सुन्दरता क्या है
यह अक्सर कहा जाता है कि सुन्दरता किसी दूसरे में नहीं, अपितु अपने अन्दर होती है। ध्यान योग से यह बात बखूबी सिद्ध हो जाती है। सुन्दर वस्तु को इसलिए सुन्दर कहा जाता है क्योंकि वह हमारे मन में आनंद के साथ लम्बे समय तक दृढ़तापूर्वक बसने की सामर्थ्य रखती है। मन में वैसी आकर्षक व स्थायी छवि को ही कुण्डलिनी भी कहते हैं।
सुन्दर वस्तु के प्रति अनायास ध्यान
लम्बे समय तक मन में बैठी हुई वस्तु की तरफ ध्यान स्वयं ही लगा रहता है। इससे अनादिकाल से लेकर मन में दबे पड़े चित्र-विचित्र विचार व रंग-बिरंगी भावनाएं उमड़ती रहती हैं। उनके प्रति साक्षीभाव व अनासक्ति-भाव स्वयं ही विद्यमान रहता है, क्योंकि मन में बैठी हुई उपरोक्त वस्तु निरंतर अपनी ओर व्यक्ति का ध्यान खींचती रहती है। इससे वे भावनामय विचार क्षीण होते रहते हैं, जिसके फलस्वरूप व्यक्ति उत्तरोत्तर शून्यता की ओर बढ़ता जाता है। अंततः व्यक्ति पूर्ण शून्यता या आत्मज्ञान को प्राप्त कर लेता है।
सबसे अधिक सुन्दर वस्तु
लौकिक परिपेक्ष्य में एक सर्वगुणसंपन्न स्त्री को एक उसके योग्य व उसके रुचिकर पुरुष के लिए सर्वाधिक सुन्दर माना जाता है। ऐसा इसीलिए है क्योंकि वैसी स्त्री का चित्र वैसे पुरुष के मन में सर्वाधिक मजबूती से बस जाता है। दोनों के बीच में प्रतिदिन के संपर्क से वह चित्र मजबूती प्राप्त करता रहता है। अंततः वह इतना अधिक माजबूत व स्थायी बन जाता है कि वह एक योग-समाधि का रूप ले लेता है। यदि बीच में स्वस्थ आकर्षण में (सच्चे प्यार में) खलल पड़े, तो मानसिक चित्र कमजोर भी पड़ सकता है। ऐसा जरूरत से ज्यादा इंटरेक्शन, शारीरिक सम्बन्ध आदि से हो सकता है। लौकिक व्यवहार में यह नजर भी आता है कि विवाह के बाद परस्पर आकर्षण कम हो जाता है। यदि अनुकूल परिस्थितियाँ मिलती रहें, तो ऐसे यिन-यांग आकर्षण को समाधि व आत्मज्ञान के स्तर तक पहुँचाने के लिए २ साल काफी हैं। ऐसे ही बहुत सारे मामलों में हैरान कर देने वाली अनुकूल परिस्थितियों को देखकर ईश्वर पर व अच्छे कर्मों पर बरबस ही विश्वास हो जाता है।
सुन्दरता की प्राप्ति सांसारिक वस्तुओं पर नहीं, अपितु अच्छे कर्मों व ईश्वर-कृपा पर निर्भर
कई लोगों के पिछले कर्म अच्छे नहीं होते, और उन पर ईश्वर की कृपा भी नहीं होती। ऐसे लोगों को ऐसा मजबूत यिन-यांग आकर्षण उपलब्ध ही नहीं होता। कई लोगों को यदि उपलब्ध हो भी जाता है, तो भी अनुकूल परिस्थितियाँ न मिलने के कारण वह लम्बे समय तक स्थिर नहीं रह पाता। ऐसे में समाधि नहीं लग पाती। बहुत से लोग वर्तमान में बहुत अच्छे कर्म कर रहे होते हैं। वे सदाचारी होते हैं। वे बड़ों-बूढ़ों को व गुरुओं को प्रसन्न रखते हैं, एवं उनकी आज्ञा का पालन करते हैं। वे उनके सामने नतमस्तक बने रहते हैं। वे सभी कठिनाईयों व दुर्व्यवहारों को प्रसन्नता के साथ सहते हैं। इससे उनके मन में अपने गुरुओं, वृद्धों व परिवारजनों की छवियाँ बस जाती हैं। उनमें से कोई अनुकूल छवि उनकी कुण्डलिनी बन जाती है। कई बार अप्रत्यक्ष रूप से कुण्डलिनी को पुष्ट करने वाला यिन-यांग आकर्षण भी कई किस्मत वालों को प्राप्त हो जाता है।
अवसरों से रहित लोगों के लिए कुण्डलिनी-योग एक बहुत बड़ी राहत
जिन अधिकाँश व बदकिस्मत लोगों को प्राकृतिक रूप से भरपूर ध्यान का अवसर नहीं मिलता, उन्हीं के लिए कुण्डलिनी योग बनाया गया है, मुख्य रूप से। कई हतोत्साहित व निराशावादी लोग इसे “रेत में से तेल निकालने” की संज्ञा भी देते हैं। यद्यपि यह अब सच्चाई है कि रेत में भी तेल (पैट्रोल) होता है। इसमें उपयुक्त समय पर तंत्र के प्रणय-योग के सम्मिलन से यह बहुत आसान, व्यावहारिक व कारगर बन जाता है।
बनावटी प्यार
किसी विशेष वस्तु से प्रतिदिन के लौकिक प्यार की कमी को मेडीटेशन से पूरा करना भी एक जादुई कारीगरी ही है। इसे हम “प्रेम का कृत्रिम निर्माण (synthesis of love)” भी कह सकते हैं। योग एक ऐसी फैक्टरी है, जो प्रेम का कृत्रिम उत्पादन करती है। यह कारीगरी मुझे बचपन से लेकर प्रभावित करती आई है। इससे लौकिक प्यार की तरह पतन की भी सम्भावना नहीं होती, क्योंकि वस्तु से सारा इंटरेक्शन मन में ही तो होता है। अति तो इन्द्रियों से ही होती है हमेशा।
सुन्दरता सापेक्ष व आभासिक होती है
यदि सुन्दरता निरपेक्ष होती, तो एक सुन्दर स्त्री सभी प्रकार के लोगों को एकसमान सुन्दर लगा करती, और हिंसक जानवर भी उसके पीछे लट्टू हो जाया करते। इसी तरह, यदि सुन्दरता भौतिक रूप-आकार पर निर्भर होती, तब योग से प्रवृद्ध की गई वृद्ध गुरु व काली माता (बाहरी तौर पर कुरूप व डरावनी) के रूप की कुण्डलिनी सबसे अधिक सुन्दर न लगा करती, और वह योगी के मन में सबसे ज्यादा मजबूती से न बस जाया करती।
Please click on this link to view this post in English (Kundalini as the basis of beauty)
खने को हरदम।
एक नए रिश्ते की ख़ातिर
अपना ही लहराए परचम।
उसको ही सर्वस्व मानकर
सबसे करे किनारा है।
काट स्वयं जड़ों को अपनी
ढूंढे नया सहारा है।
याद नहीं बिल्कुल भी उसको
बचपन में खेल जो खेले थे।
एहसास नहीं ज़रा भी उसको
माँ-बाप ने जो दु:ख झेले थे।
मिलकर भाई-बहन कभी
तितली के पीछे भागे थे
नई सुबह के इन्तज़ार में
रात-रात भर जागे थे।
एक-दूसरे के दु:ख-सुख से
जब एक साथ रो पड़ते थे।
मिलते ही एक नई ख़ुशी
तब फूल हंसी के झड़ते थे।
छोटे-छोटे कदमों से हम
धूल उड़ाया करते थे।
गाँव की पगडण्डी से
जब पढ़ने जाया करते थे।
उस वक़्त हमें मालूम नहीं था
वक़्त भी क्या दिखलाएगा।
दोस्त-भाई गाँव छोड़कर
शहरों का हो जाएगा।
भाग रहा है धन के पीछे
भूल के पिछली बातों को।
आ जाती जब याद कभी तो
तन्हा रोता रातों को।
छोड़ केअपनी जन्मस्थली
ढूंढे है प्यार परायों में।
त्याग मुसाफिर घर को अपने
ज्यों रात बिताए सरायों में।
खेत पड़े हैं बंजर सारे
माँ-बाप की आँखें सूखी हैं।
ताक रही रस्ता बेटे का
बस उसके दरस की भूखी हैं।
आई घर की याद उसे
बदला जब सारा परिवेश।
इतिहास दोहराया ज़माने ने
बच्चे भी उड़ गए परदेस।
पंछी भी उड़कर रातों को
आ जाते हैं नीढ़ में
पर खोया रहा तू क्यों बरसों तक
इन नगरों की भीड़ में?
छोड़ जवानी शहरों में
बूढ़ा लौटे गाँव को।
वृक्ष नहीं जो बचे हुए हैं
ढूंढे उनकी छाँव को।
जैसा बोया वैसा काटा
बचा नहीं अब कुछ भी शेष।
झुकी कमर से लाठी टेके
खोजे गत जीवन अवशेष।
यन्त्र बना है मानव अब तो
बलि चढ़ा जज़्बातों की।
कभी नहीं करता तहलील
उत्पन्न हुए हालातों की।
कट के अपनी डोर से
पतंग कोई उड़ न पाए।
परवाज़ भरी थी जिस ज़मीन से
उसी ज़मीन पे गिर जाए।
ऐ ज़िन्दगी!....
मयस्सर हुई तू बहुत खुशनसीबी से
नहीं कोई ताल्लुक अमीरी-ग़रीबी से
तड़पाए तू,लहराए तू।
सपने दिखा,तरसाए तू।
तेरी रौ की कशिश में
तिनके बन बह जाते हैं,भँवर में फंस जाते हैं।
ऐ ज़िन्दगी!…..
तमाशाई हैं सब अजब तेरी रियासत के
नहीं कोई मालिक तेरी इस विरासत के
ललचाए तू,भरमाए तू,
दिल से लगा,ठुकराए तू।
तेरी हवा की जुम्बिश से
पत्ते बन उड़ जाते हैं,ख़ाक में मिल जाते हैं।
ऐ ज़िन्दगी!….
ख़ौफ़ से भरा था इन्सानियत का मंज़र
ख़ून से सना था हैवानियत का ख़ंज़र।
फैली हुई थी हरसु दहशत की धुन्ध गहरी
हिम्मत की हवा से वो छटने लगी है फिर से।
अन्धेरों में भटकता था वो राह से अन्जाना
शम्मा को तड़पता है जैसे कोई परवाना।
काली अन्धेरी रातें जो राह रोकती थी
जुगनू के कारवां से रोशन हुई हैं फिर से।
काली घटा ने घिर के ऐलान कर दिया है
सागर का पानी उसने जी भर के पी लिया है।
हर शाख़ पत्ते पत्ते पे लगी बौछारें गिरने
कुदरत के ज़र्रे-ज़र्रे में छाया ख़ुमार फिर से।
तो इनके दिल की आवाज की तरह हैं, जो बरबस ही इनके मुख से निस्सृत होती रहती हैं। ये सोलन जिला के एक छोटे से हिमशिखराँचलशायी गाँव से सम्बन्ध रखते हैं। इनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि ही अध्यापन के क्षेत्र से जुड़ी हुई है। इनकी कविताएँ वास्तविकता का परिचय करवाते हुए अनायास ही दिल को छूने वाली होती हैं। आशा है कि ये भविष्य में भी अपने देहजगत के अमृतकुंड से झरने वाले कवितामृत से अंधी भौतिकता के जहर से अल्पप्राण मरूभूमि को सिंचित करते रहेंगे। 