योग से शारीरिक वजन को कैसे नियंत्रण में रखें- How to keep control over body weight through Yoga

योग से शारीरिक वजन को कैसे नियंत्रण में रखें (please browse down or click here to view post in English)

योग के साथ शारीरिक वजन घटता है। यहां तक ​​कि मैंने देखा है कि एक दिन के भारी काम के साथ भी मुझे अपनी पेंट के साथ बेल्ट लगाने की जरूरत महसूस होने लगती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मैं दैनिक योग अभ्यास की आदत रखता हूं। जब मैंने कड़ी मेहनत की, तब उसके साथ किए गए नियमित योग-अभ्यास से मेरी भड़की हुई भूख बहुत कम हो गई। इसलिए उस कड़ी मेहनत के साथ हुई वसा-हानि / fat loss को पुनर्निर्मित / recover नहीं किया गया, जिसके परिणामस्वरूप मेरा वजन घट गया। नियमित योग-अभ्यास के बिना सामान्य लोग भारी काम के बाद बहुत अधिक खाते हैं, इस प्रकार वे अपनी खोई हुई वसा का तुरंत पुनर्निर्माण कर लेते हैं। योग-अभ्यास दैनिक और हमेशा के लिए जारी रखा जाना चाहिए। यदि कोई अपना अभ्यास थोड़े समय के लिए जारी रखता है, जैसे कि यदि 2 महीने के लिए कहें, तो उसे अपने शरीर के वजन में कमी का अनुभव होगा। लेकिन अगर वह उसके बाद व्यायाम करना बंद कर देता है, तो उसकी योग से निर्मित शारीरिक व मानसिक शक्ति के पास भूख को उत्तेजित करने के अलावा अन्य कोई काम नहीं रहता है। इसके कारण उसे बहुत भूख लगती है, और वह बहुत भोजन, खासतौर से उच्च ऊर्जा वाले खाद्य पदार्थों को खाता है। इसके परिणामस्वरूप उसके शरीर की वसा का पर्याप्त निर्माण हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप उसके शरीर के वजन में एकाएक वृद्धि होती है, जो उसके पहले के मूल वजन को भी पार कर सकती है। तो निरंतर अभ्यास हमेशा जारी रखा जाना चाहिए। यह एक वैज्ञानिक और अनुभव से साबित तथ्य है कि खिंचाव वाली कसरतों / stretching exercises के अभ्यास से थोड़ी-बहुत कैलोरी जल जाती है। यद्यपि योग के अभ्यास से बड़ी मात्रा में कैलोरी जलाई नहीं जाती है, फिर भी ये अभ्यास शरीर को फिट, स्वस्थ और लचीला रखते हैं। यह किसी भी समय किसी भी प्रकार के साधारण या कठिन शारीरिक कार्य को कामयाबी व आसानी के साथ शुरू करने में मदद करता है, और व्यायामशाला के अभ्यास को भी अधिक कारगर बनाता है। इसके अलावा, यह पूरे शरीर में उचित अनुपात में रक्त के समान परिसंचरण में भी मदद करता है। इससे यह शरीर के रिमोट भंडारगृहों में जमा वसा की आसान निकासी में मदद करता है। उससे सभी कोशिकाओं को ऊर्जा के मुख्य स्रोत के रूप में वसा उपलब्ध हो जाती है। इसलिए शरीर भूख की कमी के लिए ऊर्जा की कमी का संदेश नहीं भेजता है, जिसके परिणामस्वरूप भारी भूख के बावजूद भारी भूख की रोकथाम होती है। परंतु आम लोगों में भारी काम के एकदम बाद भारी भूख भड़क जाती है, जिससे वे अपने खोए हुए वजन की भरपाई एकदम से कर लेते हैं। योग कुछ खास नहीं है, बल्कि भौतिक व्यायाम, सांस लेने और केंद्रित एकाग्रता को बढ़ाने का एक सहक्रियात्मक संयोजन है। फोकसड एकाग्रता / focused concentration इसके लिए विचारों के लिए नियंत्रक वाल्व / controlling valve के रूप में काम करती है, अराजक विचारों की अचानक भीड़ को रोकती है, जिससे इस प्रकार पेरानोइया/ paranoia और दिमाग को झूलने / mind swinging से रोकती है। जब अवचेतन मन में संचित विचार बहुत उत्तेजित हो जाते हैं, तो उन्हें दिमाग के अंदर ध्यान की केंद्रित छवि द्वारा धीरे-धीरे और सुरक्षित रूप से मुक्त करके छोड़ा जाता रहता है। साथ में, उन विचारों को बाँझ और गैर-हानिकारक बना दिया जाता है, या दूसरे शब्दों में कहें तो दृढ़ता से उत्तेजित विचार ध्यान की कुण्डलिनी छवि की कंपनी के कारण स्वयं ही शुद्ध हो जाते हैं। यह छवि दिन-प्रतिदिन की सांसारिक गतिविधियों से उत्पन्न होने वाली अराजक मानसिक गतिविधियों पर भी जांच रखती है। इसके कारण योग-अभ्यास के लिए एक जुनूनी शौक सा उत्पन्न हो जाता है, और इसे दैनिक कार्यक्रम से कभी भी गायब नहीं होने देता है। कुंडलिनी छवि पर केन्द्रित एकाग्रता के बिना योग-अभ्यास के साथ, योग अभ्यास के लिए शौक जल्द ही खो जाता है, और विभिन्न छिपे हुए विचारों की अराजकता की वजह से दैनिक क्रियाकलाप भी गंभीर रूप से पीड़ित हो जाते हैं।

तांत्रिक तकनीक मानसिक कुंडलिनी छवि को मजबूत करने और इस तरह से योग के प्रति लगन को बढ़ाने के लिए एक और गूढ़ चाल है। इसके परिणामस्वरूप पूरे श्वास में वृद्धि होती है, जिससे पूरे शरीर में पोषक तत्वों से समृद्ध और अच्छी तरह से ऑक्सीजनयुक्त रक्त की आपूर्ति में वृद्धि हो जाती है। इससे यह शरीर के वजन पर भी जांच रखता है। दरअसल तंत्र प्राचीन भारतीय आध्यात्मिकता से अलग कोई स्वतंत्र रूप का अनुशासन नहीं है। तभी तो वेद-शास्त्रों में इसका कम ही वर्णन आता है, जिससे इस रहस्य से अनभिज्ञ लोग महान तंत्र की सत्ता को ही नकारने लगते हैं। यह आत्मजागृति की ओर एक प्राकृतिक और सहज दौड़ / प्रक्रिया ही है। यह तो केवल विभिन्न आध्यात्मिक प्रयासों से पुष्ट की गई कुण्डलिनी को जागरण के लिए अंतिम छलांग / escape velocity ही देता है। यदि किसी की बुद्धि के भीतर कोई आध्यात्मिक उद्देश्य और आध्यात्मिक उपलब्धि नहीं है, तो अराजक बाहरी दुनिया के अंदर उपयोग में आ जाने के अलावा तांत्रिक शक्ति के लिए अन्य कोई रास्ता नहीं है। इसका मतलब है कि तांत्रिक तकनीक के लिए आवेदन से पहले कुंडलिनी छवि किसी के दिमाग में पर्याप्त रूप से मजबूत होनी चाहिए। तंत्र तो जागने के लिए कुंडलिनी को आवश्यक और अंतिम भागने की गति ही प्रदान करता है। यह आम बात भी सच है कि गुरु तांत्रिक साधना के साथ अवश्य होना चाहिए। वह गुरु दृढ़ता से चिपकने वाली मानसिक कुंडलिनी छवि के अलावा कुछ विशेष नहीं है। यही कारण है कि बौद्ध-ध्यान में, कई वर्षों के सरल सांद्रता-ध्यान के बाद ही एक योगी को तांत्रिक साधना लेने की अनुमति दी जाती है। लेकिन आज बौद्ध लोग, विषेशतः तिब्बती बुद्ध तंत्र सहित सभी रहस्यों को प्रकट करने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि अब वे लंबे समय से चल रहे बाहरी आक्रमण के कारण अपनी समृद्ध आध्यात्मिक विरासत को खोने से डर रहे हैं।

तंत्र के बारे में विस्तृत जानकारी इस वेबपोस्ट की स्रोत वेबसाईट / source website पर पढ़ी जा सकती है, व पूर्ण जानकारी के लिए निम्नांकित पुस्तक का समर्थन किया जाता है-

शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा), एक अनुपम ई-पुस्तक (हिंदी भाषा में, 5 स्टार प्राप्त, सर्वश्रेष्ठ व सर्वपठनीय उत्कृष्ट / अत्युत्तम / अनौखीरूप में समीक्षित / रिव्यूड ) को यहाँ क्लिक करके डाऊनलोड करें। यदि मुद्रित पुस्तक ही आपके अनुकूल है, तो भी, क्योंकि इलेक्ट्रोनिक डीवाईसिस / फोन आदि पर पुस्तक का निरीक्षण करने के उपरांत ही उसका मुद्रित-रूप / print version मंगवाना चाहिए, जो इस पुस्तक के लिए इस लिंक पर उपलब्ध है। धन्यवाद।

ई-रीडर व ई-बुक्स के बारे में विस्तार से जानने के लिए यहां क्लिक करें।

How to keep control over body weight through Yoga

Body weight decreases with yoga. Even I have noticed my pent becoming lose at waist even with one day of heavy physical work. This occurs because I am habitual of daily yoga practice. When I worked hard, routine yoga exercise along with that depressed my appetite due to my too tiredness. So fat loss with that hard work was not rebuilt up, which resulted in my weight loss. Ordinary people without routine yoga practice eat a lot after heavy work thus rebuilding up their lost fat immediately. Yogic exercises should be continued daily and forever. If anyone continues his exercises for short time, say for 2 months, then he would experience reduction in his body weight. But if he stops exercising after that, then his built up stamina has no way to work other than to provoke the voracious appetite. Due to this he becomes too hungry and eats foods especially high energy foods abundantly. This results in substantial build up of his body fat which results in his body weight gain again that can surpass even his earlier basic body weight. So exercises continued should be kept continued always. It is a scientifically and experientially proven fact that hathyogic stretching exercises burn down a moderate amount of calories. Although stretching type yoga exercises don’t burn major amount of calories yet these exercises keep body fit, healthy, active and flexible. This helps in undertaking of any type of simple or hard physical work at any time successfully and with ease, also making gym exercises more effective. Also, it also helps in uniform circulation of blood throughout the entire body in appropriate proportions. This helps in easy withdrawal of fat deposited in the remote storehouses of the body. This in turn makes that fat available to all the body cells as the main source of energy. Therefore body doesn’t send the message of energy shortage to the appetite centre, that results in inhibition of voracious appetite just as seen commonly after a heavy work. Yoga is nothing special but a synergistic combination of stretching exercises, breathing and focused concentration. Focused concentration works as a controller valve for thoughts for it prevents sudden rush of chaotic thoughts thus preventing build up of paranoia and mind swinging. When accumulated thoughts in subconscious mind becomes too agitated then those are made to be released slowly and safely by the meditatively focused image inside the mind. Those thoughts are made sterile and non harmful or in other words get purified due to company of that strongly shimmering meditative image. That image also keeps check over the chaotic mental activities arising out of day to day worldly activities. Due to this an interest is generated inside the yoga practice and it is never missed out of daily schedule. With yoga exercises without the focused concentration on a kundalini image, interest for yoga exercises is lost soon and daily schedule severally suffers due to the chaotic rush of various hidden thoughts.

Tantric technique is another trick to reinforce the mental kundalini image and thus to enhance up the yoga-interest. It also results in enhanced breathing thus profuse supply of nutrient rich and well oxygenated blood to the entire body. This also puts a check over body weight. Actually tantra is not a separate discipline at its own independent of the ancient Indian spiritualism. It is a natural and spontaneous run / process towards the awakening. It only reinforces the spiritual efforts as a final or leaping step to awakening. If there is no spiritual motive and spiritual achievement inside one’s intellect, then there is no way for tantric power to go other than to become used up inside the chaotic external world. It means that kundalini image should be enough strong inside one’s mind prior to the application of tantric technique. Tantra provides the required and final escape velocity to kundalini to awakening. This is true for the common saying that Guru must be there with tantric sadhna. That guru is nothing other than the firmly affixed mental kundalini image. This is the reason why in Buddhist meditation, a yogi is allowed to take over the tantric sadhna after spending many years of simple concentrating meditation. But today Buddhists especially Tibetan Buddhists are trying to reveal all the secrets including the tantra to the world for they are afraid of losing for ever their rich spiritual heritage due to the long persisting external invasion.

You can learn about tantra in detail at the parent website of this web post, and for full detail following book is recommended-

If you have found some benefit from this post, please download here the above mentioned e-book (in Hindi language, 5 star rated, reviewed as the best, excellent and must read by everyone). If only print version suits you, then too print version should only be got after testing that’s e- version on the electronic devices / phone etc., that is available on this link for this book. You can also find the complete information about this book, both in English as well as Hindi languages on the hosting website of this post. Thank you.

If you liked this post then please follow this blog providing your e-mail address, so that all new posts of this blog could reach to you immediately via your e-mail.

Know in full detail about e-readers and e-books here.

 

Could Dusshara-tragedy of Amritsar be avoided-क्या अमृतसर का दशहरा-हादसा टल सकता था?

Could Dusshara-tragedy of Amritsar be avoided-

Probably could have been avoided, or at least it could have minimally happened, if the following four fundamental principles once divulged by Premyogi vajra were kept in tune with a knot-

Not a big religion than humanity, not a big worship than work.

Not a bigger guru than a problem, not a big monastery from a householder.

Now we analyze all the phrases –

Not a big religion with humanity – It does not mean that religion should not be accepted. But it means that religion should not overpower humanity. If they were playing the religious rituals of Burning Ravana, then it does not mean that the security of themselves and others should be ignored. Humanity is hidden only in the safety and well-being of all living beings, especially humans. History is filled with inhuman atrocities in the name of religion, and it continues to be in sporadic form even today. If this phrase is settled in the heart by everyone, then it should be stopped immediately.

Do not worship more than work – This phrase does not mean that worship should not be done. It means that work should not be hindered due to worship, but help should be given only in the work. Then gradually the work begins to become a pooja / worship. The work of the people who visited Dussehra was that they would allow the ceremony to be done in a grand and secure manner, but in the worship of Ravana-combustion, they forgot that work, and made a great mistake in security. If this phrase was seated deep in their minds, then perhaps giving them correct directions, maybe giving them correct directions.

Not a big master than the problem – It does not mean that the master should not be respected. Guruseva / serving master is the biggest identity of humanity. This phrase means that even blind devotion should not be done towards a guru too. There should be a deep look at the problems because they also keep guiding. In fact, the gurus also learn direction from the problems. What sometimes happens is that the master ignorant of the problem is giving wrong directions. Even if the organizers of the ceremony asked to come to the maximum number of people, even if there was less space at the venue, then people should not have come, or should have gone back after seeing the problem of more crowds. Who ones would have been angry with this act, they would have lived. Seeing the problem of absence of the police should also have to go back. Surprisingly, people climbed to the railway tracks, yet they did not see the problem of running fast train probably coming soon. For the overall security, the future problem should also be assessed. Most of the incidents happen in the future by ignoring the problem that can be seen in the future, because the problem in front is visible to everyone. People would have guessed that they would go away after seeing the car. They did not think that one problem could also be that the speed of the train was very fast, and they could not even run away seeing it. They would have also thought that they would run away by listening to the vehicle’s voice. But their limited intellect was unable to assess the potential problem that the voice of the vehicle can not be heard even between the firecrackers and the noise of the people, as happened. They also thought that if they were standing on the track for a few seconds to avoid falling down Ravana, then what would happen to them? But they could not even assess the potential problem that at times, very rare incidents happen, and in those very few seconds, the carriage can reach there, and it had reached. Then comes, give priority to problems. To avoid the big problem, a small problem should be taken. If they were also troubled by the burning heat of Ravana, then that problem should have been taken to prevent the possible life-threatening problem by going on the track. Many times it takes a lot of time to make a decision, so the brain should be prepared for that time too. If this above phrase was always held, it would probably not be an accident. Another thing about “honee / destined” is By the way, it can be very weak if you try, if it can not be avoided. Then, like the diffuse bomb, it also becomes defused. No place is free from the problem, so always be alert while keeping the mind. Most of the scientific discoveries and inventions have been done while learning from the problems. It also means that if one doesn’t walk on the true path indicated by a true master, then problems try to make him walk on the same. It also means that when a man becomes troubled and disappointed from all around, then he prefers recluse and starts yoga meditation, which brings to him spiritual fruit immediately. The same happened to Premyogi vajra, hero of this hosting website and there said eBook. It also means that in most of the cases the defective man fires long spiritual speeches. Experiential and conduct full master only teaches through his conduct, speaking minimally only through signs. One of the many meanings of this phrase is that if anyone don’t walk in line with the humanity, then he is turned right way towards humanity by various types of problems.

Not a big monastery from a householder – This phrase means that there is no big meeting place, no religious place, bigger than a householder. If this thing was sitting in their mind, they would not leave their family and not run away to the problematic area, but perform religious rituals in their hometown / neighborhood. Even if they went away, they would have kept themselves safe by keeping their family in their mind in their strong desire to return back.

If you liked this post then please follow this blog providing your e-mail address, so that all new posts of this blog could reach to you immediately via your e-mail

क्या अमृतसर का दशहरा-हादसा टल सकता था-

शायद टल सकता था, या कम तो जरूर ही हो सकता था, यदि प्रेमयोगी वज्र द्वारा कभी उद्गीरित निम्नलिखित चार मूलभूत सिद्धांतों को गांठ बाँध कर याद रखा जाता-

मानवता से बड़ा धर्म नहीं, काम से बढ़ कर पूजा नहीं।

समस्या से बड़ा गुरु नहीं, गृहस्थ से बड़ा मठ नहीं।।

अब हम एक-२ करके सभी वाक्यांशों का विश्लेषण करते हैं-

मानवता से बड़ा धर्म नहीं- इसका अर्थ यह नहीं है कि धर्म को नहीं मानना चाहिए। अपितु इसका अर्थ है कि धर्म मानवता के ऊपर हावी नहीं हो जाना चाहिए। यदि वे रावण-दहन की धार्मिक रस्म को निभा रहे थे, तो इसका मतलब यह नहीं है कि अपनी और औरों की सुरक्षा को नजरअंदाज कर देना चाहिए था। मानवता सभी जीवधारियों की, विशेषतः मनुष्यों की सुरक्षा व हितैषिता में ही तो छिपी हुई है। इतिहास धर्म के नाम पर अमानवीय अत्याचारों से भरा पड़ा है, और आज भी छिटपुट रूप में ऐसा होता रहता है। यदि इस वाक्यांश को सभी के द्वारा ह्रदय में बसा लिया जाए, तो इस पर तुरंत रोक लग जाए।

काम से बढ़ कर पूजा नहीं- इस वाक्यांश का यह अर्थ नहीं है कि पूजा नहीं करनी चाहिए। इसका अर्थ यह है कि पूजा के कारण काम में बाधा नहीं पहुंचनी चाहिए, अपितु काम में सहायता ही मिलनी चाहिए। फिर धीरे-२ काम भी पूजा ही बनने लगता है। दशहरा देखने आए लोगों का काम था कि वे समारोह को भव्य रूप से व सुरक्षित रूप से संपन्न होने देते, परन्तु रावण-दहन रुपी पूजा के चक्कर में वे उस काम को ही भूल गए, और सुरक्षा में भारी चूक कर बैठे। यदि यह वाक्यांश उनके मन में गहरा बैठा होता, तो शायद उन्हें सही दिशा-निर्देश देता।

समस्या से बड़ा गुरु नहीं- इसका अर्थ यह नहीं है कि गुरु का सम्मान नहीं करना चाहिए। गुरुसेवा तो मानवता की सबसे बड़ी पहचान है। इस वाक्यांश का यही अर्थ है कि अंधभक्ति तो गुरु की भी नहीं करनी चाहिए। समस्याओं पर भी गहरी नजर रहनी चाहिए, क्योंकि वे भी दिशा-निर्देशित करती रहती हैं। वास्तव में गुरु भी समस्याओं से ही दिशा-निर्देशन सीखते हैं। कई बार क्या होता है कि वास्तविक समस्या से अनजान गुरु गलत दिशा-निर्देश दे रहे होते हैं। यदि समारोह-स्थल पर कम जगह होने के बावजूद समारोह के आयोजकों ने अधिक से अधिक संख्या में लोगों से आने के लिए कहा था, तो लोगों को आना नहीं चाहिए था, या अधिक भीड़ की समस्या को देखकर वापिस चले जाना चाहिए था। जिसने नाराज होना होता, वह होता रहता। पुलिस की गैरमौजूदगी की समस्या को देखकर भी वापिस चले जाना चाहिए था। हैरानी की बात है कि लोग रेल की पटड़ी पर चढ़ गए, फिर भी उन्हें तेजी से दौड़कर आने वाली समस्या नहीं दिखी। सम्पूर्ण सुरक्षा के लिए भविष्य की समस्या का आकलन भी करके रखना चाहिए। ज्यादातर हादसे भविष्य में हो सकने वाली समस्या को नजरअंदाज करके ही होते हैं, क्योंकि सामने खड़ी समस्या तो सबको दिख ही जाती है। लोगों ने यह अनुमान लगाया होगा कि वे गाड़ी को देखकर हट जाएंगे। उन्होंने यह नहीं सोचा कि एक समस्या यह भी हो सकती है कि गाड़ी की रप्तार बहुत तेज हो, और वे उसे देख कर भी भाग न सकें। उन्होंने यह भी सोचा होगा कि गाड़ी की आवाज को सुनकर वे भाग जाएंगे। परन्तु उनकी सीमित बुद्धि उस संभावित समस्या का आकलन नहीं कर पाई कि पटाखों व लोगों के शोर के बीच में गाड़ी की आवाज नहीं भी सुनाई दे सकती है, जैसा कि हुआ भी। उन्होंने यह भी सोचा होगा कि जल कर गिरते हुए रावण से बचने के लिए यदि वे कुछ सेकंडों के लिए पटरी पर खड़े होते हैं, तो उससे क्या होगा। परन्तु वे उस संभावित समस्या का भी आकलन नहीं कर पाए कि कई बार संयोगवश बहुत दुर्लभ घटनाएं भी हो जाती हैं, और उन्हीं चंद सैकंडों में भी गाड़ी वहां पहुँच सकती है, और वह पहुँची भी। फिर आता है, समस्याओं को प्राथमिकता देना। बड़ी समस्या से बचने के लिए छोटी समस्या को झेल लेना चाहिए। यदि जलते रावण की गर्मी से वे परेशान भी हो रहे थे, तो उस परेशानी को पटरी पर जाने से संभावित जीवनघाती समस्या को रोकने के लिए झेल लेना चाहिए था। कई बार निर्णय लेने के लिए बहुत कम समय मिलता है, इसलिए दिमाग को वैसे समय के लिए भी तैयार करके रखना चाहिए। यदि इस उपरोक्त वाक्यांश को हरदम धारण किया गया होता, तो शायद यह हादसा न होता। “होनी” की बात और है। वैसे अपने प्रयास से होनी को बहुत क्षीण तो किया ही जा सकता है, यदि टाला नहीं जा सकता। फिर डिफ्यूज बम्ब की तरह होनी भी डिफ्यूज हो जाती है। कोई भी स्थान समस्या से मुक्त नहीं है, इसलिए दिमाग लगाते हुए सदैव सतर्क रहना चाहिए। सभी वैज्ञानिक आविष्कार आदि समस्याओं से सीखकर ही हुए हैं। इसका एक अर्थ यह भी है कि यदि कोई सद्गुरु की बताई हुई सही राह पर नहीं चलता है, तो समस्याऐं उसे सही राह पर चलवाने का प्रयास करती हैं। इसका यह मतलब भी है कि जब व्यक्ति चारों ओर से समस्याओं व अपेक्षाओं का शिकार हो जाता है, तब वह एकांत के आश्रय से योगसाधना करता है और आध्यात्मिक उत्कर्ष को प्राप्त करता है। यही प्रेमयोगी वज्र के साथ भी हुआ, जो इस मेजबानी-वेबसाइट व वहां उल्लेखित ई-पुस्तक का नायक है। इसका एक अर्थ यह भी है कि अधिकांशतः दोषपूर्ण व्यक्ति ही खाली लम्बे-2 उपदेश देता है, असली गुरु तो अनुभवपूर्ण होता है, और अपने आचरण से ही सिखाता हुआ इशारों में ही बातें करता है। इस अनेकार्थक छंद का एक अर्थ यह भी है कि यदि कोई व्यक्ति मानवता के रास्ते पर नहीं चलता है, तब अनेक प्रकार की समस्याएं उसे सही रास्ते पर लाने का प्रयास करती हैं।

गृहस्थ से बड़ा मठ नहीं- इस वाक्यांश का यह अर्थ है कि गृहस्थ से बड़ा कोई सभा-स्थल नहीं, कोई धार्मिक-स्थल नहीं। यदि यह बात उनके मन में बैठी होती, तो वे अपने परिवार को छोड़कर वैसे समस्याग्रस्त क्षेत्र की ओर पलायन न करके अपने घर-पड़ौस में ही धार्मिक रस्म निभाते। और यदि चले भी जाते, तो भी अपने परिवार में वापिस लौटने की तीव्र ख्वाहिश रखते हुए अपने को सुरक्षित बचा कर रखते।

यदि आपने इस लेख/पोस्ट को पसंद किया तो कृपया इस वार्तालाप/ब्लॉग को अनुसृत/फॉलो करें, व साथ में अपना विद्युतसंवाद पता/ई-मेल एड्रेस भी दर्ज करें, ताकि इस ब्लॉग के सभी नए लेख एकदम से सीधे आपतक पहुंच सकें। धन्यवादम।

Kundalini versus Hypnotism/कुंडलिनी एक सम्मोहक

Kundalini/kundalini yoga is the best preventive measure and antidote for the effect of hypnotism. We think that hypnotism is a special thing, but it’s not so. All of us are hypnotizers to little or more extent. When some one is trying to become over influential among others, actually he is hypnotizing others unknowingly. In this way, all great leaders, rulers, artists etc. all are hypnotizers. Positive hypnotism leads to progress but negative hypnotism leads to downfall. Positive hypnotism means that hypnotizer is positively oriented and leads to positivity inside the hypnotized beings too. Negative hypnotism is just the reverse of it. Actually kundalini is also a positive hypnotizer and Kundalini yoga is an artificial means to amplify it. Kundalini is the mental image of a positively hypnotizing being/guru/devata/god/lover/consort inside one’s mind/brain. Therefore kundalini doesn’t allow the mental image of different street hypnotizers to occupy one’s brain for that kundalini has already occupied most of the space inside the brain of a kundalini yogi keeping no space vacant for the others/negative hypnotizers. Nondual hypnotizers like qualified guru or diety or god produces spiritual as well as material progress. Beings having uncontrolled and duality filled mind produce mostly downfall in both of these. Five Ms of tantra produce enhanced hypnotizing effect of any being. So, if used properly and under guidance, they produce very strong positive hypnotism otherwise negative one. The improper use of 5 Ms of tantra resulted into the defamation of tantra, the real science of mind/spiritualism. Religious extremism/terrorism is one of the best example of this misuse. If we take it in a positive way, stray hypnotisms give a tough competition to kundalini, so kundalini becomes more and more stronger.

If you liked this post then please follow this blog providing your e-mail address, so that all new posts of this blog could reach to you immediately via your e-mail.

कुंडलिनी/कुंडलिनी योग सम्मोहन से बचाने वाली सबसे अच्छी युक्ति है। हम सोचते हैं कि सम्मोहन एक विशेष चीज है, पर ऐसा नहीं है। वास्तव में हम सभी एक-दूसरे को कम-अधिक मात्रा में सम्मोहित करते रहते हैं। जब कोई व्यक्ति दूसरों के बीच में अधिक ही प्रभावशाली बनने का प्रयत्न करता है, तब वह वास्तव में अनजाने में ही दूसरों को सम्मोहित कर रहा होता है। इस तरह से सभी महान नेता, शासक, कलाकार, धर्म गुरु आदि सम्मोहनकर्ता ही हैं। सकारात्मक सम्मोहन उन्नति की ओर ले जाता है, परंतु नकारात्मक सम्मोहन पतन की ओर। सकारात्मक सम्मोहन का अर्थ है कि सम्मोहनकर्ता सकारात्मक मानसिकता वाला है, जिससे वह अपने द्वारा सम्मोहित लोगों में भी सकारात्मकता भर देता है। नकारात्मक सम्मोहन इसके ठीक विपरीत होता है। वास्तव में कुण्डलिनी भी एक सकारात्मक सम्मोहक है, और कुण्डलिनी योग उसकी सम्मोहकता को बढ़ाने वाला एक अर्धकृत्रिम उपाय। कुण्डलिनी एक सकारात्मक सम्मोहनकर्ता/योग्य गुरु/देवता/प्रेमी/यौनप्रेमी का मन/मस्तिष्क में बना हुआ एक प्रगाढ़ चित्र ही है। इसलिए वह कुण्डलिनी चित्र इधर-उधर के सम्मोहनकर्ताओं के चित्रों को मन में घुसने नहीं देता, क्योंकि उस कुण्डलिनी ने पहले ही मन-मस्तिष्क की अधिकांश खाली जगह को भरा होता है, अतः नए चित्र के लिए स्थान ही नहीं बचता। अद्वैतमयी सम्मोहनकर्ता, जैसे कि गुणवान गुरु या इष्ट या देवता , आध्यात्मिक व भौतिक, दोनों प्रकार की उन्नति करवाते हैं। परंतु जिन सम्मोहनकर्ताओं का मन अनियंत्रित, अमानवीय व द्वैतपूर्ण है, वे ज्यादातर पतन ही करवाते हैं। तन्त्र के पंचमकार किसी व्यक्ति की सम्मोहकता में अत्यधिक वृद्धि करते हैं। इसलिए यदि ये ढंग से व उचित दिशा निर्देशन में प्रयोग किए जाएं, तब ये बहुत बलवान व सकारात्मक सम्मोहकता को उत्पन्न करते हैं, अन्यथा केवल नकारात्मक। इन पंचमकारों के दुरुपयोग से ही वह तंत्र दुनिया में बदनाम हुआ है, वास्तव में जो मन/आध्यात्मिकता का वास्तविक विज्ञान है। धार्मिक अतिकट्टरता/आतंकवाद इस दुरुपयोग का एक अच्छा उदाहरण है। यदि इसे सकारात्मक रूप में लें, तो इधर-उधर के सम्मोहन कुण्डलिनी को कड़ा मुकाबला देते हैं, जिससे कुण्डलिनी मजबूत होती रहती है।

यदि आपने इस लेख/पोस्ट को पसंद किया तो कृपया इस वार्तालाप/ब्लॉग को अनुसृत/फॉलो करें, व साथ में अपना विद्युतसंवाद पता/ई-मेल एड्रेस भी दर्ज करें, ताकि इस ब्लॉग के सभी नए लेख एकदम से सीधे आपतक पहुंच सकें। धन्यवादम।

 

Tantralaya in place of Vaishyalaya/वैश्यालय के स्थान पर तंत्रालय

Prostitute centres/vaishyalaya should be socialised and channelized/transformed into the spiritual/kundalini realm with help of tantra, just as the household sexual activities are transformed by it. In this way, number one misconduct would become as a number one kundalini uplifting machine. Honor of woman would also be saved, she being appearing as tantra-godess in this way. With help of the present time health screening and health check ups, tantra yoga would become fully safe unlike that in old times when diseases used to spread to each others during such tantric feasts. There should be appointed well qualified tantric gurus in those community tantra centres. Illegal sexual relationships with accompanied crimes would automatically come down. Many psychological diseases due to restricted sexuality would come down. There would be done nothing additional to the present scenario but the proustite centres already existing would be transformed only.

वेश्यालय केंद्र / वैश्यालय को सामाजिक सहायता और चैनलिंग की मदद से आध्यात्मिक / कुंडलिनी क्षेत्र में परिवर्तित / रूपांतरित किया जाना चाहिए, जैसे कि घरेलू यौन गतिविधियों को इसके द्वारा बदल दिया जा सकता है। इस तरह, नंबर एक दुर्व्यवहार एक कुंडलिनी उत्थान मशीन के रूप में बन जाएगा। महिला का सम्मान भी बचाया जाएगा, वह इस तरह से तंत्र-देवी के रूप में दिखाई देगी। वर्तमान समय में स्वास्थ्य जांच और स्वास्थ्य जांच की सहायता से, तंत्र योग उस पुराने समय की अपेक्षा पूरी तरह से सुरक्षित हो जाएगा, जब यौनसंबंध बीमारियों को एक दूसरे के बीच में फैलाता था। उन समुदाय-तंत्र-केंद्रों में अच्छी तरह से योग्य तांत्रिक गुरु नियुक्त किया जाना चाहिए। इसके साथ ही अपराधों के साथ अवैध यौन संबंध नीचे आ जाएंगे। प्रतिबंधित कामुकता के कारण होने वाले कई मनोवैज्ञानिक रोग नीचे आ जाएंगे। वर्तमान परिदृश्य के लिए कुछ भी अतिरिक्त नहीं किया जाएगा, लेकिन पहले से मौजूद वैश्यावृत्ति-केंद्र केवल तब्दील हो जाएंगे।

 

Happy Guru poornima, 2018- गुरु पूर्णिमा २०१८ के सम्मान में

Guru can not be defined, praised, described, advertised or forcefully made. Guru is in the form of one’s own self. How can that be praised or described in anyway. Guru can only be experienced.

The same happened to Premyogi vajra. He is totally dumb regarding a Guru. He has only experiential account that he cannot describe in anyway. When he tries to describe Guru as something special, then he loses his essence totally. It is just like as if anyone can taste the sweet but cannot describe the sweetness in a true form. When he tries to describe sweetness, he loses that’s joy suddenly. Guru is a friend, not a friend, both of these and neither of these. Guru is a well wisher, not a well wisher, both of these and neither of these. Guru helps in spiritual progress, not helps in spiritual progress, both of these and neither of these. Guru has a specific age, not has a specific age, both of these and neither of these. Guru has a specific set of qualities, don’t have a specific set of qualities, both of these and neither of these. Guru is spiritually advanced, not spiritually advanced, both of these and neither of these. Guru is beloved, not beloved, both of these and neither of these. Guru is too respected, not too respected, both of these and neither of these. Guru is well known and established socially, not well known and established socially, both of these and neither of these. Guru loves his disciple, don’t love his disciple, both of these and neither of these. Guru showcases himself as a Guru, doesn’t showcase himself as a Guru, both of these and neither of these. Guru can be searched for or one can be made as a Guru deliberately/forcefully, can not be searched for or one can not be made as a Guru deliberately/forcefully, both of these and neither of these. Guru appears in one’s life through his attraction towards one’s tantric consort, it doesn’t happen so, both of these and neither of these. Guru itself searches his disciple, it’s not so, both of these and neither of these. Guru is non dual, he is dual, both of these and neither of these. Guru takes credit of his disciple’s spiritual progress, he doesn’t do so, both of these and neither of these. Guru is a family member, not a family member, both of these and neither of these. Guru is an elder one, not an elder one, both of these and neither of these. Guru is selfish and want to solve his purpose, it’s not like this, both of these and neither of these. Guru is must in life, it’s not so, both of these and neither of these. Guru is a special God gift, it’s not so, both of these and neither of these. Guru is punishing, he is not punishing, both of these and neither of these. Guru is everywhere, he is no where, both of these and neither of these. Guru is one’s second mother for he gives one second birth into an enlightened life, it’s not so, both of these and neither of these. Guru is must for awakening, he is not must for awakening, both of these and neither of these. Guru is everything, he is nothing, both of these and neither of these. Guru accepts one when he is rejected from everywhere, it’s not so, both of these and neither of these. One can be fully sure if who one is his Guru, it’s not so, both of these and neither of these. Guru is one’s Kundalini/focused mental image that can be lifted up most easily through tantra, it’s not so, both of these and neither of these. Guru doesn’t provide mere knowledge but love and mental support too for mere knowledge can also be provided by Google, it’s not so, both of these and neither of these. It is a long list and covers every humanely attributes.

Actually, Guru is indescribable just like God. Majority of people who go on beating the drums outside for Guru actually don’t know even the ABC of Guru. Guru is made in heart. Guru is made in mind. Actually not made deliberately but all happen spontaneously in a love full social environment. People who don’t know what is love, they can’t understand Guru. No one can exposé one that is hardly attached to the heart. No one can exposé one that is hardly attached to the mind.

गुरु को परिभाषित, प्रस्तावित व विज्ञापित नहीं किया जा सकता; और न ही किसी को जबरदस्ती गुरु बनाया जा सकता है। गुरु तो किसी के अपने स्वयं के / आत्मा के रूप में ही होते है। भला अपना रूप कैसे किसी के द्वारा वर्णित या प्रशंसित किया जा सकता है। गुरु केवल अनुभव ही किए जा सकते हैं।

प्रेमयोगी वज्र के साथ भी यही हुआ। वह गुरु के बारे में पूरी तरह से गूंगा है। उसके पास केवल अनुभवात्मक विवरण है, जिसे वह किसी भी तरह से वर्णित नहीं कर सकता है। जब वह गुरु को किसी विशेष रूप में वर्णित करने का प्रयास करता है, तो वह उसका सार पूरी तरह से खो देता है। यह ऐसे होता है, जैसे कोई भी व्यक्ति मीठा स्वाद तो ले सकता है, लेकिन मिठास को एक वास्तविक रूप में वर्णित नहीं कर सकता है। जब वह व्यक्ति मधुरता का वर्णन करने की कोशिश करता है, तो वह अचानक उसकी खुशी / मिठास को खो देता है। गुरु एक दोस्त है, दोस्त भी नहीं, इनमें से दोनों भी है, और इनमें से कोई भी नहीं। गुरु एक शुभचिंतक है, नहीं भी है, दोनों भी है, और इन दोनों में से कोई भी नहीं। गुरु आध्यात्मिक प्रगति में मदद करता है, नहीं भी करता है, दोनों भी सत्य हैं, इन दोनों में से कोई भी सत्य नहीं है। गुरु की एक विशिष्ट उम्र है, उसकी कोई भी विशिष्ट उम्र नहीं है, इनमें से दोनों भी, और कोई भी नहीं। गुरु के अन्दर विशिष्ट गुणों का एक समूह होता है, नहीं भी होता है, इनमें से दोनों भी, और इनमें से कोई भी नहीं है। गुरु आध्यात्मिक रूप से उन्नत है, आध्यात्मिक रूप से उन्नत नहीं भी है, इनमें से दोनों भी है, और इनमें से कोई भी नहीं। गुरु प्रिय हैं, प्रिय नहीं भी हैं, इनमें से दोनों, और इनमें से कोई भी नहीं। गुरू बहुत सम्मानित हैं, नहीं भी हैं, इनमें से दोनों भी हैं, और इनमें से कोई भी नहीं है। गुरु अच्छी तरह से जाना-माना होता है, और सामाजिक रूप से अच्छी तरह से स्थापित होता है, अच्छी तरह से ज्ञात और सामाजिक रूप से स्थापित नहीं भी होता, इनमें से दोनों भी, और इनमें से कोई भी नहीं। गुरु अपने शिष्य से प्यार करते हैं, प्यार नहीं भी करते, इनमें से दोनों भी, और इनमें से कोई भी नहीं। गुरु खुद को गुरु के रूप में दिखाता है, नहीं भी दिखाता है, इन दोनों में से दोनों ही, और इनमें से कोई भी नहीं। गुरु की खोज की जा सकती है, या किसी को जानबूझकर / बलपूर्वक गुरु के रूप में बनाया जा सकता है; उसे नहीं भी खोजा जा सकता है, या जानबूझकर / बलपूर्वक नहीं भी बनाया जा सकता है, इन दोनों में से दोनों ही, और दोनों में से कोई भी नहीं। गुरु किसीके जीवन में उसकी तांत्रिक प्रेमिका / प्रेमी के प्रति आकर्षण के माध्यम से प्रकट होता है, ऐसा नहीं भी होता है, इनमें से दोनों भी, और इनमें से कोई भी नहीं। गुरु स्वयं ही अपने शिष्य की खोज करता है, ऐसा नहीं है, इनमें से दोनों भी, और इनमें से कोई भी नहीं। गुरु द्वैतमयी नहीं है, वह द्वैतमयी है भी, इनमें से दोनों भी, और इनमें से कोई भी नहीं। गुरु अपने शिष्य की आध्यात्मिक प्रगति का श्रेय स्वयं को देते हैं, वह ऐसा नहीं करते हैं, इनमें से दोनों भी, और इनमें से कोई भी नहीं। गुरु एक परिवार का सदस्य है, वह शिष्य के परिवार का सदस्य नहीं है, इनमें से दोनों भी, और इनमें से कोई भी नहीं। गुरु एक वृद्ध व्यक्ति हैं, ऐसा नहीं है, इनमें से दोनों भी, और इनमें से कोई भी नहीं। गुरु स्वार्थी हैं, और अपने उद्देश्य को हल करना चाहते हैं; ऐसा नहीं है, इनमें से दोनों भी, और इनमें से कोई भी नहीं। गुरु जीवन में जरूरी है, ऐसा नहीं है, इनमें से दोनों भी, और इनमें से कोई भी नहीं। गुरु भगवान का दिया हुआ एक विशेष उपहार है, ऐसा नहीं है, इनमें से दोनों भी, और इनमें से कोई भी नहीं। गुरु दंडित करते हैं, वह दण्डित नहीं करते हैं, इनमें से दोनों, और इनमें से कोई भी नहीं। गुरु हर जगह है, वह कहीं नहीं है, इनमें से दोनों भी, और इनमें से कोई भी नहीं है। गुरु एक दूसरी मां है, क्योंकि वह एक दूसरे जन्म को एक प्रबुद्ध जीवन के रूप में देता है, ऐसा नहीं है, इनमें से दोनों भी, और इनमें से कोई भी नहीं। गुरु आत्मजागृति के लिए जरूरी है, जरूरी नहीं है,  इन दोनों में से दोनों भी, और इनमें से कोई भी नहीं। गुरु सब कुछ है, वह सब कुछ नहीं है, इनमें से दोनों भी है, और इनमें से कुछ भी नहीं है। जब कोई व्यक्ति हर जगह से खारिज कर दिया जाता है, तो गुरु उसको स्वीकार करता है, ऐसा नहीं है, इनमें से दोनों भी, और इनमें से कोई भी नहीं। कोई पूरी तरह से सुनिश्चित कर सकता है कि कौन उसका गुरु है, ऐसा नहीं है, इनमें से दोनों भी, और इनमें से कोई भी नहीं। गुरु एक कुंडलिनी / केंद्रित मानसिक छवि है, जिसे तंत्र के माध्यम से मूलाधार से सबसे आसानी से उठाया जा सकता है, ऐसा नहीं है, इनमें से दोनों भी हैं, और इनमें से कोई भी नहीं है। गुरु केवल ज्ञान ही प्रदान नहीं करते हैं, बल्कि ज्ञान के साथ प्यार और मानसिक सहायता / सहानुभूति भी, क्योंकि खाली ज्ञान तो Google / गूगल के द्वारा भी प्रदान किया जा सकता है; ऐसा नहीं है, इनमें से दोनों बातें भी सत्य हैं, और इनमें से कोई भी सत्य नहीं। यह एक लंबी सूची है, जो हर मानवीय विशेषताओं को शामिल करती है।

दरअसल, गुरु भगवान की तरह अवर्णनीय है। गुरु के मामले में बाहरी प्रचार के ड्रम / ढोल को बजाने वाले अधिकांश लोग वास्तव में गुरु के एबीसी / कखग को भी नहीं जानते हैं। गुरु दिल में बना होता है। गुरु को दिमाग में बनाया गया होता है। वास्तव में गुरु को जानबूझकर नहीं बनाया गया होता है, लेकिन वे एक पूर्ण सामाजिक व प्रेमभरे वातावरण में सहजता से स्वयं ही मस्तिष्क में प्रतिष्ठित हुए होते हैं। जो लोग नहीं जानते कि प्यार क्या है, वे गुरु को नहीं समझ सकते हैं। कोई भी उस व्यक्ति को उजागर नहीं कर सकता, जो दिल से मजबूती के साथ जुड़ा हुआ होता है। कोई भी उस व्यक्ति को एक्सपोज़ नहीं कर सकता है, जो दिमाग / मन से मजबूती के साथ जुड़ा हुआ होता है।

Tantric Guru and tantric consort- तांत्रिक गुरु और तांत्रिक प्रेमिका

The permanent stationing of guru inside one’s mind is best achieved through sexual tantra, just as happened with Premyogi vajra as described on Home-2 webpage. His first exposure with his sexual consort(non marital)/Queen during he being in loving company of his guru(the same spiritual old man) was pure mental/one time indirect initiation/indirect tantra based as told in detail on webpages, love story of a yogi, scattered throughout. Therein queen was as if his activated kundalini and was led through the wonderful/too rich romantic lures in his mind to his enlightenment in too short time of 2 years by the spontaneous grace of his pauranic(who reads puranas/collections of ancient Indian spiritual stories in Sanskrit, daily) guru’s company, even without her awakening. On second occasion, his that and then demised physical guru’s mental image as his second kundalini was enriched too much with his non dual life style and that image’s connection with the repeatedly remembered image of the first consort(indirectly sexual) in about 15 years. Then in the last, Premyogi vajra lifted up that kundalini to  her awakening with the help of the direct sexual tantra with his second consort(marital), as described on the same homepage in brief and love story of a yogi-7 in detail.

मन के अन्दर गुरु के स्थायी रख-रखाव को यौन तंत्र के माध्यम से सबसे अच्छी तरह से हासिल किया जा सकता है, जैसा कि होम -2 वेबपृष्ठ पर वर्णित प्रेमयोगी वज्र के साथ हुआ था। अपनी प्रथम यौनप्रेमिका / प्रथम देवीरानी (अविवाहित) से संपर्क में रहने के दौरान वह अपने गुरु (वही आध्यात्मिक बूढ़े आदमी) की निरंतर प्रेमपूर्ण संगति में भी बना हुआ था। प्रथम देवीरानी के साथ वह संपर्क शुद्ध मानसिक / एकबार के अप्रत्यक्ष तांत्रिक प्रारम्भ (इनिशिएशन) / अप्रत्यक्षतंत्र से प्रेरित था। यह सारा वर्णन वेबपेजिस “love story of a yogi” पर किया गया है। वही देवीरानी उसकी सक्रिय कुंडलिनी के रूप में थी, और उसके दिमाग में उसके उपरोक्त पौराणिक गुरु द्वारा पढ़ी गई कथाओं की सहज कृपा से अत्यद्भुत / बहुत ही समृद्ध रोमांटिक लालचों के माध्यम से, 2 वर्षों के बहुत कम समय में उसके आत्मज्ञान के लिए चरम मानसिक अभिव्यक्ति तक ले जाई गई, उन्हीं गुरु की संगति से, जो प्रतिदिन प्राचीन भारतीय आध्यात्मिक कहानियों के संग्रह / पुराण पढ़ा करते थे, उस कुण्डलिनी की सैद्धांतिक जागृति के बिना ही। दूसरे मौके पर, उन्होंने अपनी दूसरी कुंडलिनी के रूप में अपने उन्हीं भौतिक गुरु की मानसिक छवि को अपनी अद्वैतपूर्ण जीवन शैली के साथ समृद्ध किया, और पहली देवीरानी (परोक्ष रूप से यौनसम्बन्धी) की बार-बार याद की गई छवि के साथ अपने गुरु की छवि का संबंध जुड़ा होने के कारण, गुरु की छवि भी काफी समृद्ध हो गई, लगभग 15 वर्षों में। फिर आखिर में, प्रेमयोगी वज्र ने अपनी दूसरी कंसोर्ट / प्रेमिका (वैवाहिक) के साथ सीधे / प्रत्यक्ष यौनतंत्र की मदद से अंतिम जागृति के लिए उस कुंडलिनी को उठाया, जैसा कि उपरोक्त होमपेज पर ही संक्षेप में और “love story of a yogi-7” में विस्तार से वर्णित है।