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सभी मित्रों के बीते वर्ष को सहर्ष विदाई व उनको नववर्ष 2019 की बहुत-2 शुभकामनाएं- Nice farewell to all the friends’ last year and many New Year wishes for them

सभी मित्रों के बीते वर्ष को सहर्ष विदाई व उनको नववर्ष की बहुत-2 शुभकामनाएं (please browse down to view this post in English)।

मेरा बीता वर्ष, 2018 निम्न प्रकार का रहा-

अपनी टाटा टियागो कार में लगभग 3000 किलोमीटर का सपरिवार सफ़र तय किया, जिसमें से अधिकाँश उन्नत उच्चमार्गों का सफर था। पीवीआर सिनेमा में 4 हिंदी फिल्में सपरिवार देखीं, 102 नोट आऊट, संजू, हनुमान वर्सस अहिरावना (थ्री डी एनीमेशन) व सिम्बा। मेरे माता-पिता तीर्थधाम यात्रा का जल चढ़ाने कन्याकुमारी / रामेश्वरम गए। अपने पुराने घर का नवीनीकरण करवाया गया। श्री मद्भागवत सप्ताह श्रवण यज्ञ का अनुष्ठान अपने घर में करवाया गया। मेरी पूज्य व वृद्ध पितामही जी का स्वर्गवास हुआ। मेरे बेटे को पहली कक्षा में ए-1 रहने पर पारितोषिक दिया गया। मेरी पत्नी के द्वारा नए सिलाई के प्रशिक्षण-कोर्स का प्रारम्भ किया गया। मुझे क्वोरा टॉप राईटर (क्वोरा शीर्ष लेखक)- 2018 का सम्मान मिला। मेरे द्वारा कुण्डलिनीयोग का प्रतिदिन का 1 घंटे का सुबह का व एक घंटे का सांय का अभ्यास एक दिन के लिए भी नहीं छोड़ा गया। इसके कारण मेरा वर्ष 2017 का कुण्डलिनीजागरण का अनुभव जारी रहा, महान आनंद के साथ। प्रेमयोगी वज्र की सहायता से इस मेजबानी वेबसाईट (https://demystifyingkundalini.com/home-3/) को पूर्णतः विकसित किया। इस वेबसाईट के लिए 139 शेयर, 30 लाईक्स, 4772 वियूस, 3099 विसिटर व 46 फोलोवर मिले। इस वेबसाईट के लिए मैंने लगभग 31 पोस्टें लिखीं व प्रकाशित कीं। प्रेमयोगी वज्र की सहायता से “शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)” नामक पुस्तक लिखी। उसके लिए 13 सशुल्क डाऊनलोड व 80 निःशुल्क डाऊनलोड प्राप्त हुए। उसके लिए अमेजन पर एक सर्वोत्तम रिव्यू / समीक्षा (5 स्टार) भी प्राप्त हुआ। साथ में, उसे गूगल बुक पर भी दो उत्तम व 5 स्टार रिव्यू प्राप्त हुए। दूरदर्शन के कार्यक्रमों में तेनालीरामा, तारक मेहता का उल्टा चश्मा, मैं मायके चली जाऊंगी, रियल्टी शोज व जी न्यूज (मुख्यतः डीएनए) का आनंद उठाया। अपने पोर्टेबल मिनी जेबीएल स्पीकर पर गाना एप के माध्यम से लगभग 2000 मधुर ओनलाईन गाने सुने। काटगढ़ मंदिर व टीला मंदिर के सपरिवार दर्शन किए। अपने किन्डल ई-रीडर पर 3 पुस्तकें पढ़ीं। पोस्ट पढ़ने के लिए धन्यवाद।

यदि आपको इस पोस्ट से कुछ लाभ प्रतीत हुआ, तो कृपया इसके अनुसार तैयार की गई उपरोक्त अनुपम ई-पुस्तक (हिंदी भाषा में, 5 स्टार प्राप्त, सर्वश्रेष्ठ व सर्वपठनीय उत्कृष्ट / अत्युत्तम / अनौखीरूप में निष्पक्षतापूर्वक समीक्षित / रिव्यूड ) को यहाँ क्लिक करके डाऊनलोड करें। यदि मुद्रित पुस्तक ही आपके अनुकूल है, तो भी, क्योंकि इलेक्ट्रोनिक डीवाईसिस / फोन आदि पर पुस्तक का निरीक्षण करने के उपरांत ही उसका मुद्रित-रूप / print version मंगवाना चाहिए, जो इस पुस्तक के लिए इस लिंक पर उपलब्ध है। इस पुस्तक की संक्षिप्त रूप में सम्पूर्ण जानकारी आपको इसी पोस्ट की होस्टिंग वेबसाईट / hosting website पर ही मिल जाएगी। धन्यवाद।

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Nice farewell to all the friends’ last year and many New Year wishes for them.

My last year, 2018 was of the following type:

Travelled around 3,000 km in my Tata Tiago car with family, most of which were the journey of advanced highways. In PVR cinema saw 4 Hindi films with family, 102 Not out, Sanju, Hanuman Versus Ahiravana (Three D Animation) and Simmba. My parents went to Kanyakumari / Rameshwaram for carrying water for pilgrimage. My old home was renovated. Shreemad Bhaagvat Shravan Yagna’s week long ritual was performed in my house. My devoted and old grandmother went to heaven. My son was rewarded for being A1 in the first grade. New sewing training-course was started by my wife. I got the Quora Top Writer- the honour of 2018. I did not leave the Kundalini Yoga practice for 1 hour of morning and one hour of evening everyday even for one day. Due to this my experience of KundaliniJagran of 2017 continued, with great bliss. With the help of Premyogi Vajra, this hosted website (https://demystifyingkundalini.com/) was fully developed. For this website, 139 shares, 30 likes, 3099 visitors, 46 followers and 4772 views were obtained. I wrote and published about 31 posts for this website. With the help of Premyogi Vajra, I wrote a book called “Shareervigyaan darshan- ek aadhunik kundalini tantra (ek yogi ki premkatha)”. For that 13 paid downloads and 80 free downloads were received. For that, a great review (5 stars) was also received on Amazon. Along with, two good and 5 star reviews were also obtained on Google book for that. In Doordarshan’s programs, Tenalirama, Tarak Mehta ka Ulta Chashma, main maayake chali jaaoongee, realty shows and Zee news (mainly DNA) were enjoyed well. Two thousands of melodious online songs have been heard through Gaana App on my portable mini JBL speaker. Visiting the Katgarh Temple and the Tila Temple with family by me. Read 3 books on my Kindle e-Reader. Thanks for reading.

If you have found some benefit from this post, please download here the above mentioned e-book (in Hindi language, 5 star rated, reviewed in unbiased way as the best, excellent and must read by everyone) made with steps as told above. If only print version suits you, then too print version should only be got after testing that’s e- version on the electronic devices / phone etc., that is available on this link for this book. You can also find the complete information about this book, both in English as well as Hindi languages on the hosting website of this post. Thank you.

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योग व तंत्र-एक तुलनात्मक अध्ययन (तंत्र के बारे में कुछ रोचक तथ्य, तंत्र व इस्लाम के बीच में समानता)- Yoga and Tantra- A comparative study (some interesting facts about the tantric system, Tantra versus Islam)

योग व तंत्र- एक तुलनात्मक अध्ययन (तंत्र के बारे में कुछ रोचक तथ्य, तंत्र व इस्लाम के बीच में समानता), (please browse down or click here to view post in English)

यह प्रमाणित किया जाता है कि हम किसी भी धर्म का समर्थन या विरोध नहीं करते हैं। हम केवल धर्म के वैज्ञानिक और मानवीय अध्ययन को बढ़ावा देते हैं।

तंत्र क्या है

तंत्र में प्रारंभ से ही एक व्यक्ति अपने आपको देहपुरुष की तरह अद्वैतपूर्ण, मुक्त व अनासक्त समझते हुए ही समस्त व्यवहार करता है। परन्तु योग में एक व्यक्ति पहले अपनी कुण्डलिनी को जगाता है। उससे उसे अद्वैत से जुड़े हुए महान आनंद का अनुभव होता है। उस कुन्डलिनीजागरण के आनंद के वशीभूत होकर ही वह अनायास ही अद्वैतमयी आचरण प्रारम्भ करता है, और धीरे-२ तांत्रिक की तरह अद्वैतपूर्ण बन जाता है। एक योगी कुण्डलिनीजागरण से आगे बढ़ते हुए आत्मज्ञान को भी अनुभव कर सकता है। उससे उसके अद्वैतज्ञान को और अधिक दृढ़ता मिलती है। इसका अर्थ है कि तंत्र योग की अपेक्षा अधिक आसान, सर्वसुलभ, स्वाभाविक व मानवतापूर्ण है। जब योगोपलब्धि के बाद भी तंत्र को स्वीकारना ही पड़ता है, तब क्यों न उसे प्रारम्भ से ही स्वीकार किया जाए। बहुत से तंत्र का अभ्यास करने वाले लोग समय के साथ स्वयं ही कुण्डलिनीजागरण व आत्मज्ञान प्राप्त कर लेते हैं, बिना किसी भिन्न या विशेष प्रयास के। कई लोगों को तो तंत्र को सिद्ध करने का भी स्वाभाविक रूप से अवसर मिलता है, और योग को भी; जैसा कि इस वेबसाईट के नायक प्रेमयोगी वज्र के साथ हुआ। बहुत से लोग तंत्र को पंचमकारों तक ही सीमित कर देते हैं। परन्तु सच्चाई यह है कि तंत्र एक सम्पूर्ण जीवन पद्धति है। यह एक अद्वैतपूर्ण जीवनपद्धति है। हिन्दू संस्कृति के अधिकाँश अचार-विचार एक तांत्रिक पद्धति के ही विभिन्न अंग हैं, चाहे वह वेद-पुराणों का अध्ययन हो, या उनसे जुड़े हुए विभिन्न क्रियाकलाप। प्राचीनकाल में जिन लोगों को आत्मज्ञान हुआ, उन्हें आम साधारण जनजीवन में जीवन व्यतीत करना बहुत कठिन लगा। इसका कारण यह था कि आम लोग तो भौतिक दृष्टिकोण से जीवन जीने के आदी थे, जिसे आत्मज्ञानी लोगों का ज्ञानपूर्ण मन स्वीकार न कर सका। अतः उन्होंने आम अज्ञानी लोगों के व्यवहार की नक़ल को छोड़कर प्रकृति की नक़ल करते हुए अपना जीवन जीने का प्रयास किया। वैसा इसलिए, क्योंकि उन्हें प्रकृति के सभी व्यवहार ज्ञानपूर्ण लगे। वैसा करने से उनके आध्यात्मिक स्तर में और अधिक इजाफा हुआ, और वे जीवन्मुक्त बन गए। प्राकृतिक जीवनशैली से अपने को लाभ होते देखते हुए उनके मन में औरों को भी वैसा लाभ दिलाने की जिज्ञासा उत्पन्न हुई। अतः उन्होंने प्राकृतिक घटनाओं को जीवंत रूप में लिपिबद्ध करना शुरू कर दिया। वे ही लिपिबद्ध संग्रह कालान्तर में वेद-पुराणों के नाम से विख्यात हुए, जिन्होंने बहुत से लोगों के लिए जीवन्मुक्ति को सुलभ करवाया। उन पुराणों को लिखने वाले आत्मज्ञानी लोग ऋषि-मुनि कहलाए।

तंत्र के बारे में कुछ रहस्यात्मक तथ्य

उपरोक्त प्रकार की ही घटना तांत्रिक प्रेमयोगी वज्र के साथ भी घटित हुई। उसे भी बचपन में ही क्षणिक आत्मज्ञान हो गया था। उसके बाद वह भी आम लोगों की तरह जीवनयापन करने में अपने आप को अक्षम पा रहा था। इसीलिए उसने अपने लाभ के लिए शरीरविज्ञान दर्शन नामक, पौराणिक दर्शन से मिलता-जुलता एक जीवन दर्शन बनाया। उसके सान्निध्य से उसे जो अद्वैत व अनासक्ति की उपलब्धि हुई, उससे उसकी चहुंमुखी प्रगति सुनिश्चित हुई, और यहाँ तक कि अनायास ही कुण्डलिनीजागरण की एक झलक भी मिली। उसी लाभ से प्रेरित होकर उसने उसी दर्शन पर आधारित एक पुस्तक की रचना की, जिसे हम आधुनिक पुराण भी कह सकते हैं। पुराणों में तो बाहर मौजूद स्थूल सृष्टि का वर्णन है, परन्तु शरीरविज्ञान दर्शन में हमारे अपने भीतर मौजूद सूक्ष्म सृष्टि का वर्णन है। ‘यत्पिंडे तत्ब्रम्हांडे’ नामक वेदोक्ति के अनुसार दोनों सृष्टियों के बीच में लेशमात्र भी अंतर नहीं है। इसलिए हम प्रेमयोगी वज्र को आधुनिक ऋषि भी कह सकते हैं। उसकी पुस्तक भी पुराणों की तरह ही तांत्रिक ही है, यद्यपि साथ में कुछ अंश पंचमकारी विद्या का भी है, श्रीमद देवीभागवत पुराण से मिलता जुलता। अब रही बात पंचमकारी तंत्र की, तो वह विशाल तांत्रिक पद्धति का केवलमात्र एक छोटा सा हिस्सा ही है। तांत्रिक पद्धति का बहुत लम्बे समय तक आचरण करने के बाद जब आम साधक का तांत्रिक दृष्टिकोण बहुत परिपक्व हो जाता है, तभी एक योग्य गुरु के मार्गदर्शन में तंत्र के पंचमकारी अंग का आश्रय लेना चाहिए, ताकि कुण्डलिनीजागरण के लिए पर्याप्त शक्ति मिल सके। समय से पहले अपनाने पर या अयोग्य गुरु के मार्गदर्शन में यह लाभ के स्थान पर हानि भी पहुंचा सकता है। साथ में, पंचमकारी तांत्रिकों का ध्येय हिंसा नहीं, अपितु कुण्डलिनीजागरण ही है। शक्ति के सर्वश्रेष्ठ स्रोत तो माँस, मैथुन व मद्य ही हैं, जो हिंसा के बिना प्राप्त नहीं किए जा सकते हैं। इसलिए उनके कम से कम प्रयोग से अधिक से अधिक आध्यात्मिक लाभ को प्राप्त करने को ही प्राथमिकता दी गई है। इसका उदाहरण है, मत्स्य-सेवन। क्योंकि मछली को आवश्यकतानुसार न्यूनतम मात्रा में भी पकड़ा जा सकता है, इसलिए उससे निरर्थक हिंसा नहीं होती, जिससे हिंसा-दोष न्यूनतम स्तर पर बना रहता है। साथ में, मछली ठंडी प्रकृति की होती है। इसलिए यह पंचमकारी के अन्दर उस क्रोध को नहीं पनपने देती, जो आध्यात्मिक राह में सबसे बड़ा विघ्न होता है। साथ में, यह आमिषाहारों में सबसे कम तमोगुण उत्पन्न करता है, और इसके शरीर के ऊपर दुष्प्रभाव भी अन्य की तुलना में न्यूनतम होते हैं। इसी तरह इसमें एकपत्नीव्रत को प्राथमिकता दी गई है, ताकि यौनता की अति से बचा जा सके, क्योंकि वह भी एक विशेष प्रकार की हिंसा ही है, विशेषकर यदि सही तांत्रिक नियम न अपनाए जाएं। फिर भी थोड़ी-बहुत भूल-चूक तो सीखते समय स्वाभाविक ही है। यदि तांत्रिक-साथी को बदलना ही पड़े, तो बहुत लम्बे समय के बाद व विशेष आध्यात्मिक प्रगति को प्राप्त करने के बाद ही। स्त्री पर बुरी नजर सर्वथा वर्जित है। यौनता / पञ्चमकारों के बारे में भद्दे शब्द व भद्दे मजाक भी वर्जित हैं। स्त्री को देवी व गुरु की तरह सम्मान देना पड़ता है। किसी की बेटी या किसी की पत्नी को तांत्रिक-साथी नहीं बनाया जाता, क्योंकि उन्हें दूसरों की भावनात्मक संपति के अंश के रूप में देखा जाता है। प्राचीनकाल के अधिकाँश प्रख्यात तांत्रिक वही हैं, जो पहले आम जनमानस में प्रचलित साधारण तांत्रिक पद्धतियों से जीवन व्यतीत करते थे, परन्तु बाद में विभिन्न कारणों से उसके पंचमकारी अंग का भी सेवन करने लगे। उन कारणों में एक मुख्य कारण था, समाज से बहिष्कृति या समाज में पर्याप्त सम्मान न मिलना। तभी तो कुछ प्रख्यात तांत्रिक आज के पंजाब की भारत-पाकिस्तान सीमा के आसपास हुए हैं, कुछ तो आज के पाकिस्तान में भी हुए हैं। दूसरा कारण है कि पंजाब शुरु से ही समृद्ध रहा है, इसलिए वहां खाने-पीने व मौज-मस्ती करने वालों की परंपरा रही है। उसी तरफ को तांत्रिक मंदिर भी बहुतायत से पाए जाते हैं। पंजाब में गुरु-परम्परा  का बोलबाला भी तंत्र के अनुरूप ही विकसित हुआ है। मैंने स्वयं पंजाब के सुदूर व पाकिस्तान की दिशा के सीमावर्ती क्षेत्रों में रहकर सभी कुछ प्रत्यक्ष रूप में अनुभव किया है। उन सुदूर क्षेत्रों तक हिन्दुओं की आम तांत्रिक पद्धति की पहुँच ढीली थी, अतः वहां पर रहने वाले लोगों को सामूहिक आध्यात्मिकता से मिलने वाले बल की प्राप्ति नहीं हो रही थी। उसके प्रतिकारस्वरूप उन्होंने पंचमकारी तंत्र को सही ढंग से अपनाया, व त्वरित सफलता को प्राप्त किया, क्योंकि पंचमकारी शक्ति से उत्पन्न आध्यात्मिक बल सामूहिक आध्यात्मिकता के बल से भी कहीं अधिक था। निस्संदेह वे तांत्रिक आम सर्वसाधारण या आध्यात्मिक समाज से कटे-२ से रहे, फिर भी वे सिद्धियों के चरम पर पहुंचे, और दूसरों को भी प्रेरित करते रहे। स्वाभाविक है कि वैसे तांत्रिकों में बहुत से दलित व पिछड़े वर्गों के लोग भी इन्हीं उपरोक्त कारणों से शामिल हुए। वैसा ही उदाहरण दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में कष्टमय व एकाकी जीवन बिताने वाले तिब्बती बौद्धों का भी है। उन्हें सुविधामय मैदानी क्षेत्रों में प्रचलित साधारण तंत्र की अपेक्षा पंचमकारी तंत्र ही अधिक उपयुक्त लगा, इसीलिए यह वहां आज भी अच्छी तरह से जिन्दा है। चाईनी ताओ धर्म में तो एक यौनसनकी साधु को ही आदर्श साधु बताया गया है। वास्तव में जब से पंचमकारों का तंत्र से अलगाव हुआ, तब से ही आध्यात्मिकता का पतन प्रारंभ हो गया। पंचमकारों को उत्पथगामियों का आचार बताया गया। इससे हुआ यह कि पंचमकारों की शक्ति उत्पथगामियों को ही मिलती रही, और वे उससे पुष्ट होते रहे। धीरे-२ करके सारी धरती उत्पथगामियों से परिपूर्ण हो गई। दूसरी ओर आध्यात्मिकता आवश्यक शक्ति के बिना क्षीण होती गई, क्योंकि पंचमकारों को उससे दूर रखा गया। आजकल पंचमकारी तंत्र को तो गलत बोला जाता है, वैसे पंचमकारों का उपयोग धड़ल्ले से व बिना किसी रोक-टोक के खुल्लम-खुल्ला हो रहा है, आध्यात्मिकता के लिए नहीं, अपितु अंधी भौतिकता के लिए। इससे सिद्ध होता है कि आज असली तांत्रिकों की समाज को सख्त आवश्यकता है।

तंत्र एक विद्रोही सम्प्रदाय की तरह

प्रेमयोगी वज्र के साथ भी कुछ-२ ऐसा ही हुआ। वह भी आम जनमानस की तंत्रपद्धतियों को अपनाता था। परन्तु उससे उसका आध्यात्मिक विकास बहुत धीरे-२ हो रहा था। जब बहुत लम्बे समय तक भी उसे कुण्डलिनीजागरण की झलक की आशा तक भी नहीं मिली, तब वह आम अध्यात्मिक जनमानस के विरुद्ध बागी जैसा हो गया। उससे उसका बहुत अपमान होने लगा। उसका विरोध भी तांत्रिक पंचमकारों के सेवन के रूप में बढ़ता ही जा रहा था। ये दोनों कार्य-कारण एक दूसरे को बढ़ाते जा रहे थे। अपमान से विरोध व विरोध से अपमान। यह चक्र तब तक चलता रहा, जब तक उसे कुण्डलिनीजागरण की झलक नहीं मिल गई। उससे वह संतुष्ट होकर शांत हो गया, और पंचमकारी तंत्र के ऊपर उसका विश्वास बढ़ गया।

योग और तंत्र वस्तुतः एक ही चीज है

वास्तव में योग (आम आध्यात्मिक तांत्रिक पद्धतियों सहित) व तंत्र (पंचमकारी योग) एक ही हैं, केवल प्रचंडता के स्तर में ही अंतर है। पंचमकारी योग से साधारण योग की अपेक्षा कुण्डलिनी अधिक प्रचंड रहती है। अतः एक बुद्धिमान तांत्रिक व्यक्ति दोनों का समयानुसार आश्रय लेता रहता है। दोनों में कुछ भी विरोध नहीं है। तांत्रिक तो सभी आध्यात्मिक लोग हैं, पर पंचमकारी तांत्रिक को ही तांत्रिक कहने का प्रचलन है। उसे हम पंचमकारी साधु भी कह सकते हैं, क्योंकि साधारण साधु व पंचमकारी साधु के बीच में तत्त्वतः कोई अंतर नहीं है, कुण्डलिनी की अभिव्यक्ति के स्तर को छोड़कर।

तंत्र सात्विक धर्मों (हिंदु, जैन, बौद्ध आदि) का सहयोगी ही है, विरोधी नहीं

ऐसा प्रतीत होता है कि तंत्र मैं मैथुन मकार ही सबसे प्रमुख है, क्योंकि इसीसे कुण्डलिनी को आश्चर्यजनक बल प्राप्त होता है। अन्य मकार तो केवल आवश्यकतानुसार इस मुख्य मकार के सहायक ही हैं। अन्य पंचमकारी धर्मों को तो मैं तंत्र का ही एक रूपांतरित स्वरूप मानता हूँ। उनमें जो शक्ति विद्यमान है, और जिसके प्रति अधिकाँश लोग आकर्षित होते हैं, वह पंचमकारिक तांत्रिक शक्ति ही प्रतीत होती है। परन्तु सात्विक हिन्दु धर्म / तंत्र का विरोध करके वे विरोधी धर्म आध्यात्मिक लाभ की प्राप्ति नहीं करा सकते, अपितु उल्टा हानि ही कराते हैं, यह बात तो तय है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि यह सिद्धांत है कि पंचमकार तभी सफल होते हैं, यदि वे सात्विक तंत्र / योग / धर्म के सान्निध्य में रहें। इससे दोनों पद्धतियों को आध्यात्मिक व भौतिक, दोनों प्रकार के लाभ मिलते हैं। अन्यथा पंचमकार पापों के भण्डार ही तो हैं। अतः सभी धर्मों के सहयोगात्मक सहअस्तित्व में ही सबका भला है। स्वर्णसंज्ञक या आकर्षक व्यक्तित्व / रंग-रूप वाले हिंदु पंडितों के लिए इसीलिए अनुष्ठानपरक, निस्स्वार्थी, मानवतापूर्ण, प्रेमपूर्ण, संतोषी, सामाजिक व अहिंसावादी होकर रहने का निर्देश दिया गया है, ताकि उनमें अद्वैतभाव व अनासक्तिभाव के साथ-२ एक दिव्य तेज व आकर्षण भी विद्यमान रहे। तभी तो अन्य आम या पंचमकारी लोग उन्हें गुरु बना कर उनके रूप की कुण्डलिनी को अपने मन में पुष्ट कर सकते हैं। तभी पंचमकारों की शक्ति कुण्डलिनी को लगेगी, अन्यथा वह उनके लिए नरक का रास्ता ही साफ करेगी।

तंत्र के मूल के बारे में विविध विचार

कई स्थानों पर तो पंचमकारों का सेवन संकेतमात्र या औपचारिकता मात्र के लिए इसलिए निर्दिष्ट किया गया है, ताकि किसी को यह अहंकार न होए कि मैं बहुत शुद्ध हूँ, और साथ में उत्तम प्रकार का अद्वैतभाव भी बना रहे। तंत्र में यह सिद्धांत भलीभांति ध्यान में रखा गया है कि कर्म का फल तो मिल कर ही रहेगा, इसलिए पंचमकारों के प्रयोग में बहुत संयम व सावधानी बरती जाती है। कई स्थानों पर इसलिए उनका प्रयोग बताया गया है, ताकि हिंसक या राक्षस प्रकृति के लोगों को सही ढंग से खाना-पीना व भोग-विलास करना सिखाया जा सके, और उनके भोग-विलास के अन्दर अध्यात्म का बीज डालकर उन्हें भी अध्यात्म की ओर मोड़ा जा सके। बाद में धीरे-२ वे खुद सुधर जाते हैं। परन्तु कुछ भी हो, पंचमकारी तंत्र की आश्चर्यजनक शक्ति को नकारा नहीं जा सकता। सिद्ध तांत्रिक तो यहां तक कहते हैं कि तंत्र विशेषकर यौनतंत्र के बिना आत्मज्ञान को प्राप्त ही नहीं किया जा सकता है।

तंत्र के बारे में अन्य रोचक तथ्य

तंत्र के बारे में और भी बहुत से रोचक तथ्य विद्यमान हैं। तंत्रसमाज को गुह्य समाज भी कहते हैं। कई तो उनमें महान ब्राम्हण पंडित भी शामिल हो गए थे। कई तांत्रिकों की तो उनकी अपनी बहन ही उनकी तांत्रिक गुरु थी। इस्लाम में भी अपनी बहन से (यद्यपि सहोदर बहन से या पिता की पत्नी से पैदा हुई के साथ नहीं) विवाह की अनुमति है। इससे कुछ अंदाजा लगता है कि इस्लाम के मूल में कहीं न कहीं पंचमकारी तंत्र विद्यमान है। काबा में जिस काले पत्थर को चूमने का रिवाज है, उसे अधिकाँश लोग शिवलिंग ही मानते हैं। भगवान शिव तो तंत्रमार्ग के आदि प्रवर्तक हैं ही। विषमवाही तंत्र के मामले में तो यह भी माना गया है कि तांत्रिक प्रेमिका जितनी अधिक बदसूरत या अनाकर्षक हो, वह उतनी ही अधिक तंत्रसम्मत होती है, बशर्ते कि वह तांत्रिक गुणों से संपन्न हो। ऐसा इसलिए, क्योंकि उसमें अहंकार नहीं होता, जिससे वह दूसरों / गुरु के रूप की कुण्डलिनी को अपने ऊपर आसानी से पनपने देती है। विषमवाही तंत्र का अर्थ है कि मानसिक कुण्डलिनी छवि किसी और की (गुरु आदि की) होती है, जबकि कुण्डलिनीवाहक तो तांत्रिक प्रेमिका ही होती है। समवाही तंत्र का अर्थ है कि मानसिक कुण्डलिनी छवि भी तांत्रिक प्रेमिका के रूप की होती है, और कुण्डलिनी-वाहक भी वही होती है। समवाही तंत्र में सांकेतिक / अप्रत्यक्ष तांत्रिकमैथुन अधिक कारगर है, परन्तु विषमवाही तंत्र में पूर्ण / स्पष्ट / प्रत्यक्ष तांत्रिकमैथुन क्रिया। इसीलिए अधिक से अधिक यौनाकर्षण उत्पन्न करने के लिए समवाही तांत्रिका आकर्षक होनी चाहिए। समवाही व विषमवाही नाम के तंत्र के दो प्रकार मैंने इसी मेजबान वेबसाईट पर प्रेमयोगी वज्र के अनुभवात्मक विवरण में देखे, अन्य स्थान पर नहीं, यद्यपि तंत्र में यह प्रचलित धारणा है कि पिछड़े वर्ग की महिलाएँ प्रत्यक्ष तांत्रिकसम्बन्ध के लिए सर्वोत्तम होती हैं। इससे प्रेमयोगी वज्र का कथन स्पष्ट हो जाता है। कहा जाता है कि एक बार एक प्रख्यात तांत्रिक-गुरु की बदसूरत व काली तांत्रिक प्रेमिका का उनके शिष्य ने उपहास उड़ाया था। उससे नाराज होकर उस तांत्रिक-प्रेमिका ने उसको उसके जीवनकाल में आत्मज्ञान की प्राप्ति न होने का श्राप दिया। उससे वैसा ही हुआ।

अब हम तंत्र व इस्लाम के बीच समानता पर विस्तार से चर्चा करते हैं।

तंत्र व इस्लाम की शुरुआत लगभग एकसाथ हुई। दोनों में ही संसार-त्याग को अस्वीकार किया गया है, और सांसारिक प्रवृत्ति पर जोर दिया गया है। दोनों में ही स्त्री को महत्त्व दिया गया है। खतना के पीछे भी तान्त्रिक सिद्धांत ही प्रतीत होता है। इस्लाम में मौलवी के द्वारा हलाला करने की रिवाज भी तंत्र की उस प्रथा का विकृत रूप प्रतीत होती है, जिसमें गुरु व शिष्य की संयुक्त तांत्रिक-प्रेमिका होती है। दोनों ही साधना-पथ सभी सर्वसाधारण व शुद्धि-बुद्धि से रहित लोगों को भी मुक्ति प्रदान करने के लिए बनाए गए हैं। तांत्रिक नाथ सम्प्रदाय के बहुत से गुरुओं को बहुत से मुसलमान अपना भी गुरु मानते हैं। तांत्रिक गुरुओं को पीर बाबा भी कहा जाता है। जिस तरह दक्षिणपंथी, हिन्दुओं के शुद्धिवादी हैं, उसी तरह सूफी साधना-पथ इस्लाम में शुद्धिवादी व नरमपंथी विचारधारा है। अधिकांशतः, हिन्दु धर्म के दक्षिणतंत्र व वामतंत्र को एक-दूसरे का विरोधी बताया जाता है। परन्तु प्रेमयोगी वज्र के तांत्रिक अनुभव के आधार पर मैंने इस लेख में यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि वामतंत्र व दक्षिणतंत्र आपस में विरोधी नहीं, अपितु सहयोगी हैं। साधारण तांत्रिक पद्धतियों को दक्षिणतंत्र कह लो, व पंचमकारी तंत्र को वामतंत्र। इसी तरह हिन्दु धर्म व इस्लाम धर्म भी एक दूसरे के सहयोगी ही सिद्ध हुए, क्योंकि वृहद् परिपेक्ष्य में हिन्दु धर्म को दक्षिणतंत्र एवं इस्लाम को वामतंत्र कह लो। इसलिए दोनों के बीच में वैमनस्य या कटुता के लिए कोई स्थान नहीं है। दोनों ही धर्म एक-दूसरे से घृणा करके अनजाने में ही एक दूसरे से प्रेम कर रहे होते हैं। परन्तु उससे पूरा काम नहीं चलता। फिर क्यों न ये दोनों सीधे तौर पर एक-दूसरे से प्रेम करें, जिससे वे एक-दूसरे की शक्ति को और अधिक मात्रा में व अधिक सकारात्मकता के साथ प्राप्त कर सकें। विचारों में भिन्नता तो मानवमात्र का स्वभाव है ही, परन्तु उससे आपसी प्रेम व सहयोग पर दुष्प्रभाव नहीं पढ़ना चाहिए। यदि उन्हें अपने प्राचीन धर्मशास्त्रों में संशोधन करने की आवश्यकता पड़े, तो मानवता के हित में धर्मसभा या सर्वधर्मसभा बैठाकर कर लेना चाहिए। मैं यहाँ स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि यहाँ पर सभी धर्मों की बात हो रही है, किसी विशेष धर्म की नहीं। सभी को अमानवीयता, कट्टरता व घृणा से भरे हुए शब्दों में इस तरह से संशोधन करने पर विचार करना चाहिए, जिससे सभी धर्मों का सम्मान भी बना रहे, और जमाने के अनुसार उनमें संशोधन भी हो जाएं। उदाहरण के लिए जब से हिंदु धर्म में बलि प्रथा का विरोध होने लगा, तब से ही प्रतीतात्मक रूप में नारियल की बलि दी जाती है। तंत्र में कुण्डलिनी / गुरु के नाम पर पंचमकारों का सेवन किया जाता है, तो इस्लाम में अल्लाह (ईश्वर) के नाम पर, यद्यपि दोनों कुछ समानता साझा करते हैं। वास्तव में निराकार ईश्वर के निरंतर ध्यान से भी कुण्डलिनी ही पुष्ट होती है, यह रहस्य सभी को पता नहीं है। परन्तु कट्टर इस्लाम में पंचमकारों में मानव के प्रति हिंसा व झूठ-फरेब को भी सम्मिलित किया गया है। तुलनात्मक रूप से हल्के स्तर पर ऐसा हिन्दु धर्म व इसाई धर्म में भी हुआ, यद्यपि अधिकाँश मामलों में यह कहा जाता है कि ऐसा प्रतिक्रयास्वरूप हुआ। अब पुराने जमाने में इसकी क्या जरूरत पड़ी होगी, यह स्पष्टतया कह नहीं सकते, परन्तु आज के शिक्षित व मानवतापूर्ण युग में यह जरा भी प्रासंगिक नहीं है, ओर पूरी तरह से त्याज्य है। हालांकि घोर आत्मरक्षा के लिए (जान बचाने के लिए) इनके प्रयोग पर विरले मामलों में विचार किया जा सकता है। असली त्याग तो भावना का त्याग है। सुप्त भावना भी काम करती रहती है। इसलिए तत्संबंधित संकल्पों की दृढ़ अभिव्यक्ति से अमानवता का खंडन करना चाहिए, तभी सुप्त भावना (संस्कार) नष्ट होती है। ये सभी तथ्य इस वेबसाईट के नायक व एक तांत्रिक, प्रेमयोगी वज्र के अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर लिखे गए हैं, यह मात्र खाली थ्योरी नहीं है। प्रेमयोगी वज्र एक आत्मज्ञानी है, व उसकी कुण्डलिनी भी जागृत हो चुकी है। उसे भी तभी आध्यात्मिक सफलता मिली, जब उसने लगभग 25 वर्ष पूर्व अमानवता का सार्वजनिक रूप से कड़े शब्दों में खंडन किया। इसे इसी मेजबान वेबसाइट पर स्थित वेबपेज के निम्न लिंक पर पढ़ा जा सकता है- कुण्डलिनीयोग, यौनयोग व आत्मज्ञान का अनुभूत विवरण

तंत्र को कभी भी हल्के में नहीं लेना चाहिए, क्योंकि भ्रष्ट होने पर यह नरक के द्वार भी खोल सकता है

एक स्पष्टीकरण यहाँ युक्तियुक्त प्रतीत हो रहा है। यदि ईश्वर की खिलाफत करने वाले बन्दे को ईश्वर के स्मरण के साथ यातना दी जाए जेहाद आदि के नाम पर,  तब उसके बदले में जो यातनारूपी फल उस यातना देने वाले को मिलेगा, उसके साथ स्वयं ही ईश्वर का स्मरण बढ़ते समय के साथ दुगुने या अधिक रूप में हो जाएगा, क्योंकि कर्म व उसका फल दोनों आपस में जुड़े हुए होते हैं। फिर यदि वह यातनाफल सहते हुए मर ही जाए, तब तो सीधा मुक्त हो गया, क्योंकि सनातन धर्म में भी कहा है कि मरते समय जिसका स्मरण किया जाए, वही रूप मरणोपरांत मिलता है। परन्तु यदि ऐसा नहीं हुआ, तो नरक का द्वार खुला है। यह अलग बात है कि उसे नरक में भी ईश्वर का स्मरण होता रहेगा। इसलिए बहुत सावधानी की आवश्यकता होती है। इसी तरह, अब जब कोई ईश्वर के नाम पर पीड़ा सहेगा, तो स्वाभाविक है कि उसमें भी ईश्वर का स्मरण जागेगा, जिससे वह भी ईश्वर को प्रिय हो जाएगा। इससे पीड़ा देने वाले का व पीड़ा सहने वाले का, इन दोनों का एकसाथ भला होगा। अतः स्पष्ट है कि इसमें पीड़ा सहने वाले से अधिक बुरा तो पीड़ा देने वाले का होगा, क्योंकि यदि वह तंत्र का आचरण सही ढंग से नहीं कर पाया, तो बुरे कर्म से पैदा होने वाली नरकरुपी तलवार सदैव उसके ऊपर लटकी रहती है। क्योंकि यह महान कर्म-सिद्धांत है कि जब तक कोई मुक्त नहीं हो जाता, तब तक कर्म का फल तो मिल कर ही रहेगा। इसीलिए इसमें ‘सबकुछ’ या ‘कुछ भी नहीं’ होता है, बीच वाले स्तर नहीं होते। यही तंत्र का भी, विशेषतः अतिवादी तंत्र का भी सिद्धांत है। यही एक मुख्य कारण है कि महान इस्लाम एक अतिवादी तंत्र की तरह लगता है। परन्तु दुर्भाग्य से अतिवादी तंत्र के डर के कारण ही बहुत से लोग साधारण तंत्र से भी दूर रहने लगे, जिससे वे एक विज्ञानमिश्रित आध्यात्मिक पद्धति के लाभों से अछूते रहने लगे। प्रेमयोगी वज्र ने इसे अपने अनुभव से सिद्ध किया। उसने कुण्डलिनी के ध्यान के साथ मांसाहार किया। जब उससे उसे छिटपुट चोट के रूप में उसका फल मिला, तब एकदम से उसके मस्तिष्क में वह कुण्डलिनी प्रचंड होकर प्रकट हो गई, और उससे जुड़ा हुआ माँसभक्षण का पापकर्म भी उसे स्मरण हो आया। अब जो कहा है कि अल्लाह के बन्दे को परेशान नहीं करना चाहिए, वह भी सनातन धर्म के अनुसार ही है, जिसमें कहा गया है कि ईश्वरभक्त का बुरा करने वाले को ईश्वर कभी क्षमा नहीं करते। वास्तव में सभी धर्म एकरूप ही हैं, केवल समझने भर का फर्क है। इसी तरह, एक बार प्रेमयोगी वज्र ने कुण्डलिनीध्यान / अद्वैतपूर्ण जीवन के साथ हल्का-फुल्का राजद्रोह किया। वास्तव में वह राजद्रोह नहीं था, अपितु राजद्रोह का अभिनय मात्र ही था मूलतः, क्योंकि उसमें अहिन्सापूर्वक सर्वलोकहित छुपा हुआ था। जब उसे सजा मिली, तो उसने दिव्य प्रेरणा से सजा से बचने का पूरा प्रयास किया, जिसमें उसे अनौखी सफलता भी मिली। जब उसे उसकी हल्की-फुल्की सजा मिली, तब वह उसे ईनाम की तरह लगी, और उसके मन में कुण्डलिनी-ध्यान / अद्वैतभाव पहले से भी प्रचंड हो गया मूलकर्म के स्मरण के साथ, जिससे उसका थोड़े से योग के प्रयास के साथ कुण्डलिनीजागरण हो गया। साथ में कहें, जैसे योग के समय शारीरिक जोड़ों पर सांसों / मुड़ने / गति आदि के प्रभाव से उत्पन्न संवेदना के ऊपर कुण्डलिनी आरोपित होकर प्रचंड हो जाती है, उसी प्रकार धर्मसम्मत वेदना आदि के समय ईश्वर, संवेदना के ऊपर आरोपित होकर अति स्पष्ट हो जाते हैं।

कोई भी, किसी से भी, कभी भी घृणा कर ही नहीं सकता; प्रेम ही सत्य है

तभी तो मैं कहता हूँ कि कोई भी किसी से कभी घृणा कर ही नहीं सकता। यदि एक आदमी दूसरे आदमी से संपर्क स्थापित करता है, तो वह हर हालत में उससे प्रेम ही करता है। यदि वह उसका भला करता है, तो उसको प्रत्यक्ष रूप से आगे बढ़ने का मौक़ा देकर, और यदि वह बुरा करता है, तो उसके पापों को नष्ट करके अप्रत्यक्ष रूप से। यद्यपि पहले वाला तरीका अधिक प्रशंसनीय व व्यावहारिक है। दूसरे तरीके का प्रयोग यदि मजबूरीवश करना ही पड़े, तो हल्के या अधिक से अधिक मध्यम स्तर तक ही, अतिवादी स्तर तक कभी नहीं।

इतिहास गवाह है कि मक्का में रहने वाले मुस्लिम मूर्तिपूजक थे। इसका सीधा सा मतलब है कि वे तंत्रयोगी थे। क्योंकि वहां के लोग मांस-मदिरा, यौन-भोग आदि पंचमकारों का सेवन तो वैसे भी पहले से करते आए हैं। इनके साथ मूर्तिपूजन जुड़ जाए, तो वह स्वतः ही तंत्र बन जाता है।

अमानवतावादी धर्म कैसे बने

हो सकता है कि प्राचीनकाल में आम जनजीवन में लड़ाई-झगड़ों की, युद्धादि की व पशु आदि के प्रति हिंसाओं की बहुतायत हुआ करती थी, जिनका निवारण संभवतः असंभव था। इसलिए उन्हें ही धर्म का आवरण पहना कर शुद्ध व मुक्तिकारी कर दिया गया। क्योंकि हिंसाओं व अशुद्धियों से भरे हुए वातावरण में शुद्ध वैदिक क्रियाएं लाभ के स्थान पर हानि पहुंचा सकती थीं, इसीलिए उनके प्रति घृणा को फैलाया गया। बाद में स्थिति बदल गई, परन्तु उनके बनाए गए नियम सदा के लिए हो गए, क्योंकि वे निष्ठा व विश्वास से लिखित रूप में पक्के कर दिए गए थे। उस समय यातायात व संचार की भी संतोषजनक सुविधाएं नहीं होती थीं। इसलिए एक छोटे से दुष्कर / विशेष परिस्थिति वाले क्षेत्र में सीमित लोग समझते थे कि पूरी दुनिया उन्हीं के जैसी थी। इसीलिए वे अपनी विचारधारा को पूरी दुनिया में फैलाने की मंशा रखते थे।

इसी तरह पुराने समय में तंत्र में भी विरले मामलों में नर-बलि की प्रथा थी, जो अब नहीं है। दोनों में ही शरीर-सुख को अधिक महत्त्व दिया गया है। दोनों में ही हठयोग के आसन हैं। दोनों ही पलायनवादी नरम हिंदुत्व के विरोधस्वरूप ही बने थे। यद्यपि तंत्र इस्लाम की अपेक्षा नरम हिंदुत्व के प्रति बहुत अधिक उदारवादी बना रहा, और उसके बीच में पूरी तरह से घुल-मिल कर जीवित बना रहा।

यहाँ हम यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि इस्लाम में 5 मकार न होकर 4 मकार ही हैं, कम या अधिक रूप से। उसमें मदिरा निषिद्ध है। यद्यपि मैं तो माँस के प्रभाव को मदिरा के प्रभाव के समकक्ष ही मानता हूँ। दोनों ही तमोगुणस्वरूप हैं। साथ में यह भी स्पष्ट करना चाहता हूँ कि वे पञ्चमकार वहां तंत्र की तरह स्पष्ट व अच्छी तरह से परिभाषित  न होकर पञ्चमकार की तरह ही प्रतीत होते हैं, क्योंकि उनका प्रभाव पञ्चमकारों की तरह ही ईश्वरीय शक्ति की ओर ले जाने वाला है।

उपरोक्त तथ्यों के लिए अन्य प्रामाणिक लेख निम्नोक्त लिंक पर पढ़े जा सकते हैं।

At first glance, Islam and Tantrism might seem an unlikely pair for comparison, the former known for its austere simplicity and uncompromising monotheism, the latter presenting a plethora of rituals, mantras and deities. But looking beneath the surface at the underlying philosophical principles will reveal that the two share much in common—–

http://greatvashikaranspecialist.com/islamic-tantra

In Sanskrit language Allah, Akka and Amba are synonyms. They signify a goddess or mother. The term ‘ALLAH’ forms part of Sanskrit chants invoking goddess Durga, also known as Bhawani, Chandi——

अल्लाह संस्कृत का शब्द है- स्क्रिब्ड

अंततः धार्मिक उन्माद से बचाने वाली, व वास्तविक मानवता-धर्म सिखाने वाली संक्षिप्त जानकारी इसी वेबसाईट पर (जिसका नायक प्रेमयोगी वज्र है) प्राप्त की जा सकती है, और विस्तृत जानकारी वाली पुस्तक को निम्नलिखित लिंक पर प्राप्त किया जा सकता है।

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Yoga and Tantra – A comparative study (some interesting facts about the tantric system, Tantra versus Islam)

It is to certify that we don’t endorse or oppose any religion. We only promote scientific and humane study of religion.

What is Tantra?

From the very beginning in the tantric system, a person treats himself, just like the person of God / dehapurusha, as a supremely, free, nondual and unattached. However, in Yoga, a person first wakes up his kundalini. From that, he experiences great joy associated with Advaita / nonduality. With the happiness of that KundaliniJagran, he begins to adopt unattached conduct in an unintended manner, and gradually becomes non-dual like Tantric. A yogi can also experience enlightenment while moving ahead with KundaliniJagran. His adeptness gets more firmness from that. This means that the tantric technique is easier, more natural, universal, friendly to all human beings and humanistic than yoga. When the tantric system has to be accepted even after yogic achievement, why not accept it from the beginning? People who practice tantric mechanisms get themselves KundaliniJagran and enlightenment over time, without any different or special effort. Many people also get a natural opportunity to prove both the mechanisms, tantric as well as Yoga together; as with this hosting website, it happened with the protagonist Premyogi vajra. Many people limit the system to the five Ms. But the truth is that the tantric system is a whole life pattern. This is an Advaitic way (nondual) of life. Most spiritual pickles of Hindu culture are different parts of a tantric system, whether it is study of Vedas-Puranas, or various activities related to them. In ancient times, those people who had enlightenment became too decent and found very difficult to live their life in normal life. The reason for this was that the common people were used to living life from a physical perspective, which could not accept the enlightened minds of the enlightened people. Therefore, they tried to live their life while copying the natural style means imitating nature, leaving the common, ignorant and worldly people away from their deep heart. That is because they found all activities to be knowledgeable in nature. By doing so, their spiritual level increased further, and they became lively liberated. Seeing the benefits of natural lifestyles, they became curious to show the benefits to others in their mind. Therefore, they started writing natural events in the living form. That well-known scriptural collection in written form became famous as Vedas-Puranas, that made life easier and spiritual for many people. The enlightened people who wrote those mythologies were called sages/ monks.

Some mystical facts about Tantra

The same type of incident happened with tantrik Premyogi Vajra as well. Even in his childhood, he got transient enlightenment. After that, he was unable to live himself as a normal person. That is why he made a philosophy of physiology philosophy / body science philosophy, a lively philosophy similar to mythical philosophies of Vedas-Puranas, for his benefit. From his proximity to that self-made philosophy, with the achievement of Advaita and non-attachment, his all-round progress was ensured, and even unintentionally, there was a glimpse of KundaliniJagran. Inspired by the same benefits, he composed a book based on the same philosophy, which we can call modern mythology. In the Puranas, there is a description of the physical universe outside, but in the philosophy of body, the description of the subtle creation within our own body is described. According to ‘Yatpinde Tatbramhande’, there is no difference between the two worlds. Therefore, we can also call Premyogi Vajra as a modern sage. His book is like a Tantric book, similar to the Puranas, although there is also a few parts of Panchmakari Vidya / 5 Ms, like the Srimad Devibhaagavat Purana. Now it is the Panchamakari tantric system, it is only a small part of the vast Tantric system. After conducting a tantric system for a very long time, when the Tantric attitude of the common seeker becomes very mature, then only under the guidance of a qualified master, the five-M part of the system should be taken as a shelter, so that sufficient power can be obtained for KundaliniJagran. In the direction of its adoption earlier than the proper time or under the guidance of an inept guru, it can also bring losses to the place of profit. Together, the goal of Panchmakari Tantricas is not violence, but KundaliniJagran only. The best sources of power are only meat, sex and alcohol, which cannot be obtained without violence. Therefore, the least of their experiments have been given priority to achieve maximum spiritual benefits. An example of this is fish-intake. Because the fish can also be caught in the minimum quantity as needed, hence there is no redundant violence, so that violence-faults remain at a minimum level. Together, the fish is of cold nature. Therefore, it does not allow that anger in the Panchamakari to occur, which is the biggest obstacle in the spiritual path. Together, it produces the lowest Tamoguna than related other nonvegs, and its side effects on the body are even less than the other. In the same way, a single wife has been given priority so that excessive sexuality can be avoided, because that is also a particular kind of violence, especially if the right tantric rules are not adopted. Still, light mistakes are natural when learning. If the tantric-mates have to change, then in rare cases, only after a very long time and after getting special spiritual progress or after achieving enough spiritual progress. The evil eye on the woman is absolutely forbidden. Bad words and bad jokes about sexuality / 5 Ms are also taboo. The woman is to be respected as Goddess and Guru as far as possible. No one’s daughter or anyone’s wife is made to be a tantric companion, because they are seen as part of the emotional property of others. Most of the earliest known tantrics of ancient times are those who used to live life with the prevalent ordinary tantric practices, but later on for various reasons they also started consuming the Panchmakaras. One of the main reasons for these reasons was boycott from society or not adequate respect in society. Only then, some eminent tantric technicians have been around the Indo-Pak border of Punjab today, some have happened in today’s Pakistan. The second reason being the Punjab area is well prosperous, so there are people fond of making merry. In Punjab, the patronage of Guru-tradition has also been developed according to tantra. I myself have experienced everything directly from Punjab while living there in the direction of border areas with Pakistan. Tantric temples are also found abundantly on the same side. The access to the common Tantric system of the Hindus was reduced to those remote areas, so the people living there were not receiving the force from collective spirituality. Because of this resistance, they adopted the Panchamkari system correctly, and achieved quick success, because the spiritual force generated with the Panchamkari Shakti was more than the force of collective spirituality. Undoubtedly, they remained cut off from the common and spiritual society, yet they reached the peak of accomplishments, and continued to inspire others too. Naturally, in the same way, many Dalit and backward classes were also involved due to the above-mentioned reasons. The same example is also the Tibetan Buddhists who spend their lives alone in remote mountainous areas. The Panchamakari system seemed more suitable than the simple system prevailing in the plains, so it is still alive there. In Chinese Taoism / Tao religion, a sexual sage has been described as an ideal sage. In fact, since the separation of the Panchamakaras from the spiritual system, the decline of spirituality has started. Panchamakaras were described as the abode of evils. It was from this that the power of Panchamakars kept on raising the power of the evil people, and they continued to get stronger from it. After all, the whole earth became full with the so-called ignorant or evil people. On the other hand, spirituality became impaired without the necessary power, because the five Ms were kept away from it. Nowadays, the Panchamakari tantric system is spoken incorrectly, though the use of the Panchamakars is being used in the open and without any interference, not for spirituality, but for blind materiality. This proves that today the society of real tantrics is a strict requirement.

Tantra like a rebel cult

Something similar happened with Premyogi Vajra. He also adopted the spiritual techniques of common sense. However, his spiritual growth was slowing down. When he could not even get the hope of glimpse of KundaliniJagran even for a very long time, he became like a rebel against the common spiritual system. Common people started to insult him. His opposition was also increasing in the form of intake of Tantric Panchamakars. Both of this effect-reason was increasing each other. Disrespect with opposition and opposition with insult. This cycle continued until he got a glimpse of KundaliniJagran. He became content with his calmness, and his faith increased over the Panchamakari tantric system.

Yoga and Tantra are virtually the same thing

In fact, yoga (including common spiritual tantric methods) and tantra (Panchamkari Yoga) is the same, only difference in the level of magnitude of kundalini expression. Kundalini is more massive with Panchamakari Yoga than ordinary yoga. Therefore, an intelligent tantric person keeps on taking shelter of both as per time. There is nothing opposed in both. Tantric is all the spiritual people, but the Panchmakari Tantric is the prevalence of saying Tantric. We can also call him Panchmakari Sadhu, because there is no difference in principle between the ordinary Sadhu and Panchamakari sadhu, except the level of manifestation of Kundalini.

Tantra is an ally of Satvik religions (Hindu, Jain, Buddhist etc.), not anti

It seems that the maithun-makar / sexuality-M is only the most important M of all the 5 Ms, because it gives a wonderful force to the Kundalini. Other considerations are, therefore, only helpful in this main cause. I consider other Panchmakari religions as a transformational form of the panchmakari tantric system. The power that exists in those, and the majority of which attract the people, appears to be the power of 5Ms. However, opposing Satvik Hindu religion / system, anti-religion cannot attain spiritual benefits, but reverse harm only; it is a matter of course. This is because it is the principle that the five Ms are successful only if those live near the satvik and peaceful system / yoga / religion. This gives both methods both spiritual and physical benefits. Otherwise, those are only the reserves of sins. Therefore, in all the cooperative co-existence of all religions, it is a blessing for everyone. It is instructed to be a rational, selfless, humanistic, loving, satisfying, social and non-violent, for the Hindu philosophers / priests of charming personality / colorful (svarna) Hindu pundits, so that they have a divine pace and attraction along with the non duality and detachment. Only then other common or Panchamakari tantric people can fortify their physical image as Kundalini in their mind by making them a guru. Only then will the power of Panchamakars look after and raise up the Kundalini, otherwise those will clear the path of hell for them.

Miscellaneous thoughts about the origins of Tantra

In many places, the consumption of panchamkaras has been specified for signatory purpose or formalities, so that no one should have the ego that I am very pure, and together with the best kind of non-duality. This principle in the spiritual system has been kept in mind that the result of karmic effect / Karma will continue to be met; hence, the use of panchamkaras is very modest and cautious. In many places, their use has been told so that people of violent or demon nature can be taught to eat, drink and enjoy the right way, and by putting the seeds of spiritualism within their enjoyment and luxury, they too could be turned towards spirituality. Slowly later on they themselves improve. However, anything, the amazing power of the Panchamakari tantric system cannot be denied. Siddha Tantric even says that without the Tantra especially sexual tantra, enlightenment can not be attained.

Other interesting facts about Tantra

There are even more interesting facts about the tantric system. Tantrasamaj is also called a cosmopolitan / secret society. Many of them had joined the great Brahmin pundit too. For many of the Tantric, their own sister was their tantric master. Islam is also allowed to marry one’s own sister (although not born from the wife of father). This suggests that there exists somewhere in the origin of Islam the Panchamakari tantric system. The black stone that kabba have a custom to kiss, most people consider that as Shivling. Lord Shiva is the originator of the Tantra. In the case of hetero-vehicle tantra, it is also believed that the more tantric girlfriend is more ugly or unattractive; tactical it is, provided it is filled with tantric qualities. That is because there is no ego in her, so that she lets the mental kundalini image made from physical forms of others / gurus to grow easily on herself. The vishamvaahee / hetero-vehicle tantra means that the image of the mental kundalini is of physical form of somebody else (the master), whereas the Kundalinivahika / kundalini carrier is a tantric lover. Samavaahee / homo-vehicle tantra means that the image of the mental kundalini is also of the physical form of a tantric lover, and the Kundalini-carrier is the same. In samavaahee tantra, signatory / indirect sexual technique is more effective, but complete / clear / direct tantric sexual action in the vishamvaahee tantric system. Therefore, to create more and more sexual attraction, the samavaahee Tantrica (female tantric) should be attractive. I have seen two types of tantric mechanisms called samavaahee tantra and vishamvaahee tantra in the experimental details of Premyogi Vajra on this host website only, not at other places. Although there is a prevailing belief in tantra that women of the backward classes are the best for direct tantric sexual activities. This makes the statement of Premyogi Vajra clear. It is said that once a famous Tantric guru’s ugly and black tantrica girlfriend was ridiculed by his disciple. Angered by that, that tantric girlfriend cursed him for not achieving enlightenment during his lifetime. That’s how it happened.

Now we discuss the similarity between Tantra and Islam in detail

The beginning of the Tantra and Islam began almost simultaneously. In both, escaping away from world has been rejected, and the emphasis is on worldly tendencies. Both have given importance to women. There appears Tantric principle behind circumcision. Halala done by maulavee in islam also appears as a distorted form of tantric ritual of making joint consort by guru and disciple. Both sadhana paths have been created to provide salvation for all the general and purity-free people. Too many Muslims consider tantric nath-gurus as their own gurus too. Tantric gurus are also called Pir Baba. Just as the rightists are purists of Hindus, in the same way, the Sufi spiritual practice is a puritanical and moderate ideology in Islam. Most of the time, the right Dynasties of Hinduism and the left ones are said to be anti to each other. But based on the tantric experience of Premyogi Vajra, I have tried to prove in this article that the tantra and the right Dynasty are not anti to each other, but collaborative. Say ordinary tantric methods to be dakshinatantra / right tantra, and the Panchamakari system is called vamatantra / left tantra. In the same way, Hindu religion and Islam also proved to be collaborators of each other, because in the larger perspective, call the Hindu religion as right tantra and Islam as a left tantra. Therefore there is no place for animosity or bitterness between the two. Both religions are loathing each other and are thus unknowingly loving each other for the love resides inside hatred. But it does not work in full. Then why do not these two love each other directly, so that they can achieve each other’s strength in greater quantity and with greater positiveity. The difference in ideas is the nature of mankind, but it should not be used to cause ill effects on mutual love and cooperation. If they need to amend their ancient theology, then it should be done in the interest of humanity by sitting in the Synod / dharmsabha or Sarvadharma Sabha / all religions’ assembly. I want to make it clear here that here all the religions are talking about, not of any particular religion. All should consider making amendments in this way in words filled with inhumanity, fanaticism and hatred, which will also preserve the respect of all religions, and also be amended according to the era. For example, since when Hinduism began to oppose the practice of spiritual slaughter, coconut was sacrificed in a symbolic form. In the name of the Kundalini / Guru in Tantra, the Panchamakars are consumed, however in the name of Allah (God) in Islam, however both share similarities. Actually minding the invisible god always feeds up the kundalini, the secret only known by few ones. But in the hardcore Islam, among the Panchamakars, violence and lies towards human beings have also been included. In Hinduism and Christianity, it was also there comparatively at a lighter level, although in most cases it is said that it was reactionary. Now, what was the need of it in the olden days, it can not be said, but in today’s educated and humanistic era it is not relevant, and needs to be totally exterminated. However, for one’s great self-defense (to save lives) their use can be considered in rare cases. Real sacrifice is the sacrifice of the bad spirit. Dormant sense also works. Therefore, the firm expression of the related resolutions should contradict the inhumanity, only then the latent feeling (samskaras) is destroyed. All these facts are written based on the personal experience of the hero of this website and a tantric, Premyogi Vajra, this is not a mere empty theory. Premogi Vajra is an enlightened man, and his Kundalini is also awakened. He also got spiritual success only when he denied the inhumanity in stern words nearly about 25 years ago. It can be read on this link to the webpage-https://demystifyingkundalini.com/home-5/

Tantra should never be taken lightly, because it can also open the doors of hell if corrupted.

An explanation seems to be justified here. If the hostile opponent of God is tortured with the remembrance of God in the name of jihad etc, then in return, when that torture-giver would get the fruit of punishment arising out of that karma of torturing other, then the God will be remembered by him in much intensity for the karma and that’s fruit are both interconnected.. Then, if he dies while suffering torture, then he would be liberated, because even in Sanatan Dharma, it is said that whatever at the time of death is remembered, the same form is got posthumously. However, if it does not happen, then the door of hell is open. It is a different matter that he will remember God in hell also. Therefore, very caution is required. Now, when someone accepts pain in the name of God, it is natural that in him there will be a remembrance of God, so that he too will be dear to God. Due to this the person causing suffering and the person who suffers, will be blessed with one and the same. However it is clear that it will be worse for the suffering-causer than the one who suffers pain, because if the former does not perform the Tantra properly, then the hell-sword which is born from evil deeds always hangs over him. Because it is a karmic principle that until one becomes free, then the effect of karma will remain unchanged. That is why there is ‘everything’ or ‘nothing’, there is no middle level in it. This is also the principle of the Tantra especially the extreme Tantra. This is one of the main reasons that Great Islam seems like an extremist Tantra. However, unfortunately due to fear of extreme tantra, many people started living away from the ordinary or soft Tantra, by which they became untouched by the benefits of a science-based spiritual method of Tantra. Premyogi vajra proved it through his experience. He enjoyed flesh with the remembrance of Kundalini. When he got his fruit as a sporadic injury, kundalini suddenly appeared much more intense in his mind, and he also remembered the interconnected karma of eating flesh. Now whoever says that a devotee of Allah should not be disturbed, it is according to Sanatan Dharma, which states that God does not forgive the one who does bad to devotee of God. Actually all religions are the same, there is a difference between understanding only. Likewise, once, Premyogi vajra had a slight rebellion along with Kundalini-dhyan / Advaita-life. In fact, that was not treason, but the act of light apparent sedition only, because there was non-violence with benefit of the whole world hidden inside. When he was punished, he tried his best to avoid punishment by divine inspiration, in which he also had unique success. When he got his light sentence, he felt that like a prize, and in his mind, Kundalini-meditation / advaita became even more prevalent, so that he got KundaliniJagran with some effort of yoga. Simultaneously further saying, as on the body joints in yoga, the sensation generated by the effects of breathing / twisting / motion etc. becomes enraged by the Kundalini, in the same way, during the time of devotional pain, the God sensed spontaneously over the sensation becomes very clear.

No one can ever hate anyone; Love is the ultimate truth

Only then I say that no one can ever hate anyone. If a person establishes contact with another person, then he loves him in every situation. If he does good to him, then by giving him a chance to move forward, and if he does bad, then by destroying his sins indirectly. Although the former way is more plausible and practical. If the use of the second method is to be compulsive, then only to the mild level or up to the moderate  level at maximum, never to the extreme level.

History is witness that Muslims living in Mecca were pagan (idol worshipper). It simply means that they were tantric or tantric-yogis. Because the people of those desert areas were already habitual of enjoying flesh, alcohol, sex, etc. (panchmakaras) since long. If idol worship becomes associated with these panchmakari habits, then it becomes Tantra automatically.

How non-humanist religions were formed

It may be that in ancient times there was an abundance of violence in the form of quarrels, wars and animals as the main source of diet etc., whose redress was possibly impossible. Therefore, those were made clean and liberating by wearing a cover of religion. Because pure Vedic actions in the atmosphere filled with violence and impurities could cause harm to the place of profit, therefore hatred towards them spread. Afterwards, the situation changed, but the rules made by them were made forever, because they were confirmed in a written form with loyalty and faith. At that time there was not even satisfactory facilities for traffic and communication. Therefore, the limited people in a small drought area / special geographic area understood that the whole world was like them. That is why they intended to spread their ideology to the whole world.

Similarly in ancient times, there was a practice of human sacrifice in rare cases in Tantra, which is no longer there. Both of them have given greater importance to body pleasure. Both have the postures of Hatha Yoga. Both were made to oppose the escapist and soft Hindutva. Although the Tantra remained much more moderate towards soft Hindutva than Islam, and remained completely dissolving in its midst.

Here, we want to make it clear that Islam does not have five makaras, but only four are there, more or less. Wine is prohibited in it. Although I consider the effect of meat equivalent to the effect of alcohol. Both are tamoguni (darkness producing) Together, also, want to make it clear that the five-makaras there seem not as clearly and well defined as in Tantra, but those appear as panchmakaras, because their influence is going to lead towards divine power just like the Panchmakaras of Tantra.

Other authentic articles for the above facts can be read at the following links.

At first glance, Islam and Tantrism might seem an unlikely pair for comparison, the former known for its austere simplicity and uncompromising monotheism, the latter presenting a plethora of rituals, mantras and deities. But looking beneath the surface at the underlying philosophical principles will reveal that the two share much in common—–

http://greatvashikaranspecialist.com/islamic-tantra

In Sanskrit language Allah, Akka and Amba are synonyms. They signify a goddess or mother. The term ‘ALLAH’ forms part of Sanskrit chants invoking goddess Durga, also known as Bhawani, Chandi——

Allah is a Sanskrit word- Scribd

In the end, a brief information that can save you from religious frenzy, and teach true humanity-religion, can be found on this website (Whose hero is a Premyogi vjara), and a detailed information book can be found on the following link.

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प्रिंट पुस्तक की ओर- Towards the print book

प्रिंट पुस्तक की ओर (please browse down or click here to view post in English)

जैसा कि पिछली ब्लॉग पोस्टों / blog posts में मैंने बताया है कि भारत में केवल 10% पाठक ही ई-पुस्तकों को पढ़ते हैं। अधिकाँश पाठकों को निराश न होना पड़े, इसके लिए पुस्तक के प्रिंट वर्जन / print version को पोथी डॉट कॉम स्वयंप्रकाशन के प्लेटफोर्म / self publishing platform of pothi.com  से छापने का निर्णय लिया गया। कभी वह एम एस वर्ड की डॉक्स सी फाईल / Doxc file of MS word को सीधे ही ले लेता था, तो कभी उसे पीडीएफ / PDF में कन्वर्ट / convert करके अपलोड / upload करने की हिदायत देता था। वर्ड फाईल को पीडीएफ में कन्वर्ट करने से पहले प्रिंट बुक के लिए फोर्मेट / format करना जरूरी होता है, क्योंकि पीडीएफ फाईल की फोर्मेटिंग को हम बदल नहीं सकते। इसी तरह वर्ड फाईल को पीडीएफ फाईल में बदलना आसान होता है, पर पीडीएफ फाईल को पुनः वर्ड फाईल में पूरी शुद्धता से बदलना लगभग असंभव सा ही होता है। उसके लिए सब्सक्रिप्शन / subscription पर पीडीएफ एलिमेंट / PDF element को खरीदना पड़ता है। उससे पीडीएफ फाईल को वर्ड फाईल में कन्वर्ट किया जा सकता है। हालांकि उससे आसान, कारगर व मुफ्त का विकल्प ओसीआर है। ओसीआर (ऑप्टिकल रिकोग्निशन सिस्टम) के बारे में आप मेरी अलग से वेबपोस्ट पढ़ सकते हैं। कमियाँ तो रह ही जाती हैं। इसलिए किसी भी लेख की मूल वर्ड फाईल को जरूर बेक अप / स्टोर / back up करके रख लेना चाहिए।

प्रिंट के हिसाब से वर्ड फाईल को अलग से फोर्मेट करना पड़ता है, क्योंकि ई-बुक का फोर्मेट प्रिंट बुक के लिए नहीं चलता। पहले मैं वर्ड के ‘पेज सेटअप / page setup’ पर गया। वहां पर ‘मार्जिन / margin’ टेब / tab को प्रेस / press किया। अपर / upper मार्जिन व बोटम / bottom मार्जिन को ०.5 इंच, अन्दर के / इनसाइड मार्जिन को ०.75 इंच, बाहर के / आऊटसाईड मार्जिन को ०.4 इंच, व गटर को ०.3 इंच रखा। गटर पुस्तक के आमने-सामने के पृष्ठों के बीच की नाली होती है, जिसमें कई बार अक्षर दब जाते हैं। इसीलिए उसे पर्याप्त चौड़ा रखा जाता है। मेरे द्वारा ‘मिरर मार्जिन / mirror margin’ सेलेक्ट किया गया। मिरर मार्जिन किताबों के लिए विशेष होते हैं। इसमें किताब के आमने-सामने वाले पृष्ठ एक-दूसरे के दर्पण-चित्र की तरह दिखते हैं। उसी पेज सेटअप पर पोर्ट्रेट व व्होल डोक्यूमेंट / portrait and whole document को सेलेक्ट किया। साथ में, हेडर / header- ०.2″ फ्रॉम टॉप / from top, व फूटर footer- ०.2″ फ्रॉम बोटम / from bottom रखा। यह पृष्ठ-सेटअप 300 पृष्ठों वाली मेरी पुस्तक के लिए पर्याप्त है। पृष्ठ संख्याओं में परिवर्तन के साथ, केवल अंदर के मार्जिन और गटर थोड़े-बहुत बदलते हैं, अन्य मार्जिन नहीं। याद रहे कि माइक्रोसोफ्ट वर्ड के 2007 व उसके ऊपर के वर्जन में डिफाल्ट पेज मार्जिन्स चारों ओर 1 इंच (2.54 cm) होता है।

क्रमबद्ध की गई सूचना निम्नलिखित स्क्रीनशॉट चित्र पर देखें-

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फिर में ‘पेपर / paper’ टेब पर गया। पहले कस्टम साईज / custom size सेलेक्ट किया गया। फिर पेपर वाईडथ /  paper width को 6″ व पेपर हाईट को 9″ रखा, क्योंकि 6″x 9″ की पुस्तकें सर्वाधिक लोकप्रिय हैं। उस पर ये सेटिंग्स / settings खुद ही लागू थीं- ‘फर्स्ट पेज-डिफाल्ट ट्रे सेलेक्टड / first page default selected, बोथ फॉर फर्स्ट एंड अदर पेजिज / both for first and other pages तथा व्होल डोक्यूमेंट / whole document।

तब में ‘लेआऊट / layout’ टेब / tab पर गया। सेक्शन स्टार्ट / section start- ओड पेज / odd page। इसका तात्पर्य है कि पुस्तक का प्रारंभ ओड पेज (1,3 आदि) से होगा, जो पुस्तकों में अच्छा लगता है। इसमें पुस्तक के बाएँ पृष्ठ पर ईवन नंबर / even number (2,4 आदि) होता है, और दाएं पृष्ठ पर ओड नंबर की पेज संख्या। वर्ड डोक्यूमेंट की शीर्ष-पट्टी में स्थित हेडर बटन (पुस्तक का शीर्षतम रिक्त स्थान) में जाकर, हेडर में पुस्तक के शीर्षक का नाम लिख दिया गया, और पुस्तक के फूटर में (पुस्तक का निम्नतम रिक्त स्थान) उपशीर्षक का। उससे प्रत्येक पेज पर वे नाम वैसे ही आ गए। एक महत्त्वपूर्ण बात और है। यदि हम वर्ड फाईल में embed fonts ऑप्शन को चालू करें, तो वह पीडीएफ फाईल में सर्वोत्तम तरीके से कन्वर्ट हो जाती है। उससे पीडीएफ को पुनः वर्ड फाईल में कन्वर्ट करना भी आसानी से संभव हो जाता है। इसके लिए word option में जाकर save – embed fonts – embed only the characters used in the document (best for reducing file size), इन बटनों को इसी उपर्युक्त क्रम में दबाएँ। फिर उस फोर्मेटिड बुक रुपी वर्ड डोक्युमेंट को एवरनोट में स्टोर कर दिया गया, ताकि वह भविष्य में भी काम आता। फिर उस वर्ड डोक्युमेंट को ओनलाईन पीडीएफ कन्वर्टर / online pdf converter से पीडीएफ में कन्वर्ट कर दिया गया। परन्तु उसमें बहुत सी गलतियाँ थीं, विशेषतः बहुत से अक्षरों की बनावट दोषपूर्ण थीं, जो मुझे पुस्तक को पढ़ते हुए चेक करते हुए पता चला। अंततः मैंने गूगल ड्राईव / google drive के पीडीएफ कन्वर्टर का प्रयोग किया। उसमें हिंदी के सभी अक्षर व चिन्ह पूर्णतया शुद्ध निकले। इसके लिए हमें डोक्युमेंट को गूगल ड्राईव पर अपलोड करना पड़ता है। फिर ‘ओपन विद / open with’ दबाकर पीडीएफ कन्वर्टर एप / app को क्लिक / click करना चाहिए। यदि वह लिस्ट / list में न आए, तो “कनेक्ट न्यू / मोर एप / connect new or more app” को क्लिक करके पीडीएफ कन्वर्टर को सर्च / search करना चाहिए, और उसे लिस्ट में जोड़ देना चाहिए। इसी तरह यदि हम ओपन विद की लिस्ट में गूगल ट्रांसलेट / google translate को क्लिक करें, तो उससे हम डोक्युमेंट को किसी भी भाषा में ट्रांसलेट कर सकते हैं। यद्यपि वह ट्रांसलेशन दोषपूर्ण होती है, इसलिए बाद में उसे हाथ से करेक्ट / correct करना पड़ता है। फिर भी इससे बहुत से समय की व दिमाग की भी बचत हो जाती है। शर्त यह है कि एक बार में अधिक से अधिक लगभग वर्ड के 80 पेज ही ट्रांसलेट हो सकते हैं। इसलिए पुस्तक को टुकड़ों में ट्रांसलेट करना पड़ता है। ओपन विद पीडीएफ कन्वर्टर को क्लिक करके एक विंडो / window आती है, उसमें फिर से ब्राऊस / browse करके कम्प्युटर / computer की किसी ड्राईव / drive में स्टोर्ड उस बुक डोक्युमेंट / stored that book document को  फिर से अपलोड करना पड़ता है। तभी “कन्वर्ट / convert” नाम का क्लिकेबल बटन / clickable button आता है। फिर उस पीडीएफ डोक्युमेंट को खोल लें। उसके शीर्ष पर दाईं तरफ एक डाऊन एरो / down arrow का निशान होगा। उसको क्लिक करने से वह डोक्युमेंट कम्प्युटर के डाऊनलोड फोल्डर / download folder में डाऊनलोड हो जाएगा। उस डोक्युमेंट में वही सेटिंगज / फोर्मेटिंग रहेंगी, जो उसके उत्पादक वर्ड डोक्युमेंट में रखी गई थीं।

अब पोथीडॉटकोम / pothi.com में जाएं। लॉग इन / login करने के बाद कहीं पर प्रिंट ओन डिमांड / print on demand बटन पर जाकर उसमें दिए गए निर्देशों का पालन करें, और बुक को पब्लिश कर लें। 1-2 दिन में वह खरीदी जाने के लिए तैयार हो जाएगी। नए-2 स्वयंप्रकाशक के लिए कवर को अपलोड करने से अच्छा तो इनबिल्ट कवर डिजाईनर की सहायता लेना ही ठीक रहता है। उसके लिए अच्छा सा कवर-फोटो / cover photo or image अपलोड करें। वह कवर फोटो पुस्तक के अंतिम पृष्ठ की पिछली तरफ लग कर बेक कवर back cover बन जाएगा। फ्रंट कवर / front cover पर पुस्तक के शीर्षक, उपशीर्षक, लेखक आदि का नाम लिखें। साथ में, पुस्तक की रिब / rib (पुस्तक की बाईंडिंग वाली केंद्रीय व पीछे की ओर की पट्टी) पर भी शीर्षक व लेखक का नाम लिखें।

प्रिंट ऑन डिमांड से चाहो तो जितना मर्जी बुक की कॉपियां छपवा सकते हो, यहाँ तक कि अकेली पुस्तक भी। परंतु इससे सामूहिक / पारंपरिक छपाई की अपेक्षा पुस्तक कुछ अधिक महंगी पड़ती है। फिर भी इसके अनेक लाभ होतेे हैं। इससे कागज की बर्बादी नहीं होती, क्योंकि जरूरत पड़ने परही पुस्तक को छपाया जाता है, और एडवांस में पुस्तक को छपाने की आवश्यकता नहीं होती। इससे कुल लागत खर्च में भी बहुत कमी आती है, व पबलिशर की मनमानी भी नहीं चलती।

यदि आपको इस पोस्ट से कुछ लाभ प्रतीत हुआ, तो कृपया इसके अनुसार तैयार की गई उपरोक्त अनुपम ई-पुस्तक (हिंदी भाषा में, 5 स्टार प्राप्त, सर्वश्रेष्ठ व सर्वपठनीय उत्कृष्ट / अत्युत्तम / अनौखीरूप में समीक्षित / रिव्यूड ) को यहाँ क्लिक करके डाऊनलोड करें। यदि मुद्रित पुस्तक ही आपके अनुकूल है, तो भी, क्योंकि इलेक्ट्रोनिक डीवाईसिस / फोन आदि पर पुस्तक का निरीक्षण करने के उपरांत ही उसका मुद्रित-रूप / print version मंगवाना चाहिए, जो इस पुस्तक के लिए इस लिंक पर उपलब्ध है। इस पुस्तक की संक्षिप्त रूप में सम्पूर्ण जानकारी आपको इसी पोस्ट की होस्टिंग वेबसाईट / hosting website पर ही मिल जाएगी। धन्यवाद।

यदि आपने इस लेख/पोस्ट को पसंद किया तो कृपया इस वार्तालाप/ब्लॉग को अनुसृत/फॉलो करें, व साथ में अपना विद्युतसंवाद पता/ई-मेल एड्रेस भी दर्ज करें, ताकि इस ब्लॉग के सभी नए लेख एकदम से सीधे आपतक पहुंच सकें। धन्यवादम।

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Towards the print book

As I mentioned in the previous blog posts, only 10% of readers in India read e-books. Most readers did not have to be disappointed, for this it was decided to print the print version of the book with the Pothi.com’s self publication platform. Sometimes that used to take MS Word’s Doxc file directly, then that had ever instructed to upload it in PDF format. Before converting word files into PDFs, it is necessary to format that for a print book, because we cannot change the formatting of PDF file. Likewise, it is easy to convert the word file to a PDF file, but it is almost impossible to convert the PDF file to a word file fully again. For that, the PDF Element has to be bought on the subscription. Herein document can be converted to a PDF file from a word file. Better, more effective and free option is using OCR. Read my separate webpost on OCR (OPTICAL RECOGNITION SYSTEM). However, the shortcomings still remain. Therefore, the original word file of any article must be backed up / stored properly.

Word file has to be formatted separately according to the print, as the format of the e-book will not be available for the print book. First I went to the ‘page setup’ of the word. Pressed the ‘margin’ tab on there. Fixed top margin and bottom margin to 0.5″, Inside Margin 0.75 in., Outside margin 0.4 inches, and gutter was kept 0.3 inches. Gutter of book is the drain between the face-to-face pages, in which the letters are suppressed little or more. That is why it is kept wide enough. I selected ‘Mirror Margin’. Mirror margins are special for books. In this, face-to-face pages of the book look like each other’s mirror-picture. Select the ‘Portrait’ and ‘Whole Document’ on the same page setup. Together, Header-0.2″ From Top, and Footer-0.2″ from Bottom. This page setup is enough for my book with 300 pages. With change in page numbers, only the inside margin and gutter vary little or more, not the other margins. Remember that the default page margins in Microsoft Word 2007 and above are 1 inch (2.54 cm) wide all around.

See below the consolidated information on a screenshot-

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Then went on the ‘paper’ tab. The first custom selection was selected. Then the paper Width kept 6″ and paper height as 9″, because the books of 6″x 9″ are the most popular. These settings were applied to them themselves – ‘First page – Default tray selected, Both for the first and other pages’ and the ‘Whole document’.

Then went to the ‘layout’ tab. Section Start- Odd Page. This means that the book will start with Odd Page (1,3 etc.), which is good in books. It contains the Even numbers (2,4 etc.) on the left page of the book, and the page numbers of the odd category on the right page. In the Header button located in the top-bar of the Word document, the title of the book was written in the header, and the subtitle of the book is in the footer (the lowest spacing of the book) . From that on each page, those names came in the same way. Word document converted to PDF will be best if “embed font” option is enabled in MS Word while saving the parent word document. With this, converting pdf file to word file becomes possible easily. For this, ‘word option’ button is to be clicked, and then save – embed fonts – embed only the characters used in the document (best for reducing file size), these buttons are to be pressed in this above sequence.

Then that formatted book was stored in Evernote so that it could work in the future. Then the Word document was converted to PDF from the online PDF Converter. But there were many mistakes in it, especially the text of many letters was faulty, which showed me on checking while reading the book. Eventually I used Google Drive’s PDF Converter. In it all the Hindi letters and symbols are completely pure. For this, we have to upload the document to Google Drive. Then press the ‘Open with the PDF Converter’ button. If it does not come in the list, then you should search the PDF converter by clicking the “Connect New / More App”, and add it to the list. Similarly, if we click on Google Translate in the list of ‘Open With’, we can translate the document in any language. Although the translation is faulty, it has to be corrected by hand afterwards. Yet it also saves a lot of time and brains. The condition is that approximately more than 80 pages of the word cannot be translated at a time. Therefore, the book has to be translated into pieces. Clicking ‘Open with PDF Converter’ comes a window, then has to browse it again and upload that stored book document in a drive of a computer. Only then clickable button named “convert” comes. Then open that PDF document. On top of it there will be a down arrow on the right. Clicking that will download it in the ‘download’ folder of the computer. That document will have the same settings / formatting, which was placed in its raw word document.

Now go to Pothi.com. After logging in, go to the ‘print on demand button’ anywhere and follow the instructions given in it, and publish the book. In 1-2 days that will be ready to be bought. Than uploading the cover by the newer self publisher, it is better to get help from an inbuilt cover designer. Upload a nice cover photo for that. The cover photo will become a back cover at the last page of the book. Enter the name of the book’s title, subtitle, author etc. on the front cover. Together, write the name of the title and author on the book’s rib (the central and rear side band of the book).

You can print copies of the book as much as you want, even the only book too with print on demand service. But this type book is more expensive than mass / traditional printing. Yet it has many benefits. This is not a waste of paper, as the book is printed only when it is needed immediately to read, and there is no need to print the book in Advance. It also highly reduces the total cost of investment, and also the publisher does not have the arbitrariness.

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योग से शारीरिक वजन को कैसे नियंत्रण में रखें- How to keep control over body weight through Yoga

योग से शारीरिक वजन को कैसे नियंत्रण में रखें (please browse down or click here to view post in English)

योग के साथ शारीरिक वजन घटता है। यहां तक ​​कि मैंने देखा है कि एक दिन के भारी काम के साथ भी मुझे अपनी पेंट के साथ बेल्ट लगाने की जरूरत महसूस होने लगती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मैं दैनिक योग अभ्यास की आदत रखता हूं। जब मैंने कड़ी मेहनत की, तब उसके साथ किए गए नियमित योग-अभ्यास से मेरी भड़की हुई भूख बहुत कम हो गई। इसलिए उस कड़ी मेहनत के साथ हुई वसा-हानि / fat loss को पुनर्निर्मित / recover नहीं किया गया, जिसके परिणामस्वरूप मेरा वजन घट गया। नियमित योग-अभ्यास के बिना सामान्य लोग भारी काम के बाद बहुत अधिक खाते हैं, इस प्रकार वे अपनी खोई हुई वसा का तुरंत पुनर्निर्माण कर लेते हैं। योग-अभ्यास दैनिक और हमेशा के लिए जारी रखा जाना चाहिए। यदि कोई अपना अभ्यास थोड़े समय के लिए जारी रखता है, जैसे कि यदि 2 महीने के लिए कहें, तो उसे अपने शरीर के वजन में कमी का अनुभव होगा। लेकिन अगर वह उसके बाद व्यायाम करना बंद कर देता है, तो उसकी योग से निर्मित शारीरिक व मानसिक शक्ति के पास भूख को उत्तेजित करने के अलावा अन्य कोई काम नहीं रहता है। इसके कारण उसे बहुत भूख लगती है, और वह बहुत भोजन, खासतौर से उच्च ऊर्जा वाले खाद्य पदार्थों को खाता है। इसके परिणामस्वरूप उसके शरीर की वसा का पर्याप्त निर्माण हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप उसके शरीर के वजन में एकाएक वृद्धि होती है, जो उसके पहले के मूल वजन को भी पार कर सकती है। तो निरंतर अभ्यास हमेशा जारी रखा जाना चाहिए। यह एक वैज्ञानिक और अनुभव से साबित तथ्य है कि खिंचाव वाली कसरतों / stretching exercises के अभ्यास से थोड़ी-बहुत कैलोरी जल जाती है। यद्यपि योग के अभ्यास से बड़ी मात्रा में कैलोरी जलाई नहीं जाती है, फिर भी ये अभ्यास शरीर को फिट, स्वस्थ और लचीला रखते हैं। यह किसी भी समय किसी भी प्रकार के साधारण या कठिन शारीरिक कार्य को कामयाबी व आसानी के साथ शुरू करने में मदद करता है, और व्यायामशाला के अभ्यास को भी अधिक कारगर बनाता है। इसके अलावा, यह पूरे शरीर में उचित अनुपात में रक्त के समान परिसंचरण में भी मदद करता है। इससे यह शरीर के रिमोट भंडारगृहों में जमा वसा की आसान निकासी में मदद करता है। उससे सभी कोशिकाओं को ऊर्जा के मुख्य स्रोत के रूप में वसा उपलब्ध हो जाती है। इसलिए शरीर भूख की कमी के लिए ऊर्जा की कमी का संदेश नहीं भेजता है, जिसके परिणामस्वरूप भारी भूख के बावजूद भारी भूख की रोकथाम होती है। परंतु आम लोगों में भारी काम के एकदम बाद भारी भूख भड़क जाती है, जिससे वे अपने खोए हुए वजन की भरपाई एकदम से कर लेते हैं। योग कुछ खास नहीं है, बल्कि भौतिक व्यायाम, सांस लेने और केंद्रित एकाग्रता को बढ़ाने का एक सहक्रियात्मक संयोजन है। फोकसड एकाग्रता / focused concentration इसके लिए विचारों के लिए नियंत्रक वाल्व / controlling valve के रूप में काम करती है, अराजक विचारों की अचानक भीड़ को रोकती है, जिससे इस प्रकार पेरानोइया/ paranoia और दिमाग को झूलने / mind swinging से रोकती है। जब अवचेतन मन में संचित विचार बहुत उत्तेजित हो जाते हैं, तो उन्हें दिमाग के अंदर ध्यान की केंद्रित छवि द्वारा धीरे-धीरे और सुरक्षित रूप से मुक्त करके छोड़ा जाता रहता है। साथ में, उन विचारों को बाँझ और गैर-हानिकारक बना दिया जाता है, या दूसरे शब्दों में कहें तो दृढ़ता से उत्तेजित विचार ध्यान की कुण्डलिनी छवि की कंपनी के कारण स्वयं ही शुद्ध हो जाते हैं। यह छवि दिन-प्रतिदिन की सांसारिक गतिविधियों से उत्पन्न होने वाली अराजक मानसिक गतिविधियों पर भी जांच रखती है। इसके कारण योग-अभ्यास के लिए एक जुनूनी शौक सा उत्पन्न हो जाता है, और इसे दैनिक कार्यक्रम से कभी भी गायब नहीं होने देता है। कुंडलिनी छवि पर केन्द्रित एकाग्रता के बिना योग-अभ्यास के साथ, योग अभ्यास के लिए शौक जल्द ही खो जाता है, और विभिन्न छिपे हुए विचारों की अराजकता की वजह से दैनिक क्रियाकलाप भी गंभीर रूप से पीड़ित हो जाते हैं।

तांत्रिक तकनीक मानसिक कुंडलिनी छवि को मजबूत करने और इस तरह से योग के प्रति लगन को बढ़ाने के लिए एक और गूढ़ चाल है। इसके परिणामस्वरूप पूरे श्वास में वृद्धि होती है, जिससे पूरे शरीर में पोषक तत्वों से समृद्ध और अच्छी तरह से ऑक्सीजनयुक्त रक्त की आपूर्ति में वृद्धि हो जाती है। इससे यह शरीर के वजन पर भी जांच रखता है। दरअसल तंत्र प्राचीन भारतीय आध्यात्मिकता से अलग कोई स्वतंत्र रूप का अनुशासन नहीं है। तभी तो वेद-शास्त्रों में इसका कम ही वर्णन आता है, जिससे इस रहस्य से अनभिज्ञ लोग महान तंत्र की सत्ता को ही नकारने लगते हैं। यह आत्मजागृति की ओर एक प्राकृतिक और सहज दौड़ / प्रक्रिया ही है। यह तो केवल विभिन्न आध्यात्मिक प्रयासों से पुष्ट की गई कुण्डलिनी को जागरण के लिए अंतिम छलांग / escape velocity ही देता है। यदि किसी की बुद्धि के भीतर कोई आध्यात्मिक उद्देश्य और आध्यात्मिक उपलब्धि नहीं है, तो अराजक बाहरी दुनिया के अंदर उपयोग में आ जाने के अलावा तांत्रिक शक्ति के लिए अन्य कोई रास्ता नहीं है। इसका मतलब है कि तांत्रिक तकनीक के लिए आवेदन से पहले कुंडलिनी छवि किसी के दिमाग में पर्याप्त रूप से मजबूत होनी चाहिए। तंत्र तो जागने के लिए कुंडलिनी को आवश्यक और अंतिम भागने की गति ही प्रदान करता है। यह आम बात भी सच है कि गुरु तांत्रिक साधना के साथ अवश्य होना चाहिए। वह गुरु दृढ़ता से चिपकने वाली मानसिक कुंडलिनी छवि के अलावा कुछ विशेष नहीं है। यही कारण है कि बौद्ध-ध्यान में, कई वर्षों के सरल सांद्रता-ध्यान के बाद ही एक योगी को तांत्रिक साधना लेने की अनुमति दी जाती है। लेकिन आज बौद्ध लोग, विषेशतः तिब्बती बुद्ध तंत्र सहित सभी रहस्यों को प्रकट करने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि अब वे लंबे समय से चल रहे बाहरी आक्रमण के कारण अपनी समृद्ध आध्यात्मिक विरासत को खोने से डर रहे हैं।

तंत्र के बारे में विस्तृत जानकारी इस वेबपोस्ट की स्रोत वेबसाईट / source website पर पढ़ी जा सकती है, व पूर्ण जानकारी के लिए निम्नांकित पुस्तक का समर्थन किया जाता है-

शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा), एक अनुपम ई-पुस्तक (हिंदी भाषा में, 5 स्टार प्राप्त, सर्वश्रेष्ठ व सर्वपठनीय उत्कृष्ट / अत्युत्तम / अनौखीरूप में समीक्षित / रिव्यूड ) को यहाँ क्लिक करके डाऊनलोड करें। यदि मुद्रित पुस्तक ही आपके अनुकूल है, तो भी, क्योंकि इलेक्ट्रोनिक डीवाईसिस / फोन आदि पर पुस्तक का निरीक्षण करने के उपरांत ही उसका मुद्रित-रूप / print version मंगवाना चाहिए, जो इस पुस्तक के लिए इस लिंक पर उपलब्ध है। धन्यवाद।

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How to keep control over body weight through Yoga

Body weight decreases with yoga. Even I have noticed my pent becoming lose at waist even with one day of heavy physical work. This occurs because I am habitual of daily yoga practice. When I worked hard, routine yoga exercise along with that depressed my appetite due to my too tiredness. So fat loss with that hard work was not rebuilt up, which resulted in my weight loss. Ordinary people without routine yoga practice eat a lot after heavy work thus rebuilding up their lost fat immediately. Yogic exercises should be continued daily and forever. If anyone continues his exercises for short time, say for 2 months, then he would experience reduction in his body weight. But if he stops exercising after that, then his built up stamina has no way to work other than to provoke the voracious appetite. Due to this he becomes too hungry and eats foods especially high energy foods abundantly. This results in substantial build up of his body fat which results in his body weight gain again that can surpass even his earlier basic body weight. So exercises continued should be kept continued always. It is a scientifically and experientially proven fact that hathyogic stretching exercises burn down a moderate amount of calories. Although stretching type yoga exercises don’t burn major amount of calories yet these exercises keep body fit, healthy, active and flexible. This helps in undertaking of any type of simple or hard physical work at any time successfully and with ease, also making gym exercises more effective. Also, it also helps in uniform circulation of blood throughout the entire body in appropriate proportions. This helps in easy withdrawal of fat deposited in the remote storehouses of the body. This in turn makes that fat available to all the body cells as the main source of energy. Therefore body doesn’t send the message of energy shortage to the appetite centre, that results in inhibition of voracious appetite just as seen commonly after a heavy work. Yoga is nothing special but a synergistic combination of stretching exercises, breathing and focused concentration. Focused concentration works as a controller valve for thoughts for it prevents sudden rush of chaotic thoughts thus preventing build up of paranoia and mind swinging. When accumulated thoughts in subconscious mind becomes too agitated then those are made to be released slowly and safely by the meditatively focused image inside the mind. Those thoughts are made sterile and non harmful or in other words get purified due to company of that strongly shimmering meditative image. That image also keeps check over the chaotic mental activities arising out of day to day worldly activities. Due to this an interest is generated inside the yoga practice and it is never missed out of daily schedule. With yoga exercises without the focused concentration on a kundalini image, interest for yoga exercises is lost soon and daily schedule severally suffers due to the chaotic rush of various hidden thoughts.

Tantric technique is another trick to reinforce the mental kundalini image and thus to enhance up the yoga-interest. It also results in enhanced breathing thus profuse supply of nutrient rich and well oxygenated blood to the entire body. This also puts a check over body weight. Actually tantra is not a separate discipline at its own independent of the ancient Indian spiritualism. It is a natural and spontaneous run / process towards the awakening. It only reinforces the spiritual efforts as a final or leaping step to awakening. If there is no spiritual motive and spiritual achievement inside one’s intellect, then there is no way for tantric power to go other than to become used up inside the chaotic external world. It means that kundalini image should be enough strong inside one’s mind prior to the application of tantric technique. Tantra provides the required and final escape velocity to kundalini to awakening. This is true for the common saying that Guru must be there with tantric sadhna. That guru is nothing other than the firmly affixed mental kundalini image. This is the reason why in Buddhist meditation, a yogi is allowed to take over the tantric sadhna after spending many years of simple concentrating meditation. But today Buddhists especially Tibetan Buddhists are trying to reveal all the secrets including the tantra to the world for they are afraid of losing for ever their rich spiritual heritage due to the long persisting external invasion.

You can learn about tantra in detail at the parent website of this web post, and for full detail following book is recommended-

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टाईपिंग आर्ट / टंकण कला- एक अद्भुत शौक; Typing art- a wonderful hobby

टाईपिंग आर्ट / टंकण कला- एक अद्भुत शौक (PLEASE BROWSE DOWN OR CLICK HERE TO VIEW POST IN ENGLISH)

टाईपिंग एक अच्छी होबी/शौक है

लोग सोचते हैं कि टाईपिंग सीखने के लिए किसी विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। व्यावसायिक टाईपिंग / professional typing के लिए यह बात कुछ हद तक सही हो सकती है, पर व्यक्तिगत टाईपिंग के लिए अपनी उपयुक्तता के अनुसार, जैसे मर्जी टाईप / type किया जा सकता है। कई लोग मात्र दो उँगलियों से (एक-२ अंगुली दोनों हाथों की) भी बहुत तेज टाईप कर लेते हैं। ऐसे लोगों में बहुत से तो व्यावसायिक टंकण-कर्ता / professional typists भी होते हैं। अंगरेजी में टाईपिंग करते समय वाक्य के पहले अक्षर को कैपिटल में लिखने की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि बाद में टैक्स्ट को सेलेक्ट करके यह काम एकसाथ किया जा सकता है। उसके लिए एम एस वर्ड के टॉप मीनू बार में एक चेंज केस का बटन (Aa) होता है। उसके ऑप्शन सेंटेंस केस को क्लिक करके डोकुमेंट के सेलेक्टड टेक्स्ट के सभी वाक्यों का प्रथम अक्षर खुद ही केपिटल हो जाता है। टाईप करते हुए, पैराग्राफ / paragraph की पहली लाइन को इंडेंट-स्पेस / indent-space देने के लिए कीबोर्ड / keyboard की टैब की / tab key नहीं दबानी चाहिए, क्योंकि टेब की से बनी हुई स्पेस को ईबुक में स्वीकार नहीं किया जाता। एंटर बटन / enter key केवल नए पैराग्राफ को शुरू करने के लिए ही दबाना चाहिए, अन्यथा नहीं। कईयों को टाईप करते हुए हरेक लाइन के अंत में एंटर की दबाने की गलत आदत होती है। उससे एम एस वर्ड / ms word हरेक लाइन को एक नए पैराग्राफ की तरह लेता है, जिससे पैराग्राफ से सम्बंधित बहुत सी सेटिंग्स / settings गड़बड़ा जाती हैं। पैराग्राफ की पहली लाइन के इंडेंट (पेज के लिखित भाग के बाएँ किनारे से उस विशेष लाईन के प्रारम्भ की दूरी) को पैराग्राफ की सेटिंग से निर्धारित करना चाहिए। उसके लिए इंडेंटेशन / indentation ऑप्शन में जा कर स्पेशल / special के अंतर्गत फर्स्ट  लाइन / first line को सेलेक्ट करना चाहिए, और उसकी इंडेंट स्पेसिंग को 0.5 सेंटीमीटर पर एडजस्ट / adjust कर देना चाहिए। इससे प्रत्येक पैराग्राफ की पहली लाइन 0.5 सेंटीमीटर अन्दर से ही शुरू होगी। वास्तविक पुस्तक के शुरू होने से पहले के पुस्तक-परिचय आदि के भाग में फर्स्ट लाइन इंडेंट अच्छा नहीं लगता, इसलिए उस भाग को सेलेक्ट / select करके फर्स्ट लाइन इंडेंट को शून्य कर देना चाहिए। वहां पर एक पैराग्राफ को दूसरे पैराग्राफ से विभक्त करने के लिए, पैराग्राफज / paragraphs के बीच में अतिरिक्त स्पेस / additional space (लाईनों के बीच में स्पेस से ज्यादा) दे देना चाहिए। इसके लिए पैराग्राफ सेटिंग के इंडेंटस एंड स्पेसिंग / indents and spacing बटन के ऑप्शन स्पेसिंग / spacing के अंतर्गत बिफोर या आफ्टर / before or after को सेलेक्ट करके उसमें यथावश्यक इंडेंट स्पेसिंग भर दी जाती है। कई बार ऐसा करते हुए, पूरे डोकुमेंट / document की पैराग्राफ सेटिंग भी वैसी ही हो जाती है। उसको दूर करने के लिए बार-२ अनडू / undo बटन को दबाते हुए उस नई सेटिंग को सेलेक्ट किए गए, पुस्तक के प्रारम्भिक भाग तक ही सीमित कर देना चाहिए। एमएस वर्ड का फाईन्ड एंड रिप्लेस / find and replace फंक्शन / function भी बहुत लाजवाब होता है। पूरे बुक-डोक्युमेंट / book-document में बारम्बार हुई किसी भी शब्द / लेख की गलती एक बार में ही वहां से दूर हो जाती है। यहाँ तक कि कॉमा, पूर्णविराम-डंडे के पहले या बाद के स्पेस को भी वहां से ठीक किया जा सकता है। पैराग्राफ के अतिरिक्त ब्रेक को भी इससे एकसाथ ठीक किया जा सकता है। एंटर दबाने से एक पैराग्राफ ब्रेक बनता है। इसको हटाने के लिए फाइंड में ^p^p टाईप करें, व रिप्लेस में ^p टाईप करें। 

हिंदी में टाईप करने के लिए गूगल इनपुट-हिंदी सर्वोत्तम टूल है

गूगल हिंदी इनपुट / google hindi input में हिंदी के पूर्णविराम-डंडे का चिन्ह नहीं होता, इसलिए अंग्रेजी के डॉट से काम चलाना पड़ता है। हम फाईन्ड एंड रिप्लेस फंक्शन में फाईन्ड / find के स्थान पर डॉट / dot व रिप्लेस / replace के स्थान पर पूर्णविराम-डंडे / full stop bar  को टाईप करके ‘रिप्लेस आल’ / replace all के बटन को क्लिक करते हैं, तो पूरी पुस्तक-फाईल की हजारों रिप्लेसमेंटे / replacements पलक झपकते ही हो जाती हैं। एमएस वर्ड में अंग्रेजी भाषा के लिए तो इनबिल्ट / inbuilt ‘स्पेलिंग एंड ग्रामर’ / spelling and grammer बना होता है, जिसकी मदद से करेक्शन / correction की जा सकती है, पर हिंदी के लिए ऐसा सोफ्टवेयर / software अभी बना नहीं है। हिंदी टाईपिंग के लिए सबसे अच्छा तरीका है कि बिना मोनिटर स्क्रीन / monitor screen को देखे ही, कीबोर्ड को देखते हुए टाईप करते रहें। कुछ पैराग्राफ टाईप हो जाने पर, उन्हें पढ़ते हुए एकसाथ करेक्शन / correction कर लो। इससे टाईपिंग की स्पीड / speed भी बढ़ जाती है। Ctrl और A कुंजी दोनों को एक साथ दबाकर पूरा दस्तावेज़ चुना जाता है। पाठ / लेख / टेक्स्ट की प्रतिलिपि बनाने के लिए Ctrl और C कुंजी दबाए जाते हैं, और कॉपी किए गए टेक्स्ट को चिपकाने के लिए V कुंजी के साथ Ctrl कुंजी को दबाया जाता है। टाइप किए गए पदार्थ को हटाने के लिए ‘पूर्ववत करें / अनडू / undo’ बटन दबाएं। लेख को बेहतर या बड़े आकार में देखने के लिए शीर्ष मेनू पट्टी से फ़ॉन्ट आकार को न बदलें, क्योंकि ऐसा करने से हर बार फ़ाइल सेटिंग बदलती रहेगी, जो कुछ झंझट पैदा करेगी। बेस बार से ज़ूम करके केवल सिंगल बैठक के लिए ही फ़ॉन्ट आकार बढ़ेगा, फॉण्ट सेटिंग में बदलाव नहीं होगा। हर बार जब आप उस फ़ाइल का उपयोग करते हैं, तो भ्रम से बचने के लिए मामले के अनुसार ईबुक या प्रिंट बुक को सेटिंग्स / settings / फोर्मेटिंग / formatting के साथ बैकअप में स्टोर करके रखें, ताकि आपको बार-२ सेटिंग्स को एप्लाई न करना पड़े। कई बार तो पुरानी सेटिंग्स याद भी नहीं रहती, जिन्हें ढूँढने में काफी समय लग जाता है। किसी दूसरे से टाईपिंग कराने की बजाय खुद टाईप करना अच्छा रहता है। औरों को हस्तलेख पढ़ने में कठिनाई हो सकती है, और वे लेख को परिष्कृत भी नहीं कर सकते। खुद टाईपिंग करते हुए, पुस्तक की कमियां भी ध्यान में आती रहती हैं, पुस्तक को विस्तार मिलता रहता है, नए-2 विचार उमड़ते हैं, और पुस्तक पर अच्छी पकड़ बनती है। टाईपिंग भी एक होबी / hobby की तरह ही है। उसे करते हुए मजा आता है, तनाव हल्का हो जाता है, और मन भी शांत हो जाता है। इसी तरह का लाभ दूसरों से अपनी बुक को पब्लिश / publish करवाने की बजाय सेल्फ-पब्लिशिंग / self publishing के माध्यम से खुद पब्लिश करने से मिलता है।

यदि आपको इस पोस्ट से कुछ लाभ प्रतीत हुआ, तो कृपया इसके अनुसार तैयार की गई उपरोक्त अनुपम ई-पुस्तक (हिंदी भाषा में, 5 स्टार प्राप्त, सर्वश्रेष्ठ व सर्वपठनीय उत्कृष्ट / अत्युत्तम / अनौखीरूप में समीक्षित / रिव्यूड ) को यहाँ क्लिक करके डाऊनलोड करें। यदि मुद्रित पुस्तक ही आपके अनुकूल है, तो भी, क्योंकि इलेक्ट्रोनिक डीवाईसिस / फोन आदि पर पुस्तक का निरीक्षण करने के उपरांत ही उसका मुद्रित-रूप / print version मंगवाना चाहिए, जो इस पुस्तक के लिए इस लिंक पर उपलब्ध है। इस पुस्तक की संक्षिप्त रूप में सम्पूर्ण जानकारी आपको इसी पोस्ट की होस्टिंग वेबसाईट / hosting website पर ही मिल जाएगी। धन्यवाद।

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Typing art- a wonderful hobby

Typing is a great hobby

People think that special training is needed to learn typing. For professional typing, this may be true to some extent, but for personal typing, according to one’s suitability, one can type with any style. Many people just type just with two fingers (one of each hand) faster than others. Many of these are even professional typists. While typing in English, the first letter of the sentence does not need to be written in the capital, as later it can be done together by selecting the text. For that, there is a change case button (Aa) in MS Word’s top menu bar. By clicking on its Option “Sentence Case”, the first letter of all the sentences of the selected text of the document gets itself capitalized. While typing, to give the indent-space to the first line of paragraph, do not press the tab key on the keyboard, because space made by this key is not accepted in ebook. Enter key should only be pressed to start new paragraphs, otherwise not. Adopted by several people, it is the wrong habit of pressing Enter at the end of each line. From this, MS Word takes each line as a new paragraph, so that many settings related to the paragraph are messed up. Indent of the first line of the paragraph (the distance of the beginning of that special first line from the left edge of the written part of the page) should be determined by the paragraph setting. For this, going to the indentation option, the ‘first line’ should be selected under ‘special’, and its indented spacing should be adjusted at 0.5 centimeters. From this, the first line of each paragraph will start from 0.5 centimeters inside. The first line indent does not look good in the part of book-introduction etc. before the start of the actual book, so that the first line indent should be zero by selecting that part. Therefore to divide one paragraph from the second paragraph of that initial part, there should be an extra space (more than the space between the adjacent lines) between adjacent paragraphs. For this, ‘indents and spacing’ of the paragraph setting is selected and then the option ‘spacing’ under that and ‘before’ or ‘after’ under that, and then the indent spacing is filled in as required. In many cases, while doing this the paragraph setting of the entire document becomes the same. To remove it, pressing the ‘undo’ icon again and again as per manipulative need limit that new setting to the initial part of the book as was selected. ‘Find and replace’ function  of MS Word is also very great. The mistake of any word / article recurrent in the entire book-document goes away at a time. Even the extra or less space before or after comma, full stop etc. can also be cured from there.  Extra paragraph made with pressing extra enter key can also be corrected with this. Type ^p^p  in the find section and ^p in replace section.

Google input Hindi is best software for Hindi typing

Google Hindi input does not have a full-stop punctuation of Hindi, hence the dot in English has to be run. In the Find and Replace Function, we click the ‘Replace All’ button by typing the full stop bar of Hindi in place of the replace and dot in place of find button, so thousands of replacements of the file are in the blink of an eye. In MS Word, there is inbuilt ‘spelling and grammar’ for the English language, which can make corrections. This software for Hindi is not created anymore. The best way to type in Hindi is by not watching the monitor screen, just keep typing while watching the keyboard. After some paragraphs are typed, make a correction with them while reading them altogether. This also increases the speed of typing.  Whole document is selected by pressing Ctrl and A keys both together. Ctrl and C keys are pressed together for copying the text, and Ctrl key with V key is pressed for pasting the copied text. To remove typed matter press ‘undo’ button. Don’t change font size from top menu bar for better viewing and typing for that will change file setting every time, but zoom from base bar for that will increase font size for single sitting only. Keep documents in backup along with settings / formatting for eBook or print book as per the case to avoid confusion every time you use that file. It’s a good idea to type yourself instead of making typing by someone else. Others may have difficulty reading handwriting, and they cannot refine the article. While typing yourself, the drawbacks of the book also come in mind, the book gets expanded, the new ideas get energized, and the book gets a good grip. Typing is also like a hobby. It is fun to do it, the tension gets relaxed, and the mind also becomes calm. Instead of publishing the book with others, these above psychic benefit are received in a pronounced form from publishing the book by one / writer through his own / self-publishing.

In the next post we will share the self experienced matters during a website development.

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मेरे द्वारा संकलित व पूर्ववर्णित ई-पुस्तक का प्रचाराभियान- Promotion of a compiled and predefined ebook by me

मेरे द्वारा संकलित व पूर्ववर्णित ई-पुस्तक का प्रचाराभियान (please browse down or click here to view post in English)-

मैंने उस ई-पुस्तक को पूर्णरूप से निर्मित होने से पहले ही केडीपी किन्डल पर डाल दिया था। नई तैयार लिखित सामग्री को मैं प्रतिदिन उस पर अपडेट कर लिया करता था। मैंने उस पुस्तक को किन्डल अनलिमिटिड में ज्वाइन कराया हुआ था, जिसके अनुसार किन्डल अनलिमिटिड के उपभोक्ता उस पुस्तक को मुफ्त में डाऊनलोड कर सकते थे। इस तरह से, पूर्ण निर्माण होने तक मेरी पुस्तक का कुछ प्रचार स्वयं ही हो गया था। वैसे मेरी किस्मत अच्छी रही जो किसी ने अधूरी पुस्तक की समीक्षा / रिव्यू नहीं डाली, क्योंकि उससे पुस्तक की कमियाँ पाठकों के समक्ष उजागर हो सकती थीं। मेरी पुस्तक को सर्वोत्तम समीक्षा तब मिली, जब वह पूर्ण रूप में पाठकों के समक्ष प्रस्तुत हुई। लैंडिंग पेज / landing page भी मैंने बहुत पहले ही बना दिया था। लैंडिंग पेज एक वेबसाईट / website का वेबपेज / webpage, मुख्यतया होमपेज / homepage होता है, जिसमें पुस्तक के बारे में सम्पूर्ण जानकारी लिखी होती है, तथा उस पुस्तक के ऑनलाइन बुक-स्टोर / online book store का भी लिंक / link दिया होता है। इच्छुक पाठक उस लिंक पर क्लिक करके बुक स्टोर में पहुँचते हैं, और वहां से उस पुस्तक को खरीद लेते हैं। लैंडिंग पेज एक प्रकार से पुस्तक की दुकान ही होती है, और बुक स्टोर का बुक-डिटेल पेज / book detail page एक प्रकार का कैश-काऊंटर होता है। जब भी कभी पुस्तक के लिए एड-केम्पेन (प्रचाराभियान) / ad campaign चलाई जाती थी, तब उसमें लैंडिंग पेज का ही लिंक दिया गया होता था, सीधा बुक-स्टोर का नहीं। वह इसलिए क्योंकि बुक-स्टोर में पुस्तक के बारे में बहुत कम प्रारम्भिक जानकारी होती है, और वह पाठक को पुस्तक खरीदने के लिए अधिक प्रोत्साहित नहीं करता। लैंडिंग पेज में एक प्रकार से सम्पूर्ण पुस्तक ही संक्षिप्त रूप में विद्यमान होती है। मैंने तो सम्पूर्ण वेबसाईट ही पुस्तक के निमित्त कर दी थी। इससे उन पाठकों को भी लाभ मिलता था, जो किसी कारणवश विस्तृत पुस्तक को खरीद नहीं सकते थे, या पढ़ नहीं सकते थे। मैंने गूगल की एड-केम्पेन लगा कर देखी, पर उससे मुझे कोई विशेष लाभ प्रतीत नहीं हुआ। मैं क्वोरा पर प्रश्नों के उत्तर लिखा करता था। उत्तर के अंत में मैं अपनी वेबसाईट का लिंक भी लगा दिया करता था। उससे मेरी वेबसाईट पर ट्रेफिक / traffic तो काफी बढ़ गई थी, पर पुस्तक की खरीद नहीं हो पा रही थी। फेसबुक पर अपनी वेबसाईट के बारे में पोस्ट डाल कर भी बहुत कम ट्रेफिक आ रही थी। मैंने अपने सभी सोशल मीडिया अकाऊंट / social media account पर अपने वेबसाईट का लिंक लगा रखा था। पुस्तक के किन्डल अनलिमिटिड / kindle unlimited में होने की वजह से मुझे 3 महीने में 5 दिनों के लिए मुफ्त पुस्तक के रूप में उस पुस्तक के प्रचार का अवसर मिला हुआ था। उससे लगभग 40 के करीब निःशुल्क पुस्तकें पाठकों के द्वारा डाऊनलोड कर ली जाती थीं। उसके बाद 4-5 सशुल्क पुस्तकें भी बिक जाती थीं। रीडरशिप के अनुसार किण्डल अनलिमिटेड का फंड वितरित होता रहता है। मैंने एक बार किन्डल अनलिमिटिड को बंद कराकर पोथी डॉट कोम / pothi.com पर भी पुस्तक को डाला। निःशुल्क रूप में तो वहां से 2 महीने के अन्दर 15 पुस्तकें उठ गईं, पर सशुल्क रूप में एक भी नहीं। इसी के साथ ही मैंने स्मैशवर्ड / smashword, डी2डी / D2D आदि अन्य ई-बुक साईटों पर भी उस पुस्तक को डाला हुआ था। उनमें से तो एक भी पुस्तक डाऊनलोड / download नहीं हुई। अतः मैंने इन सभी साईटों से पुस्तक को हटा लिया, और उसे किन्डल अनलिमिटिड में पुनः ज्वाइन / join करा दिया। किन्डल अनलिमिटिड में रहते हुए किसी दूसरे प्लेटफोर्म / platform पर पुस्तक को पब्लिश / publish नहीं कर सकते हैं। वास्तव में किन्डल ही ई-पुस्तकों का नेता है, विशेषकर भारत में। भारत में लगभग 70% से अधिक ई-पुस्तकें अमेजन / amazon के किन्डल-स्टोर के माध्यम से ही खरीदी जाती हैं। वैसे भारत में कुल पुस्तकों का केवल लगभग 10% हिस्सा ही ई-पुस्तकों के रूप में पढ़ा जाता है। फेसबुक की एड-केम्पेन से मुझे सर्वाधिक बिक्री मिली। उसमें ग्राहकों को सुविधानुसार लक्षित किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, मैं अपने ग्राहकों को योग, ई-बुक लवर, किन्डल ई-रीडर आदि शब्दों तक ही सीमित कर देता था। उसमें स्थान को भी लक्षित किया जा सकता है। मैं अपनी पुस्तक को हिंदीभाषी प्रदेशों व क्षेत्रों तक ही सीमित कर देता था। इसी तरह, मैं 25-45 वर्ष के आयु-वर्ग के लोगों को ही लक्षित करता था। पुरुष व स्त्री दोनों को लक्षित करता था। उसमें एक रुपए से लेकर जितने मर्जी रुपए को खर्च करने का निर्देश दिया जा सकता है। डेबिट कार्ड / क्रेडिट कार्ड का डिटेल मैंने उसमें डाल दिया था। फेसबुक / facebook खुद उससे समयानुसार पैसे निकाल लेता था। उसकी ख़ास बात है की उस एड को किसी के द्वारा देखने पर पैसे नहीं कटते, अपितु तभी कटते हैं, जब कोई उस एड के लिंक पर क्लिक करके लैंडिंग पेज पर पहुँचता है। एक क्लिक लगभग डेढ़ रुपए से लेकर पांच रुपए तक की होती है, डिवाईस / device के अनुसार व अन्य अनेक परिस्थितियों के अनुसार। मोबाईल न्यूजफीड / mobile newsfeed पर संभवतः सबसे महँगी होती है। इसको भी हम सेट / set कर सकते हैं कि किस-2 एप / app (फेसबुक, मेसेंजर या इन्स्टाग्राम) पर कितनी-2 एड दिखानी है। अन्यथा फेसबुक स्वयं ही सर्वोत्तम अनुपात बना कर रखता है। बाद में तो मैंने फेसबुक पेज (बिजनेस परपस / business purpose) भी मुफ्त में बना लिया। उस पर एड डालना और भी आसान हो गया। मैंने अपने वेबसाईट-ब्लॉग / website-blog को अपने फेसबुक पेज के साथ कनेक्ट / connect कर दिया था। उससे जब भी मैं कोई ब्लॉग-पोस्ट अपनी वेबसाईट पर डालता था, तब वह स्वयं ही उसी समय मेरे फेसबुक-पेज पर भी शेयर / share हो जाती थी। फेसबुक पेज पर एक ऑप्शन / option उस पोस्ट को बूस्ट करने के लिए आता था। एक बार मैंने कौतूहलवश उस बूस्ट-बटन / boost button को दबा दिया। कुछ घंटों बाद मुझे अपनी वेबसाईट पर एकदम से बढ़ी हुई ट्रेफिक मिली। उस सम्बंधित पोस्ट को 45 शेयर मिले हुए थे। वह ट्रेफिक फेसबुक से आ रही थी। जब मैंने फेसबुक खोलकर एड-स्टेटस का पता किया, तो वह उस पोस्ट के लिए एक्टिवेटड / activated थी। लगभग 400 रुपए खर्च हो चुके थे। उस पोस्ट को 32 लाईक्स मिल चुके थे, और उसे 15000 लोगों ने (हरियाणा के, अपने आप सेट) देख लिया था। साथ में मेरी 3-4 पुस्तकें भी बिक चुकी थीं। वह तो बड़े घाटे का सौदा लगा, क्योंकि उन पुस्तकों से 70-80 रुपए की ही कमाई हो पाई थी। मैंने तुरंत उस पोस्ट- बूस्ट की एड को बंद करवा दिया। फिर मुझे इंटरनेट से अतिरिक्त जानकारी मिली की एड-केम्पेन पोस्ट-बूस्ट से कहीं अधिक बेहतर व कम खर्चीली होती है। यह भी पता चला कि पुस्तक प्रचार से अधिकांशतः उतनी कमाई नहीं होती है, जितना उस पर खर्चा आता है।

अगली पोस्ट में हम वेबसाईट निर्माण से सम्बंधित स्वानुभूत जानकारी को साझा करेंगे।

यदि आपको इस पोस्ट से कुछ लाभ प्रतीत हुआ, तो कृपया इसके अनुसार तैयार की गई उपरोक्त अनुपम ई-पुस्तक (हिंदी भाषा में, 5 स्टार प्राप्त, सर्वश्रेष्ठ व सर्वपठनीय उत्कृष्ट / अत्युत्तम / अनौखीरूप में समीक्षित / रिव्यूड ) को यहाँ क्लिक करके डाऊनलोड करें। यदि मुद्रित पुस्तक ही आपके अनुकूल है, तो भी, क्योंकि इलेक्ट्रोनिक डीवाईसिस / फोन आदि पर पुस्तक का निरीक्षण करने के उपरांत ही उसका मुद्रित-रूप / print version मंगवाना चाहिए, जो इस पुस्तक के लिए इस लिंक पर उपलब्ध है। इस पुस्तक की संक्षिप्त रूप में सम्पूर्ण जानकारी आपको इसी पोस्ट की होस्टिंग वेबसाईट / hosting website पर ही मिल जाएगी। धन्यवाद।

यदि आपने इस लेख/पोस्ट को पसंद किया तो कृपया इस वार्तालाप/ब्लॉग को अनुसृत/फॉलो करें, व साथ में अपना विद्युतसंवाद पता/ई-मेल एड्रेस भी दर्ज करें, ताकि इस ब्लॉग के सभी नए लेख एकदम से सीधे आपतक पहुंच सकें। धन्यवादम।

ई-रीडर व ई-बुक्स के बारे में विस्तार से जानने के लिए यहां क्लिक करें।

Promotion of a compiled and predefined ebook by me-

I had put that e-book on the KDP platform of Amazon kindle even before it was fully formed. I used to update the new written material on it every day. I had joined that book in Kindle Unlimited, according to which consumers of Kindle Unlimited could download that book for free. In this way, till the complete construction,  my book had got enough exposure. Before my book has been complete, luckily I did not get any review of that incomplete book, because the book’s shortcomings could be exposed to the readers. My book got the best review when it was presented to the readers in full form. I had made the landing page too long ago. The landing page is a website’s webpage, mainly homepage, in which the complete information about the book is written, and also links to the online Book Store of that book are provided there. Interested readers reach the book store by clicking on the link, and buy that book from there. Landing pages are a book shop, and Book Store’s Book-Detail page is a type of cash-counter. Whenever the ad-campaign was run for the book, it was given a link to the landing page tthere, not a direct one to book-store. That’s because book-store has very little initial information about the book, and it does not encourage readers to buy the book more. In a way, the entire book in a landing page is in short form. I had made the entire website just for the sake of the book. It also benefited those readers, who could not buy or read a detailed book for some reason. I looked at Google’s ad-campaign, but it did not seem to be a special advantage to me. I used to write answers to queries on quora. At the end of the reply, I used to link my website too. From that the traffic on my website had increased a lot, but the book was not able to be bought. Posting about my website on Facebook was also very low to attract traffic. I had put a link to my website on all my social media accounts. Because of the book’s kindle unlimited, I had the opportunity to publicize that book in the form of a free book for 5 days in 3 months. Nearly 40 free books were downloaded by the readers. After that 4-5 paid books were also sold. Kindle unlimited fund is distributed according to the readership. I once put the book on Pothi.com by closing the Kindle Unlimited. In the free form, 15 books got up within two months from there, but none in the paid form. At the same time, I had inserted that book on other e-book sites like Smashword, D2D etc. None of books were downloaded from those. So I removed the book from all these sites, and rejoined it in Kindle Unlimited. Self publisher can not publish the book on another platform while being in kindle unlimited. In fact, Kindle is the leader of e-books, especially in India. More than about 70% of e-books in India are purchased through the Amazon Kindle Store. In India, only about 10% of the total books are read as e-books. I got the best sale from Facebook’s ad-campaign. Customers can be targeted according to convenience. For example, I used to limit my clients to the words like Yoga, eBook lover, Kindle e-Reader etc. Location can also be targeted in it. I used to restrict my book to Hindi-speaking states and regions. Similarly, I used to target people aged 25-45 years of age. I targeted both men and women. It can be instructed to spend rupees from one rupee to as much as you like. I had put the details of debit card / credit card in it. Facebook itself withdraw money from time to time. His special thing is that he does not deduct money from anyone watching the ad, but only when he gets to the landing page by clicking the link of that ad. One click ranges from about 1.5 rupees to five rupees, according to the device and many more conditions. Mobile Newsfeed is probably the most expensive. We can also set this to show how much fraction of ad to show on which app (Facebook, Messenger or Instagram). Otherwise Facebook itself maintains the best ratio. Later on, I also created the Facebook Page (Business Purpose) for free. It was even easier to add an ad to it. I had connected my website-blog to my Facebook page. Whenever I used to post a blog-post on my website, it would have been shared on my Facebook page at the same time. An option on the Facebook page came to boost the post. Once upon a time I suppressed that boost-button. After a few hours, I found the tremendous traffic on my website. 45 related shares were received in that respective post. That traffic was coming from Facebook. When I opened Facebook and found the ad-status, it was activated for that post. About 400 rupees had been spent. That post had received 32 likes, and it was seen by 15,000 people (Haryana, the self set). Along with my 3-4 books were also sold. It was a big loss deal, because those books were able to earn only Rs. 70-80. I immediately stopped the post’s Boost. Then I got additional information from the Internet that the ad-campaign is far better and less expensive than Post-Boost. I also came to know that the book promotion is not as much as earning as much as it costs.

In the next post we will share the self experienced matters during a website development.

If you have found some benefit from this post, please download here the above mentioned e-book (in Hindi language, 5 star rated, reviewed as the best, excellent and must read by everyone) made with steps as told above. If only print version suits you, then too print version should only be got after testing that’s e- version on the electronic devices / phone etc., that is available on this link for this book. You can also find the complete information about this book, both in English as well as Hindi languages on the hosting website of this post. Thank you.

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स्वयंप्रकाशन, आधुनिक तकनीक की एक अद्भुत देन-Self-publishing, a wonderful creation of modern technology 

स्वयंप्रकाशन, आधुनिक तकनीक की एक अद्भुत देन (please browse down or click here to view post in English)

मुझे हाल ही में एक पुस्तक को तैयार करने का मौका मिला, जिसका नाम है, “शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)”, और जिसको लिखा है, प्रेमयोगी वज्र नामक एक रहस्यमयी योगी ने। सबसे पहले मैंने उसके द्वारा कई वर्षों से समेटी गई अस्त-व्यस्त रूप की लिखित सामग्री / written material को सही ढंग से क्रमबद्ध किया। फिर बारम्बार उसको पढ़कर, उस पूरी सामग्री को अपने मन में बैठा लिया। वास्तव में लिखने का काम तो बहुत से लोग कर लेते हैं, परन्तु अंतिम दौर में उसे पुस्तक के रूप में सभी नहीं ढाल पाते। यह इसलिए, क्योंकि उसके लिए बहुत अधिक कड़ी व अनवरत मेहनत समेत संघर्ष, लगन, ध्यान, धारणाशक्ति व निरंतरता की आवश्यकता होती है। तीव्र एकाग्रता व स्मरणशक्ति को लम्बे समय तक बना कर रखना पड़ता है। पूरी पुस्तक-सामग्री को मन में एकसाथ बैठा कर रखना पड़ता है, ताकि पूरी सामग्री को युक्तियुक्तता, रोचकता व सजावट के साथ क्रमबद्ध किया जा सके। साथ में, जिससे उसमें पुनुरुक्तियाँ / repetitions भी न हो पाएं। फिर मैंने उसकी बहुत सी पुनुरुक्तियों को हटाया, तथा निर्मित क्रमबद्ध रूप में ही उसे कम्प्युटर पर टाईप करने लगा। समय की कमी के कारण लगभग 300 पृष्ठों को टाईप करने में एक साल लग गया। प्रेमयोगी वज्र बीच-2 में भी लिखित सामग्री भेजता रहा, जिसे भी मैं प्रसंगानुसार उस वर्ड फाईल / word file के बीच-2 में जोड़ता रहा। मैं माईक्रोसोफ्ट वर्ड-2007 / Microsoft word-2007 पर टाईप / type कर रहा था। कहीं मेरा टाईप किया हुआ मेटीरियल / material कम्प्यूटर की खराबी से या अन्य कारणों से नष्ट न हो जाता, उसके लिए मैं अपनी टाईप की हुई फाईल को डी-ड्राईव / D-drive (जिस पर विंडोस-फाईल्ज / windows files नहीं होतीं) में रख लेता था, और साथ में बाहरी स्टोरेज / external storage पर बेक-अप / backup के रूप में भी सुरक्षित रख लेता था। मैंने 600 रुपए के वार्षिक सब्सक्रिप्शन / annual subscription पर (डिस्काऊंट ऑफर / discount offer पर, वास्तविक मूल्य तो रुपए 1500 था) एवरनोट / Evernote को खरीदा हुआ था। वह मुझे सबसे सुरक्षित व आसान लगा, वैसे तो जी-मेल / G-mail या गूगल-ड्राईव / Google drive पर भी मुफ्त में बैक-अप रख सकते हैं। एवरनोट में अन्य भी बहुत सी अतिरिक्त सुविधाएं हैं। उसका लेखक के लिए एक फायदा यह भी है कि कहीं पर भी कुछ भी याद आ जाए, तो उस पर तुरंत लिखा जा सकता है, जो भविष्य के लिए स्टोर हो जाता है। उसका सर्च फंक्शन / search function भी बहुत कारगर है। कई बार मैं अपनी दूसरी वर्ड फाईल से या ब्लॉग पोस्ट / blog post से भी टेक्स्ट / text को कोपी / copy करके पुस्तक वाली फाईल में पेस्ट / paste कर देता था। परन्तु उससे फोर्मेटिंग एरर / formatting error आने से टेक्स्ट दोषपूर्ण हो जाता था, या गायब ही हो जाता था। तब मुझे पता चला कि पेस्ट करते समय ऑप्शन / option आता है कि किस स्टाईल / style में पेस्ट करना है। उसके लिए वह ऑप्शन सेलेक्ट / select करना पड़ता है, जिसमें “कीप टेक्स्ट ओनली” / keep text only लिखा होता है। इसको माईक्रोसोफ्ट वर्ड के बेस बटन / base button “वर्ड ऑप्शन” / word option में जाकर स्थाई तौर पर भी सेलेक्ट किया जा सकता है। और भी बहुत सी एडजस्टमेंट / adjustments सुविधानुसार उस पर की जा सकती हैं, हालांकि उनकी कम ही जरूरत पड़ती है। क्योंकि पुस्तक हिंदी में थी, अतः गूगल इनपुट / Google input के “हिंदी भाषा टूल” / Hindi language tool को डाऊनलोड / download किया गया था। उससे इंगलिश की-बोर्ड / English keyboard पर टाईप करने से उसके जैसे हिंदी के अक्षर छप जाते हैं। जैसे की “MEHNAT” को टाईप करने से फाईल में हिंदी का “मेहनत” शब्द छप जाता है। मैंने संस्कृत टूल को भी डाऊनलोड किया हुआ था, क्योंकि पुस्तक में बहुत से शब्द संस्कृत के भी थे। कम्प्युटर / computer को यूपीएस / UPS (बेटरी बैक-अप / battery backup) के साथ जोड़ा गया था, ताकि अचानक बिजली गुल होने पर कम्प्युटर एकदम से बंद न हो जाया करता, जिससे फाईल को सेव / save करने का मौका मिल जाया करता। वैसे भी टाईप करते हुए बीच-2 में फाईल को सेव कर लिया करता था। जब मेरी फाईल 150 पृष्ठों से बड़ी हो गई थी, तब कई बार सीधे ही पैन-ड्राईव / pen drive के अन्दर उसमें जोड़ा गया टेक्स्ट सेव नहीं हो पाता था, और उसकी सूचना स्क्रीन / monitor screen पर आ जाती थी। तब फाईल को पेन-ड्राईव से कोपी करके कम्प्युटर में पेस्ट करना पड़ता था। फिर उस पर टाईप किया हुआ टेक्स्ट सेव हो जाता था। कहीं दूसरे स्थान, दुकान आदि में टाईप करने के लिए उस ताजा फाईल को फिर से पेन-ड्राईव के अन्दर कोपी-पेस्ट करना पड़ता था। कई बार तो पेन-ड्राईव में स्टोर / store की गयी फाईल खुलती ही नहीं थी। ऐसा होने का एक मुख्य कारण कम्प्यूटर में वायरस होना भी है। इसलिए वायरस वाले कम्प्यूटर पर अपनी पेन ड्राईव न चलाएं, और अपने कम्प्यूटर पर हमेशा एंटिवायरस डाल कर रखें। इसलिए कुछ भी टाईप करने के बाद मैं उस फाईल को एवरनोट (पूर्वोक्त क्लाऊड-स्टोरेज / cloud storage) में बैकअप-स्टोर कर लेता था। पेन-ड्राईव की फाईल न खुलने पर, उस फाईल को एवरनोट से डाऊनलोड कर लेता था। इस तरह से मैंने कभी भी टाईप किए हुए टेक्स्ट को लूज / lose नहीं किया, एक पंक्ति को भी नहीं। इससे एक और फायदा यह होता था कि यदि कभी मेरे पास पेन ड्राईव नहीं होती थी, तो मैं एवेरनोट से बुक-फाईल को डाऊनलोड करके उस पर टाईप कर लेता था, और उसे फिर से एवरनोट में सेव कर लेता था। यद्यपि पेन ड्राईव हमेशा मेरे हेंड बेग में रहती थी। मैंने अतिरिक्त सुरक्षा के लिए, बुक-फाईल के पूरा होने पर उसे बाह्य हार्ड ड्राईव / external hard drive, गूगल ड्राईव व जी-मेल में भी सेव कर लिया। टेक्स्ट की लाईन-स्पेसिंग / line spacing बराबर नहीं आ रही थी। बहुत से फौंट / fonts प्रयुक्त किए, पर बात नहीं बनी। निर्देशानुसार पैराग्राफ स्पेसिंग-सेटिंग / paragraph spacing setting के “डू नोट एड एक्स्ट्रा स्पेस बिफोर ओर आफ्टर पेराग्राफ” / do not add extra space before or after paragraph को भी अनचेक / uncheck किया, पर बात नहीं बनी। मैं एरियल यूनिकोड एमएस / Arial unicode MS पर टाईप करता था। फिर मुझे इंटरनेट / internet से हिंट / hint मिला की कई फोंटों में गैर-अंगरेजी / non English भाषा के अक्षर अच्छी तरह से लाईन / line में फिट / fit नहीं होते। फिर मैंने बहुत से फोंटों को ट्राई / try किया, पर केवल केम्ब्रिया फोंट / Cambria font पर ही बात बनी, और लाईन स्पेसिंग बिलकुल बराबर व शानदार हो गई। उससे मेरी बहुत बड़ी समस्या दूर हो गई, विशेषतः पुस्तक का प्रिंट वर्जन / print version छपवाने के लिए, क्योंकि ई-बुक के लिए तो असमान लाईन स्पेसिंग से भी काम चल रहा था। पर एक बात गौर करने लायक थी कि केम्ब्रिया फॉण्ट तभी एप्लाई / apply हो रहा था, जब टेक्स्ट पहले से ही एरियल यूनिकोड एमएस में टाईप या रूपांतरित किया हुआ था, अन्यथा नहीं। दोनों ही फोंट बनावट में लगभग एक जैसे ही हैं, और हिंदी के लिए सबसे उपयुक्त हैं। टेक्स्ट को सेलेक्ट करके फोंट को कभी भी बदला जा सकता है।

अब आती है बारी वर्ड फाईल को किनडल ई-बुक / kindle e-book के अनुसार फोर्मेट / format करने की। चारों ओर के मार्जिन / margins एक सेंटीमीटर किए गए। हेडर व फूटर / header and footer रिमूव / remove किए गए। हेडर उसे कहते हैं जो एक जैसा वाक्य या शब्द हरेक पेज / page के टॉप / top पर सेलेक्ट एरिया / selected area में अपने आप लिखा होता है। ऐसा आपने पुस्तकों में देखा भी होगा। इसी तरह फूटर हरेक पेज के बॉटम / bottom के सेलेक्ट एरिया में स्वयं ही लिखा होता है। तभी ऐसा होता है यदि हेडर व फूटर को होम-सेटिंग में डाला गया हो। पेज नंबर / page number भी रिमूव किए गए। लाईन स्पेसिंग को 1.5 पर सेट किया गया। टेक्स्ट एलाईनमेंट / text alignment को लेफ्ट / left पर सेट / set किया गया। चित्र, ग्राफ / graph, टेबल / table आदि यदि टेक्स्ट में न ही हों, तो बेहतर है; क्योंकि ये ई-रीडर / e-reader में बहुत अच्छी तरह से डिस्प्ले / display नहीं होते हैं। ई-रीडर में केवल श्वेत-श्याम वर्ण ही होता है। यदि बहुत ही आवश्यक हो तो चित्र को भी डाला जा सकता है, यद्यपि वह बहुत जगह घेरता है, क्योंकि वह टेक्स्ट-लाईनों के बीच में फिट नहीं हो पाता, अपितु पेज के बाएँ मार्जिन से दाएं मार्जिन तक की पूरी जगह को टेक्स्ट के लिए अनुपयोगी बना देता है।

अगली पोस्ट में हम यह बताएंगे कि तैयार वर्ड-फाईल को केडीपी / KDP (किनडल डायरेक्ट पब्लिशिंग / Kindle direct publishing) में कैसे सेल्फ-पब्लिश / self publish करना है।

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पुस्तक प्रचाराभियान के बारे में स्वानुभूत जानकारी के लिए क्लिक करें

 

Self-publishing, a wonderful creation of modern technology

I recently got an opportunity to prepare a book, whose name is “Shareervigyaan Darshan – Ek adhunik Kundalini tantra (ek yogi ki premkatha)”, and which has been originally written by a mysterious yogi named Premyogi Vajra. First of all, I sorted the written material of the disorganized form that he had been extending for many years. After reading the material again and again, I took the entire contents into my mind. In fact, many people do the work of writing, but in the last round, all of them do not shield the written material in the form of a book. This is because it requires struggle, passion, meditation, perception and continuity, including a lot of hard work and hard work. Acute concentration and memory have to be retained for a long time. The entire book-material has to be seated together in mind so that the whole material can be sorted with reasonableness, attractiveness and decoration. Together, in which words cannot be reproduced second time. Then I removed many of his reimaginations, and started typing it on the computer in the form of a textually built-in form. Due to a shortage of time, it took one year for typing about 300 pages. Premyogi Vajra also continued to send written content, which I continued to add to that word file in between the context at the right place. I was typing on Microsoft Word 2007. So that mine typed material is not destroyed by computer malfunction or for other reasons, I would have kept my typed file in the D-drive (which does not contain windows-files) and on external storage as back-up also safely. I had bought Evernote at an annual subscription of INR 600 (on the discount offer, the actual value was INR 1500). It seemed to me the safest and the easiest way to get back-up, even better than on Gmail or Google Drive both of which are free. Evernote also has many other additional facilities. There is also an advantage for his commentator that even if there is anything remembered anywhere, anything can be written immediately on it, which gets stored for the future. Its search function is also very effective. Many times I copied the text from my second word file or blog post and pasted it into the book file. But due to the formatting error coming from it, the text becomes defective, or disappeared. Then I came to know that there is an option to paste in which style to paste. For that, that option has to be selected, in which “Keep Text Only” is written. It can also be selected permanently by accessing the Microsoft Word’s base button “Word Option”. And also many adjustments can be made from here at the convenience level, although rarely required or not required at all. Because the book was in Hindi, so the “Hindi language tool” of Google Input was downloaded. By typing on the English keyboard, the letters like Hindi are printed. Like typing “MEHNAT”, Hindi’s “hard work” is printed in the file. I also downloaded the Sanskrit tool, because there were many words in the book also of Sanskrit. The computer was connected with UPS (Battery Backup) so that the computer did not stop immediately when suddenly the power was lost, thereby giving the opportunity to save the file. By typing anyway, I used to save the file again and again while typing. When my file went to be larger than 150 pages, added text was at times not able to directly be saved in that base text of the file while that being in pen-drive, and that had come to the notice screen. Then the file had to be copied from the pen-drive and pasted into the computer. Then the subsequently typed text was saved. In order to type in another place, shop etc., that fresh file had to be copied to the pen-drive. Many times the file stored in Pen-Drive did not open. That occurs mainly due to computer virus. So never use your pen drive on infected computer and keep antivirus programme installed on your computer always. So after typing anything I used to backup that file in Evernote (aforementioned cloud-storage). When the Pen-Drive file did not open, I would download the file from the Evernote.  In this way, I never lost the typed text, not even a line. Another advantage of this was that if I had ever not a pen drive, then I would download the book-file from Evernote and type it on it, and would have saved it again in the Evernote. Although the pen drive always used to be in my hand bag. I saved the completed book-file for extra security even in the external hard drive. The line-spacing of the text was not equal. I used lots of fonts, but it did not matter. I also unchecked “Do note ad extra space before and after paragraph” of paragraph spacing-setting as per the instructions, but it did not work. I used to type in Ariel Unicode MS. Then I got a hint from the internet that non-English language letters in many fonts do not fit well in the line. Then I tried a lot of fonts, but only thing happened on the Cambria font, and the line spacing became absolutely equal and fantastic. I got rid of my big problem, especially to print the print version of the book, because the e-book was also working with uneven line spacing. One thing to note was that the Cambria font was being used only when the text was already typed or converted into Aerial Unicode MS, otherwise it would not. Both fonts are almost identical in texture, and are most suitable for Hindi. By selecting the text, the fonts can be changed at any time.

Then comes to convert the word book-file to e-book format. The margins around were made one centimeter. Headers and footers were removed. Header is that in the form of same sentence or word written automatically in the selected area at the top of each page. Similarly, the footer is written in the selected area of ​​each page’s bottom. Page numbers were also removed. Line spacing was made 1.5. Text alignment set on the left. If not photo, graph, table etc., then it is better; because these in e-readers are not very well displayed. The e-reader only has black and white characters. The picture can also be inserted if it is very necessary, although it occupies a lot of space, because it does not fit in between text- lines, but the entire space from the left margin to the right margin of the page is made by this unusable for text.

In the next post we will tell how to publish the ready word-file in KDP (Kindle Direct Publishing).

If you have found some benefit from this post, please download here the above mentioned e-book (in Hindi language, 5 star rated, reviewed as the best, excellent and must read by everyone) made with steps as told above. If only print version suits you, then too print version should only be got after testing that’s e- version on the electronic devices / phone etc., that is available on this link for this book. You can also find the complete information about this book, both in English as well as Hindi languages on the hosting website of this post. Thank you.

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पुस्तक-प्रचार, एक निःशुल्क पुस्तकों का खजाना (ई-पुस्तकों व ई-रीडर के बारे में सम्पूर्ण, दिलचस्प व स्वानुभूत जानकारी)- Book-promotion as a treasure of free books (full, interesting and experiential information about e-books and e-readers)

पुस्तक-प्रचार, एक निःशुल्क पुस्तकों का खजाना (ई-पुस्तकों व ई-रीडर के बारे में सम्पूर्ण, दिलचस्प व स्वानुभूत जानकारी)- Please browse down or click this Link to see post in English

यह पोस्ट एक पुस्तक के स्वयंप्रकाशन के दौरान प्राप्त हुए अनुभवों पर आधारित है

उदाहरण के लिए निम्न लिंक को क्लिक करके आपको हिंदी की एक अत्युत्तम ई-पुस्तक (*****पांच सितारा प्राप्त, सर्वश्रेष्ठ व सर्वपठनीय उत्कृष्ट / अत्युत्तम / अनौखीरूप में समीक्षित / रिव्यूड) अति कम मूल्य पर उपलब्ध हो जाएगी। फिर कोई पुस्तकप्रेमी यदि उसका कागजी-प्रतिरूप भी अपने पास रखना चाहे, तो उसे बाद में मंगवा सकता है। यदि किसी सज्जन के पास अपना ई-रीडर नहीं है, या वे ई-रीडर में पढ़ना पसंद नहीं करते हैं, तो वे अपने मोबाईल फोन पर ही उक्त पुस्तक को  न्यूनतम मूल्य में डाऊनलोड कर सकते हैं। यदि बीच-2 में जांचने-परखने पर वह पुस्तक उन्हें अच्छी लगे, तो वे उस पुस्तक के सशुल्क कागजी-प्रतिरूप (प्रिंट वर्जन) को बाद में मंगवा सकते हैं।

किंडल ई-रीडर की विशेषताएं

ऐसी बहुत सी वेबसाईटें हैं, जो प्रचारान्तर्गत पुस्तकों (प्रोमोशनल बुक्स) को सूचिबद्ध करती हैं, तथा पुस्तक-प्रेमियों को निःशुल्क उपलब्ध करवाती हैं (यद्यपि भारत के पुस्तक प्रेमियों के लिए यह सेवा मुझे उपलब्ध नहीं दिखती है)। उन वेबसाईटों के माध्यम से हमें नए जमाने की नई-2 पुस्तकों के बारे में निःशुल्क जानकारी प्राप्त होती रहती है। यदि कोई पुस्तक हमें अच्छी लगे, तो उसे हम विस्तार के साथ भी पढ़ सकते हैं। पूरी पढ़ने के बाद यदि हमें पुस्तक प्रशंसा के योग्य लगे, और यदि हम अन्य लोगों से भी उसके पढ़ने के लिए उसकी सिफारिश करना चाहते हैं, तब हम उसी वेबसाईट पर या पुस्तक-विक्रेता वेबसाईट पर उसका रिव्यू / review भी डाल सकते हैं। जिनके पास किन्डल ई-रीडर / kindle e-reader है, या अन्य कंपनियों के ई-रीडर हैं, उनके लिए तो वे निःशुल्क पुस्तकें किसी वरदान से कम नहीं होतीं। ऐसा इसलिए है क्योंकि ई-रीडर पर कागजी पुस्तक से कहीं अधिक अच्छा पढ़ा जाता है। वे आँखों पर ज़रा भी दुष्प्रभाव नहीं डालते, क्योंकि उनमें मोबाईल फोन की तरह लाईट / रेडिएशन नहीं होती, बल्कि वे बाहर की रौशनी से ही पढ़े जाते हैं, कागजी पुस्तकों की तरह ही। उसमें ई-स्याही (e-ink) होती है, जिसमें कोई रेडिएशन नहीं होती। इसी वजह से उसमें बहुत कम बिजली खर्च होती है। एक बार फुल चार्ज करने के बाद वह एक हफ्ते से लेकर एक महीने तक चल पड़ता है, प्रयोग के अनुसार। उसमें हम अपनी सुविधानुसार अक्षरों को छोटा या बड़ा कर सकते हैं, बहुत लम्बी रेंज तक। यह सुविधा दृष्टिदोष वालों के लिए व बुजुर्ग लोगों के लिए बहुत फायदेमंद साबित होती है। अक्षरों को बड़ा करके उसे रेलगाड़ी या बस में भी आराम से पढ़ा जा सकता है। उसकी एक ख़ास बात होती है कि उसमें सैंकड़ों पुस्तकें भंडारित करके रखी जा सकती हैं, जिससे पुस्तकों का भारी-भरकम बोझ साथ में उठा कर रखने की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। क्या पता कि कब किस प्रकार की पुस्तक को पढ़ने का मन कर जाए। कहीं पर भी यदि आदमी को किसी चीज का इन्तजार करते हुए बोरियत व समय की बर्बादी महसूस होने लगे, तो उससे बचने का सर्वोत्तम उपाय ई-रीडर ही है। इसके प्रयोग से मोबाईल फोन की जरूरत से ज्यादा लत भी धीरे-२ छूटने लगती है। लगभग एक बड़े मोबाईल फोन के या औसत टेबलेट के जितने आकार (परन्तु कुछ अधिक वर्गाकार आकृति होती है ई-रीडर की) के ई-रीडर का वजन केवलमात्र 50-75 ग्राम के आसपास प्रतीत होता है, और एक पुराने जमाने के छोटे मोबाईल फोन के वजन जितना लगता है। इसमें कम्प्यूटिंग जगत का सबसे साधारण प्रॉसेसर, सेलेरोन लगा होता है, जिससे यह कभी गर्म भी नहीं होता।इसका मतलब यह है कि ई-रीडर बहुत हल्का होता है। उसकी एक अन्य खासियत यह है कि जो पुस्तक हमने जहां तक पढ़ी हो, उसे दुबारा खोलने पर वह वहीं से शुरू होती है। इसलिए कागजी पुस्तक की तरह निशान लगाने की जरूरत नहीं पड़ती। पुस्तक के किसी भी भाग में हम मात्र एक क्लिक से पहुँच सकते हैं। उसके अक्षरों को हम आवश्यकतानुसार हाईलाईट / highlight कर सकते हैं, और उसे उसी जैसे ई-रीडर पर वही ई-पुस्तक पढ़ रहे लोगों के साथ शेयर / share भी कर सकते हैं। उसमें शब्दकोश की सुविधा भी होती है। किसी अंग्रेजी के शब्द को क्लिक करके उसका विस्तृत अर्थ सामने आ जाता है। अतः उसमें कठिन से कठिन अंग्रेजी में पुस्तकों को भी आसानी से पढ़ सकते हैं। उसको पढ़ने के लिए उतने ही प्रकाश की आवश्यकता होती है, जितने प्रकाश की आवश्यकता एक कागजी पुस्तक को पढ़ने के लिए होती है। परन्तु अब नए व तुलनात्मक रूप से महंगे ई-रीडरों में अपनी लाईट भी लगी होती है। उसे हम बाहरी प्रकाश के अनुसार एडजस्ट भी कर सकते हैं। वह लाईट वास्तव में ई-रीडर के अन्दर से नहीं आती, बल्कि स्क्रीन के बाहर, उसके किनारों पर लगे बल्बों से स्क्रीन के ऊपर बाहर से पड़ती रहती है। इसका अर्थ है कि उन ई-रीडरों को हम रात के समय अपने बेडरूम में ही, रूमलाईट को जलाए बिना व अन्य पारिवारिक सदस्यों की नींद खराब किए बिना भी पढ़ सकते हैं। इससे बिजली की भी बचत हो जाती है, क्योंकि उस प्रकार के ई-रीडर में बहुत कम पावर की एलईडी लाईट लगी होती है। एक साधारण ई-रीडर का न्यूनतम मूल्य लगभग 5500 रुपए होता है, वहीँ अपनी लाईट वाले एक आधुनिक ई-रीडर का न्यूनतम मूल्य लगभग 8500 रुपये होता है। दोनों में केवल लाईट का ही अंतर होता है, अन्य कुछ नहीं या बहुत मामूली / अस्पष्ट सा (महंगे वाले में अधिक स्क्रीन रिजोल्यूशन होता है)। किन्डल / kindle के ई-रीडर सबसे सस्ते माने जाते हैं। सनेपडील / snapdeal के माध्यम से न्यूनतम मूल्य पर मिल जाते हैं। जहाँ पर पसंदीदा कागजी पुस्तक को मंगवाने के लिए कई दिन या हफ्ते लग जाते हैं, वहीँ पर ई-रीडर के माध्यम से एक मिनट से भी कम समय में ई-पुस्तक उपलब्ध हो जाती है। कई पुस्तकें तो ई-पुस्तकों के रूप में ही मिलती हैं, क्योंकि उन पुस्तकों के कागजी प्रतिरूप छपे ही नहीं होते हैं। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि या तो पुस्तक नई-2 बाजार में आई होती है, या उसका लेखक विभिन्न बाध्यताओं के कारण उसके कागजी प्रतिरूप को नहीं छपवा पाता। ई-रीडर में इंटरनेट भी चल सकता है। यद्यपि उसमें इंटरनेट चलाना मोबाईल फोन के जितना सुविधाजनक तो नहीं होता, परन्तु फिर भी पुस्तकों को सर्च करने और उन्हें डाऊनलोड करने के लिए काफी होता है। ई-रीडर में वाई-फाई रिसीवर भी लगा होता है, जिससे वह हमारे स्मार्टफोन के वाई-फाई हॉटस्पॉट से उत्सर्जित इंटरनेट डाटा-युक्त सिग्नल को रिसीव कर सकता है, और उससे पुस्तक-हेतु इंटरनेट सर्फ़ कर सकता है। यह ऐसे ही होता है, जैसे हम एक फोन से दूसरे फोन को वाई-फाई से इंटरनेट का सिग्नल भेजते हैं। हम अपने स्मार्टफोन पर भी ई-पुस्तक को डाऊनलोड कर सकते हैं, और फिर दोनों डिवाईसों / उपकरणों को वाई-फाई के माध्यम से सिंक / sync करके, उस ई-पुस्तक को ई-रीडर को भेज सकते हैं। कई बार सिंक होने में कठिनाई आती है, इसलिए उस समय सीधे ही ई-रीडर पर डाऊनलोड करना ठीक रहता है। इससे हम ई-रीडर को दुबारा रिसेट / reset करने से बच जाते हैं। यद्यपि किनडल कंपनी के बाहर से प्राप्त की गईं सशुल्क व  निःशुल्क पीडीएफ पुस्तकें ई-रीडर पर सीधी डाउनलोड नहीं की जा सकतीं, इसलिए उन्हें पहले फोन पर डाउनलोड करना पड़ता है। इसलिए सिंक को पुनः चालू करने के लिए ई-रीडर को रिसेट करना पड़ता है। उससे पहले की डाऊनलोड की हुई पुस्तकें ई-रीडर से गायब हो जाती हैं, हालांकि रिसेटिंग के बाद वे फिर से लाईब्रेरी में प्रतीक रूप में दिख जाती हैं, जिन्हें फिर से डाऊनलोड करना पड़ता है। जो पुस्तकें ई-रीडर वाली कंपनी से नहीं प्राप्त की गई थीं, अपितु कहीं बाहर से हासिल की गई थीं व कनवर्ट करके ई-रीडर को भेजी गई थीं, वे रिसेटिंग के बाद नहीं दिखतीं। इसलिए उन ई-पुस्तकों के पीडीएफ वर्जन को अपने स्मार्ट फोन पर सुरक्षित रखना चाहिए या क्लाउड सर्विस / cloud service (like evernote) पर सुरक्षित रूप से भंडारित करके रखना चाहिए, ताकि बाद में उन्हें फिर से कन्वर्ट करके ई-रीडर को भेजा जा सके और उनकी मूल वेबसाईटों में उन्हें ढूँढने में दिक्कत भी न हो। रिसेटिंग के थोड़े से झंझट से बचने के लिए डाटा केबल के प्रयोग से ई-पुस्तकों को अन्य इलेक्ट्रोनिक स्टोरेज डिवाईसिस से ई-रीडर को भेजा जा सकता है। महंगे ई रीडर में अपना इंटरनेट भी होता है। उससे हम शान्ति के लिए अपना फोन घर पर छोड़कर भी ई रीडर के साथ घूम सकते है।  किन्डल कंपनी पीडीएफ पुस्तक को स्वयं कन्वर्ट करने की सुविधा भी देती है। उसके लिए ई-रीडर में किन्डल सर्विस से जुड़े हुए अपने ईमेल आईडी को एक्टिवेट करने की ऑप्शन होती है। उस ईमेल पते पर उस पीडीएफ बुक को अटेचमेंट के रूप में भेजा जाता है, तथा मेसेज की सब्जेक्ट लाइन में CONVERT लिखा जाता है। फिर वह बुक रीडेबल मोबि फोरमेट में हमारे ई-रीडर पर पहुँच जाती है, जिसे हम फिर डाऊनलोड कर लेते हैं।

ई-रीडर से पर्यावरण की सुरक्षा

ई-रीडरों का भविष्य उज्जवल है। पुस्तकीय कागज़ के लिए पेड़ों का अंधाधुंध कटान हो रहा है, जिससे पर्यावरण को हानि पहुँच रही है, और कागज़-उद्योगों से प्रदूषण भी बढ़ रहा है। यदि कोई व्यक्ति ई-रीडर पर 100 ई-पुस्तकें पढ़ता है, तो इसका अर्थ है कि उसने उन पुस्तकों में प्रयुक्त होने वाले कागज़ को बचाया। हमारे देश के विद्यालयों में कागज़ की बहुत खपत व साथ में बर्बादी भी होती है, क्योंकि कक्षा को उत्तीर्ण करने के बाद अधिकाँश विद्यार्थी अपनी पुस्तकों को रद्दी में बेच देते हैं। वे किताबें सिर्फ एक साल ही पढ़ी गई होती हैं, जिससे वे नई होती हैं। विदेशों की तरह ही, पुस्तकें विद्यालयों के द्वारा उपलब्ध करवाई जानी चाहिए, और कक्षा पूरी करने के बाद विद्यार्थी से वापिस ले ली जानी चाहिए, ताकि वे नए विद्यार्थी को पढ़ने के लिए दी जा सकें। इससे विद्यार्थी पुस्तकों का सम्मान करना भी सीखेंगे। इससे जहां एक ओर कागज़ की बर्बादी रुकेगी, वहीँ पर सर्वशिक्षा अभियान को भी मदद मिलेगी। यदि कागज़ की पूर्ण बचत करनी हो, तो विद्यालयों में भी सभी को ई-रीडर उपलब्ध करवा दिए जाने चाहिए।

ई-रीडर आध्यात्मिक-अध्ययन के लिए सर्वश्रेष्ठ

ई-पुस्तकों से ज्ञान एकदम से और चारों ओर से बढ़ता है, जो आध्यात्मिक उत्कर्ष / कुण्डलिनी-जागरण के लिए अत्यावश्यक है। अधिकाँश मामलों में आध्यात्मिक रुचि केवल थोड़े से समय के लिए ही उत्पन्न होती है। इसलिए उस रुचि को पूरा करने वाली पुस्तक तुरंत मिलनी चाहिए, जो ई-बुक से ही संभव है। फिर स्थान-2 के आध्यात्मिक आश्रमों, योगाश्रमों या आध्यात्मिक / मनोहर प्रकृतियों के बीच में भौतिक पुस्तकों को उठा कर घूमा भी तो नहीं जा सकता। जब तक कागजी पुस्तक जिज्ञासु व्यक्ति तक पहुंचती है, तब तक उसका शौक या तो ठंडा पड़ गया होता है, या नष्ट हो गया होता है, समय की कमी से या अन्य अनेक कारणों से। इसका ताजा उदाहरण है, इस वेबसाईट व उपरोक्त प्रचाराधीन पुस्तक का नायक, “प्रेमयोगी वज्र”। उसने विभिन्न वेबसाईटों, ई-पुस्तक विक्रेता वेबसाईटों, ई-रीडर व ई-पुस्तकों के माध्यम से तीव्रता से अपने आध्यात्मिक उत्कर्ष को प्राप्त किया।

जापान एक पुस्तक-प्रेमी देश

यह जानकर हैरानी होगी कि जापान जैसे तकनीकप्रधान देश के लोग भी बहुत पुस्तक-प्रेमी होते हैं। वहां पर नई पुस्तक की रिलीज के बाहर उतनी भीड़ लग जाती है, जितनी हमारे देश में नई फ़िल्म की रिलीज के बाहर नहीं लगती। भारत में अन्य विकसित देशों की तुलना में अभी ई-रीडर का चलन बहुत कम है, और अधिकाँश लोग भौतिक / कागजी पुस्तक के ही आश्रित हैं। अच्छी ई-पुस्तकों के बाजार में आने से ई-रीडर के चलन में तेजी आएगी।

सभी लोगों की रुचियाँ भिन्न-२ हैं, इसलिए ज्ञान-विज्ञान को विभिन्न माध्यमों की सहायता से युक्तियुक्त ढंग से प्रस्तुत किया जाना चाहिए

जो सामग्री इस ई-पुस्तक में उपलब्ध है, वह पूरी की पूरी इस वर्तमान ब्लॉग की मेजबानी-वेबसाईट / hosting website पर भी उपलब्ध है। नया कुछ नहीं है। ई-पुस्तक में तो केवल उस सामग्री को अधिक निष्ठा व मेहनत के साथ विस्तृत किया गया है, और सजाया गया है। कुशाग्रबुद्धि व मेहनती व्यक्ति तो इस वेबसाईट को समझ कर उसकी सामग्री से खुद भी इस ई-पुस्तक को तैयार कर सकता है। होना भी ऐसा ही चाहिए। सभी लोग भिन्न-2 होते हैं। कोई व्यक्ति आर्थिक रूप से कमजोर होता है, जो पुस्तक नहीं खरीद सकता और उसके पास समय की भी कमी होती है। किसी व्यक्ति को पुस्तकें पढ़ने का शौक नहीं होता। वैसे व्यक्तियों के लिए वेबसाईट ही बहुत होती है। कोई व्यक्ति निःशुल्क या सस्ती वस्तु को तुच्छ समझता है। कोई व्यक्ति महँगी पुस्तक को पसंद नहीं करता। वैसे व्यक्ति के लिए सस्ती ई-पुस्तक को बनाया गया है। कोई व्यक्ति मूल्यवान व गुणवान वस्तु को निःशुल्क प्राप्त करना चाहता है, विविध कारणों से। वैसे व्यक्ति के लिए इस पुस्तक का यह त्रिदिवसीय व वर्तमानकालिक निःशुल्क पुस्तक का प्रचाराभियान रखा गया है। कोई व्यक्ति ई-पुस्तक को महत्त्व देता है, तो कोई कागजी-पुस्तक को। ताकि सभी प्रकार के व्यक्तियों की जरूरतें पूरी हो सकें, इसीलिए इस प्रकार की अनेकदिशात्मक प्रणाली को बनाया जाता है।

खोजी प्रकार के व्यक्ति के लिए ई-रीडर सबसे उपयुक्त

कई बार क्या होता है कि हम बहुत सी मुश्किलों का सामना करते हुए कागजी पुस्तक / paper book खरीद भी लेते हैं। फिर यदि वह अच्छी न भी लगे, तो भी उसे मजबूरीवश पढ़ना ही पढ़ता है, क्योंकि उसमें बहुत सा पैसा खर्च किया गया होता है, और बेशकीमती कागज़ भी। इसके विपरीत इंटरनेट / internet पर हजारों ई-पुस्तकें पीडीएफ फाईल / pdf file के रूप में निःशुल्क उपलब्ध होती हैं। हम बहुत आसानी से उन पीडीएफ फाईलों को ऑनलाईन या ऑफलाइन फाईल कनवर्टरों / file converters (कैलिबर / caliber आदि) से ई-रीडर पर पढ़ने योग्य (किन्डल के लिए मोबी फाईल / mobi file के रूप में) बना सकते हैं। इस तरह से हम बीसियों पुस्तकों को एकसाथ डाऊनलोड / download कर सकते हैं। उन्हें हम बन्दर-दृष्टि से बीच-२ में व जल्दी-२ से पढ़ सकते हैं। पुस्तकों के जो भाग हमें अच्छे लगें, हम सिर्फ उन्हें ही पढ़ सकते हैं, बाकि के निरर्थक भाग को छोड़कर। यह तरीका खोजी प्रकार के लोगों के लिए बहुत अच्छा रहता है, क्योंकि उन्होंने किसी एक संक्षिप्त विषय के बारे में वर्तमान तक की विश्वभर की सम्पूर्ण जानकारी चाहिए होती है, ताकि वे कुछ उससे अलग व नया कर सके। भौतिक पुस्तकों से हम इतनी शीघ्रता से जानकारी प्राप्त नहीं कर सकते। यदि हम किसी एक विषय से सम्बंधित विश्व की सभी कागजी पुस्तकों को पुस्तकालय आदि में प्राप्त भी कर लें, तो भी उस विषय के बारे में सभी पुस्तकों को पड़ना बहुत दूभर व असंभव सा ही होता है। क्योंकि वैसा करते हुए समय भी बहुत लगेगा, और हमारे शरीर का 5 किलोग्राम वजन भी घट जाएगा। धूल खाने को मिलेगी, वह अलग। साथ में, जल्दबाजी में व सामान्य प्रयोग-क्षरण के तहत भौतिक पुस्तकों को जो नुक्सान होगा, वह भी अलग।  ई-रीडर को तो हम धूप में भी पढ़ सकते हैं, कागजी पुस्तक की तरह ही। यह इसका विशेष गुण है, जो फोन या कम्प्यूटर आदि में नहीं होता है।

कागजी पुस्तक को तो निःशुल्क नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि उस पर भौतिक संसाधन खर्च किए गए होते हैं। इसी तरह से, कागजी पुस्तकों के प्रोमोशनल ऑफर / promotional offer भी नहीं दिए जा सकते। इस बात को लेकर भी मुकाबले में ई-पुस्तक ही बाजी मार जाती है। इसकी एक ही कमी है कि इसमें चित्र अच्छे नहीं दिखते, रंग तो दिखते ही नहीं। ई-स्याही केवल श्वेत-श्याम ही दिखा सकती है।इस क्षेत्र में भी इसमें सुधार चल रहा है।

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Book-promotion as a treasure of free books (Full, interesting and experiential information about e-books and e-readers)

This post is based on the experiences gained during the self-publishing of a book

For example, by clicking on the following link, you will get one of the best Hindi eBooks (*****5 star rated, reviewed as the best, excellent and must read by everyone) at minimum price tag. Then if someone book lover wants to keep its paper-version too, then he can arrange it later. If a gentleman does not have his e-reader, or he does not like to read on an e-reader, he can download this above said book on his mobile phone. If the book looks good to him, then he can order the comparatively costlier paper version of that book later on.

Kindle e-reader features

There are many such websites, which lists promotional books, and make books available to book lovers free of charge (although this service doesn’t appear to me available for Indian book lovers presently). Through these websites, we get free new information about new-age new books. If a book looks good to us, then we can also read it with detail. After reading the entire book, if we find the book worthy of praise and if we want to recommend it to other people to read it, then we can put a review on the same website or book-seller website. For those who have a kindle e-reader, or e-readers of other companies, those free books are not less than any boon. This is because the e-reader is better to read than the paper book. These do not have any side effects on their eyes, because these do not have light / radiation, like mobile phones, but they are read only in the outside light, just like paper books. There is an e-ink in which there is no radiation. That is why it costs very little power. Once full charge, this works from one week to one month according to usage. In this we can shorten or enlarge the letters at our convenience, to a very long range. This feature proves to be beneficial for partially blind people and elderly people. The letters can be expanded and read comfortably even at the train or bus. There is a special thing that hundreds of books can be stored in it, this eliminates the need to keep a heavy load of books together. Do you know when to read what type of book? If somewhere waiting for a man feeling boredom and waste of time waiting for something, then the best way to avoid it is e-reader. Using this, the excessive addiction of mobile phone also decreases slowly. The weight of the e-reader of the size of a large mobile phone or small tablet appears only around 50-75 grams, that is the weight of the old mobile phone. It works on simplest computing processor, celeron, so it never heats up. This means that the e-reader is very light. Another feature of it is that the book that we have read as far as it has been opened, it starts it right there. That is why it does not need to be marked as a paper book. In any part of the book, we can reach with just one click. We can highlight words of e-book in it and share with people same book on similar e-reader. It requires as much light to read it, as much as the light is needed to read a paper book. But now, the new and comparatively costly e-readers have their own lights. We can also adjust that according to the outer light. The light does not actually come from the e-reader inside, but it keeps coming from the outside of the screen with the bulbs on its edges, outside the screen. This means that we can read those e-readers in the night of the bedroom, without switching on the room light and disturbing sleep of other room partners. This also saves electricity, because this type of e-reader has very low power LED light. The minimum value of a simple e-reader is about INR 5500, the minimum price of a modern e-reader with its own light is about INR 8500. there is not any other appreciable difference between both except of the barely noticeable higher screen resolution of the costly one. Kindle E-readers are counted as cheapest. Through snapdeal these are available at a minimum price. Where it takes days or weeks to get a favorite paper book, its e-Book version becomes available in less than a minute via e-reader. Many books are available only in the form of e-books, because the paper versions of those books are not printed. This is because either the book has come newly in the market, or its author has not been able to print its paper counterpart due to various compulsions. The Internet can also run in the e-Reader. Although running the Internet is not as convenient as in the mobile phone, but still it is enough to search and download the books. The e-reader also has a Wi-Fi receiver, so that it can receive Internet data signal emitted from the Wi-Fi hotspot of our smart phone, and it can surf the Internet for the book. It is just like we send an Internet signal from one phone to another. We can also download the e-book on our smart phone, and then by syncing both the devices via Wi-Fi, you can send that e-book to the e-reader. Many times, there is problem in syncing. In such cases it is better to download the e-book directly on e-reader. Due to this we are saved from resetting the e-reader. However, free or prized pdf-books from sources other than kindle can not be directly downloaded on the e-reader. In that case we have to reset the e-reader. Due to that old downloaded e-books are washed away, however they are again visible on e-reader after resetting to be downloaded. To be saved from resetting, data cable can be used to transfer book from other storage devices to kindle. Books which were not received from the e-reader company, but were received from outside elsewhere and converted then sent to e-readers, those do not appear after the resetting. So pdf version of those books needs to be properly stored in the smart phone or cloud service (evernote etc.) so that those could be again sent to e-reader after conversion and also those pdf books need not to be searched again in the source website. Some costly e readers have their own internet. So we can wander with those peacefully leaving our phone at home. Kindle Company also gives the facility to convert the PDF book itself. For that, the e-reader has an option to activate the email id associated with the Kindle Service. That PDF is sent on that activated address as an attachment, and in the subject line of message it is written, CONVERT. Then the book reaches our e-reader in the readable Mobi format, which we then download again. Other than the facility of highlighting the text on e reader, there is also dictionary facility in it. On clicking a word it’s detailed meaning pops up. So it’s easy to read challenging English books in it.

Protecting the environment with e-readers

The future of e-readers is bright. The trees are being indiscriminately cut down for the paper, which is causing harm to the environment, and pollution from paper industries is also increasing. If a person reads 100 eBooks on e-Reader, it means that he has saved the paper used in those books. There is a lot of paper consumption in our country’s schools as well as its wastage because most of the students sell their books in the trash after passing the class. Those books have been read only for one year, due to which those are new. Like abroad, books should be made available by the schools, and after completing the class, the books should be taken back from the student and should be given to new student to read. Then students will also learn to care for books. This will help prevent the waste of paper on one hand, the Sarva Shiksha Abhiyan / Mission of education to all will also be helped on other hand. If there is desired a complete saving of paper, then everyone should be provided e-reader in schools too.

E-Reader is Best for Spiritual Studies

Knowledge from e-books grows instantly and all around, which is essential for spiritual prosperity / Kundalini-Jagran / awakening. In most people, spiritual interest arises only for a short time. Therefore, a book fulfilling that interest should be available immediately, which is possible only through the e-book. Also, in the spiritual ashrams / retreats, yoga-ashrams or spiritual / attractive natural places, one cannot wander through lifting physical books. As long as the paper book reaches the inquisitive person, then his hobbies have either fallen or destroyed, due to lack of time or many other reasons. The latest example of this is the protagonist of this on-promotion book and this very same website too, “Premogi vajra”. He achieved his spiritual prosperity through various websites, e-book vendor websites, e-readers and e-books.

Japan is a book-loving country

It will be surprising to know that people of tech-driven country like Japan are very book-lovers. There is so much rush outside the release of the new book, as does not seem to be outside the release of the new film in our country. In India, the trend of e-readers is very low compared to other developed countries, and most people are dependent on the physical / paper books. With good e-books coming into the market, the e-reader trend will accelerate.

Everyone’s interests are different, so knowledge should be presented in a rational manner with the help of various mediums.

The content available in this e-book is also available entirely on this current blog-hosting website. Nothing new. In e-book, only that material has been expanded with more fidelity and hard work, and is decorated. A diligent person can understand this website and prepare his own eBook from this content. It should be the same. All people are different from each other. Someone is financially weak, who cannot buy a book. Someone don’t like books. For such persons the website is very much. Someone considers free or low cost thing to be despised. Someone does not like expensive books. The cheap e-book has been made for such a person. Someone wants to get valuable and costly book for free. For that person, this three days long, free eBook promotional offer has been kept. Someone gives importance to e-book, but for someone paper-book is important. In order to meet the needs of all types of individuals, this kind of much disciplinary system is made.

E-reader is best suited for investigative type person

What happens many times, that we also hire a paper book while facing many difficulties. Even if it does not feel good, he reads it strictly, because he has spent a lot of money in it, and even prized papers. On the contrary, thousands of eBooks are available free of charge as PDF file on the internet. We can easily make those PDF files through online or offline file converters (caliber etc) readable on e-reader (as a mobi file for kindle). In this way, we can download twenties of books together. We can read them with monkey-eye, rapidly and selectively. The parts of the books that we think are good; we can only read those, except for the futile part of the rest. This method is very good for people of the type of searching and researching habit, because they need a brief subject to be present in the whole world till date, so that they can do something different and new. We cannot get information from physical books so quickly. Even if we get all the world’s books together in the library etc. related to one topic, then even reading all the books about that subject is very confusing and nearly impossible. Because doing so will take too much time, and our body will also lose 5-kilogram weight. Dust will also be eaten little or more. In the hasty and common use-erosion, the damage to physical books is also there. We can also read the e-Reader in the sun, just like a paper book. This is its special quality, which is not in the phone or computer etc.

The paper book cannot be made free because the physical resources are spent on it. Similarly, promotional offers of paper books cannot be given too. E-book only gets hit in this match about this matter. It’s only drawback is that it doesn’t show pictures well, never show colours at all. E-ink can only show black and white.

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Importance of Body Chakras in Kundalini Yoga – A Scientific Discussion / कुण्डलिनीयोग में शारीरिक चक्रों का महत्त्व- एक वैज्ञानिक विवेचना

Importance of Body Chakras in Kundalini Yoga – A Scientific Discussion

Giving the importance of equality to all the chakras in the Kundalini Yoga during everyday life, Kundalini visualization / visualization is done on all the chakras turn by turn. Its advantage is that in some parts of the body the Kundalini comes into the grip. In fact, the Kundalini is associated with the chakras / parts of the body. When the activity of a chakra increases, then the blissful expression of the Kundalini, which is being visualized there upon, also increases. The activity of the body depends solely on physical blood circulation. When blood circulation increases on a chakra, then the activity of that chakra also increases. The total blood circulation of the body remains the same, only in different parts it keeps on changing only. If blood circulation increases on one chakra, then it is naturally decreased on any other chakra. By brain work, blood circulation increases in the brain, so during that time the Kundalini-visualization in the brain-chakra / Agya chakra is very simple and successful. Speech, writing, reading, colloquial etc. increases the circulation in the throat, thereby making the Kundalini’s visualization simple and effective on there / in the throat chakra / Vishuddhi chakra. When the feeling of emotions in mind increases the blood circulation in the heart, then due to visualization in the heart centre / heart chakra / Anahata Chakra, the Kundalini becomes more ignited. When the digestive tract is powerful, then there is increased blood circulation in the abdomen / naval area. Therefore visualization in naval chakra / Manipura Chakra at that time is of greater benefit. The effectiveness of sexually energizing sexual activity, the proper health of the waste-emitting organs and other physical (especially hands and feet related) actions increases the blood circulation on the sexual chakras / swadhishthana and muladhara chakra, therefore there is more activity in the Kundalini. That is why at that time those two chakras seem to get more attention.

In the household life, especially in duality and ignorance, all chakras cannot be functioning simultaneously and in common, because sometimes the tasks related to a particular area have to be emphasized, then sometimes tasks related to any other area. Therefore, in a single sitting of Kundalini Yoga, visualization of Kundalini is done on all the chakras turn by turn. Then the influential chakra itself comes under the purview of visualization, which has a greater sense of visualization-benefit. By this, visualization-gains gradually become accumulated in Kundalini Jagran / awakening. On the contrary, there is no cosmic responsibility for the ascetic-yogi or devoted yogi, so that he can easily keep stirring the activity for a long time on a particular chakra. Therefore, it is said that visualization should be done on the same chakra for a long time and then should move towards the next chakra, it has been said only for such a dedicated yogi. He is saved by a slight loss of visualization caused by chakra-change, nothing special. By continuously meditating on the same chakra, it can increase blood circulation to that chakra for a long time, because visualization on any part of the body increases blood pressures there itself. This is also the principle of spiritual healing. When someone entangled in the worldly life, by leaving his chakra, which is actively working with its naturalness, takes a forceful attention on any other chakra, then according to that need, the blood of the functioning chakra runs towards that chaotic chakra. From that necessity, the natural function of the functioning chakra will be affected by it less or more. Therefore, in the Yogasadhana / meditation-sitting under such busy worldly circumstances, the dhyana / attention should be applied on the same chakra which is easily or spontaneously meditative. Do not be forced to coax with other dormant chakras. By the way, by keeping the attention of all the chakras in the same way, all parts of the body are equally healthy; Life becomes balanced and moves forward in every field. By focusing continuously on a particular chakra, specializations can be gained quickly in the related areas of that chakra, although life can become unbalanced, and the health of the areas related to other body chakras can be questioned.

This type of perfect physical and mental balance becomes available from the advaita / non duality of Puranas / Aryan personified natural stories and through the Advaita obtained from the physiology / body science philosophy. This is because, because of non duality all things look alike, and there is no special attachment to a particular area. From this, the person meditates on all parts of his individual body as well as on the universal body, because the worldly creation (related to the world) and the individual creation (body-related) are both interconnected according to “yatpinde tatbramhaande”. The control over one is reflected itself as the control over the second one too in the same manner and same extent. From this non duality practice also, kundalini develops itself gradually and with less special efforts.

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कुण्डलिनीयोग में शारीरिक चक्रों का महत्त्व- एक वैज्ञानिक विवेचना

प्रतिदिन के लौकिक जीवन के दौरान जो कुण्डलिनीयोग किया जाता है, उसमें सभी चक्रों को बराबरी का महत्त्व देते हुए सभी चक्रों पर बारी-२ से कुण्डलिनी का ध्यान किया जाता है। इसका यह फ़ायदा होता है कि शरीर के किसी न किसी भाग में कुण्डलिनी पकड़ में आ ही जाती है। वास्तव में कुण्डलिनी शरीर के चक्रों / भागों से जुड़ी होती है। जब किसी चक्र की क्रियाशीलता बढ़ती है, तब उस पर ध्यायित की जाने वाली कुण्डलिनी की आनंदमयी अभिव्यक्ति भी बढ़ जाती है। शरीर की क्रियाशीलता शारीरिक रक्तसंचार पर ही तो निर्भर करती है। जब किसी चक्र पर रक्तसंचार बढ़ जाता है, तब उस चक्र की क्रियाशीलता भी बढ़ जाती है। शरीर का कुल रक्तसंचार तो एकसमान ही रहता है, केवल विभिन्न भागों में उसकी मात्रा घटती-बढ़ती रहती है। यदि एक चक्र पर रक्तसंचार बढ़ता है, तो किसी दूसरे चक्र पर स्वाभाविक रूप से घट जाता है। दिमागी कार्य से दिमाग में रक्तसंचार बढ़ जाता है, अतः उसके दौरान मस्तिष्क-चक्र / आज्ञा चक्र में कुण्डलिनी-ध्यान अधिक सरल व सफल होता है। भाषण, लेखन, पठन, बोलचाल आदि से गले में रक्तसंचार बढ़ जाता है, जिससे वहां / ग्रीवाचक्र / विशुद्धिचक्र पर कुण्डलिनी का ध्यान सरल व प्रभावशाली हो जाता है। मन में भावनाओं के उमड़ने के समय ह्रदय में रक्तसंचार बढ़ जाता है, जिससे उस समय हृदयक्षेत्र / हृदयचक्र / अनाहत चक्र में ध्यान करने से कुण्डलिनी अधिक प्रज्वलित हो जाती है। जब पाचनक्रिया शक्तिशाली होती है, तब उदरक्षेत्र / नाभिक्षेत्र में रक्तसंचार बढ़ा हुआ होता है। इसलिए उस समय नाभिचक्र / मणिपुरचक्र में ध्यान करने से अधिक लाभ होता है। यौनशक्तिवर्धक यौनक्रियाशीलता से, अपशिष्ट-उत्सर्जक अंगों के उत्तम स्वास्थ्य से व अन्य शारीरिक (विशेषतः हस्तपादाश्रित) कर्मों से यौनचक्र / स्वाधिष्ठानचक्र व मूलाधार चक्र पर रक्तसंचार बढ़ा हुआ होता है, अतः वहां पर कुण्डलिनी अधिक क्रियाशील होती है। इसलिए उस समय उन दोनों चक्रों पर अधिक अच्छी तरह से ध्यान लगता है।

गृहस्थजीवन में, विशेषतः द्वैत व अज्ञान से भरे गृहस्थजीवन में सभी चक्र एकसाथ व एकसमान रूप से क्रियाशील नहीं रह सकते, क्योंकि कभी किसी क्षेत्र से सम्बंधित कार्यों पर अधिक जोर देना पड़ता है, तो कभी किसी अन्य क्षेत्र से सम्बंधित कार्यों पर। इसलिए कुण्डलिनीयोग की एक अकेली बैठक में सभी चक्रों पर बारी-२ से कुण्डलिनी का ध्यान किया जाता है। उससे प्रभावशाली चक्र स्वयं ही ध्यान के दायरे में आ जाता है, जिससे ध्यान-लाभ की अधिक अनुभूति होती है। इससे ध्यान-लाभ धीरे-२ इकट्ठा होता हुआ कुण्डलिनीजागरण में परिणत हो जाता है। इसके विपरीत संन्यासी-योगी या समर्पित योगी के लिए कोई लौकिक उत्तरदायित्व नहीं होता, जिससे वह एक विशेष चक्र पर लम्बे समय तक क्रियाशीलता को आसानी से बना कर रख सकता है। इसलिए जो यह कहा गया है कि एक ही चक्र पर लम्बे समय तक ध्यान करके उसे जगा देना चाहिए और फिर अगले चक्र की ओर रुख करना चाहिए, वह ऐसे ही समर्पित योगी के लिए ही कहा गया है। वह चक्र-बदलाव से उत्पन्न थोड़ी सी ध्यान-हानि से बच जाता है, अन्य विशेष कुछ नहीं। वह एक ही चक्र पर निरंतर ध्यान लगा कर वहां पर रक्तसंचार को लम्बे समय तक बढ़ा कर रख सकता है, क्योंकि शरीर के किसी भाग पर ध्यान लगाने से वहां पर रक्तसंचार स्वयं ही बढ़ जाता है। यही स्पिरिचुअल हीलिंग / आध्यात्मिक उपचार का सिद्धांत भी है। जब सांसारिकता में उलझा हुआ कोई व्यक्ति स्वाभाविकता से क्रियाशील अपने चक्र को छोड़कर किसी अन्य चक्र पर जोर-जबरदस्ती से ध्यान लगाता है, तब उस आवश्यकतानुसार क्रियाशील चक्र का रक्त उस ध्यायित किए जा रहे चक्र की ओर दौड़ पड़ता है। उससे उस आवश्यकतानुसार क्रियाशील चक्र के स्वाभाविक कार्य तो कम या अधिक रूप से दुष्प्रभावित होंगे ही। इसलिए वैसी व्यस्ततापूर्ण सांसारिक परिस्थितियों के अंतर्गत की जाने वाली योगसाधना-बैठक में जिस चक्र पर ध्यान आसानी से या स्वयं ही लग रहा हो, वहीँ पर लगने देना चाहिए। अन्य सुप्त चक्रों के साथ अधिक जोर-जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए। वैसे तो सभी चक्रों पर समान रूप से ध्यान देने से ही शरीर के सभी अंग समान रूप से स्वस्थ रहते हैं; जीवन संतुलित बनता है और हरेक क्षेत्र में आगे बढ़ता है। एक विशेष चक्र पर ही निरंतर ध्यान देने से उस चक्र से सम्बंधित क्षेत्रों में शीघ्रता से विशेषज्ञता तो प्राप्त हो सकती है, यद्यपि उससे जीवन असंतुलित बन सकता है, और शरीर के अन्य चक्रों से सम्बंधित क्षेत्रों के स्वास्थ्य पर प्रश्नचिन्ह लग सकता है। अद्वैतमय जीवन से भी कुण्डलिनी स्वयं ही व बिना किसी विशेष प्रयास के धीरे-२ विकसित होने लगती है।

इस प्रकार का उत्तम शारीरिक व मानसिक संतुलन पुराणों से व शरीरविज्ञान दर्शन से प्राप्त अद्वैतभाव से भी उपलब्ध हो जाता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि अद्वैतभाव से सभी कुछ समान जैसा लगता है, और किसी विशेष क्षेत्र से विशेष लगाव या आसक्ति नहीं रहती। इससे व्यक्ति व्यष्टि और समष्टि के सभी अंगों पर समान रूप से ध्यान देता है, क्योंकि समष्टि (विश्व-सम्बंधित) व व्यष्टि (शरीर-सम्बंधित), दोनों आपस में जुड़े हुए हैं, “यतपिण्डे तत ब्रम्हांडे” के अनुसार। एक के भी नियंत्रण से दूसरा स्वयं ही उसी के अनुसार नियंत्रित हो जाता है।

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Could Dusshara-tragedy of Amritsar be avoided-क्या अमृतसर का दशहरा-हादसा टल सकता था?

Could Dusshara-tragedy of Amritsar be avoided-

Probably could have been avoided, or at least it could have minimally happened, if the following four fundamental principles once divulged by Premyogi vajra were kept in tune with a knot-

Not a big religion than humanity, not a big worship than work.

Not a bigger guru than a problem, not a big monastery from a householder.

Now we analyze all the phrases –

Not a big religion with humanity – It does not mean that religion should not be accepted. But it means that religion should not overpower humanity. If they were playing the religious rituals of Burning Ravana, then it does not mean that the security of themselves and others should be ignored. Humanity is hidden only in the safety and well-being of all living beings, especially humans. History is filled with inhuman atrocities in the name of religion, and it continues to be in sporadic form even today. If this phrase is settled in the heart by everyone, then it should be stopped immediately.

Do not worship more than work – This phrase does not mean that worship should not be done. It means that work should not be hindered due to worship, but help should be given only in the work. Then gradually the work begins to become a pooja / worship. The work of the people who visited Dussehra was that they would allow the ceremony to be done in a grand and secure manner, but in the worship of Ravana-combustion, they forgot that work, and made a great mistake in security. If this phrase was seated deep in their minds, then perhaps giving them correct directions, maybe giving them correct directions.

Not a big master than the problem – It does not mean that the master should not be respected. Guruseva / serving master is the biggest identity of humanity. This phrase means that even blind devotion should not be done towards a guru too. There should be a deep look at the problems because they also keep guiding. In fact, the gurus also learn direction from the problems. What sometimes happens is that the master ignorant of the problem is giving wrong directions. Even if the organizers of the ceremony asked to come to the maximum number of people, even if there was less space at the venue, then people should not have come, or should have gone back after seeing the problem of more crowds. Who ones would have been angry with this act, they would have lived. Seeing the problem of absence of the police should also have to go back. Surprisingly, people climbed to the railway tracks, yet they did not see the problem of running fast train probably coming soon. For the overall security, the future problem should also be assessed. Most of the incidents happen in the future by ignoring the problem that can be seen in the future, because the problem in front is visible to everyone. People would have guessed that they would go away after seeing the car. They did not think that one problem could also be that the speed of the train was very fast, and they could not even run away seeing it. They would have also thought that they would run away by listening to the vehicle’s voice. But their limited intellect was unable to assess the potential problem that the voice of the vehicle can not be heard even between the firecrackers and the noise of the people, as happened. They also thought that if they were standing on the track for a few seconds to avoid falling down Ravana, then what would happen to them? But they could not even assess the potential problem that at times, very rare incidents happen, and in those very few seconds, the carriage can reach there, and it had reached. Then comes, give priority to problems. To avoid the big problem, a small problem should be taken. If they were also troubled by the burning heat of Ravana, then that problem should have been taken to prevent the possible life-threatening problem by going on the track. Many times it takes a lot of time to make a decision, so the brain should be prepared for that time too. If this above phrase was always held, it would probably not be an accident. Another thing about “honee / destined” is By the way, it can be very weak if you try, if it can not be avoided. Then, like the diffuse bomb, it also becomes defused. No place is free from the problem, so always be alert while keeping the mind. Most of the scientific discoveries and inventions have been done while learning from the problems. It also means that if one doesn’t walk on the true path indicated by a true master, then problems try to make him walk on the same. It also means that when a man becomes troubled and disappointed from all around, then he prefers recluse and starts yoga meditation, which brings to him spiritual fruit immediately. The same happened to Premyogi vajra, hero of this hosting website and there said eBook. It also means that in most of the cases the defective man fires long spiritual speeches. Experiential and conduct full master only teaches through his conduct, speaking minimally only through signs. One of the many meanings of this phrase is that if anyone don’t walk in line with the humanity, then he is turned right way towards humanity by various types of problems.

Not a big monastery from a householder – This phrase means that there is no big meeting place, no religious place, bigger than a householder. If this thing was sitting in their mind, they would not leave their family and not run away to the problematic area, but perform religious rituals in their hometown / neighborhood. Even if they went away, they would have kept themselves safe by keeping their family in their mind in their strong desire to return back.

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क्या अमृतसर का दशहरा-हादसा टल सकता था-

शायद टल सकता था, या कम तो जरूर ही हो सकता था, यदि प्रेमयोगी वज्र द्वारा कभी उद्गीरित निम्नलिखित चार मूलभूत सिद्धांतों को गांठ बाँध कर याद रखा जाता-

मानवता से बड़ा धर्म नहीं, काम से बढ़ कर पूजा नहीं।

समस्या से बड़ा गुरु नहीं, गृहस्थ से बड़ा मठ नहीं।।

अब हम एक-२ करके सभी वाक्यांशों का विश्लेषण करते हैं-

मानवता से बड़ा धर्म नहीं- इसका अर्थ यह नहीं है कि धर्म को नहीं मानना चाहिए। अपितु इसका अर्थ है कि धर्म मानवता के ऊपर हावी नहीं हो जाना चाहिए। यदि वे रावण-दहन की धार्मिक रस्म को निभा रहे थे, तो इसका मतलब यह नहीं है कि अपनी और औरों की सुरक्षा को नजरअंदाज कर देना चाहिए था। मानवता सभी जीवधारियों की, विशेषतः मनुष्यों की सुरक्षा व हितैषिता में ही तो छिपी हुई है। इतिहास धर्म के नाम पर अमानवीय अत्याचारों से भरा पड़ा है, और आज भी छिटपुट रूप में ऐसा होता रहता है। यदि इस वाक्यांश को सभी के द्वारा ह्रदय में बसा लिया जाए, तो इस पर तुरंत रोक लग जाए।

काम से बढ़ कर पूजा नहीं- इस वाक्यांश का यह अर्थ नहीं है कि पूजा नहीं करनी चाहिए। इसका अर्थ यह है कि पूजा के कारण काम में बाधा नहीं पहुंचनी चाहिए, अपितु काम में सहायता ही मिलनी चाहिए। फिर धीरे-२ काम भी पूजा ही बनने लगता है। दशहरा देखने आए लोगों का काम था कि वे समारोह को भव्य रूप से व सुरक्षित रूप से संपन्न होने देते, परन्तु रावण-दहन रुपी पूजा के चक्कर में वे उस काम को ही भूल गए, और सुरक्षा में भारी चूक कर बैठे। यदि यह वाक्यांश उनके मन में गहरा बैठा होता, तो शायद उन्हें सही दिशा-निर्देश देता।

समस्या से बड़ा गुरु नहीं- इसका अर्थ यह नहीं है कि गुरु का सम्मान नहीं करना चाहिए। गुरुसेवा तो मानवता की सबसे बड़ी पहचान है। इस वाक्यांश का यही अर्थ है कि अंधभक्ति तो गुरु की भी नहीं करनी चाहिए। समस्याओं पर भी गहरी नजर रहनी चाहिए, क्योंकि वे भी दिशा-निर्देशित करती रहती हैं। वास्तव में गुरु भी समस्याओं से ही दिशा-निर्देशन सीखते हैं। कई बार क्या होता है कि वास्तविक समस्या से अनजान गुरु गलत दिशा-निर्देश दे रहे होते हैं। यदि समारोह-स्थल पर कम जगह होने के बावजूद समारोह के आयोजकों ने अधिक से अधिक संख्या में लोगों से आने के लिए कहा था, तो लोगों को आना नहीं चाहिए था, या अधिक भीड़ की समस्या को देखकर वापिस चले जाना चाहिए था। जिसने नाराज होना होता, वह होता रहता। पुलिस की गैरमौजूदगी की समस्या को देखकर भी वापिस चले जाना चाहिए था। हैरानी की बात है कि लोग रेल की पटड़ी पर चढ़ गए, फिर भी उन्हें तेजी से दौड़कर आने वाली समस्या नहीं दिखी। सम्पूर्ण सुरक्षा के लिए भविष्य की समस्या का आकलन भी करके रखना चाहिए। ज्यादातर हादसे भविष्य में हो सकने वाली समस्या को नजरअंदाज करके ही होते हैं, क्योंकि सामने खड़ी समस्या तो सबको दिख ही जाती है। लोगों ने यह अनुमान लगाया होगा कि वे गाड़ी को देखकर हट जाएंगे। उन्होंने यह नहीं सोचा कि एक समस्या यह भी हो सकती है कि गाड़ी की रप्तार बहुत तेज हो, और वे उसे देख कर भी भाग न सकें। उन्होंने यह भी सोचा होगा कि गाड़ी की आवाज को सुनकर वे भाग जाएंगे। परन्तु उनकी सीमित बुद्धि उस संभावित समस्या का आकलन नहीं कर पाई कि पटाखों व लोगों के शोर के बीच में गाड़ी की आवाज नहीं भी सुनाई दे सकती है, जैसा कि हुआ भी। उन्होंने यह भी सोचा होगा कि जल कर गिरते हुए रावण से बचने के लिए यदि वे कुछ सेकंडों के लिए पटरी पर खड़े होते हैं, तो उससे क्या होगा। परन्तु वे उस संभावित समस्या का भी आकलन नहीं कर पाए कि कई बार संयोगवश बहुत दुर्लभ घटनाएं भी हो जाती हैं, और उन्हीं चंद सैकंडों में भी गाड़ी वहां पहुँच सकती है, और वह पहुँची भी। फिर आता है, समस्याओं को प्राथमिकता देना। बड़ी समस्या से बचने के लिए छोटी समस्या को झेल लेना चाहिए। यदि जलते रावण की गर्मी से वे परेशान भी हो रहे थे, तो उस परेशानी को पटरी पर जाने से संभावित जीवनघाती समस्या को रोकने के लिए झेल लेना चाहिए था। कई बार निर्णय लेने के लिए बहुत कम समय मिलता है, इसलिए दिमाग को वैसे समय के लिए भी तैयार करके रखना चाहिए। यदि इस उपरोक्त वाक्यांश को हरदम धारण किया गया होता, तो शायद यह हादसा न होता। “होनी” की बात और है। वैसे अपने प्रयास से होनी को बहुत क्षीण तो किया ही जा सकता है, यदि टाला नहीं जा सकता। फिर डिफ्यूज बम्ब की तरह होनी भी डिफ्यूज हो जाती है। कोई भी स्थान समस्या से मुक्त नहीं है, इसलिए दिमाग लगाते हुए सदैव सतर्क रहना चाहिए। सभी वैज्ञानिक आविष्कार आदि समस्याओं से सीखकर ही हुए हैं। इसका एक अर्थ यह भी है कि यदि कोई सद्गुरु की बताई हुई सही राह पर नहीं चलता है, तो समस्याऐं उसे सही राह पर चलवाने का प्रयास करती हैं। इसका यह मतलब भी है कि जब व्यक्ति चारों ओर से समस्याओं व अपेक्षाओं का शिकार हो जाता है, तब वह एकांत के आश्रय से योगसाधना करता है और आध्यात्मिक उत्कर्ष को प्राप्त करता है। यही प्रेमयोगी वज्र के साथ भी हुआ, जो इस मेजबानी-वेबसाइट व वहां उल्लेखित ई-पुस्तक का नायक है। इसका एक अर्थ यह भी है कि अधिकांशतः दोषपूर्ण व्यक्ति ही खाली लम्बे-2 उपदेश देता है, असली गुरु तो अनुभवपूर्ण होता है, और अपने आचरण से ही सिखाता हुआ इशारों में ही बातें करता है। इस अनेकार्थक छंद का एक अर्थ यह भी है कि यदि कोई व्यक्ति मानवता के रास्ते पर नहीं चलता है, तब अनेक प्रकार की समस्याएं उसे सही रास्ते पर लाने का प्रयास करती हैं।

गृहस्थ से बड़ा मठ नहीं- इस वाक्यांश का यह अर्थ है कि गृहस्थ से बड़ा कोई सभा-स्थल नहीं, कोई धार्मिक-स्थल नहीं। यदि यह बात उनके मन में बैठी होती, तो वे अपने परिवार को छोड़कर वैसे समस्याग्रस्त क्षेत्र की ओर पलायन न करके अपने घर-पड़ौस में ही धार्मिक रस्म निभाते। और यदि चले भी जाते, तो भी अपने परिवार में वापिस लौटने की तीव्र ख्वाहिश रखते हुए अपने को सुरक्षित बचा कर रखते।

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