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कूटस्थ के माध्यम से सीधी जागृति: मेरा अनुभव

बहुत लोग कहते हैं कि चक्रों और रीढ़ की साधना जरूरी है, लेकिन क्रिया योग गुरु मुखर्जी की बात मुझे गहराई से छू गई—केवल कूटस्थ (आज्ञा चक्र) पर ध्यान लगाने से ही मुक्ति मिलती है। उनका मानना था कि चक्रों पर ध्यान लगाने से अनगिनत जन्म भी व्यर्थ जा सकते हैं। अब मुझे समझ आ गया कि ऐसा क्यों है।

शुरुआत से ही मैंने तंत्र के सहारे ऊर्जा को सीधे कूटस्थ में प्रवाहित किया। या यूं कहो, सीधा मस्तिष्क में ध्यान किया। चक्रों का मुझे उस समय विशेष ज्ञान और अनुभव नहीं था। जागृति के बाद ही चक्रों पर थोड़ा ध्यान देना शुरु किया, लेकिन ऊर्जा को वहाँ रुकने नहीं दिया। इसका परिणाम हुआ—तेज़ जागृति। जहाँ पारंपरिक तरीके धीरे-धीरे ऊर्जा को ऊपर उठाते हैं, मेरा तरीका सीधे लक्ष्य तक पहुँच गया। जब ऊर्जा चक्रों या रीढ़ में नहीं उलझी, तो जागृति तुरंत हुई।

लेकिन इसके साथ एक नई चुनौती आई—संतुलन बनाए रखना। मैं उस समय दुनियादारी से विरक्त सा हो गया था, गहरे और भारी काम मस्तिष्क में आनंद के साथ ध्यान चित्र को भड़का देते थे। उससे मस्तिष्क में दबाव बढ़ जाता था बेशक आनंद भी। हालांकि मुझे उसे काबू में करने के लिए वाममार्गी तंत्र (खासकर यिन यांग रूप वाला) से बहुत सहायता मिलती थी। अब ऊर्जा स्वतः ऊपर-नीचे चलती है, लेकिन स्थिर रहना ज़रूरी है। इसके लिए मैं रोज़ चक्र ध्यान करता हूँ। हर चक्र पर श्वास रोकता हूँ, उसके रंग, अनाज, बीज मंत्र और ध्यान चित्र के रूप में देवता की कल्पना करता हूँ, और ऊपर से नीचे की ओर बढ़ता हूँ। बिना तंत्र के, स्थिर होने में थोड़ा समय लगता है, लेकिन तंत्र से यह तुरंत हो जाता है।

बहुत सी ग्राउंडिंग तकनीकों के बारे में सुना, पर ज़रूरत नहीं पड़ी। मेरे लिए तंत्र और चक्र ध्यान ही पर्याप्त हैं। इस सीधी पद्धति ने मेरे लिए काम किया। असली रहस्य यह है—जागृति तभी होती है जब ऊर्जा पूरी तरह कूटस्थ में स्थिर हो जाए, अन्यत्र बिखरने न पाए।

अगर मुक्ति की सीधी राह चाहिए—कूटस्थ पर ध्यान दो, संतुलन के लिए चक्र ध्यान अपनाओ, और ज़रूरत पड़ने पर तंत्र का सहारा लो। जब राह सरल हो, तो उसे उलझाने की ज़रूरत नहीं।

Kevala Kumbhaka and the Silent Unfolding of Awareness

When the time is right, Kevala Kumbhaka sets in effortlessly. No amount of effort can force it; it happens by itself. The breath naturally ceases, and stillness takes over. Thoughts may try to arise, but the meditation image emerges instantly, bringing breathlessness back. This cycle continues as long as one does not choose to break it.

The longest I remained in Kevala Kumbhaka was about two hours while traveling on a bus. Sitting for long periods can cause sores, but I carefully adjust posture without disturbing the stillness. By the way, the seat in the bus feels the best because due to the slight jolts and vibrations, the body gets a subtle massage, which does not cause stiffness and the legs etc. do not become numb. One can  reach the stage of keval Kumbhaka with any lifestyle of activity—in fact, it seems more so in the state of relaxation after a strenuous task, whereby everything feels effortless, as if only meditation is taking place. Though contemplating the physiology philosophy during daily activities helps in meditation, keval Kumbhaka enhances this help. The more challenging the task, the more it helps.

With time, the meditation image has mostly taken the place of ‘I.’ In my 10-second glimpse of enlightenment, the image had completely merged with me and the world. Now, it serves as a bridge to stillness. Whether it will fully dissolve or remain as an anchor is unknown—the process is guiding itself. No effort, no struggle, just unfolding.

Curiosity never ends. The joy of discovery, the urge to share, and the art of writing help refine and integrate these experiences. Simplicity is key—truth is best expressed in few words. In the end, it’s not about knowing where this journey leads but allowing it to happen, moment by moment.

केवल कुम्भक और मौन चेतना का प्राकट्य

मित्रो, जब सही समय आता है, केवल कुम्भक स्वयं घटित होता है। इसे प्रयास से प्राप्त नहीं किया जा सकता; यह अपने आप होता है। श्वास स्वाभाविक रूप से थम जाती है और स्थिरता छा जाती है। विचार उठने की कोशिश करते हैं, लेकिन ध्यान का चित्र तुरंत प्रकट होता है और फिर से निःश्वास रहित स्थिति आ जाती है। यह चक्र तब तक चलता रहता है जब तक कोई इसे तोड़ने का निश्चय नहीं करता।

सबसे लंबी अवधि जिसमें मैं केवल कुम्भक में रहा, वह लगभग दो घंटे थी, जब मैं बस में यात्रा कर रहा था। लंबे समय तक बैठने से शरीर में जकड़न हो सकती है, लेकिन मैं अपनी स्थिति को इस तरह समायोजित करता हूँ कि स्थिरता बनी रहे। वैसे बस का आसन सर्वोत्तम लगता है क्योंकि इसमें हल्के झटके या कंपन लगते रहने से शरीर की सूक्ष्म मालिश होती रहती है जिससे इसमें जकड़न नहीं होती, और न ही टांगें वगैरह सुन्न जैसी होती हैं। इस दौरान एक गहरी शांति, हल्कापन और सुकून अनुभव होता है। किसी भी गतिविधि की जीवनचर्या के साथ आदमी केवल कुंभक के स्तर तक पहुंच सकता है —बल्कि, कठिन कार्य के बाद विश्राम की अवस्था में यह और अधिक लगता है, जिससे सबकुछ सहज महसूस होता है, मानो केवल ध्यान ही हो रहा हो। यद्यपि दैनिक गतिविधि के दौरान शरीरविज्ञान दर्शन पर विचार करने से ध्यान लगने में सहायता मिलती है। केवल कुम्भक इस सहायता को और बढ़ाता है। काम जितना ज्यादा चुनौतीपूर्ण होता है, यह सहायता भी उतनी ही ज्यादा मिलती है।

समय के साथ, ध्यान का चित्र ‘मैं’ का स्थान लेने लगा है। मेरी दस सेकंड की आत्मबोध की झलक में, यह चित्र पूरी तरह मुझसे और इस संसार से एक हो गया था। अब, यह स्थिरता की ओर एक सेतु जैसा कार्य करता है। यह पूरी तरह विलीन होगा या एक सहारा बना रहेगा, यह अज्ञात है—यह प्रक्रिया स्वयं अपना मार्ग तय कर रही है। कोई प्रयास नहीं, कोई संघर्ष नहीं, बस स्वाभाविक प्रवाह।

जिज्ञासा कभी समाप्त नहीं होती। खोज का आनंद, इसे साझा करने की प्रेरणा और लेखन की कला इन अनुभवों को और अधिक स्पष्ट करने में सहायक होती है। सादगी ही मूल तत्व है—सत्य को कम शब्दों में व्यक्त करना ही उसकी गहराई को बनाए रखता है। अंततः, यह जानना महत्वपूर्ण नहीं कि यह यात्रा कहाँ ले जाएगी, बल्कि इसे क्षण-प्रतिक्षण घटित होने देना ही वास्तविक साधना है।

Kundalini and Keval Kumbhaka: When Prana becomes stable, that is the true Asana

In Yoga it is said that Siddhasana, Padmasana or other stable asanas are the best for meditation and Kumbhaka. But when keval Kumbhaka happens, any place—be it a bus seat or an office chair—becomes the best asana.

The Secret of Asana: The Play of Prana, Not the Body

In Yoga, Asana is defined as stability and comfort (Sthirasukhmasanaam). But here an amazing experience is unfolding—
If only Kumbhaka happens naturally, the body becomes stable automatically.
Then the place of sitting does not matter—because both the mind and the body do not even think of moving.
This means that the “best asana” is the one where Prana withdraws automatically within.

Is Siddhasana not necessary?

Siddhasana is said to be the best in Yoga because—
It keeps the spine straight. Makes the energy flow smoothly from Muladhara to Sahasrara.

Helps in meditation and Kumbhaka.

But if one enters into Keval Kumbhaka, there is no difference between Siddhasana and a bus seat! Because in that state— ✅ The body becomes stable automatically. ✅ The mind becomes calm. ✅ No external movement is felt.

Is Asana not important?

No, Asana is still important, especially in the initial stages. ✅ The right Asana makes it easier for Keval Kumbhaka to happen. ✅ It keeps the energy balanced. ✅ It does not allow extra tension in the body.

But once Keval Kumbhaka starts happening naturally, then the position of the body is not so much of a hindrance.

Slight adjustments during Keval Kumbhaka

When Keval Kumbhaka happens, slight body adjustments do not affect it much. This is possible because—

Now Kumbhaka is happening not just with the body, but with the prana getting confined within.
As long as the depth of prana is maintained, slight movement of the body does not break the kumbhaka.

What adjustments can be made?

✔ Slight adjustment of the hand or foot. ✔ Slight straightening or loosening of the spine. ✔ Slight relaxation of the head or neck.

When can this kumbhaka be broken?

❌ If one stands up suddenly or jolts too much. ❌ If the attention is completely diverted to the external world. ❌ If there is too much discomfort in the body and the mind gets stuck there.

Conclusion

“Kewal Kumbhak” is no longer dependent on the position of the body, but on the prana being stable within. So slight adjustments of the body do not disrupt it much.

Whether the body is stable or not, when the prana is stable—that is true kumbhaka!

कुंडलिनी और केवल कुंभक: जब प्राण स्थिर हो जाए, वही सच्चा आसन है

योग में कहा जाता है कि सिद्धासन, पद्मासन या अन्य स्थिर आसन ध्यान और कुंभक के लिए सर्वोत्तम हैं। लेकिन जब केवल कुंभक घटित होता है, तब कोई भी स्थान—चाहे वह बस की सीट हो या ऑफिस की कुर्सी—सर्वश्रेष्ठ आसन बन जाता है।

आसन का रहस्य: शरीर नहीं, बल्कि प्राण का खेल

योग में आसन को स्थिरता और सुविधा (स्थिरसुखमासनम्) के रूप में परिभाषित किया गया है। लेकिन यहाँ एक अद्भुत अनुभव सामने आ रहा है—

अगर केवल कुंभक स्वाभाविक रूप से घटित हो जाए, तो शरीर अपने-आप स्थिर हो जाता है।

तब बैठने की जगह कोई मायने नहीं रखती—क्योंकि मन और शरीर दोनों को हिलने का ख्याल ही नहीं आता।

इसका मतलब यह हुआ कि “सबसे श्रेष्ठ आसन” वही है, जहाँ प्राण अपने-आप भीतर सिमट जाए।

क्या सिद्धासन आवश्यक नहीं?

सिद्धासन को योग में सर्वश्रेष्ठ बताया गया है क्योंकि—

यह मेरुदंड को सीधा रखता है।

मूलाधार से सहस्रार तक ऊर्जा को सहज प्रवाहित करता है।

ध्यान और कुंभक में सहायक होता है।

लेकिन यदि कोई केवल कुंभक में प्रविष्ट हो जाए, तो सिद्धासन और बस की सीट में कोई अंतर नहीं रहता! क्योंकि उस अवस्था में— ✅ शरीर अपने-आप स्थिर हो जाता है। ✅ मन शांत हो जाता है। ✅ कोई बाहरी हलचल महसूस ही नहीं होती।

क्या आसन का कोई महत्व नहीं?

नहीं, आसन अभी भी महत्वपूर्ण है, खासकर प्रारंभिक अवस्था में। ✅ सही आसन से केवल कुंभक घटित होने में आसानी होती है। ✅ यह ऊर्जा को संतुलित बनाए रखता है। ✅ शरीर में अतिरिक्त तनाव नहीं आने देता।

लेकिन एक बार जब केवल कुंभक सहज रूप से घटने लगता है, तब शरीर की स्थिति उतनी बाधा नहीं बनती।

केवल कुंभक के दौरान हल्का समायोजन

जब केवल कुंभक घटित होता है, तो हल्का-फुल्का शरीर समायोजन उसे ज्यादा प्रभावित नहीं करता। यह इसलिए संभव है क्योंकि—

अब कुंभक सिर्फ शरीर से नहीं, बल्कि प्राण के भीतर सिमट जाने से हो रहा है।

जब तक प्राण की गहराई बनी रहे, शरीर का हल्का-सा हिलना कुंभक को नहीं तोड़ता।

कैसा समायोजन किया जा सकता है?

✔ हल्का हाथ या पैर समायोजित करना। ✔ रीढ़ को थोड़ा सीधा या ढीला करना। ✔ सिर या गर्दन को थोड़ा आराम देना।

कब यह कुंभक टूट सकता है?

❌ अगर कोई अचानक से खड़ा हो जाए या ज्यादा झटका लगे। ❌ अगर ध्यान पूरी तरह बाहरी दुनिया में चला जाए। ❌ अगर शरीर में बहुत ज्यादा असुविधा आ जाए और मन वहीं अटक जाए।

निष्कर्ष

“केवल कुंभक” अब सिर्फ शरीर की स्थिति पर निर्भर नहीं है, बल्कि प्राण के भीतर स्थिर होने पर निर्भर है। इसलिए हल्की-फुल्की शरीर की समायोजन करने से यह ज्यादा बाधित नहीं होता।

शरीर स्थिर हो या न हो, जब प्राण स्थिर हो जाए—वही सच्चा कुंभक है!

Kundalini & Spontaneous Breathlessness: A Hidden Reality

I never expected breath to stop effortlessly—not in deep meditation, but in ordinary moments. Sitting in a bus, resting after exhaustion, or gently gazing at Kutastha (the space between the eyebrows), breath would become still on its own.

At first, it was puzzling. But over time, I realized—this wasn’t forced breath retention (Kumbhaka). It was the natural outcome of prana turning inward.

Kevala Kumbhaka: Breathlessness Without Effort

Breath stopping involuntarily felt strange yet peaceful. It happened under two common conditions:

A light awareness of Kutastha.

Not intense concentration, just a subtle noticing.

Almost instantly, breath would slow and then stop.

Deep relaxation after exhaustion or stress.

After heavy mental or physical effort, when the body let go, breath would naturally suspend.

What struck me was that this wasn’t limited to meditation. It happened in everyday life when prana was drawn inward.

Prana, Not Mind, Leads This Process

Initially, I believed deep stillness of mind caused this phenomenon. But observation showed something else—mental activity subsided in response to prana internalizing, not the other way around.

This changed my understanding of breath control. It’s not breath suppression that produces stillness, but rather the gathering of prana inward that results in spontaneous breath suspension.

Why Daily Pranayama Makes This Happen More Often

A regular Pranayama practice enhances this natural occurrence. The reasons are clear:

Prana detaches from breath.

Normally, prana moves with inhalation and exhalation.

With daily Pranayama, prana becomes more self-sustained, making the body less dependent on constant breathing.

The breath follows prana, not the other way around.

As prana withdraws inward, breath naturally slows or stops. Inward means as it detaches from external breathing movements.

This happens in meditation but can also happen in daily activities.

Breathlessness becomes spontaneous.

Instead of being a forced practice, Kevala Kumbhaka starts occurring effortlessly.

This is why those practicing Pranayama regularly notice breath suspension happening more frequently, even outside meditation.

A Direct Experience: How It Happens Naturally

If you want to observe this process within yourself, try this:

After a long day, sit comfortably and let the body relax. I also feel after early morning meditation the chance of keval kumbhak in the day time increases.

Avoid controlling breath, simply allow stillness to settle. Soham can be chanted with light awareness of breath.

Gently bring awareness to Kutastha without strain.

Notice how breath slows and may even stop without effort.

For some, this might happen instantly. For others, it may take time. But once it begins, you realize—breath stops not by force, but as a result of prana shifting inward.

Final Insight: A New Perspective on Breathlessness

Kevala Kumbhaka is not just a result of intense meditation or willful control. It is a natural state when prana withdraws.

It becomes more frequent with regular Pranayama.

It happens when the body and mind are deeply relaxed.

It is not something to force, but something to allow.

When breath stops effortlessly, it reveals a deeper reality—prana, not breath, is the true force of life.

कुंडलिनी और सहज श्वास रुकना: एक छिपा हुआ रहस्य

श्वास बिना किसी प्रयास के अपने-आप रुक जाए—पहले तो यकीन नहीं हुआ। और वो भी सिर्फ गहरी साधना में नहीं, बल्कि बस में बैठे-बैठे, थकान के बाद आराम करते हुए या बस कूटस्थ (भृकुटि केंद्र) पर हल्का ध्यान रखने से!

पहले तो समझ नहीं आया कि ये क्या हो रहा है। पर धीरे-धीरे एहसास हुआ—ये कोई साधारण सांस रोकने की क्रिया (कुंभक) नहीं, बल्कि प्राण के भीतर सिमटने का स्वाभाविक नतीजा था।

केवल कुंभक: बिना किसी प्रयास के श्वास का थम जाना

यह अनुभूति बड़ी ही विचित्र थी, पर भीतर गहरी शांति का एहसास देती थी। मैंने गौर किया कि यह दो स्थितियों में अधिक होता है—

जब ध्यान हल्के से कूटस्थ (आज्ञा चक्र) पर टिकता है।

ज़्यादा जोर नहीं, बस सहज जागरूकता।

और फिर एकदम से श्वास धीमी पड़ जाती है या रुक जाती है।

जब बहुत अधिक थकान या मानसिक तनाव के बाद शरीर पूरी तरह ढीला छोड़ दिया जाता है।

जैसे ही मन और शरीर गहराई से विश्राम में जाता है, बिना किसी प्रयास के श्वास ठहर जाती है।

ध्यान देने वाली बात यह थी कि यह सिर्फ साधना तक सीमित नहीं था। यह तब भी हो रहा था जब मैं कोई विशेष योग नहीं कर रहा था।

श्वास नहीं, प्राण मुख्य भूमिका निभा रहा है

पहले मैं सोचता था कि मन का शांत होना ही इसका कारण है। लेकिन ध्यान से देखने पर महसूस हुआ कि असल में यह प्राण के भीतर सिमटने से हो रहा है, और मन की शांति इसका परिणाम है।

यानी, श्वास को जबरदस्ती रोकने से ध्यान गहरा नहीं होता, बल्कि जब प्राण भीतर खिंचता है, तब श्वास अपने-आप रुक जाती है।

नियमित प्राणायाम से यह अनुभव अधिक क्यों होता है?

जो लोग रोज़ प्राणायाम करते हैं, उनमें यह अनुभव जल्दी और अधिक बार होता है। कारण साफ़ है—

प्राण श्वास से अलग होना सीख जाता है।

सामान्यतः प्राण, श्वास के साथ अंदर-बाहर चलता है। मतलब श्वास के अंदर बाहर चलने के साथ प्राण शरीर में खासकर पीठ में ऊपर नीचे जाता रहता है।

लेकिन जब प्राणायाम नियमित रूप से किया जाता है, तो प्राण अधिक स्वतंत्र हो जाता है और शरीर को निरंतर सांस लेने की आवश्यकता कम होने लगती है।

दरअसल श्वास, प्राण के पीछे चलती है, न कि प्राण श्वास के पीछे। यह आश्चर्यजनक है। प्राण का खिंचाव सांस को चलाता है न कि इसका उल्टा।

जैसे-जैसे प्राण भीतर खिंचता है, श्वास स्वाभाविक रूप से धीमी या स्थिर हो जाती है। भीतर खींचता है मतलब शरीर के अन्दर खुद ही ऊपर नीचे चलने लगता है और चलने के लिए बाहरी श्वास पर निर्भर नहीं रहता।

श्वास का रुकना सहज हो जाता है।

इसे जबरदस्ती नहीं करना पड़ता, यह अपने-आप घटित होता है।

इसीलिए जो लोग नियमित प्राणायाम करते हैं, वे पाते हैं कि साधारण परिस्थितियों में भी उनकी श्वास अपने-आप रुक जाती है।

इस अनुभव को स्वयं कैसे महसूस करें?

अगर आप इसे खुद अनुभव करना चाहते हैं, तो इन सरल चीजों को आज़माएँ—

थकान के बाद किसी शांत जगह बैठें और शरीर को पूरी तरह ढीला छोड़ दें।

श्वास को न रोकें, न ही उस पर ध्यान दें—बस सहज रहें। वैसे सोहम जाप के साथ हल्का ध्यान दे भी सकते हैं। कई बार तो इससे फायदा ही होता है।

मुझे यह भी लगता है कि अगर सुबह जल्दी उठकर साधना की जाए तो दिन में केवल कुंभक लगने की संभावना बढ़ जाती है।

हल्की जागरूकता कूटस्थ (भृकुटि केंद्र) पर रखें, बिना किसी दबाव के।

ध्यान दें कि श्वास अपने-आप धीमी हो रही है या थम रही है।

शुरुआत में यह अनुभव क्षणिक हो सकता है, लेकिन जैसे-जैसे अभ्यास बढ़ता है, यह अधिक स्वाभाविक हो जाता है। और फिर आपको समझ आता है—श्वास का रुकना कोई साधन नहीं, बल्कि प्राण की गहरी अवस्था का संकेत है।

अंतिम समझ: सहज कुंभक की नई दृष्टि

केवल कुंभक को अब मैं एक अलग दृष्टि से देखता हूँ।

यह केवल गहरी साधना या जबरदस्ती की गई क्रिया नहीं है।

यह तब होता है जब प्राण भीतर लौटता है।

यह अधिक बार उन्हीं के साथ घटित होता है जो नियमित रूप से प्राणायाम करते हैं।

यह कुछ ज़बरदस्ती करने से नहीं, बल्कि सहज होने से प्रकट होता है।

जब यह सहज रूप से घटित होता है, तो यह एक गहरी सच्चाई को उजागर करता है—शरीर को जीवित रखने वाली असली शक्ति श्वास नहीं, बल्कि प्राण है।

कुंडलिनी और शरीरविज्ञान दर्शन – जागरण की होलोग्राफिक हकीकत

हाल ही में मैंने ध्यान और चेतना को लेकर कुछ ऐसा महसूस किया जिसने मेरी पूरी समझ ही बदल दी। पहले मैं सोचता था कि ध्यान का मतलब है विचारों को मिटा देना, लेकिन फिर अहसास हुआ—ध्यान विचारों को मिटाता नहीं, बल्कि उन्हें खोलता है, जैसे कोई फूल खिलता है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण? जब हम ध्यान से बाहर आते हैं, तो वही पुराने विचार वहीं के वहीं होते हैं, जैसे पहले थे। इसका मतलब यह हुआ कि ध्यान का रहस्य विचारों को खत्म करने में नहीं, बल्कि उन्हें संपूर्ण चेतना से जोड़ने और फैला देने में है।

फिर एक और गहरी बात समझ आई—संपूर्ण ब्रह्मांडीय चेतना ही सिकुड़कर विचारों में सिमट जाती है। जब हम गहरे ध्यान में जाते हैं, तो यह चेतना फैलती है। लेकिन फिर एक झटके से यह वापस सिमटने लगती है। अगर कोई व्यक्ति निराकार चेतना (निर्विकल्प अवस्था) तक भी पहुँच जाए, तो यह सिमटाव उसे धीरे-धीरे वापस खींच लाता है। गहरे ध्यान के कुछ महीनों तक चेतना विस्तारित रहती है, रचनात्मकता बढ़ जाती है, और विचार कमजोर पड़ जाते हैं, जैसे कि वे ब्रह्मांडीय चेतना में घुल रहे हों। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता है, विचार फिर से स्पष्ट और मजबूत होने लगते हैं। चेतना जितनी संकुचित होती जाती है, मन उतना ही भारी और अंधकारमय लगता है।

अगर कोई ध्यान पूरी तरह छोड़ दे, तो तीन साल में मन अपनी पुरानी अवस्था में लौट आता है। लेकिन अगर रोज़ थोड़ा-बहुत भी ध्यान किया जाए, तो यह विस्तार स्थायी बना रहता है, भले ही हल्के रूप में। और फिर एक और गहरी बात समझ आई—अगर ध्यान बिना किसी रुकावट के लगातार चलता रहे, तो चेतना स्थायी रूप से विस्तारित हो सकती है।

इस ब्रह्मांड को मस्तिष्क में महसूस करवाने वाली शक्ति ही कुंडलिनी है। क्योंकि इस शक्ति का स्वभाव सांप की तरह सिकुड़कर या कुंडल बना कर मूलाधार रूपी अंधेरे बिल की तरफ जाना है, इसलिए इसे दिव्य नागिन भी कहते हैं। कुंडलिनी शक्ति का शाब्दिक अर्थ है, कुंडल बनाने वाली शक्ति। फन उठाकर सीधी खड़ी तो यह जागृति के थोड़े ही क्षणों के लिए रहती है। उसके बाद यह वापिस लौटना शुरु कर देती है।

शरीरविज्ञान दर्शन – शरीर का होलोग्राफिक विज्ञान

फिर मुझे शरीरविज्ञान दर्शन के बारे में पता चला—तंत्र का एक अद्भुत विज्ञान, जो कुछ ऐसा समझाता है जो दिमाग हिला देने वाला है।

बाहर जो कुछ भी है, वह सब शरीर के अंदर भी है। यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक सत्य है।

यहीं से “होलोग्राफिक सिद्धांत” की समझ आती है।

जिस तरह एक होलोग्राम के हर छोटे हिस्से में पूरी तस्वीर छुपी होती है, ठीक उसी तरह, हमारा शरीर भी पूरे ब्रह्मांड का एक लघु-संस्करण (मिनीचर यूनिवर्स) है। ग्रह-नक्षत्र, सूर्य, समाज, भावनाएँ—सब कुछ शरीर के अंदर ही मौजूद है।

पहले यह बात अविश्वसनीय लगी, लेकिन जब मैंने खुद इस पर ध्यान दिया, तो यह सच निकला।

एक दिन मैंने बस अपने हाथ की तरफ देखा—और तुरंत भीतर एक अनोखी शांति और जागरूकता का अनुभव हुआ।

फिर मन में विचार आया—क्या जो कुछ भी बाहर हो रहा है, वह वास्तव में इसी शरीर के अंदर नहीं हो रहा?

यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि हकीकत है। यह अहसास इतना शक्तिशाली है कि तुरंत चेतना को ऊँचे स्तर पर पहुँचा देता है। इसे समझने के लिए किसी लंबी साधना की जरूरत नहीं, बस एक बार इसे जान लेना ही काफ़ी है।

कोई प्रयास नहीं—सिर्फ जानना और स्वीकार करना ही काफ़ी है

सबसे चौंकाने वाली बात? चेतना को ऊपर उठाने के लिए कोई प्रयास करने की जरूरत ही नहीं!

यह बाकी आध्यात्मिक मार्गों की तरह नहीं, जहाँ सालों-साल कठिन साधना करनी पड़ती है।

बस एक बार इस सत्य को जान लो—यही काफ़ी है।

हाँ, समय के साथ यह समझ और गहरी होती जाती है, लेकिन सबसे खास बात यह है कि यह जीवन को छोड़ने की बजाय उसे और अधिक आनंदमय बना देती है। नौकरी, रिश्ते, सुख—सब कुछ गहरा और अर्थपूर्ण हो जाता है।

पुरानी आध्यात्मिक धारणाओं में अक्सर ध्यान और साधना को विरक्ति और संन्यास से जोड़ दिया जाता है, लेकिन यह मार्ग अलग है। यह साधना जीवन से भागने के लिए नहीं, बल्कि जीवन को पूरी तरह जीने के लिए है।

कुंडलिनी और उच्च तंत्र खुद खोजते हैं साधक को

जब यह समझ और गहरी हुई, तो एक और अद्भुत चीज़ हुई। कुछ विशेष तांत्रिक साधनाएँ अपने-आप मेरे पास आने लगीं।

मैंने इन्हें खोजा नहीं था, बल्कि ऐसा लगने लगा जैसे वे मुझे खोज रही थीं।

कुंडलिनी स्वयं उन लोगों की तलाश करती है, जो इसके लिए तैयार होते हैं।

लेकिन इसके साथ एक चेतावनी भी आई—यदि कोई व्यक्ति बिना तैयारी के बाएँ हाथ के तंत्र (वाम मार्ग) में चला जाए, तो यह नुकसानदायक हो सकता है। यह किताब इस बारे में विस्तार से बताती है कि शरीर ही सबसे बड़ा मंदिर है, और आत्मबोध स्वाभाविक रूप से, बिना किसी ज़बरदस्ती के, खिलता है।

दाएँ हाथ का तंत्र (दक्षिण मार्ग) सुरक्षित है, लेकिन बाएँ हाथ का तंत्र (वाम मार्ग) केवल उन्हीं के लिए है जो भीतर से पूरी तरह तैयार हैं।

अगर इसे जबरदस्ती किया जाए, तो यह नुकसान पहुँचा सकता है। यह कोई खेल नहीं, बल्कि गहरी समझ और परिपक्वता की माँग करता है।

शरीर के भीतर छुपा अनंत ब्रह्मांड

इस दर्शन का सबसे अद्भुत पहलू यह है कि यह जीवन के हर पहलू को समाहित करता है।

पुराने आध्यात्मिक मार्ग जीवन और मुक्ति को अलग-अलग कर देते हैं। लेकिन शरीरविज्ञान दर्शन दिखाता है कि जीवन, आनंद, प्रेम, कर्तव्य—सब एक ही साधना का हिस्सा हैं।

त्यागने की जरूरत नहीं।

अगर पूरा ब्रह्मांड शरीर के भीतर ही मौजूद है, तो फिर बाहर कुछ छोड़ने की जरूरत ही क्या है?

प्रबोधन (Awakening) का मतलब भाग जाना नहीं—बल्कि यह जानना है कि सबकुछ पहले से ही अंदर मौजूद है।

यही कारण है कि सिर्फ हाथ की ओर देखने से भी चेतना में तुरंत बदलाव आ सकता है।

क्यों?

क्योंकि हाथ में पूरा ब्रह्मांड समाया हुआ है।

यह कोई रूपक (Metaphor) नहीं, बल्कि एक वास्तविक वैज्ञानिक सत्य है।

सिद्धांत नहीं, सीधा अनुभव

जो इस मार्ग को बाकी सभी से अलग बनाता है, वह यह है कि यह तुरंत प्रभाव देता है।

कोई वर्षों की प्रतीक्षा नहीं, कोई कठिन साधना नहीं।

बस एक सीधा अहसास—कि शरीर ही संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतिबिंब है।

ब्रह्मांड बाहर नहीं—वह अंदर है।

ग्रह-नक्षत्र, सूर्य, लोग, भावनाएँ—सब कुछ इसी शरीर के भीतर हो रहा है।

और जब यह सत्य समझ में आता है, तो जीवन आसान हो जाता है।

ध्यान अब कोई ‘क्रिया’ नहीं रह जाता, बल्कि एक सहज प्रक्रिया बन जाता है।

सिर्फ हाथ की ओर एक नजर डालने से भी यह याद आ जाता है कि—सब कुछ भीतर ही है।

और यह अहसास तुरंत शांति और ब्रह्मांडीय चेतना से जोड़ देता है।

यह मार्ग कहाँ ले जाता है?

यह ज्ञान केवल दिमाग में नहीं रहता, बल्कि जीवन को पूरी तरह बदल देता है।

मन विस्तारित हो जाता है, रचनात्मकता बढ़ जाती है, भावनाएँ स्थिर हो जाती हैं, और जीवन पहले से अधिक समृद्ध हो जाता है।

और जब समय सही होता है, तो उच्च तांत्रिक साधनाएँ अपने-आप सामने आ जाती हैं।

लेकिन जबरदस्ती कुछ भी नहीं होता। चेतना खुद सही मार्ग दिखाने लगती है।

लेकिन जल्दबाजी खतरनाक हो सकती है।

यह किताब साफ़ बताती है—हर चीज़ के लिए सही समय होता है।

अगर कोई बिना तैयारी के आगे बढ़े, तो उसे नुकसान हो सकता है। लेकिन जो सच में तैयार होते हैं, उनके लिए मार्ग खुद-ब-खुद खुल जाता है।

अंतिम सत्य – जागरण का नया मार्ग

अब मुझे यकीन हो गया है कि पुरानी आध्यात्मिक धारणाओं को बदलने की जरूरत है।

संघर्ष की कोई जरूरत नहीं।

जागरण का मतलब जीवन से भागना नहीं, बल्कि उसे पूरी तरह जीना है—गहरी समझ के साथ।

और सबसे बड़ा रहस्य?

शरीर ही कुंजी है।

शरीर ही ब्रह्मांड का होलोग्राम है।

सब कुछ बाहर नहीं, भीतर ही है।

और एक बार यह जान लिया, तो कुछ भी पहले जैसा नहीं रहता।

Kundalini and Sharirvigyan Darshan – The Holographic Reality of Awakening

Lately, I’ve been reflecting deeply on something that has completely changed my understanding of meditation and consciousness. I used to think that meditation dissolves thoughts, but then I realized—it doesn’t dissolve them at all. Instead, it opens them up, like a blossoming flower. The proof? When we exit meditation, all the previously shrunken thoughts are still there, unchanged. This means that the transcendental state isn’t about wiping thoughts away—it’s about keeping everything open, expanded, and connected to the all-pervading consciousness.

Then another realization hit me: Universal consciousness itself is shrunken into thoughts. When we meditate deeply, it expands. But then it tends to recoil back with great force. Even if one touches the Nirvikalpa experience, this recoil effect gradually brings them back, step by step. For the first few months after deep meditation, consciousness remains expanded, and creativity peaks. Thoughts feel weak, almost blending into the universal consciousness. But as time passes, mental processes start becoming more distinct again. The more awareness contracts, the darker the mind appears.

If meditation is completely stopped, in three years, the original state returns. However, if daily meditation is maintained, even for a little time, this expanded awareness remains forever, though in a subtle way. And then I realized something even bigger—continuous meditation without any worldly disturbance can lead to complete stabilization.

Kundalini is the power that makes us feel this universe in our mind. Because the nature of this power is to curl up like a snake and go towards the dark hole of the Muladhara, therefore it is also called the divine serpent. The literal meaning of Kundalini Shakti is the power that coils. It remains standing straight with its hood raised for only a few moments of awakening. After that it starts returning back.

Sharirvigyan Darshan – The Holographic Science of the Body

Then I discovered Sharirvigyan Darshan, a powerful Tantric philosophy that explains something mind-blowing—everything outside exists inside the body, in every detail. It’s not just an idea, but a scientific truth.

This is where the holographic principle comes in.

Just like in a hologram, where every part contains the whole, the human body is a miniature universe. The galaxies, the sun, human societies, emotions—everything is within. At first, it sounded unbelievable. But then I started experimenting. I found that just looking at my own bare hand brought an immediate sense of calmness and transcendental awareness.

And then I thought: Isn’t everything that’s happening outside actually happening inside this very body?

It’s not imagination—it’s real. This realization is so powerful that it instantly shifts consciousness into a higher state. It’s not just theory—it’s something you can verify right now, just by looking at your own hand.

No Effort Needed – Just Knowing and accepting is Enough

The most shocking part? No effort is needed to shift consciousness. It’s not like other spiritual paths that demand years of effort. Just reading the book once and acknowledging its truth is enough.

Of course, like everything, it deepens over time. But the beauty is that worldly life remains fully engaged. Work, relationships, enjoyment—everything becomes richer, not weaker. Unlike traditional meditation, which often leads to detachment and renunciation, this path makes life more fulfilling, more intense, more alive.

Kundalini and Higher Tantra Seek the Seeker

As this realization deepened, something even more incredible happened. Higher Tantric sadhanas started finding me. I wasn’t looking for them, but it felt like they were searching for me. Kundalini itself seeks out those who are ready.

But this also brought a warning—immature or forced practice can be harmful. I realized that Left-hand Tantra, if practiced without readiness, can be dangerous. This book warns about it in detail, explaining how the body itself is the greatest temple, and that enlightenment unfolds naturally, without force. Right-hand Tantra is safe, but Left-hand Tantra requires a deep inner readiness.

And it’s true—deliberate or immature practice can cause harm. This is not something to be forced. It has to happen at the right time.

The Holographic Universe Inside Us

The most fascinating part of this approach is that it integrates everything. Unlike traditional spiritual systems that separate worldly life from enlightenment, Sharirvigyan Darshan shows that everything—work, relationships, pleasure, responsibilities—are all part of the path. There is no need to escape. Awakening happens within life, not outside it.

And the secret behind this? The body is a hologram of the entire cosmos.

If the whole universe is inside, then there is nothing to renounce. Enlightenment isn’t about escaping—it’s about realizing that everything even enlightenment is already inside.

This is why even a simple glance at the hand can instantly shift awareness into transcendence. Why? Because the hand itself contains the entire cosmos. This is not a metaphor—it is an actual, scientific truth.

Beyond Theory – The Direct Path

What makes this different from all other spiritual teachings is that it is immediate. No waiting for years, no complicated practices. Just a direct acknowledgment of reality—that the body contains everything.

The universe is not outside—it is inside. The galaxies, the sun, the people, the emotions—all are happening within this very body. And once this truth is seen, life becomes effortless.

Meditation is no longer about “doing” something. It becomes natural and spontaneous. Even a single look at the hand reminds us that everything is within. And that simple realization brings instant calm, a direct connection to the universal consciousness.

Where This Path Leads

This knowledge doesn’t just stay at an intellectual level. It transforms everything. The mind expands, creativity peaks, emotions stabilize, and worldly life becomes richer.

And when the time is right, higher Tantric sadhanas start revealing themselves. But instead of being forced, they come naturally, as if consciousness itself is guiding the way.

However, it is important to be ready. Some practices, especially in Left-hand Tantra, can be dangerous if done without maturity. This book explains it clearly—there is a right time for everything. Rushing can cause harm, but when the seeker is truly ready, the path opens effortlessly.

Final Realization – A New Way to Awaken

This experience has convinced me that the old way of spirituality needs to change.

There is no need for unnecessary struggle. Awakening does not mean renouncing life—it means living it fully, with deep understanding.

And the greatest secret?

The body is the key.

The body is the hologram of the universe.

Everything outside is already inside.

Once this is realized, there is nothing more to seek.

And once this truth is seen, there is no unseeing it.

Everything changes, forever.

कुंडलिनी, तंत्र और क्रिया: परम आनंद का सबसे तेज़ रास्ता

दोस्तों, कुंडलिनी ऊर्जा रहस्यमयी है। यह आपको परम आनंद तक ले जा सकती है, या फिर इधर-उधर बिखर सकती है। जब मैंने पहली बार अभ्यास शुरू किया, तो मुझे किसी जटिल विधि की परवाह नहीं थी—बस परिणाम चाहिए थे। धीरे-धीरे अनुभव से मैंने देखा कि सिर्फ क्रिया योग की ऊर्जा किसी ठोस दिशा में नहीं जाती जब तक कि उसे किसी गहरी साधना से जोड़ा न जाए।

सिर्फ क्रिया योग क्यों काफ़ी नहीं है?

क्रिया योग को सीधा रास्ता कहा जाता है, लेकिन मैंने अनुभव किया कि अगर ध्यान के लिए कोई स्थिर आधार न हो, तो ऊर्जा सांसारिक बनी रहती है। यह शक्तिशाली लगती है, पर स्थायित्व नहीं आता। जब मैंने क्रिया योग के साथ एक निश्चित ध्यान-प्रतीक जोड़ा, तो सब बदल गया। आनंद ज़्यादा देर तक रहा, मन शांत हुआ और ऊर्जा चारों ओर बिखरने की बजाय ऊपर उठने लगी

पतंजलि के अष्टांग योग से यह अलग क्यों है?

मैंने कई बार सोचा कि क्रिया योग और पतंजलि के धारणा (एकाग्रता), ध्यान (मेडिटेशन) और समाधि (अवस्था) के क्रम में क्या अंतर है। पतंजलि के योग में ये चरण-दर-चरण विकसित होते हैं, लेकिन क्रिया योग में ये तीनों एक साथ घटित होते हैं

जब साँस नियंत्रण में आती है, तो धारणा अपने आप बन जाती है। जब ऊर्जा बहने लगती है, तो ध्यान स्वतः घटित होता है। और जब यह गहराता है, तो समाधि अपने आप आ जाती है। इसमें कोई प्रयास नहीं करना पड़ता, कोई संघर्ष नहीं होता।

मुझे लगता है कि पतंजलि का तरीका उन लोगों के लिए था जो एक अनुशासित मार्ग चाहते थे, लेकिन जब ऊर्जा सही तरीके से प्रवाहित होती है, तो मन को ज़बरदस्ती केंद्रित करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती—यह अपने आप होता है

तंत्र सबसे तेज़ क्यों है?

अगर क्रिया तेज़ है, तो तंत्र वज्र की तरह है। जब मैंने पहली बार तंत्र की साधना की, तो मैं चौंक गया। इसमें दिनों या महीनों का इंतज़ार नहीं होता—यह आपको तुरंत इस संसार से बाहर फेंक देता है

तंत्र के प्रभाव में ऊर्जा पूरी तरह से आज्ञाकारी हो जाती है, जैसे कोई पालतू जानवर जो हर आदेश मानता है। तुरंत आत्मसाक्षात्कार या मोक्ष भी संभव हो सकता है

लेकिन तंत्र की रोज़ाना साधना संभव नहीं है। यह बहुत तीव्र है, भारी है और इसे लंबे समय तक बनाए रखना कठिन होता है। यहीं पर क्रिया योग काम आता है। क्रिया तंत्र की अनुभूति को दिनों तक स्थिर बनाए रखता है, ताकि मन सामान्य जीवन में वापस गिरने से बच सके।

तंत्र रॉकेट की तरह है, और क्रिया उसे कक्षा में स्थिर रखती है।

मेरा अपना क्रिया-कुंडलिनी योग

समय के साथ, मैंने अपना खुद का तरीका विकसित किया। मैं यह करता हूँ:

अनुलोम-विलोम, कपालभाति और दोनों नासिका से प्राणायाम
आसन और प्रत्येक चक्र पर ध्यान
बीज मंत्रों का उच्चारण और रंगों की कल्पना
ध्यान के लिए एक निश्चित प्रतीक
महा बंध ऊर्जा स्थिर करने के लिए
बाह्य और आंतरिक कुम्भक के साथ चक्र ध्यान

मैं ठोकर, योनि मुद्रा, त्रिभंगमुरारी, या महामुद्रा नहीं करता। वैसे अब ठोकर क्रिया करने लगता हूं। जरूरी नहीं कि इसे करते समय ॐ नमो भगवते वासुदेवाय जैसा जटिल मंत्र ही बोला जाए। सीधा ओम भी मन में जप सकते हैं। त्रिभंगमुरारि का मतलब तो रीढ़ की हड्डी के तीन सहज मोड़ हैं, जिनसे होकर शक्ति गुजरती है। इसीलिए पीठ को तख्त की तरह सीधा न रखकर इसके कुदरती आकार में रखा जाता है।

वैसे तो ठोकर और महामुद्रा महाबंध के समय भी हल्के रूप में हो ही जाती हैं। अगर सुबह के चार बजे साधना करो तो योनिमुद्रा भी हल्के रूप में खुद ही हो जाती है। योनिमुद्रा में आंख, कान, नाक और मुंह को उंगलियों से बंद किया जाता है। सुबह के चार बजे न कोई आवाज होती है, न कोई दृश्य। कुंभक प्राणायाम के समय नाक तो खुद ही बंद रहती है। तीन से चार बजे का समय साधना के लिए सर्वोत्तम होता है। उस दौरान समय की कोई कमी नहीं होती। इससे समय की तरफ ध्यान नहीं जाता। इसलिए आदमी निश्चिंत होकर साधना करता है। इसी दौरान केवल कुंभक वाली समाधि लगने की संभावना भी काफी ज्यादा होती है। अनोखा अनुभव होता है। सांस इतनी धीमी हो जाती है कि कई बार पता ही नहीं चलता कि सांस चल भी रही है या नहीं। आसन खुद ही स्थिर लग जाता है। बेशक थोड़ी देर बाद फिर सेट कर लो। सांस थोड़ी देर चलेगी और फिर बंद हो जाएगी। आज्ञा चक्र पर ध्यानचित्र एकसार स्पष्ट महसूस होता है। ऐसा लगता है कि इस चित्र को लगातार बनाए रखने के लिए ऑक्सीजन कहां से आ रही है। कहते हैं कि उस समय रीढ़ की हड्डी में अंदरूनी सांस चल रही होती है। पर रीढ़ की हड्डी में भी ऑक्सीजन कहां से आई। स्थूल विज्ञान भी इसे अभी तक नहीं समझ पाया है। शायद यही प्राण है, जिसे मूलरूप में ऑक्सीजन की जरूरत ही न पड़ती हो। हो सकता है कि सांस लेने का मकसद ऑक्सीजन देना न होकर प्राणों को सीधे गति देना हो। ऑक्सीजन इसमें अतिरिक्त मदद करता हो। हो सकता है कि सांस चलती हुई बेशक महसूस न होए पर सूक्ष्म सांस चल रही हो। हो सकता है कि शारीरिक काम न होने से ऑक्सीजन की मांग शून्य जैसी हो जाती हो। पर सोते समय तो अच्छी सांस चल रही होती है। ये सब अटकलें हैं और इन पर गहरे शोध की जरूरत है। जीवन और मृत्यु का गजब सा मिश्रण होती है वह अवस्था। सांस है भी और नहीं भी। केवल कुंभक क्रियायोग वाली लंबी, गहरी, धीमी और खींचतान वाली 20 या 30 सांसों के बाद लगती है। इन गहरी सांसों के बाद फिर सो~हम मंत्र से सांसों पर ध्यान दो। सांस अंदर जाते हुए सो और बाहर निकलते हुए हम का मन में उच्चारण करो। जैसी सांस चले चलने दो, इससे छेड़छाड़ न करो। कुछ ही देर में सांस धीमी होते होते शून्य सी हो जाएगी। सो~हम जपते रहो चाहे सांस चलने का सिर्फ आभास या चिन्ह ही क्यों न हो। आज्ञा चक्र पर ध्यानचित्र पर ध्यान बना कर रखो। यही केवल कुंभक है। उपरोक्त गहरी सांसें एक मिनट में  लगभग दो तीन ही लग पाती हैं। इससे मूलाधार की ऊर्जा आनंद के साथ ऊपर चढ़ती महसूस होती है। शायद यही सुषुम्ना में सांस या प्राण को चालू करती हैं। केवल कुंभक के गहन अभ्यास से ही योगी लोग कई दिनों तक वायु की कमी वाले स्थानों में जैसे गड्ढे में बंद तहखाने आदि में समाधि लगा कर जिंदा रहते हैं। हालांकि यह भी अंतिम सिद्धि नहीं है। अंतिम सिद्धि तो आत्मज्ञान ही है। बेशक केवल कुंभक दुनियादारी के बीच भी मन को स्थिर, एकाग्र और ज्ञानवान बना कर रखने में मदद करता है। इसे केवल कुंभक इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसमें सांस को बलपूर्वक नहीं रोका जाता। बिना किसी कष्ट के सांस खुद ही रुक जाती है और वह भी बहुत देर तक।

मेरा अनुभव यह कहता है कि सिर्फ क्रिया से ऊर्जा तो जाग्रत होती है, लेकिन बिना किसी ध्यान-प्रतीक के, वह दिशाहीन हो जाती है। जब कोई ध्यान-प्रतीक साथ हो, तो ऊर्जा अधिक आध्यात्मिक और स्थायी हो जाती है

निष्कर्ष

कुंडलिनी सिर्फ ऊर्जा उठाने का खेल नहीं है—यह इस बात पर निर्भर करता है कि ऊर्जा किस ओर प्रवाहित हो रही है

तंत्र आपको तुरंत बाहर फेंकता है, क्रिया इसे स्थिर करती है, और ध्यान-प्रतीक इसे गहराई से आत्मसात करता है। बेशक तंत्र के साथ भी ध्यान आलंबन जरूरी है, तभी उसकी ऊर्जा आध्यात्मिक आयाम के साथ जुड़ पाएगी, अन्यथा दुनियादारी में बिखर जाएगी, जो नुकसान भी कर सकती है।

पतंजलि का मार्ग धीमा और क्रमबद्ध है। क्रिया तेज़ और स्वाभाविक है। तंत्र क्षणिक और तीव्र है। लेकिन जब तंत्र और क्रिया को सही से मिलाया जाए, तो आपको गति और स्थिरता दोनों मिलती हैं—जागरण और स्थायित्व, मुक्ति और संतुलन

तो क्या यह कहना सही होगा कि तंत्र आपको ब्रह्मांड से जोड़ता है और क्रिया इसे स्थायी बना देती है?