कुण्डलिनी व प्रेम सम्बन्ध के बीच में आपसी रिश्ता- mutual relationship between Kundalini and love affair

कुण्डलिनी व प्रेम सम्बन्ध के बीच में आपसी रिश्ता (please browse down or click here to view this post in English)

कुण्डलिनी एक जीवनी शक्ति है। समाज में यादों के सहारे जीने की जो बात चलती है, वह कुण्डलिनी के सहारे जीने की ही बात है। इसी तरह, प्रेमसंबंध भी कुण्डलिनी को पैदा करता है, जिससे विभिन्न कुण्डलिनी-लक्षण पैदा होते हैं। कुण्डलिनी प्राणों (साँसों सहित) को बल प्रदान करती है। कुण्डलिनी मानसिक विचार का ही पर्याय है। इस प्रकार से सभी मानसिक विचार प्राणों को पुष्ट करते हैं।

किसी व्यक्ति विशेष का लगातार यादों में, अर्थात मन में बने रहना ही कुण्डलिनी-क्रियाशीलता है। उससे उस व्यक्ति विशेष के रूप से बनी मानसिक छवि को ही कुण्डलिनी कहते हैं, तथा उस मानसिक छवि से एकाकार होने को ही कुण्डलिनी जागरण कहते हैं।

जब कोई व्यक्ति कहता है कि वह अपने प्रेमी के बिना जी नहीं सकता, तब वह उसके रूप से बनी अपनी मानसिक कुण्डलिनी के बिना न जी सकने की ही बात करता है। वास्तव में वह अपने प्रेमी के भौतिक रूप के बिना भी जी सकता है, यदि प्रेमी की छवि उसके मन में बस गई हो। तभी तो बहुत से प्रेमी जोड़े एक-दूसरे से अलग रहकर, एक-दूसरे की यादों के सहारे ही पूरा जीवन सुखपूर्वक बिता लेते हैं। उनके मन में बसी एक-दूसरे की वही छवि तो कुण्डलिनी है। वह उनके पूरे अस्तित्व को चलायमान रखती है। प्रेमी उसे नहीं छोड़ सकता। यदि वह जबरदस्ती उसे हटाने का प्रयत्न करता है, तो वह अँधेरे में जैसे डूबने लगता है, क्योंकि उसका सभी कुछ उस कुण्डलिनी के साथ जुड़ गया होता है। इसलिए वह मजबूरी में उसे बना कर रखता है। जब समय के साथ वह छवि मिटने लगती है, तब कोई नई छवि उसका स्थान लेने लगती है। इसी से पता चलता है कि कुण्डलिनी एक जीवनी शक्ति है। यौनसंबंध से उस मानसिक छवि को शक्ति मिलती है। ऐसा ही ओशो महाराज भी कहते हैं। तभी तो जगत में यौनसंबंध को सबसे बड़ा सुख माना जाता है। यदि वह सम्बन्ध तांत्रिक विधि से हो, तब तो और भी अधिक शक्ति मिलती है, जिससे वह जागृत भी हो सकती है।

अतः उपरोक्त बातों से स्वयंसिद्ध है कि अंतर्लैंगिक प्रेमसंबंध में भी कुण्डलिनी लक्षण उत्पन्न होते हैं। प्रेमी के रूप से निर्मित मानसिक कुण्डलिनी लगातार मन में बसी रहती है। उससे व्यक्ति यौनसंबंध बनाने के लिए या विवाह सम्बन्ध बनाने के लिए प्रोत्साहित होता है, ताकि वह कुण्डलिनी शांत हो सके। यद्यपि वह कुण्डलिनी लाभदायक होती है, पर व्यक्ति उसके अस्थायी दुष्प्रभावों से विचलित हो जाता है। वे दुष्प्रभाव निम्नलिखित प्रकार के हैं। वह उसकी शारीरिक व मानसिक शक्ति का कम या ज्यादा रूप में भक्षण करती रहती है। उससे उसका मन दुनियादारी में कम लगता है। वह एकांत को पसंद करने लगता है। वह लोगों को बुझा-बुझा सा दिखता है। अन्य वे सभी लक्षण उत्पन्न होते हैं, जो कुण्डलिनी के लिए सामान्य हैं, जैसे कि शरीर में, मुख्यतः हाथों में कम्पन, सिरदर्द के साथ सिर में भारीपन, भावुकता, उत्तेजना आदि। तभी तो कई प्रेमी अपने प्रेम के असफल होने पर घातक कदम भी उठा लेते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि कुण्डलिनी उनका पीछा ही नहीं छोड़ेगी, और उन्हें बिलकुल नकारा कर देगी। परन्तु वास्तविकता यह है कि वह कुण्डलिनी उनके सारे पाप धोकर उन्हें आत्मज्ञान तक पहुंचा देती है। प्रेमयोगी वज्र के साथ भी यही हुआ था, जो उसकी पुस्तक “शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)” में विस्तार से वर्णित है। फिर बाद में उसके गुरु के रूप की कुण्डलिनी उसके मन में जागृत हो गई थी, जिसने उसकी प्रेमिका की कुण्डलिनी का स्थान ले लिया था। इस तरह से, लगभग 20 सालों के बाद उसका पीछा उसकी प्रेमिका के रूप की कुण्डलिनी से छूट पाया था।

विडम्बना है कि प्रेम के सफल होने पर भी व्यक्ति को संतुष्टि नहीं मिलती। विवाह के बाद प्रेमी का आकर्षण समाप्त हो जाता है, जिससे उसके रूप की कुण्डलिनी भी गायब हो जाती है। वह जीवनी शक्ति के लिए तरसने लगता है। फिर वह पछताता है कि क्योंकर उसने प्रेमी की यादों (कुण्डलिनी) से घबरा कर प्रेम को परवान नहीं चढ़ने दिया। वह सोचता है कि प्रेमी के भौतिक रूप से अच्छी तो उसके रूप से निर्मित मानसिक कुण्डलिनी ही थी। यद्यपि फिर भी कुछ नहीं बिगड़ा होता है, यदि वह मौके की नजाकत को समझे। क्योंकि वैसी पछतावे वाली स्थिति में वह संदर्भित तंत्र / अप्रत्यक्ष तंत्र का सहारा ले सकता है, जिसमें वह अपने जीवनसाथी-प्रेमी की सहायता से गुरु, देवता , इष्ट आदि के रूप की कुण्डलिनी को जागृत कर सकता है। इस तरह के समस्त तथ्य उपरोक्त पुस्तक में सविस्तार वर्णित हैं।

वैसे तो मन के सभी विचार जीवनी शक्ति देते हैं। एक बहिर्मुखी आदमी में ये विचार निरंतर जारी रहते हैं, इसलिए उसकी जीवनी शक्ति निरंतर बनी रहती है। जब उसका शरीर किसी कारणवश क्षीण हो जाता है, तब उसकी बहिर्मुखता भी क्षीण हो जाती है। इससे वह निर्विचार सा होकर जीवनी शक्ति के लिए तरस जाता है। फिर वह अकेली मानसिक छवि को योग से पुष्ट करने लगता है, ताकि वह जीवनी शक्ति प्राप्त करता रह सके। बुद्धिमान व्यक्ति बहिर्मुखता के साथ योग या प्रेम से या दोनों से कुण्डलिनी को भी पुष्ट करता रहता है, ताकि वह संकट के समय काम आवे। भाग्यहीन व्यक्ति न तो बदलते विचारों का पूरा लाभ उठाता है, और न ही कुण्डलिनी-रूपी अकेले यौगिक विचार का। इसलिए जीवनी शक्ति के अभाव के कारण उसका जीवन संकट में पड़ा रहता है।

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Mutual relationship between Kundalini and love affair

Kundalini is a Life force. What is the matter of living in the society with the help of memories; it is only a matter of living with the help of Kundalini. Likewise, love affair also produces Kundalini, which causes various Kundalini-symptoms. Kundalini gives strength to pranas / subtle breath-power (including breaths). Kundalini is a synonym for mental thought. In this way, all mental thoughts affirm life.

A continuous memory of a particular person, that is to remain in the mind, is the Kundalini-activation. From that, the mental image created from the physical form of a particular person is called Kundalini, and Kundalini awakening is to be united with that mental image.

When a person says that he cannot live without his lover, then he talks about not living without the Kundalini. In fact, he can live without the physical nature of his lover, if the image of the lover has settled in his mind. Only then, many lover couples spend their whole life happily, living apart from each other, with the help of each other’s memories. The same image in the mind of lover is Kundalini. She keeps his whole existence moving. He cannot leave her. If he forcefully tries to remove her, then he starts drowning in the darkness, because his everything has gone attached with that image. That is why he maintains her in compulsion. When the image begins to dissolve over time, then a new image begins to take its place. This shows that Kundalini is a life force. Sexual mood gives strength to that mental image. Similar are also the words of Osho Maharaja. Only then, sexual relations are considered the greatest happiness in the world. If that relation is with the Tantric method, then kundalini gets even more power, so that she can also be awakened.

Therefore, there is axiom by the above things that kundalini symptoms arise in romantic love affair also. The mental kundalini built from the physical form of a lover constantly resides in the mind. The person is encouraged to make sexual relation or to create a marriage relationship, so that the Kundalini can calm down. Although the Kundalini is beneficial, the person gets distracted by its temporary side effects. These are the following types of side effects. She uses less or more of his physical and mental powers. His mind wants to be less in the world. He seems to like seclusion. It looks to people as if he has gone extinguished. Other all those symptoms are common, which are normal for the Kundalini, such as subtle tremors in the body, mainly vibrations in the hands, heaviness in the head with headache, emotionalism, excitement etc. Only then do many lovers take fatal steps when their love fails, because they think that Kundalini will not leave them normal, and will make them rejected altogether. However, the reality is that the Kundalini, by washing all their sins, leads them to enlightenment. This was the case with Premyogi Vajra, which is described in detail in his book (in Hindi) “shareervigyan darshan- ek adhunik kundalini tantra (ek yogi ki premkatha); Physiology philosophy – A Modern Kundalini tantra (The Love Story of a Yogi)”, and “love story of a yogi- what Patanjali says”. Both of these are also available on “shop” page of this website. Later, his Kundalini made of his Guru’s form had awakened in his mind, who had replaced his girlfriend’s Kundalini. In this way, after twenty years of pursuing it, he was exempted from the kundalini made of his girlfriend’s form.

Ironically, even after the success of love, the person does not get satisfaction. After marriage, the attraction of the lover ends, so that the Kundalini of her form also disappears. He seems longing for the force of life. Then he regrets why he did not allow love to go to peak out of fear of lover’s memories (the Kundalini). He thinks that the lover’s physical form is worse than the mental kundalini built from her that physical form. Although nothing is non repairable then too, if he understands the potential of the spot. Because in such a situation, he can resort to the contextual Tantra / indirect Tantra in which he can awaken the Kundalini of the form of Guru, God, favorite etc. with the help of loving life partner. All such facts are described in detail in the above book.

By the way, all thoughts of the mind give the force to life. These thoughts continue in an extroverted man, so his life force continues to be sustained. When his body gets impaired for some reason, then his extrovert nature also becomes impaired. This leads to a bit of gross thoughtlessness and yearns for life. Then he starts to consolidate the single mental image with the yoga, so that he can get the life force. The wise person keeps on strengthening the Kundalini along with his extrovert nature with help of yoga / meditation or love or both, so that she will work in times of crisis. An ill fated one does not take full advantage of changing thoughts, nor of the yogic thought alone, that is named as kundalini. Therefore, due to the absence of life force, his life remains in crisis.

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कुण्डलिनी का पुरातन जीवनशैली से सम्बन्ध- relationship between Kundalini and antiquity

यह पोस्ट देवी माता व उनके नवरात्रि त्यौहार को समर्पित है।

कुण्डलिनी का पुरातन जीवनशैली से सम्बन्ध (please browse down or click here to view this post in English)

कुण्डलिनी-विषय को पुरातन-पंथी कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। “कुण्डलिनी” शब्द भी संस्कृत भाषा का है। संस्कृत भाषा को पुरातन पंथी वैसे भी कहा जाता है। मन में निरंतर बस रही सबसे प्यारी छवि को ही कुण्डलिनी कहा जाता है। वह छवि देवता की भी हो सकती है, किसी प्रेमी / प्रेमिका की भी हो सकती है, गुरु की भी हो सकती है, और यहाँ तक कि शत्रु की भी हो सकती है। बिना प्रेम किए ही शत्रु की छवि मन में बस जाती है। कंस के मन में कृष्ण की छवि बस गई थी। इसी तरह, शिशुपाल के मन में भी भगवान् श्रीकृष्ण की छवि बस गई थी। यह अपवाद-स्वरूप है। इसी तरह, तांत्रिक आकर्षण से निर्मित मानसिक छवि बिना प्रेम के या कम प्रेम के साथ भी मन में बस सकती है। अधिकाँश मामलों में परम प्रेमी लोगों की छवि ही मन में बसी होती है। फिर भी, छवि को मन में बसाने वाले मूल साधन के रूप में तांत्रिक आकर्षण (यिन-याँग आकर्षण) ही प्रतीत होता है। ओशो महाराज भी ऐसा ही कहते हैं। कृष्ण के प्रेम में दीवानी मीरा के मन में कृष्ण की छवि बस गई थी। इसी तरह, गोपियों के मन में भी कृष्ण की छवि बस गई थी। रांझा के मन में हीर की छवि बस गई थी, और हीर के मन में रांझा की छवि बस गई थी। लैला के मन में मजनू की, व मजनू के मन में लैला की छवि बस गई थी। इसी तरह से रोमियो के मन में जूलियट की छवि बस गई थी, व जूलियट के मन में रोमियो की छवि बस गई थी। यदि पहाड़ों के प्रेम-प्रसंगों को लें, तो रान्झू के मन में फूलमाँ की, व फूलमाँ के मन में रान्झू की छवि बस गई थी। दुर्योधन के मन में उसके मित्र कर्ण की छवि बस गई थी, व कर्ण के मन में दुर्योधन की। योगी श्री रामकृष्ण परमहंस के मन में माता काली की छवि बस गई थी। इसी तरह, स्वामी विवेकानंद के मन में उनके अपने गुरु व योगी श्री रामकृष्ण परमहंस के रूप वाली कुण्डलिनी-छवि बस गई थी। भक्त हनुमान के मन में भगवान राम के रूप की कुण्डलिनी बस गई थी

तो क्या प्रेम का नाम ही कुण्डलिनी है? हाँ, प्रेम ही कुण्डलिनी है। कुण्डलिनी कोई विशेष नाड़ी, विशेष हड्डी या कोई अन्य भौतिक वस्तु नहीं है। हाँ, विभिन्न भौतिक वस्तुओं से कुण्डलिनी को पुष्ट करने में, व उसे जागृत करने में सहायता अवश्य मिलती है। मन में निर्बाध रूप से बनी हुई प्रेमी की छवि ही कुण्डलिनी है। जब कभी भी कोई आदमी उस छवि में कुछ क्षणों के लिए इतना अधिक खो जाता है कि उसे अपने पृथक अस्तित्व का बोध ही नहीं रहता, और वह कुण्डलिनी के साथ एकाकार हो जाता है, तब उसे ही कुण्डलिनीजागरण या पूर्ण समाधि कहते हैं। तो फिर हठयोगी की कुण्डलिनी कैसे विकसित होती है? हठयोगी तो किसी से प्रेम नहीं करता।

हठयोगी योग के निरंतर अभ्यास से अपने मन में कुण्डलिनी को पुष्ट करता है। जो काम प्रेम के कारण स्वयं होता है, वही काम वह योग के बल से करता है। तभी तो वह अपने मन में वैसी कुण्डलिनी छवि को भी जागृत कर सकता है, जिसके प्रति आमतौर पर प्रेम नहीं पनपता। उदाहरण के लिए, वह सूर्य की छवि को, वायु-स्पर्श की अनुभूति की छवि को, ध्वनि की छवि आदि-2 किसी भी प्रकार की छवि को अपने मन में जागृत कर सकता है। यद्यपि उसके लिए प्रेमी मनुष्य की छवि को जागृत करने के लिए लगाए जाने वाले योगबल की तुलना में कहीं अधिक योगबल लगाने की आवश्यकता होती है। वैसा प्रचंड योगबल केवल पहुंचे हुए योगी ही उत्पन्न कर सकते हैं, जो बहुत विरले होते हैं। सबसे सुगम तरीका यह होता है कि पहले अनन्य प्रेमी की छवि को प्रेम-व्यवहार से मन में पुष्ट किया जाए, फिर अतिरिक्त योगबल की सहायता से उसे जागृत किया जाए। प्रेमी मनुष्य की  कुण्डलिनी-छवि सर्वाधिक मानवतापूर्ण भी है, क्योंकि उससे मानवमात्र के प्रति आदरबुद्धि व प्रेम अत्यधिक रूप से बढ़ जाते हैं।

अब पुरातन व आधुनिक पक्ष की बात करते हैं। किसी व्यक्ति के साथ लम्बे समय तक परस्पर सद्भाव, सद्व्यवहार, सहयोग, मेल-मिलाप, निःस्वार्थ भाव व तारतम्य को बनाए रखकर ही उसके प्रति प्रेम उपजता है। ऐसा करने को पुरातन पंथ कहा जाता है, और ऐसा करने वाले को पुरातनपंथी। अवसरवाद को आधुनिकता कहा जाता है। अवसरवाद से प्रगाढ़ प्रेम-सम्बन्ध को बनने का अवसर ही नहीं मिल पाता है, साथ में उससे बना-बनाया प्रेम-सम्बन्ध भी नष्ट हो जाता है। जब तक दूसरा व्यक्ति अपने लिए हितकारक लगेगा, तभी तक उससे प्रेमसम्बन्ध बना रहेगा। जैसे ही वह अहितकारक लगने लगेगा, वैसे ही बना-बनाया प्रेमसम्बन्ध टूट जाएगा। इसे ही अवसरवाद कहते हैं। अपने मन में किसी व्यक्ति की छवि को स्थिर कुण्डलिनी का रूप प्रदान करने के लिए, अपने हित-अहित को दरकिनार करते हुए उससे लम्बे समय तक प्रेमसम्बन्ध बना कर रखना पड़ता है। इसे पुराना फैशन कहा जाता है। तभी तो मैंने कुण्डलिनी को पुरातन-पंथी कहा है।

आत्मज्ञान व अद्वैतभाव भी पुरातन-पंथी ही हैं। आत्मज्ञान कुण्डलिनी से ही उपलब्ध होता है। आत्मज्ञान के बाद भी कुण्डलिनी मन में निरंतर बसी रहती है। इसी तरह, पिछली पोस्टों में सिद्ध किया गया है कि अद्वैत व कुण्डलिनी एक-दूसरे को बढ़ाते रहते हैं। इसी तरह, सभी धार्मिक क्रियाकलाप भी पुराने तौर-तरीके के रूप में जाने जाते हैं, क्योंकि सभी का एकमात्र उद्देश्य कुण्डलिनी ही है।

अतः सिद्ध होता है कि जीवन की पुरानी शैली कुण्डलिनी-सम्मुखता के रूप में है, जबकि तथाकथित आधुनिक शैली कुण्डलिनी-विमुखता के रूप में है। पुराने और नए तौर-तरीकों के बीच में कोई भी भौतिक विभिन्नता नहीं है। केवल दृष्टिकोण, विचारधारा, व जीवन-व्यवहार का ही अन्तर है। इस तरह से हम देख सकते हैं कि जीवन के नए तौर-तरीके से आध्यात्मिक उन्नति बहुत दुर्लभ है। आजकल सर्वाधिक व्यावहारिक तरीका यह है कि आधुनिक व पुराने तौर-तरीकों को मिश्रित रूप में अपनाया जाए। यही तंत्रात्मक जीवन-पद्धति प्रेमयोगी वज्र द्वारा रचित “शरीरविज्ञान दर्शन” का मुख्य आधार है।

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This post is dedicated to the Goddess Mother and her Navaratri festival.

relationship between Kundalini and antiquity

It will not be an exaggeration to mention the subject of Kundalini as an archaeologist. The word “Kundalini” is also of Sanskrit language. Sanskrit language is also called an archaeologist. The most beloved image that is constantly sitting in mind is called Kundalini. That image can also be of God, can also be of a boyfriend / girlfriend, it can be of a master (guru), and even an enemy can be. Without love, the image of the enemy settles in the mind. Krishna’s image was settled in his enemy Kans’s mind. Similarly, in the mind of Shishupala, Lord Krishna’s image was settled. This is an exception. Similarly, a mental image created by a tantric love affair can sit in the mind without love or with less love. In most cases, the image of the ultimate lover is in the mind. Even so, the tantric attraction (yin-yang attraction) appears to be the basic means of settling the image in the mind. Osho maharaj says the same thing. In Krishna’s love, the divine image of Krishna was settled in the mind of Mira. Similarly, the image of Krishna in the Gopis’ mind was settled. The image of Heer was settled in Ranjha’s mind, and the image of Ranjha was settled in Heer’s mind. In the mind of Laila, the image of Majnu was settled, and in Majnu’s mind, the image of Layla was settled. Similarly, the image of Juliet was settled in Romeo’s mind, and the image of Romeo in Juliet’s mind was settled. If you take the love affairs in the mountains, then in the mind of the Ranju, the image of Phoolman was settled and vice versa. In Duryodhana’s mind, the image of his friend Karna was settled, and in Karna’s mind, the image of Duryodhana was settled. The image of Mata Kali was settled in the mind of yogi Shri Ramkrishna Paramahansa. Similarly, in the mind of Swami Vivekananda, the Kundalini-image of Shri Ramkrishna Paramahansa, his own master and yogi, settled. In the mind of the devotee Hanuman, the Kundalini of Lord Rama was settled.

Therefore, Kundalini is the name of love. Yes, love is Kundalini. Kundalini is not a special pulse, special bone or any other physical object. Yes, it is possible to reinforce the Kundalini with various physical objects, and those help in its awakening too. The uninterrupted image of the lover in one’s mind is the Kundalini. Whenever a person is lost so much for a few moments in that image that he does not realize his separate existence, and he becomes united with the Kundalini, then he is called having Kundalini awakening or full Samadhi. Then how does the Kundalini of Hath yogi grow? Hath yogi does not love anyone.

Hath yogi reinforces the Kundalini in his mind with continuous practice of yoga. The work that is done by love itself is done by the power of yoga. Only then can he awaken that type of kundalini image in his mind, which usually does not grow in love. For example, he can awaken the image of the sun, the image of the sensation of the air-touch, the image of the sound etc., any type of image in its mind. Although it requires the addition of more yogic power than the yogic power needed to awaken the image of a loving human. Such a huge yogic power can be produced only by the yogis of far reaching, which are very rare. The easiest way is to first confirm the image of the unique lover in love with love-full interactions, and then awaken it with the help of the additional Yoga. The Kundalini-image made of a humanely lover is also the most humanitarian, because it greatly increases the respect and love towards humankind.

Now talk about the old and the modern side of living. Long-term mutual goodness, goodwill, cooperation, reconciliation, selflessness, brotherhood, and coordination are accompanied by a person’s love for a loving being. To do so, it is called an ancient cult, and the doer who is doing this is a fundamentalist. Opportunism is called modernism. Opportunism does not get the opportunity to create a strong love relationship, together with it destroys the already created love-relationships. As long as the other person will feel good for himself, that long he will remain in love. As soon as he starts to feel harm from him, the love-made love relationship will be broken. This is called opportunism itself. In order to give the image of a person the form of a stable Kundalini in your mind, bypassing your interests, it has to be kept affectionate for a long time. This is called old fashion. That is why I have called the Kundalini as the antiquity.

Enlightenment and advaita (non-duality) are also ancient. Enlightenment is available only from the Kundalini. Even after enlightenment, the Kundalini remains in the mind continuously. Similarly, in previous posts it has been proven that Advaita and Kundalini keep increasing each other. Likewise, all religious activities are also known as old ways, because the only purpose of all is Kundalini.

Therefore, it proves that the old style of life is in the form of a Kundalini-oriented lifestyle, whereas the so-called modern style is in the form of a Kundalini-opposing lifestyle. There is no physical variation between old and new modes. The only difference is there in the form of approach, ideology, and life-style. In this way, we can see that spiritual advancement in the new way of life is very rare. Nowadays, the most practical way is to adopt modern and old ways in mixed form. This tantric method of life is the main basis of “Shareeravigyan darshan” written by Premyogi vajra.

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सभी मित्रों के बीते वर्ष को सहर्ष विदाई व उनको नववर्ष 2019 की बहुत-2 शुभकामनाएं- Nice farewell to all the friends’ last year and many New Year wishes for them

सभी मित्रों के बीते वर्ष को सहर्ष विदाई व उनको नववर्ष की बहुत-2 शुभकामनाएं (please browse down to view this post in English)।

मेरा बीता वर्ष, 2018 निम्न प्रकार का रहा-

अपनी टाटा टियागो कार में लगभग 3000 किलोमीटर का सपरिवार सफ़र तय किया, जिसमें से अधिकाँश उन्नत उच्चमार्गों का सफर था। पीवीआर सिनेमा में 4 हिंदी फिल्में सपरिवार देखीं, 102 नोट आऊट, संजू, हनुमान वर्सस अहिरावना (थ्री डी एनीमेशन) व सिम्बा। मेरे माता-पिता तीर्थधाम यात्रा का जल चढ़ाने कन्याकुमारी / रामेश्वरम गए। अपने पुराने घर का नवीनीकरण करवाया गया। श्री मद्भागवत सप्ताह श्रवण यज्ञ का अनुष्ठान अपने घर में करवाया गया। मेरी पूज्य व वृद्ध पितामही जी का स्वर्गवास हुआ। मेरे बेटे को पहली कक्षा में ए-1 रहने पर पारितोषिक दिया गया। मेरी पत्नी के द्वारा नए सिलाई के प्रशिक्षण-कोर्स का प्रारम्भ किया गया। मुझे क्वोरा टॉप राईटर (क्वोरा शीर्ष लेखक)- 2018 का सम्मान मिला। मेरे द्वारा कुण्डलिनीयोग का प्रतिदिन का 1 घंटे का सुबह का व एक घंटे का सांय का अभ्यास एक दिन के लिए भी नहीं छोड़ा गया। इसके कारण मेरा वर्ष 2017 का कुण्डलिनीजागरण का अनुभव जारी रहा, महान आनंद के साथ। प्रेमयोगी वज्र की सहायता से इस मेजबानी वेबसाईट (https://demystifyingkundalini.com/home-3/) को पूर्णतः विकसित किया। इस वेबसाईट के लिए 139 शेयर, 30 लाईक्स, 4772 वियूस, 3099 विसिटर व 46 फोलोवर मिले। इस वेबसाईट के लिए मैंने लगभग 31 पोस्टें लिखीं व प्रकाशित कीं। प्रेमयोगी वज्र की सहायता से “शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)” नामक पुस्तक लिखी। उसके लिए 13 सशुल्क डाऊनलोड व 80 निःशुल्क डाऊनलोड प्राप्त हुए। उसके लिए अमेजन पर एक सर्वोत्तम रिव्यू / समीक्षा (5 स्टार) भी प्राप्त हुआ। साथ में, उसे गूगल बुक पर भी दो उत्तम व 5 स्टार रिव्यू प्राप्त हुए। दूरदर्शन के कार्यक्रमों में तेनालीरामा, तारक मेहता का उल्टा चश्मा, मैं मायके चली जाऊंगी, रियल्टी शोज व जी न्यूज (मुख्यतः डीएनए) का आनंद उठाया। अपने पोर्टेबल मिनी जेबीएल स्पीकर पर गाना एप के माध्यम से लगभग 2000 मधुर ओनलाईन गाने सुने। काटगढ़ मंदिर व टीला मंदिर के सपरिवार दर्शन किए। अपने किन्डल ई-रीडर पर 3 पुस्तकें पढ़ीं। पोस्ट पढ़ने के लिए धन्यवाद।

यदि आपको इस पोस्ट से कुछ लाभ प्रतीत हुआ, तो कृपया इसके अनुसार तैयार की गई उपरोक्त अनुपम ई-पुस्तक (हिंदी भाषा में, 5 स्टार प्राप्त, सर्वश्रेष्ठ व सर्वपठनीय उत्कृष्ट / अत्युत्तम / अनौखीरूप में निष्पक्षतापूर्वक समीक्षित / रिव्यूड ) को यहाँ क्लिक करके डाऊनलोड करें। यदि मुद्रित पुस्तक ही आपके अनुकूल है, तो भी, क्योंकि इलेक्ट्रोनिक डीवाईसिस / फोन आदि पर पुस्तक का निरीक्षण करने के उपरांत ही उसका मुद्रित-रूप / print version मंगवाना चाहिए, जो इस पुस्तक के लिए इस लिंक पर उपलब्ध है। इस पुस्तक की संक्षिप्त रूप में सम्पूर्ण जानकारी आपको इसी पोस्ट की होस्टिंग वेबसाईट / hosting website पर ही मिल जाएगी। धन्यवाद।

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Nice farewell to all the friends’ last year and many New Year wishes for them.

My last year, 2018 was of the following type:

Travelled around 3,000 km in my Tata Tiago car with family, most of which were the journey of advanced highways. In PVR cinema saw 4 Hindi films with family, 102 Not out, Sanju, Hanuman Versus Ahiravana (Three D Animation) and Simmba. My parents went to Kanyakumari / Rameshwaram for carrying water for pilgrimage. My old home was renovated. Shreemad Bhaagvat Shravan Yagna’s week long ritual was performed in my house. My devoted and old grandmother went to heaven. My son was rewarded for being A1 in the first grade. New sewing training-course was started by my wife. I got the Quora Top Writer- the honour of 2018. I did not leave the Kundalini Yoga practice for 1 hour of morning and one hour of evening everyday even for one day. Due to this my experience of KundaliniJagran of 2017 continued, with great bliss. With the help of Premyogi Vajra, this hosted website (https://demystifyingkundalini.com/) was fully developed. For this website, 139 shares, 30 likes, 3099 visitors, 46 followers and 4772 views were obtained. I wrote and published about 31 posts for this website. With the help of Premyogi Vajra, I wrote a book called “Shareervigyaan darshan- ek aadhunik kundalini tantra (ek yogi ki premkatha)”. For that 13 paid downloads and 80 free downloads were received. For that, a great review (5 stars) was also received on Amazon. Along with, two good and 5 star reviews were also obtained on Google book for that. In Doordarshan’s programs, Tenalirama, Tarak Mehta ka Ulta Chashma, main maayake chali jaaoongee, realty shows and Zee news (mainly DNA) were enjoyed well. Two thousands of melodious online songs have been heard through Gaana App on my portable mini JBL speaker. Visiting the Katgarh Temple and the Tila Temple with family by me. Read 3 books on my Kindle e-Reader. Thanks for reading.

If you have found some benefit from this post, please download here the above mentioned e-book (in Hindi language, 5 star rated, reviewed in unbiased way as the best, excellent and must read by everyone) made with steps as told above. If only print version suits you, then too print version should only be got after testing that’s e- version on the electronic devices / phone etc., that is available on this link for this book. You can also find the complete information about this book, both in English as well as Hindi languages on the hosting website of this post. Thank you.

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स्वयंप्रकाशन, आधुनिक तकनीक की एक अद्भुत देन-Self-publishing, a wonderful creation of modern technology 

स्वयंप्रकाशन, आधुनिक तकनीक की एक अद्भुत देन (please browse down or click here to view post in English)

मुझे हाल ही में एक पुस्तक को तैयार करने का मौका मिला, जिसका नाम है, “शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)”, और जिसको लिखा है, प्रेमयोगी वज्र नामक एक रहस्यमयी योगी ने। सबसे पहले मैंने उसके द्वारा कई वर्षों से समेटी गई अस्त-व्यस्त रूप की लिखित सामग्री / written material को सही ढंग से क्रमबद्ध किया। फिर बारम्बार उसको पढ़कर, उस पूरी सामग्री को अपने मन में बैठा लिया। वास्तव में लिखने का काम तो बहुत से लोग कर लेते हैं, परन्तु अंतिम दौर में उसे पुस्तक के रूप में सभी नहीं ढाल पाते। यह इसलिए, क्योंकि उसके लिए बहुत अधिक कड़ी व अनवरत मेहनत समेत संघर्ष, लगन, ध्यान, धारणाशक्ति व निरंतरता की आवश्यकता होती है। तीव्र एकाग्रता व स्मरणशक्ति को लम्बे समय तक बना कर रखना पड़ता है। पूरी पुस्तक-सामग्री को मन में एकसाथ बैठा कर रखना पड़ता है, ताकि पूरी सामग्री को युक्तियुक्तता, रोचकता व सजावट के साथ क्रमबद्ध किया जा सके। साथ में, जिससे उसमें पुनुरुक्तियाँ / repetitions भी न हो पाएं। फिर मैंने उसकी बहुत सी पुनुरुक्तियों को हटाया, तथा निर्मित क्रमबद्ध रूप में ही उसे कम्प्युटर पर टाईप करने लगा। समय की कमी के कारण लगभग 300 पृष्ठों को टाईप करने में एक साल लग गया। प्रेमयोगी वज्र बीच-2 में भी लिखित सामग्री भेजता रहा, जिसे भी मैं प्रसंगानुसार उस वर्ड फाईल / word file के बीच-2 में जोड़ता रहा। मैं माईक्रोसोफ्ट वर्ड-2007 / Microsoft word-2007 पर टाईप / type कर रहा था। कहीं मेरा टाईप किया हुआ मेटीरियल / material कम्प्यूटर की खराबी से या अन्य कारणों से नष्ट न हो जाता, उसके लिए मैं अपनी टाईप की हुई फाईल को डी-ड्राईव / D-drive (जिस पर विंडोस-फाईल्ज / windows files नहीं होतीं) में रख लेता था, और साथ में बाहरी स्टोरेज / external storage पर बेक-अप / backup के रूप में भी सुरक्षित रख लेता था। मैंने 600 रुपए के वार्षिक सब्सक्रिप्शन / annual subscription पर (डिस्काऊंट ऑफर / discount offer पर, वास्तविक मूल्य तो रुपए 1500 था) एवरनोट / Evernote को खरीदा हुआ था। वह मुझे सबसे सुरक्षित व आसान लगा, वैसे तो जी-मेल / G-mail या गूगल-ड्राईव / Google drive पर भी मुफ्त में बैक-अप रख सकते हैं। एवरनोट में अन्य भी बहुत सी अतिरिक्त सुविधाएं हैं। उसका लेखक के लिए एक फायदा यह भी है कि कहीं पर भी कुछ भी याद आ जाए, तो उस पर तुरंत लिखा जा सकता है, जो भविष्य के लिए स्टोर हो जाता है। उसका सर्च फंक्शन / search function भी बहुत कारगर है। कई बार मैं अपनी दूसरी वर्ड फाईल से या ब्लॉग पोस्ट / blog post से भी टेक्स्ट / text को कोपी / copy करके पुस्तक वाली फाईल में पेस्ट / paste कर देता था। परन्तु उससे फोर्मेटिंग एरर / formatting error आने से टेक्स्ट दोषपूर्ण हो जाता था, या गायब ही हो जाता था। तब मुझे पता चला कि पेस्ट करते समय ऑप्शन / option आता है कि किस स्टाईल / style में पेस्ट करना है। उसके लिए वह ऑप्शन सेलेक्ट / select करना पड़ता है, जिसमें “कीप टेक्स्ट ओनली” / keep text only लिखा होता है। इसको माईक्रोसोफ्ट वर्ड के बेस बटन / base button “वर्ड ऑप्शन” / word option में जाकर स्थाई तौर पर भी सेलेक्ट किया जा सकता है। और भी बहुत सी एडजस्टमेंट / adjustments सुविधानुसार उस पर की जा सकती हैं, हालांकि उनकी कम ही जरूरत पड़ती है। क्योंकि पुस्तक हिंदी में थी, अतः गूगल इनपुट / Google input के “हिंदी भाषा टूल” / Hindi language tool को डाऊनलोड / download किया गया था। उससे इंगलिश की-बोर्ड / English keyboard पर टाईप करने से उसके जैसे हिंदी के अक्षर छप जाते हैं। जैसे की “MEHNAT” को टाईप करने से फाईल में हिंदी का “मेहनत” शब्द छप जाता है। मैंने संस्कृत टूल को भी डाऊनलोड किया हुआ था, क्योंकि पुस्तक में बहुत से शब्द संस्कृत के भी थे। कम्प्युटर / computer को यूपीएस / UPS (बेटरी बैक-अप / battery backup) के साथ जोड़ा गया था, ताकि अचानक बिजली गुल होने पर कम्प्युटर एकदम से बंद न हो जाया करता, जिससे फाईल को सेव / save करने का मौका मिल जाया करता। वैसे भी टाईप करते हुए बीच-2 में फाईल को सेव कर लिया करता था। जब मेरी फाईल 150 पृष्ठों से बड़ी हो गई थी, तब कई बार सीधे ही पैन-ड्राईव / pen drive के अन्दर उसमें जोड़ा गया टेक्स्ट सेव नहीं हो पाता था, और उसकी सूचना स्क्रीन / monitor screen पर आ जाती थी। तब फाईल को पेन-ड्राईव से कोपी करके कम्प्युटर में पेस्ट करना पड़ता था। फिर उस पर टाईप किया हुआ टेक्स्ट सेव हो जाता था। कहीं दूसरे स्थान, दुकान आदि में टाईप करने के लिए उस ताजा फाईल को फिर से पेन-ड्राईव के अन्दर कोपी-पेस्ट करना पड़ता था। कई बार तो पेन-ड्राईव में स्टोर / store की गयी फाईल खुलती ही नहीं थी। ऐसा होने का एक मुख्य कारण कम्प्यूटर में वायरस होना भी है। इसलिए वायरस वाले कम्प्यूटर पर अपनी पेन ड्राईव न चलाएं, और अपने कम्प्यूटर पर हमेशा एंटिवायरस डाल कर रखें। इसलिए कुछ भी टाईप करने के बाद मैं उस फाईल को एवरनोट (पूर्वोक्त क्लाऊड-स्टोरेज / cloud storage) में बैकअप-स्टोर कर लेता था। पेन-ड्राईव की फाईल न खुलने पर, उस फाईल को एवरनोट से डाऊनलोड कर लेता था। इस तरह से मैंने कभी भी टाईप किए हुए टेक्स्ट को लूज / lose नहीं किया, एक पंक्ति को भी नहीं। इससे एक और फायदा यह होता था कि यदि कभी मेरे पास पेन ड्राईव नहीं होती थी, तो मैं एवेरनोट से बुक-फाईल को डाऊनलोड करके उस पर टाईप कर लेता था, और उसे फिर से एवरनोट में सेव कर लेता था। यद्यपि पेन ड्राईव हमेशा मेरे हेंड बेग में रहती थी। मैंने अतिरिक्त सुरक्षा के लिए, बुक-फाईल के पूरा होने पर उसे बाह्य हार्ड ड्राईव / external hard drive, गूगल ड्राईव व जी-मेल में भी सेव कर लिया। टेक्स्ट की लाईन-स्पेसिंग / line spacing बराबर नहीं आ रही थी। बहुत से फौंट / fonts प्रयुक्त किए, पर बात नहीं बनी। निर्देशानुसार पैराग्राफ स्पेसिंग-सेटिंग / paragraph spacing setting के “डू नोट एड एक्स्ट्रा स्पेस बिफोर ओर आफ्टर पेराग्राफ” / do not add extra space before or after paragraph को भी अनचेक / uncheck किया, पर बात नहीं बनी। मैं एरियल यूनिकोड एमएस / Arial unicode MS पर टाईप करता था। फिर मुझे इंटरनेट / internet से हिंट / hint मिला की कई फोंटों में गैर-अंगरेजी / non English भाषा के अक्षर अच्छी तरह से लाईन / line में फिट / fit नहीं होते। फिर मैंने बहुत से फोंटों को ट्राई / try किया, पर केवल केम्ब्रिया फोंट / Cambria font पर ही बात बनी, और लाईन स्पेसिंग बिलकुल बराबर व शानदार हो गई। उससे मेरी बहुत बड़ी समस्या दूर हो गई, विशेषतः पुस्तक का प्रिंट वर्जन / print version छपवाने के लिए, क्योंकि ई-बुक के लिए तो असमान लाईन स्पेसिंग से भी काम चल रहा था। पर एक बात गौर करने लायक थी कि केम्ब्रिया फॉण्ट तभी एप्लाई / apply हो रहा था, जब टेक्स्ट पहले से ही एरियल यूनिकोड एमएस में टाईप या रूपांतरित किया हुआ था, अन्यथा नहीं। दोनों ही फोंट बनावट में लगभग एक जैसे ही हैं, और हिंदी के लिए सबसे उपयुक्त हैं। टेक्स्ट को सेलेक्ट करके फोंट को कभी भी बदला जा सकता है।

अब आती है बारी वर्ड फाईल को किनडल ई-बुक / kindle e-book के अनुसार फोर्मेट / format करने की। चारों ओर के मार्जिन / margins एक सेंटीमीटर किए गए। हेडर व फूटर / header and footer रिमूव / remove किए गए। हेडर उसे कहते हैं जो एक जैसा वाक्य या शब्द हरेक पेज / page के टॉप / top पर सेलेक्ट एरिया / selected area में अपने आप लिखा होता है। ऐसा आपने पुस्तकों में देखा भी होगा। इसी तरह फूटर हरेक पेज के बॉटम / bottom के सेलेक्ट एरिया में स्वयं ही लिखा होता है। तभी ऐसा होता है यदि हेडर व फूटर को होम-सेटिंग में डाला गया हो। पेज नंबर / page number भी रिमूव किए गए। लाईन स्पेसिंग को 1.5 पर सेट किया गया। टेक्स्ट एलाईनमेंट / text alignment को लेफ्ट / left पर सेट / set किया गया। चित्र, ग्राफ / graph, टेबल / table आदि यदि टेक्स्ट में न ही हों, तो बेहतर है; क्योंकि ये ई-रीडर / e-reader में बहुत अच्छी तरह से डिस्प्ले / display नहीं होते हैं। ई-रीडर में केवल श्वेत-श्याम वर्ण ही होता है। यदि बहुत ही आवश्यक हो तो चित्र को भी डाला जा सकता है, यद्यपि वह बहुत जगह घेरता है, क्योंकि वह टेक्स्ट-लाईनों के बीच में फिट नहीं हो पाता, अपितु पेज के बाएँ मार्जिन से दाएं मार्जिन तक की पूरी जगह को टेक्स्ट के लिए अनुपयोगी बना देता है।

अगली पोस्ट में हम यह बताएंगे कि तैयार वर्ड-फाईल को केडीपी / KDP (किनडल डायरेक्ट पब्लिशिंग / Kindle direct publishing) में कैसे सेल्फ-पब्लिश / self publish करना है।

यदि आपको इस पोस्ट से कुछ लाभ प्रतीत हुआ, तो कृपया इसके अनुसार तैयार की गई उपरोक्त अनुपम ई-पुस्तक (हिंदी भाषा में, 5 स्टार प्राप्त, सर्वश्रेष्ठ व सर्वपठनीय उत्कृष्ट / अत्युत्तम / अनौखीरूप में समीक्षित / रिव्यूड ) को यहाँ क्लिक करके डाऊनलोड करें। यदि मुद्रित पुस्तक ही आपके अनुकूल है, तो भी, क्योंकि इलेक्ट्रोनिक डीवाईसिस / फोन आदि पर पुस्तक का निरीक्षण करने के उपरांत ही उसका मुद्रित-रूप / print version मंगवाना चाहिए, जो इस पुस्तक के लिए इस लिंक पर उपलब्ध है। इस पुस्तक की संक्षिप्त रूप में सम्पूर्ण जानकारी आपको इसी पोस्ट की होस्टिंग वेबसाईट / hosting website पर ही मिल जाएगी। धन्यवाद।

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Self-publishing, a wonderful creation of modern technology

I recently got an opportunity to prepare a book, whose name is “Shareervigyaan Darshan – Ek adhunik Kundalini tantra (ek yogi ki premkatha)”, and which has been originally written by a mysterious yogi named Premyogi Vajra. First of all, I sorted the written material of the disorganized form that he had been extending for many years. After reading the material again and again, I took the entire contents into my mind. In fact, many people do the work of writing, but in the last round, all of them do not shield the written material in the form of a book. This is because it requires struggle, passion, meditation, perception and continuity, including a lot of hard work and hard work. Acute concentration and memory have to be retained for a long time. The entire book-material has to be seated together in mind so that the whole material can be sorted with reasonableness, attractiveness and decoration. Together, in which words cannot be reproduced second time. Then I removed many of his reimaginations, and started typing it on the computer in the form of a textually built-in form. Due to a shortage of time, it took one year for typing about 300 pages. Premyogi Vajra also continued to send written content, which I continued to add to that word file in between the context at the right place. I was typing on Microsoft Word 2007. So that mine typed material is not destroyed by computer malfunction or for other reasons, I would have kept my typed file in the D-drive (which does not contain windows-files) and on external storage as back-up also safely. I had bought Evernote at an annual subscription of INR 600 (on the discount offer, the actual value was INR 1500). It seemed to me the safest and the easiest way to get back-up, even better than on Gmail or Google Drive both of which are free. Evernote also has many other additional facilities. There is also an advantage for his commentator that even if there is anything remembered anywhere, anything can be written immediately on it, which gets stored for the future. Its search function is also very effective. Many times I copied the text from my second word file or blog post and pasted it into the book file. But due to the formatting error coming from it, the text becomes defective, or disappeared. Then I came to know that there is an option to paste in which style to paste. For that, that option has to be selected, in which “Keep Text Only” is written. It can also be selected permanently by accessing the Microsoft Word’s base button “Word Option”. And also many adjustments can be made from here at the convenience level, although rarely required or not required at all. Because the book was in Hindi, so the “Hindi language tool” of Google Input was downloaded. By typing on the English keyboard, the letters like Hindi are printed. Like typing “MEHNAT”, Hindi’s “hard work” is printed in the file. I also downloaded the Sanskrit tool, because there were many words in the book also of Sanskrit. The computer was connected with UPS (Battery Backup) so that the computer did not stop immediately when suddenly the power was lost, thereby giving the opportunity to save the file. By typing anyway, I used to save the file again and again while typing. When my file went to be larger than 150 pages, added text was at times not able to directly be saved in that base text of the file while that being in pen-drive, and that had come to the notice screen. Then the file had to be copied from the pen-drive and pasted into the computer. Then the subsequently typed text was saved. In order to type in another place, shop etc., that fresh file had to be copied to the pen-drive. Many times the file stored in Pen-Drive did not open. That occurs mainly due to computer virus. So never use your pen drive on infected computer and keep antivirus programme installed on your computer always. So after typing anything I used to backup that file in Evernote (aforementioned cloud-storage). When the Pen-Drive file did not open, I would download the file from the Evernote.  In this way, I never lost the typed text, not even a line. Another advantage of this was that if I had ever not a pen drive, then I would download the book-file from Evernote and type it on it, and would have saved it again in the Evernote. Although the pen drive always used to be in my hand bag. I saved the completed book-file for extra security even in the external hard drive. The line-spacing of the text was not equal. I used lots of fonts, but it did not matter. I also unchecked “Do note ad extra space before and after paragraph” of paragraph spacing-setting as per the instructions, but it did not work. I used to type in Ariel Unicode MS. Then I got a hint from the internet that non-English language letters in many fonts do not fit well in the line. Then I tried a lot of fonts, but only thing happened on the Cambria font, and the line spacing became absolutely equal and fantastic. I got rid of my big problem, especially to print the print version of the book, because the e-book was also working with uneven line spacing. One thing to note was that the Cambria font was being used only when the text was already typed or converted into Aerial Unicode MS, otherwise it would not. Both fonts are almost identical in texture, and are most suitable for Hindi. By selecting the text, the fonts can be changed at any time.

Then comes to convert the word book-file to e-book format. The margins around were made one centimeter. Headers and footers were removed. Header is that in the form of same sentence or word written automatically in the selected area at the top of each page. Similarly, the footer is written in the selected area of ​​each page’s bottom. Page numbers were also removed. Line spacing was made 1.5. Text alignment set on the left. If not photo, graph, table etc., then it is better; because these in e-readers are not very well displayed. The e-reader only has black and white characters. The picture can also be inserted if it is very necessary, although it occupies a lot of space, because it does not fit in between text- lines, but the entire space from the left margin to the right margin of the page is made by this unusable for text.

In the next post we will tell how to publish the ready word-file in KDP (Kindle Direct Publishing).

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Importance of Body Chakras in Kundalini Yoga – A Scientific Discussion / कुण्डलिनीयोग में शारीरिक चक्रों का महत्त्व- एक वैज्ञानिक विवेचना

Importance of Body Chakras in Kundalini Yoga – A Scientific Discussion

Giving the importance of equality to all the chakras in the Kundalini Yoga during everyday life, Kundalini visualization / visualization is done on all the chakras turn by turn. Its advantage is that in some parts of the body the Kundalini comes into the grip. In fact, the Kundalini is associated with the chakras / parts of the body. When the activity of a chakra increases, then the blissful expression of the Kundalini, which is being visualized there upon, also increases. The activity of the body depends solely on physical blood circulation. When blood circulation increases on a chakra, then the activity of that chakra also increases. The total blood circulation of the body remains the same, only in different parts it keeps on changing only. If blood circulation increases on one chakra, then it is naturally decreased on any other chakra. By brain work, blood circulation increases in the brain, so during that time the Kundalini-visualization in the brain-chakra / Agya chakra is very simple and successful. Speech, writing, reading, colloquial etc. increases the circulation in the throat, thereby making the Kundalini’s visualization simple and effective on there / in the throat chakra / Vishuddhi chakra. When the feeling of emotions in mind increases the blood circulation in the heart, then due to visualization in the heart centre / heart chakra / Anahata Chakra, the Kundalini becomes more ignited. When the digestive tract is powerful, then there is increased blood circulation in the abdomen / naval area. Therefore visualization in naval chakra / Manipura Chakra at that time is of greater benefit. The effectiveness of sexually energizing sexual activity, the proper health of the waste-emitting organs and other physical (especially hands and feet related) actions increases the blood circulation on the sexual chakras / swadhishthana and muladhara chakra, therefore there is more activity in the Kundalini. That is why at that time those two chakras seem to get more attention.

In the household life, especially in duality and ignorance, all chakras cannot be functioning simultaneously and in common, because sometimes the tasks related to a particular area have to be emphasized, then sometimes tasks related to any other area. Therefore, in a single sitting of Kundalini Yoga, visualization of Kundalini is done on all the chakras turn by turn. Then the influential chakra itself comes under the purview of visualization, which has a greater sense of visualization-benefit. By this, visualization-gains gradually become accumulated in Kundalini Jagran / awakening. On the contrary, there is no cosmic responsibility for the ascetic-yogi or devoted yogi, so that he can easily keep stirring the activity for a long time on a particular chakra. Therefore, it is said that visualization should be done on the same chakra for a long time and then should move towards the next chakra, it has been said only for such a dedicated yogi. He is saved by a slight loss of visualization caused by chakra-change, nothing special. By continuously meditating on the same chakra, it can increase blood circulation to that chakra for a long time, because visualization on any part of the body increases blood pressures there itself. This is also the principle of spiritual healing. When someone entangled in the worldly life, by leaving his chakra, which is actively working with its naturalness, takes a forceful attention on any other chakra, then according to that need, the blood of the functioning chakra runs towards that chaotic chakra. From that necessity, the natural function of the functioning chakra will be affected by it less or more. Therefore, in the Yogasadhana / meditation-sitting under such busy worldly circumstances, the dhyana / attention should be applied on the same chakra which is easily or spontaneously meditative. Do not be forced to coax with other dormant chakras. By the way, by keeping the attention of all the chakras in the same way, all parts of the body are equally healthy; Life becomes balanced and moves forward in every field. By focusing continuously on a particular chakra, specializations can be gained quickly in the related areas of that chakra, although life can become unbalanced, and the health of the areas related to other body chakras can be questioned.

This type of perfect physical and mental balance becomes available from the advaita / non duality of Puranas / Aryan personified natural stories and through the Advaita obtained from the physiology / body science philosophy. This is because, because of non duality all things look alike, and there is no special attachment to a particular area. From this, the person meditates on all parts of his individual body as well as on the universal body, because the worldly creation (related to the world) and the individual creation (body-related) are both interconnected according to “yatpinde tatbramhaande”. The control over one is reflected itself as the control over the second one too in the same manner and same extent. From this non duality practice also, kundalini develops itself gradually and with less special efforts.

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कुण्डलिनीयोग में शारीरिक चक्रों का महत्त्व- एक वैज्ञानिक विवेचना

प्रतिदिन के लौकिक जीवन के दौरान जो कुण्डलिनीयोग किया जाता है, उसमें सभी चक्रों को बराबरी का महत्त्व देते हुए सभी चक्रों पर बारी-२ से कुण्डलिनी का ध्यान किया जाता है। इसका यह फ़ायदा होता है कि शरीर के किसी न किसी भाग में कुण्डलिनी पकड़ में आ ही जाती है। वास्तव में कुण्डलिनी शरीर के चक्रों / भागों से जुड़ी होती है। जब किसी चक्र की क्रियाशीलता बढ़ती है, तब उस पर ध्यायित की जाने वाली कुण्डलिनी की आनंदमयी अभिव्यक्ति भी बढ़ जाती है। शरीर की क्रियाशीलता शारीरिक रक्तसंचार पर ही तो निर्भर करती है। जब किसी चक्र पर रक्तसंचार बढ़ जाता है, तब उस चक्र की क्रियाशीलता भी बढ़ जाती है। शरीर का कुल रक्तसंचार तो एकसमान ही रहता है, केवल विभिन्न भागों में उसकी मात्रा घटती-बढ़ती रहती है। यदि एक चक्र पर रक्तसंचार बढ़ता है, तो किसी दूसरे चक्र पर स्वाभाविक रूप से घट जाता है। दिमागी कार्य से दिमाग में रक्तसंचार बढ़ जाता है, अतः उसके दौरान मस्तिष्क-चक्र / आज्ञा चक्र में कुण्डलिनी-ध्यान अधिक सरल व सफल होता है। भाषण, लेखन, पठन, बोलचाल आदि से गले में रक्तसंचार बढ़ जाता है, जिससे वहां / ग्रीवाचक्र / विशुद्धिचक्र पर कुण्डलिनी का ध्यान सरल व प्रभावशाली हो जाता है। मन में भावनाओं के उमड़ने के समय ह्रदय में रक्तसंचार बढ़ जाता है, जिससे उस समय हृदयक्षेत्र / हृदयचक्र / अनाहत चक्र में ध्यान करने से कुण्डलिनी अधिक प्रज्वलित हो जाती है। जब पाचनक्रिया शक्तिशाली होती है, तब उदरक्षेत्र / नाभिक्षेत्र में रक्तसंचार बढ़ा हुआ होता है। इसलिए उस समय नाभिचक्र / मणिपुरचक्र में ध्यान करने से अधिक लाभ होता है। यौनशक्तिवर्धक यौनक्रियाशीलता से, अपशिष्ट-उत्सर्जक अंगों के उत्तम स्वास्थ्य से व अन्य शारीरिक (विशेषतः हस्तपादाश्रित) कर्मों से यौनचक्र / स्वाधिष्ठानचक्र व मूलाधार चक्र पर रक्तसंचार बढ़ा हुआ होता है, अतः वहां पर कुण्डलिनी अधिक क्रियाशील होती है। इसलिए उस समय उन दोनों चक्रों पर अधिक अच्छी तरह से ध्यान लगता है।

गृहस्थजीवन में, विशेषतः द्वैत व अज्ञान से भरे गृहस्थजीवन में सभी चक्र एकसाथ व एकसमान रूप से क्रियाशील नहीं रह सकते, क्योंकि कभी किसी क्षेत्र से सम्बंधित कार्यों पर अधिक जोर देना पड़ता है, तो कभी किसी अन्य क्षेत्र से सम्बंधित कार्यों पर। इसलिए कुण्डलिनीयोग की एक अकेली बैठक में सभी चक्रों पर बारी-२ से कुण्डलिनी का ध्यान किया जाता है। उससे प्रभावशाली चक्र स्वयं ही ध्यान के दायरे में आ जाता है, जिससे ध्यान-लाभ की अधिक अनुभूति होती है। इससे ध्यान-लाभ धीरे-२ इकट्ठा होता हुआ कुण्डलिनीजागरण में परिणत हो जाता है। इसके विपरीत संन्यासी-योगी या समर्पित योगी के लिए कोई लौकिक उत्तरदायित्व नहीं होता, जिससे वह एक विशेष चक्र पर लम्बे समय तक क्रियाशीलता को आसानी से बना कर रख सकता है। इसलिए जो यह कहा गया है कि एक ही चक्र पर लम्बे समय तक ध्यान करके उसे जगा देना चाहिए और फिर अगले चक्र की ओर रुख करना चाहिए, वह ऐसे ही समर्पित योगी के लिए ही कहा गया है। वह चक्र-बदलाव से उत्पन्न थोड़ी सी ध्यान-हानि से बच जाता है, अन्य विशेष कुछ नहीं। वह एक ही चक्र पर निरंतर ध्यान लगा कर वहां पर रक्तसंचार को लम्बे समय तक बढ़ा कर रख सकता है, क्योंकि शरीर के किसी भाग पर ध्यान लगाने से वहां पर रक्तसंचार स्वयं ही बढ़ जाता है। यही स्पिरिचुअल हीलिंग / आध्यात्मिक उपचार का सिद्धांत भी है। जब सांसारिकता में उलझा हुआ कोई व्यक्ति स्वाभाविकता से क्रियाशील अपने चक्र को छोड़कर किसी अन्य चक्र पर जोर-जबरदस्ती से ध्यान लगाता है, तब उस आवश्यकतानुसार क्रियाशील चक्र का रक्त उस ध्यायित किए जा रहे चक्र की ओर दौड़ पड़ता है। उससे उस आवश्यकतानुसार क्रियाशील चक्र के स्वाभाविक कार्य तो कम या अधिक रूप से दुष्प्रभावित होंगे ही। इसलिए वैसी व्यस्ततापूर्ण सांसारिक परिस्थितियों के अंतर्गत की जाने वाली योगसाधना-बैठक में जिस चक्र पर ध्यान आसानी से या स्वयं ही लग रहा हो, वहीँ पर लगने देना चाहिए। अन्य सुप्त चक्रों के साथ अधिक जोर-जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए। वैसे तो सभी चक्रों पर समान रूप से ध्यान देने से ही शरीर के सभी अंग समान रूप से स्वस्थ रहते हैं; जीवन संतुलित बनता है और हरेक क्षेत्र में आगे बढ़ता है। एक विशेष चक्र पर ही निरंतर ध्यान देने से उस चक्र से सम्बंधित क्षेत्रों में शीघ्रता से विशेषज्ञता तो प्राप्त हो सकती है, यद्यपि उससे जीवन असंतुलित बन सकता है, और शरीर के अन्य चक्रों से सम्बंधित क्षेत्रों के स्वास्थ्य पर प्रश्नचिन्ह लग सकता है। अद्वैतमय जीवन से भी कुण्डलिनी स्वयं ही व बिना किसी विशेष प्रयास के धीरे-२ विकसित होने लगती है।

इस प्रकार का उत्तम शारीरिक व मानसिक संतुलन पुराणों से व शरीरविज्ञान दर्शन से प्राप्त अद्वैतभाव से भी उपलब्ध हो जाता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि अद्वैतभाव से सभी कुछ समान जैसा लगता है, और किसी विशेष क्षेत्र से विशेष लगाव या आसक्ति नहीं रहती। इससे व्यक्ति व्यष्टि और समष्टि के सभी अंगों पर समान रूप से ध्यान देता है, क्योंकि समष्टि (विश्व-सम्बंधित) व व्यष्टि (शरीर-सम्बंधित), दोनों आपस में जुड़े हुए हैं, “यतपिण्डे तत ब्रम्हांडे” के अनुसार। एक के भी नियंत्रण से दूसरा स्वयं ही उसी के अनुसार नियंत्रित हो जाता है।

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