योग से शारीरिक वजन को कैसे नियंत्रण में रखें- How to keep control over body weight through Yoga

योग से शारीरिक वजन को कैसे नियंत्रण में रखें (please browse down or click here to view post in English)

योग के साथ शारीरिक वजन घटता है। यहां तक ​​कि मैंने देखा है कि एक दिन के भारी काम के साथ भी मुझे अपनी पेंट के साथ बेल्ट लगाने की जरूरत महसूस होने लगती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मैं दैनिक योग अभ्यास की आदत रखता हूं। जब मैंने कड़ी मेहनत की, तब उसके साथ किए गए नियमित योग-अभ्यास से मेरी भड़की हुई भूख बहुत कम हो गई। इसलिए उस कड़ी मेहनत के साथ हुई वसा-हानि / fat loss को पुनर्निर्मित / recover नहीं किया गया, जिसके परिणामस्वरूप मेरा वजन घट गया। नियमित योग-अभ्यास के बिना सामान्य लोग भारी काम के बाद बहुत अधिक खाते हैं, इस प्रकार वे अपनी खोई हुई वसा का तुरंत पुनर्निर्माण कर लेते हैं। योग-अभ्यास दैनिक और हमेशा के लिए जारी रखा जाना चाहिए। यदि कोई अपना अभ्यास थोड़े समय के लिए जारी रखता है, जैसे कि यदि 2 महीने के लिए कहें, तो उसे अपने शरीर के वजन में कमी का अनुभव होगा। लेकिन अगर वह उसके बाद व्यायाम करना बंद कर देता है, तो उसकी योग से निर्मित शारीरिक व मानसिक शक्ति के पास भूख को उत्तेजित करने के अलावा अन्य कोई काम नहीं रहता है। इसके कारण उसे बहुत भूख लगती है, और वह बहुत भोजन, खासतौर से उच्च ऊर्जा वाले खाद्य पदार्थों को खाता है। इसके परिणामस्वरूप उसके शरीर की वसा का पर्याप्त निर्माण हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप उसके शरीर के वजन में एकाएक वृद्धि होती है, जो उसके पहले के मूल वजन को भी पार कर सकती है। तो निरंतर अभ्यास हमेशा जारी रखा जाना चाहिए। यह एक वैज्ञानिक और अनुभव से साबित तथ्य है कि खिंचाव वाली कसरतों / stretching exercises के अभ्यास से थोड़ी-बहुत कैलोरी जल जाती है। यद्यपि योग के अभ्यास से बड़ी मात्रा में कैलोरी जलाई नहीं जाती है, फिर भी ये अभ्यास शरीर को फिट, स्वस्थ और लचीला रखते हैं। यह किसी भी समय किसी भी प्रकार के साधारण या कठिन शारीरिक कार्य को कामयाबी व आसानी के साथ शुरू करने में मदद करता है, और व्यायामशाला के अभ्यास को भी अधिक कारगर बनाता है। इसके अलावा, यह पूरे शरीर में उचित अनुपात में रक्त के समान परिसंचरण में भी मदद करता है। इससे यह शरीर के रिमोट भंडारगृहों में जमा वसा की आसान निकासी में मदद करता है। उससे सभी कोशिकाओं को ऊर्जा के मुख्य स्रोत के रूप में वसा उपलब्ध हो जाती है। इसलिए शरीर भूख की कमी के लिए ऊर्जा की कमी का संदेश नहीं भेजता है, जिसके परिणामस्वरूप भारी भूख के बावजूद भारी भूख की रोकथाम होती है। परंतु आम लोगों में भारी काम के एकदम बाद भारी भूख भड़क जाती है, जिससे वे अपने खोए हुए वजन की भरपाई एकदम से कर लेते हैं। योग कुछ खास नहीं है, बल्कि भौतिक व्यायाम, सांस लेने और केंद्रित एकाग्रता को बढ़ाने का एक सहक्रियात्मक संयोजन है। फोकसड एकाग्रता / focused concentration इसके लिए विचारों के लिए नियंत्रक वाल्व / controlling valve के रूप में काम करती है, अराजक विचारों की अचानक भीड़ को रोकती है, जिससे इस प्रकार पेरानोइया/ paranoia और दिमाग को झूलने / mind swinging से रोकती है। जब अवचेतन मन में संचित विचार बहुत उत्तेजित हो जाते हैं, तो उन्हें दिमाग के अंदर ध्यान की केंद्रित छवि द्वारा धीरे-धीरे और सुरक्षित रूप से मुक्त करके छोड़ा जाता रहता है। साथ में, उन विचारों को बाँझ और गैर-हानिकारक बना दिया जाता है, या दूसरे शब्दों में कहें तो दृढ़ता से उत्तेजित विचार ध्यान की कुण्डलिनी छवि की कंपनी के कारण स्वयं ही शुद्ध हो जाते हैं। यह छवि दिन-प्रतिदिन की सांसारिक गतिविधियों से उत्पन्न होने वाली अराजक मानसिक गतिविधियों पर भी जांच रखती है। इसके कारण योग-अभ्यास के लिए एक जुनूनी शौक सा उत्पन्न हो जाता है, और इसे दैनिक कार्यक्रम से कभी भी गायब नहीं होने देता है। कुंडलिनी छवि पर केन्द्रित एकाग्रता के बिना योग-अभ्यास के साथ, योग अभ्यास के लिए शौक जल्द ही खो जाता है, और विभिन्न छिपे हुए विचारों की अराजकता की वजह से दैनिक क्रियाकलाप भी गंभीर रूप से पीड़ित हो जाते हैं।

तांत्रिक तकनीक मानसिक कुंडलिनी छवि को मजबूत करने और इस तरह से योग के प्रति लगन को बढ़ाने के लिए एक और गूढ़ चाल है। इसके परिणामस्वरूप पूरे श्वास में वृद्धि होती है, जिससे पूरे शरीर में पोषक तत्वों से समृद्ध और अच्छी तरह से ऑक्सीजनयुक्त रक्त की आपूर्ति में वृद्धि हो जाती है। इससे यह शरीर के वजन पर भी जांच रखता है। दरअसल तंत्र प्राचीन भारतीय आध्यात्मिकता से अलग कोई स्वतंत्र रूप का अनुशासन नहीं है। तभी तो वेद-शास्त्रों में इसका कम ही वर्णन आता है, जिससे इस रहस्य से अनभिज्ञ लोग महान तंत्र की सत्ता को ही नकारने लगते हैं। यह आत्मजागृति की ओर एक प्राकृतिक और सहज दौड़ / प्रक्रिया ही है। यह तो केवल विभिन्न आध्यात्मिक प्रयासों से पुष्ट की गई कुण्डलिनी को जागरण के लिए अंतिम छलांग / escape velocity ही देता है। यदि किसी की बुद्धि के भीतर कोई आध्यात्मिक उद्देश्य और आध्यात्मिक उपलब्धि नहीं है, तो अराजक बाहरी दुनिया के अंदर उपयोग में आ जाने के अलावा तांत्रिक शक्ति के लिए अन्य कोई रास्ता नहीं है। इसका मतलब है कि तांत्रिक तकनीक के लिए आवेदन से पहले कुंडलिनी छवि किसी के दिमाग में पर्याप्त रूप से मजबूत होनी चाहिए। तंत्र तो जागने के लिए कुंडलिनी को आवश्यक और अंतिम भागने की गति ही प्रदान करता है। यह आम बात भी सच है कि गुरु तांत्रिक साधना के साथ अवश्य होना चाहिए। वह गुरु दृढ़ता से चिपकने वाली मानसिक कुंडलिनी छवि के अलावा कुछ विशेष नहीं है। यही कारण है कि बौद्ध-ध्यान में, कई वर्षों के सरल सांद्रता-ध्यान के बाद ही एक योगी को तांत्रिक साधना लेने की अनुमति दी जाती है। लेकिन आज बौद्ध लोग, विषेशतः तिब्बती बुद्ध तंत्र सहित सभी रहस्यों को प्रकट करने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि अब वे लंबे समय से चल रहे बाहरी आक्रमण के कारण अपनी समृद्ध आध्यात्मिक विरासत को खोने से डर रहे हैं।

तंत्र के बारे में विस्तृत जानकारी इस वेबपोस्ट की स्रोत वेबसाईट / source website पर पढ़ी जा सकती है, व पूर्ण जानकारी के लिए निम्नांकित पुस्तक का समर्थन किया जाता है-

शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा), एक अनुपम ई-पुस्तक (हिंदी भाषा में, 5 स्टार प्राप्त, सर्वश्रेष्ठ व सर्वपठनीय उत्कृष्ट / अत्युत्तम / अनौखीरूप में समीक्षित / रिव्यूड ) को यहाँ क्लिक करके डाऊनलोड करें। यदि मुद्रित पुस्तक ही आपके अनुकूल है, तो भी, क्योंकि इलेक्ट्रोनिक डीवाईसिस / फोन आदि पर पुस्तक का निरीक्षण करने के उपरांत ही उसका मुद्रित-रूप / print version मंगवाना चाहिए, जो इस पुस्तक के लिए इस लिंक पर उपलब्ध है। धन्यवाद।

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How to keep control over body weight through Yoga

Body weight decreases with yoga. Even I have noticed my pent becoming lose at waist even with one day of heavy physical work. This occurs because I am habitual of daily yoga practice. When I worked hard, routine yoga exercise along with that depressed my appetite due to my too tiredness. So fat loss with that hard work was not rebuilt up, which resulted in my weight loss. Ordinary people without routine yoga practice eat a lot after heavy work thus rebuilding up their lost fat immediately. Yogic exercises should be continued daily and forever. If anyone continues his exercises for short time, say for 2 months, then he would experience reduction in his body weight. But if he stops exercising after that, then his built up stamina has no way to work other than to provoke the voracious appetite. Due to this he becomes too hungry and eats foods especially high energy foods abundantly. This results in substantial build up of his body fat which results in his body weight gain again that can surpass even his earlier basic body weight. So exercises continued should be kept continued always. It is a scientifically and experientially proven fact that hathyogic stretching exercises burn down a moderate amount of calories. Although stretching type yoga exercises don’t burn major amount of calories yet these exercises keep body fit, healthy, active and flexible. This helps in undertaking of any type of simple or hard physical work at any time successfully and with ease, also making gym exercises more effective. Also, it also helps in uniform circulation of blood throughout the entire body in appropriate proportions. This helps in easy withdrawal of fat deposited in the remote storehouses of the body. This in turn makes that fat available to all the body cells as the main source of energy. Therefore body doesn’t send the message of energy shortage to the appetite centre, that results in inhibition of voracious appetite just as seen commonly after a heavy work. Yoga is nothing special but a synergistic combination of stretching exercises, breathing and focused concentration. Focused concentration works as a controller valve for thoughts for it prevents sudden rush of chaotic thoughts thus preventing build up of paranoia and mind swinging. When accumulated thoughts in subconscious mind becomes too agitated then those are made to be released slowly and safely by the meditatively focused image inside the mind. Those thoughts are made sterile and non harmful or in other words get purified due to company of that strongly shimmering meditative image. That image also keeps check over the chaotic mental activities arising out of day to day worldly activities. Due to this an interest is generated inside the yoga practice and it is never missed out of daily schedule. With yoga exercises without the focused concentration on a kundalini image, interest for yoga exercises is lost soon and daily schedule severally suffers due to the chaotic rush of various hidden thoughts.

Tantric technique is another trick to reinforce the mental kundalini image and thus to enhance up the yoga-interest. It also results in enhanced breathing thus profuse supply of nutrient rich and well oxygenated blood to the entire body. This also puts a check over body weight. Actually tantra is not a separate discipline at its own independent of the ancient Indian spiritualism. It is a natural and spontaneous run / process towards the awakening. It only reinforces the spiritual efforts as a final or leaping step to awakening. If there is no spiritual motive and spiritual achievement inside one’s intellect, then there is no way for tantric power to go other than to become used up inside the chaotic external world. It means that kundalini image should be enough strong inside one’s mind prior to the application of tantric technique. Tantra provides the required and final escape velocity to kundalini to awakening. This is true for the common saying that Guru must be there with tantric sadhna. That guru is nothing other than the firmly affixed mental kundalini image. This is the reason why in Buddhist meditation, a yogi is allowed to take over the tantric sadhna after spending many years of simple concentrating meditation. But today Buddhists especially Tibetan Buddhists are trying to reveal all the secrets including the tantra to the world for they are afraid of losing for ever their rich spiritual heritage due to the long persisting external invasion.

You can learn about tantra in detail at the parent website of this web post, and for full detail following book is recommended-

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स्वयंप्रकाशन, आधुनिक तकनीक की एक अद्भुत देन-Self-publishing, a wonderful creation of modern technology 

स्वयंप्रकाशन, आधुनिक तकनीक की एक अद्भुत देन (please browse down or click here to view post in English)

मुझे हाल ही में एक पुस्तक को तैयार करने का मौका मिला, जिसका नाम है, “शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)”, और जिसको लिखा है, प्रेमयोगी वज्र नामक एक रहस्यमयी योगी ने। सबसे पहले मैंने उसके द्वारा कई वर्षों से समेटी गई अस्त-व्यस्त रूप की लिखित सामग्री / written material को सही ढंग से क्रमबद्ध किया। फिर बारम्बार उसको पढ़कर, उस पूरी सामग्री को अपने मन में बैठा लिया। वास्तव में लिखने का काम तो बहुत से लोग कर लेते हैं, परन्तु अंतिम दौर में उसे पुस्तक के रूप में सभी नहीं ढाल पाते। यह इसलिए, क्योंकि उसके लिए बहुत अधिक कड़ी व अनवरत मेहनत समेत संघर्ष, लगन, ध्यान, धारणाशक्ति व निरंतरता की आवश्यकता होती है। तीव्र एकाग्रता व स्मरणशक्ति को लम्बे समय तक बना कर रखना पड़ता है। पूरी पुस्तक-सामग्री को मन में एकसाथ बैठा कर रखना पड़ता है, ताकि पूरी सामग्री को युक्तियुक्तता, रोचकता व सजावट के साथ क्रमबद्ध किया जा सके। साथ में, जिससे उसमें पुनुरुक्तियाँ / repetitions भी न हो पाएं। फिर मैंने उसकी बहुत सी पुनुरुक्तियों को हटाया, तथा निर्मित क्रमबद्ध रूप में ही उसे कम्प्युटर पर टाईप करने लगा। समय की कमी के कारण लगभग 300 पृष्ठों को टाईप करने में एक साल लग गया। प्रेमयोगी वज्र बीच-2 में भी लिखित सामग्री भेजता रहा, जिसे भी मैं प्रसंगानुसार उस वर्ड फाईल / word file के बीच-2 में जोड़ता रहा। मैं माईक्रोसोफ्ट वर्ड-2007 / Microsoft word-2007 पर टाईप / type कर रहा था। कहीं मेरा टाईप किया हुआ मेटीरियल / material कम्प्यूटर की खराबी से या अन्य कारणों से नष्ट न हो जाता, उसके लिए मैं अपनी टाईप की हुई फाईल को डी-ड्राईव / D-drive (जिस पर विंडोस-फाईल्ज / windows files नहीं होतीं) में रख लेता था, और साथ में बाहरी स्टोरेज / external storage पर बेक-अप / backup के रूप में भी सुरक्षित रख लेता था। मैंने 600 रुपए के वार्षिक सब्सक्रिप्शन / annual subscription पर (डिस्काऊंट ऑफर / discount offer पर, वास्तविक मूल्य तो रुपए 1500 था) एवरनोट / Evernote को खरीदा हुआ था। वह मुझे सबसे सुरक्षित व आसान लगा, वैसे तो जी-मेल / G-mail या गूगल-ड्राईव / Google drive पर भी मुफ्त में बैक-अप रख सकते हैं। एवरनोट में अन्य भी बहुत सी अतिरिक्त सुविधाएं हैं। उसका लेखक के लिए एक फायदा यह भी है कि कहीं पर भी कुछ भी याद आ जाए, तो उस पर तुरंत लिखा जा सकता है, जो भविष्य के लिए स्टोर हो जाता है। उसका सर्च फंक्शन / search function भी बहुत कारगर है। कई बार मैं अपनी दूसरी वर्ड फाईल से या ब्लॉग पोस्ट / blog post से भी टेक्स्ट / text को कोपी / copy करके पुस्तक वाली फाईल में पेस्ट / paste कर देता था। परन्तु उससे फोर्मेटिंग एरर / formatting error आने से टेक्स्ट दोषपूर्ण हो जाता था, या गायब ही हो जाता था। तब मुझे पता चला कि पेस्ट करते समय ऑप्शन / option आता है कि किस स्टाईल / style में पेस्ट करना है। उसके लिए वह ऑप्शन सेलेक्ट / select करना पड़ता है, जिसमें “कीप टेक्स्ट ओनली” / keep text only लिखा होता है। इसको माईक्रोसोफ्ट वर्ड के बेस बटन / base button “वर्ड ऑप्शन” / word option में जाकर स्थाई तौर पर भी सेलेक्ट किया जा सकता है। और भी बहुत सी एडजस्टमेंट / adjustments सुविधानुसार उस पर की जा सकती हैं, हालांकि उनकी कम ही जरूरत पड़ती है। क्योंकि पुस्तक हिंदी में थी, अतः गूगल इनपुट / Google input के “हिंदी भाषा टूल” / Hindi language tool को डाऊनलोड / download किया गया था। उससे इंगलिश की-बोर्ड / English keyboard पर टाईप करने से उसके जैसे हिंदी के अक्षर छप जाते हैं। जैसे की “MEHNAT” को टाईप करने से फाईल में हिंदी का “मेहनत” शब्द छप जाता है। मैंने संस्कृत टूल को भी डाऊनलोड किया हुआ था, क्योंकि पुस्तक में बहुत से शब्द संस्कृत के भी थे। कम्प्युटर / computer को यूपीएस / UPS (बेटरी बैक-अप / battery backup) के साथ जोड़ा गया था, ताकि अचानक बिजली गुल होने पर कम्प्युटर एकदम से बंद न हो जाया करता, जिससे फाईल को सेव / save करने का मौका मिल जाया करता। वैसे भी टाईप करते हुए बीच-2 में फाईल को सेव कर लिया करता था। जब मेरी फाईल 150 पृष्ठों से बड़ी हो गई थी, तब कई बार सीधे ही पैन-ड्राईव / pen drive के अन्दर उसमें जोड़ा गया टेक्स्ट सेव नहीं हो पाता था, और उसकी सूचना स्क्रीन / monitor screen पर आ जाती थी। तब फाईल को पेन-ड्राईव से कोपी करके कम्प्युटर में पेस्ट करना पड़ता था। फिर उस पर टाईप किया हुआ टेक्स्ट सेव हो जाता था। कहीं दूसरे स्थान, दुकान आदि में टाईप करने के लिए उस ताजा फाईल को फिर से पेन-ड्राईव के अन्दर कोपी-पेस्ट करना पड़ता था। कई बार तो पेन-ड्राईव में स्टोर / store की गयी फाईल खुलती ही नहीं थी। ऐसा होने का एक मुख्य कारण कम्प्यूटर में वायरस होना भी है। इसलिए वायरस वाले कम्प्यूटर पर अपनी पेन ड्राईव न चलाएं, और अपने कम्प्यूटर पर हमेशा एंटिवायरस डाल कर रखें। इसलिए कुछ भी टाईप करने के बाद मैं उस फाईल को एवरनोट (पूर्वोक्त क्लाऊड-स्टोरेज / cloud storage) में बैकअप-स्टोर कर लेता था। पेन-ड्राईव की फाईल न खुलने पर, उस फाईल को एवरनोट से डाऊनलोड कर लेता था। इस तरह से मैंने कभी भी टाईप किए हुए टेक्स्ट को लूज / lose नहीं किया, एक पंक्ति को भी नहीं। इससे एक और फायदा यह होता था कि यदि कभी मेरे पास पेन ड्राईव नहीं होती थी, तो मैं एवेरनोट से बुक-फाईल को डाऊनलोड करके उस पर टाईप कर लेता था, और उसे फिर से एवरनोट में सेव कर लेता था। यद्यपि पेन ड्राईव हमेशा मेरे हेंड बेग में रहती थी। मैंने अतिरिक्त सुरक्षा के लिए, बुक-फाईल के पूरा होने पर उसे बाह्य हार्ड ड्राईव / external hard drive, गूगल ड्राईव व जी-मेल में भी सेव कर लिया। टेक्स्ट की लाईन-स्पेसिंग / line spacing बराबर नहीं आ रही थी। बहुत से फौंट / fonts प्रयुक्त किए, पर बात नहीं बनी। निर्देशानुसार पैराग्राफ स्पेसिंग-सेटिंग / paragraph spacing setting के “डू नोट एड एक्स्ट्रा स्पेस बिफोर ओर आफ्टर पेराग्राफ” / do not add extra space before or after paragraph को भी अनचेक / uncheck किया, पर बात नहीं बनी। मैं एरियल यूनिकोड एमएस / Arial unicode MS पर टाईप करता था। फिर मुझे इंटरनेट / internet से हिंट / hint मिला की कई फोंटों में गैर-अंगरेजी / non English भाषा के अक्षर अच्छी तरह से लाईन / line में फिट / fit नहीं होते। फिर मैंने बहुत से फोंटों को ट्राई / try किया, पर केवल केम्ब्रिया फोंट / Cambria font पर ही बात बनी, और लाईन स्पेसिंग बिलकुल बराबर व शानदार हो गई। उससे मेरी बहुत बड़ी समस्या दूर हो गई, विशेषतः पुस्तक का प्रिंट वर्जन / print version छपवाने के लिए, क्योंकि ई-बुक के लिए तो असमान लाईन स्पेसिंग से भी काम चल रहा था। पर एक बात गौर करने लायक थी कि केम्ब्रिया फॉण्ट तभी एप्लाई / apply हो रहा था, जब टेक्स्ट पहले से ही एरियल यूनिकोड एमएस में टाईप या रूपांतरित किया हुआ था, अन्यथा नहीं। दोनों ही फोंट बनावट में लगभग एक जैसे ही हैं, और हिंदी के लिए सबसे उपयुक्त हैं। टेक्स्ट को सेलेक्ट करके फोंट को कभी भी बदला जा सकता है।

अब आती है बारी वर्ड फाईल को किनडल ई-बुक / kindle e-book के अनुसार फोर्मेट / format करने की। चारों ओर के मार्जिन / margins एक सेंटीमीटर किए गए। हेडर व फूटर / header and footer रिमूव / remove किए गए। हेडर उसे कहते हैं जो एक जैसा वाक्य या शब्द हरेक पेज / page के टॉप / top पर सेलेक्ट एरिया / selected area में अपने आप लिखा होता है। ऐसा आपने पुस्तकों में देखा भी होगा। इसी तरह फूटर हरेक पेज के बॉटम / bottom के सेलेक्ट एरिया में स्वयं ही लिखा होता है। तभी ऐसा होता है यदि हेडर व फूटर को होम-सेटिंग में डाला गया हो। पेज नंबर / page number भी रिमूव किए गए। लाईन स्पेसिंग को 1.5 पर सेट किया गया। टेक्स्ट एलाईनमेंट / text alignment को लेफ्ट / left पर सेट / set किया गया। चित्र, ग्राफ / graph, टेबल / table आदि यदि टेक्स्ट में न ही हों, तो बेहतर है; क्योंकि ये ई-रीडर / e-reader में बहुत अच्छी तरह से डिस्प्ले / display नहीं होते हैं। ई-रीडर में केवल श्वेत-श्याम वर्ण ही होता है। यदि बहुत ही आवश्यक हो तो चित्र को भी डाला जा सकता है, यद्यपि वह बहुत जगह घेरता है, क्योंकि वह टेक्स्ट-लाईनों के बीच में फिट नहीं हो पाता, अपितु पेज के बाएँ मार्जिन से दाएं मार्जिन तक की पूरी जगह को टेक्स्ट के लिए अनुपयोगी बना देता है।

अगली पोस्ट में हम यह बताएंगे कि तैयार वर्ड-फाईल को केडीपी / KDP (किनडल डायरेक्ट पब्लिशिंग / Kindle direct publishing) में कैसे सेल्फ-पब्लिश / self publish करना है।

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Self-publishing, a wonderful creation of modern technology

I recently got an opportunity to prepare a book, whose name is “Shareervigyaan Darshan – Ek adhunik Kundalini tantra (ek yogi ki premkatha)”, and which has been originally written by a mysterious yogi named Premyogi Vajra. First of all, I sorted the written material of the disorganized form that he had been extending for many years. After reading the material again and again, I took the entire contents into my mind. In fact, many people do the work of writing, but in the last round, all of them do not shield the written material in the form of a book. This is because it requires struggle, passion, meditation, perception and continuity, including a lot of hard work and hard work. Acute concentration and memory have to be retained for a long time. The entire book-material has to be seated together in mind so that the whole material can be sorted with reasonableness, attractiveness and decoration. Together, in which words cannot be reproduced second time. Then I removed many of his reimaginations, and started typing it on the computer in the form of a textually built-in form. Due to a shortage of time, it took one year for typing about 300 pages. Premyogi Vajra also continued to send written content, which I continued to add to that word file in between the context at the right place. I was typing on Microsoft Word 2007. So that mine typed material is not destroyed by computer malfunction or for other reasons, I would have kept my typed file in the D-drive (which does not contain windows-files) and on external storage as back-up also safely. I had bought Evernote at an annual subscription of INR 600 (on the discount offer, the actual value was INR 1500). It seemed to me the safest and the easiest way to get back-up, even better than on Gmail or Google Drive both of which are free. Evernote also has many other additional facilities. There is also an advantage for his commentator that even if there is anything remembered anywhere, anything can be written immediately on it, which gets stored for the future. Its search function is also very effective. Many times I copied the text from my second word file or blog post and pasted it into the book file. But due to the formatting error coming from it, the text becomes defective, or disappeared. Then I came to know that there is an option to paste in which style to paste. For that, that option has to be selected, in which “Keep Text Only” is written. It can also be selected permanently by accessing the Microsoft Word’s base button “Word Option”. And also many adjustments can be made from here at the convenience level, although rarely required or not required at all. Because the book was in Hindi, so the “Hindi language tool” of Google Input was downloaded. By typing on the English keyboard, the letters like Hindi are printed. Like typing “MEHNAT”, Hindi’s “hard work” is printed in the file. I also downloaded the Sanskrit tool, because there were many words in the book also of Sanskrit. The computer was connected with UPS (Battery Backup) so that the computer did not stop immediately when suddenly the power was lost, thereby giving the opportunity to save the file. By typing anyway, I used to save the file again and again while typing. When my file went to be larger than 150 pages, added text was at times not able to directly be saved in that base text of the file while that being in pen-drive, and that had come to the notice screen. Then the file had to be copied from the pen-drive and pasted into the computer. Then the subsequently typed text was saved. In order to type in another place, shop etc., that fresh file had to be copied to the pen-drive. Many times the file stored in Pen-Drive did not open. That occurs mainly due to computer virus. So never use your pen drive on infected computer and keep antivirus programme installed on your computer always. So after typing anything I used to backup that file in Evernote (aforementioned cloud-storage). When the Pen-Drive file did not open, I would download the file from the Evernote.  In this way, I never lost the typed text, not even a line. Another advantage of this was that if I had ever not a pen drive, then I would download the book-file from Evernote and type it on it, and would have saved it again in the Evernote. Although the pen drive always used to be in my hand bag. I saved the completed book-file for extra security even in the external hard drive. The line-spacing of the text was not equal. I used lots of fonts, but it did not matter. I also unchecked “Do note ad extra space before and after paragraph” of paragraph spacing-setting as per the instructions, but it did not work. I used to type in Ariel Unicode MS. Then I got a hint from the internet that non-English language letters in many fonts do not fit well in the line. Then I tried a lot of fonts, but only thing happened on the Cambria font, and the line spacing became absolutely equal and fantastic. I got rid of my big problem, especially to print the print version of the book, because the e-book was also working with uneven line spacing. One thing to note was that the Cambria font was being used only when the text was already typed or converted into Aerial Unicode MS, otherwise it would not. Both fonts are almost identical in texture, and are most suitable for Hindi. By selecting the text, the fonts can be changed at any time.

Then comes to convert the word book-file to e-book format. The margins around were made one centimeter. Headers and footers were removed. Header is that in the form of same sentence or word written automatically in the selected area at the top of each page. Similarly, the footer is written in the selected area of ​​each page’s bottom. Page numbers were also removed. Line spacing was made 1.5. Text alignment set on the left. If not photo, graph, table etc., then it is better; because these in e-readers are not very well displayed. The e-reader only has black and white characters. The picture can also be inserted if it is very necessary, although it occupies a lot of space, because it does not fit in between text- lines, but the entire space from the left margin to the right margin of the page is made by this unusable for text.

In the next post we will tell how to publish the ready word-file in KDP (Kindle Direct Publishing).

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Importance of Body Chakras in Kundalini Yoga – A Scientific Discussion / कुण्डलिनीयोग में शारीरिक चक्रों का महत्त्व- एक वैज्ञानिक विवेचना

Importance of Body Chakras in Kundalini Yoga – A Scientific Discussion

Giving the importance of equality to all the chakras in the Kundalini Yoga during everyday life, Kundalini visualization / visualization is done on all the chakras turn by turn. Its advantage is that in some parts of the body the Kundalini comes into the grip. In fact, the Kundalini is associated with the chakras / parts of the body. When the activity of a chakra increases, then the blissful expression of the Kundalini, which is being visualized there upon, also increases. The activity of the body depends solely on physical blood circulation. When blood circulation increases on a chakra, then the activity of that chakra also increases. The total blood circulation of the body remains the same, only in different parts it keeps on changing only. If blood circulation increases on one chakra, then it is naturally decreased on any other chakra. By brain work, blood circulation increases in the brain, so during that time the Kundalini-visualization in the brain-chakra / Agya chakra is very simple and successful. Speech, writing, reading, colloquial etc. increases the circulation in the throat, thereby making the Kundalini’s visualization simple and effective on there / in the throat chakra / Vishuddhi chakra. When the feeling of emotions in mind increases the blood circulation in the heart, then due to visualization in the heart centre / heart chakra / Anahata Chakra, the Kundalini becomes more ignited. When the digestive tract is powerful, then there is increased blood circulation in the abdomen / naval area. Therefore visualization in naval chakra / Manipura Chakra at that time is of greater benefit. The effectiveness of sexually energizing sexual activity, the proper health of the waste-emitting organs and other physical (especially hands and feet related) actions increases the blood circulation on the sexual chakras / swadhishthana and muladhara chakra, therefore there is more activity in the Kundalini. That is why at that time those two chakras seem to get more attention.

In the household life, especially in duality and ignorance, all chakras cannot be functioning simultaneously and in common, because sometimes the tasks related to a particular area have to be emphasized, then sometimes tasks related to any other area. Therefore, in a single sitting of Kundalini Yoga, visualization of Kundalini is done on all the chakras turn by turn. Then the influential chakra itself comes under the purview of visualization, which has a greater sense of visualization-benefit. By this, visualization-gains gradually become accumulated in Kundalini Jagran / awakening. On the contrary, there is no cosmic responsibility for the ascetic-yogi or devoted yogi, so that he can easily keep stirring the activity for a long time on a particular chakra. Therefore, it is said that visualization should be done on the same chakra for a long time and then should move towards the next chakra, it has been said only for such a dedicated yogi. He is saved by a slight loss of visualization caused by chakra-change, nothing special. By continuously meditating on the same chakra, it can increase blood circulation to that chakra for a long time, because visualization on any part of the body increases blood pressures there itself. This is also the principle of spiritual healing. When someone entangled in the worldly life, by leaving his chakra, which is actively working with its naturalness, takes a forceful attention on any other chakra, then according to that need, the blood of the functioning chakra runs towards that chaotic chakra. From that necessity, the natural function of the functioning chakra will be affected by it less or more. Therefore, in the Yogasadhana / meditation-sitting under such busy worldly circumstances, the dhyana / attention should be applied on the same chakra which is easily or spontaneously meditative. Do not be forced to coax with other dormant chakras. By the way, by keeping the attention of all the chakras in the same way, all parts of the body are equally healthy; Life becomes balanced and moves forward in every field. By focusing continuously on a particular chakra, specializations can be gained quickly in the related areas of that chakra, although life can become unbalanced, and the health of the areas related to other body chakras can be questioned.

This type of perfect physical and mental balance becomes available from the advaita / non duality of Puranas / Aryan personified natural stories and through the Advaita obtained from the physiology / body science philosophy. This is because, because of non duality all things look alike, and there is no special attachment to a particular area. From this, the person meditates on all parts of his individual body as well as on the universal body, because the worldly creation (related to the world) and the individual creation (body-related) are both interconnected according to “yatpinde tatbramhaande”. The control over one is reflected itself as the control over the second one too in the same manner and same extent. From this non duality practice also, kundalini develops itself gradually and with less special efforts.

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कुण्डलिनीयोग में शारीरिक चक्रों का महत्त्व- एक वैज्ञानिक विवेचना

प्रतिदिन के लौकिक जीवन के दौरान जो कुण्डलिनीयोग किया जाता है, उसमें सभी चक्रों को बराबरी का महत्त्व देते हुए सभी चक्रों पर बारी-२ से कुण्डलिनी का ध्यान किया जाता है। इसका यह फ़ायदा होता है कि शरीर के किसी न किसी भाग में कुण्डलिनी पकड़ में आ ही जाती है। वास्तव में कुण्डलिनी शरीर के चक्रों / भागों से जुड़ी होती है। जब किसी चक्र की क्रियाशीलता बढ़ती है, तब उस पर ध्यायित की जाने वाली कुण्डलिनी की आनंदमयी अभिव्यक्ति भी बढ़ जाती है। शरीर की क्रियाशीलता शारीरिक रक्तसंचार पर ही तो निर्भर करती है। जब किसी चक्र पर रक्तसंचार बढ़ जाता है, तब उस चक्र की क्रियाशीलता भी बढ़ जाती है। शरीर का कुल रक्तसंचार तो एकसमान ही रहता है, केवल विभिन्न भागों में उसकी मात्रा घटती-बढ़ती रहती है। यदि एक चक्र पर रक्तसंचार बढ़ता है, तो किसी दूसरे चक्र पर स्वाभाविक रूप से घट जाता है। दिमागी कार्य से दिमाग में रक्तसंचार बढ़ जाता है, अतः उसके दौरान मस्तिष्क-चक्र / आज्ञा चक्र में कुण्डलिनी-ध्यान अधिक सरल व सफल होता है। भाषण, लेखन, पठन, बोलचाल आदि से गले में रक्तसंचार बढ़ जाता है, जिससे वहां / ग्रीवाचक्र / विशुद्धिचक्र पर कुण्डलिनी का ध्यान सरल व प्रभावशाली हो जाता है। मन में भावनाओं के उमड़ने के समय ह्रदय में रक्तसंचार बढ़ जाता है, जिससे उस समय हृदयक्षेत्र / हृदयचक्र / अनाहत चक्र में ध्यान करने से कुण्डलिनी अधिक प्रज्वलित हो जाती है। जब पाचनक्रिया शक्तिशाली होती है, तब उदरक्षेत्र / नाभिक्षेत्र में रक्तसंचार बढ़ा हुआ होता है। इसलिए उस समय नाभिचक्र / मणिपुरचक्र में ध्यान करने से अधिक लाभ होता है। यौनशक्तिवर्धक यौनक्रियाशीलता से, अपशिष्ट-उत्सर्जक अंगों के उत्तम स्वास्थ्य से व अन्य शारीरिक (विशेषतः हस्तपादाश्रित) कर्मों से यौनचक्र / स्वाधिष्ठानचक्र व मूलाधार चक्र पर रक्तसंचार बढ़ा हुआ होता है, अतः वहां पर कुण्डलिनी अधिक क्रियाशील होती है। इसलिए उस समय उन दोनों चक्रों पर अधिक अच्छी तरह से ध्यान लगता है।

गृहस्थजीवन में, विशेषतः द्वैत व अज्ञान से भरे गृहस्थजीवन में सभी चक्र एकसाथ व एकसमान रूप से क्रियाशील नहीं रह सकते, क्योंकि कभी किसी क्षेत्र से सम्बंधित कार्यों पर अधिक जोर देना पड़ता है, तो कभी किसी अन्य क्षेत्र से सम्बंधित कार्यों पर। इसलिए कुण्डलिनीयोग की एक अकेली बैठक में सभी चक्रों पर बारी-२ से कुण्डलिनी का ध्यान किया जाता है। उससे प्रभावशाली चक्र स्वयं ही ध्यान के दायरे में आ जाता है, जिससे ध्यान-लाभ की अधिक अनुभूति होती है। इससे ध्यान-लाभ धीरे-२ इकट्ठा होता हुआ कुण्डलिनीजागरण में परिणत हो जाता है। इसके विपरीत संन्यासी-योगी या समर्पित योगी के लिए कोई लौकिक उत्तरदायित्व नहीं होता, जिससे वह एक विशेष चक्र पर लम्बे समय तक क्रियाशीलता को आसानी से बना कर रख सकता है। इसलिए जो यह कहा गया है कि एक ही चक्र पर लम्बे समय तक ध्यान करके उसे जगा देना चाहिए और फिर अगले चक्र की ओर रुख करना चाहिए, वह ऐसे ही समर्पित योगी के लिए ही कहा गया है। वह चक्र-बदलाव से उत्पन्न थोड़ी सी ध्यान-हानि से बच जाता है, अन्य विशेष कुछ नहीं। वह एक ही चक्र पर निरंतर ध्यान लगा कर वहां पर रक्तसंचार को लम्बे समय तक बढ़ा कर रख सकता है, क्योंकि शरीर के किसी भाग पर ध्यान लगाने से वहां पर रक्तसंचार स्वयं ही बढ़ जाता है। यही स्पिरिचुअल हीलिंग / आध्यात्मिक उपचार का सिद्धांत भी है। जब सांसारिकता में उलझा हुआ कोई व्यक्ति स्वाभाविकता से क्रियाशील अपने चक्र को छोड़कर किसी अन्य चक्र पर जोर-जबरदस्ती से ध्यान लगाता है, तब उस आवश्यकतानुसार क्रियाशील चक्र का रक्त उस ध्यायित किए जा रहे चक्र की ओर दौड़ पड़ता है। उससे उस आवश्यकतानुसार क्रियाशील चक्र के स्वाभाविक कार्य तो कम या अधिक रूप से दुष्प्रभावित होंगे ही। इसलिए वैसी व्यस्ततापूर्ण सांसारिक परिस्थितियों के अंतर्गत की जाने वाली योगसाधना-बैठक में जिस चक्र पर ध्यान आसानी से या स्वयं ही लग रहा हो, वहीँ पर लगने देना चाहिए। अन्य सुप्त चक्रों के साथ अधिक जोर-जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए। वैसे तो सभी चक्रों पर समान रूप से ध्यान देने से ही शरीर के सभी अंग समान रूप से स्वस्थ रहते हैं; जीवन संतुलित बनता है और हरेक क्षेत्र में आगे बढ़ता है। एक विशेष चक्र पर ही निरंतर ध्यान देने से उस चक्र से सम्बंधित क्षेत्रों में शीघ्रता से विशेषज्ञता तो प्राप्त हो सकती है, यद्यपि उससे जीवन असंतुलित बन सकता है, और शरीर के अन्य चक्रों से सम्बंधित क्षेत्रों के स्वास्थ्य पर प्रश्नचिन्ह लग सकता है। अद्वैतमय जीवन से भी कुण्डलिनी स्वयं ही व बिना किसी विशेष प्रयास के धीरे-२ विकसित होने लगती है।

इस प्रकार का उत्तम शारीरिक व मानसिक संतुलन पुराणों से व शरीरविज्ञान दर्शन से प्राप्त अद्वैतभाव से भी उपलब्ध हो जाता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि अद्वैतभाव से सभी कुछ समान जैसा लगता है, और किसी विशेष क्षेत्र से विशेष लगाव या आसक्ति नहीं रहती। इससे व्यक्ति व्यष्टि और समष्टि के सभी अंगों पर समान रूप से ध्यान देता है, क्योंकि समष्टि (विश्व-सम्बंधित) व व्यष्टि (शरीर-सम्बंधित), दोनों आपस में जुड़े हुए हैं, “यतपिण्डे तत ब्रम्हांडे” के अनुसार। एक के भी नियंत्रण से दूसरा स्वयं ही उसी के अनुसार नियंत्रित हो जाता है।

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BURNING RAVANA- DEEP SECRET HIDDEN INSIDE / रावण दहन- एक रहस्यात्मक प्रथा

It is Dushehara festival of Hindus / descendants of Aryans today. Ravana, a human-rascal of Ramayana-period is burnt on this day. Many people see it superficially and think that it is merely a ancient happening. However the truth is that it has deep meaning inside. I do not rule out the truth of the ancient story, but I see more truth in the collateral non dual- tantric message that it gives. Actually, the entire nature is present in the form of a beautiful woman. Whatever there is happening inside the body of a woman, that all is happening in a similar way inside the nature too, nothing else. It is a tantric and vedic truth thad has been further proved scientifically by Premyogi vajra in his tantric book, Shareeravigyaan darshan. Ignorant people exploit this nature in a bad manner and with a bad attitude. God Rama always in union with his nature can not tolerate this and thus never allow such people to gain self realization to enter his abode. Therefore such people are burnt by physical fire on there demise for they being deeply identified with their physical bodies. So the message is clear that love the nature and its creatures. The entire Aryan civilization is based on this fundamental guideline. God can never be approached directly without satisfying his nature. It is a deep tantric secret that also demystifies Kundalini more or less. That is why nature-worship is so much abundant in Aryan lifestyle. Today, the world is in great danger. The nature has been over exploited by the human. The result of it is global warming. If it continues, there would be disasters in every field of life. Beautiful Venice city would be submerged fully inside the ocean. So all the coastal areas. Therefore it is right time now to adopt Aryan practices and to worship the nature like those. May be the nature along with her consort, God become pleased and give us the right direction to follow, and also dilute down the disasters little or more.

The ancient story that Ravana had stolen Seetaa, the wife of Lord Rama is a metaphor type. The one disrespecting woman or nature can not please the God. Hanuman, the monkey god and servant of Seetaa is the metaphor of creatures inside the nature. He helped god Rama means that all creatures except of willfully ignorant human beings are innocents. Rama took help of Hanuman to save Seetaa means that when nature is exploited by human, then invisible God makes the other creatures outnumbered thus creating problems for selfish human beings. In this way, God teaches a good lesson to human and so he starts saving the nature. It is entirely similarly seen today, what was happening there thousands of years ago, in the Ramayana-age .

So very-2 happy Dushehara to all of you.

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आज आर्यों के वंशजों / हिन्दुओं  का त्यौहार दशहरा है। रावण, रामायण काल ​​का मानव-राक्षस इस दिन जला दिया जाता है। बहुत से लोग इसे सतही रूप से देखते हैं, और सोचते हैं कि यह केवल एक प्राचीन घटना है। हालांकि सच यह है कि इसमें गहरा अर्थ छुपा हुआ है। मैं प्राचीन कहानी की सच्चाई से इंकार नहीं करता हूं, लेकिन मैं इसे संपार्श्विक अद्वैत-तंत्र के उस संदेश के रूप में अधिक सत्य देखता हूं, जो यह देता है। असल में, पूरी प्रकृति एक सुंदर महिला के रूप में मौजूद है। किसी भी महिला के शरीर में जो भी हो रहा है, वह सब प्रकृति के अंदर भी इसी तरह से हो रहा है, और कुछ नहीं। यह एक तांत्रिक और वैदिक सत्य है, जिसे प्रेमयोगी वज्र ने अपनी तांत्रिक पुस्तक, शरीरविज्ञान दर्शन में वैज्ञानिक रूप से बखूबी साबित कर दिया है। अज्ञानी लोग इस प्रकृति का खराब तरीके से और बुरे व्यवहार के साथ शोषण करते हैं। भगवान राम जो हमेशा अपनी प्रकृति के साथ मिलकर रहते हैं, वे इसे बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं, और इस तरह ऐसे लोगों को कभी भी अपने निवास में प्रवेश करने के लिए आत्मज्ञान प्राप्त करने की इजाजत नहीं देते हैं। इसलिए ऐसे लोगों को अंत में भौतिक आग से जला दिया जाता है, क्योंकि वे अपने भौतिक निकायों / शरीरों के साथ गहराई से / आसक्ति से चिपके होते हैं। तो संदेश स्पष्ट है कि प्रकृति और उसके प्राणियों से प्यार करना चाहिए। संपूर्ण आर्य सभ्यता इस मौलिक दिशानिर्देश पर ही आधारित है। भगवान को उनकी प्रकृति को संतुष्ट किए बिना, सीधे प्राप्त नहीं किया जा सकता है। यह एक गहरा तांत्रिक रहस्य है, जो कुण्डलिनी को भी रहस्योद्घाटित करता है। यही कारण है कि आर्य जीवनशैली में प्रकृति-पूजा इतनी प्रचुर मात्रा में है। आज दुनिया बहुत खतरे में है। प्रकृति का मानव द्वारा शोषण किया गया है। इसका परिणाम ग्लोबल वार्मिंग है। यदि यह जारी रहता है, तो जीवन के हर क्षेत्र में आपदाएं होंगी। सुंदर वेनिस शहर समुद्र के अंदर पूरी तरह से डूब जाएगा। सभी तटीय क्षेत्रों के साथ ऐसा ही होगा। इसलिए आर्यन प्रथाओं को अपनाने और उनकी तरह प्रकृति की पूजा करने के लिए यह सही समय है। हो सकता है कि प्रकृति व उसके सदैव साथ रहने वाले उसके प्रेमी, भगवान प्रसन्न हो जाएं, और हमें प्रकृति को बचाने में सही दिशा-निर्देशन प्रदान करें, और आपदाओं से भी थोड़ी राहत दे दें।

प्राचीन कहानी कि रावण ने भगवान राम की पत्नी सीता को चुरा लिया था, एक रूपक प्रकार की है। जो महिला या प्रकृति का अपमान करता है, वह भगवान को  प्रसन्न नहीं कर सकता है। हनुमान, बंदर-देवता और सीता का नौकर, प्रकृति के भीतर प्राणियों का रूपक है। उसने भगवान राम की मदद की, इसका अर्थ है कि जानबूझकर अनजान बने मनुष्यों को छोड़कर सभी प्राणी निर्दोष हैं। राम ने सीता को बचाने के लिए हनुमान की मदद ली, इसका मतलब है कि जब मनुष्य द्वारा प्रकृति का शोषण किया जाता है, तो अदृश्य भगवान अन्य प्राणियों को अधिक से अधिक बनाता है, जिससे स्वाभाविक ही मनुष्यों के लिए अधिक से अधिक समस्याएं पैदा हो जाती हैं। उसे उससे अच्छा सबक मिलता है, और वह प्रकृति को बचाने लग जाता है। यह पूरी तरह से आज भी वैसा ही देखा जा रहा है, जैसा कि हजारों साल पूर्व के रामायण-काल में घटित हो रहा था।

इसलिए आप सभी को दशहरे की हार्दिक शुभकामनाएं।

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Mahishasur mardini (goddess, killer of demon mahishasur)-महिषासुर मर्दिनी

Mahishasur was a great demon in prehistoric ages. He was having nature and appearance that of a male Buffalo. He used to appear as a divine and smart human being or as a male Buffalo as per his willingness. His army and followers of Buffalo race were too strong to be defeated even by the gods / demigods / devatas. He had captured all the territories including the divine and astral ones. He was torturing everyone. Ordinary people went to the doorsteps of gods, but they were unable to help those and were themselves too badly affected for the demon was not allowing them to work for the development of human race, most intelligent of all the creatures. Ultimately all gods became gathered and went to the doorstep of super god Bramha. He along with those went to another super god Shiva. He finding himself unable to help those went to last and topmost super god Vishnu along with them. Vishnu told them the importance of unity. All gods and super gods expressed out their individual powers. Those all individual powers were then united together and came out in the form of a super power in the appearance of a too beautiful, powerful and divine goddess called as Durga. She warned the demon many times but he took her lightly. Ultimately she killed him thus opening the way for the development of humanity and divinity.
This is a classical pauranik story of Hindu religious literature. We can take it into original scientific form. Mahishasur demon was the prehistoric dinosaur kingdom when Buffalo-mouthed reptilians used to roam the earth, hindering the human evolution by the natural elements / gods. No separate / lonely natural element was able to detain those. So in embodied / body less human spirits went to the personified heads of those natural elements / gods to help them for their embodied expression. Those natural elements ultimately joined together and made a most favorable condition for their destruction in the form of that scientifically proved drastic and prehistoric meteorite-hit that pushed dinosaurs to extinction. The flashing light of that meteorite was considered as the most beautiful goddess that was made through the so rare incidence of union of all of the favorable climatic conditions as union of individual powers of all the climate controlling natural elements / gods. May be that small meteorite-hits also occured before that drastic one as the signs of warning from the goddess.
This proves that ancient pauranik stories are just only the personified descriptions of the real and scientific world around us. This has only been done with a motive to produce functional non duality that leads to kundalini awakening with sustained practice. So these puranas should be regularly read, understood and that’s non dual attitude attached with one’s own individual life.
Premyogi vajra has made a Tantric book in Hindi, in which he has described universe existing inside our own body in a Purana-style. He has taken help of medical science for this. He has correlated everything happening inside our own human body with our gross social life. It’s already proved that whatever there is inside the universe, that everything is present inside our own body. His book appears more interesting than Purana today for he has written everything that’s scientifically proved, so in an easy form to comprehend. I have myself read it and found it suddenly transforming and spiritually elevating. It’s an extraordinary, incomparable and wonderful book. Detailed description of this book is available here at-

The non dual, tantric, Kundalini yoga technique (the real meditation), and spiritual Enlightenment explained, verified, clarified, simplified, justified, taught, guided, defined, displayed, summarized, and proved in an experiential, philosophical, practical, humanely, scientific and logical way best over

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महिषासुर प्रागैतिहासिक युग में एक महान दैत्य था। वह पुरुष बफेलो / भैंसे के जैसे स्वभाव व उसीकी जैसी शक्ल का था। वह अपनी इच्छा के अनुसार कभी एक दिव्य और स्मार्ट / सुन्दर इंसान और कभी एक भैंसे के रूप में दिखाई देता था। भैंस-वंश की उसकी सेना और उसके अनुयायी देवताओं द्वारा भी पराजित होने के लिए नहीं बने थे। उन्होंने दिव्य और सूक्ष्म लोकों सहित सभी क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया था। वह महिषराज हर किसी को यातना दे रहा था। साधारण लोग देवताओं के दरवाजे पर सहायता के लिए गए, लेकिन वे उन लोगों की मदद करने में असमर्थ थे और उन राक्षसों से खुद भी बहुत बुरी तरह प्रभावित हुए थे, जिससे उन्हें उस मानव जाति के विकास के लिए काम करने की इजाजत नहीं मिल पा रही थी, जो सभी प्राणियों में सबसे अधिक बुद्धिमान होती है। आखिरकार सभी देवता इकट्ठे हो गए और सुपर गॉड / महा देवता ब्रह्मा के द्वार पर गए। वे उनके साथ एक और सुपर भगवान शिव के पास गए। उन्होंने भी खुद को उन लोगों व देवताओं की सहायता करने में असमर्थ पाया, अतः वे भी उनके साथ अंतिम और शीर्ष सुपर भगवान विष्णु के पास चले गए। विष्णु ने उन्हें एकता के महत्व के बारे में बताया। सभी देवताओं और सुपर देवताओं ने अपनी व्यक्तिगत शक्तियों को अभिव्यक्त किया। फिर उन सभी व्यक्तिगत शक्तियों को एक साथ एकजुट किया गया, जिससे एक बहुत ही शक्तिशाली, सुन्दर, मनुष्याकृत और दिव्य देवी के रूप में एक सुपर पावर उत्पन्न हुई, जिसे दुर्गा कहा जाता था। उसने राक्षस को कई बार चेतावनी दी लेकिन उसने उसे हल्के में लिया। आखिरकार उसने मानवता और दिव्यता के विकास के लिए रास्ता खोलने के लिए उसे मार डाला।

यह हिंदू धार्मिक साहित्य की शास्त्रीय पौराणिक कहानी है। हम इसे मूल वैज्ञानिक रूप में ले सकते हैं। महिषासुर राक्षस का साम्राज्य प्रागैतिहासिक डायनासौर का साम्राज्य ही था, जब महिषमुख सरीसृप पृथ्वी के चारों ओर घूमते थे, और प्राकृतिक तत्वों / देवताओं द्वारा मानव विकास में बाधा डालते थे। कोई अकेला प्राकृतिक तत्व उनको रोकने में सक्षम नहीं था। तो देहरहित मानव आत्माओं ने उन प्राकृतिक तत्वों के मनुष्याकृत प्रमुखों / देवताओं से अपनी मानवीय अभिव्यक्ति के लिए सहायता माँगी। वे सभी प्राकृतिक तत्व / जल, वायु, अग्नि आदि आखिरकार एक साथ शामिल हो गए और वैज्ञानिक रूप से साबित प्रागैतिहासिककाल की कठोर उल्कापिंड-टक्कर के रूप में उन्होंने उन दैत्यों के विनाश के लिए सबसे अनुकूल स्थितियां बनाईं, जो अंततः डायनासोर को विलुप्त कर पाईं। उस उल्कापिंड की चमकती रोशनी को सबसे खूबसूरत / दिव्य व शक्तिशाली देवी माना गया, जो सभी अनुकूल जलवायु-स्थितियों के संघ की इतनी दुर्लभ घटना के माध्यम से अंतरिक्ष से धरती की ओर गिराया गया था। वास्तव में  ऐसी अति दुर्लभ घटना करोड़ों वर्षों में, सभी जलवायु नियंत्रक प्राकृतिक तत्वों / देवताओं की व्यक्तिगत शक्तियों के संघ से ही होती है। हो सकता है कि उससे पहले भी छोटे-२ उल्कापात हुए हों, जो उस दैत्य को देवी के द्वारा दी गई अंतिम चेतावनी के रूप में माने जा रहे हों।

यह साबित करता है कि प्राचीन पौराणिक कहानियां हमारे आस-पास की वास्तविक और वैज्ञानिक दुनिया के केवल personified / मनुष्याकृत वर्णन ही हैं। ऐसा केवल कार्यात्मक अद्वैत को पैदा करने के उद्देश्य से किया गया है, जो निरंतर अभ्यास के साथ कुंडलिनी जागृति को उत्पन्न करता है। इसलिए इन पुराणों को नियमित रूप से पढ़ा जाना चाहिए, समझ लिया जाना चाहिए और इनसे उत्पन्न अद्वैत-दृष्टिकोण को अपने वर्तमान के अपने व्यक्तिगत जीवन से जोड़ा जाना चाहिए।

प्रेमयोगी वज्र ने हिंदी में एक तांत्रिक पुस्तक बनाई है, जिसमें उन्होंने पुराण-शैली में अपने शरीर के अंदर मौजूद ब्रह्मांड का वर्णन किया है। उन्होंने इसके लिए चिकित्सा विज्ञान की मदद ली है। उन्होंने अपने स्वयं के मानव शरीर के भीतर होने वाली हर चीज को हमारे अपने सकल सामाजिक जीवन के साथ सहसंबंधित किया है। यह पहले ही साबित होया हुआ है कि ब्रह्मांड के अंदर जो कुछ भी है, वह सब हमारे अपने शरीर के अंदर भी वैसा ही मौजूद है। उनकी आधुनिक पुस्तक प्राचीन पुराण की तुलना में अधिक दिलचस्प व व्यावहारिक प्रतीत होती है, क्योंकि उन्होंने वही सब कुछ लिखा है जो वैज्ञानिक रूप से सिद्ध है और समझने में बहुत आसान है। मैंने खुद इसे पढ़ लिया है और इससे मैंने अपने आपको अचानक ही रूपांतरित सा व आध्यात्मिक रूप से उन्नत सा महसूस किया। यह एक आश्चर्यजनक, अनुपम व अविस्मरणीय पुस्तक है। इस पुस्तक का विस्तृत विवरण यहां उपलब्ध है-

अद्वैतपूर्ण, तांत्रिक, कुंडलिनी योग तकनीक (असली ध्यान), और आत्मज्ञान को एक अनुभवपूर्ण, दार्शनिक, व्यावहारिक, मानवीय, वैज्ञानिक और तार्किक तरीके से; सबसे अच्छे रूप में समझने योग्य, सत्यापित, स्पष्टीकृत, सरलीकृत, औचित्यीकृत, सीखने योग्य, निर्देशित, परिभाषित, प्रदर्शित, संक्षिप्त, और प्रमाणित किया गया है

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Kundalini versus Hypnotism/कुंडलिनी एक सम्मोहक

Kundalini/kundalini yoga is the best preventive measure and antidote for the effect of hypnotism. We think that hypnotism is a special thing, but it’s not so. All of us are hypnotizers to little or more extent. When some one is trying to become over influential among others, actually he is hypnotizing others unknowingly. In this way, all great leaders, rulers, artists etc. all are hypnotizers. Positive hypnotism leads to progress but negative hypnotism leads to downfall. Positive hypnotism means that hypnotizer is positively oriented and leads to positivity inside the hypnotized beings too. Negative hypnotism is just the reverse of it. Actually kundalini is also a positive hypnotizer and Kundalini yoga is an artificial means to amplify it. Kundalini is the mental image of a positively hypnotizing being/guru/devata/god/lover/consort inside one’s mind/brain. Therefore kundalini doesn’t allow the mental image of different street hypnotizers to occupy one’s brain for that kundalini has already occupied most of the space inside the brain of a kundalini yogi keeping no space vacant for the others/negative hypnotizers. Nondual hypnotizers like qualified guru or diety or god produces spiritual as well as material progress. Beings having uncontrolled and duality filled mind produce mostly downfall in both of these. Five Ms of tantra produce enhanced hypnotizing effect of any being. So, if used properly and under guidance, they produce very strong positive hypnotism otherwise negative one. The improper use of 5 Ms of tantra resulted into the defamation of tantra, the real science of mind/spiritualism. Religious extremism/terrorism is one of the best example of this misuse. If we take it in a positive way, stray hypnotisms give a tough competition to kundalini, so kundalini becomes more and more stronger.

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कुंडलिनी/कुंडलिनी योग सम्मोहन से बचाने वाली सबसे अच्छी युक्ति है। हम सोचते हैं कि सम्मोहन एक विशेष चीज है, पर ऐसा नहीं है। वास्तव में हम सभी एक-दूसरे को कम-अधिक मात्रा में सम्मोहित करते रहते हैं। जब कोई व्यक्ति दूसरों के बीच में अधिक ही प्रभावशाली बनने का प्रयत्न करता है, तब वह वास्तव में अनजाने में ही दूसरों को सम्मोहित कर रहा होता है। इस तरह से सभी महान नेता, शासक, कलाकार, धर्म गुरु आदि सम्मोहनकर्ता ही हैं। सकारात्मक सम्मोहन उन्नति की ओर ले जाता है, परंतु नकारात्मक सम्मोहन पतन की ओर। सकारात्मक सम्मोहन का अर्थ है कि सम्मोहनकर्ता सकारात्मक मानसिकता वाला है, जिससे वह अपने द्वारा सम्मोहित लोगों में भी सकारात्मकता भर देता है। नकारात्मक सम्मोहन इसके ठीक विपरीत होता है। वास्तव में कुण्डलिनी भी एक सकारात्मक सम्मोहक है, और कुण्डलिनी योग उसकी सम्मोहकता को बढ़ाने वाला एक अर्धकृत्रिम उपाय। कुण्डलिनी एक सकारात्मक सम्मोहनकर्ता/योग्य गुरु/देवता/प्रेमी/यौनप्रेमी का मन/मस्तिष्क में बना हुआ एक प्रगाढ़ चित्र ही है। इसलिए वह कुण्डलिनी चित्र इधर-उधर के सम्मोहनकर्ताओं के चित्रों को मन में घुसने नहीं देता, क्योंकि उस कुण्डलिनी ने पहले ही मन-मस्तिष्क की अधिकांश खाली जगह को भरा होता है, अतः नए चित्र के लिए स्थान ही नहीं बचता। अद्वैतमयी सम्मोहनकर्ता, जैसे कि गुणवान गुरु या इष्ट या देवता , आध्यात्मिक व भौतिक, दोनों प्रकार की उन्नति करवाते हैं। परंतु जिन सम्मोहनकर्ताओं का मन अनियंत्रित, अमानवीय व द्वैतपूर्ण है, वे ज्यादातर पतन ही करवाते हैं। तन्त्र के पंचमकार किसी व्यक्ति की सम्मोहकता में अत्यधिक वृद्धि करते हैं। इसलिए यदि ये ढंग से व उचित दिशा निर्देशन में प्रयोग किए जाएं, तब ये बहुत बलवान व सकारात्मक सम्मोहकता को उत्पन्न करते हैं, अन्यथा केवल नकारात्मक। इन पंचमकारों के दुरुपयोग से ही वह तंत्र दुनिया में बदनाम हुआ है, वास्तव में जो मन/आध्यात्मिकता का वास्तविक विज्ञान है। धार्मिक अतिकट्टरता/आतंकवाद इस दुरुपयोग का एक अच्छा उदाहरण है। यदि इसे सकारात्मक रूप में लें, तो इधर-उधर के सम्मोहन कुण्डलिनी को कड़ा मुकाबला देते हैं, जिससे कुण्डलिनी मजबूत होती रहती है।

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In honor of Ganesha parva/chaturthi (गणेश पर्व/चतुर्थी के सम्मान में)

Ganesh is not only an idol, but also a very good Kundalini carrier. Actually, mental Kundalini is worshipped indirectly through superimposing her over the physical structure of an idol. Otherwise how can a mental image be worshipped that is inseparable from the own self of the worshipper for one can worship the separately existing other thing only, not his own self. In this way, God Ganesha’s physical structure is simplest, semi real and non judgemental that’s why it doesn’t interfere with the process of focusing one’s mental image over it. On the other hand, too attractive/comparatively fully real idol-structures of other gods may interfere with this process little or more specially in case of an unaccustomed and novice kundalini meditator. Ganesha idol is an intermediary link between nonliving god-symbols (stone etc.) and fully personified god-statues/idols, thus having properties of both of these intermixed together. It is the Link between inanimate vedic deity symbols and full fledged personified gods of later history. His head of elephant is there only to replace that with the head of personified mental kundalini.

गणेश केवलमात्र एक मूर्ति नहीं है, अपितु एक सर्वोत्तम कुण्डलिनी वाहक भी है। वास्तव में कुण्डलिनी की  पूजा अप्रत्यक्ष रूप से, उसे देव-मूर्ति के ऊपर आरोपित करके की जाती है। नहीं तो मानसिक कुण्डलिनी की पूजा कैसे की जा सकती है, क्योंकि किसी दूसरी व बाहरी वस्तु की ही पूजा की जा सकती है, अपने आप की (मानसिक कुण्डलिनी के रूप में अभिव्यक्त) नहीं। इस मामले में, भगवान गणेश की सर्वसाधारण, कम वास्तविक व निष्पक्ष मूर्ति सर्वोत्तम प्रतीत होती है, क्योंकि वह अपने ऊपर कुण्डलिनी का आरोपण करवाने की ध्यानात्मक प्रक्रिया में अधिक व्यवधान उत्पन्न नहीं करती। दूसरी ओर अन्य देवी-देवताओं की आकर्षक व अपेक्षाकृत रूप से अधिक वास्तविक मूर्तियां उस प्रक्रिया के दौरान अपने प्रति आकर्षण पैदा करके, उस प्रक्रिया में व्यवधान उत्पन्न कर सकती हैं, विशेषकर के असहज व नए-नवेले कुण्डलिनी साधक के मामले में। गणेश की मूर्ति जड़ देव-प्रतिमाओं (पत्थर आदि) व पूर्णतः मनुष्याकृत देव-मूर्तियों के बीच की कड़ी है, अतः यह दोनों ही प्रकार की मूर्तियों के गुणों को अपने अंदर समाहित करती है। यह निर्जीव वैदिक देव प्रतिमाओं व अवांतर पूर्णमनुष्याकृत देव प्रतिमाओं के बीच की कड़ी है। इसको हाथी का शीश इसीलिए लगाया गया है, ताकि उसे मानसिक मनुष्याकृत कुण्डलिनी के शीश से मन से बदला जा सके।