दोस्तो, क्रोनिक या लंबी बिमारी में जो आदमी आध्यात्मिक सा बन जाता है, वह इसीलिए क्योंकि दर्द, जलन या अन्य शरीर की स्थायी संवेदनाओं से उसका ध्यान लगातार शरीर पर बना रहता है। हालांकि यह सामान्यीकरण नहीं है। कई लोगों को इससे विपरीत लग सकता है। यह सब किसी भी समय किसी की व्यक्तिगत स्थिति के अनुसार होता है। संवेदनाएँ सुखद या अप्रिय संवेदनाएँ होती हैं। दोनों के पीछे एक ही नियम लागू होता है। यह दोनों से लाभ प्राप्त करने की व्यक्ति की क्षमता पर निर्भर करता है अन्यथा बहुसंख्यक लोग दूसरे प्रकार के पक्ष में एक प्रकार से बचने या उसे दबाने की कोशिश करते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है कि दोनों एक ही समय में आसानी से उपलब्ध हों, इसलिए प्रतीक्षा में बहुत समय बर्बाद हो जाता है। इसीलिए खाली समय में तपस्या करने की सलाह दी जाती है। योग भी एक तपस्या है क्योंकि यह विभिन्न शारीरिक और मानसिक संवेदनाएँ प्रदान करता है। कहते हैं कि कष्टसहनरूपी तप से पाप नष्ट होते हैं। इसके पीछे भी मुझे यही सिद्धांत लगता है। कष्ट की दर्द, संवेदना आदि से शरीर की तरफ ध्यान बना रहता है, जिससे मन में दबे सभी प्रकार के अच्छे बुरे विचारों को उमड़ने का मौका मिलता है। जानबूझकर चिंतन करने वाली आम स्थिति में आदमी तथाकथित घृणित या बुरा अनुभव कराने वाली या जीवन पर बुरा प्रभाव डालने वाली यादों को दबाकर रखता है। साथ में, इसके विपरीत अच्छा अनुभव देने वाली यादों को जबरदस्ती और आसक्ति के साथ पुनः पुनः याद करता रहता है। इससे वे मिटने लगती हैं। बैलेंस में उसके अवचेतन मन में केवल बुरे विकल्प ही दबे हुए बचे रह जाते हैं। वे प्रभावी होकर उसे बुरा अनुभव देने लग जाते हैं। उन्हें संतुलित करने के लिए वह अच्छी यादों से जुड़ी क्रियाओं की तरफ पुनः आसक्ति के साथ प्रवृत्त हो जाता है। आसक्ति इसलिए क्योंकि उन्हें विलीन करते हुए भी उसके मन में आसक्ति थी। अच्छे विकल्पों से आसक्ति इसलिए भी क्योंकि बुरे विकल्प उसने जबरन अवचेतन में दबाए हुए हैं। अगर आदमी अपने मित्र से आसक्ति और शत्रु से घृणा करेगा तो जरूर मित्र को बागों में घुमाएगा और शत्रु को बेड़ी डालकर तहखाने में बंद कर देगा। इसको घुमाकर सोचें तो यदि एक आदमी हर बार अपने नौकर श्यामू के जिम्मे गुलामों जैसा काम छोड़कर अपने दूसरे नौकर रामू को गंगास्नान कराने ले जाएगा तो यही माना जाएगा कि उसको रामू के प्रति आसक्ति है और श्यामू से घृणा। इस तरह यह सिलसिला जारी रहता है और अवचेतन में दबे हुए तथाकथित बुरे संकल्प आसक्तिपूर्ण जीवन को हवा देते रहते हैं। पर यदि उसका मन ध्यानसाधना या मेडिटेशन से शरीर, सांस, माला, ध्यानचित्र आदि किसी भी ध्यान आलंबन पर स्थिर हो, तो फिर उसके अवचेतन मन पर उसका पक्षपातपूर्ण नियंत्रण नहीं रहता। फिर समय, स्थिति, अवस्था आदि के अनुसार हर प्रकार के अवचेतन मन में दबे संकल्प उभरते रहते हैं। क्योंकि अवचेतन मन का बक्सा हर किस्म के संकल्पों से बराबर खाली होता रहता है, इसलिए उसे किसी विशेष संकल्प की पक्षपातपूर्ण अनुभूति नहीं होती। इससे वह नए संकल्प बनाने के लिए पक्षपात या आसक्ति के साथ अपनी दुनियादारी नहीं चलाता, बल्कि समय, स्थिति, अवस्था के अनुसार जो जरूरी है, वैसा ही जीवन व्यवहार करता है। इससे वह खुद ही बुरे कर्मों से बचा रहता है क्योंकि बुरे कर्म अक्सर आसक्ति से ही होते हैं। यह ऐसे ही है जैसे अगर एक आदमी की टोकरी में आलू, प्याज, टमाटर, संतरा, केला बराबर मात्रा में खत्म हो जाए तो वह सबको पाने लिए बराबर प्रयास करेगा, न कि एक ही चीज के पीछे हाथ धोकर पड़ेगा। एक ही चीज पर पूरा ध्यान रहने से वह उससे आसक्त होकर उसको पाने के लिए बुरे काम भी कर सकता है। पर जब उसका ध्यान सभी चीजों को पाने के लिए बराबर बंटा रहेगा, तो उसकी किसी भी चीज के प्रति आसक्ति नहीं हो पाएगी। इससे वह उन्हें पाने के लिए बुरे कर्म से भी बचा रहेगा। किसी चीज के लगातार चिंतन से ही तो उसके प्रति आसक्ति पैदा होती है।
वैसे तो कुंडलिनी ध्यानयोग में भी तो एक ही ध्यानचित्र का लगातार चिंतन किया जाता है, पर उससे तो आसक्ति पैदा नहीं होती। इसकी वजह है, उस चिंतन का प्राणायाम और योगासन के साथ किया जाना या किसी योगी पुरुष की सत्संगति में बने रहना। इससे सांस और शरीर के साथ वह चिंतन जुड़ा होने से वह अपना ही हिस्सा लगता है, जिससे उसके प्रति आसक्ति पैदा नहीं होती। साथ में, कई जानकीर लोगों द्वारा अपने मन में यह धारणा पहले से बैठाई गई होती है कि ध्यानचित्र को भौतिक रूप से प्राप्त नहीं करना है, अपितु उसे मन में ही जगाना है। इससे गहराती चिंतन शक्ति से अन्य दबे विचार भी सामने उभर कर आत्मा में विलीन हो जाते हैं। आम भौतिक चिंतन में आदमी चिंतित वस्तु को वस्तुतः लंबी चलने वाली चिंतन प्रक्रिया में काफी पहले ही भौतिक रूप में प्राप्त कर लेता है। इससे चिंतन नष्ट हो जाता है क्योंकि अपना या अपनी निकटतम वस्तु का या प्राप्त वस्तु का कैसा चिंतन। आम आदमी योगी तो होते नहीं जो अपनी आत्मा के साथ जुड़े हुए चित्र का बलपूर्वक चिंतन करें। वैसे भी चिंतन तो उसका ही हो सकता है जो भौतिक प्राप्ति से दूर है। इससे यह चिंतन ज्यादा गहराई तक नहीं जा पाता, जिससे ज्यादा दबे विचार भी गहराई से बाहर नहीं निकल पाते। आसक्ति उसी के प्रति पैदा हो सकती है, जिसका भौतिक अस्तित्व हो या जो अपने लिए उपयोगी हो। ध्यानचित्रों जैसे देवताओं, ऋषियों आदि का भौतिक अस्तित्व है ही नहीं, फिर उनसे आसक्ति कैसी। गुरु भी न होने की तरह ही हैं, क्योंकि वे अद्वैतरूप होते हैं। अद्वैत रूप परमात्मा का है, और परमात्मा भी परम शून्य रूप ही हैं। किसी का अन्य पसंदीदा ध्यानचित्र ऐसा भी हो सकता है जिसका उसके लिए कोई भौतिक महत्त्व न हो। जैसे कोई पर्वत, नदी, आकाश आदि या कुछ भी। उससे भी कैसी आसक्ति। आम दुनियादारी में जब आदमी को चिंतित वस्तु मिल जाती है, तो वह उसका चिंतन छोड़ देता है। फिर वह किसी अन्य अप्राप्त वस्तु का चिंतन करने लगता है, ताकि वह उसे प्राप्त हो सके। इस तरह यह सिलसिला चलता रहता है, पर चिंतन आध्यात्मिक गहराई या कुंडलिनी जागरण तक नहीं पहुंच पाता। बेशक उसे उस चिंतन से भौतिक लाभ तो मिलते हैं, जैसे खुशी और भौतिक समृद्धि। खुशी इसलिए मिलती है क्योंकि उस चिंतन से उसके अवचेतन मन का भार कुछ न कुछ तो हल्का होता ही है। यही माया है, यही दुनियादारी है, जिसका सिलसिला अनवरत जारी रहता है।