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कुंडलिनी शक्ति ही अंधेरे से संपूर्ण सृष्टि की रचना करती है

गुप्त कालचक्र मुझे अवचेतन मन का खेल लगता है। आदमी के हरेक अंग से संबंधित सूचना उससे संबंधित चक्र में छुपी होती है। ये पिछले अनगिनत जन्मों की सूचनाएं होती हैं, क्योंकि सभी जीवों के शरीर, उनके क्रियाकलाप, उनसे जुड़ी भावनाएं और चक्र सभी लगभग एकजैसे ही होते हैं, मात्रा में कम ज्यादा का या रूपाकार का अंतर हो सकता है। चक्रों पर ध्यान करने से वे सूचनाएं प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में प्रकट होकर मिटती रहती हैं। जब स्थूल मन की सफाई हो जाती है, तब आदमी सूक्ष्म मन की सफाई के लिए खुद ही चक्रसाधना की ओर मुड़ता है। जैसे स्थूल मन की अवस्था समय के साथ प्रतिपल बदलती रहती है, वैसे ही सूक्ष्म अवचेतन मन की भी बदलती रहती है, क्योंकि सूक्ष्म मन भी स्थूल मन का ही प्रतिबिंब है, पर वह हमें नजर नहीं आता। इसीलिए इसे गुप्त कालचक्र कहते हैं। मतलब कि अगर अवचेतन मन पूरा साफ भी कर लिया तो इसकी कोई गारंटी नहीं कि यह फिर गंदा नहीं होगा। सभी चक्रों का ऊर्जा स्तर बदलता महसूस होता रहेगा चक्रसाधक को। काल के थपेड़ों से कुछ नहीं बच सकता। इसलिए भलाई इसी में है कि जो है, उसे स्वीकार करते रहो हर स्थिति में बराबर और अप्रभावित से बने रहते हुए। यही वैकल्पिक कालचक्र है। यही गुप्तकालचक्र साधना का मुख्य उद्देश्य लगता है मुझे।

कुंडलिनी शक्ति सृष्टि का निर्माण करती है, जो यह कहा जाता है इसका यह अर्थ नहीं लगता कि वह अंतरिक्ष के ग्रह तारों आदि भौतिक और स्थूल पिंडों का निर्माण करती है। बल्कि ज्यादा युक्तियुक्त तो यह अर्थ लगता है कि वह प्रजनक संभोगशक्ति के जैसी है जो एक बच्चे को जन्म देती है और उसके शरीर और मनमस्तिष्क के रूप में संपूर्ण सृष्टि का निर्माण करती है। हालांकि पहले वाली उक्ति भी अप्रत्यक्ष रूप से सही हो सकती है, क्योंकि जो पिंड में है वही ब्रह्मांड में है, पर दूसरी उक्ति तो प्रत्यक्ष, व्यवहारिक व स्पष्ट रूप से सत्य दिखती है।

कई लोग बोल सकते हैं कि संभोग शक्ति तो वंश परंपरा को बढ़ाने के लिए है, उसमें कुंडलिनी कहां से आ गई। आदमी तो कुछ भी मायने निकाल सकता है उस शक्ति के। अगर उसका असली उद्देश्य जानना हो तो पशु को देखना चाहिए। ये अपनी सोच या लक्ष्य के हिसाब से नहीं बल्कि कुदरती प्रेरणा या इंस्टिंक्ट अर्थात स्वाभाविक प्रवृत्ति से ज्यादा चलते हैं। उनके मन में संतानोत्पत्ति का उद्देश्य नहीं होता संभोग को लेकर। वे तो अज्ञान के अंधेरे में संकुचित मन को विस्तार देने के लिए ही संभोग के लिए प्रेरित होते हैं, वह भी तब जब प्राकृतिक अनुकूल परिस्थितियां उन्हें इसके लिए प्रेरित करे, ऐसे तो इसके लिए भी अपनेआप उनमें लालसा पैदा नहीं होती। एक भैंस और भैंसा तभी इसके लिए प्रेरित होंगे जब भैंस मद में अर्थात हीट में होगी जो महीने में एक या दो दिन के लिए आती है। गर्मियों के मौसम में तो वह हीट आना भी बंद हो जाता है। अन्य समय तो दोनों साथ में रहते हुए भी संभोग नहीं करेंगे। पर जब मद में होती है तो जानकार मानते हैं कि भैंस पच्चीस किलोमीटर तक भैंसे को खोजते हुए अकेले निकल सकती है, बेशक वह रास्ते में मर ही क्यों न जाए। आदमी विकसित प्राणी है। वह कुदरती नियमों से लाभ लेना जानता है। तंत्रयोगी एक कदम और आगे है। वह अंधेरे में संकुचित मन की एक ध्यानचित्र के रूप में छोटी सी लौ जलाता है। फिर वह उसे संभोगसहायित योग से इतना ज्यादा बढ़ाता है कि वह जागृत हो जाती है। यही कुंडलिनी जागरण है। अब चाहे ध्यानचित्र के रूप में संकुचित मन को कुंडलिनी कहो या अंधेरे में संकुचित मन को। बात एक ही है क्योंकि वही अंधेरा ध्यानसाधना से विकसित होकर ध्यानचित्र बन जाता है। जो संभोग शक्ति उसे विकसित होने का बल देती है, वह मूलाधार मतलब अंधेरे कुंड में रहती है, इसीलिए इसका नाम कुंडलिनी है। मतलब ध्यानचित्र का कुंडलिनी नाम तभी पड़ा जब उसे संभोग शक्ति अर्थात वीर्यशक्ति का बल मिला। मतलब कुंडलिनी शब्द ही तांत्रिक है। आम आदमी अंधेरे में या अनगिनत क्षुद्र और हल्के विचारों में संकुचित मन के साथ सीधे ही संभोग करता है, जिससे अनगिनत विचारों में वह शक्ति बंट जाती है। इससे उसे दुनियावी विस्तार या तरक्की तो मिल सकती है, पर जागृति के लाभ कम ही मिलते हैं।

जब शक्ति मूलाधाररूपी कुंड के अंधेरे में घुसती है, तभी जीव संभोग की ओर आकृष्ट होता है। हमेशा पूर्ण ज्ञान के प्रकाश में रहने वाले व्यक्ति का तो संभोग का मन ही नहीं करता। मेरे एक खानेपीने वाले एक वरिष्ठ अनुभवी मित्र थे जिन्होंने मुझे एकबार कहा था कि अगर मैं मांसाहार नहीं करूंगा तो संभोग कैसे कर पाऊंगा। मैं उस बात को मन से नहीं मान पाया था। आज मैं उनकी बात में छिपे तंत्र दर्शन को समझ पा रहा हूं। अंधेरा सिर्फ़ खानेपीने से ही पैदा नहीं होता। दुनियादारी में आसक्ति से कर्मशील रहते हुए भी पैदा होता है। मुझे लगता है कि शरीर की बनावट ही ऐसी है कि मस्तिष्क या मन का अंधेरा जैसे जैसे बढ़ता है, वैसे वैसे ही शक्ति नीचे जाती है। सबसे ज्यादा या घुप्प अंधेरे का मतलब है कि शक्ति मूलाधार पर इकट्ठी हो गई है। यह रक्तसंचार ही है जो कुदरतन नीचे की ओर इकट्ठा होता रहता है। मूलाधार तक पहुंचकर शक्ति फिर पीठ से होकर सीधी मस्तिष्क को चढ़ जाती है। मूलाधार पर शक्ति के पहुंचने से स्वाभाविक है कि वहां के यौनांग क्रियाशील हो जाएंगे। कई संयम रखकर उस शक्ति को वापिस ऊपर जाने का मौका देते हैं। कई तांत्रिक विधि से उसे बढ़ा कर फिर बढ़ी हुई मात्रा को ऊपर चढ़ाते हैं, और कई गिरा देते हैं। शक्ति के गिरने से मूलाधार में शक्ति फिर इकट्ठी होने लगती है जिसमें पहले से ज्यादा समय लग जाता है। अच्छी खुराक से वह जल्दी इकट्ठी होती है पर उसमें पापकर्म भी शामिल हो सकता है। साथ में, भोजन को पचाने और उसे शरीर में लगाने में भी ऊर्जा खर्च होती है, मतलब कुल मिलाकर प्राण ऊर्जा की हानि ही होती है। फिर ऐसे ही होगा कि आगे दौड़ और पीछे चौड़। इन साधारण लोकोक्तियों के बड़े गहन अर्थ होते हैं। चौड़ मतलब कुंडलिनी सर्पिणी का कुंडल। मतलब शक्ति पाप के अंधेरे के रूप में सो जाती है, बेशक उसे उस अंधेरे की शक्ति से ही ऊपर चढ़ाया गया हो। पर मुझे लगता है कि उतना पाप खाने पीने से नहीं लगता जितना दुनिया में आसक्तिपूर्ण व्यवहार से लगता है। इसीलिए तो शिव भूतों की तरह खाने पीने वाले दिखते हुए भी मस्तमलंग, निस्संग और निष्पाप बने हुए विचरते रहते हैं। पर जब आदमी का मन या आत्मा इतना साफ हो जाएगा कि उसमें अंधेरा होगा ही नहीं बेशक शक्ति मूलाधार को गई हुई हो, तब क्या होगा। शायद तब बिना संभोग के उसकी शक्ति ऐसे ही घूमती रहेगी। उसे यौनोन्माद भी होगा, इरेक्शन भी होगा, पर वह भौतिक संभोग के प्रति ज्यादा प्रेरित नहीं होगा, क्योंकि उसे महसूस होगा कि उससे शक्ति की हानि है, बेशक कितनी ही सावधानी क्यों न बरती जाए। मुलाधार में शक्ति के समय उसके मन में किसी कामुक स्त्री का चित्र छा सकता है, और सहस्रार में शक्ति के समय किसी गुरु या आध्यात्मिक व्यक्ति या प्रेमी पुरुष का। पर वह दोनों से ही अनासक्त रहते हुए अपने काम में व्यस्त रहेगा, जिससे वह शक्ति उसमें झूलती रहेगी और वह हमेशा आनंद में डूबा रहेगा।

जब ऊर्जा मूलाधार को जाएगी तो मास्तिष्क में तो उसकी कमी पड़ेगी ही जैसे जब बारिश का पानी जमीन में रिसेगा, तो पानी से भरे गढ्ढे सूखेंगे ही। इससे मन में कुछ न कुछ अंधेरा तो छाएगा ही, बेशक आदमी कितना ही ज्यादा शुद्ध और सिद्ध क्यों न बन गया हो। विकारशील दुनिया में इतना सिद्ध कोई नहीं हो सकता जिसका मन मस्तिष्क हमेशा उजाले से भरा रहता हो। आम सांसारिक आदमी के मन का उजाला तो ऊर्जा के सहारे ही है। बिना भौतिक ऊर्जा के उजाला रखने वाला तो कोई अति विरला साधु संन्यासी ही हो सकता है। फिर भी पूरा उजाला तो पूर्ण मुक्ति की अवस्था में में ही होना संभव है, जो शरीर के रहते संभव नहीं है। विकारी शरीर के साथ जुड़े होने पर कोई पूरी तरह कैसे निर्विकार रह सकता है। बैलगाड़ी में बैठने वाला हिचकोलों से कैसे बच सकता है। जो बिना संभोग के ही मन में उजाला बना कर रखते हैं, उन्होंने संभोग से इतर सात्त्विक तकनीकों में महारत हासिल कर ली होती है, जिनसे मूलाधार की ऊर्जा पीठ से ऊपर चढ़ती रहती है। यह सांसों पर ध्यान, शरीर पर ध्यान, वर्तमान पर ध्यान, चक्रों पर साधारण या बीजमंत्रो के साथ ध्यान, विपश्यना, देवपुजा आदि ही हैं। उदाहरण के लिए चक्रों पर बीजमंत्रों के ध्यान से प्राण खुलते हैं, सांसें खुलती हैं, चेतना और उससे मन विचारों की चमक बढ़ती है, बुद्धि बढ़ती है, और मूलाधार पर ऊपर की तरफ संकुचन बल लगता है। चमक चाहे शरीर के भीतर हो या बाहर, ऊर्जा से ही आती है।

मानसिक अंधेरा भी दो किस्म का होता है। एक खाने पीने, शारीरिक श्रम, नींद, आराम आदि से उत्पन्न अंधेरा होता है। उसमें शरीर में ऊर्जा तो बहुत होती है, पर मन में उसकी कमी होती है, क्योंकि हिंसा, नशे आदि से और दुनियावी आसक्ति के भ्रम के बाद अकेलेपन से मन की चेतना दबी हुई होती है। मतलब साफ़ है कि जब मास्तिष्क में नहीं, तब वह मूलाधार के दायरे में केंद्रित होती है। शरीर के दो ही मुख्य दायरे हैं। एक सहस्रार का तो दूसरा मूलाधार का। ऊर्जा एक दायरे में नहीं तो स्वाभाविक है कि दूसरे दायरे में होगी। अगर सिक्के का हैड नहीं आया तो टेल ही आएगा, अन्य कोई विकल्प नहीं। ऐसी अवस्था में तांत्रिक संभोग से लाभ मिलता है। दूसरी किस्म का अंधेरा वह होता है जिसमें पूरे शरीर में ऊर्जा की कमी होती है। यह तो रोग जैसी या अवसाद जैसी या थकावट जैसी या कमजोरी जैसी अवस्था होती है। इसीलिए इसमें संभोग का मन नहीं करता। अगर करेगा तो बीमार पड़ सकता है, क्योंकि एक तो पहले ही शरीर में ऊर्जा की कमी होती है, दूसरा ऊपर से संभोग में भी ऊर्जा को व्यय कर रहा है। सबको पता है कि घर की छत की टंकी में पानी जीवन के कई काम संपन्न करवाता है। पर पानी को छत तक चढ़ाने के लिए भी ऊर्जा चाहिए और भूमिगत टैंक में भी पानी होना चाहिए। अगर सूखे टैंक में या कम वोल्टेज में पंप चलाएंगे, तो पंप तो खराब होगा ही। वैसे तो तांत्रिक संभोग का भी संत वाला शांत तरीका भी है, जिससे उसमें कम से कम ऊर्जा की खपत होती है, और ज्यादा से ज्यादा ऊर्जा ऊपर चढ़ती है। मस्तिष्क में ऊर्जा होना सबसे ज्यादा जरूरी है, क्योंकि वही पूरे शरीर को नियंत्रित करता है। नीचे के चक्रों में, विशेषकर सबसे नीचे के दो चक्रों में ऊर्जा कुछ कम भी रहे तो भी ज्यादा नुकसान नहीं।

कई लोग बोल सकते हैं कि शून्य अंधेरे से विचाररूपी सृष्टि कैसे बनती है। अंधेरे का मतलब ही सूक्ष्म या अव्यक्त या छुपी हुई सृष्टि है। अंधेरा वास्तव में शून्य नहीं होता जैसा अक्सर माना जाता है। असली शून्य तो बौद्धों का शून्य मतलब परब्रह्म परमात्मा ही होता है। सृष्टि बनने के लिए दो चीजें ही चाहिए, अंधेरा और शक्ति अर्थात ऊर्जा। अगर ऊर्जा नहीं है तो अंधेरा सृष्टि के रूप में व्यक्त नहीं हो पाएगा। जीवात्मा के रूप में जो अंधेरा होता है, उसी को सृष्टि के रूप में प्रकट करने के लिए ही उसे शरीर मिलता है, जिससे ऊर्जा मिलती है। यह अलग बात है कि वह योगसाधना से उस सृष्टि को शून्य कर पाएगा या उसी अंधेरे में छुपा देगा या उससे भी ज्यादा आसक्तिमय दुनियादारी से अपने को उससे भी ज्यादा अंधेरे में बदल देगा, जिसके लिए उसे फिर से नया जन्म और नया शरीर प्राप्त करना पड़ेगा। नया शरीर कर्मों के अनुसार मिलेगा। अच्छे कर्म हुए तो मनुष्य शरीर फिर मिल जाएगा जिससे सृष्टि को शून्य करने का मौका पुनः मिल जाएगा। अगर कर्म बुरे हुए तो किसी जानवर का शरीर मिलने से अंधेरे का बोझ कुछ कम तो हो जाएगा पर शून्य नहीं हो पाएगा, क्योंकि जानवर योग नहीं कर सकते। इस तरह पता नहीं फिर कब मौका मिलेगा। यही वेदवाणी कहती है।

वैज्ञानिक प्रयोगों से यह सिद्ध कर चुके हैं कि स्थूल भौतिक सृष्टि में भी ऐसा ही होता है। उन्होंने पाया कि अंतरिक्ष में हर जगह वे मूलभूत कण या तरंगें क्वांटम फ्लैकचुएशन के रूप में मौजूद हैं जिनसे सृष्टि का निर्माण होता है। क्योंकि वे बहुत सूक्ष्म और अव्यक्त जैसे हैं इसलिए पकड़ में न आने से अंधेरे के रूप में महसूस होते हैं। उदाहरण के लिए डार्क एनर्जी, डार्क मैटर यह सब अंधेरा ही तो है। जब कहीं से उन्हें ऊर्जा मिलती है तो उनका स्पंदन बढ़ने लगता है जिससे सृष्टि का या स्थूल पदार्थों का निर्माण शुरु हो जाता है। विचारों के लिए तो यह ऊर्जा शरीर से मिलती है पर स्थूल सृष्टि के लिए कहां से मिलती है। इसके बारे में अभी स्पष्टता और एकमतता नहीं दिखती। कुछ कहते हैं कि ब्लैकहोल आदि पिंडों के आपस में टकराने से जो गुरुत्वाकर्षण तरंगें आदि अंतरिक्ष में हलचलें पैदा होती हैं, उसीसे वह ऊर्जा मिलती है। जहां पर अंतरिक्ष में ज्यादा हलचल है, वहां ज्यादा तारों का निर्माण होता पाया गया है। पर सृष्टि की शुरुआत में अंतरिक्ष की सबसे पहली हलचल के लिए ऊर्जा कहां से आई, यह पता नहीं है। शास्त्र तो कहते हैं कि ओम ॐ की आवाज निकली जिससे सृष्टि का निर्माण शुरु हुआ। ओम की ध्वनि एक अंतरिक्ष की तरंग या हलचल ही है। हो सकता है कि उसी ने आगे की हलचलों और निर्माणों का सिलसिला शुरु किया हो। ॐ ध्वनि रूपी हलचल के लिए ऊर्जा कहां से आई, यह प्रश्न अनुत्तरित है। यह शायद परमात्मा की अपनी अचिंत्य शक्ति है, जिसका उत्तर योग के अतिरिक्त विज्ञान से मिल भी नहीं सकता। अगर शक्ति नहीं होगी तो शिव शव की तरह अंधेरा बना रहेगा, व्यष्टि शरीर के अंदर भी और समष्टि शरीर मतलब स्थूल भौतिक सृष्टि में भी।

कुंडलिनी योग ही बौद्ध धर्म का गुप्त कालचक्र है

किसी समय दैत्य महाबलवान हो गए थे। वे लोकों को पीड़ित करने और धर्म का लोप करने लगे। परेशान होकर देवताओं ने देवरक्षक विष्णु से अपना दुख कहा। देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिए विष्णु कैलाशपर्वत के समीप जाकर स्वयं कुंड का निर्माण कर उसमें अग्निस्थापन कर उसी के समक्ष तप करने लगे। वे पार्थिव विधि से अनेक प्रकार के मंत्रों एवं स्तोत्रों द्वारा मानसरोवर में उत्पन्न हुए कमलों से प्रसन्नता के साथ शिवजी का पूजन करते रहे। वे हरि स्वयं आसन लगाकर स्थित रहे और विचलित नहीं हुए। बहुत समय तक भी शिव प्रकट नहीं हुए। इस पर विष्णु ने हैरान होकर शिव के सहस्रनाम का जाप शुरु कर दिया। वे एक एक नाममंत्र का उच्चारण कर उन्हें एक एक कमल अर्पित करते हुए शंभु की पूजा करने लगे। उस समय शिव ने विष्णु की भक्तिपरीक्षा के लिए उन सहस्र कमलों में से एक कमल का अपहरण कर लिया। विष्णु शिव की माया को न समझकर एक कमल को ढूंढने में लग गए। विष्णु ने उस कमल के लिए पूरी पृथ्वी का भ्रमण किया। उसके प्राप्त न होने पर उन्होंने उसकी जगह अपना एक नेत्र ही अर्पित कर दिया, बेशक शिव ने उन्हें अपना नेत्र निकालने से रोक दिया। तभी शिव प्रसन्न होकर प्रकट हुए और विष्णु को वर देने के लिए तैयार हो गए। पूछने पर विष्णु ने बताया कि उनका आयुध दैत्यों को मारने में सक्षम नहीं हो रहा है। विष्णु का यह वचन सुनकर शिव ने उन्हें अपना महातेजस्वी सुदर्शन चक्र प्रदान किया। उसे प्राप्त कर विष्णु ने बिना परिश्रम के शीघ्र ही उन महाबली राक्षसों को विनष्ट कर दिया। इस प्रकार संसार में शांति हुई। देवता सुखी हुए और सुंदर सुदर्शन चक्र प्राप्त कर अति प्रसन्न विष्णु भी परम सुखी हो गए।

कथा का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण

विष्णु या विष्णु अवतार शरीर को संचालित करने वाला जीवात्मा है, और परब्रह्म विष्णु वह अनिर्वचनीय परमात्मा है जिससे वह अवतरित होता है। वही शरीर के रूप में तीनों लोकों का पोषण करता है और विभिन्न देवताओं से भी करवाता है। इसी तरह शिव अवतार रुद्र मृत्यु के निकट शरीर को नष्ट करने वाली उसी जीवात्मा की अवस्था है। ब्रह्मा भी उसी जीवात्मा की मनरूपी सृष्टि का निमार्ण करने बाली अवस्था है। ब्रह्मा का कोई परब्रह्म रूप नहीं, क्योंकि वह विष्णु रूपी जीवात्मा से उत्पन्न मन ही है। इसीलिए कहा जाता है कि ब्रह्मा का जन्म विष्णु की नाभि से होता है। देवताओं से संचालित शरीर तो बहुत कोशिश करता है अज्ञानरूपी दुर्दांत राक्षसों के चंगुल से निकलने के लिए, पर सफल नहीं हो पाता। अंतिम सहारा जीवात्मारूपी विष्णु ही होता है। वह इसके लिए तांत्रिक विधि से शिवसाधना करता है। कैलाश सहस्रार चक्र है जहां परब्रह्म शिव का निवास है। उसके समीप मूलाधार चक्र है जो कुंड की तरह है। दोनों चक्रों को एकदूसरे के करीब इसलिए कहा है क्योंकि दोनों सीधे नाड़ी के माध्यम से आपस में जुड़े हुए होते हैं बेशक भौतिक दूरी अन्य चक्रों के बजाए मूलाधार की अधिक है। कुंड शब्द शिवपुराण में गड्ढे या कुंड के लिए बहुत प्रयुक्त किया गया है। इसका मतलब है कि कुंडलिनी शब्द इसी कुंड से बना है। कुंड में सर्प कुंडली लगाकर बैठता है। कुंडल या कुण्डली वाला सर्प कुंडलिन हुआ और सर्पिणी कुंडलिनी हुई। वैसे ही जैसे धनिन का मतलब है धन वाला और धनिनी का मतलब है धन वाली। कुंडल कान में पहने जाने वाले छल्ले को कहते हैं। इसलिए कुंडलिन का अर्थ हुआ कान की बाली या छल्ले जैसी आकृति वाला। और कुंडलिनी का अर्थ हुआ कान की बाली या छल्ले जैसी आकृति वाली। कुंडल और कान के गड्ढे या कुंड के बीच संबंध है। इसी तरह कुंडलिनी और मूलाधार रूपी गड्ढे या कुंड के बीच भी संबंध है। कुंड में अग्नि स्थापन मतलब मूलाधार चक्र को प्राणवायु से क्रियाशील करना। उस कुंड में शिवसाधना मतलब मूलाधार चक्र पर इष्ट ध्यान। पार्थिव विधि से शिवपूजन किया मतलब मिट्टी का शिवलिंग बनाया। मनुष्य के शरीर को भी पार्थिव देह कहा जाता है। तो उसके अंग पार्थिव अंग हुए। मानसरोवर के फूल मतलब मन के या ध्यान के फूल। उन्होंने एक हज़ार फूल चढ़ाए मतलब हज़ार बार चक्रों की ऊर्जा को मूलाधार पर स्थापित किया और उसके साथ इष्ट ध्यान किया। मतलब ऊर्जा के एक हजार बार चक्कर लगाए। फूल यहां चक्र को कहा है। हजारवां फूल शिव ने चुरा लिया मतलब सहस्रार चक्र तक ऊर्जा नहीं जा पा रही थी। इससे विष्णु ने अपना नेत्र मतलब तीसरा नेत्र मतलब आज्ञा चक्र खोला और उसके ध्यान से अर्थात उस पर शांभवी मुद्रा में ध्यान देने से ऊर्जा सेंट्रल हुई। वह ऊर्जा पहले मूलाधार में पहुंची, वहां उससे प्रगाढ़ शिवध्यान लगा और फिर शिवध्यानचित्र के साथ सहस्रार में चली गई जहां उन्हें शिव के साक्षात दर्शन प्राप्त हुए मतलब उन्हें जागृति प्राप्त हो गई।

उपरोक्त कथा को दूसरे तरीके से भी समझ सकते हैं। एक पंखुड़ी को एक फूल कह सकते हैं क्योंकि कर्मकांड की पूजा के दौरान फूल की कुछ पंखुड़ियां चढ़ाना ही पूरा फूल चढ़ाना समझा जाता है। इससे फूलों की भी बचत होती है और एक ही फूल से बहुत से देवताओं का पूजन भी हो जाता है। सहस्रारचक्ररूपी कमलपुष्प में एक हजार पंखुड़ियां होती हैं। शिव के नाम से एक पुष्प चढ़ाने से मतलब शिव के ध्यान की किसी निश्चित मात्रा से सहस्रार की एक पंखुड़ी खिल रही थी। दरअसल जागृति पाने के लिए सभी चक्रों की पूरी ऊर्जा सहस्रार को अर्पित करनी होती है। जब सहस्रार एक पुष्प है और वह ध्यान से खिलता है तो स्वाभाविक है कि ध्यान भी एक पुष्प ही है। जैसे जल से भरे किसी बर्तन में जल डालने से उसका जल बढ़ता है, वैसे ही सहस्रार रूपी पुष्प में पुष्प जोड़ने से वह पुष्प बढ़ेगा ही। सहस्रार पूरा खिलने वाला था मतलब जागृति होने वाली थी पर उसकी अंतिम पंखुड़ी नहीं खिल पा रही थी। आज्ञाचक्ररूपी ध्यानपुष्प से वह भी खिल गई। कर्मकांड पूजा में ध्यान करते समय पुष्प को नमस्कार मुद्रा में बंद हाथों के अंदर रखा जाता है। ध्यान को देवता को समर्पित करने के रूप में उस अंजलिस्थित पुष्प को देवता के चरणों में अर्पित किया जाता है। सहस्रार को जब सभी चक्रों की समस्त ऊर्जा एकसाथ मिलती है, तभी यह जागृति के स्तर तक पहुंचता है। ऊर्जा को सीधे सहस्रार तक पहुंचाना कठिन है, इसलिए इसे मूलाधार तक लाने का व्यावहारिक तरीका सामने लाया गया है, जहां से यह आसानी से सीधे सहस्रार तक पहुंच जाती है।

यह लेख पिछले और अगले लेख से जुड़ा है। उसमें कालचक्र के ऊपर भी अच्छी अनुसंधानात्मक चर्चा है। बाह्य कालचक्र में अद्वैत भाव आंतरिक कालचक्र के ध्यान की सहायता से बनता है। ऐसा इसलिए क्योंकि आंतरिक कालचक्र के अंदर कहीं भी असक्तिजनित और द्वैतजनित बंधन नहीं दिखता। सभी देवता, कर्मकाण्ड आदि सब आंतरिक कालचक्र के ही अंग है। हरेक बाह्य पदार्थ में उनके अधिष्ठातृ देवताओं के रूप में मानवशरीरधारी देवताओं का ध्यान करना आंतरिक कालचक्र का ध्यान करना ही है। इससे आदमी धीरे धीरे पवित्र होकर गुप्त कालचक्र मतलब कुंडलिनी योगसाधना की और बढ़ता है। शरीरविज्ञान दर्शन देवसाधना को और ज्यादा मजबूती देता है क्योंकि यह वैज्ञानिक रूप से दर्शाता है कि देवताओं और साथ में मनुष्यों सहित सभी जीवों के शरीर के अंदर पूरा ब्रह्मांड मतलब बाह्य कालचक्र मौजूद है।

Kundalini Yoga is Gupta Kalachakra in Buddhism

At some time the demons had become very powerful. They started tormenting people and destroying Dharma. Distressed, the gods expressed their grief to the protector of gods, Vishnu. To fulfill the task of the gods, Vishnu himself went near Mount Kailash, built a pit, lit a fire in it and started performing penance in front of it. He kept worshiping Lord Shiva with joy with the lotuses born in Manasarovar by chanting various types of mantras and hymns in the earthly manner. Hari Vishnu himself remained seated and did not get distracted. Shiva did not appear for a long time. Vishnu was surprised at this and started chanting the Sahasranama of Shiva. He started worshiping Shambhu by chanting his name mantras one by one and offering him a lotus with each name mantra. At that time, Shiva abducted one of the thousand lotuses to test the devotion of Vishnu. Vishnu, not understanding Shiva’s illusive act, started searching for a lotus. Vishnu traveled the entire earth for that lotus. When he did not receive it, he offered one of his eyes in its place, although Shiva had stopped him from doing so. Then Shiva appeared pleased and got ready to grant a boon to Vishnu. When asked, Vishnu told that his weapon was not able to kill the demons. Hearing this word of Vishnu, Shiva gave him his very brilliant Sudarshan Chakra. After receiving it, Vishnu quickly destroyed those mighty demons without any effort. In this way there was peace in the world. The gods became happy and Vishnu also became extremely happy after receiving the beautiful Sudarshan Chakra.

Psychological analysis of the above story

Vishnu or Vishnu Avatar is the soul that operates the body, and Parabrahma Vishnu is the indescribable Supreme Being from whom it descends. He nourishes the three worlds in the form of the body and also provides nourishment to various gods in it. Similarly, Shiva incarnation Rudra is the state of the same soul which destroys the body near death. Brahma is also in the state of creating the creation as per the mind of the same soul. There is no Parabrahma form of Brahma, because he is only the mind generated from the soul in the form of Vishnu. That is why it is said that Brahma is born from the navel of Vishnu. The body, governed by the gods, tries hard to escape from the clutches of the deadly demons of ignorance, but is unable to succeed. The last support is Vishnu in the form of a living being soul. For this he does Shiva Sadhana through Tantric method. Kailash is the Sahasrara Chakra where the Supreme Lord Shiva resides. Near it is the Muladhar Chakra which is like a pit. Both the chakras are said to be close to each other because both are directly connected through the nadi, although the physical distance is greater for Muladhara than for other chakras. The word Kund has been used a lot in Shivpuran for pit or pond. This means that the word Kundalini is derived from this Kund. The snake sits coiled in the pit. The coiled he snake became Kundalin and the she snake became Kundalini. Similarly, Dhanin means a man with wealth and Dhanini means a woman with wealth. Rings worn in the ears are called kundal. Therefore, Kundalin means a male one shaped like earrings. And Kundalini means a female one shaped like earrings. There is a connection between the earrings and the ear pit. Similarly, there is a connection between Kundalini and the pit or pool of Muladhar. Establishing fire in the pond means activating the Muladhar Chakra with vital air. Shiv Sadhana in that pond means special meditation on Muladhar Chakra. Shiva was worshiped in the earthly manner, meaning a Shivalinga was made of clay. The human body is also called the earthly body. So his body parts became earthly parts. Flowers of Manasarovar mean flowers of mind or meditation. He offered thousand lotus flowers, that is, he established the energy of the chakras on the Muladhar one thousand times and did Ishta meditation on it. Meaning the energy revolved around one thousand times. The flower here is called the chakra. Shiva stole the thousandth flower which means the energy was not fully reaching the Sahasrara Chakra. Due to this, Vishnu opened his third eye i.e. Ajna Chakra and by meditating on it i.e. by meditating on it in Shambhavi Mudra, the energy became centralized. That energy first reached Mooladhar, where he meditated deeply on Shiva and then went to Sahasrara along with Shivdhyanachitra where he got the direct darshan of Shiva, which means he attained awakening.

The above story can be understood in another way also. One petal can be called a flower because offering a few petals of a flower during ritual worship is considered as offering the entire flower. This also saves flowers and many deities can be worshiped with a single flower. The lotus flower in the form of Sahasrarachakra has a thousand petals. Offering a flower in the name of Shiva meant that a petal of flower in the form of a certain amount of meditation on Shiva was offered to muladhara from where it was straight redirected to sahasrara. It’s difficult to offer energy directly to sahasrar, so practical method appears offering it to muladhara from where it gets itself redirected straight to sahasrar easily. Actually full energy of all the chakras is to be offered to sahasrar to get awakening. When Sahasrara is a flower and it blooms with meditation then it is natural that meditation is also a flower. Just like pouring water into a vessel filled with water increases its water content, similarly adding flowers to the Sahasrara flower will increase that flower. Sahasrara was about to bloom completely, meaning awakening was about to happen but its last petal was not blooming. It also blossomed with the flower of meditation in the form of Agya Chakra. In ritual puja, while meditating, the flower is placed inside the closed hands in Namaskar position. As a means of dedicating that meditation in the end to the deity, the flower situated in Anjali or closed praying hands is offered at the feet of the deity.

This article is connected to the previous and next article. There is also a good research discussion on Kaalachakra. Gaining Advaita Bhava in the outer Kalachakra is the main aim of the inner Kalachakra. This is because there is no visible duality-born and attachment born bondage anywhere within the internal chakra. All the gods, rituals etc. are part of the internal kalchakra. Meditating on the gods in human form in every external object in the form of their presiding deities is to meditate on the internal kalchakra. Due to this, man gradually becomes pure and moves towards Gupt Kalachakra i.e. Kundalini Yogasadhana. The sharirvigyan darshan philosophy gives further strength to Devsadhana because it scientifically shows that the entire universe including gods as well as human beings i.e. external Kalachakra is present inside the body of all living beings.

Kundalini awakens from the Kunda and activates the vaikalpik Kalachakra as Sudarshan Chakra in which sharirvigyan darshan ek adhunik kundalini tantra book helps a lot

It is said that the word Kundalini is not in the scriptures. But the word Kund is there a lot in Shivpuran. In Sanskrit language, a masculine object shaped like an earring or ring is called Kundalin and a feminine object having such shape is called Kundalini. Perhaps the word Kundal is also derived from the word Kund. The relation between the two is clearly visible. The literal meaning of Kund is round pit, and Kundal means round ring. The only difference between the two is that the pit has a bottom surface, but the rings do not, otherwise both are the same. Just as word Harshil is made from Harsh, similarly Kundal can be made from Kund. Harsh means full of joy and Kundal means accompanied with pit. This is because kundal fits properly inside kund. Only any Sanskrit grammar scholar can check this guess of mine, if he is reading this article. Even if a kundal is not formed from the word kund, the snake gets molded into the shape of the coil and hides in the kund i.e. the pit. That is why it is said that the snake has made its kundali. It should not be surprising if the pit in which a snake coils itself and hides is called a kund. In the dark pit of Mooladhar, the widespread power of the mind shrinks and gets hidden in the form of a meditation picture. That is why that power is called Kundalini. It climbs up through all the chakras and spreads in the nadis of the back and brain shaped like a hooded snake. Vishnu installed Shivalinga in the pit. Since it is related to religious faith, not much can be said about it because some staunch Hindus start doubting the fact that the one who calls the stories of the Puranas mythical is a Hindu. Well, in their opinion they are also right, because these stories are not fabricated. Myths are also of two types, one apocryphal or useless type and one based on scientific truth or useful type. The myths of the Puranas are of a different type, meaning that although they may seem like myths, they are completely based on scientific truth. That is why we highlight their scientific truth so that they are not considered fabricated myths and their lost respect can be regained. However, with common worldly thinking, it can be understood that the above Shivalinga worship by Lord Vishnu is similar to the way some skilled Tantra yogis gave Shivdhyan-superimposed sexual power to Muladhar as generated from Yabyum Asana. It is only by Shiva’s meditation on the Linga that it becomes pure and becomes Shivlinga. The method of great and ideal yogis like Dev Vishnu may certainly be advanced and sattvik, but the aim of all is the same, and that is to awaken the Shakti.

Vishnu was trying to worship Shiva with a thousand lotus flowers, that is, he was trying to lift the Shivadhyanachitra from the perineum up to the Sahasrara Chakra through the spine. Shiva hid a flower with his Maya shakti, which means that Vishnu, being fascinated by Shiva’s illusive power, was not able to offer his ego to Shiva. Vishnu searched for that last flower everywhere on earth but could not find it, meaning ego is within, not outside. Even if the entire external creation is offered to Shiva, the offering will still remain incomplete, because the ego residing inside the brain has not been offered. Vishnu then offered his one eye i.e. by awakening the third eye i.e. Ajna Chakra, he brought its power down from the front channel to the Muladhar Chakra. Being completely satisfied with that, Shiva present there climbed up to the Sahasrara Chakra and became fully awakened, that is, being pleased, he presented himself in visual form to Vishnu. The web of ego resides in the form of intelligence, and the symbol of intelligence is the Agyachakra. Meaning, the power of the mind which was trapped in the web of intellectualistic worldliness, got freed and got attached to Shivdhyan Chitra i.e. Kundalini picture, due to which it woke up. Then Shiva gave him Sudarshan Chakra, meaning the Sahasrara Chakra formed after su darshan or good visualisation or Shivadarshan i.e. awakening, is Sudarshan Chakra. Killing evil and demons means eliminating bad thoughts. At many places it is also shown like a rod, which seems to symbolize the Sushumna Nadi.

Shri Krishna had lifted Govardhan Mountain on the Sudarshan Chakra itself, that is, through the awakened Sahasrara Chakra, the form of knowledge, he made the physical world so light, subtle and ethereal that it rose up and came in the middle of the void sky. With this, the cowherds men, i.e. the common worldly people under the influence of senses, were saved from the indiscriminate rain of sorrows, which was being caused by Indra in the form of ego. Cow is called the senses and the one who grazes the cow means an ignorant human being suffering from the influence of senses. This seems to be a similar case of Ravana lifting Mount Kailash on his arms. Sudarshan Chakra moving only at will and coming back on its own after striking and always rotating indicates that it is a divine chakra i.e. Sahasrara Chakra. Its spokes, axles etc. indicate seasons etc. Kalachakra is also compared to this among Buddhists. Even in Kalachakra, there are spokes etc. equal to Sudarshan Chakra which indicate the movement of time, seasons etc. Both contain thunder and electricity. This is the energy flowing in Sushumna and giving instant awakening. Like Sudarshan Chakra, Kalachakra is also associated with Vishnu, Krishna, Shiva etc. Both are described in the Vedas. However, Kalachakra is mainly used among Buddhists.

There are three types of Kalachakra, baahya or external, aantarik or internal and gupta or secret. External macro universe is included in external, internal is micro universe inside the body and secret is included in mysterious liberating sciences like yoga etc. I think that having complete knowledge of one leads to knowledge of all three. For an extroverted person, it is the sadhana of the external Kalachakra. internal for an introvert and Gupt Kalachakra is made for Sanyasin or renunciate type of person. Knowledge and liberation come from all three. Premyogi Vajra’s philosophy of physiological science or sharirvigyan darshan can be called a kind of internal Kalachakra, because it describes the universe inside the body. Kalachakra is a circle in which various deities, symbols and figures are displayed. In fact, there is a world with similar diverse forms in all the three time cycles aka kalchakras. By its sadhana it is natural that Sushumna, Sahasrara and Kundalini etc. get awakened, which then destroy the demons in the form of evil thoughts and nature. In this case also Kalachakra and Sudarshan Chakra are same. It can be said that the Kalachakra is available to a common man, whereas the Kalachakra available to an ideal man like Vishnu has been called Sudarshan Chakra. The common man destroys only his own ignorance whereas Vishnu and his incarnations like Ram, Krishna, Buddha etc. destroy the ignorance of countless devotees. That is why Sudarshan Chakra can be called a special Kalachakra.

In Vamana Purana also this chakra has been called Kalachakra. Its twelve spokes indicate the twelve months and six navels indicate the six seasons. It is also said that the mantra ‘Sahasrat Hum Phat’ is inscribed on its spokes. This sounds like a Buddhist mantra. The Sikhs also used the Chakra as a weapon, which could be used directly or by throwing. At many places it is also said that the center of Sudarshan Chakra is made of Vajra. Vajra is the same spinal cord through which Vajra Shakti passes to Sahasrara. This article will be completely understood after reading the next article because its original story described in Shivpuran will be written in it.

Even in Rigveda, Sudarshan Chakra has been called Kalachakra. Apart from the three Kalachakras, there is also a fourth alternative Kalachakra, in which the mind is not allowed to be affected by the movement of time. This is the chakra of enlightenment and spiritual knowledge. This is Advaita, this is Dvaitadvaita, meaning Advaita is living amidst duality. This is the concept of tantra philosophy called body science philosophy created by Premyogi Vajra. This is Vishnu’s evil destroying Sudarshan Chakra. These are the three previous Kaalchakras, which due to the blows of time are going to put the common man’s mind in duality, ignorance and sorrow and put him in the cycle of birth and death again and again. The benevolent Sudarshan Chakra, the fourth and last one is the alternative Kalachakra, which undoubtedly rotates at the speed of time, but by teaching man to live non-dually in it, gives him happiness, prosperity and liberation. Anyone can have the time cycle that can kill, but only a knowledgeable person like Vishnu can have the one to save. That is achieved when the Sahasrara Chakra is awakened. This time continues like a cycle and never stops. Birth is followed by death, death is followed by birth and then again death. Creation is followed by destruction, destruction is followed by creation and then again destruction. Seasons keep changing in cycles, happiness and sorrow keep coming and going in cycles. We cannot run away from this cycle. The cycle itself cuts the cycle. Varadayi that’s boon providing Sudarshan or Alternative Chakra is the only way to escape. Meaning, keep moving with the cycle but do not let it disturb your non-dual peace. This is the praise and worship of Sudarshan Chakra.

Sudarshan Chakra cut Shishupala’s throat, which means that due to Shishupala’s duplicitous behavior his power did not rise above Vishuddhi Chakra. Because a person speaks with the power of Vishuddhi Chakra of the throat, then the power rising up is stopped by the throat and ends in abusive language, which means the path of power near the throat is cut, which means the throat is cut. Shishupala was abusing Krishna a lot. Kundalini chakras are also called chakras because the level of power on them also keeps changing cyclically. Sometimes the power increases and reaches a peak, which is called awakening of the chakra, and then decreases and reaches a minimum. For example, sometimes the heart’s emotions are in full swing and sometimes it becomes emotionless. After some time, the heart again gets filled with emotions, which sometimes leads to creation of a good poem. This cycle continues. If the Chakra is awakened, it does not mean that it will remain awakened forever. Its power will keep increasing and decreasing. Don’t be afraid of this nor be affected by it. This is the vaikalpik Kalachakra, meaning the Buddhist thinking kalchakra i.e. through truthful imagination or philosophy, we have to eliminate the ill effects of Kalachakra and create positive effects from it. Similarly, Sahasrara Chakra is also sometimes at its peak power. At that time, this can give material prosperity and liberation to deserving person by giving knowledge or boon, and by cursing the sinful person, it can also put him in material loss and bondage. Then the Sahasrara Chakra also occurs at a lower Shakti level, at which time Shri Krishna used to behave like a common man. He behaved like an incarnational man only when the Sahasrara was in a state of extreme power, at which time the Sudarshan Chakra was shown rotating on his finger as an external and physical symbol of the Sahasrara Chakra. Common people cannot feel the subtle Sahasrara Chakra inside the mind or brain. Through awakened Sahasrara Chakra that’s Sudarshan Chakra there is divinity, prophecy and greatness.

Man is born in the external kalchakra and learns a lot by living in it for a long time. This is the time cycle or kalchakra of initial practice. Then, being troubled by the blows of sorrow arising from it, he starts imposing it on the internal kalchakra. Meaning, he starts giving solace to his mind that whatever is there in the vast universe is also there in his own small body. Meaning ‘Yatpinde tat brahmande’. To do this becomes very easy with the book titled “sharirvigyan darshan, ek adhunik Kundalini Tantra, ek yogi ki premkatha”. This gives him a feeling of non-duality due to which he feels some protection from the blows of time. This happens because despite the entire Kalachakra running inside the body, none of its components fall into the bondage of duality. After remaining stable in it for a long time, when he becomes pure enough, then his tendency automatically leans towards the secret time cycle or gupta kalchakra of Yoga Sadhana. While doing yoga and moving forward, he himself turns towards Tantric Kundalini Yoga. Through Tantra Yoga, his Kundalini is awakened in the Sahasrara Chakra, which means he becomes the possessor of the vaikalpik Kalachakra or Sudarshan Chakra. Yet whenever he keeps coming down from this supreme Kalachakra due to lack of energy in Sahasrara, he easily reaches there with a little push of tantric energy.

The infinitely wide external kalchakra becomes smaller and smaller. First it reaches the level of the internal kalchakra. Then it becomes more subtle and limited to seven Kundalini Chakras and becomes the Gupta Kalachakra. It’s called Gupta or secret because not everyone can feel it but only the Kundalini yogis. Then after awakening, it becomes subtle to the level of the point of sahasrar chakra and becomes an vaikalpik Kalachakra. The kalchakra continues from the beginning till the end, but earlier it was the one who puts you in the bondage of ignorance, in the end it becomes the giver of knowledge and liberation. This is a very effective and practical meditation which must be adopted. To put it in the simplest terms, it is like that in between the material worldly life, one should keep experiencing one’s body as well, the paths ahead open up on their own. Yoga is made only to develop its habit. While doing Yogasana, worldly thoughts keep coming due to the activity of Prana and along with this, attention is also focused on the special posture of the body and breath, which means the external Kalachakra keeps getting transformed into the internal Kalachakra.

कुंडलिनी कुंड से जागकर सुदर्शन चक्र रूपी वैकल्पिक कालचक्र को क्रियाशील कर देती है, जिसमें शरीरविज्ञान दर्शन एक आधुनिक कुंडलिनी तंत्र पुस्तक बहुत मदद करती है

कुंडलिनी शब्द को कहते हैं कि यह शास्त्रों में नहीं है। पर कुंड शब्द तो शिवपुराण में बहुत है। संस्कृत भाषा में कान के कुंडल या छल्ले जैसे आकार वाला पुलिंग पदार्थ कुंडली हुआ और ऐसे आकार वाली स्त्रीलिंग वस्तु कुंडलिनी कहलाई। शायद कुंडल शब्द भी कुंड शब्द से बना है। दोनों में संबंध तो साफ दिखता है। कुंड का शाब्दिक अर्थ गोल गढ्ढा है, और कुंडल का अर्थ गोल छल्ला है। दोनों में यही अंतर है कि गड्ढे में धरातल होता है, पर छल्ले में नहीं होता, बाकि तो दोनों समान ही हैं। जैसे हर्ष से हर्षिल बना है वैसे ही कुंड से कुंडल बना हो सकता है। हर्ष मतलब हर्ष से युक्त और कुंडल मतलब कुंड से युक्त। मेरे इस अनुमान की जांच तो कोई संस्कृत व्याकरण विद्वान ही कर सकते हैं, अगर यह लेख पढ़ रहे हैं। कुंड से कुंडल न भी बना हो तो भी कुंडल के जैसे आकार में ढलकर सर्प कुंड अर्थात गढ्ढे में छिप जाता है। इसीलिए कहते हैं कि सांप ने कुंडली लगाई हुई है। जिस गड्ढे में सर्प कुंडली मारकर छिप जाता है, उसे अगर कुंड कहा जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। मूलाधार रूपी अंधेरे कुंड में मन की शक्ति सिकुड़ कर ध्यानचित्र के रूप में छिप जाती है। इसीलिए उस शक्ति को कुंडलिनी कहा जाता है। यही सभी चक्रों से होकर ऊपर चढ़ते हुए, फन उठाए नाग के जैसे आकार वाली पीठ और मास्तिष्क की नाड़ी में फैल जाती है। विष्णु ने कुंड में शिवलिंग को स्थापित किया। धार्मिक आस्था से जुड़ा होने के कारण इस बारे ज्यादा कुछ कहा नहीं जा सकता क्योंकि कुछ कट्टर हिंदु तो पुराणों की कथाओं को मिथकीय कहने वाले के हिंदु होने पर ही संदेह करने लगते हैं। वैसे अपनी सोच से वे भी सही ही कहते हैं, क्योंकि ये कथाएं मनगढ़ंत नहीं हैं। मिथक भी दो किस्म के होते हैं, एक मनगढ़ंत या निरर्थक किस्म के और एक वैज्ञानिक सत्य पर आधारित या सार्थक किस्म के। पुराणों के मिथक दूसरे किस्म के हैं, मतलब बेशक ये मिथक लगे पर पूरी तरह से वैज्ञानिक सत्य पर आधारित हैं। इसीलिए हम इनके वैज्ञानिक सत्य को उजागर करते हैं ताकि इन्हें मनगढ़ंत मिथक न समझा जा कर इनका खोया सम्मान वापिस मिल सके। हालांकि आम लौकिक सोच से ऐसा समझ सकते हैं कि देव विष्णु की उपरोक्त शिवलिंग पुकार ऐसी ही है जैसे किसी कुशल तांत्रिक ने यबयुम आसन से उत्पन्न शिवध्यानयुक्त संभोगशक्ति मूलाधार को दी। लिंग पर शिव के ध्यान से ही वह पवित्र होकर शिवलिंग बनता है। देव विष्णु जैसे महान व आदर्श योगियों का तरीका बेशक उन्नत और सात्त्विक हो सकता है, पर सबका मकसद एक ही है, और वह है शक्ति को जागृत करना।

विष्णु एक हजार कमल पुष्पों से शिव की पूजा करने की कोशिश कर रहे थे मतलब सहस्रार चक्र तक शिवध्यानचित्र को मूलाधार से उठाने की कोशिश कर रहे थे मेरुदंड से। एक पुष्प शिव ने माया से छिपा लिया मतलब शिव की माया से मोहित होकर विष्णु अपने अंहकार को शिव को अर्पित नहीं कर पा रहे थे। विष्णु ने धरती पर उस आखिरी पुष्प को हर जगह ढूंढा पर वह नहीं मिला मतलब अंहकार भीतर होता है, बाहर नहीं। बाहर की सारी सृष्टि भी शिव को चढ़ा दें, तो भी चढ़ावा अधूरा ही रहेगा, क्योंकि मास्तिष्क के अंदर बसा अहंकार तो चढ़ाया ही नहीं। विष्णु ने फिर अपना नेत्र चढ़ाया मतलब तीसरे नेत्र मतलब आज्ञा चक्र को जागृत करके वे उसकी शक्ति को फ्रंट चैनल से नीचे उतारकर मूलाधार चक्र तक लाए। उससे वहां स्थित शिव उससे पूर्ण संतुष्ट होकर वहां से सहस्रार चक्र तक चढ़कर पूरी तरह से जागृत हो गए मतलब प्रसन्न होकर उन्होंने विष्णु को अपने दर्शन करा दिए। अंहकार का जंजाल बुद्धि के रूप में बसा हुआ होता है, और बुद्धि का प्रतीक आज्ञाचक्र है। मतलब जो मन की शक्ति बुद्धिवादी सांसारिकता के जंजाल में फंसी थी, वह मुक्त हो कर शिवध्यानचित्र अर्थात कुंडलिनी चित्र को लग गई, जिससे वह जाग गया। फिर शिव ने उन्हें सुदर्शन चक्र दिया, मतलब जो अच्छे दर्शन या शिवदर्शन अर्थात जागृति के बाद सहस्रार चक्र बना, वही सुदर्शन चक्र है। वही दुष्टों व राक्षसों का वध मतलब बुरे विचारों का खात्मा करता है। कई जगह पर उसे दंड की तरह भी दिखाया जाता है, जो सुषुम्ना नाड़ी का द्योतक लगता है।

श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र पर ही गोवर्धन पर्वत को उठाया था मतलब ज्ञानरूप जागृत सहस्रार चक्र से ही स्थूल जगत को इतना हल्का, सूक्ष्म और आकाशरूप बना दिया कि वह ऊपर उठकर शून्य आसमान के बीच में आ गया। इससे ग्वालबाल मतलब इन्द्रियों के वशीभूत आम सांसारिक आदमी दुखों की अंधाधुंध वर्षा से बच सके थे, जो अंहकार रूपी इंद्र के कारण हो रही थी। गाय इंद्रिय को कहते हैं और गाय चराने वाला अर्थात इंद्रियों के संसर्ग से पीड़ित अज्ञानी मानव हुआ। यह ऐसा ही मामला लगता है जैसा रावण के द्वारा कैलाश पर्वत को भुजाओं पर उठाने का है। सुदर्शन चक्र का केवल इच्छामात्र से चलना और प्रहार करके खुद वापिस लौट आना और हमेशा घूमते रहना इसके दिव्य चक्र मतलब सहस्रार चक्र होने की ओर इशारा करता है। इसकी अरे मतलब स्पोकें, धुरी आदि ऋतुओं आदि का संकेत करती हैं। बौद्धों में कालचक्र भी शायद इसे ही कहते हैं। कालचक्र में भी सुदर्शन चक्र के बराबर ही अरे आदि होते हैं जो कि समय, ऋतु आदि की चाल को इंगित करते हैं। दोनों में ही वज्र और विद्युत होती है। यह सुषुम्ना में बहने वाली और जागृति देने वाली ऊर्जा ही है। कालचक्र को भी सुदर्शन चक्र की तरह विष्णु, कृष्ण, शिव आदि से जोड़ा जाता है। दोनों का ही वर्णन वेदशास्त्रों में है। हालांकि कालचक्र का उपयोग मुख्यतः बौद्धों में होता है।

कालचक्र के तीन प्रकार हैं, बाह्य, आभ्यंतर और गुप्त। बाह्य में बाहरी स्थूल ब्रह्मांड, आभ्यंतर में शरीर के अंदर का सूक्ष्म ब्रह्मांड और गुप्त में योग आदि रहस्यमय मुक्तिदायी विद्याएं आती हैं। मुझे लगता है कि एक का पूर्ण ज्ञान होने से तीनों का ज्ञान हो जाता है। बहिर्मुखी आदमी के लिए बाह्य कालचक्र की साधना है। अंतर्मुखी व्यक्ति के लिए आंतरिक कालचक्र और संन्यासी किस्म के व्यक्ति के लिए गुप्त कालचक्र बना है। तीनों से ही ज्ञान और मुक्ति मिलती है। प्रेमयोगी वज्र रचित शरीरविज्ञान दर्शन को एक प्रकार का आंतरिक कालचक्र कह सकते हैं, क्योंकि उसमें शरीर के अंदर के ब्रह्मांड का वर्णन किया गया है। कालचक्र एक मंडल होता है, जिसमें विभिन्न देवताओँ, चिह्नों और आकृतियों को प्रदर्शित किया जाता है। वास्तव में भी तीनों कालचक्रों में भी ऐसे ही विविध रूपरंग वाला संसार है। इसकी साधना से स्वाभाविक है कि सुषुम्ना, सहस्रार और कुंडलिनी आदि जागृत हो जाते हैं, जो फिर दुष्ट विचारों और स्वभावों रूपी राक्षसों का नाश करते हैं। इस मामले में भी कालचक्र और सुदर्शन चक्र एक ही हैं। यह कह सकते हैं कि कालचक्र आम आदमी को मिलता है जबकि विष्णु जैसे परम आदर्श मनुष्य को मिलने वाले कालचक्र को सुदर्शन चक्र कहा गया है। आम आदमी तो केवल अपने ही अज्ञान का नाश करता है जबकि विष्णु और राम, कृष्ण, बुद्ध आदि उनके अवतार अनगिनत भक्त लोगों का अज्ञान नष्ट करते हैं। इसीलिए सुदर्शन चक्र को विशिष्ट कालचक्र कह सकते हैं।

वामन पुराण में  भी इस चक्र को कालचक्र कहा गया है। इसकी बारह स्पोकें बारह महीनों और छः नाभियां छः ऋतुओं को इंगित करती हैं। यह भी कहा जाता है कि मंत्र सहस्रात हुम फट इसकी स्पोकों पर खुदा है। यह एक बौद्ध मंत्र लगता है। सिख भी चक्र को हथियार की तरह इस्तेमाल करते थे, जिसे सीधे भी और फेंक कर भी चलाया जाता था। कई जगह यह भी आता है कि सुदर्शन चक्र का केंद्र वज्र से बना है। वज्र वही मेरूदंड है, जिससे होकर वज्र शक्ति सहस्रार तक गुजरती है। पूरी तरह से यह लेख अगले लेख को पढ़कर समझ आएगा क्योंकि उसमें शिवपुराण में वर्णित इसकी मूल कथा लिखी जाएगी।

ऋग्वेद में भी सुदर्शन चक्र को कालचक्र कहा गया है। तीनों कालचक्रों से अलग एक चौथा वैकल्पिक कालचक्र भी है, जिसमें मन को समय की चाल से प्रभावित नहीं होने दिया जाता। यही बुद्धत्व और आत्मज्ञान का कालचक्र है। यही अद्वैत है, यही द्वैताद्वैत मतलब द्वैत के बीच रहकर अद्वैत है। यही प्रेमयोगी वज्र कृत शरीरविज्ञान दर्शन नामक तंत्र दर्शन की अवधारणा है। विष्णु का दुष्टविनाशक सुदर्शन चक्र ये ही पूर्व के तीनों कालचक्र हैं, जो समय के थपेड़ों से आम आदमी के मन को द्वैत, अज्ञान और दुख में डालकर उसे बारंबार जन्म मृत्यु के चक्र में डालने वाले हैं। कृपा करने वाला सुदर्शन चक्र चौथा और अंतिम मतलब वैकल्पिक कालचक्र है, जो बेशक समय की रफ्तार से घूमता है, पर आदमी को उसके बीच अद्वैत से रहना सिखाकर उसे सुख समृद्धि और मुक्ति देता है। मारने वाला समय चक्र तो किसी के पास भी हो सकता है, पर बचाने वाला तो विष्णु जैसे आत्मज्ञानी के पास ही हो सकता है। वह तब मिलता है जब सहस्रार चक्र जागृत होता है। यह काल तो चक्र की तरह चलता ही रहता है, कभी नहीं रुकता। जन्म के बाद मृत्यु, मृत्यु के बाद जन्म और फिर मृत्यु। सृष्टि के बाद प्रलय, प्रलय के बाद सृष्टि और फिर प्रलय। ऋतुएं चक्रवत बदलती रहती हैं, सुख दुख चक्रवत आते जाते रहते हैं। इस चक्र से हम भाग नहीं सकते। चक्र को चक्र ही काटता है। वरदायी सुदर्शन या वैकल्पिक चक्र ही बचने का एकमात्र उपाय है। मतलब चक्र के साथ चलते रहो पर उससे अपनी अद्वैतमय शांति भंग न होने दो। यही सुदर्शन चक्र की स्तुति और पूजन है। 

शिशुपाल को सुदर्शन चक्र ने गले से काटा मतलब शिशुपाल के द्वैतपूर्ण व्यवहार से उसकी शक्ति विशुद्धि चक्र से ऊपर नहीं चढ़ी। क्योंकि आदमी गले के विशुद्धि चक्र की शक्ति से बोलता है, तो ऊपर चढ़ती शक्ति को गले ने रोककर गाली गलौज में खत्म कर दिया मतलब गले के पास शक्ति का रास्ता कट गया मतलब गला कट गया। शिशुपाल कृष्ण को बहुत गालियां निकाल रहा था। कुंडलिनी चक्र भी शायद इसीलिए चक्र कहलाते हैं क्योंकि इन पर भी शक्ति का स्तर चक्रवत बदलता रहता है। कभी शक्ति बढ़ते बढ़ते चरम पर पहुंच जाती है, जिसे चक्र का जागृत होना कहते हैं, और फिर घटते घटते न्यूनतम भी पहुंच जाती है। उदाहरण के लिए कभी दिल की भावनाएं उफान पर होती हैं और कभी वह भावशून्य सा हो जाता है। कुछ समय बाद दिल फिर भावनाओं से भर जाता है, जिससे कई बार अच्छी सी कविता का निर्माण भी हो जाता है। ऐसा चक्र चलता रहता है। चक्र जागृत हो गया तो इसका मतलब यह नहीं कि वह हमेशा जागृत रहेगा। उसकी शक्ति घटती बढ़ती रहेगी। इससे घबराना नहीं है और न ही प्रभावित होना है। यही वैकल्पिक कालचक्र है, मतलब बुद्धवादी विकल्प अर्थात कल्पना या दर्शन से कालचक्र के दुष्प्रभाव को ख़त्म करके उससे सद्प्रभाव पैदा करना है। इसी तरह सहस्रार चक्र भी कभी चरम शक्ति पर होता है। उस समय यह पात्र व्यक्ति को ज्ञान या वरदान देकर भौतिक समृद्धि और मुक्ति भी दे सकता है, और पापी व्यक्ति को श्राप देकर उसे भौतिक हानि और बंधन में भी डाल सकता है। फिर सहस्रार चक्र निम्न शक्ति स्तर पर भी होता है, जिस समय श्रीकृष्ण एक आम आदमी की तरह व्यवहार करते थे। सहस्रार की चरम शक्ति की अवस्था होने पर ही वे अवतारी पुरुष की तरह व्यवहार करते थे, और जिस समय सहस्रार चक्र के बाह्य और स्थूल प्रतीक के रूप में उनकी अंगुली पर सुदर्शन चक्र घूमता हुआ दिखाया जाता था। आम आदमी तो मन या मस्तिष्क में छिपे सूक्ष्म सहस्रार चक्र को महसूस नहीं कर सकते। जागृत सहस्रार चक्र मतलब सुदर्शन चक्र से ही दिव्यता है, परमात्मता है, पुरुषोत्तमता है।

आदमी बाह्य कालचक्र में ही पैदा होता है और उसमें लंबे समय तक रहते हुए बहुत कुछ सीखता है। यह शुरुवाती अभ्यास का कालचक्र है। फिर उससे उत्पन्न दुखों के थपेड़ों से परेशान होकर उसे आंतरिक कालचक्र के ऊपर अध्यारोपित करने लगता है। मतलब वह अपने मन को यह दिलासा देने लगता है कि जो कुछ विस्तृत ब्रह्मांड में है वही सबकुछ उसके अपने छोटे से शरीर में भी है। मतलब यत्पिंडे तत् ब्रह्माण्डे। ऐसा करना “शरीरविज्ञान दर्शन, एक आधुनिक कुंडलिनी तंत्र, एक योगी की प्रेमकथा” नामक पुस्तक से बहुत आसान हो जाता है। उससे उसे कुछ अद्वैत की अनुभूति होती है जिससे वह काल के थपेड़ों से थोड़ी सुरक्षा महसूस करता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि शरीर के अंदर पूरा कालचक्र दौड़ता रहने के बावजूद उसका कोई भी घटक द्वैत के बंधन में नहीं पड़ता। लंबे समय तक उसमें स्थिर रहने के बाद जब वह काफी पवित्र हो जाता है, तब उसकी प्रवृत्ति खुद ही योगसाधना रूपी गुप्त कालचक्र की ओर झुक जाती है। योग करते हुए और आगे बढ़ते हुए वह खुद ही तांत्रिक कुंडलिनी योग की तरफ मुड़ जता है। तंत्र योग से उसकी कुंडलिनी सहस्रार चक्र में जागृत हो जाती है, मतलब वह वैकल्पिक कालचक्र या सुदर्शन चक्र का अधिकारी बन जाता है। फिर भी जब भी वह सहस्रार में ऊर्जा की कमी से इस सर्वोच्च कालचक्र से नीचे आता रहता है तब तांत्रिक ऊर्जा के थोड़े से धक्के से वह आसानी से उसमें पहुंचता रहता है।

अनंत विस्तृत बाह्य कालचक्र अद्वैत सूक्ष्म होता जाता है। पहले वह आंतरिक कालचक्र के स्तर पर पहुंचता है। फिर और सूक्ष्म होकर सात कुंडलिनी चक्रों तक सीमित होकर गुप्त कालचक्र बन जाता है। इसे गुप्त कालचक्र इसलिए कहते हैं क्योंकि सभी इसे महसूस नहीं कर सकते, पर केवल कुंडलिनी योगी ही इसे महसूस करते हैं। फिर जागृति के बाद यह सहस्रार चक्र के बिंदु के स्तर तक सूक्ष्म बनकर वैकल्पिक कालचक्र बन जाता है। कालचक्र शुरु से लेकर अंत तक रहता है, पर पहले वह अज्ञान के बंधन में डालने वाला था, अंत में ज्ञान और मुक्ति देने वाला बन जाता है। यह बेहद कारगर और व्यवहारिक साधना है जिसे जरूर अपनाना चाहिए। सबसे साधारण शब्दों में बोलें तो यह ऐसा है कि भौतिक दुनियादारी के बीचबीच में अपने शरीर को भी अनुभव करते रहना चाहिए, उसके आगे के रास्ते खुद खुलते जाते हैं। योग इसकी आदत डालने के लिए ही बना है। योगासन करते समय प्राणों की क्रियाशीलता से दुनियावी विचार भी आते रहते हैं और साथ में शरीर के विशेष पोज और सांस पर भी ध्यान लगा होता है मतलब बाह्य कालचक्र आंतरिक कालचक्र में रूपांतरित होता रहता है।

कुंडलिनी योग से मृत व्यक्ति भी जीवित हो सकता है

शिवपुराण में एक सुधर्मा ब्राह्मण की कथा आती है। वह संतुष्ट, प्रसन्न और अद्वैत भाव में स्थित रहता था। उसकी सुदेहा नाम की एक शिवधर्मपरायण पतिव्रता पत्नि थी। उनकी उम्र काफी बीत गई पर उनके कोई पुत्र नहीं हुआ। फिर भी तत्त्ववेत्ता सुधर्मा को जरा भी दुख नहीं हुआ। पर उसकी पत्नि को पुत्र न होने का बड़ा दुख था। वह अपने पति से पुत्र के लिए प्रयत्न करने को कहा करती। फिर सुधर्मा उसे डांटकर समझाते कि पुत्र क्या करेगा। कौन किसकी माता तथा कौन पिता है, कौन पुत्र है और कौन भाई या मित्र है। सभी स्वार्थ का ही साधन करने वाले हैं। एक बार किसी पड़ोसी औरत ने सुदेहा को पुत्र न होने का ताना देते हुए बहुत धिक्कारा। वह फिर अपने पति से शिकायत करने लगी। उसने उसे बहुत समझाया पर जब वह फिर भी नहीं समझी तो उसने उसके सामने दो पुष्प रखे और उसे उनमें से एक पुष्प उठाने को कहा। सुदेहा ने वह पुष्प उठाया जिस पर ब्राह्मण ने पुत्र न होना सोचा था। फिर भी वह न मानी और पुत्र के बिना आत्महत्या की धमकी दे दी। तब सुदेहा अपनी सगी बहन घुश्मा को लेकर आई और अपने पति को उससे पुत्र के लिए विवाह करने को कहा। सुधर्मा ने उसे समझाया कि वह उसके पुत्रवती होने पर उससे ईर्ष्या करने लगेगी, जिससे उसे दुख होगा। उस पर घुश्मा ने कहा कि वह अपनी सगी बहन से कैसे ईर्ष्या कर सकती थी। घुश्मा प्रतिदिन एक सौ एक पार्थिव लिंगों का निर्माण, पूजन और विसर्जन करती थी। इस तरह जब एक लाख लिंगों की संख्या पूरी हुई तो उसे सुंदर पुत्र प्राप्त हुआ। सुधर्मा उसे देखकर बहुत खुश हुआ और आसक्तिरहित होकर सुखभोग करने लगा। उसके बाद तो सुदेहा घुश्मा से बहुत ईर्ष्या करने लगी। सभी संबंधी घुश्मा का सम्मान करने लगे। हालांकि सुधर्मा तब भी सुदेहा को अधिक सम्मान और प्रेम देता था, पर उसके मन में कपट था। घुश्मा के बेटे का विवाह भी हो गया। जलती भुनती सुदेहा से एक दिन रहा न गया। उसने अपनी पत्नि के साथ सोए सौतेले पुत्र को मारकर उसके शरीर को खंडखंड करके उन खंडों को नदी में बहा दिया। संयोग से उसी स्थान पर ही सुदेहा भी पार्थिव लिंगों का विसर्जन करती थी। जब पुत्रवधु ने सुबह उठकर खून के छींटे और पति के शरीर के टुकड़े शैय्या पर बिखरे देखे तो रो पड़ी। सुदेहा भी नाटक करते हुए रोने लगी। पर घुश्मा ने जरा भी दुख नहीं किया और पार्थिव पूजन के व्रत में लगी रही। उसके पति ने भी कोई ध्यान नहीं दिया, जब तक शिवलिंग पूजन पूरा नहीं हुआ। वह स्थिरचित्त होकर शिव का नाम लेते हुए पार्थिव शिवलिंगों को बहाने गई और जब वह मुड़ लौटने लगी तो उसने उस सरोवर के तट पर अपने पुत्र को देखा। घुश्मा अपने पुत्र को जीवित देखकर भी ज्यादा खुश नहीं हुई, जैसे कि वह उसके मरने पर दुखी भी नहीं थी, पर यथावत शिवजी के ध्यान में तत्पर रही। उसी समय वहां से संतुष्ट हुए ज्योतिस्वरूप सदाशिव प्रकट हो गए और घुश्मा से वर मांगने को कहा। तब उसने अपनी बहन सुदेहा की रक्षा का वर मांगा। शिव ने जब इस पर आश्चर्य प्रकट किया तो घुश्मा ने कहा कि जो अपकार करने वाले का भी उपकार करता है, उसके दर्शन मात्र से ही सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। तब शिव ने इससे खुश होकर अन्य वर मांगने को कहा। तब घुश्मा ने शिव को हमेशा अपने पास रहने को कहा। इस पर शिव वहां पर घुश्मेश्वर लिंग नाम से स्थित हो गए। पुत्र को जीवित देखकर सुदेहा लज्जित हो गई और दोनों से क्षमा मांगकर अपने पाप को नष्ट करने वाले व्रत का आचरण करने लगी।

घुश्मेश्वर लिंग कथा का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण

इस कथा के रूप में कर्मयोग, अनासक्ति और अद्वैतभाव की महिमा का वर्णन हुआ है। घुश्मा को पुत्र देखकर भी ज्यादा खुशी नहीं हुई। मतलब किसी अन्य व्यक्ति के लाभ की खुशी तो कर्मयोगी को भी होती है, पर ज्यादा नहीं, मतलब इतनी नहीं कि उसके प्रति आसक्ति ही हो जाए। अपने मृत पुत्र को देखकर घुश्मा को जरा भी दुख नहीं हुआ। जो जाना था, वह तो चला गया। उसके लिए दुख करने का क्या फायदा था। अपने लिए जरा भी दुख नहीं हुआ, मतलब कर्मयोगी अपने लिए दुख को जरा भी नहीं मानता। शायद अपने लिए खुशी को भी नहीं मानता। अपने जीवित पुत्र को देखकर जो उसे थोड़ी खुशी हुई, वह उसके लिए हुई होगी, अपने लिए नहीं। अद्वैतभाव में रहने पर खुद ही इष्ट पर ध्यान लगने लगता है। इसीको ऐसा कहा है कि वह अपने पुत्र को जीवित देखकर खुश नहीं हुई, पर शिवजी के ध्यान में तत्पर रही। संबंध न्याय से तो इष्ट के ध्यान से अद्वैतभाव पैदा होना चाहिए शायद यही हुआ हो। कुंडलिनी ध्यानयोग से आध्यात्मिक गुण पैदा होने के पीछे यही सिद्धांत कारण है। मृत व्यक्ति कभी जीवित नहीं हो सकता। वह जो उसे अपना मृत पुत्र दिखाई दिया, वह उसकी शिवसाधना के प्रभाव से उसका प्रगाढ़ ध्यान लगने के कारण उसे अपने मन में ही दिखाई दिया। तभी उसे शिव भी नजर आए, मतलब उस ध्यान से वह जागृत भी गई। अगर सचमुच उसका पुत्र जीवित हो गया होता तो सुदेहा तप करके प्रायश्चित क्यों करती, क्योंकि तब तो उसके पुत्र के जीवित होने से उसको मारने का पाप खुद ही नष्ट हो जाता। कहानी अप्रत्यक्ष रूप से बताती है कि सुदेहा द्वारा घुश्मा की ध्यानसिद्ध कल्पना में उसके द्वारा मारे गए उसके बेटे को देखे जाने से उसे बार-बार अपना वह पाप याद आया जिसने उसे तपस्या करने के लिए प्रेरित किया। इस तरह की सौतनों पर बहुत सी फिल्में बनी हैं। एक पंजाबी फिल्म सौंकण सौंकने तो हूबहू यही कथा लगती है। यही अंतर है कि उसमें सौतन कुछ नुकसान होने से पहले खुद ही अलग होकर अपने मायके चली गई। रही बात अपकार करने वाले को माफ करने की, तो ऐसे उदाहरणों से वेदपुराण भरे पड़े हैं। शायद हिंदु धर्म इसीलिए सबसे सहिष्णु कौम है। पर कई कौमों ने इसका नाजायज फायदा भी उठाया। कहते हैं कि यदि पृथ्वीराज चौहान मुहम्मद गौरी को तराईं के युद्ध में माफ न करता तो भारत सैंकड़ों सालों के लिए मुगलों का गुलाम सा न बनता। गुलामी की झलक तो आज तक दिखती है किसी न किसी रूप में। सबको पता है कि जनसंख्या नियंत्रण कानून और समान नागरिक संहिता को लागू करने में कौन सी कौमें सबसे ज्यादा अड़चन पैदा कर सकती हैं। ऐसे बहुत से उदाहरण हैं। अब म्यांमार के बौद्ध संत विराथू को ही लें। उनकी यह बात सोशल मीडिया पर बड़ी चली थी कि प्यार और सहिष्णुता तो ठीक है पर आप पागल कुत्ते की बगल में तो नहीं ही सो सकते। खैर यह पुराण पर आधारित बात चल पड़ी, इसका कोई पृथक उद्देश्य नहीं। कुल मिलाकर अतिवाद हर जगह हानिकारक होता है। मतलब कि दूसरे को माफ करना बेशक बहुत पुण्यदायक है, पर अगर सामने वाला जान लेने पर ही उतारू है, तो उस पुण्य का क्या करोगे, क्योंकि सबकुछ शरीर पर ही निर्भर है। वैसे भगवान शिव इस अतिवाद के खिलाफ ही लगते हैं, क्योंकि वे लगभग हर जगह ऐसे अति सहिष्णु वरदान पर आश्चर्य प्रकट करते हैं। अगर ऐसा वर मांगना स्वाभाविक होता या बिल्कुल ठीक होता तो उन्हें आश्चर्य नहीं होना था। वैसे वे इस पर बहुत प्रसन्न भी होते थे। मतलब कि सहिष्णुता और अति सहिष्णुता को विभाजित करने वाली रेखा बहुत पतली है, और मौके के अनुसार ही प्रतिक्रिया होनी चाहिए। मुझे लगता है कि घुश्मा, अत्रि आदि लोग महान शिवभक्त होते थे जिन्होंने शिवलिंग की सहायता से जागृति प्राप्त की। उन्हीं को सम्मान देने के लिए ही उनके निवास स्थानों पर उनके नामों से स्थायी शिवलिंग बनाकर वहां तीर्थों के निर्माण कर दिए होंगे ताकि लोगों को उनसे प्रेरणा मिलती रहे। भौतिक वैज्ञानिकों को भी जब ऐसा श्रेय दिया जाता है तो आध्यात्मिक वैज्ञानिकों को क्यों नहीं। यही घुश्मेश्वर लिंग, अत्रीश्वर लिंग आदि के पीछे का कारण नजर आता है। इस कथा से एक अंदाजा यह भी लगता है कि किसी को मरणोपरांत याद करने से उसे परलोक में लाभ मिलता है। हो सकता है कि जब तीव्र ध्यान से घुश्मा ने अपने पुत्र को जीवित देखा तो वह सूक्ष्म रूप से जीवित हो गया हो, बेशक किसी को न दिखता हो। इसीलिए बहुत सी संस्कृतियों में हर वर्ष मृत संबंधियों को याद करते हुए उनकी पूजा करने की परंपरा है। शायद वह पुनर्जीवित आत्मा उसका ध्यान करने वाली आत्मा के नजदीक सूक्ष्म रूप में बस जाती है, और उसके द्वारा किए जा रहे कर्मों को करती है, उसके द्वारा भोगे जा रहे फलों को भोगती है, और उसके साथ ही मुक्त भी हो जाती है। शायद यह ऐसा ही संबंध होता है जैसा एक मां और उसके पेट में पल रहे बच्चे के बीच में होता है। कई बार जब कोई बुरी आत्मा किसी के शरीर में डेरा डालती है तो उससे गलत काम भी करवाती है। फिर उसे तांत्रिकों की सहायता से भगाना भी पड़ता है। इसीलिए बुरी संगति से बचने को कहा जाता है। अच्छी आत्माएं किसी के शरीर में ज्यादा दखलंदाजी नहीं करती क्योंकि वे अपनी मर्यादाएं समझती हैं, हालांकि मौका पड़ने पर सही रास्ते पर लगाती भी रहती हैं। इसलिए उन्हें भगाने की जरूरत नहीं होती, बल्कि उन्हें तो बुलाकर किया जाता है, जैसे कि देवताओं का इन्वोकेशन अर्थात आह्वान। वैसे भी इस अजूबों से भरी दुनिया में क्या कुछ अजीब नहीं घट सकता।

Kundalini yoga can make a dead person alive

There is a story of Sudharma Brahmin in Shivpuran. He remained satisfied, happy and in a non-dual state. He had a devout wife named Sudeha. Much of his life passed but he did not have any son. Still the philosopher Sudharma did not feel sad at all. But his wife was very sad about not having a son. She asked her husband to try for a son. Then Sudharma would scold him and explain what his son would do. Who is whose mother and who is whose father, who is the son and who is the brother or friend. Everyone is selfish. Once a neighbor woman scolded Sudeha for not having a son. She again started complaining to her husband. He explained to her a lot but when she still did not understand, he placed two flowers in front of her and asked her to pick one of them. Sudeha picked up the flower on which the Brahmin had thought about not having a son. Still she did not agree and threatened to commit suicide without her son. Then Sudeha brought her real sister Ghushma and asked her husband to marry her for a son. Sudharma explained to her that she would become jealous of her if she had a son, which would hurt her. On that Ghushma said how could she be jealous of her real sister. Ghushma used to make, worship and immerse one hundred and one earthly Lingas every day. In this way, when the number of one lakh Lingas was completed, she was blessed with a beautiful son. Sudharma was very happy to see him and started enjoying pleasures without attachment. After that Sudeha became very jealous of Ghushma. All the relatives started respecting Ghushma. Although Sudharma still gave more respect and love to Sudeha, there was deceit in her mind. Ghushma’s son also got married. Burning Sudeha Couldn’t stay calm on a day. She killed the stepson who slept with his wife, dismembered his body and threw those pieces into the river. Coincidentally, Sudeha also used to immerse the earthly shivlingas at the same place. When the daughter-in-law woke up in the morning and saw splattered blood and pieces of her husband’s body scattered on the bed, she cried. Sudeha also started crying while acting. But Ghushma did not feel sad at all and continued fasting for the Shiva’s prayers. Her husband also did not pay any attention until the Shivling worship was completed. With a steady mind, she took the name of Shiva and went to leave the earthly Shivalingas and when she turned back, she saw her son on the banks of that lake. Ghushma was not very happy to see her son alive, just as she was not sad at his death, but remained ready to meditate on Lord Shiva. At the same time, Satisfied Sadashiv appeared from there and asked Ghushma to ask for a boon. Then she asked for the boon of protecting her sister Sudeha. When Shiva expressed surprise at this, Ghushma said that all the sins are destroyed by the mere sight of the one who does good to the one who does harm. Then Shiva became happy with this and asked her to ask for another boon. Then Ghushma asked Shiva to always stay with her. On this, Shiva settled there under the name Ghushmeshwar Linga. Seeing her son alive, Sudeha felt ashamed and sought forgiveness from both of them and started fasting to erase her sins.

Psychological analysis of the ghushmeshwar linga story

The glory of Karmayoga, non-attachment and non-duality has been described in this story. Ghushma was not very happy even after seeing her son. Meaning, a Karmayogi also feels happy for the benefit of another person, but not much, that is, not so much that he becomes attached to him. Ghushma did not feel sad at all after seeing her dead son. The one who had to go, has gone. What was the use of feeling sad for him? There was no sorrow for herself at all, meaning the Karmayogi does not accept sorrow for himself at all. Perhaps he doesn’t even consider happiness for himself. The little happiness she felt on seeing his living son must have been for him, not for herself. By living in a non-duality, one automatically starts concentrating on the desired aka ishta. It is said that she was not happy to see her son alive, but remained attentive to Lord Shiva. As far as justice is concerned, meditation on God should give rise to a feeling of non-duality, perhaps this is what has happened. This is the principle reason behind the development of spiritual qualities through Kundalini meditation. A dead person can never come alive. Whatever she saw as her dead son, she saw him in her mind only because of her deep meditation due to the influence of her Shiv Sadhana. Then she also saw Shiva, which means she became awakened by that meditation. If her son had really come alive then why would Sudeha do penance and atone for it, because then the sin of killing her son would itself have been destroyed if her son was alive. The story tells indirectly that seeing her killed son in the meditative imagination of sudeha by ghushma made her remember her that sin repeatedly that propelled her to do penance. Many films have been made on such types of stepmothers. A Punjabi film Saunkan Saunkne seems to have exactly the same story. The difference is that the daughter-in-law in this herself separated and went to her maternal home before any harm could be done by her. As far as forgiving the one who has done wrong is concerned, the Vedas and Puranas are full of such examples. Perhaps that is why Hinduism is the most tolerant community. But many communities also took unfair advantage of it. It is said that if Prithviraj Chauhan had not forgiven Muhammad Gauri in the battle of Tarain, India would not have become like a slave of the Mughals for hundreds of years. Glimpse of slavery still appears existing in some form or the other. Everyone knows which communities can create the most obstacles in implementing the population control law and uniform civil code. There are many such examples. Now take Myanmar’s Buddhist saint Wirathu. His statement was widely shared on social media that love and tolerance are good but you cannot sleep next to a mad dog. Well, this thing started based on Purana, it has no separate purpose. Overall, extremism is harmful everywhere. Meaning that forgiving others is certainly very virtuous, but if the person in front is inclined to kill you then what will you do with that virtue, because everything depends on the body. However, Lord Shiva seems to be against this extremism, because almost everywhere he expresses surprise at such a boon of extreme tolerance. He would not have been surprised if asking for such a boon was natural or absolutely right. By the way, he was also very happy about this. Meaning that the line dividing tolerance and over-tolerance is very thin, and reactions should be tailored to the occasion. I think people like Ghushma, Atri etc. were great devotees of Shiva who attained awakening with the help of Shivalinga. To honor them, permanent Shivalingas would have been built in their names at their residences so that people could continue to get inspiration from them. When physical scientists are also given such credit then why not spiritual scientists? This seems to be the reason behind the origin of Ghushmeshwar Linga, Atrishwar Linga etc. This story also gives an idea that remembering someone after death gives him/her benefits in the next world. It is possible that when Ghushma, through intense meditation, saw her son alive, he may have become alive in a subtle way, although of course not visible to anyone. That is why many cultures have a tradition of remembering and worshiping dead relatives every year. Perhaps this is a relationship similar to that between a mother and the child growing in her womb. Many times, when an evil spirit resides in someone’s body, it also makes him do wrong things. Then he has to be chased away with the help of Tantrikas. That is why it is said to avoid bad company. Good souls do not interfere much in anyone’s body because they understand their limitations, however, they keep guiding them on the right path whenever the need arises. Therefore, there is no need to chase them away, rather it is done by calling them, like invocation of the gods. Well, moreover what strange can not happen in this world full of wonders.

Kundalini Yoga assisted by Beeja Mantras

Friends, there is a seed mantra associated with each chakra. Om is associated with Sahasrara Chakra, Om or Sham with Ajna Chakra, Haam with Vishuddhi Chakra, Yam with Anahata Chakra, Ram with Manipura Chakra, Vam with Swadhisthana Chakra, and Lam with Muladhara Chakra. In this article we will try to understand the science related to them. The dot above the Beej Mantra is in the form of a Chakra. This makes the attention more pinpoint, meaning more focused and effective. By meditating on the Chakra in the visual form of the Beej Mantra and reciting its sound in the mind, the upper Prana and the lower Apana reach that Beej Mantra and get together. This is a good scientific technique to concentrate the power of the entire body at one point. Many people find it difficult to concentrate directly on the chakra. This is a good option for them. Due to this, the meditation picture on the chakra also becomes more clear. I did not need that kind of Bija Mantra, because I already had a clear experience of meditation image on the Chakras. It seems that I tworked as a seed mantra for me. With that I was able to give power to the chakras. Only now have I understood the usefulness of Beej Mantras. Earlier I used to take them lightly. For those who have not yet developed their meditation image, Beeja Mantras are very important, because these develop their meditation. Attach the point aka bindu at the top of the Bija Mantra to the most sensitive place of the Chakra, and add the remaining part of the Bija Mantra to it as per your wish, diagonally, straight, upside down, even rotating around the point and let the complete Bija Mantra be formed. If you chant it in your mind, you will immediately feel the benefits. For example, make the navel hole the point of Ram Beeja Mantra. Ham is associated with the throat chakra because perhaps it is a symbol of ego, and the sound of ‘Main Main’ means ‘Aham, Aham’ or I, I in English comes from the throat itself. The letter Om has been given to Sahasrara and Ajna Chakra because there is a sense of non-duality in all three. The Sham शं Bija Mantra is given to the Ajna Chakra because it means peace in Sanskrit, and distraction, fatigue or restlessness of the mind has a greater impact on the Ajna Chakra, as it is associated with the intellect and worldly functions of the mind. Sahasrara is already a transcendental chakra, hence there is no sense of disturbance in it. These are the two main chakras of the brain. Yam is given to the Heart Chakra because the feeling of compassion resides in the heart, and both have the letter Ya. रं or ram may have been given to the navel because food burns in the stomach, and burning is also called radna in Hindi. The mantra of Ba Bam Bam Bam Bam Lahari is the main mantra to please Shiva. Perhaps this is the seed mantra of Swadhisthana Chakra that’s vam. Lam might have been given to Muladhar because the letter La has sexual connotation. The point located above the Bijamantra has two benefits. Firstly, it gives a non-dual sound like Om, and secondly it helps in concentrating of energy on the sensational acupoints or chakra points. Actually, lotuses of different colors and petals are also associated with different chakras. Colors increase the resolution i.e. clarity of the picture. The petals reveal the connection of the chakras to the body. Due to this, sufficient life force reaches the chakras from the body. For example, the two petals on the Ajna Chakra mean two nadis from both the eyebrows. It is Ida and Pingala that bring power to the Ajna Chakra. Similarly, the hexagon of the heart chakra brings power from all sides here. Sky blue color has been given to the throat chakra because sound travels only in the sky. Green color has been given to the heart chakra because it symbolizes peace, kindness, greenery, growth and development. Yellow color has been given to the navel chakra because the food gets burnt in the stomach and turns yellow, just as the leaves of a tree turn yellow due to excess sunlight. Turmeric is yellow and so are the laddus. Swadhisthana Chakra gets more attention with orange color. Sexual desire is associated with sour taste and orange is also sour and sweet. Muladhar Chakra has been given red color because red blood is associated with violence etc. in the darkness of ignorance etc. Purple color helps in meditation on Sahasrara Chakra. Similarly, dark blue or black color gives good attention to Ajna Chakra. Although the practice of colors and lotus flower is a bit difficult, but it seems that the benefits are equally great. Only colors or colored circles can also be meditated upon. The point on top of Vam bijamantra in Sanskrit can be considered an orange. Similarly, the sensory point of the Muladhara Chakra, i.e. the point of Lam bijamantra can be considered as a red tomato. The navel hole can be considered the point of ram bijamantra and a yellow colour laddu. The green hexagon on the heart chakra can be considered as the point of Yam. The central dense sphere of Sahasrara of lotus flower or any other flower can be considered as the point of Om. It has petals all around. Lotus flower has been taken because the lotus leaf remains detached from water even when it is in it, and perhaps by meditating on it man too will learn to remain detached from the world. The shape of the circle from petal to petal through the central knot is also similar, like there is an oblique bracket above Om. The point can be considered as the seed of that flower inside that sphere. There are no set rules. You can meditate in any way that seems easy and effective. Similarly, the flowers of Ajna Chakra and Vishuddhi Chakra can also be considered a part of the syllables Om and Ham respectively. Whatever seed mantra comes to your mind, you should keep meditating on it, it automatically settles in its place. All chakras are interconnected. If only ‘Ham’ is being concentrated on the throat, then it does not matter, when it will draw energy, then the middle chakras like Anahata, Manipura etc. will themselves receive energy because they lie in the middle path. Due to this, the seed mantras of those chakras like Yam, Ram etc. automatically come to mind. When the chain of energy rotates, all the chakras are automatically massaged. By strengthening one chakra, all the chakras themselves get strengthened. It is like pushing one box seat of Chandol i.e. Merry Go Round gives motion to all the box seats. With practice, their seed mantras can be meditated on all the chakras from head to toe like beads of a rosary. Perhaps this is the real rosary and the physical rosary also makes it active.

कुंडलिनी योग में बीजमंत्रों का महत्त्व

दोस्तों, हरेक चक्र के साथ एक बीजमंत्र जुड़ा होता है। सहस्रार चक्र के साथ ॐ आज्ञा चक्र के साथ ओम या शं, विशुद्धि चक्र के साथ हं, अनाहत चक्र के साथ यं, मणिपुर चक्र के साथ रं, स्वाधिष्ठान चक्र के साथ वं, और मूलाधार चक्र के साथ लं जुड़ा होता है। इस लेख में हम उनसे जुड़ा विज्ञान समझने की कोशिश करेंगे। बीजमंत्र के ऊपर जो बिंदी होती है, वह चक्र रूप होती है। इससे ध्यान ज्यादा पिनपोइंट मतलब ज्यादा केंद्रित और प्रभावी हो जाता है। बीजमंत्र के दृश्यात्मक रूप आकार का ध्यान चक्र पर करने से और उसकी आवाज मन में बोलने से ऊपर का प्राण और नीचे का अपान उस बीजमंत्र पर पहुंच कर इकट्ठे हो जाते हैं। यह अच्छी वैज्ञानिक तकनीक है पूरे शरीर की शक्ति को एक बिंदु पर केंद्रित करने की। चक्र पर कईयों को सीधा ध्यान केंद्रित करने में दिक्कत आती है। उनके लिए यह अच्छा विकल्प है। इससे ध्यानचित्र भी चक्र पर ज्यादा स्पष्ट हो जाता है। मुझे तो वैसे बीजमंत्र की जरूरत नहीं पड़ी थी, क्योंकि चक्रों पर ध्यानचित्र मुझे पहले से ही स्पष्ट अनुभव होता था। लगता है कि उसी ने मेरे लिए बीजमंत्र का काम किया। उसी से मैं चक्रों को शक्ति दे पाया। अब जाकर मैं बीजमंत्राें की उपयोगिता समझ पाया हूं। पहले तो मैं इन्हें हल्के में लेता था। जिनका ध्यानचित्र अभी विकसित नहीं हुआ है, उनके लिए बीजमंत्र बहुत अहम हैं, क्योंकि ये ध्यानचित्र को विकसित करते हैं। बीजमंत्र के शीर्ष पर जो बिंदु होता है, उसे चक्र के सबसे संवेदनात्मक स्थान पर संलग्न करो, और उसके साथ बीजमंत्र का शेष भाग जिस मर्जी आड़े तिरछे, सीधे, उल्टे, यहां तक कि बिंदु के चारों ओर घुमाते हुए जोड़कर पूरा बीजमंत्र बनने दो और मन में उसका उच्चारण करो तो एकदम से फायदा महसूस होता है। उदाहरण के लिए नाभि के छेद को रं बीजमंत्र का बिंदु बना दो। हं गले के चक्र से इसलिए जुड़ा है क्योंकि शायद यह अहंकार का प्रतीक है, और गले से ही मैं मैं मतलब अहम अहम की आवाज निकलती है। ॐ अक्षर सहस्रार व आज्ञा चक्र को इसलिए दिया गया है क्योंकि तीनों में ही अद्वैत का भाव है। शं बीजमंत्र आज्ञा चक्र को इसलिए दिया गया है क्योंकि संस्कृत में इसका मतलब शांति है, और दिमाग के भटकाव, थकान या अशांति का प्रभाव आज्ञा चक्र पर ज्यादा पड़ता है, क्योंकि यह बुद्धि और दिमाग के सांसारिक कार्यों से जुड़ा है। सहस्रार तो पहले ही पारलौकिक चक्र है, इसलिए उसमें अशांति का मतलब ही नहीं है। दिमाग के ये दो ही मुख्य चक्र हैं। यं हृदय चक्र को इसलिए दिया गया है क्योंकि दया भाव हृदय में रहता है, और दोनों में य अक्षर है। रं नाभि को इसलिए दिया गया होगा क्योंकि पेट में भोजन जलता है, और जलाने को राड़ना भी कहते कहते हैं। ब बं बं बं बं लहरी की मंत्र तो शिव को प्रसन्न करने वाला प्रमुख मंत्र है। शायद यह स्वाधिष्ठान चक्र का बीजमंत्र वं ही है। लं मूलाधार को इसलिए दिया गया होगा क्योंकि ल अक्षर में कामभाव है। बीजमंत्र के ऊपर स्थित बिंदु के दो फायदे हैं। एक तो उससे ॐ जैसी अद्वैतबोधक ध्वनि मिलती है, और दूसरा इससे संवेदनात्मक चक्रबिंदु पर ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलती है। वैसे तो विभिन्न चक्रों के साथ विभिन्न रंगों और पंखुड़ियों के कमल भी जुड़े होते हैं। रंगों से ध्यानचित्र का रिसोलयुशन अर्थात स्पष्टता बढ़ती है। पंखुड़ियों से चक्रों के शरीर से संपर्क माने कनेक्शन का पता चलता है। इससे शरीर से चक्र तक पर्याप्त प्राणशक्ति पहुंचती है। जैसे कि आज्ञा चक्र पर दो पंखुड़ियों का मतलब दोनों भौहों की तरफ से दो नाड़ियां हैं। ये इड़ा और पिंगला ही हैं जो आज्ञा चक्र तक शक्ति लाती हैं। इसी तरह हृदय चक्र का षट्कोण यहां चारों तरफ से शक्ति लाता है। आसमानी नीला रंग गले के चक्र को इसलिए दिया गया है क्योंकि आवाज आसमान में ही चलती है। हरा रंग हृदय चक्र को इसलिए दिया गया है क्योंकि यह शांति, दया, हरियाली, वृद्धि व विकास का प्रतीक है। पीला रंग नाभि चक्र को इसलिए दिया गया है क्योंकि पेट में खाना जल कर पीला पड़ जाता है, जैसे पेड़ के पत्ते ज्यादा धूप से पीले पड़ जाते हैं। हल्दी भी पीली होती है और लड्डू भी। स्वाधिष्ठान चक्र पर संतरी रंग से ज्यादा ध्यान लगता है। कामभाव खट्टे स्वाद से जुड़ा है और संतरा भी खट्टा मीठा होता है। मूलाधार चक्र को लाल रंग इसलिए दिया गया है क्योंकि अज्ञानता के अंधेरे में हिंसा आदि के साथ ही लाल रक्त जुड़ा है आदि आदि। सहस्रार चक्र पर बैंगनी रंग से अच्छा ध्यान लगता है। इसी तरह आज्ञा चक्र पर गहरे नीले या काले रंग से अच्छा ध्यान लगता है। वैसे रंगों का और कमल के फूल का अभ्यास थोड़ा मुश्किल होता है, पर लगता है कि इससे फायदा भी उतना ही ज्यादा मिलता है। सिर्फ रंग या रंगदार घेरे का ध्यान भी किया जा सकता है। वं के बिंदु को एक संतरा माना जा सकता है। इसी तरह मूलाधार चक्र के संवेदनात्मक बिंदु मतलब लं के बिंदु को टमाटर माना जा सकता है। नाभि छिद्र को रं का बिंदु और एक पीला लड्डू माना जा सकता है। हृदय चक्र पर जो हरा षट्कोण है, उसे यं का बिंदु समझा जा सकता है। सहस्रार के कमल या किसी भी फूल के केंद्रीय सघन गोले को ॐ का बिंदु माना जा सकता है। चारों तरफ इसके पंखुड़ियां होती हैं। कमल का फूल इसलिए लिया गया है क्योंकि कमल का पत्ता जल में रहकर भी उससे निर्लिप्त रहता है, और शायद इसके ध्यान से आदमी भी दुनिया में निर्लिप्त रहना सीख जाए। फूल के केंद्रीय गोले का आकार भी ऐसा ही होता है, जैसे ॐ के ऊपर एक तिरछी ब्रेकेट होती है। बिंदु को उस गोले के अंदर उस फूल का बीज समझा जा सकता है। कुछ भी निर्धारित नियम नहीं है। जैसा आसान व प्रभावी लगे, उस तरीके से ध्यान कर सकते हैं। इसी तरह आज्ञा चक्र और विशुद्धि चक्र के फूल को भी क्रमशः ओम और हं अक्षर का भाग माना जा सकता है। जो बीजमंत्र ध्यान में आए, उसी का ध्यान करते रहना चाहिए, वह खुद अपनी जगह पर बैठ जाता है। सभी चक्र आपस में जुड़े होते हैं। यदि गले पर हं का ही ध्यान हो रहा है, तो कोई बात नहीं, यह जब ऊर्जा खींचेगा, तो बीच वाले अनाहत, मणिपुर आदि चक्र खुद ऊर्जा प्राप्त करेंगे क्योंकि वे बीच के रास्ते में ही पड़ते हैं। इससे उन चक्रों के यं, रं आदि बीजमंत्र खुद ही ध्यान में आ जाते हैं। जब ऊर्जा की जंजीर घूमती है तो सभी चक्रों की मालिश खुद ही हो जाती है। एक चक्र को बल देने से सभी चक्रों को खुद ही बल मिलता है। यह ऐसे ही है जैसे चंडोल अर्थात मैरी गो राउंड के इसी एक बॉक्स सीट को धक्का देने से सभी बॉक्स सीटों को गति मिलती है। अभ्यास होने पर सिर से पैर तक सभी चक्रों पर उनके बीजमंत्रों का माला के मनके की तरह ध्यान किया जा सकता है। शायद यही असली माला है और भौतिक माला भी इसीको क्रियाशील करती है।

कुंडलिनी योग सांसारिक जीवन पर एक अतिरिक्त सुविधा मात्र है

दोस्तो, शिवपुराण में अंधक नामक एक दैत्य की कथा आती है। कहते हैं कि उस देवशत्रु दैत्य ने तीनों लोकों को अपने वश में कर लिया था। वह समुद्र में गर्त का आश्रय लेकर रहता था। वह अत्यंत पराक्रमशाली दैत्य उस गर्त से निकलकर प्रजाओं को पीड़ित करने के पश्चात पुनः उसी गड्ढे में प्रवेश कर जाता था। तब दुखी होकर सभी देवताओं ने बारंबार शिव की प्रार्थना करते हुए उनसे अपना सारा दुख निवेदन किया। इस पर शिव ने उन्हें आश्वासन देते हुए कहा कि वे उसे मारेंगे और उनसे कहा कि वे अपनी सेना के साथ वहां जाएं, वे खुद भी गणों के साथ वहां आ रहे हैं। तब उस गर्त से देवताओं और ऋषियों से द्वेष करने वाले उस भयंकर अंधक के निकल जाने पर देवता लोग उस गर्त में प्रवेष कर गए। तब देवताओं और दैत्यों ने परस्पर अत्यंत भयानक युद्ध किया। शिवजी की कृपा से देवता उस युद्ध में प्रबल हो गए। देवताओं से पीड़ित होकर वह ज्यों ही उस गड्ढे में प्रवेष करने लगा, उसी समय परमात्मा शिव ने उसे त्रिशूल में पिरो दिया। तब त्रिशूल में स्थित हुआ वह शिवजी का ध्यान करके प्रार्थना करने लगा,”हे देव, अंत समय में आपका दर्शन करके प्राणी आपके ही सदृश हो जाता है”। शिवजी ने खुश होकर उससे वर मांगने को कहा। तब सात्त्विक भाव को प्राप्त हुए उस दैत्य ने शिवजी को प्रणाम करके व उनकी स्तुति करके अपने लिए उनकी भक्ति मांगी और उनसे वहीं निवास करने की प्रार्थना की। इस पर शंकर ने दैत्य को उसी गड्ढे में फेंक दिया और लोकहित की कामना से वहीं लिंगरूप धारण कर स्थित हो गए।

उपरोक्त पौराणिक कथा का आध्यात्मिक-मनोवैज्ञानिक विश्लेषण

मुझे लगता है कि अवचेतन मन को ही अंधक राक्षस कहा गया है। यही आदमी को नियंत्रित करता है। अनजाने में जो आदमी से व्यवहार होता है, वह इसी के वश में आकर होता है। इसीलिए तो आदमी शराब आदि के नशे में मन में गहरी दबी हुई बातों, भावनाओं और शारीरिक क्रियाओं को प्रकट करता है। उस समय वर्तमान का चेतन मन निष्क्रिय सा रहता है, जिससे अवचेतन मन को शरीर को नियंत्रित करने का ज्यादा मौका मिलता है। समुद्र का गड्ढा मूलाधार चक्र है। समुद्र में भी जल होता है, और चक्रों में भी शक्तिरूपी जल होता है। समुद्र भी भूमि पर सबसे ज्यादा निचाई पर स्थित होता है, और मूलाधार चक्र भी शरीर में सबसे ज्यादा निचाई पर स्थित माना जाता है। चक्र के बीच में खाली घेरा ही वह गड्ढा है। जैसे मूलाधार चक्र शरीर का सबसे सुदूर और निष्क्रिय सा भाग है, उसी तरह अवचेतन मन भी संपूर्ण मन का सबसे सुदूर और निष्क्रिय सा हिस्सा है। जैसे समुद्र के गड्ढे की गहराई में प्रकाश न पहुंचने से वहां अंधेरा होता है, इसी तरह अवचेतन मन में भी अंधेरा होता है। इसलिए मूलाधार और अवचेतन मन, दोनों को एक स्थान पर साथ रहते दिखाया जाता है। अंधक मतलब अंधा या अंधेरा करने वाला। जब आदमी अवचेतन मन के प्रभाव में होता है, तो वह भी आदमी को अंधा सा या अंधेरानुमा बना देता है। जैसे नींद आदि के रूप में कुछ देर अवचेतन मन में रहने के बाद आदमी जागकर चुस्ती के साथ क्रियाशील हो जाता है, उसी तरह मूलाधार में अवचेतन मन के रूप में सोई हुई शक्ति जागकर और ऊपर उठकर पूरे शरीर और मन को स्वस्थ और क्रियाशील कर देती है। पुरानी इच्छाएं और आदतें अवचेतन मन में सूक्ष्म वासनाओं के रूप में दबी हुई होती हैं। ये आदमी के व्यवहार को निर्धारित करती हैं। आदमी की मानसिक शक्ति कमजोर पड़ने पर ये वासनाएं जागकर उसके मन में काम, क्रोध आदि छः दोष पैदा कर सकती हैं, जिससे वह कई बार बुरे कर्म कर बैठता है, जो उसे पतन या विनाश की ओर ले जाता है। वासनाओं से बुरे काम और बुरे काम से पुनः वासना का निर्माण होने से ये दोनों चक्रवत एकदूसरे को बढ़ाते रहते हैं। अच्छा काम भी बुरा ही माना जाएगा यदि उसके साथ आसक्ति जुड़ जाए, क्योंकि यही आसक्ति वासना के बनने में मदद करती है। हां बुरे काम की तुलना में इससे यह फायदा होगा कि अच्छे काम का फल भी अच्छा ही मिलेगा। हालांकि अच्छे फल को आसक्ति के साथ भोगने से उससे भी वासना बनकर अवचेतन मन में दर्ज हो जाएगी, जो आदमी से फिर अच्छा काम करवाएगी। जैसे मर्जी कर्म और फल हों, आसक्ति का साथ मिलने पर बंधन तो डालेंगे ही। अच्छे काम और फल को सोने की जंजीर समझ लो, और बुरे कर्मफल को लोहे की जंजीर। दोनों आदमी को जन्ममरण के चक्कर में जकड़ेंगी ही। उसके बाद आदमी को चेतना या होश आने पर थोड़ी देर के लिए जागी हुई वह वासना फिर से उसके अवचेतन मन रूपी गड्ढे में चली जाती है। ऐसा बारंबार होता रहता है। अंधक मतलब अवचेतन मन और उससे उत्पन्न विभिन्न दोष मतलब उसकी सेना के विभिन्न राक्षस। जैसे ही काम, क्रोध आदि दोष आदमी पर हावी होने लगता है, वैसे ही उसके द्वारा शरीरविज्ञान दर्शन आदि अद्वैत साहित्यों या देवपूजा आदि अद्वैतवर्धक कर्मों की सहायता से उत्पन्न अद्वैतमय देवताओं के ध्यान से शिवरूपी ध्यानचित्र नीचे के चक्रों पर उजागर होने लगता है। योग से भी ऐसा ही होता है। योग से जब शरीर की प्राण शक्ति घूमते हुए मूलाधार पर पहुंचती है, तो इसे ही देवताओं का वहां पहुंचना कह सकते हैं, क्योंकि देवता शरीर के अंगों और उनको चलाने वाली शक्ति के साथ जुड़े होते हैं। देवताओं की सेना आध्यात्मिक कृत्यों को कहा गया होगा और शिव की सेना मतलब गणसेना तांत्रिक कृत्यों को कहा गया होगा। दोनों एकदूसरे के पूरक हैं। शक्ति के साथ शिवरूपी ध्यान चित्र का आभिव्यक्त होना स्वाभाविक ही है। वहां राक्षसों के साथ युद्ध का मतलब है, वहां दबे स्थूल या इसी जन्म के विचारों का प्रकट होना और उससे उनका कमजोर होना या नष्ट होना। अवचेतन मन में तो अनगिनत जन्मों के विचार दबे होते हैं। इसलिए उसे हराना इतना आसान नहीं है। मस्तिष्क में शक्ति पहुंचने से वह स्थूल विचारों और क्रियाओं के रूप में प्रकट होता रहता है, और उससे सर्वाधिक दूर मूलाधार में शक्ति पहुंचने से वह अपने अंधकारमय मूलरूप में छिपता रहता है। मतलब आदमी पूरी तरह उसके नियंत्रण में होता है, बेशक उसे लगे कि वह सबकुछ अपनी मर्जी से कर रहा है। जैसे ही वह शक्ति के साथ मूलाधार में पहुंचता है, वह बैक चैनलस से ऊपर जाती हुई शक्ति के साथ फिर ऊपर चढ़ जाता है। मतलब जैसे ही वह नीचे जाते हुए मूलाधार चक्र पर पहुंचता है, वैसे ही वह इड़ा, पिंगला, और सुषुम्ना नाड़ियों से ऊपर उठने लगता है। यही शिव के द्वारा अंधक को त्रिशूल पर लटकाना है। उन नाड़ियों से मास्तिष्क में पहुंचकर वह शिवध्यान की संगति से पवित्र हो जाता है। वहां से फिर वह फ्रंट चैनल से नीचे गिरकर पुनः मूलाधार चक्र में पहुंच जाता है। यह चक्र चलता रहता है। क्योंकि मूलाधार चक्र उस अंधक को त्रिशूल पर उठाकर लगातार पवित्र करता रहता है, इसलिए यही अंधकेश्वर लिंग लगता है। वह शिवलिंग मतलब शिव का लिंग इसलिए है क्योंकि वह शिवरूप ध्यानचित्र के साथ जुड़ा होता है। क्योंकि ध्यानचित्र एक पार्श्व संगीत की तरह जीवनरूपी शोरभरे संगीत के झटकों से आदमी को बचाता है, इसीलिए कथा में कहा गया है कि शिव ने देवताओं और लोगों की अंधक से रक्षा की। मतलब योग अगर पुरानी दबी वासनाओं को बाहर निकालकर उन्हें साफ करता रहता है, तो उसमें प्रयोग किया गया ध्यानचित्र योगी को उनके वशीभूत होने से बचाता रहता है। तभी तो वे वासनाएं साफ होती हैं, नहीं तो उनके वशीभूत होने से फिर नई वासनाएं बन जाएंगी। मतलब साफ है कि ध्यानचित्र के बिना योग अधूरा है और यहां तक कि नुकसानदायक भी हो सकता है। मतलब योग सैशन के अंत में एक ध्यान सैशन भी होना चाहिए। बहुत समय लगता है वासनाओं की सफाई में। इसलिए योग जीवनभर निरंतर और प्रतिदिन नियमित रूप से चलता रहना चाहिए। वैसे यह ध्यान देने वाली बात है कि आम दुनियावी कामों से भी शक्ति घूमती रहती है। जब आदमी शारीरिक काम करता है, तो रक्तसंचार से, पहले तो शरीर और मन को काफी आनंदमय ताजगी और स्फूर्ति मिलती है। फिर थक जाने पर जब आदमी आराम करता है तब रक्त को घुमाने वाली शरीर की क्रियाशीलता नहीं रहती, जिससे भागता हुआ रक्त अपने भारीपन की वजह से मूलाधार चक्र पर जमा हो जाता है, और साथ में शक्ति भी। उससे फिर से आदमी अवचेतन मन के अंधेरे की गिरफ्त में आ जाता है। उससे ऊबकर वह फिर सांसारिक क्रियाशीलता को अपनाकर उस मूलाधार पर जमा हुई शक्ति को घुमाने की कोशिश करता है। इससे पूरे शरीर और मास्तिष्क में शक्ति पहुंचने से वह फिर से आनंदित हो जाता है। मतलब अंधक गड्ढे से बाहर आकर शरीररूपी विश्व को नियंत्रित करने लगता है। क्योंकि आदमी से काम वही होते हैं, जो उसके अवचेतन मन में दबे होते हैं। वैसे बड़ों, गुरुओं और ज्ञानियों की संगति से वह उसके प्रभाव में आकर बुरे काम करने से बचता भी है। पर कब तक। जब तक उसका समूल नाश नहीं किया गया, तब तक पूरी सुरक्षा नहीं।

दुनियावी कामों से अगर पुराने जमे विचार शिथिल होते रहते हैं, तो नए विचार अवचेतन मन पर जमते भी रहते हैं। मतलब आगे दौड़, पीछे चौड़। इसीलिए कामों को कर्मयोग के रूप में करने को कहा जाता है। इसमें कर्ता, कर्म, और फल में आसक्ति नहीं रखी जाती। अनासक्ति की वजह से वे अवचेतन मन पर गहरे नहीं जमते बल्कि ऊपर ही रहकर जल्दी ही बाहर निकलकर नष्ट भी होते रहते हैं। इससे कुल मिलाकर विचारों का नष्ट होना विचारों के जन्म से ज्यादा होता है, जिससे अवचेतन मन रूपी अंधक धीरे धीरे शुद्ध होता रहता है।

दूसरी बात, योग के समय प्रकट होने वाले दबे विचारों को हम खुलकर प्रकट होने देते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि वे हमारे से ऊटपटांग काम या व्यवहार नहीं करवा सकते, क्योंकि हम उस समय काम तो कर ही नहीं रहे होते हैं बल्कि एकांत में योग कर रहे होते हैं। इससे वह बार बार प्रकट होकर नष्ट होते रहते हैं। उन्हें गीले बारूद का मिसफायर होना कह सकते हैं। दूसरी ओर, काम के समय हम बुरे विचारों को खुलकर प्रकट नहीं होने देते, क्योंकि वे हमें दिग्भ्रमित करके हमसे बुरे कर्म और बुरे व्यवहार करवा सकते हैं।

तीसरी बात, योग के समय ध्यानचित्र ज्यादा प्रभावी होता है। वह ऊटपटांग किस्म के दबे विचारों के प्राकट्य के बुरे प्रभाव को कम करते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि ज्यादा ध्यान ध्यानचित्र पर रहता है, जिससे जाग रही बुरी मानसिक वृत्तियों की तरफ कम ध्यान जाता है। वैसे तो कर्मयोग के समय भी ध्यानचित्र प्रभावी रहता है, पर उतना नहीं, जितना योग के समय। हालांकि मेरे कर्मयोग के दौरान तो ध्यानचित्र साधारण योग से भी ज्यादा प्रभावी रहता था, फिर भी तंत्रयोग के ध्यानचित्र से तो थोड़ा कम ही प्रभावी होता था। थोड़ा ही फर्क था। बेशक जागृति योग्य बल तंत्रयोग से ही मिला। कर्मयोग में भी बहुत शक्ति होती है। ध्यानचित्र के इसी अध्यात्मवैज्ञानिक लाभ को देखते हुए उसे शिवपुराण रचयिता ने शिव का रूप दिया है। वह योग की सहायता से अंधक को बार बार त्रिशूल पर उठाता रहता है और उसे पवित्र करके पुनः गड्ढे में फेंकता रहता है। मतलब बैक चैनल की नाड़ियों के माध्यम से शक्ति और शिवचित्र के साथ अवचेतन मन ऊपर उठता रहता है, अपनी एनर्जी रिलीज करके पवित्र होता रहता है, और फ्रंट चैनल से होकर नीचे गिरता रहता है। फिर पुनः पीछे से ऊपर उठता है। यह चक्र चलता रहता है।

चौथी बात, दुनियावी कामों से शक्ति को इतना ज्यादा और जल्दी जल्दी नहीं घुमा सकते, जितना कि योग से। दिनभर योग करते रहने से शक्ति को सैंकड़ों बार घुमाया जा सकता है, जबकि काम करते हुए तो शक्ति ज्यादा से ज्यादा 4 5 बार ही घूम सकती है। सुबह के ब्रेकफास्ट के बाद के काम से शक्ति एकबार घूमती है। फिर लंच के समय आराम होता है। आराम के बाद के काम से शक्ति फिर एकबार घूमती है। लगभग 1 2 बार तो सभी शक्ति को घुमा लेते हैं। कई लोग शाम के समय आराम के साथ चायपानी कर लेते हैं। उसके बाद के काम से शक्ति तीसरी बार घूमती है। बहुत तेज लोग जल्दी सोकर उठने से लेकर ब्रेकफास्ट तक के काम से भी शक्ति को चौथी बार घुमा लेते हैं। अति क्रियाशील लोग तो शाम के पूजा के आराम और खाना खाने के बाद से लेकर सोने तक शक्ति को पांचवी बार भी घुमा लेते हैं। मतलब शक्ति को घूमने के लिए काम के साथ आराम भी जरूरी होता है।

ये सब बारूद का खेल है। अवचेतन मन में जमा विचारों के बारूद को इस तरह जलाना है कि धमाका भी न होए और वह जलता भी रहे। इसके लिए उस पर अनासक्ति रूपी हल्के जल का छिड़काव किया जा सकता है। यही योग का ध्येय है। कुदरती चेष्ठा भी हल्के दर्जे का योग ही है, जिसमें आदमी को उसके अवचेतन मन में दबे कर्मविचारों के जैसे फल मिलते रहते हैं। इससे वे कर्मविचार याद आ जाते हैं, मतलब वे दबी हुई ऊर्जा के रूप में थे, जो बाहर निकलकर आत्मा में विलीन हो जाती है। ऊर्जा न पैदा होती है और न ही नष्ट होती है। वह आत्मा से प्रकट होती रहती है और उसी में विलीन होती रहती है। इस जन्म के दबे विचार तो याद आ जाते हैं, पर पिछले जन्म के विचार बिना याद आए ही विलीन होते रहते हैं। हालांकि उसका अहसास जरूर होता है। इसीलिए तो किसी अच्छे या बुरे फल मिलने के बाद आदमी अपने में हल्कापन और आनंद सा पैदा होता हुआ महसूस करता है। क्योंकि आदमी बुरे फल से घबराकर उसे अन्यथा व नकारात्मक रूप में लेता है, इसलिए उसमें आनंद होने से भी वह उसे महसूस नहीं कर पाता। अगर आदमी अनासक्ति व अद्वैत भाव को अपना कर रखे, तो आनंद ही है, चाहे फल अच्छा हो या बुरा हो। इसी कुदरती योग को तेज गति देने के लिए ही कुंडलिनी योग बना है।