वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास; भाग-11

पोस्ट के जो केटेगरी व टैग होते हैं, वे गूगल सर्च में उपयोगी नहीं होते। वे तो केवल वर्डप्रेस डॉट कोम में ही पोस्ट को सर्च करवाते हैं। केटेगरी व टेग, दोनों मिलाकर पंद्रह से अधिक नहीं होने चाहिए। उनकी पंद्रह से अधिक संख्या वाली पोस्टों को वर्डप्रेस फ़िल्टर करके स्पाम में डाल देता है। केटेगरी में मुख्य कीवर्ड होता है, जबकि टेग में उस मुख्य कीवर्ड का सब कीवर्ड होता है। उदाहरण के लिए, कुण्डलिनी जागरण से सम्बंधित पोस्ट के लिए “कुण्डलिनी” कीवर्ड केटेगरी के लिए फिट है, जबकि “कुण्डलिनी जागरण” टेग के लिए।

ऐसा भी चल सकता है कि किसी पोस्ट के लिए केवल केटेगरी के ही कीवर्ड दिए गए हों, टेग के नहीं। वर्डप्रेस डॉट कोम दोनों को एकसमान समझता है। यहाँ तक कि यदि कोई भी केटेगरी या टेग न दिया गया हो, तब भी वह पोस्ट के मुख्य कंटेंट में से कीवर्ड को ढूंढ लेता है।

अब जो वेबसाईट के रीडर के अंतर्गत टेग बटन है, उसका अर्थ यह नहीं है कि उसमें लिखे जाने वाले कीवर्ड से केवल उसी कीवर्ड के टेग वाली पोस्टें ही ढूंढी जाए। वास्तव में उस बटन का नाम “टेग” के स्थान पर “कीवर्ड” ज्यादा उपयुक्त लगता है।

अब मुफ्त की व खरीदी गई वेबसाईट के बीच में अंतर के बारे में बात करते हैं। निःशुल्क वेबसाईट के डोमेन नेम में वेबसाईट के नाम के साथ वर्डप्रेस डॉट लगा होता है। पेमेंट वाली वेबसाईट में यह नहीं लगा होता। यही अंतर है, और कुछ नहीं। उदाहरण के लिए,  इस वेबसाईट के निःशुल्क वर्जन का डोमेन नेम यह होगा, demystifyingkundalini.wordpress.com; जबकि इसके सशुल्क वर्जन का डोमेन नेम यह है, demystifyingkundalini.com

दोनों में ही मेरी वैबसाईट का डोमेन नेम (demystifyingkundalini) सुरक्षित है, और इसे कोई दूसरा नहीं ले सकता। सशुल्क वर्जन में एक लाभ यह भी है कि उसमें कस्टमर केयर की ईमेल व चेट सुपोर्ट मिलती है। साथ में, निःशुल्क वेबसाईट के डाटा की सुरक्षा का जिम्मा कंपनी नहीं लेती। इसलिए नियमित रूप से उसे बेकअप करते रहना पड़ता है।

वेबसाईट विकास से सम्बंधित पोस्ट की इस सिरीज (नंबर 1 से लेकर 12 तक) में जो जानकारी मुझे कस्टमर केयर सुपोर्ट से मिली है, उनमें से भी कुछ ख़ास-२ डाली गई है। इसलिए यह निःशुल्क वेबसाईट को बनाने वाले के लिए किसी वरदान से कम नहीं है।

अब बात आती है बहुभाषी वेबसाईट की। पहला तरीका यह है कि एक ही वेबसाईट में दोनों भाषाओं के पेज व पोस्ट डालें। इसके लिए मीनू आईटम्स व विजेट्स के नाम हिंदी व अन्ग्रेजी, दोनों में रखने पड़ेंगे। एक भाषा से दूसरी भाषा में जाने के लिए पेजस व पोस्ट्स पर लिंक डालने होंगे। अब ऐसी वेबसाईट में दो प्रकार से ब्लॉग पोस्ट लिखी जा सकती है। पहले तरीके में, पहले मूल भाषा में लिखा जाता है, फिर उसके नीचे उसी पोस्ट में अनुवादित भाषा में लिखा जाता है। पोस्ट के टॉप पर एक पेजजंप लिंक दिया जाता है, ताकि उस पर क्लिक करने से अनुवादित भाषा में जाया जा सके।

दूसरे तरीके में, मूल हिंदी के लिए अलग से पोस्ट बनाई जाती है, और अंग्रेजी के लिए अलग से। दोनों पोस्टों में एक-दूसरे पर जाने के लिए लिंक डाला जाता है। यह तरीका सर्च इंजन रेंकिंग के लिए कुछ ज्यादा अच्छा प्रतीत होता है। मैं तो द्विभाषी वैबसाईट के लिए इसी तरीके को अपनाता हूँ। यद्यपि इसमें एक भाषा के फोलोवर दूसरी भाषा की पोस्ट भी प्राप्त करते रहते हैं। इससे बचने का तरीका यह है कि अनुवादित भाषा के लिए अलग से वेबसाईट बना लो। मुफ्त वाली वेबसाईट भी बना सकते हैं। एक वेबसाईट से दूसरी पर जाने के लिए जगह-२ पर लिंक डाले जाते हैं। संभवतः उसमें एक वेबसाईट मीनू से दूसरी वेबसाईट भी खुल जाती है, क्योंकि दूसरी वेबसाईट पहली वाली वेबसाईट की सेटिंग पर ही बनी होती है। उदाहरण के लिए, यदि मुख्य वेबसाईट demystifyingkundalini.com है, तो दूसरी वेबसाईट demystifyingkundalinieng.wordpress.com बना सकते हैं। डोमेन नाम में कुछ न कुछ परिवर्तन तो करना ही पड़ता है। साथ में, वह डोमेन नाम उपलब्ध भी होना चाहिए। फिर भी, खासकर भारतीय वातावरण में एक ही वैबसाईट में हिंदी व अंग्रेजी भाषाएँ एक दूसरे की सहयोगी हैं, इसलिए यह मिश्रित तरीका सर्वोत्तम है।

ट्रांसलेशन के मामले में गूगल कुछ सख्त है। अंगरेजी की गुणवत्ता से वह आसानी से संतुष्ट नहीं होता। इसलिए कहा जाता है कि मशीन-ट्रांसलेशन या गूगल-ट्रांसलेशन को वह स्वीकार नहीं करता। पर मेरा मानना है कि यदि गूगल से बेसिक ट्रांसलेशन कराने के बाद उसे हाथ से सुधारा जाए, तो वह ट्रांसलेशन स्वीकृत हो जाता है।

Please click on this link to view this post in English (Website creation, management and development, part-11)

Website creation, management and development, part-10

The authority-website is one that holds dominance in its respective areas. If someone has made millions of rupees by writing a blog, then the topic of the type “How to be a Millionaire from Blog” will be called his Authority blog or website, not the person copying it. In the same way, one who has experienced a true Kundalini-awakening, his Kundalini-Website will be called as an authority website. However, it happens that his website is buried under the flood of other Kundalini-Websites. Now Google is taking proper cognizance of this, and it is giving more importance to the authority website.

The widgets should be re-ordered in such a way that the most important widget is at the top, and the least important is at the bottom. In the personal website, any type of post can be published, but there should be only one topic in the professional website. That is because the personal website is created to fulfill the hobby, not to earn money or fame.

As I mentioned earlier, the “Top Post” widget can be installed. The drawback of it is that it only counts the views generated in last 48-72 hours. If you want to create an all-time top post, then apply the ‘text widget’. Write “All Time Top Post” etc. in its title. Select the text button from the box below. Type the name of the post in it. Then select that name and click the “Link” button on the bar above it. Enter the URL address of that post in the box made from it. In this way, a list of top posts can also be made on the lower side, and that list can be made as a bulleted list or a numbered list. In this way, with help of text widget, we can put any text and links in the sidebar.

Keep in mind that the double sidebar can reduce the space for the main content, especially on the desktop. I like the theme with a single sidebar.

Writing the old text is called data spinning, data scraping, or plagiarism. If Google gets to know it, then it surely puts a penalty. In fact, it is not even a penalty. The Google bot only leaves the post unread and unranked, leaving the website itself down. Many say that text should be rewritten by changing it too much. However, no benefit appears from that, because with less than that hard work, a new text can be written. If someone copies and pastes data from his private chat, like email, then it probably is not a duplicate content. If you accidentally created a webpage with duplicate content, then you do not need to delete it. Only make it as a private page. This will remove it from the Internet, and Google will not be able to see it. Although that page will always be available to you.

As previously mentioned, the drop down list opens up by pressing the Menu button ‘W’ (Website). This list also has a “STAT” button. All information related to Website’s performance is found by clicking on it. These are, number of views, number of visitors, number of likes, number of comments, information about viewed pages / posts etc. There are also archives / home pages in views. This is not a special post or page. In fact, there is a list of months for a widget called “archive” on the homepage. Clicking on any of those months opens all posts for that month on a self-made and temporary page. Clicking on a month name adds a view to the name of the archive / homepage. This means that a visitor was on the homepage, when he clicked over a month of archive. If someone clicks a particular post of that month and opens it in its original form, then only a view will be added in the name of that particular post, otherwise it will not. Similarly, the same thing happens with the homepage-category widget. By clicking on one of the tags below the post, all the posts related to that tag are opened up on the above-mentioned floating page. The rest of the process is the same.

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कृपया इस पोस्ट को हिंदी में पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें (वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास, भाग-10)

वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास, भाग-8; Website creation, management and development, part-8

वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास, भाग-8 (please browse down or click here to view this post in English)

मुफ्त के वैबसाईट प्लान में वैबसाईट का मोबाईल के आकार-प्रकार के अनुरूप आकार-प्रकार भी नहीं होता, जिससे ट्रेफिक काफी घट जाती है। कई लोग कहते हैं कि डुप्लीकेट कंटेंट की पेनल्टी से बचने के लिए पोस्ट में केनोनिकल टेग लगाने चाहिए। सच्चाई यह है कि गूगल स्वयं ही वेबपेज / वेब आर्टिकल का सर्वाधिक उपयुक्त रूप सर्च रेंकिंग के लिए चुन लेता है। हाँ, यदि गूगल को डुप्लीकेट कंटेंट का मकसद सर्च रेंकिंग को बढ़ाना लगे, तब वह उस पर पेनल्टी भी लगा सकता है। फिर भी जहाँ तक हो सके, सुरक्षा के लिहाज से डुप्लीकेट कंटेंट से बचना ही चाहिए। गूगल का बोट पोस्ट को डालने के अनुमानित समय पर बार-२ आता रहता है, व नई पोस्ट की खुराक से संतुष्ट होकर ट्रेफिक को बढ़ाता रहता है। इसलिए यदि निर्धारित अंतराल पर पोस्ट न डाली जाए, तो वह भूखा रह जाता है, जिससे वह लम्बे समय तक वापिस नहीं भी आ सकता। इसलिए अच्छा रहता है, यदि निर्धारित समय व अंतराल पर पोस्ट को डालना जारी रखा जाए। सप्ताह में एक दिन व वीकएंड पर जैसे कि शनिवार की शाम को 6 बजे से 9 बजे के बीच में सर्वोपयुक्त समय है, क्योंकि उस समय दुनिया के सभी टाईम जोन के लोग जागते हुए होते हैं, और रिलेक्सड मोड में भी होते हैं। फ्री प्लान में मोबाईल फोन पर वेबसाईट को एडिट भी नहीं किया जा सकता है। वेबसाईट पर पर्सनल पेज भी बनाए जा सकते हैं, जिन्हें कोई और नहीं देख सकता। उस पर अपनी सभी निजी जानकारी डाली जा सकती है।

इसी तरह “नोफोलो” कोड भी नहीं लगाना चाहिए किसी पोस्ट के साथ, क्योंकि इससे लिंक जूस किसी को नहीं मिलता, और नष्ट हो जाता है। यदि लिंक जूस लिंकड वेबसाईट को जाने से रुक भी जाए, तो भी फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि दूसरे ब्लोगर भी इस कोड को लगाएंगे, जिससे उनके ब्लॉग का लिंक जूस हमें नहीं मिल पाएगा। संक्षेप में, ट्रेफिक बढ़ाने के शोर्ट टर्म उपायों से बचना चाहिए। इनमें से अधिकांश उपाय तो अवैध ही होते हैं, जिनके कारण गूगल पेनल्टी लगा सकता है। अगर वैबपोस्ट या वेबपेज के लिए नया कंटेंट लिखने की सामर्थ्य न हो, तो अपने पुराने कंटेंट के शब्दों व वाक्यों में थोड़ा परिवर्तन करके, संभवतः उसको दुबारा भी लिख सकते हैं।  यद्यपि ऐसा दूसरों के कंटेंट को चुरा कर नहीं करना चाहिए।  कई ऐसे जाने-माने इंटरनेट-पुरुष भी हैं, जो दूसरों के कंटेंट से छेड़छाड़ करके ही मशहूर हुए हैं।

यदि बढ़ी हुई ट्रेफिक को निरंतर प्राप्त करना चाहें, तो सप्ताह में दो बार नई पोस्ट डालें।परन्तु इससे यह नुकसान होता है कि पाठकों को नई पोस्ट पढ़ने के लिए अधिक समय नहीं मिलता। ट्रेफिक को निर्बाध रूप से बढ़ा हुआ रखने के लिए भी सप्ताह में दो बार पोस्ट लिखी जा सकती है, परन्तु इससे बार-2 नोटिफिकेशन को प्राप्त करने वाले ई-मेल फोलोवर परेशान हो सकते हैं। यह भी हो सकता है कि वे मानसिक बोझ के कारण पोस्ट को पढ़े ही न।

वैबसाईट को ट्रांसफर भी किया जा सकता है। वेबसाईट को किसी दूसरे आदमी के नाम भी बनाया जा सकता है। कई लोग स्वयं वेबसाईट के मालिकाना हक़ से दूर रहना चाहते हैं, विशेषकर जिन पर पैसों का लेन-देन होता है। सार्वजनिक क्षेत्र के कामगारों को ऐसी वेबसाईट से समस्या आती है, विशेषकर आयकर दाखिले के समय। अन्य कानूनी बाध्यताएं भी होती हैं। ऐसे में वे पत्नी के नाम से वेबसाईट बनाते हैं, और स्वयं उसके एडमिन बन जाते हैं। मालिक (यहाँ पर पत्नि) तो वैसे भी एडमिन होता ही है। कई लोग अपनी वेबसाईट के प्रसिद्ध होने पर उसे पत्नि आदि के नाम ट्रांसफर कर देते हैं। उसके लिए पत्नि का वर्डप्रेस अकाऊंट (वर्डप्रेस प्लेटफोर्म के लिए) बनाना पड़ता है। पत्नि आदि का अंतर्राष्ट्रीय डेबिट कार्ड भी बनाना पड़ता है, जिससे वेबसाईट को रिचार्ज या अपग्रेड किया जा सके। साधारण वेबसाईट को तो सरकारी कर्मचारी भी चला सकते हैं, जिसमें पैसों का लेन-देन न हो, राजनीतिक बयानबाजी न हो, और सरकार की नापसंदगी के लेख न लिखे गए हों। विचारों की अभिव्यक्ति का अधिकार तो सबको है, यद्यपि एक सरकारी कर्मचारी के लिए कुछ शर्तों के साथ। उन विचारों से उसका सरकारी कार्य दुष्प्रभावित नहीं होना चाहिए। यदि लाभान्वित होए, तब तो बहुत अच्छा है।

वर्डप्रेस के टॉप बार के रीडर बटन को क्लिक करके ड्रापडाऊन मीनू खुलता है। उसमें पहला बटन “फोलोड साईट्स” का होता है। उस पर सभी फोलोड साईट्स की पोस्टस दिखती हैं, क्रमवार, सबसे नयी वाली सबसे पहले। उससे निचला बटन “कन्वर्जेशन” का होता है। उस पर जिस किसी भी पोस्ट के कमेन्ट को लाईक किया गया हो, उस पोस्ट के सभी कमेन्ट दिखाई देते हैं, क्रमवार, लाईक्ड कमेन्ट वाली सबसे नयी पोस्ट के कमेन्ट सबसे पहले। उससे निचला बटन “डिस्कवर” का होता है। उस पर वर्डप्रेस-पाठकों द्वारा चुनी गई बेहतरीन पोस्टस दिखाई जाती हैं। उससे निचला बटन “सर्च” का होता है। उस पर बहुत सी रिकमंड की गई पोस्टस होती हैं। सबसे ज्यादा रेकमंड की गई पोस्टस सबसे पहले होती हैं। उसमें एक सर्च बार भी होती है, जिस पर हम पोस्टस को सर्च कर सकते हैं। उससे निचला बटन “माय लाईक्स” का होता है। उस पर वे सभी पोस्टस होती हैं, जिन्हें लाईक किया गया होता है, क्रमवार, सबसे नयी लाईक की गई पोस्ट सबसे पहले। सबसे नीचे “टेगस” बटन होता है। इस पर हम अपने मनचाहे टेग को एड कर सकते हैं, ताकि हर बार उस टेग पर क्लिक करने से उस टेग वाली पोस्टस खुलती रहें। उदाहरण के लिए, यदि किसी को “कुण्डलिनी” से सम्बंधित विषय पसंद हैं, तो वह “कुण्डलिनी” शब्द को एड कर सकता है।

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Website creation, management and development, part-8

In a free website plan, the website does not have any size-type according to the size-type of mobile, which reduces traffic significantly. Many people say that in order to avoid the penalty of duplicate content, it is necessary to put a canonical tag in the post. The truth is that Google automatically chooses the best form of webpage / web article for search rankings. Yes, if Google finds it as a tactic to increase search rankings, then it can also penalize it. However, as far as possible, for security purpose, duplicate content must be avoided. Google’s bot keeps coming at the estimated time of posting, and satisfied with the new post dose, keeps increasing traffic. So if the post is not put at the fixed interval, then he is hungry, so that he may not return for a long time. It is therefore good, if continuing to post is kept at set time and interval. Weekly posting, on the day of weekend, such as on Saturday, and at time between 6 pm and 9 pm is the best, because at that time all the people of the world are awake and also in the Relaxed mode. The website cannot be edited on the mobile phone in the free plan. Personal pages can also be made on the website, which nobody else can see. All your personal information can be inserted on it.

Similarly, the “nofollow” code should not be included in any post as it does not make available link juice to anyone, and is destroyed. Even if the link juice is being blocked from going to the Linked website, there is no benefit as other bloggers will also apply this code, so that the link juice of their blog is not available to us. In short, short-term measures should be avoided to increase traffic. Most of these measures are illegal, due to which Google can penalize. If one does not have the ability to write new content for his webpost or webpage, then by changing slightly the words and sentences of their old content, they can possibly write it again. Although it should not be stolen from others’ content. There are many well-known internet-men, who have become famous only by tinkering with others’ content.

If you want to get increased traffic continuously, then add new posts twice a week. But this can be a loss for readers do not get much time to read new posts. Posting a post twice a week can also be practiced to keep the traffic uninterrupted, but the e-mail followers who receive frequent notifications may be upset. It may also be that they did not read the post because of the mental burden.

The website can also be transferred. The website can also be named with another man. Many people want to stay away from the ownership of the website themselves, especially on which money transactions happen. Public sector workers face problems from such websites, especially during the time of income tax return. There are also other legal obligations. In such a way, they make websites in the name of their wives, and become their administrators. The owner (the wife on here) is also the admin itself. Many people transfer their website to others’ account when they are famous. For that, the WordPress account (for wordpress platform) has to be created for the new website owner. The international debit card of the wife etc. has to be created so that the website can be recharged or upgraded. The general informative website can also be run by government employees, in which there is no money transaction, no political rhetoric, and the articles of government’s dislikes have not been written. The right to express thoughts is for everyone, even though with some conditions for a government employee. With his ideas, his official work should not be affected. If beneficial to his official work, then it is very good.

Clicking the Reader button in top bar of WordPress opens the dropdown menu. The first button is “Followed Sites”. Posts are displayed from all the followed sites on it, serial wise, the newest first of all. The lower button is of “Conversation”. It shows the comments of all the posts on the comment of which the website owner has put the “like” himself, or a comment has been made by himself, in an orderly fashion, the newest post with liked comment appearing first of all. Still lower button is that of “Discover”. The best posts are selected by WordPress-readers on it. The lower button is that of “Search”. There are so many recommended posts on it. The most recommended posts are the first. There is also a search bar on which we can search the post. The lower button is that of “My Likes”. There are all the posts on it, which have been liked, respectively, the most recently posted posts being first in line. The bottom is the “Tags” button. On this, we can add tags to our liking, so that every time we click on that tag, the posts with that tag continue to open. For example, if someone likes topics related to “Kundalini”, then he can add the word “Kundalini” in the tag.

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वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास, भाग-6; Website creation, management and development, part-6

वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास, भाग-6 (please browse down or click here to view this post in English)

पेज जम्प लिंक भी साधारण लिंक एड्रेस के साथ अतिरिक्त कोड डालकर बनाए जाते हैं। सामान्य तौर पर लिंक को दबाने से लिंकड पेज के टॉप पर ही लेंडिंग होती है। यदि हम पेज के बीच में किसी विशेष पेराग्राफ पर सीधे ही लेंड करना चाहें, तो उसके लिए पेज जम्प लिंक बनाया जाता है। उसके लिए लिंकड पेज के एडिट मोड (एचटीएमएल में, विजुअल में नहीं) में जाकर लक्षित पेराग्राफ के प्रारम्भ में “स्टाईल” अंगरेजी के शब्द के बाद सिंगल स्पेस देकर यह कोड लिखा जाता है, id=“कुछ भी लिखो” सिंगल स्पेस——पोस्ट की सामग्री—। फिर जब उस लिंकड पेज का वेब एड्रेस भरा जाता है, तब उसके अंत में, कहीं पर भी बिना कोई स्पेस दिए, हेशटेग के  निशान के साथ  वही कोड लिखा जाता है, अर्थात #कुछ भी लिखो(जो id के साथ लिखा था)। यह मार्कर कुछ भी व किसी भी भाषा में लिखा जा सकता है, यद्यपि दोनों जगह पर यह एकसमान (समान स्पेसिंग के साथ) होना चाहिए, उपरोक्त लक्षित पेराग्राफ पर भी व उपरोक्त लिंक-निर्माण की एड्रेस बार में भी। अच्छा रहता है यदि पेज से सम्बंधित शब्द ही लिखे जाएं। जैसे कि कुण्डलिनी से सम्बंधित पेज में पहले पेज जम्प लिंक के लिए ‘कुण्डलिनी1’ व दूसरे के लिए ‘कुण्डलिनी2’ आदि-2। इसी पेज जम्प लिंक से ही एक ही पेज पर इधर से उधर एक क्लिक मात्र से जा सकते हैं, आवश्यकता के अनुसार, जैसे कि ‘गो टू टॉप ऑफ़ पेज’ आदि-2।

वेबसाईट का नाम वैसा रखना चाहिए, जो वेबसाईट की सामग्री से सर्वाधिक जुड़ा हुआ हो। हफ्ते-दस दिन के अंतराल पर नई व पर्याप्त लम्बी पोस्ट को डालते रहना चाहिए। उससे पाठकों की संख्या बढ़ी हुई रहती है। एक पोस्ट कम से कम 500 सब्दों की तो होनी ही चाहिए। वर्डप्रेस की यदि एक पोस्ट 1500 शब्दों से बड़ी हो, तो उसके टेग में ‘Longreads’ शब्द जोड़ देना चाहिए, क्योंकि लम्बी पोस्टों के अलग ही दीवाने होते हैं। आप किसी  भी आदमी को अपनी वेबसाईट से जुड़ने के लिए न्यौता दे सकते हैं। आप उसे फोलोवर, राईटर, एडमिन आदि कुछ भी बना सकते हैं।

मुझे तो लगता है कि सभी लोगों को अपनी एक वेबसाईट व एक पुस्तक बनानी चाहिए। इससे एक-दूसरे के विचारों का व जिन्दगी का पूरा पता चलता है। वेबसाईट किसी भी त्रुटि से पूर्णतया सुरक्षित रहती है। यदि लिखने में कोई त्रुटि हो जाए, तो उसे हम बिना दिक्कत के कभी भी दूर कर सकते हैं। किसी भी वेबपेज के एडिट मोड में टॉप पर एक हिस्टरी बटन बना होता है। उस पर वेबसाईट के कई हफ्तों-महीनों के सभी परिवर्तित रूप विद्यमान रहते हैं। हम किसी भी रूप में कभी भी वापिस लौट सकते हैं। यह सुविधा डेस्कटॉप पर ही विद्यमान होती है, मोबाईल डिवाईस पर नहीं। इसी तरह, हम किसी भी वेबपेज को कभी भी ट्रेश बिन में डाल सकते हैं। वह रिसाईकल बिन की तरह ही होता है, और उससे हम वेबपेज को कभी भी वापिस प्राप्त कर सकते हैं। हालांकि एक महीने के बाद ट्रेशबिन  खुद ही खाली हो जाता है।

पूर्वोक्तानुसार, टॉप लेफ्ट के मुख्यरूप W-My site बटन के ड्राप डाऊन मीनू के अंत में एक सेटिंग बटन भी होता है। उसमें 5 हैड होते हैं। राईटिंग हैड में जाकर हम अवांछित पोस्ट-केटेगरी को डिलीट कर सकते हैं। डिस्कशन हैड में हम चुन सकते हैं कि हमें कब-२ ई-मेल के माध्यम से नोटिफाई किया जाए—अगली पोस्ट में जारी—

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Website creation, management and development, part-6

Page Jump Links are also created by adding additional code with simple link address. Normally, the link is lending only at the top of the link page by clicking the link. If we want to lend directly to a particular paragraph in the middle of the page, then the page jump link is created for it. For this, by entering the single space after the word “style” in the beginning of the targeted paragraph, in the edit mode of the ‘to be linked page’ (in the HTML, not in visual), this code is written, id=”Write anything” single space– —- Content of the post —. Then when the web address of that ‘to be linked page’ is filled, then at the end of it, the same code is written without any spaces with hash tag, that is, #write anything (which is written with the above said id). This marker can be written in anything and in any language, although it should be in uniform (with the same spacing) in both places, that is, on the targeted paragraph as told above and in the address bar of the above link building. It is good if words related to pages are written. For example, Kundalini 1 for the first page jump link in the page related to Kundalini and ‘Kundalini 2’ for the second etc. The same page can jump from one paragraph to another on the same page from Jump Link only, as per the requirement, such as ‘go to top of page’ etc.

The name of the website should be kept that, which is most linked to the contents of the website. New and substantial long post should be posted in the intervals of ten days. With that, the number of readers keeps increasing. A post must have at least 500 words. If a post is bigger than 1500 words in Word press, then the word ‘longreads’ should be added in its tag, because the long posts have different junkies. You can invite any person to join your website. You can make him a follower, writer, admin etc.

I feel that all people should have their own website and a book. This gives complete understanding of each other’s thoughts and lives. The website is completely secure from any error. If there is an error in writing, then we can overcome it without any difficulty. On top of any webpage in edit mode, there is a history button. There are many variations of the website for several weeks and months. We can return to any form anytime. This feature exists on the desktop, not on the mobile device. Similarly, we can put any webpage in the trash bin anytime. It is like a recycling bin, and we can get it back to the webpage anytime. However, after a month the trash bin itself is empty.

As aforementioned, there is a ‘setting’ button at the end of the drop-down menu of the main ‘W-My site’ button of the top left. There are five heads in it. We can delete unwanted post-category by visiting the Writing Head. In the Discussion Head, we can choose to notify us for which contents via e-mail—-continued in next post—-

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वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास, भाग-5; Website creation, management and development, part-5

वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास, भाग-5 (please browse down or click here to view this post in English)

वर्डप्रेस के तीन प्लान हैं, पर्सनल, प्रीमियम, व बिजनेस। पर्सनल प्लान की कीमत 2400 रुपए प्रतिवर्ष है, प्रीमियम प्लान की लगभग 4000 रुपए, व बिजनेस प्लान की लगभग 8000 रुपए । अधिकाँश लोगों के लिए पर्सनल प्लान पर्याप्त है। जो बहुत अधिक आडियो व विडियो पोस्ट लिखते हैं, इंटरनेट पर कुछ बेचकर पेमेंट रिसीव करते हैं, विज्ञापनों से कमाई करते हैं, व ज्यादा ही तड़क-भड़क वाली वेबसाईट-थीम को पसंद करते हैं, केवल उन्हीं के लिए दूसरे प्लान की आवाश्यकता होती है। छोटे प्लान से ट्रेफिक भी अधिक मिलती है, क्योंकि वह जल्दी लोड होती है, और वह सिंपल भी होती है। मुझे तो पर्सनल प्लान ही सर्वश्रेष्ठ लगा। वर्डप्रेस डॉट कॉम के पास एक निःशुल्क प्लान भी होता है, जिसमें वह अपने विज्ञापन डालती रहती है, और कस्टमर केयर की सपोर्ट भी नहीं देती। निःशुल्क प्लान तो कभी नहीं लेना चाहिए, सीखने के लिए भी नहीं, क्योंकि उसमें डाटा गुम होने का डर हमेशा बना रहता है। मेने तो शुरू के 5-6 महीने के लिए निःशुल्क प्लान ही लिया था। जब मेरी ट्रेफिक कुछ बढ़ गई, और डाटा भी बड़ा हो गया, तब मैंने उसे पर्सनल प्लान में अपग्रेड करवाया। उसमें मुझे एक महीने का विंडो-टाईम मिला, जिसमें पुनः डाऊनग्रेड करने पर मुझे पूरा रिफंड वापिस मिलना था। जब मेरी वेबसाईट पूर्णतः तैयार हो गई, तब मैंने उसे प्रीमियम प्लान में अपग्रेड करवाया (उसमें भी एक महीने का विंडो-टाईम था)। पर मैं उसमें छः महीने तक काम करता रहा, और जब मेरा मन भर गया, और उसे निरर्थक समझा, तब मैंने उसे डाऊनग्रेड करवा दिया। अपवाद–स्वरूप मुझे पूरा रिफंड वापिस मिल गया।

अब हम पोस्ट के व वेबपेज के निर्माण के बारे में बात करते हैं। पोस्ट में केटेगरी व टैग बनाने का विकल्प होता है। केटेगरी से पाठकों / वेबसाईट-विजिटरों के लिए पोस्ट तक पहुँचना आसान हो जाता है। जैसे कि कविताओं के लिए कविता नाम से केटेगरी बना कर उसमें सभी कवितायेँ डाली जाती हैं। एक पोस्ट की एक से अधिक केटेगरी भी हो सकती हैं। टैग के रूप में कीवर्ड को लिखा जाता है। जैसे कि कुण्डलिनी से सम्बंधित पोस्ट के लिए कुण्डलिनी, योग, अध्यात्म आदि शब्द टैग के रूप में डाले जाते हैं। टैग से सर्च इंजन को पोस्ट खोजने में आसानी होती है। इसी तरह कमेन्ट, पिन्जबेक, व ट्रेकबेक को एनेबल या डिसेबल करने का विकल्प भी होता है। वेबसाईट में लिंक बनाना बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। लिंक से ही वेबसाईट पूरी दुनिया से जुड़ती है। पोस्ट के एडिट मोड में जाकर सर्वप्रथम एंकर टेक्स्ट को सेलेक्ट किया जाता है। एंकर टेक्स्ट पोस्ट का वह वाक्य या शब्द होता है, जिस पर लिंक की हुई सामग्री जुड़ी होती है, और जिस पर कर्सर रखने से हाथ का निशान बनता है, और जिसको क्लिक करने से लिंकड सामग्री वाला पेज खुल जाता है। एंकर टेक्स्ट को सेलेक्ट करने के बाद टॉप मीनू बार में लिंक के निशान पर क्लिक किया जाता है। उससे वह लिंकड पेज का यू-आर-एल (जो पेज के टॉप वाली गूगल-सर्च-बार में होता है) एड्रेस मांगता है। उस एड्रेस को वहां कोपी-पेस्ट करके सेव कर लिया जाता है। “लिंकड पेज को अलग टेब पर खोलें” वाले विकल्प को न चुनें। इसी लिंक बनाने की कला से ही “नेक्स्ट पेज”, “प्रीवियस पेज” आदि क्लिकेबल बटन बनाए जाते हैं। अगली पोस्ट में हम पेज जम्प लिंक के बारे में बताएँगे——अगली पोस्ट पर जारी——

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Website creation, management and development, part-5

There are three plans of WordPress.com. These are personal, premium, and business. The price of personal plan is 2400 INR per year, about 8000 INR is the price for premium plan, and approximately 8000 inr for the business plan. Personal plan for most people is enough. Those who write a lot of audio and video posts, sell something on the internet, receive payments, earn money from ads, and like more snappy website-themes, they only need another plan. Traffic is also much higher with the simple plan, because it loads quickly, and it is simple in design. I thought it was best to have a personal plan. WordPress.com also has a free plan, in which it keeps sending its ads, and does not even support customer care. Free plans should never be taken, not even for learning, because there is always the fear of losing data. I had only taken a free plan for 5-6 months of the start. When my traffic increased, and the data grew too, then I upgraded it to the personal plan. I got one-month window-time in which I had to get the entire refund back once I again downgraded that. When my website was completely ready, then I upgraded it to the premium plan (it also had a one-month window-time). However, I kept working for six months in it, and when my mind was full, and considered it as nonsensical, then I downgraded it. With the exception, I got the full refund back.

Now we talk about the creation of posts and web pages. Post has the option to create categories and tags. The category makes it easy for readers / website-visitors to access posts. For poetry, ‘poetry’ is named after category and all poems are inserted in it. There may be more than one category for a post. The keywords are written as tags. As for the post related to Kundalini, Kundalini-Yoga, Spirituality etc., kundalini or/and yoga words are put in the form of tags. The tag makes search engines easy to find posts. Similarly, there is an option to enable comment, Pingback, and Trackback. Making a link in the website is very important. The link connects the whole world with the post / website. First, the anchor text is selected by going into the edit mode of the post. The anchor text is the sentence or word of the post that the linked material is attached to, and putting mouse on which the hand mark evolves, and clicking on which opens the page with the link contents. After selecting anchor text, the link mark is clicked in the top editor bar. From that, it asks for the link-page URL (which is in the top of the to be linked page, in Google-search-bar). Copying that address, it is pasted in editor and saved. Do not select the option “Open the link page on a separate tab”. Clickable buttons are created from the art of creating link, like “Next page”, “Previous page” etc. In the next post we will tell about the page jump link —— contd. on next post ——

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वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास, भाग-4; Website creation, management and development, part-4

वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास, भाग-4 (please browse down or click here to view this post in English)

पिछली पोस्ट में हम वेबपोस्ट को लिखने के बारे में बता रहे थे, जो इस पोस्ट में भी जारी है। कुछ फोटो / वीडियो आदि डालने के लिए टॉप के बाएँ कोने का प्लस निशान दबा कर आए मीडिया बटन को दबाया जाता है।

पूर्वोक्त स्टेटस बटन से हम यह भी देख सकते हैं कि हमारी वेबसाईट की तरफ लोगों को रेफर / निर्देशित करने वाला स्रोत क्या है। जैसे कि क्वोरा या फेसबुक या ट्विटर आदि। वास्तव में प्रारम्भ में रेफरल ट्रेफिक का ही सहारा लेना पड़ता है, क्योंकि सर्च इंजन से ट्रेफिक लगभग शून्य ही होती है। इसके लिए हर सोशल मीडिया पर, फोरम पर, वार्तालाप पर व कमेन्ट पर अपनी वेबसाईट का लिंक डालकर रेफरेंस देते रहना चाहिए। सबसे अच्छा तरीका तो क्वोरा पर प्रश्नों के उत्तर दें, क्योंकि आजकल क्वोरा नंबर एक की प्रश्नोत्तरी वेबसाईट है। वहां पर वेबसाईट का लिंक डालने की सबसे अधिक छूट है, और वहां से रेफरल ट्रेफिक एकदम से मिलनी शुरू हो जाती है, और लम्बे समय तक मिलती रहती है। इसी तरह हम ओनलाईन एप से वेबसाईट का सर्च-रेंक व बेकलिंक स्टेटस भी जान सकते हैं। सर्च इंजन रेंक का मतलब है कि वेबसाईट में स्थित किसी कीवर्ड को गूगल पर सर्च करने पर वह वेबसाईट कौन से पेज पर व कौन से नंबर पर आ रही है। एक पेज पर 10 वेबसाईटें होती हैं। इस तरह के 10 पेज ही सर्च में शो होते हैं। यदि पहले पेज पर वेबसाईट आए तो अच्छी बात है, यदि उस पर भी प्रथम / टॉप की तीन वेबसाईटों में आए तो सर्वोत्तम। की-वर्ड यदि मशहूर होगा, तभी लोग उसे सर्च करेंगे। उदाहरण के लिए, यदि “कुण्डलिनी” शब्द प्रथम पृष्ठ पर आए, तो सर्वोत्तम ट्रेफिक मिलेगी, क्योंकि कुण्डलिनी शब्द बहुत मशहूर है। पर यदि “कुण्डलिनी का रहस्योद्घाटन”, यह शब्द-समूह / की-वर्ड प्रथम पेज पर आए, तो कोई विशेष लाभ नहीं, क्योंकि इस की-वर्ड को खोजने वाले लोग बहुत कम हैं।

सर्च-रेंकिंग वियूशिप से बढ़ती है, और वह वियूशिप भी गूगल सर्च से ही आनी चाहिए, रिफेरल सोर्स से नहीं। वियूशिप का अर्थ है कि प्रति विजिट कितने वियू हैं। यदि वियूशिप कम है, तो इसका अर्थ है कि वेबसाईट बोरिंग है। वास्तव में, सर्च इंजन से आई हुई ट्रेफिक का वियूशिप ही वेबसाईट-रेंकिंग बढ़ाता है, रिफेरल ट्रेफिक का नहीं। इसी तरह बेकलिंक से भी बहुत अधिक ट्रेफिक मिल सकती है, विशेषतः यदि बेकलिंक प्रसिद्द वेबसाईट से मिला है। बेकलिंक का अर्थ है कि दूसरी वेबसाईट हमारी वेबसाईट को लिंक कर रही है।

वर्डप्रेस डॉट ओर्ग (ओर्ग- ऑर्गेनाईजेशन) के माध्यम से उपलब्ध वर्डप्रेस वास्तव में लाएनेक्स के फ्री विन्डोज़ ऑपरेटिंग सोफ्टवेयर की तरह वेबसाईट बनाने के लिए एक सार्वजनिक व निःशुल्क सोफ्टवेयर है। इसे ओपन सोर्स सोफ्टवेयर भी कहते हैं। यह वेबसाईट के लिए ऐसे ही है, जैसे कम्पयूटर के लिए विंडोज सोफ्टवेयर है। उसे कोई भी सोफ्टवेयर विशेषग्य अपनी कला से सुधार सकता है। इसीलिए वेबसाईट बनाने में कोई खर्चा नहीं आता। परन्तु उससे सम्बंधित कायदे-कानूनों का ज्ञान तो होना ही चाहिए, जैसे कि गूगल को साईट मेप उपलब्ध करवाते रहना, गूगल एनालीटिक को इंस्टाल करना, एसईओ (सर्च इंजन ओपटीमाईजेशन) आदि-२। साथ में, होस्टिंग सर्विस के लिए तो किसी कंपनी को चुन कर, उसे तो शुल्क अदा करना ही पड़ता है। वह कंपनी वेबसाईट का सारा डाटा सुरक्षित रूप से स्टोर करके रखती है, और वेब पर उपलब्ध करवाती है। इन सभी परेशानियों को देखते हुए, वर्डप्रेस डॉट कोम (कोम- कोमर्शियल) नाम की कंपनी बनाई गई। उस कंपनी ने निःशुल्क वेबसाईट सेवाप्रदाता के वर्डप्रेस प्लेटफोर्म के साथ अन्य सभी सेवाएं प्रदान कीं। इससे लोगों को कुछ सस्ते में ही सभी परेशानियों से छुटकारा मिल गया। उनका काम फिर वेबसाईट पर लिखना मात्र ही रह गया। जैसे कि पहले भी बताया गया है कि उनके तीन प्लान हैं——अगली पोस्ट में जारी——

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Website creation, management and development, part-4

 

In the previous post we were talking about writing a web post, which is also in this post. To insert some photo / video etc., pressing the plus sign of the top left corner causes the media button pop out.

From the aforementioned ‘Stats’ button, we can also see what is the source of referring / directing people towards our website. Such as quora or facebook or twitter etc. In fact, referrals have to be resorted to in the beginning, because traffic from the search engines is almost zero. For this, on every social media, on the forum, on the conversation and comment, reference of website should be given by putting a link of your website. Answering the questions on Quora is the best way, because now quora is the number one quiz website. There is the maximum discount for putting a link of the website on quora, and from there the referral traffic starts immediately, and it lasts for a long time. Similarly, we can also find the website’s search-rank and backlink status from the online apps. Search Engine Rank means that on which page and on which position the website is positioned, when searching any keyword of website in the search engine. There are 10 websites on one page. Such 10 pages are shown only in search. If the first page is reserved to the website then it is a good thing, if it comes in the first / top three positions, then the best. If the keyword is famous, then only people will search it. For example, if the keyword “kundalini” brings website to the first page, then the best traffic will be obtained, because the word Kundalini is very popular. But if “the revelation of Kundalini”, this keyword-group / key phrase brings the website on the first page, then there is no special advantage, because people searching for this word-group are very few.

Search-Ranking increases with viewship, and that should also come from Google search, not from referral sources. Viewship means how many views per visit are there. If the viewship is low, it means that the website is boring. In fact, the traffic from the search engines increases website-ranking, not the referral traffic. Similarly, there may be more traffic from backlink, especially if the backlink is from the popular website. Backlink means that the other website is linking to our website.

WordPress available through WordPress.org (org- organization) is actually a public and free software for creating websites like Linux’s free Windows operating software. It is also called open source software. This is there to run the website, just as Windows software is there to run the computers. It can be improved by any software expert through his art. That’s why there is no cost to make the website. But there must be knowledge of the laws and rules related to it, such as providing the site map to Google, installing Google Analytics, SEO (Search Engine Optimization) etc. Together, by choosing a company for the hosting service, one has to pay the fee. The company keeps all the data stored on its cloud service safely, and makes it available on the web. Looking at all these problems, the WordPress.com (com-commercial) was created. The company provided all other services with the free WordPress platform. With this, people got rid of all the hassles in some cheap way. Their work was left to write on the website only. As mentioned earlier, they have three plans ———————————-continued in next web post———

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वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास, भाग-3; Website creation, management and development, part-3

वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास, भाग-3 (please browse down or click here to view this post in English)

(4) साईट पेजस- यह हरेक वेबपेज को एक सूचि में दिखाता है। वहां पर हरेक पेज पर उसके एडिट करने का, उसका स्टेट जानने का व उसे ट्रेश में डालने का विकल्प होता है। ट्रेश एक रिसाईकल बिन की तरह होता है, जहाँ से हम वेबपेज को पुनः प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए ट्रेश बिन को कभी खाली नहीं करना चाहिए। उस पर एक पेज को एड (जोड़) करने का भी विकल्प होता है। (5) ब्लॉग posts- वहां पर सभी पोस्टों की सूचि होती है। उन सभी की जांच-परख  (एडिट आदि) भी हम उपरोक्तानुसार ही कर सकते हैं। (6) मीडिया- उस पर वेबसाईट के सभी चित्रों की सूचि  कुछ क्रियाकलापों के साथ दिखती है। (7) कमेंट्स- इसमें सभी कमेंट्स (पिन्जबेक व ट्रेकबेक के साथ) होते हैं। वहां हम उन्हें एप्रूव या डीस्प्रूव कर सकते हैं। यदि कोई कमेन्ट झूठा / स्पाम लगे, तो उसे एप्रूव नहीं करना चाहिए। वैसे भी ऐसे कमेन्ट खुद ही स्पाम फोल्डर में चले जाते हैं। पिन्जबेक व ट्रेकबेक भी कमेन्ट ही होते हैं, जो तब मिलते हैं, जब कोई हमारी वेबसाईट को अपनी वेबसाईट से लिंक करता है (हमारी वेबसाईट के यूआरएल लिंक एड्रेस को अपनी वेबसाईट पर कोपी-पेस्ट करके)। पिंजबेक व ट्रेकबेक की सहायता केवल वर्डप्रेस नामक सेवाप्रदाता कंपनी ही देती है। (8) फीडबेक- इस  पर सभी संदेशों का पूर्ण ब्यौरा होता है, जो कभी भी लोगों ने वेबसाईट को प्रेषित किए हों। (9) वर्डएड्स- जैसा कि पहले भी बताया जा चुका है। (10) शेयरिंग- इस पर वेबसाईट ब्लॉग को अपने फेसबुक, ट्विटर, गूगल अकाऊंट आदि से कनेक्ट या डिसकनेक्ट किया जाता है। कनेक्ट करने से सभी लिखी गईं ब्लॉग पोस्ट एकदम से सभी कनेक्टीड सोशल मीडिया अकाऊंट पर खुद ही शेयर हो जाती हैं।

यह ध्यान रहे कि आजकल पूर्ण वेबसाईट का प्रचलन है। इसमें वेबसाईट व ब्लॉग-पोस्ट, दोनों का लाभ एकसाथ मिलता है। कोई वेबसाईट सिर्फ वेबसाईट ही हो सकती है। इसी तरह कोई ब्लॉग साईट सिर्फ ब्लॉग साईट ही भी हो सकती है। यद्यपि ये कुछ सस्ती हो सकती हैं, पर इनसे मन नहीं भरता। वर्डप्रेस पूर्ण वेबसाईट की सुविधा देती है। उसमें कुछ स्टेटिक पेज वेबसाईट को निर्मित करते हैं, और अन्य पेज ब्लॉग पोस्ट के लिए रखे होते हैं। (11) पीपल- इसमें ये सूचि होती है- टीम (इसमें एडमिन, एडिटर, औथर, कन्ट्रीब्यूटर लोगों का ब्यौरा होता है। हम इन्हें विस्तार दे सकते हैं), फोलोवर (सभी फोलोवर लोगों का ब्यौरा), इन्वाईटी (बाहर से निमंत्रित किए गए लोग व उनके रोल का ब्यौरा। हम कभी भी किसी को भी इनवाईट करके उसे उपर्युक्त कोई भी रोल दे सकते हैं)।

उपरोक्त ही बटन अधिकाँश व मुख्य होते हैं।

वर्डप्रेस पर ब्लॉग-पोस्ट लिखना- जैसा कि पहले भी बताया जा चुका है कि किसी भी वेबपेज के टॉप पर प्लस के निशान वाले कागज़ को प्रेस करके पोस्ट लिखने के लिए एक खाली वेबपेज खुलता है। उसमें सबसे ऊपर टाईटल के लिए अलग जगह होती है। उस पर लिखे गए शब्द खुद ही बड़े आकार में होते हैं। फिर पोस्ट का पहला पहरा हेडिंग-2 में लिखना चाहिए, यदि हिंदी में हो, अन्यथा केवल ब्लोक लेटर में ही लिखना चाहिए, क्योंकि हेडिंग में आने पर अंगरेजी के शब्द केपिटल बन जाते हैं। पूरे लेख को जस्टीफाईड एलाईनमेंट दें, यदि कविता हो तो सेन्ट्रल अलाईनमेंट दें।  एमएस वर्ड की तरह वहां पर लिखने की सभी सुविधाएं होती हैं। अच्छा रहेगा यदि मूल पोस्ट  को पहले एमएस वर्ड में बना लो, फिर उसे ब्लॉग पेज पर कोपी-पेस्ट करो। फिर छोटी-मोटी कमियाँ वहां पूर्ण करते रहो। ऐसा इसलिए, क्योंकि ब्लॉग पेज पर स्पेलिंग व ग्रामर को ठीक करने की सुविधा नहीं होती, और कई बार तो बीच में लिखने पर पहले से लिखे गए अक्षर कटने भी लग जाते हैं। कुछ —- अगली पोस्ट पर जारी—-

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Website creation, management and development, part-3

(4) Sites pages – This shows each webpage in a list. There is an option to edit it on each page, to know its state and put it in trash. Trash is like a recycling bin, from which we can retrieve the webpage. Therefore, the trash bin should never be made empty. There is also an option to add a page to it. (5) Blog posts – There is a list of all posts on there. We can also examine them all as per the above. (6) Media – The list of all the pictures of the website is displayed on it with some activities. (7) Comments- It contains all the comments (with Pingback and Trackback). We can approve or dispose these pings there. If a statement is false / spam, then it should not be approved. Anyway, such comments themselves go to the spam folder. Pingback and Trackback are also the comments, which are received when someone links our website to his website (by copying the URL link address of our website to his website). PingBack and Trackback is only provided by a service provider named WordPress. (8) Feedback – There is full details of all the messages on this, which have ever been sent to the website. (9) WordAds – as has been said before. (10) Sharing – By this, the website blog is connected to or disconnected to your Facebook, Twitter, Google Account etc. By connecting, all written blog posts are automatically shared on all the connected social media accounts.

Keep in mind that nowadays the full website is famous. In this, the benefits of both the website and the blog get together. Only a website can be a website. Similarly, a blog site can be just a blog site. Although these may be cheap, but do not appeal to mind much. WordPress offers full website support. Some Static Pages make up the website in it, and the other pages are kept for blog posts. (11) People – This list contains – Team (This includes the details of the Admin, Editor, Author, Contributor, We can extend them), Follower (Details of all the Follower people), Invitee (Invited from outside, the details of the invited people and their role, we can give any invitee any role as above).

The above buttons are mostly and main.

Writing a blog-post on WordPress- As already mentioned, a blank webpage opens to write a post by pressing the plus-mark paper on the top of any of the webpage. At the top there is a separate place for the title. The words written on it are themselves in large size. Then the first paragraph of the post should be written in the heading-2, if it is in Hindi, otherwise it should be written in the block letter only, because English words become capitals when in heading. Give the whole article a justified alignment, central if it is a poem. Like MS Word, there are all the facilities for writing. It would be good if you made the original post first in MS Word, then post it on the blog page. Then keep undoing small defects there. That’s because the blog page does not have the ability to fix spelling and grammar, and sometimes it gives a cut in the already written text if some text added afterwards. Something —- Continued on next post—-

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