My post

वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास- Website creation, management and development

वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास  (please browse down or click here to view this post in English)।

मैंने अपनी पुस्तक को लिख कर तैयार कर लिया था। चार-पांच बार पढ़कर सभी अशुद्धियों को भी ठीक कर दिया था। पिछली पोस्टों में मैं यह बताना भूल गया कि मुझे क्विक प्रिंट से भी बहुत सहायता मिली। क्विक प्रिंट की सुविधा पोथी डॉट कॉम द्वारा दी जाती है। उसमें पुस्तक को साधारण तरीके से प्रिंट करके शीघ्रतापूर्वक उसे लेखक के बताए पते पर पहुंचा दिया जाता है। उसमें बुक की वर्ड फाईल को ज्यादा फोर्मेट करने की आवश्यकता नहीं होती। केवल पेज के मार्जिन ही सुविधानुसार निर्धारित किए जाते हैं। वर्ड के डिफाल्ट पेज मार्जिन (मतलब स्वयं के) चारों ओर 1 इंच (2.54 सेंटीमीटर) होते हैं। इनसाईड मार्जिन तो यह ठीक है, पर अन्य किनारों के लिए यह मर्जिन अधिक है, जिससे कागज़ की बर्बादी होती है। यह असली पुस्तक तो होती नहीं, केवल करेक्शन के लिए ही निकाली गई होती है। इसलिए अन्य मार्जिन्स को आप 1 या आधा सेंटीमीटर पर भी सेट कर सकते हो। संभवतः कहीं प्रिंट करते समय शब्द न कट जाएं, इसलिए कम से कम 1 सेंटीमीटर तो होना ही चाहिए। इसी तरह यदि करेक्शन करने के लिए अधिक स्थान चाहिए, तो आप लाइन स्पेसिंग को 1.5 पर भी सेट कर सकते हो। अन्य कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं होती। फिर उस वर्ड फाईल को गूगल ड्राईव की सहायता से पीडीएफ में बदल दिया जाता है। उस पीडीएफ फाईल को ही पोथी डॉट कॉम पर अपलोड कर दिया जाता है। वास्तव में प्रिंट फॉर्म में करेक्शन करना कम्प्युटर में सीधे करेक्शन करने से बहुत आसान, सटीक, सुविधाजनक व त्वरित होता है। पुस्तक के अतिरिक्त कोई  भी डोक्युमेंट पोथी डॉट कोम से मंगाया जा सकता है, घर बैठे-२ ही, वह भी मनचाही गुणवत्ता व बाईंडिंग में। 2 बार क्विक प्रिंट बुक में करेक्शन करने के बाद जब मैं आश्वस्त हो गया, तब मैंने बुक को फुल प्रिंट के लिए फोर्मेट किया, और उसकी डिलीवरी के लिए डिमांड दे दी। फुल प्रिंट बुक को भी मैंने दो बार करेक्ट करने के बाद ही फाईनल समझा। अब जाकर मेरी पुस्तक पूर्ण रूप से तैयार हुई थी। वेबसाईट तो मैंने बहुत पहले से बना ली थी, यद्यपि वेबसाईट का युद्धस्तर पर निर्माण तो पुस्तक की पूर्णता के बाद ही शुरू हुआ, क्योंकि तब मुझे अतिरिक्त समय उपलब्ध हो गया था।

वेबसाईट-निर्माण का मेरा सफर निम्नलिखित प्रकार का था। मुझे जब पुस्तक के प्रचार की आवश्यकता महसूस हुई, तब मैंने एक लेंडिंग पेज बनाने की सोची। जैसा कि पिछली पोस्टों में भी मैंने बताया है कि लेंडिंग पेज एक ऐसा वेबपेज (वेबसाईट का पेज) होता है, जिस पर पुस्तक के बारे में सम्पूर्ण विवरण हो, संभावित पाठकों को पुस्तक पढ़ने के लिए प्रेरित किया जा रहा हो, और जिस पर उस पुस्तक को बेचने वाली व्यापारिक वेबसाईट का लिंक-पता दर्ज हो। गूगल पर सर्च करने पर लैंडिंग पेज के लिए बहुत सी सशुल्क पेशकशें दी जा रही थीं। कोई कम खर्चे वाली थीं, तो कुछ अधिक खर्चे वाली। फिर भी मुझे तो वह खर्चा अधिक ही लगा, और साथ में लैंडिंग पेज की उतनी साज-सज्जा की आवश्यकता भी मुझे महसूस नहीं हुई, जितनी का वे दावा कर रहे थे। मुझे तो एक साधारण लैंडिंग पेज ही चाहिए था। उसके लिए सर्वोत्तम व मुफ्त का तरीका तो मुझे वेबसाईट-निर्माण का ही लगा। वास्तव में बहुत सी कम्पनियां मुफ्त की वेबसाईट बनाने का ऑफर देती हैं, जैसे कि वर्डप्रेस डॉट कॉम, जिम्डो डॉट कॉम आदि-२। इनमें वर्डप्रेस डॉट कॉम काफी जानी-मानी व गुणवत्तापूर्ण वेबसाईट-निर्मात्री कंपनी है। इसलिए मैंने उसे ही चुना। 10 मिनट में ही सिंपल स्टेप्स में वह बन कर तैयार हो गई। पहले तो मुझे पता ही नहीं चला कि उसमें करना क्या था। मैंने एक-दो पोस्टें लिखीं, जो न जाने कहाँ खो जाती थीं। कभी दिख जाती थीं। फिर धीरे-२ मुझे आभास हुआ कि मुझे किसी मुफ्त की थीम को एक्टिवेट करना था। वेबसाईट-थीम वास्तव में वेबसाईट का दिल होती है। यह निर्धारित करती है कि वेबपेज कैसा दिखेगा। उस पर फोटो कौन सी होगी, विभिन्न बटन कहाँ-२ व कौन-२ से ऑप्शन होंगे।

थीम को एक्टिवेट करने से मेरा वेबसाईट-निर्माण का लगभग 90% काम पूरा हो गया था। बाकि का 10% काम तो अब उसमें विभिन्न विजेट (जैसे कि कोपीराईट का, लीगल डिस्क्लेमर का, शेयरिंग का आदि-2) को एप्लाई करना था। कई थीमों में केवल साईडबार-विजेट-एरिया ही होता है, फुटबार-विजेट-एरिया नहीं। धीरे-२ वह काम भी होता रहा। सर्वप्रथम मुख्य काम तो वेबपेज पर लिखित सामग्री को डालना था। मैंने अपनी ई-पुस्तक से ही पुस्तक-परिचय आदि को कोपी करके होमपेज पर पेस्ट कर दिया। होमपेज को ही मैंने लेंडिंग पेज बना दिया। इसके लिए होमपेज को स्टेटिक पेज बनाना पड़ता है। उससे वह स्थिर बना रहता है, और समय-२ पर डाली गई पोस्टें उस पर नहीं आतीं, अपितु एक अलग पेज “माय पोस्ट पेज” पर छपती रहती हैं। क्या आपको भी वेबसाईट बनाते हुए ऐसी ही समस्याएँ पेश आईं? —-मेरी अगली ब्लॉग पोस्ट पर जारी—–   

यदि आपने इस लेख/पोस्ट को पसंद किया तो कृपया इस वार्तालाप/ब्लॉग को अनुसृत/फॉलो करें, व साथ में अपना विद्युतसंवाद पता/ई-मेल एड्रेस भी दर्ज करें, ताकि इस ब्लॉग के सभी नए लेख एकदम से सीधे आपतक पहुंच सकें।

 

Website creation, management and development

I had prepared my book in written form. After reading four to five times, I also cured all the impurities. In the previous post, I forgot to mention that I got many help from Quick Print. Quick print is provided by Pothi.com. In this service, the book is readily printed and delivered to the address given by the author. There is no need to format the book’s Word file in it. Only the margins of the pages are determined according to convenience. Word default page margins (mean of themselves) are around 1 inch (2.54 centimeter). Inside margins, this is fine, but this margin is higher for other edges, which causes waste of paper. This is not the real book, it is only for correction. Therefore, you can also set other margins to 1 or half centimeters. It may be that the words are not cut when printing, so at least 1 centimeter should be there. Similarly, if you need more space to perform correction, you can also set the line spacing to 1.5. There is no need to do anything else. Then that Word file is converted to PDF with the help of Google Drive. That PDF file is uploaded to Pothi.com. In fact, correction of print forms is very easy, accurate, convenient and quick than to correct / edit document in the computer. Apart from the book, any document can be sent to Pothi.com, sitting at home, that too in the desired quality and binding. After making a correction in a quick print book, when I was convinced, I formatted the book for full print, and put demand for delivery of it. I considered the full print book as finished product only after reading and correcting it twice. Now my book was fully prepared by me. The website was created very long ago, although the creation of the website at war level started only after the completion of the book, because then I had an extra time available.

My journey to website building was the following type. When I felt the need to publicize the book, I thought of making a landing page. As I have mentioned earlier in the previous posts, the landing page is a web page, which has full details about the book, potential readers are being encouraged to read the book, and on which there is entered the link-address of the business website that sells the book. There were many paid offers for landing pages when searching on Google. There were some less costly, then some were more expensive. Even then, I found that the expenditure was more expensive, and I did not even need the decoration of the landing page, as much as they were claiming. I just wanted a simple landing page. The best and free way for me was to create a website. In fact, many companies offer to create free websites, such as WordPress.com, Zimdo.com etc. Among them WordPress.com is a well-known and quality website-maker company. That is why I chose that. In 10 minutes website became ready in the simple steps. At first, I did not know what to do in it. I wrote a few posts, which were not shown fully and anywhere they were lost. Were ever seen again. Then slowly I realized that I had to activate any free theme. Website-theme is actually the heart of the website. It determines how a web page will look. What will be the photo on it, where different buttons will have options?

Activated by the theme, almost 90% of my website-building work was completed. The remaining 10% of the work was to be applied to various widgets (like copyright, legal disclaimer, sharing etc.). Many themes only have Sidebar-Widget-Area, Footer-Widget-Area not. Slowly that work was also going on. First, the main task was to put content written on the web page. I copied book-introduction etc. from my e-book and pasted it on the homepage. I made the landing page only for the home page. For this, the homepage has to be made static page. From that LP / HP remains stable, and the posts put on time after time do not come to that, but website keep those on a different page, “My Post Page”. Did you have similar problems while creating the website? —- Continued on my next blog post —–   

If you liked this post then please follow this blog providing your e-mail address, so that all new posts of this blog could reach to you immediately via your e-mail.

भाई विनोद शर्मा जी द्वारा रचित व दिल को छूने वाली कुछ कविताएँ

ये काल का प्रहार है

काल का प्रहार

आकाश अश्रु रो रहा

सृष्टि के पाप धो रहा

धरा मिलनकी इच्छासे

पर्वत भी धैर्य खो रहा

चारों दिशा अवरुद्ध है

जल धाराएँ क्रुद्ध हैं

नर कंकाल बह रहे

हकीकत बयान कर रहे

कुदरत की गहरी मार है

ये काल का प्रहार है।

रिश्तों में अपनापन नहीं

बच्चों में भोलापन नहीं

शीतल रुधिर शिराओं में

धीरज नहीं युवाओं में

वाणी मधु से रिक्त है

हरएक स्वार्थ सिक्त है

अविश्वास से भरा हुआ

हर शख्स है डरा हुआ

इन्सानियत की हार है

ये काल का प्रहार है।

दहक रही भीषण अग्न

झुलस रहा है बाग-वन

सूरज के रक्त नयन से

बरस रहे अंगार हैं

गुलों में वो महक नहीं

परिंदों की वो चहक नहीं

ठूंठ बन गए तरू

भूखंड हो गए मरू

आबोहवा बेज़ार है

ये काल का प्रहार है।

जागृति के नाम पर

विलुप्त शिष्टाचार है

सभ्यता ठगी खड़ी

सुषुप्त संस्कार है

श्रेष्ठता के ढोंग का

ओढ़े हुए नक़ाब है

कर्तव्य बोध शून्य है

अधिकारों का हिसाब है

निश्छलता तार-तार है

ये काल का प्रहार है।

शब्दों से कैसे खेलूं मैं

शब्दों से कैसे खेलूं मैं

अन्तर में भावों की ज्वाला

धधक-धधक सी उठती है।

असह्य अखण्डित दाह-वेदना

जिह्वा पर मेरे ठिठकती है।

प्राकट्य जटिल सा हो जाता है

बस भीतर -भीतर झेलूं मैं।

अब तू ही बता हमदर्द मेरे!

शब्दों से कैसे खेलूं मैं?

इस जगती में हर श्वास की

परिमित एक कड़ी होती है।

हृदय निकट गहन रिश्तों की

चिन्ता -व्यथा बड़ी होती है।

धीर धरूं क्यों?मन करता है

सबकी पीड़ा ले लूं मैं।

अब तू ही बता हमदर्द मेरे!

शब्दों से कैसे खेलूं मैं?

कोकिल की मीठी स्वर लहरी में

झींगुर की झिन-झिन दोपहरी में

मस्त मयूरों के नृत्यों में

गुंजित भवरों के कृत्यों में

प्रच्छन्न सरस जीवन-पय घट से

मधु वंचित प्याले भर लूं मैं।

अब तू ही बता हमदर्द मेरे!

शब्दों से कैसे खेलूं मैं?

काल सरित की अविरल धारा

अबल-सबल हर कोई हारा।

मूर्ख है जो धारा संग उलझे

गिरह ये ऐसी जो न सुलझे।

अब तक कोई रोक न पाया

तो फिर कैसे ठेलूं मैं?

अब तू ही बता हमदर्द मेरे!

शब्दों से कैसे खेलूं मैं?

ऐ ज़िन्दगी ! तू बेहद खूबसूरत है।

ऐ ज़िन्दगी ! तू बेहद खूबसूरत है।

तेरा हर नाज़ो नख़रा सह लेते हैं।

रुलाए तू हंसाए तू,

नश्तर चुभा,सहलाए तू।

तेरी लौ की तपिश में

परवाने बन जल जाते हैं,कुर्बान हुए जाते हैं ।

ऐ ज़िन्दगी!….

भीड़ न बनो जुदा हों भीड़ से खड़े

भीड़ न बनो जुदा हों भीड़ से खड़े,

जिधर भी तुम चलो काफ़िला साथ चल पड़े।

है ज़िन्दगी की राह मुश्किलात से भरी,

ये रास्ते न होंगे हीरे-मोती से जड़े।

भीड़ न बनो…….

मेहनत से ही मिलेगा मुक़द्दर में जो लिखा,

नहीं मिलेंगे स्वर्ण-कलश खेत में गढ़े।

भीड़ न बनो……

पढ़े लिखों का दौर यही शोर चारों ओर,

इन्सां वही है जो दिलों के ज़ज्बों को पढ़े।

भीड़ न बनो…..

हर लम्हा है बदलाव ये मन्ज़ूर तुम करो,

तोड़ रूढ़ियों की बन्दिशें आगे चलो बढ़े।

भीड़ न बनो…..

ज़हनी संगीनें तन चुकी हैं होश में आओ,

जिस्मानी जंग छोड़ के हम खुद से ही लड़ें।

भीड़ न बनो…..

मतलबी हर शख़्स यहाँ घात में बैठा,

मालूम नहीं किस ग़रज़ से शानों पे चढ़े।

भीड़ न बनो…..

करता है वो इन्साफ बिना भेदभाव के,

अपनी कमी का दोष हम किसी पे क्यों मढ़ें।

भीड़ न बनो…..

लियाक़त नहीं मोहताज किसी धन की दोस्तो!

खिलते हैं वे कमल भी जो कीचड़ में हों पड़े।

भीड़ न बनो…..।

दिल के इस मयखाने में जज़्बात ये साक़ी बनते हैं

दिल के इस मयखाने में जज़्बात ये साक़ी बनते हैं

आँखों के पैमाने से फिर दर्द के जाम छलकते हैं।

तेरी रहमतों की बारिश का इन्तज़ार मुझको

तेरी रहमतों की बारिश का इन्तज़ार मुझको

उम्मीद के ये बादल घिरने लगे हैं फिर से ।

जो ज़ख़्म अब से पहले नासूर बन गए थे

रिस्ते हुए ज़ख़्म वो भरने लगे हैं फिर से।

दो अश्क

बैठ कहीं सुनसान जगह पर

ख़ुदग़रज़ी के इस आलम से

माज़ी के गुज़रे लम्हों में

कुछ देर मैं खोना चाहता हूँ

दो अश्क बहाना चाहता हूँ।

जाड़े की ठण्डी सुबह में

ठिठुरते हुए बाहों को बांधे

प्राची से उगते सूरज को

बेसब्री से तकना चाहता हूँ

दो अश्क बहाना चाहता हूँ।

पशु चराने दादी के संग

सुनसान सघन जंगल के भीतर

सर रखकर उनकी गोदी में

वही कथा मैं सुनना चाहता हूँ

दो अश्क——————-।

सुबह सबेरे खेत जोतते

पिता के पद-चिह्नों के पीछे

‘चल’ ‘हट’ कर उन बैलों को

सही दिशा दिखाना चाहता हूँ

दो अश्क——————-।

व्यर्थ उलझकर भाई-बहन से

सच्चे-झूठे आँसू लेकर

स्नेह भरे माँ के आँचल में

वो दुलार मैं पाना चाहता हूँ

दो अश्क—————-।

शहर गए अब्बू के संग

भीड़ भरी सड़क पर उनकी

विश्वास भरी उँगली को थामे

उस भीड़ में खोना चाहता हूँ

दो अश्क—————–।

कोई बड़ी शरारत हो जाने पर

सहमे हुए घबराए मन से

घास गई उस माँ की मैं

वही बाट जोहना चाहता हूँ

दो अश्क—————-।

बिना बताए माँ-अब्बू जब

आँखों से ओझल हो जाते

घर आने पर कहीं दुबककर

मैं उनसे रूठना चाहता हूँ

दो अश्क—————-।

मासूम बचपना कहीं छोड़कर

हरपल मरता है शख़्स यहाँ

इतराता अपने जन्म दिवस पर

क्यों? यही जानना चाहता हूँ

दो अश्क——————।

यदि आपने इस लेख/पोस्ट को पसंद किया तो कृपया लाईक बटन दबाएँ, इसे शेयर करें व इस वार्तालाप/ब्लॉग को अनुसृत/फॉलो करें, व साथ में अपना विद्युतसंवाद पता/ई-मेल एड्रेस भी दर्ज करें, ताकि इस ब्लॉग के सभी नए लेख एकदम से सीधे आपतक पहुंच सकें। साथ में, कमेंट में अपनी राय देना न भूलें। धन्यवादम।

सभी मित्रों के बीते वर्ष को सहर्ष विदाई व उनको नववर्ष 2019 की बहुत-2 शुभकामनाएं- Nice farewell to all the friends’ last year and many New Year wishes for them

सभी मित्रों के बीते वर्ष को सहर्ष विदाई व उनको नववर्ष की बहुत-2 शुभकामनाएं (please browse down to view this post in English)।

मेरा बीता वर्ष, 2018 निम्न प्रकार का रहा-

अपनी टाटा टियागो कार में लगभग 3000 किलोमीटर का सपरिवार सफ़र तय किया, जिसमें से अधिकाँश उन्नत उच्चमार्गों का सफर था। पीवीआर सिनेमा में 4 हिंदी फिल्में सपरिवार देखीं, 102 नोट आऊट, संजू, हनुमान वर्सस अहिरावना (थ्री डी एनीमेशन) व सिम्बा। मेरे माता-पिता तीर्थधाम यात्रा का जल चढ़ाने कन्याकुमारी / रामेश्वरम गए। अपने पुराने घर का नवीनीकरण करवाया गया। श्री मद्भागवत सप्ताह श्रवण यज्ञ का अनुष्ठान अपने घर में करवाया गया। मेरी पूज्य व वृद्ध पितामही जी का स्वर्गवास हुआ। मेरे बेटे को पहली कक्षा में ए-1 रहने पर पारितोषिक दिया गया। मेरी पत्नी के द्वारा नए सिलाई के प्रशिक्षण-कोर्स का प्रारम्भ किया गया। मुझे क्वोरा टॉप राईटर (क्वोरा शीर्ष लेखक)- 2018 का सम्मान मिला। मेरे द्वारा कुण्डलिनीयोग का प्रतिदिन का 1 घंटे का सुबह का व एक घंटे का सांय का अभ्यास एक दिन के लिए भी नहीं छोड़ा गया। इसके कारण मेरा वर्ष 2017 का कुण्डलिनीजागरण का अनुभव जारी रहा, महान आनंद के साथ। प्रेमयोगी वज्र की सहायता से इस मेजबानी वेबसाईट (https://demystifyingkundalini.com/home-3/) को पूर्णतः विकसित किया। इस वेबसाईट के लिए 139 शेयर, 30 लाईक्स, 4772 वियूस, 3099 विसिटर व 46 फोलोवर मिले। इस वेबसाईट के लिए मैंने लगभग 31 पोस्टें लिखीं व प्रकाशित कीं। प्रेमयोगी वज्र की सहायता से “शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)” नामक पुस्तक लिखी। उसके लिए 13 सशुल्क डाऊनलोड व 80 निःशुल्क डाऊनलोड प्राप्त हुए। उसके लिए अमेजन पर एक सर्वोत्तम रिव्यू / समीक्षा (5 स्टार) भी प्राप्त हुआ। साथ में, उसे गूगल बुक पर भी दो उत्तम व 5 स्टार रिव्यू प्राप्त हुए। दूरदर्शन के कार्यक्रमों में तेनालीरामा, तारक मेहता का उल्टा चश्मा, मैं मायके चली जाऊंगी, रियल्टी शोज व जी न्यूज (मुख्यतः डीएनए) का आनंद उठाया। अपने पोर्टेबल मिनी जेबीएल स्पीकर पर गाना एप के माध्यम से लगभग 2000 मधुर ओनलाईन गाने सुने। काटगढ़ मंदिर व टीला मंदिर के सपरिवार दर्शन किए। अपने किन्डल ई-रीडर पर 3 पुस्तकें पढ़ीं। पोस्ट पढ़ने के लिए धन्यवाद।

यदि आपको इस पोस्ट से कुछ लाभ प्रतीत हुआ, तो कृपया इसके अनुसार तैयार की गई उपरोक्त अनुपम ई-पुस्तक (हिंदी भाषा में, 5 स्टार प्राप्त, सर्वश्रेष्ठ व सर्वपठनीय उत्कृष्ट / अत्युत्तम / अनौखीरूप में निष्पक्षतापूर्वक समीक्षित / रिव्यूड ) को यहाँ क्लिक करके डाऊनलोड करें। यदि मुद्रित पुस्तक ही आपके अनुकूल है, तो भी, क्योंकि इलेक्ट्रोनिक डीवाईसिस / फोन आदि पर पुस्तक का निरीक्षण करने के उपरांत ही उसका मुद्रित-रूप / print version मंगवाना चाहिए, जो इस पुस्तक के लिए इस लिंक पर उपलब्ध है। इस पुस्तक की संक्षिप्त रूप में सम्पूर्ण जानकारी आपको इसी पोस्ट की होस्टिंग वेबसाईट / hosting website पर ही मिल जाएगी। धन्यवाद।

यदि आपने इस लेख/पोस्ट को पसंद किया तो कृपया इस वार्तालाप/ब्लॉग को अनुसृत/फॉलो करें, व साथ में अपना विद्युतसंवाद पता/ई-मेल एड्रेस भी दर्ज करें, ताकि इस ब्लॉग के सभी नए लेख एकदम से सीधे आपतक पहुंच सकें। धन्यवादम।

 

Nice farewell to all the friends’ last year and many New Year wishes for them.

My last year, 2018 was of the following type:

Travelled around 3,000 km in my Tata Tiago car with family, most of which were the journey of advanced highways. In PVR cinema saw 4 Hindi films with family, 102 Not out, Sanju, Hanuman Versus Ahiravana (Three D Animation) and Simmba. My parents went to Kanyakumari / Rameshwaram for carrying water for pilgrimage. My old home was renovated. Shreemad Bhaagvat Shravan Yagna’s week long ritual was performed in my house. My devoted and old grandmother went to heaven. My son was rewarded for being A1 in the first grade. New sewing training-course was started by my wife. I got the Quora Top Writer- the honour of 2018. I did not leave the Kundalini Yoga practice for 1 hour of morning and one hour of evening everyday even for one day. Due to this my experience of KundaliniJagran of 2017 continued, with great bliss. With the help of Premyogi Vajra, this hosted website (https://demystifyingkundalini.com/) was fully developed. For this website, 139 shares, 30 likes, 3099 visitors, 46 followers and 4772 views were obtained. I wrote and published about 31 posts for this website. With the help of Premyogi Vajra, I wrote a book called “Shareervigyaan darshan- ek aadhunik kundalini tantra (ek yogi ki premkatha)”. For that 13 paid downloads and 80 free downloads were received. For that, a great review (5 stars) was also received on Amazon. Along with, two good and 5 star reviews were also obtained on Google book for that. In Doordarshan’s programs, Tenalirama, Tarak Mehta ka Ulta Chashma, main maayake chali jaaoongee, realty shows and Zee news (mainly DNA) were enjoyed well. Two thousands of melodious online songs have been heard through Gaana App on my portable mini JBL speaker. Visiting the Katgarh Temple and the Tila Temple with family by me. Read 3 books on my Kindle e-Reader. Thanks for reading.

If you have found some benefit from this post, please download here the above mentioned e-book (in Hindi language, 5 star rated, reviewed in unbiased way as the best, excellent and must read by everyone) made with steps as told above. If only print version suits you, then too print version should only be got after testing that’s e- version on the electronic devices / phone etc., that is available on this link for this book. You can also find the complete information about this book, both in English as well as Hindi languages on the hosting website of this post. Thank you.

If you liked this post then please follow this blog providing your e-mail address, so that all new posts of this blog could reach to you immediately via your e-mail.

योग व तंत्र-एक तुलनात्मक अध्ययन (तंत्र के बारे में कुछ रोचक तथ्य, तंत्र व इस्लाम के बीच में समानता)- Yoga and Tantra- A comparative study (some interesting facts about the tantric system, Tantra versus Islam)

योग व तंत्र- एक तुलनात्मक अध्ययन (तंत्र के बारे में कुछ रोचक तथ्य, तंत्र व इस्लाम के बीच में समानता), (please browse down or click here to view post in English)

तंत्र में प्रारंभ से ही एक व्यक्ति अपने आपको देहपुरुष की तरह अद्वैतपूर्ण, मुक्त व अनासक्त समझते हुए ही समस्त व्यवहार करता है। परन्तु योग में एक व्यक्ति पहले अपनी कुण्डलिनी को जगाता है। उससे उसे अद्वैत से जुड़े हुए महान आनंद का अनुभव होता है। उस कुन्डलिनीजागरण के आनंद के वशीभूत होकर ही वह अनायास ही अद्वैतमयी आचरण प्रारम्भ करता है, और धीरे-२ तांत्रिक की तरह अद्वैतपूर्ण बन जाता है। एक योगी कुण्डलिनीजागरण से आगे बढ़ते हुए आत्मज्ञान को भी अनुभव कर सकता है। उससे उसके अद्वैतज्ञान को और अधिक दृढ़ता मिलती है। इसका अर्थ है कि तंत्र योग की अपेक्षा अधिक आसान, सर्वसुलभ, स्वाभाविक व मानवतापूर्ण है। जब योगोपलब्धि के बाद भी तंत्र को स्वीकारना ही पड़ता है, तब क्यों न उसे प्रारम्भ से ही स्वीकार किया जाए। बहुत से तंत्र का अभ्यास करने वाले लोग समय के साथ स्वयं ही कुण्डलिनीजागरण व आत्मज्ञान प्राप्त कर लेते हैं, बिना किसी भिन्न या विशेष प्रयास के। कई लोगों को तो तंत्र को सिद्ध करने का भी स्वाभाविक रूप से अवसर मिलता है, और योग को भी; जैसा कि इस वेबसाईट के नायक प्रेमयोगी वज्र के साथ हुआ। बहुत से लोग तंत्र को पंचमकारों तक ही सीमित कर देते हैं। परन्तु सच्चाई यह है कि तंत्र एक सम्पूर्ण जीवन पद्धति है। यह एक अद्वैतपूर्ण जीवनपद्धति है। हिन्दू संस्कृति के अधिकाँश अचार-विचार एक तांत्रिक पद्धति के ही विभिन्न अंग हैं, चाहे वह वेद-पुराणों का अध्ययन हो, या उनसे जुड़े हुए विभिन्न क्रियाकलाप। प्राचीनकाल में जिन लोगों को आत्मज्ञान हुआ, उन्हें आम साधारण जनजीवन में जीवन व्यतीत करना बहुत कठिन लगा। इसका कारण यह था कि आम लोग तो भौतिक दृष्टिकोण से जीवन जीने के आदी थे, जिसे आत्मज्ञानी लोगों का ज्ञानपूर्ण मन स्वीकार न कर सका। अतः उन्होंने आम अज्ञानी लोगों के व्यवहार की नक़ल को छोड़कर प्रकृति की नक़ल करते हुए अपना जीवन जीने का प्रयास किया। वैसा इसलिए, क्योंकि उन्हें प्रकृति के सभी व्यवहार ज्ञानपूर्ण लगे। वैसा करने से उनके आध्यात्मिक स्तर में और अधिक इजाफा हुआ, और वे जीवन्मुक्त बन गए। प्राकृतिक जीवनशैली से अपने को लाभ होते देखते हुए उनके मन में औरों को भी वैसा लाभ दिलाने की जिज्ञासा उत्पन्न हुई। अतः उन्होंने प्राकृतिक घटनाओं को जीवंत रूप में लिपिबद्ध करना शुरू कर दिया। वे ही लिपिबद्ध संग्रह कालान्तर में वेद-पुराणों के नाम से विख्यात हुए, जिन्होंने बहुत से लोगों के लिए जीवन्मुक्ति को सुलभ करवाया। उन पुराणों को लिखने वाले आत्मज्ञानी लोग ऋषि-मुनि कहलाए।

उपरोक्त प्रकार की ही घटना तांत्रिक प्रेमयोगी वज्र के साथ भी घटित हुई। उसे भी बचपन में ही क्षणिक आत्मज्ञान हो गया था। उसके बाद वह भी आम लोगों की तरह जीवनयापन करने में अपने आप को अक्षम पा रहा था। इसीलिए उसने अपने लाभ के लिए शरीरविज्ञान दर्शन नामक, पौराणिक दर्शन से मिलता-जुलता एक जीवन दर्शन बनाया। उसके सान्निध्य से उसे जो अद्वैत व अनासक्ति की उपलब्धि हुई, उससे उसकी चहुंमुखी प्रगति सुनिश्चित हुई, और यहाँ तक कि अनायास ही कुण्डलिनीजागरण की एक झलक भी मिली। उसी लाभ से प्रेरित होकर उसने उसी दर्शन पर आधारित एक पुस्तक की रचना की, जिसे हम आधुनिक पुराण भी कह सकते हैं। पुराणों में तो बाहर मौजूद स्थूल सृष्टि का वर्णन है, परन्तु शरीरविज्ञान दर्शन में हमारे अपने भीतर मौजूद सूक्ष्म सृष्टि का वर्णन है। ‘यत्पिंडे तत्ब्रम्हांडे’ नामक वेदोक्ति के अनुसार दोनों सृष्टियों के बीच में लेशमात्र भी अंतर नहीं है। इसलिए हम प्रेमयोगी वज्र को आधुनिक ऋषि भी कह सकते हैं। उसकी पुस्तक भी पुराणों की तरह ही तांत्रिक ही है, यद्यपि साथ में कुछ अंश पंचमकारी विद्या का भी है, श्रीमद देवीभागवत पुराण से मिलता जुलता। अब रही बात पंचमकारी तंत्र की, तो वह विशाल तांत्रिक पद्धति का केवलमात्र एक छोटा सा हिस्सा ही है। तांत्रिक पद्धति का बहुत लम्बे समय तक आचरण करने के बाद जब आम साधक का तांत्रिक दृष्टिकोण बहुत परिपक्व हो जाता है, तभी एक योग्य गुरु के मार्गदर्शन में तंत्र के पंचमकारी अंग का आश्रय लेना चाहिए, ताकि कुण्डलिनीजागरण के लिए पर्याप्त शक्ति मिल सके। समय से पहले अपनाने पर या अयोग्य गुरु के मार्गदर्शन में यह लाभ के स्थान पर हानि भी पहुंचा सकता है। साथ में, पंचमकारी तांत्रिकों का ध्येय हिंसा नहीं, अपितु कुण्डलिनीजागरण ही है। शक्ति के सर्वश्रेष्ठ स्रोत तो माँस, मैथुन व मद्य ही हैं, जो हिंसा के बिना प्राप्त नहीं किए जा सकते हैं। इसलिए उनके कम से कम प्रयोग से अधिक से अधिक आध्यात्मिक लाभ को प्राप्त करने को ही प्राथमिकता दी गई है। इसका उदाहरण है, मत्स्य-सेवन। क्योंकि मछली को आवश्यकतानुसार न्यूनतम मात्रा में भी पकड़ा जा सकता है, इसलिए उससे निरर्थक हिंसा नहीं होती, जिससे हिंसा-दोष न्यूनतम स्तर पर बना रहता है। साथ में, मछली ठंडी प्रकृति की होती है। इसलिए यह पंचमकारी के अन्दर उस क्रोध को नहीं पनपने देती, जो आध्यात्मिक राह में सबसे बड़ा विघ्न होता है। साथ में, यह आमिषाहारों में सबसे कम तमोगुण उत्पन्न करता है, और इसके शरीर के ऊपर दुष्प्रभाव भी अन्य की तुलना में न्यूनतम होते हैं। इसी तरह इसमें एकपत्नीव्रत को प्राथमिकता दी गई है, ताकि यौनता की अति से बचा जा सके, क्योंकि वह भी एक विशेष प्रकार की हिंसा ही है, विशेषकर यदि सही तांत्रिक नियम न अपनाए जाएं। फिर भी थोड़ी-बहुत भूल-चूक तो सीखते समय स्वाभाविक ही है। यदि तांत्रिक-साथी को बदलना ही पड़े, तो बहुत लम्बे समय के बाद व विशेष आध्यात्मिक प्रगति को प्राप्त करने के बाद ही। स्त्री पर बुरी नजर सर्वथा वर्जित है। यौनता / पञ्चमकारों के बारे में भद्दे शब्द व भद्दे मजाक भी वर्जित हैं। स्त्री को देवी व गुरु की तरह सम्मान देना पड़ता है। किसी की बेटी या किसी की पत्नी को तांत्रिक-साथी नहीं बनाया जाता, क्योंकि उन्हें दूसरों की भावनात्मक संपति के अंश के रूप में देखा जाता है। प्राचीनकाल के अधिकाँश प्रख्यात तांत्रिक वही हैं, जो पहले आम जनमानस में प्रचलित साधारण तांत्रिक पद्धतियों से जीवन व्यतीत करते थे, परन्तु बाद में विभिन्न कारणों से उसके पंचमकारी अंग का भी सेवन करने लगे। उन कारणों में एक मुख्य कारण था, समाज से बहिष्कृति या समाज में पर्याप्त सम्मान न मिलना। तभी तो कुछ प्रख्यात तांत्रिक आज के पंजाब की भारत-पाकिस्तान सीमा के आसपास हुए हैं, कुछ तो आज के पाकिस्तान में भी हुए हैं। दूसरा कारण है कि पंजाब शुरु से ही समृद्ध रहा है, इसलिए वहां खाने-पीने व मौज-मस्ती करने वालों की परंपरा रही है। उसी तरफ को तांत्रिक मंदिर भी बहुतायत से पाए जाते हैं। पंजाब में गुरु-परम्परा  का बोलबाला भी तंत्र के अनुरूप ही विकसित हुआ है। मैंने स्वयं पंजाब के सुदूर व पाकिस्तान की दिशा के सीमावर्ती क्षेत्रों में रहकर सभी कुछ प्रत्यक्ष रूप में अनुभव किया है। उन सुदूर क्षेत्रों तक हिन्दुओं की आम तांत्रिक पद्धति की पहुँच ढीली थी, अतः वहां पर रहने वाले लोगों को सामूहिक आध्यात्मिकता से मिलने वाले बल की प्राप्ति नहीं हो रही थी। उसके प्रतिकारस्वरूप उन्होंने पंचमकारी तंत्र को सही ढंग से अपनाया, व त्वरित सफलता को प्राप्त किया, क्योंकि पंचमकारी शक्ति से उत्पन्न आध्यात्मिक बल सामूहिक आध्यात्मिकता के बल से भी कहीं अधिक था। निस्संदेह वे तांत्रिक आम सर्वसाधारण या आध्यात्मिक समाज से कटे-२ से रहे, फिर भी वे सिद्धियों के चरम पर पहुंचे, और दूसरों को भी प्रेरित करते रहे। स्वाभाविक है कि वैसे तांत्रिकों में बहुत से दलित व पिछड़े वर्गों के लोग भी इन्हीं उपरोक्त कारणों से शामिल हुए। वैसा ही उदाहरण दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में कष्टमय व एकाकी जीवन बिताने वाले तिब्बती बौद्धों का भी है। उन्हें सुविधामय मैदानी क्षेत्रों में प्रचलित साधारण तंत्र की अपेक्षा पंचमकारी तंत्र ही अधिक उपयुक्त लगा, इसीलिए यह वहां आज भी अच्छी तरह से जिन्दा है। चाईनी ताओ धर्म में तो एक यौनसनकी साधु को ही आदर्श साधु बताया गया है। वास्तव में जब से पंचमकारों का तंत्र से अलगाव हुआ, तब से ही आध्यात्मिकता का पतन प्रारंभ हो गया। पंचमकारों को उत्पथगामियों का आचार बताया गया। इससे हुआ यह कि पंचमकारों की शक्ति उत्पथगामियों को ही मिलती रही, और वे उससे पुष्ट होते रहे। धीरे-२ करके सारी धरती उत्पथगामियों से परिपूर्ण हो गई। दूसरी ओर आध्यात्मिकता आवश्यक शक्ति के बिना क्षीण होती गई, क्योंकि पंचमकारों को उससे दूर रखा गया। आजकल पंचमकारी तंत्र को तो गलत बोला जाता है, वैसे पंचमकारों का उपयोग धड़ल्ले से व बिना किसी रोक-टोक के खुल्लम-खुल्ला हो रहा है, आध्यात्मिकता के लिए नहीं, अपितु अंधी भौतिकता के लिए। इससे सिद्ध होता है कि आज असली तांत्रिकों की समाज को सख्त आवश्यकता है।

प्रेमयोगी वज्र के साथ भी कुछ-२ ऐसा ही हुआ। वह भी आम जनमानस की तंत्रपद्धतियों को अपनाता था। परन्तु उससे उसका आध्यात्मिक विकास बहुत धीरे-२ हो रहा था। जब बहुत लम्बे समय तक भी उसे कुण्डलिनीजागरण की झलक की आशा तक भी नहीं मिली, तब वह आम अध्यात्मिक जनमानस के विरुद्ध बागी जैसा हो गया। उससे उसका बहुत अपमान होने लगा। उसका विरोध भी तांत्रिक पंचमकारों के सेवन के रूप में बढ़ता ही जा रहा था। ये दोनों कार्य-कारण एक दूसरे को बढ़ाते जा रहे थे। अपमान से विरोध व विरोध से अपमान। यह चक्र तब तक चलता रहा, जब तक उसे कुण्डलिनीजागरण की झलक नहीं मिल गई। उससे वह संतुष्ट होकर शांत हो गया, और पंचमकारी तंत्र के ऊपर उसका विश्वास बढ़ गया।

वास्तव में योग (आम आध्यात्मिक तांत्रिक पद्धतियों सहित) व तंत्र (पंचमकारी योग) एक ही हैं, केवल प्रचंडता के स्तर में ही अंतर है। पंचमकारी योग से साधारण योग की अपेक्षा कुण्डलिनी अधिक प्रचंड रहती है। अतः एक बुद्धिमान तांत्रिक व्यक्ति दोनों का समयानुसार आश्रय लेता रहता है। दोनों में कुछ भी विरोध नहीं है। तांत्रिक तो सभी आध्यात्मिक लोग हैं, पर पंचमकारी तांत्रिक को ही तांत्रिक कहने का प्रचलन है। उसे हम पंचमकारी साधु भी कह सकते हैं, क्योंकि साधारण साधु व पंचमकारी साधु के बीच में तत्त्वतः कोई अंतर नहीं है, कुण्डलिनी की अभिव्यक्ति के स्तर को छोड़कर।

ऐसा प्रतीत होता है कि तंत्र मैं मैथुन मकार ही सबसे प्रमुख है, क्योंकि इसीसे कुण्डलिनी को आश्चर्यजनक बल प्राप्त होता है। अन्य मकार तो केवल आवश्यकतानुसार इस मुख्य मकार के सहायक ही हैं। अन्य पंचमकारी धर्मों को तो मैं तंत्र का ही एक रूपांतरित स्वरूप मानता हूँ। उनमें जो शक्ति विद्यमान है, और जिसके प्रति अधिकाँश लोग आकर्षित होते हैं, वह पंचमकारिक तांत्रिक शक्ति ही प्रतीत होती है। परन्तु सात्विक हिन्दु धर्म / तंत्र का विरोध करके वे विरोधी धर्म आध्यात्मिक लाभ की प्राप्ति नहीं करा सकते, अपितु उल्टा हानि ही कराते हैं, यह बात तो तय है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि यह सिद्धांत है कि पंचमकार तभी सफल होते हैं, यदि वे सात्विक तंत्र / योग / धर्म के सान्निध्य में रहें। इससे दोनों पद्धतियों को आध्यात्मिक व भौतिक, दोनों प्रकार के लाभ मिलते हैं। अन्यथा पंचमकार पापों के भण्डार ही तो हैं। अतः सभी धर्मों के सहयोगात्मक सहअस्तित्व में ही सबका भला है। स्वर्णसंज्ञक या आकर्षक व्यक्तित्व / रंग-रूप वाले हिंदु पंडितों के लिए इसीलिए अनुष्ठानपरक, निस्स्वार्थी, मानवतापूर्ण, प्रेमपूर्ण, संतोषी, सामाजिक व अहिंसावादी होकर रहने का निर्देश दिया गया है, ताकि उनमें अद्वैतभाव व अनासक्तिभाव के साथ-२ एक दिव्य तेज व आकर्षण भी विद्यमान रहे। तभी तो अन्य आम या पंचमकारी लोग उन्हें गुरु बना कर उनके रूप की कुण्डलिनी को अपने मन में पुष्ट कर सकते हैं। तभी पंचमकारों की शक्ति कुण्डलिनी को लगेगी, अन्यथा वह उनके लिए नरक का रास्ता ही साफ करेगी।

कई स्थानों पर तो पंचमकारों का सेवन संकेतमात्र या औपचारिकता मात्र के लिए इसलिए निर्दिष्ट किया गया है, ताकि किसी को यह अहंकार न होए कि मैं बहुत शुद्ध हूँ, और साथ में उत्तम प्रकार का अद्वैतभाव भी बना रहे। तंत्र में यह सिद्धांत भलीभांति ध्यान में रखा गया है कि कर्म का फल तो मिल कर ही रहेगा, इसलिए पंचमकारों के प्रयोग में बहुत संयम व सावधानी बरती जाती है। कई स्थानों पर इसलिए उनका प्रयोग बताया गया है, ताकि हिंसक या राक्षस प्रकृति के लोगों को सही ढंग से खाना-पीना व भोग-विलास करना सिखाया जा सके, और उनके भोग-विलास के अन्दर अध्यात्म का बीज डालकर उन्हें भी अध्यात्म की ओर मोड़ा जा सके। बाद में धीरे-२ वे खुद सुधर जाते हैं। परन्तु कुछ भी हो, पंचमकारी तंत्र की आश्चर्यजनक शक्ति को नकारा नहीं जा सकता। सिद्ध तांत्रिक तो यहां तक कहते हैं कि तंत्र विशेषकर यौनतंत्र के बिना आत्मज्ञान को प्राप्त ही नहीं किया जा सकता है।

तंत्र के बारे में और भी बहुत से रोचक तथ्य विद्यमान हैं। तंत्रसमाज को गुह्य समाज भी कहते हैं। कई तो उनमें महान ब्राम्हण पंडित भी शामिल हो गए थे। कई तांत्रिकों की तो उनकी अपनी बहन ही उनकी तांत्रिक गुरु थी। इस्लाम में भी अपनी बहन से (यद्यपि सहोदर बहन से या पिता की पत्नी से पैदा हुई के साथ नहीं) विवाह की अनुमति है। इससे कुछ अंदाजा लगता है कि इस्लाम के मूल में कहीं न कहीं पंचमकारी तंत्र विद्यमान है। काबा में जिस काले पत्थर को चूमने का रिवाज है, उसे अधिकाँश लोग शिवलिंग ही मानते हैं। भगवान शिव तो तंत्रमार्ग के आदि प्रवर्तक हैं ही। विषमवाही तंत्र के मामले में तो यह भी माना गया है कि तांत्रिक प्रेमिका जितनी अधिक बदसूरत या अनाकर्षक हो, वह उतनी ही अधिक तंत्रसम्मत होती है, बशर्ते कि वह तांत्रिक गुणों से संपन्न हो। ऐसा इसलिए, क्योंकि उसमें अहंकार नहीं होता, जिससे वह दूसरों / गुरु के रूप की कुण्डलिनी को अपने ऊपर आसानी से पनपने देती है। विषमवाही तंत्र का अर्थ है कि मानसिक कुण्डलिनी छवि किसी और की (गुरु आदि की) होती है, जबकि कुण्डलिनीवाहक तो तांत्रिक प्रेमिका ही होती है। समवाही तंत्र का अर्थ है कि मानसिक कुण्डलिनी छवि भी तांत्रिक प्रेमिका के रूप की होती है, और कुण्डलिनी-वाहक भी वही होती है। समवाही तंत्र में सांकेतिक / अप्रत्यक्ष तांत्रिकमैथुन अधिक कारगर है, परन्तु विषमवाही तंत्र में पूर्ण / स्पष्ट / प्रत्यक्ष तांत्रिकमैथुन क्रिया। इसीलिए अधिक से अधिक यौनाकर्षण उत्पन्न करने के लिए समवाही तांत्रिका आकर्षक होनी चाहिए। समवाही व विषमवाही नाम के तंत्र के दो प्रकार मैंने इसी मेजबान वेबसाईट पर प्रेमयोगी वज्र के अनुभवात्मक विवरण में देखे, अन्य स्थान पर नहीं, यद्यपि तंत्र में यह प्रचलित धारणा है कि पिछड़े वर्ग की महिलाएँ प्रत्यक्ष तांत्रिकसम्बन्ध के लिए सर्वोत्तम होती हैं। इससे प्रेमयोगी वज्र का कथन स्पष्ट हो जाता है। कहा जाता है कि एक बार एक प्रख्यात तांत्रिक-गुरु की बदसूरत व काली तांत्रिक प्रेमिका का उनके शिष्य ने उपहास उड़ाया था। उससे नाराज होकर उस तांत्रिक-प्रेमिका ने उसको उसके जीवनकाल में आत्मज्ञान की प्राप्ति न होने का श्राप दिया। उससे वैसा ही हुआ।

अब हम तंत्र व इस्लाम के बीच समानता पर विस्तार से चर्चा करते हैं। तंत्र व इस्लाम की शुरुआत लगभग एकसाथ हुई। दोनों में ही संसार-त्याग को अस्वीकार किया गया है, और सांसारिक प्रवृत्ति पर जोर दिया गया है। दोनों में ही स्त्री को महत्त्व दिया गया है। खतना के पीछे भी तान्त्रिक सिद्धांत ही प्रतीत होता है। इस्लाम में मौलवी के द्वारा हलाला करने की रिवाज भी तंत्र की उस प्रथा का विकृत रूप प्रतीत होती है, जिसमें गुरु व शिष्य की संयुक्त तांत्रिक-प्रेमिका होती है। दोनों ही साधना-पथ सभी सर्वसाधारण व शुद्धि-बुद्धि से रहित लोगों को भी मुक्ति प्रदान करने के लिए बनाए गए हैं। तांत्रिक नाथ सम्प्रदाय के बहुत से गुरुओं को बहुत से मुसलमान अपना भी गुरु मानते हैं। तांत्रिक गुरुओं को पीर बाबा भी कहा जाता है। जिस तरह दक्षिणपंथी, हिन्दुओं के शुद्धिवादी हैं, उसी तरह सूफी साधना-पथ इस्लाम में शुद्धिवादी व नरमपंथी विचारधारा है। अधिकांशतः, हिन्दु धर्म के दक्षिणतंत्र व वामतंत्र को एक-दूसरे का विरोधी बताया जाता है। परन्तु प्रेमयोगी वज्र के तांत्रिक अनुभव के आधार पर मैंने इस लेख में यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि वामतंत्र व दक्षिणतंत्र आपस में विरोधी नहीं, अपितु सहयोगी हैं। साधारण तांत्रिक पद्धतियों को दक्षिणतंत्र कह लो, व पंचमकारी तंत्र को वामतंत्र। इसी तरह हिन्दु धर्म व इस्लाम धर्म भी एक दूसरे के सहयोगी ही सिद्ध हुए, क्योंकि वृहद् परिपेक्ष्य में हिन्दु धर्म को दक्षिणतंत्र एवं इस्लाम को वामतंत्र कह लो। इसलिए दोनों के बीच में वैमनस्य या कटुता के लिए कोई स्थान नहीं है। दोनों ही धर्म एक-दूसरे से घृणा करके अनजाने में ही एक दूसरे से प्रेम कर रहे होते हैं। परन्तु उससे पूरा काम नहीं चलता। फिर क्यों न ये दोनों सीधे तौर पर एक-दूसरे से प्रेम करें, जिससे वे एक-दूसरे की शक्ति को और अधिक मात्रा में व अधिक सकारात्मकता के साथ प्राप्त कर सकें। विचारों में भिन्नता तो मानवमात्र का स्वभाव है ही, परन्तु उससे आपसी प्रेम व सहयोग पर दुष्प्रभाव नहीं पढ़ना चाहिए। यदि उन्हें अपने प्राचीन धर्मशास्त्रों में संशोधन करने की आवश्यकता पड़े, तो मानवता के हित में धर्मसभा या सर्वधर्मसभा बैठाकर कर लेना चाहिए। मैं यहाँ स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि यहाँ पर सभी धर्मों की बात हो रही है, किसी विशेष धर्म की नहीं। सभी को अमानवीयता, कट्टरता व घृणा से भरे हुए शब्दों में इस तरह से संशोधन करने पर विचार करना चाहिए, जिससे सभी धर्मों का सम्मान भी बना रहे, और जमाने के अनुसार उनमें संशोधन भी हो जाएं। उदाहरण के लिए जब से हिंदु धर्म में बलि प्रथा का विरोध होने लगा, तब से ही प्रतीतात्मक रूप में नारियल की बलि दी जाती है। तंत्र में कुण्डलिनी / गुरु के नाम पर पंचमकारों का सेवन किया जाता है, तो इस्लाम में अल्लाह (ईश्वर) के नाम पर, यद्यपि दोनों कुछ समानता साझा करते हैं। वास्तव में निराकार ईश्वर के निरंतर ध्यान से भी कुण्डलिनी ही पुष्ट होती है, यह रहस्य सभी को पता नहीं है। परन्तु कट्टर इस्लाम में पंचमकारों में मानव के प्रति हिंसा व झूठ-फरेब को भी सम्मिलित किया गया है। तुलनात्मक रूप से हल्के स्तर पर ऐसा हिन्दु धर्म व इसाई धर्म में भी हुआ, यद्यपि अधिकाँश मामलों में यह कहा जाता है कि ऐसा प्रतिक्रयास्वरूप हुआ। अब पुराने जमाने में इसकी क्या जरूरत पड़ी होगी, यह स्पष्टतया कह नहीं सकते, परन्तु आज के शिक्षित व मानवतापूर्ण युग में यह जरा भी प्रासंगिक नहीं है, ओर पूरी तरह से त्याज्य है। हालांकि घोर आत्मरक्षा के लिए (जान बचाने के लिए) इनके प्रयोग पर विरले मामलों में विचार किया जा सकता है। असली त्याग तो भावना का त्याग है। सुप्त भावना भी काम करती रहती है। इसलिए तत्संबंधित संकल्पों की दृढ़ अभिव्यक्ति से अमानवता का खंडन करना चाहिए, तभी सुप्त भावना (संस्कार) नष्ट होती है। ये सभी तथ्य इस वेबसाईट के नायक व एक तांत्रिक, प्रेमयोगी वज्र के अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर लिखे गए हैं, यह मात्र खाली थ्योरी नहीं है। प्रेमयोगी वज्र एक आत्मज्ञानी है, व उसकी कुण्डलिनी भी जागृत हो चुकी है। उसे भी तभी आध्यात्मिक सफलता मिली, जब उसने लगभग 25 वर्ष पूर्व अमानवता का सार्वजनिक रूप से कड़े शब्दों में खंडन किया। इसे इसी मेज वेबसाइट पर स्थित वेबपेज के निम्न लिंक पर पढ़ा जा सकता है-https://demystifyingkundalini.com/%E0%A4%97%E0%A5%83%E0%A4%B9-10/

एक स्पष्टीकरण यहाँ युक्तियुक्त प्रतीत हो रहा है। यदि ईश्वर की खिलाफत करने वाले बन्दे को ईश्वर के स्मरण के साथ यातना दी जाए जेहाद आदि के नाम पर,  तब उसके बदले में जो यातनारूपी फल उस यातना देने वाले को मिलेगा, उसके साथ स्वयं ही ईश्वर का स्मरण बढ़ते समय के साथ दुगुने या अधिक रूप में हो जाएगा, क्योंकि कर्म व उसका फल दोनों आपस में जुड़े हुए होते हैं। फिर यदि वह यातनाफल सहते हुए मर ही जाए, तब तो सीधा मुक्त हो गया, क्योंकि सनातन धर्म में भी कहा है कि मरते समय जिसका स्मरण किया जाए, वही रूप मरणोपरांत मिलता है। परन्तु यदि ऐसा नहीं हुआ, तो नरक का द्वार खुला है। यह अलग बात है कि उसे नरक में भी ईश्वर का स्मरण होता रहेगा। इसलिए बहुत सावधानी की आवश्यकता होती है। इसी तरह, अब जब कोई ईश्वर के नाम पर पीड़ा सहेगा, तो स्वाभाविक है कि उसमें भी ईश्वर का स्मरण जागेगा, जिससे वह भी ईश्वर को प्रिय हो जाएगा। इससे पीड़ा देने वाले का व पीड़ा सहने वाले का, इन दोनों का एकसाथ भला होगा। अतः स्पष्ट है कि इसमें पीड़ा सहने वाले से अधिक बुरा तो पीड़ा देने वाले का होगा, क्योंकि यदि वह तंत्र का आचरण सही ढंग से नहीं कर पाया, तो बुरे कर्म से पैदा होने वाली नरकरुपी तलवार सदैव उसके ऊपर लटकी रहती है। क्योंकि यह महान कर्म-सिद्धांत है कि जब तक कोई मुक्त नहीं हो जाता, तब तक कर्म का फल तो मिल कर ही रहेगा। इसीलिए इसमें ‘सबकुछ’ या ‘कुछ भी नहीं’ होता है, बीच वाले स्तर नहीं होते। यही तंत्र का भी, विशेषतः अतिवादी तंत्र का भी सिद्धांत है। यही एक मुख्य कारण है कि महान इस्लाम एक अतिवादी तंत्र की तरह लगता है। परन्तु दुर्भाग्य से अतिवादी तंत्र के डर के कारण ही बहुत से लोग साधारण तंत्र से भी दूर रहने लगे, जिससे वे एक विज्ञानमिश्रित आध्यात्मिक पद्धति के लाभों से अछूते रहने लगे। प्रेमयोगी वज्र ने इसे अपने अनुभव से सिद्ध किया। उसने कुण्डलिनी के ध्यान के साथ मांसाहार किया। जब उससे उसे छिटपुट चोट के रूप में उसका फल मिला, तब एकदम से उसके मस्तिष्क में वह कुण्डलिनी प्रचंड होकर प्रकट हो गई, और उससे जुड़ा हुआ माँसभक्षण का पापकर्म भी उसे स्मरण हो आया। अब जो कहा है कि अल्लाह के बन्दे को परेशान नहीं करना चाहिए, वह भी सनातन धर्म के अनुसार ही है, जिसमें कहा गया है कि ईश्वरभक्त का बुरा करने वाले को ईश्वर कभी क्षमा नहीं करते। वास्तव में सभी धर्म एकरूप ही हैं, केवल समझने भर का फर्क है। इसी तरह, एक बार प्रेमयोगी वज्र ने कुण्डलिनीध्यान / अद्वैतपूर्ण जीवन के साथ हल्का-फुल्का राजद्रोह किया। वास्तव में वह राजद्रोह नहीं था, अपितु राजद्रोह का अभिनय मात्र ही था मूलतः, क्योंकि उसमें अहिन्सापूर्वक सर्वलोकहित छुपा हुआ था। जब उसे सजा मिली, तो उसने दिव्य प्रेरणा से सजा से बचने का पूरा प्रयास किया, जिसमें उसे अनौखी सफलता भी मिली। जब उसे उसकी हल्की-फुल्की सजा मिली, तब वह उसे ईनाम की तरह लगी, और उसके मन में कुण्डलिनी-ध्यान / अद्वैतभाव पहले से भी प्रचंड हो गया मूलकर्म के स्मरण के साथ, जिससे उसका थोड़े से योग के प्रयास के साथ कुण्डलिनीजागरण हो गया। साथ में कहें, जैसे योग के समय शारीरिक जोड़ों पर सांसों / मुड़ने / गति आदि के प्रभाव से उत्पन्न संवेदना के ऊपर कुण्डलिनी आरोपित होकर प्रचंड हो जाती है, उसी प्रकार धर्मसम्मत वेदना आदि के समय ईश्वर, संवेदना के ऊपर आरोपित होकर अति स्पष्ट हो जाते हैं।

तभी तो मैं कहता हूँ कि कोई भी किसी से कभी घृणा कर ही नहीं सकता। यदि एक आदमी दूसरे आदमी से संपर्क स्थापित करता है, तो वह हर हालत में उससे प्रेम ही करता है। यदि वह उसका भला करता है, तो उसको प्रत्यक्ष रूप से आगे बढ़ने का मौक़ा देकर, और यदि वह बुरा करता है, तो उसके पापों को नष्ट करके अप्रत्यक्ष रूप से। यद्यपि पहले वाला तरीका अधिक प्रशंसनीय व व्यावहारिक है। दूसरे तरीके का प्रयोग यदि मजबूरीवश करना ही पड़े, तो हल्के या अधिक से अधिक मध्यम स्तर तक ही, अतिवादी स्तर तक कभी नहीं।

हो सकता है कि प्राचीनकाल में आम जनजीवन में लड़ाई-झगड़ों की, युद्धादि की व पशु आदि के प्रति हिंसाओं की बहुतायत हुआ करती थी, जिनका निवारण संभवतः असंभव था। इसलिए उन्हें ही धर्म का आवरण पहना कर शुद्ध व मुक्तिकारी कर दिया गया। क्योंकि हिंसाओं व अशुद्धियों से भरे हुए वातावरण में शुद्ध वैदिक क्रियाएं लाभ के स्थान पर हानि पहुंचा सकती थीं, इसीलिए उनके प्रति घृणा को फैलाया गया। बाद में स्थिति बदल गई, परन्तु उनके बनाए गए नियम सदा के लिए हो गए, क्योंकि वे निष्ठा व विश्वास से लिखित रूप में पक्के कर दिए गए थे। उस समय यातायात व संचार की भी संतोषजनक सुविधाएं नहीं होती थीं। इसलिए एक छोटे से दुष्कर / विशेष परिस्थिति वाले क्षेत्र में सीमित लोग समझते थे कि पूरी दुनिया उन्हीं के जैसी थी। इसीलिए वे अपनी विचारधारा को पूरी दुनिया में फैलाने की मंशा रखते थे।

इसी तरह पुराने समय में तंत्र में भी विरले मामलों में नर-बलि की प्रथा थी, जो अब नहीं है। दोनों में ही शरीर-सुख को अधिक महत्त्व दिया गया है। दोनों में ही हठयोग के आसन हैं। दोनों ही पलायनवादी नरम हिंदुत्व के विरोधस्वरूप ही बने थे। यद्यपि तंत्र इस्लाम की अपेक्षा नरम हिंदुत्व के प्रति बहुत अधिक उदारवादी बना रहा, और उसके बीच में पूरी तरह से घुल-मिल कर जीवित बना रहा।

यहाँ हम यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि इस्लाम में 5 मकार न होकर 4 मकार ही हैं, कम या अधिक रूप से। उसमें मदिरा निषिद्ध है। यद्यपि मैं तो माँस के प्रभाव को मदिरा के प्रभाव के समकक्ष ही मानता हूँ। दोनों ही तमोगुणस्वरूप हैं। साथ में यह भी स्पष्ट करना चाहता हूँ कि वे पञ्चमकार वहां तंत्र की तरह स्पष्ट व अच्छी तरह से परिभाषित  न होकर पञ्चमकार की तरह ही प्रतीत होते हैं, क्योंकि उनका प्रभाव पञ्चमकारों की तरह ही ईश्वरीय शक्ति की ओर ले जाने वाला है। उपरोक्त तथ्यों के लिए एक अन्य प्रामाणिक लेख निम्नोक्त लिंक पर पढ़ा जा सकता है- http://greatvashikaranspecialist.com/islamic-tantra

अल्लाह संस्कृत का शब्द है- स्क्रिब्ड

अंततः धार्मिक उन्माद से बचाने वाली, व वास्तविक मानवता-धर्म सिखाने वाली संक्षिप्त जानकारी इसी वेबसाईट पर (जिसका नायक प्रेमयोगी वज्र है) प्राप्त की जा सकती है, और विस्तृत जानकारी वाली पुस्तक को निम्नलिखित लिंक पर प्राप्त किया जा सकता है।

यदि आपको इस पोस्ट से कुछ लाभ प्रतीत हुआ, तो कृपया इसके अनुसार तैयार की गई उपरोक्त अनुपम ई-पुस्तक (हिंदी भाषा में, 5 स्टार प्राप्त, सर्वश्रेष्ठ व सर्वपठनीय उत्कृष्ट / अत्युत्तम / अनौखीरूप में निष्पक्षतापूर्वक समीक्षित / रिव्यूड ) को यहाँ क्लिक करके डाऊनलोड करें। यदि मुद्रित पुस्तक ही आपके अनुकूल है, तो भी, क्योंकि इलेक्ट्रोनिक डीवाईसिस / फोन आदि पर पुस्तक का निरीक्षण करने के उपरांत ही उसका मुद्रित-रूप / print version मंगवाना चाहिए, जो इस पुस्तक के लिए इस लिंक पर उपलब्ध है। इस पुस्तक की संक्षिप्त रूप में सम्पूर्ण जानकारी आपको इसी पोस्ट की होस्टिंग वेबसाईट / hosting website पर ही मिल जाएगी। धन्यवाद।

यदि आपने इस लेख/पोस्ट को पसंद किया तो कृपया इस वार्तालाप/ब्लॉग को अनुसृत/फॉलो करें, व साथ में अपना विद्युतसंवाद पता/ई-मेल एड्रेस भी दर्ज करें, ताकि इस ब्लॉग के सभी नए लेख एकदम से सीधे आपतक पहुंच सकें। धन्यवादम।

ई-रीडर व ई-बुक्स के बारे में विस्तार से जानने के लिए यहां क्लिक करें।

Yoga and Tantra – A comparative study (some interesting facts about the tantric system, Tantra versus Islam)

From the very beginning in the tantric system, a person treats himself, just like the person of God / dehapurusha, as a supremely, free, nondual and unattached. However, in Yoga, a person first wakes up his kundalini. From that, he experiences great joy associated with Advaita / nonduality. With the happiness of that KundaliniJagran, he begins to adopt unattached conduct in an unintended manner, and gradually becomes non-dual like Tantric. A yogi can also experience enlightenment while moving ahead with KundaliniJagran. His adeptness gets more firmness from that. This means that the tantric technique is easier, more natural, universal, friendly to all human beings and humanistic than yoga. When the tantric system has to be accepted even after yogic achievement, why not accept it from the beginning? People who practice tantric mechanisms get themselves KundaliniJagran and enlightenment over time, without any different or special effort. Many people also get a natural opportunity to prove both the mechanisms, tantric as well as Yoga together; as with this hosting website, it happened with the protagonist Premyogi vajra. Many people limit the system to the five Ms. But the truth is that the tantric system is a whole life pattern. This is an Advaitic way (nondual) of life. Most spiritual pickles of Hindu culture are different parts of a tantric system, whether it is study of Vedas-Puranas, or various activities related to them. In ancient times, those people who had enlightenment became too decent and found very difficult to live their life in normal life. The reason for this was that the common people were used to living life from a physical perspective, which could not accept the enlightened minds of the enlightened people. Therefore, they tried to live their life while copying the natural style means imitating nature, leaving the common, ignorant and worldly people away from their deep heart. That is because they found all activities to be knowledgeable in nature. By doing so, their spiritual level increased further, and they became lively liberated. Seeing the benefits of natural lifestyles, they became curious to show the benefits to others in their mind. Therefore, they started writing natural events in the living form. That well-known scriptural collection in written form became famous as Vedas-Puranas, that made life easier and spiritual for many people. The enlightened people who wrote those mythologies were called sages/ monks.

The same type of incident happened with tantrik Premyogi Vajra as well. Even in his childhood, he got transient enlightenment. After that, he was unable to live himself as a normal person. That is why he made a philosophy of physiology philosophy / body science philosophy, a lively philosophy similar to mythical philosophies of Vedas-Puranas, for his benefit. From his proximity to that self-made philosophy, with the achievement of Advaita and non-attachment, his all-round progress was ensured, and even unintentionally, there was a glimpse of KundaliniJagran. Inspired by the same benefits, he composed a book based on the same philosophy, which we can call modern mythology. In the Puranas, there is a description of the physical universe outside, but in the philosophy of body, the description of the subtle creation within our own body is described. According to ‘Yatpinde Tatbramhande’, there is no difference between the two worlds. Therefore, we can also call Premyogi Vajra as a modern sage. His book is like a Tantric book, similar to the Puranas, although there is also a few parts of Panchmakari Vidya / 5 Ms, like the Srimad Devibhaagavat Purana. Now it is the Panchamakari tantric system, it is only a small part of the vast Tantric system. After conducting a tantric system for a very long time, when the Tantric attitude of the common seeker becomes very mature, then only under the guidance of a qualified master, the five-M part of the system should be taken as a shelter, so that sufficient power can be obtained for KundaliniJagran. In the direction of its adoption earlier than the proper time or under the guidance of an inept guru, it can also bring losses to the place of profit. Together, the goal of Panchmakari Tantricas is not violence, but KundaliniJagran only. The best sources of power are only meat, sex and alcohol, which cannot be obtained without violence. Therefore, the least of their experiments have been given priority to achieve maximum spiritual benefits. An example of this is fish-intake. Because the fish can also be caught in the minimum quantity as needed, hence there is no redundant violence, so that violence-faults remain at a minimum level. Together, the fish is of cold nature. Therefore, it does not allow that anger in the Panchamakari to occur, which is the biggest obstacle in the spiritual path. Together, it produces the lowest Tamoguna than related other nonvegs, and its side effects on the body are even less than the other. In the same way, a single wife has been given priority so that excessive sexuality can be avoided, because that is also a particular kind of violence, especially if the right tantric rules are not adopted. Still, light mistakes are natural when learning. If the tantric-mates have to change, then in rare cases, only after a very long time and after getting special spiritual progress or after achieving enough spiritual progress. The evil eye on the woman is absolutely forbidden. Bad words and bad jokes about sexuality / 5 Ms are also taboo. The woman is to be respected as Goddess and Guru as far as possible. No one’s daughter or anyone’s wife is made to be a tantric companion, because they are seen as part of the emotional property of others. Most of the earliest known tantrics of ancient times are those who used to live life with the prevalent ordinary tantric practices, but later on for various reasons they also started consuming the Panchmakaras. One of the main reasons for these reasons was boycott from society or not adequate respect in society. Only then, some eminent tantric technicians have been around the Indo-Pak border of Punjab today, some have happened in today’s Pakistan. The second reason being the Punjab area is well prosperous, so there are people fond of making merry. In Punjab, the patronage of Guru-tradition has also been developed according to tantra. I myself have experienced everything directly from Punjab while living there in the direction of border areas with Pakistan. Tantric temples are also found abundantly on the same side. The access to the common Tantric system of the Hindus was reduced to those remote areas, so the people living there were not receiving the force from collective spirituality. Because of this resistance, they adopted the Panchamkari system correctly, and achieved quick success, because the spiritual force generated with the Panchamkari Shakti was more than the force of collective spirituality. Undoubtedly, they remained cut off from the common and spiritual society, yet they reached the peak of accomplishments, and continued to inspire others too. Naturally, in the same way, many Dalit and backward classes were also involved due to the above-mentioned reasons. The same example is also the Tibetan Buddhists who spend their lives alone in remote mountainous areas. The Panchamakari system seemed more suitable than the simple system prevailing in the plains, so it is still alive there. In Chinese Taoism / Tao religion, a sexual sage has been described as an ideal sage. In fact, since the separation of the Panchamakaras from the spiritual system, the decline of spirituality has started. Panchamakaras were described as the abode of evils. It was from this that the power of Panchamakars kept on raising the power of the evil people, and they continued to get stronger from it. After all, the whole earth became full with the so-called ignorant or evil people. On the other hand, spirituality became impaired without the necessary power, because the five Ms were kept away from it. Nowadays, the Panchamakari tantric system is spoken incorrectly, though the use of the Panchamakars is being used in the open and without any interference, not for spirituality, but for blind materiality. This proves that today the society of real tantrics is a strict requirement.

Something similar happened with Premyogi Vajra. He also adopted the spiritual techniques of common sense. However, his spiritual growth was slowing down. When he could not even get the hope of glimpse of KundaliniJagran even for a very long time, he became like a rebel against the common spiritual system. Common people started to insult him. His opposition was also increasing in the form of intake of Tantric Panchamakars. Both of this effect-reason was increasing each other. Disrespect with opposition and opposition with insult. This cycle continued until he got a glimpse of KundaliniJagran. He became content with his calmness, and his faith increased over the Panchamakari tantric system.

In fact, yoga (including common spiritual tantric methods) and tantra (Panchamkari Yoga) is the same, only difference in the level of magnitude of kundalini expression. Kundalini is more massive with Panchamakari Yoga than ordinary yoga. Therefore, an intelligent tantric person keeps on taking shelter of both as per time. There is nothing opposed in both. Tantric is all the spiritual people, but the Panchmakari Tantric is the prevalence of saying Tantric. We can also call him Panchmakari Sadhu, because there is no difference in principle between the ordinary Sadhu and Panchamakari sadhu, except the level of manifestation of Kundalini.

It seems that the maithun-makar / sexuality-M is only the most important M of all the 5 Ms, because it gives a wonderful force to the Kundalini. Other considerations are, therefore, only helpful in this main cause. I consider other Panchmakari religions as a transformational form of the panchmakari tantric system. The power that exists in those, and the majority of which attract the people, appears to be the power of 5Ms. However, opposing Satvik Hindu religion / system, anti-religion cannot attain spiritual benefits, but reverse harm only; it is a matter of course. This is because it is the principle that the five Ms are successful only if those live near the satvik and peaceful system / yoga / religion. This gives both methods both spiritual and physical benefits. Otherwise, those are only the reserves of sins. Therefore, in all the cooperative co-existence of all religions, it is a blessing for everyone. It is instructed to be a rational, selfless, humanistic, loving, satisfying, social and non-violent, for the Hindu philosophers / priests of charming personality / colorful (svarna) Hindu pundits, so that they have a divine pace and attraction along with the non duality and detachment. Only then other common or Panchamakari tantric people can fortify their physical image as Kundalini in their mind by making them a guru. Only then will the power of Panchamakars look after and raise up the Kundalini, otherwise those will clear the path of hell for them.

In many places, the consumption of panchamkaras has been specified for signatory purpose or formalities, so that no one should have the ego that I am very pure, and together with the best kind of non-duality. This principle in the spiritual system has been kept in mind that the result of karmic effect / Karma will continue to be met; hence, the use of panchamkaras is very modest and cautious. In many places, their use has been told so that people of violent or demon nature can be taught to eat, drink and enjoy the right way, and by putting the seeds of spiritualism within their enjoyment and luxury, they too could be turned towards spirituality. Slowly later on they themselves improve. However, anything, the amazing power of the Panchamakari tantric system cannot be denied. Siddha Tantric even says that without the Tantra especially sexual tantra, enlightenment can not be attained.

There are even more interesting facts about the tantric system. Tantrasamaj is also called a cosmopolitan / secret society. Many of them had joined the great Brahmin pundit too. For many of the Tantric, their own sister was their tantric master. Islam is also allowed to marry one’s own sister (although not born from the wife of father). This suggests that there exists somewhere in the origin of Islam the Panchamakari tantric system. The black stone that kabba have a custom to kiss, most people consider that as Shivling. Lord Shiva is the originator of the Tantra. In the case of hetero-vehicle tantra, it is also believed that the more tantric girlfriend is more ugly or unattractive; tactical it is, provided it is filled with tantric qualities. That is because there is no ego in her, so that she lets the mental kundalini image made from physical forms of others / gurus to grow easily on herself. The vishamvaahee / hetero-vehicle tantra means that the image of the mental kundalini is of physical form of somebody else (the master), whereas the Kundalinivahika / kundalini carrier is a tantric lover. Samavaahee / homo-vehicle tantra means that the image of the mental kundalini is also of the physical form of a tantric lover, and the Kundalini-carrier is the same. In samavaahee tantra, signatory / indirect sexual technique is more effective, but complete / clear / direct tantric sexual action in the vishamvaahee tantric system. Therefore, to create more and more sexual attraction, the samavaahee Tantrica (female tantric) should be attractive. I have seen two types of tantric mechanisms called samavaahee tantra and vishamvaahee tantra in the experimental details of Premyogi Vajra on this host website only, not at other places. Although there is a prevailing belief in tantra that women of the backward classes are the best for direct tantric sexual activities. This makes the statement of Premyogi Vajra clear. It is said that once a famous Tantric guru’s ugly and black tantrica girlfriend was ridiculed by his disciple. Angered by that, that tantric girlfriend cursed him for not achieving enlightenment during his lifetime. That’s how it happened.

Now we discuss the similarity between Tantra and Islam in detail. The beginning of the Tantra and Islam began almost simultaneously. In both, escaping away from world has been rejected, and the emphasis is on worldly tendencies. Both have given importance to women. There appears Tantric principle behind circumcision. Halala done by maulavee in islam also appears as a distorted form of tantric ritual of making joint consort by guru and disciple. Both sadhana paths have been created to provide salvation for all the general and purity-free people. Too many Muslims consider tantric nath-gurus as their own gurus too. Tantric gurus are also called Pir Baba. Just as the rightists are purists of Hindus, in the same way, the Sufi spiritual practice is a puritanical and moderate ideology in Islam. Most of the time, the right Dynasties of Hinduism and the left ones are said to be anti to each other. But based on the tantric experience of Premyogi Vajra, I have tried to prove in this article that the tantra and the right Dynasty are not anti to each other, but collaborative. Say ordinary tantric methods to be dakshinatantra / right tantra, and the Panchamakari system is called vamatantra / left tantra. In the same way, Hindu religion and Islam also proved to be collaborators of each other, because in the larger perspective, call the Hindu religion as right tantra and Islam as a left tantra. Therefore there is no place for animosity or bitterness between the two. Both religions are loathing each other and are thus unknowingly loving each other for the love resides inside hatred. But it does not work in full. Then why do not these two love each other directly, so that they can achieve each other’s strength in greater quantity and with greater positiveity. The difference in ideas is the nature of mankind, but it should not be used to cause ill effects on mutual love and cooperation. If they need to amend their ancient theology, then it should be done in the interest of humanity by sitting in the Synod / dharmsabha or Sarvadharma Sabha / all religions’ assembly. I want to make it clear here that here all the religions are talking about, not of any particular religion. All should consider making amendments in this way in words filled with inhumanity, fanaticism and hatred, which will also preserve the respect of all religions, and also be amended according to the era. For example, since when Hinduism began to oppose the practice of spiritual slaughter, coconut was sacrificed in a symbolic form. In the name of the Kundalini / Guru in Tantra, the Panchamakars are consumed, however in the name of Allah (God) in Islam, however both share similarities. Actually minding the invisible god always feeds up the kundalini, the secret only known by few ones. But in the hardcore Islam, among the Panchamakars, violence and lies towards human beings have also been included. In Hinduism and Christianity, it was also there comparatively at a lighter level, although in most cases it is said that it was reactionary. Now, what was the need of it in the olden days, it can not be said, but in today’s educated and humanistic era it is not relevant, and needs to be totally exterminated. However, for one’s great self-defense (to save lives) their use can be considered in rare cases. Real sacrifice is the sacrifice of the bad spirit. Dormant sense also works. Therefore, the firm expression of the related resolutions should contradict the inhumanity, only then the latent feeling (samskaras) is destroyed. All these facts are written based on the personal experience of the hero of this website and a tantric, Premyogi Vajra, this is not a mere empty theory. Premogi Vajra is an enlightened man, and his Kundalini is also awakened. He also got spiritual success only when he denied the inhumanity in stern words nearly about 25 years ago. It can be read on this link to the webpage-https://demystifyingkundalini.com/home-5/

An explanation seems to be justified here. If the hostile opponent of God is tortured with the remembrance of God in the name of jihad etc, then in return, when that torture-giver would get the fruit of punishment arising out of that karma of torturing other, then the God will be remembered by him in much intensity for the karma and that’s fruit are both interconnected.. Then, if he dies while suffering torture, then he would be liberated, because even in Sanatan Dharma, it is said that whatever at the time of death is remembered, the same form is got posthumously. However, if it does not happen, then the door of hell is open. It is a different matter that he will remember God in hell also. Therefore, very caution is required. Now, when someone accepts pain in the name of God, it is natural that in him there will be a remembrance of God, so that he too will be dear to God. Due to this the person causing suffering and the person who suffers, will be blessed with one and the same. However it is clear that it will be worse for the suffering-causer than the one who suffers pain, because if the former does not perform the Tantra properly, then the hell-sword which is born from evil deeds always hangs over him. Because it is a karmic principle that until one becomes free, then the effect of karma will remain unchanged. That is why there is ‘everything’ or ‘nothing’, there is no middle level in it. This is also the principle of the Tantra especially the extreme Tantra. This is one of the main reasons that Great Islam seems like an extremist Tantra. However, unfortunately due to fear of extreme tantra, many people started living away from the ordinary or soft Tantra, by which they became untouched by the benefits of a science-based spiritual method of Tantra. Premyogi vajra proved it through his experience. He enjoyed flesh with the remembrance of Kundalini. When he got his fruit as a sporadic injury, kundalini suddenly appeared much more intense in his mind, and he also remembered the interconnected karma of eating flesh. Now whoever says that a devotee of Allah should not be disturbed, it is according to Sanatan Dharma, which states that God does not forgive the one who does bad to devotee of God. Actually all religions are the same, there is a difference between understanding only. Likewise, once, Premyogi vajra had a slight rebellion along with Kundalini-dhyan / Advaita-life. In fact, that was not treason, but the act of light apparent sedition only, because there was non-violence with benefit of the whole world hidden inside. When he was punished, he tried his best to avoid punishment by divine inspiration, in which he also had unique success. When he got his light sentence, he felt that like a prize, and in his mind, Kundalini-meditation / advaita became even more prevalent, so that he got KundaliniJagran with some effort of yoga. Simultaneously further saying, as on the body joints in yoga, the sensation generated by the effects of breathing / twisting / motion etc. becomes enraged by the Kundalini, in the same way, during the time of devotional pain, the God sensed spontaneously over the sensation becomes very clear.

Only then I say that no one can ever hate anyone. If a person establishes contact with another person, then he loves him in every situation. If he does good to him, then by giving him a chance to move forward, and if he does bad, then by destroying his sins indirectly. Although the former way is more plausible and practical. If the use of the second method is to be compulsive, then only to the mild level or up to the moderate  level at maximum, never to the extreme level.

It may be that in ancient times there was an abundance of violence in the form of quarrels, wars and animals as the main source of diet etc., whose redress was possibly impossible. Therefore, those were made clean and liberating by wearing a cover of religion. Because pure Vedic actions in the atmosphere filled with violence and impurities could cause harm to the place of profit, therefore hatred towards them spread. Afterwards, the situation changed, but the rules made by them were made forever, because they were confirmed in a written form with loyalty and faith. At that time there was not even satisfactory facilities for traffic and communication. Therefore, the limited people in a small drought area / special geographic area understood that the whole world was like them. That is why they intended to spread their ideology to the whole world.

Similarly in ancient times, there was a practice of human sacrifice in rare cases in Tantra, which is no longer there. Both of them have given greater importance to body pleasure. Both have the postures of Hatha Yoga. Both were made to oppose the escapist and soft Hindutva. Although the Tantra remained much more moderate towards soft Hindutva than Islam, and remained completely dissolving in its midst.

Here, we want to make it clear that Islam does not have five makaras, but only four are there, more or less. Wine is prohibited in it. Although I consider the effect of meat equivalent to the effect of alcohol. Both are tamoguni (darkness producing) Together, also, want to make it clear that the five-makaras there seem not as clearly and well defined as in Tantra, but those appear as panchmakaras, because their influence is going to lead towards divine power just like the Panchmakaras of Tantra.

For further confirmation, you can visit this link- http://greatvashikaranspecialist.com/islamic-tantra

Allah is a Sanskrit word- Scribd

In the end, a brief information that can save you from religious frenzy, and teach true humanity-religion, can be found on this website (Whose hero is a Premyogi vjara), and a detailed information book can be found on the following link.

If you have found some benefit from this post, please download here the above mentioned e-book (in Hindi language, 5 star rated, reviewed in unbiased way as the best, excellent and must read by everyone) made with steps as told above. If only print version suits you, then too print version should only be got after testing that’s e- version on the electronic devices / phone etc., that is available on this link for this book. You can also find the complete information about this book, both in English as well as Hindi languages on the hosting website of this post. Thank you.

If you liked this post then please follow this blog providing your e-mail address, so that all new posts of this blog could reach to you immediately via your e-mail.

Know in full detail about e-readers and e-books here.

 

प्रिंट पुस्तक की ओर- Towards the print book

प्रिंट पुस्तक की ओर (please browse down or click here to view post in English)

जैसा कि पिछली ब्लॉग पोस्टों / blog posts में मैंने बताया है कि भारत में केवल 10% पाठक ही ई-पुस्तकों को पढ़ते हैं। अधिकाँश पाठकों को निराश न होना पड़े, इसके लिए पुस्तक के प्रिंट वर्जन / print version को पोथी डॉट कॉम स्वयंप्रकाशन के प्लेटफोर्म / self publishing platform of pothi.com  से छापने का निर्णय लिया गया। कभी वह एम एस वर्ड की डॉक्स सी फाईल / Doxc file of MS word को सीधे ही ले लेता था, तो कभी उसे पीडीएफ / PDF में कन्वर्ट / convert करके अपलोड / upload करने की हिदायत देता था। वर्ड फाईल को पीडीएफ में कन्वर्ट करने से पहले प्रिंट बुक के लिए फोर्मेट / format करना जरूरी होता है, क्योंकि पीडीएफ फाईल की फोर्मेटिंग को हम बदल नहीं सकते। इसी तरह वर्ड फाईल को पीडीएफ फाईल में बदलना आसान होता है, पर पीडीएफ फाईल को पुनः वर्ड फाईल में पूरी शुद्धता से बदलना लगभग असंभव सा ही होता है। उसके लिए सब्सक्रिप्शन / subscription पर पीडीएफ एलिमेंट / PDF element को खरीदना पड़ता है। उससे पीडीएफ फाईल को वर्ड फाईल में कन्वर्ट किया जा सकता है। हालांकि उससे आसान, कारगर व मुफ्त का विकल्प ओसीआर है। ओसीआर (ऑप्टिकल रिकोग्निशन सिस्टम) के बारे में आप मेरी अलग से वेबपोस्ट पढ़ सकते हैं। कमियाँ तो रह ही जाती हैं। इसलिए किसी भी लेख की मूल वर्ड फाईल को जरूर बेक अप / स्टोर / back up करके रख लेना चाहिए।

प्रिंट के हिसाब से वर्ड फाईल को अलग से फोर्मेट करना पड़ता है, क्योंकि ई-बुक का फोर्मेट प्रिंट बुक के लिए नहीं चलता। पहले मैं वर्ड के ‘पेज सेटअप / page setup’ पर गया। वहां पर ‘मार्जिन / margin’ टेब / tab को प्रेस / press किया। अपर / upper मार्जिन व बोटम / bottom मार्जिन को ०.5 इंच, अन्दर के / इनसाइड मार्जिन को ०.75 इंच, बाहर के / आऊटसाईड मार्जिन को ०.4 इंच, व गटर को ०.3 इंच रखा। गटर पुस्तक के आमने-सामने के पृष्ठों के बीच की नाली होती है, जिसमें कई बार अक्षर दब जाते हैं। इसीलिए उसे पर्याप्त चौड़ा रखा जाता है। मेरे द्वारा ‘मिरर मार्जिन / mirror margin’ सेलेक्ट किया गया। मिरर मार्जिन किताबों के लिए विशेष होते हैं। इसमें किताब के आमने-सामने वाले पृष्ठ एक-दूसरे के दर्पण-चित्र की तरह दिखते हैं। उसी पेज सेटअप पर पोर्ट्रेट व व्होल डोक्यूमेंट / portrait and whole document को सेलेक्ट किया। साथ में, हेडर / header- ०.2″ फ्रॉम टॉप / from top, व फूटर footer- ०.2″ फ्रॉम बोटम / from bottom रखा। यह पृष्ठ-सेटअप 300 पृष्ठों वाली मेरी पुस्तक के लिए पर्याप्त है। पृष्ठ संख्याओं में परिवर्तन के साथ, केवल अंदर के मार्जिन और गटर थोड़े-बहुत बदलते हैं, अन्य मार्जिन नहीं। याद रहे कि माइक्रोसोफ्ट वर्ड के 2007 व उसके ऊपर के वर्जन में डिफाल्ट पेज मार्जिन्स चारों ओर 1 इंच (2.54 cm) होता है।

क्रमबद्ध की गई सूचना निम्नलिखित स्क्रीनशॉट चित्र पर देखें-

Screenshot_2018-12-06-12-31-55

फिर में ‘पेपर / paper’ टेब पर गया। पहले कस्टम साईज / custom size सेलेक्ट किया गया। फिर पेपर वाईडथ /  paper width को 6″ व पेपर हाईट को 9″ रखा, क्योंकि 6″x 9″ की पुस्तकें सर्वाधिक लोकप्रिय हैं। उस पर ये सेटिंग्स / settings खुद ही लागू थीं- ‘फर्स्ट पेज-डिफाल्ट ट्रे सेलेक्टड / first page default selected, बोथ फॉर फर्स्ट एंड अदर पेजिज / both for first and other pages तथा व्होल डोक्यूमेंट / whole document।

तब में ‘लेआऊट / layout’ टेब / tab पर गया। सेक्शन स्टार्ट / section start- ओड पेज / odd page। इसका तात्पर्य है कि पुस्तक का प्रारंभ ओड पेज (1,3 आदि) से होगा, जो पुस्तकों में अच्छा लगता है। इसमें पुस्तक के बाएँ पृष्ठ पर ईवन नंबर / even number (2,4 आदि) होता है, और दाएं पृष्ठ पर ओड नंबर की पेज संख्या। वर्ड डोक्यूमेंट की शीर्ष-पट्टी में स्थित हेडर बटन (पुस्तक का शीर्षतम रिक्त स्थान) में जाकर, हेडर में पुस्तक के शीर्षक का नाम लिख दिया गया, और पुस्तक के फूटर में (पुस्तक का निम्नतम रिक्त स्थान) उपशीर्षक का। उससे प्रत्येक पेज पर वे नाम वैसे ही आ गए। एक महत्त्वपूर्ण बात और है। यदि हम वर्ड फाईल में embed fonts ऑप्शन को चालू करें, तो वह पीडीएफ फाईल में सर्वोत्तम तरीके से कन्वर्ट हो जाती है। उससे पीडीएफ को पुनः वर्ड फाईल में कन्वर्ट करना भी आसानी से संभव हो जाता है। इसके लिए word option में जाकर save – embed fonts – embed only the characters used in the document (best for reducing file size), इन बटनों को इसी उपर्युक्त क्रम में दबाएँ। फिर उस फोर्मेटिड बुक रुपी वर्ड डोक्युमेंट को एवरनोट में स्टोर कर दिया गया, ताकि वह भविष्य में भी काम आता। फिर उस वर्ड डोक्युमेंट को ओनलाईन पीडीएफ कन्वर्टर / online pdf converter से पीडीएफ में कन्वर्ट कर दिया गया। परन्तु उसमें बहुत सी गलतियाँ थीं, विशेषतः बहुत से अक्षरों की बनावट दोषपूर्ण थीं, जो मुझे पुस्तक को पढ़ते हुए चेक करते हुए पता चला। अंततः मैंने गूगल ड्राईव / google drive के पीडीएफ कन्वर्टर का प्रयोग किया। उसमें हिंदी के सभी अक्षर व चिन्ह पूर्णतया शुद्ध निकले। इसके लिए हमें डोक्युमेंट को गूगल ड्राईव पर अपलोड करना पड़ता है। फिर ‘ओपन विद / open with’ दबाकर पीडीएफ कन्वर्टर एप / app को क्लिक / click करना चाहिए। यदि वह लिस्ट / list में न आए, तो “कनेक्ट न्यू / मोर एप / connect new or more app” को क्लिक करके पीडीएफ कन्वर्टर को सर्च / search करना चाहिए, और उसे लिस्ट में जोड़ देना चाहिए। इसी तरह यदि हम ओपन विद की लिस्ट में गूगल ट्रांसलेट / google translate को क्लिक करें, तो उससे हम डोक्युमेंट को किसी भी भाषा में ट्रांसलेट कर सकते हैं। यद्यपि वह ट्रांसलेशन दोषपूर्ण होती है, इसलिए बाद में उसे हाथ से करेक्ट / correct करना पड़ता है। फिर भी इससे बहुत से समय की व दिमाग की भी बचत हो जाती है। शर्त यह है कि एक बार में अधिक से अधिक लगभग वर्ड के 80 पेज ही ट्रांसलेट हो सकते हैं। इसलिए पुस्तक को टुकड़ों में ट्रांसलेट करना पड़ता है। ओपन विद पीडीएफ कन्वर्टर को क्लिक करके एक विंडो / window आती है, उसमें फिर से ब्राऊस / browse करके कम्प्युटर / computer की किसी ड्राईव / drive में स्टोर्ड उस बुक डोक्युमेंट / stored that book document को  फिर से अपलोड करना पड़ता है। तभी “कन्वर्ट / convert” नाम का क्लिकेबल बटन / clickable button आता है। फिर उस पीडीएफ डोक्युमेंट को खोल लें। उसके शीर्ष पर दाईं तरफ एक डाऊन एरो / down arrow का निशान होगा। उसको क्लिक करने से वह डोक्युमेंट कम्प्युटर के डाऊनलोड फोल्डर / download folder में डाऊनलोड हो जाएगा। उस डोक्युमेंट में वही सेटिंगज / फोर्मेटिंग रहेंगी, जो उसके उत्पादक वर्ड डोक्युमेंट में रखी गई थीं।

अब पोथीडॉटकोम / pothi.com में जाएं। लॉग इन / login करने के बाद कहीं पर प्रिंट ओन डिमांड / print on demand बटन पर जाकर उसमें दिए गए निर्देशों का पालन करें, और बुक को पब्लिश कर लें। 1-2 दिन में वह खरीदी जाने के लिए तैयार हो जाएगी। नए-2 स्वयंप्रकाशक के लिए कवर को अपलोड करने से अच्छा तो इनबिल्ट कवर डिजाईनर की सहायता लेना ही ठीक रहता है। उसके लिए अच्छा सा कवर-फोटो / cover photo or image अपलोड करें। वह कवर फोटो पुस्तक के अंतिम पृष्ठ की पिछली तरफ लग कर बेक कवर back cover बन जाएगा। फ्रंट कवर / front cover पर पुस्तक के शीर्षक, उपशीर्षक, लेखक आदि का नाम लिखें। साथ में, पुस्तक की रिब / rib (पुस्तक की बाईंडिंग वाली केंद्रीय व पीछे की ओर की पट्टी) पर भी शीर्षक व लेखक का नाम लिखें।

प्रिंट ऑन डिमांड से चाहो तो जितना मर्जी बुक की कॉपियां छपवा सकते हो, यहाँ तक कि अकेली पुस्तक भी। परंतु इससे सामूहिक / पारंपरिक छपाई की अपेक्षा पुस्तक कुछ अधिक महंगी पड़ती है। फिर भी इसके अनेक लाभ होतेे हैं। इससे कागज की बर्बादी नहीं होती, क्योंकि जरूरत पड़ने परही पुस्तक को छपाया जाता है, और एडवांस में पुस्तक को छपाने की आवश्यकता नहीं होती। इससे कुल लागत खर्च में भी बहुत कमी आती है, व पबलिशर की मनमानी भी नहीं चलती।

यदि आपको इस पोस्ट से कुछ लाभ प्रतीत हुआ, तो कृपया इसके अनुसार तैयार की गई उपरोक्त अनुपम ई-पुस्तक (हिंदी भाषा में, 5 स्टार प्राप्त, सर्वश्रेष्ठ व सर्वपठनीय उत्कृष्ट / अत्युत्तम / अनौखीरूप में समीक्षित / रिव्यूड ) को यहाँ क्लिक करके डाऊनलोड करें। यदि मुद्रित पुस्तक ही आपके अनुकूल है, तो भी, क्योंकि इलेक्ट्रोनिक डीवाईसिस / फोन आदि पर पुस्तक का निरीक्षण करने के उपरांत ही उसका मुद्रित-रूप / print version मंगवाना चाहिए, जो इस पुस्तक के लिए इस लिंक पर उपलब्ध है। इस पुस्तक की संक्षिप्त रूप में सम्पूर्ण जानकारी आपको इसी पोस्ट की होस्टिंग वेबसाईट / hosting website पर ही मिल जाएगी। धन्यवाद।

यदि आपने इस लेख/पोस्ट को पसंद किया तो कृपया इस वार्तालाप/ब्लॉग को अनुसृत/फॉलो करें, व साथ में अपना विद्युतसंवाद पता/ई-मेल एड्रेस भी दर्ज करें, ताकि इस ब्लॉग के सभी नए लेख एकदम से सीधे आपतक पहुंच सकें। धन्यवादम।

ई-रीडर व ई-बुक्स के बारे में विस्तार से जानने के लिए यहां क्लिक करें।

Towards the print book

As I mentioned in the previous blog posts, only 10% of readers in India read e-books. Most readers did not have to be disappointed, for this it was decided to print the print version of the book with the Pothi.com’s self publication platform. Sometimes that used to take MS Word’s Doxc file directly, then that had ever instructed to upload it in PDF format. Before converting word files into PDFs, it is necessary to format that for a print book, because we cannot change the formatting of PDF file. Likewise, it is easy to convert the word file to a PDF file, but it is almost impossible to convert the PDF file to a word file fully again. For that, the PDF Element has to be bought on the subscription. Herein document can be converted to a PDF file from a word file. Better, more effective and free option is using OCR. Read my separate webpost on OCR (OPTICAL RECOGNITION SYSTEM). However, the shortcomings still remain. Therefore, the original word file of any article must be backed up / stored properly.

Word file has to be formatted separately according to the print, as the format of the e-book will not be available for the print book. First I went to the ‘page setup’ of the word. Pressed the ‘margin’ tab on there. Fixed top margin and bottom margin to 0.5″, Inside Margin 0.75 in., Outside margin 0.4 inches, and gutter was kept 0.3 inches. Gutter of book is the drain between the face-to-face pages, in which the letters are suppressed little or more. That is why it is kept wide enough. I selected ‘Mirror Margin’. Mirror margins are special for books. In this, face-to-face pages of the book look like each other’s mirror-picture. Select the ‘Portrait’ and ‘Whole Document’ on the same page setup. Together, Header-0.2″ From Top, and Footer-0.2″ from Bottom. This page setup is enough for my book with 300 pages. With change in page numbers, only the inside margin and gutter vary little or more, not the other margins. Remember that the default page margins in Microsoft Word 2007 and above are 1 inch (2.54 cm) wide all around.

See below the consolidated information on a screenshot-

Screenshot_2018-12-06-12-31-55

Then went on the ‘paper’ tab. The first custom selection was selected. Then the paper Width kept 6″ and paper height as 9″, because the books of 6″x 9″ are the most popular. These settings were applied to them themselves – ‘First page – Default tray selected, Both for the first and other pages’ and the ‘Whole document’.

Then went to the ‘layout’ tab. Section Start- Odd Page. This means that the book will start with Odd Page (1,3 etc.), which is good in books. It contains the Even numbers (2,4 etc.) on the left page of the book, and the page numbers of the odd category on the right page. In the Header button located in the top-bar of the Word document, the title of the book was written in the header, and the subtitle of the book is in the footer (the lowest spacing of the book) . From that on each page, those names came in the same way. Word document converted to PDF will be best if “embed font” option is enabled in MS Word while saving the parent word document. With this, converting pdf file to word file becomes possible easily. For this, ‘word option’ button is to be clicked, and then save – embed fonts – embed only the characters used in the document (best for reducing file size), these buttons are to be pressed in this above sequence.

Then that formatted book was stored in Evernote so that it could work in the future. Then the Word document was converted to PDF from the online PDF Converter. But there were many mistakes in it, especially the text of many letters was faulty, which showed me on checking while reading the book. Eventually I used Google Drive’s PDF Converter. In it all the Hindi letters and symbols are completely pure. For this, we have to upload the document to Google Drive. Then press the ‘Open with the PDF Converter’ button. If it does not come in the list, then you should search the PDF converter by clicking the “Connect New / More App”, and add it to the list. Similarly, if we click on Google Translate in the list of ‘Open With’, we can translate the document in any language. Although the translation is faulty, it has to be corrected by hand afterwards. Yet it also saves a lot of time and brains. The condition is that approximately more than 80 pages of the word cannot be translated at a time. Therefore, the book has to be translated into pieces. Clicking ‘Open with PDF Converter’ comes a window, then has to browse it again and upload that stored book document in a drive of a computer. Only then clickable button named “convert” comes. Then open that PDF document. On top of it there will be a down arrow on the right. Clicking that will download it in the ‘download’ folder of the computer. That document will have the same settings / formatting, which was placed in its raw word document.

Now go to Pothi.com. After logging in, go to the ‘print on demand button’ anywhere and follow the instructions given in it, and publish the book. In 1-2 days that will be ready to be bought. Than uploading the cover by the newer self publisher, it is better to get help from an inbuilt cover designer. Upload a nice cover photo for that. The cover photo will become a back cover at the last page of the book. Enter the name of the book’s title, subtitle, author etc. on the front cover. Together, write the name of the title and author on the book’s rib (the central and rear side band of the book).

You can print copies of the book as much as you want, even the only book too with print on demand service. But this type book is more expensive than mass / traditional printing. Yet it has many benefits. This is not a waste of paper, as the book is printed only when it is needed immediately to read, and there is no need to print the book in Advance. It also highly reduces the total cost of investment, and also the publisher does not have the arbitrariness.

If you have found some benefit from this post, please download here the above mentioned e-book (in Hindi language, 5 star rated, reviewed as the best, excellent and must read by everyone) made with steps as told above. If only print version suits you, then too print version should only be got after testing that’s e- version on the electronic devices / phone etc., that is available on this link for this book. You can also find the complete information about this book, both in English as well as Hindi languages on the hosting website of this post. Thank you.

If you liked this post then please follow this blog providing your e-mail address, so that all new posts of this blog could reach to you immediately via your e-mail.

Know in full detail about e-readers and e-books here.

 

योग से शारीरिक वजन को कैसे नियंत्रण में रखें- How to keep control over body weight through Yoga

योग से शारीरिक वजन को कैसे नियंत्रण में रखें (please browse down or click here to view post in English)

योग के साथ शारीरिक वजन घटता है। यहां तक ​​कि मैंने देखा है कि एक दिन के भारी काम के साथ भी मुझे अपनी पेंट के साथ बेल्ट लगाने की जरूरत महसूस होने लगती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मैं दैनिक योग अभ्यास की आदत रखता हूं। जब मैंने कड़ी मेहनत की, तब उसके साथ किए गए नियमित योग-अभ्यास से मेरी भड़की हुई भूख बहुत कम हो गई। इसलिए उस कड़ी मेहनत के साथ हुई वसा-हानि / fat loss को पुनर्निर्मित / recover नहीं किया गया, जिसके परिणामस्वरूप मेरा वजन घट गया। नियमित योग-अभ्यास के बिना सामान्य लोग भारी काम के बाद बहुत अधिक खाते हैं, इस प्रकार वे अपनी खोई हुई वसा का तुरंत पुनर्निर्माण कर लेते हैं। योग-अभ्यास दैनिक और हमेशा के लिए जारी रखा जाना चाहिए। यदि कोई अपना अभ्यास थोड़े समय के लिए जारी रखता है, जैसे कि यदि 2 महीने के लिए कहें, तो उसे अपने शरीर के वजन में कमी का अनुभव होगा। लेकिन अगर वह उसके बाद व्यायाम करना बंद कर देता है, तो उसकी योग से निर्मित शारीरिक व मानसिक शक्ति के पास भूख को उत्तेजित करने के अलावा अन्य कोई काम नहीं रहता है। इसके कारण उसे बहुत भूख लगती है, और वह बहुत भोजन, खासतौर से उच्च ऊर्जा वाले खाद्य पदार्थों को खाता है। इसके परिणामस्वरूप उसके शरीर की वसा का पर्याप्त निर्माण हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप उसके शरीर के वजन में एकाएक वृद्धि होती है, जो उसके पहले के मूल वजन को भी पार कर सकती है। तो निरंतर अभ्यास हमेशा जारी रखा जाना चाहिए। यह एक वैज्ञानिक और अनुभव से साबित तथ्य है कि खिंचाव वाली कसरतों / stretching exercises के अभ्यास से थोड़ी-बहुत कैलोरी जल जाती है। यद्यपि योग के अभ्यास से बड़ी मात्रा में कैलोरी जलाई नहीं जाती है, फिर भी ये अभ्यास शरीर को फिट, स्वस्थ और लचीला रखते हैं। यह किसी भी समय किसी भी प्रकार के साधारण या कठिन शारीरिक कार्य को कामयाबी व आसानी के साथ शुरू करने में मदद करता है, और व्यायामशाला के अभ्यास को भी अधिक कारगर बनाता है। इसके अलावा, यह पूरे शरीर में उचित अनुपात में रक्त के समान परिसंचरण में भी मदद करता है। इससे यह शरीर के रिमोट भंडारगृहों में जमा वसा की आसान निकासी में मदद करता है। उससे सभी कोशिकाओं को ऊर्जा के मुख्य स्रोत के रूप में वसा उपलब्ध हो जाती है। इसलिए शरीर भूख की कमी के लिए ऊर्जा की कमी का संदेश नहीं भेजता है, जिसके परिणामस्वरूप भारी भूख के बावजूद भारी भूख की रोकथाम होती है। परंतु आम लोगों में भारी काम के एकदम बाद भारी भूख भड़क जाती है, जिससे वे अपने खोए हुए वजन की भरपाई एकदम से कर लेते हैं। योग कुछ खास नहीं है, बल्कि भौतिक व्यायाम, सांस लेने और केंद्रित एकाग्रता को बढ़ाने का एक सहक्रियात्मक संयोजन है। फोकसड एकाग्रता / focused concentration इसके लिए विचारों के लिए नियंत्रक वाल्व / controlling valve के रूप में काम करती है, अराजक विचारों की अचानक भीड़ को रोकती है, जिससे इस प्रकार पेरानोइया/ paranoia और दिमाग को झूलने / mind swinging से रोकती है। जब अवचेतन मन में संचित विचार बहुत उत्तेजित हो जाते हैं, तो उन्हें दिमाग के अंदर ध्यान की केंद्रित छवि द्वारा धीरे-धीरे और सुरक्षित रूप से मुक्त करके छोड़ा जाता रहता है। साथ में, उन विचारों को बाँझ और गैर-हानिकारक बना दिया जाता है, या दूसरे शब्दों में कहें तो दृढ़ता से उत्तेजित विचार ध्यान की कुण्डलिनी छवि की कंपनी के कारण स्वयं ही शुद्ध हो जाते हैं। यह छवि दिन-प्रतिदिन की सांसारिक गतिविधियों से उत्पन्न होने वाली अराजक मानसिक गतिविधियों पर भी जांच रखती है। इसके कारण योग-अभ्यास के लिए एक जुनूनी शौक सा उत्पन्न हो जाता है, और इसे दैनिक कार्यक्रम से कभी भी गायब नहीं होने देता है। कुंडलिनी छवि पर केन्द्रित एकाग्रता के बिना योग-अभ्यास के साथ, योग अभ्यास के लिए शौक जल्द ही खो जाता है, और विभिन्न छिपे हुए विचारों की अराजकता की वजह से दैनिक क्रियाकलाप भी गंभीर रूप से पीड़ित हो जाते हैं।

तांत्रिक तकनीक मानसिक कुंडलिनी छवि को मजबूत करने और इस तरह से योग के प्रति लगन को बढ़ाने के लिए एक और गूढ़ चाल है। इसके परिणामस्वरूप पूरे श्वास में वृद्धि होती है, जिससे पूरे शरीर में पोषक तत्वों से समृद्ध और अच्छी तरह से ऑक्सीजनयुक्त रक्त की आपूर्ति में वृद्धि हो जाती है। इससे यह शरीर के वजन पर भी जांच रखता है। दरअसल तंत्र प्राचीन भारतीय आध्यात्मिकता से अलग कोई स्वतंत्र रूप का अनुशासन नहीं है। तभी तो वेद-शास्त्रों में इसका कम ही वर्णन आता है, जिससे इस रहस्य से अनभिज्ञ लोग महान तंत्र की सत्ता को ही नकारने लगते हैं। यह आत्मजागृति की ओर एक प्राकृतिक और सहज दौड़ / प्रक्रिया ही है। यह तो केवल विभिन्न आध्यात्मिक प्रयासों से पुष्ट की गई कुण्डलिनी को जागरण के लिए अंतिम छलांग / escape velocity ही देता है। यदि किसी की बुद्धि के भीतर कोई आध्यात्मिक उद्देश्य और आध्यात्मिक उपलब्धि नहीं है, तो अराजक बाहरी दुनिया के अंदर उपयोग में आ जाने के अलावा तांत्रिक शक्ति के लिए अन्य कोई रास्ता नहीं है। इसका मतलब है कि तांत्रिक तकनीक के लिए आवेदन से पहले कुंडलिनी छवि किसी के दिमाग में पर्याप्त रूप से मजबूत होनी चाहिए। तंत्र तो जागने के लिए कुंडलिनी को आवश्यक और अंतिम भागने की गति ही प्रदान करता है। यह आम बात भी सच है कि गुरु तांत्रिक साधना के साथ अवश्य होना चाहिए। वह गुरु दृढ़ता से चिपकने वाली मानसिक कुंडलिनी छवि के अलावा कुछ विशेष नहीं है। यही कारण है कि बौद्ध-ध्यान में, कई वर्षों के सरल सांद्रता-ध्यान के बाद ही एक योगी को तांत्रिक साधना लेने की अनुमति दी जाती है। लेकिन आज बौद्ध लोग, विषेशतः तिब्बती बुद्ध तंत्र सहित सभी रहस्यों को प्रकट करने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि अब वे लंबे समय से चल रहे बाहरी आक्रमण के कारण अपनी समृद्ध आध्यात्मिक विरासत को खोने से डर रहे हैं।

तंत्र के बारे में विस्तृत जानकारी इस वेबपोस्ट की स्रोत वेबसाईट / source website पर पढ़ी जा सकती है, व पूर्ण जानकारी के लिए निम्नांकित पुस्तक का समर्थन किया जाता है-

शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा), एक अनुपम ई-पुस्तक (हिंदी भाषा में, 5 स्टार प्राप्त, सर्वश्रेष्ठ व सर्वपठनीय उत्कृष्ट / अत्युत्तम / अनौखीरूप में समीक्षित / रिव्यूड ) को यहाँ क्लिक करके डाऊनलोड करें। यदि मुद्रित पुस्तक ही आपके अनुकूल है, तो भी, क्योंकि इलेक्ट्रोनिक डीवाईसिस / फोन आदि पर पुस्तक का निरीक्षण करने के उपरांत ही उसका मुद्रित-रूप / print version मंगवाना चाहिए, जो इस पुस्तक के लिए इस लिंक पर उपलब्ध है। धन्यवाद।

ई-रीडर व ई-बुक्स के बारे में विस्तार से जानने के लिए यहां क्लिक करें।

How to keep control over body weight through Yoga

Body weight decreases with yoga. Even I have noticed my pent becoming lose at waist even with one day of heavy physical work. This occurs because I am habitual of daily yoga practice. When I worked hard, routine yoga exercise along with that depressed my appetite due to my too tiredness. So fat loss with that hard work was not rebuilt up, which resulted in my weight loss. Ordinary people without routine yoga practice eat a lot after heavy work thus rebuilding up their lost fat immediately. Yogic exercises should be continued daily and forever. If anyone continues his exercises for short time, say for 2 months, then he would experience reduction in his body weight. But if he stops exercising after that, then his built up stamina has no way to work other than to provoke the voracious appetite. Due to this he becomes too hungry and eats foods especially high energy foods abundantly. This results in substantial build up of his body fat which results in his body weight gain again that can surpass even his earlier basic body weight. So exercises continued should be kept continued always. It is a scientifically and experientially proven fact that hathyogic stretching exercises burn down a moderate amount of calories. Although stretching type yoga exercises don’t burn major amount of calories yet these exercises keep body fit, healthy, active and flexible. This helps in undertaking of any type of simple or hard physical work at any time successfully and with ease, also making gym exercises more effective. Also, it also helps in uniform circulation of blood throughout the entire body in appropriate proportions. This helps in easy withdrawal of fat deposited in the remote storehouses of the body. This in turn makes that fat available to all the body cells as the main source of energy. Therefore body doesn’t send the message of energy shortage to the appetite centre, that results in inhibition of voracious appetite just as seen commonly after a heavy work. Yoga is nothing special but a synergistic combination of stretching exercises, breathing and focused concentration. Focused concentration works as a controller valve for thoughts for it prevents sudden rush of chaotic thoughts thus preventing build up of paranoia and mind swinging. When accumulated thoughts in subconscious mind becomes too agitated then those are made to be released slowly and safely by the meditatively focused image inside the mind. Those thoughts are made sterile and non harmful or in other words get purified due to company of that strongly shimmering meditative image. That image also keeps check over the chaotic mental activities arising out of day to day worldly activities. Due to this an interest is generated inside the yoga practice and it is never missed out of daily schedule. With yoga exercises without the focused concentration on a kundalini image, interest for yoga exercises is lost soon and daily schedule severally suffers due to the chaotic rush of various hidden thoughts.

Tantric technique is another trick to reinforce the mental kundalini image and thus to enhance up the yoga-interest. It also results in enhanced breathing thus profuse supply of nutrient rich and well oxygenated blood to the entire body. This also puts a check over body weight. Actually tantra is not a separate discipline at its own independent of the ancient Indian spiritualism. It is a natural and spontaneous run / process towards the awakening. It only reinforces the spiritual efforts as a final or leaping step to awakening. If there is no spiritual motive and spiritual achievement inside one’s intellect, then there is no way for tantric power to go other than to become used up inside the chaotic external world. It means that kundalini image should be enough strong inside one’s mind prior to the application of tantric technique. Tantra provides the required and final escape velocity to kundalini to awakening. This is true for the common saying that Guru must be there with tantric sadhna. That guru is nothing other than the firmly affixed mental kundalini image. This is the reason why in Buddhist meditation, a yogi is allowed to take over the tantric sadhna after spending many years of simple concentrating meditation. But today Buddhists especially Tibetan Buddhists are trying to reveal all the secrets including the tantra to the world for they are afraid of losing for ever their rich spiritual heritage due to the long persisting external invasion.

You can learn about tantra in detail at the parent website of this web post, and for full detail following book is recommended-

If you have found some benefit from this post, please download here the above mentioned e-book (in Hindi language, 5 star rated, reviewed as the best, excellent and must read by everyone). If only print version suits you, then too print version should only be got after testing that’s e- version on the electronic devices / phone etc., that is available on this link for this book. You can also find the complete information about this book, both in English as well as Hindi languages on the hosting website of this post. Thank you.

If you liked this post then please follow this blog providing your e-mail address, so that all new posts of this blog could reach to you immediately via your e-mail.

Know in full detail about e-readers and e-books here.

 

टाईपिंग आर्ट / टंकण कला- एक अद्भुत शौक; Typing art- a wonderful hobby

टाईपिंग आर्ट / टंकण कला- एक अद्भुत शौक (PLEASE BROWSE DOWN OR CLICK HERE TO VIEW POST IN ENGLISH)

लोग सोचते हैं कि टाईपिंग सीखने के लिए किसी विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। व्यावसायिक टाईपिंग / professional typing के लिए यह बात कुछ हद तक सही हो सकती है, पर व्यक्तिगत टाईपिंग के लिए अपनी उपयुक्तता के अनुसार, जैसे मर्जी टाईप / type किया जा सकता है। कई लोग मात्र दो उँगलियों से (एक-२ अंगुली दोनों हाथों की) भी बहुत तेज टाईप कर लेते हैं। ऐसे लोगों में बहुत से तो व्यावसायिक टंकण-कर्ता / professional typists भी होते हैं। अंगरेजी में टाईपिंग करते समय वाक्य के पहले अक्षर को कैपिटल में लिखने की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि बाद में टैक्स्ट को सेलेक्ट करके यह काम एकसाथ किया जा सकता है। उसके लिए एम एस वर्ड के टॉप मीनू बार में एक चेंज केस का बटन (Aa) होता है। उसके ऑप्शन सेंटेंस केस को क्लिक करके डोकुमेंट के सेलेक्टड टेक्स्ट के सभी वाक्यों का प्रथम अक्षर खुद ही केपिटल हो जाता है। टाईप करते हुए, पैराग्राफ / paragraph की पहली लाइन को इंडेंट-स्पेस / indent-space देने के लिए कीबोर्ड / keyboard की टैब की / tab key नहीं दबानी चाहिए, क्योंकि टेब की से बनी हुई स्पेस को ईबुक में स्वीकार नहीं किया जाता। एंटर बटन / enter key केवल नए पैराग्राफ को शुरू करने के लिए ही दबाना चाहिए, अन्यथा नहीं। कईयों को टाईप करते हुए हरेक लाइन के अंत में एंटर की दबाने की गलत आदत होती है। उससे एम एस वर्ड / ms word हरेक लाइन को एक नए पैराग्राफ की तरह लेता है, जिससे पैराग्राफ से सम्बंधित बहुत सी सेटिंग्स / settings गड़बड़ा जाती हैं। पैराग्राफ की पहली लाइन के इंडेंट (पेज के लिखित भाग के बाएँ किनारे से उस विशेष लाईन के प्रारम्भ की दूरी) को पैराग्राफ की सेटिंग से निर्धारित करना चाहिए। उसके लिए इंडेंटेशन / indentation ऑप्शन में जा कर स्पेशल / special के अंतर्गत फर्स्ट  लाइन / first line को सेलेक्ट करना चाहिए, और उसकी इंडेंट स्पेसिंग को 0.5 सेंटीमीटर पर एडजस्ट / adjust कर देना चाहिए। इससे प्रत्येक पैराग्राफ की पहली लाइन 0.5 सेंटीमीटर अन्दर से ही शुरू होगी। वास्तविक पुस्तक के शुरू होने से पहले के पुस्तक-परिचय आदि के भाग में फर्स्ट लाइन इंडेंट अच्छा नहीं लगता, इसलिए उस भाग को सेलेक्ट / select करके फर्स्ट लाइन इंडेंट को शून्य कर देना चाहिए। वहां पर एक पैराग्राफ को दूसरे पैराग्राफ से विभक्त करने के लिए, पैराग्राफज / paragraphs के बीच में अतिरिक्त स्पेस / additional space (लाईनों के बीच में स्पेस से ज्यादा) दे देना चाहिए। इसके लिए पैराग्राफ सेटिंग के इंडेंटस एंड स्पेसिंग / indents and spacing बटन के ऑप्शन स्पेसिंग / spacing के अंतर्गत बिफोर या आफ्टर / before or after को सेलेक्ट करके उसमें यथावश्यक इंडेंट स्पेसिंग भर दी जाती है। कई बार ऐसा करते हुए, पूरे डोकुमेंट / document की पैराग्राफ सेटिंग भी वैसी ही हो जाती है। उसको दूर करने के लिए बार-२ अनडू / undo बटन को दबाते हुए उस नई सेटिंग को सेलेक्ट किए गए, पुस्तक के प्रारम्भिक भाग तक ही सीमित कर देना चाहिए। एमएस वर्ड का फाईन्ड एंड रिप्लेस / find and replace फंक्शन / function भी बहुत लाजवाब होता है। पूरे बुक-डोक्युमेंट / book-document में बारम्बार हुई किसी भी शब्द / लेख की गलती एक बार में ही वहां से दूर हो जाती है। यहाँ तक कि कॉमा, पूर्णविराम-डंडे के पहले या बाद के स्पेस को भी वहां से ठीक किया जा सकता है। पैराग्राफ के अतिरिक्त ब्रेक को भी इससे एकसाथ ठीक किया जा सकता है। एंटर दबाने से एक पैराग्राफ ब्रेक बनता है। इसको हटाने के लिए फाइंड में ^p^p टाईप करें, व रिप्लेस में ^p टाईप करें। गूगल हिंदी इनपुट / google hindi input में हिंदी के पूर्णविराम-डंडे का चिन्ह नहीं होता, इसलिए अंग्रेजी के डॉट से काम चलाना पड़ता है। हम फाईन्ड एंड रिप्लेस फंक्शन में फाईन्ड / find के स्थान पर डॉट / dot व रिप्लेस / replace के स्थान पर पूर्णविराम-डंडे / full stop bar  को टाईप करके ‘रिप्लेस आल’ / replace all के बटन को क्लिक करते हैं, तो पूरी पुस्तक-फाईल की हजारों रिप्लेसमेंटे / replacements पलक झपकते ही हो जाती हैं। एमएस वर्ड में अंग्रेजी भाषा के लिए तो इनबिल्ट / inbuilt ‘स्पेलिंग एंड ग्रामर’ / spelling and grammer बना होता है, जिसकी मदद से करेक्शन / correction की जा सकती है, पर हिंदी के लिए ऐसा सोफ्टवेयर / software अभी बना नहीं है। हिंदी टाईपिंग के लिए सबसे अच्छा तरीका है कि बिना मोनिटर स्क्रीन / monitor screen को देखे ही, कीबोर्ड को देखते हुए टाईप करते रहें। कुछ पैराग्राफ टाईप हो जाने पर, उन्हें पढ़ते हुए एकसाथ करेक्शन / correction कर लो। इससे टाईपिंग की स्पीड / speed भी बढ़ जाती है। Ctrl और A कुंजी दोनों को एक साथ दबाकर पूरा दस्तावेज़ चुना जाता है। पाठ / लेख / टेक्स्ट की प्रतिलिपि बनाने के लिए Ctrl और C कुंजी दबाए जाते हैं, और कॉपी किए गए टेक्स्ट को चिपकाने के लिए V कुंजी के साथ Ctrl कुंजी को दबाया जाता है। टाइप किए गए पदार्थ को हटाने के लिए ‘पूर्ववत करें / अनडू / undo’ बटन दबाएं। लेख को बेहतर या बड़े आकार में देखने के लिए शीर्ष मेनू पट्टी से फ़ॉन्ट आकार को न बदलें, क्योंकि ऐसा करने से हर बार फ़ाइल सेटिंग बदलती रहेगी, जो कुछ झंझट पैदा करेगी। बेस बार से ज़ूम करके केवल सिंगल बैठक के लिए ही फ़ॉन्ट आकार बढ़ेगा, फॉण्ट सेटिंग में बदलाव नहीं होगा। हर बार जब आप उस फ़ाइल का उपयोग करते हैं, तो भ्रम से बचने के लिए मामले के अनुसार ईबुक या प्रिंट बुक को सेटिंग्स / settings / फोर्मेटिंग / formatting के साथ बैकअप में स्टोर करके रखें, ताकि आपको बार-२ सेटिंग्स को एप्लाई न करना पड़े। कई बार तो पुरानी सेटिंग्स याद भी नहीं रहती, जिन्हें ढूँढने में काफी समय लग जाता है। किसी दूसरे से टाईपिंग कराने की बजाय खुद टाईप करना अच्छा रहता है। औरों को हस्तलेख पढ़ने में कठिनाई हो सकती है, और वे लेख को परिष्कृत भी नहीं कर सकते। खुद टाईपिंग करते हुए, पुस्तक की कमियां भी ध्यान में आती रहती हैं, पुस्तक को विस्तार मिलता रहता है, नए-2 विचार उमड़ते हैं, और पुस्तक पर अच्छी पकड़ बनती है। टाईपिंग भी एक होबी / hobby की तरह ही है। उसे करते हुए मजा आता है, तनाव हल्का हो जाता है, और मन भी शांत हो जाता है। इसी तरह का लाभ दूसरों से अपनी बुक को पब्लिश / publish करवाने की बजाय सेल्फ-पब्लिशिंग / self publishing के माध्यम से खुद पब्लिश करने से मिलता है।

यदि आपको इस पोस्ट से कुछ लाभ प्रतीत हुआ, तो कृपया इसके अनुसार तैयार की गई उपरोक्त अनुपम ई-पुस्तक (हिंदी भाषा में, 5 स्टार प्राप्त, सर्वश्रेष्ठ व सर्वपठनीय उत्कृष्ट / अत्युत्तम / अनौखीरूप में समीक्षित / रिव्यूड ) को यहाँ क्लिक करके डाऊनलोड करें। यदि मुद्रित पुस्तक ही आपके अनुकूल है, तो भी, क्योंकि इलेक्ट्रोनिक डीवाईसिस / फोन आदि पर पुस्तक का निरीक्षण करने के उपरांत ही उसका मुद्रित-रूप / print version मंगवाना चाहिए, जो इस पुस्तक के लिए इस लिंक पर उपलब्ध है। इस पुस्तक की संक्षिप्त रूप में सम्पूर्ण जानकारी आपको इसी पोस्ट की होस्टिंग वेबसाईट / hosting website पर ही मिल जाएगी। धन्यवाद।

यदि आपने इस लेख/पोस्ट को पसंद किया तो कृपया इस वार्तालाप/ब्लॉग को अनुसृत/फॉलो करें, व साथ में अपना विद्युतसंवाद पता/ई-मेल एड्रेस भी दर्ज करें, ताकि इस ब्लॉग के सभी नए लेख एकदम से सीधे आपतक पहुंच सकें। धन्यवादम।

ई-रीडर व ई-बुक्स के बारे में विस्तार से जानने के लिए यहां क्लिक करें।

Typing art- a wonderful hobby

 

People think that special training is needed to learn typing. For professional typing, this may be true to some extent, but for personal typing, according to one’s suitability, one can type with any style. Many people just type just with two fingers (one of each hand) faster than others. Many of these are even professional typists. While typing in English, the first letter of the sentence does not need to be written in the capital, as later it can be done together by selecting the text. For that, there is a change case button (Aa) in MS Word’s top menu bar. By clicking on its Option “Sentence Case”, the first letter of all the sentences of the selected text of the document gets itself capitalized. While typing, to give the indent-space to the first line of paragraph, do not press the tab key on the keyboard, because space made by this key is not accepted in ebook. Enter key should only be pressed to start new paragraphs, otherwise not. Adopted by several people, it is the wrong habit of pressing Enter at the end of each line. From this, MS Word takes each line as a new paragraph, so that many settings related to the paragraph are messed up. Indent of the first line of the paragraph (the distance of the beginning of that special first line from the left edge of the written part of the page) should be determined by the paragraph setting. For this, going to the indentation option, the ‘first line’ should be selected under ‘special’, and its indented spacing should be adjusted at 0.5 centimeters. From this, the first line of each paragraph will start from 0.5 centimeters inside. The first line indent does not look good in the part of book-introduction etc. before the start of the actual book, so that the first line indent should be zero by selecting that part. Therefore to divide one paragraph from the second paragraph of that initial part, there should be an extra space (more than the space between the adjacent lines) between adjacent paragraphs. For this, ‘indents and spacing’ of the paragraph setting is selected and then the option ‘spacing’ under that and ‘before’ or ‘after’ under that, and then the indent spacing is filled in as required. In many cases, while doing this the paragraph setting of the entire document becomes the same. To remove it, pressing the ‘undo’ icon again and again as per manipulative need limit that new setting to the initial part of the book as was selected. ‘Find and replace’ function  of MS Word is also very great. The mistake of any word / article recurrent in the entire book-document goes away at a time. Even the extra or less space before or after comma, full stop etc. can also be cured from there.  Extra paragraph made with pressing extra enter key can also be corrected with this. Type ^p^p  in the find section and ^p in replace section. Google Hindi input does not have a full-stop punctuation of Hindi, hence the dot in English has to be run. In the Find and Replace Function, we click the ‘Replace All’ button by typing the full stop bar of Hindi in place of the replace and dot in place of find button, so thousands of replacements of the file are in the blink of an eye. In MS Word, there is inbuilt ‘spelling and grammar’ for the English language, which can make corrections. This software for Hindi is not created anymore. The best way to type in Hindi is by not watching the monitor screen, just keep typing while watching the keyboard. After some paragraphs are typed, make a correction with them while reading them altogether. This also increases the speed of typing.  Whole document is selected by pressing Ctrl and A keys both together. Ctrl and C keys are pressed together for copying the text, and Ctrl key with V key is pressed for pasting the copied text. To remove typed matter press ‘undo’ button. Don’t change font size from top menu bar for better viewing and typing for that will change file setting every time, but zoom from base bar for that will increase font size for single sitting only. Keep documents in backup along with settings / formatting for eBook or print book as per the case to avoid confusion every time you use that file. It’s a good idea to type yourself instead of making typing by someone else. Others may have difficulty reading handwriting, and they cannot refine the article. While typing yourself, the drawbacks of the book also come in mind, the book gets expanded, the new ideas get energized, and the book gets a good grip. Typing is also like a hobby. It is fun to do it, the tension gets relaxed, and the mind also becomes calm. Instead of publishing the book with others, these above psychic benefit are received in a pronounced form from publishing the book by one / writer through his own / self-publishing.

In the next post we will share the self experienced matters during a website development.

If you have found some benefit from this post, please download here the above mentioned e-book (in Hindi language, 5 star rated, reviewed as the best, excellent and must read by everyone) made with steps as told above. If only print version suits you, then too print version should only be got after testing that’s e- version on the electronic devices / phone etc., that is available on this link for this book. You can also find the complete information about this book, both in English as well as Hindi languages on the hosting website of this post. Thank you.

If you liked this post then please follow this blog providing your e-mail address, so that all new posts of this blog could reach to you immediately via your e-mail.

Know in full detail about e-readers and e-books here.