मेरे द्वारा संकलित व पूर्ववर्णित ई-पुस्तक का प्रचाराभियान (please browse down or click here to view post in English)-

मैंने उस ई-पुस्तक को पूर्णरूप से निर्मित होने से पहले ही केडीपी किन्डल पर डाल दिया था। नई तैयार लिखित सामग्री को मैं प्रतिदिन उस पर अपडेट कर लिया करता था। मैंने उस पुस्तक को किन्डल अनलिमिटिड में ज्वाइन कराया हुआ था, जिसके अनुसार किन्डल अनलिमिटिड के उपभोक्ता उस पुस्तक को मुफ्त में डाऊनलोड कर सकते थे। इस तरह से, पूर्ण निर्माण होने तक मेरी पुस्तक का कुछ प्रचार स्वयं ही हो गया था। वैसे मेरी किस्मत अच्छी रही जो किसी ने अधूरी पुस्तक की समीक्षा / रिव्यू नहीं डाली, क्योंकि उससे पुस्तक की कमियाँ पाठकों के समक्ष उजागर हो सकती थीं। मेरी पुस्तक को सर्वोत्तम समीक्षा तब मिली, जब वह पूर्ण रूप में पाठकों के समक्ष प्रस्तुत हुई। लैंडिंग पेज / landing page भी मैंने बहुत पहले ही बना दिया था। लैंडिंग पेज एक वेबसाईट / website का वेबपेज / webpage, मुख्यतया होमपेज / homepage होता है, जिसमें पुस्तक के बारे में सम्पूर्ण जानकारी लिखी होती है, तथा उस पुस्तक के ऑनलाइन बुक-स्टोर / online book store का भी लिंक / link दिया होता है। इच्छुक पाठक उस लिंक पर क्लिक करके बुक स्टोर में पहुँचते हैं, और वहां से उस पुस्तक को खरीद लेते हैं। लैंडिंग पेज एक प्रकार से पुस्तक की दुकान ही होती है, और बुक स्टोर का बुक-डिटेल पेज / book detail page एक प्रकार का कैश-काऊंटर होता है। जब भी कभी पुस्तक के लिए एड-केम्पेन (प्रचाराभियान) / ad campaign चलाई जाती थी, तब उसमें लैंडिंग पेज का ही लिंक दिया गया होता था, सीधा बुक-स्टोर का नहीं। वह इसलिए क्योंकि बुक-स्टोर में पुस्तक के बारे में बहुत कम प्रारम्भिक जानकारी होती है, और वह पाठक को पुस्तक खरीदने के लिए अधिक प्रोत्साहित नहीं करता। लैंडिंग पेज में एक प्रकार से सम्पूर्ण पुस्तक ही संक्षिप्त रूप में विद्यमान होती है। मैंने तो सम्पूर्ण वेबसाईट ही पुस्तक के निमित्त कर दी थी। इससे उन पाठकों को भी लाभ मिलता था, जो किसी कारणवश विस्तृत पुस्तक को खरीद नहीं सकते थे, या पढ़ नहीं सकते थे। मैंने गूगल की एड-केम्पेन लगा कर देखी, पर उससे मुझे कोई विशेष लाभ प्रतीत नहीं हुआ। मैं क्वोरा पर प्रश्नों के उत्तर लिखा करता था। उत्तर के अंत में मैं अपनी वेबसाईट का लिंक भी लगा दिया करता था। उससे मेरी वेबसाईट पर ट्रेफिक / traffic तो काफी बढ़ गई थी, पर पुस्तक की खरीद नहीं हो पा रही थी। फेसबुक पर अपनी वेबसाईट के बारे में पोस्ट डाल कर भी बहुत कम ट्रेफिक आ रही थी। मैंने अपने सभी सोशल मीडिया अकाऊंट / social media account पर अपने वेबसाईट का लिंक लगा रखा था। पुस्तक के किन्डल अनलिमिटिड / kindle unlimited में होने की वजह से मुझे 3 महीने में 5 दिनों के लिए मुफ्त पुस्तक के रूप में उस पुस्तक के प्रचार का अवसर मिला हुआ था। उससे लगभग 40 के करीब निःशुल्क पुस्तकें पाठकों के द्वारा डाऊनलोड कर ली जाती थीं। उसके बाद 4-5 सशुल्क पुस्तकें भी बिक जाती थीं। रीडरशिप के अनुसार किण्डल अनलिमिटेड का फंड वितरित होता रहता है। मैंने एक बार किन्डल अनलिमिटिड को बंद कराकर पोथी डॉट कोम / pothi.com पर भी पुस्तक को डाला। निःशुल्क रूप में तो वहां से 2 महीने के अन्दर 15 पुस्तकें उठ गईं, पर सशुल्क रूप में एक भी नहीं। इसी के साथ ही मैंने स्मैशवर्ड / smashword, डी2डी / D2D आदि अन्य ई-बुक साईटों पर भी उस पुस्तक को डाला हुआ था। उनमें से तो एक भी पुस्तक डाऊनलोड / download नहीं हुई। अतः मैंने इन सभी साईटों से पुस्तक को हटा लिया, और उसे किन्डल अनलिमिटिड में पुनः ज्वाइन / join करा दिया। किन्डल अनलिमिटिड में रहते हुए किसी दूसरे प्लेटफोर्म / platform पर पुस्तक को पब्लिश / publish नहीं कर सकते हैं। वास्तव में किन्डल ही ई-पुस्तकों का नेता है, विशेषकर भारत में। भारत में लगभग 70% से अधिक ई-पुस्तकें अमेजन / amazon के किन्डल-स्टोर के माध्यम से ही खरीदी जाती हैं। वैसे भारत में कुल पुस्तकों का केवल लगभग 10% हिस्सा ही ई-पुस्तकों के रूप में पढ़ा जाता है। फेसबुक की एड-केम्पेन से मुझे सर्वाधिक बिक्री मिली। उसमें ग्राहकों को सुविधानुसार लक्षित किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, मैं अपने ग्राहकों को योग, ई-बुक लवर, किन्डल ई-रीडर आदि शब्दों तक ही सीमित कर देता था। उसमें स्थान को भी लक्षित किया जा सकता है। मैं अपनी पुस्तक को हिंदीभाषी प्रदेशों व क्षेत्रों तक ही सीमित कर देता था। इसी तरह, मैं 25-45 वर्ष के आयु-वर्ग के लोगों को ही लक्षित करता था। पुरुष व स्त्री दोनों को लक्षित करता था। उसमें एक रुपए से लेकर जितने मर्जी रुपए को खर्च करने का निर्देश दिया जा सकता है। डेबिट कार्ड / क्रेडिट कार्ड का डिटेल मैंने उसमें डाल दिया था। फेसबुक / facebook खुद उससे समयानुसार पैसे निकाल लेता था। उसकी ख़ास बात है की उस एड को किसी के द्वारा देखने पर पैसे नहीं कटते, अपितु तभी कटते हैं, जब कोई उस एड के लिंक पर क्लिक करके लैंडिंग पेज पर पहुँचता है। एक क्लिक लगभग डेढ़ रुपए से लेकर पांच रुपए तक की होती है, डिवाईस / device के अनुसार व अन्य अनेक परिस्थितियों के अनुसार। मोबाईल न्यूजफीड / mobile newsfeed पर संभवतः सबसे महँगी होती है। इसको भी हम सेट / set कर सकते हैं कि किस-2 एप / app (फेसबुक, मेसेंजर या इन्स्टाग्राम) पर कितनी-2 एड दिखानी है। अन्यथा फेसबुक स्वयं ही सर्वोत्तम अनुपात बना कर रखता है। बाद में तो मैंने फेसबुक पेज (बिजनेस परपस / business purpose) भी मुफ्त में बना लिया। उस पर एड डालना और भी आसान हो गया। मैंने अपने वेबसाईट-ब्लॉग / website-blog को अपने फेसबुक पेज के साथ कनेक्ट / connect कर दिया था। उससे जब भी मैं कोई ब्लॉग-पोस्ट अपनी वेबसाईट पर डालता था, तब वह स्वयं ही उसी समय मेरे फेसबुक-पेज पर भी शेयर / share हो जाती थी। फेसबुक पेज पर एक ऑप्शन / option उस पोस्ट को बूस्ट करने के लिए आता था। एक बार मैंने कौतूहलवश उस बूस्ट-बटन / boost button को दबा दिया। कुछ घंटों बाद मुझे अपनी वेबसाईट पर एकदम से बढ़ी हुई ट्रेफिक मिली। उस सम्बंधित पोस्ट को 45 शेयर मिले हुए थे। वह ट्रेफिक फेसबुक से आ रही थी। जब मैंने फेसबुक खोलकर एड-स्टेटस का पता किया, तो वह उस पोस्ट के लिए एक्टिवेटड / activated थी। लगभग 400 रुपए खर्च हो चुके थे। उस पोस्ट को 32 लाईक्स मिल चुके थे, और उसे 15000 लोगों ने (हरियाणा के, अपने आप सेट) देख लिया था। साथ में मेरी 3-4 पुस्तकें भी बिक चुकी थीं। वह तो बड़े घाटे का सौदा लगा, क्योंकि उन पुस्तकों से 70-80 रुपए की ही कमाई हो पाई थी। मैंने तुरंत उस पोस्ट- बूस्ट की एड को बंद करवा दिया। फिर मुझे इंटरनेट से अतिरिक्त जानकारी मिली की एड-केम्पेन पोस्ट-बूस्ट से कहीं अधिक बेहतर व कम खर्चीली होती है। यह भी पता चला कि पुस्तक प्रचार से अधिकांशतः उतनी कमाई नहीं होती है, जितना उस पर खर्चा आता है।

अगली पोस्ट में हम वेबसाईट निर्माण से सम्बंधित स्वानुभूत जानकारी को साझा करेंगे।

यदि आपको इस पोस्ट से कुछ लाभ प्रतीत हुआ, तो कृपया इसके अनुसार तैयार की गई उपरोक्त अनुपम ई-पुस्तक (हिंदी भाषा में, 5 स्टार प्राप्त, सर्वश्रेष्ठ व सर्वपठनीय उत्कृष्ट / अत्युत्तम / अनौखीरूप में समीक्षित / रिव्यूड ) को यहाँ क्लिक करके डाऊनलोड करें। यदि मुद्रित पुस्तक ही आपके अनुकूल है, तो भी, क्योंकि इलेक्ट्रोनिक डीवाईसिस / फोन आदि पर पुस्तक का निरीक्षण करने के उपरांत ही उसका मुद्रित-रूप / print version मंगवाना चाहिए, जो इस पुस्तक के लिए इस लिंक पर उपलब्ध है। इस पुस्तक की संक्षिप्त रूप में सम्पूर्ण जानकारी आपको इसी पोस्ट की होस्टिंग वेबसाईट / hosting website पर ही मिल जाएगी। धन्यवाद।

यदि आपने इस लेख/पोस्ट को पसंद किया तो कृपया इस वार्तालाप/ब्लॉग को अनुसृत/फॉलो करें, व साथ में अपना विद्युतसंवाद पता/ई-मेल एड्रेस भी दर्ज करें, ताकि इस ब्लॉग के सभी नए लेख एकदम से सीधे आपतक पहुंच सकें। धन्यवादम।

ई-रीडर व ई-बुक्स के बारे में विस्तार से जानने के लिए यहां क्लिक करें।

Promotion of a compiled and predefined ebook by me-

I had put that e-book on the KDP platform of Amazon kindle even before it was fully formed. I used to update the new written material on it every day. I had joined that book in Kindle Unlimited, according to which consumers of Kindle Unlimited could download that book for free. In this way, till the complete construction,  my book had got enough exposure. Before my book has been complete, luckily I did not get any review of that incomplete book, because the book’s shortcomings could be exposed to the readers. My book got the best review when it was presented to the readers in full form. I had made the landing page too long ago. The landing page is a website’s webpage, mainly homepage, in which the complete information about the book is written, and also links to the online Book Store of that book are provided there. Interested readers reach the book store by clicking on the link, and buy that book from there. Landing pages are a book shop, and Book Store’s Book-Detail page is a type of cash-counter. Whenever the ad-campaign was run for the book, it was given a link to the landing page tthere, not a direct one to book-store. That’s because book-store has very little initial information about the book, and it does not encourage readers to buy the book more. In a way, the entire book in a landing page is in short form. I had made the entire website just for the sake of the book. It also benefited those readers, who could not buy or read a detailed book for some reason. I looked at Google’s ad-campaign, but it did not seem to be a special advantage to me. I used to write answers to queries on quora. At the end of the reply, I used to link my website too. From that the traffic on my website had increased a lot, but the book was not able to be bought. Posting about my website on Facebook was also very low to attract traffic. I had put a link to my website on all my social media accounts. Because of the book’s kindle unlimited, I had the opportunity to publicize that book in the form of a free book for 5 days in 3 months. Nearly 40 free books were downloaded by the readers. After that 4-5 paid books were also sold. Kindle unlimited fund is distributed according to the readership. I once put the book on Pothi.com by closing the Kindle Unlimited. In the free form, 15 books got up within two months from there, but none in the paid form. At the same time, I had inserted that book on other e-book sites like Smashword, D2D etc. None of books were downloaded from those. So I removed the book from all these sites, and rejoined it in Kindle Unlimited. Self publisher can not publish the book on another platform while being in kindle unlimited. In fact, Kindle is the leader of e-books, especially in India. More than about 70% of e-books in India are purchased through the Amazon Kindle Store. In India, only about 10% of the total books are read as e-books. I got the best sale from Facebook’s ad-campaign. Customers can be targeted according to convenience. For example, I used to limit my clients to the words like Yoga, eBook lover, Kindle e-Reader etc. Location can also be targeted in it. I used to restrict my book to Hindi-speaking states and regions. Similarly, I used to target people aged 25-45 years of age. I targeted both men and women. It can be instructed to spend rupees from one rupee to as much as you like. I had put the details of debit card / credit card in it. Facebook itself withdraw money from time to time. His special thing is that he does not deduct money from anyone watching the ad, but only when he gets to the landing page by clicking the link of that ad. One click ranges from about 1.5 rupees to five rupees, according to the device and many more conditions. Mobile Newsfeed is probably the most expensive. We can also set this to show how much fraction of ad to show on which app (Facebook, Messenger or Instagram). Otherwise Facebook itself maintains the best ratio. Later on, I also created the Facebook Page (Business Purpose) for free. It was even easier to add an ad to it. I had connected my website-blog to my Facebook page. Whenever I used to post a blog-post on my website, it would have been shared on my Facebook page at the same time. An option on the Facebook page came to boost the post. Once upon a time I suppressed that boost-button. After a few hours, I found the tremendous traffic on my website. 45 related shares were received in that respective post. That traffic was coming from Facebook. When I opened Facebook and found the ad-status, it was activated for that post. About 400 rupees had been spent. That post had received 32 likes, and it was seen by 15,000 people (Haryana, the self set). Along with my 3-4 books were also sold. It was a big loss deal, because those books were able to earn only Rs. 70-80. I immediately stopped the post’s Boost. Then I got additional information from the Internet that the ad-campaign is far better and less expensive than Post-Boost. I also came to know that the book promotion is not as much as earning as much as it costs.

In the next post we will share the self experienced matters during a website development.

If you have found some benefit from this post, please download here the above mentioned e-book (in Hindi language, 5 star rated, reviewed as the best, excellent and must read by everyone) made with steps as told above. If only print version suits you, then too print version should only be got after testing that’s e- version on the electronic devices / phone etc., that is available on this link for this book. You can also find the complete information about this book, both in English as well as Hindi languages on the hosting website of this post. Thank you.

If you liked this post then please follow this blog providing your e-mail address, so that all new posts of this blog could reach to you immediately via your e-mail.

Know in full detail about e-readers and e-books here.

 

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s