दोस्तों हम बात कर रहे थे कि क्रिया और प्रभाव आपस में जुड़े होते हैं। इस परस्पर प्रभाव को शास्त्रीय दर्शनों में अक्सर कार्य कारण संबंध परंपरा कहा जाता है। जीवात्मा क्रिया से प्रभाव पैदा करती है और परमात्मा प्रभाव से क्रिया पैदा करते हैं। इसको ऐसे समझते हैं। जीव अपने शरीर की क्रियाशीलता से चेतना का आनंद प्राप्त करता है। पर परमात्मा पहले ही चेतना से भरपूर है इसलिए उससे शरीर की क्रिया खुद ही होती रहती है। आम शरीर वाली क्रिया नहीं पर सृष्टि रूपी विराट शरीर वाली क्रिया। क्योंकि परमात्मा की चेतना अनंत है इसलिए उसके कारण क्रिया करने वाला उनका शरीर भी अनंत ही होगा। उनकी सांस के रूप में अनंत वायु बहती है। उनकी आंख के रूप में असंख्य सूरज चमकते हैं। उनकी भुजा के रूप में सृष्टि के असंख्य काम होते हैं। उनके पैरों के रूप में सृष्टि के सभी काम एक दूसरे से जुड़े हैं। जैसे आदमी पैरों से चलकर घर से खेत और खेत से घर जाता है। इसलिए उसके घर के और खेत के काम आपस में जुड़े हैं। क्योंकि सारी सृष्टि की सभी क्रियाएं आपस में जुड़ी हैं। इससे यही माना जाएगा कि परमात्मा के असंख्य पैर हैं, जिससे वह हर जगह हर क्षण जा सकते हैं। इसी तरह अगर हम परमात्मा के सारे गुणों का वर्णन करने लग जाएं, तो एक क्या अनगिनत पुस्तकें छप जाएंगी? यह शास्त्रों में पहले से ही बहुत है। यहां मुख्य प्रश्न है कि शरीर रहित जीवात्मा या सूक्ष्म शरीर स्थूल शरीर वाले सभी काम कैसे करता है?
बेशक सूक्ष्म शरीर सूक्ष्म रूप में सभी काम करता है पर करता कैसे हैं? यहां भी शायद क्रिया प्रभाव वाली कहानी ही जमेगी। एक अमुक शरीर ने शुरु से लेकर जो जो क्रियाएं की होती हैं, वे सभी उसकी आत्मा पर अंधकार की छांव के रूप में दर्ज हो जाती हैं। मतलब उसकी उन क्रियाओं का प्रभाव उसके जीवन काल में उसे चेतना के रूप में मिलता गया। पर मृत्यु के बाद वह उसकी आत्मा में अचेतनता के रूप में दर्ज होता गया। चेतनता और अचेतनता दोनों एक दूसरे के सापेक्ष हैं। जीव में ये दोनों एक दूसरे से जुड़े होते हैं। पर परमात्मा में निरपेक्ष चेतना होती है, क्योंकि वह किसी भौतिक पदार्थ के आश्रित नहीं होती। जीव की चेतना उसके भौतिक शरीर के आश्रित होती है। इससे जब उसका शरीर नष्ट होता है तब उसकी चेतना भी नष्ट हो जाती है। वैसे चेतना कभी नष्ट नहीं होती बल्कि वह उसके सूक्ष्म शरीर में अचेतनता के रूप में एनकोडिड अर्थात दर्ज होती रहती है। इसका मतलब है कि उसका सूक्ष्म शरीर अचेतनता से बना है। हालांकि यह अचेतनता उतनी ही है जितनी उसकी चेतनता होती थी। उसकी चेतनता का सारा डाटा उसकी अचेतनता में दर्ज रहता है। शायद कर्म फल इसी वजह से मिलता है। जैसे रात से दिन और दिन से रात बनते रहते हैं, वैसे ही जीवात्मा की चेतनता और अचेतनता एक दूसरे को क्रमवार बनाते रहते हैं।
अब हम क्रिया और प्रभाव के परस्पर संबंध पर पुनः चलते हैं। जीवात्मा में परमात्मा की तरह चेतना रूपी प्रभाव असीमित नहीं है। जीवात्मा में यह प्रभाव सीमित होता है, इसलिए इससे क्रिया भी सीमित ही होगी। क्योंकि शरीर रहित जीवात्मा में प्रभाव शरीर युक्त जीवात्मा का उल्टा होगा इसलिए किया अभी उलट ही होगी। उलट का मतलब यह नहीं कि उलटे काम होते रहेंगे बल्कि यह कि वे काम छाप या सूक्ष्म रूप में होंगे। इसलिए स्थूल रूप में शरीर युक्त आत्मा जो कुछ सोचता था उससे उसकी चेतना बढ़ी। वह चेतना उसकी आत्मा में दर्ज होगी। उस दर्ज सूचना से उसे अपनी शरीररहित अवस्था में अपने द्वारा सोचने का अनुभव होगा। हालांकि वैसा अनुभव नहीं जैसा जीवित शरीर करता था बल्कि सूक्ष्म व तरंगरहित या अपरिवर्तनीय रूप में। यह उसके सूक्ष्म शरीर का मन हो गया। जीव आत्मा शरीर में रहते हुए जो बुद्धि से निर्णय लेता था, उनसे भी उसकी चेतना बढ़ी। वह भी उसकी आत्मा में दर्ज होगी। उस दर्ज सूचना से उसे मृत्यु के बाद अपने द्वारा निर्णय लेने का अनुभव होगा। हालांकि वैसा नहीं जैसा उसका जीवित शरीर करता था बल्कि सूक्ष्म व तरंगरहित या अपरिवर्तनीय रूप का अनुभव। यह उसके सूक्ष्म शरीर की बुद्धि होगी। शरीर युक्त आत्मा जो अहम भाव अनुभव करता था, उससे उसकी चेतना बढ़ी। वह चेतना उसकी आत्मा में सूक्ष्म रूप में दर्ज होगी अर्थात समकक्ष अचेतनता के रूप में दर्ज होगी। उस दर्ज सूचना से उसे अपने अहम भाव का अनुभव होगा। हालांकि वैसा अनुभव नहीं जैसा उसका जीवित शरीर करता था, बल्कि सूक्ष्म या तरंगरहित या अपरिवर्तनीय रूप में। जब शरीर नहीं है, तब तरंग तो बन ही नहीं सकती। शरीरयुक्त आत्मा जो कर्मेंद्रियों के द्वारा किए गए कामों को अनुभव करता था, उससे उसकी चेतना बढ़ी। वह जितनी थी उतनी ही उसकी आत्मा में सूक्ष्म रूप में दर्ज हो गई। उस दर्ज सूचना से उसे अपनी कर्मेंद्रियों वाला अनुभव मिलेगा। हालांकि वैसा अनुभव नहीं जैसा उसका जीवित शरीर करता था, बल्कि सूक्ष्म और तरंगरहित या अपरिवर्तनीय रूप में। शरीरयुक्त आत्मा जो ज्ञानेंद्रियों के द्वारा किए गए कामों को अनुभव करता था, उनसे उसकी चेतना बढ़ी। वह चेतना उसकी आत्मा में सूक्ष्म रूप में दर्ज होगी। उस दर्ज सूचना से उसे अपनी ज्ञानेंद्रियों वाला अनुभव मिलेगा। हालांकि वैसा नहीं जैसा उसका जीवित शेर करता था बल्कि सूक्ष्म और तरंगरहित या अपरिवर्तनीय रूप में। शरीरयुक्त आत्मा जो अपने अंदर पांचों प्राणों को अनुभव करता था, उससे उसकी चेतना बढ़ी। वह चेतना भी उसकी आत्मा में सूक्ष्म रूप में दर्ज हो गई। उस दर्ज सूचना से उसे अपने प्राणों वाला या सांस लेने वाला अनुभव मिलेगा। हालांकि वैसा नहीं जैसा उसका जीवित शरीर अनुभव करता था, बल्कि सूक्ष्म और तरंगरहित या अपरिवर्तनीय रूप में। इस तरह से जीवात्मा का पूरा सूक्ष्म शरीर बन जाता है। यह पूरी तरह से उसके सबसे नजदीकी स्थूल शरीर के जैसा ही होता है, क्योंकि उसका प्रभाव सबसे ज्यादा होता है। वैसे तो जीव आत्मा ने अनगिनत योनियों में जन्म लिया होता है। इसीलिए आत्मा को मरने के बाद भी अपने परिवर्तनरहित और तरंगरहित अंधेरे में अपने सबसे नजदीकी शरीर का अनुभव होता रहता है। उसे लगता ही नहीं कि वह नष्ट हो गया है या उसकी मृत्यु हो गई है। इस सूक्ष्म शरीर को पूरी तरह से डिकोड करने का तरीका केवल कुंडलिनी योग ही है।