कुण्डलिनी का पुरातन जीवनशैली से सम्बन्ध- relationship between Kundalini and antiquity

यह पोस्ट देवी माता व उनके नवरात्रि त्यौहार को समर्पित है।

कुण्डलिनी का पुरातन जीवनशैली से सम्बन्ध (please browse down or click here to view this post in English)

कुण्डलिनी-विषय को पुरातन-पंथी कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। “कुण्डलिनी” शब्द भी संस्कृत भाषा का है। संस्कृत भाषा को पुरातन पंथी वैसे भी कहा जाता है। मन में निरंतर बस रही सबसे प्यारी छवि को ही कुण्डलिनी कहा जाता है। वह छवि देवता की भी हो सकती है, किसी प्रेमी / प्रेमिका की भी हो सकती है, गुरु की भी हो सकती है, और यहाँ तक कि शत्रु की भी हो सकती है। बिना प्रेम किए ही शत्रु की छवि मन में बस जाती है। कंस के मन में कृष्ण की छवि बस गई थी। इसी तरह, शिशुपाल के मन में भी भगवान् श्रीकृष्ण की छवि बस गई थी। यह अपवाद-स्वरूप है। इसी तरह, तांत्रिक आकर्षण से निर्मित मानसिक छवि बिना प्रेम के या कम प्रेम के साथ भी मन में बस सकती है। अधिकाँश मामलों में परम प्रेमी लोगों की छवि ही मन में बसी होती है। फिर भी, छवि को मन में बसाने वाले मूल साधन के रूप में तांत्रिक आकर्षण (यिन-याँग आकर्षण) ही प्रतीत होता है। ओशो महाराज भी ऐसा ही कहते हैं। कृष्ण के प्रेम में दीवानी मीरा के मन में कृष्ण की छवि बस गई थी। इसी तरह, गोपियों के मन में भी कृष्ण की छवि बस गई थी। रांझा के मन में हीर की छवि बस गई थी, और हीर के मन में रांझा की छवि बस गई थी। लैला के मन में मजनू की, व मजनू के मन में लैला की छवि बस गई थी। इसी तरह से रोमियो के मन में जूलियट की छवि बस गई थी, व जूलियट के मन में रोमियो की छवि बस गई थी। यदि पहाड़ों के प्रेम-प्रसंगों को लें, तो रान्झू के मन में फूलमाँ की, व फूलमाँ के मन में रान्झू की छवि बस गई थी। दुर्योधन के मन में उसके मित्र कर्ण की छवि बस गई थी, व कर्ण के मन में दुर्योधन की। योगी श्री रामकृष्ण परमहंस के मन में माता काली की छवि बस गई थी। इसी तरह, स्वामी विवेकानंद के मन में उनके अपने गुरु व योगी श्री रामकृष्ण परमहंस के रूप वाली कुण्डलिनी-छवि बस गई थी। भक्त हनुमान के मन में भगवान राम के रूप की कुण्डलिनी बस गई थी

तो क्या प्रेम का नाम ही कुण्डलिनी है? हाँ, प्रेम ही कुण्डलिनी है। कुण्डलिनी कोई विशेष नाड़ी, विशेष हड्डी या कोई अन्य भौतिक वस्तु नहीं है। हाँ, विभिन्न भौतिक वस्तुओं से कुण्डलिनी को पुष्ट करने में, व उसे जागृत करने में सहायता अवश्य मिलती है। मन में निर्बाध रूप से बनी हुई प्रेमी की छवि ही कुण्डलिनी है। जब कभी भी कोई आदमी उस छवि में कुछ क्षणों के लिए इतना अधिक खो जाता है कि उसे अपने पृथक अस्तित्व का बोध ही नहीं रहता, और वह कुण्डलिनी के साथ एकाकार हो जाता है, तब उसे ही कुण्डलिनीजागरण या पूर्ण समाधि कहते हैं। तो फिर हठयोगी की कुण्डलिनी कैसे विकसित होती है? हठयोगी तो किसी से प्रेम नहीं करता।

हठयोगी योग के निरंतर अभ्यास से अपने मन में कुण्डलिनी को पुष्ट करता है। जो काम प्रेम के कारण स्वयं होता है, वही काम वह योग के बल से करता है। तभी तो वह अपने मन में वैसी कुण्डलिनी छवि को भी जागृत कर सकता है, जिसके प्रति आमतौर पर प्रेम नहीं पनपता। उदाहरण के लिए, वह सूर्य की छवि को, वायु-स्पर्श की अनुभूति की छवि को, ध्वनि की छवि आदि-2 किसी भी प्रकार की छवि को अपने मन में जागृत कर सकता है। यद्यपि उसके लिए प्रेमी मनुष्य की छवि को जागृत करने के लिए लगाए जाने वाले योगबल की तुलना में कहीं अधिक योगबल लगाने की आवश्यकता होती है। वैसा प्रचंड योगबल केवल पहुंचे हुए योगी ही उत्पन्न कर सकते हैं, जो बहुत विरले होते हैं। सबसे सुगम तरीका यह होता है कि पहले अनन्य प्रेमी की छवि को प्रेम-व्यवहार से मन में पुष्ट किया जाए, फिर अतिरिक्त योगबल की सहायता से उसे जागृत किया जाए। प्रेमी मनुष्य की  कुण्डलिनी-छवि सर्वाधिक मानवतापूर्ण भी है, क्योंकि उससे मानवमात्र के प्रति आदरबुद्धि व प्रेम अत्यधिक रूप से बढ़ जाते हैं।

अब पुरातन व आधुनिक पक्ष की बात करते हैं। किसी व्यक्ति के साथ लम्बे समय तक परस्पर सद्भाव, सद्व्यवहार, सहयोग, मेल-मिलाप, निःस्वार्थ भाव व तारतम्य को बनाए रखकर ही उसके प्रति प्रेम उपजता है। ऐसा करने को पुरातन पंथ कहा जाता है, और ऐसा करने वाले को पुरातनपंथी। अवसरवाद को आधुनिकता कहा जाता है। अवसरवाद से प्रगाढ़ प्रेम-सम्बन्ध को बनने का अवसर ही नहीं मिल पाता है, साथ में उससे बना-बनाया प्रेम-सम्बन्ध भी नष्ट हो जाता है। जब तक दूसरा व्यक्ति अपने लिए हितकारक लगेगा, तभी तक उससे प्रेमसम्बन्ध बना रहेगा। जैसे ही वह अहितकारक लगने लगेगा, वैसे ही बना-बनाया प्रेमसम्बन्ध टूट जाएगा। इसे ही अवसरवाद कहते हैं। अपने मन में किसी व्यक्ति की छवि को स्थिर कुण्डलिनी का रूप प्रदान करने के लिए, अपने हित-अहित को दरकिनार करते हुए उससे लम्बे समय तक प्रेमसम्बन्ध बना कर रखना पड़ता है। इसे पुराना फैशन कहा जाता है। तभी तो मैंने कुण्डलिनी को पुरातन-पंथी कहा है।

आत्मज्ञान व अद्वैतभाव भी पुरातन-पंथी ही हैं। आत्मज्ञान कुण्डलिनी से ही उपलब्ध होता है। आत्मज्ञान के बाद भी कुण्डलिनी मन में निरंतर बसी रहती है। इसी तरह, पिछली पोस्टों में सिद्ध किया गया है कि अद्वैत व कुण्डलिनी एक-दूसरे को बढ़ाते रहते हैं। इसी तरह, सभी धार्मिक क्रियाकलाप भी पुराने तौर-तरीके के रूप में जाने जाते हैं, क्योंकि सभी का एकमात्र उद्देश्य कुण्डलिनी ही है।

अतः सिद्ध होता है कि जीवन की पुरानी शैली कुण्डलिनी-सम्मुखता के रूप में है, जबकि तथाकथित आधुनिक शैली कुण्डलिनी-विमुखता के रूप में है। पुराने और नए तौर-तरीकों के बीच में कोई भी भौतिक विभिन्नता नहीं है। केवल दृष्टिकोण, विचारधारा, व जीवन-व्यवहार का ही अन्तर है। इस तरह से हम देख सकते हैं कि जीवन के नए तौर-तरीके से आध्यात्मिक उन्नति बहुत दुर्लभ है। आजकल सर्वाधिक व्यावहारिक तरीका यह है कि आधुनिक व पुराने तौर-तरीकों को मिश्रित रूप में अपनाया जाए। यही तंत्रात्मक जीवन-पद्धति प्रेमयोगी वज्र द्वारा रचित “शरीरविज्ञान दर्शन” का मुख्य आधार है।

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This post is dedicated to the Goddess Mother and her Navaratri festival.

relationship between Kundalini and antiquity

It will not be an exaggeration to mention the subject of Kundalini as an archaeologist. The word “Kundalini” is also of Sanskrit language. Sanskrit language is also called an archaeologist. The most beloved image that is constantly sitting in mind is called Kundalini. That image can also be of God, can also be of a boyfriend / girlfriend, it can be of a master (guru), and even an enemy can be. Without love, the image of the enemy settles in the mind. Krishna’s image was settled in his enemy Kans’s mind. Similarly, in the mind of Shishupala, Lord Krishna’s image was settled. This is an exception. Similarly, a mental image created by a tantric love affair can sit in the mind without love or with less love. In most cases, the image of the ultimate lover is in the mind. Even so, the tantric attraction (yin-yang attraction) appears to be the basic means of settling the image in the mind. Osho maharaj says the same thing. In Krishna’s love, the divine image of Krishna was settled in the mind of Mira. Similarly, the image of Krishna in the Gopis’ mind was settled. The image of Heer was settled in Ranjha’s mind, and the image of Ranjha was settled in Heer’s mind. In the mind of Laila, the image of Majnu was settled, and in Majnu’s mind, the image of Layla was settled. Similarly, the image of Juliet was settled in Romeo’s mind, and the image of Romeo in Juliet’s mind was settled. If you take the love affairs in the mountains, then in the mind of the Ranju, the image of Phoolman was settled and vice versa. In Duryodhana’s mind, the image of his friend Karna was settled, and in Karna’s mind, the image of Duryodhana was settled. The image of Mata Kali was settled in the mind of yogi Shri Ramkrishna Paramahansa. Similarly, in the mind of Swami Vivekananda, the Kundalini-image of Shri Ramkrishna Paramahansa, his own master and yogi, settled. In the mind of the devotee Hanuman, the Kundalini of Lord Rama was settled.

Therefore, Kundalini is the name of love. Yes, love is Kundalini. Kundalini is not a special pulse, special bone or any other physical object. Yes, it is possible to reinforce the Kundalini with various physical objects, and those help in its awakening too. The uninterrupted image of the lover in one’s mind is the Kundalini. Whenever a person is lost so much for a few moments in that image that he does not realize his separate existence, and he becomes united with the Kundalini, then he is called having Kundalini awakening or full Samadhi. Then how does the Kundalini of Hath yogi grow? Hath yogi does not love anyone.

Hath yogi reinforces the Kundalini in his mind with continuous practice of yoga. The work that is done by love itself is done by the power of yoga. Only then can he awaken that type of kundalini image in his mind, which usually does not grow in love. For example, he can awaken the image of the sun, the image of the sensation of the air-touch, the image of the sound etc., any type of image in its mind. Although it requires the addition of more yogic power than the yogic power needed to awaken the image of a loving human. Such a huge yogic power can be produced only by the yogis of far reaching, which are very rare. The easiest way is to first confirm the image of the unique lover in love with love-full interactions, and then awaken it with the help of the additional Yoga. The Kundalini-image made of a humanely lover is also the most humanitarian, because it greatly increases the respect and love towards humankind.

Now talk about the old and the modern side of living. Long-term mutual goodness, goodwill, cooperation, reconciliation, selflessness, brotherhood, and coordination are accompanied by a person’s love for a loving being. To do so, it is called an ancient cult, and the doer who is doing this is a fundamentalist. Opportunism is called modernism. Opportunism does not get the opportunity to create a strong love relationship, together with it destroys the already created love-relationships. As long as the other person will feel good for himself, that long he will remain in love. As soon as he starts to feel harm from him, the love-made love relationship will be broken. This is called opportunism itself. In order to give the image of a person the form of a stable Kundalini in your mind, bypassing your interests, it has to be kept affectionate for a long time. This is called old fashion. That is why I have called the Kundalini as the antiquity.

Enlightenment and advaita (non-duality) are also ancient. Enlightenment is available only from the Kundalini. Even after enlightenment, the Kundalini remains in the mind continuously. Similarly, in previous posts it has been proven that Advaita and Kundalini keep increasing each other. Likewise, all religious activities are also known as old ways, because the only purpose of all is Kundalini.

Therefore, it proves that the old style of life is in the form of a Kundalini-oriented lifestyle, whereas the so-called modern style is in the form of a Kundalini-opposing lifestyle. There is no physical variation between old and new modes. The only difference is there in the form of approach, ideology, and life-style. In this way, we can see that spiritual advancement in the new way of life is very rare. Nowadays, the most practical way is to adopt modern and old ways in mixed form. This tantric method of life is the main basis of “Shareeravigyan darshan” written by Premyogi vajra.

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Non duality and Kundalini reinforces each other/अद्वैतभाव व कुंडलिनी एक दूसरे को पुष्ट करते हैं।

Bliss originates from non duality. Kundalini awakening is semifinal bliss. Enlightenment is final/supreme bliss. Therefore, Kundalini awakening and enlightenment, both proves to be the states of semifinal and final non duality respectively. Morning Kundalini yoga strengthens Kundalini. That in turn strengthens non duality. That in turn strengthens bliss. Similar system works after evening Kundalini yoga too, so tiredness fade away immediately. Similarly, Non dual action strengthens kundalini and bliss, both together for all these three live together.

After his glimpse enlightenment, Premyogi vajra had got profound non dual attitude. So Kundalini and bliss also used to accompany that powerfully along with.

आनंद अद्वैत से उत्पन्न होता है। कुंडलिनी जागरण में उच्चतम के निकट का आनंद अनुभव होता है। आत्मज्ञान में उच्चतम आनंद की स्थिति होती है। इससे सिद्ध होता है कि कुंडलिनी जागरण लगभग उच्चतम अद्वैत से संपन्न होता है, और आत्मज्ञान पूर्णतया उच्चतम अद्वैत से सम्पन्न होता है। प्रातः कुण्डलिनी योग कुंडलिनी को पुष्ट करता है। कुंडलिनी फिर अद्वैत को पुष्ट करती है। अंत में अद्वैत आनंद को बढ़ाता है। सांयकाल के कुंडलिनी योग से भी इसी सिद्धांत से थकान दूर होती है। इसी तरह, अद्वैतमयी क्रियाकलाप कुंडलिनी व आनंद, दोनों को पुष्ट करते हैं, क्योंकि ये तीनों गुण साथ-२ रहते हैं।

अपने क्षणिकात्मज्ञान के बाद, उसके प्रभाव से प्रेमयोगी वज्र में असीम अद्वैत उत्पन्न हो गया था। इससे कुंडलिनी व आनंद, दोनों भी प्रचंड रूप से स्वयं ही उसके साथ रहते थे।

Tantric Guru and tantric consort- तांत्रिक गुरु और तांत्रिक प्रेमिका

(कृपया हिंदी में पोस्ट पढ़ने के लिए नीचे ब्राऊज करें)

The permanent stationing of guru inside one’s mind is best achieved through sexual tantra, just as happened with Premyogi vajra as described on Home-2 webpage. His first exposure with his sexual consort(non marital)/Queen during he being in loving company of his guru(the same spiritual old man) was pure mental/one time indirect initiation/indirect tantra based as told in detail on webpages, love story of a yogi, scattered throughout. Therein queen was as if his activated kundalini and was led through the wonderful/too rich romantic lures in his mind to his enlightenment in too short time of 2 years by the spontaneous grace of his pauranic(who reads puranas/collections of ancient Indian spiritual stories in Sanskrit, daily) guru’s company, even without her awakening. On second occasion, his that and then demised physical guru’s mental image as his second kundalini was enriched too much with his non dual life style and that image’s connection with the repeatedly remembered image of the first consort(indirectly sexual) in about 15 years. Then in the last, Premyogi vajra lifted up that kundalini to  her awakening with the help of the direct sexual tantra with his second consort(marital), as described on the same homepage in brief and love story of a yogi-7 in detail.

मन के अन्दर गुरु के स्थायी रख-रखाव को यौन तंत्र के माध्यम से सबसे अच्छी तरह से हासिल किया जा सकता है, जैसा कि होम -2 वेबपृष्ठ पर वर्णित प्रेमयोगी वज्र के साथ हुआ था। अपनी प्रथम यौनप्रेमिका / प्रथम देवीरानी (अविवाहित) से संपर्क में रहने के दौरान वह अपने गुरु (वही आध्यात्मिक बूढ़े आदमी) की निरंतर प्रेमपूर्ण संगति में भी बना हुआ था। प्रथम देवीरानी के साथ वह संपर्क शुद्ध मानसिक / एकबार के अप्रत्यक्ष तांत्रिक प्रारम्भ (इनिशिएशन) / अप्रत्यक्षतंत्र से प्रेरित था। यह सारा वर्णन वेबपेजिस “love story of a yogi” पर किया गया है। वही देवीरानी उसकी सक्रिय कुंडलिनी के रूप में थी, और उसके दिमाग में उसके उपरोक्त पौराणिक गुरु द्वारा पढ़ी गई कथाओं की सहज कृपा से अत्यद्भुत / बहुत ही समृद्ध रोमांटिक लालचों के माध्यम से, 2 वर्षों के बहुत कम समय में उसके आत्मज्ञान के लिए चरम मानसिक अभिव्यक्ति तक ले जाई गई, उन्हीं गुरु की संगति से, जो प्रतिदिन प्राचीन भारतीय आध्यात्मिक कहानियों के संग्रह / पुराण पढ़ा करते थे, उस कुण्डलिनी की सैद्धांतिक जागृति के बिना ही। दूसरे मौके पर, उन्होंने अपनी दूसरी कुंडलिनी के रूप में अपने उन्हीं भौतिक गुरु की मानसिक छवि को अपनी अद्वैतपूर्ण जीवन शैली के साथ समृद्ध किया, और पहली देवीरानी (परोक्ष रूप से यौनसम्बन्धी) की बार-बार याद की गई छवि के साथ अपने गुरु की छवि का संबंध जुड़ा होने के कारण, गुरु की छवि भी काफी समृद्ध हो गई, लगभग 15 वर्षों में। फिर आखिर में, प्रेमयोगी वज्र ने अपनी दूसरी कंसोर्ट / प्रेमिका (वैवाहिक) के साथ सीधे / प्रत्यक्ष यौनतंत्र की मदद से अंतिम जागृति के लिए उस कुंडलिनी को उठाया, जैसा कि उपरोक्त होमपेज पर ही संक्षेप में और “love story of a yogi-7” में विस्तार से वर्णित है।