प्राचीन मिस्र की आध्यात्मिक यौनता एवं भारतीय तंत्र के बीच में समानता

अन्खिंग क्या है और कैसे किया जाता है?

अन्खिंग में पूर्णता से थोड़ा कम (90%) सांस भर कर शक्ति को यौनचक्रों से पीठ वाले अनाहत चक्र (उनके अनुसार पांचवां चक्र) तक चढ़ाया जाता है, और वहां से 90 डिग्री के कोण पर पीछे की ओर खुले में मोड़ दिया जाता है। वह फिर स्वयं ही आँख के लूप से होते हुए सबसे ऊपर वाले आठवें चक्र (सिर से एक हाथ लम्बाई ऊपर) पर पहुँच जाती है। वह चक्र वर्टिकल बोडी लाइन से 90 डिग्री के कोण पर स्थित है। वहां से वह आँख-लूप के अगले भाग से नीचे उतर कर अनाहत चक्र (आगे का) पर पुनः स्थापित हो जाती है। फिर बाकि का बचा हुआ 10% सांस भी अन्दर भर लिया जाता है। धीरे-2 सांस छोड़ते हुए ध्यान किया जाता है कि वह शक्ति उस आँख-चेनल में घूम रही है। फिर गहरी साँसें लेते जाएं, जब तक कि पूरे शरीर में रिलैक्सेशन महसूस न हो जाए। फिर अपनी साँसें नार्मल कर लें। ध्यान करो कि यह शक्ति पूरे शरीर में रिसती हुई, उसकी सभी कोशिकाओं को पुष्ट करती हुई, उसके बाहर भी चारों ओर फैल रही है। फिर पूरी तरह से रिलैक्स हो जाओ, या सो जाओ।

अन्खिंग के रेखा-चित्र व लूप का मनोवैज्ञानिक रहस्य

अन्खिंग प्रक्रिया में शक्ति हृदय के ऊपर के शरीर के हिस्से को स्पर्श नहीं करती। वह चारों और बाहर-2 से ही लूप बना कर पुनः हृदय चक्र पर पहुँच जाती है। इसीलिए शक्ति-मार्ग को दर्शाने वाले रेखा-चित्र में रीढ़ की हड्डी को छूती हुई सीधी रेखा केवल यौनचक्र (मूलाधार) से हृदय चक्र तक ही दिखाई गई है, उसके ऊपर नहीं। उसके ऊपर उपरोक्त अन्खिंग-लूप जुड़ा है। हृदय चक्र पर एक सीधी रेखा आगे से पीछे जाते हुए एक क्रोस बनाती है। इस डिजाइन का यह मतलब है कि मूलाधार चक्र व नाभि चक्र के आगे वाले भाग से होते हुए कुण्डलिनी को ऊपर चढ़ाने की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि वे लचीले भाग में होते हैं, और योग-बंधों के कारण अन्दर की तरफ पिचक कर मेरुदंड वाले चक्र-भागों से जुड़कर एक हो जाते हैं। इससे आगे वाले चक्रों की शक्ति स्वयं ही पीछे वाले चक्रों को मिल जाती है। हृदय चक्र पर इसलिए आगे-पीछे गुजरने वाली रेखा है, क्योंकि आगे वाला चक्र पिचक कर पीछे वाले चक्र से नहीं जुड़ता है। देखा भी जाता है कि छाती का क्षेत्र विस्तृत है, और ज्यादा अन्दर-बाहर भी नहीं होता।

अन्खिंग का वैज्ञानिक स्पष्टीकरण

शक्ति मनोवैज्ञानिक दबाव से ही अनाहत चक्र से 90 डिग्री के कोण पर पीछे की ओर बाहर निकलती है। ऐसा सोचा जाता है, तभी ऐसा होता है। आठवें चक्र तक भी वह मनोवैज्ञानिक दबाव से ही आँख (अन्खिंग-लूप) से होते हुए ऊपर चढ़ती है। एक प्रकार से शक्ति बीच के चक्रों को बाईपास करते हुए, सीधे ही आठवें चक्र तक पहुँच जाती है। वहां से नीचे भी यह इसी तरह के दबाव के अभ्यास से आती है। इसमें शरीर की बनावट से मेल खाता हुआ रेखा-चित्र भी मानसिक चिंतन के दबाव की सहायता करता है।

अन्खिंग व सैक्सुअल कुण्डलिनीयोग के बीच में समानता

कुण्डलिनीयोग में शक्ति को कुण्डलिनी कहा जाता है। यह अधिकाँश मामलों में गुरु या देवता का मानसिक चित्र ही होता है। इस योग में यौनशक्ति से कुण्डलिनी को विभिन्न चक्रों पर पुष्ट किया जाता है, विशेषकर मस्तिष्क में। पुष्टता को प्राप्त कुण्डलिनी फिर लम्बे समय तक अनुभवदृष्टि में बनी रहकर तन-मन को शुद्ध करती रहती है। अन्खिंग में भी ऐसा ही होता है। यद्यपि उसमें शक्ति को हृदय क्षेत्र में ही केन्द्रित माना गया है। थोड़े समय के लिए आठवें चक्र पर भी रुकती है। बीच वाले रस्ते व लूप में तो केवल उसकी सूक्ष्म चाल ही होती है। वास्तव में हृदय में सबसे प्रिय वस्तु ही बसी होती है। यह वस्तु एक ही होती है। दो से तो प्रेम ही नहीं होता। हृदय ही प्रेम का स्थान है। इस तरह से, अन्खिंग की तथाकथित शक्ति स्वयं ही कुण्डलिनी-रूप सिद्ध हो गई। प्राचीन मिस्र की मान्यता के अनुसार, साधारण यौनसम्बन्ध के दौरान यौन-उन्माद/स्खलन की शक्ति या तो नीचे गिर कर भूमिगत हो जाती है, या मस्तिष्क के विभिन्न विचारों के रूप में प्रस्फुटित होती है। दोनों ही मामलों में यह नष्ट हो जाती है। परन्तु यदि मस्तिष्क का विचार एकमात्र कुण्डलिनी के रूप में हो, तब वह यौनशक्ति नष्ट नहीं होती। ऐसा इसलिए है, क्योंकि कुण्डलिनी का ध्यान प्रतिदिन किया जाता है, अन्य विचारों का नहीं। इसलिए यौनशक्ति से निर्मित, कुण्डलिनी की प्रचंडता लम्बे समय तक बनी रहती है। क्योंकि अन्य विचार कभी-कभार ही दोबारा पैदा होते हैं, इसलिए उनकी प्रचंडता तब तक गिर चुकी होती है। साथ में, यौनशक्ति सभी विचारों में बंट कर बहुत छोटी रह जाती है, जबकि वह कुण्डलिनीयोग से एक ही कुण्डलिनी को मिलती है, जिससे पूरी बनी रहती है। अतः सिद्ध होता है कि प्राचीन मिस्र की तथाकथित शक्ति कुण्डलिनी ही है, और अन्खिंग भी कुण्डलिनीयोग से भिन्न नहीं है। एक प्रकार से हम कुण्डलिनीयोग को अन्खिंग तकनीक का सरल व वैज्ञानिक रूपांतर भी कह सकते हैं।

प्राचीन तंत्र में यौनोन्माद (बिंदुपात) पूर्णतया वर्जित नहीं है, अपितु उस पर आत्मनियंत्रण न होना ही वर्जित है

प्रेमयोगी वज्र के अनुसार, यदि ओर्गैस्मिक शिखर/वीर्यपात के समय मूलबबंध व उड्डीयान बंध को मजबूती से व लम्बे समय तक बना कर रखा जाता है, तब पूरी यौनशक्ति मस्तिष्क-स्थित कुण्डलिनी को मिलती है। उससे ऐसा लगता है कि यौन-चक्र व मस्तिष्क-चक्र मिलकर एक हो गए हैं, और दोनों पर कुण्डलिनी एकसाथ चमक रही है। इससे वीर्य का क्षरण भी बहुत कम होता है, जबकि आनंद बहुत अधिक प्राप्त होता है। यदि केवल उड्डीयान बंध ही लगाया जाए, तो यह सकारात्मक प्रभाव बहुत कम हो जाता है।

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Sex, and specifically the orgasm, is more that just something that feels good and allows procreation. There are many other functions, such as the release of dysfunctional energy within the body, which can help to keep one from becoming diseased. There is the function that opens the higher chakras, and under the right conditions allows a person to begin the process of enlightenment. And further, if two people, lovers, practice sacred sex, the entire experience can lead them together into higher consciousness and into worlds beyond this plane——

Ancient Egyptian Sexual Ankhing 

The ancient egyptians believed that orgasm is more than just something that feels good and allows procreation…

This Ancient Egyptian Sex Technique May Be the Secret to Eternal Life

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गुरु के बारे में एक आधारभूत रहस्योद्घाटन

गुरु क्या है

गुरु वह विलक्षण व्यक्तित्व है, जिस पर विश्वास है, जिससे प्रेम है, और जो अपने से कहीं अधिक महत्त्वशाली प्रतीत होते हैं। संस्कृत शब्द “गुरु” का अर्थ ही भारी या बड़ा है।

क्या एक प्रेमी गुरु का रूप ले सकता है

काफी हद तक एक प्रेमी गुरु का रूप ले सकता है, यद्यपि अधिकाँश मामलों में पूर्णरूप से गुरु नहीं बन सकता। वैसे कुछ अपवाद तो हर जगह ही देखने को मिल जाते हैं। अधिकांशतः प्रेमी के प्रति आदरभाव कम होता है, और उसके प्रति महत्त्वबुद्धि भी कम होती है। उससे प्रेमी का चित्र मन में अच्छी तरह से नहीं बैठता। गुरु के प्रति तो प्रेम के साथ आदरभाव व महत्त्वबुद्धि दोनों का होना आवश्यक है। इसीलिए गुरु अधिकांशतः आयु में वृद्धावस्था के करीब होते हैं। इससे वे ज्ञानी, ध्यानी, सम्मानित व योगसाधक होते हैं। वे आध्यात्मिक कर्मकांड करने वाले, व देवता के पुजारी होते हैं। वे साधारण व सात्विक जीवन जीने वाले होते हैं। वे सर्वप्रिय, मृदुभाषी, संतुलित, अहिंसक व कट्टरता से रहित होते हैं। उनके मन-मंदिर में सभी सद्गुणों का वास होता है। वे मन के दोषों से रहित, अनासक्त व अद्वैतशील होते हैं। गुरु के प्रति उपरोक्त आदरबुद्धि व महत्त्वबुद्धि के कारण उनका लीलामय रूप शिष्य के मन में पक्की तरह से बैठ जाता है, और लम्बे समय तक बना रहता है।

गुरु में दिव्य गुणों का होना आवश्यक है

ऐसा इसलिए है क्योंकि कुंडलिनी स्वयं दिव्य है और दिव्य गुणों का उत्पादन करती है। इसलिए, गुरु की दिव्यता एक व्यक्ति के दिमाग में कुंडलिनी को मजबूत करने में बेहतर रूप से मदद करती है। इसके अलावा, देवत्व भगवान के अनुग्रह को भी आकर्षित करता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि भगवान भी देवत्व से भरे हुए हैं। भगवान की कृपा भी कुंडलिनी वृद्धि में एक महत्वपूर्ण कारक है।

गुरु व प्रणय-प्रेमी एक दूसरे के पूरक के रूप में

गुरु व प्रणय-प्रेमी की जुगलबंदी तंत्र का एक अभिन्न व आधारभूत हिस्सा है। तंत्र के अनुसार, गुरु व प्रणय-प्रेमी/प्रेमिका के बीच में किसी भी प्रकार से सम्बन्ध या संपर्क बना रहना चाहिए। कई आध्यात्मिक आकांक्षी प्रेमी के साथ भी और गुरु के साथ भी एकसाथ मजबूत संबंध (मानसिक या शारीरिक या दोनों) बना कर रखते हैं। यह भी स्वयं ही प्रेमी और गुरु की मानसिक छवियों के परस्पर मिलन का कारण बनता है। उससे गुरु के प्रति बनी हुई आदरबुद्धि प्रणय-प्रेमी के ऊपर स्थानांतरित हो जाती है, और प्रणय-प्रेमी के प्रति किया गया प्रणय-प्रेम गुरु के ऊपर शुद्ध प्रेम के रूप में स्थानांतरित हो जाता है। यह ऐसे ही होता है, जैसे एक अँधा और एक लंगड़ा एक-दूसरे की सहायता करते हैं। आमतौर पर गुरु की वृद्धावस्था के कारण उनके प्रति उतना मजबूत व आकर्षण से भरा हुआ प्रेम पैदा नहीं होता, जितना कि एक यौनप्रेमी के प्रति होता है। इसी तरह, एक यौनप्रेमी के प्रति उतनी आदरबुद्धि नहीं होती, जितनी एक वृद्ध गुरु के प्रति होती है। इसका कारण यह है कि अधिकांशतः प्रणय-प्रेमी भौतिकवादी, कम आयु वाला, कम अनुभव वाला, कम योग्यता वाला, कम योगसाधना करने वाला, कम गुणों वाला, मन के दोषों से युक्त व द्वैतशील होता है।

दो कुण्डलिनियों का एकसाथ निर्माण, व विकास

गुरु व प्रेमी के निरंतर संपर्क से, दोनों के लीलामय रूपों की कुण्डलिनियां (स्पष्ट व स्थायी मानसिक चित्र) एकसाथ विकसित होती रहती हैं। वे दोनों एक-दूसरे को शक्ति देती रहती हैं। भौतिक माहौल में प्रेमी की व अध्यात्मिक माहौल में गुरु की कुण्डलिनी अधिक विकसित होती है। अनुकूल परिस्थितियों के अनुसार, दोनों में से कोई भी कुण्डलिनी पहले जागृत हो सकती है। अधिकाँशतः गुरु के रूप की कुण्डलिनी ही जागृत होती है, प्रणय-प्रेमी की कुण्डलिनी तो उसकी सहायक बन कर रह जाती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि पूर्ण मानसिक मिलन तो गुरु के साथ ही संभव है। प्रणय-प्रेमी से सम्बंधित शारीरिक उत्तेजना उसके रूप की कुण्डलिनी से एकाकार होने (कुण्डलिनी जागरण) की राह में रोड़ा बन जाती है। यह सारा कुछ ठीक इसी तरह ही प्रेमयोगी वज्र के साथ भी हुआ, जो इस वेबसाईट का नायक है।

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प्राणोत्थान- कुण्डलिनी जागरण की शुरुआत

प्राण क्या है

प्राण शरीर की शक्ति को कहते हैं। यह जीवनी शक्ति है, जो जीवन को चलायमान रखती है। प्राणवायु शक्ति को बना कर रखती है। इसी तरह, खाया-पिया हुआ अन्न-जल भी इस शक्ति को बना कर रखता है। शरीर का हिलना-डुलना, काम-काज व योग-व्यायाम भी इस शक्ति को बना कर रखते हैं। काम, क्रोध आदि मानसिक विकार, एवं विभिन्न रोग इस शक्ति को घटाते रहते हैं।

प्राण का ऊर्ध्वगमन (ऊपर जाना) व अधोगमन (नीचे गिरना)

साधारण, संतुलित, व आदर्श मानवीय अवस्था में प्राण पूरे शरीर में समान रूप से व्याप्त रहता है। उसका प्राण मन-मस्तिष्क में व बाह्य इन्द्रियों में समान रूप से कार्य करता है। जब व्यक्ति आदर्श मानवीय अवस्था से नीचे गिरने लगता है, तब उसका प्राण बाह्य इन्द्रियों की तरफ ज्यादा प्रवाहित होने लगता है। उसी अनुपात में उसके मस्तिष्क में प्राण कम होने लगता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि उसका प्राण शरीर के निचले चक्रों में केन्द्रित होने लगता है। जब उसके प्राण का अधिकाँश भाग बाह्य इन्द्रियों में समाहित हो जाता है, तब वह दानव या पशु जैसा बन जाता है। इस स्थिति को हम कह सकते हैं कि उसका प्राण पूरी तरह से नाभिचक्र से नीचे केन्द्रित हो गया है। इससे आदमी द्वैतवादी, आसक्त, व मन के दोषों से युक्त हो जाता है। ऐसा व्यक्ति जब ऐसे जीवन की उलझनों से थक जाता है या उनसे ऊब जाता है, तब वह एकांत व शान्ति की खोज में निकल पड़ता है। वह बाह्य इन्द्रियों से उपरत हो जाता है। ऐसे में उसके दुनियादारी से प्रचंड बने हुए प्राण के पास ज्यादा शारीरिक काम नहीं रहता। इसलिए वह मस्तिष्क की तरफ चढ़ने लगता है, और वहां अपना असर दिखाता है। इसे ही प्राणोत्थान कहते हैं। इससे मस्तिष्क में चित्र-विचित्र व पुरानी यादें आनंद के साथ उमड़ने लगती हैं। इससे वे शान्ति के साथ आत्मा में लीन होने लगती हैं। मन में चारों ओर शान्ति छा जाती है। मन का कचरा साफ होने लगता है। इस तरह से महामानव या देवता का प्राण ऊपर वाले चक्रों में अधिक केन्द्रित होता है।

पाचन तंत्र एक दूसरे मस्तिष्क के रूप में

मैं इस उपरोक्त तथ्य को एक उदाहरण से स्पष्ट करना चाहता हूँ। व्रत-उपवास वाले दिन मन-मस्तिष्क में स्वयं ही ध्यान होता रहता है। पाचन प्रणाली को दूसरा मस्तिष्क भी कहते हैं, क्योंकि वह बहुत अधिक प्राण-ऊर्जा का भक्षण करती है। व्रत से इस प्रणाली को आराम मिलने के कारण वहां की प्राण-ऊर्जा मस्तिष्क को उपलब्ध हो जाती है।

वैज्ञानिक भी इस बात की पुष्टि कर चुके हैं कि मानव-मस्तिष्क के विकास में आग की खोज के साथ तेज गति आई। उसके पाचन तंत्र का अधिकाँश काम आग ने कर दिया। इससे पाचन तंत्र की अधिकाँश प्राण-शक्ति मस्तिष्क को उपलब्ध होने लगी।

प्राणोत्थान से कुण्डलिनी का पोषण

यदि मस्तिष्क में पहुंचे हुए प्राण से कुण्डलिनी (एक विशेष मानसिक चित्र) को पुष्ट न किया जाए, तो उससे कुण्डलिनी जागृत नहीं हो पाएगी। इसकी बजाय उससे विभिन्न प्रकार के मानसिक चित्र एकसाथ पुष्ट होते रहेंगे, जिससे प्राणशक्ति सब के बीच में बंट जाएगी। उससे पर्याप्त बल के अभाव  में कोई भी मानसिक चित्र जागृत नहीं हो पाएगा। अतः प्राणोत्थान के साथ कुण्डलिनी-ध्यान भी आवश्यक है। यदि पहले से ही कुण्डलिनी-ध्यान किया जा रहा है, तब तो और भी अच्छा है। इसीलिए प्राणोत्थान को कुण्डलिनी उत्थान भी कहते हैं।

मस्तिष्क के साथ प्रत्येक चक्र पर कुण्डलिनी-ध्यान सहायक है, क्योंकि सभी चक्रों पर बहुत सी प्राण-शक्ति जमा होती है, जो कुण्डलिनी को पुष्ट करती है। वास्तव में कहीं पर भी ध्यान की गई कुण्डलिनी मस्तिष्क में ही पुष्ट होती है, क्योंकि अंततः मस्तिष्क ही सभी अनुभवों का स्थान है।

प्राणोत्थान का सबसे श्रेष्ठ तरीका

वास्तव में प्राणोत्थान की बहुत सी विधियां हैं। यद्यपि तंत्र का यौनयोग (सेक्सुअल योगा) इसके लिए सबसे श्रेष्ठ व व्यावहारिक तरीका है। इससे दुनियादारी के झमेले में फंसे हुए आदमी का भी एकदम से प्राणोत्थान हो जाता है। आदमी अचानक ही चमत्कारिक रूप से अपने आप को रूपांतरित सा महसूस करता है। यौनयोग दिन के समय पूर्ण चेतना की अवस्था में व पूर्ण निष्ठा-समर्पण से किया जाए, तो सर्वोत्तम है। हालांकि इसको पूर्ण सामाजिक व मानवीय उत्तरदायित्वों के साथ करना चाहिए।

प्राणोत्थान के लक्षण

मन में कुण्डलिनी का ध्यान निरंतर व स्वयं ही होता रहता है। शान्ति, आनंद, हल्केपन, सात्विकता, संतुष्टि आदि दिव्य गुणों का अनुभव होता है। योगसाधना करने में बहुत मन लगता है। संसार के प्रति लिप्सा (क्रेविंग) नहीं रहती, हालांकि सामान्य इच्छाएँ नहीं रुकतीं। किसी भी चीज में आसक्ति नहीं रहती है। हो जाए या मिल जाए, तो भी ठीक, और न होए या न मिले, तो भी ठीक। सभी कुछ एकसमान सा लगता है। यह अद्वैत है। चिंता व तनाव समाप्त हो जाते हैं। भूख अच्छी लगती है। अच्छा स्वास्थ्य महसूस होता है। भ्रमण के लिए मन करता है। अवसाद समाप्त हो जाता है। उत्तम मानसिकता अपने चरम के आसपास होती है। किसी से वैर-विरोध नहीं रहता। व्यक्ति सहनशील, हंसमुख, आकर्षक, सर्वप्रिय व मिलनसार बन जाता है। क्षमा भाव बना रहता है। काम, क्रोध अदि मन के विकार गायब हो जाते हैं। भारी, अस्त-व्यस्त व तेज-तर्रारी वाले शारीरिक कामों में मन नहीं लगता, क्योंकि शरीर की अधिकाँश प्राणशक्ति मस्तिष्क की ओर प्रवाहित होती रहती है। जरूरत पड़ने पर आदमी ऐसे काम कर भी लेता है, यद्यपि उससे उसका प्राणोत्थान नीचे गिरने लगता है।

कुण्डलिनी जागरण के लिए प्राणोत्थान बहुत जरूरी

इसी प्राणोत्थान की अवस्था में अनुकूल परिस्थितियाँ मिलने पर कुण्डलिनी-जागरण होता है। प्राणोत्थान के बिना कुण्डलिनी-जागरण नहीं होता।

कुण्डलिनी-जागरण शिखर-बिंदु तक पहुंचे हुए प्राणोत्थान के रूप में

प्राणोत्थान व कुण्डलिनी-जागरण के बीच में तत्त्वतः कोई अंतर नहीं है। दोनों के बीच में केवल अभिव्यक्ति के स्तर का ही अंतर है। इसीलिए कई अति महत्त्वाकांक्षी लोग प्राणोत्थान को ही कुण्डलिनी जागरण समझ लेते हैं। पूर्णता को प्राप्त प्राणोत्थान ही कुण्डलिनी जागरण कहलाता है। प्राणोत्थान तो लम्बे समय तक भी रह सकता है। यहाँ तक कि यह कई सालों तक भी रहता है, विशेषतः यदि कुण्डलिनी तांत्रिक प्रकार की हो। कुण्डलिनी के साथ प्राणोत्थान ही आत्मज्ञान करवाता है। कुण्डलिनी जागरण तो केवल इसे अतिरिक्त रूप में पुष्ट ही करता है, अन्य कुछ नहीं। किताबों के अध्ययन व अन्य गहन दिमागी कार्यों से भी प्राणोत्थान होता है, यद्यपि इसे तीव्रता, आध्यात्मिकता व लम्बे समय तक स्थिरता कुण्डलिनी से ही मिलती है। प्राणोत्थान के विपरीत कुण्डलिनी जागरण क्षणिक होता है। इसका अनुभव आधा या एक मिनट से अधिक नहीं रहता। अधिकाँश लोग तो विलक्षणता के डर से इसे कुछ ही सेकंडों में नीचे उतार देते हैं, जैसा ही इस वेबसाईट के नायक प्रेमयोगी वज्र के साथ भी हुआ था।

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कुण्डलिनी चक्रों के त्रिभुज, वृत्त एवं पंखुड़ियाँ- एक छिपा हुआ राज उजागर

सहस्रार चक्र व स्वाधिष्ठान चक्र के सिवाय सभी चक्रों पर त्रिभुज हैं। कहीं पर वह सीधा ऊपर की ओर है, तो कहीं पर उल्टा नीचे की ओर है। कहीं पर एक-दूसरे को काटते हुए दो त्रिभुज हैं। इसी तरह किसी चक्र पर चार पंखुड़ियां हैं, तो किसी पर छह या सात आदि। सहस्रार में तो एक हजार पंखुड़ियां हैं। इनके पीछे आखिर क्या रहस्य छिपा हो सकता है? कुछ रहस्य दार्शनिक हैं, तो कुछ रहस्य अनुभवात्मक व मनोवैज्ञानिक हैं। योग करते हुए मुझे भी इसके पीछे छिपे हुए कुछ अनुभवात्मक रहस्य पता चले हैं, जिन्हें मैं इस पोस्ट के माध्यम से साझा कर रहा हूँ।

कुण्डलिनी के राजमार्ग और आपूर्ति-मार्ग

त्रिभुज की रेखाएं वास्तव में कुण्डलिनी-चित्र के राजमार्ग हैं, जिन पर दौड़ती हुई कुण्डलिनी का ध्यान किया जाता है। इसी तरह, त्रिभुज के बिंदु भी कुण्डलिनी के विश्राम स्थल हैं। चक्र के पीटल (पंखुड़ियां) उस चक्र से सम्बंधित क्षेत्र से सम्बंधित नाड़ी-पुंज हैं, जो चेतनामयी पोषक शक्ति या ध्यान शक्ति को चक्र व उस पर स्थित कुण्डलिनी तक पहुंचाती हैं। ये वृक्ष या फूल की पत्तियों की तरह ही हैं।

मूलाधार चक्र का उल्टा त्रिभुज नीचे की ओर

मूलाधार चक्र पर उल्टा त्रिभुज होता है। इसकी एक भुजा जननांग से शुरू होकर आगे के स्वाधिष्ठान चक्र (जननांग के मूल में) से होते हुए पीछे के (मेरुदंड के) स्वाधिष्ठान चक्र तक जाती है। इसकी दूसरी भुजा पीछे के स्वाधिष्ठान चक्र से लेकर मूलाधार चक्र (सबसे नीचे, जननांग व मलद्वार के मध्य में) तक है। इसकी तीसरी भुजा जननांग की शिखा से या आगे के स्वाधिष्ठान चक्र से लेकर मूलाधार तक है। मैंने देखा कि जननांग को छोड़कर, छोटा त्रिभुज बना कर भी अच्छा ध्यान होता है। जननांग से तो कुण्डलिनी को कई बार अतिरिक्त शक्ति मिल जाती है। उस छोटे त्रिभुज का एक बिंदु आगे का स्वाधिष्ठान चक्र है, दूसरा बिंदु पीछे का स्वाधिष्ठान चक्र है, व तीसरा बिंदु या त्रिभुज की शिखा मूलाधार है। 4 पीटल का अर्थ है कि एक पीटल जननांग तक है, एक आगे के स्वाधिष्ठान चक्र तक है, तीसरी पीछे के स्वाधिष्ठान चक्र तक है, और चौथी स्वयं मूलाधार चक्र की है (चक्र के संकुचन  से उपलब्ध)।

स्वाधिष्ठान चक्र पर कोई अलग से त्रिभुज नहीं है, क्योंकि वह मूलाधार के त्रिभुज में ही कवर हो जाता है। इसकी 6 पीटल निम्नलिखित क्षेत्रों से आती हैं। 4 मूलाधार से, एक जननांग से और छवीं पीटल इसकी अपनी है (संकुचन से उपलब्ध)।

त्रिभुज पिरामिड या शंकु को भी प्रदर्शित करता हुआ व उल्टा त्रिभुज पीछे की ओर को भी

मणिपुर चक्र में उल्टा त्रिभुज व 10 पीटल हैं। वास्तव में, उल्टे त्रिभुज का मतलब पीछे की ओर प्वाइंट करता हुआ त्रिभुज है। दो डाईमेंशन वाले कागज़ पर पीछे की ओर या अन्दर की ओर प्वाइंट करते हुए त्रिभुज को ही उल्टा या नीचे की तरफ प्वाइंट करता हुआ दर्शाया गया है। इसमें मुख्य ध्यान-पट्टिका नाभि क्षेत्र में, दाएं से लेकर बाएँ भाग तक फैली है। वैसे तो पट्टी को विस्तृत करते हुए पूरे उदर क्षेत्र को एक शंकु या पिरामिड (कुछ लोग त्रिभुज को पिरामिड ही मानते हैं) के आकार में भी दिखाया जा सकता है, जिसकी शिखा पीछे के (मेरुदंड वाले) मणिपुर चक्र पर है।नाभि क्षेत्र पिरामिड की तरह ही लगता है। पिरामिड की दो तिरछी भुजाएं सबसे निचली पसलियों से बनती हैं। पिरामिड की आधार भुजा पेल्विक कैविटी और एब्डोमिनल कैविटी को विभक्त करने वाली काल्पनिक रेखा से बनती है। यह पिरामिड अन्दर की तरफ जाता हुआ पिछले मणिपुर चक्र पर प्वाइंट करता है। इसीलिए कई लोग पूरे उदर क्षेत्र में कुण्डलिनी को चक्राकार भी घुमाते हैं। वास्तव में जब पेट ध्यान के साथ संकुचित किया जाता है, तो ऐसा लगता है कि पेट व रीढ़ की हड्डी आपस में जुड़ गए हैं, व दोनों आगे-पीछे के चक्र भी। इसकी 10 पीटल में से 6 पीटल स्वाधिष्ठान से आती हैं (ऊपर की ओर संकुचन से)। 7वीं पीटल उदर के दाएं भाग से, 8वीं बाएँ भाग से, 9वीं उसके अपने संकुचन से व 10वीं अनाहत चक्र से आती है (जालंधर बंध के सहयोग से)।

अनाहत चक्र पर सुन्दर षटकोण

अनाहत चक्र में एक-दूसरे को काटते हुए दो त्रिभुज हैं, जिससे एक सुन्दर षटकोण बनता है। क्योंकि यह चक्र सबसे प्रमुख है। मैंने स्वयं ध्यान के समय आगे से पीछे तक फैले हुए सुन्दर व आनंदमयी षटकोण को बनते हुए देखा है। एक त्रिभुज पीछे वाले अनाहत चक्र पर प्वाइंट करती है। उसकी आधार भुजा हृदय से लेकर छाती के दाएं क्षेत्र तक है। दूसरी त्रिभुज आगे वाले अनाहत चक्र पर प्वाइंट करती है, जिसकी आधार भुजा रीढ़ की हड्डी में पीछे वाले अनाहत चक्र के दोनों ओर फैली है। जब आदमी खड़े होकर सांस को भरते हुए व सिर को पीछे की ओर करते हुए छाती को बाहर की ओर फुलाता है, तब त्रिभुज की आधार भुजा आगे वाले क्षेत्र में, दोनों स्तनों के बीच में व त्रिभुज की चोटी पीछे वाले अनाहत बिंदु पर होती है। जब सांस को छोड़ते हुए, सिर को नीचे झुकाते हुए व कन्धों को आगे की ओर मोड़ते हुए छाती को अन्दर की ओर संकुचित किया जाता है; तब त्रिभुज की आधार भुजा कंधे की एक तरफ की उभार वाली हड्डी से लेकर दूसरी तरफ की उभार वाली हड्डी तक होती है, और आगे का अनाहत चक्र त्रिभुज की टिप के रूप में होता है।

इसके 12 पीटल में से 6 तो मणिपुर चक्र से आती हैं (ऊपर की ओर संकुचन के माध्यम से)। 2 आगे की आधार भुजा से, 2 पीछे की आधार भुजा से, तथा एक-2 पीटल दोनों चक्रों की अपनी है। वैसे मुझे एक अकेला, व छोटा त्रिभुज भी आसान लगा, जिसकी आधार भुजा हृदय से लेकर आगे वाले अनाहत चक्र तक ही है।

विशुद्धि चक्र पर भी उल्टा त्रिभुज

विशुद्धि चक्र पर उल्टा त्रिभुज है। जहां गले में संकुचन जैसा (आवाज वाले स्थान पर) होता है, वहां पर त्रिभुज की चोटी है। यह आगे वाला चक्र है। त्रिभुज की आधार भुजा गर्दन के मेरुदंड पर लम्बाई व चौड़ाई वाले भाग के लगभग बीचोंबीच है। इस भुजा के केंद्र में पीछे वाला चक्र है। दर्पण में देखने पर गले का वह क्षेत्र उल्टे त्रिभुज की तरह दिखता भी है, विशेषतः जब उड्डीयान बंध पूरा लगा हो। आगे वाले चक्र की ऊपर की ओर सिकुड़न से व उड्डीयान बंध से कुण्डलिनी पीछे वाले चक्र तक ऊपर चढ़ती रहती है। इसकी 16 पीटल में से 12 तो अनाहत चक्र से आती हैं, दो आज्ञा चक्र से, व अंतिम दो इस चक्र के अपने क्षेत्र से आती हैं।

आज्ञाचक्र के त्रिभुज की आधार भुजा दोनों आँखों के बीच में

आज्ञा चक्र पर उल्टी त्रिभुज है। इसका भी पूर्ववत यही अर्थ है कि इसकी आधार भुजा दाईं आँख से बाईं आँख के बीच में है, और यह पीछे के आज्ञा चक्र (सिर के पिछले भाग में, आगे के आज्ञा चक्र के ठीक अपोसिट बिंदु) पर प्वाइंट करती है। इसके दो पीटल में से एक दाईं आँख वाले क्षेत्र से, व एक बाईं आँख वाले क्षेत्र से आती हैं।

मस्तिष्क स्वयं नाड़ी-रेखाओं से भरा हुआ, इसलिए सहस्रार चक्र पर कोई त्रिभुज नहीं

सहस्रार चक्र पर कोई त्रिभुज नहीं है, क्योंकि इसमें ध्यान करने के लिए किसी विशेष रेखा-चित्र की आवश्यकता नहीं है। कहीं पर भी ध्यान किया जा सकता है, और सीधा चक्र-बिंदु पर भी। इसके हजारों पीटल का अर्थ है कि इसके पोषण के लिए लिए पूरे मस्तिष्क सहित पूरे शरीर की भावनामय ऊर्जा पहुंचती है। शरीर के किसी भी भाग पर या चक्र पर ध्यान कर लो, अंततः वह सहस्रार चक्र को ही पुष्ट करता है।

चक्रों के वृत्त कुण्डलिनी-किसान के गोल खेत की तरह

वैसे तो किसी भी चक्र पर षटकोण के रेखा चित्र पर कुण्डलिनी का ध्यान किया जा सकता है। कई चक्रों पर तो वृत्त (गोलाकार रेखाचित्र) भी बनाए गए हैं। इसका यह अर्थ है कि कुण्डलिनी का ध्यान गोलाकार क्षेत्र में भी किया जा सकता है, एक गोलाकार खेत को जोतते हुए किसान की तरह।

सम्भोगीय चक्रों का त्रिभुज बहुत प्रभावशाली

मैं यहाँ एक उदाहरण देकर स्पष्ट करना चाहता हूँ, की त्रिभुजाकार रेखाचित्र से ध्यान करना कितना आसान और प्रभावशाली हो जाता है। यहाँ मैं सबसे नीचे के सम्भोगीय चक्रों की बात करने जा रहा हूँ। अधिकांशतः इनका ध्यान इकट्ठे रूप में ही होता है, अलग-२ नहीं। जालंधर बंध से ऊपर का प्राण आगे के स्वाधिष्ठान चक्र पर आरोपित हो जाता है। मूलाधार के संकुचन से भी नीचे का प्राण वहां पहुँच जाता है। इससे कुण्डलिनी वहां पर दमकने लगती है। तभी वहां पर पीठ की तरफ को एक संकुचन सा अनुभव होता है। उससे जननांग शिखा से लेकर, कुण्डलिनी के साथ प्राण पीछे के स्वाधिष्ठान चक्र पर केन्द्रित हो जाता है। थोड़ी देर बाद वहां की मांसपेशी थक कर शिथिल हो जाती है, जिससे प्राण मूलाधार तक नीचे उतर जाता है। फिर मूलाधार संकुचित किया जाता है, जिससे प्राण फिर आगे वाले स्वाधिष्ठान चक्र तक ऊपर चढ़ जाता है। वही क्रम पुनः-२ दोहराया जाता है, और कुण्डलिनी उस त्रिभुज पर चक्राकार घूमती रहती है, हर बार अपनी चमक बढ़ाते हुए।

Please click on this link to view this post in English (The triangle, circle and petal of kundalini chakra- demystifying a hidden secret)

कुण्डलिनी व प्रेम सम्बन्ध के बीच में आपसी रिश्ता- mutual relationship between Kundalini and love affair

कुण्डलिनी व प्रेम सम्बन्ध के बीच में आपसी रिश्ता (please browse down or click here to view this post in English)

कुण्डलिनी एक जीवनी शक्ति है। समाज में यादों के सहारे जीने की जो बात चलती है, वह कुण्डलिनी के सहारे जीने की ही बात है। इसी तरह, प्रेमसंबंध भी कुण्डलिनी को पैदा करता है, जिससे विभिन्न कुण्डलिनी-लक्षण पैदा होते हैं। कुण्डलिनी प्राणों (साँसों सहित) को बल प्रदान करती है। कुण्डलिनी मानसिक विचार का ही पर्याय है। इस प्रकार से सभी मानसिक विचार प्राणों को पुष्ट करते हैं।

किसी व्यक्ति विशेष का लगातार यादों में, अर्थात मन में बने रहना ही कुण्डलिनी-क्रियाशीलता है। उससे उस व्यक्ति विशेष के रूप से बनी मानसिक छवि को ही कुण्डलिनी कहते हैं, तथा उस मानसिक छवि से एकाकार होने को ही कुण्डलिनी जागरण कहते हैं।

जब कोई व्यक्ति कहता है कि वह अपने प्रेमी के बिना जी नहीं सकता, तब वह उसके रूप से बनी अपनी मानसिक कुण्डलिनी के बिना न जी सकने की ही बात करता है। वास्तव में वह अपने प्रेमी के भौतिक रूप के बिना भी जी सकता है, यदि प्रेमी की छवि उसके मन में बस गई हो। तभी तो बहुत से प्रेमी जोड़े एक-दूसरे से अलग रहकर, एक-दूसरे की यादों के सहारे ही पूरा जीवन सुखपूर्वक बिता लेते हैं। उनके मन में बसी एक-दूसरे की वही छवि तो कुण्डलिनी है। वह उनके पूरे अस्तित्व को चलायमान रखती है। प्रेमी उसे नहीं छोड़ सकता। यदि वह जबरदस्ती उसे हटाने का प्रयत्न करता है, तो वह अँधेरे में जैसे डूबने लगता है, क्योंकि उसका सभी कुछ उस कुण्डलिनी के साथ जुड़ गया होता है। इसलिए वह मजबूरी में उसे बना कर रखता है। जब समय के साथ वह छवि मिटने लगती है, तब कोई नई छवि उसका स्थान लेने लगती है। इसी से पता चलता है कि कुण्डलिनी एक जीवनी शक्ति है। यौनसंबंध से उस मानसिक छवि को शक्ति मिलती है। ऐसा ही ओशो महाराज भी कहते हैं। तभी तो जगत में यौनसंबंध को सबसे बड़ा सुख माना जाता है। यदि वह सम्बन्ध तांत्रिक विधि से हो, तब तो और भी अधिक शक्ति मिलती है, जिससे वह जागृत भी हो सकती है।

अतः उपरोक्त बातों से स्वयंसिद्ध है कि अंतर्लैंगिक प्रेमसंबंध में भी कुण्डलिनी लक्षण उत्पन्न होते हैं। प्रेमी के रूप से निर्मित मानसिक कुण्डलिनी लगातार मन में बसी रहती है। उससे व्यक्ति यौनसंबंध बनाने के लिए या विवाह सम्बन्ध बनाने के लिए प्रोत्साहित होता है, ताकि वह कुण्डलिनी शांत हो सके। यद्यपि वह कुण्डलिनी लाभदायक होती है, पर व्यक्ति उसके अस्थायी दुष्प्रभावों से विचलित हो जाता है। वे दुष्प्रभाव निम्नलिखित प्रकार के हैं। वह उसकी शारीरिक व मानसिक शक्ति का कम या ज्यादा रूप में भक्षण करती रहती है। उससे उसका मन दुनियादारी में कम लगता है। वह एकांत को पसंद करने लगता है। वह लोगों को बुझा-बुझा सा दिखता है। अन्य वे सभी लक्षण उत्पन्न होते हैं, जो कुण्डलिनी के लिए सामान्य हैं, जैसे कि शरीर में, मुख्यतः हाथों में कम्पन, सिरदर्द के साथ सिर में भारीपन, भावुकता, उत्तेजना आदि। तभी तो कई प्रेमी अपने प्रेम के असफल होने पर घातक कदम भी उठा लेते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि कुण्डलिनी उनका पीछा ही नहीं छोड़ेगी, और उन्हें बिलकुल नकारा कर देगी। परन्तु वास्तविकता यह है कि वह कुण्डलिनी उनके सारे पाप धोकर उन्हें आत्मज्ञान तक पहुंचा देती है। प्रेमयोगी वज्र के साथ भी यही हुआ था, जो उसकी पुस्तक “शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)” में विस्तार से वर्णित है। फिर बाद में उसके गुरु के रूप की कुण्डलिनी उसके मन में जागृत हो गई थी, जिसने उसकी प्रेमिका की कुण्डलिनी का स्थान ले लिया था। इस तरह से, लगभग 20 सालों के बाद उसका पीछा उसकी प्रेमिका के रूप की कुण्डलिनी से छूट पाया था।

विडम्बना है कि प्रेम के सफल होने पर भी व्यक्ति को संतुष्टि नहीं मिलती। विवाह के बाद प्रेमी का आकर्षण समाप्त हो जाता है, जिससे उसके रूप की कुण्डलिनी भी गायब हो जाती है। वह जीवनी शक्ति के लिए तरसने लगता है। फिर वह पछताता है कि क्योंकर उसने प्रेमी की यादों (कुण्डलिनी) से घबरा कर प्रेम को परवान नहीं चढ़ने दिया। वह सोचता है कि प्रेमी के भौतिक रूप से अच्छी तो उसके रूप से निर्मित मानसिक कुण्डलिनी ही थी। यद्यपि फिर भी कुछ नहीं बिगड़ा होता है, यदि वह मौके की नजाकत को समझे। क्योंकि वैसी पछतावे वाली स्थिति में वह संदर्भित तंत्र / अप्रत्यक्ष तंत्र का सहारा ले सकता है, जिसमें वह अपने जीवनसाथी-प्रेमी की सहायता से गुरु, देवता , इष्ट आदि के रूप की कुण्डलिनी को जागृत कर सकता है। इस तरह के समस्त तथ्य उपरोक्त पुस्तक में सविस्तार वर्णित हैं।

वैसे तो मन के सभी विचार जीवनी शक्ति देते हैं। एक बहिर्मुखी आदमी में ये विचार निरंतर जारी रहते हैं, इसलिए उसकी जीवनी शक्ति निरंतर बनी रहती है। जब उसका शरीर किसी कारणवश क्षीण हो जाता है, तब उसकी बहिर्मुखता भी क्षीण हो जाती है। इससे वह निर्विचार सा होकर जीवनी शक्ति के लिए तरस जाता है। फिर वह अकेली मानसिक छवि को योग से पुष्ट करने लगता है, ताकि वह जीवनी शक्ति प्राप्त करता रह सके। बुद्धिमान व्यक्ति बहिर्मुखता के साथ योग या प्रेम से या दोनों से कुण्डलिनी को भी पुष्ट करता रहता है, ताकि वह संकट के समय काम आवे। भाग्यहीन व्यक्ति न तो बदलते विचारों का पूरा लाभ उठाता है, और न ही कुण्डलिनी-रूपी अकेले यौगिक विचार का। इसलिए जीवनी शक्ति के अभाव के कारण उसका जीवन संकट में पड़ा रहता है।

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Mutual relationship between Kundalini and love affair

Kundalini is a Life force. What is the matter of living in the society with the help of memories; it is only a matter of living with the help of Kundalini. Likewise, love affair also produces Kundalini, which causes various Kundalini-symptoms. Kundalini gives strength to pranas / subtle breath-power (including breaths). Kundalini is a synonym for mental thought. In this way, all mental thoughts affirm life.

A continuous memory of a particular person, that is to remain in the mind, is the Kundalini-activation. From that, the mental image created from the physical form of a particular person is called Kundalini, and Kundalini awakening is to be united with that mental image.

When a person says that he cannot live without his lover, then he talks about not living without the Kundalini. In fact, he can live without the physical nature of his lover, if the image of the lover has settled in his mind. Only then, many lover couples spend their whole life happily, living apart from each other, with the help of each other’s memories. The same image in the mind of lover is Kundalini. She keeps his whole existence moving. He cannot leave her. If he forcefully tries to remove her, then he starts drowning in the darkness, because his everything has gone attached with that image. That is why he maintains her in compulsion. When the image begins to dissolve over time, then a new image begins to take its place. This shows that Kundalini is a life force. Sexual mood gives strength to that mental image. Similar are also the words of Osho Maharaja. Only then, sexual relations are considered the greatest happiness in the world. If that relation is with the Tantric method, then kundalini gets even more power, so that she can also be awakened.

Therefore, there is axiom by the above things that kundalini symptoms arise in romantic love affair also. The mental kundalini built from the physical form of a lover constantly resides in the mind. The person is encouraged to make sexual relation or to create a marriage relationship, so that the Kundalini can calm down. Although the Kundalini is beneficial, the person gets distracted by its temporary side effects. These are the following types of side effects. She uses less or more of his physical and mental powers. His mind wants to be less in the world. He seems to like seclusion. It looks to people as if he has gone extinguished. Other all those symptoms are common, which are normal for the Kundalini, such as subtle tremors in the body, mainly vibrations in the hands, heaviness in the head with headache, emotionalism, excitement etc. Only then do many lovers take fatal steps when their love fails, because they think that Kundalini will not leave them normal, and will make them rejected altogether. However, the reality is that the Kundalini, by washing all their sins, leads them to enlightenment. This was the case with Premyogi Vajra, which is described in detail in his book (in Hindi) “shareervigyan darshan- ek adhunik kundalini tantra (ek yogi ki premkatha); Physiology philosophy – A Modern Kundalini tantra (The Love Story of a Yogi)”, and “love story of a yogi- what Patanjali says”. Both of these are also available on “shop” page of this website. Later, his Kundalini made of his Guru’s form had awakened in his mind, who had replaced his girlfriend’s Kundalini. In this way, after twenty years of pursuing it, he was exempted from the kundalini made of his girlfriend’s form.

Ironically, even after the success of love, the person does not get satisfaction. After marriage, the attraction of the lover ends, so that the Kundalini of her form also disappears. He seems longing for the force of life. Then he regrets why he did not allow love to go to peak out of fear of lover’s memories (the Kundalini). He thinks that the lover’s physical form is worse than the mental kundalini built from her that physical form. Although nothing is non repairable then too, if he understands the potential of the spot. Because in such a situation, he can resort to the contextual Tantra / indirect Tantra in which he can awaken the Kundalini of the form of Guru, God, favorite etc. with the help of loving life partner. All such facts are described in detail in the above book.

By the way, all thoughts of the mind give the force to life. These thoughts continue in an extroverted man, so his life force continues to be sustained. When his body gets impaired for some reason, then his extrovert nature also becomes impaired. This leads to a bit of gross thoughtlessness and yearns for life. Then he starts to consolidate the single mental image with the yoga, so that he can get the life force. The wise person keeps on strengthening the Kundalini along with his extrovert nature with help of yoga / meditation or love or both, so that she will work in times of crisis. An ill fated one does not take full advantage of changing thoughts, nor of the yogic thought alone, that is named as kundalini. Therefore, due to the absence of life force, his life remains in crisis.

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Tantralaya in place of Vaishyalaya/वैश्यालय के स्थान पर तंत्रालय

(हिंदी में पोस्ट पढ़ने के लिए कृपया नीचे ब्राऊज करें)

Prostitute centres/vaishyalaya should be socialised and channelized/transformed into the spiritual/kundalini realm with help of tantra, just as the household sexual activities are transformed by it. In this way, number one misconduct would become as a number one kundalini uplifting machine. Honor of woman would also be saved, she being appearing as tantra-godess in this way. With help of the present time health screening and health check ups, tantra yoga would become fully safe unlike that in old times when diseases used to spread to each others during such tantric feasts. There should be appointed well qualified tantric gurus in those community tantra centres. Illegal sexual relationships with accompanied crimes would automatically come down. Many psychological diseases due to restricted sexuality would come down. There would be done nothing additional to the present scenario but the proustite centres already existing would be transformed only.

वेश्यालय केंद्र / वैश्यालय को सामाजिक सहायता और चैनलिंग की मदद से आध्यात्मिक / कुंडलिनी क्षेत्र में परिवर्तित / रूपांतरित किया जाना चाहिए, जैसे कि घरेलू यौन गतिविधियों को इसके द्वारा बदल दिया जा सकता है। इस तरह, नंबर एक दुर्व्यवहार एक कुंडलिनी उत्थान मशीन के रूप में बन जाएगा। महिला का सम्मान भी बचाया जाएगा, वह इस तरह से तंत्र-देवी के रूप में दिखाई देगी। वर्तमान समय में स्वास्थ्य जांच और स्वास्थ्य जांच की सहायता से, तंत्र योग उस पुराने समय की अपेक्षा पूरी तरह से सुरक्षित हो जाएगा, जब यौनसंबंध बीमारियों को एक दूसरे के बीच में फैलाता था। उन समुदाय-तंत्र-केंद्रों में अच्छी तरह से योग्य तांत्रिक गुरु नियुक्त किया जाना चाहिए। इसके साथ ही अपराधों के साथ अवैध यौन संबंध नीचे आ जाएंगे। प्रतिबंधित कामुकता के कारण होने वाले कई मनोवैज्ञानिक रोग नीचे आ जाएंगे। वर्तमान परिदृश्य के लिए कुछ भी अतिरिक्त नहीं किया जाएगा, लेकिन पहले से मौजूद वैश्यावृत्ति-केंद्र केवल तब्दील हो जाएंगे।

 

Tantric Guru and tantric consort- तांत्रिक गुरु और तांत्रिक प्रेमिका

(कृपया हिंदी में पोस्ट पढ़ने के लिए नीचे ब्राऊज करें)

The permanent stationing of guru inside one’s mind is best achieved through sexual tantra, just as happened with Premyogi vajra as described on Home-2 webpage. His first exposure with his sexual consort(non marital)/Queen during he being in loving company of his guru(the same spiritual old man) was pure mental/one time indirect initiation/indirect tantra based as told in detail on webpages, love story of a yogi, scattered throughout. Therein queen was as if his activated kundalini and was led through the wonderful/too rich romantic lures in his mind to his enlightenment in too short time of 2 years by the spontaneous grace of his pauranic(who reads puranas/collections of ancient Indian spiritual stories in Sanskrit, daily) guru’s company, even without her awakening. On second occasion, his that and then demised physical guru’s mental image as his second kundalini was enriched too much with his non dual life style and that image’s connection with the repeatedly remembered image of the first consort(indirectly sexual) in about 15 years. Then in the last, Premyogi vajra lifted up that kundalini to  her awakening with the help of the direct sexual tantra with his second consort(marital), as described on the same homepage in brief and love story of a yogi-7 in detail.

All posts in this category are also available as Kindle eBooks. The e-book is titled “Kundalini science – A Spiritual Psychology”. Please click on this link to get it for the lowest price.

मन के अन्दर गुरु के स्थायी रख-रखाव को यौन तंत्र के माध्यम से सबसे अच्छी तरह से हासिल किया जा सकता है, जैसा कि होम -2 वेबपृष्ठ पर वर्णित प्रेमयोगी वज्र के साथ हुआ था। अपनी प्रथम यौनप्रेमिका / प्रथम देवीरानी (अविवाहित) से संपर्क में रहने के दौरान वह अपने गुरु (वही आध्यात्मिक बूढ़े आदमी) की निरंतर प्रेमपूर्ण संगति में भी बना हुआ था। प्रथम देवीरानी के साथ वह संपर्क शुद्ध मानसिक / एकबार के अप्रत्यक्ष तांत्रिक प्रारम्भ (इनिशिएशन) / अप्रत्यक्षतंत्र से प्रेरित था। यह सारा वर्णन वेबपेजिस “love story of a yogi” पर किया गया है। वही देवीरानी उसकी सक्रिय कुंडलिनी के रूप में थी, और उसके दिमाग में उसके उपरोक्त पौराणिक गुरु द्वारा पढ़ी गई कथाओं की सहज कृपा से अत्यद्भुत / बहुत ही समृद्ध रोमांटिक लालचों के माध्यम से, 2 वर्षों के बहुत कम समय में उसके आत्मज्ञान के लिए चरम मानसिक अभिव्यक्ति तक ले जाई गई, उन्हीं गुरु की संगति से, जो प्रतिदिन प्राचीन भारतीय आध्यात्मिक कहानियों के संग्रह / पुराण पढ़ा करते थे, उस कुण्डलिनी की सैद्धांतिक जागृति के बिना ही। दूसरे मौके पर, उन्होंने अपनी दूसरी कुंडलिनी के रूप में अपने उन्हीं भौतिक गुरु की मानसिक छवि को अपनी अद्वैतपूर्ण जीवन शैली के साथ समृद्ध किया, और पहली देवीरानी (परोक्ष रूप से यौनसम्बन्धी) की बार-बार याद की गई छवि के साथ अपने गुरु की छवि का संबंध जुड़ा होने के कारण, गुरु की छवि भी काफी समृद्ध हो गई, लगभग 15 वर्षों में। फिर आखिर में, प्रेमयोगी वज्र ने अपनी दूसरी कंसोर्ट / प्रेमिका (वैवाहिक) के साथ सीधे / प्रत्यक्ष यौनतंत्र की मदद से अंतिम जागृति के लिए उस कुंडलिनी को उठाया, जैसा कि उपरोक्त होमपेज पर ही संक्षेप में और “love story of a yogi-7” में विस्तार से वर्णित है।

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Women is revered in tantra- महिलाओं को तन्त्र में पूजित किया जाता है

(हिंदी में पोस्ट पढ़ने के लिए कृपया नीचे ब्राऊज करें)

There is a misbelief that in the tantra, woman is exploited and used as a toy to work for the spiritual uplifting of a man (Woman in Tantra). Actually in tantra a man becomes fully sage like in every respect. Can a sage even think of exploiting anyone? Taoism also recommends for a sage to be a sexual sage, not a simple sage due to the same reason. Actually, religiously extremist people who misused tantric powers for the inhumane practices, they exploited the woman violently but the blame came to the real tantra.

महिलाओं को तन्त्र में पूजित किया जाता है

एक मिथ्या विश्वास है कि तंत्र में महिला का शोषण किया जाता है, और एक पुरुष के आध्यात्मिक उत्थान (तंत्र में महिला) के लिए उसका एक खिलौने के रूप में उपयोग किया जाता है। असल में तंत्र में एक आदमी पूरी तरह से ऋषि के समान बन जाता है। क्या ऋषि किसी का भी शोषण करने के बारे में कभी सोच भी सकता है? ताओवाद भी ऋषि के लिए एक यौन-क्रियाशील ऋषि बनने की सिफारिश करता है, एक साधारण ऋषि बनने की नहीं। असल में, धार्मिक रूप से चरमपंथी लोग, जिन्होंने अमानवीय प्रथाओं के लिए तांत्रिक शक्तियों का दुरुपयोग किया, उन्होंने ही महिला का हिंसक तरीके से शोषण किया, लेकिन दोष वास्तविक तंत्र के ऊपर आ गया।