वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास, भाग-8; Website creation, management and development, part-8

वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास, भाग-8 (please browse down or click here to view this post in English)

मुफ्त के वैबसाईट प्लान में वैबसाईट का मोबाईल के आकार-प्रकार के अनुरूप आकार-प्रकार भी नहीं होता, जिससे ट्रेफिक काफी घट जाती है। कई लोग कहते हैं कि डुप्लीकेट कंटेंट की पेनल्टी से बचने के लिए पोस्ट में केनोनिकल टेग लगाने चाहिए। सच्चाई यह है कि गूगल स्वयं ही वेबपेज / वेब आर्टिकल का सर्वाधिक उपयुक्त रूप सर्च रेंकिंग के लिए चुन लेता है। हाँ, यदि गूगल को डुप्लीकेट कंटेंट का मकसद सर्च रेंकिंग को बढ़ाना लगे, तब वह उस पर पेनल्टी भी लगा सकता है। फिर भी जहाँ तक हो सके, सुरक्षा के लिहाज से डुप्लीकेट कंटेंट से बचना ही चाहिए। गूगल का बोट पोस्ट को डालने के अनुमानित समय पर बार-२ आता रहता है, व नई पोस्ट की खुराक से संतुष्ट होकर ट्रेफिक को बढ़ाता रहता है। इसलिए यदि निर्धारित अंतराल पर पोस्ट न डाली जाए, तो वह भूखा रह जाता है, जिससे वह लम्बे समय तक वापिस नहीं भी आ सकता। इसलिए अच्छा रहता है, यदि निर्धारित समय व अंतराल पर पोस्ट को डालना जारी रखा जाए। सप्ताह में एक दिन व वीकएंड पर जैसे कि शनिवार की शाम को 6 बजे से 9 बजे के बीच में सर्वोपयुक्त समय है, क्योंकि उस समय दुनिया के सभी टाईम जोन के लोग जागते हुए होते हैं, और रिलेक्सड मोड में भी होते हैं। फ्री प्लान में मोबाईल फोन पर वेबसाईट को एडिट भी नहीं किया जा सकता है। वेबसाईट पर पर्सनल पेज भी बनाए जा सकते हैं, जिन्हें कोई और नहीं देख सकता। उस पर अपनी सभी निजी जानकारी डाली जा सकती है।

इसी तरह “नोफोलो” कोड भी नहीं लगाना चाहिए किसी पोस्ट के साथ, क्योंकि इससे लिंक जूस किसी को नहीं मिलता, और नष्ट हो जाता है। यदि लिंक जूस लिंकड वेबसाईट को जाने से रुक भी जाए, तो भी फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि दूसरे ब्लोगर भी इस कोड को लगाएंगे, जिससे उनके ब्लॉग का लिंक जूस हमें नहीं मिल पाएगा। संक्षेप में, ट्रेफिक बढ़ाने के शोर्ट टर्म उपायों से बचना चाहिए। इनमें से अधिकांश उपाय तो अवैध ही होते हैं, जिनके कारण गूगल पेनल्टी लगा सकता है। अगर वैबपोस्ट या वेबपेज के लिए नया कंटेंट लिखने की सामर्थ्य न हो, तो अपने पुराने कंटेंट के शब्दों व वाक्यों में थोड़ा परिवर्तन करके, संभवतः उसको दुबारा भी लिख सकते हैं।  यद्यपि ऐसा दूसरों के कंटेंट को चुरा कर नहीं करना चाहिए।  कई ऐसे जाने-माने इंटरनेट-पुरुष भी हैं, जो दूसरों के कंटेंट से छेड़छाड़ करके ही मशहूर हुए हैं।

यदि बढ़ी हुई ट्रेफिक को निरंतर प्राप्त करना चाहें, तो सप्ताह में दो बार नई पोस्ट डालें।परन्तु इससे यह नुकसान होता है कि पाठकों को नई पोस्ट पढ़ने के लिए अधिक समय नहीं मिलता। ट्रेफिक को निर्बाध रूप से बढ़ा हुआ रखने के लिए भी सप्ताह में दो बार पोस्ट लिखी जा सकती है, परन्तु इससे बार-2 नोटिफिकेशन को प्राप्त करने वाले ई-मेल फोलोवर परेशान हो सकते हैं। यह भी हो सकता है कि वे मानसिक बोझ के कारण पोस्ट को पढ़े ही न।

वैबसाईट को ट्रांसफर भी किया जा सकता है। वेबसाईट को किसी दूसरे आदमी के नाम भी बनाया जा सकता है। कई लोग स्वयं वेबसाईट के मालिकाना हक़ से दूर रहना चाहते हैं, विशेषकर जिन पर पैसों का लेन-देन होता है। सार्वजनिक क्षेत्र के कामगारों को ऐसी वेबसाईट से समस्या आती है, विशेषकर आयकर दाखिले के समय। अन्य कानूनी बाध्यताएं भी होती हैं। ऐसे में वे पत्नी के नाम से वेबसाईट बनाते हैं, और स्वयं उसके एडमिन बन जाते हैं। मालिक (यहाँ पर पत्नि) तो वैसे भी एडमिन होता ही है। कई लोग अपनी वेबसाईट के प्रसिद्ध होने पर उसे पत्नि आदि के नाम ट्रांसफर कर देते हैं। उसके लिए पत्नि का वर्डप्रेस अकाऊंट (वर्डप्रेस प्लेटफोर्म के लिए) बनाना पड़ता है। पत्नि आदि का अंतर्राष्ट्रीय डेबिट कार्ड भी बनाना पड़ता है, जिससे वेबसाईट को रिचार्ज या अपग्रेड किया जा सके। साधारण वेबसाईट को तो सरकारी कर्मचारी भी चला सकते हैं, जिसमें पैसों का लेन-देन न हो, राजनीतिक बयानबाजी न हो, और सरकार की नापसंदगी के लेख न लिखे गए हों। विचारों की अभिव्यक्ति का अधिकार तो सबको है, यद्यपि एक सरकारी कर्मचारी के लिए कुछ शर्तों के साथ। उन विचारों से उसका सरकारी कार्य दुष्प्रभावित नहीं होना चाहिए। यदि लाभान्वित होए, तब तो बहुत अच्छा है।

वर्डप्रेस के टॉप बार के रीडर बटन को क्लिक करके ड्रापडाऊन मीनू खुलता है। उसमें पहला बटन “फोलोड साईट्स” का होता है। उस पर सभी फोलोड साईट्स की पोस्टस दिखती हैं, क्रमवार, सबसे नयी वाली सबसे पहले। उससे निचला बटन “कन्वर्जेशन” का होता है। उस पर जिस किसी भी पोस्ट के कमेन्ट को लाईक किया गया हो, उस पोस्ट के सभी कमेन्ट दिखाई देते हैं, क्रमवार, लाईक्ड कमेन्ट वाली सबसे नयी पोस्ट के कमेन्ट सबसे पहले। उससे निचला बटन “डिस्कवर” का होता है। उस पर वर्डप्रेस-पाठकों द्वारा चुनी गई बेहतरीन पोस्टस दिखाई जाती हैं। उससे निचला बटन “सर्च” का होता है। उस पर बहुत सी रिकमंड की गई पोस्टस होती हैं। सबसे ज्यादा रेकमंड की गई पोस्टस सबसे पहले होती हैं। उसमें एक सर्च बार भी होती है, जिस पर हम पोस्टस को सर्च कर सकते हैं। उससे निचला बटन “माय लाईक्स” का होता है। उस पर वे सभी पोस्टस होती हैं, जिन्हें लाईक किया गया होता है, क्रमवार, सबसे नयी लाईक की गई पोस्ट सबसे पहले। सबसे नीचे “टेगस” बटन होता है। इस पर हम अपने मनचाहे टेग को एड कर सकते हैं, ताकि हर बार उस टेग पर क्लिक करने से उस टेग वाली पोस्टस खुलती रहें। उदाहरण के लिए, यदि किसी को “कुण्डलिनी” से सम्बंधित विषय पसंद हैं, तो वह “कुण्डलिनी” शब्द को एड कर सकता है।

यदि आपने इस लेख/पोस्ट को पसंद किया तो कृपया इसे शेयर करें, इस वार्तालाप/ब्लॉग को अनुसृत/फॉलो करें, व साथ में अपना विद्युतसंवाद पता/ई-मेल एड्रेस भी दर्ज करें, ताकि इस ब्लॉग के सभी नए लेख एकदम से सीधे आपतक पहुंच सकें। कमेन्ट सैक्शन में अपनी राय जाहिर करना न भूलें।

 

Website creation, management and development, part-8

In a free website plan, the website does not have any size-type according to the size-type of mobile, which reduces traffic significantly. Many people say that in order to avoid the penalty of duplicate content, it is necessary to put a canonical tag in the post. The truth is that Google automatically chooses the best form of webpage / web article for search rankings. Yes, if Google finds it as a tactic to increase search rankings, then it can also penalize it. However, as far as possible, for security purpose, duplicate content must be avoided. Google’s bot keeps coming at the estimated time of posting, and satisfied with the new post dose, keeps increasing traffic. So if the post is not put at the fixed interval, then he is hungry, so that he may not return for a long time. It is therefore good, if continuing to post is kept at set time and interval. Weekly posting, on the day of weekend, such as on Saturday, and at time between 6 pm and 9 pm is the best, because at that time all the people of the world are awake and also in the Relaxed mode. The website cannot be edited on the mobile phone in the free plan. Personal pages can also be made on the website, which nobody else can see. All your personal information can be inserted on it.

Similarly, the “nofollow” code should not be included in any post as it does not make available link juice to anyone, and is destroyed. Even if the link juice is being blocked from going to the Linked website, there is no benefit as other bloggers will also apply this code, so that the link juice of their blog is not available to us. In short, short-term measures should be avoided to increase traffic. Most of these measures are illegal, due to which Google can penalize. If one does not have the ability to write new content for his webpost or webpage, then by changing slightly the words and sentences of their old content, they can possibly write it again. Although it should not be stolen from others’ content. There are many well-known internet-men, who have become famous only by tinkering with others’ content.

If you want to get increased traffic continuously, then add new posts twice a week. But this can be a loss for readers do not get much time to read new posts. Posting a post twice a week can also be practiced to keep the traffic uninterrupted, but the e-mail followers who receive frequent notifications may be upset. It may also be that they did not read the post because of the mental burden.

The website can also be transferred. The website can also be named with another man. Many people want to stay away from the ownership of the website themselves, especially on which money transactions happen. Public sector workers face problems from such websites, especially during the time of income tax return. There are also other legal obligations. In such a way, they make websites in the name of their wives, and become their administrators. The owner (the wife on here) is also the admin itself. Many people transfer their website to others’ account when they are famous. For that, the WordPress account (for wordpress platform) has to be created for the new website owner. The international debit card of the wife etc. has to be created so that the website can be recharged or upgraded. The general informative website can also be run by government employees, in which there is no money transaction, no political rhetoric, and the articles of government’s dislikes have not been written. The right to express thoughts is for everyone, even though with some conditions for a government employee. With his ideas, his official work should not be affected. If beneficial to his official work, then it is very good.

Clicking the Reader button in top bar of WordPress opens the dropdown menu. The first button is “Followed Sites”. Posts are displayed from all the followed sites on it, serial wise, the newest first of all. The lower button is of “Conversation”. It shows the comments of all the posts on the comment of which the website owner has put the “like” himself, or a comment has been made by himself, in an orderly fashion, the newest post with liked comment appearing first of all. Still lower button is that of “Discover”. The best posts are selected by WordPress-readers on it. The lower button is that of “Search”. There are so many recommended posts on it. The most recommended posts are the first. There is also a search bar on which we can search the post. The lower button is that of “My Likes”. There are all the posts on it, which have been liked, respectively, the most recently posted posts being first in line. The bottom is the “Tags” button. On this, we can add tags to our liking, so that every time we click on that tag, the posts with that tag continue to open. For example, if someone likes topics related to “Kundalini”, then he can add the word “Kundalini” in the tag.

If you liked this post then please share it, and follow this blog while providing your e-mail address, so that all new posts of this blog could reach to you immediately via your e-mail. Do not forget to express your opinion in the comments section.

वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास, भाग-7; Website creation, management and development, part-7

वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास, भाग-7 (please browse down or click here to view this post in English)

डुप्लीकेट कंटेंट के लिए गूगल पेनल्टी लगा सकता है। यदि वेब पर कोई कंटेंट कोपी-पेस्ट किया गया / बिलकुल एक जैसा हो, तो उसे डुप्लीकेट कंटेंट कहा जाता है। इससे बचने का उपाय है कि पसंद किए गए कंटेंट का लिंक ही अपनी वेबसाईट में डालें, कंटेंट नहीं। इससे पाठक कंटेंट तक सुरक्षित रूप से पहुँच जाते हैं। इसी तरह, कभी भी किसी पब्लिश्ड पोस्ट को डिलीट न करें। पोस्ट को डिलीट करने से ब्रोकन लिंक बन जाता है, जिससे वेबसाईट डिफेम हो जाती है। ब्रोकन लिंक वह है, जिस पर क्लिक करने से पेज नहीं खुलता। इससे बचने का तरीका यह है कि पब्लिश की गई पोस्ट के यूआरएल से छेड़छाड़ न करें। इसी तरह अतिथि-लेखक को भी यह स्पष्ट कर दें कि उनका लेख वापिस नहीं होगा, और न ही वे वेब पर उसे अन्य स्थान पर डाल सकते हैं, डुप्लीकेट कंटेंट से बचने के लिए। संभवतः वे उसे फेसबुक पर अपने मित्रों तक सीमित तो रख ही सकते हैं। नई पोस्ट पब्लिश करने के बाद कुछ दिनों तक वेबसाईट पर ट्रेफिक बढ़ जाती है, व पोस्ट के शेयर भी बढ़ जाते हैं। फिर एकदम से ट्रेफिक डाऊन आ जाती है, और शेयर भी रुक जाते हैं। यह गूगल व फेसबुक के रेंकिंग अलोगरिथम के कारण होता है। वेबसाईट पर अधिक परिवर्तन किए जाने पर गूगल अपने सर्च इंजन से एकदम से व थोड़े समय के लिए ट्रेफिक को बढ़ा देता है। वह पाठकों का रिस्पोंस टेस्ट कर रहा होता है, ताकि वेबसाईट को रेंकिंग दी जा सके।

अपने वेबसाईट प्लान के एक्सपायर होने से 1-2 महीने पहले ही रिचार्ज कर लें। यदि आखिरी समय पर रिचार्ज में दिक्कत आने से डोमेन एक्सपायर हो जाए, तो बहुत दिक्कतें आती हैं। वैसे वेबसाईट का पर्सनल प्लान प्रीमियम प्लान से बेहतर होता है, क्योंकि उसमें वेबसाईट साधारण होती है, जिससे उसमें कम कन्फ्यूजन होता है, वह जल्दी से लोड हो जाती है, और उस पर ट्रेफिक भी बढ़ जाती है। फेसबुक पर भी गूगल की तरह ही रेंकिंग अलोगरिथम चलती है। जिस पोस्ट को जितने अधिक रिएक्शन (शेयर, लाईक, कमेन्ट) मिलते हैं, वह उतनी ही फैलती है। शुरू में ओरगेनिक ट्रेफिक (बिना पेमेंट/एड/बूस्ट की) कम होती है, पर धीरे-2 बढ़ जाती है, यदि पोस्ट में दम हो, तो। पोस्ट को लिखने के बाद एक दिन के लिए 40 रुपए न्यूनतम डालकर, उसका बूस्ट करके देख लेना चाहिए। यदि उसे अच्छा रिएक्शन मिले, तो बूस्ट को बढ़ाया जा सकता है, अन्यथा पैसा खर्च करने से कोई विशेष लाभ नहीं। वैसे असफल मामलों में वियू तो मिल जाते हैं, पर रिएक्शन नहीं मिलते। रिएक्शन ही तो पोस्ट को पंख लगाते हैं। कई बार केवल एकमात्र अच्छी पोस्ट भी वेबसाईट को चार चाँद लगा देती है। सफल बूस्ट के बाद ऑर्गेनिक ट्रेफिक भी बढ़ जाती है। अच्छी पोस्ट तो बिना बूस्ट के भी फैल जाती है, पर बहुत ज्यादा समय ले सकती है।

यदि आपने इस लेख/पोस्ट को पसंद किया तो कृपया इसे शेयर करें, इस वार्तालाप/ब्लॉग को अनुसृत/फॉलो करें, व साथ में अपना विद्युतसंवाद पता/ई-मेल एड्रेस भी दर्ज करें, ताकि इस ब्लॉग के सभी नए लेख एकदम से सीधे आपतक पहुंच सकें। कमेन्ट सैक्शन में अपनी राय जाहिर करना न भूलें।

Website creation, management and development, part-7

 

Google can penalize duplicate content. If any content on the web is copy-pasted / is exactly the same, then it is called duplicate content. The only way to avoid this is to insert a link to the liked content on your website, not copying the content. This allows readers to access content safely. Similarly, never delete a published post. Deleting a post creates a Broken Link, which causes the Website defamed. Broken link is that, clicking on which page does not open. The way to avoid this is not to tamper with the post URL of published post. Similarly, make the guest-writers clear that their article will not be returned, nor can they place it on another place on the Web, to avoid duplicate content. Maybe they can keep it limited to Facebook friends. After publishing a new post, traffic increases on the website for a few days, and post shares also increase. Then suddenly traffic goes down, and the shares also stop. This is due to Google’s and Facebook’s ranking algorithm. When more changes are made to the website, Google extends traffic from its search engine for a short time. Google is testing the readers’ responses so that the website can be ranked.

Recharge your website plan 1-2 months prior to expiry. If the domain expires at the last minute due to a problem with recharge, then there are many problems. The personal plan of the website is better than the premium plan, because the website is simple, thereby it has less confusion, and it loads quickly, and also increases traffic on it. Like Google, Ranking algorithm runs on Facebook too. The more reactions (shares, likes, comments) the post gets, the more it spreads. Initially, organic traffic (without payment / ad / boost) is low, but gradually increases, if the post is wonderful.  After publishing the post, test it by putting a minimum of 40 rupees for one day. That way, it should be test-boosted and looked after. If that gets a good reaction, boost can be increased; otherwise, the money spent does not have any special advantage. Well, in the case of failed cases, the views are found enough, but the reaction is not found. Reactions put wings to the post. Many times, only a single good post lets the website enjoy the stardom. After successful boost, organic traffic also increases. Good post can also spread without boost, but it can take a lot of time.

If you liked this post then please share it, and follow this blog while providing your e-mail address, so that all new posts of this blog could reach to you immediately via your e-mail. Do not forget to express your opinion in the comments section.

वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास, भाग-5; Website creation, management and development, part-5

वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास, भाग-5 (please browse down or click here to view this post in English)

वर्डप्रेस के तीन प्लान हैं, पर्सनल, प्रीमियम, व बिजनेस। पर्सनल प्लान की कीमत 2400 रुपए प्रतिवर्ष है, प्रीमियम प्लान की लगभग 4000 रुपए, व बिजनेस प्लान की लगभग 8000 रुपए । अधिकाँश लोगों के लिए पर्सनल प्लान पर्याप्त है। जो बहुत अधिक आडियो व विडियो पोस्ट लिखते हैं, इंटरनेट पर कुछ बेचकर पेमेंट रिसीव करते हैं, विज्ञापनों से कमाई करते हैं, व ज्यादा ही तड़क-भड़क वाली वेबसाईट-थीम को पसंद करते हैं, केवल उन्हीं के लिए दूसरे प्लान की आवाश्यकता होती है। छोटे प्लान से ट्रेफिक भी अधिक मिलती है, क्योंकि वह जल्दी लोड होती है, और वह सिंपल भी होती है। मुझे तो पर्सनल प्लान ही सर्वश्रेष्ठ लगा। वर्डप्रेस डॉट कॉम के पास एक निःशुल्क प्लान भी होता है, जिसमें वह अपने विज्ञापन डालती रहती है, और कस्टमर केयर की सपोर्ट भी नहीं देती। निःशुल्क प्लान तो कभी नहीं लेना चाहिए, सीखने के लिए भी नहीं, क्योंकि उसमें डाटा गुम होने का डर हमेशा बना रहता है। मेने तो शुरू के 5-6 महीने के लिए निःशुल्क प्लान ही लिया था। जब मेरी ट्रेफिक कुछ बढ़ गई, और डाटा भी बड़ा हो गया, तब मैंने उसे पर्सनल प्लान में अपग्रेड करवाया। उसमें मुझे एक महीने का विंडो-टाईम मिला, जिसमें पुनः डाऊनग्रेड करने पर मुझे पूरा रिफंड वापिस मिलना था। जब मेरी वेबसाईट पूर्णतः तैयार हो गई, तब मैंने उसे प्रीमियम प्लान में अपग्रेड करवाया (उसमें भी एक महीने का विंडो-टाईम था)। पर मैं उसमें छः महीने तक काम करता रहा, और जब मेरा मन भर गया, और उसे निरर्थक समझा, तब मैंने उसे डाऊनग्रेड करवा दिया। अपवाद–स्वरूप मुझे पूरा रिफंड वापिस मिल गया।

अब हम पोस्ट के व वेबपेज के निर्माण के बारे में बात करते हैं। पोस्ट में केटेगरी व टैग बनाने का विकल्प होता है। केटेगरी से पाठकों / वेबसाईट-विजिटरों के लिए पोस्ट तक पहुँचना आसान हो जाता है। जैसे कि कविताओं के लिए कविता नाम से केटेगरी बना कर उसमें सभी कवितायेँ डाली जाती हैं। एक पोस्ट की एक से अधिक केटेगरी भी हो सकती हैं। टैग के रूप में कीवर्ड को लिखा जाता है। जैसे कि कुण्डलिनी से सम्बंधित पोस्ट के लिए कुण्डलिनी, योग, अध्यात्म आदि शब्द टैग के रूप में डाले जाते हैं। टैग से सर्च इंजन को पोस्ट खोजने में आसानी होती है। इसी तरह कमेन्ट, पिन्जबेक, व ट्रेकबेक को एनेबल या डिसेबल करने का विकल्प भी होता है। वेबसाईट में लिंक बनाना बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। लिंक से ही वेबसाईट पूरी दुनिया से जुड़ती है। पोस्ट के एडिट मोड में जाकर सर्वप्रथम एंकर टेक्स्ट को सेलेक्ट किया जाता है। एंकर टेक्स्ट पोस्ट का वह वाक्य या शब्द होता है, जिस पर लिंक की हुई सामग्री जुड़ी होती है, और जिस पर कर्सर रखने से हाथ का निशान बनता है, और जिसको क्लिक करने से लिंकड सामग्री वाला पेज खुल जाता है। एंकर टेक्स्ट को सेलेक्ट करने के बाद टॉप मीनू बार में लिंक के निशान पर क्लिक किया जाता है। उससे वह लिंकड पेज का यू-आर-एल (जो पेज के टॉप वाली गूगल-सर्च-बार में होता है) एड्रेस मांगता है। उस एड्रेस को वहां कोपी-पेस्ट करके सेव कर लिया जाता है। “लिंकड पेज को अलग टेब पर खोलें” वाले विकल्प को न चुनें। इसी लिंक बनाने की कला से ही “नेक्स्ट पेज”, “प्रीवियस पेज” आदि क्लिकेबल बटन बनाए जाते हैं। अगली पोस्ट में हम पेज जम्प लिंक के बारे में बताएँगे——अगली पोस्ट पर जारी——

यदि आपने इस लेख/पोस्ट को पसंद किया तो कृपया इसे शेयर करें, इस वार्तालाप/ब्लॉग को अनुसृत/फॉलो करें, व साथ में अपना विद्युतसंवाद पता/ई-मेल एड्रेस भी दर्ज करें, ताकि इस ब्लॉग के सभी नए लेख एकदम से सीधे आपतक पहुंच सकें। अन्यथा कमेन्ट सैक्शन में अपनी राय जाहिर करें।

 

Website creation, management and development, part-5

There are three plans of WordPress.com. These are personal, premium, and business. The price of personal plan is 2400 INR per year, about 8000 INR is the price for premium plan, and approximately 8000 inr for the business plan. Personal plan for most people is enough. Those who write a lot of audio and video posts, sell something on the internet, receive payments, earn money from ads, and like more snappy website-themes, they only need another plan. Traffic is also much higher with the simple plan, because it loads quickly, and it is simple in design. I thought it was best to have a personal plan. WordPress.com also has a free plan, in which it keeps sending its ads, and does not even support customer care. Free plans should never be taken, not even for learning, because there is always the fear of losing data. I had only taken a free plan for 5-6 months of the start. When my traffic increased, and the data grew too, then I upgraded it to the personal plan. I got one-month window-time in which I had to get the entire refund back once I again downgraded that. When my website was completely ready, then I upgraded it to the premium plan (it also had a one-month window-time). However, I kept working for six months in it, and when my mind was full, and considered it as nonsensical, then I downgraded it. With the exception, I got the full refund back.

Now we talk about the creation of posts and web pages. Post has the option to create categories and tags. The category makes it easy for readers / website-visitors to access posts. For poetry, ‘poetry’ is named after category and all poems are inserted in it. There may be more than one category for a post. The keywords are written as tags. As for the post related to Kundalini, Kundalini-Yoga, Spirituality etc., kundalini or/and yoga words are put in the form of tags. The tag makes search engines easy to find posts. Similarly, there is an option to enable comment, Pingback, and Trackback. Making a link in the website is very important. The link connects the whole world with the post / website. First, the anchor text is selected by going into the edit mode of the post. The anchor text is the sentence or word of the post that the linked material is attached to, and putting mouse on which the hand mark evolves, and clicking on which opens the page with the link contents. After selecting anchor text, the link mark is clicked in the top editor bar. From that, it asks for the link-page URL (which is in the top of the to be linked page, in Google-search-bar). Copying that address, it is pasted in editor and saved. Do not select the option “Open the link page on a separate tab”. Clickable buttons are created from the art of creating link, like “Next page”, “Previous page” etc. In the next post we will tell about the page jump link —— contd. on next post ——

If you liked this post then please share it, and follow this blog while providing your e-mail address, so that all new posts of this blog could reach to you immediately via your e-mail. Otherwise, express your opinion in the comments section.

वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास, भाग-4; Website creation, management and development, part-4

वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास, भाग-4 (please browse down or click here to view this post in English)

पिछली पोस्ट में हम वेबपोस्ट को लिखने के बारे में बता रहे थे, जो इस पोस्ट में भी जारी है। कुछ फोटो / वीडियो आदि डालने के लिए टॉप के बाएँ कोने का प्लस निशान दबा कर आए मीडिया बटन को दबाया जाता है।

पूर्वोक्त स्टेटस बटन से हम यह भी देख सकते हैं कि हमारी वेबसाईट की तरफ लोगों को रेफर / निर्देशित करने वाला स्रोत क्या है। जैसे कि क्वोरा या फेसबुक या ट्विटर आदि। वास्तव में प्रारम्भ में रेफरल ट्रेफिक का ही सहारा लेना पड़ता है, क्योंकि सर्च इंजन से ट्रेफिक लगभग शून्य ही होती है। इसके लिए हर सोशल मीडिया पर, फोरम पर, वार्तालाप पर व कमेन्ट पर अपनी वेबसाईट का लिंक डालकर रेफरेंस देते रहना चाहिए। सबसे अच्छा तरीका तो क्वोरा पर प्रश्नों के उत्तर दें, क्योंकि आजकल क्वोरा नंबर एक की प्रश्नोत्तरी वेबसाईट है। वहां पर वेबसाईट का लिंक डालने की सबसे अधिक छूट है, और वहां से रेफरल ट्रेफिक एकदम से मिलनी शुरू हो जाती है, और लम्बे समय तक मिलती रहती है। इसी तरह हम ओनलाईन एप से वेबसाईट का सर्च-रेंक व बेकलिंक स्टेटस भी जान सकते हैं। सर्च इंजन रेंक का मतलब है कि वेबसाईट में स्थित किसी कीवर्ड को गूगल पर सर्च करने पर वह वेबसाईट कौन से पेज पर व कौन से नंबर पर आ रही है। एक पेज पर 10 वेबसाईटें होती हैं। इस तरह के 10 पेज ही सर्च में शो होते हैं। यदि पहले पेज पर वेबसाईट आए तो अच्छी बात है, यदि उस पर भी प्रथम / टॉप की तीन वेबसाईटों में आए तो सर्वोत्तम। की-वर्ड यदि मशहूर होगा, तभी लोग उसे सर्च करेंगे। उदाहरण के लिए, यदि “कुण्डलिनी” शब्द प्रथम पृष्ठ पर आए, तो सर्वोत्तम ट्रेफिक मिलेगी, क्योंकि कुण्डलिनी शब्द बहुत मशहूर है। पर यदि “कुण्डलिनी का रहस्योद्घाटन”, यह शब्द-समूह / की-वर्ड प्रथम पेज पर आए, तो कोई विशेष लाभ नहीं, क्योंकि इस की-वर्ड को खोजने वाले लोग बहुत कम हैं।

सर्च-रेंकिंग वियूशिप से बढ़ती है, और वह वियूशिप भी गूगल सर्च से ही आनी चाहिए, रिफेरल सोर्स से नहीं। वियूशिप का अर्थ है कि प्रति विजिट कितने वियू हैं। यदि वियूशिप कम है, तो इसका अर्थ है कि वेबसाईट बोरिंग है। वास्तव में, सर्च इंजन से आई हुई ट्रेफिक का वियूशिप ही वेबसाईट-रेंकिंग बढ़ाता है, रिफेरल ट्रेफिक का नहीं। इसी तरह बेकलिंक से भी बहुत अधिक ट्रेफिक मिल सकती है, विशेषतः यदि बेकलिंक प्रसिद्द वेबसाईट से मिला है। बेकलिंक का अर्थ है कि दूसरी वेबसाईट हमारी वेबसाईट को लिंक कर रही है।

वर्डप्रेस डॉट ओर्ग (ओर्ग- ऑर्गेनाईजेशन) के माध्यम से उपलब्ध वर्डप्रेस वास्तव में लाएनेक्स के फ्री विन्डोज़ ऑपरेटिंग सोफ्टवेयर की तरह वेबसाईट बनाने के लिए एक सार्वजनिक व निःशुल्क सोफ्टवेयर है। इसे ओपन सोर्स सोफ्टवेयर भी कहते हैं। यह वेबसाईट के लिए ऐसे ही है, जैसे कम्पयूटर के लिए विंडोज सोफ्टवेयर है। उसे कोई भी सोफ्टवेयर विशेषग्य अपनी कला से सुधार सकता है। इसीलिए वेबसाईट बनाने में कोई खर्चा नहीं आता। परन्तु उससे सम्बंधित कायदे-कानूनों का ज्ञान तो होना ही चाहिए, जैसे कि गूगल को साईट मेप उपलब्ध करवाते रहना, गूगल एनालीटिक को इंस्टाल करना, एसईओ (सर्च इंजन ओपटीमाईजेशन) आदि-२। साथ में, होस्टिंग सर्विस के लिए तो किसी कंपनी को चुन कर, उसे तो शुल्क अदा करना ही पड़ता है। वह कंपनी वेबसाईट का सारा डाटा सुरक्षित रूप से स्टोर करके रखती है, और वेब पर उपलब्ध करवाती है। इन सभी परेशानियों को देखते हुए, वर्डप्रेस डॉट कोम (कोम- कोमर्शियल) नाम की कंपनी बनाई गई। उस कंपनी ने निःशुल्क वेबसाईट सेवाप्रदाता के वर्डप्रेस प्लेटफोर्म के साथ अन्य सभी सेवाएं प्रदान कीं। इससे लोगों को कुछ सस्ते में ही सभी परेशानियों से छुटकारा मिल गया। उनका काम फिर वेबसाईट पर लिखना मात्र ही रह गया। जैसे कि पहले भी बताया गया है कि उनके तीन प्लान हैं——अगली पोस्ट में जारी——

यदि आपने इस लेख/पोस्ट को पसंद किया तो कृपया इस वार्तालाप/ब्लॉग को अनुसृत/फॉलो करें, व साथ में अपना विद्युतसंवाद पता/ई-मेल एड्रेस भी दर्ज करें, ताकि इस ब्लॉग के सभी नए लेख एकदम से सीधे आपतक पहुंच सकें। धन्यवादम।

Website creation, management and development, part-4

 

In the previous post we were talking about writing a web post, which is also in this post. To insert some photo / video etc., pressing the plus sign of the top left corner causes the media button pop out.

From the aforementioned ‘Stats’ button, we can also see what is the source of referring / directing people towards our website. Such as quora or facebook or twitter etc. In fact, referrals have to be resorted to in the beginning, because traffic from the search engines is almost zero. For this, on every social media, on the forum, on the conversation and comment, reference of website should be given by putting a link of your website. Answering the questions on Quora is the best way, because now quora is the number one quiz website. There is the maximum discount for putting a link of the website on quora, and from there the referral traffic starts immediately, and it lasts for a long time. Similarly, we can also find the website’s search-rank and backlink status from the online apps. Search Engine Rank means that on which page and on which position the website is positioned, when searching any keyword of website in the search engine. There are 10 websites on one page. Such 10 pages are shown only in search. If the first page is reserved to the website then it is a good thing, if it comes in the first / top three positions, then the best. If the keyword is famous, then only people will search it. For example, if the keyword “kundalini” brings website to the first page, then the best traffic will be obtained, because the word Kundalini is very popular. But if “the revelation of Kundalini”, this keyword-group / key phrase brings the website on the first page, then there is no special advantage, because people searching for this word-group are very few.

Search-Ranking increases with viewship, and that should also come from Google search, not from referral sources. Viewship means how many views per visit are there. If the viewship is low, it means that the website is boring. In fact, the traffic from the search engines increases website-ranking, not the referral traffic. Similarly, there may be more traffic from backlink, especially if the backlink is from the popular website. Backlink means that the other website is linking to our website.

WordPress available through WordPress.org (org- organization) is actually a public and free software for creating websites like Linux’s free Windows operating software. It is also called open source software. This is there to run the website, just as Windows software is there to run the computers. It can be improved by any software expert through his art. That’s why there is no cost to make the website. But there must be knowledge of the laws and rules related to it, such as providing the site map to Google, installing Google Analytics, SEO (Search Engine Optimization) etc. Together, by choosing a company for the hosting service, one has to pay the fee. The company keeps all the data stored on its cloud service safely, and makes it available on the web. Looking at all these problems, the WordPress.com (com-commercial) was created. The company provided all other services with the free WordPress platform. With this, people got rid of all the hassles in some cheap way. Their work was left to write on the website only. As mentioned earlier, they have three plans ———————————-continued in next web post———

If you liked this post then please follow this blog providing your e-mail address, so that all new posts of this blog could reach to you immediately via your e-mail.

वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास, भाग-3; Website creation, management and development, part-3

वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास, भाग-3 (please browse down or click here to view this post in English)

(4) साईट पेजस- यह हरेक वेबपेज को एक सूचि में दिखाता है। वहां पर हरेक पेज पर उसके एडिट करने का, उसका स्टेट जानने का व उसे ट्रेश में डालने का विकल्प होता है। ट्रेश एक रिसाईकल बिन की तरह होता है, जहाँ से हम वेबपेज को पुनः प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए ट्रेश बिन को कभी खाली नहीं करना चाहिए। उस पर एक पेज को एड (जोड़) करने का भी विकल्प होता है। (5) ब्लॉग posts- वहां पर सभी पोस्टों की सूचि होती है। उन सभी की जांच-परख  (एडिट आदि) भी हम उपरोक्तानुसार ही कर सकते हैं। (6) मीडिया- उस पर वेबसाईट के सभी चित्रों की सूचि  कुछ क्रियाकलापों के साथ दिखती है। (7) कमेंट्स- इसमें सभी कमेंट्स (पिन्जबेक व ट्रेकबेक के साथ) होते हैं। वहां हम उन्हें एप्रूव या डीस्प्रूव कर सकते हैं। यदि कोई कमेन्ट झूठा / स्पाम लगे, तो उसे एप्रूव नहीं करना चाहिए। वैसे भी ऐसे कमेन्ट खुद ही स्पाम फोल्डर में चले जाते हैं। पिन्जबेक व ट्रेकबेक भी कमेन्ट ही होते हैं, जो तब मिलते हैं, जब कोई हमारी वेबसाईट को अपनी वेबसाईट से लिंक करता है (हमारी वेबसाईट के यूआरएल लिंक एड्रेस को अपनी वेबसाईट पर कोपी-पेस्ट करके)। पिंजबेक व ट्रेकबेक की सहायता केवल वर्डप्रेस नामक सेवाप्रदाता कंपनी ही देती है। (8) फीडबेक- इस  पर सभी संदेशों का पूर्ण ब्यौरा होता है, जो कभी भी लोगों ने वेबसाईट को प्रेषित किए हों। (9) वर्डएड्स- जैसा कि पहले भी बताया जा चुका है। (10) शेयरिंग- इस पर वेबसाईट ब्लॉग को अपने फेसबुक, ट्विटर, गूगल अकाऊंट आदि से कनेक्ट या डिसकनेक्ट किया जाता है। कनेक्ट करने से सभी लिखी गईं ब्लॉग पोस्ट एकदम से सभी कनेक्टीड सोशल मीडिया अकाऊंट पर खुद ही शेयर हो जाती हैं।

यह ध्यान रहे कि आजकल पूर्ण वेबसाईट का प्रचलन है। इसमें वेबसाईट व ब्लॉग-पोस्ट, दोनों का लाभ एकसाथ मिलता है। कोई वेबसाईट सिर्फ वेबसाईट ही हो सकती है। इसी तरह कोई ब्लॉग साईट सिर्फ ब्लॉग साईट ही भी हो सकती है। यद्यपि ये कुछ सस्ती हो सकती हैं, पर इनसे मन नहीं भरता। वर्डप्रेस पूर्ण वेबसाईट की सुविधा देती है। उसमें कुछ स्टेटिक पेज वेबसाईट को निर्मित करते हैं, और अन्य पेज ब्लॉग पोस्ट के लिए रखे होते हैं। (11) पीपल- इसमें ये सूचि होती है- टीम (इसमें एडमिन, एडिटर, औथर, कन्ट्रीब्यूटर लोगों का ब्यौरा होता है। हम इन्हें विस्तार दे सकते हैं), फोलोवर (सभी फोलोवर लोगों का ब्यौरा), इन्वाईटी (बाहर से निमंत्रित किए गए लोग व उनके रोल का ब्यौरा। हम कभी भी किसी को भी इनवाईट करके उसे उपर्युक्त कोई भी रोल दे सकते हैं)।

उपरोक्त ही बटन अधिकाँश व मुख्य होते हैं।

वर्डप्रेस पर ब्लॉग-पोस्ट लिखना- जैसा कि पहले भी बताया जा चुका है कि किसी भी वेबपेज के टॉप पर प्लस के निशान वाले कागज़ को प्रेस करके पोस्ट लिखने के लिए एक खाली वेबपेज खुलता है। उसमें सबसे ऊपर टाईटल के लिए अलग जगह होती है। उस पर लिखे गए शब्द खुद ही बड़े आकार में होते हैं। फिर पोस्ट का पहला पहरा हेडिंग-2 में लिखना चाहिए, यदि हिंदी में हो, अन्यथा केवल ब्लोक लेटर में ही लिखना चाहिए, क्योंकि हेडिंग में आने पर अंगरेजी के शब्द केपिटल बन जाते हैं। पूरे लेख को जस्टीफाईड एलाईनमेंट दें, यदि कविता हो तो सेन्ट्रल अलाईनमेंट दें।  एमएस वर्ड की तरह वहां पर लिखने की सभी सुविधाएं होती हैं। अच्छा रहेगा यदि मूल पोस्ट  को पहले एमएस वर्ड में बना लो, फिर उसे ब्लॉग पेज पर कोपी-पेस्ट करो। फिर छोटी-मोटी कमियाँ वहां पूर्ण करते रहो। ऐसा इसलिए, क्योंकि ब्लॉग पेज पर स्पेलिंग व ग्रामर को ठीक करने की सुविधा नहीं होती, और कई बार तो बीच में लिखने पर पहले से लिखे गए अक्षर कटने भी लग जाते हैं। कुछ —- अगली पोस्ट पर जारी—-

यदि आपने इस लेख/पोस्ट को पसंद किया तो कृपया इस वार्तालाप/ब्लॉग को अनुसृत/फॉलो करें, व साथ में अपना विद्युतसंवाद पता/ई-मेल एड्रेस भी दर्ज करें, ताकि इस ब्लॉग के सभी नए लेख एकदम से सीधे आपतक पहुंच सकें। धन्यवादम।

Website creation, management and development, part-3

(4) Sites pages – This shows each webpage in a list. There is an option to edit it on each page, to know its state and put it in trash. Trash is like a recycling bin, from which we can retrieve the webpage. Therefore, the trash bin should never be made empty. There is also an option to add a page to it. (5) Blog posts – There is a list of all posts on there. We can also examine them all as per the above. (6) Media – The list of all the pictures of the website is displayed on it with some activities. (7) Comments- It contains all the comments (with Pingback and Trackback). We can approve or dispose these pings there. If a statement is false / spam, then it should not be approved. Anyway, such comments themselves go to the spam folder. Pingback and Trackback are also the comments, which are received when someone links our website to his website (by copying the URL link address of our website to his website). PingBack and Trackback is only provided by a service provider named WordPress. (8) Feedback – There is full details of all the messages on this, which have ever been sent to the website. (9) WordAds – as has been said before. (10) Sharing – By this, the website blog is connected to or disconnected to your Facebook, Twitter, Google Account etc. By connecting, all written blog posts are automatically shared on all the connected social media accounts.

Keep in mind that nowadays the full website is famous. In this, the benefits of both the website and the blog get together. Only a website can be a website. Similarly, a blog site can be just a blog site. Although these may be cheap, but do not appeal to mind much. WordPress offers full website support. Some Static Pages make up the website in it, and the other pages are kept for blog posts. (11) People – This list contains – Team (This includes the details of the Admin, Editor, Author, Contributor, We can extend them), Follower (Details of all the Follower people), Invitee (Invited from outside, the details of the invited people and their role, we can give any invitee any role as above).

The above buttons are mostly and main.

Writing a blog-post on WordPress- As already mentioned, a blank webpage opens to write a post by pressing the plus-mark paper on the top of any of the webpage. At the top there is a separate place for the title. The words written on it are themselves in large size. Then the first paragraph of the post should be written in the heading-2, if it is in Hindi, otherwise it should be written in the block letter only, because English words become capitals when in heading. Give the whole article a justified alignment, central if it is a poem. Like MS Word, there are all the facilities for writing. It would be good if you made the original post first in MS Word, then post it on the blog page. Then keep undoing small defects there. That’s because the blog page does not have the ability to fix spelling and grammar, and sometimes it gives a cut in the already written text if some text added afterwards. Something —- Continued on next post—-

If you liked this post then please follow this blog providing your e-mail address, so that all new posts of this blog could reach to you immediately via your e-mail.

वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास, भाग-2; Website creation, management and development, part-2

वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास, भाग-2 (please browse down or click here to view this post in English)

सभी मित्रों को भारतीय गणतंत्र दिवस की बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाएं

होमपेज बनाने के बाद हम जो भी पेज बनाते हैं, वे होमपेज के साथ जोड़े जा सकते हैं, अन्यथा वे स्वतन्त्र पेज के रूप में विद्यमान रहते हैं। वेबसाईट के डिजाइन आदि का सारा निर्माण कस्टमाईज बटन से ही होता है। उस कस्टमाईजर पर एक थीम बटन भी होता है, जिससे हम थीम (बेसिक आऊटले) का चुनाव कर सकते हैं। वेबसाईट के निःशुल्क प्लान में बहुत साधारण मुफ्त के थीम मिलते हैं, जिन पर अक्षरों की चमक व बनावट भी साधारण दर्जे की होती है। सशुल्क प्लान में सबसे सस्ता पर्सनल प्लान होता है, जिसकी थीम कुछ बढ़िया होती है, फिर भी अक्षरों को अधिक बनावट नहीं दे सकते, और न ही वेबसाईट चमक-दमक वाली लगती है। प्रीमियम प्लान में ये कमियाँ नहीं होतीं। उसका शुल्क भी अधिक होता है। वर्डप्रेस कम्पनी में इसका सालाना शुल्क लगभग 4000 रुपए होता है। पर्सनल प्लान का मूल्य 2400 रुपए होता है। प्रीमियम प्लान में सीएसएस कोड का प्रयोग किया जा सकता है, हेडर इमेज व साईडबार आदि की चीजों को भी एडजस्ट किया जा सकता है। सीएसएस कोड कंपनी की कस्टमर केयर सर्विस से प्राप्त किए जा सकते हैं। बिजनेस प्लान में कुछ अधिक नहीं, केवल अधिक बढ़िया बिजनेस थीम मिलती हैं, उसमें विभिन्न प्लगइन (जो छोटे-मोटे काम करते हैं) भी इंस्टाल किए जा सकते हैं, तथा उस पर विज्ञापन भी डाले जा सकते हैं। विज्ञापन तो प्रीमियम प्लान पर भी डाले जा सकते हैं। यद्यपि पैसे कमाने बहुत कठिन हैं उससे। लगभग 280 रुपए प्राप्त करने के लिए लगभग 10000 वियू चाहिए। यदि कोई मशहूर वेबसाईट आपकी किसी पोस्ट को लिंक कर ले, तब तो बल्ले ही बल्ले। इसलिए अच्छी पोस्टें लिखें। इसमें वेबपेज के बेस पर फूटर क्रेडिट (वर्डप्रेस का) भी नहीं होता, पर उससे विशेष फर्क नहीं पड़ता। बिजनेस प्लान बहुत महँगा होता है, लगभग 8000 रुपए प्रतिवर्ष। प्रीमियम व बिजनेस प्लान में पेमेंट बटन भी बनाया जा सकता है, जिससे हम कुछ भी ऑनलाईन बेचकर पेमेंट रिसीव कर सकते हैं। निःशुल्क प्लान में कस्टम डोमेन भी नहीं मिलता। उदाहरण के लिए मेरी वेबसाईट का कस्टम (स्वयं चुना गया) डोमेन demystifyingkundalini.com है। परन्तु जब यह निःशुल्क प्लान में थी, तब इसका डोमेन demystifyingkundalini.wordpress.com था। यदि एक साल वेबसाईट को सब्सक्राईब करके अगले साल पेमेंट न की जाए, तो केवल अतिरिक्त सुविधाएं ही हटेंगी संभवतः, free प्लान वाली सुविधाएं तो हमेशा के लिए रहेंगी। कस्टमाईज को दबाकर निम्नलिखित बटन आते हैं- साईट आईडेंटीटी (इससे वेबसाईट की पहली मुख्य व शीर्ष पंक्ति लिखी जाती है, जो पूरी वेबसाईट का संक्षिप्त व प्रभावशाली विवरण दे), फोंटस (इससे अक्षरों के प्रकार / बनावट को चुना जाता है), कलर्स एंड बेकग्राऊंड (इससे पेज के बेकग्राऊंड का स्टाईल व कलर चुना जाता है), हेडर इमेज (इससे उस मुख्य इमेज को चुना जाता है, जो प्रत्येक वेबपेज पर स्वयं लगी रहती है), मीनू (इस पर पेज व सबपेज को नाम दिए जाते हैं, और सबपेज बनाए जाते हैं), सीएसएस (जिस पर कुछ व्यक्तिगत व इच्छानुसार संरचना के लिए कोड लिखे जाते हैं), विजेट (वेबसाईट के विभिन्न अवयवों जैसे कोपीराईट, डिस्क्लेमर, लिंक, ब्लॉग स्टेट, फोलो ब्लॉग, फोलो अस आदि यहाँ से चुने व बनाए जाते हैं)। ये साईडबार में भी व फुटबार में भी, चुनाव के अनुसार जोड़े जा सकते हैं, होमपेज सेटिंग (यहाँ पूर्वोक्तानुसार होमपेज को ही स्टेटिक बनाया जाता है, लेटेस्ट पोस्ट वाले पेज को नहीं)। सभी पेज यहाँ पर एड किए जा सकते हैं, अन्यथा वेबपेज होमपेज से पृथक ही रहेगा। सबसे मुख्य व प्रथम पेज को ही यहाँ होमपेज बनाया जाता है, अन्य पेज तो उसके बाद उसमें जुड़े होते हैं, जिन्हें विषयानुसार हम कुछ भी नाम दे सकते हैं। वास्तव में एक वेबपेज 1500 शब्दों से अधिक नहीं होना चाहिए, तभी वह इंटरनेट के कम सिग्नल पर भी जल्दी खुल जाता है। यदि होम पेज या अन्य कोई भी वेबपेज बड़ा हो, तो उसे सबपेजों में डिवाईड किया जा सकता है, और नाम ऐसे लिखे जा सकते हैं, जैसे होम 1 (पेज का विषय), होम 2 (—-) आदि-2। वेबसाईट के मूल डोमेन यूआरएल / एड्रेस (जैसे कि demystifyingkundalini.com को सर्च इंजन में डालकर होमपेज ही खुलता है। ये ही मुख्य बटन होते हैं।

सभी सशुल्क प्लानों में कस्टमर केयर की अच्छी सुविधा होती है, जिसमें चेटिंग व ईमेल के माध्यम से सभी कुछ पूछा गया विस्तार व स्पष्टता से समझाया जाता है। यहाँ पर वर्डप्रेस नामक वेबसाईट प्लेटफोर्म का विवरण दिया जा रहा है। यह उपरोक्त कस्टमाईज बटन, w बटन को दबाकर आता है। अन्य बटन जो उस लाईन में होते हैं, वे निम्नलिखित हैं- स्टेटस- वेबसाईट के विसिटर, वियूस, लाईक्स, कमेंट्स आदि की पल-पल की जानकारी देता है; एक्टिविटी- जब भी वेबसाईट पर जो भी काम किया गया होता है, उसकी समस्त जानकारी देता है; प्लान- वेबसाईट के चल रहे प्लान व अन्य प्लानों की जानकारी देता है, रिन्यूवल ऑप्शन की जानकारी होती है, व सम्बंधित प्लान पर क्या-क्या किया जा सकता है, वह सब जानकारी वहां होती है। अगली पोस्ट में जारी———

 

Website creation, management and development, part-2

Any page we create after creating the homepage can be added to the homepage, otherwise that remain in the form of free page. All the designs of the website are made from customize button. There is a theme button on that customizer so that we can choose the theme (Basic Outley). The free plan of the website offers a lot of free themes, on which the brightness and texture of the letters are also of normal quality. The paid plan is the cheapest personal plan, whose theme is good, still can not make the text more textured, nor does the website look like glitter. There are no shortcomings in the premium plan. That’s fees are also high. The wordpress company has an annual fee of about Rs 4000 for premium plan. The value of the personal plan is Rs. 2400. The CSS code can be used in the premium plan, through which the header image and sidebar etc. can also be adjusted. CSS codes can be obtained from the company’s Customer Care Service. There is nothing more in business plans, only more great business themes are available, in which various plugins (which work in different minor ways) can be installed and ads can also be placed on it. Advertisements can also be placed on the premium plan. Although money is difficult to earn from website directly. To get around 280 rupees, we need around 10,000 views. If a famous website links to any of your posts, then it’s too good. So write good posts. It does not even have a footer credit (wordpress) on the webpage’s base, but it does not make any difference to it. Business plan is very expensive, around 8000 rupees per year. A payment button can also be made in the premium and business plan, so that we can receive payment by selling anything online. There is no custom domain even in the free plan. For example, the custom (self-chosen) domain of my website is demystifyingkundalini.com. But when it was in the free plan, its domain was demystifyingkundalini.wordpress.com. If one year is subscribed to the website but not paid for next year, then only the extra features will be deleted Probably, facilities of free plans will remain forever. On pressing the Customize button there comes the following buttons: – Site Identity (This is written as the first, main and top line of the website, giving brief and effective details of the entire website); fonts (by this, type of text / texture is selected); Colors End Background (the style and color of the page’s background are selected); header image (this selects the main image that is displayed on each webpage itself); menus (On this pages and subpages are given names, and subpages are created); CSS (code written for some personal and customized structure); Widgets (various content of the website such as copyright, disclaimer, link, blog State, follow blog, follow us etc. are selected and created from here). These can also be added in the Sidebar and Footbar, as per the selection; homepage setting (Here the homepage is made as static, not the latest post page). All pages can be edited here, otherwise the webpage will remain separate from the homepage. The main page and the first page are created here, the other pages are then added to it, which we can name anything by subject. In fact, a webpage should not be more than 1500 words, only then it opens on the Internet with less signals also much quickly. If the home page or any other webpage is large, it can be devided in the subpages, and the names can be written such as Home 1 (the topic of the page), Home 2 (—-) etc. The homepage is opened by entering the website’s original domain URL / address (such as demystifyingkundalini.com in the search engine). These are the main buttons.

All the paid plans have good customer care, in which all queries asked through chatting and email are explained in detail and clarity. Here’s a description of the website platform named WordPress. This above told customize button pops on pressing the w button. The other buttons that are in that line are the following: Stats – gives the information of the visitors of the website, views, likes, comments etc.; Activity – gives information about any work done on the website whenever it has been done; Plan- Provides information about the ongoing plans and running plan of the website, information about the renewal option, and all the information about what can be done on the respective plan. Continuing in next post ———

वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास- Website creation, management and development

वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास  (please browse down or click here to view this post in English)।

मैंने अपनी पुस्तक को लिख कर तैयार कर लिया था। चार-पांच बार पढ़कर सभी अशुद्धियों को भी ठीक कर दिया था। पिछली पोस्टों में मैं यह बताना भूल गया कि मुझे क्विक प्रिंट से भी बहुत सहायता मिली। क्विक प्रिंट की सुविधा पोथी डॉट कॉम द्वारा दी जाती है। उसमें पुस्तक को साधारण तरीके से प्रिंट करके शीघ्रतापूर्वक उसे लेखक के बताए पते पर पहुंचा दिया जाता है। उसमें बुक की वर्ड फाईल को ज्यादा फोर्मेट करने की आवश्यकता नहीं होती। केवल पेज के मार्जिन ही सुविधानुसार निर्धारित किए जाते हैं। वर्ड के डिफाल्ट पेज मार्जिन (मतलब स्वयं के) चारों ओर 1 इंच (2.54 सेंटीमीटर) होते हैं। इनसाईड मार्जिन तो यह ठीक है, पर अन्य किनारों के लिए यह मर्जिन अधिक है, जिससे कागज़ की बर्बादी होती है। यह असली पुस्तक तो होती नहीं, केवल करेक्शन के लिए ही निकाली गई होती है। इसलिए अन्य मार्जिन्स को आप 1 या आधा सेंटीमीटर पर भी सेट कर सकते हो। संभवतः कहीं प्रिंट करते समय शब्द न कट जाएं, इसलिए कम से कम 1 सेंटीमीटर तो होना ही चाहिए। इसी तरह यदि करेक्शन करने के लिए अधिक स्थान चाहिए, तो आप लाइन स्पेसिंग को 1.5 पर भी सेट कर सकते हो। अन्य कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं होती। फिर उस वर्ड फाईल को गूगल ड्राईव की सहायता से पीडीएफ में बदल दिया जाता है। उस पीडीएफ फाईल को ही पोथी डॉट कॉम पर अपलोड कर दिया जाता है। वास्तव में प्रिंट फॉर्म में करेक्शन करना कम्प्युटर में सीधे करेक्शन करने से बहुत आसान, सटीक, सुविधाजनक व त्वरित होता है। पुस्तक के अतिरिक्त कोई  भी डोक्युमेंट पोथी डॉट कोम से मंगाया जा सकता है, घर बैठे-२ ही, वह भी मनचाही गुणवत्ता व बाईंडिंग में। 2 बार क्विक प्रिंट बुक में करेक्शन करने के बाद जब मैं आश्वस्त हो गया, तब मैंने बुक को फुल प्रिंट के लिए फोर्मेट किया, और उसकी डिलीवरी के लिए डिमांड दे दी। फुल प्रिंट बुक को भी मैंने दो बार करेक्ट करने के बाद ही फाईनल समझा। अब जाकर मेरी पुस्तक पूर्ण रूप से तैयार हुई थी। वेबसाईट तो मैंने बहुत पहले से बना ली थी, यद्यपि वेबसाईट का युद्धस्तर पर निर्माण तो पुस्तक की पूर्णता के बाद ही शुरू हुआ, क्योंकि तब मुझे अतिरिक्त समय उपलब्ध हो गया था।

वेबसाईट-निर्माण का मेरा सफर निम्नलिखित प्रकार का था। मुझे जब पुस्तक के प्रचार की आवश्यकता महसूस हुई, तब मैंने एक लेंडिंग पेज बनाने की सोची। जैसा कि पिछली पोस्टों में भी मैंने बताया है कि लेंडिंग पेज एक ऐसा वेबपेज (वेबसाईट का पेज) होता है, जिस पर पुस्तक के बारे में सम्पूर्ण विवरण हो, संभावित पाठकों को पुस्तक पढ़ने के लिए प्रेरित किया जा रहा हो, और जिस पर उस पुस्तक को बेचने वाली व्यापारिक वेबसाईट का लिंक-पता दर्ज हो। गूगल पर सर्च करने पर लैंडिंग पेज के लिए बहुत सी सशुल्क पेशकशें दी जा रही थीं। कोई कम खर्चे वाली थीं, तो कुछ अधिक खर्चे वाली। फिर भी मुझे तो वह खर्चा अधिक ही लगा, और साथ में लैंडिंग पेज की उतनी साज-सज्जा की आवश्यकता भी मुझे महसूस नहीं हुई, जितनी का वे दावा कर रहे थे। मुझे तो एक साधारण लैंडिंग पेज ही चाहिए था। उसके लिए सर्वोत्तम व मुफ्त का तरीका तो मुझे वेबसाईट-निर्माण का ही लगा। वास्तव में बहुत सी कम्पनियां मुफ्त की वेबसाईट बनाने का ऑफर देती हैं, जैसे कि वर्डप्रेस डॉट कॉम, जिम्डो डॉट कॉम आदि-२। इनमें वर्डप्रेस डॉट कॉम काफी जानी-मानी व गुणवत्तापूर्ण वेबसाईट-निर्मात्री कंपनी है। इसलिए मैंने उसे ही चुना। 10 मिनट में ही सिंपल स्टेप्स में वह बन कर तैयार हो गई। पहले तो मुझे पता ही नहीं चला कि उसमें करना क्या था। मैंने एक-दो पोस्टें लिखीं, जो न जाने कहाँ खो जाती थीं। कभी दिख जाती थीं। फिर धीरे-२ मुझे आभास हुआ कि मुझे किसी मुफ्त की थीम को एक्टिवेट करना था। वेबसाईट-थीम वास्तव में वेबसाईट का दिल होती है। यह निर्धारित करती है कि वेबपेज कैसा दिखेगा। उस पर फोटो कौन सी होगी, विभिन्न बटन कहाँ-२ व कौन-२ से ऑप्शन होंगे।

थीम को एक्टिवेट करने से मेरा वेबसाईट-निर्माण का लगभग 90% काम पूरा हो गया था। बाकि का 10% काम तो अब उसमें विभिन्न विजेट (जैसे कि कोपीराईट का, लीगल डिस्क्लेमर का, शेयरिंग का आदि-2) को एप्लाई करना था। कई थीमों में केवल साईडबार-विजेट-एरिया ही होता है, फुटबार-विजेट-एरिया नहीं। धीरे-२ वह काम भी होता रहा। सर्वप्रथम मुख्य काम तो वेबपेज पर लिखित सामग्री को डालना था। मैंने अपनी ई-पुस्तक से ही पुस्तक-परिचय आदि को कोपी करके होमपेज पर पेस्ट कर दिया। होमपेज को ही मैंने लेंडिंग पेज बना दिया। इसके लिए होमपेज को स्टेटिक पेज बनाना पड़ता है। उससे वह स्थिर बना रहता है, और समय-२ पर डाली गई पोस्टें उस पर नहीं आतीं, अपितु एक अलग पेज “माय पोस्ट पेज” पर छपती रहती हैं। क्या आपको भी वेबसाईट बनाते हुए ऐसी ही समस्याएँ पेश आईं? —-मेरी अगली ब्लॉग पोस्ट पर जारी—–   

यदि आपने इस लेख/पोस्ट को पसंद किया तो कृपया इस वार्तालाप/ब्लॉग को अनुसृत/फॉलो करें, व साथ में अपना विद्युतसंवाद पता/ई-मेल एड्रेस भी दर्ज करें, ताकि इस ब्लॉग के सभी नए लेख एकदम से सीधे आपतक पहुंच सकें।

 

Website creation, management and development

I had prepared my book in written form. After reading four to five times, I also cured all the impurities. In the previous post, I forgot to mention that I got many help from Quick Print. Quick print is provided by Pothi.com. In this service, the book is readily printed and delivered to the address given by the author. There is no need to format the book’s Word file in it. Only the margins of the pages are determined according to convenience. Word default page margins (mean of themselves) are around 1 inch (2.54 centimeter). Inside margins, this is fine, but this margin is higher for other edges, which causes waste of paper. This is not the real book, it is only for correction. Therefore, you can also set other margins to 1 or half centimeters. It may be that the words are not cut when printing, so at least 1 centimeter should be there. Similarly, if you need more space to perform correction, you can also set the line spacing to 1.5. There is no need to do anything else. Then that Word file is converted to PDF with the help of Google Drive. That PDF file is uploaded to Pothi.com. In fact, correction of print forms is very easy, accurate, convenient and quick than to correct / edit document in the computer. Apart from the book, any document can be sent to Pothi.com, sitting at home, that too in the desired quality and binding. After making a correction in a quick print book, when I was convinced, I formatted the book for full print, and put demand for delivery of it. I considered the full print book as finished product only after reading and correcting it twice. Now my book was fully prepared by me. The website was created very long ago, although the creation of the website at war level started only after the completion of the book, because then I had an extra time available.

My journey to website building was the following type. When I felt the need to publicize the book, I thought of making a landing page. As I have mentioned earlier in the previous posts, the landing page is a web page, which has full details about the book, potential readers are being encouraged to read the book, and on which there is entered the link-address of the business website that sells the book. There were many paid offers for landing pages when searching on Google. There were some less costly, then some were more expensive. Even then, I found that the expenditure was more expensive, and I did not even need the decoration of the landing page, as much as they were claiming. I just wanted a simple landing page. The best and free way for me was to create a website. In fact, many companies offer to create free websites, such as WordPress.com, Zimdo.com etc. Among them WordPress.com is a well-known and quality website-maker company. That is why I chose that. In 10 minutes website became ready in the simple steps. At first, I did not know what to do in it. I wrote a few posts, which were not shown fully and anywhere they were lost. Were ever seen again. Then slowly I realized that I had to activate any free theme. Website-theme is actually the heart of the website. It determines how a web page will look. What will be the photo on it, where different buttons will have options?

Activated by the theme, almost 90% of my website-building work was completed. The remaining 10% of the work was to be applied to various widgets (like copyright, legal disclaimer, sharing etc.). Many themes only have Sidebar-Widget-Area, Footer-Widget-Area not. Slowly that work was also going on. First, the main task was to put content written on the web page. I copied book-introduction etc. from my e-book and pasted it on the homepage. I made the landing page only for the home page. For this, the homepage has to be made static page. From that LP / HP remains stable, and the posts put on time after time do not come to that, but website keep those on a different page, “My Post Page”. Did you have similar problems while creating the website? —- Continued on my next blog post —–   

If you liked this post then please follow this blog providing your e-mail address, so that all new posts of this blog could reach to you immediately via your e-mail.