कुंडलिनी योग में लेखन का महत्त्व

दोस्तो, पिछली पोस्ट में मैं बता रहा था कि कैसे कुंडलिनी प्रेम की भूखी होती है। आध्यात्मिक शास्त्रों में भगवान भी तो प्रेम के ही भूखे बताए जाते हैं। दरअसल भगवान वहाँ कुंडलिनी को ही कहा गया है। साथ में मैं बता रहा था कि कैसे आजकल की पीढ़ी असंतुलित होती जा रही है। इलेक्ट्रॉनिक वीडियोस, सोशल मीडिया और गेम्स के लिए उनके पास समय भी बहुत है, और संसाधन भी। पर इलेक्ट्रॉनिक बुक्स, वैबपोस्टस और चर्चाओं के लिए न तो समय है, और न ही संसाधन। इनके भौतिक या कागजी रूपों की बात तो छोड़ो, क्योंकि वे भी अपनी जगह पर जरूरी हैं। यदि ये आध्यात्मिक प्रकार के हैं, तब तो बिल्कुल भी नहीं। एकबार एक जानेमाने पुस्तक विक्रेता की दुकान पर उसके मालिक से मेरी इस बात पर संयोगवश चर्चा चल पड़ी थी। बेचारे कह रहे थे कि इलेक्ट्रॉनिक गेजेट्स ने उनकी दुकान पर पुस्तकों की बिक्री बहुत कम कर दी है। फिर भी उनके संतोष व उनकी सहनशीलता को दाद देनी पड़ेगी जो कह रहे थे कि बच्चों को बड़े प्यार से ही मोबाइल फोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक गेजेट्स से दूर रखना चाहिए, डांट कर नहीं। डांट से वे कुण्ठा औऱ हीनता से भर जाएंगे। डांटने से अच्छा तो उनको इनका प्रयोग करने दो, वे खुद सीखेंगे। यहाँ हम किसी चीज को ऊंचा या नीचा नहीं दिखा रहे हैं। हम तो यही कह रहे हैं कि संतुलित मात्रा में सभी मानवीय चीजों की जरूरत है। संतुलन ही योग है, संतुलन ही अध्यात्म है।

असली लेखक अपने लिए लिखता है

मैं हमेशा अपने बौद्धिक विकास के लिए लिखने की कोशिश करता रहता हूँ। जो असली लेखक होता है, वह औरों के लिए नहीं, अपने लिए लिखता है। लेखन से दिमाग को एकप्रकार से एक्सटर्नल हार्ड डिस्क मिल जाती है, डेटा को स्टोर करने के लिए। इससे दिमाग का बोझ कम हो जाने से वह ज्यादा अच्छे से सोच-समझ सकता है। आपको तो पता ही है कि कुंडलिनी योग के लिए चिंतन शक्ति की कितनी अधिक जरूरत है। केंद्रित या फोकस्ड चिंतन ही तो कुंडलिनी है। उस लेखन को कोई पढ़े तो भी ठीक, यदि न पढ़े तो भी ठीक। अपने जिस लेखन से आदमी खुद ही लाभ नहीं उठा सकता, उससे दूसरे लोग क्या लाभ उठाएंगे। अपने फायदे के साथ यदि दुनिया का भी फायदा हो, तो उससे बढ़िया क्या बात हो सकती है। आप मान सकते हो कि मेरे आध्यात्मिक अनुभवों में मेरे लेखन का अप्रतिम योगदान है। कई बार तो लगता है कि यदि मुझे लेखन की आदत न होती, तो वे अनुभव होते ही न। आजकल ईबुक्स की कीमतें बढ़ा-चढ़ा कर रखने का रिवाज सा चला है। पर सच्चाई यह है कि उन पर लेखक के भौतिक संसाधन खर्च नहीं होते, जैसे कि कागज, पैन आदि। सैल्फ पब्लिशिंग से पब्लिशिंग भी निःशुल्क उपलब्ध होती है। केवल लेखक की बुद्धि ही खर्च होती है। पर बुद्धि तो खर्च होने से बढ़ती है। किताब की कीमत तो बुद्धि व अनुभव के रूप में अपनेआप मिल ही जाती है, तब पैसे की कीमत किस बात की। कहते भी हैं कि विद्या खर्च करने से बढ़ती है। इसीलिए पुराने जमाने में आध्यात्मिक सेवाएं निःशुल्क या नो प्रोफिट नो लॉस पर प्रदान की जाती थीं। सशुल्क ईबुक्स को बहुत कम पाठक मिलते हैं। निःशुल्क पुस्तकों को खरीदने व बेचने के लिए गूगल प्ले बुक्स और पीडीएफ ड्राइव डॉट नेट बहुत अच्छे प्लेटफॉर्म हैं। पिछले एक साल के अंदर गूगल प्ले बुक्स पर मेरी नौ हजार पुस्तकें शून्य मूल्य पर बिक गई हैं। इन पुस्तकों में भी सबसे ज्यादा बिक्री इस वेबसाइट की सभी ब्लॉग पोस्टस को इकट्ठा करके बनाई गई पुस्तकों की हुई है। यदि उनकी कीमत रखी होती तो शायद नौ भी न बिकतीं। यह इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि एक अन्य प्लेटफार्म पर इन पुस्तकों के पेड वेरशन्स (न्यूनतम मूल्य पर) भी हैं, वहाँ तो लगभग नौ ही बिकी हैं। गूगल प्ले बुक्स पर भी एक बार पुस्तकों का न्यूनतम मूल्य रखकर प्रयोग किया था, तब भी दो या तीन महीनों में केवल 4-5 प्रतियां ही बिक पाई थीं। अपने लेखन के प्रति पाठकों की रुचि से जो संतोष प्राप्त होता है, वह पैसे से प्राप्त नहीं होता। 

इड़ा औऱ पिंगला नाड़ी अर्धनारीश्वर को इंगित करते हैं

अपने पिछले लेखन से मैंने इस हफ्ते यह बात सीखी कि क्यों न अपने आध्यात्मिक अनुभवों का सार्वभौमिक प्रमाण आध्यात्मिक शास्त्रों में भी ढूंढा जाए। इसलिए मैंने स्वामी मुक्तिबोधानन्द की हठयोग प्रदीपिका को पढ़ना शुरु किया। दो दिनों में ही 15% से ज्यादा पुस्तक को पढ़ लिया। इतना जल्दी इसलिए पढ़ पाया क्योंकि जो मैं अपने अनुभवों से लिखता आया हूँ, कमोबेश वही तो था लिखा हुआ। साथ में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की छुट्टी होने के कारण पर्याप्त समय भी मिल गया। सिर्फ दो-चार विचारों में अंतर जरूर था। यदि मैं वह अंतर बताऊंगा, तो यह माना जा सकता है कि आपने भी वह पुस्तक पढ़ ली होगी, क्योंकि आप मेरी पोस्टस शुरु से पढ़ते आ रहे हैं। मैं वह अंतर आने वाली पोस्टों में भी बताता रहूँगा।
उस पुस्तक में लिखा है कि इड़ा नाड़ी पीठ के बाएं भाग से ऊपर चढ़ती है, पर ऊपर जाकर दाईं ओर मुड़कर मस्तिष्क के दाएं गोलार्ध को कवर करती है। पर मुझे तो वह बाएँ मस्तिष्क में ही जाते हुए अनुभव होती है। इसी तरह पिंगला नाड़ी को निचले शरीर के दाएं भाग और मस्तिष्क के बाएं भाग को कवर करते हुए दर्शाया गया है। पर मुझे तो वह दाएं मस्तिष्क में ही जाते हुए दिखती है। अर्धनारीश्वर के चित्र में भी ऐसा ही, मेरे अनुभव के अनुरूप ही दिखाया जाता है। वहाँ तो ऐसा नहीं दिखाया जाता कि शरीर का निचला बायाँ भाग स्त्री का और ऊपरी बायाँ भाग पुरुष का है। हो सकता है कि इसमें कुछ और दार्शनिक या अनुभवात्मक पेच हो।

आध्यात्मिक सिद्धियां बताने से बढ़ती भी हैं

एक अन्य मतभेद यह था कि उस पुस्तक में सिद्धियों को गुप्त रखने की बात कही गई थी। मैं भी यही मानता हूँ कि एक स्तर तक तो गोपनीयता ठीक है, पर उसके आगे नहीं। जब मन जागृति से भर जाए और आदमी क्षणिक जागृति के और अनुभव प्राप्त न करना चाहे, तब अपनी जागृति को सार्वजनिक करना ही बेहतर है। इससे जिज्ञासु लोगों को बहुत कुछ सीखने को मिलता है। ऐसा दरअसल खुद ही होता है। जिस आदमी के पास कम पैसा होता है, और पैसों से मन नहीं भरा होता है, वह उसे छिपाता है, ताकि दूसरे लोग न मांग ले। पर जब आदमी के पास असीमित पैसा होता है, और पैसों से उसका मन भर चुका होता है, तब वह उसके बारे में खुलकर बताता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि उसे पता होता है कि कोई कितना भी ले ले, पर उसका पैसा खत्म नहीं होने वाला। यदि कोई उसका सारा पैसा ले भी ले, तब भी उसे फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि उसका मन तो पैसे से पहले ही भर चुका होता है। बल्कि उसे तो फायदा ही लगता है, क्योंकि जो चीज उसे चाहिए ही नहीँ, उससे उसका पीछा छूट जाता है। वैसे आजकल के वैज्ञानिक व बुद्धिजीवी समाज में आध्यात्मिक सिद्धियां बताने से बढ़ती भी हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि आजकल के पढ़े-लिखे लोग एक-दूसरे की जानकारियों से प्रेरणा लेकर आगे बढ़ते हैं। मुझे तो लगता है कि यदि मैं अपने प्रथम आध्यात्मिक अनुभव की खुली चर्चा सोशल मीडिया में न करता, तो मुझे जागृति का दूसरा अनुभव न मिलता। पुराने समय के आदिम युग में अनपढ़ता व अज्ञान के कारण सम्भवतः लोग एक-दूसरे से ईर्ष्या व घृणा करते होंगे। इससे वे एक-दूसरे के ज्ञान से प्रेरणा न लेकर एक-दूसरे की टांग खींचकर आपस में एक-दूसरे को गिराते होंगे, तभी उस समय सिद्धियों को छिपाने का बोलबाला रहा होगा। कुंडलिनी के बारे में भी मुझे अधूरी सी जानकारी लगी। इस बारे अगली पोस्ट में बताऊंगा। 

कुंडलिनी योग और शून्य आकाश~ आम मिथक का पर्दाफाश

कुंडलिनी तंत्र में चित्तवृत्तिनिरोध मूल धयेय न होने से यह पतंजलि योग से थोड़ा भिन्न प्रतीत होता है।

मित्रो, पतंजलि ने कहा है, योगश्चित्तवृत्ति निरोधः। इसका शाब्दिक अर्थ है,”योग चित्त या मन की लहरों या विचारों को रोकना है”। इसका मतलब है कि पतंजलि ने मन को शून्य करके,अर्थात विपासना से ही जागरण को प्राप्त किया होगा। उन्होंने अकस्मात कुंडलिनी जागरण प्राप्त नहीं किया होगा। हुआ क्या कि निरंतर के कुंडलिनी ध्यान से विपासना का काम होता रहा। पुराने विचार उभरने लगे और कुंडलिनी के आगे डिम पड़ने लगे। वे मिटते रहे और शून्य बढ़ता गया। पूर्ण शून्य होने पर अकस्मात मूलाधार से ऊर्जा के ऊपर चढ़ने से समाधि महसूस हुई। यही कुंडलिनी जागरण है। इसमें तांत्रिक यौनबल और अन्य तांत्रिक तरीकों की सहायता नहीं ली गई थी। मैंने यह एक पिछली पोस्ट में भी वर्णित किया है कि जब किसी भावनात्मक आघात से मन अचानक निर्विचार होकर शून्य सा हो जाता है, तब अचानक मूलाधार से ऊर्जा की नदी पीठ से होकर सहस्रार तक चढ़ती है। मेरे साथ भी पहली बार ऐसा ही हुआ था, जिसका वर्णन मैं पहले कर चुका हूँ। इसमें कुछ भी रहस्यात्मक या चमत्कारिक नहीं है। यह शुद्ध वैज्ञानिक घटना होती है। इसीलिए यह घटना धर्म-मर्यादा की सीमाओं से भी नहीं बंधी हुई होती। ऐसा किसी के साथ भी हो सकता है। जैसे बादल और धरती के बीच विभवांतर या ऊर्जा के अंतर के बढ़ने से बादलों से बिजली निकलकर जमीन पर गिरती है, वैसे ही मस्तिष्क या सहस्रार और मूलाधार के बीच होता है। जब तंत्रयोग से मूलाधार में ऊर्जा इकट्ठी हुई हो, और तभी किसी मानसिक सदमे या झटके से मस्तिष्क की ऊर्जा अचानक कम हो जाए, तो मूलाधार से बिजली सहस्रार को गिरती है। वह बिजली रीढ़ की हड्डी के केंद्र से होकर गुजरती है। इसे ही सुषुम्ना का जागरण या कुंडलिनी जागरण कहते हैं। वह मानसिक सदमा बेवफाई, धोखे, परेशानी, हताशा आदि किसी भी प्रकार से लग सकता है। वह ऊर्जा मन के विचार को जागृत कर देती है, अर्थात समाधि पैदा करती है। तो इसका मतलब यह हुआ कि कुंडलिनी योग प्रतिदिन करना चाहिए। क्या पता कब मानसिक सदमे वाली स्थिति पैदा हो जाए। इससे जागृति की संभावना तभी ज्यादा होगी, जब सारे चक्र विशेषकर मूलाधार चक्र ऊर्जावान होगा। साथ में, इससे सभी नाड़ियाँ भी खुली हुई रहेंगी, जिससे ऊर्जा का गमन आसान होगा। विशेष बात यह है कि कुंडलिनी को बनाया ही इसलिए होता है ताकि शून्य आसानी से प्राप्त हो जाए। होता क्या है कि अन्य सभी विचारों की बजाय कुंडलिनी ज्यादा प्रभावी होती है। इसका मतलब है कि कुंडलिनी सभी विचारों के साथ जुड़ी होती है। जैसे ही किसी मानसिक झटके से कुंडलिनी नष्ट होती है, वैसे ही उससे जुड़े हुए सभी विचार भी साथ में एकदम से नष्ट हो जाते हैं। यदि कुंडलिनी न हो, तो सभी अलग-2 सैंकड़ों विचारों को नष्ट करना लगभग असंभव के समान हो जाए। तभी तो कहते हैं कि जागृति उन्हीं को मिलती है, जिनकी कुंडलिनी सक्रिय होती है। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ था। मैं कई वर्षों से कुंडलिनी योग कर रहा था। फिर पुराने सहपाठियों से ऑनलाइन मुलाकात हुई। मैं बहुत खुश हुआ। फिर किन्हीं वजहों से मुझे अपने प्रति बेवफाई महसूस हुई जिससे मुझे अजीब सा मानसिक व भावनात्मक आघात लगा। वह आनन्द व शून्यता से भरा हुआ था। इतने वर्षों से क्रियाशील कुंडलिनी मुझे नष्ट होती हुई सी महसूस हुई। मैं शून्य, खाली और हल्का सा हो गया। मूलाधार और सहस्रार के बीच विभवांतर बहुत बढ़ गया क्योंकि मेरा मूलाधार कुंडलिनी योग से काफी सक्रिय बना हुआ था। एक ऊर्जा की चमकदार लकीर मुझे अपनी रीढ़ की हड्डी से चढ़ी हुई व सहस्रार से जुड़ी हुई महसूस हुई। वहाँ हल्की सी जागृति का आभास भी हुआ, पूर्ण नहीं। हालाँकि मैं उस समय आधी नींद में था, और उसी अर्धनिद्रा की अवस्था में मुझे रात को अपनी आंखों से भावनात्मक अश्रु भी महसूस होते रहे। क्षणिक आत्मज्ञान भी ऐसी ही शून्यता से प्राप्त हुआ था। पर मुझे दुनियादारी में रहने वाले के लिए यह शून्यत्व वाला तरीका ठीक नहीं लगता। इससे आदमी पलायनवादी सा बन जाता है। यह वैज्ञानिक तरीका भी नहीं लगता मुझे। शून्यत्व तो बहुत से लोग महसूस करते रहते हैं, पर समाधि बहुत विरले लोग ही महसूस कर पाते हैं। लोग नशे से भी शून्यत्व जैसी स्थिति प्राप्त करने की कोशिश करते हैं। मेरा जागृति का उपरोक्त पहला तरीका शून्यत्व जैसा लगता है लोगों को, पर वह भी पूरी तरह से शून्यत्व वाला नहीं था। वह भी हरफनमौला तांत्रिक वाला तरीका था। हालांकि वह दूसरी जागृति वाले तरीके से थोड़ा कम तांत्रिक था। जब भी मेरा झुकाव जागृति की तरफ होता था, या मुझे जागृति की याद आती थी, तो यहाँ तक कि अच्छे-खासे तथाकथित विद्वान लोग भी मुझे शून्यपरस्त सा समझकर मेरा मानसिक बहिष्कार जैसा कर देते थे, आम आदमी की बात तो छोड़ो। पता नहीं जागृति को लोग शून्यप्राप्त ही क्यों समझते हैं। ऐसा तंत्र विज्ञान की अनदेखी के कारण हुआ है। अब तो तंत्र विज्ञान लुप्तप्राय जैसा ही लगता है मुझे। तँत्रविज्ञान के मूल सिद्धांत के अनुसार तो जागृति और दुनियादारी, दोनों ही यथोचित गुणवत्ता से व यथोचित गति से एकसाथ दौड़ते हैं। यह कर्मयोग से काफी मिलता जुलता है।
पता नहीं मुझे अंतर्मन में क्यों लगता है कि शून्यत्व वाला कुंडलिनी तरीका कायरों के जैसा तरीका है। पता नहीं यह मुझे भिखारियों और लाचारों के जैसा तरीका क्यों लगता है। इसके लिए दूसरों के सहारे रहना पड़ता है। जब कोई भावनात्मक आघात देगा, तब जागृति होगी। जो भावनात्मक आघात दे, उसे उसके लिए धन्यवाद भी नहीं कर सकते। अजीब सा कंसेप्ट है।  हो सकता है कि मुझे ही ऐसा लगता हो, क्योंकि सबकी शरीर संरचना भिन्न होती है। ये मेरे अपने विचार हैं, और अपने पर अनुभव करके उठे हैं। मैं कोई सिद्धांत प्रस्तुत नहीं कर रहा हूँ। जब आदमी हर तरफ से पिटेगा, तभी शून्यत्व महसूस होगा, और जागृति होगी। किसीके द्वारा पिटने का मतलब किसीके द्वारा दिया जाने वाला भावनात्मक आघात ही है। दोनों में कोई अंतर नहीं है। बल्कि भावनात्मक आघात तो भौतिक पिटाई से भी बुरा है, क्योंकि उससे मन-आत्मा की गहराई तक पिटाई होती है। इसी पिटाई-सिद्धांत की वजह से तो यह कहावत प्रचलित हुई है, “जिसका कोई नहीं है, उसका भगवान है”। इस तरीके में आदमी अपने शरीर को भी अक्सर नुकसान पहुंचाता है। वह संतुलित आहार नहीं लेता, संतुलित जीवन नहीं जीता। वह शरीर का बहुत दमन करता है। यह इसीलिए ताकि भावनात्मक आघात का असर ज्यादा से ज्यादा हो, और वह ज्यादा से ज्यादा शून्य बने। क्योंकि यदि आदमी शक्तिमय जीवन से शक्ति हासिल करेगा, तो शून्यत्व से बचने के लिए इधर-उधर हाथ-पैर मारेगा। यह तरीका तो कोयले की खान से हीरा निकालने की तरह है। यही तरीका मुझे ज्यादातर प्रचलित दिखता है। मुझे लगता है कि यह तरीका विशेष परिस्थितियों में ही काम करता है, पर लोगों ने इसे सामान्य बना दिया है। वास्तव में यह ध्येय या साध्य है, पर लोगों ने इसे साधन बना दिया है। यह शून्य, साधना की चरमावस्था में खुद पैदा होता है, पर लोग इसे साधना किए बिना ही जानबूझकर पैदा करके करते हैं। वास्तव में यह एक आभासिक शून्य की तरह होता है, असली शून्य नहीं, पर लोग अपने लिए एक असली शून्य जैसा पैदा कर लेते हैं, घौंसले की तरह, रहने के लिए। यह प्रकाशमान, आनन्दमयी, चेतन और कुंडलिनी से भरे शून्य की तरह होता है, पर कई लोग इसे अंधकारमयी, दुखमयी, जड़ और कुंडलिनी से रहित शून्य समझकर इसका मजाक उड़ाते हैं। यह शून्य बहुत थोड़े समय के लिए टिकता है और जागृति पैदा करके नष्ट हो जाता है, पर लोग इसे लगातार बना कर रखते हुए अपने मस्तिष्क को औऱ अपनी इंद्रियों को जैसे लॉक रूम में जैसे बन्द कर देते हैं। अगर यह तरीका इतना कारगर होता, तो आज हर जगह जागृत लोग ही दिखते। पर आप को तो लैम्प लेके ढूंढने से भी बिरले ही मिलेंगे। दूसरे, वीरों और राजाओं वाले तांत्रिक कुंडलिनी तरीके वाले लोग भी विरले ही दिखते हैं मुझे। क्योंकि वे इसे ठीक ढंग से व खुल के नहीं करते। उनके मन में इस बारे संदेह रहता है। संदेहात्मा विनश्यति। इस तरीके में अपने आम रोजमर्रा के व्यावहारिक जीवन को नीचे नहीं गिराया जाता, बल्कि तांत्रिक शक्ति से कुंडलिनी को ही इतना ऊपर उठाया जाता है कि उसके सामने भरा-पूरा भौतिक जीवन शून्य जैसा हो जाता है। यह ऐसे ही होता है जैसे सूर्य के सामने दीपक की ज्यादा अहमियत नहीं होती। शून्य बनने की नौबत ही नहीं आती। कुंडलिनी-सूर्य को संसार-दीपक से ज्यादा चमकाने के लिए दो ही तरीके हैं। या तो संसार-दीपक को बुझा दो, या फिर कुंडलिनी-सूर्य को इतना अधिक चमका दो कि संसार-दीपक फीका पड़ जाए। इससे भौतिक व सामाजिक जीवन भी साथ में तरक्की करता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि शक्ति हरेक काम करती है, भौतिक भी और आध्यात्मिक भी। मैं अपनी बात बताऊँ, तो अपने प्राणोत्थान व कुंडलिनी जागरण के दौरान मैं सांसारिक रूप से काफी क्रियाशील था। मैं कुंडलिनी जागरण के लिए जंगल की किसी गुफा की तरफ नहीं भागा। मैं एक मशहूर योगी की बहुचर्चित कुंडलिनी सम्बन्धी किताब पढ़ रहा था। उसमें वे कहते हैं कि वे महानगर को छोड़कर हिमालय के सुनसान व भयानक जंगल में कई महीनों तक साधना करते रहे। अंत में उन्हें जाल बुनती हुई मकड़ी का स्पष्ट चित्र मन में दिखा। आंखें खोली तो बाहर भी हूबहू वही दृश्य था। फिर लिखते कि फिर वे साधना पूर्ण करके अपने घर आ गए। माना कि यह एकाग्रता की उच्च अवस्था है, पर साधना की पूर्णता में कुंडलिनी का और कुंडलिनी जागरण का कहीं जिक्र नहीं था, जिसके लिए वह पुस्तक मूलरूप में बनी थी। पता नहीं वह साधना की पूर्णता क्या थी? मन की आंखों से मकड़ी को जाला बुनते हुए देखने के लिए इतना ज्यादा संघर्ष? मैं यहाँ किसी की आलोचना नहीं कर रहा हूँ, बल्कि तथ्य सामने रख रहा हूँ। आध्यात्मिक विकास इसलिए भी रुकता है जब आदमी तथ्यों की छानबीन इस डर से नहीं करता कि कहीं यह किसी की आलोचना न बन जाए। इसी तरह एक अन्य महोदय अपनी प्रसिद्ध पुस्तक में लिखते हैं कि वे खंडहरनुमा अंधेरे कमरे में सुनसान अकेले में कुंडलिनी साधना करते थे। कई महीनों बाद उन्हें पीठ के आधार पर अंडे जैसे के फूटने और उससे प्रकाशमय तरल पीठ के बीचोंबीच ऊपर चढ़ता हुआ महसूस हुआ। इसी अनुभव के साथ वह कुंडलिनी पुस्तक समाप्त हो जाती है। हालाँकि ये हैरानी भरे अनुभव हैं, पर कुंडलिनी और कुंडलिनी जागरण का कुछ पता नहीं। मैं अपने कुंडलिनी जागरण की झलक के दौरान पूरी तरह से विकसित और सभ्य समाज के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहा था। मैं अपने सांसारिक कर्मों औऱ दायित्वों का निर्वहन पहले की तरह कर रहा था। अत्याधुनिक सुविधाओं का उपभोग कर रहा था। अत्याधुनिक गाड़ी में अत्याधुनिक मार्गों और स्थानों का सपरिवार भ्रमण-आनन्द ले रहा था। अत्याधुनिक बड़े पर्दे पर उच्च गुणवत्ता की फिल्में सपरिवार देखने अक्सर लॉन्ग ड्राइव पे चला जाता। प्राकृतिक और कृत्रिम, दोनों किस्म के नजारों का भरपूर लुत्फ उठाते हम लोग। और तो और, अंतरराष्ट्रीय कुंडलिनी फोरम पर पूरी तरह से सक्रिय था। अब इससे बढ़कर क्या दुनियादारी हो सकती है। मुझे रंगीन दुनिया से कभी अलगाव महसूस नहीं हुआ। साथ में ज्यादा लगाव भी महसूस नहीं हुआ। चमकदार दुनिया के साथ तांत्रिक शक्ति से कुंडलिनी को भी सबसे अधिक चमका भी रखा था। इससे सारा संसार पूरी तरह से चमकता हुआ भी अद्वैतकारी कुंडलिनी के आगे फीका ही रहता था। अद्वैत से सबकुछ एकजैसा लगता था। शायद ड्राइविंग का और भ्रमण का भी अद्वैत को पैदा करने में कुछ योगदान है। कुंडलिनी हर समय मस्तिष्क में रहती थी। ऐसा लगता था कि सबकुछ कुंडलिनी के अंदर है। इसका मतलब यह नहीं कि ऐसे भोगविलास से ही कुंडलिनी जागरण होता है। मैं तो बस उदाहरण दे रहा हूँ। आप शून्यत्व वाले पहले कुंडलिनी तरीके को नेगेटिव प्रेशर तरीका कह सकते हैं। इसका मतलब है कि इसमें शून्यत्व का वैक्यूम कुंडलिनी ऊर्जा को ऊपर की तरफ चूसता है। यह ऐसे ही है जैसे हम स्ट्रॉ से जूस चूसते हैं, या वैक्यूम कलीनर डस्ट को चूसता है। इसी तरह दूसरे वाले तांत्रिक कुंडलिनी तरीके को पॉजिटिव प्रैशर तरीका कह सकते हैं। इसका मतलब है कि इसमें तांत्रिक शक्तियों से कुंडलिनी को नीचे से ऊपर की तरफ बलपूर्वक पम्प किया जाता है। यह ऐसे ही है जैसे नदी के पानी को पहाड़ी की चोटी तक विद्युतचालित मोटर पम्प से चढ़ाया जाता है। कई लोग दोनों तरीकों का संतुलित इस्तेमाल करते हैं। वे मस्तिष्क में भी थोड़ा सा शून्य बनाते हैं, और तांत्रिक शक्ति से चालित कुंडलिनी पम्प से मूलाधार से भी कुंडलिनी ऊर्जा को ऊपर चढ़ाने के लिए अतिरिक्त बल प्रदान करते हैं। सम्भवतः मेरा कुंडलिनी जागरण की झलक प्रस्तुत करने वाला तरीका भी यही था। अद्वैत भाव से मेरे अंदर हल्का सा आभासिक शून्य बना होगा। इसीलिए इतनी आसानी से हो गया। बेशक यह कुंडलिनी जागरण की दस सेकंड की झलक थी, पर था तो कुंडलिनी जागरण ही। एक लीटर पानी और पांच लीटर पानी के बीच में तत्त्वतः कोई अंतर नहीं है। वह झलक इसलिए खत्म नहीं हुई कि मैं उसके योग्य नहीं था या मैं उसके लिए तरसता था। उस झलक को मैंने खुद जानबूझकर खत्म किया। ऐसा इसलिए क्योंकि मैं पारलौकिक आयाम में प्रविष्ट नहीं होना चाहता था। मैं अपने पिछले अनुभव से हताश हो गया था। आजकल इस आयाम का कोई सम्मान नहीं है। ऐसे आदमी को पागल व पलायनवादी समझा जाता है। ऐसे आदमी की वैज्ञानिक व प्रगतिशील सोच को भाँति-2 की अति रूढ़िवादी और अति भौतिकवादी धारणाओं से एकसाथ दबा दिया जाता है। ऐसी धारणाओं वाले लोग समझते हैं कि इसे अंधेरे बिल में सोते-2 ही जागरण प्राप्त हो गया। वे यह नहीं देख-समझ पाते कि इसे इसके लिए इसे बहुत से भौतिक संघर्ष करने पड़े हैं। इसे शून्य पद की उपाधि तब मिली है, जब इसने सबसे ज्यादा भौतिक व सामाजिक उपलब्धियां हासिल की हैं, और यह फिर से विकासवादी भौतिक जगत में प्रविष्ट होने के लिए तैयार है, पर जागृति के साथ। वास्तव में जागृति एक ऐसा पारलौकिक आयाम है, जो किसी को नहीं दिखता, सिर्फ शून्य ही नजर आता है। इसी तरह अधिकांश लोगों को यह पता ही नहीं होता कि जो कुंडलिनी आध्यात्मिक विकास के लिए जरूरी है, वही कुंडलिनी भौतिक विकास के लिए भी जरूरी है। यदि जागरण का आनन्द कुंडलिनी से मिलता है, तो भौतिक भोग-विलास भी कुंडलिनी की सहायता से ही उपलब्ध होता है। उन्हें कुंडलिनी महसूस तो होती रहती है, क्योंकि अपने अनुभव को कोई नहीं झुठला सकता। पर उन्हें उसके बारे में विस्तार से जानकारी नहीं होती। यह ऐसे ही होता है जैसे एक चीनी से अनजान आदमी उसकी मिठास तो अनुभव कर सकता है, पर उसे उसके बारे में विस्तार से पता नहीं होता, जैसे चीनी का रंग-रूप क्या है, यह कहाँ से आई, कैसे बनी, कैसे काम करती है, इसके क्या-2 फायदे हैं, और कहाँ-2 इस्तेमाल होती है। जागृति के बाद आदमी के अपने प्यारे लोग भी बेगाने हो जाते हैं। क्योंकि उसका रूपांतरण होता है। ऐसे आदमी की दिल की गहराई को कोई नहीं समझता। कई मामलों में तो जिगरी दोस्त भी जिगरी दुश्मन बन जाते हैं। ईश्वरीय शक्ति हाथ लगने से आदमी क्रांतिकारी कदम उठाता है। उसे हिंसक क्रांतिकारी तो नहीं कह सकते पर शांतिपूर्ण रेबेलियन या समाज सुधारक कह सकते हैं। पर आम आदमी उसे क्रांतिकारी ही समझते हैं, क्योंकि उनकी नजर ही वैसी होती है। रिवोल्यूशनिस्ट और रेबेलियन के बीच में जो अंतर ओशो ने बताए हैं, वे पढ़ने लायक हैं। इससे जान का ख़तरा हमेशा बना रहता है। मैंने खुद इन्हें पहली जागृति के बाद अनुभव किया है। इतना कुछ करने के बाद भी अगर अपने आदमी ही पराए हो जाएं, तो क्या फायदा। इसलिए इस दुनिया में खुलकर मजे करने चाहिए। जो जितना ज्यादा मूर्ख है, वह इस दुनिया में उतना ही ज्यादा सुखी है। रूपांतरण के झटकों से मूर्ख ही सुरक्षित रहता है। उसके सभी अपने हैं। अध्यात्म और भौतिकता का संतुलन ही सर्वोत्तम है। मध्यमार्ग ही सर्वोत्तम है। ये मेरे अपने विचार हैं, इसीलिए व्यक्तिगत ब्लॉग पर लिख रहा हूँ। यह कोई कथा-उपदेश सुनाने वाला ब्लॉग तो है नहीँ। मुझे लगता है कि नेगेटिव प्रेशर वाला कुंडलिनी तरीका उनके लिए है, जो कमजोर, बीमार, वृद्ध, ऊर्जाहीन और दुनियादारी से दूर हैं। पोजिटिव प्रेशर वाला कुंडलिनी साधना का तरीका उनके लिए है, जो ताकतवर, स्वस्थ, जवान, ऊर्जावान और दुनियादारी में डूबे हुए हैं।
असली और वैज्ञानिक तरीका तो कुंडलिनी ध्यान ही है। इसमें मूलाधार की ऊर्जा-नदी को ऊपर चढ़ाने के लिए विचारों की शून्यता का नहीँ, बल्कि विचारों (कुंडलिनी विचार/चित्र) की प्रचंडता का सहारा लिया जाता है। इसलिए यह मानवीय व प्रेम से भरा तरीका है। यह व्यवहारवादी व लौकिक तरीका है, जो सबके अनुकूल है। भौतिकवादी प्रकार के लोगों के लिए तो यह तरीका सर्वोत्तम ही है। दूसरी ओर, शून्यत्व वाला तरीका जँगली सा तरीका लगता है। मुझे तो लगता है कि सम्भवतः ऋषि पतंजलि के अष्टांग योग के इसी मूल सूत्र के गलतफहमी से भरे प्रचलन से ही हिंदुओं का स्वभाव पलायनवादी जैसा रहा होगा। हालाँकि दोनों ही तरीके कुंडलिनी चालित हैं, पर छोटा सा अहम अंतर है, जिसे लोग आसानी से नहीँ देख पाते। शून्यत्व वाले कुंडलिनी तरीके में कुंडलिनी से शून्यत्व पैदा किया जाता है। इसमें बहुत समय लग जाता है। इसमें तांत्रिक यौनबल का सहारा भी नहीं लिया जाता है। यह शुद्ध अष्टांगयोग वाला या राजयोग वाला तरीका है। तांत्रिक कुंडलिनी तरीके में कुंडलिनी को तांत्रिक यौनबल देकर इतना मजबूत कर दिया जाता है कि कुंडलिनी शून्यत्व को बाईपास करके सीधे ही मूलाधार की ऊर्जा-नदी को सहस्रार तक खींच लेती है। इसीलिए तांत्रिक कुंडलिनी जागरण हमेशा कुंडलिनी से शुरु होता हुआ अनुभव होता है। शून्यत्व वाला जागरण किसी भी विचार या चित्र से शुरु हो सकता है, हालांकि ज्यादातर कुंडलिनी से ही शुरु होता है, और ज्यादा भूमिका कुंडलिनी की ही होती है, क्योंकि उसका ध्यान करने की आदत होती है। तांत्रिक कुंडलिनी जागरण के दौरान तो आदमी दुनियादारी के मजे उड़ा रहा होता है, घूम-फिर रहा होता है। पर शून्यत्व वाले कुंडलिनी जागरण के दौरान वह दुनिया की नजरों में अकेले जैसा, निवृत्त जैसा, और अवसादग्रस्त जैसा होता है। एक सामाजिक प्राणी के लिए शून्यत्व पैदा करना आसान नहीं है। अगर पैदा हो गया, तो उसे बना कर रखना आसान नहीं है, क्योंकि ऐसा तो नहीं है कि शून्यत्व पैदा होते ही जागरण हो जाए। मुझे लगता है कि हिन्दू धर्म में जो भौतिक व बौद्धिक विकास की रप्तार कम हुई, उसके लिए कहीँ न कहीं यह शून्यत्व साधना भी जिम्मेदार है। पतंजलि के चित्तवृत्ति या मन के विचारों के रोधन से लोग यह मतलब लगाने लगे होंगे कि दिमाग का जितना कम प्रयोग करेंगे, उतनी ही जल्दी और बढ़िया जागृति होगी। पर वे पतंजलि के गूढ़ भाव को नहीं समझे होंगे, जिसके अनुसार कुंडलिनी साधना खुद शून्यत्व पैदा करती है, जानबूझकर दिमाग को बंधक बनाने की जरूरत नहीं। पतंजलि योग में यम-नियम आदि चित्त-विरोधी विधियों से दिमाग की बैकग्राउंड सीनरी की डार्कनेस को बढ़ाकर कुंडलिनी चित्र को चमकाने की कोशिश की जाती है। कुंडलिनी को अतिरिक्त ऊर्जा देने के लिए इसमें ऊर्जाघन पदार्थों जैसे कि तांत्रिक पंचमकारों के सेवन का प्रावधान नहीं है। जबकि कुंडलिनी योग में बैकग्राउंड सीनरी की चमक को बढ़ाकर कुंडलिनी को चमकाने के लिए अतिरिक्त ऊर्जा प्रदान की जाती है। साथ में, तांत्रिक तकनीकों से बैकग्राउंड सीन की चमक को भी कुंडलिनी के ऊपर स्थानांतरित किया जाता रहता है। इससे लौकिक ऐशोआराम भी दुष्प्रभावित नहीं होता। हालांकि यह एक वैश्विक सत्य है कि कुछ न होने से कुछ होना बेहतर है। मेरे कहने का मतलब है कि जिस किसी भी मानवीय तरीके से कुंडलिनी जागरण की संभावना हो, उसे झटक लेना चाहिए।

कुन्डलिनी योग में दाढ़ी-मूँछ की भूमिका~ एक आध्यात्मिक हास्यात्मक व्यंग्य

Laughing Buddha

मैं एक पिछली पोस्ट में बता रहा था कि जब मेरी कुन्डलिनी शक्ति जागरण के लिए मूलाधार से ऊपर उठी, उस समय वहाँ महिलाओँ का समूह सामारोहिक नाच गाना कर रहा था। एक महीने से चले आ रहे तीव्र कुन्डलिनी योगाभ्यास से मेरी मध्यम आकार की दाढ़ी उग आई थी। काले बालों के झुंड में उगे कुछेक सफेद बाल दुनिया की भीड़ में साधु पुरुष जैसे भले जान पड़ते थे। इसलिए कई औरतें मुझे भोलेपन, प्यार व अचम्भे से निहार रही थीं। वहाँ पर बढ़ी हुई और मैचिंग दाढ़ी वाले कुछ दूसरे लोग भी थे, जो मुझे विशेष प्यार, आदर और अपनापन दे रहे थे। इससे जाहिर होता है कि दाढ़ी वाले लोग ही असली दाढ़ी की पहचान रखते हैं। हीरे को कौन पहचाने, जौहरी। इसमें हंसने वाली कोई बात नहीं, क्योंकि यह जोक नहीं सच्चाई है। वैसे भी औरतें बढ़ी हुई दाढ़ी से बड़ी प्रभावित और आकर्षित होती हैं। यदि उसके साथ कुन्डलिनी योगाभ्यास भी जुड़ा हो और वह भी तांत्रिक प्रकार का, तब तो कहने ही क्या। इससे भी मेरी सुषुप्त कुन्डलिनी शक्ति को जागने के लिए पर्याप्त बल मिला। असली दाढ़ी वही होती है जो साधना के प्रभाव से खुद उग आए, जिसे उगा के न करना पड़े, और जिसे फैशनेबल बनाने के लिए ज्यादा सौंदर्य प्रसाधन भी न लगाना पड़े। साधना के बल से आंखों में ऐसी चमक पैदा हो जाती है कि बाकि सभी सौंदर्य प्रसाधन उसके आगे फीके पड़ने लगते हैं। दिल में इतना नूर छा जाता है कि चेहरे के नूर पर ध्यान देने का मन ही नहीं करता। बार-बार चेहरे के नकली नूर की तरफ ध्यान न जाए, इसके लिए ही तो आदमी की दाढ़ी अपने आप बढ़ने लगती है। कुछ करने की जरूरत ही नहीं पड़ती। कई लोग ज्यादा आकर्षक बनने के लिए और खासकर महिलाओं को आकर्षित करने के लिए जानबूझ कर दाढ़ी बढ़ाते हैं। साधना का तो वे नाम भी नहीं जानते। कुछ महिलाएं ऊपर ऊपर से तो उनसे आकर्षित होती हैं, पर दिल से उनसे प्रभावित नहीँ होती। पर जो महिला गहरी नजर और साधना का शौक रखती हो, वह तो उससे बेहतर क्लीन शेव आदमी को समझती है। क्योंकि क्लीनशेव पुरुष कम से कम धोखा तो नहीं कर रहा होता है, और बेचारा कम से कम नकली नूर से ही तो काम चला रहा होता है। ये जो कहते हैं न कि समथिंग इज बैटर दैन नथिंग। अब तो मेरी शेविंग किट डब्बे में पड़ी बोर हो रही होगी। पहले मैं नाई की दुकान जाया करता था हेयर ट्रिम करवाने। हफ्ते में एकबार। फेस पर कभी जीरो पर ज्यादातर नंबर एक की ट्रिम सेटिंग रखवाता था। मूछों पर ज्यादातर दो नम्बर की सेटिंग रखवाता था। अब तो मैंने अपना ट्रिमर ले लिया है। अपनी मर्जी से दाढ़ी और मूंछों की लंबाई रखता हूँ। एक दिन तो भाई गजब हो गया। हुआ यह कि दाढ़ी तो मैंने दो नम्बर की सेटिंग से बना ली थी। ट्रिमर के रेगुलेटर व्हील को तीन नंबर की तरफ घुमाने लगा ताकि मूंछें कुछ बड़ी रखता। पर यह क्या, व्हील उल्टा घूम गया। उस समय शाम गहरा जाने से वहाँ रौशनी भी कम थी और मैं भी कुछ ज्यादा ही जल्दी में था। अब इस पापी मन का पेट भरे तब न। वो भी दिन थे जब कई घंटों चल कर नाई की दुकान में पहुंचना पड़ता था। वहाँ भी रंगबिरंगे जंगलों को अपने मुंह पे सजाए लोगों की लंबी लाइन लगी होती थी। एक दाढ़ी के चक्कर में लगभग पूरा दिन बर्बाद हो जाता था। आजकल देवस्वरूप इस ट्रिमर ने घण्टों का काम मिनटों में समेट लिया है, फिर भी चाहिए इस मन को जल्दी। उस जमाने में एकदिन की पूरी कमाई मुंह पर उगे बगीचे की सफाई में लग जाती थी, पर आज यह कंजूस मन बाथरूम मिरर के ऊपर एक अच्छा सा बल्ब लगाने को राजी नहीँ। बगीचा इस आस से बोल रहा हूँ कि शायद कुंडलिनी फल इसीमें पकता हो, क्योंकि अधिकांश योगी बाबा दाढ़ी वाले ही नजर आते हैं मुझे। तीन की बजाय लैंथ सेटिंग एक हो गई थी। एक चौथाई मूँछ एक झटके में साफ हो गई। ट्रिमर कोई कैंची थोड़े ही है, जो संभलने का मौका दे। अधकटी मूँछ रखता तो लोग पता नहीं कौन सी मानसिक बीमारी समझ कर मुझे चिढ़ाते। इसलिए मजबूरी में पूरी मूँछ ही साफ करनी पड़ी और दाढ़ी भी। भला हो इस कोरोना फेसमास्क का जिसने अगली दिन मेरी सेहत को बचा लिया, वरना ताना दे देकर लोग जरूर गिरा देते। अब मार्केट में उपलब्ध स्टाईलिश ट्रिमर मशीनों के आगे रेजर ब्लेड वाला युग बीता हुआ युग लगता है। वैसे भी चिकित्सा विज्ञान के अनुसार क्लीनशेव मुंह ज्यादा गंदा होता है। जब सूक्ष्मदर्शी यंत्र से ऐसे मुंह का निरीक्षण किया गया तब कीटाणुओं की रंगबिरंगी कॉलोनियों के जंगल उसमें पाए गए। मुँह पर रेजर की खरोंच से शरीर के अन्दरूनी सेल्स कीटाणुओं की खुराक बनने के लिए इस तरह से बाहर निकलते रहते हैं, जैसे कि खेत में हल की खुदाई से मिट्टी में दबे कीड़े मकोड़े पक्षियों की खुराक बनने के लिए बाहर निकलते हैं। जब ट्रिमर से साफ किया गया मुँह देखा गया, तब बाहर से तो वह जंगल की तरह लग रहा था, पर अंदर से एकदम चकाचक। इसलिए हम आपको भी यही सलाह देते हैं कि एक अच्छा सा ट्रिमर रख लो और कुन्डलिनी योगी बन जाओ।

मेरे को देखकर बहुत से लोग जटाधारी बन गए। पर यह पता नहीं कि साथ में कुन्डलिनी योगी भी बने या फिर मुंहदिखाई भर के ही योगी बने। अगर योगी भी बनते तो मेरी सूरत के साथ सीरत का भी जायजा लेते। पर यह क्या, दूर-दूर और छिप-छिप के ही उन्होंने मेरी दाढ़ी का नुस्खा चुरा लिया, कुन्डलिनी योग गया तेल लेने। हाँ, तेल से याद आया। कइयों का आरोप है कि मूंछें बहुत तेल पीती हैं। इससे मुझे लगा कि यहाँ वस्तुस्थिति स्पष्ट कर देना जरूरी है, ताकि बेचारी बेकसूर मूंछें यूँ ही बदनाम न होती रहें। दरअसल वे अपनी मर्जी से या अपने ऐशो-आराम के लिए तेल नहीं पीतीं, बल्कि शनिदेव अपनी दिव्य अचिंत्य शक्ति से उनसे अपने लिए तेल पिलवाते हैं। इसलिए उन दाढ़ी-शरणागत लोगों से कुंडलिनी योगा हुआ हो या न हुआ हो, पर उनकी दाढ़ी में लगे तेल से शनिदेव जरूर प्रसन्न हुए होंगे। दोस्तो, आप तो जानते ही हो कि शनिदेव को काला रंग और सरसों का तेल बहोत प्रिय हैं। इसलिए यदि शनि का प्रकोप हो, तो इधर-उधर की जरा भी न सोचें। सरसों के तेल से सींच कर अपने सदाबहार झाड़ को जितना ज्यादा काला, घना और विकराल बनाएंगे, पूज्य शनिदेव उतने ही अधिक फूले नहीं समाएंगे। और आपको यह भी पता होगा कि नाराज शनिदेव जितने बुरे हैं, खुश होने पर उतने ही भले भी हैं। खैर मैं क्या कह रहा था कि अब चिकने चुपड़े लोगों की जगह जटाधारी लोगों का दिखना आम हो गया है। और तो और, नकल करने की होड़ ऐसी लगी कि छोटे बच्चे भी पापा के रेजर से मुँह खंरोचने लग गए, इस आस से कि शायद उनके भी बाल उग आएं। मैं बढ़ी दाढ़ी के फैशन को शुरु करने वाला ऐसा आइकन पीस बन गया कि जब कहीं मुँह की खारिश से परेशान होके मुंह के बाल छोटे करता, तो मिलने वाले लोग बोलते कि भाईसाहब आजकल आप कमजोर हो गए हैं। कमजोर नहीं, बहुत कमजोर। कसूर ट्रिमर का, और उलाहना सुने सेहत। बालों का भला सेहत से क्या रिश्ता। अब तो वे लोग ही जानें कि बालों से ऐसी कौनसी नाड़ी निकलती है, जो सीधी सेहत से जाकर जुड़ती है। और तो और, जो लोग मुझे क्लीनशेव आदमी के रूप में जानते थे, वे भी मेरी दाढ़ी को देखकर बोलते कि मियाँ आप कमजोर हो गए हैं। यह अब एक महान और रहस्यमयी खोजबीन का विषय है कि मुंह के बालों में बदलाव से सेहत कैसे गिर जाती है। सेहत भी सिर्फ उन्हीं लोगों की नजर में गिरती है, जिन्हें चेहरे में बदलाव नजर आता है। उसको खुद को और दूसरे लोगों को सेहत का गिरना जरा भी नजर नहीं आता। मूँछों की बात कोई नहीं करता। पता नहीं क्यों लोगों को मूँछों की बात करना दुखती रग को छूना लगता है। पर सच्चाई यह है कि जो जिंदगी में कभी न हँसा हो, वह भी मूँछों की बात से बतीसी चमकाते हुए हंसी का फव्वारा छोड़ दे। सीधे तौर पर हेयर ट्रिमर को कोई दोष न दे। सबको पता है कि अगर ट्रिमर या बालों को दोष दिया तो उससे लिंगभेद पैदा हो जाएगा। इससे जाहिर होता है कि आजकल के लोग कितने सयाने हो गए हैं, और साथ में लैंगिक समानता के प्रबल पक्षधर भी।

भाईसाहब हम करें भी तो आखिर क्या करें। दाढ़ी मुंडवाएँ तो डाढ़ी वाले लोगों की गैंग से बाहर, और अगर दाढ़ी बढ़ाएं, तो चिकने लोगों की गैंग से बाहर। आगे कुआँ, पीछे खाई। आप मानो न मानो, इस समस्या का हल इलेक्ट्रॉनिक ट्रिमर ही है। इसको लगाके आदमी इधर भी खप जाए और उधर भी। इसको दो नम्बर पर मुंह पर घुमा दो, तो दाढ़ी वाले भी खुश, और चिकने भी खुश। दो नम्बर पर ट्रिमर लगा डाला, तो लाइफ झिंगा-लाला। बौद्धों वाला मध्यमार्ग ही सबसे अच्छा है।  अगर ज्यादा ही असर चाहिए तो नकली दाढ़ी मूँछ रख लो, और चीनी में नमक की तरह हर जगह घुल-मिल जाओ। पर मुंह के बालों से तो व्यक्तित्व की पहचान जुड़ी होती है न। व्यक्तित्व की पहचान गई घास चरने। उसका जरा भी टेंशन नहीँ लेने का। अपुन तो बस मजे का बीन बजाना है। वैसे भी जजमेंटल बोले तो मीनमेख ढूंढते रहना आत्मा के लिए नुकसानदायक होता है। बस देखते रहिए, हंसी-मजाक में ही आप एक महान आध्यात्मिक गुरु बन जाएंगे। आपके तो दोनों हाथों में लड्डू आ जाएंगे।

कहते हैं कि बालों में आत्मा बसती है। आदमी को अपने मुंह के बाल सबसे ज्यादा अजीज होते हैं। मेरा डॉक्टर लोगों से दोस्ताना सम्बंध रहता है, क्योंकि वे बाल की खाल निकालने वाले होते हैं। भला उनसे अच्छा बालों को कौन समझ सकता है। वे बताते हैं कि वेंटिलेटर पर जिंदगी की साँसें गिन रहे लोग भी अपनी मूंछों को साफ नहीँ करवाते। वे अक्सर वेंटिलेटर के काम में भौतिक बाधा पहुंचाया करती हैं। माया मरे न मन मरे, मर-मर गए शरीर; आशा-तृष्णा न मिटे, कह गए दास कबीर। आदमी सब कुछ बर्दाश्त कर सकता है, पर अपने मुँह के बालों की बेइज्जती कभी बर्दाश्त नहीं कर सकता। तभी तो अजीज शख्स को नाक का बाल कहकर भी संबोधित किया जाता है। बेशक नाक का बाल है, पर है तो मूँछ का पड़ौसी ही। और वो पड़ौस ही क्या, जहाँ दिल न मिले। इसी तरह, जब चोर की दाढ़ी में तिनका, यह बोला जाता है, तो आदमी दाढ़ी पे हाथ घुमाए बिना रह ही नहीं पाता, बेशक उसे चोरी की सजा में फाँसी ही क्यों न हो जाए। आपको विश्वास न हो, तो आप प्रयोग करके देख लो। भला किस सच्चे दाढ़ीशुदा आदमी को अपनी प्रियतमा दाढ़ी पर एक अदना सा तिनका बर्दाश्त हो सकता है। बालों विशेषकर मूँछ के बालों के प्रति इस अथाह आकर्षण का ही परिणाम है कि एकबार वनविभाग का छापामार दल बाघ के दांतों और नाखूनों की छानबीन करने लोगों के घर पहुंचा, तो उसे उनकी जगह पर बाघ की मूँछ के बाल छिपाए हुए मिले। और तो और, सिक्ख धर्म में तो केश को धार्मिक महत्त्व का सर्वप्रमुख चिन्ह माना गया है। वहाँ तो केश रक्षा के लिए कटार का चलना भी जायज है। आपने महाभारत की कथा तो सुनी ही होगी न। उसमें पांडव, भगवान श्रीकृष्ण की सलाह पर अश्वत्थामा को मृत्युदंड न देकर उसका पूर्ण मुंडन करते हैं। साथ में माथे की मणि भी निकाल लेते हैं। भाईसाहब, वह मणि और कुछ नहीं, कुंडलिनी ही तो है, जो बालों के साथ खुद ही चलती बनी। वही माथे पर स्थित आज्ञाचक्र पर निवास करती है। अश्वत्थामा ने इसे अपनी मृत्यु से भी ज्यादा अपमानजनक समझा, और फिर देखा नहीं आपने कि कैसे उसने आगे चलकर बदले की कार्यवाही करते हुए ब्रह्मास्त्र चला दिया था, जिससे उत्तरा के गर्भ में झुलसते हुए परीक्षित को कैसे भगवान श्रीकृष्ण ने बाल-बाल बचा लिया था। इधर एक मशहूर नेत्री ने विदेशी मूल की महिला को प्रधानमंत्री बनने से रोकने के लिए अपने पूर्ण मुंडन की धमकी दे डाली, तो उधर एक विश्वविजेता खिलाड़ी ने अपनी कुलदेवी को प्रसन्न करने के लिए अपना पूर्ण मुंडन करा ही डाला। इसी तरह, तिरुपति बालाजी मंदिर में भगवान वेंकटेश्वर को बाल चढ़ाए जाते हैं। मान्यता है कि भगवान वेंकटेश्वर इन बालों की कीमत से कुबेर का कर्ज उतारते हैं। कुबेर सृष्टि के सबसे धनवान देवता हैं। इसका मतलब है कि फिर कर्ज की रकम भी बहुत भारी भरकम रही होगी। तो क्या फिर भगवान वेंकटेश्वर भक्तों से सोना-चांदी नहीं माँग सकते, सिर्फ बाल ही क्यों मांगते हैं। क्योंकि उन्हें पता है कि बाल सृष्टि की सबसे कीमती वस्तु है। वे जानते हैं कि बालों के अंदर आदमी का सारा बॉयोडाटा छिपा होता है। आप गूगल और फेसबुक जैसी कम्पनियों से पूछ कर देख सकते हैं कि डाटा की कीमत क्या होती है। थारे को जवाब मिल जावेगा। इतना इम्पोर्टेन्ट मैटर होने के बाद भी बालों की अचिंत्य शक्ति पर सही ढंग से वैज्ञानिक शोध हुए ही कहाँ हैं अभी तक। मुझे तो लगता है कि आज तक की सबसे कम समझी गई और सबसे जरूरी चीज बाल ही हैं। तो दोस्तो, बात यहीं पर जाकर अटकती है कि दाढ़ी-मूँछ के मामले में लापरवाही बरतना अच्छी बात नहीं है।

कुंडलिनी से भी तो आदमी का इसी तरह का गहरा लगाव होता है। हो न हो, पूरा का पूरा कुंडलिनी रहस्य बालों में ही छुपा हो। तभी तो केशों को पवित्र तीर्थस्थानों पर बहाने का रिवाज है। एक बार मैं दुश्मन इलाके में बैठे नाई से बाल साफ करवाने चला गया। समझ लो, यह मेरा एक रिसर्च प्रोजेक्ट था। मैं एक देसी वैज्ञानिक जो ठहरा। यह अलग बात है कि मेरी इन शुद्ध देसी खोजबीनों पर कोई ध्यान नहीं देता। फिर क्या था, उसके बाद वहां के लोग मेरे अजीज और मैं उनका अजीज। बालों की चमत्कारिक शक्ति को देखकर मैं दंग रह गया। बालों के रहस्यमयी टोटकों पर अभी ढंग से रिसर्च नहीं हुई है भाई साहब। मुझे तो पूर्ण विश्वास है कि बालों में ही सभी समस्याओं का हल मिल जाए। हमारे प्राचीन ऋषि मुनि बड़े पहुंचे हुए वैज्ञानिक हुआ करते थे। न हींग लगाते थे, न फिटकरी, और रिसर्च इतनी गहरी, जिसे छूने तक की हिम्मत आज की बड़ी-बड़ी प्रयोगशालाएं न कर सके है। तांत्रिक टोटकों को ही देख लो। कैसे पहुंचे हुए तांत्रिक, आदमी के सिर्फ एक बाल से पूरे आदमी को वश में कर लेते हैं। महिलाएं ऐसे केशतंत्र का ज्यादा शिकार बनती हैं, क्योंकि उन्हें ही अपने केश सबसे प्रिय होते हैं। बालों के इस छोटे से टोटके के आगे सारा आधुनिक विज्ञान फेल।। यह तो एक छोटा सा उदाहरण है। हमारे साथ बने रहिए, और देखते रहिए, आगे-आगे क्या होता है।

आदमी का त्वरित रूपांतरण जैसे कुंडलिनी जागरण से होता है, वैसे ही मूँछ काटने से भी होता है। इसीलिए पुराने जमाने में लोग अपने पापों से छुटकारा पाने के लिए अपनी मूँछ काट दिया करते थे। तभी से अपनी मूँछ बचाने की कहावतें बनीं। उदाहरण के लिए मूँछ ऊंची रखना, मूँछ न कटने देना, मूँछ का सवाल होना, मूँछ को शर्मिंदा न करना, मूँछ की लाज रखना, मूँछ की शर्म करना आदि बहुत सीं। सच भी है, सोने के जेवर की तरह अच्छी तरह से संभालकर रखी हुई मूँछ बुरे वक्त पे काम आती है। मुझे भी एकबार प्यार-संभाल कर रखी हुई मूंछों ने ही बचाया था। हुआ यह था कि मैं अपने बीते हुए जीवन से पूरी तरह उदास और निराश हो गया था। फिर किसी दैवकृपा से मिले एक गुरु सदृश तजुर्बेदार व्यक्ति ने मुझे मूँछ साफ करने की सलाह दी थी। वे खुद भी अपने नित नए नवेले चेहरे के शौकीन थे। दरअसल वे मेरे कॉलेज टाइम के रंगीन मिजाज के प्रोफेसर ही थे। कॉलेज की लड़कियां तो उनसे बड़ा लगाव रखती थीं। एकबार तो लगाव इस हद तक बढ़ गया था कि कुछेक छात्राओं को अपने साथ छेड़छाड़ की आशंका पैदा हो गई थी। भगवान जाने क्या-क्या मामले रहे होंगे। खैर, वे मूंछों की वजह से मेरे ऊपर ढाए गए सितम से अच्छी तरह वाकिफ थे। आपको तो पता ही है कि कॉलेज लाइफ में चिकने चेहरों की ही तूती बोलती है। मूंछों वालों को तो वहाँ पर बाबा बोला जाता है। बाबा भी अगर असली समझे, तब तो बात भी बने न। अब तो बाबा का मतलब भंगी, पगला, इश्क-विश्क में हारा हुआ और पता नहीं क्या-2। घिन्न आती है सोचकर भी। और तो और जितना भी आप अकल का घोड़ा दौड़ा सकते हो नकारात्मक लफ्जों के मैदान में, दौड़ा लो, सबका पर्यायवाची बाबा ही दिखेगा आपको। लापरवाह तो बाबा, भाँग पिए तो बाबा, शराब पिए तो बाबा, हड्ड चबाए तो बाबा, लुगाई संग घूमण लागे तो बाबा, मार-कुटाई करे तो बाबा। बस-2, समझदारों को इशारा ही काफी होता है। असली बाबा को बाबा कहोगे, तो चिमटा पड़ेगा। बाबा क्या दहेज में मिला शब्द है, जिस मर्जी के साथ मन किया, चिपका दिया। असली बाबाओं में एकता ही कहाँ, जो कोर्ट में पेटिशन दायर कर सके। कहते हैं न कि शेर अकेला चलता है, झुंड में तो भेड़-बकरियां चला करती हैं। इधर असली जाति-वर्ग को असली नाम से नहीं बुला सकते, और उधर जहाँ देखो, बाबा-बाबा-बाबा। तौबा के लिए, न बाबा न। बच्चियां नूं पुचकारण लई, ओ मेरा बाबा। इह तां माड़ा जिहा जचदा वी है, किवें कि बाबा ते बच्चे दोनों ही सौखे हुंदे हन। और अब तो नया ही ट्रेंड चल पड़ा है, माई क्यूटी बाबा। बाबा की मशहूरी का आलम यह कि एकबार मेरी पत्नी देवी ने मुझे प्यार से बाबा क्या कह दिया, मेरा छोटा सा बेटा हँसता ही जाए, हंसता ही जाए। मैंने पूछा मेरे बाबा इतना क्यों हँस रहे हो। तो वह मेरी तरफ अंगुली करके हँसते हुए बोला, बा-बा ब्लैक शीप। आजकल के बच्चे भी न कितने समझदार हो गए हैं। बाबा बरगा यूनिवरसल बोल नी देख्या अड़यो। कभी उस्ताद पहुंचे हुए हुनरमंद को कहते थे। आज भंगी ट्रक ड्राइवर को बोलते हैं। एक बार मैंने एक देसी इंजीनियर को तारीफ में उस्ताद क्या बोल दिया, उसने अगले ही दिन मुझे मानहानि का नोटिस भिजवा दिया। हाय राम, ये शब्द हैं के देसी तोप के गोले। गुरु शब्द बड़ा पवित्र अल्फाज़ माना जाता है। पर एक हिजड़े के निर्माण के दौरान भी इसका बहुत प्रयोग होता है। वहाँ पर कामदेव के शहर को उजाड़ने वाले एक्सपर्ट शख्स को भी गुरु बोला जाता है। कोई गलत काम करके आए, तो सबसे पहले इन्हीं शब्दों से स्वागत होता है, वाह गुरु। अब समय आ गया है कि हम पवित्र शब्दों की मर्यादा को बचाएं। अगर देशद्रोही की नापाक मूँछों को बचाने के लिए आधी रात में कोर्ट खुलवाए जा सकते हैं, तो इन शब्दों को बचाने के लिए क्यों नहीं। जबकि ये शब्द तो सबसे बड़े देशप्रेमी हैं, क्योंकि ये हमारी सनातन संस्कृति की रक्षा करते हैं। मैंने तो अपने समझदार मित्रों से साफ-2 शब्दों में कहलवा दिया है कि या तो वे मेरे आध्यात्मिक लेख न पढें, या फिर मुझे सपने में भी गुरु और बाबा न बोलें। एक चालू सा दोस्त मुझे बार-2 शरीफ कहकर चिढ़ाता था। मैंने उसे खरी-2 सुनाते हुए चेता दिया कि भले ही वह पाकिस्तान जाकर नवाज शरीफ को शरीफ बोल आए, पर मुझे कभी शरीफ न बोले। उसके बाद वो मुझे नेस बोले तो अंग्रेजी का अच्छा बोलने लगा। हाँ, तो मैं क्या मूल प्रवचन दे रहा था कि अब वे हरफनमौला महोदय अपने योग्य शिष्य को कैसे न पहचानते, सो उन बिन बुलाए गुरु ने पहली ही मुलाकात में मुझे प्रेम, गर्व, मुस्कान और गर्मजोशी के साथ सबसे प्रिय या सच्चा शिष्य कुछ ऐसा कहकर संबोधित कर दिया। वो मेरी मूंछों का काला झाड़ देखकर कुछ औंच जैसे भी गए थे, पर ये तो घुल-मिल कर उन्हें बाद में पता चला था कि मेरे दिल पर तो मूंछें थीं ही नहीं। बाद में कभी बता रहे थे कि तू डेंजरस हुआ करता था। मैंने भी स्पष्टीकरण दे दिया था कि वो मेरी मूंछें डेंजरस थीं, मैं नहीं। झाड़-साफ-दिमाग तो थे ही, इसलिए एकदम से समझ गए। फिर जाके ढंग से घुल-मिल पाए, नहीं तो मुच्छड़ों और मुच्छकटों की प्रॉपर हुकिंग कहाँ। कहाँ-2 की सुनाऊँ, इन वफादार मूछों ने कहाँ-2 नहीं बचाया है मुझे। अब तो लगता है कि कुत्ते उनके घने बालों के कारण ही वफादार होते हैं। एक-दो मुच्छकटे और 1-2 मुच्छड़ लोग भी उनके अगल-बगल में, उनसे कुछ इधर-उधर की हांकते कामकाजी चहलकदमी कर रहे थे। अपने प्रति उनके अंदर इतने सारे सुंदर और मजबूत भाव, वो भी एकसाथ देखकर तो मैं दंग ही रह गया। साथ में मैं अपने को खुशकिस्मत भी समझने लगा कि उन्होंने मुझे मुच्छड़ शिष्य नहीँ कहा। वो भाव-प्राकाट्य उन्होंने इतनी तेजी से किया कि जबतक उनके एकदम चिकने चेहरे से मेरी नजर हटती और मैं उनसे कुछ कह पाता, तब तक वे वहाँ से रुखसत भी कर गए थे। उस समय तो मुझे लगा था कि शायद जोक कर रहे होंगे, पर अब समझ आ रहा है कि वह जोक नहीं, उनका सच्चा मुच्छकटा आशीर्वाद था। वे खुद मुच्छड़ों और मुच्छकटों के अघोषित गठबंधन के सताए हुए लगते थे। बाद में तो मुझे उनसे यह गम्भीर शिकायत भी सुनने को मिली कि उन्हींके शिष्यगण उन्हें अपने चेहरे का बंजर मैदान दिखाकर चिढ़ाया करते थे। शायद इसी वजह से कई बार अपनी मुच्छों को टेबल पर सजा देते थे। हो सकता है कि वे कॉलेज टाइम की मेरी तांत्रिक गुरुभक्ति की निष्ठा को संयोगवश ताड़ गए हों। उनको भोले शंकर और कामदेव का एकसाथ आशीर्वाद प्राप्त लगता था। उस समय उनकी जिंदगी का चिकना और फैशनेबल चेहरा रखने का दौर चल रहा था। इसलिए मूँछ-छेदन संस्कार की दीक्षा उनसे लेना ही मैंने सबसे उचित समझा। उन गुरुदेव की सलाह पर मूँछ काटने से मेरा जबरदस्त रूपांतरण हुआ और उस नाजुक दौर में उन्होंने मुझे ऐसे संभाला जैसे एक कुंडलिनी गुरु अपने शिष्य को कुंडलिनी रूपांतरण के नाजुक दौर में संभालता है। मूँछ काट कर चिकना चेहरा बनने से मुझे ऐसा लगा जैसे कि मेरी जिंदगी का रिफ्रेश बटन दबा हो। जैसे कि मूँछों के साथ बीती जिंदगी भी उतर गई हो, और मैंने एक नया सा जनम ले लिया हो। मुंडन साईंस अब कुछ गले उतर रही है। कुंभ में भी नागा साधु बनने आए लोगों के सिर और चेहरे का पूर्ण मुंडन करके ही उनका माईंडवाश किया जाता है, ताकि वे पिछली जिंदगी में कभी वापिस लौट ही न सके। यज्ञोपवीत संस्कार के समय भी तो ऐसा ही पूर्ण मुंडन किया जाता है, बालों की एक लंबी शिखा को छोड़कर। उसके बाद भी आदमी का दूसरा जन्म माना जाता है, मतलब माइंड वाश हो जाता है उसका। बालों की शिखा उसे कुंडलिनी से और घर से जोड़कर रखती है, इसीलिए तो वह घर नहीं छोड़ता, बस कुंडलिनी साधना में लगा रहता है। इसी तरह, बौद्ध भिक्षु इनसे भी एक कदम आगे रहते हैं। वे हमेशा ही पूर्ण मुंडन करवाए रखते हैं, ताकि आम लोग उनके संपर्क में कभी आ ही न सके, और आकर उनकी साधना में विघ्न न डाल सके। अब केशप्रेमी लोग कहाँ जाने लगे मुंडक सभाओं में। कुछ किस्म के मुसलमान भाई तो काफिरों से अलग दिखने के लिए अलग ही नायाब नुस्खा अपनाते हैं। वे मूँछों को तो साफ कर देते हैं, पर दाढ़ी को बड़ा पालते-पोसते हैं। तो कुछेक बकरे के जैसी दाढ़ी रखते हैं। रब खैर करे। कहीँ पर लोग दाढ़ी पर चित्र-विचित्र डिसाईन और नक्शे आदि बनवाते हैं। भाई उनके नेचरल आर्ट को तो दाद देनी पड़ेगी। न रँग लगे, न कैनवास, बस एक बढ़िया सी कैंची चाहिए। कुछ लोग चार्ली चैपलिन की तरह नाक के ठीक नीचे, मधुमक्खी के जितनी मिनी मूँछ रखते हैं। इससे उन्हें नई ही उमंग का एहसास होता है। ऐसी मूँछ रखते हुए भी डर लगता है कि कहीं खुराफाती लोग मधुमक्खी को भगाने का झूठा बहाना बनाकर मुंह पर थप्पड़ ही न मारते रहे। कुछ लोग बहादुरी का प्रदर्शन करने के लिए दोनों तरफ को लम्बी, उठी हुईं और पैनी मूंछें रखते हैं, जैसे कि जाबांज फाइटर पायलट अभिनन्दन। सुनने में तो यह भी आया कि उनकी मूँछों के डर से ही पाकिस्तान को उन्हें चौबीस घंटे के अंदर रिहा करना पड़ा था। कुछ लोग अपने आप को विशिष्ट जताने के लिए दाढ़ी-मूँछ को मेहंदी या बनावटी रसायनों से लाल रँगाते हैं, तो कुछ उन्हें कज्जली काला कर देते हैं। बेचारे आम गरीब आदमी को ही मन मसोस कर झुंड की खाल के अंदर रहना पड़ता है, क्योंकि यदि वे विशेष बनने लगेंगे, तो खाएंगे क्या। लोगों के इस मिजाज से अंदाजा लगाया जा सकता है कि प्राचीन काल में मूँछों का वास्तुशास्त्र जरूर रहा होगा। फिर हो सकता है कि वह मध्ययुग में जिहादियों द्वारा जला दिया गया हो। उसमें उन्हें अपनी अय्याशीपरस्त मूँछों की तौहीन नजर आई हो। भला एक अमनपसंद शख्स को अमन का बेइंतेहा पैग़ाम देने वाली पाक-साफ मूँछों की शान में गुस्ताखी कैसे बर्दाश्त हो सकती थी। तौबा-तौबा। प्रथमद्रष्टया तो यही लगता है कि इस तरह की विकृत मूँछ-विद्या से ही हिंदुओं के अनगिनत धार्मिक स्थल नेस्तनाबूद किए गए हैं, और असंख्य धार्मिक ग्रन्थ सुपुर्दे खाक किए गए हैं। तो भाइयो मैं अपनी मूँछमुंडन से जुड़ी आपबीती बता रहा था कि कैसे उससे डिप्रेस करने वाली वर्तमान की, कॉलेज की और बेरोजगारी की जिंदगी चली गई थी रिसाइकिल बिन में, और बचपन के साथ स्कूल टाइम की जिंदगी आ गई थी रिसाइकिल बिन के कचरे से निकल कर मेरे मस्तिष्क के डेस्कटॉप पर। ऐसा लगा जैसे मेरे दिमाग की वही पुरानी विंडो अपडेटिड वर्शन के साथ रीइंस्टॉल हो गई हो। वही पुराने जीवन के ख्याल, पर अनौखे और हुस्न से भरे अंदाज में। दोस्तो, बहुत तरक्की की मैंने उस दौर में। मेरी तरक्की का बाहरी माहौल तो पहले से ही बना हुआ होगा, बस भीतरी माहौल डगमगा रहा था, जिसे मेरे चिकने चेहरे ने संभाल लिया। जब मेरी हालत स्थिर हो गई, तब मैंने फिर से चेहरे पे फसल उगाना शुरु कर दिया। बर्फबारी के दिनों में तभी तो अनाज मिलेगा न जब पहले से फसल इकट्ठी कर रखी हो। मित्रो, मूंछों के सभी रहस्यों से पर्दा उठाने लगूँ तो एक पूरा मूँछ पुराण बन जाए। हाय, ये लेखन भी भला क्या अजीब बला है न। हाथ थक जाते हैं, पर मन नहीं थकता। और अगर तो मूँछ जैसा रोमांचक विषय हो, तब तो सवाल ही पैदा नहीं होता कि मन थक जाए। तजुर्बेदार बुजुर्ग लोग कहते हैं कि महिलाएं शादी से और पुरुष रण से वापिस नहीं लौटते। इसी तरह मूँछ जैसे दिलछेड़ विषय के लेखक की लेखनी कभी कागज से वापिस नहीं लौटती। इसलिए सब्र बनाकर पढ़ते रहना, ताकि लेख के अंत में आप भी अपने को मूँछ विशेषज्ञ बना हुआ पाओ। दरअसल मूंछों को हटाने से मेरी बरसों पुरानी दबी पड़ी कुंडलिनी ऐसे चमकने लगी थी, जैसे झाड़ को हटाकर उसके अंदर दबी पड़ी सोने की अंगूठी चमकती है। यह भी एक शोध का विषय है कि क्या मूँछों का अंधेरा चमकदार कुंडलिनी को ढक कर रखता है। मूंछें साफ करने का सबसे बड़ा फायदा मुझे यही हुआ कि मैं अपनी कुंडलिनी को अच्छी तरह से पहचान पाया था। फिर मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। वो मुझे जहाँ लेके जाती रही, मैं वहाँ हो आता रहा, और वह हर प्रकार से मेरा भला ही करती रही। कुंडलिनी के आगे जैसे मैं बच्चे की तरह नँगा ही हो गया था। मूँछे उड़ाने और नंगे होने के बीच में कोई ज्यादा अंतर है भी नहीँ। मैंने उसके आगे अपने आप को समर्पित कर दिया था। कुंडलिनी के सहयोग से कड़ी मेहनत करके मैंने कामयाबी के बहुत से कीर्तिमान स्थापित किए दोस्तो। कुंडलिनी स्त्रीलिंग में थी, तभी तो कुंडलिनी को एक स्त्री की तरह संबोधित किया जाता है। ये जो प्यार-व्यार और शादी-ब्याह का खेल भौतिक जगत में चलता रहता है न, बिल्कुल ऐसा ही मन के सूक्ष्म जगत में भी चलता रहता है। फिर क्या था, उस स्त्रीलिंग कुंडलिनी को देखकर पुलिंग गुरु भी पहुंच गए मूँछ-मुस्कुराहट बिखेरते हुए गाजे-बाजे के साथ। दोनों ने शादी की, रोमांस किया, बच्चे पैदा किए और फिर दोनों बुड्ढे होकर एक-दूसरे के प्रति उदासीन जैसे भी हो गए। वो मेरे सूक्ष्म माँ-बाप मुझे छोड़कर जा रहे थे। मैं कुछ उदास रहने लग गया था। तभी मैंने कुंडलिनी योग का अभ्यास शुरु किया और उन मुच्छड़ गुरु (कुंडलिनी) की मूँछ खींचकर उन्हें फिर से जगा दिया बोले तो एकदम मस्त कुंडलिनी जागरण। तब जाकर मैंने कुछ राहत की साँस ली और घर की खेती को फिर से उगाना शुरु कर दिया। पर आज भी मैं बड़े झाड़ से डरता हूँ। पुराना सदमा जो गया नहीँ मेरे दिमाग से पूरी तरह। पता नहीं क्यों अंधेरा जैसा लगता है इसके नीचे। क्या सबको लगता होगा, या मेरेको ही। इसकी सफाई से क्या सबकी कुंडलिनी चमकती होगी, या सिर्फ मेरी ही चमकी थी। यह सब साझे शोध और अनुभव से ही पता चल सकता है। इसलिए मैं इनकी इस तरह से छंटाई करता रहता हूँ, ताकि इनकी जड़ तक हवा और रौशनी जाती रहे। पर मुझे लगता है कि यह मन का वहम भी है। कुंडलिनी जागरण के समय तो मेरे पूरे चेहरे पर झाड़ पसरा हुआ था, हालाँकि वह मध्यम आकार का था, पर था तो घना झाड़ ही। उस समय तो हर जगह प्रकाश ही प्रकाश था। इससे जाहिर होता है कि सबकुछ देश, काल और मानसिकता पर निर्भर करता है। इसलिए जैसा अच्छा लगे, वैसा करना चाहिए, पर कुंडलिनी के लिए प्रयास हमेशा करते रहना चाहिए। यदि घासफूस की तरह हल्की कुंडलिनी को यह मूँछों का झाड़ दबा कर रखता है, तो फनदार कोबरा नागिन की तरह फुफकारे मारने वाली शक्तिशाली कुंडलिनी को दुनिया की नजरों से बचाते हुए संभालकर भी यही रखता है। इसीलिए तो मैंने कहा न कि वक़्त की भाषा पढ़नी आनी चाहिए, और सर्वहितकारी मूँछों का हमेशा सम्मान करना चाहिए। वक्त के अनुसार आदमी खुद चलता नहीं, और दोष मढ़ता है मूँछों के सिर। सबसे ज्यादा दुरुपयोग आदमी ने मूँछों का खुद ही किया है। मूँछों की शक्ति से पता नहीँ कितने अनैतिक काम किए हैं उसने। मूँछों की अथाह शक्ति का अंदाजा इसीसे लगाया जा सकता है कि सिर्फ इनके ऊपर प्यार भरा हाथ फेरने से ही जोश कई गुना बढ़ जाता है। ए लो जी, इस क्रिया के लिए मूँछ-विशेषज्ञों द्वारा प्रदत्त नाम भी याद आ ही गया, मूँछ पर ताव देना। बड़ा गूढ़ नाम है यह। आप सोच भी नहीं सकते कि ताव का अर्थ यहाँ ताप या गर्मी है। जैसे मालिश की गर्मी से सरोबार पहलवान अंगड़ाई लेते हुए उठ खड़ा होता है, ऐसे ही मूंछें भी। उपरोक्त कुछ मुख्य वजहों से मूँछों की इज्जत आज इस कदर गिर गई है कि लड़की वाले सबसे पहले यही पूछते हैं कि कहीं लड़का मूँछों वाला तो नहीं है। कभी मूँछ वाले का समाज में विशिष्ट रुतबा हुआ करता था। आज तो आलम यह है कि मूँछों को यह लोरी-गीत सुनाकर शांत करना पड़ता है, मत रो——-~मेरी मूछ, चुप हो जा——नहीँ तेरी पूछ। जो कुकाल में होता है, बुरे हाल में होता है; ऐ यार मेरे साथ तेरे वही तो हुआ; मत रो—–~~~~—–। दोस्तो, यह ट्रेंड बदलना चाहिए, और हमें बेकसूर को बचाने के लिए मिलकर आगे आना चाहिए। और आगे की कहें, तो डाकुओं का भी मूँछों की बदनामी में भारी हाथ रहा है। हमारे समाज के लेखकों और कवियों ने भी मूँछों को डाकुओं के साथ बहुत जोड़ा है। यह कहीं पढ़ने में नहीं आता कि बड़ी-2 मूँछों वाला विद्वान। और तो और, देवियाँ भी पीछे नहीं रही हैं। उनका भी बच्चों को सुलाने के लिए बड़ी-2 आँखों के साथ, डरावनी मुद्रा में अक्सर यही डायलॉग होता है, बड़ी-2 मूँछों वाला-ला-ला-ला—–। अब इससे ज्यादा क्या कहूं, विलुप्ति की कगार पर खड़ी मूँछों को बचाने के लिए उनकी खोई इज्जत वापिस लौटाना जरूरी है कि नहीँ। यदि जरूरी है, तो मूँछ-संरक्षण के लिए भी कानून बनने चाहिए। आज की इस विकट परिस्थिति में मूँछ-आरक्षण के लिए कानून का बनाया जाना बहुत जरूरी हो गया है। मुच्छड़ों को अल्पसंख्यक वर्ग का दर्जा दे देना चाहिए। मूँछ संरक्षण के लिए कल्याणकारी योजनाएं चलाई जानी चाहिए। मूँछ-भत्ते का विशेष प्रावधान होना चाहिये। अपनी कहूँ, तो मेरे चेहरे पर घनी दाढ़ी आती ही नहीं। इससे इसकी जड़ों में हवा व रौशनी खुद ही लगातार पहुंचती रहती है। हो सकता है कि मेरी सदाबहार कुंडलिनी के पीछे इसी अधमुंडी किस्म की मूँछों का हाथ हो। इसको लेकर मेरी घरवाली बोलती रहती है कि आप दाढ़ी के साथ लड़की जैसे लगते हो। इसलिए कई बार मेरे मन में आता है कि क्यों न इस नपुंसकता की निशानी को जड़ से ही उखाड़ फेंकूँ। पर तभी यह भी सोचता हूँ कि अगर भरी बरसात के बीच खेत को बंजर रहने दिया, तो जालम गर्मी के दिनों में क्या खाएँगे। अगर सर्दियों में ही सारे कपड़े उतार दिए, तो गर्मियों में क्या उतारेंगे।

दोस्तो, मैंने यह भी महसूस किया कि खाली मूँछ की बजाय दाढ़ी-मूँछ का मिश्रण ज्यादा दार्शनिक होता है। कहते हैं न कि चेहरा मन का आइना होता है। आईने के अंदर सुंदर बनने से उसके सामने खड़ा आदमी खुद ही सुंदर बन जाता है। इसलिए चेहरे पर अद्वैत दर्शन बना कर रखने से मन में खुद ही अद्वैत छा जाता है। मुख्य भूभाग को बंजर रखना और पहाड़ी की तलहटी में बनी छोटी सी पथरीली क्यारी में झाड़ ऊगा कर रखना समझदारी का काम भी तो नहीं लगता। तो इस समस्या को देखते हुए मैंने पूरे भूभाग में बिजाई शुरु कर दी थी। पर फिर एक नई समस्या आन पड़ी थी। फसल के एकमुश्त कटान के बाद पूरा भूभाग बंजर और नँगा लगता था। कोई सीधा आसमान से जमीन पर आ गिरे और खजूर भी न मिले अटकने को, तो उसकी व्यथा-पीड़ा आप खुद भी समझ सकते हैं। साथ में, द्वैत या यूँ कह लो कि बदलाव के झटके ऐसे लगे, जैसे सर्द-गर्म के लगते हैं। और भाई ये मनहूस द्वैत तो मन का सबसे बड़ा रोग है न। तो दोस्तो, दोनों समस्याओं से बचने का एक ही मध्यमार्ग वाला तरीका बचा था। क्यारी की फसल को जमीन से न काटकर थोड़ा ऊपर-2 से काटा जाए। इससे क्या हुआ कि फसल कटान के बाद भी थोड़ी-बहुत हरियाली बची रही। उससे लोगों की आंखों का नूर भी बरबस बना रहा, और द्वैत या बदलाव पर भी काफी रोक लग गई। यहाँ एक दार्शनिक पेंच और है। दरअसल अद्वैत का निर्माण द्वैत से ही होता है। इसलिए जो सौ टके का दार्शनिक मिस्त्री है, उसके लिए तो द्वैत पैदा करने वाली विकराल मूंछें किसी सोने की ईंट उगलने वाली खदान से कम नहीं हैं। वह तो उनकी चिनाई करने से पहले उनके साथ मन के काम, क्रोध जैसे दोषों का मिक्चर सीमेंट-मोर्टार की तरह चिपकाता है, फिर उनसे अव्वल दर्जे के अद्वैत-महल तैयार कर लेता है। उसकी बसाई अद्वैत नगरी के आगे कुबेर की अलकापुरी क्या मायने रखती है। हो न हो, अलकापुरी इन्हीं मूँछ-महलों को कहा गया हो। वैसे भी कुबेर की मूंछें भी बड़ी सुंदर बताई जाती हैं। मैंने भी एकबार इसी तरह त्रिलोकलुभावन अद्वैत-नगरी का निर्माण किया था। उस समय मेरे पास बड़े-2 मिस्त्री ज्ञानप्राप्ति के लिए दूर-2 से घुटनों के बल आते थे।

इसी केशप्रेम की विचित्र मानसिकता के कारण ही आदमी अपने जैसे बालों वाले आदमी के साथ ही घुलना-मिलना पसंद करता है। इसी विकृत मानसिकता के परिणामस्वरूप ही तो तालिबानियों ने पूरे अफगानिस्तान में सभी को दाढ़ी रखने का फरमान जारी किया था। पर स्त्री उसे कम से कम बालों वाली चाहिए, खुद वह बेशक कितने ही लंबे बाल क्यों न रखता हो। पर स्त्री के मामले में उसका यौनस्वार्थ जो जुड़ा होता है। वह उसके केशस्वार्थ पर भारी पड़ जाता है। इसी तरह अपने बच्चे कैसे ही बालों वाले क्यों न हो, सभी अच्छे लगते हैं। इसमें भी अप्रत्यक्ष रूप से यौनस्वार्थ ही जुड़ा होता है। इससे साफ जाहिर होता है कि केशभाव और यौनभाव ये दोनों सबसे शक्तिशाली भाव हैं। तांत्रिक इन दोनों का महत्त्व अच्छी तरह से समझते हैं, इसलिए दोनों को संभाल कर रखते हैं। अब कुछ समझ में आ रहा है कि भगवान शिव के जैसे महान तांत्रिक जटाधारी और मस्तमौला क्यों होते हैं।

कई बार तो मुझे लगता है कि यदि कुन्डलिनी जागरण के समय मेरी दाढ़ी न बढ़ी होती, तो मुझे कुन्डलिनी जागरण ही न होता। क्लीनशेव होने से मैं अपना चिकना चुपड़ा मुंह लेकर उन गाने बजाने वाली औरतों के इर्दगिर्द इस प्रकार मंडराता ही रहता, जिस प्रकार एक बार नारद मुनि अपना बंदर का मुख लेकर पूरी स्वयंवर सभा में सबकी आंखों से आंखें मिलाते हुए मंडराते फिरे थे। उससे मुझे उस दोस्त से मिलने का मौका ही न मिलता जिससे मैं कुन्डलिनी की याद में खो गया था। साथ में अगर अपने जैसे नामर्द चिकनू को देखकर कोई औरत इशारे में भी दिल में चुभने वाला ताना कस देती, तब तो जागरण का प्रश्न ही पैदा न होता। ताने से तिलमिलाए नारद ने भी तो कपटी कहकर भगवान विष्णु की खटिया खड़ी नहीँ कर दी थी वैकुंठ में जाके, जागरण गया गेहूँ बीजणे जाँ बांदर भगाणे। हाँ, तो मैं क्या कह रहा था कि उस उलाहने से कुन्डलिनी में खोने की बजाय मेरा दिल उलाहने में खोने लगता। स्त्री की नाराजगी और स्त्री के उलाहने से भयानक चीज इस दुनिया में कुछ नहीँ है यारो। आदमी सब कुछ भूल सकता है, पर एक औरत का उलाहने से भरा नाराज चेहरा कभी नहीं भूल सकता। अगर औरत की नाराजगी से घायल दिल आदमी कुन्डलिनी जागरण क्या भगवान को भी पा ले, तो भी भगवान उसे उस नाराज औरत के चरणों में पड़कर माफी मांगने के लिए भेजते हैं, तभी अपने अनदेखे महल का अनदेखा मेन गेट उसके लिए खोलते हैं। वरना आदमी को उस अनदेखे महल को बाहर-बाहर से ही देख कर संतोष करना पड़ता है। इसकी कोई गारंटी नहीं कि औरत मान ही जाएगी। यह उस पर और आपके मन की पवित्रता पर निर्भर करता है। कई बार औरत माफी मांगने आए मर्द को कोई दूसरा ही उलाहना मार देती है। इससे वह कहीं का नहीं रहता, एक धोबी के कुत्ते की तरह, न घर का न घाट का। वह फिर से वापिस मुड़कर अनदेखे भगवान को दूर खड़े देख कर उसके पास पहुंच जाता है। भगवान उसे थोड़ा सा पुचकारते हैं, और फिर औरत के चिकने चेहरे को शांत करने के लिए वापिस रवाना कर देते हैं। कई बार तो बेचारा मर्द स्त्री और भगवान के बीच में गेंद ही बन कर रह जाता है। यह सिलसिला तब तक चलता है जब तक कोई अन्य दयालु और भाव से भरी स्त्री उस अभागे मर्द को थाम नहीं लेती। ये जो कहते हैं न कि लोहा ही लोहे को काटता है। दरअसल उस स्त्री को भगवान ही भेजता है अपनी दिव्य शक्ति से प्रेरित करके। इसलिए मेरी सलाह मानो, भगवान की कुछ मदद करने के लिए एक अच्छी औरत को भी ढूंढते रहा करो। स्त्री के मामले में डायरेक्ट एक्शन तो भगवान भी नहीं ले सकता। वह भी मामले का निपटारा एक स्त्री को भेजके ही कर सकता है। भगवान भी बेचारा सच्चा है। एक औरत के आगे उसकी भी नहीं चलती। अपनी पत्नी के डर से ही तो वह अपनी सभी मूर्तियों और चित्रों से मूंछें गायब कर देता है, नहीं तो उसके जैसा समदर्शी महानुभाव मुच्छड़ों के साथ क्यों पक्षपात करता। औरत के नाराज चिकने चेहरे की ज्वाला उसके अनछुए महल तक को छूने लगती है। वो करे भी तो क्या करे। यदि वह औरत के साथ सख्ती करे तो उसके बगल में बैठी उसकी पत्नीदेवी उलाहना मारते हुए, नाराज होकर चली जाए। वो भला अपने भक्त को चिकने चेहरे की ज्वाला से बचाने के लिए खुद क्यों उसका शिकार बने। मुझे तो चिकने लोगों पर यह सोचकर तरस आ रहा है कि कहीं वे स्त्री के कोप से बचने के लिए ही तो चिकने नहीं होते। औरत को उनका चिकना चेहरा देखकर उनपर तरस आ जाता होगा। चिकने चेहरे से औरत को बच्चे की याद जो आती है। वैसे भी औरतें बच्चों पर सबसे ज़्यादा मेहरबान होती हैं। पर ये चालाकी ज्यादा दिन नहीं चलती। गलती से अगर चेहरे पर दो बाल भी उग आए, तो वह पिछली सारी कसर सूद समेत निकालती है। इसलिए पुरजोर आवाज से कहता हूँ कि औरत के जैसा चिकना-चुपड़ा चेहरा बनाने से पहले औरत के द्वारा निभाई जाने योग्य जिम्मेदारियां भी समझ लेनी चाहिए। अगर ऐसा न किया गया तो बेचारे अमनपसंद दाढ़ीदार आदमी की आत्मा नाराज चिकने चेहरों के बीच ही भटकती रहेगी, और उसे मरने के बाद भी शांति नहीं मिलेगी। कांटे तो मुरझाए हुए ही अच्छे लगते हैं, पर फूल तो हमेशा खिले हुए ही अच्छे लगते हैं। खिला हुआ फूल चेहरे पे न सही, दिल पर ही सही। इसलिए कहता हूँ कि सिर्फ मुंह पर ही नहीं, दिल पर भी कुन्डलिनी रूपी दाढ़ी उगी होनी चाहिए। इससे जब औरत का प्यार, कामदेव के पुष्पबाण पर सवार होकर दिल तक पहुंचेगा तो वह सीधा कुन्डलिनी को लगेगा, जिससे कुन्डलिनी गलती से जागृत भी हो सकती है। नहीँ तो ऐसा होगा जैसा एकबार अंतरराष्ट्रीय मूँछ प्रतिस्पर्धा में हुआ था। उसमें विजेता घोषित किए गए दिग्गज मूँछ शिरोमणि या बेचारे मुच्छड़ महाशय कह लो, सहज उद्गार प्रकट करते हुए कहने लगे थे कि उन्हें विजेता घोषित होते हुए ऐसा मजा आ रहा था, जैसा एक गैंडे को बार-2 कीचड़ में लोटते हुए आता है। जो इस मूँछ स्तोत्र को श्रद्धापूर्वक पढ़ेगा, उसपर जीवनभर मूँछों की अपार कृपा बनी रहेगी, तथा इस जीवन के बाद उसे मूँछलोक की प्राप्ति होगी। अब कृपा करके इस दिव्य मूँछ संहिता को कहीँ कॉपी पेस्ट न करिएगा, नहीँ तो किन्हीं ताव-(प्र)चोदित मूँछों की गाज कहीँ व्यंग्यकार पर ही न गिर जाए।😂😂😂😂😂😂😂😂😂😂😂😂😂😂😂😂~प्रेमयोगी {व्यंग्यकार~भीष्म}😄😥🙏