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Non duality and Kundalini reinforces each other/अद्वैतभाव व कुंडलिनी एक दूसरे को पुष्ट करते हैं।

Bliss originates from non duality. Kundalini awakening is semifinal bliss. Enlightenment is final/supreme bliss. Therefore, Kundalini awakening and enlightenment, both proves to be the states of semifinal and final non duality respectively. Morning Kundalini yoga strengthens Kundalini. That in turn strengthens non duality. That in turn strengthens bliss. Similar system works after evening Kundalini yoga too, so tiredness fade away immediately. Similarly, Non dual action strengthens kundalini and bliss, both together for all these three live together.

After his glimpse enlightenment, Premyogi vajra had got profound non dual attitude. So Kundalini and bliss also used to accompany that powerfully along with.

आनंद अद्वैत से उत्पन्न होता है। कुंडलिनी जागरण में उच्चतम के निकट का आनंद अनुभव होता है। आत्मज्ञान में उच्चतम आनंद की स्थिति होती है। इससे सिद्ध होता है कि कुंडलिनी जागरण लगभग उच्चतम अद्वैत से संपन्न होता है, और आत्मज्ञान पूर्णतया उच्चतम अद्वैत से सम्पन्न होता है। प्रातः कुण्डलिनी योग कुंडलिनी को पुष्ट करता है। कुंडलिनी फिर अद्वैत को पुष्ट करती है। अंत में अद्वैत आनंद को बढ़ाता है। सांयकाल के कुंडलिनी योग से भी इसी सिद्धांत से थकान दूर होती है। इसी तरह, अद्वैतमयी क्रियाकलाप कुंडलिनी व आनंद, दोनों को पुष्ट करते हैं, क्योंकि ये तीनों गुण साथ-२ रहते हैं।

अपने क्षणिकात्मज्ञान के बाद, उसके प्रभाव से प्रेमयोगी वज्र में असीम अद्वैत उत्पन्न हो गया था। इससे कुंडलिनी व आनंद, दोनों भी प्रचंड रूप से स्वयं ही उसके साथ रहते थे।

अटल जी को श्रद्धा सुमन/ Tribute to Atal ji

अटल जी की याद में कुछ पंक्तियाँ

मैं अटल जी के सम्मान में कुछ पंक्तियाँ लिखना चाहूंगा-

उठ जाग होनहार, प्रकाश हो या अंधकार।

बाँध तरकस पीठ पर, भर तीर में फुंकार।।

झुका दे शीश दोनों का, कर ना पाए फिर कभी भी वार।

उठ जाग होनहार, प्रकाश हो या अंधकार।।

यह कविता कुण्डलिनीयोग से भी स्वतः ही सम्बंधित प्रतीत होती है। यह कविता अज्ञानरूपी निद्रा में डूबे हुए एक आम साधारण मनुष्य से कहती है कि हे बहादुर मनुष्य, नींद से जाग जा और उठ खड़ा हो जा। तू डर मत, चाहे तेज रौशनी का माहौल हो या चाहे घनघोर अन्धकार ही क्यों न हो। इसका मतलब है कि तू प्रकाश व अन्धकार की परवाह न करते हुए दोनों को एक नजर से देख, अर्थात तू अद्वैतपूर्ण बन जा। बाँध तरकस पीठ पर का मतलब है कि तू कुण्डलिनीयोग साधना में जुट जा। उस साधना से जो चित्र-विचित्र विचार-संकल्प उसके मन में उभरेंगे, वे ही उस साधना रुपी तरकस के विभिन्न तीर होंगे। वह कुण्डलिनी साधना बैठकपूर्ण योग से भी की जा सकती है, और कर्मपूर्ण कर्मयोग से भी। फिर कविता कहती है कि भर तीर में फुंकार। इसका अर्थ है कि एक सबसे मजबूत व गुणसंपन्न मानसिक चित्र को तू कुण्डलिनी बना ले, और नित्य निरंतर उसका ध्यान करने लग जा। उससे वह कुण्डलिनी एक विषबुझे तीर की तरह प्रचंड हो जाएगी। “झुका दे शीश दोनों का” का अर्थ है कि उस प्रचंड कुण्डलिनी के आगे प्रकाश व अन्धकार दोनों निष्प्रभावी होने लग जाएंगे। कुण्डलिनी-जागरण से वे पूरी तरह से निष्प्रभावी हो जाएंगे, क्योंकि उस जागृत कुण्डलिनी में प्रकाश व अन्धकार दोनों के सभी उत्कृष्ट गुण विद्यमान होंगे। ऐसा इसलिए होगा क्योंकि वह परम प्रकाशमान कुण्डलिनी साधक को अपनी आत्मा से अभिन्न प्रतीत होगी। पूर्णतः निष्प्रभावी होने पर वे दोनों कभी वार नहीं कर पाएंगे, क्योंकि फिर उन दोनों के किसी भी रूप में साधक के मन में कभी आसक्ति उत्पन्न नहीं होगी।

Tribute in the memory of Atal ji

Rise up brave, whether it is light or dark grave;

Tie arrow-box on the back, fill up hiss to that pack.

Make bow down heads of both, could never then hit when you be in sloth;

Rise up brave, whether it is light or dark grave. 

This poem seems to be related to Kundalini Yoga itself. This poem says to an spiritually ignorant sleepy man means a  common man, “O brave man, wake up from sleep and rise up!” Do not be afraid, whether there is a bright light environment or a dark darkness. This means that if you do not care light and darkness, watch them both at a glance, that is, you become untainted. On the back, tie up arrow box means that you will get involved in cultivation of Kundalinioga. The painting / different ideas / thoughts that arise in his mind from that sadhana / meditation will be different arrows of that technique. The Kundalini cult can also be done through sitting yoga ie. full yoga, and also through action-yoga / karmayoga. Then the poem says that apply poison to the arrow to make that a hissing serpent. This means that you make a most qualified and beautiful mental picture as your Kundalini, and always start meditating / concentrating on it or visualizing it. From that, the Kundalini will be powerful like a poisoned arrow. “make bow down heads” means that both the light and the dark will appear to be neutral in front of that huge and all light full kundalini. With Kundalini-Jagaran / awakening, they will become completely neutral, because in that awakening of the Kundalini, all the excellent qualities of light and darkness will exist. This will be because that ultimate luminous Kundalini  will appear to be the integral to seeker’s soul. If they both are completely neutral, they will never be able to fight, because then in any form of both of them the attachment will never be generated in the mind of that seeker.

 

Identifying Kundalini image- कुण्डलिनी छवि को पहचानना

Nondual Tantra helps to identify and subsequently enrich the mental Kundalini image.

Most of the people even many Yogis do not know how to identify a suitable mental image as a kundalini/life-boat to cross over, inside the vast ocean of their mental formations and subsequently to give initial boost to her in their mind, before the proper sitting meditation.

Actually, everybody has most preferred image inside their mind but that is obscured due to their duality/attachment filled lifestyle. One has to take support of non duality for some time to make that image prominent. Non duality should be adopted along with a fully functional worldly life, not a sedentary one. One would see then that the most preferred mental image would come to the surface and would roam his mind regularly, the image having a strength/expression proportionate to the intensity of the non duality. In this way, one would identify and mark his kundalini image. He would then start the sitting meditation twice a day regularly, in which he would concentrate on that selected kundalini image on his various body Chakras. He would succeed soon then. Kundalini image should be preferably a personified image. It can be a mental image of a Guru/teacher/friend/grandfather/lover/devata. Most preferred mental image is that of a person who is a loving and friendly too. Image of god or passed one is preferred for concentrating on the image of a living being may produce changes in the life of that living being likewise, although it rarely happens for one’s outer appearance is always different than his inner or real appearance. In fact, one should listen to his mind and decide likewise. Many of the Boddhaas are great meditating beings. They select their kundalini image as early as in their childhood and keep on concentrating on her for their lifetime. For practical and real time detail, Love story of a yogi can be followed.

Not selecting a correct kundalini image or not selecting at all appears one of the reason due to which many of the kundalini yogis do no succeed.

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अद्वैत तंत्र से मानसिक कुंडलिनी छवि को पहचानने और फिर उसे समृद्ध करने में मदद मिलती है।

अधिकांश लोग और यहाँ तक कि कई योगी भी नहीं जानते हैं कि एक उपयुक्त मानसिक छवि को कुंडलिनी / जीवनरक्षक नाव के रूप में कैसे परिवर्धित किया जाए, जिससे चित्र-विचित्र मानसिक संरचनाओं के विशाल महासागर को पार किया जाए, और फिर बैठकपूर्ण योगसाधना से पहले उसे किस तरह से प्रारंभिक बढ़ावा दिया जाए।

दरअसल, हर किसी के मन में सबसे पसंदीदा छवि अवश्य होती है लेकिन वह उनकी द्वैतपूर्ण / अनासक्तिपूर्ण जीवनशैली के कारण अस्पष्ट रहती है। उस छवि को प्रमुख रूप से स्पष्ट बनाने के लिए व्यक्ति को कुछ समय के लिए अद्वैत का समर्थन करना पड़ता है। अद्वैत को पूर्णरूप के कार्यात्मक सांसारिक जीवन के साथ अपनाया जाना चाहिए, न कि एक निष्कर्मक / निठल्ले जीवन के साथ, तभी अद्वैत का पूर्ण लाभ मिलता है। ऐसा करने पर हम देखेंगे कि हमारी सबसे पसंदीदा मानसिक छवि सतह पर आ जाएगी और नियमित रूप से हमारे दिमाग में घूमने लगेगी। उस छवि की स्पष्टता / अभिव्यक्ति / तीव्रता हमारे द्वारा अपनाए गए अद्वैत की तीव्रता के समानान्तर / अनुरूप होगी। इस तरह, एक व्यक्ति अपनी कुंडलिनी छवि को पहचान कर उसे चिन्हित कर पाएगा। फिर वह नियमित रूप से दिन में दो बार बैठकमय साधना / सिटिंग मेडिटेशन का अभ्यास शुरू करेगा, जिसमें वह अपने विभिन्न शरीर-चक्रों पर विराजमान उस चयनित कुंडलिनीछवि पर ध्यान केंद्रित करेगा। वह जल्द ही सफल हो जाएगा। कुंडलिनी छवि अधिमानतः एक प्रिय व्यक्तित्व की छवि होनी चाहिए। वह एक गुरु / शिक्षक / दोस्त / दादा / प्रेमी / देवता आदि, किसी की भी मानसिक छवि हो सकती है। सबसे पसंदीदा मानसिक छवि उस व्यक्ति की बनी होती है, जो एक प्रेमपूर्ण तरीके से मित्रवत व्यवहार करता है। ध्यान केंद्रित करने के लिए ईश्वर की छवि या स्वर्गारोहित व्यक्ति / अधिमानतः पूर्वज  की छवि को प्राथमिकता दी जाती है, क्योंकि सैद्धांतिक रूप से जीवित व्यक्ति की छवि पर ध्यान लगाने से उसके जीवन में ध्यानानुसार परिवर्तन उत्पन्न हो सकता है, हालांकि यह शायद ही कभी होता हो, क्योंकि किसी का बाहरी स्वरूप हमेशा ही उसके भीतर के या वास्तविक स्वरूप से अलग होता है। वास्तव में, किसी भी व्यक्ति को अपने दिमाग का सुनना चाहिए, और उसके अनुसार ही शुभ फैसला लेना चाहिए। बोद्धों में से कई लोग महान ध्यानयोगी होते हैं। वे अपने बचपन में ही अपनी कुंडलिनी छवि का चयन कर लेते हैं, और अपने पूरे जीवनभर उसके ऊपर ध्यान केंद्रित करते रहते हैं। इससे सम्बंधित व्यावहारिक और वास्तविक समय के पूर्ण ज्ञान के लिए, इस वेबसाईट पर प्रस्तुत सत्यकथा ” एक योगी की प्रेमकथा” /  Love story of a yogi का अनुपालन किया जा सकता है।

एक सही कुंडलिनी छवि का चयन नहीं करना या बिल्कुल चयन नहीं करना एक मुख्य कारण है, जिससे कुंडलिनी योगी सफल नहीं हो पाते हैं।

Tantralaya in place of Vaishyalaya/वैश्यालय के स्थान पर तंत्रालय

Prostitute centres/vaishyalaya should be socialised and channelized/transformed into the spiritual/kundalini realm with help of tantra, just as the household sexual activities are transformed by it. In this way, number one misconduct would become as a number one kundalini uplifting machine. Honor of woman would also be saved, she being appearing as tantra-godess in this way. With help of the present time health screening and health check ups, tantra yoga would become fully safe unlike that in old times when diseases used to spread to each others during such tantric feasts. There should be appointed well qualified tantric gurus in those community tantra centres. Illegal sexual relationships with accompanied crimes would automatically come down. Many psychological diseases due to restricted sexuality would come down. There would be done nothing additional to the present scenario but the proustite centres already existing would be transformed only.

वेश्यालय केंद्र / वैश्यालय को सामाजिक सहायता और चैनलिंग की मदद से आध्यात्मिक / कुंडलिनी क्षेत्र में परिवर्तित / रूपांतरित किया जाना चाहिए, जैसे कि घरेलू यौन गतिविधियों को इसके द्वारा बदल दिया जा सकता है। इस तरह, नंबर एक दुर्व्यवहार एक कुंडलिनी उत्थान मशीन के रूप में बन जाएगा। महिला का सम्मान भी बचाया जाएगा, वह इस तरह से तंत्र-देवी के रूप में दिखाई देगी। वर्तमान समय में स्वास्थ्य जांच और स्वास्थ्य जांच की सहायता से, तंत्र योग उस पुराने समय की अपेक्षा पूरी तरह से सुरक्षित हो जाएगा, जब यौनसंबंध बीमारियों को एक दूसरे के बीच में फैलाता था। उन समुदाय-तंत्र-केंद्रों में अच्छी तरह से योग्य तांत्रिक गुरु नियुक्त किया जाना चाहिए। इसके साथ ही अपराधों के साथ अवैध यौन संबंध नीचे आ जाएंगे। प्रतिबंधित कामुकता के कारण होने वाले कई मनोवैज्ञानिक रोग नीचे आ जाएंगे। वर्तमान परिदृश्य के लिए कुछ भी अतिरिक्त नहीं किया जाएगा, लेकिन पहले से मौजूद वैश्यावृत्ति-केंद्र केवल तब्दील हो जाएंगे।

 

Happy Guru poornima, 2018- गुरु पूर्णिमा २०१८ के सम्मान में

Guru can not be defined, praised, described, advertised or forcefully made. Guru is in the form of one’s own self. How can that be praised or described in anyway. Guru can only be experienced.

The same happened to Premyogi vajra. He is totally dumb regarding a Guru. He has only experiential account that he cannot describe in anyway. When he tries to describe Guru as something special, then he loses his essence totally. It is just like as if anyone can taste the sweet but cannot describe the sweetness in a true form. When he tries to describe sweetness, he loses that’s joy suddenly. Guru is a friend, not a friend, both of these and neither of these. Guru is a well wisher, not a well wisher, both of these and neither of these. Guru helps in spiritual progress, not helps in spiritual progress, both of these and neither of these. Guru has a specific age, not has a specific age, both of these and neither of these. Guru has a specific set of qualities, don’t have a specific set of qualities, both of these and neither of these. Guru is spiritually advanced, not spiritually advanced, both of these and neither of these. Guru is beloved, not beloved, both of these and neither of these. Guru is too respected, not too respected, both of these and neither of these. Guru is well known and established socially, not well known and established socially, both of these and neither of these. Guru loves his disciple, don’t love his disciple, both of these and neither of these. Guru showcases himself as a Guru, doesn’t showcase himself as a Guru, both of these and neither of these. Guru can be searched for or one can be made as a Guru deliberately/forcefully, can not be searched for or one can not be made as a Guru deliberately/forcefully, both of these and neither of these. Guru appears in one’s life through his attraction towards one’s tantric consort, it doesn’t happen so, both of these and neither of these. Guru itself searches his disciple, it’s not so, both of these and neither of these. Guru is non dual, he is dual, both of these and neither of these. Guru takes credit of his disciple’s spiritual progress, he doesn’t do so, both of these and neither of these. Guru is a family member, not a family member, both of these and neither of these. Guru is an elder one, not an elder one, both of these and neither of these. Guru is selfish and want to solve his purpose, it’s not like this, both of these and neither of these. Guru is must in life, it’s not so, both of these and neither of these. Guru is a special God gift, it’s not so, both of these and neither of these. Guru is punishing, he is not punishing, both of these and neither of these. Guru is everywhere, he is no where, both of these and neither of these. Guru is one’s second mother for he gives one second birth into an enlightened life, it’s not so, both of these and neither of these. Guru is must for awakening, he is not must for awakening, both of these and neither of these. Guru is everything, he is nothing, both of these and neither of these. Guru accepts one when he is rejected from everywhere, it’s not so, both of these and neither of these. One can be fully sure if who one is his Guru, it’s not so, both of these and neither of these. Guru is one’s Kundalini/focused mental image that can be lifted up most easily through tantra, it’s not so, both of these and neither of these. Guru doesn’t provide mere knowledge but love and mental support too for mere knowledge can also be provided by Google, it’s not so, both of these and neither of these. It is a long list and covers every humanely attributes.

Actually, Guru is indescribable just like God. Majority of people who go on beating the drums outside for Guru actually don’t know even the ABC of Guru. Guru is made in heart. Guru is made in mind. Actually not made deliberately but all happen spontaneously in a love full social environment. People who don’t know what is love, they can’t understand Guru. No one can exposé one that is hardly attached to the heart. No one can exposé one that is hardly attached to the mind.

गुरु को परिभाषित, प्रस्तावित व विज्ञापित नहीं किया जा सकता; और न ही किसी को जबरदस्ती गुरु बनाया जा सकता है। गुरु तो किसी के अपने स्वयं के / आत्मा के रूप में ही होते है। भला अपना रूप कैसे किसी के द्वारा वर्णित या प्रशंसित किया जा सकता है। गुरु केवल अनुभव ही किए जा सकते हैं।

प्रेमयोगी वज्र के साथ भी यही हुआ। वह गुरु के बारे में पूरी तरह से गूंगा है। उसके पास केवल अनुभवात्मक विवरण है, जिसे वह किसी भी तरह से वर्णित नहीं कर सकता है। जब वह गुरु को किसी विशेष रूप में वर्णित करने का प्रयास करता है, तो वह उसका सार पूरी तरह से खो देता है। यह ऐसे होता है, जैसे कोई भी व्यक्ति मीठा स्वाद तो ले सकता है, लेकिन मिठास को एक वास्तविक रूप में वर्णित नहीं कर सकता है। जब वह व्यक्ति मधुरता का वर्णन करने की कोशिश करता है, तो वह अचानक उसकी खुशी / मिठास को खो देता है। गुरु एक दोस्त है, दोस्त भी नहीं, इनमें से दोनों भी है, और इनमें से कोई भी नहीं। गुरु एक शुभचिंतक है, नहीं भी है, दोनों भी है, और इन दोनों में से कोई भी नहीं। गुरु आध्यात्मिक प्रगति में मदद करता है, नहीं भी करता है, दोनों भी सत्य हैं, इन दोनों में से कोई भी सत्य नहीं है। गुरु की एक विशिष्ट उम्र है, उसकी कोई भी विशिष्ट उम्र नहीं है, इनमें से दोनों भी, और कोई भी नहीं। गुरु के अन्दर विशिष्ट गुणों का एक समूह होता है, नहीं भी होता है, इनमें से दोनों भी, और इनमें से कोई भी नहीं है। गुरु आध्यात्मिक रूप से उन्नत है, आध्यात्मिक रूप से उन्नत नहीं भी है, इनमें से दोनों भी है, और इनमें से कोई भी नहीं। गुरु प्रिय हैं, प्रिय नहीं भी हैं, इनमें से दोनों, और इनमें से कोई भी नहीं। गुरू बहुत सम्मानित हैं, नहीं भी हैं, इनमें से दोनों भी हैं, और इनमें से कोई भी नहीं है। गुरु अच्छी तरह से जाना-माना होता है, और सामाजिक रूप से अच्छी तरह से स्थापित होता है, अच्छी तरह से ज्ञात और सामाजिक रूप से स्थापित नहीं भी होता, इनमें से दोनों भी, और इनमें से कोई भी नहीं। गुरु अपने शिष्य से प्यार करते हैं, प्यार नहीं भी करते, इनमें से दोनों भी, और इनमें से कोई भी नहीं। गुरु खुद को गुरु के रूप में दिखाता है, नहीं भी दिखाता है, इन दोनों में से दोनों ही, और इनमें से कोई भी नहीं। गुरु की खोज की जा सकती है, या किसी को जानबूझकर / बलपूर्वक गुरु के रूप में बनाया जा सकता है; उसे नहीं भी खोजा जा सकता है, या जानबूझकर / बलपूर्वक नहीं भी बनाया जा सकता है, इन दोनों में से दोनों ही, और दोनों में से कोई भी नहीं। गुरु किसीके जीवन में उसकी तांत्रिक प्रेमिका / प्रेमी के प्रति आकर्षण के माध्यम से प्रकट होता है, ऐसा नहीं भी होता है, इनमें से दोनों भी, और इनमें से कोई भी नहीं। गुरु स्वयं ही अपने शिष्य की खोज करता है, ऐसा नहीं है, इनमें से दोनों भी, और इनमें से कोई भी नहीं। गुरु द्वैतमयी नहीं है, वह द्वैतमयी है भी, इनमें से दोनों भी, और इनमें से कोई भी नहीं। गुरु अपने शिष्य की आध्यात्मिक प्रगति का श्रेय स्वयं को देते हैं, वह ऐसा नहीं करते हैं, इनमें से दोनों भी, और इनमें से कोई भी नहीं। गुरु एक परिवार का सदस्य है, वह शिष्य के परिवार का सदस्य नहीं है, इनमें से दोनों भी, और इनमें से कोई भी नहीं। गुरु एक वृद्ध व्यक्ति हैं, ऐसा नहीं है, इनमें से दोनों भी, और इनमें से कोई भी नहीं। गुरु स्वार्थी हैं, और अपने उद्देश्य को हल करना चाहते हैं; ऐसा नहीं है, इनमें से दोनों भी, और इनमें से कोई भी नहीं। गुरु जीवन में जरूरी है, ऐसा नहीं है, इनमें से दोनों भी, और इनमें से कोई भी नहीं। गुरु भगवान का दिया हुआ एक विशेष उपहार है, ऐसा नहीं है, इनमें से दोनों भी, और इनमें से कोई भी नहीं। गुरु दंडित करते हैं, वह दण्डित नहीं करते हैं, इनमें से दोनों, और इनमें से कोई भी नहीं। गुरु हर जगह है, वह कहीं नहीं है, इनमें से दोनों भी, और इनमें से कोई भी नहीं है। गुरु एक दूसरी मां है, क्योंकि वह एक दूसरे जन्म को एक प्रबुद्ध जीवन के रूप में देता है, ऐसा नहीं है, इनमें से दोनों भी, और इनमें से कोई भी नहीं। गुरु आत्मजागृति के लिए जरूरी है, जरूरी नहीं है,  इन दोनों में से दोनों भी, और इनमें से कोई भी नहीं। गुरु सब कुछ है, वह सब कुछ नहीं है, इनमें से दोनों भी है, और इनमें से कुछ भी नहीं है। जब कोई व्यक्ति हर जगह से खारिज कर दिया जाता है, तो गुरु उसको स्वीकार करता है, ऐसा नहीं है, इनमें से दोनों भी, और इनमें से कोई भी नहीं। कोई पूरी तरह से सुनिश्चित कर सकता है कि कौन उसका गुरु है, ऐसा नहीं है, इनमें से दोनों भी, और इनमें से कोई भी नहीं। गुरु एक कुंडलिनी / केंद्रित मानसिक छवि है, जिसे तंत्र के माध्यम से मूलाधार से सबसे आसानी से उठाया जा सकता है, ऐसा नहीं है, इनमें से दोनों भी हैं, और इनमें से कोई भी नहीं है। गुरु केवल ज्ञान ही प्रदान नहीं करते हैं, बल्कि ज्ञान के साथ प्यार और मानसिक सहायता / सहानुभूति भी, क्योंकि खाली ज्ञान तो Google / गूगल के द्वारा भी प्रदान किया जा सकता है; ऐसा नहीं है, इनमें से दोनों बातें भी सत्य हैं, और इनमें से कोई भी सत्य नहीं। यह एक लंबी सूची है, जो हर मानवीय विशेषताओं को शामिल करती है।

दरअसल, गुरु भगवान की तरह अवर्णनीय है। गुरु के मामले में बाहरी प्रचार के ड्रम / ढोल को बजाने वाले अधिकांश लोग वास्तव में गुरु के एबीसी / कखग को भी नहीं जानते हैं। गुरु दिल में बना होता है। गुरु को दिमाग में बनाया गया होता है। वास्तव में गुरु को जानबूझकर नहीं बनाया गया होता है, लेकिन वे एक पूर्ण सामाजिक व प्रेमभरे वातावरण में सहजता से स्वयं ही मस्तिष्क में प्रतिष्ठित हुए होते हैं। जो लोग नहीं जानते कि प्यार क्या है, वे गुरु को नहीं समझ सकते हैं। कोई भी उस व्यक्ति को उजागर नहीं कर सकता, जो दिल से मजबूती के साथ जुड़ा हुआ होता है। कोई भी उस व्यक्ति को एक्सपोज़ नहीं कर सकता है, जो दिमाग / मन से मजबूती के साथ जुड़ा हुआ होता है।

Animal(buffalo) case report

Actinobacillosis in a buffalo unresponsive to streptomycin

There was a buffalo case having chronic Actinobacillosis with only mild symptoms of the disease. That created confusion, first causing wrong diagnosis that was done as Ketosis at first time, unresponsive/simple Actinobacillosis at second time  and liver damage on third occasion. It lastly recovered with potassium iodide oral therapy @ 7g od for 7 days.

Date and place

village Tepra, p.o. Namhol, district Bilaspur, state Himachal pradesh, India. dated 26-02-2008

Animal

Species-Bovine-buffalo, age-adult/full mouth.

History

There was a gradual weakness since calving about 5 months ago. Rapid weakness and oligophagia/reduced appetite since about 12-13 days along with constant dribbling of saliva. No total refusal of food. Selective eating of grass avoiding dry but eating lush green. Frequent up-down shaking of head while picking up grass to mouth. Rumination type movements of jaws but no froth seen to outside, although a clear stingy saliva visible. Animal used to lick the hands of owner when being healthy but now stopping that all together.

Clinical signs

Pulse rate-60/normal, respiration rate- normal, rectal temperature- 99-100 degree F showing weakness, conjuctival mucous membrane-bright pink/normal, oral cavity-no shear molars, no grass entangled between teeth and cheek, no foreign body between molars and anywhere inside buccal cavity. Tongue appeared somewhat enlarged posteriorly. On anterior side of tongue, blackish spots(size of pin head) distributed. Body condition- very much emaciated and hide bound. Reduced from the original size of 400 kg to 200 kg.

Diagnosis number 1

Ketosis. Treatment done- Injection dexamethasone @20 mg i/m and bolus albendazole orally but to no effect.

Diagnosis number 2

Actnobacillosis. Treatment done- Injection Streptomycin @ 2.5 g i/m o.d. for 3 days and injection liver extract for 2 days but to no effect.

Diagnosis number 3

Liver damage due to facioliasis or any other reason. Treatment done- Injection liver extract at a rate 5 times the normal doze rate for 4 days/up to one day more of stoppage of salivation and initiation of tongue movement(by the effect of KI) including injection B-complex for two days. Potassium iodide was also administered in the last 2 days of above course, orally without hope for its effect but only to satisfy the owner/for hit and trial @ 7 g daily for 7 days. Miracle type occured and salivation stopped after 2 days of potassium iodide therapy.

Conclusion- It appears that the above described disease in buffalo was a chronic form of Actinobacillosis that was unresponsive to Streptomycin.

 

Tantric Guru and tantric consort- तांत्रिक गुरु और तांत्रिक प्रेमिका

The permanent stationing of guru inside one’s mind is best achieved through sexual tantra, just as happened with Premyogi vajra as described on Home-2 webpage. His first exposure with his sexual consort(non marital)/Queen during he being in loving company of his guru(the same spiritual old man) was pure mental/one time indirect initiation/indirect tantra based as told in detail on webpages, love story of a yogi, scattered throughout. Therein queen was as if his activated kundalini and was led through the wonderful/too rich romantic lures in his mind to his enlightenment in too short time of 2 years by the spontaneous grace of his pauranic(who reads puranas/collections of ancient Indian spiritual stories in Sanskrit, daily) guru’s company, even without her awakening. On second occasion, his that and then demised physical guru’s mental image as his second kundalini was enriched too much with his non dual life style and that image’s connection with the repeatedly remembered image of the first consort(indirectly sexual) in about 15 years. Then in the last, Premyogi vajra lifted up that kundalini to  her awakening with the help of the direct sexual tantra with his second consort(marital), as described on the same homepage in brief and love story of a yogi-7 in detail.

मन के अन्दर गुरु के स्थायी रख-रखाव को यौन तंत्र के माध्यम से सबसे अच्छी तरह से हासिल किया जा सकता है, जैसा कि होम -2 वेबपृष्ठ पर वर्णित प्रेमयोगी वज्र के साथ हुआ था। अपनी प्रथम यौनप्रेमिका / प्रथम देवीरानी (अविवाहित) से संपर्क में रहने के दौरान वह अपने गुरु (वही आध्यात्मिक बूढ़े आदमी) की निरंतर प्रेमपूर्ण संगति में भी बना हुआ था। प्रथम देवीरानी के साथ वह संपर्क शुद्ध मानसिक / एकबार के अप्रत्यक्ष तांत्रिक प्रारम्भ (इनिशिएशन) / अप्रत्यक्षतंत्र से प्रेरित था। यह सारा वर्णन वेबपेजिस “love story of a yogi” पर किया गया है। वही देवीरानी उसकी सक्रिय कुंडलिनी के रूप में थी, और उसके दिमाग में उसके उपरोक्त पौराणिक गुरु द्वारा पढ़ी गई कथाओं की सहज कृपा से अत्यद्भुत / बहुत ही समृद्ध रोमांटिक लालचों के माध्यम से, 2 वर्षों के बहुत कम समय में उसके आत्मज्ञान के लिए चरम मानसिक अभिव्यक्ति तक ले जाई गई, उन्हीं गुरु की संगति से, जो प्रतिदिन प्राचीन भारतीय आध्यात्मिक कहानियों के संग्रह / पुराण पढ़ा करते थे, उस कुण्डलिनी की सैद्धांतिक जागृति के बिना ही। दूसरे मौके पर, उन्होंने अपनी दूसरी कुंडलिनी के रूप में अपने उन्हीं भौतिक गुरु की मानसिक छवि को अपनी अद्वैतपूर्ण जीवन शैली के साथ समृद्ध किया, और पहली देवीरानी (परोक्ष रूप से यौनसम्बन्धी) की बार-बार याद की गई छवि के साथ अपने गुरु की छवि का संबंध जुड़ा होने के कारण, गुरु की छवि भी काफी समृद्ध हो गई, लगभग 15 वर्षों में। फिर आखिर में, प्रेमयोगी वज्र ने अपनी दूसरी कंसोर्ट / प्रेमिका (वैवाहिक) के साथ सीधे / प्रत्यक्ष यौनतंत्र की मदद से अंतिम जागृति के लिए उस कुंडलिनी को उठाया, जैसा कि उपरोक्त होमपेज पर ही संक्षेप में और “love story of a yogi-7” में विस्तार से वर्णित है।