इसाई धर्म में कुण्डलिनी

कुण्डलिनी और होली स्पिरिट एक ही वस्तु-विशेष के दो नाम हैं। इसाई धर्म में होली स्पिरिट के साथ बैप्टिस्म का वर्णन आता है। इसी तरह हिन्दू धर्म में कुण्डलिनी की क्रियाशीलता व जागरण का वर्णन आता है। मैं अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि होली स्पिरिट व कुण्डलिनी, दोनों एक ही चीज को दर्शा रहे हैं। इस बात को हम निम्नलिखित वैज्ञानिक तर्कों से भी सिद्ध कर सकते हैं।

होली स्पिरिट को ईश्वर की चलायमान शक्ति कहा गया है। इसी तरह कुण्डलिनी को भी जीवनी शक्ति कहा गया है। जैसे ईश्वर अपनी शक्ति को होली स्पिरिट के रूप में किसी भी स्थान पर प्रोजेक्ट करके उस शक्ति से अपनी इच्छा पूरी करवाता है, उसी तरह वह कुण्डलिनी के माध्यम से भी अपनी शुभ इच्छा पूरी करवाता है।

जैसे होली स्पिरिट को सांस, हवा, जीवन-धारियों में सबसे महत्त्वपूर्ण या प्राणशक्ति, देवता या फरिश्ते के रूप में पर्सोनीफाईड आदि नाम दिए गए हैं; उसी तरह से कुण्डलिनी को भी ये सभी नाम दिए गए हैं। जिस तरह होली स्पिरिट को गॉड का हाथ या अंगुली कहा गया है, उसी तरह कुण्डलिनी शक्ति को भी भगवान् शिव का क्रियात्मक अंश या आधा शरीर कहा गया है।

इसाई धर्म में कहा गया है कि गॉड अपनी होली स्पिरिट की सहायता से बहुत से महान कार्य करता व करवाता है। उदाहरण के लिए, सृष्टि का निर्माण, बाईबल की रचना, पुराने समय के महान लोगों व उपदेशकों के द्वारा किए गए आश्चर्यजनक काम। इसी तरह से कुण्डलिनी भी महान कार्य करती व करवाती है। इसी धर्म के अनुसार होली स्पिरिट किसी मानव-रूप में नहीं है, परन्तु उसे अन्य चीजों की तरह मानवीकृत किया गया है। इसी तरह कुण्डलिनी को भी एक देवी या सर्पिणी का रूप दिया गया है, हालांकि इसका कोई भौतिक रूप नहीं है।

होली स्पिरिट एक सहायक है, जिसे क्रिस्ट के नाम से भेजा गया है, जो क्रिस्ट के फोलोवर्स को सभी चीजें सिखाएगी, और उन्हें क्रिस्ट की टीचिंग्स की याद दिलाएगी। इसका अर्थ है कि क्रिस्ट का नाम जपने से मन में क्रिस्ट की छवि बस जाएगी, जो होली स्पिरिट बन जाएगी। कुण्डलिनी भी तो इसी तरह गुरु, देवता आदि के ध्यान से विकसित होती है।

होली स्पिरिट सिखाती है कि क्रिस्ट वास्तव में कौन है। अर्थात होली स्पिरिट अद्वैत का साक्षात्कार करवाती है। क्रिस्ट का रूप भी अद्वैतवान ही है। ऐसा ही अद्वैत कुण्डलिनी से भी तो उत्पन्न होता है।

होली स्पिरिट बाईबल को समझना आसान कर देती है। होली स्पिरिट वही सिखाती है, जो बाईबल में है। होली स्पिरिट बाईबल का स्मरण करवाती है। इसी तरह का काम कुण्डलिनी से भी होता है, व उसको जान लेने से भी सभी धार्मिक ग्रन्थ स्वयं ही, बिना पढ़े ही जाने हुए बन जाते हैं।

होली स्पिरिट पापों से लड़ने की शक्ति देती है। इसी तरह, कुण्डलिनी भी पुराने पापों को नष्ट करती है, और नए पापों को पनपने नहीं देती। होली स्पिरिट को प्राप्त करने वाला आदमी स्पिरिट में ही स्थित रहता है, और माँसमय शरीर की लिप्सा को पूरा नहीं करता। इसका मतलब है कि वह ननड्यूल व अनासक्त हो जाता है। कुण्डलिनी भी आदमी को अद्वैतशील व अनासक्त बना देती है। होली स्पिरिट भी कुण्डलिनी की तरह ही हमारे दिल में रहना चाहती है। इसका अर्थ है कि दोनों से ही बहुत गहरा प्यार हो जाता है, क्योंकि दोनों की याद निरंतर बनी रहती है। होली स्पिरिट व कुण्डलिनी, दोनों ही हमारा मार्गदर्शन करती हैं।

होली स्पिरिट या कुण्डलिनी बहुत बड़े बोझ व प्रतिकूलता को भी सहने की शक्ति देती है। दोनों ही नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर ले जाती हैं, तथा दोनों से पड़ौसी खुश रहते हैं। हिन्दू-ग्रंथों में भी आता है कि कुण्डलिनी-योगी के सभी लोग प्रेमी मित्र बन जाते हैं, कोई उसका शत्रु नहीं रहता।

वाक इन स्पिरिट का अर्थ है कि डैविल द्वारा आप मिसगाईड न किए जाएं, और हमेशा होली स्पिरिट के आज्ञाकारी बने रहें। इसी तरह कुण्डलिनी-योगी के लिए भी निरंतर कुण्डलिनी-ध्यान करना जरूरी माना गया है।

होली स्पिरिट में चलते रहने के वही लाभ मिलते हैं, जो कुण्डलिनी से उत्पन्न रूपांतरण से मिलते हैं। गॉड ने हमें डर की स्पिरिट (सामान्य द्वैतपूर्ण सोच) नहीं दी है, अपितु शक्ति, प्रेम, व स्वस्थ मन (अद्वैतपूर्ण व अनासक्त भाव) की स्पिरिट दी है। कुण्डलिनीयोग भी यही कहता है।

होली स्पिरिट के प्रवेश का अनुभव भी कुण्डलिनी-जागरण के अनुभव के सामान हो सकता है। दोनों के अनुभव रहस्यात्मक हैं। उदाहरण के लिए, पूरे शरीर में एक करंट के या सुनहरे जल के दौड़ने के साथ अनंत ख़ुशी का अनुभव। गिफ्ट ऑफ़ टंग भी प्राप्त हो सकता है। यह कुण्डलिनीयोग की वाक्-सिद्धि की तरह ही है, जिसमें कही गई बात सच हो जाती है। कुण्डलिनी के एक्टिवेशन की तरह ही होली स्पिरिट का एक्टिवेशन साईलेंट रूप में भी हो सकता है।

अब होली स्पिरिट के बैप्टिस्म व कुण्डलिनी जागरण के लिए जिम्मेदार कारणों के बीच समानता पर विचार करते हैं। जब कोई अपने अपराध पर पश्चाताप करता है, तब होली स्पिरिट एक्टिवेट हो जाती है। योग के अनुसार भी जब कोई आदमी अपने बीते जीवन को अपनी यादों में बार-२ साक्षीभाव के साथ उजागर करता है, तब स्वयं ही अच्छा पश्चाताप हो जाता है। उससे कुण्डलिनी क्रियाशील हो जाती है। जब कोई अपने को गॉड या क्रिस्ट के समर्पित कर देता है, तब होली स्पिरिट एक्टिवेट हो जाती है। योग में भी ईश्वर-समर्पण व कुण्डलिनी के प्रति समर्पण को सबसे अधिक महत्त्व दिया गया है।

यहां तक कि भगवान या देवता को याद करने से भी होली स्पिरिट या कुंडलिनी सक्रिय हो जाती है। मैंने हमेशा खुद इसको स्पष्ट रूप से अनुभव किया है। जब भी मैंने शरीरविज्ञान दर्शन की मदद से अद्वैतवादी होने की कोशिश की है, तब-2 मुझे कुंडलिनी का अनुभव हुआ है। ईश्वर अद्वैत का ही एक आधिकारिक नाम है। दोनों नाम एक ही चीज को दर्शाते हैं। मैं पहले से ही अनुभवात्मक रूप से साबित कर चुका हूं कि अद्वैत और कुंडलिनी हमेशा साथ-2 रहते हैं। यह वह इसाई धर्म-सम्मत बिंदु है, जहां से ईश्वर और पवित्र आत्मा (होली स्पिरिट/कुण्डलिनी) के बीच संबंध उपजा है। इसके अतिरिक्त, मैंने खुद भी अनुभव किया है कि अगर किसी भी चीज को बार-बार याद किया जाता है, तो वह चीज कुंडलिनी बन जाती है। उसी आधार पर, ईसा मसीह और बाइबल को बार-बार याद करने से वे पवित्र आत्मा / होली स्पिरिट के रूप में उपलब्ध हो जाते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि पवित्र आत्मा वही सिखाती है, जैसा कि ईसा मसीह और बाइबल ने सिखाया है, क्योंकि ये तीनों एकसमान ही हैं। उसी प्रकार, गुरु, देवता, या वेद-पुराणों का स्मरण करने से वे कुंडलिनी के रूप में प्रकट हो जाते हैं।

होली स्पिरिट को प्राप्त करने के लिए नया जन्म लेना पड़ता है। इसी तरह कुण्डलिनी को क्रियाशील करने के लिए योग-साधना के द्वारा रूपांतरित होना पड़ता है। नया जन्म क्रिस्ट से सम्बंधित होना चाहिए। इसका मतलब यह है कि योग के अनुसार रूपांतरण सकारात्मक होना चाहिए, नकारात्मक नहीं। इसका यह अर्थ भी है कि घर में शुरू से लेकर आध्यात्मिक माहौल होना चाहिए। वैसे भी कुण्डलिनी-जागरण के बाद पुनर्जन्म की तरह रूपांतरण होता है। ब्रेन में नए सरकट बनते हैं।

होली स्पिरिट की आज्ञा को मानना चाहिए। यह कुण्डलिनी योग के महत्त्व को रेखांकित करता है। जो योगी कुण्डलिनीयोग के माध्यम से कुण्डलिनी का बारम्बार स्मरण कर रहा है, वह उसकी आज्ञा का पालन करने के लिए हरदम तैयार ही तो है। होली स्पिरिट की प्राप्ति के लिए बिलीव करना अति आवश्यक है। कुण्डलिनीयोग के माध्यम से कुण्डलिनी के निरंतर स्मरण का मतलब ही यह है कि योगी का कुण्डलिनी के प्रति अपार विश्वास है।

होली स्पिरिट में बैप्टिस्म या सैल्वेशन के प्रत्येक मामले में ‘स्पीकिंग ऑफ़ टंग’ की प्राप्ति नहीं होती। यह ऐसा ही है, जैसे कि कुण्डलिनी जागरण व मोक्ष के लिए सिद्धियाँ जरूरी नहीं हैं।

अब हम कुण्डलिनी व होली स्पिरिट की एकरूपता का विरोध करने वाली बातों पर विचार करते हैं। होली स्पिरिट बाहर से आती है, परन्तु कुण्डलिनी शरीर के अन्दर ही होती है। ऐसा इसलिए है ताकि क्रिश्चियनिटी में योग के प्रसार पर रोक लग सके। योग का दुरुपयोग हो सकता है, जिस कारण उससे कर्महीनता व आलस्य का प्रसार हो सकता है। यह भी संभव है कि आत्मज्ञान व उस जैसे अनुभव को ही होली स्पिरिट का प्रवेश कहा गया हो। आत्मज्ञान बाहर से अर्थात ईश्वर से आता है, जबकि कुण्डलिनी-जागरण अपने अन्दर के प्रयास से उपलब्ध होता है। आत्मज्ञान के बाद कुण्डलिनी या होली स्पिरिट स्वयं ही विकसित हो जाती है, और निरंतर बनी रहती है। प्रेमयोगी वज्र के साथ भी ऐसा ही हुआ था। इसी तरह, ईश्वर से प्रार्थना व उसके प्रति समर्पण से कई प्रकार के अलौकिक अनुभव होते हैं, जैसे कि पूर्वोक्तानुसार शरीर में बहते हुए करंट या प्रकाश की नदी का अनुभव। ऐसे अनुभवों से भी कुण्डलिनी या होली स्पिरिट क्रियाशील हो जाती है।

मानवीय कर्म व प्रेम से कुण्डलिनी या होली स्पिरिट शरीर के अन्दर प्रविष्ट होती है। तभी तो इसाई धर्म में मानवता व प्रेम पर सर्वाधिक बल दिया गया है।

साथ में, ईसाई धर्म में 12 फलों वाले जीवन-वृक्ष का उल्लेख है। यह फ्रक्टिफाइड ट्री 7-12 चक्रों के साथ रीढ़ की हड्डी ही है।

क्रिश्चियनिटी में गॉड व सृष्टि के बीच में द्वैत का भाव है। ऐसा केवल इसलिए है ताकि गॉड को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध किया जा सके, जिससे उसमें मजबूत विश्वास पैदा हो जाए। हिंदू धर्म भी यह कहता है कि भगवान इस दुनिया के समान है, और साथ ही अलग भी है। वास्तव में अद्वैत ही सत्य है। क्योंकि जो अच्छी आदतें होली स्पिरिट के बैप्टिस्म के बाद विकसित होती हैं, वे केवल अद्वैत से ही उत्पन्न होती हैं।

कई लोग सोचते हैं कि योग में क्रिश्चियनीटी की तरह इविल स्पिरिट नहीं है। परन्तु यह सत्य नहीं है, क्योंकि योग में भी ‘माया’ नाम से इविल स्पिरिट को स्वीकार किया गया है, जो योगी को साधना व शुभ प्रयासों से विचलित करती रहती है।

वास्तव में चीज एक ही है, जिसे हम ऑब्जेक्ट ऑफ़ मेडिटेशन या ध्येय वस्तु कहते हैं। इसाई धर्म में इसे प्राकृतिक, सांसारिक व साधारण-संक्षिप्त रूप में बखान किया गया है; जबकि हिन्दू धर्म में त्यागपूर्णता, कृत्रिमता व दार्शनिक साज-सज्जा के साथ। परन्तु दुर्भाग्य से बहुत से लोग इस दार्शनिक विस्तार में असली, व्यावहारिक, व मूल वस्तु को भूल जाते हैं। इससे धर्मों में विभिन्नता प्रतीत होती है, परन्तु वास्तव में सभी धर्म मूल रूप से एकसमान हैं, और सभी मानवता व प्रेम के पक्ष में हैं।

अब मैं इसाई धर्म व हिंदु धर्म के मिश्रण के बारे में बात करता हूँ। पहले आदमी इसाई धर्म की नीति के अनुसार कर्मयोग से अपनी कुण्डलिनी को विकसित करे। फिर जब उसकी उम्र बढ़ जाए, वह मानवीय रूप से संसार को समृद्ध कर ले, तथा कुण्डलिनी में निपुण हो जाए; तब उसकी पदोन्नति कुण्डलिनीयोग में हो जाए। तब वह समर्पित व बैठकपूर्ण कुण्डलिनीयोग पर अधिक ध्यान दे, ताकि उसकी कुण्डलिनी और अधिक परिपक्व होकर जागृत हो जाए। प्रेमयोगी वज्र ने भी ईश्वरीय प्रेरणा से ऐसा ही किया था, जिससे उसे अतिशीघ्र कुण्डलिनीजागरण का अनुभव हो सका था। इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि सभी धर्मों में वह सभी कुछ है, जो अन्य धर्मों में भी है। कई धर्मों में उनका संकेतों में वर्णन है, तो कई धर्मों में विस्तार से।

यदि आपने इस लेख/पोस्ट को पसंद किया तो कृपया “लाईक” बटन को क्लिक करें, इसे शेयर करें, इस वार्तालाप/ब्लॉग को अनुसृत/फॉलो करें, व साथ में अपना विद्युतसंवाद पता/ई-मेल एड्रेस भी दर्ज करें, ताकि इस ब्लॉग के सभी नए लेख एकदम से सीधे आपतक पहुंच सकें। कमेन्ट सैक्शन में अपनी राय जाहिर करना न भूलें।

Please click on this link to view this post in English (kundalini in christianity)

देवपूजा में कुंडलिनी

सभी धार्मिक गतिविधियाँ कुण्डलिनी में वैसे ही समा जाती हैं, जैसे नदियाँ समुद्र में। जब हम किसी देवी-देवता की पूजा कर रहे होते हैं, तब हम अप्रत्यक्ष रूप से कुण्डलिनी की ही पूजा कर रहे होते हैं। शरीरविज्ञान दर्शन के अनुसार देवता की मूर्ति, चित्र आदि के रूप में स्थित मानव-देह में अद्वैतशाली देहपुरुष विद्यमान होते हैं। अतः देवता की पूजा से उनकी पूजा स्वतः ही हो जाती है। उससे पूजा करने वाले व्यक्ति के मन में अद्वैतभाव पुष्ट हो जाता है। शरीरविज्ञान दर्शन के अनुसार यह सिद्धांत है कि कुण्डलिनी व अद्वैत साथ-२ रहते हैं। अतः देवपूजन से कुण्डलिनी-पूजन स्वयं ही हो जाता है, जिससे कुण्डलिनी क्रियाशील होकर विकसित होती रहती है, और कभी भी अनुकूल परिस्थितियों को पाकर जागृत भी हो सकती है।

यदि हम देव-मूर्ति में देहपुरुषों की सत्ता को न भी मानें, तब भी कोई बात नहीं। क्योंकि प्रकृति की सभी चीजें जिन्हें हम जड़ कहते हैं, वे जड़ (निर्जीव) नहीं, अपितु अद्वैतभाव के साथ चेतन (सजीव) होती हैं। प्रकृति के सभी अणु-परमाणु या मूलकण मूर्ति में भी विद्यमान होते हैं। अतः देव-मूर्ति के पूजन से सम्पूर्ण अद्वैतमयी प्रकृति की पूजा स्वयं ही हो जाती है। देहपुरुष की सत्ता की वैज्ञानिक कल्पना तो सम्पूर्ण प्रकृति व मानवाकार मूर्ति के बीच में पूर्ण समानता को प्रदर्शित करने के लिए ही की गई है। इससे अद्वैतभाव की प्रचंडता भी बढ़ जाती है।

जैसे ही मूर्ति-पूजन के साथ कुण्डलिनी प्रकट हो जाती है, तथा पूजन व कुण्डलिनी के बीच के सम्बन्ध का तनिक विचार कर लिया जाता है, वैसे ही पूजन पर ध्यान देने से वह ध्यान कुण्डलिनी को स्वयं ही लगता रहता है। उससे कुण्डलिनी उत्तरोत्तर चमकती रहती है। उदाहरण के लिए, देव-मूर्ति के सामने घंटी बजाने से व घंटी की आवाज पर ध्यान लगाने से, व ऐसा समझने से कि वह आवाज देवमूर्ति में स्थित कुण्डलिनी की सेवा कर रही है, स्वयं ही बीच-२ में कुण्डलिनी पर ध्यान लगता रहता है। ऐसा ही तब भी होता है, जब पितरों का पूजन किया जा रहा होता है। क्योंकि पितरों की देह भी देवता या प्रकृति की तरह शुद्ध, निर्विकार व अद्वैतवान होती है।

इसका अर्थ है कि जिसे कुण्डलिनी का ज्ञान नहीं है, उसे पूजा का सम्पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता। एक कुण्डलिनी-योगी ही उत्तम प्रकार का पुजारी सिद्ध हो सकता है।

यदि किसी के मन में कुण्डलिनी नहीं बनी हुई है, तो उसके द्वारा की गई पूजा उलटी भी पड़ सकती है। पूजा से उसके मन में चित्र-विचित्र प्रकार के विचार उठेंगे, क्योंकि पूजा से शान्ति व मानसिक शक्ति प्राप्त होती है। इससे पूजा की शक्ति घटिया किस्म के विचारों को भी मिल सकती है, जो हानि पहुंचा सकते हैं। जो पूजा-शक्ति कुण्डलिनी-रूपी एकाकी व लाभदायक विचार को पुष्ट कर सकती है, वह विचारों के हानिकारक झमेले को भी पुष्ट कर सकती है। इसीलिए कहते हैं कि पुजारी या गुरु का योग्य होना बहुत जरूरी है।

मैं अपने दादा के साथ लोगों के घरों में वैदिक पूजा-पाठ कराने जाया करता था। उस पूजा से मेरी पहले से विद्यमान तांत्रिक कुण्डलिनी बहुत अधिक बलवान हो जाया करती थी। उससे मुझे बहुत अधिक आनंद के साथ भरपूर सकारात्मक शक्ति प्राप्त होती थी। वह शक्ति वैसी ही यजमान को भी प्राप्त हो जाया करती थी, क्योंकि वे मेरे दादा के साथ मेरे प्रति भी प्रेमभाव सहित आदर-बुद्धि व सेवाभाव रख रहे होते थे।

इसी तरह प्रत्येक कर्म भी बड़ी आसानी से पूजा बन सकता है, यदि शरीरविज्ञान दर्शन के अनुसार यह सत्य सिद्धांत समझा जाए कि प्रत्येक कर्म अद्वैतशाली देहपुरुष की प्रसन्नता के लिए ही किया जाता है।

यदि आपने इस लेख/पोस्ट को पसंद किया तो कृपया “लाईक” बटन को क्लिक करें, इसे शेयर करें, इस वार्तालाप/ब्लॉग को अनुसृत/फॉलो करें, व साथ में अपना विद्युतसंवाद पता/ई-मेल एड्रेस भी दर्ज करें, ताकि इस ब्लॉग के सभी नए लेख एकदम से सीधे आपतक पहुंच सकें। कमेन्ट सैक्शन में अपनी राय जाहिर करना न भूलें।

Please click on this link to view this post in English (Kundalini in worship)

कुण्डलिनी व मूर्तिपूजा के बीच में परस्पर सम्बन्ध

कुण्डलिनी को क्रियाशील व जागृत करने के लिए कुण्डलिनी के साथ बहुत लम्बे समय तक सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध बनाना पड़ता है। अधिकांशतः ऐसा एक ही जीवनकाल में संभव नहीं हो पाता। इसलिए आवश्यक है कि कुण्डलिनी के स्मरण वाला संस्कार एक आदमी को उसके जन्म से ही मिल जाए। यहाँ तक कि जब वह माता के गर्भ में हो, तभी से मिलना शुरू हो जाए। इसको संभव बनाने के लिए ही इष्टदेव को कल्पित किया गया है। वह कल्पित रूप सदा से सभी के लिए एक जैसा होता है। इससे उस इष्टदेव को मानने वाले परिवार में उस इष्टदेव के स्मरण से सम्बंधित संस्कार वंश परम्परा के साथ पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ता रहता है। इसीलिए शैव सम्प्रदाय के लोगों के लिए शिव के रूप का ध्यान करना आसान हो जाता है। उसी ध्यान-शक्ति से एक शैव के मन में बसने वाला शिव उसकी कुण्डलिनी बन जाता है, जो अंततः कुण्डलिनी-जागरण के रूप में जीवंत भी हो सकता है। यदि दूरदर्शी ऋषियों के द्वारा शिव को निश्चित रूप न दिया गया होता, तो शिव का ध्यान उत्तरोत्तर न बढ़कर बार-२ टूटता रहता।

मान लो, किसी आदमी नि शिव को जटाधारी माना होता, और उसके पुत्र ने शिव को जटाहीन माना होता, तो क्या होता? वैसे में पिता के द्वारा अर्जित ध्यान पुत्र को प्राप्त न होता। वह अपना ध्यान स्वयं ही शुरू से इकट्ठा करता, जिससे उसे बहुत थोड़ा ही लाभ मिलता। उसे जो लाभ मिलता, वह यह होता कि उससे उसके जीवन में अल्प मात्रा में ही अद्वैत व अनासक्ति-भाव उत्पन्न होते। उससे प्रचंड अनासक्ति व अद्वैत के साथ कुण्डलिनी-जागरण न मिलता।

देवताओं में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण देव शंकर हैं। इसीलिए उन्हें देवों के देव महादेव कहा जाता है। उन्हें एक निश्चित रूप प्रदान किया गया है। उनके गले में सर्प की माला है। उनके सिर पर लम्बी-२ जटाएं हैं। उनके मस्तक पर आधा चन्द्रमा विराजमान है। उनकी जटाओं से गंगा नदी निकल रही है। उनके माथे पर तीन समानांतर रेखाओं के रूप में तिलक है, जिसे त्रिपुंड कहा जाता है। कई जगह उनके भ्रूमध्य में खुला हुआ तीसरा नेत्र भी दिखाया जाता है। वे भस्म से लिपटे हुए हैं। उनके एक हाथ में त्रिशूल है, और एक हाथ में डमरू है। वे बैल की सवारी करते हैं। वे बाघ का चर्म ही ओढ़ते हैं, अन्य कोई वस्त्र नहीं पहनते हैं। वे सुन्दर हैं। उनके नयन-नक्श संतुलित व त्रुटिरहित हैं। उनका मुख कान्तिमान व आकर्षक है। उनका शरीर सुडोल व संतुलित है। वे मध्यम गोरे रंग के हैं। उनकी चाल-ढाल अद्वैत, अनासक्ति, व वैराग्य से भरी हुई है।

इसी तरह अन्य देवी-देवताओं को भी निश्चित रूप व आकार प्रदान किए गए हैं। साथ में, उन्हें निश्चित भाव-भंगिमाएं व आचार-विचार भी प्रदान किए गए हैं। गणेश को मूषक की सवारी करने वाला, लड्डू खाने वाला, व हाथी के जैसे मुख वाला बताया गया है। इसी तरह, नौ देवियों को भी भिन्न-२ परिचय दिए गए हैं।

इसी सिद्धांत के अनुसार अपने पूर्वज या पारिवारिक वृद्ध (पितामह आदि) को गुरु बनाना अधिक लाभप्रद है। क्योंकि एक व्यक्ति उनके साथ जन्म से लेकर परिचित व सौहार्दपूर्ण बना होता है, इसलिए उन्हें मन में बैठाना सर्वाधिक सरल होता है। वही मानसिक मूर्ति फिर लगातार के अभ्यास से कुण्डलिनी बन कर क्रियाशील व जागृत हो सकती है।

देव-मूर्ति पुराने मित्रों, परिचितों व पूर्वजों से भी जुड़ी होती है। जब कोई उन चिर परिचितों की समकालीन देव-मूर्ति से पुनः संपर्क साधता है, तब उन चिर-परिचितों की याद पुनः ताजा हो जाती है। उनमें से सर्वाधिक प्रभावशाली स्मरण बार-२ के अभ्यास से स्थायी स्मरण (कुण्डलिनी) के रूप में मन में उभर सकता है। विज्ञान की भाषा में इसे कंडीशंड रिफ्लेक्स (conditioned reflex) कहते हैं। इसके अनुसार जब दो वस्तुएं मन में एकसाथ बैठ गई हों, तो दोनों वस्तुएं आपस में जुड़ जाती हैं। जब कभी एक वस्तु का स्मरण किया जाता है, तो उससे जुड़ी हुई दूसरी वस्तु का स्मरण स्वयं ही हो जाता है। यह उस जैविक घटना की तरह है, जब एक गाय अपने बछड़े को देखकर अपना दूध छोड़ने लगती है। इस प्रकार से देव-मूर्तियाँ सामाजिक कंडिशनर (social conditioner) या सामाजिक संपर्कसूत्र (social link) का काम करती हैं। अपने प्रिय व परिचित जनों की याद बनाए रखने में ये अहम् भूमिका निभाती हैं। यही बात अन्य सभी निर्धारित किए गए धार्मिक विधि-विधानों के सम्बन्ध में भी लागू होती है। यद्यपि देव-मूर्तियाँ इनमें मुख्य हैं, क्योंकि वे मानवाकार, सुन्दर, सहज सुलभ, सर्वसुलभ, व आकर्षक होती हैं।

अगर किसी को मूर्ति पूजा से प्रत्यक्ष लाभ नहीं दिखता है, तो भी इसकी मदद से ध्यान और गहरी भावना की एक अच्छी आदत पड़ जाती है। यह मानवता के समग्र विकास में मदद करता है। यह सब प्रेमयोगी वज्र के साथ हुआ, तभी तो वह क्षणिक आत्मज्ञान व क्षणिक कुण्डलिनी जागरण को अनुभव कर पाया। दरअसल, वैदिक काल में देवताओं को उनके शुद्ध प्राकृतिक रूप में पूजा जाता था। बाद में, इनमें से कई देवताओं को मानव समाज में चल रहे सामाजिक सुधारों के साथ मानव रूप दिया गया, जो ज्ञान-विज्ञान सम्मत भी है।

प्राकृतिक चीजें अद्वैतशाली व अनासक्त होती हैं, तभी तो प्रकृति के बीच में आनंददायक शान्ति का अनुभव होता है। वास्तव में, देव-मूर्तियाँ घर के सीमित स्थान के लिए निर्मित किए गए, विराट प्रकृति के सूक्ष्म रूप ही हैं। शास्त्रों के वचनों से व वैज्ञानिक दर्शन “शरीरविज्ञान दर्शन” से भी यह प्रमाणित ही है कि जो कुछ भी इस बाह्य व विराट प्रकृति में है, वह सभी कुछ इस मानव शरीर के अन्दर भी वैसा ही है।

अब बात आती है, धर्म-परिवर्तन के बारे में। उपरोक्त तथ्यों के आधार पर तो अपने धर्म का त्याग कभी नहीं करना चाहिए। क्योंकि धर्म परिवर्तन करने से अपने कुलधर्म से जुड़ी हुई चिर-परिचित लोगों व वस्तुओं की यादें गायब हो जाती हैं, और कुण्डलिनी-विकास का अच्छा अवसर हाथ से छूट जाता है। शास्त्रों में भी आता है, श्रेयो स्वधर्मो विगुणोपि, परधर्मो भयावहः। अर्थात, अपना धर्म कम गुणों वाला होने पर भी कल्याणकारी है, दूसरों का धर्म तो भयावह है। इसका यह अर्थ नहीं है कि कट्टर धार्मिक होना चाहिए, या दूसरे धर्मों को नहीं मानना चाहिए। बल्कि इसका अर्थ है कि सभी मानवीय धर्मों को मानते हुए, अपने धर्म को ही मुख्य बना कर रखना चाहिए। यह ध्यान में रहना चाहिए कि यह बात योग पर लागू नहीं होती, क्योंकि योग कोई विशेष धर्म नहीं है। योग तो एक आध्यात्मिक मनोविज्ञान है, जो सभी धर्मों का एक अभिन्न अंग है।

यदि आपने इस लेख/पोस्ट को पसंद किया तो कृपया “लाईक” बटन को क्लिक करें, इसे शेयर करें, इस वार्तालाप/ब्लॉग को अनुसृत/फॉलो करें, व साथ में अपना विद्युतसंवाद पता/ई-मेल एड्रेस भी दर्ज करें, ताकि इस ब्लॉग के सभी नए लेख एकदम से सीधे आपतक पहुंच सकें। कमेन्ट सैक्शन में अपनी राय जाहिर करना न भूलें।

Please click on this link to view this post in English (Interrelation between Kundalini and idol worship)

होली त्यौहार व तंत्र का आपस में रिश्ता- Tantra versus Holi festival

होली त्यौहार व तंत्र का आपस में रिश्ता (please browse down or click here to view this post in English)

होली है………। सभी मित्रों को होली की बहुत-२ शुभकामनाएँ। “होली” नाम ही तांत्रिक है। “ल” अक्षर को तंत्र में कामप्रधान माना गया है। मूलाधार का बीजाक्षर “लं” है, व उसी का बीजमंत्र “क्लीं” है। दोनों में ही “ल” अक्षर है। मूलाधार चक्र को भी कामप्रधान माना जाता है। प्रेमयोगी वज्र के साथ भी बीजाक्षर से सम्बंधित घटना हुई थी। वह जिस ऑनलाईन कुण्डलिनी-ग्रुप का सदस्य था, उसमें बहुत से लोगों के नाम “ल” अक्षर वाले थे। कई के नाम में तो दो “ल” भी थे। उदाहरण के लिए “ल्लो”, “लीं”, व “लि” आदि। उन “ल” अक्षर के नाम वाले लोगों के साथ ही उसका अधिकाँश वार्तालाप होता था। उससे उसका मूलाधार चक्र अनजाने में ही जागृत हो गया। उससे उसमें तांत्रिक योग की प्रवृत्ति जागृत हुई, जिससे शीघ्र ही उसकी कुण्डलिनी जागृत हो गई। साथ में, उनके चेहरे भी लाल रंग लिए हुए थे। लाल रंग भी कामोत्तेजक माना जाता है। उससे भी प्रेमयोगी वज्र को सहयोग मिला।

उस फोरम पर उसका नाम हृदयेश था। इसका अर्थ है, “हृदय का स्वामी”। एक परिपक्व व स्वस्थ हृदय ही मूलाधार को लम्बे समय तक क्रियाशील रख सकता है। बहुत मेहनती होने के कारण, उसका नाभि-चक्र भी क्रियाशील था। हृदय-चक्र व मूलाधार चक्र, दोनों को शक्ति की बहुत आवश्यकता होती है। नाभि चक्र दोनों के लिए शक्ति की आपूर्ति कर रहा था। इसलिए हम नाभि चक्र को अनाहत चक्र व मूलाधार चक्र को आपस में जोड़ने वाला पुल भी कह सकते हैं।

इसी तरह देवी भागवत पुराण में भी एक कथा आती है कि किसी जंगल में एक व्यक्ति के मुख से किसी भय के कारण अनायास ही बीजाक्षर वाले बोल निकले थे, क्योंकि वह मानसिक रूप से व वाणी से दिव्यांग भी था। उसी बीजाक्षर के बल से उसे देवी सिद्ध हो गई, और वह हर प्रकार से उन्नति करने लगा।

तंत्र के साथ होली के सम्बन्ध को उजागर करने वाला दूसरा कारक लाल रंग है। हम सभी जानते हैं कि होली का मुख्य रंग लाल रंग ही है। यह रंग होली वाला जोश भी पैदा करता है। आपको यह जानकार हैरानी होगी कि जो कुंकुम आम जनजीवन में सर्वाधिक प्रयोग किया जाता है, वह हल्दी ही होता है। 95 भाग हल्दी-चूर्ण को 5 भाग चूने (पानी में घोलकर) के साथ मिलाकर जब छाया में सुखाया जाता है, तब वह सुर्ख लाल हो जाता है। चूने की मात्रा बहुत कम होने से इस तरह से निर्मित कुंकुम शरीर के लिए हानिकारक भी नहीं होता। परन्तु सिन्दूर बहुत भिन्न होता है। वह पारे व सीसे का यौगिक होता है, इसलिए स्वास्थ्य के लिए हानि भी पहुंचा सकता है, यदि ढंग से प्रयोग में न लाया जाए। उसका रंग संतरी होता है। हनुमान के ऊपर लगे हुए लाल रंग को आप सिन्दूर समझें। इसी तरह, गुलाल भी कई रंगों के होते हैं, व प्राकृतिक होते हैं। लाल गुलाब लाली वाले पौधों से, नीले रंग का गुलाल इंडिगो से आदि-२। होली के रंग खुद ही बनाने चाहिए। बाजार में तो अधिकाँश तौर पर सिंथैटिक रंग मिलते हैं, जो शरीर के लिए हानिकारक होते हैं। उपरोक्त कारणों से ही तंत्र के मूलाधार चक्र का रंग भी लाल ही होता है।

होलिका दहन भी तंत्र के अनुसार ही है। हम जानते हैं कि यज्ञादि अनुष्ठान अधिकाँश तौर पर तांत्रिक   होते हैं। यज्ञ में जल रही अग्नि के बीच में तांत्रिक अपनी कुण्डलिनी को अनुभव करता है। इससे उसकी  कुण्डलिनी बहुत पुष्ट हो जाती है, क्योंकि वह अग्नि के तेज से जगमगा जाती है।

होली के दिन एक दूसरे पर सीधे तौर पर व पिचकारी से रंग उड़ेलना भी तंत्र के अनुसार ही है। हम सभी जानते हैं कि सभी को अपने किए हुए  कर्मों का भोग करना ही पड़ता है। तांत्रिक योग से यह प्रक्रिया सरल हो जाती है। उससे फल देने वाले कर्म के संस्कार निरंतर के अभ्यास से इतने क्षीण हो जाते हैं कि या तो वे सीधे ही नष्ट हो जाते हैं, या मामूली सा फल देकर नष्ट हो जाते हैं। होली के रंगों से शरीर का विकृत होना एक प्रकार से पूर्व के किए हुए कुकर्मों से शरीर को दंड मिलना ही है। हो सकता है कि किसी के पिछले कर्मों के अनुसार उसके शरीर को गंभीर चोट लगनी हो। होली के रंग से जब उसका शरीर कुरूप हो जाता है, तो होनी उसे शरीर की क्षति समझ लेती है, जिससे उससे सम्बंधित कुकर्म क्षीण हो जाता है। तांत्रिक योगाभ्यास की अतिरिक्त सहायता से वह नष्ट ही हो जाता है। इसी तरह किसी को पानी में डुबो कर मार सकने वाला कुकर्म पानी की एक पिचकारी मात्र से शांत हो जाता है। होली के दिन चलने वाले हल्के-फुल्के मजाक व वाद-विवाद से भी इसी सिद्धांत के अनुसार ही पिछले कुकर्म शांत हो जाते है। अब ज़रा सोचें, बरसाने की लट्ठमार होली से तो पुराने कुकर्मों का भण्डार ही ढीला पड़ जाता होगा।

अब जो पुरानी कथा है कि होली के दिन प्रहलाद को मारने की मंशा रखने वाली उसकी बहन होलिका स्वयं ही दहन हो गई थी, उसमें वास्तव में हिरण्यकशिपु के कुकर्म को ही होलिका कहा गया है। कहा जाता है कि पिता के कुकर्म पुत्र को भोगने पड़ते हैं। वे कुकर्म (हिरण्यकशिपु की पुत्री व प्रहलाद की बहन के रूप में वर्णित) होली के तांत्रिक प्रभाव से नष्ट हो गए, अर्थात होलिका जल गई।

वास्तव में, होली के दिन चारों ओर कामदेव का तेज विद्यमान होता है, क्योंकि सभी लोग एकसाथ मिलकर काम को बढ़ा रहे होते हैं। उससे मूलाधार चक्र को बहुत बल मिलता है। यह तांत्रिक सिद्धांत है कि मूलाधार की क्रियाशीलता के समय किया गया कोई भी कार्य अनेक गुना फलदायी होता है। तभी तो होली का दिन तांत्रिक सिद्धि के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। अगर उस दिन तंत्रयोगी की कुण्डलिनी न भी जागृत हो पाए, तो भी कुण्डलिनी को बहुत अधिक बल मिलता है। वास्तव में, कुण्डलिनी की क्रियाशीलता को भी उतना ही अहम् माना जाता है, जितना की कुण्डलिनी-जागरण को।

कई लोग होली का प्रारम्भ कृष्ण-राधा के प्रेम से बताते हैं। इसमें तो होली की काम-प्रधानता स्वयं ही सिद्ध हो गई। तंत्र भी तो काम प्रधान ही है।

यदि आपने इस लेख/पोस्ट को पसंद किया तो कृपया इसे शेयर करें, इस वार्तालाप/ब्लॉग को अनुसृत/फॉलो करें, व साथ में अपना विद्युतसंवाद पता/ई-मेल एड्रेस भी दर्ज करें, ताकि इस ब्लॉग के सभी नए लेख एकदम से सीधे आपतक पहुंच सकें। कमेन्ट सैक्शन में अपनी राय जाहिर करना न भूलें।

Tantra versus Holi festival

Holi hai ………. Lots of good luck of Holi to all friends. The name “Holi” is tantric. The letter “L” is considered to be a romantic in Tantra. The seed-syllable of the root chakra is “Lm”, and the seed-mantra of it is “Kleem”. Both have the same letter “L”. Mulaladar chakra is also considered as pro-romantic. There was also an incident related to seed-syllable with Premyogi vajra. He was a member of the online Kundalini-group, in which many people had names containing the alphabet “L”. There were also two “L” in many names. For example, “Llo”, “Lee”, and “li” etc. He had most of his conversations with those people having names bearing “L” in any form. From this, his root chakra was awakened itself. From that, the tendency of tantric sexual activity was awakened in him, so that soon his kundalini awoke. Together, their faces were also red in color. Red color is also considered to be erotic. Premyogi vajra got support from that too.

His name was Hridayesh on that forum. It means “lord of the heart”. A mature and healthy heart can keep the mooladhara active for a long time. Due to being very diligent, his navel-chakra was also functional. Heart-chakra and Muladhadara chakra both require a lot of power. Navel Chakra was supplying power for both. Therefore, we can also call the Naval Chakra as a bridge connecting the Anahata Chakra and Muladhadra Chakra together.

In the same way, in the Goddess Bhagwat Puran, there is a story that in a forest, from the mouth of a person, due to fear, some seed syllables emanated itself, because he was also handicapped mentally and verbally as well. With the help of the same seed syllable, Goddess was pleased, due to which he started progressing in every way.

The second factor to highlight Holi’s relationship with tantra is red color. We all know that Holi’s main color is red color. This color also produces the passion of Holi. You must be surprised to know that the kunkum (sacred red color powder), which is most commonly used in the general life, that is turmeric only. Mix 95 part turmeric powder with five parts lime (dissolved in water) and when it is dried in the shade, then it becomes red. Since the amount of lime is very low, this form made in this way is not harmful to the body. However, vermilion is very different. It is a compound of mercury and lead, hence can also cause harm to the health, if not used in the manner. Its color is orange. Think of the red color shown on the Hanuman as vermilion. Similarly, gulals are also of many colors, and are natural. Red gulal from reddish plants, blue gulal from indigo etc. Holi colors should be made by themselves. In the market, there are mostly synthetic colors, which are harmful to the body. For the above reasons only the color of the root chakra of tantra is red.

Holika Dahan is also according to the tantra. We know that yajna rituals are mostly tantric. Tantric experiences his kundalini in the middle of the fire burning in Yajna. This makes his kundalini very strong, because that is shining with the shine of fire.

On the day of Holi, it is according to the tantra the ritual of coloring directly each other or with water mixed colors. We all know that everybody has to enjoy the deeds done by him. With Tantric Yoga, this process becomes simpler. The mental imprints of the actions that give phala become so weak with the practice of tantric yoga that either these are destroyed directly, or are destroyed by giving slightest phala or results. Being distorted from the colors of Holi, there is a way to get punishment for the body from the pre-existing misdeeds. It may be that according to past deeds someone has to bear serious injuries to his body. When the body becomes deformed with the color of Holi, then it is considered to be the loss of the body, due to which the karma associated with it becomes lose. With the additional help of Tantric Yoga, it is fully destroyed. Similarly, a karma that is able to drown someone through water immersion becomes calm with only one stream of colored water on Holi. According to the same principle, the past misdeeds become calm after the light joke and debate that runs on Holi. Now think, the Lath mar Holi (stick-fight) of Barsana can loosen even the storage of old misdeeds.

Now the old story is that on Holi, his sister Holika, who had the intention to kill her brother Prahlad, had become combusted herself. In reality, misdeeds of his father Hiranyakashipu have been called as Holika. It is said that the son has to suffer the misdeeds of his father. Those misdeeds (described as the daughter of Hiranyakashipu and sister of Prahlad) were destroyed with the tantric influence of Holi that means Holika was burnt.

In fact, the passion and shine of Kamdeva (god of romance) is present all around on the day of Holi, because all people are working together to grow romance. It gives a lot of force to the Mooladhar Chakra. It is the tantric theory that any work undertaken during the activation of the Muladhara is fruitful many folds. Only then is Holi’s day considered as the best for tantric accomplishment. Even if the Kundalini of Tantric Yogi cannot be awakened on that day, then too, Kundalini gets very much strength. In fact, the activity of Kundalini is also considered that much important, as much as its awakening.

Many people think the historical start of Holi with the love of Krishna-Radha. In this, Holi’s romantic nature is itself proved. Tantra is also romantic in nature.

If you liked this post then please share it, and follow this blog while providing your e-mail address, so that all new posts of this blog could reach to you immediately via your e-mail. Do not forget to express your opinion in the comments section.

सभी मित्रों के बीते वर्ष को सहर्ष विदाई व उनको नववर्ष 2019 की बहुत-2 शुभकामनाएं- Nice farewell to all the friends’ last year and many New Year wishes for them

सभी मित्रों के बीते वर्ष को सहर्ष विदाई व उनको नववर्ष की बहुत-2 शुभकामनाएं (please browse down to view this post in English)।

मेरा बीता वर्ष, 2018 निम्न प्रकार का रहा-

अपनी टाटा टियागो कार में लगभग 3000 किलोमीटर का सपरिवार सफ़र तय किया, जिसमें से अधिकाँश उन्नत उच्चमार्गों का सफर था। पीवीआर सिनेमा में 4 हिंदी फिल्में सपरिवार देखीं, 102 नोट आऊट, संजू, हनुमान वर्सस अहिरावना (थ्री डी एनीमेशन) व सिम्बा। मेरे माता-पिता तीर्थधाम यात्रा का जल चढ़ाने कन्याकुमारी / रामेश्वरम गए। अपने पुराने घर का नवीनीकरण करवाया गया। श्री मद्भागवत सप्ताह श्रवण यज्ञ का अनुष्ठान अपने घर में करवाया गया। मेरी पूज्य व वृद्ध पितामही जी का स्वर्गवास हुआ। मेरे बेटे को पहली कक्षा में ए-1 रहने पर पारितोषिक दिया गया। मेरी पत्नी के द्वारा नए सिलाई के प्रशिक्षण-कोर्स का प्रारम्भ किया गया। मुझे क्वोरा टॉप राईटर (क्वोरा शीर्ष लेखक)- 2018 का सम्मान मिला। मेरे द्वारा कुण्डलिनीयोग का प्रतिदिन का 1 घंटे का सुबह का व एक घंटे का सांय का अभ्यास एक दिन के लिए भी नहीं छोड़ा गया। इसके कारण मेरा वर्ष 2017 का कुण्डलिनीजागरण का अनुभव जारी रहा, महान आनंद के साथ। प्रेमयोगी वज्र की सहायता से इस मेजबानी वेबसाईट (https://demystifyingkundalini.com/home-3/) को पूर्णतः विकसित किया। इस वेबसाईट के लिए 139 शेयर, 30 लाईक्स, 4772 वियूस, 3099 विसिटर व 46 फोलोवर मिले। इस वेबसाईट के लिए मैंने लगभग 31 पोस्टें लिखीं व प्रकाशित कीं। प्रेमयोगी वज्र की सहायता से “शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)” नामक पुस्तक लिखी। उसके लिए 13 सशुल्क डाऊनलोड व 80 निःशुल्क डाऊनलोड प्राप्त हुए। उसके लिए अमेजन पर एक सर्वोत्तम रिव्यू / समीक्षा (5 स्टार) भी प्राप्त हुआ। साथ में, उसे गूगल बुक पर भी दो उत्तम व 5 स्टार रिव्यू प्राप्त हुए। दूरदर्शन के कार्यक्रमों में तेनालीरामा, तारक मेहता का उल्टा चश्मा, मैं मायके चली जाऊंगी, रियल्टी शोज व जी न्यूज (मुख्यतः डीएनए) का आनंद उठाया। अपने पोर्टेबल मिनी जेबीएल स्पीकर पर गाना एप के माध्यम से लगभग 2000 मधुर ओनलाईन गाने सुने। काटगढ़ मंदिर व टीला मंदिर के सपरिवार दर्शन किए। अपने किन्डल ई-रीडर पर 3 पुस्तकें पढ़ीं। पोस्ट पढ़ने के लिए धन्यवाद।

यदि आपको इस पोस्ट से कुछ लाभ प्रतीत हुआ, तो कृपया इसके अनुसार तैयार की गई उपरोक्त अनुपम ई-पुस्तक (हिंदी भाषा में, 5 स्टार प्राप्त, सर्वश्रेष्ठ व सर्वपठनीय उत्कृष्ट / अत्युत्तम / अनौखीरूप में निष्पक्षतापूर्वक समीक्षित / रिव्यूड ) को यहाँ क्लिक करके डाऊनलोड करें। यदि मुद्रित पुस्तक ही आपके अनुकूल है, तो भी, क्योंकि इलेक्ट्रोनिक डीवाईसिस / फोन आदि पर पुस्तक का निरीक्षण करने के उपरांत ही उसका मुद्रित-रूप / print version मंगवाना चाहिए, जो इस पुस्तक के लिए इस लिंक पर उपलब्ध है। इस पुस्तक की संक्षिप्त रूप में सम्पूर्ण जानकारी आपको इसी पोस्ट की होस्टिंग वेबसाईट / hosting website पर ही मिल जाएगी। धन्यवाद।

यदि आपने इस लेख/पोस्ट को पसंद किया तो कृपया इस वार्तालाप/ब्लॉग को अनुसृत/फॉलो करें, व साथ में अपना विद्युतसंवाद पता/ई-मेल एड्रेस भी दर्ज करें, ताकि इस ब्लॉग के सभी नए लेख एकदम से सीधे आपतक पहुंच सकें। धन्यवादम।

 

Nice farewell to all the friends’ last year and many New Year wishes for them.

My last year, 2018 was of the following type:

Travelled around 3,000 km in my Tata Tiago car with family, most of which were the journey of advanced highways. In PVR cinema saw 4 Hindi films with family, 102 Not out, Sanju, Hanuman Versus Ahiravana (Three D Animation) and Simmba. My parents went to Kanyakumari / Rameshwaram for carrying water for pilgrimage. My old home was renovated. Shreemad Bhaagvat Shravan Yagna’s week long ritual was performed in my house. My devoted and old grandmother went to heaven. My son was rewarded for being A1 in the first grade. New sewing training-course was started by my wife. I got the Quora Top Writer- the honour of 2018. I did not leave the Kundalini Yoga practice for 1 hour of morning and one hour of evening everyday even for one day. Due to this my experience of KundaliniJagran of 2017 continued, with great bliss. With the help of Premyogi Vajra, this hosted website (https://demystifyingkundalini.com/) was fully developed. For this website, 139 shares, 30 likes, 3099 visitors, 46 followers and 4772 views were obtained. I wrote and published about 31 posts for this website. With the help of Premyogi Vajra, I wrote a book called “Shareervigyaan darshan- ek aadhunik kundalini tantra (ek yogi ki premkatha)”. For that 13 paid downloads and 80 free downloads were received. For that, a great review (5 stars) was also received on Amazon. Along with, two good and 5 star reviews were also obtained on Google book for that. In Doordarshan’s programs, Tenalirama, Tarak Mehta ka Ulta Chashma, main maayake chali jaaoongee, realty shows and Zee news (mainly DNA) were enjoyed well. Two thousands of melodious online songs have been heard through Gaana App on my portable mini JBL speaker. Visiting the Katgarh Temple and the Tila Temple with family by me. Read 3 books on my Kindle e-Reader. Thanks for reading.

If you have found some benefit from this post, please download here the above mentioned e-book (in Hindi language, 5 star rated, reviewed in unbiased way as the best, excellent and must read by everyone) made with steps as told above. If only print version suits you, then too print version should only be got after testing that’s e- version on the electronic devices / phone etc., that is available on this link for this book. You can also find the complete information about this book, both in English as well as Hindi languages on the hosting website of this post. Thank you.

If you liked this post then please follow this blog providing your e-mail address, so that all new posts of this blog could reach to you immediately via your e-mail.

योग से शारीरिक वजन को कैसे नियंत्रण में रखें- How to keep control over body weight through Yoga

योग से शारीरिक वजन को कैसे नियंत्रण में रखें (please browse down or click here to view post in English)

योग के साथ शारीरिक वजन घटता है। यहां तक ​​कि मैंने देखा है कि एक दिन के भारी काम के साथ भी मुझे अपनी पेंट के साथ बेल्ट लगाने की जरूरत महसूस होने लगती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मैं दैनिक योग अभ्यास की आदत रखता हूं। जब मैंने कड़ी मेहनत की, तब उसके साथ किए गए नियमित योग-अभ्यास से मेरी भड़की हुई भूख बहुत कम हो गई। इसलिए उस कड़ी मेहनत के साथ हुई वसा-हानि / fat loss को पुनर्निर्मित / recover नहीं किया गया, जिसके परिणामस्वरूप मेरा वजन घट गया। नियमित योग-अभ्यास के बिना सामान्य लोग भारी काम के बाद बहुत अधिक खाते हैं, इस प्रकार वे अपनी खोई हुई वसा का तुरंत पुनर्निर्माण कर लेते हैं। योग-अभ्यास दैनिक और हमेशा के लिए जारी रखा जाना चाहिए। यदि कोई अपना अभ्यास थोड़े समय के लिए जारी रखता है, जैसे कि यदि 2 महीने के लिए कहें, तो उसे अपने शरीर के वजन में कमी का अनुभव होगा। लेकिन अगर वह उसके बाद व्यायाम करना बंद कर देता है, तो उसकी योग से निर्मित शारीरिक व मानसिक शक्ति के पास भूख को उत्तेजित करने के अलावा अन्य कोई काम नहीं रहता है। इसके कारण उसे बहुत भूख लगती है, और वह बहुत भोजन, खासतौर से उच्च ऊर्जा वाले खाद्य पदार्थों को खाता है। इसके परिणामस्वरूप उसके शरीर की वसा का पर्याप्त निर्माण हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप उसके शरीर के वजन में एकाएक वृद्धि होती है, जो उसके पहले के मूल वजन को भी पार कर सकती है। तो निरंतर अभ्यास हमेशा जारी रखा जाना चाहिए। यह एक वैज्ञानिक और अनुभव से साबित तथ्य है कि खिंचाव वाली कसरतों / stretching exercises के अभ्यास से थोड़ी-बहुत कैलोरी जल जाती है। यद्यपि योग के अभ्यास से बड़ी मात्रा में कैलोरी जलाई नहीं जाती है, फिर भी ये अभ्यास शरीर को फिट, स्वस्थ और लचीला रखते हैं। यह किसी भी समय किसी भी प्रकार के साधारण या कठिन शारीरिक कार्य को कामयाबी व आसानी के साथ शुरू करने में मदद करता है, और व्यायामशाला के अभ्यास को भी अधिक कारगर बनाता है। इसके अलावा, यह पूरे शरीर में उचित अनुपात में रक्त के समान परिसंचरण में भी मदद करता है। इससे यह शरीर के रिमोट भंडारगृहों में जमा वसा की आसान निकासी में मदद करता है। उससे सभी कोशिकाओं को ऊर्जा के मुख्य स्रोत के रूप में वसा उपलब्ध हो जाती है। इसलिए शरीर भूख की कमी के लिए ऊर्जा की कमी का संदेश नहीं भेजता है, जिसके परिणामस्वरूप भारी भूख के बावजूद भारी भूख की रोकथाम होती है। परंतु आम लोगों में भारी काम के एकदम बाद भारी भूख भड़क जाती है, जिससे वे अपने खोए हुए वजन की भरपाई एकदम से कर लेते हैं। योग कुछ खास नहीं है, बल्कि भौतिक व्यायाम, सांस लेने और केंद्रित एकाग्रता को बढ़ाने का एक सहक्रियात्मक संयोजन है। फोकसड एकाग्रता / focused concentration इसके लिए विचारों के लिए नियंत्रक वाल्व / controlling valve के रूप में काम करती है, अराजक विचारों की अचानक भीड़ को रोकती है, जिससे इस प्रकार पेरानोइया/ paranoia और दिमाग को झूलने / mind swinging से रोकती है। जब अवचेतन मन में संचित विचार बहुत उत्तेजित हो जाते हैं, तो उन्हें दिमाग के अंदर ध्यान की केंद्रित छवि द्वारा धीरे-धीरे और सुरक्षित रूप से मुक्त करके छोड़ा जाता रहता है। साथ में, उन विचारों को बाँझ और गैर-हानिकारक बना दिया जाता है, या दूसरे शब्दों में कहें तो दृढ़ता से उत्तेजित विचार ध्यान की कुण्डलिनी छवि की कंपनी के कारण स्वयं ही शुद्ध हो जाते हैं। यह छवि दिन-प्रतिदिन की सांसारिक गतिविधियों से उत्पन्न होने वाली अराजक मानसिक गतिविधियों पर भी जांच रखती है। इसके कारण योग-अभ्यास के लिए एक जुनूनी शौक सा उत्पन्न हो जाता है, और इसे दैनिक कार्यक्रम से कभी भी गायब नहीं होने देता है। कुंडलिनी छवि पर केन्द्रित एकाग्रता के बिना योग-अभ्यास के साथ, योग अभ्यास के लिए शौक जल्द ही खो जाता है, और विभिन्न छिपे हुए विचारों की अराजकता की वजह से दैनिक क्रियाकलाप भी गंभीर रूप से पीड़ित हो जाते हैं।

तांत्रिक तकनीक मानसिक कुंडलिनी छवि को मजबूत करने और इस तरह से योग के प्रति लगन को बढ़ाने के लिए एक और गूढ़ चाल है। इसके परिणामस्वरूप पूरे श्वास में वृद्धि होती है, जिससे पूरे शरीर में पोषक तत्वों से समृद्ध और अच्छी तरह से ऑक्सीजनयुक्त रक्त की आपूर्ति में वृद्धि हो जाती है। इससे यह शरीर के वजन पर भी जांच रखता है। दरअसल तंत्र प्राचीन भारतीय आध्यात्मिकता से अलग कोई स्वतंत्र रूप का अनुशासन नहीं है। तभी तो वेद-शास्त्रों में इसका कम ही वर्णन आता है, जिससे इस रहस्य से अनभिज्ञ लोग महान तंत्र की सत्ता को ही नकारने लगते हैं। यह आत्मजागृति की ओर एक प्राकृतिक और सहज दौड़ / प्रक्रिया ही है। यह तो केवल विभिन्न आध्यात्मिक प्रयासों से पुष्ट की गई कुण्डलिनी को जागरण के लिए अंतिम छलांग / escape velocity ही देता है। यदि किसी की बुद्धि के भीतर कोई आध्यात्मिक उद्देश्य और आध्यात्मिक उपलब्धि नहीं है, तो अराजक बाहरी दुनिया के अंदर उपयोग में आ जाने के अलावा तांत्रिक शक्ति के लिए अन्य कोई रास्ता नहीं है। इसका मतलब है कि तांत्रिक तकनीक के लिए आवेदन से पहले कुंडलिनी छवि किसी के दिमाग में पर्याप्त रूप से मजबूत होनी चाहिए। तंत्र तो जागने के लिए कुंडलिनी को आवश्यक और अंतिम भागने की गति ही प्रदान करता है। यह आम बात भी सच है कि गुरु तांत्रिक साधना के साथ अवश्य होना चाहिए। वह गुरु दृढ़ता से चिपकने वाली मानसिक कुंडलिनी छवि के अलावा कुछ विशेष नहीं है। यही कारण है कि बौद्ध-ध्यान में, कई वर्षों के सरल सांद्रता-ध्यान के बाद ही एक योगी को तांत्रिक साधना लेने की अनुमति दी जाती है। लेकिन आज बौद्ध लोग, विषेशतः तिब्बती बुद्ध तंत्र सहित सभी रहस्यों को प्रकट करने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि अब वे लंबे समय से चल रहे बाहरी आक्रमण के कारण अपनी समृद्ध आध्यात्मिक विरासत को खोने से डर रहे हैं।

तंत्र के बारे में विस्तृत जानकारी इस वेबपोस्ट की स्रोत वेबसाईट / source website पर पढ़ी जा सकती है, व पूर्ण जानकारी के लिए निम्नांकित पुस्तक का समर्थन किया जाता है-

शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा), एक अनुपम ई-पुस्तक (हिंदी भाषा में, 5 स्टार प्राप्त, सर्वश्रेष्ठ व सर्वपठनीय उत्कृष्ट / अत्युत्तम / अनौखीरूप में समीक्षित / रिव्यूड ) को यहाँ क्लिक करके डाऊनलोड करें। यदि मुद्रित पुस्तक ही आपके अनुकूल है, तो भी, क्योंकि इलेक्ट्रोनिक डीवाईसिस / फोन आदि पर पुस्तक का निरीक्षण करने के उपरांत ही उसका मुद्रित-रूप / print version मंगवाना चाहिए, जो इस पुस्तक के लिए इस लिंक पर उपलब्ध है। धन्यवाद।

ई-रीडर व ई-बुक्स के बारे में विस्तार से जानने के लिए यहां क्लिक करें।

How to keep control over body weight through Yoga

Body weight decreases with yoga. Even I have noticed my pent becoming lose at waist even with one day of heavy physical work. This occurs because I am habitual of daily yoga practice. When I worked hard, routine yoga exercise along with that depressed my appetite due to my too tiredness. So fat loss with that hard work was not rebuilt up, which resulted in my weight loss. Ordinary people without routine yoga practice eat a lot after heavy work thus rebuilding up their lost fat immediately. Yogic exercises should be continued daily and forever. If anyone continues his exercises for short time, say for 2 months, then he would experience reduction in his body weight. But if he stops exercising after that, then his built up stamina has no way to work other than to provoke the voracious appetite. Due to this he becomes too hungry and eats foods especially high energy foods abundantly. This results in substantial build up of his body fat which results in his body weight gain again that can surpass even his earlier basic body weight. So exercises continued should be kept continued always. It is a scientifically and experientially proven fact that hathyogic stretching exercises burn down a moderate amount of calories. Although stretching type yoga exercises don’t burn major amount of calories yet these exercises keep body fit, healthy, active and flexible. This helps in undertaking of any type of simple or hard physical work at any time successfully and with ease, also making gym exercises more effective. Also, it also helps in uniform circulation of blood throughout the entire body in appropriate proportions. This helps in easy withdrawal of fat deposited in the remote storehouses of the body. This in turn makes that fat available to all the body cells as the main source of energy. Therefore body doesn’t send the message of energy shortage to the appetite centre, that results in inhibition of voracious appetite just as seen commonly after a heavy work. Yoga is nothing special but a synergistic combination of stretching exercises, breathing and focused concentration. Focused concentration works as a controller valve for thoughts for it prevents sudden rush of chaotic thoughts thus preventing build up of paranoia and mind swinging. When accumulated thoughts in subconscious mind becomes too agitated then those are made to be released slowly and safely by the meditatively focused image inside the mind. Those thoughts are made sterile and non harmful or in other words get purified due to company of that strongly shimmering meditative image. That image also keeps check over the chaotic mental activities arising out of day to day worldly activities. Due to this an interest is generated inside the yoga practice and it is never missed out of daily schedule. With yoga exercises without the focused concentration on a kundalini image, interest for yoga exercises is lost soon and daily schedule severally suffers due to the chaotic rush of various hidden thoughts.

Tantric technique is another trick to reinforce the mental kundalini image and thus to enhance up the yoga-interest. It also results in enhanced breathing thus profuse supply of nutrient rich and well oxygenated blood to the entire body. This also puts a check over body weight. Actually tantra is not a separate discipline at its own independent of the ancient Indian spiritualism. It is a natural and spontaneous run / process towards the awakening. It only reinforces the spiritual efforts as a final or leaping step to awakening. If there is no spiritual motive and spiritual achievement inside one’s intellect, then there is no way for tantric power to go other than to become used up inside the chaotic external world. It means that kundalini image should be enough strong inside one’s mind prior to the application of tantric technique. Tantra provides the required and final escape velocity to kundalini to awakening. This is true for the common saying that Guru must be there with tantric sadhna. That guru is nothing other than the firmly affixed mental kundalini image. This is the reason why in Buddhist meditation, a yogi is allowed to take over the tantric sadhna after spending many years of simple concentrating meditation. But today Buddhists especially Tibetan Buddhists are trying to reveal all the secrets including the tantra to the world for they are afraid of losing for ever their rich spiritual heritage due to the long persisting external invasion.

You can learn about tantra in detail at the parent website of this web post, and for full detail following book is recommended-

If you have found some benefit from this post, please download here the above mentioned e-book (in Hindi language, 5 star rated, reviewed as the best, excellent and must read by everyone). If only print version suits you, then too print version should only be got after testing that’s e- version on the electronic devices / phone etc., that is available on this link for this book. You can also find the complete information about this book, both in English as well as Hindi languages on the hosting website of this post. Thank you.

If you liked this post then please follow this blog providing your e-mail address, so that all new posts of this blog could reach to you immediately via your e-mail.

Know in full detail about e-readers and e-books here.

 

पुस्तक-प्रचार, एक निःशुल्क पुस्तकों का खजाना- Book-promotion as a treasure of free books

पुस्तक-प्रचार, एक निःशुल्क पुस्तकों का खजाना (ई-पुस्तकों व ई-रीडर के बारे में सम्पूर्ण, दिलचस्प व स्वानुभूत जानकारी)- Please browse down or click this Link to see post in English

उदाहरण के लिए निम्न लिंक को क्लिक करके आपको हिंदी की एक अत्युत्तम ई-पुस्तक (*****पांच सितारा प्राप्त, सर्वश्रेष्ठ व सर्वपठनीय उत्कृष्ट / अत्युत्तम / अनौखीरूप में समीक्षित / रिव्यूड) अति कम मूल्य पर उपलब्ध हो जाएगी। फिर कोई पुस्तकप्रेमी यदि उसका कागजी-प्रतिरूप भी अपने पास रखना चाहे, तो उसे बाद में मंगवा सकता है। यदि किसी सज्जन के पास अपना ई-रीडर नहीं है, या वे ई-रीडर में पढ़ना पसंद नहीं करते हैं, तो वे अपने मोबाईल फोन पर ही उक्त पुस्तक को  न्यूनतम मूल्य में डाऊनलोड कर सकते हैं। यदि बीच-2 में जांचने-परखने पर वह पुस्तक उन्हें अच्छी लगे, तो वे उस पुस्तक के सशुल्क कागजी-प्रतिरूप (प्रिंट वर्जन) को बाद में मंगवा सकते हैं।

ऐसी बहुत सी वेबसाईटें हैं, जो प्रचारान्तर्गत पुस्तकों (प्रोमोशनल बुक्स) को सूचिबद्ध करती हैं, तथा पुस्तक-प्रेमियों को निःशुल्क उपलब्ध करवाती हैं (यद्यपि भारत के पुस्तक प्रेमियों के लिए यह सेवा मुझे उपलब्ध नहीं दिखती है)। उन वेबसाईटों के माध्यम से हमें नए जमाने की नई-2 पुस्तकों के बारे में निःशुल्क जानकारी प्राप्त होती रहती है। यदि कोई पुस्तक हमें अच्छी लगे, तो उसे हम विस्तार के साथ भी पढ़ सकते हैं। पूरी पढ़ने के बाद यदि हमें पुस्तक प्रशंसा के योग्य लगे, और यदि हम अन्य लोगों से भी उसके पढ़ने के लिए उसकी सिफारिश करना चाहते हैं, तब हम उसी वेबसाईट पर या पुस्तक-विक्रेता वेबसाईट पर उसका रिव्यू / review भी डाल सकते हैं। जिनके पास किन्डल ई-रीडर / kindle e-reader है, या अन्य कंपनियों के ई-रीडर हैं, उनके लिए तो वे निःशुल्क पुस्तकें किसी वरदान से कम नहीं होतीं। ऐसा इसलिए है क्योंकि ई-रीडर पर कागजी पुस्तक से कहीं अधिक अच्छा पढ़ा जाता है। वे आँखों पर ज़रा भी दुष्प्रभाव नहीं डालते, क्योंकि उनमें मोबाईल फोन की तरह लाईट / रेडिएशन नहीं होती, बल्कि वे बाहर की रौशनी से ही पढ़े जाते हैं, कागजी पुस्तकों की तरह ही। उसमें ई-स्याही (e-ink) होती है, जिसमें कोई रेडिएशन नहीं होती। इसी वजह से उसमें बहुत कम बिजली खर्च होती है। एक बार फुल चार्ज करने के बाद वह एक हफ्ते से लेकर एक महीने तक चल पड़ता है, प्रयोग के अनुसार। उसमें हम अपनी सुविधानुसार अक्षरों को छोटा या बड़ा कर सकते हैं, बहुत लम्बी रेंज तक। यह सुविधा दृष्टिदोष वालों के लिए व बुजुर्ग लोगों के लिए बहुत फायदेमंद साबित होती है। अक्षरों को बड़ा करके उसे रेलगाड़ी या बस में भी आराम से पढ़ा जा सकता है। उसकी एक ख़ास बात होती है कि उसमें सैंकड़ों पुस्तकें भंडारित करके रखी जा सकती हैं, जिससे पुस्तकों का भारी-भरकम बोझ साथ में उठा कर रखने की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। क्या पता कि कब किस प्रकार की पुस्तक को पढ़ने का मन कर जाए। कहीं पर भी यदि आदमी को किसी चीज का इन्तजार करते हुए बोरियत व समय की बर्बादी महसूस होने लगे, तो उससे बचने का सर्वोत्तम उपाय ई-रीडर ही है। इसके प्रयोग से मोबाईल फोन की जरूरत से ज्यादा लत भी धीरे-२ छूटने लगती है। लगभग एक बड़े मोबाईल फोन के या औसत टेबलेट के जितने आकार (परन्तु कुछ अधिक वर्गाकार आकृति होती है ई-रीडर की) के ई-रीडर का वजन केवलमात्र 50-75 ग्राम के आसपास प्रतीत होता है, और एक पुराने जमाने के छोटे मोबाईल फोन के वजन जितना लगता है। इसमें कम्प्यूटिंग जगत का सबसे साधारण प्रॉसेसर, सेलेरोन लगा होता है, जिससे यह कभी गर्म भी नहीं होता।इसका मतलब यह है कि ई-रीडर बहुत हल्का होता है। उसकी एक अन्य खासियत यह है कि जो पुस्तक हमने जहां तक पढ़ी हो, उसे दुबारा खोलने पर वह वहीं से शुरू होती है। इसलिए कागजी पुस्तक की तरह निशान लगाने की जरूरत नहीं पड़ती। पुस्तक के किसी भी भाग में हम मात्र एक क्लिक से पहुँच सकते हैं। उसके अक्षरों को हम आवश्यकतानुसार हाईलाईट / highlight कर सकते हैं, और उसे उसी जैसे ई-रीडर पर वही ई-पुस्तक पढ़ रहे लोगों के साथ शेयर / share भी कर सकते हैं। उसमें शब्दकोश की सुविधा भी होती है। किसी अंग्रेजी के शब्द को क्लिक करके उसका विस्तृत अर्थ सामने आ जाता है। अतः उसमें कठिन से कठिन अंग्रेजी में पुस्तकों को भी आसानी से पढ़ सकते हैं। उसको पढ़ने के लिए उतने ही प्रकाश की आवश्यकता होती है, जितने प्रकाश की आवश्यकता एक कागजी पुस्तक को पढ़ने के लिए होती है। परन्तु अब नए व तुलनात्मक रूप से महंगे ई-रीडरों में अपनी लाईट भी लगी होती है। उसे हम बाहरी प्रकाश के अनुसार एडजस्ट भी कर सकते हैं। वह लाईट वास्तव में ई-रीडर के अन्दर से नहीं आती, बल्कि स्क्रीन के बाहर, उसके किनारों पर लगे बल्बों से स्क्रीन के ऊपर बाहर से पड़ती रहती है। इसका अर्थ है कि उन ई-रीडरों को हम रात के समय अपने बेडरूम में ही, रूमलाईट को जलाए बिना व अन्य पारिवारिक सदस्यों की नींद खराब किए बिना भी पढ़ सकते हैं। इससे बिजली की भी बचत हो जाती है, क्योंकि उस प्रकार के ई-रीडर में बहुत कम पावर की एलईडी लाईट लगी होती है। एक साधारण ई-रीडर का न्यूनतम मूल्य लगभग 5500 रुपए होता है, वहीँ अपनी लाईट वाले एक आधुनिक ई-रीडर का न्यूनतम मूल्य लगभग 8500 रुपये होता है। दोनों में केवल लाईट का ही अंतर होता है, अन्य कुछ नहीं या बहुत मामूली / अस्पष्ट सा (महंगे वाले में अधिक स्क्रीन रिजोल्यूशन होता है)। किन्डल / kindle के ई-रीडर सबसे सस्ते माने जाते हैं। सनेपडील / snapdeal के माध्यम से न्यूनतम मूल्य पर मिल जाते हैं। जहाँ पर पसंदीदा कागजी पुस्तक को मंगवाने के लिए कई दिन या हफ्ते लग जाते हैं, वहीँ पर ई-रीडर के माध्यम से एक मिनट से भी कम समय में ई-पुस्तक उपलब्ध हो जाती है। कई पुस्तकें तो ई-पुस्तकों के रूप में ही मिलती हैं, क्योंकि उन पुस्तकों के कागजी प्रतिरूप छपे ही नहीं होते हैं। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि या तो पुस्तक नई-2 बाजार में आई होती है, या उसका लेखक विभिन्न बाध्यताओं के कारण उसके कागजी प्रतिरूप को नहीं छपवा पाता। ई-रीडर में इंटरनेट भी चल सकता है। यद्यपि उसमें इंटरनेट चलाना मोबाईल फोन के जितना सुविधाजनक तो नहीं होता, परन्तु फिर भी पुस्तकों को सर्च करने और उन्हें डाऊनलोड करने के लिए काफी होता है। ई-रीडर में वाई-फाई रिसीवर भी लगा होता है, जिससे वह हमारे स्मार्टफोन के वाई-फाई हॉटस्पॉट से उत्सर्जित इंटरनेट डाटा-युक्त सिग्नल को रिसीव कर सकता है, और उससे पुस्तक-हेतु इंटरनेट सर्फ़ कर सकता है। यह ऐसे ही होता है, जैसे हम एक फोन से दूसरे फोन को वाई-फाई से इंटरनेट का सिग्नल भेजते हैं। हम अपने स्मार्टफोन पर भी ई-पुस्तक को डाऊनलोड कर सकते हैं, और फिर दोनों डिवाईसों / उपकरणों को वाई-फाई के माध्यम से सिंक / sync करके, उस ई-पुस्तक को ई-रीडर को भेज सकते हैं। कई बार सिंक होने में कठिनाई आती है, इसलिए उस समय सीधे ही ई-रीडर पर डाऊनलोड करना ठीक रहता है। इससे हम ई-रीडर को दुबारा रिसेट / reset करने से बच जाते हैं। यद्यपि किनडल कंपनी के बाहर से प्राप्त की गईं सशुल्क व  निःशुल्क पीडीएफ पुस्तकें ई-रीडर पर सीधी डाउनलोड नहीं की जा सकतीं, इसलिए उन्हें पहले फोन पर डाउनलोड करना पड़ता है। इसलिए सिंक को पुनः चालू करने के लिए ई-रीडर को रिसेट करना पड़ता है। उससे पहले की डाऊनलोड की हुई पुस्तकें ई-रीडर से गायब हो जाती हैं, हालांकि रिसेटिंग के बाद वे फिर से लाईब्रेरी में प्रतीक रूप में दिख जाती हैं, जिन्हें फिर से डाऊनलोड करना पड़ता है। जो पुस्तकें ई-रीडर वाली कंपनी से नहीं प्राप्त की गई थीं, अपितु कहीं बाहर से हासिल की गई थीं व कनवर्ट करके ई-रीडर को भेजी गई थीं, वे रिसेटिंग के बाद नहीं दिखतीं। इसलिए उन ई-पुस्तकों के पीडीएफ वर्जन को अपने स्मार्ट फोन पर सुरक्षित रखना चाहिए या क्लाउड सर्विस / cloud service (like evernote) पर सुरक्षित रूप से भंडारित करके रखना चाहिए, ताकि बाद में उन्हें फिर से कन्वर्ट करके ई-रीडर को भेजा जा सके और उनकी मूल वेबसाईटों में उन्हें ढूँढने में दिक्कत भी न हो। रिसेटिंग के थोड़े से झंझट से बचने के लिए डाटा केबल के प्रयोग से ई-पुस्तकों को अन्य इलेक्ट्रोनिक स्टोरेज डिवाईसिस से ई-रीडर को भेजा जा सकता है। महंगे ई रीडर में अपना इंटरनेट भी होता है। उससे हम शान्ति के लिए अपना फोन घर पर छोड़कर भी ई रीडर के साथ घूम सकते है।  किन्डल कंपनी पीडीएफ पुस्तक को स्वयं कन्वर्ट करने की सुविधा भी देती है। उसके लिए ई-रीडर में किन्डल सर्विस से जुड़े हुए अपने ईमेल आईडी को एक्टिवेट करने की ऑप्शन होती है। उस ईमेल पते पर उस पीडीएफ बुक को अटेचमेंट के रूप में भेजा जाता है, तथा मेसेज की सब्जेक्ट लाइन में CONVERT लिखा जाता है। फिर वह बुक रीडेबल मोबि फोरमेट में हमारे ई-रीडर पर पहुँच जाती है, जिसे हम फिर डाऊनलोड कर लेते हैं।

ई-रीडरों का भविष्य उज्जवल है। पुस्तकीय कागज़ के लिए पेड़ों का अंधाधुंध कटान हो रहा है, जिससे पर्यावरण को हानि पहुँच रही है, और कागज़-उद्योगों से प्रदूषण भी बढ़ रहा है। यदि कोई व्यक्ति ई-रीडर पर 100 ई-पुस्तकें पढ़ता है, तो इसका अर्थ है कि उसने उन पुस्तकों में प्रयुक्त होने वाले कागज़ को बचाया। हमारे देश के विद्यालयों में कागज़ की बहुत खपत व साथ में बर्बादी भी होती है, क्योंकि कक्षा को उत्तीर्ण करने के बाद अधिकाँश विद्यार्थी अपनी पुस्तकों को रद्दी में बेच देते हैं। वे किताबें सिर्फ एक साल ही पढ़ी गई होती हैं, जिससे वे नई होती हैं। विदेशों की तरह ही, पुस्तकें विद्यालयों के द्वारा उपलब्ध करवाई जानी चाहिए, और कक्षा पूरी करने के बाद विद्यार्थी से वापिस ले ली जानी चाहिए, ताकि वे नए विद्यार्थी को पढ़ने के लिए दी जा सकें। इससे विद्यार्थी पुस्तकों का सम्मान करना भी सीखेंगे। इससे जहां एक ओर कागज़ की बर्बादी रुकेगी, वहीँ पर सर्वशिक्षा अभियान को भी मदद मिलेगी। यदि कागज़ की पूर्ण बचत करनी हो, तो विद्यालयों में भी सभी को ई-रीडर उपलब्ध करवा दिए जाने चाहिए।

ई-पुस्तकों से ज्ञान एकदम से और चारों ओर से बढ़ता है, जो आध्यात्मिक उत्कर्ष / कुण्डलिनी-जागरण के लिए अत्यावश्यक है। अधिकाँश मामलों में आध्यात्मिक रुचि केवल थोड़े से समय के लिए ही उत्पन्न होती है। इसलिए उस रुचि को पूरा करने वाली पुस्तक तुरंत मिलनी चाहिए, जो ई-बुक से ही संभव है। फिर स्थान-2 के आध्यात्मिक आश्रमों, योगाश्रमों या आध्यात्मिक / मनोहर प्रकृतियों के बीच में भौतिक पुस्तकों को उठा कर घूमा भी तो नहीं जा सकता। जब तक कागजी पुस्तक जिज्ञासु व्यक्ति तक पहुंचती है, तब तक उसका शौक या तो ठंडा पड़ गया होता है, या नष्ट हो गया होता है, समय की कमी से या अन्य अनेक कारणों से। इसका ताजा उदाहरण है, इस वेबसाईट व उपरोक्त प्रचाराधीन पुस्तक का नायक, “प्रेमयोगी वज्र”। उसने विभिन्न वेबसाईटों, ई-पुस्तक विक्रेता वेबसाईटों, ई-रीडर व ई-पुस्तकों के माध्यम से तीव्रता से अपने आध्यात्मिक उत्कर्ष को प्राप्त किया।

यह जानकर हैरानी होगी कि जापान जैसे तकनीकप्रधान देश के लोग भी बहुत पुस्तक-प्रेमी होते हैं। वहां पर नई पुस्तक की रिलीज के बाहर उतनी भीड़ लग जाती है, जितनी हमारे देश में नई फ़िल्म की रिलीज के बाहर नहीं लगती। भारत में अन्य विकसित देशों की तुलना में अभी ई-रीडर का चलन बहुत कम है, और अधिकाँश लोग भौतिक / कागजी पुस्तक के ही आश्रित हैं। अच्छी ई-पुस्तकों के बाजार में आने से ई-रीडर के चलन में तेजी आएगी।

जो सामग्री इस ई-पुस्तक में उपलब्ध है, वह पूरी की पूरी इस वर्तमान ब्लॉग की मेजबानी-वेबसाईट / hosting website पर भी उपलब्ध है। नया कुछ नहीं है। ई-पुस्तक में तो केवल उस सामग्री को अधिक निष्ठा व मेहनत के साथ विस्तृत किया गया है, और सजाया गया है। कुशाग्रबुद्धि व मेहनती व्यक्ति तो इस वेबसाईट को समझ कर उसकी सामग्री से खुद भी इस ई-पुस्तक को तैयार कर सकता है। होना भी ऐसा ही चाहिए। सभी लोग भिन्न-2 होते हैं। कोई व्यक्ति आर्थिक रूप से कमजोर होता है, जो पुस्तक नहीं खरीद सकता और उसके पास समय की भी कमी होती है। किसी व्यक्ति को पुस्तकें पढ़ने का शौक नहीं होता। वैसे व्यक्तियों के लिए वेबसाईट ही बहुत होती है। कोई व्यक्ति निःशुल्क या सस्ती वस्तु को तुच्छ समझता है। कोई व्यक्ति महँगी पुस्तक को पसंद नहीं करता। वैसे व्यक्ति के लिए सस्ती ई-पुस्तक को बनाया गया है। कोई व्यक्ति मूल्यवान व गुणवान वस्तु को निःशुल्क प्राप्त करना चाहता है, विविध कारणों से। वैसे व्यक्ति के लिए इस पुस्तक का यह त्रिदिवसीय व वर्तमानकालिक निःशुल्क पुस्तक का प्रचाराभियान रखा गया है। कोई व्यक्ति ई-पुस्तक को महत्त्व देता है, तो कोई कागजी-पुस्तक को। ताकि सभी प्रकार के व्यक्तियों की जरूरतें पूरी हो सकें, इसीलिए इस प्रकार की अनेकदिशात्मक प्रणाली को बनाया जाता है।

कई बार क्या होता है कि हम बहुत सी मुश्किलों का सामना करते हुए कागजी पुस्तक / paper book खरीद भी लेते हैं। फिर यदि वह अच्छी न भी लगे, तो भी उसे मजबूरीवश पढ़ना ही पढ़ता है, क्योंकि उसमें बहुत सा पैसा खर्च किया गया होता है, और बेशकीमती कागज़ भी। इसके विपरीत इंटरनेट / internet पर हजारों ई-पुस्तकें पीडीएफ फाईल / pdf file के रूप में निःशुल्क उपलब्ध होती हैं। हम बहुत आसानी से उन पीडीएफ फाईलों को ऑनलाईन या ऑफलाइन फाईल कनवर्टरों / file converters (कैलिबर / caliber आदि) से ई-रीडर पर पढ़ने योग्य (किन्डल के लिए मोबी फाईल / mobi file के रूप में) बना सकते हैं। इस तरह से हम बीसियों पुस्तकों को एकसाथ डाऊनलोड / download कर सकते हैं। उन्हें हम बन्दर-दृष्टि से बीच-२ में व जल्दी-२ से पढ़ सकते हैं। पुस्तकों के जो भाग हमें अच्छे लगें, हम सिर्फ उन्हें ही पढ़ सकते हैं, बाकि के निरर्थक भाग को छोड़कर। यह तरीका खोजी प्रकार के लोगों के लिए बहुत अच्छा रहता है, क्योंकि उन्होंने किसी एक संक्षिप्त विषय के बारे में वर्तमान तक की विश्वभर की सम्पूर्ण जानकारी चाहिए होती है, ताकि वे कुछ उससे अलग व नया कर सके। भौतिक पुस्तकों से हम इतनी शीघ्रता से जानकारी प्राप्त नहीं कर सकते। यदि हम किसी एक विषय से सम्बंधित विश्व की सभी कागजी पुस्तकों को पुस्तकालय आदि में प्राप्त भी कर लें, तो भी उस विषय के बारे में सभी पुस्तकों को पड़ना बहुत दूभर व असंभव सा ही होता है। क्योंकि वैसा करते हुए समय भी बहुत लगेगा, और हमारे शरीर का 5 किलोग्राम वजन भी घट जाएगा। धूल खाने को मिलेगी, वह अलग। साथ में, जल्दबाजी में व सामान्य प्रयोग-क्षरण के तहत भौतिक पुस्तकों को जो नुक्सान होगा, वह भी अलग।  ई-रीडर को तो हम धूप में भी पढ़ सकते हैं, कागजी पुस्तक की तरह ही। यह इसका विशेष गुण है, जो फोन या कम्प्यूटर आदि में नहीं होता है।

कागजी पुस्तक को तो निःशुल्क नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि उस पर भौतिक संसाधन खर्च किए गए होते हैं। इसी तरह से, कागजी पुस्तकों के प्रोमोशनल ऑफर / promotional offer भी नहीं दिए जा सकते। इस बात को लेकर भी मुकाबले में ई-पुस्तक ही बाजी मार जाती है। इसकी एक ही कमी है कि इसमें चित्र अच्छे नहीं दिखते, रंग तो दिखते ही नहीं। ई-स्याही केवल श्वेत-श्याम ही दिखा सकती है।इस क्षेत्र में भी इसमें सुधार चल रहा है।

यदि आपने इस लेख/पोस्ट को पसंद किया तो कृपया इस वार्तालाप/ब्लॉग को अनुसृत/फॉलो करें, व साथ में अपना विद्युतसंवाद पता/ई-मेल एड्रेस भी दर्ज करें, ताकि इस ब्लॉग के सभी नए लेख एकदम से सीधे आपतक पहुंच सकें। धन्यवादम।

पुस्तक के स्वयंप्रकाशन से सम्बंधित सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त करें।

Book-promotion as a treasure of free books (Full, interesting and experiential information about e-books and e-readers)

For example, by clicking on the following link, you will get one of the best Hindi eBooks (*****5 star rated, reviewed as the best, excellent and must read by everyone) at minimum price tag. Then if someone book lover wants to keep its paper-version too, then he can arrange it later. If a gentleman does not have his e-reader, or he does not like to read on an e-reader, he can download this above said book on his mobile phone. If the book looks good to him, then he can order the comparatively costlier paper version of that book later on.

There are many such websites, which lists promotional books, and make books available to book lovers free of charge (although this service doesn’t appear to me available for Indian book lovers presently). Through these websites, we get free new information about new-age new books. If a book looks good to us, then we can also read it with detail. After reading the entire book, if we find the book worthy of praise and if we want to recommend it to other people to read it, then we can put a review on the same website or book-seller website. For those who have a kindle e-reader, or e-readers of other companies, those free books are not less than any boon. This is because the e-reader is better to read than the paper book. These do not have any side effects on their eyes, because these do not have light / radiation, like mobile phones, but they are read only in the outside light, just like paper books. There is an e-ink in which there is no radiation. That is why it costs very little power. Once full charge, this works from one week to one month according to usage. In this we can shorten or enlarge the letters at our convenience, to a very long range. This feature proves to be beneficial for partially blind people and elderly people. The letters can be expanded and read comfortably even at the train or bus. There is a special thing that hundreds of books can be stored in it, this eliminates the need to keep a heavy load of books together. Do you know when to read what type of book? If somewhere waiting for a man feeling boredom and waste of time waiting for something, then the best way to avoid it is e-reader. Using this, the excessive addiction of mobile phone also decreases slowly. The weight of the e-reader of the size of a large mobile phone or small tablet appears only around 50-75 grams, that is the weight of the old mobile phone. It works on simplest computing processor, celeron, so it never heats up. This means that the e-reader is very light. Another feature of it is that the book that we have read as far as it has been opened, it starts it right there. That is why it does not need to be marked as a paper book. In any part of the book, we can reach with just one click. We can highlight words of e-book in it and share with people same book on similar e-reader. It requires as much light to read it, as much as the light is needed to read a paper book. But now, the new and comparatively costly e-readers have their own lights. We can also adjust that according to the outer light. The light does not actually come from the e-reader inside, but it keeps coming from the outside of the screen with the bulbs on its edges, outside the screen. This means that we can read those e-readers in the night of the bedroom, without switching on the room light and disturbing sleep of other room partners. This also saves electricity, because this type of e-reader has very low power LED light. The minimum value of a simple e-reader is about INR 5500, the minimum price of a modern e-reader with its own light is about INR 8500. there is not any other appreciable difference between both except of the barely noticeable higher screen resolution of the costly one. Kindle E-readers are counted as cheapest. Through snapdeal these are available at a minimum price. Where it takes days or weeks to get a favorite paper book, its e-Book version becomes available in less than a minute via e-reader. Many books are available only in the form of e-books, because the paper versions of those books are not printed. This is because either the book has come newly in the market, or its author has not been able to print its paper counterpart due to various compulsions. The Internet can also run in the e-Reader. Although running the Internet is not as convenient as in the mobile phone, but still it is enough to search and download the books. The e-reader also has a Wi-Fi receiver, so that it can receive Internet data signal emitted from the Wi-Fi hotspot of our smart phone, and it can surf the Internet for the book. It is just like we send an Internet signal from one phone to another. We can also download the e-book on our smart phone, and then by syncing both the devices via Wi-Fi, you can send that e-book to the e-reader. Many times, there is problem in syncing. In such cases it is better to download the e-book directly on e-reader. Due to this we are saved from resetting the e-reader. However, free or prized pdf-books from sources other than kindle can not be directly downloaded on the e-reader. In that case we have to reset the e-reader. Due to that old downloaded e-books are washed away, however they are again visible on e-reader after resetting to be downloaded. To be saved from resetting, data cable can be used to transfer book from other storage devices to kindle. Books which were not received from the e-reader company, but were received from outside elsewhere and converted then sent to e-readers, those do not appear after the resetting. So pdf version of those books needs to be properly stored in the smart phone or cloud service (evernote etc.) so that those could be again sent to e-reader after conversion and also those pdf books need not to be searched again in the source website. Some costly e readers have their own internet. So we can wander with those peacefully leaving our phone at home. Kindle Company also gives the facility to convert the PDF book itself. For that, the e-reader has an option to activate the email id associated with the Kindle Service. That PDF is sent on that activated address as an attachment, and in the subject line of message it is written, CONVERT. Then the book reaches our e-reader in the readable Mobi format, which we then download again. Other than the facility of highlighting the text on e reader, there is also dictionary facility in it. On clicking a word it’s detailed meaning pops up. So it’s easy to read challenging English books in it.

The future of e-readers is bright. The trees are being indiscriminately cut down for the paper, which is causing harm to the environment, and pollution from paper industries is also increasing. If a person reads 100 eBooks on e-Reader, it means that he has saved the paper used in those books. There is a lot of paper consumption in our country’s schools as well as its wastage because most of the students sell their books in the trash after passing the class. Those books have been read only for one year, due to which those are new. Like abroad, books should be made available by the schools, and after completing the class, the books should be taken back from the student and should be given to new student to read. Then students will also learn to care for books. This will help prevent the waste of paper on one hand, the Sarva Shiksha Abhiyan / Mission of education to all will also be helped on other hand. If there is desired a complete saving of paper, then everyone should be provided e-reader in schools too.

Knowledge from e-books grows instantly and all around, which is essential for spiritual prosperity / Kundalini-Jagran / awakening. In most people, spiritual interest arises only for a short time. Therefore, a book fulfilling that interest should be available immediately, which is possible only through the e-book. Also, in the spiritual ashrams / retreats, yoga-ashrams or spiritual / attractive natural places, one cannot wander through lifting physical books. As long as the paper book reaches the inquisitive person, then his hobbies have either fallen or destroyed, due to lack of time or many other reasons. The latest example of this is the protagonist of this on-promotion book and this very same website too, “Premogi vajra”. He achieved his spiritual prosperity through various websites, e-book vendor websites, e-readers and e-books.

It will be surprising to know that people of tech-driven country like Japan are very book-lovers. There is so much rush outside the release of the new book, as does not seem to be outside the release of the new film in our country. In India, the trend of e-readers is very low compared to other developed countries, and most people are dependent on the physical / paper books. With good e-books coming into the market, the e-reader trend will accelerate.

The content available in this e-book is also available entirely on this current blog-hosting website. Nothing new. In e-book, only that material has been expanded with more fidelity and hard work, and is decorated. A diligent person can understand this website and prepare his own eBook from this content. It should be the same. All people are different from each other. Someone is financially weak, who cannot buy a book. Someone don’t like books. For such persons the website is very much. Someone considers free or low cost thing to be despised. Someone does not like expensive books. The cheap e-book has been made for such a person. Someone wants to get valuable and costly book for free. For that person, this three days long, free eBook promotional offer has been kept. Someone gives importance to e-book, but for someone paper-book is important. In order to meet the needs of all types of individuals, this kind of much disciplinary system is made.

What happens many times, that we also hire a paper book while facing many difficulties. Even if it does not feel good, he reads it strictly, because he has spent a lot of money in it, and even prized papers. On the contrary, thousands of eBooks are available free of charge as PDF file on the internet. We can easily make those PDF files through online or offline file converters (caliber etc) readable on e-reader (as a mobi file for kindle). In this way, we can download twenties of books together. We can read them with monkey-eye, rapidly and selectively. The parts of the books that we think are good; we can only read those, except for the futile part of the rest. This method is very good for people of the type of searching and researching habit, because they need a brief subject to be present in the whole world till date, so that they can do something different and new. We cannot get information from physical books so quickly. Even if we get all the world’s books together in the library etc. related to one topic, then even reading all the books about that subject is very confusing and nearly impossible. Because doing so will take too much time, and our body will also lose 5-kilogram weight. Dust will also be eaten little or more. In the hasty and common use-erosion, the damage to physical books is also there. We can also read the e-Reader in the sun, just like a paper book. This is its special quality, which is not in the phone or computer etc.

The paper book cannot be made free because the physical resources are spent on it. Similarly, promotional offers of paper books cannot be given too. E-book only gets hit in this match about this matter. It’s only drawback is that it doesn’t show pictures well, never show colours at all. E-ink can only show black and white.

If you liked this post then please follow this blog providing your e-mail address, so that all new posts of this blog could reach to you immediately via your e-mail.

Get complete information about self publishing.