कुण्डलिनी की प्राप्ति के लिए आवश्यक छह महत्त्वपूर्ण कारक- आध्यात्मिक जागरण सभी के लिए संभव है!

दोस्तों, मैंने पिछली पोस्ट में लिखा था कि कुण्डलिनी जागरण को अपनी इच्छा से प्राप्त नहीं किया जा सकता। परन्तु ऐसा भी नहीं है। यदि दृढ़ निश्चय से व सही ढंग से प्रयास किया जाए, तो उसे अपनी इच्छा से भी प्राप्त किया जा सकता है। कुण्डलिनी जागरण एक अजीबोगरीब घटना है। यह सबसे साधारण भी है, और साथ में सबसे जटिल भी। इसे अपनी इच्छा से भी प्राप्त किया जा सकता है, और नहीं भी। इसे अपने प्रयास से प्राप्त भी किया जा सकता है, और नहीं भी। परिस्थिति के अनुसार इसमें विभिन्न विरोधी भावों का समावेश प्रतीत होता है।

आज हम बताएंगे कि कुण्डलिनी जागरण के लिए किन पांच चीजों का एकसाथ इकट्ठा होना जरुरी है।

कुण्डलिनी जागरण के लिए कुण्डलिनी ध्यान का महत्त्व

कुण्डलिनी ध्यान कुण्डलिनी जागरण के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण कारक है। कुण्डलिनी चित्र मन में स्पष्टता, आनंद, और अद्वैत के साथ बना होना चाहिए। वास्तव में कुण्डलिनी से आदमी में सभी मानवीय या आध्यात्मिक गुण स्वयं ही प्रकट हो जाते हैं। इन गुणों का आकलन करके भी यह पता लगाया जा सकता है कि कुण्डलिनी ध्यान कितना मजबूत है। ऐसा भी नहीं है कि योगसाधना से ही कुण्डलिनी का ध्यान होता हो। वास्तव में अद्वैत भावना (कर्मयोग) से पैदा होने वाला कुण्डलिनी ध्यान ज्यादा व्यावहारिक, ज्यादा मजबूत और ज्यादा मानवीय होता है।

अलग-२ चक्रों पर कुण्डलिनी-ध्यान करने से सभी चक्र भी मजबूत हो जाते हैं। फिर जब तांत्रिक प्रक्रिया से कुण्डलिनी को सभी चक्रों से गुजारते हुए मस्तिष्क तक उठाया जाता है, तब चक्रों की शक्ति भी स्वयं ही मस्तिष्क में पहुँच जाती है। इस तरह से हम कह सकते हैं कि चक्रों की शक्ति कुण्डलिनी जागरण के लिए छटा महत्त्वपूर्ण कारक है।

कुण्डलिनी जागरण के लिए प्राणों का महत्त्व

प्राण शक्ति (शारीरिक व मानसिक शक्ति) का ही पर्यायवाची रूप है। जैसे शक्ति के बिना कोई भौतिक कार्य संभव नहीं होता है, उसी तरह कुण्डलिनी जागरण भी प्राणों की मजबूती के बिना संभव नहीं है। कमजोर, सुस्त व बीमार आदमी को कुण्डलिनी जागरण की प्राप्ति नहीं हो सकती।

कुण्डलिनी और प्राण साथ-साथ रहते हैं। जब योग साधना से कुण्डलिनी को शरीर के निचले चक्रों से मस्तिष्क को चढ़ाया जाता है, तब उसके साथ प्राण भी अपने आप ऊपर चढ़ जाते हैं। यदि शरीर में प्राणों की कमी होगी, तो मस्तिष्क में पहुँच कर भी कुण्डलिनी कमजोर जैसी बनी रहेगी, और जागृत नहीं हो पाएगी।

कई लोग मानते हैं कि आराम से बैठकर, और खा-पी कर हमारे शरीर में प्राण शक्ति इकट्ठी हो जाएगी। परन्तु ऐसा नहीं है। यदि ऐसा होता, तो सभी बड़े-२ सेठ कब के कुण्डलिनी जागरण प्राप्त कर चुके होते। प्राण वास्तव में शरीर और मन की क्रियाशीलता, सामाजिकता, अद्वैत व मानवता से ही संचित होते हैं। इसीलिए तो पुराने समय में राजा लोग कई वर्षों तक सर्वोत्तम विधि से राज-काज चलाने के बाद एकदम से वनवास को चले जाया करते थे। उससे उनकी पुरानी क्रियाशीलता से मजबूत बने हुए प्राण उनकी कुण्डलिनी को शीघ्र ही जागृत कर दिया करते थे।

प्रेमयोगी वज्र के साथ भी ऐसा ही हुआ था। उपरोक्त प्रकार की भरपूर दुनियादारी के बाद वह योग साधना करने के लिए एकांत में चला गया। वहां उसकी संचित प्राण शक्ति उसकी कुण्डलिनी को लग गई, और वह जागृत हो गई।

कुण्डलिनी जागरण के लिए इन्द्रियों की अंतर्मुखता का महत्त्व

यदि इन्द्रियों का मुंह बाहर की ओर खुला रहेगा, तो संचित प्राण बाहर निकल जाएंगे। इससे वे कुण्डलिनी को जागृत नहीं कर पाएंगे। अंतर्मुखता का मतलब गूंगे-बहरे बनना नहीं है। इसका अर्थ तो बाहरी दुनिया में कम से कम उलझना है।

प्रेमयोगी वज्र भी जब दुनियादारी से दूर होकर एकांत में योग साधना करने लगा, तब वह अपने गुजारे लायक ही बहिर्मुखी रहने लगा, जरूरत से ज्यादा नहीं। वैसे तंत्र ने भी उसकी काफी सहायता की। उसकी जो शक्ति दुनियादारी में बर्बाद हो जाती थी, वह उसकी तांत्रिक जीवन पद्धति से पूरी हो जाती थी। अपनी उस तंत्र-संवर्धित प्राण शक्ति से वह कुण्डलिनी व योग के बारे में गहरा अध्ययन करता था, योग करता था, हलके-फुल्के भ्रमण करता था, और हलके-फुल्के काम करता था। फिर भी उसमें काफी प्राण शक्ति शेष बची रहती थी, जो उसकी कुण्डलिनी को जगाने में काम आई।

कुण्डलिनी जागरण के लिए वीर्य शक्ति का महत्त्व

वीर्य शक्ति तंत्र का प्रमुख आधार है। वीर्य शक्ति के बिना कुण्डलिनी को जागरण के लिए अपेक्षित मुक्तिगामी वेग (escape velocity) प्राप्त नहीं होता। तांत्रिक साधना के माध्यम से वीर्य शक्ति को आधार चक्रों से ऊपर उठाकर मस्तिष्क तक पहुँचाया जाता है। वीर्यशक्ति के साथ प्राण भी ऊपर चला जाता है। वीर्य शक्ति के नाश के साथ बहुत सा प्राण भी नष्ट हो जाता है। वीर्य शक्ति के बचाव से प्राण का बचाव हो जाता है, जो तंत्र के माध्यम से मस्तिष्क स्थित कुण्डलिनी को प्रदान कर दिया जाता है।

कुण्डलिनी जागरण के लिए एक ट्रिगर का महत्त्व

यदि उपरोक्त सभी अनुकूल परिस्थितियाँ मस्तिष्क में मौजूद हों, पर साथ में यदि एक मानसिक झटका/ट्रिगर न मिले, तो भी कुण्डलिनी जागरण नहीं होता। मैं उस ट्रिगर को एक उदाहरण से समझाता हूँ। मान लो कि दो गुरुभाई कुण्डलिनी योगी हों, और दोनों अलग-२ जगहों पर अपने गुरु के रूप की कुण्डलिनी का ध्यान कर रहे हों। फिर वे वर्षों बाद अचानक किसी मेले/समारोह आदि में आपस में प्यार से मिलें, तो वह मुलाक़ात उन दोनों के लिए एक ट्रिगर का काम करेगी। उससे उन दोनों का ध्यान अपने गुरु पर जाएगा, जिससे पहले से उनके मन में बसी हुई गुरु के रूप की कुण्डलिनी प्रचंड होकर एकदम से जागृत हो जाएगी।    

उपर चडकर हरेक चक्र क्रमवाईझ पांच से छे मास की अंतराल पे एक-एक चक्र का वेधन करते करते मस्तक मे एकठी हो जाएगी अब ये टाईम पे मस्तक मे कुल तीन प्रकार की एकरुप होती है. (1):- प्राण-अपान की उर्जा, (2):- दशेय ईन्द्रियाकी शक्ति की उर्जा, (3):- कुंडलीनी शक्ति की उर्जा .ये तीनो शक्तियां की उर्जा जब मस्तक मे एकरुप एकत्रित होकर बहती है तब मानव को गाढ ध्यान लग जाता है…….

कुण्डलिनी जागरण भाग-4

उपरोक्त सभी छह कारकों के एकसाथ इकट्ठा होने से उत्पन्न कुण्डलिनी-जागरण के वास्तविक समय के अनुभव को पढ़ने के लिए निम्नलिखित लिंक पर जाएं।

प्रेमयोगी वज्र अपनी उस समाधि(कुण्डलिनीजागरण/KUNDALINI AWAKENING) का वर्णन अपने शब्दों में इस प्रकार करता है

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कुण्डलिनी जागरण- यह कैसे काम करता है

दोस्तो, क्वोरा पर कुण्डलिनी-जागरण के बारे में बहुत से प्रश्न पूछे जाते रहते हैं। मुख्य प्रश्न यही होता है कि कुण्डलिनी जागरण क्या होता है? बार-२ वही उत्तर दोहराना कुछ युक्तियुक्त सा नहीं लगता है। इसलिए मैंने निर्णय लिया कि इससे सम्बंधित एक वैबसाईट पोस्ट बनाई जाए, ताकि पाठकों को क्वोरा से इसकी ओर रिडायरेक्ट किया जा सके।

किसी को याद करना ही कुण्डलिनी जागरण है

तत्त्वतः तो ऐसा ही है। केवल याद करने के स्तर में ही भिन्नता होती है। कुण्डलिनी को इससे अधिक गहराई से याद नहीं किया जा सकता। जागरण की अवस्था में कुण्डलिनी दिल की गहराईयों में पूरी उतरी होती है। कुण्डलिनी जागरण के समय कुण्डलिनी आत्मा की गहराईयों में पूरी उतर चुकी होती है। वास्तव में कुण्डलिनी आत्मा से जुड़ जाती है। वह आत्मा से एकाकार हो जाती है। उस समय आत्मा उसे दूसरी वस्तु के रूप में नहीं देख पाता। उस समय आत्मा उसे अपने ही रूप में देखता है। आत्मा पूरी तरह से कुण्डलिनी-रूप बन जाता है। यहाँ याद किया गया व्यक्ति (गुर, देवता, प्रेमी आदि या सैद्धांतिक रूप से कुछ भी) ही कुण्डलिनी के रूप में होता है। आत्मा का अभिप्राय यहाँ आम आदमी का अपना निरपेक्ष व अंधकारमय स्वरूप है। वह रूप विचारों व अनुभवों से पूर्णतः रिक्त जैसा होता है। वह अंधकारमय शून्य जैसा होता है। वह माया या अज्ञान या भ्रम से ही अंधकारमय बना होता है। वास्तव में तो वह कुण्डलिनी की तरह ही प्रकाशमान होता है।

इसका मतलब है कि कुण्डलिनी-जागरण के समय आत्मा भी कुण्डलिनी के रूप में चमकने लगता है। इससे यह होता है की सभी कुछ अपने जैसा महसूस होने लगता है। कोई द्वैत नहीं रहता। सभी कुछ अद्वैत-रूप में प्रकाशित होने लगता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि कुण्डलिनी समेत सभी अनुभव स्वभाव से ही प्रकाशमान होते हैं। उस समय कुण्डलिनी के जुड़ने से आत्मा भी प्रकाशमान बन जाता है। विशाल अग्नि को अपनी एक लौ अपने से अलग कैसे लग सकती है? आत्मा को दुनिया के अनुभव / पदार्थ तब अपने से अलग लगते थे, जब वह कुण्डलिनी से नहीं जुड़ा था। उस समय उसे कुण्डलिनी भी अपने से अलग लगती थी। बेशक कुण्डलिनी का कितना ही ज्यादा ध्यान क्यों नहीं किया जाता था, कुछ न कुछ अलगाव तो उससे रहता ही था। एक अन्धकार से भरे कमरे को अपने अन्दर पैदा हुई एक आग की चिंगारी अपने जैसी कैसे लग सकती है? उसे तो वह अपने से अलग ही लगेगी न।

कुण्डलिनी जागरण आदमी को उसकी अपनी असली आत्मा की झलक दिखाता है। इससे वह योगसाधना आदि के निरंतर अभ्यास से उसे पूर्ण रूप से प्राप्त करने के लिए प्रेरित होता है।

कुण्डलिनी जागरण ज्यादा देर तक नहीं टिकता

कुण्डलिनी जागरण कुछ सेकंडों से ज्यादा समय तक नहीं झेला जा सकता। उस समय मस्तिष्क में विस्फोटक दबाव जैसा बना होता है। अधिकाँश मामलों में आदमी भय से या संकोच से कुण्डलिनी को स्वयं ही नीचे उतार देता है। यदि वह खुद न उतारे, तो कुछ देर में ही मस्तिष्क बहुत थक जाता है, और जागरण के अनुभव को खुद बंद कर देता है। फिर आदमी थकान के कारण आराम कर सकता है। संभवतः उसे नींद तो नहीं आती, क्योंकि वह उस समय आनंद, शान्ति, अद्वैत, और तनावहीनता से भरा होता है। उसका मस्तिष्क शून्य जैसा भी बन सकता है, जिसमें उसे विचार-शून्य असली आत्मा का अनुभव भी हो सकता है।

कुण्डलिनी जागरण की अवधि व्यक्ति के अभ्यास, मनोबल, शारीरिक बल, आयु, सामाजिक स्थिति आदि के ऊपर भी निर्भर कर सकती है। पर इसे एक मिनट से ज्यादा समय तक जारी रखना असंभव सा ही लगता है।

कुण्डलिनी जागरण के बारे में भ्रम

बहुत से लोग कुण्डलिनी-ध्यान को और प्राणोत्थान (कुण्डलिनी-उत्थान) को ही कुण्डलिनी जागरण समझ लेते हैं। यह भ्रम स्वाभाविक ही है, क्योंकि पूर्वोक्तानुसार सभी स्वभाव से समान ही हैं, और इन सभी स्थितियों में कुण्डलिनी का स्मरण या चिंतन विद्यमान होता है। केवल स्मरण के स्तर में ही अंतर होता है। साधारण कुण्डलिनी-ध्यान में यह स्मरण सबसे कम होता है। प्राणोत्थान में यह स्मरण और अधिक होता है। कुण्डलिनी-जागरण में यह सर्वोच्च होता है। जहां साधारण कुण्डलिनी ध्यान व प्राणोत्थान वाला कुण्डलिनी ध्यान लम्बे समय तक (घंटों से दिनों तक) लगातार जारी रखा जा सकता है, वहीँ कुण्डलिनी जागरण को एक मिनट से ज्यादा अवधि तक जारी नहीं रखा जा सकता। जहां साधारण कुण्डलिनी ध्यान और प्राणोत्थान वाले कुण्डलिनी ध्यान को अपनी इच्छा व अभ्यास से कभी भी पैदा किया जा सकता है, वहीँ कुण्डलिनी जागरण को इच्छानुसार पैदा नहीं किया जा सकता। कुण्डलिनी जागरण स्वयं होता है, और बिना बताए होता है। जब बहुत सी अनुकूल परिस्थितियाँ इकट्ठी होती हैं, तभी यह होता है। साथ में, इसको पैदा करने के लिए एक मानसिक झटका देने वाला उत्तेजक या उद्दीपक (ट्रिगर) भी होना चाहिए। वास्तव में आदमी इसके होने के बारे में कोई पूर्वानुमान नहीं लगा पता। यह तब होता है, जब आदमी को इसके होने के बारे में जरा भी अंदेशा नहीं होता। परन्तु साथ में यह भी सत्य है कि यह कुण्डलिनी ध्यान और प्राणोत्थान की अवस्था में ही होता है, और ये व्यक्तिगत व परिवेशीय परिस्थितियों के अनुसार विभिन्न अरसे से (महीनों से लेकर वर्षों की अवधि तक) जारी रखे हुए होने चाहिए।

प्राणोत्थान के बारे में विस्तृत जानकारी निम्नलिखित पोस्ट पर पढ़ी जा सकती है।

प्राणोत्थान व कुण्डलिनी-जागरण के बीच में तत्त्वतः कोई अंतर नहीं है। दोनों के बीच में केवल अभिव्यक्ति के स्तर का ही अंतर है। इसीलिए कई अति महत्त्वाकांक्षी लोग प्राणोत्थान को ही कुण्डलिनी जागरण समझ लेते हैं। पूर्णता को प्राप्त प्राणोत्थान ही कुण्डलिनी जागरण कहलाता है …….

प्राणोत्थान- कुण्डलिनी जागरण की शुरुआत

कुंडली जागरण के वास्तविक समय के अनुभव को जानने के लिए निम्नलिखित वेबपेज पढ़ा जा सकता है।

शक्तिशाली फरफराहट के साथ, जैसे वह अनुभव ऊपर की ओर उड़ने का प्रयास कर रहा था। अतीव आनंद की स्थिति थी। वह आनंद एकसाथ अनुभव किए जा सकने वाले सैंकड़ों यौनसंबंधों से भी बढ़ कर था। सीधा सा अर्थ है कि इन्द्रियां उतना आनंद उत्पन्न कर ही नहीं सकतीं। मेरी कुण्डलिनी पूरी तरह से प्रकाशित होती हुई, सूर्य का मुकाबला कर रही थी …..

प्रेमयोगी वज्र अपनी उस समाधि(कुण्डलिनीजागरण/KUNDALINI AWAKENING) का वर्णन अपने शब्दों में इस प्रकार करता हैैं

अगली पोस्ट में हम यह बताएँगे कि कुण्डलिनी जागरण के लिए दिमाग में किन 5 चीजों का एकसाथ इकट्ठा होना जरूरी है।     

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कुण्डलिनी एक नाग की तरह

मित्रो, कुछ हफ्ते पहले मुझे एक प्राचीन नाग-मंदिर में सपरिवार जाने का मौक़ा मिला। वह काफी मशहूर है, और वहां पूरे श्रावण के महीने भर मेला लगता है। उस के गर्भगृह में मूर्तियों आदि के बारे में तो याद नहीं, पर वहां पर नाग का विशाल, रंगीन व दीवार पर पेंट किया गया चित्र दिल को छूने वाला था। वह शेषनाग की तरह था, जिस पर भगवान् नारायण शयन करते हैं। उसके बहुत से फण थे। मुझे वह कुछ जानी-पहचानी आकृति लग रही थी। वहां पर मेरी कुण्डलिनी भी तेजी से चमकने लगी, जिससे मुझे आनंद आने लगा। वह मुझे कुछ रहस्यात्मक पहेली लग रही थी, जिसे मेरा मन अनायास ही सुलझाने का प्रयास करने लगा।

नाग अन्धकार का प्रतीक  

मेरा पहला विश्लेषण यह था कि नारायण (भगवान) आम आदमी को अन्धकार स्वरूप दिखते हैं। माया के भ्रम के कारण उन्हें उनका प्रकाश नजर नहीं आता। इसीलिए अन्धकार के प्रतीक स्वारूप नाग को उनके साथ दिखाया गया है। फिर भी इस विश्लेषण से मैं पूरा संतुष्ट नहीं हुआ।

नाग कुण्डलिनी के प्रतीक के रूप में

मैं योगाइंडियाडॉटकोम की एक पोस्ट पढ़ रहा था। उसमें कुछ लिखा था, जिसका आशय मैंने यह समझा कि मूलाधार पर नाग साढे तीन चक्र/वलय लगाकर स्थित होता है। वह अपनी पूंछ को मुंह से दबा कर रखता है। जब कुण्डलिनी शक्ति उन वलयों से गुजारी जाती है, तब वह सीधा ऊपर उठकर मेरुदंड से होकर मस्तिष्क तक पहुँच जाता है। उसके साथ कुंडलिनी शक्ति भी होती है।

मैंने इससे निष्कर्ष निकाला कि हमारा नाड़ी तंत्र एक फण फैला कर उठे हुए नाग की तरह दिखता है, और उसी की तरह काम करता है। वैज्ञानिक तौर पर, नाड़ियों में संवेदना भी नाग की तरह लहरदार ढंग से ट्रेवल करती है। वज्र उस नाग की पूंछ है। उसे आधा वलय भी कह सकते हैं। अंडकोष वाला क्षेत्र पहला वलय/कुंडल है। उसके बाहर दूसरा घेरा मांस व तंतुओं का है। तीसरा घेरा हड्डी का है, जो मेरुदंड से जुड़ा होता है। जैसे ऊपर उठे हुए नाग की पीठ के निचले हिस्से में अन्दर की दिशा में एक बैंड/मोड़ होता है, वैसे ही हमारी पीठ के निचले हिस्से (नाभि के बिलकुल अपोजिट) में होता है। उसके बाद दोनों बाहर की ओर उभरते जाते हैं, और फिर दोनों में सिर का मोड़ आता है, जो लगभग एकसमान होता है। नाग के कई सिर इसलिए दिखाए गए हैं, क्योंकि हमारा सिर मेरुदंड से कई गुना चौड़ा व मोटा होता है, तुलनात्मक रूप से।

हमारा नाड़ी तंत्र एक नाग की तरह

रीढ़ की हड्डी के अन्दर नाड़ी को भी हम नाग की तरह अनुभव कर सकते हैं। दोनों में समानता मिलेगी। नाड़ियाँ भी  नाग की तरह या रस्सी की  तरह ही होती हैं। वज्र की नाड़ी को नाग की पूंछ समझो। वाही आधा चक्र भी हुई। स्वाधिष्ठान चक्र का सम्वेदना क्षेत्र (जहाँ कुण्डलिनी का ध्यान होता है) नाग का पहला चक्र/कुंडल/घेरा है। आसपास के क्षेत्र की नाड़ियाँ भी वहां जुड़ती हैं, वही नाग का पहला घेरा है। दूसरा घेरा उसे कह सकते हैं, जहाँ वह नाड़ी सैक्रल प्लेक्सस/नाड़ियों के जाल से जुड़ती है। तीसरा घेरा उसे कह सकते हैं, जहाँ सैक्रल प्लेक्सस स्पाईनल कोर्ड से मिलती है। वहां पर वह नाग/स्पाईनल कोर्ड ऊपर को खड़ा हो जाता है, और मोटा भी हो जाता है। पीठ के लम्बर क्षेत्र में उसमें पेट की तरफ गड्ढे वाला एक मोड़ आता है। अगला मोड़ ऊपर आता है, सिर के नजदीक। सिर के अन्दर का नाड़ी-पुंज उस सांप के अनेक फण हैं, जो कि स्पाईनल कोर्ड/नाग-शरीर से जुड़े होते हैं।

हमारे शरीर के कुण्डलिनी चक्र भगवान शेषनाग के शरीर के मुख्य बिंदु

इतना गहराई में जाने की जरूरत नहीं है। सीधी सी बात है कि पूरा सैक्रल/सेक्सुअल एरिया नाग के चौड़ की तरह मोटा, गोलाकार व परतदार होता है। इसकी सारी संवेदना वज्र/पूंछ की संवेदना के साथ मिलकर ऊपर चली जाती है। जो नाग के मुख्य उभार बिंदु हैं, वे ही शरीर के सात चक्र हैं। वहीँ पर ध्यान के दौरान कुण्डलिनी ज्यादा चमकती रहती है। मूलाधार चक्र पर वज्र की शिखा जुड़ी होती है। आगे के स्वाधिष्ठान चक्र (वज्र के मूल) पर नाग की पूंछ (वज्र) कुंडलाकार रूप में गुथे हुए नाग के उस मुख्य शरीर से जुड़ी होती है, जो जमीन पर होता है। पीछे के स्वाधिष्ठान चक्र पर नाग के ऊपर उठने से लगभग 90 डिग्री का कोण बनता है। पीछे के नाभि चक्र पर नाग के शरीर के मोड़ का सबसे गहरा बिंदु होता है। पीछे के अनाहत चक्र पर नाग के शरीर में उभार आता है। पीछे के विशुद्धि चक्र में नाग के फण के मोड़ का सबसे गहरा बिंदु होता है। उसके ऊपर पीछे के आज्ञा चक्र पर फिर से नाग के सिर/फण का उभार आता है। इसके ऊपर पूरा मस्तिष्क/ मस्तिष्क का सबसे ऊपरी स्थान जहाँ एक कुण्डलिनी संवेदना होती है (सिर के ऊपरी सतह के सबसे आगे वाले व सबसे पीछे वाले भाग के बीचोंबीच; यहाँ एक गड्ढा जैसा महसूस होता है, इसीलिए इसे ब्रह्मरंध्र भी कहते हैं) नाग के एक हजार फणों के रूप में होता है। तभी तो उसे सहस्रार (एक हजार भाग वाला) कहते हैं। बीच वाले मुख्य फण पर कुण्डलिनी विद्यमान होती है।

ध्यान के दौरान नाग के साथ कुण्डलिनी-अनुभव

इसी ऊहापोह में मैं एक दिन तांत्रिक  विधि से ध्यान कर रहा था। मैं उपरोक्त तरीकों से नाग का ध्यान करने लगा। मुझे उसकी पूंछ/वज्र-शिखा पर कुंडलिनी उभरती हुई और सांप की तरह सरसराहट के साथ उसके फण/मेरे मस्तिष्क तक जाते हुए महसूस होने लगी। मस्तिष्क में वह काफी तेज, शांत व भगवान नारायण की तरह थी। ऐसा लगा कि जैसे भगवान नारायण ही कुंडलिनी के रूप में शेषनाग के ऊपर विलास कर रहे थे। साथ में मुझे उपरोक्त नाग-मंदिर के जैसी अनुभूति मिली। फिर मैं अध्यात्म में नाग के महत्त्व को समझ सका।

नाग का पूजन

लगभग सभी धर्मों में नाग को पवित्र व पूज्य माना जाता है। नारायण नाग पर शयन करते हैं। भगवान शिव के मस्तक पर भी नाग विराजमान है। कई धर्मों में दो नाग आपस में लिपटे हुए दिखाए गए हैं। वे संभवतः यब-युम आसन में बंधे हुए दो तांत्रिक जोड़ीदार हैं।

नाग कुण्डलिनी नहीं है

मैंने कुंडलिनी को नाग के रूप में सुन रखा था। पर वह नाग नहीं है। वह नाग के शरीर/तंत्रिका तंत्र/नर्वस सिस्टम पर नाग की तरह चलती है। वैसे ही, जैसे विष्णु भगवान् नाग नहीं हैं, पर वे नाग के ऊपर विहार करते हैं।

नाग कुण्डलिनी को अतीरिक्त बल देता है

जरूरी नहीं कि कुण्डलिनी जागरण नाग के ध्यान से ही हो। प्रेमयोगी वज्र ने  तो नाग का ध्यान नहीं किया था। उसने एकबार कुण्डलिनी को अपने शरीर के अन्दर सीधा ऊपर उठते हुए अनुभव किया था, जैसे एक हैलीकोप्टर हवा में सीधा ऊपर उठता है। नाग के ध्यान से तो केवल उसे उठने के लिए अतिरिक्त बल ही मिलता है। इसीलिए तो अधिकांश बड़े देवी-देवताओं के साथ नाग दिखाया गया होता है।

शेषनाग के सिर पर पृथ्वी

ऐसी पौराणिक मान्यता है कि शेषनाग/मल्टी हूडिड सर्पेंट ने अपने सिर पर सारी धरती को धारण किया हुआ है। वास्तव में यह शेषनाग हमारा अपना उपरोक्त तंत्रिका तंत्र ही है। सारी धरती हमारे इसी तंत्रिका तंत्र/मस्तिष्क में अनुभव के रूप में ही है। वास्तव में स्थूल और बाहर तो कुछ भी नहीं है। यही अंतिम वाक्य अध्यात्म का मूल मन्त्र है।

संवेदना के ऊपर कुण्डलिनी का आरोपण

हरेक शारीरिक संवेदना नाड़ी से होकर मस्तिष्क को जाती है। जब उस पर कुण्डलिनी/एक विशेष मानसिक चित्र का आरोपण किया जाता है, तब वह भी उसके साथ मस्तिष्क में पहुँच जाती है। शरीर की सर्वाधिक तीव्र व आनंदप्रद संवेदना वज्र-शिखा की है। इसलिए उसपर आरोपित कुण्डलिनी मस्तिष्क में जीवंत हो जाती है। इसीलिए कहा जाता है कि कुण्डलिनी मूलाधार में शयन करती है। वास्तव में मूलाधार चक्र में वज्र-शिखा को ही दर्शाया गया है, दोनों एक काल्पनिक रेखा से जुड़ते हुए। उसे ही नाग की पूंछ कहते हैं। आम आदमी में वहां पर कुण्डलिनी सोई हुई होती है। इसका अर्थ है कि वहां पर कुण्डलिनी जागृत नहीं हो सकती। जागरण के लिए उसे मस्तिष्क में ले जाना पड़ता है। नाग ने अपनी पूंछ को मुंह में दबाया होता है। इसका अर्थ है कि कुण्डलिनी वज्र से शुरू होकर वीर्यपात के रूप में वज्र पर ही वापिस आ जाती है, और वहां से बाहर बर्बाद हो जाती है। अपने कुंडल खोलकर नाग के सीधे खड़े होने का मतलब है कि कुण्डलिनी को सीधी दिशा में वज्र शिखा से मेरुदंड से होकर मस्तिष्क तक ले जाया जाता है, बार-2 सैक्सुअल क्षेत्र में घुमाया नहीं जाता। ऐसी भावना की जा सकती है कि पूरे यौन क्षेत्र (जो एक फण उठाए हुए बड़े नाग के जमीनी ढेर/घड़े जैसी आकृति का है) में चारों तरफ से डूबी/सरोबार कुण्डलिनी उससे शक्ति लेकर सीधी ऊपर फण तक चली जाती है। फण/मस्तिष्क पर कुण्डलिनी को मजबूत किया जाता है, और उसे वीर्यपात के रूप में वज्र तक वापिस नहीं उतारा जाता। हालांकि, कुंडलिनी को धीरे-धीरे सामने/आगे के चक्रों के माध्यम से नीचे ले जाया जा सकता है, जिससे वे मजबूत हो जाते हैं। संस्कृत शब्द कुण्डलिनी का अर्थ है, कुंडल/कोइल वाली। अर्थात एक मानसिक आकृति जो कुंडल/नाग पर विराजमान है।

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कुण्डलिनी द्वारा सुरक्षा की भावना के विकास के माध्यम से दंगों की रोकथाम

आजकल अधिकाँश लोगों में जरुरत से ज्यादा असुरक्षा की भावना बढ़ गई है। जो लोगों के पास है, उसका वे पूरा आनंद उठा ही नहीं पाते हैं। इसका कारण यही है कि वे भविष्य की चिंता अधिक करते हैं। लोगों के अन्दर भविष्य के मामले में असुरक्षा की भावना इस कदर बढ़ गई है कि वे हिंसक होकर अपने वर्तमान को बिगाड़ने पर तुल गए हैं। उदाहरण के लिए, भारत की संसद से पारित किए गए एक बिल को ही लें। इस बिल का नाम नागरिकता संशोधन विधेयक / सीएए (citizen amendment act/ CAA) है। इस बिल में पड़ौसी देशों में प्रताड़ित धार्मिक अल्पसंख्यकों को भारत में नागरिकता देने का प्रावधान है। ये पड़ौसी देश वही हैं, जो धर्म के नाम पर भारत से अलग हुए थे। वे देश तो इस्लामिक राष्ट्र बन गए, पर भारत धर्मनिरपेक्ष (यद्यपि मुस्लिम तुष्टिकरण के साथ) देश बना रहा।

उपरोक्त बिल के विरोध के लिए भारत के मुस्लिम भाइयों को स्वार्थपरक राजनेताओं व बुद्धिजीवियों द्वारा धर्म के नाम पर भड़काया जा रहा है। वे इसके विरोध में हिंसक प्रदर्शन कर रहे हैं। उनका मानना है कि वर्तमान में तो यह बिल उचित और मानवतावादी है। उनके मन का डर तो केवल अनजाने भविष्य के प्रति आशंकाओं (एनआरसी / NRC बिल आदि) को लेकर है। ऐसे लोग क़ानून से बच नहीं पाएंगे।

भविष्य से सम्बंधित सुरक्षा की भावना के मामले में पशु मनुष्य से बेहतर हैं

मैं पिछले गर्मी के मौसम में अपनी पत्नी के साथ सायं भ्रमण कर रहा था। वहां हम एक घास के मैदान में बने एक बैंच पर बैठ गए। वहां पर एक गाय बैठी थी, जो बड़े आराम से जुगाली कर रही थी। ऐसा लग रहा था कि दुनिया के सारे सुख उसे उस समय मिले हुए थे। वह प्रसन्न थी। उसके चेहरे पर अपने निकट भविष्य की चिंता जरा भी नजर नहीं आ रही थी। कुछ ही महीनों में कड़ाके की ठण्ड पड़ने वाली थी। वह बेघर थी, इसलिए स्वाभाविक था कि दो महीने की सर्दियों की रातों का ख्याल ही उसके होश उड़ा देता। पर वह उससे बेखबर होकर अपनी मौजूदा स्थिति का भरपूर लुत्फ उठा रही थी। कोई आदमी होता, तो पूरा गर्मियों का मौसम डर-२ के गुजरता। वह आने वाली सर्दियों की चिंता में डूबा रहता, और गर्मियों की सुहानी रातों का जरा भी आनंद न ले पाता। अपने विश्लेषण करने वाले दिमाग पर जरूरत से ज्यादा भरोसा करने से ऐसा ही होता है। ऐसे झूठे दिमागी जंजालों से बचने के लिए अद्वैत और कुण्डलिनी का सहारा लेना चाहिए।

कुण्डलिनी से सुरक्षा की भावना कैसे बढ़ती है?

कुण्डलिनी योग से मन की कुण्डलिनी मजबूत होती है। उससे अद्वैत भाव मजबूत होता है। अद्वैत भाव के मजबूत होने से आदमी को सभी कुछ एकसमान लगता है। इससे उसके मन में किसी ख़ास चीज के प्रति आसक्ति नहीं रहती। वह किसी ख़ास चीज को प्राप्त करने के लिए छटपटाता नहीं है। इसी वजह से वह किसी भी परिस्थिति का विरोध नहीं करता। यदि कभी करता भी है, तो शांतिपूर्वक ढंग से करता है। मानवता, अहिंसा, और शांति तो कुण्डलिनी योगी के अन्दर सबसे प्रमुख गुण होते हैं। कुण्डलिनी इंसान को इंसान बनाती है।

कुण्डलिनी समस्याओं से कैसे बचाती है?

कुण्डलिनी आदमी को नियंत्रित रखती है। वह आदमी को भड़कने नहीं देती। वह आदमी के धीरज को बढ़ाती है। उससे अद्वैत व शान्ति का अनुभव होता है। उससे दिमाग अच्छी तरह से व सकारात्मक रूप से काम करने लगता है। उससे समस्या को सुलझाने में मदद मिलती है। कुण्डलिनी पूरे शरीर में घूमती रहती है, जिससे पूरा शरीर स्वस्थ रहता है। उससे आदमी का शरीर बलवान और मेहनती बनता है। उससे भी समस्याएँ सुलझने लगती हैं।

यह सत्य सिद्धांत है कि कर्म का फल अवश्य मिलता है। कुण्डलिनी से आदमी बुरे काम कर ही नहीं पाता। उससे उसे भविष्य में बुरे फल मिलने की सम्भावना नहीं रहती। उससे भविष्य की समस्याएँ रुक जाती हैं।

कुण्डलिनी योग एक वैज्ञानिक और प्राकृतिक धर्म

इतिहास गवाह है कि अधर्म ने मानवता का उतना नुक्सान नहीं किया है, जितना धर्म ने किया है। सबसे पहला, प्राकृतिक और मानवतावादी धर्म कुण्डलिनी योग ही था। उसको किसी विशेष स्थान से सम्बन्ध रखने वाले और विशेष विचारधारा वाले लोगों के संगठन ने अपनाया। उससे हिन्दु धर्म बन गया। कुछ दूसरे स्थानों पर रहने वाले लोगों के विभिन्न संगठनों ने हिन्दु धर्म का विरोध करने वाले कुछ विभिन्न धर्म बना लिए। परन्तु वे इस गलतफहमी में रहे कि कुण्डलिनी योग हिन्दु धर्म की खोज है। वे आज तक इसी भ्रम में हैं। इसीलिए वे कुण्डलिनी योग को अपनाने में हिचकिचाते हैं। परन्तु वास्तविकता यह है कि कुण्डलिनी योग पूरी तरह से वैज्ञानिक, बेरंग और कुदरती है। कुण्डलिनी योग के बिना तो कोई भी धर्म अधूरा है।

प्रेमयोगी वज्र के जीवन में कुण्डलिनी का योगदान

वह एक बिलकुल साधारण आदमी था। जब से उसे कुण्डलिनी का साथ मिला, तभी से वह तरक्की करने लगा। उसे तो कुण्डलिनी का बहुत सहयोग मिला। वास्तव में भगवान् कुण्डलिनी के माध्यम से ही सहायता करता है। उसी की सहायता से वह उच्च अध्ययन कर पाया। उसी की सहायता से वह उच्च भावना के साथ लोगों की सेवा कर पाया। उसी की वजह से वह उच्च स्तर का जीवन जी पाया। उसी की वजह से वह अनेक प्रकार की समस्याओं से बच पाया, और अनेक प्रकार की समस्याओं पर काबू पा पाया।

वह एक बार अपने घर समेत अपनी सारी संपत्तियों को छोड़कर घर से बहुत दूर चला गया। इससे उसकी भविष्य की सभी चिंताएं मिट गईं। उस नए व वीरान स्थान पर उसे अपनी असुरक्षा की भावना बिलकुल भी महसूस नहीं हुई। इससे उसे शान्ति मिली और वह कुण्डलिनी के बारे में अध्ययन करने लगा, और कुण्डलिनी योग करने लगा। एक साल के अन्दर ही उसकी कुण्डलिनी जागृत हो गई। कुण्डलिनी जागरण का अर्थ है, दुनिया के सभी सुखों की एकसाथ प्राप्ति। इससे मन पूरी तरह से तृप्त और संतुष्ट हो जाता है।

सीधा सा अर्थ है कि भविष्य को लेकर चिंता और असुरक्षा की भावना झूठी होती है। उनसे कुछ प्राप्त नहीं होता है, बल्कि जो अपने पास होता है, वह भी चला जाता है। इनसे जितना बचा जा सके, बचना चाहिए।

कुण्डलिनी ही वास्तविक धर्मनिरपेक्षता है

नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके आप पाएंगे एक देशप्रेम से भरी हुई, वैज्ञानिक , फिक्शन से भरी और अनौखी पुस्तक, जिसे हर किसी को जरूर पढ़ना चाहिए।

शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)

कुण्डलिनी की वैज्ञानिकता को सिद्ध करने वाली निम्नलिखित पुस्तक अनुमोदित की जाती है।

कुण्डलिनी विज्ञान- एक आध्यात्मिक मनोविज्ञान

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कुण्डलिनी से यौन-हिंसा पर रोकथाम

यह तांत्रिक पोस्ट तंत्र के आदिदेव भगववान शिव व तंत्र गुरु ओशो को समर्पित है।

प्रमाणित किया जाता है कि इस तांत्रिक वैब पोस्ट में किसी की भावना को ठेस पहुंचाने का प्रयास नहीं किया गया है। इसमें तांत्रिक वैबसाइट के अपने स्वतंत्र विचार जनहित में प्रस्तुत किए गए हैं। हम बलात्कार पीड़िताओं के साथ सम्वेदना प्रकट करते हैं।

आजकल हर जगह यौन हिंसा की ख़बरें सुनने को मिल रही हैं। यह पूरी दुनिया में हो रहा है। कोई भी क्षेत्र इस मामले में अपवाद नहीं है। अभी हाल ही में हैदराबाद में घटित डा० प्रियंका रेड्डी यौन हत्याकांड इसका सबसे ताजा उदाहरण है। दूसरा ताजा उदाहरण उत्तर प्रदेश के उन्नाव का है, जहां एक बलात्कार से पीड़ित बाला को ज़िंदा जलाया गया। आओ, हम इन मामलों के मनोवैज्ञानिक, सामाजिक व तांत्रिक पहलुओं के सम्बन्ध में विचार करते हैं।

यौन हिंसा के मुख्य कारण

यौनहिंसा का मुख्य कारण सार्वजनिक स्थानों पर परोसी जाने वाली, अश्लीलता, भौंडेपन, व्यभिचार एवं पोर्न से भरी हुई ऑडियोविजुअल सामग्रियां हैं। हालांकि, यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि ये यौन-अनुशासित और तांत्रिक व्यक्ति को शारीरिक और आध्यात्मिक रूप से नुकसान पहुंचाने के बजाय लाभ पहुंचा सकती हैं। इसलिए, इस मामले में मानसिक दृष्टिकोण का प्रकार अधिक महत्वपूर्ण कारक है।

यौन हिंसा का दूसरा मुख्य कारण समाज में समुचित यौन शिक्षा का अभाव है। कई जगह जो यौन शिक्षा दी जाती है, वह तंत्र के अनुसार नहीं होती, इसलिए वह पूरी तरह से कारगर नहीं हो पाती। वास्तविक यौन शिक्षा तो तांत्रिक यौन शिक्षा ही है। तंत्र ही यौनाचार का विज्ञान है। आजकल जब भौतिक यौन शिक्षा को हर जगह फैलाया जा रहा है, तब भी यौन हिंसा बढ़ने की क्या वजह है? इसकी वजह यही है कि उसमें तंत्र की आध्यात्मिकता को शामिल नहीं किया जा रहा है। भौतिक यौन शिक्षा तो कई बार लाभ की बजाय हानि भी पहुंचाती है, तथा वास्तविक यौन सुख से भी वंचित रखती है। यह तांत्रिक यौन शिक्षा ही है, जो वास्तविक यौन सुख को उपलब्ध करवाते हुए आदमी को शारीरिक, मानसिक, व आध्यात्मिक रूप से भी उन्नत करती है।

यौन हिंसा का तीसरा मुख्य कारण समाज में बढ़ती अव्यवस्था, व बेरोजगारी है। इससे असुरक्षा की भावना बढ़ती है, जो यौन हिंसा को जन्म देती है। खाली दिमाग शैतान का घर होता है। जिस आदमी के पास काम और आमदनी नहीं होते, उसे ऊटपटांग ही सूझता है।

यौन हिंसा का चौथा कारण वास्तविक आध्यात्मिकता की कमी है। आध्यात्मिकता खाली दिमाग को भी नियंत्रण में रखती है। तभी तो खाली बैठे हुए जोगी-फकीर कभी गलत काम नहीं करते।

यौन हिंसा का पांचवां प्रमुख कारण न्यायिक कारण है। न्याय प्रणाली भी अपने तरीके से सही काम कर रही है। यद्यपि यह अपराधी मानसिकता के मन में पर्याप्त डर या शर्म पैदा नहीं कर पा रही है। अपराध या तो डर से रुकते हैं, या शर्म से। इसमें शर्म पैदा करने वाला तरीका ज्यादा मानवतापूर्ण है। एक कटु सत्य यह भी है कि ज्यादातर मामलों में अपराधी सजा के भय से ही बलात्कार-पीड़िता की ह्त्या करते हैं, ताकि ज्यादा से ज्यादा सबूत मिटाए जा सके। यह भी यह भी सच्चाई है कि अधिकांशतः तेज दिमाग वाले लोग ही अपराधी बनते हैं। यदि ऐसे लोगों को समुचित दिशा-निर्देशन मिलता रहे, तो वे अपराध की बजाय समाज के अन्य बहुत से महत्त्वपूर्ण काम कर सकते हैं।

तांत्रिक आचार को अपनाने से यौन हिंसा पर रोकथाम

बेशक तंत्र बाहर से देखने पर यौन-सनकी शास्त्र की तरह लगता हो, परन्तु ऐसा नहीं है। तंत्र पोर्न या बलात्कार के बिलकुल विपरीत है। इसमें यौन साथी को पूर्णतः अपने समान समझ कर उससे प्रेम किया जाता है। इसमें परस्पर रजामंदी होती है। इसमें यौन-स्वास्थ्य व यौन अनुशासन पर बहुत ध्यान दिया जाता है। सच्चाई तो यह है कि अनुशासित तंत्र के सामने तो सर्वसाधारण व पारिवारिक प्रणय सम्बन्ध भी बलात्कार की तरह प्रतीत होते हैं। तंत्र में किसी की बेटी या पत्नी को यौन साथी नहीं बनाया जाता। इससे किसी की भावनात्मक संपत्ति को नुक्सान नहीं पहुंचता। तंत्र में बहुत लम्बे समय तक यौन साथी के साथ अन्तरंग सम्बन्ध बना कर रखना पड़ता है। उसे कई वर्षों तक बदला नहीं जा सकता। उसे मझधार में भी नहीं छोड़ा जा सकता। इससे भी बलात्कार जैसे क्षणिक वासना पूर्ति के कामों पर रोक लगती है। तंत्र में एकपत्नीव्रत को सर्वश्रेष्ठ आचार माना गया है, तथा पत्नी को ही सर्वश्रेष्ठ तांत्रिक साथी माना गया है। भगवान शिव-पार्वती की जोड़ी इसका अच्छा उदाहरण है।

कुण्डलिनी शक्ति के बहिर्गमन को रोकने से यौन हिंसा की रोकथाम

वैसे तो जितना संभव हो सके, तांत्रिक विधि से वीर्यपात को रोककर उसकी शक्ति को कुण्डलिनी शक्ति में रूपांतरित कर देना चाहिए। फिर भी मासिक चक्र के गर्भाधान से सुरक्षित काल (मासिक चक्र के प्रथम 7 और अंतिम 7 दिन, यद्यपि कोई भी समय शत-प्रतिशत सुरक्षित नहीं हो सकता है) में किए गए वीर्यपात के बाद सम्भोग बंद नहीं करना चाहिए, बल्कि वीर्य-रक्षण के साथ जारी रखना चाहिए। वीर्यपात से शक्ति बहिर्मुख होकर नष्ट हो जाती है। इससे यौन साथी के प्रति द्वेष पैदा होता है, जो यौन हिंसा में बदल सकता है। इससे एक प्रकार से शक्ति का मुंह बाहर की तरफ खुल जाता है, और लम्बे समय तक वैसा ही बना रहता है। कुछ दिनों के बाद जब बाहर की और शक्ति (नागिन) का मुंह बंद हो जाता है, तब आदत से मजबूर मूढ़ मनुष्य फिर से वीर्यपात करके उसे खोल देता है। इससे उसकी कुण्डलिनी शक्ति निरंतर बाहर की और बर्बाद होती रहती है। उससे आदमी बाहरी दुनिया की मोहमाया में बुरी तरह से फँस जाता है, और उसके अन्दर बहुत से दुर्गुण पैदा हो जाते हैं। उस शक्ति को जितना हो सके, वीर्यपात के बाद उतना शीघ्र ऊपर (मस्तिष्क) की ओर चढ़ा दिया जाना चाहिए। यहाँ तक कि एक बार भी वीर्य के संरक्षण और उसके ऊर्ध्व-चालन के साथ किया गया तांत्रिक यौनयोग बहुत सुन्दर फल देता है, बेशक उसके बाद लम्बे समय तक सेक्स न किया जाए। उससे शक्ति की बहिर्मुखता (नागिन का मुंह नीचे की ओर होना) से उत्पन्न नकारात्मकता एकदम से यू टर्न लेकर ऊर्ध्वमुखता (नागिन का मुंह ऊपर की तरफ उठना) से उत्पन्न सकारात्मकता का रूप ले लेती है। इससे यौन साथी से भी प्रेम बढ़ता है, जिससे यौन हिंसा पर लगाम लगती है। जैसे-२ वीर्य बढ़ता जाता है, वैसे-२ ही मस्तिष्क में कुण्डलिनी शक्ति का स्तर भी बढ़ता जाता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि हमने यौन योग से वीर्य की शक्ति को मस्तिष्क की ओर जाने के लिए निर्दिष्ट किया होता है। उसके साथ कुण्डलिनी स्वयं ही मस्तिष्क की तरफ विकास करती है, क्योंकि यौन योग से हमने कुण्डलिनी को उस वीर्य-शक्ति के ऊपर आरोपित किया होता है।

कुण्डलिनी योग से यौन हिंसा पर लगाम

यह मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक रूप से सत्य है कि प्रत्येक जीव अपनी कुण्डलिनी के विकास के लिए ही यौन सम्बन्ध बनाता है। महान तंत्र गुरु ओशो ने भी यह बात कही है कि सम्भोग से समाधि की प्राप्ति सबसे आसान व व्यावहारिक है। समाधि का अर्थ यहाँ निरंतर का कुण्डलिनी-ध्यान या कुण्डलिनी-जागरण ही है। इस परिपेक्ष्य से, यदि कुण्डलिनी के विकास के लिए कुण्डलिनी-योग की सहायता ली जाए, तो सम्भोग की आवश्यकता ही न पड़े। इसी वजह से तो ऋषि-मुनि व महान योगीजन आजीवन विवाह के बिना ही पूर्ण संतुष्ट जीवन जी पाते थे।

इतिहास गवाह है कि जब से भारत की वैदिक संस्कृति का अन्य संस्कृतियों के द्वारा अतिक्रमण हुआ है, तभी से यौन-हिंसा के मामले बढ़े हैं, और वीभत्स हुए हैं। इसलिए यौन-हिंसा से बचने के लिए कुण्डलिनी योग को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

तांत्रिक यौन-शिक्षा को सर्वसुलभ करवाने वाली निम्नलिखित पुस्तकें अनुमोदित की जाती हैं

1) शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)

2) कुण्डलिनी रहस्योद्घाटित- प्रेमयोगी वज्र क्या कहता है

3) कुण्डलिनी विज्ञान- एक आध्यात्मिक मनोविज्ञान     

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कुण्डलिनी से कौशल विकास एवं रचनात्मकता

आजकल का युग वैज्ञानिक युग है। कौशल व विज्ञान एक दूसरे के प्रमुख सहयोगी हैं। कुशलता के बिना विज्ञान अधूरा है, और विज्ञान के बिना कुशलता अधूरी है। किसी भी काम में वैज्ञानिक तकनीकें भी नाकामयाब या नुकसानदेह/जानलेवा हो जाती हैं, यदि कौशलता का अभाव हो। विज्ञान आज लगभग हर जगह विद्यमान है, परन्तु कुशलता हर जगह विद्यमान नहीं है। अविकसित देशों में अधिकाँश स्थानों पर कुशलता का अभाव होता है। इसी तरह, विकसित देशों के दूर-दराज के व जनजातीय क्षेत्रों में भी कुशलता का भाव होता है। हर रोज जब मैं आसपास नजर दौड़ाता हूँ, तो मुझे कौशल की भारी कमी महसूस होती है। उदाहरण के लिए, मेसनरी वर्क को ही लें। यह मुझे कहीं पर भी गुणवत्तापूर्ण नहीं दिखता। छोटी-२ बातों का ध्यान नहीं रखा जाता, जिससे बड़े-२ नुक्सान हो जाते हैं। अधिकाँश मिस्त्री वैज्ञानिक तथ्यों से परिचित नहीं होते। जो परिचित होते हैं, वे उन्हें व्यावहारिक रूप में लागू करने में आलस करते हैं। कई तो उन्हें लागू करने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाते। कईयों को प्रशिक्षण का अभाव खलता है। कई रूढ़ीवादी सोच के कारण उन्हें जानबूझ कर लागू नहीं करते।

कुण्डलिनी से कौशल विकास कैसे होता है

यह तो सर्वविदित ही है कि अद्वैतभाव के साथ मन में बसी रहने वाली छवि को ही कुण्डलिनी कहते हैं। यह गुरु की, प्रेमी-प्रेमिका की, पुत्र की, माता-पिता की, दादा-दादी की, मित्र की, किसी मनपसंद स्थान या वस्तु आदि किसी की भी हो सकती है।

किसी के मन में कुण्डलिनी के बारम्बार प्रकट होने का सीधा सा अर्थ है कि वह किसी भी चीज की गहराई तक जाता है, और उसे ऊपर-२ से जानकार छोड़ नहीं देता। इससे गहराई तक जाने का उसका स्वभाव स्वयं ही बन जाता है। इस धीर स्वभाव से यह होता है कि जब वह कोई भी काम करता है, तब उसे पूरे विस्तार के साथ सम्पादित करता है। वह उसमें कोई कमी नहीं रहने देना चाहता। वह उस काम से लम्बे समय तक चिपका रहता है। इससे उसे उस काम के बारे में ज्यादा से ज्यादा ज्ञान व अनुभव प्राप्त करने का मौक़ा मिल जाता है। इससे उसकी कुण्डलिनी भी मजबूत होती रहती है, क्योंकि कुण्डलिनी को भी तो चिपकू स्वभाव की ही जरूरत होती है। इससे दोनों सिद्धियाँ एकसाथ प्राप्त हो रही होती हैं। एकतरफ उसे कौशल विकास के साथ भौतिक काम की उच्च गुणवत्ता के रूप में भौतिक सिद्धि प्राप्त हो रही होती है, तो दूसरी तरफ कुण्डलिनी विकास के रूप में आध्यात्मिक सिद्धि भी।

कुण्डलिनी व कौशल विकास के आपसी रिश्ते के बारे में प्रेमयोगी वज्र का अपना अनुभव

जब प्रथम देविरानी के रूप की कुण्डलिनी उसके मन में फुली ब्लोन अप थी, तब वह सभी काम बड़ी बारीकी से करता था। वह अपना अकादैमिक अध्ययन बहुत गहरी व स्पष्टता से करता था। वह हरेक विषय की जड़ तक चला जाता था। उसे औरों के द्वारा ऊपर-२ से किया गया काम पसंद नहीं आता था। वह उसके लिए उन्हें कई बार ताने भी मार देता था, जिससे बहुत से लोग उसे अव्यावहारिक, आलोचक, नकारात्मक, बड़ी-२ बातें बनाने वाला, व घमंडी मानने लग गए थे। परन्तु वह औरों की सहायता के बिना कैसे बदलाव ला सकता था। अकेला चना भांड नहीं फोड़ सकता। अतः उसे अनेकों बार परिस्थिति के साथ समझौता करना पड़ता था।

कालान्तर में जब उसके मन में गुरु के रूप की कुण्डलिनी चमकने लगी, तब वह बहुत ज्यादा व्यावहारिक व स्वावलंबी बन गया। तब उसने जो भी काम किए, वे पूरी गुणवत्ता के साथ किए। वह छोटे-२ सभी काम स्वयं कर लेता था, क्योंकि उसकी बारीक और गहरी नजर को कोई समझ ही नहीं पाता था। जब लोगों ने उसके चमत्कारिक परिणाम देखे, तब लोगों को असलियत का पता चला, और वे उसकी तारीफ करने लगे।

सौहार्दपूर्ण वातावरण में कौशल अधिक विकसित होता है

ऐसे वातावरण में लोग एक-दूसरों को वस्तु-सेवाओं व व्यावहारिक जानकारियों का आदान-प्रदान करते रहते हैं। कुण्डलिनी विकास के लिए भी सौहार्दपूर्ण वातावरण की आवश्यकता होती है। इससे भी यही सिद्ध होता है कि कुण्डलिनी कौशल विकास में मदद करती है।

कुण्डलिनी योग को कौशल विकास के प्रशिक्षण में शामिल किया जाना चाहिए

प्रेमयोगी वज्र को प्राकृतिक रूप से इतना अधिक प्यार मिला कि उसके मन में स्वयं ही कुण्डलिनी विकसित हो गई। उसे योग करने की जरूरत ही नहीं पड़ी। यह अलग बात है कि उसने बाद में दूसरों के लाभ के लिए कुण्डलिनी योग से भी कुण्डलिनी जागरण प्राप्त किया, ताकि सभी लोगों को कुण्डलिनी की उपलब्धि हो सके। सभी लोग उसकी तरह तो खुशकिस्मत नहीं होते।     

सबसे प्रिय वस्तु को ही कुण्डलिनी कहते हैं। जब कौशल प्रशिक्षण कुण्डलिनी के साथ जुड़ जाता है, तब वह भी कुण्डलिनी की तरह ही सर्वाधिक प्रिय बन जाता है। यही कौशल व कुण्डलिनी के आपसी गठजोड़ का मूलभूत सिद्धांत है। इससे कौशल व कुण्डलिनी आजीवन एक-दूसरे को एकसाथ बढ़ाते रहते हैं, और एकसाथ बुलंदियां छूते रहते हैं।    

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कुण्डलिनी के साथ पशु-प्रेम

यह सर्वविदित है कि कुण्डलिनी प्रेम का प्रतीक है। कुण्डलिनी समर्पण का प्रतीक है। कुण्डलिनी श्रद्धा-विश्वास का प्रतीक है। कुण्डलिनी स्वामीभक्ति का प्रतीक है। कुण्डलिनी सेवाभाव का प्रतीक है। कुण्डलिनी परहितकारिता का प्रतीक है। कुण्डलिनी आज्ञापालन का प्रतीक है। कुण्डलिनी सहनशक्ति का प्रतीक है। ये कुण्डलिनी के साथ रहने वाले मुख्य गुण हैं। अन्य भी बहुत से गुण कुण्डलिनी के साथ विद्यमान रहते हैं। यदि हम गौर करें, तो ये सभी मुख्य गुण पशुओं में भी विद्यमान होते हैं। इनमें से कई गुण तो उनमें मनुष्यों से भी ज्यादा मात्रा में प्रतीत होते हैं।  इससे यह अर्थ निकलता है कि पशु कुण्डलिनी-प्रेमी होते हैं। आइये, हम इसकी विवेचना करते हैं।

कुण्डलिनी स्वामीभक्ति का प्रतीक है

आजतक कुत्ते से ज्यादा स्वामीभक्ति किसी प्राणी में नहीं देखी गई है। ऐसे बहुत से  उदाहरण हैं, जब कुत्ते ने अपने मालिक के लिए जान तक दे दी है। इसका अर्थ है कि कुत्ते के मन में अपने मालिक के व्यक्तित्व की छवि स्थाई और स्पष्ट रूप से बसी हुई होती है। वह छवि कुत्ते के मन के लिए एक खूंटे की तरह काम करती है। इससे कुत्ता आपने विचारों और क्रियाकालापों के प्रति अनासक्ति भाव या साक्षी भाव प्राप्त करता रहता है। उससे कुत्ते को आनंद प्राप्त होता रहता  है। उस कुण्डलिनी छवि के महत्त्व को वह कभी नहीं भूलता, यहाँ तक कि उसके लिए जान तक दे सकता है। इसके विपरीत, बहुत से मनुष्य अपने मालिक के प्रति वफादारी नहीं निभा पाते। इससे सिद्ध  हो जाता है कि कुत्ता  मनुष्य से भी ज्यादा कुण्डलिनी प्रेमी होता है।

कुण्डलिनी सेवा भाव का प्रतीक है

उदाहरण के लिए, गाय को ही लें। वह हमें दूध देकर हमारी सेवा करती है। अधिकतर गौवें अपनी देख-रेख करने वाले मालिक के पास ही दूध देती हैं। दूसरा कोई जाए, तो वे जोर की लात भी टिका सकती हैं। इसका सीधा सा अर्थ है कि गाय के मन में अपने मालिक की छवि बस जाती है, जो  उसके लिए कुण्डलिनी का काम करती है।  एक आदमी  तो अपने मालिक को कभी भी छोड़ सकता है, परन्तु गाय ऐसा कभी नहीं करती है। इससे भी यही सिद्ध होता है कि पशु मनुष्य से भी ज्य्यादा नैष्ठिक कुण्डलिनी भक्त होते हैं।

यह अलग बात है कि दिमाग की कमी के कारण पशु मनुष्य की तरह मालिक (कुण्डलिनी) को बारम्बार बदल भी नहीं सकता। अधिकाँश मनूश्य तो अपने दिमाग पर इतना घमंड करने लग जाते हैं कि कुण्डलिनी के परिपक्व होने से पहले ही उसे बदल देते हैं। ऐसी स्थिति से तो पशु वाली स्थिति ही बेहतर प्रतीत होती है। एक बात और है। पालतु पशु को जब आदमी द्वारा संरक्षण व भोजन प्राप्त होता है, तभी उसे कुण्डलिनी को ज्यादा बढ़ाने का अवसर मिलता है।

कुण्डलिनी परहितकारिता का प्रतीक है

इसी तरह, विभिन्न पशु-पक्षी विभिन्न प्रकार  के उत्पाद देकर मनुष्य का भला करते  रहते हैं। ऐसा उनके मनुष्य के प्रति प्रेम से ही सम्भव  हो सकता है। माता प्रेम के वशीभूत होकर ही अपने बच्चे को दूध पिलाती है। यह भी सत्य है कि प्रेम केवल कुण्डलिनी से ही होता है। यह अलग बात है कि पशु उसे बोलकर बता नहीं सकता। यदि प्रेम न भी हो, तो भी किसी का हित करते हुए स्वयं ही उससे प्रेम हो जाता है। यहाँ तक कि पेड़-पौधे भी कुण्डलिनी-प्रेमी होते हैं, क्योंकि वे भी सदैव परहित में लगे रहते हैं।

कुण्डलिनी आज्ञापालन का प्रतीक है

हम उसी की आज्ञा का पालन सबसे अधिक तत्परता के साथ करते हैं,  जो हमारे मन में सबसे अधिक बसा होता है, जो हमें सबसे अधिक महत्त्वशाली लगता है, और जिस पर हमें सबसे अधिक विश्वास होता है। वही हमारी कुण्डलिनी के रूप में होता है। वही आनंद का स्रोत भी होता है। अपनी मालिक की आज्ञा का पालन कुत्ते बहुत बखूबी करते हैं। कुत्ते में तो दिमाग भी इंसान से कम होता है। इसका सीधा सा अर्थ है कि कुत्ता केवलमात्र कुण्डलिनी से ही आज्ञापालन के लिए प्रेरित होता है, अन्य लॉजिक से नहीं। आदमी तो दूसरे भी बहुत से लॉजिक लगा लेता है। इसका सीधा सा अर्थ है कि एक कुत्ता भी कुण्डलिनी की अच्छी समझ रखता है।

इन बातों का उद्देश्य मनुष्य को गौण सिद्ध करना नहीं है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि मनुष्य जीव-विकास की सीढ़ी पर सबसे ऊपर है। यहाँ बात केवल कुण्डलिनी के बारे में हो रही है।

कुण्डलिनी कर्तव्यपालन का प्रतीक है

एक बैल यदि अस्वस्थ भी हो, तो भी वह खेत में हल चलाने से पीछे नहीं हटता। इसी तरह, यदि उसका मूड ऑफ़ हो, तो भी वह अपने कदम पीछे नहीं हटाता। यह अलग बात है, यदि वह हल चलाते-२ हांफने लगे या नीचे गिर जाए। इसका सीधा सा अर्थ है कि बैल भी कुण्डलिनी प्रेमी होता है। उसका रोजमर्रा का काम व उसके मालिक का व्यक्तित्व उसके मन में एक मजबूत कुण्डलिनी के रूप में बस जाता है, जिसे वह नजरअंदाज नहीं कर पाता। अपने आनंद के स्रोत को भला कौन बुद्धिमान प्राणी छोड़ना चाहे। इसी तरह, सहनशक्ति के मामले में बभी समझ लेना चाहिए।

पशुओं के कुण्डलिनी प्रेम के बारे में प्रेमयोगी वाज्र का आपना अनुभव

उसका ब्बच्पन पालतु पशुओं से भरे-पूरे परिवार में बीता था। पशुओं के मन के भाव पढ़ने में उसे बहुत मजा आता था। जंगल में बैलों का खेल-२ में आपस में भिड़ना उसे रोमांचित कर देता था। मवेशियों का जंगल के घास से पेट भर जाने के बाद अपने बाड़े की तरफ दौड़ लगाना एक अलग ही रोमांच पैदा करता था। एक गाय बड़ी नटखट, चंचल व साथ में दुधारू भी थी। वह एक नेता की तरह सभी मवेशियों के आगे-२ चला करती थी। सभी मवेशी उसे सींग मारने को आतुर रहते थे, इसलिए वह अकेले में ही चरा करती थी। वह जंगल के डर से उनकी नजरों से दूर भी नहीं जाती थी। उसकी बछिया भी वैसी ही निकली। वह देखने में भी बहुत सुन्दर थी। जंगल से बाड़े की तरफ पहाड़ी से नीचे उतरते समय वह पूंछ खड़ी करके बड़ी तेजी से कुदकते हुए भागती, और कुछ दूर जाकर पीछे से आने वाले  मवेशियों का इन्तजार करते हुए खड़ी होकर बार-२ गर्दन मोड़कर पीछे देखने लग जाती। जब वे नजदीक आते, तब फिर से दौड़ पड़ती।

जब प्रेमयोगी वज्र की कुण्डलिनी बलवान होती थी, तब सभी मवेशी उसके आसपास चरने के लिए आ जाया करते थे। कोई मवेशी उसे कान टेढ़े करके बड़े आश्चर्य से व प्रेम से देखने लग जाते थे। कई तो उसे चाटने भी लग जाते थे। वे उसे बार-२ सूंघते, और आनंदित हो जाते। शायद उन्हें कुण्डलिनी के साथ विद्यमान सबलीमेटिड वीर्य की खुशबू भी उसके रोमछिद्रों से निकली हुई महसूस होती थी। कुण्डलिनी जागरण के आसपास (प्राणोत्थान के दौरान) भी पशुओं के संबंध में उसका ऐसा ही अनुभव रहा। कई बार तो खूंटे से बंधीं कमजोर दिल वाली भैंसें उसे अचानक अपने पास पाकर डर सी भी जाती थीं, और फिर अचानक प्यार से सूंघने लग जाती थीं। ज्यादातर ऐसा उन्हीं के साथ होता था, जो क्रोधी, सींग मारने वाली, और दूध देने में आनाकानी करने वाली होती थीं। इसका सीधा सा मतलब है कि वे कुण्डलिनी से कम परिचित होती थीं।

पशुओं के बीच में रहने से कुण्डलिनी विकास

प्रेमयोगी वज्र ने यह महसूस किया कि पशुओं, विशेषकर जंगल में खुले घूमने वाले, पालतु, व गाय जाति के मवेशियों के बीच में रहकर कुण्डलिनी ज्यादा स्पष्ट रूप से विकसित हो जाती थी। पशु स्वभाव से ही प्रकृति प्रेमी होते हैं। प्रकृति में तो हर जगह अद्वैतरूपा कुण्डलिनी विद्यमान है ही। इसलिए कुण्डलिनी प्रेमी को पशुओं से भी प्रेम करना चाहिए।

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