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कुण्डलिनी व मूर्तिपूजा के बीच में परस्पर सम्बन्ध

कुण्डलिनी को क्रियाशील व जागृत करने के लिए कुण्डलिनी के साथ बहुत लम्बे समय तक सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध बनाना पड़ता है। अधिकांशतः ऐसा एक ही जीवनकाल में संभव नहीं हो पाता। इसलिए आवश्यक है कि कुण्डलिनी के स्मरण वाला संस्कार एक आदमी को उसके जन्म से ही मिल जाए। यहाँ तक कि जब वह माता के गर्भ में हो, तभी से मिलना शुरू हो जाए। इसको संभव बनाने के लिए ही इष्टदेव को कल्पित किया गया है। वह कल्पित रूप सदा से सभी के लिए एक जैसा होता है। इससे उस इष्टदेव को मानने वाले परिवार में उस इष्टदेव के स्मरण से सम्बंधित संस्कार वंश परम्परा के साथ पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ता रहता है। इसीलिए शैव सम्प्रदाय के लोगों के लिए शिव के रूप का ध्यान करना आसान हो जाता है। उसी ध्यान-शक्ति से एक शैव के मन में बसने वाला शिव उसकी कुण्डलिनी बन जाता है, जो अंततः कुण्डलिनी-जागरण के रूप में जीवंत भी हो सकता है। यदि दूरदर्शी ऋषियों के द्वारा शिव को निश्चित रूप न दिया गया होता, तो शिव का ध्यान उत्तरोत्तर न बढ़कर बार-२ टूटता रहता।

मान लो, किसी आदमी नि शिव को जटाधारी माना होता, और उसके पुत्र ने शिव को जटाहीन माना होता, तो क्या होता? वैसे में पिता के द्वारा अर्जित ध्यान पुत्र को प्राप्त न होता। वह अपना ध्यान स्वयं ही शुरू से इकट्ठा करता, जिससे उसे बहुत थोड़ा ही लाभ मिलता। उसे जो लाभ मिलता, वह यह होता कि उससे उसके जीवन में अल्प मात्रा में ही अद्वैत व अनासक्ति-भाव उत्पन्न होते। उससे प्रचंड अनासक्ति व अद्वैत के साथ कुण्डलिनी-जागरण न मिलता।

देवताओं में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण देव शंकर हैं। इसीलिए उन्हें देवों के देव महादेव कहा जाता है। उन्हें एक निश्चित रूप प्रदान किया गया है। उनके गले में सर्प की माला है। उनके सिर पर लम्बी-२ जटाएं हैं। उनके मस्तक पर आधा चन्द्रमा विराजमान है। उनकी जटाओं से गंगा नदी निकल रही है। उनके माथे पर तीन समानांतर रेखाओं के रूप में तिलक है, जिसे त्रिपुंड कहा जाता है। कई जगह उनके भ्रूमध्य में खुला हुआ तीसरा नेत्र भी दिखाया जाता है। वे भस्म से लिपटे हुए हैं। उनके एक हाथ में त्रिशूल है, और एक हाथ में डमरू है। वे बैल की सवारी करते हैं। वे बाघ का चर्म ही ओढ़ते हैं, अन्य कोई वस्त्र नहीं पहनते हैं। वे सुन्दर हैं। उनके नयन-नक्श संतुलित व त्रुटिरहित हैं। उनका मुख कान्तिमान व आकर्षक है। उनका शरीर सुडोल व संतुलित है। वे मध्यम गोरे रंग के हैं। उनकी चाल-ढाल अद्वैत, अनासक्ति, व वैराग्य से भरी हुई है।

इसी तरह अन्य देवी-देवताओं को भी निश्चित रूप व आकार प्रदान किए गए हैं। साथ में, उन्हें निश्चित भाव-भंगिमाएं व आचार-विचार भी प्रदान किए गए हैं। गणेश को मूषक की सवारी करने वाला, लड्डू खाने वाला, व हाथी के जैसे मुख वाला बताया गया है। इसी तरह, नौ देवियों को भी भिन्न-२ परिचय दिए गए हैं।

इसी सिद्धांत के अनुसार अपने पूर्वज या पारिवारिक वृद्ध (पितामह आदि) को गुरु बनाना अधिक लाभप्रद है। क्योंकि एक व्यक्ति उनके साथ जन्म से लेकर परिचित व सौहार्दपूर्ण बना होता है, इसलिए उन्हें मन में बैठाना सर्वाधिक सरल होता है। वही मानसिक मूर्ति फिर लगातार के अभ्यास से कुण्डलिनी बन कर क्रियाशील व जागृत हो सकती है।

देव-मूर्ति पुराने मित्रों, परिचितों व पूर्वजों से भी जुड़ी होती है। जब कोई उन चिर परिचितों की समकालीन देव-मूर्ति से पुनः संपर्क साधता है, तब उन चिर-परिचितों की याद पुनः ताजा हो जाती है। उनमें से सर्वाधिक प्रभावशाली स्मरण बार-२ के अभ्यास से स्थायी स्मरण (कुण्डलिनी) के रूप में मन में उभर सकता है। विज्ञान की भाषा में इसे कंडीशंड रिफ्लेक्स (conditioned reflex) कहते हैं। इसके अनुसार जब दो वस्तुएं मन में एकसाथ बैठ गई हों, तो दोनों वस्तुएं आपस में जुड़ जाती हैं। जब कभी एक वस्तु का स्मरण किया जाता है, तो उससे जुड़ी हुई दूसरी वस्तु का स्मरण स्वयं ही हो जाता है। यह उस जैविक घटना की तरह है, जब एक गाय अपने बछड़े को देखकर अपना दूध छोड़ने लगती है। इस प्रकार से देव-मूर्तियाँ सामाजिक कंडिशनर (social conditioner) या सामाजिक संपर्कसूत्र (social link) का काम करती हैं। अपने प्रिय व परिचित जनों की याद बनाए रखने में ये अहम् भूमिका निभाती हैं। यही बात अन्य सभी निर्धारित किए गए धार्मिक विधि-विधानों के सम्बन्ध में भी लागू होती है। यद्यपि देव-मूर्तियाँ इनमें मुख्य हैं, क्योंकि वे मानवाकार, सुन्दर, सहज सुलभ, सर्वसुलभ, व आकर्षक होती हैं।

अगर किसी को मूर्ति पूजा से प्रत्यक्ष लाभ नहीं दिखता है, तो भी इसकी मदद से ध्यान और गहरी भावना की एक अच्छी आदत पड़ जाती है। यह मानवता के समग्र विकास में मदद करता है। यह सब प्रेमयोगी वज्र के साथ हुआ, तभी तो वह क्षणिक आत्मज्ञान व क्षणिक कुण्डलिनी जागरण को अनुभव कर पाया। दरअसल, वैदिक काल में देवताओं को उनके शुद्ध प्राकृतिक रूप में पूजा जाता था। बाद में, इनमें से कई देवताओं को मानव समाज में चल रहे सामाजिक सुधारों के साथ मानव रूप दिया गया, जो ज्ञान-विज्ञान सम्मत भी है।

प्राकृतिक चीजें अद्वैतशाली व अनासक्त होती हैं, तभी तो प्रकृति के बीच में आनंददायक शान्ति का अनुभव होता है। वास्तव में, देव-मूर्तियाँ घर के सीमित स्थान के लिए निर्मित किए गए, विराट प्रकृति के सूक्ष्म रूप ही हैं। शास्त्रों के वचनों से व वैज्ञानिक दर्शन “शरीरविज्ञान दर्शन” से भी यह प्रमाणित ही है कि जो कुछ भी इस बाह्य व विराट प्रकृति में है, वह सभी कुछ इस मानव शरीर के अन्दर भी वैसा ही है।

अब बात आती है, धर्म-परिवर्तन के बारे में। उपरोक्त तथ्यों के आधार पर तो अपने धर्म का त्याग कभी नहीं करना चाहिए। क्योंकि धर्म परिवर्तन करने से अपने कुलधर्म से जुड़ी हुई चिर-परिचित लोगों व वस्तुओं की यादें गायब हो जाती हैं, और कुण्डलिनी-विकास का अच्छा अवसर हाथ से छूट जाता है। शास्त्रों में भी आता है, श्रेयो स्वधर्मो विगुणोपि, परधर्मो भयावहः। अर्थात, अपना धर्म कम गुणों वाला होने पर भी कल्याणकारी है, दूसरों का धर्म तो भयावह है। इसका यह अर्थ नहीं है कि कट्टर धार्मिक होना चाहिए, या दूसरे धर्मों को नहीं मानना चाहिए। बल्कि इसका अर्थ है कि सभी मानवीय धर्मों को मानते हुए, अपने धर्म को ही मुख्य बना कर रखना चाहिए। यह ध्यान में रहना चाहिए कि यह बात योग पर लागू नहीं होती, क्योंकि योग कोई विशेष धर्म नहीं है। योग तो एक आध्यात्मिक मनोविज्ञान है, जो सभी धर्मों का एक अभिन्न अंग है।

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Please click on this link to view this post in English (Interrelation between Kundalini and idol worship)

Relation between Kundalini and meditation on Breath

The breath is very important in Kundalini-meditation. With the mind of the Kundalini, breathing starts improving, so the body’s metabolism improves. Similarly, by focusing mind on deep and regular breathing (with the body moving with it), the Kundalini appears on the chakras of the body (especially on the Anahata and Manipur chakras), and on the nose tip. Especially it is noticed on the nose tip, when the breath touching the nasal tip is minded. The same thing is written in the Gita (Hindu-scripture) too. There comes a topic called “meditation on nasikagra / nose tip or starting point of nose.” Many scholars consider it as a midpoint between the eyebrows, that is the Agya chakra. They call the starting part of the nose as this midpoint, because in their view the nose starts from there. Actually, the nose tip is nearest to the front lips, from which the nose starts. I can say it with evidence. When I go on a morning walk, and feel the touch at the sensitive part of the beginning of the nose with the cold breeze of the morning, then on my nose tip, on the peak of nose or slightly outside it, my kundalini appears. When I count one number with full breath (both inside and outside breath), likewise counting from one to five (most of the times foot-steps also aligned with the breath), and then breathing five times without count, and repeat such a sequence again and again for long, then the Kundalini becomes even more stable and clear.

Similarly, with the meditation of breath, you can also pronounce “So(silent a)ham” in mind. It also helps to get the godly power of “OM”. When pronouncing “so”, there is in breathing, and while pronouncing “ham”, there is out breathing. Sanskrit word “So / Sah” means “He (God)”. The Sanskrit word “ham / aham” means, I, That is, I am God / Brahma. In yoga, the importance of all types of breaths is there. If breath is shallow, then mind focusing on that at nasikagra / nose tip is easy. If there is deeper breath, then at the Vishuddha Chakra, at the Anahata Chakra with still deeper breath, with deeper than that, it is easy to meditate on those breaths at the Manipura Chakra and with the highest deepness level of breaths, it is easy to focus mind on those at Swadhishthan-Muladhar Chakra. By breathing with the stomach, meditation of breath at the navel chakra appears to be the easiest and most effective.

While bearing the Advaitabhaav / non-dual feel like Dehapurush, Kundalini is exposed up, and with this, breathing (along with metabolism) improves. Puffs become regular and deep. The air of the breath is felt appealing, and the feeling of satisfaction begins. Stress starts to end. The mechanisms of the body are relaxed. The working of the heart improves. The burden of the heart decreases. There is calm in the mind with joy.

Double way can also be adopted. In this, by holding the Advaita (mainly with the help of physiologic philosophy / shareervigyan darshan), the breaths are slightly deepened and regularized. Then paying attention to those breaths, more benefits are obtained. In addition to the non-dual feeling, the breath can be improved even by direct meditation of the Kundalini. Advaita and Kundalini-meditation, both of them can be run together. With the non duality, Kundalini becomes manifested anyway. Additional attention can be given to that exposed Kundalini. After concentrating on the breath for a long time, the Kundalini becomes like a stable and clear image in mind under meditation. The Kundalini then refreshes the whole body, relaxes it, and removes the disease.

While focusing on breath, moving parts of the body with breath itself attract the meditative attention. Almost all major body parts move with breath. In this way, the entire body gets entry into meditation. The whole body is full of Advaitic (non-dual) men. Therefore, the mind itself is filled with non-duality by indirect attention on those dehpurushas. According to “physiology philosophy,” these micro human beings exist in the form of body cells, and body biochemicals. These micro human beings behave just like living beings. Because a being having an Advaita feeling can only be a human being, not another creature. In other organisms, there is even lack of the bhaav / mental possession / feeling, so there is no question of type of feeling. Therefore, the form of a human being appears superimposed over those dehpurushas. Because a yogi has made a man (master or lover) as his own Kundalini, so the yogi is most habitual of that man’s form. From this, the form of that special man that is attributed to his Kundalini, that is superimposed over Deh-Purusha of that meditating yogi. With the practice of yogic pranayama, the breath becomes associated with the kundalini. From this also, the Kundalini manifests itself in the meditation of the breath. In this way, the Kundalini is constantly reinforced with various efforts, so that both of the mind and the body remain healthy. In this way, Kundalini can be awakened in the earliest times. In all these efforts, physiology-philosophy has a very important role to play.

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कुण्डलिनी व साँसों पर ध्यान के बीच में संबंध

कुण्डलिनी-ध्यान में साँसों का बहुत महत्त्व है। कुण्डलिनी के ध्यान से साँसें भी खुलकर चलने लगती हैं, व शरीर का मैटाबोलिजम भी सुधर जाता है। इसी तरह, गहरी व नियमित साँसों पर (उससे गति कर रहे शरीर के साथ) ध्यान देने से शरीर के चक्रों पर (विशेषकर अनाहत व मणिपुर चक्र पर), व नासिकाग्र पर कुण्डलिनी प्रकट हो जाती है। नासिकाग्र पर विशेषतः तब प्रकट होती है, जब नासिकाग्र का स्पर्श करती हुई साँसों की हवा का ध्यान किया जाता है। यही बात गीता में भी लिखी है। उसमें “नासिकाग्र पर ध्यान” नामक एक विषय आता है। कई विद्वान इसे भौहों के बीच का आज्ञाचक्र मानते हैं, अर्थात वे नासिका के शुरू के भाग को आज्ञाचक्र बताते हैं, क्योंकि उनकी दृष्टि में नाक वहां से शुरू होती है। पर वास्तव में नासिका का अग्र होठों के साथ लगा होता है, जहां से नाक शुरू होती है। मैं इसे प्रमाण के साथ कह सकता हूँ। मैं जब सुबह की सैर पर जाता हूँ, और नाक के शुरू के संवेदनशील भाग का स्पर्श सुबह की ठंडी हवा के साथ अनुभव करता हूँ, तो मेरे नासिकाग्र पर, नाक की शिखा (टिप) पर या उसके थोड़ा बाहर मेरी कुण्डलिनी प्रकट हो जाती है। जब मैं उस सांस के ध्यान के साथ पांच बार पूरी सांस (अन्दर व बाहर दोनों तरफ की) को एक से पांच तक की गिनती के साथ गिनता हूँ (अधिकाँश तौर पर कदमों को भी साँसों के साथ मिलाकर), तथा पांच बार सांस बिना गिनती के लेता हूँ, और इस तरह के क्रम को बार-२ दोहराता हूँ, तब कुण्डलिनी और भी अधिक स्थिर व स्पष्ट हो जाती है।

इसी प्रकार, साँसों के ध्यान के साथ “सोSहम” का भी मन में उच्चारण कर सकते हैं। इससे ॐ की शक्ति भी प्राप्त हो जाती है। संस्कृत शब्द “सो” का उच्चारण सांस भरते समय, व “हम” का उच्चारण सांस छोड़ते समय करें। “सो / सः” का अर्थ है, “वह (ईश्वर)”। संस्कृत शब्द “हम / अहम्” का अर्थ है, मैं। अर्थात मैं ही वह ईश्वर / ब्रम्ह हूँ। योग में हर प्रकार की साँसों का महत्त्व है। यदि साँसें उथली हो, तो नासिकाग पर उनका ध्यान आसान होता है। कुछ अधिक गहरी होने पर विशुद्धि चक्र पर, उससे अधिक गहरी होने पर अनाहत चक्र पर, उससे भी अधिक गहरी होने पर मणिपुर चक्र पर व सर्वाधिक गहरी होने पर स्वाधिष्ठान-मूलाधार चक्र पर उन साँसों का ध्यान करना आसान होता है। पेट से सांस लेते हुए, नाभि चक्र पर साँसों का ध्यान करना सर्वाधिक आसान व प्रभावशाली प्रतीत होता है।

देहपुरुष की तरह अद्वैतभाव को धारण करने से कुण्डलिनी भी उजागर हो जाती है, तथा साँसें (मैटाबोलिजम के साथ) सुधर जाती हैं। साँसें नियमित व गहरी हो जाती हैं। साँसों की हवा मीठी लगने लगती है, व उससे संतुष्टि महसूस होने लगती है। तनाव समाप्त होने लगता है। शरीर की कार्यप्रणालियाँ तनावमुक्त हो जाती हैं। हृदय की गति सुधर जाती है। हृदय का बोझ कम हो जाता है। मन में एक शान्ति सी छा जाती है, आनंद के साथ।

दोहरा तरीका भी अपनाया जा सकता है। इसमें अद्वैतभाव (मुख्यतः शरीरविज्ञान दर्शन की सहायता से) को धारण करके साँसों को किंचित गहरा व नियमित किया जाता है। फिर उन साँसों पर ध्यान देते हुए, और अधिक लाभ प्राप्त किया जाता है। अद्वैतभाव के अतिरिक्त कुण्डलिनी के सीधे ध्यान से भी साँसों को सुधारा जा सकता है। अद्वैतभाव व कुण्डलिनी-ध्यान, दोनों की एक साथ सहायता भी ली जा सकती है। अद्वैतभाव से तो कुण्डलिनी वैसे भी प्रकट हो ही जाती है। उस उजागर हुई कुण्डलिनी पर अतिरिक्त ध्यान भी दिया जा सकता है। फिर लम्बे समय तक साँसों पर ध्यान देने से कुण्डलिनी, ध्यान के अंतर्गत स्थिर व स्पष्ट जैसी हो जाती है। वह कुण्डलिनी फिर पूरे शरीर को तरोताजा, तनावमुक्त, व रोगमुक्त कर देती है।

साँसों पर ध्यान देते हुए, सांस से गति करते हुए शरीर के भागों पर स्वयं ही ध्यान चला जाता है। शरीर के लगभग सभी मुख्य भाग सांस के साथ गति करते हैं। इस तरह से पूरा शरीर ही ध्यान में आ जाता है। पूरा शरीर अद्वैतपूर्ण पुरुषों से भरा हुआ है। अतः उनके अप्रत्यक्ष ध्यान से मन स्वयं ही अद्वैतभाव से भर जाता है। “शरीरविज्ञान दर्शन” के अनुसार ये देहपुरुष शरीर की कोशिकाओं, व शरीर के जैव-रसायनों के रूप में विद्यमान हैं। ये देहपुरुष प्राणियों की तरह ही समस्त व्यवहार करते हैं। क्योंकि अद्वैतभाव रखने वाला कोई प्राणी एक मनुष्य ही हो सकता है, अन्य जीव नहीं। अन्य जीवों में तो भावों की भी न्यूनता होती है, द्वैत-अद्वैत का तो प्रश्न ही नहीं उठता। इसलिए देहपुरुष के ऊपर एक मनुष्य का रूप आरोपित होने लगता है। क्योंकि एक योगी ने एक मनुष्य (गुरु या प्रेमी) को अपनी कुण्डलिनी बनाया हुआ होता है, इसलिए वह उसी मनुष्य के रूप का सर्वाधिक अभ्यस्त होता है। इससे उस विशेष मनुष्य का रूप अर्थात उस ध्यान करने वाले योगी की कुण्डलिनी देहपुरुष के ऊपर आरोपित हो जाती है। योग-प्राणायाम के अभ्यास से भी साँसें कुण्डलिनी के साथ जुड़ जाती हैं। इससे भी साँसों के ध्यान से कुण्डलिनी स्वयं ही प्रकट हो जाती है। इस तरह से, विभिन्न प्रयासों से कुण्डलिनी लगातार पुष्ट होती रहती है, जिससे मन व शरीर, दोनों हृष्ट-पुष्ट बने रहते हैं। कालान्तर में कुण्डलिनी जागृत भी हो सकती है। इन सभी प्रयासों में शरीरविज्ञान दर्शन की एक अहम भूमिका होती है।

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कुण्डलिनी व प्रेम सम्बन्ध के बीच में आपसी रिश्ता- mutual relationship between Kundalini and love affair

कुण्डलिनी व प्रेम सम्बन्ध के बीच में आपसी रिश्ता (please browse down or click here to view this post in English)

कुण्डलिनी एक जीवनी शक्ति है। समाज में यादों के सहारे जीने की जो बात चलती है, वह कुण्डलिनी के सहारे जीने की ही बात है। इसी तरह, प्रेमसंबंध भी कुण्डलिनी को पैदा करता है, जिससे विभिन्न कुण्डलिनी-लक्षण पैदा होते हैं। कुण्डलिनी प्राणों (साँसों सहित) को बल प्रदान करती है। कुण्डलिनी मानसिक विचार का ही पर्याय है। इस प्रकार से सभी मानसिक विचार प्राणों को पुष्ट करते हैं।

किसी व्यक्ति विशेष का लगातार यादों में, अर्थात मन में बने रहना ही कुण्डलिनी-क्रियाशीलता है। उससे उस व्यक्ति विशेष के रूप से बनी मानसिक छवि को ही कुण्डलिनी कहते हैं, तथा उस मानसिक छवि से एकाकार होने को ही कुण्डलिनी जागरण कहते हैं।

जब कोई व्यक्ति कहता है कि वह अपने प्रेमी के बिना जी नहीं सकता, तब वह उसके रूप से बनी अपनी मानसिक कुण्डलिनी के बिना न जी सकने की ही बात करता है। वास्तव में वह अपने प्रेमी के भौतिक रूप के बिना भी जी सकता है, यदि प्रेमी की छवि उसके मन में बस गई हो। तभी तो बहुत से प्रेमी जोड़े एक-दूसरे से अलग रहकर, एक-दूसरे की यादों के सहारे ही पूरा जीवन सुखपूर्वक बिता लेते हैं। उनके मन में बसी एक-दूसरे की वही छवि तो कुण्डलिनी है। वह उनके पूरे अस्तित्व को चलायमान रखती है। प्रेमी उसे नहीं छोड़ सकता। यदि वह जबरदस्ती उसे हटाने का प्रयत्न करता है, तो वह अँधेरे में जैसे डूबने लगता है, क्योंकि उसका सभी कुछ उस कुण्डलिनी के साथ जुड़ गया होता है। इसलिए वह मजबूरी में उसे बना कर रखता है। जब समय के साथ वह छवि मिटने लगती है, तब कोई नई छवि उसका स्थान लेने लगती है। इसी से पता चलता है कि कुण्डलिनी एक जीवनी शक्ति है। यौनसंबंध से उस मानसिक छवि को शक्ति मिलती है। ऐसा ही ओशो महाराज भी कहते हैं। तभी तो जगत में यौनसंबंध को सबसे बड़ा सुख माना जाता है। यदि वह सम्बन्ध तांत्रिक विधि से हो, तब तो और भी अधिक शक्ति मिलती है, जिससे वह जागृत भी हो सकती है।

अतः उपरोक्त बातों से स्वयंसिद्ध है कि अंतर्लैंगिक प्रेमसंबंध में भी कुण्डलिनी लक्षण उत्पन्न होते हैं। प्रेमी के रूप से निर्मित मानसिक कुण्डलिनी लगातार मन में बसी रहती है। उससे व्यक्ति यौनसंबंध बनाने के लिए या विवाह सम्बन्ध बनाने के लिए प्रोत्साहित होता है, ताकि वह कुण्डलिनी शांत हो सके। यद्यपि वह कुण्डलिनी लाभदायक होती है, पर व्यक्ति उसके अस्थायी दुष्प्रभावों से विचलित हो जाता है। वे दुष्प्रभाव निम्नलिखित प्रकार के हैं। वह उसकी शारीरिक व मानसिक शक्ति का कम या ज्यादा रूप में भक्षण करती रहती है। उससे उसका मन दुनियादारी में कम लगता है। वह एकांत को पसंद करने लगता है। वह लोगों को बुझा-बुझा सा दिखता है। अन्य वे सभी लक्षण उत्पन्न होते हैं, जो कुण्डलिनी के लिए सामान्य हैं, जैसे कि शरीर में, मुख्यतः हाथों में कम्पन, सिरदर्द के साथ सिर में भारीपन, भावुकता, उत्तेजना आदि। तभी तो कई प्रेमी अपने प्रेम के असफल होने पर घातक कदम भी उठा लेते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि कुण्डलिनी उनका पीछा ही नहीं छोड़ेगी, और उन्हें बिलकुल नकारा कर देगी। परन्तु वास्तविकता यह है कि वह कुण्डलिनी उनके सारे पाप धोकर उन्हें आत्मज्ञान तक पहुंचा देती है। प्रेमयोगी वज्र के साथ भी यही हुआ था, जो उसकी पुस्तक “शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)” में विस्तार से वर्णित है। फिर बाद में उसके गुरु के रूप की कुण्डलिनी उसके मन में जागृत हो गई थी, जिसने उसकी प्रेमिका की कुण्डलिनी का स्थान ले लिया था। इस तरह से, लगभग 20 सालों के बाद उसका पीछा उसकी प्रेमिका के रूप की कुण्डलिनी से छूट पाया था।

विडम्बना है कि प्रेम के सफल होने पर भी व्यक्ति को संतुष्टि नहीं मिलती। विवाह के बाद प्रेमी का आकर्षण समाप्त हो जाता है, जिससे उसके रूप की कुण्डलिनी भी गायब हो जाती है। वह जीवनी शक्ति के लिए तरसने लगता है। फिर वह पछताता है कि क्योंकर उसने प्रेमी की यादों (कुण्डलिनी) से घबरा कर प्रेम को परवान नहीं चढ़ने दिया। वह सोचता है कि प्रेमी के भौतिक रूप से अच्छी तो उसके रूप से निर्मित मानसिक कुण्डलिनी ही थी। यद्यपि फिर भी कुछ नहीं बिगड़ा होता है, यदि वह मौके की नजाकत को समझे। क्योंकि वैसी पछतावे वाली स्थिति में वह संदर्भित तंत्र / अप्रत्यक्ष तंत्र का सहारा ले सकता है, जिसमें वह अपने जीवनसाथी-प्रेमी की सहायता से गुरु, देवता , इष्ट आदि के रूप की कुण्डलिनी को जागृत कर सकता है। इस तरह के समस्त तथ्य उपरोक्त पुस्तक में सविस्तार वर्णित हैं।

वैसे तो मन के सभी विचार जीवनी शक्ति देते हैं। एक बहिर्मुखी आदमी में ये विचार निरंतर जारी रहते हैं, इसलिए उसकी जीवनी शक्ति निरंतर बनी रहती है। जब उसका शरीर किसी कारणवश क्षीण हो जाता है, तब उसकी बहिर्मुखता भी क्षीण हो जाती है। इससे वह निर्विचार सा होकर जीवनी शक्ति के लिए तरस जाता है। फिर वह अकेली मानसिक छवि को योग से पुष्ट करने लगता है, ताकि वह जीवनी शक्ति प्राप्त करता रह सके। बुद्धिमान व्यक्ति बहिर्मुखता के साथ योग या प्रेम से या दोनों से कुण्डलिनी को भी पुष्ट करता रहता है, ताकि वह संकट के समय काम आवे। भाग्यहीन व्यक्ति न तो बदलते विचारों का पूरा लाभ उठाता है, और न ही कुण्डलिनी-रूपी अकेले यौगिक विचार का। इसलिए जीवनी शक्ति के अभाव के कारण उसका जीवन संकट में पड़ा रहता है।

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Mutual relationship between Kundalini and love affair

Kundalini is a Life force. What is the matter of living in the society with the help of memories; it is only a matter of living with the help of Kundalini. Likewise, love affair also produces Kundalini, which causes various Kundalini-symptoms. Kundalini gives strength to pranas / subtle breath-power (including breaths). Kundalini is a synonym for mental thought. In this way, all mental thoughts affirm life.

A continuous memory of a particular person, that is to remain in the mind, is the Kundalini-activation. From that, the mental image created from the physical form of a particular person is called Kundalini, and Kundalini awakening is to be united with that mental image.

When a person says that he cannot live without his lover, then he talks about not living without the Kundalini. In fact, he can live without the physical nature of his lover, if the image of the lover has settled in his mind. Only then, many lover couples spend their whole life happily, living apart from each other, with the help of each other’s memories. The same image in the mind of lover is Kundalini. She keeps his whole existence moving. He cannot leave her. If he forcefully tries to remove her, then he starts drowning in the darkness, because his everything has gone attached with that image. That is why he maintains her in compulsion. When the image begins to dissolve over time, then a new image begins to take its place. This shows that Kundalini is a life force. Sexual mood gives strength to that mental image. Similar are also the words of Osho Maharaja. Only then, sexual relations are considered the greatest happiness in the world. If that relation is with the Tantric method, then kundalini gets even more power, so that she can also be awakened.

Therefore, there is axiom by the above things that kundalini symptoms arise in romantic love affair also. The mental kundalini built from the physical form of a lover constantly resides in the mind. The person is encouraged to make sexual relation or to create a marriage relationship, so that the Kundalini can calm down. Although the Kundalini is beneficial, the person gets distracted by its temporary side effects. These are the following types of side effects. She uses less or more of his physical and mental powers. His mind wants to be less in the world. He seems to like seclusion. It looks to people as if he has gone extinguished. Other all those symptoms are common, which are normal for the Kundalini, such as subtle tremors in the body, mainly vibrations in the hands, heaviness in the head with headache, emotionalism, excitement etc. Only then do many lovers take fatal steps when their love fails, because they think that Kundalini will not leave them normal, and will make them rejected altogether. However, the reality is that the Kundalini, by washing all their sins, leads them to enlightenment. This was the case with Premyogi Vajra, which is described in detail in his book (in Hindi) “shareervigyan darshan- ek adhunik kundalini tantra (ek yogi ki premkatha); Physiology philosophy – A Modern Kundalini tantra (The Love Story of a Yogi)”, and “love story of a yogi- what Patanjali says”. Both of these are also available on “shop” page of this website. Later, his Kundalini made of his Guru’s form had awakened in his mind, who had replaced his girlfriend’s Kundalini. In this way, after twenty years of pursuing it, he was exempted from the kundalini made of his girlfriend’s form.

Ironically, even after the success of love, the person does not get satisfaction. After marriage, the attraction of the lover ends, so that the Kundalini of her form also disappears. He seems longing for the force of life. Then he regrets why he did not allow love to go to peak out of fear of lover’s memories (the Kundalini). He thinks that the lover’s physical form is worse than the mental kundalini built from her that physical form. Although nothing is non repairable then too, if he understands the potential of the spot. Because in such a situation, he can resort to the contextual Tantra / indirect Tantra in which he can awaken the Kundalini of the form of Guru, God, favorite etc. with the help of loving life partner. All such facts are described in detail in the above book.

By the way, all thoughts of the mind give the force to life. These thoughts continue in an extroverted man, so his life force continues to be sustained. When his body gets impaired for some reason, then his extrovert nature also becomes impaired. This leads to a bit of gross thoughtlessness and yearns for life. Then he starts to consolidate the single mental image with the yoga, so that he can get the life force. The wise person keeps on strengthening the Kundalini along with his extrovert nature with help of yoga / meditation or love or both, so that she will work in times of crisis. An ill fated one does not take full advantage of changing thoughts, nor of the yogic thought alone, that is named as kundalini. Therefore, due to the absence of life force, his life remains in crisis.

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कुण्डलिनी का यिन-याँग से संबंध- kundalini associated with Yin-Yang

कुण्डलिनी का यिन-याँग से संबंध (please browse down or click here to view this post in English)

कुण्डलिनी के लिए यिन-यांग आकर्षण बहुत आवश्यक है। चुम्बक के विपरीत ध्रुव एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं। घनात्मक विद्युत् आवेश ऋणात्मक विद्युत् आवेश को आकर्षित करता है, तथा ऋणात्मक घनात्मक को। प्रकाश अन्धकार को आकर्षित करता है, और अन्धकार प्रकाश को। भाव व अभाव एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं। इसी तरह, स्त्री व पुरुष एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं। विपरीत भावों के बीच में परस्पर आकर्षण को यिन-यांग आकर्षण कहते हैं, और यह कुण्डलिनी के विकास में अहम् भूमिका निभाता है।

प्रेमयोगी वज्र अपने बचपन में एक गंभीर, निर्बल सा, रोगग्रस्त सा, गहरे रंग वाला, लम्बे शरीर वाला, आलसी सा, व छोटी नाक वाला बालक था। वह एक एक ऐसे बालक के प्रति आकर्षित हो गया था, जो चंचल, चुस्त, बलवान, नीरोग, हलके रंग वाला, लम्बी-तीखी नाक वाला, व छोटे शरीर वाला था। वह बालक उसका दूर-पार का रिश्तेदार भी था, व मित्र भी था। वह उम्र में कुछ बड़ा था। दोनों एक ही परिवार में निवास करते थे। यह यिन-यांग आकर्षण का एक अच्छा उदाहरण था। सभी गुण उन दोनों में एक-दूसरे के विपरीत प्रतीत होते थे, फिर भी दोनों के बीच में प्यार था। प्यार के साथ हल्का-फुल्का झगड़ा, या हलकी-फुल्की नोंक-झोंक तो चलती ही रहती है। पर वे दोनों क्षणिक कटुता को भूलकर एकदम से सामान्य हो जाया करते थे। कई बार तो लम्बे समय के लिए भी मनमुटाव हो जाता था, यद्यपि अनासक्ति व अद्वैत के साथ। यह अनासक्ति व अद्वैत परिवार के आध्यात्मिक माहौल के कारण था। इस तरह से, प्रेमयोगी वज्र के मन में उस बालक की छवि एक मजबूत कुण्डलिनी के रूप में प्रतिष्ठित हो गई थी।

कुछ बड़े होने पर दोनों का वियोग हो गया। प्रेमयोगी वज्र को शून्यता का पहला चरण महसूस हुआ। वास्तव में उसके मन के सभी भाव उस कुण्डलिनी के साथ जुड़ गए थे, और कुण्डलिनी के क्षीण होने से वे भी क्षीण जैसे हो रहे थे। उसी दौरान उसे एक अन्य समाज के साथ रहने का मौका मिला। उस समाज में एक देवीरानी ऐसी थी, जो प्रेमयोगी वज्र को उस बालक के जैसी लगी। अतः बालक के रूप वाली मानसिक कुण्डलिनी के साथ लगने वाली उसकी समाधि देवीरानी के रूप को स्थानांतरित होने लगी। देवीरानी-निर्मित कुण्डलिनी बालक-निर्मित कुण्डलिनी का स्थान लेने लगी। यह समाधि-स्थानान्तरण पतंजलि योगसूत्र के भाष्य (संभवतः शंकराचार्य-कृत) में भी उल्लिखित है। वह समाधि पहले वाली समाधि से भी मजबूत थी, क्योंकि उसमें स्त्री-पुरुष आकर्षण भी पहले से विद्यमान यिन-यांग आकर्षण के साथ जुड़ गया था। इसलिए वह समाधि दो सालों में ही शिखर-स्तर तक पहुँच गई।

फिर दोनों प्रकार के समाजों का वियोग हो गया। इससे प्रेमयोगी वज्र को शून्यता का दूसरा चरण महसूस हुआ। वह पहले वाले चरण से भी बहुत मजबूत था। उन्हीं वृद्ध आध्यात्मिक पुरुष (वैबसाईट में वर्णित) के सान्निध्य से उसे उसी चरण के दौरान क्षणिक आत्मज्ञान हो गया।

कहने का तात्पर्य है कि स्त्री-पुरुष आकर्षण ही यिन-यांग आकर्षण का शीर्ष स्तर है। समाज में अन्य स्तरों के यिन-यांग आकर्षण पर तो कुछ जोर दिया भी जाता है, परन्तु स्त्री-पुरुष आकर्षण की उपेक्षा की जाती है। अगर स्त्री-पुरुष आकर्षण एक-दूसरे के रूप की कुण्डलिनी को पुष्ट न भी कर सके, तो भी यह किसी तीसरे व्यक्तित्व (गुरु, देव या अन्य प्रेमी) के रूप की कुण्डलिनी को शक्ति देता है, और उसे जागृत भी कर सकता है। यही वाक्य तंत्रयोग का सार है। यहाँ तक कि अन्य स्तरों के यिन-यांग आकर्षण भी इसी प्रकार का अप्रत्यक्ष रूप का कुंडलिनी-वर्धक प्रभाव पैदा कर सकते हैं, मस्तिष्क के आध्यात्मिक केन्द्रों को क्रियाशील करके। दरअसल, यिन-यांग घटना द्वैत पैदा करती है। यह जल्द ही अद्वैत के द्वारा प्रतिस्थापित किया जाता है, खासकर के आध्यात्मिक (नॉनडुअल) वातावरण में। अद्वैत के साथ कुंडलिनी विकास होता है, क्योंकि दोनों एक साथ रहते हैं।

अधिकाँश समाजों में, विभिन्न सामजिक पहलुओं का हवाला देते हुए साधारण प्रकार के यिन-यांग आकर्षण को भी हतोत्साहित किया जाता है। उन पहलुओं में मुख्य है रूढ़ीवाद। रूढ़ीवाद में जातिवाद, नस्लवाद, अर्थवाद, व्यवसायवाद, लिंगवाद आदि विभिन्न भेदभावकारी वाद आते हैं। भेदभाव तो वैसे यिन-यांग आकर्षण के लिए आवश्यक हैं, परन्तु यह प्रेमभाव पर हावी नहीं होना चाहिए। भेदभाव व प्रेमभाव, दोनों भाव एकसाथ होने चाहिए। यही तो द्वैताद्वैत है। यिन-यांग आकर्षण द्वैत का प्रतीक है, और प्रेम अद्वैत का। द्वैताद्वैत ही सत्य है। खाली अद्वैत तो अधूरा है। यदि प्रेमभाव ही नहीं होगा, तो भेदभाव से उत्पन्न यिन-यांग आकर्षण का लाभ कैसे मिल पाएगा?

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kundalini associated with Yin-Yang

Yin-Yang attraction is very important for Kundalini. The contrasting poles of a magnet attract each other. Positive electrical charge attracts the negative electrical charge, and the negative attracts the positive one. The light attracts the darkness, and the darkness attracts the light. Presence and absence attract each other. Similarly, men and women attract each other. Yin-yang attraction is called attraction between opposite expressions, and it plays an important role in the development of Kundalini.

Premyogi vajra was a child with a serious / sober, weak, diseased, dark colored, tall, lazy, and small blunt nosed body / personality in his childhood. He was attracted to a child who was playful, agile, strong, healthy, light-colored, having long-pointed nose, and having a comparatively short body. That child was his distant relative and friend too. He was little elder in age. Both used to live in the same family. This was a good example of Yin-yang charm. All the qualities were in contrast to each other in both of them, yet there was love between the two. Light fight with love, or fluttering, keeps on going everywhere. However, they both used to forget the momentary bitterness and become completely normal. Many times, even for a long time there was a disturbed relation, though with unattached and non-dual attitude. This was due to the spiritual environment of the family. In this way, the image of that child in the heart of Premyogi vajra became distinguished as a strong kundalini.

When they grew up somewhat, they were separated. Premyogi vajra felt the first phase of emptiness. Indeed, all the expressions of his mind were attached to that Kundalini, and due to the weakness of the Kundalini, they were also becoming weak. At the same time, he got an opportunity to live with another society. There was such a goddess-queen in that society, which seemed like that naughty child to Premyogi vajra. Therefore, the Samadhi, which began with the mental Kundalini in the form of that child began to be transferred to the form of devirani / goddess-queen. Devirani-built Kundalini started to replace child-made Kundalini. This Samadhi-transfer is also mentioned in Patanjali Yoga Sutra’s commentary (possibly that by Shankaracharya). That later Samadhi was stronger than the earlier Samadhi, because the male and female attraction in that was also associated with the already existing Yin-yang attraction. That is why Samadhi reached peak level in two years.

Then the two types of societies were separated. From this, Premyogi vajra felt the second phase of emptiness. That was much stronger than the first one. With the proximity of that same spiritual old man (as mentioned in website), he got momentary enlightenment during that second phase.

To say, it means that feminine attraction is the top level of Yin-yang charm. There is some emphasis on the Yin-Yang attraction of other levels in society, but gender attraction is neglected. Even if the male and female attraction cannot strengthen the Kundalini of each other, even then it gives strength to the Kundalini of the form of a third person (Guru, God or other lover) and can also awaken that. This sentence is the essence of the tantra. Even other levels of yin-yang attraction can also produce this indirect kundalini potentiating effect through activating the brain centres (mainly spirituality related). Actually, yin-yang phenomenon produces duality. This is soon replaced by non-duality, especially in a right kind of spiritual (nondual) environment. Non duality brings kundalini growth along with for non duality and kundalini live together.

In most societies, yin-yang attraction of ordinary type is also discouraged while citing various social aspects. In those aspects, the main is stereotype. In stereotype, different rituals arise like castism, racism, economism, businessism, genderism etc. Discrimination is essential for yin-yang attraction, but it should be dominated by love. Discrimination and love, both expressions should be together. This is Dwaitadwaita / duality plus non-duality. Yin-yang attraction is a symbol of duality, and love is symbol of non-duality / Advaita. Dwaitadwait is the only truth. Empty Advaita is incomplete. If there is no love, how can you get the benefits of Yin-Yang attraction generated from discrimination?

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वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास, भाग-8; Website creation, management and development, part-8

वेबसाईट का निर्माण, प्रबंधन व विकास, भाग-8 (please browse down or click here to view this post in English)

मुफ्त के वैबसाईट प्लान में वैबसाईट का मोबाईल के आकार-प्रकार के अनुरूप आकार-प्रकार भी नहीं होता, जिससे ट्रेफिक काफी घट जाती है। कई लोग कहते हैं कि डुप्लीकेट कंटेंट की पेनल्टी से बचने के लिए पोस्ट में केनोनिकल टेग लगाने चाहिए। सच्चाई यह है कि गूगल स्वयं ही वेबपेज / वेब आर्टिकल का सर्वाधिक उपयुक्त रूप सर्च रेंकिंग के लिए चुन लेता है। हाँ, यदि गूगल को डुप्लीकेट कंटेंट का मकसद सर्च रेंकिंग को बढ़ाना लगे, तब वह उस पर पेनल्टी भी लगा सकता है। फिर भी जहाँ तक हो सके, सुरक्षा के लिहाज से डुप्लीकेट कंटेंट से बचना ही चाहिए। गूगल का बोट पोस्ट को डालने के अनुमानित समय पर बार-२ आता रहता है, व नई पोस्ट की खुराक से संतुष्ट होकर ट्रेफिक को बढ़ाता रहता है। इसलिए यदि निर्धारित अंतराल पर पोस्ट न डाली जाए, तो वह भूखा रह जाता है, जिससे वह लम्बे समय तक वापिस नहीं भी आ सकता। इसलिए अच्छा रहता है, यदि निर्धारित समय व अंतराल पर पोस्ट को डालना जारी रखा जाए। सप्ताह में एक दिन व वीकएंड पर जैसे कि शनिवार की शाम को 6 बजे से 9 बजे के बीच में सर्वोपयुक्त समय है, क्योंकि उस समय दुनिया के सभी टाईम जोन के लोग जागते हुए होते हैं, और रिलेक्सड मोड में भी होते हैं। फ्री प्लान में मोबाईल फोन पर वेबसाईट को एडिट भी नहीं किया जा सकता है। वेबसाईट पर पर्सनल पेज भी बनाए जा सकते हैं, जिन्हें कोई और नहीं देख सकता। उस पर अपनी सभी निजी जानकारी डाली जा सकती है।

इसी तरह “नोफोलो” कोड भी नहीं लगाना चाहिए किसी पोस्ट के साथ, क्योंकि इससे लिंक जूस किसी को नहीं मिलता, और नष्ट हो जाता है। यदि लिंक जूस लिंकड वेबसाईट को जाने से रुक भी जाए, तो भी फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि दूसरे ब्लोगर भी इस कोड को लगाएंगे, जिससे उनके ब्लॉग का लिंक जूस हमें नहीं मिल पाएगा। संक्षेप में, ट्रेफिक बढ़ाने के शोर्ट टर्म उपायों से बचना चाहिए। इनमें से अधिकांश उपाय तो अवैध ही होते हैं, जिनके कारण गूगल पेनल्टी लगा सकता है। अगर वैबपोस्ट या वेबपेज के लिए नया कंटेंट लिखने की सामर्थ्य न हो, तो अपने पुराने कंटेंट के शब्दों व वाक्यों में थोड़ा परिवर्तन करके, संभवतः उसको दुबारा भी लिख सकते हैं।  यद्यपि ऐसा दूसरों के कंटेंट को चुरा कर नहीं करना चाहिए।  कई ऐसे जाने-माने इंटरनेट-पुरुष भी हैं, जो दूसरों के कंटेंट से छेड़छाड़ करके ही मशहूर हुए हैं।

यदि बढ़ी हुई ट्रेफिक को निरंतर प्राप्त करना चाहें, तो सप्ताह में दो बार नई पोस्ट डालें।परन्तु इससे यह नुकसान होता है कि पाठकों को नई पोस्ट पढ़ने के लिए अधिक समय नहीं मिलता। ट्रेफिक को निर्बाध रूप से बढ़ा हुआ रखने के लिए भी सप्ताह में दो बार पोस्ट लिखी जा सकती है, परन्तु इससे बार-2 नोटिफिकेशन को प्राप्त करने वाले ई-मेल फोलोवर परेशान हो सकते हैं। यह भी हो सकता है कि वे मानसिक बोझ के कारण पोस्ट को पढ़े ही न।

वैबसाईट को ट्रांसफर भी किया जा सकता है। वेबसाईट को किसी दूसरे आदमी के नाम भी बनाया जा सकता है। कई लोग स्वयं वेबसाईट के मालिकाना हक़ से दूर रहना चाहते हैं, विशेषकर जिन पर पैसों का लेन-देन होता है। सार्वजनिक क्षेत्र के कामगारों को ऐसी वेबसाईट से समस्या आती है, विशेषकर आयकर दाखिले के समय। अन्य कानूनी बाध्यताएं भी होती हैं। ऐसे में वे पत्नी के नाम से वेबसाईट बनाते हैं, और स्वयं उसके एडमिन बन जाते हैं। मालिक (यहाँ पर पत्नि) तो वैसे भी एडमिन होता ही है। कई लोग अपनी वेबसाईट के प्रसिद्ध होने पर उसे पत्नि आदि के नाम ट्रांसफर कर देते हैं। उसके लिए पत्नि का वर्डप्रेस अकाऊंट (वर्डप्रेस प्लेटफोर्म के लिए) बनाना पड़ता है। पत्नि आदि का अंतर्राष्ट्रीय डेबिट कार्ड भी बनाना पड़ता है, जिससे वेबसाईट को रिचार्ज या अपग्रेड किया जा सके। साधारण वेबसाईट को तो सरकारी कर्मचारी भी चला सकते हैं, जिसमें पैसों का लेन-देन न हो, राजनीतिक बयानबाजी न हो, और सरकार की नापसंदगी के लेख न लिखे गए हों। विचारों की अभिव्यक्ति का अधिकार तो सबको है, यद्यपि एक सरकारी कर्मचारी के लिए कुछ शर्तों के साथ। उन विचारों से उसका सरकारी कार्य दुष्प्रभावित नहीं होना चाहिए। यदि लाभान्वित होए, तब तो बहुत अच्छा है।

वर्डप्रेस के टॉप बार के रीडर बटन को क्लिक करके ड्रापडाऊन मीनू खुलता है। उसमें पहला बटन “फोलोड साईट्स” का होता है। उस पर सभी फोलोड साईट्स की पोस्टस दिखती हैं, क्रमवार, सबसे नयी वाली सबसे पहले। उससे निचला बटन “कन्वर्जेशन” का होता है। उस पर जिस किसी भी पोस्ट के कमेन्ट को लाईक किया गया हो, उस पोस्ट के सभी कमेन्ट दिखाई देते हैं, क्रमवार, लाईक्ड कमेन्ट वाली सबसे नयी पोस्ट के कमेन्ट सबसे पहले। उससे निचला बटन “डिस्कवर” का होता है। उस पर वर्डप्रेस-पाठकों द्वारा चुनी गई बेहतरीन पोस्टस दिखाई जाती हैं। उससे निचला बटन “सर्च” का होता है। उस पर बहुत सी रिकमंड की गई पोस्टस होती हैं। सबसे ज्यादा रेकमंड की गई पोस्टस सबसे पहले होती हैं। उसमें एक सर्च बार भी होती है, जिस पर हम पोस्टस को सर्च कर सकते हैं। उससे निचला बटन “माय लाईक्स” का होता है। उस पर वे सभी पोस्टस होती हैं, जिन्हें लाईक किया गया होता है, क्रमवार, सबसे नयी लाईक की गई पोस्ट सबसे पहले। सबसे नीचे “टेगस” बटन होता है। इस पर हम अपने मनचाहे टेग को एड कर सकते हैं, ताकि हर बार उस टेग पर क्लिक करने से उस टेग वाली पोस्टस खुलती रहें। उदाहरण के लिए, यदि किसी को “कुण्डलिनी” से सम्बंधित विषय पसंद हैं, तो वह “कुण्डलिनी” शब्द को एड कर सकता है।

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Website creation, management and development, part-8

In a free website plan, the website does not have any size-type according to the size-type of mobile, which reduces traffic significantly. Many people say that in order to avoid the penalty of duplicate content, it is necessary to put a canonical tag in the post. The truth is that Google automatically chooses the best form of webpage / web article for search rankings. Yes, if Google finds it as a tactic to increase search rankings, then it can also penalize it. However, as far as possible, for security purpose, duplicate content must be avoided. Google’s bot keeps coming at the estimated time of posting, and satisfied with the new post dose, keeps increasing traffic. So if the post is not put at the fixed interval, then he is hungry, so that he may not return for a long time. It is therefore good, if continuing to post is kept at set time and interval. Weekly posting, on the day of weekend, such as on Saturday, and at time between 6 pm and 9 pm is the best, because at that time all the people of the world are awake and also in the Relaxed mode. The website cannot be edited on the mobile phone in the free plan. Personal pages can also be made on the website, which nobody else can see. All your personal information can be inserted on it.

Similarly, the “nofollow” code should not be included in any post as it does not make available link juice to anyone, and is destroyed. Even if the link juice is being blocked from going to the Linked website, there is no benefit as other bloggers will also apply this code, so that the link juice of their blog is not available to us. In short, short-term measures should be avoided to increase traffic. Most of these measures are illegal, due to which Google can penalize. If one does not have the ability to write new content for his webpost or webpage, then by changing slightly the words and sentences of their old content, they can possibly write it again. Although it should not be stolen from others’ content. There are many well-known internet-men, who have become famous only by tinkering with others’ content.

If you want to get increased traffic continuously, then add new posts twice a week. But this can be a loss for readers do not get much time to read new posts. Posting a post twice a week can also be practiced to keep the traffic uninterrupted, but the e-mail followers who receive frequent notifications may be upset. It may also be that they did not read the post because of the mental burden.

The website can also be transferred. The website can also be named with another man. Many people want to stay away from the ownership of the website themselves, especially on which money transactions happen. Public sector workers face problems from such websites, especially during the time of income tax return. There are also other legal obligations. In such a way, they make websites in the name of their wives, and become their administrators. The owner (the wife on here) is also the admin itself. Many people transfer their website to others’ account when they are famous. For that, the WordPress account (for wordpress platform) has to be created for the new website owner. The international debit card of the wife etc. has to be created so that the website can be recharged or upgraded. The general informative website can also be run by government employees, in which there is no money transaction, no political rhetoric, and the articles of government’s dislikes have not been written. The right to express thoughts is for everyone, even though with some conditions for a government employee. With his ideas, his official work should not be affected. If beneficial to his official work, then it is very good.

Clicking the Reader button in top bar of WordPress opens the dropdown menu. The first button is “Followed Sites”. Posts are displayed from all the followed sites on it, serial wise, the newest first of all. The lower button is of “Conversation”. It shows the comments of all the posts on the comment of which the website owner has put the “like” himself, or a comment has been made by himself, in an orderly fashion, the newest post with liked comment appearing first of all. Still lower button is that of “Discover”. The best posts are selected by WordPress-readers on it. The lower button is that of “Search”. There are so many recommended posts on it. The most recommended posts are the first. There is also a search bar on which we can search the post. The lower button is that of “My Likes”. There are all the posts on it, which have been liked, respectively, the most recently posted posts being first in line. The bottom is the “Tags” button. On this, we can add tags to our liking, so that every time we click on that tag, the posts with that tag continue to open. For example, if someone likes topics related to “Kundalini”, then he can add the word “Kundalini” in the tag.

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कुण्डलिनी का पुरातन जीवनशैली से सम्बन्ध- relationship between Kundalini and antiquity

यह पोस्ट देवी माता व उनके नवरात्रि त्यौहार को समर्पित है।

कुण्डलिनी का पुरातन जीवनशैली से सम्बन्ध (please browse down or click here to view this post in English)

कुण्डलिनी-विषय को पुरातन-पंथी कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। “कुण्डलिनी” शब्द भी संस्कृत भाषा का है। संस्कृत भाषा को पुरातन पंथी वैसे भी कहा जाता है। मन में निरंतर बस रही सबसे प्यारी छवि को ही कुण्डलिनी कहा जाता है। वह छवि देवता की भी हो सकती है, किसी प्रेमी / प्रेमिका की भी हो सकती है, गुरु की भी हो सकती है, और यहाँ तक कि शत्रु की भी हो सकती है। बिना प्रेम किए ही शत्रु की छवि मन में बस जाती है। कंस के मन में कृष्ण की छवि बस गई थी। इसी तरह, शिशुपाल के मन में भी भगवान् श्रीकृष्ण की छवि बस गई थी। यह अपवाद-स्वरूप है। इसी तरह, तांत्रिक आकर्षण से निर्मित मानसिक छवि बिना प्रेम के या कम प्रेम के साथ भी मन में बस सकती है। अधिकाँश मामलों में परम प्रेमी लोगों की छवि ही मन में बसी होती है। फिर भी, छवि को मन में बसाने वाले मूल साधन के रूप में तांत्रिक आकर्षण (यिन-याँग आकर्षण) ही प्रतीत होता है। ओशो महाराज भी ऐसा ही कहते हैं। कृष्ण के प्रेम में दीवानी मीरा के मन में कृष्ण की छवि बस गई थी। इसी तरह, गोपियों के मन में भी कृष्ण की छवि बस गई थी। रांझा के मन में हीर की छवि बस गई थी, और हीर के मन में रांझा की छवि बस गई थी। लैला के मन में मजनू की, व मजनू के मन में लैला की छवि बस गई थी। इसी तरह से रोमियो के मन में जूलियट की छवि बस गई थी, व जूलियट के मन में रोमियो की छवि बस गई थी। यदि पहाड़ों के प्रेम-प्रसंगों को लें, तो रान्झू के मन में फूलमाँ की, व फूलमाँ के मन में रान्झू की छवि बस गई थी। दुर्योधन के मन में उसके मित्र कर्ण की छवि बस गई थी, व कर्ण के मन में दुर्योधन की। योगी श्री रामकृष्ण परमहंस के मन में माता काली की छवि बस गई थी। इसी तरह, स्वामी विवेकानंद के मन में उनके अपने गुरु व योगी श्री रामकृष्ण परमहंस के रूप वाली कुण्डलिनी-छवि बस गई थी। भक्त हनुमान के मन में भगवान राम के रूप की कुण्डलिनी बस गई थी

तो क्या प्रेम का नाम ही कुण्डलिनी है? हाँ, प्रेम ही कुण्डलिनी है। कुण्डलिनी कोई विशेष नाड़ी, विशेष हड्डी या कोई अन्य भौतिक वस्तु नहीं है। हाँ, विभिन्न भौतिक वस्तुओं से कुण्डलिनी को पुष्ट करने में, व उसे जागृत करने में सहायता अवश्य मिलती है। मन में निर्बाध रूप से बनी हुई प्रेमी की छवि ही कुण्डलिनी है। जब कभी भी कोई आदमी उस छवि में कुछ क्षणों के लिए इतना अधिक खो जाता है कि उसे अपने पृथक अस्तित्व का बोध ही नहीं रहता, और वह कुण्डलिनी के साथ एकाकार हो जाता है, तब उसे ही कुण्डलिनीजागरण या पूर्ण समाधि कहते हैं। तो फिर हठयोगी की कुण्डलिनी कैसे विकसित होती है? हठयोगी तो किसी से प्रेम नहीं करता।

हठयोगी योग के निरंतर अभ्यास से अपने मन में कुण्डलिनी को पुष्ट करता है। जो काम प्रेम के कारण स्वयं होता है, वही काम वह योग के बल से करता है। तभी तो वह अपने मन में वैसी कुण्डलिनी छवि को भी जागृत कर सकता है, जिसके प्रति आमतौर पर प्रेम नहीं पनपता। उदाहरण के लिए, वह सूर्य की छवि को, वायु-स्पर्श की अनुभूति की छवि को, ध्वनि की छवि आदि-2 किसी भी प्रकार की छवि को अपने मन में जागृत कर सकता है। यद्यपि उसके लिए प्रेमी मनुष्य की छवि को जागृत करने के लिए लगाए जाने वाले योगबल की तुलना में कहीं अधिक योगबल लगाने की आवश्यकता होती है। वैसा प्रचंड योगबल केवल पहुंचे हुए योगी ही उत्पन्न कर सकते हैं, जो बहुत विरले होते हैं। सबसे सुगम तरीका यह होता है कि पहले अनन्य प्रेमी की छवि को प्रेम-व्यवहार से मन में पुष्ट किया जाए, फिर अतिरिक्त योगबल की सहायता से उसे जागृत किया जाए। प्रेमी मनुष्य की  कुण्डलिनी-छवि सर्वाधिक मानवतापूर्ण भी है, क्योंकि उससे मानवमात्र के प्रति आदरबुद्धि व प्रेम अत्यधिक रूप से बढ़ जाते हैं।

अब पुरातन व आधुनिक पक्ष की बात करते हैं। किसी व्यक्ति के साथ लम्बे समय तक परस्पर सद्भाव, सद्व्यवहार, सहयोग, मेल-मिलाप, निःस्वार्थ भाव व तारतम्य को बनाए रखकर ही उसके प्रति प्रेम उपजता है। ऐसा करने को पुरातन पंथ कहा जाता है, और ऐसा करने वाले को पुरातनपंथी। अवसरवाद को आधुनिकता कहा जाता है। अवसरवाद से प्रगाढ़ प्रेम-सम्बन्ध को बनने का अवसर ही नहीं मिल पाता है, साथ में उससे बना-बनाया प्रेम-सम्बन्ध भी नष्ट हो जाता है। जब तक दूसरा व्यक्ति अपने लिए हितकारक लगेगा, तभी तक उससे प्रेमसम्बन्ध बना रहेगा। जैसे ही वह अहितकारक लगने लगेगा, वैसे ही बना-बनाया प्रेमसम्बन्ध टूट जाएगा। इसे ही अवसरवाद कहते हैं। अपने मन में किसी व्यक्ति की छवि को स्थिर कुण्डलिनी का रूप प्रदान करने के लिए, अपने हित-अहित को दरकिनार करते हुए उससे लम्बे समय तक प्रेमसम्बन्ध बना कर रखना पड़ता है। इसे पुराना फैशन कहा जाता है। तभी तो मैंने कुण्डलिनी को पुरातन-पंथी कहा है।

आत्मज्ञान व अद्वैतभाव भी पुरातन-पंथी ही हैं। आत्मज्ञान कुण्डलिनी से ही उपलब्ध होता है। आत्मज्ञान के बाद भी कुण्डलिनी मन में निरंतर बसी रहती है। इसी तरह, पिछली पोस्टों में सिद्ध किया गया है कि अद्वैत व कुण्डलिनी एक-दूसरे को बढ़ाते रहते हैं। इसी तरह, सभी धार्मिक क्रियाकलाप भी पुराने तौर-तरीके के रूप में जाने जाते हैं, क्योंकि सभी का एकमात्र उद्देश्य कुण्डलिनी ही है।

अतः सिद्ध होता है कि जीवन की पुरानी शैली कुण्डलिनी-सम्मुखता के रूप में है, जबकि तथाकथित आधुनिक शैली कुण्डलिनी-विमुखता के रूप में है। पुराने और नए तौर-तरीकों के बीच में कोई भी भौतिक विभिन्नता नहीं है। केवल दृष्टिकोण, विचारधारा, व जीवन-व्यवहार का ही अन्तर है। इस तरह से हम देख सकते हैं कि जीवन के नए तौर-तरीके से आध्यात्मिक उन्नति बहुत दुर्लभ है। आजकल सर्वाधिक व्यावहारिक तरीका यह है कि आधुनिक व पुराने तौर-तरीकों को मिश्रित रूप में अपनाया जाए। यही तंत्रात्मक जीवन-पद्धति प्रेमयोगी वज्र द्वारा रचित “शरीरविज्ञान दर्शन” का मुख्य आधार है।

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This post is dedicated to the Goddess Mother and her Navaratri festival.

relationship between Kundalini and antiquity

It will not be an exaggeration to mention the subject of Kundalini as an archaeologist. The word “Kundalini” is also of Sanskrit language. Sanskrit language is also called an archaeologist. The most beloved image that is constantly sitting in mind is called Kundalini. That image can also be of God, can also be of a boyfriend / girlfriend, it can be of a master (guru), and even an enemy can be. Without love, the image of the enemy settles in the mind. Krishna’s image was settled in his enemy Kans’s mind. Similarly, in the mind of Shishupala, Lord Krishna’s image was settled. This is an exception. Similarly, a mental image created by a tantric love affair can sit in the mind without love or with less love. In most cases, the image of the ultimate lover is in the mind. Even so, the tantric attraction (yin-yang attraction) appears to be the basic means of settling the image in the mind. Osho maharaj says the same thing. In Krishna’s love, the divine image of Krishna was settled in the mind of Mira. Similarly, the image of Krishna in the Gopis’ mind was settled. The image of Heer was settled in Ranjha’s mind, and the image of Ranjha was settled in Heer’s mind. In the mind of Laila, the image of Majnu was settled, and in Majnu’s mind, the image of Layla was settled. Similarly, the image of Juliet was settled in Romeo’s mind, and the image of Romeo in Juliet’s mind was settled. If you take the love affairs in the mountains, then in the mind of the Ranju, the image of Phoolman was settled and vice versa. In Duryodhana’s mind, the image of his friend Karna was settled, and in Karna’s mind, the image of Duryodhana was settled. The image of Mata Kali was settled in the mind of yogi Shri Ramkrishna Paramahansa. Similarly, in the mind of Swami Vivekananda, the Kundalini-image of Shri Ramkrishna Paramahansa, his own master and yogi, settled. In the mind of the devotee Hanuman, the Kundalini of Lord Rama was settled.

Therefore, Kundalini is the name of love. Yes, love is Kundalini. Kundalini is not a special pulse, special bone or any other physical object. Yes, it is possible to reinforce the Kundalini with various physical objects, and those help in its awakening too. The uninterrupted image of the lover in one’s mind is the Kundalini. Whenever a person is lost so much for a few moments in that image that he does not realize his separate existence, and he becomes united with the Kundalini, then he is called having Kundalini awakening or full Samadhi. Then how does the Kundalini of Hath yogi grow? Hath yogi does not love anyone.

Hath yogi reinforces the Kundalini in his mind with continuous practice of yoga. The work that is done by love itself is done by the power of yoga. Only then can he awaken that type of kundalini image in his mind, which usually does not grow in love. For example, he can awaken the image of the sun, the image of the sensation of the air-touch, the image of the sound etc., any type of image in its mind. Although it requires the addition of more yogic power than the yogic power needed to awaken the image of a loving human. Such a huge yogic power can be produced only by the yogis of far reaching, which are very rare. The easiest way is to first confirm the image of the unique lover in love with love-full interactions, and then awaken it with the help of the additional Yoga. The Kundalini-image made of a humanely lover is also the most humanitarian, because it greatly increases the respect and love towards humankind.

Now talk about the old and the modern side of living. Long-term mutual goodness, goodwill, cooperation, reconciliation, selflessness, brotherhood, and coordination are accompanied by a person’s love for a loving being. To do so, it is called an ancient cult, and the doer who is doing this is a fundamentalist. Opportunism is called modernism. Opportunism does not get the opportunity to create a strong love relationship, together with it destroys the already created love-relationships. As long as the other person will feel good for himself, that long he will remain in love. As soon as he starts to feel harm from him, the love-made love relationship will be broken. This is called opportunism itself. In order to give the image of a person the form of a stable Kundalini in your mind, bypassing your interests, it has to be kept affectionate for a long time. This is called old fashion. That is why I have called the Kundalini as the antiquity.

Enlightenment and advaita (non-duality) are also ancient. Enlightenment is available only from the Kundalini. Even after enlightenment, the Kundalini remains in the mind continuously. Similarly, in previous posts it has been proven that Advaita and Kundalini keep increasing each other. Likewise, all religious activities are also known as old ways, because the only purpose of all is Kundalini.

Therefore, it proves that the old style of life is in the form of a Kundalini-oriented lifestyle, whereas the so-called modern style is in the form of a Kundalini-opposing lifestyle. There is no physical variation between old and new modes. The only difference is there in the form of approach, ideology, and life-style. In this way, we can see that spiritual advancement in the new way of life is very rare. Nowadays, the most practical way is to adopt modern and old ways in mixed form. This tantric method of life is the main basis of “Shareeravigyan darshan” written by Premyogi vajra.

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