दोस्तों, दुनिया छोड़ना अर्थात त्याग भी सापेक्ष ही है। कोई अगर दुनिया में पहले ही कर्मों और भोगों से दूर है, तो उसका दुनिया छोड़ना भी ज्यादा प्रभावी नहीं होगा ,क्योंकी उसकी दुनिया तो पहले ही छूटी हुई है। पर अगर कोई भोगों और कर्मों में भरपुर उन्मुख है, तब उसका हल्का सा एकांतवास भी दुनियादारी का महान त्याग बन जाएगा। अगर उसमें वैराग्य का बीज या अनासक्ति का भाव भी उसकी दुनियादारी के समय लगातर पल रहा है, तब तो उसके लिए कुंडलिनी योगसाधना और ज्यादा सरल और फलदाई हो जायेगी।
ईजीनेस एंड सक्सेस इन कुंडलीनी योग इज डायरेक्टली प्रोपोर्शनल टू द प्रोडक्ट आफ मेडिटेशन टेक्नीक, पास्ट वर्ल्डलिनेस, स्ट्रेंथ ऑफ सीड आफ डिटैचमेंट विद दैट एंड द स्टरेंथ आफ रेनंसिएशन आफ्टरवार्ड्स!
K∝md*pw*sod*r*
K=G*md*p*sod*r*
K का मतलब है, कुंडली योग की गुणवत्ता।
md का मतलब मतलब मेडिटेशन टेक्नीक है। ये अनेक प्रकार की हैं। इनमें तंत्र सहायित चक्र साधना सर्वोत्तम तकनीक मानी जाती है, फिर भी सबके अपने अपने स्वभाव होते हैं और अपनी अपनी रुचियां होती हैं।
pw का मतलब है पास्ट वर्ल्डलीनेस, मतलब त्याग से पहले की दुनियादारी की मात्रा व गुणवत्ता।
Sod का मतलब है, सीड आफ डिटैचमेंट मतलब अनासक्ति का भाव (बीती दुनियादारी के समय में)।
R का मतलब है रेनअनसिएशन आफ्टरवार्ड्स, मतलब दुनियादारी के बाद के संसारत्याग की मात्रा व गुणवत्ता।
G प्रोपोर्शनअलिटी का कांस्टेंट है, जो गुरु है। गुरु ज्यादा मजबूत, तो कुंडलिनी योग भी ज्यादा मजबूत।
इस तरह से हम केवल भौतिक आयामों को ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक आयामों को भी वैज्ञानिक इक्वेशनों व फार्मूलों से माप सकते हैं। वैज्ञानिक तो यह पहले ही कह चुके हैं कि सांसारिक क्रियाशीलता और संसार त्याग के बीच जितना ज्यादा अंतर होता है, अचानक या शीघ्र जागृति की संभावना भी उतनी ही ज्यादा होती है।
देखा जाए तो सभी लोग खासकर योगी लोग गणेश की आकृति में ही होते हैं। जब जीभ को तालु से छुआया जाता है, तब आज्ञा चक्र से नाभि तक आगे के चक्रों से होते हुए नाड़ी नाक के माध्यम से जुड़ जाती है। यही गणेश की सूंड है। इसी तरह जब योगिक सांसों के दौरान प्राण इड़ा से ऊपर चढ़कर चेहरे की बाई तरफ कंपन व हलचल पैदा करते हैं, तो वह गणेश का बड़ा सा बांया कान है। जब प्राण पिंगला की तरफ जाते हैं, तो दाएं चेहरे पर सिकुड़न बढ़ाते हैं, जो गणेश का दायां बड़ा कान है। जब मुख का बायां कोना प्राणों से अजीब सा या विकृत सा खुलता है, जिससे मुंह के किनारे वाला लंबा नुकीला कैनाइन दांत साफ नजर आता है, तो वह गणेश का बायां दांत है, और जब दायां कोना खुलता है, तब दायां दांत होता है।
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