वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास, भाग-9 (वेबपेज बनाना व कस्टमाईज करना, विजेट्स)

कोई भी वेबपेज बनाने के लिए “माय साईट” को क्लिक करते हैं। उससे ड्रॉप डाऊन मीनू खुलता है। उस पर “साईट पेजस” नाम से एक बटन होता है। उसके कोने में लिखे “एड पेज” पर क्लिक किया जाता है, जिससे लिखने के लिए एक खाली साईट-पेज खुलता है। उसे लिख कर पब्लिश कर दिया जाता है। वह वेबपोस्ट की तरह किसी ईमेल फोलोवर को डिलीवर नहीं होता, बल्कि वेबसाईट में कहीं गुमनाम पड़ा रहता है। उस वेबपेज को किसी मीनू में या विजेट में एड करना पड़ता है। मीनू में डालने के लिए कस्टमाईजर से प्राईमरी मीनू खोलें। उसमें मीनू के सभी पेज दिखते हैं, और अंत में नीचे एक “एड आईटम” बटन होता है। उस पर क्लिक करने से सभी वेबपेजस की लिस्ट खुल जाएगी। अब उस नए वेबपेज को सेलेक्ट कर लें। वह प्राईमरी मीनू में जुड़ जाएगा। मीनू की सभी आईटम्स को रिओरडर (ऊपर-नीचे) भी कर सकते हैं, और किसी आईटम का ड्रॉपडाऊन लिस्ट के रूप में सबमीनू भी बनाया जा सकता है। इससे यह लाभ होता है की वेबसाईट की साईडबार बहुत लम्बी होकर मेन कंटेंट के नीचे तक नहीं लटकती।

विजेट में वेबपेज को डालने के लिए कस्टमाईज़र से विजेट में जाएं। यथानुसार साईडबार या फुटबार विजेट को सेलेक्ट करें। वेबसाईट में लगे हुए विजेटस की लिस्ट के बोटम पर एक “एड विजेट” नाम से बटन होता है। उस पर क्लीक करके विजेट की एक नई व लम्बी लिस्ट खुलती है। उस पर “पेज” विजेट को चुनें। वह विजेट वेबसाईट के विजेट की लिस्ट में जुड़ जाएगा। अब उस पर क्लिक करके उसे नाम दें। उसमें वेबसाईट के सारे पेज जुड़ जाएंगे, और उनकी एक लम्बी लिस्ट नीचे की तरफ साईडबार में जुड़ जाएगी। उस लिस्ट में वे सभी पेज भी होंगें, जो प्राईमरी मीनू में दिख रहे होंगे। साथ में, इस विजेट की ड्रॉपडाऊन लिस्ट भी नहीं बनती। इससे यह बहुत स्थान घेरता है, जिससे साईडबार बहुत नीचे तक चली जाती है। इससे बचने के लिए डबल साईडबार वाली (दोनों बाईं तरफ, दोनों दाईं तरफ, या एक बाईं व एक दाईं तरफ) वेबसाईट-थीम को भी एक्टिवेट किया जा सकता है। इससे यह नुक्सान हो सकता है कि मेन कंटेंट के लिए जगह काफी कम रह सकती है, मुख्यतया डेस्कटॉप पर। दूसरा उपाय है कि इस विजेट का प्रयोग न करें। उपरोक्तानुसार, प्राईमरी मीनू में ही एक आईटम “अन्य वेबपेजस” आदि नाम से बना लें। उसमें अतिरिक्त के वेबपेज “एड आईटम” से डालें, व उन्हें रिऑर्डर कर लें। उस “अन्य वेबपेजस” आईटम का सबमीनू बना लें। इससे इसके नीचे के सभी पेज ड्रॉपडाऊन लिस्ट के रूप में आ जाएंगे, जो कम जगह घेरेंगे। अन्य भी बहुत से विजेट होते हैं, जैसे “रीसेंट पोस्टस”, “टॉप पोस्टस एंड पेजस”, “टेक्स्ट” आदि। “टेक्स्ट” विजेट को साधारण सूचना जैसे की कोपीराईट सूचना, व डिसक्लेमर आदि लिखने के लिए किया जाता है।

यदि आप हरेक पोस्ट के ऊपर शेयर की संख्या भी दिखाना चाहते हैं, तो “माय साईट” पर जाएं। ड्रॉपडाऊन लिस्ट में “शेयरिंग” बटन को क्लिक करें। अब उस पर “ऑफिशियल बटन्स” को क्लिक करें। वैबसाईट के मामले में धीरज रखना चाहिए। कभी भी डोमेन नेम व वैबसाईट के विषय को बदलना नहीं चाहिए। डोमेन का नाम भी वैबसाईट के अनुसार ही रखना चाहिए। जैसे कि यह वैबसाईट कुण्डलिनी से सम्बंधित है, इसीलिए इसका डोमेन नाम “demystifyingkundalini” रखा गया है।

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Please click on this link to view this post in English (Website creation, management and development, part-9)

Website creation, management and development, part-9 (making and customizing web page, widgets)

Click “My site” to create any webpage. From that, drop down menu opens. It has a button named “Site Pages”. Click on “add Page” written in its corner, from which an empty site-page opens for writing. It is written and published. It is not delivered to an email follower like web post, but it remains anonymous somewhere in the website. The webpage has to be added in a menu or in a widget. To enter in the menu, open the primary menu from the customizer. All the pages of the menu are visible in it, and finally there is an “add item” button below. Clicking on it will open the list of all the WebPages. Now select that new webpage. It will be added to the primary menu. All items in the menu can also be reordered (up-down), and sub-menu can also be made as a dropdown list of any item. It has the advantage that the sidebar of the website does not get too long and does not hang down to the bottom of the main content.

To enter a webpage in the widget, go to the widget button from the customizer. Accordingly select Sidebar widget or Footer Widget. There is a button named “add Widget” on the bottom of the list of widgets in the website. Clicking on it opens a new and long list of widgets. Select the “Pages” widget on it. That widget will be added to the list of widgets in the website. Now click on it and name it. All the pages of the website will be added to it, and a long list of them will be added to the sidebar. There will be all the pages in that list, even those, which are already visible in the primary menu. Together, this widget does not even have a dropdown list. It occupies a lot of space, so that the sidebar goes down very far. To prevent this, the website-theme can also be activated with double sidebar (both on the left, both on right, or one left and one on right). This can be a loss for the main content can get a lot less space, mainly on the desktop. The second solution is not to use this widget. According to the above, create an item in the primary menu named “Other Web Pages” etc. Put additional webpage in it with “add item” button and reorder all of them. Make submenu of that “other webpage” item. From this, all the pages below it will come in the form of dropdown list, which will occupy less space. There are many other widgets, such as “Recent Posts”, “Top Posts and Pages”, “Text” etc. The “text” widget is used to write simple information such as copyright notification, and disclaimer etc.

If you want to show the number of shares below each post, go to “My Site”. Click the “Sharing” button in the dropdown list. Now click on “official buttons” on it. Endurance should be maintained in case of website development. Never change the domain name and subject matter of the website. The name of the domain should also be kept according to the website. As this website is related to Kundalini, so its domain name has been chosen as “demystifyingkundalini”.

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ओसीआर, ऑप्टिकल रिकोग्निशन सिस्टम, आधुनिक प्रकाशन के लिए एक वरदान

कुण्डलिनी और लेखन कला एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं

पाठक सोचते होंगे कि कुण्डलिनी-वैबसाईट में स्वयंप्रकाशन व वेबसाईट-निर्माण के विषय किस उद्देश्य से डाले गए हैं।  वास्तव में कुण्डलिनी-साधक को स्वयंप्रकाशन का व वेबसाईट-निर्माण का भी व्यावहारिक अनुभव होना चाहिए।  ऐसा इसलिए है, क्योंकि कुण्डलिनी-क्रियाशीलता या कुण्डलिनी-जागरण के बाद दिमाग में मननशीलता की बाढ़ जैसी आ जाती है।  उस स्थिति में व्यक्ति एक उत्कृष्ट पुस्तक व वेबसाईट का निर्माण कर सकता है।  साथ में, इससे वह खालीपन की नकारात्मकता से भी बच सकता है। प्रेमयोगी वज्र के साथ भी ऐसा ही हुआ।

मैं ओसीआर तकनीक तक कैसे पहुंचा

ओसीआर (ocr) तकनीक से मेरा सामना तब हुआ, जब मैं अपने पिता द्वारा लिखित लगभग सात साल पुरानी एक कागजी पुस्तक का ई-पुस्तक वाला रूप बनाने का प्रयत्न कर रहा था। पुस्तक का नाम था ‘सोलन की सर्वहित साधना’। सौभाग्य से उस पुस्तक की सॉफ्ट कोपी प्रकाशक के पास मिल गई। इससे मैं पुस्तक को स्कैन करने से बच गया। साथ में, संभवतः सॉफ्ट कोपी से बनाई गई ई-पुस्तक में कम अशुद्धियाँ होती हैं। वह पुस्तक पीडीएफ फोर्मेट में थी। पहले तो मैं ऑनलाईन पीडीएफ कन्वर्टर की सहायता लेने लगा। मैंने कई प्रकार के कन्वर्टर को ट्राय करके देखा, गूगल ड्राईवर के कन्वर्टर को भी। परन्तु सभी में जो वर्ड फाईल कन्वर्ट होकर आ रही थी, उसके अक्षर तो पूर्णतया दोषपूर्ण थे। वह हिंदी पुस्तक तो कोई चाइनीज पुस्तक लग रही थी। फिर पीडीएफ एलीमेंट का प्रयोग किया। उसमें मुफ्त के प्लान में कुछ ही पेज एक्सट्रेक्ट करने की छूट थी। पेज तो पीडीएफ फाईल से वर्ड फाईल को एक्सट्रेक्ट हो गए थे, पर उन पृष्ठों में पट्टियों, फूलों आदि से सजावट जस की तस बनी हुई थी। वे सजावट की चीजें मुझसे रिमूव नहीं हो रही थीं। कुछ हो भी रही थीं, पर सभी नहीं। अक्षरों की गुणवत्ता भी अधिक अच्छी नहीं थी। मैंने सोचा कि शायद खरीदे जाने वाले प्लान से कोई बात बन जाए। परन्तु जब उसकी कीमत देखी, तो मैं एकदम पीछे हट गया। क्योंकि उसकी न्यूनतम सालाना कीमत लगभग 3000-4000 रुपए की थी।

मुफ्त में उपलब्ध ऑनलाईन फाईल कन्वर्टर से मुझे बहुत सहायता मिली

कई महीनों तक मेरी योजना ठन्डे बस्ते में पड़ी रही। फिर जब मुझे कुछ खाली समय प्राप्त हुआ, तब मैंने गूगल पर सर्च किया। ओसीआर तो मैंने पहले भी पढ़ रखा था, पर मुझे कभी भी पूरी तरह से समझ नहीं आया था। फिर मुझे एक वेबपोस्ट में पता चला कि उसके लिए पुस्तक को स्कैन करना पड़ता है, ताकि पुस्तक का प्रत्येक पृष्ठ एक अलग चित्र के रूप में आ जाए। जैसे ही मैं पुस्तक के स्कैन की तैयारी कर रहा था, वैसे ही मुझे पता चला कि यदि पुस्तक पीडीएफ फाईल के रूप में उपलब्ध हो, तो उसे सीधे ही चित्र-फाईल के रूप में कन्वर्ट किया जा सकता है। मैंने गूगल पर ‘पीडीएफ इमेज एक्सट्रेक्शन’ से सर्च करके बहुत से ऑनलाईन कन्वर्टर ट्राय किए। उनमें मुझे स्मालपीडीएफडॉटकोम पर उपलब्ध कन्वर्टर सर्वोत्तम लगा। मैंने उसमें एक ही बार में सारी बुक-फाईल अपलोड कर दी। कनवर्शन के बाद सारी बुक-फाईल डाऊनलोड कर दी। उससे कम्प्यूटर के डाऊनलोड फोल्डर में सारी बुक-फाईल क्रमवार चित्रों के रूप में आ गई। सभी चित्र एक जिपड (कंप्रेस्ड) फोल्डर में थे। उस फोल्डर को अन्जिप (विनजिप आदि सोफ्टवेयर से) करने से सभी चित्र एक साधारण फोल्डर में आ गए।

हिंदी भाषा के लिए काम करने वाले कम ही ओसीआर उपलब्ध हैं

फिर मैं उन चित्रों को वर्ड डोक में कनवर्ट करने वाले सोफ्टवेयर (ओसीआर) को गूगल में खोजने लगा। बहुत से ओसीआर ऐसे थे, जो हिंदी भाषा की सुविधा नहीं देते थे। अंत में मुझे वैबसाईट http://www.i2ocr.com पर उपलब्ध ऑनलाईन ओसीआर सर्वोत्तम लगा। वह निःशुल्क था। मैं बुक-चित्रों वाला फोल्डर एकसाथ अपलोड करने की कोशिश कर रहा था, पर नहीं हुआ। फिर मैंने सभी चित्रों को सेलेक्ट करके, सभी को एकसाथ अपलोड करने का प्रयास किया। पर वह भी नहीं हुआ। फिर मुझे एक वेबपोस्ट में पता चला कि बैच एक्सट्रेक्शन वाले ओसीआर कमर्शियल होते हैं, व मुफ्त में उपलब्ध नहीं होते। अतः मुझे एक-२ करके चित्रों को कन्वर्ट करना पड़ा। चित्रों की तरह ही कन्वर्ट हुई डोक फाईलें भी क्रमवार रूप में डाऊनलोड फोल्डर में आ गईं।

इमेज एक्सट्रेक्शन से बनाई गई वर्ड-फाईल की फोर्मेटिंग

फिर मैंने क्रम के अनुसार सभी डोक फाईलों को एक अकेली डोक फाईल में कोपी-पेस्ट कर दिया। पर डोक फाईल में अक्षरों की छोटी-बड़ी लाईनें थीं, जो जस्टिफाई एलाईनमेंट में भी ठीक नहीं हो रही थीं। फिर मैंने एक वैबपोस्ट में पढ़ा कि एमएस वर्ड के फाईन्ड-रिप्लेस के फाईन्ड सेक्शन में ^p (^ चिन्ह कीबोर्ड की शिफ्ट व 6 नंबर वाली की को एकसाथ दबाने से छपता है) को टाईप करें, व रिप्लेस में खाली सिंगल स्पेस डालें। ‘रिप्लेस आल’ की कमांड से सब ठीक हो जाता है। वैसा ही हुआ। इस तरह से वह ई-पुस्तक तैयार हुई।

यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि यदि बहुत सारी छोटी वर्ड फ़ाइलों को एक साथ जोड़ा जाना है, तो एमएस वर्ड के ‘इंसर्ट’ की मदद ली जानी चाहिए। ‘इंसर्ट’ बटन पर क्लिक करने पर बने ‘ऑब्जेक्ट’ बटन पर क्लिक करें, और इसके कोने पर बने त्रिकोण पर क्लिक करें। अब ड्रॉपडाउन मेनू पर ‘फ़ाइल फ्रॉम टेक्स्ट’ पर क्लिक करें। एक नया ब्राउज़-विंडो पॉप अप होगा। उस पर वर्ड फ़ाइलों का चयन करें, जिन्हें क्लब किया जाना है। ध्यान रखें कि चयन के क्रम में फ़ाइलों को क्लब किया जाएगा। इसका मतलब है, चयनित समूह में पहली फ़ाइल संयुक्त वर्ड फ़ाइल में पहले आएगी और इसी तरह। मैं एक बार में अधिकतम 10 फ़ाइलों को क्लब करने की सलाह देता हूं क्योंकि मुझे लगता है कि यदि बड़ी संख्या में फ़ाइलों को एक साथ चुना जाता है तो यह सिस्टम त्रुटि पैदा कर सकता है। पर वास्तव में कन्वर्ट होने के बाद कई फाईलें वर्ड फोर्मेट में डाऊनलोड नहीं हो रही थीं। मैं हिंदी भाषा की फाईल को ओसीआर कर रहा था। टेक्स्ट फोर्मेट में वे फाईलें डाऊनलोड हो रही थीं। हालांकि टेक्स्ट फोर्मेट वाली फाईल नोटपैड में ही खुल रही थीं, वर्डनोट में नहीं। टेक्स्ट फाईलों में डाऊनलोड करने का यह नुक्सान है कि उन्हें वर्ड फाईलों की तरह इन्सर्ट-ओब्जेक्ट आदि कमांड देकर एकसाथ क्लब नहीं किया जा सकता। सबको अलग-२ कोपी-पेस्ट करना पड़ता है।

फाईनल फाईल करेक्शन

उस पुस्तक में कई जगह दो अक्षर जुड़े हुए थे। जैसे कि मूल पुस्तक के ‘फल का’ शब्दों का ‘फलका’ बन गया था। थोड़ी सी मेनुअल करेक्शन से सब ठीक हो गया। कागजी पुस्तक को सामने रखकर उपयुक्त स्थानों पर पेजब्रेक, लाइनब्रेक, हैडिंग शेप आदि दिए गए, ताकि ई-पुस्तक पूर्णतः मूल पुस्तक की तरह लगती। कवर के व शुरू के कुछ चित्रात्मक पृष्ठों को सीधे ही ई-पुस्तक में इन्सर्ट किया गया। इन कवर फ़ोटो के संपादन के लिए मैंने ‘फोटोजेट’ के ऑनलाइन फोटो संपादक का उपयोग किया। हालाँकि, संपादित छवि डाउनलोड करने से पहले इस ऐप को फेस बुक पर साझा करना पड़ता है। Pixlr.com का ऑनलाइन संपादक भी अच्छा है। चित्रों को सीधे कोपी-पेस्ट करने की बजाय एमएस वर्ड की ‘इन्सर्ट-पिक्चर’ की सहायता ली गई, क्योंकि सीधे कोपी-पेस्ट करने से कई बार ई-बुक में चित्र दिखता ही नहीं।

ओसीआर में कुछ विशेष ध्यान देने योग्य बातें

पुस्तक को स्केन करने से पहले यह देख लें की पुस्तक कितनी पुरानी है। बहुत पुरानी पुस्तकों का ओसीआर नहीं हो पाता। पुस्तक की बाईंडिंग खोलकर प्रत्येक पेज को अलग से सकेन करना पडेगा। पुस्तक को फोल्ड करके स्केन करने से किनारे के अक्षर ढंग से स्कैन नहीं होते, जिससे वे ओसीआर नहीं हो पाते। बाद में आप पुस्तक की पुनः बाईन्डिंग करवा सकते हो। डबल पेज स्कैन करके भी ओसीआर नहीं हो पाता। पेज उसी हिसाब से स्कैनर पर रखना पड़ेगा, जैसा कि आमतौर पर सिंगल पेज रखा जाता है। पेज की लम्बाई स्कैनर की लम्बाई की दिशा में रखी जाती है। पेज सामान्य पुस्तक के पेज की तरह लिखा होना चाहिए, यानी अक्षरों की पंक्तियाँ पेज की चौड़ाई की दिशा में कवर करती हों। स्कैनर पर पेज जितना सीधा होगा, उतना ही अच्छा ओसीआर होगा। इसलिए पेज को स्कैनर-ग्लास की लम्बाई वाली बैक साईड प्लास्टिक बाउंडरी से सटा कर रखा जाना चाहिए। इससे पेज खुद ही सीधा आ जाता है। लैन्थवाईज तो पेज स्कैनर के बीच में आना चाहिए।

फाईल को सुधारने के लिए ओसीआर करने से पहले आसान विकल्प भी आजमा लें

कई बार तो ओसीआर करने की जरूरत ही नहीं पड़ती, क्योंकि फोंट को कन्वर्ट करके काम चल पड़ता है। हर जगह चलने वाला फोंट यूनिकोड है। मैंने एक क्रुतिदेव (krutidev) फोंट में टाईप किए हुए पीडीएफ लेख को वर्ड-लेख में कन्वर्ट किया, परन्तु उसके अक्षर पढ़े नहीं जा रहे थे। फिर मैंने ऑनलाईन फॉण्ट कन्वर्टर में फाईल को डालकर उसके क्रुतिदेव फोंट को यूनिकोड में कन्वर्ट किया। फिर जाकर अक्षर पढ़े गए। १-२ प्रकार के ही अक्षर गलत थे, वो भी कहीं-२ पर ही। थोड़ी सी मेहनत से लेख मैंने करेक्ट कर दिया। वह मेहनत ओसीआर में लगने वाली मेहनत से काफी कम थी। फिर भी ओसीआर दुबारा टाईप करने से बहुत ज्यादा आसान है।

भविष्य की तकनीक ‘हैण्ड टैक्स्ट रिकोग्निशन’

इससे आगे की तकनीक हाथ से लिखे लेख को ओसीआर करने की है। इसे ‘हैण्ड टैक्स्ट रिकोग्निशन’ कहते हैं। परन्तु यह पूरा विकसित नहीं हुआ है। इस पर खोज जारी है। हालांकि डब्बों वाले कागजी फोर्मेट में एक-२ डब्बे में एक-२ अक्षर को डालने से यह तकनीक काम कर जाती है। तभी तो सेवा-भरती या पंजीकरण आदि के अधिकाँश परिचय-फॉर्म भरने के लिए डब्बों वाले फोर्मेट का प्रयोग किया जाता है।

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OCR, Optical Recognition System, a boon to modern publishing

Kundalini and writing arts are related to each other

Readers will think that what is the purpose of self-publishing and website-creation in the Kundalini-website. In fact, Kundalini-seeker should also have practical experience of self-publishing and website building. This is because, after the Kundalini-activation or Kundalini-awakening, the mind becomes like a flood of thoughtfulness. In that case, the person can create an excellent book and an excellent website. Together, it can also avoid the negativity of the worklessness. The same happened with Premyogi vajra.

How did I access OCR technology

I encountered the OCR technique when I was trying to make an e-book form of a paper book written by my father about seven years ago.  The name of that book was ‘Solan ki sarvhit saadhna/सोलन की सर्वहित साधना’. Fortunately, the publisher found out the soft copy of that book. This saved me from scanning the book. Together, there is probably less inaccuracy in the e-book made with soft copies. That book was in PDF format. At first, I started taking the help of Online PDF Converter. I tried a variety of converters, as well as the Google Drive Converter. However, the word file that was coming after being converted by all of those was completely flawed. The book was looking like a Chinese book, not the original Hindi book. Then I used the PDF Element. There was facility for only few pages in free plan. The pages were extracted from the PDF file to the word file, but the pages were along with original decorations like straps, palettes, flowers etc. I was not able to remove those things of decoration. Some things were removable in word, but not all. It was also a labor intensive work. Even the quality of the letters was not better. I thought that may be something would be done with the plan of purchase. However, when I saw the value of it, I left it completely behind. Because its minimum annual price was about INR 3000-4000.

I have a lot of help with free online file converter

For several months, my plan was lying in cold storage. Then when I got some free time, I searched on Google. I had read about the OCR before, but I never fully understood it. Then I found out in a web post that the book has to be scanned for it so that every page of the book comes in the form of a separate picture. As soon as I was preparing for the scan of the book, I came to know that if the book is available as a PDF file, it could be converted directly into a picture file. I tried many online converters by searching on Google with keywords ‘PDF Image Extraction’. Among those converters, I found the best available converter on Smallpdf.com. Extractor on ilovepdf.com is also good. I uploaded whole of the book-file in one go. After conversion whole of the converted book-file was downloaded. In it, the entire book-file came in the download folder of the computer in the form of serial wise pictures (jpg images). All the pictures were in a zipped (compressed) folder. By making that folder unzipped (with WinZip etc. software), all images came in a simple folder.

There are very few OCR’s available for Hindi language

Then I started finding online app on Google that could convert those pictures into the word doc (OCR app). There were many OCRs that did not offer Hindi language facility. Finally, I found the best online OCR for Hindi available on the website http://www.i2ocr.com. That was free. However, I was trying to upload the folder containing books, but it did not happen. Then I tried to upload all the pictures together by selecting all the pictures. However, even that did not happen. Then I found out in a web post that Batch Extraction OCRs are commercial, and are not available freely. Therefore, I had to convert pictures one by one. Like the book-pictures, the converted doc files also came folded serial wise in a folder.

Formatting a word file created with image extraction

Then I copied all the doc files into a single doc file in right sequence. However, the word-lines were unequal in length in the doc file, which were not being corrected even with the command of Justify alignment. Then I read in a web post that in the ‘Find’ section of ‘find-replace’ of MS Word, type the ^ p in the find section(^ symbol is printed by pressing the shift key and 6 number numeric key together), and insert a single blank space in the replace section. With the command of ‘Replace All’, all becomes all right. That is what happened. Thus, the e-book was prepared in this way.

It should be noted that if there are plenty of small word files to be clubbed together, then help of ‘insert’ of ms word should be taken. On clicking ‘insert’ button, search the ‘object’ button and click on triangle at corner of this. Now click ‘text from file’ on dropdown menu. A new browse-window will pop up. Select word files on it to be clubbed. Keep in mind that files will be clubbed in order of selection. It means, first file in selected group will come first in combined word file and so on. I advise to club only maximum of 10 files at a time for I feel it can produce error if very large number of files is selected together. In fact, many files were not being downloaded in word format after converting. I was doing OCR in Hindi language. Those files were being downloaded in the text format. However, the files with the text format were opening only in Notepad, not in wordnote. It is a loss to download text files that those cannot be clubbed together by giving commands like insert-object etc. as in word files. One has to copy-paste every file separately.

Final File Correction

There were two words attached to each other without space in that book at many places. For example, the words ‘fruit is’ of the original book became ‘fruitis’. With a little manual correction, it was all right. Page break, line break, heading shape etc. were provided at the appropriate places by keeping the paper book in front, so that the e-book looks like a completely original book. Some pictorial pages of cover and initial part of book were inserted directly into the e-book. For editing these cover photos, I used online photo editor of ‘photojet’. However, one needs to share it on face book before downloading the edited image. Online editor of pixlr.com is also good. Instead of copying images directly, the help of ‘Insert- picture’ of MS Word was taken, because copying image directly to the word file does not cause that to appear in the e-book at all times.

Some special things to note in OCR

Before scanning the book, see how much old the book is. OCR of old books is not available. Opening the book’s bindings is required so that each page is scanned separately. By scanning the bound book by folding it, the scans are not good for paper-margins, so they cannot get good OCR. Later on, you can re-bind the book. Scanning the double page does not even make the OCR. The page will have to be placed on the scanner accordingly, as usually a single page is placed. The length of the page is placed in the direction of the length of the scanner. The page should be written like a normal book page, that is, the lines of letters cover the width of the page. The more straightforward the page on the scanner, the better the OCR. Therefore, the page should be attached to the backside plastic boundary of scanner-glass length. The page itself comes directly straight with this. In lengthwise, page should come in the middle of the scanner.

To improve the file, try the easy option before doing OCR.

Many times, there is no need to do OCR, because converting fonts work. Universal fonts are Unicode. I converted a pdf article typed in a krutidev font into a word-article, but its characters were not being read. Then I put the file in online font converter and converted its krutidev font to Unicode. Then the alphabets were readable. Only 1-2 types of letters were wrong, that too only at few places. I corrected the article with a little hard work. The effort was much less than the hard work needed to do OCR. Yet OCR is a lot easier than re-typing.

Future technology ‘hand text recognition’

Further technique is recognizing hand-written text by the OCR. This is called ‘hand text recognition’. However, it has not evolved completely. Search is on. However, this technique works by inserting letters one by one in predefined boxed compartments in the paper format. That is why the introduction-forms in recruitment etc. are hand-filled in the boxed format.

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देवपूजा में कुंडलिनी

सभी धार्मिक गतिविधियाँ कुण्डलिनी में वैसे ही समा जाती हैं, जैसे नदियाँ समुद्र में। जब हम किसी देवी-देवता की पूजा कर रहे होते हैं, तब हम अप्रत्यक्ष रूप से कुण्डलिनी की ही पूजा कर रहे होते हैं। शरीरविज्ञान दर्शन के अनुसार देवता की मूर्ति, चित्र आदि के रूप में स्थित मानव-देह में अद्वैतशाली देहपुरुष विद्यमान होते हैं। अतः देवता की पूजा से उनकी पूजा स्वतः ही हो जाती है। उससे पूजा करने वाले व्यक्ति के मन में अद्वैतभाव पुष्ट हो जाता है। शरीरविज्ञान दर्शन के अनुसार यह सिद्धांत है कि कुण्डलिनी व अद्वैत साथ-२ रहते हैं। अतः देवपूजन से कुण्डलिनी-पूजन स्वयं ही हो जाता है, जिससे कुण्डलिनी क्रियाशील होकर विकसित होती रहती है, और कभी भी अनुकूल परिस्थितियों को पाकर जागृत भी हो सकती है।

यदि हम देव-मूर्ति में देहपुरुषों की सत्ता को न भी मानें, तब भी कोई बात नहीं। क्योंकि प्रकृति की सभी चीजें जिन्हें हम जड़ कहते हैं, वे जड़ (निर्जीव) नहीं, अपितु अद्वैतभाव के साथ चेतन (सजीव) होती हैं। प्रकृति के सभी अणु-परमाणु या मूलकण मूर्ति में भी विद्यमान होते हैं। अतः देव-मूर्ति के पूजन से सम्पूर्ण अद्वैतमयी प्रकृति की पूजा स्वयं ही हो जाती है। देहपुरुष की सत्ता की वैज्ञानिक कल्पना तो सम्पूर्ण प्रकृति व मानवाकार मूर्ति के बीच में पूर्ण समानता को प्रदर्शित करने के लिए ही की गई है। इससे अद्वैतभाव की प्रचंडता भी बढ़ जाती है।

जैसे ही मूर्ति-पूजन के साथ कुण्डलिनी प्रकट हो जाती है, तथा पूजन व कुण्डलिनी के बीच के सम्बन्ध का तनिक विचार कर लिया जाता है, वैसे ही पूजन पर ध्यान देने से वह ध्यान कुण्डलिनी को स्वयं ही लगता रहता है। उससे कुण्डलिनी उत्तरोत्तर चमकती रहती है। उदाहरण के लिए, देव-मूर्ति के सामने घंटी बजाने से व घंटी की आवाज पर ध्यान लगाने से, व ऐसा समझने से कि वह आवाज देवमूर्ति में स्थित कुण्डलिनी की सेवा कर रही है, स्वयं ही बीच-२ में कुण्डलिनी पर ध्यान लगता रहता है। ऐसा ही तब भी होता है, जब पितरों का पूजन किया जा रहा होता है। क्योंकि पितरों की देह भी देवता या प्रकृति की तरह शुद्ध, निर्विकार व अद्वैतवान होती है।

इसका अर्थ है कि जिसे कुण्डलिनी का ज्ञान नहीं है, उसे पूजा का सम्पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता। एक कुण्डलिनी-योगी ही उत्तम प्रकार का पुजारी सिद्ध हो सकता है।

यदि किसी के मन में कुण्डलिनी नहीं बनी हुई है, तो उसके द्वारा की गई पूजा उलटी भी पड़ सकती है। पूजा से उसके मन में चित्र-विचित्र प्रकार के विचार उठेंगे, क्योंकि पूजा से शान्ति व मानसिक शक्ति प्राप्त होती है। इससे पूजा की शक्ति घटिया किस्म के विचारों को भी मिल सकती है, जो हानि पहुंचा सकते हैं। जो पूजा-शक्ति कुण्डलिनी-रूपी एकाकी व लाभदायक विचार को पुष्ट कर सकती है, वह विचारों के हानिकारक झमेले को भी पुष्ट कर सकती है। इसीलिए कहते हैं कि पुजारी या गुरु का योग्य होना बहुत जरूरी है।

मैं अपने दादा के साथ लोगों के घरों में वैदिक पूजा-पाठ कराने जाया करता था। उस पूजा से मेरी पहले से विद्यमान तांत्रिक कुण्डलिनी बहुत अधिक बलवान हो जाया करती थी। उससे मुझे बहुत अधिक आनंद के साथ भरपूर सकारात्मक शक्ति प्राप्त होती थी। वह शक्ति वैसी ही यजमान को भी प्राप्त हो जाया करती थी, क्योंकि वे मेरे दादा के साथ मेरे प्रति भी प्रेमभाव सहित आदर-बुद्धि व सेवाभाव रख रहे होते थे।

इसी तरह प्रत्येक कर्म भी बड़ी आसानी से पूजा बन सकता है, यदि शरीरविज्ञान दर्शन के अनुसार यह सत्य सिद्धांत समझा जाए कि प्रत्येक कर्म अद्वैतशाली देहपुरुष की प्रसन्नता के लिए ही किया जाता है।

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Kundalini in worship

All religious activities are endowed in Kundalini just like rivers in the sea. When we are worshiping some goddess or god, then we are indirectly worshiping the Kundalini. According to the physiology philosophy / shareervigyan darshan, the gods and goddesses are present in the form of non-dual dehpurush in the body of deities. Therefore, worship of the deity becomes their worship automatically. Advaita is strengthened in the mind of the person who worships him. According to the philosophy of physiology, it is the principle that Kundalini and Advaita/non-duality live together. Therefore, the Kundalini-Pooja / kundalini worship is done through Devapujan / god worship itself, due to which the Kundalini becomes progressively stronger, and can be awakened by observing favorable conditions.

Even if we do not accept the existence of Dehpurush inside God-idol, there is no problem even then. Because all the things of nature that we call as the nonliving are not lifeless actually, but are living with non-duality. All atoms and fundamental particles of nature also exist in the body of the idol. Therefore, the worship of the God-idol is equal to the worship of the non-dual nature itself. The scientific imagination of the existence of Dehpurush is done only to show complete equality between the entire nature and the human-form idol. This also increases the strength of non-duality.

As soon as the Kundalini becomes manifest with idol worship, and the relation between worship and Kundalini is taken into consideration, that soon by meditating on worship procedure, the Kundalini receives the meditation itself. Due to this, Kundalini keeps on shining. For example, by meditating on the sound of a bell in front of a God-idol and subtle or indirect thinking about it as serving the kundalini present in God-idol, sharper meditation goes on shifting to the Kundalini itself at intervals. This is the case even when the ancestors are being worshiped. Because the bodies of the ancestors are also pure, divine, and non-dual like the God or Nature.

It means that one, who does not have knowledge of Kundalini, he does not receive the full result of worship. A Kundalini-yogi can be a perfect type of priest. If the Kundalini is not built in anyone’s mind, then the worship made by him can also cause mental trouble. Puja will give power to ​​strange-looking thoughts in his mind, because worship gives peace and mental strength. In this way, power of worship can also be got by poor quality ideas, which can cause harm. The power, which can strengthen the lonely and beneficial thinking about the Kundalini that can also strengthen the harmful jumble of thoughts. That is why it is said that being an able and qualified priest or master is very important, not merely being.

I used to accompany my grandfather to Vedic pooja in the homes of people. From that worship, my already existing Tantric Kundalini would become very strong. From that, I got a lot of positive power with great pleasure. The hosts would have received that power as well, because they used to have love and respect for my grandfather along with me.

Similarly, every action can be made as worship very easily, if according to physiological philosophy, this true theory is understood that every action is done only for the appeasement of non-dual Dehpurusha of our own body.

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Interrelation between Kundalini and idol worship

One has to make cordial relations with Kundalini for a very long time to activate and awaken it. Most likely it is very hard in a single lifetime. It is therefore necessary that Kundalini be remembered by one since his birth. Even when a man is in the womb of the mother, then he must start getting subtle impression of kundalini meditation. Ishtadev (favored god) has been conceptualized to make it possible. Ishtdeva is always the same for all. From this, in the family that believes in that god, the habit of meditating on him continues to grow throughout the long series of generations. That is why it is easy for the people of Shaiva ​​Sampradaya (Shiva-creed) to meditate on the same form of Shiva. By the same meditation, Shiva, who settles in a Shaiva people’s heart, he can become their own Kundalini, which can eventually become alive as a Kundalini-awakening. If Shiva were not given a definite form by the visionary sages, then the meditation of Shiva would not progressively increase and would be interfered repeatedly.

Suppose, a man would have considered Shiva as longhaired, and his son would have considered Shiva as short haired, what would happen? In this way, the son did not receive the meditation earned by his father. He collects his own meditation from the beginning, making him a little profit. The benefit that he would get, it would be that in his life, in a small quantity, non-duality and non-attachment would arise. Then he would not get Kundalini awakening due to tremendous non-attachment and non-duality.

Dev Shankar is the most important among the deities. That is why he is called great Lord, being the Lord of Lords. He has been given a definite form. The necklace of the snake is there in his neck. He has lengthy hair on his head. The half moon is seated on his head. The Ganga River is coming out from his head-hair. There are three parallel lines marked with sandalwood and ash on his forehead, which is called Tilak. It is also called Tripund. The third eye is also seen open at many places in his mid eyebrow. He is covered with ash. He has a trident in one hand, and in one hand, he has a damaru (a special single handed drum). He rides a bull. He wears the tiger’s skin, and does not wear any other clothes. He is beautiful. His facial look and texture are balanced and free of error. His face is vibrant and attractive. His body is soft, muscular, strong and balanced. He has a facial complexion of medium white color. His movements are full of advaita (non-duality), non-attachment, and quietness.

Likewise, other deities and goddesses have also been given certain shapes and sizes. Along with these, they have also been given certain quotes and ethics. Ganesha has been described as a mouse rider, a laddoo (a type of sweet) lover, and having an elephant face. Similarly, nine different Goddesses have also been given different introduction.

According to this principle, making your ancestor or family elderly (grandfather etc.) as your master is more beneficial. Because a person is acquainted with him since his birth and is very cordial with him, so it is the easiest to put him in mind. Then the same mental idol (mental picture) made out of him becomes active and awakened by becoming a Kundalini with constant practice.

God-idol is associated with old friends, acquaintances and ancestors. When someone reconnects to those contemporary deities of those acquaintances, then the memories of those familiar beings are re-opened. The most effectively remembered being of them could emerge in the form of permanent remembrance (Kundalini) with the repeated practice. In science, it is called conditioned reflex. According to this, when two objects have sat together in the mind, then both objects are joined together. Whenever an object is remembered, then the other thing associated with it is remembered by itself. It is just like that biological phenomenon, when a cow starts letting down her milk on seeing her calf. In this way, god-statues work as social conditioners or social links. They play an important role in maintaining the memory of loved ones and acquaintances. This same principle applies in relation to all other prescribed religious laws. Although idols are main in it, because they are human, beautiful, easy to be accessible, unrivaled, and attractive.

If one does not notice direct benefit from idol worship, even then a good habit of meditation and deep feeling is formed with help of it. It helps in the overall growth of humanity. The same happened to Premyogi vajra, that is why he could get glimpse forms of Enlightenment and Kundalini awakening. Actually, deities were worshipped in their pure natural form in Vedic period. Later on, many of these deities were personified in human form with ongoing social reforms, Which is also based on scientific philosophy.

Natural things are non-dual and detached in their inherent internal form. That is why a blissful peace is felt at natural places. Actually, god idols are the miniaturized models of the vast nature for it is scriptural and also scientifically proved by “Shareervigyan darshan” that  everything external is situated inside the human body. These tiny models have been designed for the confined home environment.

Now it comes about religion-change. Based on the above facts, we should never sacrifice our religion. Because of the change of religion, the memories of the familiar ones that are associated with one’s home religion are lost, and so the good opportunities for Kundalini-growth are missed by hand. A saying in this regard also comes in the scriptures, “Shreyo Swadharmo Vigunopi, Paradharmo Bhayavaha”. That is, even though one’s own religion is of low quality, then too it provides welfare, but the religion of others is so frightening. It does not mean that one should be strictly religious or religious extremist, or should not accept other religions. Rather it means that while accepting all the human religions, one’s own religion should be made the main one. It should be kept in mind that this does not apply to yoga, because yoga is not a particular religion. Yoga is a spiritual psychology, which is an integral part of all the religions.

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