Importance of Body Chakras in Kundalini Yoga – A Scientific Discussion / कुण्डलिनीयोग में शारीरिक चक्रों का महत्त्व- एक वैज्ञानिक विवेचना

Importance of Body Chakras in Kundalini Yoga – A Scientific Discussion

Giving the importance of equality to all the chakras in the Kundalini Yoga during everyday life, Kundalini visualization / visualization is done on all the chakras turn by turn. Its advantage is that in some parts of the body the Kundalini comes into the grip. In fact, the Kundalini is associated with the chakras / parts of the body. When the activity of a chakra increases, then the blissful expression of the Kundalini, which is being visualized there upon, also increases. The activity of the body depends solely on physical blood circulation. When blood circulation increases on a chakra, then the activity of that chakra also increases. The total blood circulation of the body remains the same, only in different parts it keeps on changing only. If blood circulation increases on one chakra, then it is naturally decreased on any other chakra. By brain work, blood circulation increases in the brain, so during that time the Kundalini-visualization in the brain-chakra / Agya chakra is very simple and successful. Speech, writing, reading, colloquial etc. increases the circulation in the throat, thereby making the Kundalini’s visualization simple and effective on there / in the throat chakra / Vishuddhi chakra. When the feeling of emotions in mind increases the blood circulation in the heart, then due to visualization in the heart centre / heart chakra / Anahata Chakra, the Kundalini becomes more ignited. When the digestive tract is powerful, then there is increased blood circulation in the abdomen / naval area. Therefore visualization in naval chakra / Manipura Chakra at that time is of greater benefit. The effectiveness of sexually energizing sexual activity, the proper health of the waste-emitting organs and other physical (especially hands and feet related) actions increases the blood circulation on the sexual chakras / swadhishthana and muladhara chakra, therefore there is more activity in the Kundalini. That is why at that time those two chakras seem to get more attention.

In the household life, especially in duality and ignorance, all chakras cannot be functioning simultaneously and in common, because sometimes the tasks related to a particular area have to be emphasized, then sometimes tasks related to any other area. Therefore, in a single sitting of Kundalini Yoga, visualization of Kundalini is done on all the chakras turn by turn. Then the influential chakra itself comes under the purview of visualization, which has a greater sense of visualization-benefit. By this, visualization-gains gradually become accumulated in Kundalini Jagran / awakening. On the contrary, there is no cosmic responsibility for the ascetic-yogi or devoted yogi, so that he can easily keep stirring the activity for a long time on a particular chakra. Therefore, it is said that visualization should be done on the same chakra for a long time and then should move towards the next chakra, it has been said only for such a dedicated yogi. He is saved by a slight loss of visualization caused by chakra-change, nothing special. By continuously meditating on the same chakra, it can increase blood circulation to that chakra for a long time, because visualization on any part of the body increases blood pressures there itself. This is also the principle of spiritual healing. When someone entangled in the worldly life, by leaving his chakra, which is actively working with its naturalness, takes a forceful attention on any other chakra, then according to that need, the blood of the functioning chakra runs towards that chaotic chakra. From that necessity, the natural function of the functioning chakra will be affected by it less or more. Therefore, in the Yogasadhana / meditation-sitting under such busy worldly circumstances, the dhyana / attention should be applied on the same chakra which is easily or spontaneously meditative. Do not be forced to coax with other dormant chakras. By the way, by keeping the attention of all the chakras in the same way, all parts of the body are equally healthy; Life becomes balanced and moves forward in every field. By focusing continuously on a particular chakra, specializations can be gained quickly in the related areas of that chakra, although life can become unbalanced, and the health of the areas related to other body chakras can be questioned.

This type of perfect physical and mental balance becomes available from the advaita / non duality of Puranas / Aryan personified natural stories and through the Advaita obtained from the physiology / body science philosophy. This is because, because of non duality all things look alike, and there is no special attachment to a particular area. From this, the person meditates on all parts of his individual body as well as on the universal body, because the worldly creation (related to the world) and the individual creation (body-related) are both interconnected according to “yatpinde tatbramhaande”. The control over one is reflected itself as the control over the second one too in the same manner and same extent. From this non duality practice also, kundalini develops itself gradually and with less special efforts.

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कुण्डलिनीयोग में शारीरिक चक्रों का महत्त्व- एक वैज्ञानिक विवेचना

प्रतिदिन के लौकिक जीवन के दौरान जो कुण्डलिनीयोग किया जाता है, उसमें सभी चक्रों को बराबरी का महत्त्व देते हुए सभी चक्रों पर बारी-२ से कुण्डलिनी का ध्यान किया जाता है। इसका यह फ़ायदा होता है कि शरीर के किसी न किसी भाग में कुण्डलिनी पकड़ में आ ही जाती है। वास्तव में कुण्डलिनी शरीर के चक्रों / भागों से जुड़ी होती है। जब किसी चक्र की क्रियाशीलता बढ़ती है, तब उस पर ध्यायित की जाने वाली कुण्डलिनी की आनंदमयी अभिव्यक्ति भी बढ़ जाती है। शरीर की क्रियाशीलता शारीरिक रक्तसंचार पर ही तो निर्भर करती है। जब किसी चक्र पर रक्तसंचार बढ़ जाता है, तब उस चक्र की क्रियाशीलता भी बढ़ जाती है। शरीर का कुल रक्तसंचार तो एकसमान ही रहता है, केवल विभिन्न भागों में उसकी मात्रा घटती-बढ़ती रहती है। यदि एक चक्र पर रक्तसंचार बढ़ता है, तो किसी दूसरे चक्र पर स्वाभाविक रूप से घट जाता है। दिमागी कार्य से दिमाग में रक्तसंचार बढ़ जाता है, अतः उसके दौरान मस्तिष्क-चक्र / आज्ञा चक्र में कुण्डलिनी-ध्यान अधिक सरल व सफल होता है। भाषण, लेखन, पठन, बोलचाल आदि से गले में रक्तसंचार बढ़ जाता है, जिससे वहां / ग्रीवाचक्र / विशुद्धिचक्र पर कुण्डलिनी का ध्यान सरल व प्रभावशाली हो जाता है। मन में भावनाओं के उमड़ने के समय ह्रदय में रक्तसंचार बढ़ जाता है, जिससे उस समय हृदयक्षेत्र / हृदयचक्र / अनाहत चक्र में ध्यान करने से कुण्डलिनी अधिक प्रज्वलित हो जाती है। जब पाचनक्रिया शक्तिशाली होती है, तब उदरक्षेत्र / नाभिक्षेत्र में रक्तसंचार बढ़ा हुआ होता है। इसलिए उस समय नाभिचक्र / मणिपुरचक्र में ध्यान करने से अधिक लाभ होता है। यौनशक्तिवर्धक यौनक्रियाशीलता से, अपशिष्ट-उत्सर्जक अंगों के उत्तम स्वास्थ्य से व अन्य शारीरिक (विशेषतः हस्तपादाश्रित) कर्मों से यौनचक्र / स्वाधिष्ठानचक्र व मूलाधार चक्र पर रक्तसंचार बढ़ा हुआ होता है, अतः वहां पर कुण्डलिनी अधिक क्रियाशील होती है। इसलिए उस समय उन दोनों चक्रों पर अधिक अच्छी तरह से ध्यान लगता है।

गृहस्थजीवन में, विशेषतः द्वैत व अज्ञान से भरे गृहस्थजीवन में सभी चक्र एकसाथ व एकसमान रूप से क्रियाशील नहीं रह सकते, क्योंकि कभी किसी क्षेत्र से सम्बंधित कार्यों पर अधिक जोर देना पड़ता है, तो कभी किसी अन्य क्षेत्र से सम्बंधित कार्यों पर। इसलिए कुण्डलिनीयोग की एक अकेली बैठक में सभी चक्रों पर बारी-२ से कुण्डलिनी का ध्यान किया जाता है। उससे प्रभावशाली चक्र स्वयं ही ध्यान के दायरे में आ जाता है, जिससे ध्यान-लाभ की अधिक अनुभूति होती है। इससे ध्यान-लाभ धीरे-२ इकट्ठा होता हुआ कुण्डलिनीजागरण में परिणत हो जाता है। इसके विपरीत संन्यासी-योगी या समर्पित योगी के लिए कोई लौकिक उत्तरदायित्व नहीं होता, जिससे वह एक विशेष चक्र पर लम्बे समय तक क्रियाशीलता को आसानी से बना कर रख सकता है। इसलिए जो यह कहा गया है कि एक ही चक्र पर लम्बे समय तक ध्यान करके उसे जगा देना चाहिए और फिर अगले चक्र की ओर रुख करना चाहिए, वह ऐसे ही समर्पित योगी के लिए ही कहा गया है। वह चक्र-बदलाव से उत्पन्न थोड़ी सी ध्यान-हानि से बच जाता है, अन्य विशेष कुछ नहीं। वह एक ही चक्र पर निरंतर ध्यान लगा कर वहां पर रक्तसंचार को लम्बे समय तक बढ़ा कर रख सकता है, क्योंकि शरीर के किसी भाग पर ध्यान लगाने से वहां पर रक्तसंचार स्वयं ही बढ़ जाता है। यही स्पिरिचुअल हीलिंग / आध्यात्मिक उपचार का सिद्धांत भी है। जब सांसारिकता में उलझा हुआ कोई व्यक्ति स्वाभाविकता से क्रियाशील अपने चक्र को छोड़कर किसी अन्य चक्र पर जोर-जबरदस्ती से ध्यान लगाता है, तब उस आवश्यकतानुसार क्रियाशील चक्र का रक्त उस ध्यायित किए जा रहे चक्र की ओर दौड़ पड़ता है। उससे उस आवश्यकतानुसार क्रियाशील चक्र के स्वाभाविक कार्य तो कम या अधिक रूप से दुष्प्रभावित होंगे ही। इसलिए वैसी व्यस्ततापूर्ण सांसारिक परिस्थितियों के अंतर्गत की जाने वाली योगसाधना-बैठक में जिस चक्र पर ध्यान आसानी से या स्वयं ही लग रहा हो, वहीँ पर लगने देना चाहिए। अन्य सुप्त चक्रों के साथ अधिक जोर-जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए। वैसे तो सभी चक्रों पर समान रूप से ध्यान देने से ही शरीर के सभी अंग समान रूप से स्वस्थ रहते हैं; जीवन संतुलित बनता है और हरेक क्षेत्र में आगे बढ़ता है। एक विशेष चक्र पर ही निरंतर ध्यान देने से उस चक्र से सम्बंधित क्षेत्रों में शीघ्रता से विशेषज्ञता तो प्राप्त हो सकती है, यद्यपि उससे जीवन असंतुलित बन सकता है, और शरीर के अन्य चक्रों से सम्बंधित क्षेत्रों के स्वास्थ्य पर प्रश्नचिन्ह लग सकता है। अद्वैतमय जीवन से भी कुण्डलिनी स्वयं ही व बिना किसी विशेष प्रयास के धीरे-२ विकसित होने लगती है।

इस प्रकार का उत्तम शारीरिक व मानसिक संतुलन पुराणों से व शरीरविज्ञान दर्शन से प्राप्त अद्वैतभाव से भी उपलब्ध हो जाता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि अद्वैतभाव से सभी कुछ समान जैसा लगता है, और किसी विशेष क्षेत्र से विशेष लगाव या आसक्ति नहीं रहती। इससे व्यक्ति व्यष्टि और समष्टि के सभी अंगों पर समान रूप से ध्यान देता है, क्योंकि समष्टि (विश्व-सम्बंधित) व व्यष्टि (शरीर-सम्बंधित), दोनों आपस में जुड़े हुए हैं, “यतपिण्डे तत ब्रम्हांडे” के अनुसार। एक के भी नियंत्रण से दूसरा स्वयं ही उसी के अनुसार नियंत्रित हो जाता है।

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BURNING RAVANA- DEEP SECRET HIDDEN INSIDE / रावण दहन- एक रहस्यात्मक प्रथा

It is Dushehara festival of Hindus / descendants of Aryans today. Ravana, a human-rascal of Ramayana-period is burnt on this day. Many people see it superficially and think that it is merely a ancient happening. However the truth is that it has deep meaning inside. I do not rule out the truth of the ancient story, but I see more truth in the collateral non dual- tantric message that it gives. Actually, the entire nature is present in the form of a beautiful woman. Whatever there is happening inside the body of a woman, that all is happening in a similar way inside the nature too, nothing else. It is a tantric and vedic truth thad has been further proved scientifically by Premyogi vajra in his tantric book, Shareeravigyaan darshan. Ignorant people exploit this nature in a bad manner and with a bad attitude. God Rama always in union with his nature can not tolerate this and thus never allow such people to gain self realization to enter his abode. Therefore such people are burnt by physical fire on there demise for they being deeply identified with their physical bodies. So the message is clear that love the nature and its creatures. The entire Aryan civilization is based on this fundamental guideline. God can never be approached directly without satisfying his nature. It is a deep tantric secret that also demystifies Kundalini more or less. That is why nature-worship is so much abundant in Aryan lifestyle. Today, the world is in great danger. The nature has been over exploited by the human. The result of it is global warming. If it continues, there would be disasters in every field of life. Beautiful Venice city would be submerged fully inside the ocean. So all the coastal areas. Therefore it is right time now to adopt Aryan practices and to worship the nature like those. May be the nature along with her consort, God become pleased and give us the right direction to follow, and also dilute down the disasters little or more.

The ancient story that Ravana had stolen Seetaa, the wife of Lord Rama is a metaphor type. The one disrespecting woman or nature can not please the God. Hanuman, the monkey god and servant of Seetaa is the metaphor of creatures inside the nature. He helped god Rama means that all creatures except of willfully ignorant human beings are innocents. Rama took help of Hanuman to save Seetaa means that when nature is exploited by human, then invisible God makes the other creatures outnumbered thus creating problems for selfish human beings. In this way, God teaches a good lesson to human and so he starts saving the nature. It is entirely similarly seen today, what was happening there thousands of years ago, in the Ramayana-age .

So very-2 happy Dushehara to all of you.

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आज आर्यों के वंशजों / हिन्दुओं  का त्यौहार दशहरा है। रावण, रामायण काल ​​का मानव-राक्षस इस दिन जला दिया जाता है। बहुत से लोग इसे सतही रूप से देखते हैं, और सोचते हैं कि यह केवल एक प्राचीन घटना है। हालांकि सच यह है कि इसमें गहरा अर्थ छुपा हुआ है। मैं प्राचीन कहानी की सच्चाई से इंकार नहीं करता हूं, लेकिन मैं इसे संपार्श्विक अद्वैत-तंत्र के उस संदेश के रूप में अधिक सत्य देखता हूं, जो यह देता है। असल में, पूरी प्रकृति एक सुंदर महिला के रूप में मौजूद है। किसी भी महिला के शरीर में जो भी हो रहा है, वह सब प्रकृति के अंदर भी इसी तरह से हो रहा है, और कुछ नहीं। यह एक तांत्रिक और वैदिक सत्य है, जिसे प्रेमयोगी वज्र ने अपनी तांत्रिक पुस्तक, शरीरविज्ञान दर्शन में वैज्ञानिक रूप से बखूबी साबित कर दिया है। अज्ञानी लोग इस प्रकृति का खराब तरीके से और बुरे व्यवहार के साथ शोषण करते हैं। भगवान राम जो हमेशा अपनी प्रकृति के साथ मिलकर रहते हैं, वे इसे बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं, और इस तरह ऐसे लोगों को कभी भी अपने निवास में प्रवेश करने के लिए आत्मज्ञान प्राप्त करने की इजाजत नहीं देते हैं। इसलिए ऐसे लोगों को अंत में भौतिक आग से जला दिया जाता है, क्योंकि वे अपने भौतिक निकायों / शरीरों के साथ गहराई से / आसक्ति से चिपके होते हैं। तो संदेश स्पष्ट है कि प्रकृति और उसके प्राणियों से प्यार करना चाहिए। संपूर्ण आर्य सभ्यता इस मौलिक दिशानिर्देश पर ही आधारित है। भगवान को उनकी प्रकृति को संतुष्ट किए बिना, सीधे प्राप्त नहीं किया जा सकता है। यह एक गहरा तांत्रिक रहस्य है, जो कुण्डलिनी को भी रहस्योद्घाटित करता है। यही कारण है कि आर्य जीवनशैली में प्रकृति-पूजा इतनी प्रचुर मात्रा में है। आज दुनिया बहुत खतरे में है। प्रकृति का मानव द्वारा शोषण किया गया है। इसका परिणाम ग्लोबल वार्मिंग है। यदि यह जारी रहता है, तो जीवन के हर क्षेत्र में आपदाएं होंगी। सुंदर वेनिस शहर समुद्र के अंदर पूरी तरह से डूब जाएगा। सभी तटीय क्षेत्रों के साथ ऐसा ही होगा। इसलिए आर्यन प्रथाओं को अपनाने और उनकी तरह प्रकृति की पूजा करने के लिए यह सही समय है। हो सकता है कि प्रकृति व उसके सदैव साथ रहने वाले उसके प्रेमी, भगवान प्रसन्न हो जाएं, और हमें प्रकृति को बचाने में सही दिशा-निर्देशन प्रदान करें, और आपदाओं से भी थोड़ी राहत दे दें।

प्राचीन कहानी कि रावण ने भगवान राम की पत्नी सीता को चुरा लिया था, एक रूपक प्रकार की है। जो महिला या प्रकृति का अपमान करता है, वह भगवान को  प्रसन्न नहीं कर सकता है। हनुमान, बंदर-देवता और सीता का नौकर, प्रकृति के भीतर प्राणियों का रूपक है। उसने भगवान राम की मदद की, इसका अर्थ है कि जानबूझकर अनजान बने मनुष्यों को छोड़कर सभी प्राणी निर्दोष हैं। राम ने सीता को बचाने के लिए हनुमान की मदद ली, इसका मतलब है कि जब मनुष्य द्वारा प्रकृति का शोषण किया जाता है, तो अदृश्य भगवान अन्य प्राणियों को अधिक से अधिक बनाता है, जिससे स्वाभाविक ही मनुष्यों के लिए अधिक से अधिक समस्याएं पैदा हो जाती हैं। उसे उससे अच्छा सबक मिलता है, और वह प्रकृति को बचाने लग जाता है। यह पूरी तरह से आज भी वैसा ही देखा जा रहा है, जैसा कि हजारों साल पूर्व के रामायण-काल में घटित हो रहा था।

इसलिए आप सभी को दशहरे की हार्दिक शुभकामनाएं।

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Mahishasur mardini (goddess, killer of demon mahishasur)-महिषासुर मर्दिनी

Mahishasur mardini (कृपया इस पोस्ट को हिंदी में पढ़ने के लिए नीचे ब्राऊस करें या इस वाक्य के लिंक पर क्लिक करें)

Mahishasur was a great demon in prehistoric ages. He was having nature and appearance that of a male Buffalo. He used to appear as a divine and smart human being or as a male Buffalo as per his willingness. His army and followers of Buffalo race were too strong to be defeated even by the gods / demigods / devatas. He had captured all the territories including the divine and astral ones. He was torturing everyone. Ordinary people went to the doorsteps of gods, but they were unable to help those and were themselves too badly affected for the demon was not allowing them to work for the development of human race, most intelligent of all the creatures. Ultimately all gods became gathered and went to the doorstep of super god Bramha. He along with those went to another super god Shiva. He finding himself unable to help those went to last and topmost super god Vishnu along with them. Vishnu told them the importance of unity. All gods and super gods expressed out their individual powers. Those all individual powers were then united together and came out in the form of a super power in the appearance of a too beautiful, powerful and divine goddess called as Durga. She warned the demon many times but he took her lightly. Ultimately she killed him thus opening the way for the development of humanity and divinity.
This is a classical pauranik story of Hindu religious literature. We can take it into original scientific form. Mahishasur demon was the prehistoric dinosaur kingdom when Buffalo-mouthed reptilians used to roam the earth, hindering the human evolution by the natural elements / gods. No separate / lonely natural element was able to detain those. So in embodied / body less human spirits went to the personified heads of those natural elements / gods to help them for their embodied expression. Those natural elements ultimately joined together and made a most favorable condition for their destruction in the form of that scientifically proved drastic and prehistoric meteorite-hit that pushed dinosaurs to extinction. The flashing light of that meteorite was considered as the most beautiful goddess that was made through the so rare incidence of union of all of the favorable climatic conditions as union of individual powers of all the climate controlling natural elements / gods. May be that small meteorite-hits also occured before that drastic one as the signs of warning from the goddess.
This proves that ancient pauranik stories are just only the personified descriptions of the real and scientific world around us. This has only been done with a motive to produce functional non duality that leads to kundalini awakening with sustained practice. So these puranas should be regularly read, understood and that’s non dual attitude attached with one’s own individual life.
Premyogi vajra has made a Tantric book in Hindi, in which he has described universe existing inside our own body in a Purana-style. He has taken help of medical science for this. He has correlated everything happening inside our own human body with our gross social life. It’s already proved that whatever there is inside the universe, that everything is present inside our own body. His book appears more interesting than Purana today for he has written everything that’s scientifically proved, so in an easy form to comprehend. I have myself read it and found it suddenly transforming and spiritually elevating. It’s an extraordinary, incomparable and wonderful book. Detailed description of this book is available here at-

The non dual, tantric, Kundalini yoga technique (the real meditation), and spiritual Enlightenment explained, verified, clarified, simplified, justified, taught, guided, defined, displayed, summarized, and proved in an experiential, philosophical, practical, humanely, scientific and logical way best over

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महिषासुर प्रागैतिहासिक युग में एक महान दैत्य था। वह पुरुष बफेलो / भैंसे के जैसे स्वभाव व उसीकी जैसी शक्ल का था। वह अपनी इच्छा के अनुसार कभी एक दिव्य और स्मार्ट / सुन्दर इंसान और कभी एक भैंसे के रूप में दिखाई देता था। भैंस-वंश की उसकी सेना और उसके अनुयायी देवताओं द्वारा भी पराजित होने के लिए नहीं बने थे। उन्होंने दिव्य और सूक्ष्म लोकों सहित सभी क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया था। वह महिषराज हर किसी को यातना दे रहा था। साधारण लोग देवताओं के दरवाजे पर सहायता के लिए गए, लेकिन वे उन लोगों की मदद करने में असमर्थ थे और उन राक्षसों से खुद भी बहुत बुरी तरह प्रभावित हुए थे, जिससे उन्हें उस मानव जाति के विकास के लिए काम करने की इजाजत नहीं मिल पा रही थी, जो सभी प्राणियों में सबसे अधिक बुद्धिमान होती है। आखिरकार सभी देवता इकट्ठे हो गए और सुपर गॉड / महा देवता ब्रह्मा के द्वार पर गए। वे उनके साथ एक और सुपर भगवान शिव के पास गए। उन्होंने भी खुद को उन लोगों व देवताओं की सहायता करने में असमर्थ पाया, अतः वे भी उनके साथ अंतिम और शीर्ष सुपर भगवान विष्णु के पास चले गए। विष्णु ने उन्हें एकता के महत्व के बारे में बताया। सभी देवताओं और सुपर देवताओं ने अपनी व्यक्तिगत शक्तियों को अभिव्यक्त किया। फिर उन सभी व्यक्तिगत शक्तियों को एक साथ एकजुट किया गया, जिससे एक बहुत ही शक्तिशाली, सुन्दर, मनुष्याकृत और दिव्य देवी के रूप में एक सुपर पावर उत्पन्न हुई, जिसे दुर्गा कहा जाता था। उसने राक्षस को कई बार चेतावनी दी लेकिन उसने उसे हल्के में लिया। आखिरकार उसने मानवता और दिव्यता के विकास के लिए रास्ता खोलने के लिए उसे मार डाला।

यह हिंदू धार्मिक साहित्य की शास्त्रीय पौराणिक कहानी है। हम इसे मूल वैज्ञानिक रूप में ले सकते हैं। महिषासुर राक्षस का साम्राज्य प्रागैतिहासिक डायनासौर का साम्राज्य ही था, जब महिषमुख सरीसृप पृथ्वी के चारों ओर घूमते थे, और प्राकृतिक तत्वों / देवताओं द्वारा मानव विकास में बाधा डालते थे। कोई अकेला प्राकृतिक तत्व उनको रोकने में सक्षम नहीं था। तो देहरहित मानव आत्माओं ने उन प्राकृतिक तत्वों के मनुष्याकृत प्रमुखों / देवताओं से अपनी मानवीय अभिव्यक्ति के लिए सहायता माँगी। वे सभी प्राकृतिक तत्व / जल, वायु, अग्नि आदि आखिरकार एक साथ शामिल हो गए और वैज्ञानिक रूप से साबित प्रागैतिहासिककाल की कठोर उल्कापिंड-टक्कर के रूप में उन्होंने उन दैत्यों के विनाश के लिए सबसे अनुकूल स्थितियां बनाईं, जो अंततः डायनासोर को विलुप्त कर पाईं। उस उल्कापिंड की चमकती रोशनी को सबसे खूबसूरत / दिव्य व शक्तिशाली देवी माना गया, जो सभी अनुकूल जलवायु-स्थितियों के संघ की इतनी दुर्लभ घटना के माध्यम से अंतरिक्ष से धरती की ओर गिराया गया था। वास्तव में  ऐसी अति दुर्लभ घटना करोड़ों वर्षों में, सभी जलवायु नियंत्रक प्राकृतिक तत्वों / देवताओं की व्यक्तिगत शक्तियों के संघ से ही होती है। हो सकता है कि उससे पहले भी छोटे-२ उल्कापात हुए हों, जो उस दैत्य को देवी के द्वारा दी गई अंतिम चेतावनी के रूप में माने जा रहे हों।

यह साबित करता है कि प्राचीन पौराणिक कहानियां हमारे आस-पास की वास्तविक और वैज्ञानिक दुनिया के केवल personified / मनुष्याकृत वर्णन ही हैं। ऐसा केवल कार्यात्मक अद्वैत को पैदा करने के उद्देश्य से किया गया है, जो निरंतर अभ्यास के साथ कुंडलिनी जागृति को उत्पन्न करता है। इसलिए इन पुराणों को नियमित रूप से पढ़ा जाना चाहिए, समझ लिया जाना चाहिए और इनसे उत्पन्न अद्वैत-दृष्टिकोण को अपने वर्तमान के अपने व्यक्तिगत जीवन से जोड़ा जाना चाहिए।

प्रेमयोगी वज्र ने हिंदी में एक तांत्रिक पुस्तक बनाई है, जिसमें उन्होंने पुराण-शैली में अपने शरीर के अंदर मौजूद ब्रह्मांड का वर्णन किया है। उन्होंने इसके लिए चिकित्सा विज्ञान की मदद ली है। उन्होंने अपने स्वयं के मानव शरीर के भीतर होने वाली हर चीज को हमारे अपने सकल सामाजिक जीवन के साथ सहसंबंधित किया है। यह पहले ही साबित होया हुआ है कि ब्रह्मांड के अंदर जो कुछ भी है, वह सब हमारे अपने शरीर के अंदर भी वैसा ही मौजूद है। उनकी आधुनिक पुस्तक प्राचीन पुराण की तुलना में अधिक दिलचस्प व व्यावहारिक प्रतीत होती है, क्योंकि उन्होंने वही सब कुछ लिखा है जो वैज्ञानिक रूप से सिद्ध है और समझने में बहुत आसान है। मैंने खुद इसे पढ़ लिया है और इससे मैंने अपने आपको अचानक ही रूपांतरित सा व आध्यात्मिक रूप से उन्नत सा महसूस किया। यह एक आश्चर्यजनक, अनुपम व अविस्मरणीय पुस्तक है। इस पुस्तक का विस्तृत विवरण यहां उपलब्ध है-

अद्वैतपूर्ण, तांत्रिक, कुंडलिनी योग तकनीक (असली ध्यान), और आत्मज्ञान को एक अनुभवपूर्ण, दार्शनिक, व्यावहारिक, मानवीय, वैज्ञानिक और तार्किक तरीके से; सबसे अच्छे रूप में समझने योग्य, सत्यापित, स्पष्टीकृत, सरलीकृत, औचित्यीकृत, सीखने योग्य, निर्देशित, परिभाषित, प्रदर्शित, संक्षिप्त, और प्रमाणित किया गया है

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Happy janamaashtami/जन्माष्टमी पर्व की बधाइयाँ

Geetaa philosophy dictated by Lord Krishna is a wonderful treatise of worldwide spirituality. Every religion, philosophy, spirituality seems to be emerging out of it. It’s Karmyoga is an amazing gift to the world. Today, it’s most necessary for people are becoming more and more lethargic, workless and paranoiac/depressed due to today’s mechanized work style. Many types of strange diseases like diabetes, heart ailments, thyroid ailments etc. are gaining their strong foot hold.

Actually, karmyoga teaches us how to be busy physically and mentally along with the development of spirituality round the clock. It helps in achieving worldly as well as spiritual goals, both together in a quickest possible time. Karmayoga is equal to tantra, but with additional sexual element added in tantra for super fast spiritual success. Lord Krishna was also a tantric. Keeping so many gopa-girls happy and even arranging raas in the lonely night with too many of them isn’t possible without tantra.

In karmyoga/tantra, one need to maintain non duality/mental awareness every moment. This is done through practices of vedas-puranas, shareervigyaan darshan/body science philosophy or any other suitable means. It’s a psychic principle that non duality, kundalini and bliss remains always together and enrich each other. So, there are four options for karmayogi. Either enrich kundalini with Kundalini yoga or enrich non duality through philosophical contemplation or through increasing his bliss through humanely relationships or all of these. Last is the best for it incorporates all the spiritual fundamentals. For detailed experiential information, please visit this website.

श्रीकृष्ण के द्वारा उच्चारित गीता दुनियाभर में आध्यात्मिकता का एक अद्वितीय खजाना है। प्रत्येक प्रकार का धर्म, दर्शन, आध्यात्मिक जीवन इससे निकलता हुआ प्रतीत होता है। इसका कर्मयोग दुनिया के लिए एक अद्भुत तोहफा है। आजकल यह सर्वाधिक प्रासंगिक है, क्योंकि आजकल के मशीनी युग में लोग सुस्त, कर्महीन, आलसी व अवसादग्रस्त से हो रहे हैं, जिसकी वजह से मधुमेह, उच्च रक्तचाप, उच्च कोलेस्ट्रॉल आदि विचित्र बीमारियां बढ़ रही हैं।

वास्तव में, कर्मयोग हमें सिखाता है कि कैसे हमने शारीरिक व मानसिक रूप, दोनों से दिन-रात व्यस्त रहना है, और साथ में अवसाद खत्म करके आध्यात्मिक विकास भी तीव्रतम गति से करना है। कर्मयोग से सर्वाधिक शीघ्रता से भौतिक व आध्यात्मिक विकास, दोनों हो जाते हैं। कर्मयोग व तन्त्र एक ही चीज है, यद्यपि तंत्र में अतिरिक्त भाग के रूप में यौनसंबंध भी जुड़ा होता है, ताकि आध्यात्मिक विकास तीव्रतम वेग से हो जाए।

अद्वैत, कुंडलिनी व आनंद , तीनों एकसाथ रहते हैं, और एक -दूसरे को बढ़ाते रहते हैं। इसलिए  आध्यात्मिक विकास की चार विधियाँ मुख्य है। कुंडलिनी योग से कुंडलिनी को बढ़ाओ या वेद-पुराणों, शरीरविज्ञान दर्शन आदि उचित अद्वैतकारी दर्शनों के अभ्यास से निरंतर अद्वैत को धारण किया जाए या मानवीय व्यवहारों से आनंद बढ़ाया जाए या तीनों प्रयासों को एकसाथ किया जाए। अन्तिम विधि सर्वाधिक बलवान है, क्योंकि इसके अंदर अध्यात्म के सभी मूलभूत सिद्धांत हैं।

वास्तव में भगवान श्रीकृष्ण एक तांत्रिक भी थे। इतनी सारी गोप कन्याओं को खुश रखना, व उनमें से अनेकों के साथ रात्रि के एकांत में रास रचाना तंत्र ज्ञान के बिना संभव नहीं है।

अतरिक्त व अनुभवात्मक जानकारी के लिए कृपया इस वेबसाइट को प्रारंभ से व विस्तार से पढ़ें।

Non duality and Kundalini reinforces each other/अद्वैतभाव व कुंडलिनी एक दूसरे को पुष्ट करते हैं।

Bliss originates from non duality. Kundalini awakening is semifinal bliss. Enlightenment is final/supreme bliss. Therefore, Kundalini awakening and enlightenment, both proves to be the states of semifinal and final non duality respectively. Morning Kundalini yoga strengthens Kundalini. That in turn strengthens non duality. That in turn strengthens bliss. Similar system works after evening Kundalini yoga too, so tiredness fade away immediately. Similarly, Non dual action strengthens kundalini and bliss, both together for all these three live together.

After his glimpse enlightenment, Premyogi vajra had got profound non dual attitude. So Kundalini and bliss also used to accompany that powerfully along with.

आनंद अद्वैत से उत्पन्न होता है। कुंडलिनी जागरण में उच्चतम के निकट का आनंद अनुभव होता है। आत्मज्ञान में उच्चतम आनंद की स्थिति होती है। इससे सिद्ध होता है कि कुंडलिनी जागरण लगभग उच्चतम अद्वैत से संपन्न होता है, और आत्मज्ञान पूर्णतया उच्चतम अद्वैत से सम्पन्न होता है। प्रातः कुण्डलिनी योग कुंडलिनी को पुष्ट करता है। कुंडलिनी फिर अद्वैत को पुष्ट करती है। अंत में अद्वैत आनंद को बढ़ाता है। सांयकाल के कुंडलिनी योग से भी इसी सिद्धांत से थकान दूर होती है। इसी तरह, अद्वैतमयी क्रियाकलाप कुंडलिनी व आनंद, दोनों को पुष्ट करते हैं, क्योंकि ये तीनों गुण साथ-२ रहते हैं।

अपने क्षणिकात्मज्ञान के बाद, उसके प्रभाव से प्रेमयोगी वज्र में असीम अद्वैत उत्पन्न हो गया था। इससे कुंडलिनी व आनंद, दोनों भी प्रचंड रूप से स्वयं ही उसके साथ रहते थे।

अटल जी को श्रद्धा सुमन/ Tribute to Atal ji

अटल जी की याद में कुछ पंक्तियाँ

मैं अटल जी के सम्मान में कुछ पंक्तियाँ लिखना चाहूंगा-

उठ जाग होनहार, प्रकाश हो या अंधकार।

बाँध तरकस पीठ पर, भर तीर में फुंकार।।

झुका दे शीश दोनों का, कर ना पाए फिर कभी भी वार।

उठ जाग होनहार, प्रकाश हो या अंधकार।।

यह कविता कुण्डलिनीयोग से भी स्वतः ही सम्बंधित प्रतीत होती है। यह कविता अज्ञानरूपी निद्रा में डूबे हुए एक आम साधारण मनुष्य से कहती है कि हे बहादुर मनुष्य, नींद से जाग जा और उठ खड़ा हो जा। तू डर मत, चाहे तेज रौशनी का माहौल हो या चाहे घनघोर अन्धकार ही क्यों न हो। इसका मतलब है कि तू प्रकाश व अन्धकार की परवाह न करते हुए दोनों को एक नजर से देख, अर्थात तू अद्वैतपूर्ण बन जा। बाँध तरकस पीठ पर का मतलब है कि तू कुण्डलिनीयोग साधना में जुट जा। उस साधना से जो चित्र-विचित्र विचार-संकल्प उसके मन में उभरेंगे, वे ही उस साधना रुपी तरकस के विभिन्न तीर होंगे। वह कुण्डलिनी साधना बैठकपूर्ण योग से भी की जा सकती है, और कर्मपूर्ण कर्मयोग से भी। फिर कविता कहती है कि भर तीर में फुंकार। इसका अर्थ है कि एक सबसे मजबूत व गुणसंपन्न मानसिक चित्र को तू कुण्डलिनी बना ले, और नित्य निरंतर उसका ध्यान करने लग जा। उससे वह कुण्डलिनी एक विषबुझे तीर की तरह प्रचंड हो जाएगी। “झुका दे शीश दोनों का” का अर्थ है कि उस प्रचंड कुण्डलिनी के आगे प्रकाश व अन्धकार दोनों निष्प्रभावी होने लग जाएंगे। कुण्डलिनी-जागरण से वे पूरी तरह से निष्प्रभावी हो जाएंगे, क्योंकि उस जागृत कुण्डलिनी में प्रकाश व अन्धकार दोनों के सभी उत्कृष्ट गुण विद्यमान होंगे। ऐसा इसलिए होगा क्योंकि वह परम प्रकाशमान कुण्डलिनी साधक को अपनी आत्मा से अभिन्न प्रतीत होगी। पूर्णतः निष्प्रभावी होने पर वे दोनों कभी वार नहीं कर पाएंगे, क्योंकि फिर उन दोनों के किसी भी रूप में साधक के मन में कभी आसक्ति उत्पन्न नहीं होगी।

Tribute in the memory of Atal ji

Rise up brave, whether it is light or dark grave;

Tie arrow-box on the back, fill up hiss to that pack.

Make bow down heads of both, could never then hit when you be in sloth;

Rise up brave, whether it is light or dark grave. 

This poem seems to be related to Kundalini Yoga itself. This poem says to an spiritually ignorant sleepy man means a  common man, “O brave man, wake up from sleep and rise up!” Do not be afraid, whether there is a bright light environment or a dark darkness. This means that if you do not care light and darkness, watch them both at a glance, that is, you become untainted. On the back, tie up arrow box means that you will get involved in cultivation of Kundalinioga. The painting / different ideas / thoughts that arise in his mind from that sadhana / meditation will be different arrows of that technique. The Kundalini cult can also be done through sitting yoga ie. full yoga, and also through action-yoga / karmayoga. Then the poem says that apply poison to the arrow to make that a hissing serpent. This means that you make a most qualified and beautiful mental picture as your Kundalini, and always start meditating / concentrating on it or visualizing it. From that, the Kundalini will be powerful like a poisoned arrow. “make bow down heads” means that both the light and the dark will appear to be neutral in front of that huge and all light full kundalini. With Kundalini-Jagaran / awakening, they will become completely neutral, because in that awakening of the Kundalini, all the excellent qualities of light and darkness will exist. This will be because that ultimate luminous Kundalini  will appear to be the integral to seeker’s soul. If they both are completely neutral, they will never be able to fight, because then in any form of both of them the attachment will never be generated in the mind of that seeker.


Yoga versus Religious extremism- योग और धार्मिक कट्टरता

Yoga versus Religious extremism (हिंदी में पढ़ने के लिए कृपया पोस्ट को नीचे की तरफ ब्राऊज करें)

I think, science became developed spontaneously to save the world from the religious extremism. People died of religious cause were born as advanced people in their next birth. The feeling of insecurity remained in those as such due to the long lasting effect of great agony of their previous birth. So there mind was itself diverted towards advanced weaponry for their self protection. There appears enough declines in the massacres on the basis of religion after the science took hold of its foot. People became too busy in their own business/work and there was no extra time/stamina to think of these things too seriously enough. Advanced warfare technologies became developed to take control of the outnumbered and frenzied religious mobs/religion driven dreadful warriors by the handful of security forces. But unfortunately those warfare technologies were not controlled in a sensible way, that resulted in world wars, other regional conflicts, their pass over to the terrorists/dictators/religiously driven warriors and insurgents(external link/quora); thus defying the main and sole purpose of the warfare technologies to save the humanity. Religious extremism/radicalism/intolerance is the so good example of the dualism/non spiritualism. Only Yoga can save the world from the religious extremism/intolerance.

Actually, Yoga and the non dual lifestyle, both nourish kundalini in a similar way. Premyogi vajra experienced all of it practically. He is a mystic man whose mystic experiences including his concluding vision can be read at  Mystic Premyogi vajra and his divine love story can be read at  Love story of a Yogi . When he adopted a non dual attitude in his too busy physical as well as mental life style through the help of his home made tantric philosophy named SHAVID, he found his kundalini as too live and growing. Similarly, when he practiced kundalini yoga in his sedentary lifestyle, then also he found his kundalini even more live and growing. So it is self obvious that Yoga produces non duality through the medium of Kundalini for kundalini and non duality love to live together. We also know that people with Sedentary lifestyle or those lacking a lot of work to do are more violent/aggressive/agitated for their tons of energy have no way to go. They are more prone to be religiously intolerant/extremists/radicals. If they do Yoga, then they will become non dual and all the problems will be solved for the non duality is the best antidote for the religious poisoning that is the outgrowth of the duality filled lifestyle.

Why one wants to destroy other’s religion. Because he doesn’t like that. Why he doesn’t like that. Because he has duality in mind and considers his religion as better/different than that of others. Now the problem here is the double standard. He tries to destroy other’s religion in the name of God/non duality. God is nothing but non-duality, I think so. In this way, he performs the act that is full of duality while considering himself as non dual or man of god. If he is really non dual or a man of god, then what is the need of destroying anything for a non dual is happy with everything, just as Premyogi vajra became after his glimpse enlightenment. It means he is a liar/cheater, speaking/thinking something and doing the opposite thing. These types of people may become too dangerous for they may be too unpredictable. This clarifies the famous statement that the crimes covered with the religious blanket are too difficult to eradicate. Until this double standard is removed ant the religions are fully disconnected from the anti humanity, till then the organized and well planned crimes are difficult to prevent. So it is better to be a human than a religious one.

Gautama Buddha has well said even much  before the advent of the truly extremist religions, though near the silent  footprints of those through his intuitive guess of the future course that not accepting his wrong doings by one is much more dangerous than the wrong doings itself for the later one can improve himself but former one can never improve himself for he considers himself as if right.

योग और कट्टर धर्मिता

मुझे लगता है कि धार्मिक कट्टरपंथियों के धार्मिक उन्माद से दुनिया को बचाने के लिए विज्ञान स्वचालित रूप से विकसित हो गया था। धार्मिक कारणों से मरने वाले लोग अपने अगले जन्म में उन्नत लोगों के रूप में पैदा हुए थे। वह असुरक्षा की भावना उन लोगों में बनी रही, जो उनके पिछले जन्म की बड़ी पीड़ा के लंबे समय तक चलने वाले प्रभाव के कारण थी। तो फिर वहां प्रकृति द्वारा उनको अपने स्वयं के संरक्षण के लिए उन्नत हथियारों की तरफ मोड़ दिया गया था। विज्ञान के पैर पसारने के बाद धर्म के आधार पर नरसंहार में पर्याप्त गिरावट दिखाई देती है। क्योंकि लोग अपने व्यवसाय / काम में बहुत व्यस्त हो गए, और अमानवीय चीजों को बहुत गंभीरता से सोचने के लिए कोई अतिरिक्त समय / शक्ति नहीं थी। सुरक्षा बलों के द्वारा बड़े पैमाने पर और उन्मत्त धार्मिक मोब्स / हिंसक भीड़ के डरावने योद्धाओं को नियंत्रित करवाने के लिए उन्नत युद्ध तकनीकों का विकास किया गया। लेकिन दुर्भाग्यवश उन युद्ध तकनीकों को एक समझदार तरीके से नियंत्रित नहीं किया गया, जिसके परिणामस्वरूप विश्व युद्ध व अन्य क्षेत्रीय संघर्ष हुए; और आतंकवादियों / तानाशाहों / धार्मिक रूप से संचालित योद्धाओं और विद्रोहियों (बाहरी लिंक / क्वारा) तक उन तकनीकों को प्रसारित कर दिया गया। इस प्रकार मानवता को बचाने के लिए युद्ध-प्रौद्योगिकियों के मुख्य और एकमात्र उद्देश्य को काफी हद तक खारिज कर दिया गया। धार्मिक अतिवाद / कट्टरतावाद / असहिष्णुता आदि दुर्गुण द्वैतवाद / गैर-आध्यात्मिकता के इतने अच्छे उदाहरण हैं। केवल योग ही धार्मिक अतिवाद / असहिष्णुता से दुनिया को बचा सकता है।

असल में, योग और अद्वैतमयी जीवनशैली, दोनों कुंडलिनी को एक ही तरह से पोषित करते हैं। प्रेमयोगी वज्र ने इसे व्यावहारिक रूप से अनुभव किया। वह एक रहस्यवादी व्यक्ति है, जिसके रहस्यमय अनुभवों को उनके अंतिम दृष्टिकोण समेत इसी वेबसाईट के गृह-पृष्ठों पर पढ़ा जा सकता है, और उसकी दिव्य / योगिक प्रेम कहानी को “एक योगी की प्रेम कहानी / love story of a yogi” नामक वेबपृष्ठों पर पढ़ा जा सकता है। जब उन्होंने शविद / शरीरविज्ञान दर्शन नामक अपने घर के / स्वयंनिर्मित तांत्रिक दर्शन की मदद से अपने व्यस्त शारीरिक और मानसिक जीवन शैली में एक अद्वैतपूर्ण रवैया अपनाया, तो उन्होंने अपनी कुंडलिनी को भी जीवित और बढ़ते हुए पाया। इसी तरह, जब उन्होंने अपनी आसन्न / बैठकमयी जीवनशैली में कुंडलिनी योग का अभ्यास किया, तब भी उन्होंने अपनी कुंडलिनी को और भी जीवित और बढ़ते हुए पाया। तो यह स्वयं स्पष्ट है कि योग कुंडलिनी के माध्यम से अद्वैत को पैदा करता है, क्योंकि कुण्डलिनी और अद्वैत एक साथ रहने के लिए ललायित रहते हैं / एकसाथ रहते हैं। हम यह भी जानते हैं कि सेडेंटरी / बैठकपूर्ण लाइफस्टाइल / जीवनशैली वाले लोग या वे जो अनथक रूप से काम को प्राप्त करने में असमर्थ रहते हैं, उनके पास अपनी प्रचंड व संचित ऊर्जा को हिंसक / आक्रामक / उत्तेजित / अमानवीय  रास्तों पर ले जाने के अतिरिक्त और कोई रास्ता नहीं बचता है। वे धार्मिक असहिष्णु / चरमपंथी / कट्टरपंथी बनने के लिए अधिक बाध्य हो सकते हैं। यदि वे योग करते हैं, तो वे स्वयं ही अद्वैतमयी बन जाएंगे, और उस अद्वैत के द्वारा सभी समस्याओं का हल कर दिया जाएगा, क्योंकि अद्वैत ही उस धार्मिक विषाक्तता के लिए सबसे अच्छा प्रतिरक्षा-उपाय है, जो द्वैत से भरी जीवनशैली का विस्तार ही तो है।

क्यों कोई दूसरे के धर्म को नष्ट करना चाहता है? क्योंकि वह उसे पसंद नहीं करता है। वह उसे पसंद क्यों नहीं करता है? क्योंकि उसके मन में द्वैत है, और इसलिए अपने धर्म को दूसरों के मुकाबले बेहतर / अलग मानता है। अब समस्या यहाँ डबल स्टेंडर्ड / दोगलेपन की है। वह भगवान के / अद्वैत के नाम पर दूसरों के धर्म को नष्ट करने की कोशिश करता है। भगवान कुछ भी नहीं, बल्कि अद्वैत ही तो है, मुझे तो ऐसा लगता है। इस तरह, वह उस कार्य को निष्पादित करता है, जो द्वैत से भरा होता है, जबकि वह खुद को अद्वैतशाली या ईश्वर के बन्दे के रूप में मानता है। यदि वह वास्तव में अद्वैत या ईश्वर का आदमी है, तो कुछ भी नष्ट करने की क्या ज़रूरत है, क्योंकि अद्वैतवान हर स्वाभाविक स्थिति में व हर स्वाभाविक चीज से प्रसन्न रहता है, जैसे कि प्रेमयोगी वज्र अपने झलकमयी आत्मज्ञान के बाद रहता था। इसका मतलब है कि वह परधर्मद्वेषी झूठा / धोखाधड़ी-पूर्ण है, बोल / सोच कुछ और रहा है, और कर उसके बिलकुल विपरीत रहा है। इस प्रकार के लोग बहुत खतरनाक हो सकते हैं, क्योंकि वे बहुत अप्रत्याशित हो सकते हैं। यह इस प्रसिद्ध बयान को स्पष्ट करता है, कि धार्मिक कंबल से ढके अपराधों को खत्म करना बहुत मुश्किल होता है। जब तक इस डबल मानक को हटा नहीं दिया जाता है, और जब तक धर्म को अमानवता से पूरी तरह से डिस्कनेक्ट / पृथक नहीं कर दिया जाता है, तब तक संगठितसमूहों द्वारा किए गए और अच्छी तरह से अंजाम में लाए गए योजनाबद्ध अपराधों को रोकने में मुश्किल होगी। इससे निष्कर्ष निकालता है कि एक सच्चा इंसान एक धार्मिक व्यक्ति से बेहतर होता है।

गौतम बुद्ध ने वास्तव में चरमपंथी धर्मों के आगमन से पहले ही उनके बारे में बहुत कुछ कहा है, हालांकि संभवतः उनके चुपचाप आते हुए पैरों के निशान को वे शुरू में ही भांप गए थे। उन्होंने कहा है कि जो गलत लोग अपनी गलतियों को स्वीकार नहीं करते हैं, उनके लिए गलत कर्मों की तुलना में वह नकारने का भाव कहीं अधिक खतरनाक है, क्योंकि गलती करने वाला बाद में खुद को सुधार भी सकता है, लेकिन की हुई गलती को नकारने वाला व्यक्ति खुद को कभी भी सुधार नहीं सकता, क्योंकि वह खुद को सही मानते रहने की भूल करता ही रहता है।