन नहीं कर सकता।

अंतिम बार मैंने उन सूक्ष्म शरीर को बहुत निर्मल देखा

वे मेरे पुश्तैनी घर के मुख्य गेट से बरामदे में प्रविष्ट हो रही थीं। उन्होंने उज्ज्वल सफेद कपड़े पहन रखे थे। वे बहुत निर्मल, शान्त व आनन्दमयी लग रही थीं। उनसे मिल कर मेरा रोम-2 खिल उठा। उन्होंने मुझसे पूछा कि मैं कहाँ गया था। मैंने कहा कि मैं हरिद्वार गया था। हरिद्वार भगवान का सबसे बड़ा तीर्थ माना जाता है। यह विश्वप्रसिद्ध योग राजधानी ऋषिकेश के नजदीक स्थित है। वे मुस्कुराते हुए व मुझसे यह पूछते हुए भवन के अंदर प्रविष्ट हुईं कि क्या मैं उससे पहले हरिद्वार नहीं गया था। उनका पूछने का मतलब था कि मैं पहले भी तो हरिद्वार गया हुआ था।

जब मेरे चाचा का सूक्ष्म शरीर मुझे चेतवानी देने आया था

उससे कुछ समय पहले मेरे चाचा की मृत्यु हाईपर थायरेडिसम बीमारी के कारण अचानक हृदय गति रुकने से हुई थी। वे बड़े मिलनसार व सामाजिक होते थे। ड्रीम विजिटेशन में मुझे वे अपनी मित्रमण्डली के साथ होहल्ला व हंसी मजाक करते हुए एक विचित्र सी अंधेरी पर शांत गुफा के अंदर चलते मिले। मैं और मेरी 5 साल की बेटी भी कुछ अजीब, चन्द्रमा की रौशनी से मिश्रित अंधेरे वाली और आनंद वाली जगह पर कुछ सीढ़ियां चढ़ कर उनके पीछे चल दिए। गुफा के दूसरे छोर पर बहुत तेज स्वर्ग के जैसा प्रकाश था। चाचा ने मुझसे मुस्कुराते हुए अपने साथ चलने के लिए पूछा। मैंने अनहोनी की आशंका से मना कर दिया। मेरी बेटी को वह नजारा बड़ा भा रहा था, इसलिए वह उनके साथ चलने के लिए जिद करने लगी। मैंने उसे बलपूर्वक रोका और हम गुफा से बाहर वापिस लौट आए। अगले दिन मेरी कार सड़क से बाहर निकलने से बाल-2 बच गई। साथ बैठी हुई मेरी फैमिली ने मुझे समय रहते चेता दिया था।

अपरिचित की आत्मा भी ड्रीम विजिटेशन में सहायता माँग सकती है

मेरे एक रिश्तेदार के लड़के को सपने में एक मंदिर के साधु बार-2 आकर अपना अंतिम संस्कार करने के लिए कहते थे। खोजबीन करने पर पता चला कि उन साधु की हत्या हो गई थी और उनकी लाश को नाले में फेंक दिया गया था। मेरे उन रिश्तेदार ने साधु का पुतला बनवाया और उसका विधिवत अंतिम संस्कार करवाया। उसके बाद उन साधु का सपने में आना बंद हो गया। मैं उस बात पर यकीन नहीं करता था। पर अपने खुद के उपरोक्त ड्रीम विजिटेशन के अनुभव के बाद वैसी अलौकिक घटनाओं पर विश्वास होने लग गया।