कुंडलिनी सभी प्रकार के अनुभवों को सुरक्षित रूप से झेलने की शक्ति देती है; और कुण्डलिनी जागरण तो सबसे बड़ा अनुभव है, जिसके आगे सभी अनुभव बौने हैं; प्रेत आत्मा से सामना होने की कुछ घटनाएं

दोस्तों, पिछली पोस्ट में मैंने ड्रीम विजिटेशन के बारे में बताया था। इस पोस्ट में मैं उससे संबंधित अपने अनुभवों के बारे में बताऊंगा।

आदमी (आत्मा) की मृत्यु नहीं होती, वह केवल रूप बदलता रहता है

आज से दो वर्ष पहले मेरी दादी जी का देहांत हो गया था। बुढ़ापा मृत्यु का मुख्य कारण रहा, हालांकि उसमें एक अनजानी सी लंबी बीमारी का भी योगदान था। यह भी संयोग ही है कि उन्हें श्वासरोग की भी समस्या थी, और कोरोना(कोविड-19) भी श्वासरोग ही फैला रहा है। बहुत से शारीरिक व मानसिक कष्टों के बीच में उन्होंने अपने प्राण छोड़े। स्वभाव से वे कोमल, भावनाप्रधान, सुखप्रधान व भीरु स्वभाव की थीं। कई बार तो वे अपनेपन की मोहमाया से ग्रस्त लगती थीं, पर वे उसे प्रेमभावना कहती थीं। दयालु, मानवतापूर्ण व ममतामयी स्वभाव की मूर्ति थीं। मेहनती थीं और अच्छे-बुरे की अच्छी परख रखती थीं। अपनों के सुख व भले के लिए चिंतित रहा करती थीं। वे बच्चों से बहुत प्यार करती थीं। बच्चों को वे जरा भीडांटने नहीं देती थीं, उन्हें गुस्से में हाथ भी लगाना तो दूर की बात रही। वे पालतु जानवरों की भी बहुत देखरेख रखती थीं। वे बहुत सोच-विचार करा करती थीं। मरने से और उसके बाद की दुर्गति से बहुत डरती थीं। उनकी मृत्यु के लगभग 15 दिन बाद मेरी उनसे सपने में मुलाकात हुई। अजीब सा शांतिपूर्ण अंधेरा था। मुट्ठी में भरने लायक घना अंधेरा था। पर आम अंधेरे के विपरीत उसमें चमक थी चमकीले काजल की तरह। वह मोहमाया या अज्ञान से दबी हुई आत्मा की स्वाभाविक चमक होती है। उस अंधेरे के रूप में भी मैं उन्हें स्पष्ट पहचान रहा था। इसका मतलब है कि उस अंधेरे में उनके रूप की एनकोडिंग थी। मतलब कि किसी आदमी की आत्मा का अंधेरा उसके गुण और रूप के अनुसार होता है। उसी अंधेरे से अगले जन्म में वही गुण और कर्म फिर से प्रकट हो जाते हैं। इसका अर्थ है कि सभी अंधेरे एक जैसे नहीं होते।

उनका वह रूप मुझे अच्छा लगा। वह आकाश की तरह पूरा खुला हुआ और विस्तृत था। वह मुझे अपनी क्षणिक आत्मज्ञान की अनुभूति की तरह लगा। परन्तु उसमें प्रकाश व आनंद वाला गुण किसी चीज के दबाने से ढका हुआ जैसा लग रहा था। शायद यही दबाव अज्ञान, आसक्ति, द्वैत, मोहमाया, कर्मसंस्कार आदि के नाम से जाना जाता है। ऐसा लगा जैसे ग्रहण काल में आसमान के आकार का सूर्य पूरा ढका हुआ हो, और नीचे का प्रकाश उस काले आसमान को कुछ अजीब सी या चमकीले काजल जैसी चमक देता हुआ बाहर की तरफ उमड़ना चाह रहा हो। इसे ही अज्ञान के पर्दे से आत्मा का ढकना कहते हैं। इसे ही अज्ञान रूपी बादल से आत्मा रूपी सूर्य का ढकना भी कहते हैं।

मैंने उनसे उनका हालचाल पूछा तो उन्होंने कहा कि वहाँ पर तो ऐसी-वैसी कोई दिक्कत नहीं थी। उन्होंने मेरा हाल पूछा तो मैंने कहा कि मैं ठीक था। उन्होंने कहा, “मैं तो वैसे ही डरती थीं  कि मरने के बाद पता नहीं क्या होता होगा। पर मैं तो यहाँ ठीक हूँ”। उन्हें वह स्थिति कुछ शक के साथ पूर्ण जैसी लग रही थी, पर मुझे उसमें कमी लग रही थी। शायद वे उस स्थिति को भगवान ही समझ रही हों। शायद वह उस स्थिति के बारे में जानने के लिए मुझसे संपर्क कर रही हों। मैंने प्रसन्न मुद्रा में आसमान की तरफ ऊपर हाथ उठाकर और ऊपर देखते हुए उन्हें उनके अंत समय के निकट कहा भी था कि वे सबसे ऊपर के आकाश लोक में जाएंगी, जिसे उन्होंने गौर से व विश्वास के साथ सुना था। ऐसा मैंने उनके ऐसा पूछने पर कहा था कि उस लाईलाज बिमारी के बाद वह कहाँ जा रही थीं। उनके उस विश्वास की एक वजह यह भी थी कि मेरे दादाजी ने लगभग 25 वर्ष पहले उन्हें मेरे सामने मेरे आत्मज्ञान के बारे में प्रसन्नता व बड़े आत्मगौरव के साथ बताया था। मेरी कुंडलिनी के निर्माण में मेरे दादाजी का बहुत बड़ा योगदान रहा था।

फिर उस ड्रीम विजिटेशन में मेरी दादीजी ने मुझसे कहा, “तेरे बहुत से अहितचिंतक पीठ पीछे तेरे विरुद्ध बोल रहे हैं”। तो मैंने उनसे कहा, “आप भगवान के बहुत नजदीक हो, इसलिए कृपया उनसे स्थिति सामान्य करने के लिए प्रार्थना करो”। उन्होंने कहा, “ठीक है”। मैं उस समय प्रतिदिन कुण्डलिनी योग कर रहा था। इसका अर्थ है कि कुंडलिनी (अद्वैत) मृत्यु के बाद ईश्वर की तरफ ले जाती है।

प्रेतात्मा के द्वारा भगवान का स्मरण करना बहुत बड़ी बात है, क्योंकि उस समय वह पूरी तरह से भूखी-प्यासी व आश्रय विहीन होती है। हो सकता है कि उससे उन्हें भगवान की तरफ गति मिल गई हो। आश्चर्य की बात है कि जिस स्थान पर उन प्रेतात्मा के लिए धार्मिक रीति के अनुसार जल का कलश रखा हुआ था, वहीं पर उनसे मुलाकात हुई। वहां पर एक शिवलिंग टेलीफोन सेट का काम कर रहा था, जिसके माध्यम से उनसे बात हो रही थी। बड़ी स्पष्ट,भावपूर्ण व जीवंत आवाज थी उनकी। वह मुंह से निकली हुई आवाज नहीं थी। वह सीधी उनकी आत्मा से आ रही थी और मेरी आत्मा को छू रही थी। ऐसा लग रहा था कि जैसे कोई स्विच दबा और मैं शरीर रहित आयाम में प्रविष्ट हो गया था। फिर मैंने परिवार के और सदस्यों से उनकी बात करानी चाही। पर वे लोग उन्हें मरा हुआ मान रहे थे। फिर मुझे भी उनके मरे हुए होने का भान हुआ। मैं तनिक दुखी होकर विलाप करने लगा और थोड़ा डर सा गया। उससे वह आत्मा ओझल हो गई और मैं एकदम से आत्मा के आयाम से बाहर आ गया।

प्रियजनों की आत्मा आने वाले खतरे का बोध भी करवाती है

कुछ महीनों बाद मैंने उन्हें बड़ी भयावह अवस्था में देखा। वह शायद वैसी ही स्थिति थी, जैसी उन्होंने अपनी मृत्यु के समय महसूस की होगी। मैंने उन्हें अपने पुश्तैनी घर के बरामदे में मृत रूप में जीवित बैठे देखा। वह बड़ा विचित्र व क्लेशपूर्ण अनुभव था। शायद वह मुझे अगले दिन होने वाली दुर्घटना के बारे में बताना चाह रही हों, पर बोल नहीं पा रही हों। अगले दिन मेरे कमरे की खिड़की पर एक जहरीला कोबरा सांप था, जिससे मेरा कर्मचारी बाल-बाल बच गया।

एकबार मैंने उन सूक्ष्म शरीर को फिर से भगवान की याद दिलाई

वह किसी रिश्तेदार के यहाँ आराम से सबके साथ बाहर बैठी थीं। मेरी मुलाकात होने पर मैंने उन्हें ईश्वर की याद दिलाई। वह धीरे-2 भवन के अंदर को सरक गईं और ओझल हो गईं। उनका रूप पहले से कुछ अधिक स्वच्छ लग रहा था। सूक्ष्म शरीर भगवान के तेज को ज्यादा देर सहन नहीं कर सकता।

अंतिम बार मैंने उन सूक्ष्म शरीर को बहुत निर्मल देखा

वे मेरे पुश्तैनी घर के मुख्य गेट से बरामदे में प्रविष्ट हो रही थीं। उन्होंने उज्ज्वल सफेद कपड़े पहन रखे थे। वे बहुत निर्मल, शान्त व आनन्दमयी लग रही थीं। उनसे मिल कर मेरा रोम-2 खिल उठा। उन्होंने मुझसे पूछा कि मैं कहाँ गया था। मैंने कहा कि मैं हरिद्वार गया था। हरिद्वार भगवान का सबसे बड़ा तीर्थ माना जाता है। यह विश्वप्रसिद्ध योग राजधानी ऋषिकेश के नजदीक स्थित है। वे मुस्कुराते हुए व मुझसे यह पूछते हुए भवन के अंदर प्रविष्ट हुईं कि क्या मैं उससे पहले हरिद्वार नहीं गया था। उनका पूछने का मतलब था कि मैं पहले भी तो हरिद्वार गया हुआ था।

जब मेरे चाचा का सूक्ष्म शरीर मुझे चेतवानी देने आया था

उससे कुछ समय पहले मेरे चाचा की मृत्यु हाईपर थायरेडिसम बीमारी के कारण अचानक हृदय गति रुकने से हुई थी। वे बड़े मिलनसार व सामाजिक होते थे। ड्रीम विजिटेशन में मुझे वे अपनी मित्रमण्डली के साथ होहल्ला व हंसी मजाक करते हुए एक विचित्र सी अंधेरी पर शांत गुफा के अंदर चलते मिले। मैं और मेरी 5 साल की बेटी भी कुछ अजीब, चन्द्रमा की रौशनी से मिश्रित अंधेरे वाली और आनंद वाली जगह पर कुछ सीढ़ियां चढ़ कर उनके पीछे चल दिए। गुफा के दूसरे छोर पर बहुत तेज स्वर्ग के जैसा प्रकाश था। चाचा ने मुझसे मुस्कुराते हुए अपने साथ चलने के लिए पूछा। मैंने अनहोनी की आशंका से मना कर दिया। मेरी बेटी को वह नजारा बड़ा भा रहा था, इसलिए वह उनके साथ चलने के लिए जिद करने लगी। मैंने उसे बलपूर्वक रोका और हम गुफा से बाहर वापिस लौट आए। अगले दिन मेरी कार सड़क से बाहर निकलने से बाल-2 बच गई। साथ बैठी हुई मेरी फैमिली ने मुझे समय रहते चेता दिया था।

अपरिचित की आत्मा भी ड्रीम विजिटेशन में सहायता माँग सकती है

मेरे एक रिश्तेदार के लड़के को सपने में एक मंदिर के साधु बार-2 आकर अपना अंतिम संस्कार करने के लिए कहते थे। खोजबीन करने पर पता चला कि उन साधु की हत्या हो गई थी और उनकी लाश को नाले में फेंक दिया गया था। मेरे उन रिश्तेदार ने साधु का पुतला बनवाया और उसका विधिवत अंतिम संस्कार करवाया। उसके बाद उन साधु का सपने में आना बंद हो गया। मैं उस बात पर यकीन नहीं करता था। पर अपने खुद के उपरोक्त ड्रीम विजिटेशन के अनुभव के बाद वैसी अलौकिक घटनाओं पर विश्वास होने लग गया।

कुण्डलिनी जागरण- यह कैसे काम करता है

दोस्तो, क्वोरा पर कुण्डलिनी-जागरण के बारे में बहुत से प्रश्न पूछे जाते रहते हैं। मुख्य प्रश्न यही होता है कि कुण्डलिनी जागरण क्या होता है? बार-२ वही उत्तर दोहराना कुछ युक्तियुक्त सा नहीं लगता है। इसलिए मैंने निर्णय लिया कि इससे सम्बंधित एक वैबसाईट पोस्ट बनाई जाए, ताकि पाठकों को क्वोरा से इसकी ओर रिडायरेक्ट किया जा सके।

किसी को याद करना ही कुण्डलिनी जागरण है

तत्त्वतः तो ऐसा ही है। केवल याद करने के स्तर में ही भिन्नता होती है। कुण्डलिनी को इससे अधिक गहराई से याद नहीं किया जा सकता। जागरण की अवस्था में कुण्डलिनी दिल की गहराईयों में पूरी उतरी होती है। कुण्डलिनी जागरण के समय कुण्डलिनी आत्मा की गहराईयों में पूरी उतर चुकी होती है। वास्तव में कुण्डलिनी आत्मा से जुड़ जाती है। वह आत्मा से एकाकार हो जाती है। उस समय आत्मा उसे दूसरी वस्तु के रूप में नहीं देख पाता। उस समय आत्मा उसे अपने ही रूप में देखता है। आत्मा पूरी तरह से कुण्डलिनी-रूप बन जाता है। यहाँ याद किया गया व्यक्ति (गुर, देवता, प्रेमी आदि या सैद्धांतिक रूप से कुछ भी) ही कुण्डलिनी के रूप में होता है। आत्मा का अभिप्राय यहाँ आम आदमी का अपना निरपेक्ष व अंधकारमय स्वरूप है। वह रूप विचारों व अनुभवों से पूर्णतः रिक्त जैसा होता है। वह अंधकारमय शून्य जैसा होता है। वह माया या अज्ञान या भ्रम से ही अंधकारमय बना होता है। वास्तव में तो वह कुण्डलिनी की तरह ही प्रकाशमान होता है।

इसका मतलब है कि कुण्डलिनी-जागरण के समय आत्मा भी कुण्डलिनी के रूप में चमकने लगता है। इससे यह होता है की सभी कुछ अपने जैसा महसूस होने लगता है। कोई द्वैत नहीं रहता। सभी कुछ अद्वैत-रूप में प्रकाशित होने लगता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि कुण्डलिनी समेत सभी अनुभव स्वभाव से ही प्रकाशमान होते हैं। उस समय कुण्डलिनी के जुड़ने से आत्मा भी प्रकाशमान बन जाता है। विशाल अग्नि को अपनी एक लौ अपने से अलग कैसे लग सकती है? आत्मा को दुनिया के अनुभव / पदार्थ तब अपने से अलग लगते थे, जब वह कुण्डलिनी से नहीं जुड़ा था। उस समय उसे कुण्डलिनी भी अपने से अलग लगती थी। बेशक कुण्डलिनी का कितना ही ज्यादा ध्यान क्यों नहीं किया जाता था, कुछ न कुछ अलगाव तो उससे रहता ही था। एक अन्धकार से भरे कमरे को अपने अन्दर पैदा हुई एक आग की चिंगारी अपने जैसी कैसे लग सकती है? उसे तो वह अपने से अलग ही लगेगी न।

कुण्डलिनी जागरण आदमी को उसकी अपनी असली आत्मा की झलक दिखाता है। इससे वह योगसाधना आदि के निरंतर अभ्यास से उसे पूर्ण रूप से प्राप्त करने के लिए प्रेरित होता है।

कुण्डलिनी जागरण ज्यादा देर तक नहीं टिकता

कुण्डलिनी जागरण कुछ सेकंडों से ज्यादा समय तक नहीं झेला जा सकता। उस समय मस्तिष्क में विस्फोटक दबाव जैसा बना होता है। अधिकाँश मामलों में आदमी भय से या संकोच से कुण्डलिनी को स्वयं ही नीचे उतार देता है। यदि वह खुद न उतारे, तो कुछ देर में ही मस्तिष्क बहुत थक जाता है, और जागरण के अनुभव को खुद बंद कर देता है। फिर आदमी थकान के कारण आराम कर सकता है। संभवतः उसे नींद तो नहीं आती, क्योंकि वह उस समय आनंद, शान्ति, अद्वैत, और तनावहीनता से भरा होता है। उसका मस्तिष्क शून्य जैसा भी बन सकता है, जिसमें उसे विचार-शून्य असली आत्मा का अनुभव भी हो सकता है।

कुण्डलिनी जागरण की अवधि व्यक्ति के अभ्यास, मनोबल, शारीरिक बल, आयु, सामाजिक स्थिति आदि के ऊपर भी निर्भर कर सकती है। पर इसे एक मिनट से ज्यादा समय तक जारी रखना असंभव सा ही लगता है।

कुण्डलिनी जागरण के बारे में भ्रम

बहुत से लोग कुण्डलिनी-ध्यान को और प्राणोत्थान (कुण्डलिनी-उत्थान) को ही कुण्डलिनी जागरण समझ लेते हैं। यह भ्रम स्वाभाविक ही है, क्योंकि पूर्वोक्तानुसार सभी स्वभाव से समान ही हैं, और इन सभी स्थितियों में कुण्डलिनी का स्मरण या चिंतन विद्यमान होता है। केवल स्मरण के स्तर में ही अंतर होता है। साधारण कुण्डलिनी-ध्यान में यह स्मरण सबसे कम होता है। प्राणोत्थान में यह स्मरण और अधिक होता है। कुण्डलिनी-जागरण में यह सर्वोच्च होता है। जहां साधारण कुण्डलिनी ध्यान व प्राणोत्थान वाला कुण्डलिनी ध्यान लम्बे समय तक (घंटों से दिनों तक) लगातार जारी रखा जा सकता है, वहीँ कुण्डलिनी जागरण को एक मिनट से ज्यादा अवधि तक जारी नहीं रखा जा सकता। जहां साधारण कुण्डलिनी ध्यान और प्राणोत्थान वाले कुण्डलिनी ध्यान को अपनी इच्छा व अभ्यास से कभी भी पैदा किया जा सकता है, वहीँ कुण्डलिनी जागरण को इच्छानुसार पैदा नहीं किया जा सकता। कुण्डलिनी जागरण स्वयं होता है, और बिना बताए होता है। जब बहुत सी अनुकूल परिस्थितियाँ इकट्ठी होती हैं, तभी यह होता है। साथ में, इसको पैदा करने के लिए एक मानसिक झटका देने वाला उत्तेजक या उद्दीपक (ट्रिगर) भी होना चाहिए। वास्तव में आदमी इसके होने के बारे में कोई पूर्वानुमान नहीं लगा पता। यह तब होता है, जब आदमी को इसके होने के बारे में जरा भी अंदेशा नहीं होता। परन्तु साथ में यह भी सत्य है कि यह कुण्डलिनी ध्यान और प्राणोत्थान की अवस्था में ही होता है, और ये व्यक्तिगत व परिवेशीय परिस्थितियों के अनुसार विभिन्न अरसे से (महीनों से लेकर वर्षों की अवधि तक) जारी रखे हुए होने चाहिए।

प्राणोत्थान के बारे में विस्तृत जानकारी निम्नलिखित पोस्ट पर पढ़ी जा सकती है।

प्राणोत्थान व कुण्डलिनी-जागरण के बीच में तत्त्वतः कोई अंतर नहीं है। दोनों के बीच में केवल अभिव्यक्ति के स्तर का ही अंतर है। इसीलिए कई अति महत्त्वाकांक्षी लोग प्राणोत्थान को ही कुण्डलिनी जागरण समझ लेते हैं। पूर्णता को प्राप्त प्राणोत्थान ही कुण्डलिनी जागरण कहलाता है …….

प्राणोत्थान- कुण्डलिनी जागरण की शुरुआत

कुंडली जागरण के वास्तविक समय के अनुभव को जानने के लिए निम्नलिखित वेबपेज पढ़ा जा सकता है।

शक्तिशाली फरफराहट के साथ, जैसे वह अनुभव ऊपर की ओर उड़ने का प्रयास कर रहा था। अतीव आनंद की स्थिति थी। वह आनंद एकसाथ अनुभव किए जा सकने वाले सैंकड़ों यौनसंबंधों से भी बढ़ कर था। सीधा सा अर्थ है कि इन्द्रियां उतना आनंद उत्पन्न कर ही नहीं सकतीं। मेरी कुण्डलिनी पूरी तरह से प्रकाशित होती हुई, सूर्य का मुकाबला कर रही थी …..

प्रेमयोगी वज्र अपनी उस समाधि(कुण्डलिनीजागरण/KUNDALINI AWAKENING) का वर्णन अपने शब्दों में इस प्रकार करता हैैं

अगली पोस्ट में हम यह बताएँगे कि कुण्डलिनी जागरण के लिए दिमाग में किन 5 चीजों का एकसाथ इकट्ठा होना जरूरी है।     

कुण्डलिनी विषय के दिल तक पहुँचने के लिए कृपया अगली दोनों पोस्टें क्रमवार जरूर पढ़ें

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कुण्डलिनी से पर्यावरण-सुरक्षा

हमारे पर्यावरण का मौजूदा हाल

आजकल पर्यावरण तेजी से विनाश की तरफ जा रहा है। हर जगह पर्यावरण को प्रदूषित किया जा रहा है। हरेक व्यक्ति पर्यावरण को प्रदूषित करने में लगा हुआ है। आदमी की इच्छाओं पर लगाम ही नहीं लग रही है। भौतिक वस्तुओं का अंधाधुंध निर्माण हो रहा है, जिसके लिए पर्यावरण का व्यापक दोहन किया जा रहा है। हरेक वास्तु आज विषैली हो गई है। प्राकृतिक आपदाओं व प्रदूषण से लोग असमय मौत के शिकार हो रहे हैं।

प्राचीन जनजीवन में पर्यावरण-सुरक्षा

हमारा प्राचीन जनजीवन एक पर्यावरण-मित्र जनजीवन था। पर्यावरण को देवताओं की तरह पूजा जाता था। पर्वतों, नदियों, सागरों, वृक्षों, वनों समेत सभी वस्तुओं को देवता मानकर पूजा जाता था। कई तथाकथित आधुनिक लोग कहते हैं कि पुराने समय के लोगों में दिमाग की कमी होती थी, इसलिए वे तकनीक में पिछड़े हुए थे। परन्तु वास्तविकता यह है कि वे दिमाग के मामले में आज के लोगों से भी ज्यादा तेज होते थे। तभी तो वे स्वावलंबी होकर अपना जीवन जंगल में भी सुखपूर्वक बिता लेते थे। आज के अधिकाँश लोग तकनीक के बिना अपना जीवन जी ही नहीं सकते। प्राचीन लोग तकनीक का इस्तेमाल इसलिए नहीं करना चाहते थे, क्योंकि उससे पर्यावरण को नुक्सान पहुंचता था।

प्राचीन युग में पर्यावरण की सुरक्षा में कुण्डलिनी का योगदान

जैसा कि हमने ऊपर कहा है कि पुराने जमाने के लोग सभी वस्तुओं को देवता मानते थे। उदाहरण के लिए, आर्यों को ही देख लें। वे प्रकृति के पुजारी थे। सृष्टि की प्रत्येक वस्तु को उन्होंने सुन्दर देवता का रूप दिया हुआ था, जैसे कि वायु देव, जल देव, सूर्य देव, अग्नि देव आदि। आज भी वैदिक अनुष्ठानों में इन सभी देवताओं के पूजन की परम्परा है। इसी तरह की परम्परा प्राचीन मिस्र व सेल्टिक समाज में भी थी। लगभग सभी देशों में यह परम्परा किसी न किसी रूप में रही है। इससे पर्यावरण को लम्बे समय तक बचाने में काफी मदद मिली।

प्राकृतिक वस्तुओं की पूजा का अर्थ ही अद्वैत की पूजा है। क्योंकि तनिक चिंतन करने पर सभी वस्तुओं की आत्मा अद्वैत ही प्रतीत होती है। वे हैं भी, और नहीं भी हैं। वे काम करती भी हैं, और नहीं भी करती हैं। उन्हें फल मिलता भी है, और नहीं भी मिलता है। वे प्रकाश-रूप भी हैं, और अन्धकार-रूप भी, और दोनों से रहित भी हैं। इसका अर्थ है कि प्राचीन लोगों के मन में कुण्डलिनी का निवास हुआ करता था, क्योंकि अद्वैतभाव और कुण्डलिनी मन में साथ-२ रहते हैं। तभी तो प्राचीन युग में कुण्डलिनी का बहुत बोलबाला हुआ करता था, और विश्व के सभी धर्मों में किसी न किसी रूप में इसका जिक्र जरूर मिलता है।

कुण्डलिनी पर्यावरण को कैसे बचाती है

अधिकाँश लोग अपने मन के वश में होते हैं। मन तो बन्दर की तरह होता है। वह अपने साथ उनको भी नचाता रहता है। वे मन के गुलाम होते हैं, और मन का साथ नहीं छोड़ सकते। उनकी सत्ता मन की सत्ता के साथ जुड़ी होती है। मन के नष्ट होने से वे भी अपने को नष्ट महसूस करते हैं। उनका मन भौतिक दुनिया के आश्रित होता है। यदि मन को भौतिक काम-धंधे न मिले, तो वह मरने लगता है। इसलिए वह बिना जरूरत के ही नए-२ काम-धंधे ढूँढता रहता है। वह पर्यावरण को हानि पहुंचाने से भी नहीं कतराता, क्योंकि द्वैतभाव के कारण उसे पर्यावरण में देवता/कुण्डलिनी नहीं दिखाई देती। उसे पर्यावरण में केवल अन्धकार दिखाई देता है। इस तरह से पर्यावरण को क्षति पहुँचती है।

इसके विपरीत, एक कुण्डलिनी योगी का मन कुण्डलिनी के आश्रित रहता है। वह कुण्डलिनी से जीवन-शक्ति लेता रहता है। उसे भौतिक काम-धंधों से जीवन-शक्ति लेने की कोई जरूरत नहीं होती। इसलिए वह अपनी जरूरत के कम से कम काम-धंधों में ही मस्त रहता है, और फालतु के काम-धंधों में नहीं उलझता। अपनी जरूरत के काम भी वह पर्यावरण को हानि पहुंचाए बिना निपटाता है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि उसकी नजर में हर जगह कुण्डलिनी है। यह तो सिद्ध ही है कि सृष्टि में हर जगह अद्वैत तत्त्व विद्यमान है, और यह भी कि अद्वैत के साथ कुण्डलिनी भी रहती है।

प्रेमयोगी वज्र का अपना अनुभव

क्षणिक आत्मज्ञान के बाद वह अकर्मक जैसा बन गया था। हर समय वह कुण्डलिनी के ध्यान में मस्त रहता था। उसे कुण्डलिनी से भरपूर जीवन मिलता रहता था। उसे कोई काम करने की जरूरत ही महसूस नहीं होती थी। काम करने से तो उसकी कुण्डलिनी को नुक्सान भी पहुँचता था। बहुत जरूरी होने पर ही वह काम करता था। काम को वह अद्वैत के साथ करता था, ताकि उसकी कुण्डलिनी को कम से कम नुकसान पहुंचता। वह पर्यावरण के प्रति काफी सचेत व प्रकृति-प्रेमी बन गया था। अधिकाँश समय वह प्रकृति के बीच में बैठकर अकेले ही गुजारता था। औरों के, बिना जरूरत के काम उसे पागलपन की तरह लगते थे। यद्यपि कई ऐसे काम मजबूरी में उसे भी करने पड़ते थे, ताकि वह सभी के साथ चल सकता। इससे जाहिर है कि एक कुण्डलिनी योगी से समाज की व्यवस्था पर विशेष फर्क नहीं पड़ता। पर्यावरण संरक्षण के लिए यह जरूरी है कि अधिकाँश लोग कुण्डलिनी योगी बनें।  

   इसी सन्दर्भ में प्रकृति के प्रति लगाव, प्रकृति से प्रेम भी एक योग है। परोक्ष रूप में यह प्रकृति ही परमात्मा का स्वरूप है ।

योग एक प्रकृति प्रेम-(विश्व पर्यावरण दिवस पर संदर्भित)

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बच्चों में कुण्डलिनी

कहते हैं कि बच्चे भगवान् का रूप होते हैं। इसके पीछे बहुत से कारण हैं। परन्तु सबसे प्रमुख व मूल कारण कुण्डलिनी से सम्बंधित है। कुण्डलिनी बच्चों का मूल स्वभाव है। वास्तव में, कुण्डलिनी की खोज बच्चों ने ही की है। बड़ों ने तो उस खोज को केवल कागज़ पर उकेरा ही है। बड़ों ने बच्चों के इस मूल स्वभाव की नक़ल करके बहुत सी मैडिटेशन तकनीकों को ईजाद किया है। बड़ों ने बच्चों के इस मूल स्वभाव की नक़ल करके बहुत सी योग-सिद्धियाँ प्राप्त की हैं। परन्तु हैरानी की बात यह है कि बच्चों के इस मूल स्वभाव को बहुत कम श्रेय दिया जाता है। अहंकार के आश्रित अधिकाँश लोग सारा श्रेय स्वयं बटोरना चाहते हैं। आज हम इस ब्लॉग पोस्ट के माध्यम से बच्चों को उनका असली हक़ दिलाने की कोशिश करेंगे।

बच्चे स्वभाव से ही अद्वैतवादी होते हैं

बच्चे केवल अनुभव करना जानते हैं। वे अनुभव का पूरा मजा लेते हैं। वे गहराई में नहीं जाते। वे जजमेंट नहीं करते। इसलिए उन्हें सभी कुछ एक जैसा ही प्रतीत होता है। उनकी नजर में लोहा, पत्थर व सोना एकसमान हैं। विपासना साधना के ये मूलभूत गुण हैं। इससे सिद्ध होता है कि बच्चों में स्वयं ही विपासना होती रहती है। विपासना उनका स्वभाव है।

बच्चे स्वभाव से ही कुण्डलिनी प्रेमी होते हैं

यह हम पहले भी विविध प्रमाणों से अनेक बार सिद्ध कर चुके हैं कि विपासना (साक्षी भाव)/अद्वैत व कुण्डलिनी साथ-२ रहते हैं। क्योंकि बच्चे स्वभाव से ही अद्वैतवादी होते हैं, अतः यह स्वयं ही सिद्ध हो जाता है कि बच्चे स्वभाव से ही कुण्डलिनी योगी होते हैं। इसी वजह से ही तो बच्चे किसी एक चीज के दीवाने हो जाते हैं। यदि वे किसी ख़ास खिलौने को पसंद करते हैं, तो रात-दिन उसी के पीछे लग जाते हैं। इसी तरह, यदि बच्चे किसी एक आदमी के दीवाने हो जाते हैं, तो उसी पर अपना सब कुछ लुटाने को तैयार हो जाते हैं। हालांकि इससे वे कई बार बड़ों के धोखे का शिकार भी बन जाते हैं। योग-ऋषि पतंजलि भी तो यही कहते हैं कि “यथाभिमतध्यानात् वा”; अर्थात अपनी किसी भी मनपसंद चीज के निरंतर ध्यान से योग सिद्ध होता है।

सर्वप्रिय वस्तु के रूप में कुण्डलिनी

यही सबसे पसंदीदा चीज ही तो कुण्डलिनी है, जो निरंतर मन में बसी रहती है। एक बात और है। जब बच्चा कोई नयी चीज पसंद करने लगता है, तब वह अपनी पुरानी पसंदीदा चीज को छोड़ देता है। फिर वह उसी एक नयी चीज का दीवाना बन जाता है। वह एक से अधिक चीजों या लोगों से एकसाथ प्यार नहीं कर पाता। कुण्डलिनी योगी का भी यही प्रमुख लक्षण है। योगी भी लम्बे समय तक, यहाँ तक कि जीवनभर भी एक ही चीज का ध्यान करते रहते हैं, जो उनकी कुण्डलिनी बन जाती है।

प्रेम कुण्डलिनी की खुराक के रूप में

प्रेम से कुण्डलिनी को बल मिलता रहता है। तभी तो देखने में आता है कि बच्चे प्रेम की ओर सर्वाधिक आकृष्ट होते हैं।

बच्चों का मोबाईल फोन-प्रेम भी कुण्डलिनी-प्रेम ही है

आजकल बच्चे हर समय मोबाईल फोन से चिपके रहते हैं। यह बच्चों का दोष नहीं है। यह उनका कुण्डलिनी-स्वभाव है, जो उन्हें एक चीज से चिपकाता है। उन्हें अच्छे-बुरे का भी अधिक ज्ञान नहीं होता। इसलिए बच्चों की भलाई के लिए समाज को ऐसी चीजें बनानी चाहिए, जो पूरी तरह से दुष्प्रभाव से मुक्त हों। एक उपाय यह भी है कि बच्चों को प्रेम से ऐसी चीजों के दुष्प्रभाव के बारे में बाताया जाए। उन्हें प्यार से समझाना चाहिए या अपने साथ दूसरे कामों/खेलों/घूमने-फिरने में मित्र की तरह व्यस्त रखना चाहिए। यदि बच्चों के सामने नफरत से भरा हुआ द्वैतभाव प्रकट किया जाएगा, तब तो उनका कुण्डलिनी-गुण नष्ट ही हो जाएगा, और साथ में उनका बचपन भी।

बच्चे मन के भावों को पढ़ लेते हैं

बड़े लोग चाहे जितना मर्जी छुपाने की कोशिश कर लें, बच्चे उनके मन के भाव को पढ़ ही लेते हैं। यह शक्ति कुदरत ने उन्हें आत्मरक्षा के लिए दी है। इसी शक्ति से तो वे किसी आदमी को अच्छी तरह से पहचान कर उसके जी-जान से दीवाने हो जाते हैं, जिससे कुण्डलिनी विकास होता है। वैसे भी बच्चों में कुण्डलिनी आसानी से बन जाती है, क्योंकि उनका दिमाग खाली होता है। तभी तो देखा जाता है कि कई बार अच्छे-खासे घर के बच्चे बिगड़ जाते हैं। वास्तव में, उस घर के लोग बाहर से तो अच्छे होते हैं, पर उनके मन के भाव अच्छे नहीं होते। बच्चे उन मनोभावों से गलत आदतें सीख लेते हैं। इसके उलट, कई बार बुरे घर के बच्चे बहुत अच्छे बनते हैं। वास्तव में, उस घर के लोग बाहर से बुरे प्रतीत होते हैं, पर उनके मन के भाव अच्छे होते हैं। सबसे बेहतर यह है कि मन के अन्दर व बाहर, दोनों स्थानों पर अच्छे बन कर रहा जाए। यदि अपने काम में उन्हें भी भागीदार बनाया जाए, तो वे स्वयं ही सीख जाते हैं। कई बार वे सीखने-सिखाने के नाम से ही चिढ़ जाते हैं।  

बच्चों में कुण्डलिनी सक्रिय होती है, पर वे उसे जागृत नहीं कर पाते

कुण्डलिनी को जागृत करने के लिए बच्चों को कम से कम किशोरावस्था का इन्तजार करना ही पड़ता है। उस आयु में शरीर को यौनशक्ति मिलनी शुरू हो जाती है। यदि उस यौनशक्ति का प्रबंधन सही ढंग से हो जाए, तो वह कुण्डलिनी को मिलने लग जाती है, जिससे कुण्डलिनी आसानी से जाग सकती है। कईयों को दिव्य व अनुकूल परिस्थितियाँ मिलने से यह काम स्वयं हो जाता है, जैसा कि प्रेमयोगी वज्र के साथ हुआ। कईयों को विशेष प्रयास करना पड़ता है।

प्रेमयोगी वज्र का कुण्डलिनी अनुभव

बचपन में वह कुण्डलिनी के प्रति तो आम बच्चों की तरह ही आकृष्ट होता था। यद्यपि किशोरावस्था में उसे दिव्य व अनुकूल परिस्थितियाँ मिलीं, जिनसे उसकी यौनशक्ति उसकी कुण्डलिनी को मिलती रही। वह यौनशक्ति इतनी अधिक मजबूत थी कि उसकी कुण्डलिनी ने जागृत हुए बिना ही उसे क्षणिक आत्मज्ञान करा दिया। उसके बाद तो वह पूरी तरह से एक बच्चे के जैसा बन गया। हर समय उसके मन में कुण्डलिनी वैसे ही बसी रहती थी, जैसे कि एक बच्चे के मन में कोई खिलौना या विशेष प्रेमी। अधिकाँश लोग उसका मजाक जैसा बनाया करते थे। कई तो कभी-२ दुर्व्यवहार पर भी उतर आते थे। वास्तव में, सभी लोग अपने झूठे अहंकार पर लगी चोट को बर्दाश्त नहीं कर पाते।

दूसरी बार उसने क्षणिक कुण्डलिनी जागरण को कृत्रिम योग तकनीक से प्राप्त किया, कुछ यौनयोग की सहायता लेकर। यह सारा वृत्तांत हिंदी में बनी पुस्तक “शरीरविज्ञान दर्शन” में, व अंग्रेजी में लिखी पुस्तक “love story of a Yogi” में वर्णित है, जो इस वैबसाईट के पेज “शॉप” पर उपलब्ध हैं। इसके अतिरिक्त, यदि कोई कुण्डलिनी प्रेमी इस वैबसाईट की सभी कुण्डलिनी से सम्बंधित ब्लॉग पोस्टों को किनडल ईबुक के रूप में आसानी से व एकसाथ पढ़ना चाहे, तो सभी का संग्रह भी पुस्तक रूप में इसी वैबपेज पर उपलब्ध है। उसके हिंदी-रूप का नाम “कुण्डलिनी विज्ञान- एक आध्यात्मिक मनोविज्ञान” व अंग्रेजी-रूप का नाम “kundalini science- a spiritual psychology” है।

आदर्श बचपन तो केवल जीवन के साथ अपनाए जाने योग्य सही दृष्टिकोण के बारे में बताता है, न कि जीवन के वास्तविक अनुभवों को दर्शाता है। जीवन जीने का तरीका तो मानवीय रूप से सामाजिक जीवन को लम्बे समय तक जीने से प्राप्त व्यावहारिक अनुभवों के माध्यम से ही सीखने में आता है। इसलिए बड़े और बच्चे आपस में प्रेमपूर्ण व्यवहार से एक-दूसरे की मदद वैसे ही करते हैं, जैसे कि एक अँधा और एक लंगड़ा।

बच्चों में कोई बुराई नहीं होती है और वे बड़े होते हुए अपने आसपास से बुराई सीखते हैं।

रिसर्च में भी हुआ साबित, ‘भगवान का रूप’ होते हैं बच्चे

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पहाड़ों में कुण्डलिनी

मित्रो, पहाड़ों का अपना एक अलग ही आकर्षण है। वहां पर मन प्रफुल्लित, साफ, हल्का, शांत व आनंदित हो जाता है। पुराना जीवन रंग-बिरंगे विचारों के रूप में मस्तिष्क में उमड़ने लगता है, जिससे बड़ा ही आनंद महसूस होता है। चिंता, अवसाद व तनाव दूर होने लगते हैं। गत जीवन के मानसिक जख्म भरने लगते हैं। प्रेमयोगी वज्र को भी अपने व्यावसायिक उत्तरदायित्वों के कारण कुछ वर्षों तक ऊंचे पहाड़ों में रहने का मौक़ा मिला था। उसे वहां के लोगों से व प्राकृतिक परिवेश से भरपूर प्यार, सहयोग व सम्मान मिला।

पहाड़ों में अपने आप विपासना साधना होती रहती है

उपरोक्त तथ्यों से जाहिर है कि पहाड़ों में विपासना के लिए सर्वाधिक अनुकूल परिस्थितियाँ मौजूद होती हैं। यदि आदमी योग आदि के माध्यम से अपना बल भी लगाए, तब तो शीघ्र ही आध्यात्मिक सफलता मिलती है। प्रेमयोगी वज्र को भी उपरोक्त मानसिक सद्प्रभावों का अनुभव पहाड़ों के इसी गुण के कारण हुआ।

कुण्डलिनी ही पहाड़ों में स्वयम्भूत विपासना को पैदा करती है

आश्चर्य की बात है कि प्रेमयोगी वज्र की मानसिक कुण्डलिनी, जो पहले दब जैसी गई थी, वह पहाड़ों में बहुत मजबूत हो गई थी। वह तांत्रिक कुण्डलिनी थी, और उसकी मानसिक प्रेमिका के रूप में थी। उसके साथ ही उसकी मानसिक गुरु के रूप वाली कुण्डलिनी भी वहां पर ज्यादा चमकदार बन गई थी। पर उसने देखा कि पहाड़ों के लोग प्रेमिका के रूप वाली कुण्डलिनी को बहुत ज्यादा महत्त्व दे रहे थे, गुरु के रूप वाली कुण्डलिनी की अपेक्षा। गुरु के रूप वाली कुण्डलिनी को वहां के पंडित वर्ग के आध्यात्मिक लोग ज्यादा महत्त्व दे रहे थे, यद्यपि प्रेमिका की कुण्डलिनी के साथ ही, अकेली गुरु के रूप वाली कुण्डलिनी को नहीं। इसका कारण यह है कि पहाड़ मन के काम-रस या श्रृंगार-रस को उत्तेजित करते हैं। इसी वजह से तो काम शास्त्रों में ऊंचे पहाड़ों का सुन्दर वर्णन बहुतायत में पाया जाता है। उदाहरण के लिए विश्वप्रसिद्ध साहित्यिक रचना “मेघदूत”।

दूसरा प्रमाण यह है कि मैदानी भागों में कुण्डलिनी योग साधना के बाद जब प्रेमयोगी वज्र पर्वत-भ्रमण पर गया, तब पहाड़ों में उसकी कुण्डलिनी प्रचंड होकर जागृत हो गई, जैसा कि इस वैबसाईट के “गृह-2” वैबपेज पर वर्णित किया गया है। इसके अतिरिक्त, प्रेमयोगी वज्र को क्षणिक आत्मज्ञान का अनुभव भी पहाड़ों में ही हुआ था, जो उसने इस वैबसाईट के “गृह-2” वेबपेज पर वर्णित किया है । इसी वजह से तो अनादिकाल से लेकर योग साधक शीघ्र सिद्धि के लिए मैदानों से पहाड़ों की तरफ पलायन करते आए हैं।

पहाड़ों में कुण्डलिनी क्यों चमकने लगती है?

वास्तव में, पहाड़ देवता की मूर्ति की तरह काम करते हैं। तभी तो कई धर्मों में पहाड़ को देवता माना गया है। एक प्रकार से देवता की मूर्ति पहाड़ के रूप में प्रतिक्षण आँखों के सामने विद्यमान रहती है। पहाड़ मैं विद्यमान अद्वैत तत्त्व आदमी के मन में भी अद्वैतभाव पैदा कर देता है। उस अद्वैत के प्रभाव से कुण्डलिनी मन-मंदिर में छा जाती है।

यदि किसी के मन में कुण्डलिनी न भी हो, तो भी अद्वैतभाव से बहुत से आध्यात्मिक लाभ मिलते हैं। साथ में, उससे धीरे-२ कुण्डलिनी भी बनना शुरू हो जाती है।

यह बात इस वैबसाईट में पहले भी सिद्ध की जा चुकी है कि सृष्टि के कण-कण में अद्वैत तत्त्व विद्यमान है। वास्तव में, वही भगवान् है। इसे समझने के लिए सबसे बढ़िया पुस्तक “शरीरविज्ञान दर्शन” है।

मौन, ध्यान एवं जप आदि कार्यों के लिए एकांत की जरूरत होती है और इसके लिए पहाड़ों से अच्छा कोई स्थान नहीं हो सकता।

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कुण्डलिनी से विपासना या विपश्यना

विपश्यना क्या है

क्वोरा पर बहुत से लोग विपासना के बारे में प्रश्न पूछते रहते हैं। इसलिए सोचा कि क्यों न इस बार विपासना पर ही एक एक सुन्दर ब्लॉग-पोस्ट लिख लूं।

विपश्यना का अर्थ है विशेष पश्यना अर्थात एक विशेष प्रकार की नजर। सामान्य नजर तो वही बहिर्मुखी नजर है, जिससे हम-आप सभी लोग देखते हैं। विशेष नजर अंतर्मुखी नजर है, जिससे अपने अन्दर मौजूद विचारों-भावों को देखा जाता है। सामान्य नजर में द्रष्टा का साक्षी भाव नहीं होता, परन्तु विपश्यना में द्रष्टा का साक्षीभाव होता है। सामान्य नजर से बंधन होता है, जबकि विपश्यना से मुक्ति प्राप्त होती है। सामान्य नजर से असली सुख नहीं मिलता, जबकि विपश्यना से असली सुख मिलता है। सामान्य नजर से असली शान्ति नहीं मिलती, जबकि विपश्यना से असली शान्ति मिलती है। यद्यपि यह बात ध्यान रखने योग्य है की विपश्यना का आधार सामान्य नजर ही है, क्योंकि सामान्य नजर से ही मन में वह ढेर सारी सूक्ष्म सामग्री इकट्ठी हो पाती है, जिसके प्रति हम विपश्यना की विशेष नजर को केन्द्रित कर पाते हैं। इसलिए सामान्य नजर का भी अपना अलग महत्त्व है। तभी तो कहा जाता है कि विज्ञान के बिना अध्यात्म लंगड़ा है, तथा अध्यात्म के बिना विज्ञान अंधा है। इसलिए जीवन में विज्ञान व अध्यात्म, दोनों का समुचित मिश्रण होना चाहिए।

विपश्यना से साधना-लाभ कैसे मिलता है

जब हम मन के विचारों-भावों के प्रति अनासक्त हो जाते हैं, तब उससे यह अर्थ निकलता है कि जो कुछ विचारों-भावों से हासिल होता है, वह हमारे अपने पास पहले से ही तो है। अपने विचारों-भावों के इलावा हमारे पास अपना स्वयं का निरपेक्ष रूप/आत्मा ही तो है। अतः विचारों-भावों के सभी गुण आत्मा में उजागर होने लगते हैं, जैसे कि प्रकाश, आनंद, शान्ति आदि। वास्तव में, वे गुण आत्मा में पहले से ही विद्यमान होते हैं, परन्तु भौतिक व मानसिक दुनिया के प्रति आसक्ति के कारण दबे होते हैं। आत्मा के इसी शुद्धीकरण को “भ्रम के काले बादलों का छंटना” या “अज्ञान के काले परदे का हटना” आदि नामों से भी जाना जाता है।

आत्मा के ऊपर से अज्ञान के काले बादल का हटना

हालांकि ऐसा प्रतीत नहीं होता कि आत्मा धीरे-२ साफ हो रही है, जैसे कि रात का अँधेरा सुबह के साथ-२ धीरे-२ साफ होता है। नगण्य मात्रा में आत्मा की सफाई हो भी सकती है (जो प्रत्यक्ष तौर पर नजर नहीं आती), जिससे अद्वैत व शान्ति का अनुभव होता है, पर यह क्षणिक/अस्थायी होती है। सच्चाई यह है कि अचानक ही घुप अन्धकार से भरी आत्मा में प्रकाश छा जाता है, जैसे कि अँधेरे कमरे में प्रकाश बल्ब का स्विच ऑन करने से छा जाता है। वास्तव में सफाई तो मन की होती है, आत्मा की नहीं। आत्मा तो हमेशा साफ है। जब मन पूरी तरह से साफ हो जाता है, या यूं कहो कि मन विचारों के कचरे से रहित हो जाता है, तभी आत्मा के ऊपर पड़ा हुआ काला पर्दा अचानक से हट जाता है। आम आदमी यह देखकर हतोत्साहित हो जाता है कि उसकी आत्मा तो साफ ही नहीं हो रही है। इससे वह साधना के प्रयास को छोड़ देता है।

आम इंसान को एक अन्य गलतफहमी यह होती है कि व्यक्त रूप में ही मन के विचार आत्मा पर पर्दा डालते हैं, अव्यक्त या संस्कार रूप में नहीं। तभी तो अधिकाँश लोग अपने विचारों को बलपूर्वक दबाकर इस भ्रम में रहते हैं कि वे योगी हैं। वास्तव में मन के विचार (आसक्ति के साथ) बड़े दुष्ट होते हैं। ये अपनी सुप्त अवस्था में भी आत्मा को अँधेरे से ढक कर रखते हैं। तभी तो विभिन्न साधनाओं से इन दबे हुए विचारों को उघाड़ कर नष्ट करना पड़ता है। विपासना से यह काम सबसे आसानी से होता है। तभी तो सरल विपासना से सीधे ही, बिना किसी अन्य साधना के आत्मज्ञान हो सकता है, जैसे बुद्ध को हुआ। यह अलग आत है कि आम सांसारिक जीवन में कुण्डलिनी के बिना ऐसा होना संभव प्रतीत नहीं होता।

विपश्यना के प्रकार व उसके लिए सहयोगी कारक

विपश्यना दो प्रकार की है, ऐक्टिव (सक्रिय) और पैसिव (निष्क्रिय)। ऐक्टिव विपश्यना में मन को जिस मानसिक खूंटे (ऐंकर) से बांधा जाता है, वह बलपूर्वक निर्मित किया जाता है। उससे मन हर समय उस खूंटे से चिपका रहता है। उससे मन अपने अन्दर उमड़ने वाले विचारों-भावों की तरफ गहराई से ध्यान नहीं दे पाता, जिससे उसका उनके प्रति अनासक्ति के साथ साक्षीभाव बना रहता है। मन्त्र-जाप, माला-जाप, साँसें, कुण्डलिनी, जप-तप, उपवास, तथा अन्य सभी आध्यात्मिक गतिविधियाँ इसी खूंटे का काम करती हैं।

पैसिव विपश्यना में रोजमर्रा के क्रियाकलापों के दौरान स्वयं ही मन के लिए खूंटा निर्मित होता रहता है। उदाहरण के लिए, ड्राईविंग के दौरान मन सड़क पर लगा होता है, इसलिए उस दौरान उमड़ रहे विचारों-भावों के प्रति स्वयं ही विपश्यना होती रहती है। इसी तरह, अन्य साहसिक गतिविधियों, खेलों, स्पर्धाओं, कलाओं, विद्याओं आदि के दौरान भी होता है। इन गतिविधियों के साथ जितनी अधिक विपश्यना होती है, उतनी ही अधिक उनकी गुणवत्ता मानी जाती है। इनके साथ विपश्यना की मात्रा ही इनकी गुणवत्ता की मात्रा की सूचक हैं। प्रतिभागी की यह विपश्यना साथ रहने वाले लोगों, दर्शकों में भी इंडयूस होती रहती है।

कुण्डलिनी से विपश्यना

कुण्डलिनी (मन में स्थायी रूप से बसने वाली एकाकी छवि) विपश्यना के लिए सर्वोत्तम खूंटा है। यह मानसिक खूंटा ढीला होता रहता है, अतः प्रतिदिन के कुण्डलिनी-योग से इसे मजबूती देते रहना चाहिए।

कुण्डलिनी की सहायता से निष्क्रिय विपश्यना सर्वाधिक प्रभावशाली

प्रेमयोगी वज्र के अन्दर स्वयं ही तांत्रिक कुण्डलिनी चिपक गई थी। वह बहुत मजबूत व स्पष्ट थी। वह लगातार बनी रहती थी। वह एक आकर्षक मानसिक प्रेमिका (तांत्रिक गुरु की संगति में) के रूप में थी। वह मन के लिए एक सर्वाधिक शक्तिशाली खूंटा बनी। अपनी आकर्षकता के कारण, वह मानसिक खूंटे के साथ मानसिक वीडियो प्लेयर का काम भी कर रही थी। उससे प्रेमयोगी वज्र के मन में अपने पिछले जीवन की घटनाएं रंग-बिरंगे चित्रों के रूप में उमड़ रही थीं। सभी चित्र उस आकर्षक खूंटे के सामने फीके पड़ गए थे। सभी के प्रति स्वयं ही विपश्यना हो रही थी, जिससे वे तेजी से आत्मा में विलीन हो रहे थे। उससे उसका आत्मा बहुत तेजी से शुद्ध हो रहा था। अंततः दो साल के भीतर ही वह शून्य जैसा हो गया। अंत में, दिव्य परिस्थितियों के कारण उसका वह अंतिम विचार-रूपी मानसिक खूंटा भी उखड़ गया, जिससे उसे क्षणिक आत्मज्ञान की झलक मिली। इस घटना का विस्तृत वर्णन उसकी हिंदी में पुस्तक “शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)” व अंग्रेजी में पुस्तक “Love story of a Yogi- what Patanjali says” में किया गया है।

इससे सिद्ध होता है कि मानसिक खूंटे का आकर्षक होना भी आवश्यक है, ताकि वह मन की गहराइयों में दबे पड़े विचारों-भावों के स्पष्ट चित्रों को उघाड़ता रहे, और वे सभी उसके आगे फीके पड़ने लगे। कुण्डलिनी (विशेषतः तांत्रिक कुण्डलिनी) सबसे अधिक आकर्षक होती है, इसलिए विपश्यना के लिए कुण्डलिनी एक सर्वोत्तम मानसिक खूंटा है। निरंतर ध्यान के साथ इसका आकर्षण बढ़ता ही जाता है। जब सभी कुछ शून्यप्राय हो जाता है, तब आत्मज्ञान के लिए अंतिम छलांग के रूप में उस अंतिम मानसिक खूंटे को भी त्यागना पड़ता है। इसी मूलभूत मनोवैज्ञानिक सिद्धांत के आधार पर ही लाखों पुस्तकें व साधनाएं बनी हैं।

विपस्‍सना का अर्थ है: अपनी श्‍वास का निरीक्षण करना, श्‍वास को देखना।      

 
विपस्‍सना ध्‍यान की तीन विधियां: ओशो

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मानवतापूर्ण समस्याएँ भी कुण्डलिनी को क्रियाशील करती हैं

मानवतापूर्ण समस्याएँ क्या हैं

ऐसी समस्याएँ जो सतही या आभासिक होती हैं, तथा जिनसे अपना या औरों का कोई अहित नहीं होता है, वे मानवतापूर्ण समस्याएँ कहलाती हैं। उदाहरण के लिए, किसी को प्रेमसंबंध के टूटने की समस्या का आभास होता है। यद्यपि वास्तविकता यह होती है कि उसका प्रेमप्रसंग कभी चला ही नहीं होता है। ऐसा ही आश्चर्यजनक एहसास प्रेमयोगी वज्र को भी हुआ था, जिससे उसे क्षणिक आत्मजागरण की अनुभूति होने में मदद मिली थी।

अन्य उदाहरण हम उपवास का लेते हैं। वह हमें समस्या की तरह लगता है, जबकि वास्तव में वैसा होता नहीं है। उपवास से शरीर और मन के साथ कुण्डलिनी को भी ऊर्जा मिलती है।

मानवता के लिए समस्या झेलना भी मानवतापूर्ण समस्या है

जप, तप, योग आदि आध्यात्मिक गतिविधियाँ इसका अच्छा उदाहरण हैं। देश, समाज, मानवीय धर्म, परिवार आदि के लिए समस्या सहना मानवीय समस्या है। समस्या से जितनी अधिक सत्यता व शुद्धि के साथ जितने अधिक लोगों का भला होगा, उसकी मानवता उतनी ही अधिक होगी।

मानवतापूर्ण समस्या से क्या होता है

मानवतापूर्ण समस्या से आदमी मानवता से प्रेम करने लगता है। वह सभी मनुष्यों से प्रेम करने लगता है। उसके मन में एक विशेष मनुष्य (गुरु,मित्र,देव आदि) की छवि बस जाती है। समय के साथ वही फिर कुण्डलिनी बन जाती है। प्रेमयोगी वज्र के साथ भी यही हुआ। शरीरविज्ञान दर्शन के प्रभाव से चल रही उसकी अति क्रियाशीलता के कारण उसके मन में उन वृद्धाध्यात्मिक पुरुष की छवि पुष्ट होती गई।

मानवीय समस्या से कुण्डलिनी कैसे विकसित होती है

जब कुण्डलिनी मन में काफी मजबूत हो जाती है, तब एक समय ऐसा आता है कि व्यक्ति काम के व कुण्डलिनी के दोहरे बोझ से टूट जैसा जाता है। वैसी स्थिति में जैसे ही कोई बड़ी आभासिक समस्या उसके रास्ते में आए, तो वह पूरी तरह से कुण्डलिनी के समक्ष आत्मसमर्पण कर देता है, और कुण्डलिनी के आश्रित हो जाता है। इससे उसकी कुण्डलिनी क्रियाशील हो जाती है।

क्रियाशील हो चुकी कुण्डलिनी फिर कैसे जागृत होती है

कुण्डलिनी के क्रियाशील हो जाने के बाद समस्याग्रस्त व्यक्ति का मानसिक अवसाद घट जाता है, और आनंद बढ़ जाता है। इससे कुण्डलिनी पर उसका विश्वास बढ़ जाता है, और उसे लगता है कि उसकी कुण्डलिनी से ही उसको सभी समस्याओं से सुरक्षा मिलती है। फिर वह कुण्डलिनी को जागृत करने वाले योग आदि शास्त्रों का अध्ययन और उनका अभ्यास करने लगता है। इससे उसका योग से सम्बंधित ज्ञान और अभ्यास आगे से आगे बढ़ता रहता है। अंततः उसकी कुण्डलिनी जागृत हो जाती है।

प्रेमयोगी वज्र को कैसे समस्या से कुण्डलिनी के लिए एस्केप विलोसिटी मिली

प्रेमयोगी वज्र शरीरविज्ञान दर्शन के प्रभाव से प्राप्त हो रहीं मानवीय समस्याओं, विभिन्न मानवीय कामों और कुण्डलिनी के बोझ से टूट जैसा गया था, शारीरिक रूप से। उसकी स्मरणशक्ति भी काफी घट गई थी। यद्यपि उसके मन में आनंद व शान्ति काफी बढ़ गए थे। फिर उसे घर से बहुत अधिक दूर सपरिवार शान्ति के साथ एक मनोरम स्थान पर रहने का मौक़ा मिला। घर से वहां तक आवागमन के लिए उसने अत्याधुनिक व बहुत महंगी गाड़ी खरीदी। उसको उसमें ड्राईवर सीट कम्फर्ट नहीं मिला। वह बहुत पछताया, पर जो होना था, वह हो चूका था। अपने को संभालने के लिए वह पूरी तरह से कुण्डलिनी के सहारे होकर मन में उसका ध्यान करने लगा। उससे उसकी कुण्डलिनी चमकने लगी, और उसकी चिंता लगभग समाप्त ही हो गई। इससे आश्वस्त होकर वह ई-बुक्स, पेपर बुक्स, इंटरनेट व मित्रों की मदद से योग सीखने लगा। उससे उसकी कुण्डलिनी एक साल में ही बहुत मजबूत हो गई। उसके अंतिम एक महीने में यौनयोग की सहायता लेने पर वह जागृत हो गई। उसके बाद वह अपनी गाड़ी का अभ्यस्त हो गया, तथा उसे पता चला कि उसकी गाड़ी का कम्फर्ट दरअसल अन्य गाड़ियों से कहीं अधिक था। इसका अर्थ है कि उसकी समस्या असली नहीं बल्कि आभासिक थी, जो उसकी कुण्डलिनी को जगाने के लिए उसके अन्दर पैदा हुई थी।

कुण्डलिनी के प्रति समर्पण ही ईश्वर के प्रति समर्पण है।

आभासिक समस्या सफलता के लिए भरपूर कोशिशों के बाद होनी चाहिए

यदि थोड़े से एफर्ट्स के बाद ही समस्या का सामना करना पड़े, तब आदमी का विश्वास विविधतापूर्ण दुनियादारी पर बना रहता है, और वह कुण्डलिनी के सामने पूर्ण आत्मसमर्पण नहीं करता। परन्तु जब भरपूर प्रयास करने के बाद भी आदमी को हानि का ऐहसास होता है, तब दुनिया से उसका विश्वास उठ जाता है, और वह पूरी तरह से कुण्डलिनी के सामने घुटने टेक देता है, ताकि बिना भौतिक मशक्कतों के ही उसे प्राण-रस या जीवन-रस मिलता रहे। यह सिद्धांत है कि भरपूर प्रयासों के बाद आने वाली समस्याएँ आभासिक या सकारात्मक ही होती हैं, वास्तविक या नकारात्मक नहीं।

इस कुंडलिनी उत्प्रेरक समस्या को भौतिक दुनियादारी के प्रति सकारात्मक और अस्थायी अविश्वास के रूप में परिभाषित किया जा सकता है

इस कुंडलिनी उत्प्रेरक समस्या को बहुत से लोग भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक आघात / ट्रामा के रूप में परिभाषित करते हैं। हालांकि यह वास्तव में आघात नहीं है, क्योंकि आघात तो व्यक्ति को नीचे गिराता है, कुंडलिनी की असीमित ऊंचाइयों तक नहीं उठाता। वास्तव में इसे भौतिक दुनिया के प्रति विश्वास के सकारात्मक और अस्थायी रूप से क्षीण होने के रूप में कहा जाना चाहिए, जो कि व्यक्ति को कुंडलिनी {एकमात्र मानसिक छवि} की मानसिक दुनिया की ओर प्रेरित करता है।

तंत्र के अनुसार भौतिक दुनियादारी से मन भरने पर ही कुण्डलिनी आसानी से प्राप्त होती है

एक व्यक्ति को जीवन के हरेक क्षेत्र का अनुभव होना चाहिए {जैसा प्रेमयोगी वज्र को था}, नहीं तो भौतिक दुनिया के प्रति लालसा से उसका मन दुनिया में रमा रहेगा। वह पार्याप्त रूप से समृद्ध भी होना चाहिए {जैसा प्रेमयोगी वज्र था}, नहीं तो उसे कमाई की चिंता बनी रहेगी, जिससे उसका मन दुनिया से नहीं हटेगा। सीधी सी तंत्रसम्मत बात है कि जिसका मन भौतिक दुनिया की सकारात्मक, कर्मपूर्ण व मानवीय रंगीनियों से भर गया हो, उसे ही उससे ऊपर उठने का मौक़ा आसानी से मिलता है।

कुण्डलिनी के विलयन से आत्मज्ञान

योग-साधना करते-२ एक समय ऐसा आता है, जब कुण्डलिनी आत्मा में विलीन होने लगती है। तब व्यक्ति का विश्वास कुण्डलिनी से भी हटकर आत्मा पर केन्द्रित हो जाता है। उसके दौरान ही उसे क्षणिक आत्मज्ञान हो जाता है। ऐसा ही प्रेमयोगी वज्र के साथ भी हुआ था, जिसका वर्णन उसने अपनी हिंदी में पुस्तक “शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)” तथा अंग्रेजी में पुस्तक “Love story of a Yogi- what Patanjali says” में विस्तार के साथ किया है।

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अवसादरोधक दवा से कुण्डलिनी लाभ

अवसादरोधक दवा कैसे काम करती है

प्रेमयोगी वज्र प्रचंड दुनियादारी में उलझा हुआ व्यक्ति था। उससे उसका मन बहुत अशांत हो गया था। यद्यपि वह शरीरविज्ञान दर्शन की सहायता से उसे काफी हद तक काबू कर रहा था। परन्तु फिर भी वह पूरी तरह से काबू नहीं हो पा रहा था। एक बार वह गंभीर गैस्ट्राइटीस के वहम से एंडोस्कोपी करवाने गया। चिकित्सक ने उसकी मनोदशा को समझते हुए उसे डेढ़ महीने की अवसादरोधक व क्रोधनाशक दवा (नाम याद नहीं) प्रेस्क्राईब कर दी। उसे उसको खाते हुए अपने अवसाद व क्रोध में काफी कमी महसूस हो रही थी। उसने गूगल पर पढ़ लिया था कि एक महीने तक रोजाना खाने पर ही इस दवा का प्रभाव स्थाई बन पाता है। अतः वह दवा को खाता रहा। उसे लग रहा था कि जो काम आध्यात्मिक पुस्तक शरीरविज्ञान करती थी, वही काम वह दवा भी कर रही थी। यद्यपि दवा का काम कुछ ज्यादा ही जड़ता, उग्रता, स्मरणशक्ति की कमी, और कृत्रिमता से भरा हुआ था। उसे आत्मजागरण व कुण्डलिनीजागरण का अद्वैतकारक प्रभाव भी अवसादरोधी दवा के अद्वैतकारक प्रभाव से मिलता-जुलता लगा, यद्यपि शुद्धता और स्तर में अंतर के साथ। एकहार्ट टोल्ले ने भी लगभग ऐसा ही बयान किया है कि अवसादरोधी दवा का प्रभाव आत्मजागरण के प्रभाव जैसा होता है, यद्यपि तुलनात्मक रूप से बहुत निम्न दर्जे का और उग्रता के साथ।

वह लम्बी खांसी से परेशान था

उसने बहुत सी एंटीबायोटिक दवाइयां खाईं, पर खांसी ठीक नहीं हुई। वह समझ रहा था कि एंटीबायोटिक दवाइयाँ काम नहीं कर रही थीं, जीवाणुओं के प्रतिरोध के कारण। वास्तव में उसकी खांसी की वजह क्रोनिक गेस्ट्राइटीस थी। जब उसने 1 महीने तक पेंटोपराजोल और डॉमपेरिडोन दवाइयां खाईं तथा योग करने के साथ कुछ सावधानियां बरतीं; तब उसकी खांसी जड़ से ख़त्म हो गई। आजकल के तनाव भरे जीवन में यह समस्या विकराल हो गई है, जिस बारे में अधिकाँश लोग गलतफहमी का शिकार हो जाते हैं।

I don’t see it as a road to true and lasting awakening, but it can give people a glimpse of freedom from the prison of their conceptual mind (a worth reading interview with Eckhart tolle)…………..

INTERVIEW WITH ECKHART TOLLE

मस्तिष्कप्रभावी दवाओं से रूपांतरण

शरीरविज्ञान दर्शन एक अद्वैतवादी सोच है। इससे सिद्ध होता है कि वह दवा अद्वैत को उत्पन्न कर रही थी। माईंड अल्टरिंग ड्रग्स भावनाओं को नियंत्रित करने के लिए पावर ब्रेक की तरह काम करती है, जिससे मस्तिष्क के सॉफ्ट टिशू को नुक्सान पहुँच सकता है। उसे अपनी स्मरणशक्ति कम होती हुई महसूस हो रही थी। क्रोध के समय तो उसका मस्तिष्क जवाब देने लगता था, इसलिए वह क्रोध कर ही नहीं पाता था। क्रोध से उसका मस्तिष्क दबावयुक्त, भारी, सुस्त, और अंधकारमय सा हो जाता था। शारीरिक रूप से भी वह  शिथिल व कमजोर जैसा रहने लग गया था। उसकी कार्यक्षमता काफी घट गई थी। वह अपने अचानक  हुए परिवर्तन को देखकर हैरान था। इसलिए उसने 30-35 दिन के बाद वह दवा बंद कर दी, और बची हुई दवा कूड़ेदान में डाल दी। यद्यपि उसका रूपांतरण स्थायी रूप से हो गया था। वह पिछली अवस्था में कभी भी वापिस नहीं लौट पाया।

अवसादरोधक दवा आनंद व अद्वैत को कैसे उत्पन्न करती है?

इससे व्यक्ति किसी के भी बारे में गहराई से नहीं सोच पाता, और न ही ढंग से विश्लेषण या जजमेंट कर पाता है। इससे सभी वस्तु-विचारों के प्रति स्वयं ही साक्षीभाव पैदा हो जाता है। उससे आनंद पैदा होता है। साथ में, विश्लेषण व जजमेंट की कमी से सभी वस्तु-विचारों के बीच का अंतर मिटने लगता है, जिससे सभी कुछ एक जैसा लगने लगता है। यही तो अद्वैत है। यह सब ऐसे ही होता है, जैसे शराब के हल्के नशे में होता है। सीधा सा मतलब है कि मेडीटेशन बुद्धि-शक्ति को बढ़ा कर अद्वैतभाव को उत्पन्न करती है, जबकि मस्तिष्क-परिवर्तक दवाएं बुद्धि-शक्ति को घटा कर। फिर भी ये दवाएं आध्यात्मिक जागरण की झलक तो दिखा ही देती हैं। उस झलक का पीछा करते हुए आदमी वास्तविक आत्म-जागरण को भी प्राप्त कर सकता है।

मस्तिष्क-परिवर्तक दवाओं से ध्यान लगाने में कैसे सहायता मिलती है?

अपनी मानसिक गतिविधियों के अचानक ही बहुत धीमा पड़ने से प्रेमयोगी वज्र को आश्चर्य भी हुआ, और कुछ दुःख भी। वह अपनी पूर्ववत मानसिकता को प्राप्त करने के उपाय सोचने लगा। वह मानसिकता उसकी याददाश्त से जुड़ी हुई थी, जो ड्रग के प्रभाव से काफी कम हो गई थी। उसे कुछ समय के लिए एक ऐसे व्यक्ति की संगति मिल गई, जो नियमित रूप से योगासन करता था। उसे देखकर वह भी करने लगा। धीरे-२ उसे अभ्यास हो गया। वह इंटरनेट व पुस्तकों की मदद भी लेने लगा। उसमें मानसिक शक्ति तो पहले की तरह प्रचुर थी, परन्तु वह कहीं लग नहीं रही थी। इसका कारण यह था कि वह दवा के प्रभाव से उन पिछली बातों व घटनाओं को भूल गया था, जिनसे उसकी मानसिक शक्ति जुड़ कर क्षीण होती रहती थी। दवा से उसका पिछला संसार मिट जाने से उसकी प्रचंड मानसिक शक्ति उससे मुक्त हो गई थी। इसीलिए उसे महसूस नहीं हो रही थी। योग की सहायता से वह छुपी हुई व भरपूर मानसिक शक्ति उसकी कुण्डलिनी को स्वयं ही लगने लगी। इससे वह समय के साथ जागृत हो गई।

दुनियादारी की मानसिकता का कुण्डलिनी-मानसिकता के रूप में प्रकट होना

कुण्डलिनीयोग से उसे अपनी खोई हुई पुरानी मानसिकता प्राप्त हो गई। यद्यपि वह पहले की तरह अद्वैतपूर्ण दुनियादारी के रूप में नहीं थी, अपितु वह अकेली कुण्डलिनी के रूप में थी। समस्त मानसिक शक्ति एकमात्र कुण्डलिनी को लगने से वह जागृत हो गई।

प्रबल मानसिकता की प्राप्ति केवलमात्र अद्वैतभाव से संभव

यह ध्यान देने योग्य बात है कि प्रबल, अविरल व स्थायी मानसिकता केवल अद्वैतपूर्ण दुनियादारी से ही संभव है। द्वैतपूर्ण व्यवहार से मानसिकता चरम के निकट पहुँचने से पहले ही क्षीण होती रहती है। इससे सिद्ध होता है कि प्रेमयोगी वज्र का अद्वैतपूर्ण जीवन-व्यवहार (geetaa-ukt karmayoga)  भी उसके कुण्डलिनी-जागरण में सहायक बना।

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अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस- 2019

सभी मित्रों को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस- 2019 की बहुत-2 हार्दिक शुभकामनाएं।

योग-साधकों के लिए कुछ जरूरी व व्यावहारिक सुझाव-

1) योग प्रतिदिन करना चाहिए। यदि किसी दिन व्यस्तता और थकान अधिक भी हो, तो भी योगसाधना के नियम को नहीं तोड़ना चाहिए। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वैसे व्यस्त व थकान से भरे दिन योग-साधक एक नई व प्रभावकारी योगक्रिया स्वतः ही आसानी से सीख जाता है। साथ में, उस दिन एक नई अंतर्दृष्टि विकसित होती है।यदि उस दिन योग न किया जाए, तो साधक उस नई तकनीक या अंतर्दृष्टि से लम्बे समय तक वंचित रह सकता है।

यदि समय की बहुत ही अधिक कमी हो, तो ही योग साधना को कुछ संक्षिप्त करना चाहिए, अन्यथा पहले की तरह पूरे विस्तार के साथ योग करना चाहिए। उदाहरण के लिए, मैं आगे के और पीछे के चक्रों को जोड़कर, एकसाथ दोनों का ध्यान करने की कला ऐसे ही व्यस्त समय में सीखा था। पहले मैं आगे के चक्र पर अलग से व पीछे के चक्र पर अलग से कुण्डलिनी का ध्यान करता था। पहले दौरे में मैं ऊपर से लेकर नीचे तक सभी आगे वाले चक्रों का ध्यान करता था। दूसरे दौरे में नीचे से लेकर ऊपर तक सभी मेरुदंड वाले चक्रों का ध्यान बारी-२ से करता था। एक व्यस्तता से भरे हुए दिन के दौरान मैंने दोनों चक्रों को एक मनोवैज्ञानिक, काल्पनिक व अनुभवात्मक रेखा के माध्यम से जोड़कर, दोनों पर एकसाथ ध्यान लगाने का प्रयास किया। बहुत आनंद व कुण्डलिनी की तीव्र चमक के साथ वे दोनों चक्र मुझे अनुभव हुए। उनको आपस में जोड़ने वाली काल्पनिक रेखा पर कुण्डलिनी आगे-पीछे जा रही थी। वह कभी एक चक्र पर स्थित हो जाती थी, तो कभी दूसरे चक्र पर। कभी वह रेखा के बीचों-बीच स्थित हो जाती थी, और वहां पर दोनों चक्रों का प्रतिनिधित्व करती थी।

2) प्राणायाम करते समय शिथिल (रिलेक्स्ड) रहें। अन्दर-बाहर आती-जाती साँसों पर भरपूर ध्यान दें। उससे कुण्डलिनी का ध्यान स्वयं ही हो जाता है। यदि अन्य विचार भी उठें, तो वे भी शुद्ध हो जाते हैं, क्योंकि आराम व तनावहीनता की अवस्था में सभी मानसिक विचार साक्षीभाव के साथ प्रकट होते हैं। तनाव व क्रोध आदि मानसिक दोषों की अवस्था में उठने वाले मानसिक विचार अशुद्ध व बंधनकारी होते हैं। इसलिए सदैव शांत, तनावरहित, व मानसिक दोषों से रहित बने रहने का प्रयत्न करें। शरीरविज्ञान दर्शन से इसमें बहुत मदद मिलती है।

प्रेमयोगी वज्र क्षणिक आत्मज्ञान के बाद बिलकुल तनावरहित बन गया था। उसने उत्तेजित व अशांत लोगों की घटिया मानसिकता को बहुत समय तक शांति के साथ झेला। एक दिन उसके मन में क्रोध उत्पन्न हो गया, और उसने एक सिरफिरे आदमी की पिटाई कर दी। यद्यपि ऐसा उसने अपने बचाव में किया। बाद में पता चला कि वह नशे में था। उसी दिन से उसे अपने मन के विचारों से अपना बंधन महसूस होने लगा, और वह बढ़ता ही गया। उसकी अशांति व उसका तनाव दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगा, और साथ में उसका आत्मबंधन भी। वह डरा हुआ सा रहता था। दोनों प्रकार के भाव एक-दूसरे को बढ़ाने लगे। जिस प्रकार आत्मबंधन से भय उत्पन्न होता है, उसी प्रकार भय से आत्मा बद्ध हो जाती है। दरअसल, यह एक प्रकार की चेन रिएक्शन है, और जब यह शुरू हो जाती है, तो यह अपने आप बढ़ती चली जाती है। इस प्रकार से वह अपने आत्मज्ञान को शीघ्रता से विस्मृत करने लगा।  उसे आश्चर्य हुआ कि कैसे एक बार का किया हुआ क्रोध भी आदमी को योगभ्रष्ट कर सकता है। भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है कि वह व्यक्ति मुझे सबसे प्रिय है, जिसकी किसी के भी साथ शत्रुता नहीं है।

अतः सिद्ध होता है कि योग से ही विश्व में वास्तविक प्रेम व सौहार्द बना रह सकता है।

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इसाई धर्म में कुण्डलिनी

पवित्र आत्मा के साथ बैपटिस्म का अर्थ है कुंडलिनी सक्रियण

कुण्डलिनी और होली स्पिरिट एक ही वस्तु-विशेष के दो नाम हैं। इसाई धर्म में होली स्पिरिट के साथ बैप्टिस्म का वर्णन आता है। इसी तरह हिन्दू धर्म में कुण्डलिनी की क्रियाशीलता व जागरण का वर्णन आता है। मैं अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि होली स्पिरिट व कुण्डलिनी, दोनों एक ही चीज को दर्शा रहे हैं। इस बात को हम निम्नलिखित वैज्ञानिक तर्कों से भी सिद्ध कर सकते हैं।

पवित्र आत्मा और कुंडलिनी, दोनों भगवान की क्रिया शक्ति हैं

होली स्पिरिट को ईश्वर की चलायमान शक्ति कहा गया है। इसी तरह कुण्डलिनी को भी जीवनी शक्ति कहा गया है। जैसे ईश्वर अपनी शक्ति को होली स्पिरिट के रूप में किसी भी स्थान पर प्रोजेक्ट करके उस शक्ति से अपनी इच्छा पूरी करवाता है, उसी तरह वह कुण्डलिनी के माध्यम से भी अपनी शुभ इच्छा पूरी करवाता है।

पवित्र आत्मा और कुंडलिनी, दोनों के नाम समान हैं

जैसे होली स्पिरिट को सांस, हवा, जीवन-धारियों में सबसे महत्त्वपूर्ण या प्राणशक्ति, देवता या फरिश्ते के रूप में पर्सोनीफाईड आदि नाम दिए गए हैं; उसी तरह से कुण्डलिनी को भी ये सभी नाम दिए गए हैं। जिस तरह होली स्पिरिट को गॉड का हाथ या अंगुली कहा गया है, उसी तरह कुण्डलिनी शक्ति को भी भगवान् शिव का क्रियात्मक अंश या आधा शरीर कहा गया है।

पवित्र आत्मा और कुंडलिनी, दोनों को समान रूप प्रदान किया गया है

इसाई धर्म में कहा गया है कि गॉड अपनी होली स्पिरिट की सहायता से बहुत से महान कार्य करता व करवाता है। उदाहरण के लिए, सृष्टि का निर्माण, बाईबल की रचना, पुराने समय के महान लोगों व उपदेशकों के द्वारा किए गए आश्चर्यजनक काम। इसी तरह से कुण्डलिनी भी महान कार्य करती व करवाती है। इसी धर्म के अनुसार होली स्पिरिट किसी मानव-रूप में नहीं है, परन्तु उसे अन्य चीजों की तरह मानवीकृत किया गया है। इसी तरह कुण्डलिनी को भी एक देवी या सर्पिणी का रूप दिया गया है, हालांकि इसका कोई भौतिक रूप नहीं है।

पवित्र आत्मा और कुंडलिनी, दोनों मानसिक छवि के रूप में हैं

होली स्पिरिट एक सहायक है, जिसे क्रिस्ट के नाम से भेजा गया है, जो क्रिस्ट के फोलोवर्स को सभी चीजें सिखाएगी, और उन्हें क्रिस्ट की टीचिंग्स की याद दिलाएगी। इसका अर्थ है कि क्रिस्ट का नाम जपने से मन में क्रिस्ट की छवि बस जाएगी, जो होली स्पिरिट बन जाएगी। कुण्डलिनी भी तो इसी तरह गुरु, देवता आदि के ध्यान से विकसित होती है।

Holy spirit and Kundalini, both teach us the same thing

होली स्पिरिट सिखाती है कि क्रिस्ट वास्तव में कौन है। अर्थात होली स्पिरिट अद्वैत का साक्षात्कार करवाती है। क्रिस्ट का रूप भी अद्वैतवान ही है। ऐसा ही अद्वैत कुण्डलिनी से भी तो उत्पन्न होता है।

होली स्पिरिट बाईबल को समझना आसान कर देती है। होली स्पिरिट वही सिखाती है, जो बाईबल में है। होली स्पिरिट बाईबल का स्मरण करवाती है। इसी तरह का काम कुण्डलिनी से भी होता है, व उसको जान लेने से भी सभी धार्मिक ग्रन्थ स्वयं ही, बिना पढ़े ही जाने हुए बन जाते हैं।

पवित्र आत्मा और कुंडलिनी, दोनों एक आदमी में समान गुण पैदा करते हैं

होली स्पिरिट पापों से लड़ने की शक्ति देती है। इसी तरह, कुण्डलिनी भी पुराने पापों को नष्ट करती है, और नए पापों को पनपने नहीं देती। होली स्पिरिट को प्राप्त करने वाला आदमी स्पिरिट में ही स्थित रहता है, और माँसमय शरीर की लिप्सा को पूरा नहीं करता। इसका मतलब है कि वह ननड्यूल व अनासक्त हो जाता है। कुण्डलिनी भी आदमी को अद्वैतशील व अनासक्त बना देती है। होली स्पिरिट भी कुण्डलिनी की तरह ही हमारे दिल में रहना चाहती है। इसका अर्थ है कि दोनों से ही बहुत गहरा प्यार हो जाता है, क्योंकि दोनों की याद निरंतर बनी रहती है। होली स्पिरिट व कुण्डलिनी, दोनों ही हमारा मार्गदर्शन करती हैं।

होली स्पिरिट या कुण्डलिनी बहुत बड़े बोझ व प्रतिकूलता को भी सहने की शक्ति देती है। दोनों ही नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर ले जाती हैं, तथा दोनों से पड़ौसी खुश रहते हैं। हिन्दू-ग्रंथों में भी आता है कि कुण्डलिनी-योगी के सभी लोग प्रेमी मित्र बन जाते हैं, कोई उसका शत्रु नहीं रहता। वाक इन स्पिरिट का अर्थ है कि डैविल द्वारा आप मिसगाईड न किए जाएं, और हमेशा होली स्पिरिट के आज्ञाकारी बने रहें। इसी तरह कुण्डलिनी-योगी के लिए भी निरंतर कुण्डलिनी-ध्यान करना जरूरी माना गया है।

होली स्पिरिट में चलते रहने के वही लाभ मिलते हैं, जो कुण्डलिनी से उत्पन्न रूपांतरण से मिलते हैं। गॉड ने हमें डर की स्पिरिट (सामान्य द्वैतपूर्ण सोच) नहीं दी है, अपितु शक्ति, प्रेम, व स्वस्थ मन (अद्वैतपूर्ण व अनासक्त भाव) की स्पिरिट दी है। कुण्डलिनीयोग भी यही कहता है।

पवित्र आत्मा और कुंडलिनी, दोनों एक आदमी में समान रहस्यमय अनुभव पैदा करते हैं

होली स्पिरिट के प्रवेश का अनुभव भी कुण्डलिनी-जागरण के अनुभव के सामान हो सकता है। दोनों के अनुभव रहस्यात्मक हैं। उदाहरण के लिए, पूरे शरीर में एक करंट के या सुनहरे जल के दौड़ने के साथ अनंत ख़ुशी का अनुभव। गिफ्ट ऑफ़ टंग भी प्राप्त हो सकता है। यह कुण्डलिनीयोग की वाक्-सिद्धि की तरह ही है, जिसमें कही गई बात सच हो जाती है। कुण्डलिनी के एक्टिवेशन की तरह ही होली स्पिरिट का एक्टिवेशन साईलेंट रूप में भी हो सकता है।

पवित्र आत्मा और कुंडलिनी, दोनों समान कारणों के कारण सक्रिय होते हैं

अब होली स्पिरिट के बैप्टिस्म व कुण्डलिनी जागरण के लिए जिम्मेदार कारणों के बीच समानता पर विचार करते हैं। जब कोई अपने अपराध पर पश्चाताप करता है, तब होली स्पिरिट एक्टिवेट हो जाती है। योग के अनुसार भी जब कोई आदमी अपने बीते जीवन को अपनी यादों में बार-२ साक्षीभाव के साथ उजागर करता है, तब स्वयं ही अच्छा पश्चाताप हो जाता है। उससे कुण्डलिनी क्रियाशील हो जाती है। जब कोई अपने को गॉड या क्रिस्ट के समर्पित कर देता है, तब होली स्पिरिट एक्टिवेट हो जाती है। योग में भी ईश्वर-समर्पण व कुण्डलिनी के प्रति समर्पण को सबसे अधिक महत्त्व दिया गया है।

यहां तक कि भगवान या देवता को याद करने से भी होली स्पिरिट या कुंडलिनी सक्रिय हो जाती है। मैंने हमेशा खुद इसको स्पष्ट रूप से अनुभव किया है। जब भी मैंने शरीरविज्ञान दर्शन की मदद से अद्वैतवादी होने की कोशिश की है, तब-2 मुझे कुंडलिनी का अनुभव हुआ है। ईश्वर अद्वैत का ही एक आधिकारिक नाम है। दोनों नाम एक ही चीज को दर्शाते हैं। मैं पहले से ही अनुभवात्मक रूप से साबित कर चुका हूं कि अद्वैत और कुंडलिनी हमेशा साथ-2 रहते हैं। यह वह इसाई धर्म-सम्मत बिंदु है, जहां से ईश्वर और पवित्र आत्मा (होली स्पिरिट/कुण्डलिनी) के बीच संबंध उपजा है। इसके अतिरिक्त, मैंने खुद भी अनुभव किया है कि अगर किसी भी चीज को बार-बार याद किया जाता है, तो वह चीज कुंडलिनी बन जाती है। उसी आधार पर, ईसा मसीह और बाइबल को बार-बार याद करने से वे पवित्र आत्मा / होली स्पिरिट के रूप में उपलब्ध हो जाते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि पवित्र आत्मा वही सिखाती है, जैसा कि ईसा मसीह और बाइबल ने सिखाया है, क्योंकि ये तीनों एकसमान ही हैं। उसी प्रकार, गुरु, देवता, या वेद-पुराणों का स्मरण करने से वे कुंडलिनी के रूप में प्रकट हो जाते हैं।

होली स्पिरिट को प्राप्त करने के लिए नया जन्म लेना पड़ता है। इसी तरह कुण्डलिनी को क्रियाशील करने के लिए योग-साधना के द्वारा रूपांतरित होना पड़ता है। नया जन्म क्रिस्ट से सम्बंधित होना चाहिए। इसका मतलब यह है कि योग के अनुसार रूपांतरण सकारात्मक होना चाहिए, नकारात्मक नहीं। इसका यह अर्थ भी है कि घर में शुरू से लेकर आध्यात्मिक माहौल होना चाहिए। वैसे भी कुण्डलिनी-जागरण के बाद पुनर्जन्म की तरह रूपांतरण होता है। ब्रेन में नए सरकट बनते हैं।

होली स्पिरिट की आज्ञा को मानना चाहिए। यह कुण्डलिनी योग के महत्त्व को रेखांकित करता है। जो योगी कुण्डलिनीयोग के माध्यम से कुण्डलिनी का बारम्बार स्मरण कर रहा है, वह उसकी आज्ञा का पालन करने के लिए हरदम तैयार ही तो है। होली स्पिरिट की प्राप्ति के लिए बिलीव करना अति आवश्यक है। कुण्डलिनीयोग के माध्यम से कुण्डलिनी के निरंतर स्मरण का मतलब ही यह है कि योगी का कुण्डलिनी के प्रति अपार विश्वास है।

पवित्र आत्मा और कुंडलिनी, दोनों हमेशा उपलब्धियां प्रदान नहीं करती हैं

होली स्पिरिट में बैप्टिस्म या सैल्वेशन के प्रत्येक मामले में ‘स्पीकिंग ऑफ़ टंग’ की प्राप्ति नहीं होती। यह ऐसा ही है, जैसे कि कुण्डलिनी जागरण व मोक्ष के लिए सिद्धियाँ जरूरी नहीं हैं।

पवित्र आत्मा और कुंडलिनी के बीच संघर्ष गलतफहमी के कारण दिखाई देता है

अब हम कुण्डलिनी व होली स्पिरिट की एकरूपता का विरोध करने वाली बातों पर विचार करते हैं। होली स्पिरिट बाहर से आती है, परन्तु कुण्डलिनी शरीर के अन्दर ही होती है। ऐसा इसलिए है ताकि क्रिश्चियनिटी में योग के प्रसार पर रोक लग सके। योग का दुरुपयोग हो सकता है, जिस कारण उससे कर्महीनता व आलस्य का प्रसार हो सकता है। यह भी संभव है कि आत्मज्ञान व उस जैसे अनुभव को ही होली स्पिरिट का प्रवेश कहा गया हो। आत्मज्ञान बाहर से अर्थात ईश्वर से आता है, जबकि कुण्डलिनी-जागरण अपने अन्दर के प्रयास से उपलब्ध होता है। आत्मज्ञान के बाद कुण्डलिनी या होली स्पिरिट स्वयं ही विकसित हो जाती है, और निरंतर बनी रहती है। प्रेमयोगी वज्र के साथ भी ऐसा ही हुआ था। इसी तरह, ईश्वर से प्रार्थना व उसके प्रति समर्पण से कई प्रकार के अलौकिक अनुभव होते हैं, जैसे कि पूर्वोक्तानुसार शरीर में बहते हुए करंट या प्रकाश की नदी का अनुभव। ऐसे अनुभवों से भी कुण्डलिनी या होली स्पिरिट क्रियाशील हो जाती है।

मानवीय कर्म व प्रेम से कुण्डलिनी या होली स्पिरिट शरीर के अन्दर प्रविष्ट होती है। तभी तो इसाई धर्म में मानवता व प्रेम पर सर्वाधिक बल दिया गया है।

साथ में, ईसाई धर्म में 12 फलों वाले जीवन-वृक्ष का उल्लेख है। यह फ्रक्टिफाइड ट्री 7-12 चक्रों के साथ रीढ़ की हड्डी ही है।

एक ही उद्देश्य के साथ ईसाई और हिंदू धर्म दोनों में द्वैतवाद है

क्रिश्चियनिटी में गॉड व सृष्टि के बीच में द्वैत का भाव है। ऐसा केवल इसलिए है ताकि गॉड को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध किया जा सके, जिससे उसमें मजबूत विश्वास पैदा हो जाए। हिंदू धर्म भी यह कहता है कि भगवान इस दुनिया के समान है, और साथ ही अलग भी है। वास्तव में अद्वैत ही सत्य है। क्योंकि जो अच्छी आदतें होली स्पिरिट के बैप्टिस्म के बाद विकसित होती हैं, वे केवल अद्वैत से ही उत्पन्न होती हैं।

ईसाई धर्म और हिंदू धर्म, दोनों में बुरी आत्मा है

कई लोग सोचते हैं कि योग में क्रिश्चियनीटी की तरह इविल स्पिरिट नहीं है। परन्तु यह सत्य नहीं है, क्योंकि योग में भी ‘माया’ नाम से इविल स्पिरिट को स्वीकार किया गया है, जो योगी को साधना व शुभ प्रयासों से विचलित करती रहती है।

सभी धर्म मूल रूप से समान हैं

वास्तव में चीज एक ही है, जिसे हम ऑब्जेक्ट ऑफ़ मेडिटेशन या ध्येय वस्तु कहते हैं। इसाई धर्म में इसे प्राकृतिक, सांसारिक व साधारण-संक्षिप्त रूप में बखान किया गया है; जबकि हिन्दू धर्म में त्यागपूर्णता, कृत्रिमता व दार्शनिक साज-सज्जा के साथ। परन्तु दुर्भाग्य से बहुत से लोग इस दार्शनिक विस्तार में असली, व्यावहारिक, व मूल वस्तु को भूल जाते हैं। इससे धर्मों में विभिन्नता प्रतीत होती है, परन्तु वास्तव में सभी धर्म मूल रूप से एकसमान हैं, और सभी मानवता व प्रेम के पक्ष में हैं।

ईसाई धर्म और हिंदू धर्म का मिश्रण आध्यात्मिक सफलता प्राप्त करने के लिए सबसे तेज है

अब मैं इसाई धर्म व हिंदु धर्म के मिश्रण के बारे में बात करता हूँ। पहले आदमी इसाई धर्म की नीति के अनुसार कर्मयोग से अपनी कुण्डलिनी को विकसित करे। फिर जब उसकी उम्र बढ़ जाए, वह मानवीय रूप से संसार को समृद्ध कर ले, तथा कुण्डलिनी में निपुण हो जाए; तब उसकी पदोन्नति कुण्डलिनीयोग में हो जाए। तब वह समर्पित व बैठकपूर्ण कुण्डलिनीयोग पर अधिक ध्यान दे, ताकि उसकी कुण्डलिनी और अधिक परिपक्व होकर जागृत हो जाए। प्रेमयोगी वज्र ने भी ईश्वरीय प्रेरणा से ऐसा ही किया था, जिससे उसे अतिशीघ्र कुण्डलिनीजागरण का अनुभव हो सका था। इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि सभी धर्मों में वह सभी कुछ है, जो अन्य धर्मों में भी है। कई धर्मों में उनका संकेतों में वर्णन है, तो कई धर्मों में विस्तार से।

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