अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस- 2019

सभी मित्रों को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस- 2019 की बहुत-2 हार्दिक शुभकामनाएं।

योग-साधकों के लिए कुछ जरूरी व व्यावहारिक सुझाव-

1) योग प्रतिदिन करना चाहिए। यदि किसी दिन व्यस्तता और थकान अधिक भी हो, तो भी योगसाधना के नियम को नहीं तोड़ना चाहिए। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वैसे व्यस्त व थकान से भरे दिन योग-साधक एक नई व प्रभावकारी योगक्रिया स्वतः ही आसानी से सीख जाता है। साथ में, उस दिन एक नई अंतर्दृष्टि विकसित होती है।यदि उस दिन योग न किया जाए, तो साधक उस नई तकनीक या अंतर्दृष्टि से लम्बे समय तक वंचित रह सकता है।

यदि समय की बहुत ही अधिक कमी हो, तो ही योग साधना को कुछ संक्षिप्त करना चाहिए, अन्यथा पहले की तरह पूरे विस्तार के साथ योग करना चाहिए। उदाहरण के लिए, मैं आगे के और पीछे के चक्रों को जोड़कर, एकसाथ दोनों का ध्यान करने की कला ऐसे ही व्यस्त समय में सीखा था। पहले मैं आगे के चक्र पर अलग से व पीछे के चक्र पर अलग से कुण्डलिनी का ध्यान करता था। पहले दौरे में मैं ऊपर से लेकर नीचे तक सभी आगे वाले चक्रों का ध्यान करता था। दूसरे दौरे में नीचे से लेकर ऊपर तक सभी मेरुदंड वाले चक्रों का ध्यान बारी-२ से करता था। एक व्यस्तता से भरे हुए दिन के दौरान मैंने दोनों चक्रों को एक मनोवैज्ञानिक, काल्पनिक व अनुभवात्मक रेखा के माध्यम से जोड़कर, दोनों पर एकसाथ ध्यान लगाने का प्रयास किया। बहुत आनंद व कुण्डलिनी की तीव्र चमक के साथ वे दोनों चक्र मुझे अनुभव हुए। उनको आपस में जोड़ने वाली काल्पनिक रेखा पर कुण्डलिनी आगे-पीछे जा रही थी। वह कभी एक चक्र पर स्थित हो जाती थी, तो कभी दूसरे चक्र पर। कभी वह रेखा के बीचों-बीच स्थित हो जाती थी, और वहां पर दोनों चक्रों का प्रतिनिधित्व करती थी।

2) प्राणायाम करते समय शिथिल (रिलेक्स्ड) रहें। अन्दर-बाहर आती-जाती साँसों पर भरपूर ध्यान दें। उससे कुण्डलिनी का ध्यान स्वयं ही हो जाता है। यदि अन्य विचार भी उठें, तो वे भी शुद्ध हो जाते हैं, क्योंकि आराम व तनावहीनता की अवस्था में सभी मानसिक विचार साक्षीभाव के साथ प्रकट होते हैं। तनाव व क्रोध आदि मानसिक दोषों की अवस्था में उठने वाले मानसिक विचार अशुद्ध व बंधनकारी होते हैं। इसलिए सदैव शांत, तनावरहित, व मानसिक दोषों से रहित बने रहने का प्रयत्न करें। शरीरविज्ञान दर्शन से इसमें बहुत मदद मिलती है।

प्रेमयोगी वज्र क्षणिक आत्मज्ञान के बाद बिलकुल तनावरहित बन गया था। उसने उत्तेजित व अशांत लोगों की घटिया मानसिकता को बहुत समय तक शांति के साथ झेला। एक दिन उसके मन में क्रोध उत्पन्न हो गया, और उसने एक सिरफिरे आदमी की पिटाई कर दी। यद्यपि ऐसा उसने अपने बचाव में किया। बाद में पता चला कि वह नशे में था। उसी दिन से उसे अपने मन के विचारों से अपना बंधन महसूस होने लगा, और वह बढ़ता ही गया। उसकी अशांति व उसका तनाव दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगा, और साथ में उसका आत्मबंधन भी। वह डरा हुआ सा रहता था। दोनों प्रकार के भाव एक-दूसरे को बढ़ाने लगे। जिस प्रकार आत्मबंधन से भय उत्पन्न होता है, उसी प्रकार भय से आत्मा बद्ध हो जाती है। दरअसल, यह एक प्रकार की चेन रिएक्शन है, और जब यह शुरू हो जाती है, तो यह अपने आप बढ़ती चली जाती है। इस प्रकार से वह अपने आत्मज्ञान को शीघ्रता से विस्मृत करने लगा।  उसे आश्चर्य हुआ कि कैसे एक बार का किया हुआ क्रोध भी आदमी को योगभ्रष्ट कर सकता है। भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है कि वह व्यक्ति मुझे सबसे प्रिय है, जिसकी किसी के भी साथ शत्रुता नहीं है।

अतः सिद्ध होता है कि योग से ही विश्व में वास्तविक प्रेम व सौहार्द बना रह सकता है।

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demystifyingkundalini by Premyogi vajra- प्रेमयोगी वज्र-कृत कुण्डलिनी-रहस्योद्घाटन

I am as natural as air and water. I take in hand whatever is there to work hard and make a merry. I am fond of Yoga, Tantra, Music and Cinema. मैं हवा और पानी की तरह प्राकृतिक हूं। मैं कड़ी मेहनत करने और रंगरलियाँ मनाने के लिए जो कुछ भी काम देखता हूँ, उसे हाथ में ले लेता हूं। मुझे योग, तंत्र, संगीत और सिनेमा का शौक है।

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