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कुंडलिनी सहस्रार चक्र में जबकि कुंडलिनी शक्ति मूलाधार चक्र में निवास करती है

मित्रो, कुंडलिनी और कुण्डलिनी शक्ति के बीच में अंतर को लेकर दुनिया में अक्सर भ्रम देखा जाता रहता है। कई लोग कुंडलिनी को कुंडलिनी शक्ति समझ लेते हैं, और दूसरे कई लोग कुण्डलिनी शक्ति को कुंडलिनी समझ लेते हैं। आज हम इस बारे में अनुभवात्मक चर्चा करेंगे।

कुण्डलिनी शक्ति का मूल निवासस्थान मूलाधार चक्र है, जबकि कुण्डलिनी का मूल निवासस्थान सहस्रार है

शक्ति मूलाधार में उत्पन्न होती रहती है। वह सहस्रार तक जाकर कुण्डलिनी को पुष्ट करती है। इससे ऐसा लगता है कि कुण्डलिनी मूलाधार में पैदा हो रही है। सहस्रार से शक्ति आज्ञाचक्र से होकर नीचे उतरती है, और शरीर के सभी चक्रों में फैल जाती है। इससे ऐसा आभास होता है कि सभी चक्रों पर कुंडलिनी घूम रही है। वास्तव में वह शक्ति घूम रही होती है। शक्ति को प्राण या प्राणशक्ति भी कहते हैं।यदि चक्रों पर ही कुण्डलिनी हुआ करती, तो वह वहाँ पर जागृत भी होती। पर कुंडलिनी तो सहस्रार में ही जागृत होती है।

शरीर में अनुभव का स्थान मस्तिष्क ही है, कोई अन्य स्थान नहीं

शरीर के किसी भी भाग की चमड़ी में यदि खुजली हो, तो उसकी अनुभूति मस्तिष्क में ही होती है। हालांकि हमें ऐसा लगता है कि खुजली वाले स्थान पर संवेदना की अनुभूति होती है।कुण्डलिनी के साथ भी वैसा ही होता है। चाहे हम किसी भी चक्र पर कुण्डलिनी का ध्यान करें, उसकी अनुभूति मस्तिष्क में ही होगी। परन्तु लगता ऐसा है कि चक्र पर कुण्डलिनी है। यदि मस्तिष्क को दवा आदि से बेहोश किया जाए, तो शरीर के चक्रों पर भी संवेदना या कुण्डलिनी की अनुभूति नहीं होगी। इसी तरह जब सुषुम्ना नाड़ी पीठ में एक चमकती हुई लकीर के रूप में अनुभव होती है, तो वह अनुभूति भी मस्तिष्क में ही हो रही होती है।

मस्तिष्क से फ्रंट चैनेल के रास्ते उतरता हुआ प्राण कुंडलिनी के आभासिक चित्र को भी अपने साथ नीचे ले आता है

यह इस बात से सिद्ध होता है कि जब मस्तिष्क में कुंडलिनी का ध्यान हो रहा होता है, उस समय यदि जीभ को तालु से लगा कर प्राण को मस्तिष्क से नीचे उतारा जाए, तो कुंडलिनी भी उसके साथ उतरकर सभी चक्रों को भेदते हुए मूलाधार तक पहुंच जाती है। कुंडलिनी का चित्र तो लगातार मस्तिष्क में ही बन रहा होता है, पर उसका आभासिक अनुभव विभिन्न चक्रों पर होता है। इसी तरह, पीठ से ऊपर चढ़ता हुआ प्राण कुंडलिनी को भी वापिस ऊपर ले जाता हुआ प्रतीत होता है। हालांकि कुण्डलिनी कुण्डलिनी मस्तिष्क में ही होती है। इसका मतलब है कि जब प्राण कुण्डलिनी को अपने साथ चलाता है, तो कुण्डलिनी भी प्राण को अपने साथ चलाती है, क्योंकि दोनों आपस में जुड़े होते हैं। तांत्रिक हठयोग में प्राण को कुंडलिनी का हैन्डल बनाया जाता है, जबकि राजयोग में कुंडलिनी को प्राण का हैंडल बनाया जाता है। मिश्रित योग में दोनों ही तरीकों का इस्तेमाल होता है, इसलिए यह सबसे ज्यादा प्रभावी है।

मस्तिष्क के विभिन्न विचार भी जब प्राण के साथ नीचे उतरते हैं, तो वे कुंडलिनी बन जाते हैं

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि योगी को कुण्डलिनी के चिंतन की आदत पड़ी होती है। इसलिए कुंडलिनी विचार सबसे प्रिय होता है। तभी तो प्रिय व्यक्ति के लिए कहते हैं कि वह तो मेरे दिल का टुकड़ा है। माँ बेटे के लिए अपनी कोख का हवाला देती है। जब प्राण किसी चक्र पर केंद्रित हो, तब मस्तिष्क में विचारों के लिए बहुत कम प्राण बचा होता है। उतने कम प्राण में तो कुण्डलिनी चित्र को ही बना के रखा जा सकता है, क्योंकि रोज के योगाभ्यास के बल से मस्तिष्क को उसको आसानी से और कम प्राण ऊर्जा से बनाने की आदत पड़ी होती है। इसी तरह, योगाभ्यास के समय जब मन विचारशून्य सा होता है, तो मूलाधार से सहस्रार को चढ़ने वाली शक्ति से कुंडलिनी ही उजागर होती है। यह इसलिए क्योंकि कुंडलिनी की लिए सोचकर ध्यान लगाने की जरूरत नहीं होती। वह रोज के अभ्यास से खुद ही ध्यानपटल पर बनी रहती है। इसी तरह, योगाभ्यास के दौरान जब साँसे प्राणों से भरपूर होती हैं, तब भी कुण्डलिनी ही पुष्ट होती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कुण्डलिनी चित्र ही उन साँसों के प्राणों का सबसे अधिक फायदा उठाते हुए सबसे तेजी से चमक सकती हैं। ऐसा रोज के कुंडलिनी अभ्यास से ही होता है।

अनुभूति का स्थान सहस्रार चक्र ही है, इसीलिए कहा जाता है कि आत्मा सहस्रार में निवास करती है

मुझे तो कुण्डलिनी जागरण की अनुभूति पूरे मस्तिष्क में हुई। ऐसा लगा कि मस्तिष्क का हरेक कण कम्पायमान या जागृत हो रहा था। यद्यपि कुण्डलिनी मस्तिष्क के सबसे ऊपरी हिस्से में महसूस हो रही थी। उसे ही क्राऊन चक्र भी कहते हैं। जब जागरण की अनुभूति समाप्त हुई, तब कुण्डलिनी आज्ञा चक्र में महसूस हुई। सहस्रार से जागरण की शुरुआत इसलिए होती है क्योंकि मूलाधार से ऊपर चढ़ने वाली प्राणशक्ति सीधी सहस्रार में प्रविष्ट होकर वहाँ पर कुंडलिनी को चमकाती है। हो सकता है कि अनुभव केवल सहस्रार चक्र में ही होती हो, और अन्य मस्तिष्कीय केंद्रों में अनुभूति सहस्रार से ही रेफर्ड होकर आई हो। हालांकि मेरा यह अनुमान वैज्ञानिक प्रयोगों के विरुद्ध है, जिसमें मस्तिष्क में बहुत से अनुभूति के केंद्र बताए गए हैं। वैसे तो चिकित्सा विज्ञान अभी तक चक्रों और नाड़ियों की पहेली को नहीं सुलझा पाया है। इसी तरह, आज्ञा चक्र और उससे निचले चक्रों की तरह मस्तिष्क व शरीर के सभी बिंदुओं पर महसूस होने वाली संवेदनाएं रेफर्ड ही हैं। संवेदनाओं का मूल स्थान तो सहस्रार ही है। सहस्रार में जागरण के एकदम बाद कुंडलिनी आज्ञा चक्र पर आ जाती है। इससे जाहिर होता है कि निचला चक्र अपने ऊपर वाले चक्र से कम ऊर्जा स्तर का होता है। मतलब यह है कि सहस्रार की प्राणऊर्जा के विभिन्न स्तर विभिन्न चक्रों के रूप में अभिव्यक्त होते हैं। जागरण के समय ऊर्जा स्तर टॉप मोस्ट लेवल पर होता है। ऊर्जा स्तर के एक निश्चित सीमा के नीचे गिरने से जागरण की अनुभूति समाप्त हो जाती है। उस समय भी कुण्डलिनी रहती तो सहस्रार में ही है, पर वह आज्ञा चक्र में प्रतीत होती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि सहस्रार से प्राण आज्ञा चक्र तक उतर गया होता है। यदि कुण्डलिनी प्राण के साथ न चला करती, तो जागरण के एकदम बाद किसी भी चक्र पर महसूस हुआ करती। उसके बाद जैसे-जैसे प्राण नीचे उतरता है, कुण्डलिनी भी उसके साथ उतरती महसूस होती है। यह ऐसे ही होता है, जैसे जब किसी अंग में बहुत तेज दर्द होता है, तो वह सहस्रार में महसूस होता है, और आदमी कहता है कि उसका सिर फटा जा रहा है। इससे ऐसी कहावत भी बनी है कि”इतनी दर्द हुई कि चोटी खड़ी हो गई”। दरअसल बालों की चोटी सहस्रार के निकट बँधी होती है। छोटी मोटी दर्द तो प्रभावित अंग के स्थानीय क्षेत्र में ही लोकेलाइज्ड महसूस होती है। यदि बिना सुन्न किए दाँत उखाड़ा जाए, तो सहस्रार में बहुत तेज दर्द होता है। आदमी बोलता है कि उससे बड़ा दर्द कोई नहीं हो सकता। कुंडलिनी जागरण के अनुभव के बाद भी तो आदमी यही बोलता है कि इससे बड़ा अनुभव नहीं हो सकता। वास्तव में कुंडलिनी जागरण ही दुनिया की सबसे बड़ी अनुभूति है। अगर कोई है, तो वह आत्मज्ञान या ईश्वर ही है। उसमें अद्वैत और आनंद की अनुभूति पूर्ण रूप में होती है। अद्वैत और आनन्द तो दाँत उखाड़ने के बाद भी महसूस होता है, पर पूर्णरूप में नहीं। इससे भी जाहिर होता है कि अनुभूति का स्थान सहस्रार ही है। दाँत निकालने के दर्द की अनुभूति की जागरण की अनुभूति से समानता की बात बहुत से योगियों ने की है। मैंने भी ऐसा दाँत निकालने का उच्चतम स्तर का दर्द एकबार महसूस किया था। सुन्न करने वाली दवा अपना असर नहीं दिखा पाई थी। उससे मुझे अपना मस्तिष्क फटता हुआ सा इसलिए महसूस हुआ, क्योंकि मेरे शरीर का सारा प्राण दर्द का पीछा करते हुए सहस्रार में घुस गया था। उसके बाद मुझे 3 साल पहले हुए आत्मज्ञान का स्मरण हो आया, क्योंकि वह अवस्था उसीके जैसी आध्यात्मिक थी। वह प्राणोत्थान की अवस्था लग रही थी। इसमें पूरे शरीर का प्राण सहस्रार में केंद्रित होता है। इसका वर्णन मैंने एक पुरानी पोस्ट में किया है। सम्भवतः दुःख या दर्द से पाप का नष्ट होना इससे पैदा हुई इस योग भावना से ही होता है। इससे इस बात की भी पुष्टि हो जाती है कि योग से पाप क्षीण होते हैं। अब कुण्डलिनी के अनुभव को तो दर्द के अनुभव की तरह पैदा नहीं किया जा सकता है। अगर ऐसा होता तो आदमी सावधानी से अपने बाहरी अंगों में संवेदना पैदा करके कुण्डलिनी को महसूस किया करता। कुण्डलिनी का ध्यान तो मस्तिष्क में ही किया जा सकता है। ऐसा करना आम आदमी के लिए कठिन है। इसलिए प्राण को कुंडलिनी के हैंडल के रूप में प्रयोग में लाया जाता है। तांत्रिक हठयोग से प्राण को सहस्रार तक चढ़ाया जाता है। उससे वहां खुद ही कुण्डलिनी प्रकट होकर मजबूत होती रहती है। इससे जाहिर होता है कि हठयोग राजयोग की अपेक्षा अधिक वैज्ञानिक, व्यावहारिक व आसान है। वैसे समयानुसार दोनों का मिश्रित प्रयोग मुझे ज्यादा कारगर लगा। उपरोक्तानुसार जब दर्द के साथ प्राण सहस्रार तक पहुंचता है, तो उससे कुण्डलिनी भी अनुभव होने लगती है। परंतु ज्यादा कुण्डलिनी लाभ नहीं मिलता, क्योंकि अधिकांश प्राण को दर्द की अनुभूति खा जाती है। हालांकि कई जगह स्पर्श की अनुभूति का कुण्डलिनी के लिए प्रयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए, जीभ और तालु के आपसी स्पर्श के अनुभव से कुण्डलिनी और प्राण मस्तिष्क से वहां तक उतर जाते हैं, और फ्रंट चैनल से नीचे चले जाते हैं।उपरोक्तानुसार ही, जैसे सहस्रार में बनने वाले चित्र ही चक्रों पर बने हुए प्रतीत होते हैं, उसी तरह बाहरी दुनिया में बनने वाले सूर्य, नदी, पर्वत वगैरह के चित्र भी सहस्रार में ही बन रहे होते हैं, पर उनकी अनुभूति दूर बाहर होती है। यह ट्रिक मस्तिष्क ने क्रमिक जीवविकास के दौरान सीखी है। यदि सभी कुछ अंदर ही महसूस हुआ करता, तो बाहर की तरफ दौड़ न होती, और जीवविकास न होता।जितनी तेज अनुभूति होती है, वह उतनी ही ज्यादा आत्मा से चिपकती है। उसे ही समाधि भी कहते हैं। ऐसी तेज अनुभूति सहस्रार में ही होती है। तभी तो आदमी यौन प्रेमी को कभी भूल नहीं पाता। दरअसल मूलाधार से उठ रही अनुभूति सीधी सहस्रार में जा बैठती है और वहाँ प्रेमी के चित्र को मजबूत करती है। इसी वजह से कई लोग प्रेम में पागल होकर साधु बन जाते हैं।सहस्रार चक्र की इसी सार्वभौमिकता के कारण उसे एक हजार पंखुड़ियां दी गई हैं। इसका मतलब है कि यह शरीर के हरेक बिंदु से जुड़ा होता है। अन्य चक्रों में दो, तीन या चार पंखुड़ियां होती हैं, मतलब कि वे आसपास के कुछेक चक्रों से ही जुड़े होते हैं। इसका वर्णन मैंने एक पुरानी पोस्ट में किया है। शिवपुराण के अनुसार कुण्डलिनी ही शिव है, और शिव ही कुंडलिनी है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि उसमें शिव ही का ध्यान लगाने को कहा गया है। उसीके अनुसार वह शिव सहस्रार में निवास करते हैं। शक्ति उनसे मिलने के लिए मूलाधार से ऊपर चढ़ती रहती है। जब शक्ति का आवेग एक निश्चित सीमा से ऊपर उठ जाता है, तब उसका शिव के साथ मिलन का कामोन्माद चरम पर पहुंच जाता है। उससे शिव-शक्ति का मिलन पूर्ण हो जाता है, जो कुण्डलिनी जागरण के रूप में प्रकट होता है।

मिश्रित योग सबसे अधिक कारगर होता है, इस उपरोक्त कथन की पुष्टि के लिए मैं अपने साथ घटित घटना का एक उदाहरण देता हूँ। मैं उस समय प्राणोत्थान की अवस्था में था। प्रतिदिन योगाभ्यास कर रहा था। एक दिन मेरे अचानक मिले पुराने मित्र के कारण मुझे कुण्डलिनी का तेज स्मरण हो आया। मैं उसमें खो गया। तभी अचानक मेरे प्राण भी उस कुंडलिनी का साथ देने के लिए मूलाधार से उठकर पीठ के रास्ते मस्तिष्क को चढ़ गए। इससे वह कुण्डलिनी जागृत हो गई। इसका विस्तृत विवरण इस वेबसाइट के होमपेज पर है। प्राण इसीलिए ऊपर चढ़ पाए, क्योंकि मैं प्रतिदिन तांत्रिक हठयोग का अभ्यास कर रहा था, और मुझे प्राण को ऊपर चढ़ाने की आदत बनी हुई थी। यदि वह आदत न होती, तो कुंडलिनी का स्मरण तो मस्तिष्क में तेजी से होता पर वह जागृत न होती, क्योंकि उसे मूलाधार की प्राणशक्ति न मिलती। जागरण कराने वाली असली प्राणशक्ति तो मूलाधार चक्र में ही रहती है। इससे पूर्वकथित इस बात की भी पुष्टि हो जाती है कि प्राण कुंडलिनी का पीछा करता है, और जहाँ कुंडलिनी जाती है, वहाँ प्राण भी चला जाता है। कुण्डलिनी के स्मरण को आप राजयोग कह सकते हैं, और मूलाधार से प्राण को ऊपर चढ़ाने को हठयोग कहते हैं। इससे सिद्ध होता है कि सभी प्रकार के योग मिलजुल कर काम करते हैं, और सभी एक ही महायोग के विभिन्न हिस्से हैं।

भाई विनोद शर्मा द्वारा रचित कालजयी, भावपूर्ण व दिल को छूने वाली कुछ कविताएँ- भाग 4

स्वयं की तू तलाश कर

क्षणिक सुखों की चाह में           
भटक रहा इधर-उधर
कस्तूरी की खुशबू के लिए
हिरण की तरह बेख़बर
वज़ूद क्या तू कौन है?
इतनी-सी पहचान कर
हृदय में अपने झांक ले
स्वयं की तू पहचान कर।

राह में बिखरे हुए
कांटे भी चुन लें कभी
रोते हुए इन्सान का
दर्द भी सुन ले कभी
क्या तू मुंह दिखाएगा
जाएगा जब उसके घर
हृदय में अपने झांक ले
स्वयं की तू तलाश कर।

मर गया है कौन ये
पास जा के देख ले
ज़ुल्म क्या इस पर हुआ
चिन्तन में चिता सेंक लें
आवाज़ उठा अर्श तक
किसका तुझे इतना डर
हृदय में अपने झांक ले
स्वयं की तू तलाश कर।

बस्ती में ख़ुदग़र्जों की
निराश होना छोड़ दें
कर दे बुलन्द हस्ती को
हवाओं का रुख मोड़ दे
गुज़रेगा जिन राहों से
लोग झुकाएंगे सर
हृदय में अपने झांक ले
स्वयं की तू तलाश कर।

शान्ति-ध्वज को छोड़ दें
शमशीर उठा तन के चल
मसीहा बन कमज़ोर का
पड़ने दें माथे पे बल
आग़ाज़ कर जीवन का तू
अन्जाम की फ़िक्र न कर
हृदय में अपने झांक ले
स्वयं की तू तलाश कर।

सांसें मिली संसार में
मक़सद कोई ज़रूर है
शाख़ पर पत्ता भी वरना
हिलता नहीं हुज़ूर है
लगा दे यहाँ हाज़िरी
दिन-रात अपना कर्म कर
हृदय में अपने झांक ले
स्वयं की तू तलाश कर।

तरकश में अभी कई बाण पड़े हैं

हंसा कौन ये दूर गगन में
क्या सुन पाए तुम भी यारो
मौन व्याप्त है चहुं दिशा में
अब तो सम्भलो अहम के मारो

अति का बुरा सर्वत्र सुना था
आज घटित हुए देख लिया है
फिसला जब जीवन मुट्ठी से
फिर तुमने उसे याद किया है।

जीवनदायी धरा पर तुमको
जीना रास नहीं आया है
जीवन सम्भव नहीं जहां था
वो मंगल-चाँद तुम्हें भाया है

प्रकृति विरुद्ध जो काम किए हैं
उसका दण्ड तो पाना होगा
तुमने सोचा शाश्वत हैं हम
अब समय से पूर्व जाना होगा।

भूमि,नभ,जल,वायु,अग्नि
पंच तत्वों को भी न छोड़ा
विधि निर्मित जो नियम बने थे
उन नियमों का पालन तोड़ा

विज्ञान नहीं भगवान से ऊपर
इतना अगर तुम जाने होते
आज नहीं अपने कन्धो पर
मानवता की लाशें ढोते।

प्रमाद भरा है कैसा तुम में
दानवता तुमसे हारी है
भक्ष लिया हर जीव जगत का
अब सोचो किसकी बारी है

शर्मसार है जगत नियन्ता
महसूस हुई लाचारी है
सख्त़ फैसला अब वो लेगा
सृष्टि की ज़िम्मेदारी है।

अभी तो ये आरम्भ हुआ है
क्यों इतने बेचैन हो रहे
समय है ये कर्मों के फल का
वर्षौं से जिसका बीज बो रहे

किसके मद में उन्मत थे तुम
अब शीश झुकाए मौन खड़े हैं
एक ही तीर चलाया उसने
तरकश में अभी कई बाण पड़े हैं।

मानव जीवन के विरोधाभास पर छोटी सी गजल

जब से कसम ली उसने शराफ़त से जीने की
 पैमाईश लगे अब करने बुज़दिल भी सीने की।
 
हिक़ारत से देखते थे जो मयख़ानों की तरफ़
 आदत उन्हें अब हो गई हर रोज़ पीने की।
 
फ़ितरत में जिनकी डूबना बचाए उन्हें कौन
 समन्दर में ज़रूरत नहीं उनको सफ़ीने की।
 
नहीं वास्ता मेहनत से जिनका दूर तलक यार
 करते नहीं इज्ज़त वो किसी के पसीने की।
 
इकट्ठा किए रहे जो कौड़ियों को अपने पास
 कीमत क्या जाने नासमझ उजले नगीने की।
 
भरे हैं जो बारूद से हर वक़्त बेशुमार
 देते हैं नसीहत वो सभी को सकीने की।

भाई विनोद शर्मा द्वारा रचित कालजयी, भावपूर्ण व दिल को छूने वाली कुछ कविताएँ- भाग 3

“भाव सुमन”, इस लघु पुस्तिका में हमारे दैनिक जीवन से जुड़े हुए भौतिक और आध्यात्मिक पहलुओं को सुन्दर, स्मरणीय, और कर्णप्रिय कविताओं के रूप में छुआ गया है। ये कवितायेँ बहुआयामी हैं। प्रत्येक कविता अनेक प्रकार के विषयों को एकसाथ छूती है। कविता हमारे अवचेतन मन तक आसानी से पहुँच बना लेती हैं। इसीलिए कहा जाता है कि “जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि”। बहुत सी पुस्तकों को पढ़ने से भी जो बात मन-स्वभाव में न बैठे, वह मात्र एक कविता के पठन-चिंतन से आसानी से बैठ सकती है। बहुत न लिखते हुए इसी आशा के साथ विराम लगाता हूँ कि प्रस्तुत कविता-संग्रह कविता-प्रेमी पाठकों की आकांक्षाओं पर खरा उतरेगा।

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कुंडलिनी स्विच

मित्रों, इस बार मैं योग की साधारण सी तकनीक का वर्णन करूंगा। यह है, जीभ की निचली सतह को नरम तालु से टच करने की। वैसे इसके बारे में मैंने पहले भी लिखा था। परंतु इस बार मैं तकनीक का व्यवहारिक रूप दिखाऊँगा। अभी भी मैंने कुंडलिनी को जीभ के माध्यम से फ्रंट चैनेल से उतारा। योग के निरन्तर अभ्यास से मेरी इस तकनीक में लगातार निखार आ रहा है। इसके बारे में मैं नित नई बातें सीख रहा हूँ। 

मस्तिष्क के विचारों और जीभ -तालु के स्पर्श का एकसाथ ध्यान करना चाहिए

ऐसा करने से विचारों की शक्ति खुद ही फ्रंट चैनेल से होते हुए नीचे उतर जाती है। 

जीभ तालु पर जितना पीछे कांटेक्ट में रहे, उतना ही अच्छा है

तालु का पीछे वाला भाग नरम, मखमली, नम व फिसलन से भरा होता है। वहाँ पर स्पर्श की संवेदना भी ज्यादा मजबूत व आनन्द से भरी होती है। कुंडलिनी जितने अधिक ऊपर वाले चक्रों में होती है, जीभ-तालु के आपसी स्पर्श की अनुभूति भी उतनी ही जल्दी और तेज होती है। स्पर्श की अनुभूति यदि पलभर के लिए भी हो जाए, तो भी कुंडलिनी नीचे उतर जाती है। यह ऐसे ही होता है, जैसे दो तारों के क्षणभर के संपर्क से ही करेंट प्रवाहित हो जाता है। कई बार यह अनुभूति जीभ को तालु पर रब करके भी पैदा की जाती है।

साँसें भी जीभ-तालु के आपसी स्पर्श को बनाने और मिटाने का काम करती हैं

इसीलिए जीभ-तालु के कांटेक्ट पॉइंट को कुंडलिनी स्विच भी बोलते हैं। साँस भरते समय यह कांटेक्ट पॉइंट कुछ लूस पड़ जाता है। वास्तव में यहाँ पर अवेयरनेस घट जाती है। इसका मतलब है कि कुंडलिनी स्विच ऑफ़ हो जाता है, और चैनेल का लूप सर्किट ब्रेक हो जाता है। इससे कुंडलिनी एनर्जी मस्तिष्क में जमा हो जाती है। पेट से साँसें भरने से ऐसा ज्यादा अच्छी तरह से होता है। इसी तरह, बैक चैनेल का फन उठाए नाग के रूप में ध्यान करने से भी कुण्डलिनी को बैक चैनेल में ऊपर चढ़ने में मदद मिलती है। मस्तिष्क में कुण्डलिनी एनर्जी के जमा होने से जीभ-तालु के स्पर्श को अनुभव करना भी आसान हो जाता है, जैसा ऊपर बताया गया है। फिर साँस छोड़ते हुए यह और आसान हो जाता है, क्योंकि उस समय पूरे फ्रंट चैनेल पर नीचे की तरफ दबाव पड़ता है। इस तरह से एक स्वचालित यंत्र के पुर्जों की तरह ये सभी तकनीकी बिंदु एक-दूसरे की मदद करते रहते हैं, और कुण्डलिनी चक्र लगातार चलने लगता है। इससे शरीर और मन दोनों रिफ्रेश हो जाते हैं। वैसे भी, कभी भी जीभ को तालु से स्पर्श कराने पर मस्तिष्क का अतिरिक्त बोझ नीचे उतर जाता है। मस्तिष्क के खाली हो जाने से उसमें एकदम से कुण्डलिनी स्वयं ही प्रकट हो जाती है। सिर्फ स्पर्श से कुछ नहीं होता, वहाँ पर अवेयरनेस भी पहुंचनी चाहिए। स्पर्श की संवेदना को गौर से अनुभव करने से वहाँ अवेयरनेस खुद ही पहुंच जाती है। उसके परिणामस्वरूप फ्रंट चैनेल में विशेषकर फ्रंट स्वाधिष्ठान चक्र में एक गहरी मांसपेशियों की सिकुड़न की अनुभूति होती है, और साथ में साँस की एक गहरी गैसप के साथ नियमित व गहरी सांसें चलने लगती हैं। यही कुण्डलिनी एनर्जी का चलना है। 

जीभ के पिछले हिस्से के केन्द्र से फ्रंट चैनल गुजरती है, जो सभी फ्रंट चक्रों को बेधते हुए मूलाधार तक जाती है। उससे कुंडलिनी एनर्जी के गुजरते समय पूरे फ्रंट चैनल एरिया में सनसनी के साथ ऐंठन महसूस होती है।

कई बार कुंडलिनी एनेर्जी पतली और केंद्रीय लाइन पर महसूस होती है, कभी बिना रेखा के ही

जरूरी नहीं कि हमेशा ही जीभ को तालु पर बहुत पीछे ले जाना पड़े। कई बार तालु के अगले भाग में ही अच्छी अनुभूति मिल जाती है। सामान्य पोजिशन में सीधी जीभ की तालु के साथ स्पर्श-संवेदना को भी अनुभव किया जा सकता है। जैसा ठीक लगे, वैसा करना चाहिए। कई बार कुण्डलिनी पतली रेखा में चलती महसूस होती है। ऐसा तब होता है, जब ध्यान तेज होता है, और मन शांत होता है। कई बार कुंडलिनी शक्ति केवल एक चक्र से दूसरे चक्र को स्थान बदलते दिखती है, चक्रों को जोड़ने वाली चैनल लाइन नहीं दिखाई देती।  अभ्यास के साथ खुद ही अनुभूतियाँ विकसित होती रहती हैं। इसलिए औरों की अनुभूतियों की नकल न करते हुए सही अभ्यास में लगे रहना चाहिए। इसी तरह, कई बार कुंडलिनी के चलने से संबंधित क्षेत्र की मांसपेशियों का संकुचन और ढीलापन ही महसूस होता है, बेशक कुंडलिनी का पता नहीं चलता। ऐसा सही तकनीक को लागू करने से होता है। यह कुण्डलिनी के प्रभाव को दिखाता है। कई बार ऐसा महसूस भी नहीं होता, खासकर जब मांसपेशियां थकी हों।

Kundalini switch

Friends, this time I will describe the simple technique of yoga. This is, to touch the lower surface of the tongue with the soft palate. Well I had written about it earlier also. But this time I will show the practical form of the technique. Just now I landed the Kundalini through the front channel through the tongue. With continuous practice of yoga, my technique is constantly improving. I am constantly learning new things about it.

The brain’s thoughts and tongue-palate touch should be meditated together

By doing this, the power of thoughts itself goes down through the front channel.

The more far inside the tongue is in contact with the palate, the better

The back part of the palate is soft, velvety, moist and slippery. There the sense of touch is also stronger and full of joy. The more the Kundalini is in the upper chakras, the faster and deeper the sensation of mutual touch of the tongue and palate. Even if the touch sensation remains for a moment, the Kundalini descends. This is similar to the way a current flows through the momentary contact of two wires. Many times this feeling is also produced by rubbing the tongue on the palate.

Breathing also works to make and erase the tongue and palate touch

That is why the contact point of the tongue-palate is also called Kundalini switch. This contact point becomes somewhat loose while breathing. Actually, awareness decreases here. This means that the Kundalini switches off, and the loop circuit of the channel breaks. This causes Kundalini energy to accumulate in the brain. This happens more thoroughly when the air is inhaled through stomach movement. Similarly, meditating on the back channel as a hood raising snake also helps Kundalini to climb up the back channel. The accumulation of Kundalini energy in the brain also makes it easier to experience the sensation of touch of the tongue and palate, as mentioned above. Also, it becomes easier while exhaling, because at that time there is downward pressure on the entire front channel. In this way, all these technical points help each other like the spares of an automatic device, and the Kundalini cycle starts running continuously. This refreshes both body and mind. Anyway, anytime the tongue touches the palate, the extra burden of the brain comes down. When the brain becomes empty, the Kundalini manifests itself in it. Nothing happens with just touch, awareness should also reach there. Deep feeling of touch sensation there causes reach of awareness there itself. As a result, there is a deep muscular sensation in the front channel, especially in the front swadhishthan chakra, and regular and deep breathing starts with a deep gasp of breath. This is the movement of Kundalini Energy.

The front channel passes through the center of the back of the tongue, intercepting all the front chakras uo to the Muladhar Chakra. This causes a sensation with cramp in the entire front channel area as Kundalini Energy passes through it.

At times, the Kundalini energy is felt on a thin and central line, sometimes without a line

One does not always have to move the tongue too far back on the palate. Many times a good feeling is found in the front bony part of the palate. In normal position of tongue, tactile sensation can also be experienced along the palate instead of inverted tongue. It should be done as it seems appropriate. At times, Kundalini feels moving in a thin line. This happens when meditation is deep, and the mind is calm. Many times the Kundalini Shakti is seen only changing place from one Chakra to another Chakra, the channel line connecting the Chakras is not visible. Feelings develop on their own with practice. Therefore, do not imitate the sensations of others, and one should be engaged in right practice. Similarly, sometimes the movement of the Kundalini causes the contraction and relaxation of the muscles of the area to be felt, of course, the Kundalini is not detected. This is done by applying the correct technique. It shows the influence of Kundalini. Sometimes it does not even feel, especially when the muscles are tired.

कुंडलिनी ही यमुना में पौराणिक कालियनाग को मारने वाले भगवान श्रीकृष्ण के रूप में अभिव्यक्त होती है

मित्रों, योग एक वैज्ञानिक विधि है। आम लोग इसे आसानी से नहीं समझ सकते। अभ्यास तो इसका तब करेंगे न, जब इसे समझेंगे। इसीलिए आम जनमानस की सुविधा के लिए पुराण रचे गए हैं। पुराणों में योग को विभिन्न मिथक घटनाओं और कथाओं के रूप में समझाया गया है। हालांकि मिथक रूप होने पर भी ये कथाएं सैद्धांतिक रूप से सत्य होती हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि ये मिथक शास्त्रीय होते हैं, विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए होते हैं, और गैर-शास्त्रीय या साधारण मिथकों के विपरीत होते हैं। कुछ तथाकथित आधुनिकतावादियों की सोच के विपरीत, ये अंधविश्वास की श्रेणी में नहीं आते। सामाजिक, व्यक्तिगत और व्यावहारिक मर्यादाओं के उल्लंघन से बचने के लिए कई बातें सीधे तौर पर नहीँ कही जा सकती हैं, इसलिए उन्हें वैज्ञानिक मिथक के रूप में कहना पड़ता है। योग को एकदम से समझना मुश्किल हो सकता है। लम्बे समय तक यौगिक या अद्वैतमयी जीवनशैली को अपना कर रखना पड़ता है। इसीलिए पुराणों में योग से संबंधित बातों को मनोरंजक मिथक कथाओं के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इससे ये कथाएं लंबे समय तक अपने प्रति आदमी की रुचि बना कर रखती हैं। इनसे आदमी अपनेआप ही अप्रत्यक्ष रूप से योगी बना रहता है, और अनुकूल परिस्थिति मिलने पर थोड़े से अतिरिक्त प्रयास से वह पूर्ण योगी भी बन सकता है। यदि सभी लोग एकसाथ पूर्णकालिक योगी बन गए, तब दुनियादारी के काम कैसे चलेंगे। इसीलिए योग को ऐसी वैज्ञानिक व सुहानी कथाओं के रूप में ढाला जाता है, जिन पर विश्वास बना रहे। इससे दुनियादारी के सारे दायित्वों को निभाते हुए भी आदमी हर समय यौगिक जीवनशैली में बंधा रहता है। ऐसी ही एक प्रसिद्ध कथा श्रीमद्भागवत महापुराण में आती है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण व कालियनाग के बीच हुए युद्ध का वर्णन है। उस कथा के अनुसार भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ के डर से रमणक द्वीप पर कालिय नाम का एक विशाल नाग रहता था, जिसके सैंकड़ों फन थे। उसे किसी संत ने श्राप दिया था कि कृष्ण भगवान उसको मारकर उसका उद्धार करेंगे। इसलिए वह वृन्दावन के समीप बह रही यमुना नदी में आ गया था। उसके जहर से यमुना का पानी जहरीला हो गया था, जिससे आसपास के लोगबाग और पशु-पक्षी मर रहे थे। कृष्ण भगवान अपने गोप मित्रों के साथ वहाँ गेंद खेल रहे थे। तभी उनकी गेंद यमुना के जल में चली गई। श्रीकृष्ण ने तुरंत यमुना में छलांग लगा दी। अगले ही पल वे कालियनाग से कुश्ती लड़ रहे थे। बहुत आपाधापी के बाद श्रीकृष्ण उसके बीच वाले और सबसे बड़े सिर पर चढ़ गए। वहाँ उन्होंने अपना वजन बढ़ा लिया और उसके फनों को मसल दिया। उन्होंने उसके सिर और पूँछ को एकसाथ पकड़कर उसे यहाँ-वहाँ पटका। अंत में उन्होंने कालियनाग को हार मानने पर मजबूर कर दिया। तभी कालियनाग की पत्नियां वहाँ आईं और भगवान कृष्ण से उसके प्राणों की भिक्षा माँगने लगीं। श्रीकृष्ण ने उसे इस शर्त पर छोड़ा कि वह सपरिवार यमुना को छोड़कर रमणक द्वीप पर वापिस चला जाएगा और दुबारा यमुना के अंदर कभी नहीं घुसेगा।

कालियनाग सुषुम्ना नाड़ी या मेरुदंड का प्रतीक है, और भगवान श्रीकृष्ण कुंडलिनी के प्रतीक हैँ

 वास्तव में आदमी की संरचना एक नाग से मिलती है। आदमी का सॉफ्टवेयर उसके केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र से बना होता है, जो आकृति में एक फन उठाए नाग की तरह दिखता है। उसमें मस्तिष्क और मेरुदंड आते हैं। आदमी का बाकी का शरीर तो इसी केंद्रीय तंत्रिका तंत्र पर बाहर-बाहर से मढ़ा गया है। इसी केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में सुषुम्ना नाड़ी प्रवाहित होती है। यहाँ यमुना नदी का पानी मेरुदंड के चारों ओर बहने वाले सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूड का प्रतीक है। रमणक द्वीप में निवास करना दुनियादारी के भोग-विलास में उलझने का प्रतीक है। रमणक शब्द को रमणीक या रमणीय शब्द से लिया गया है, जिसका अर्थ है मनोरंजक। गरूड़ का भय साधु संतों के भय का प्रतीक है। रमणीक जगह पर साधु संत नहीं जाते। यह देखा जाता है कि साधु संत लोगों को दुनियादारी के फालतू झमेलों से दूर रखते हैं। साधु का श्राप किसी सज्जन द्वारा ईश्वर का सही रास्ता दिखाना है। कालियनाग का श्रीकृष्ण के द्वारा मारे जाने के बारे में कहना उसको आसक्ति के बंधन से मुक्ति प्रदान करने का प्रतीक है। श्रीकृष्ण के द्वारा उसे वापिस रमणक द्वीप भेजने का अर्थ है कि वह दुनिया के भोले-भाले लोगों से दूर एकांत में चला जाए और वहाँ पर आसक्ति का विष फैलाता रहे। कालियनाग की पत्नियां दस इन्द्रियों की प्रतीक हैं। इनमें 5 कर्मेन्द्रियां और 5 ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। ये इन्द्रियाँ कालियनाग की पत्नियां इसलिए कही गई हैं, क्योंकि ये दुनियादारी में आसक्त आदमी के सान्निध्य में बहुत शक्तिशाली होकर उससे एकाकार हो जाती हैं। कालियनाग का विष आसक्तिपूर्ण जीवनशैली का प्रतीक है। यह दुनिया का सबसे शक्तिशाली विष है। इससे आदमी जन्म-मरण के चक्कर में पड़कर बार-बार मरता ही रहता है। कालियनाग के सैंकड़ों फनों से निकल रहे विष का अर्थ है कि मस्तिष्क में पैदा हो रही सैंकड़ों इच्छाओं व चिंताओं से यह आसक्ति बढ़ती ही रहती है।  भगवान कृष्ण यहाँ कुंडलिनी के प्रतीक हैं। उनका कालियनाग के बीच वाले मस्तक पर चढ़ने का अर्थ है, कुंडलिनी का सहस्रार चक्र में ध्यान करना। श्रीकृष्ण के द्वारा गेंद खेलने का अभिप्राय कुण्डलिनी योगसाधना से है। गेंद यहाँ प्राणायाम की प्राणवायु की प्रतीक है। कृष्ण के सखा ग्वाल-बाल विभिन्न प्रकार के प्राणायामों व योगसाधना के प्रतीक हैं। जैसे गेंद आगे-पीछे जाती रहती है, वैसे ही साँसें भी। गेंद का नदी में घुसने का अर्थ है, प्राणवायु का चक्रों में प्रविष्ट होना। श्रीकृष्ण का नदी में छलांग लगाने का अर्थ है कि कुंडलिनी भी प्राणवायु के साथ चक्रों में प्रविष्ट हो गई। यमुना पवित्र नदी है, जिसमें श्रीकृष्ण छलांग लगाते हैं। इसका अर्थ है कि प्राणवायु से पवित्र हुए चक्रों में ही कुंडलिनी प्रविष्ट होती है। श्रीकृष्ण के द्वारा कालियनाग के फनों को मसले जाने का अर्थ है कि कुंडलिनी ने मस्तिष्क की फालतू इच्छाओं और चिंताओं पर रोक लगा दी है, तथा अवचेतन मन में दबे पड़े वैचारिक कचरे की सफाई कर दी है। श्रीकृष्ण के द्वारा कालियनाग के सिर और पूँछ को एकसाथ पकड़े जाने का अर्थ है कि कुंडलिनी मूलाधार चक्र से सहस्रार चक्र तक पूरी सुषुम्ना नाड़ी में फैल गई है। मूलाधार से शक्ति लेकर कुंडलिनी सहस्रार में चमक रही है। ऐसा तब होता है जब तालु-जिह्वा के जोड़ या सहस्रार और मूलाधार का ध्यान एकसाथ किया जाता है। ऐसा करने से कालियनाग के पटके जाने का अर्थ है कि उससे दिमाग का फालतू शोर खत्म हो रहा है, जिससे आदमी शाश्वत आनन्द की ओर बढ़ रहा है। कालियनाग को जान से मारने का प्रयास करने का अर्थ है कि शरीर के तंत्रिका तंत्र को नियंत्रित रूप में ही काम करने देना है। कालियनाग का दुबारा यमुना में न प्रविष्ट होने का अर्थ है कि कुंडलिनी जागरण के बाद आदमी कभी आसक्तिपूर्ण व्यवहार नहीं करता।

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Kundalini is the manifestation of Lord Krishna who killed Mythological Kaliyanag in Yamuna river

Friends, yoga is a scientific method. Common people cannot understand it easily. They will practice it when they understand it. That is why the Puranas have been composed to facilitate the common public. Yoga has been explained in the Puranas as various mythic events and stories. Although being as mythological forms these stories are still theoretically true. This is so because these myths are classical and specially designed, as opposed to non classical or ordinary myths. Contrary to the thinking of some so-called modernists, they do not fall under the category of superstition. Many things cannot be said directly to avoid violations of social, personal and practical limitations, hence they have to be said as scientific myths. Yoga can be difficult to understand instantly. One has to adopt a Yogic or nondual lifestyle for a long time. That is why in Puranas, things related to yoga are presented as amusing mythology. This keeps these stories interesting for a man for a long time. With this, a man automatically becomes a yogi indirectly, and with a little extra effort, he can also become a perfect yogi if he gets a favorable situation. If everyone became a fulltime yogi together, then how would worldly work go. That is why yoga is molded as such scientific and pleasant stories, on which faith remains. Due to this, the man remains tied in the Yogic lifestyle at all times even while performing all the obligations of worldliness. One such famous story comes in the Shrimad Bhagwat Mahapuran, which describes the war between Lord Krishna and Kaliyanag. According to that legend, a huge snake named Kaliya who had hundreds of hoods lived on the island of Ramanak, with the fear of Garuda, the vehicle of Lord Vishnu. He was cursed by some saint that Lord Krishna will kill him and liberate him. Therefore, he came to the river Yamuna flowing near Vrindavan. The water of the Yamuna became poisonous due to its poison, killing the people, birds and animals around. Lord Krishna was playing ball with his grazer friends. Then his ball went into the water of Yamuna. Shri Krishna immediately leaped into the Yamuna. The next moment he was wrestling with Kaliynaag. After a lot of trouble, Shri Krishna climbed on the middle and biggest head of it. There he increased his weight and mashed his hoods. He grabbed his head and tail together and hit him here and there. In the end, he forced Kalyanag to give up. Then Kaliyanag’s wives came there and started asking Lord Krishna for his life. Srikrishna left him on the condition that he along with his family would leave the Yamuna and return to the island of Ramanak and would never enter the Yamuna again.

Kaliyanag is a symbol of the sushumna nadi or spinal cord, and Lord Shri Krishna is the symbol of Kundalini

In fact the structure of man resembles a serpent. The man’s software is made up of his central nervous system, which looks like a hood raising snake in shape. The brain and spinal cord come in it. The rest of the man’s body has been overlaid on this central nervous system. Sushumna channel runs in this central nervous system. Here the water of Yamuna river symbolizes the cerebrospinal fluid flowing around the spinal cord. Living in the island of Ramanak is a symbol of worldly indulgence. The word Ramanaka is derived from the Sanskrit word Ramanika or ramaneeya, meaning amusing. The fear of Garuda symbolizes the fear of saints. Saints do not go to the indulging places. It is seen that saints keep people away from unnecessary conflicts of worldliness. The curse of a monk means to show the right path to God by a gentleman. Saying about Kaliyanag being killed by Shri Krishna is a symbol of liberating him from the bondage of attachment. Shri Krishna sending him back to the island of Ramanak means that he should go in seclusion away from the innocent people of the world and spread poison of attachment there. Kaliyanag’s wives symbolize the ten senses. There are 5 work senses and 5 knowlege senses in them. These senses are said to be the wives of Kaliyanag because they become very powerful in the connection with the man attached to the world and become one with him. The poison of Kaliyanag signifies a attached lifestyle. It is the most powerful poison in the world. Due to this, man keeps dying in the cycle of birth and death again and again. The poison emanating from hundreds of hoods of Kaliyanag means that this attachment keeps on growing due to the hundreds of desires and worries that arise in the brain. Lord Krishna is the symbol of Kundalini here. His climb to the central hood of Kaliyanag means meditating Kundalini in the Sahasrara Chakra. Playing ball by Sri Krishna means Kundalini Yogasadhana. The ball is a symbol of pranayama here. Boy Krishna’s friend grazers symbolize various types of pranayamas and yogasanas. Breathing in and out denotes the ball going back and forth or up and down. The entry of the ball into the river means the entry of pranavayu into chakras. Sri Krishna’s leap into the river means that Kundalini also entered the chakras with pranavayu. Yamuna is the holy river in which Sri Krishna jumps. This means that the Kundalini enters only in the chakras consecrated by breathing. Mulling of the Kaliyanag by Sri Krishna means that Kundalini has curbed the mind’s unnecessary desires and concerns, and has cleaned up the ideological waste buried in the subconscious mind. The holding of Kaliyanag’s head and tail together by Sri Krishna means that the Kundalini has spread across the entire Sushumna channel from Muladhara Chakra to Sahasrara Chakra. Taking power from the Muladhar, Kundalini is shining in Sahasrara. This happens when the palate-tongue joint or Sahasrara and Muladhara are meditated together. By doing this, Kaliyanag’s banging means that the unnecessary noise of the brain is being eliminated, due to which man is moving towards eternal joy. To attempt to kill Kaliyanaag means to let the central nervous system of the body function in a controlled manner. Kaliyanag’s non-entry into the Yamuna again means that after Kundalini awakening, man never behaves indulgently.

Kundalini with Chakra balancing is the key to balanced life that leads to stress reduction itself

Friends, nowadays life has become very struggling and competitive. The intricacies of relationships have also increased a lot these days. It is natural for the burden to increase in the mind. Today we will discuss this and how to avoid it with the help of Kundalini.

Uncontrolled burden of mind is the root cause of most problems

The man’s uncontrolled burden of mind brings many behavioral changes in him. He becomes irritable and angry. This increases his stress. Increased stress reduces his ability to work, and he becomes a victim of various diseases. All these make his family, social and business life mess up. His breath also seems to stop, and also become irregular. This also causes a lack of oxygen in the body.

Chakra meditation helps reduce stress

Due to the non-utilization of all the chakras equally, the life force is not divided in equal quantity between all the chakras. Due to this the chakras which are excessively overpowered, they become adversely affected by the workload; And the chakras which get less life force than necessary also become adversely affected by not getting enough work. That is why it is said that yoga provides health benefits. In fact, with proper Kundalini yoga, all the chakras remain healthy and active. This makes life controlled and balanced. We have often seen that intellectuals working in the midst of nature have attractive personalities. Their lifestyle is balanced. This is the reason that their brain chakras are kept healthy by the work of the brain, and other chakras of the body by physical actions. If those people also do Kundalini Yoga, then they will also benefit, then how will urban people with lazy lifestyle not get.

Kundalini acts as a carrier of life force

Pranashakti is invisible. We cannot even experience it easily. Then how to rotate it on chakras. In fact, Kundalini acts as a handle for life force. Wherever Kundalini goes, Pranashakti goes there itself. That is why only the Kundalini is revolved on the chakras.

A practical recipe to reduce the unnecessary burden of mind

The tongue is held pressed lightly along the palate. Contact with the tongue and palate is taken into consideration. Let the movements of thoughts in the brain keep going, and also keep attention on them. Keep attention on the body’s front channel and back channel as well. If possible, keep awareness on all these together, otherwise shift the attention from one to another. By doing this, the Kundalini will suddenly appear in the brain, and other unnecessary thoughts will slow down. Kundalini will remain in the brain continuously with joy revolving on all the chakras too, and the unnecessary burden of the brain will also be reduced. One can imagine the back channel as a hood raising Sheshnag, on whose central line Kundalini runs. By taking long and deep breaths through the abdomen, Kundalini gets the additional power to walk in the channel. Even directly, Kundalini meditation can be focused on a particular chakra, and it can also be kept in mind that the life force will descend itself through the front channel from the brain to that chakra. With this, the brain power also reaches that chakra in a short time. With that, along with the spasm on the chakra and bliss the Kundalini begins to glow rapidly. The burden of the brain becomes lighter. It is as if the electric current reaches the target immediately in the form of electromagnetic waves, while the electrons take longer to reach.

Increasing appetite by drinking tea

It is often seen that drinking tea decreases appetite. This happens because tea makes the life force go to the brain. That is why after drinking tea, colorful thoughts start popping in the mind. This leads to loss of life force in the digestive system. Many times I brought down the increased life force of brain gained via tea through Kundalini Yoga, and set it especially on the navel chakra. It suddenly increased my appetite. Similarly Pranashakti can also be focused on other chakras. We can call it Tea Yoga. This proves that through Kundalini Yoga we can control many metabolic activities of our body.

कुंडलिनी के साथ चक्र-संतुलन संतुलित जीवन की कुंजी है, जिससे तनाव खुद ही घट जाता है

दोस्तों, आजकल जीवन बहुत संघर्षपूर्ण व स्पर्धात्मक हो गया है। रिश्तों की पेचीदगियां भी आजकल बहुत बढ़ गई हैं। ऐसे में दिमाग में बोझ का बढ़ जाना स्वाभाविक ही है। आज हम इस पर और कुंडलिनी की सहायता से इससे बचाव के ऊपर चर्चा करेंगे।

दिमाग का अनियंत्रित बोझ ही अधिकांश समस्याओं का मूल कारण है

दिमाग के अनियंत्रित बोझ से आदमी में बहुत से व्यावहारिक परिवर्तन आते हैं। वह चिड़चिड़ा व गुस्सैल बन जाता है। इससे उसका तनाव बढ़ जाता है। तनाव बढ़ने से उसकी कार्य करने की क्षमता घट जाती है, और वह विभिन्न रोगों का शिकार होने लग जाता है। इन सभी से उसका पारिवारिक, सामाजिक और व्यावसायिक जीवन गड़बड़ाने लग जाता है। उसकी साँसें भी रुकने सी लगती हैं, और अनियमित भी हो जाती हैं। इससे शरीर में ऑक्सीजन की कमी भी होने लगती है। 

चक्र साधना तनाव को कम करने में सहायक

सभी चक्रों का समान रूप से उपयोग न होने से प्राणशक्ति सभी चक्रों के बीच में बराबर मात्रा में विभक्त नहीँ हो पाती। इससे जिन चक्रों को जरूरत से ज्यादा प्राणशक्ति मिलती है, वे काम के बोझ से दुष्प्रभावित हो जाते हैं; और जिन चक्रों को जरूरत से कम प्राणशक्ति मिलती है, वे भी पर्याप्त काम न मिलने से दुष्प्रभावित हो जाते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि योग से स्वास्थ्य लाभ मिलता है। वास्तव में सही ढंग से किए जाने वाले कुंडलिनी योग से सभी चक्र स्वस्थ व क्रियाशील बने रहते हैं। इससे जीवन संयमित व संतुलित बन जाता है। हमने अक्सर देखा है कि प्रकृति के बीच में काम करने वाले बुद्धिजीवी लोग आकर्षक व्यक्तित्व वाले होते हैं। उनकी जीवनशैली संतुलित होती है। इसका यही कारण है कि दिमाग के काम से उनके मस्तिष्क के चक्र स्वस्थ रहते हैं, और शारीरिक कार्यों से शरीर के अन्य चक्र। यदि वैसे लोग भी कुंडलिनी योग करेंगे तो उन्हें भी लाभ होगा, फिर आलस्यपूर्ण जीवनशैली वाले शहरी लोगों को भला क्योंकर नहीं होगा।

कुंडलिनी प्राणशक्ति के वाहक के रूप में काम करती है

प्राणशक्ति तो अदृश्य होती है। उसे तो हम आसानी से अनुभव भी नहीं कर सकते। फिर उसे चक्रों पर कैसे घुमाया जाएगा। वास्तव में, कुंडलिनी प्राणशक्ति के लिए एक हैन्डल का काम करती है। जहाँ भी कुंडलिनी जाती है, प्राणशक्ति वहाँ खुद चली जाती है। इसीलिए चक्रों पर केवल कुंडलिनी को ही घुमाया जाता है।

दिमाग के अनावश्यक बोझ को एकदम से कम करने वाला एक व्यावहारिक नुस्खा

जीभ को तालु के साथ सटा कर रखा जाता है। जीभ और तालु के संपर्क को ध्यान में रखा जाता है। मस्तिष्क में विचारों की हलचलों को यथावत चलने दें, और उन पर भी ध्यान बना कर रखें। शरीर के फ्रंट चैनल और बैक चैनल पर भी ध्यान बना कर रखें। यदि संभव हो तो सभी पर एकसाथ ध्यान बनाएं, अन्यथा ध्यान को एक-दूसरे पर शिफ्ट करते रहें। ऐसा करने पर कुंडलिनी अचानक मस्तिष्क में प्रकट हो जाएगी, और अन्य फालतू विचार धीमे पड़ जाएंगे। कुंडलिनी सभी चक्रों पर घूमते हुए आनन्द के साथ लगातार मस्तिष्क में बनी रहेगी, और मस्तिष्क का अनावश्यक बोझ भी कम हो जाएगा। बैक चैनल की कल्पना एक फन उठाए हुए शेषनाग के रूप में कर सकते हैं, जिसकी केंद्रीय रेखा पर कुंडलिनी चलती है। पेट से लंबे और गहरे साँस लेने से भी कुंडलिनी को चैनेल में चलने की शक्ति प्राप्त होती है। सीधे भी कुंडलिनी ध्यान को किसी विशेष चक्र पर केंद्रित किया जा सकता है, और साथ में यह भी ध्यान में रखा जा सकता है कि मस्तिष्क से उस चक्र तक फ्रंट चैनल के माध्यम से प्राणशक्ति स्वयं नीचे उतर जाएगी। इससे थोड़ी देर में ही मस्तिष्क की प्राणशक्ति भी उस चक्र पर पहुंच जाती है। उससे चक्र पर ऐंठन के साथ और आनन्द के साथ कुंडलिनी तेजी से चमकने लगती है। मस्तिष्क का बोझ एकदम से हल्का हो जाता है। यह ऐसे ही होता है जैसे कि इलेक्ट्रिक करेंट विद्युतचुम्बकीय तरँग के रूप में एकदम से लक्ष्य पर पहुंच जाता है, जबकि इलेक्ट्रॉनों को पहुंचने में ज्यादा समय लगता है।

चाय पीकर भूख को बढ़ाना

अक्सर देखा जाता है कि चाय पीकर भूख घट जाती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि चाय से प्राणशक्ति मस्तिष्क को चली जाती है। तभी तो चाय पीने के बाद दिमाग में रंग-बिरंगे विचार उमड़ने लगते हैं। इससे पाचनतंत्र में प्राणशक्ति की कमी हो जाती है। कई बार मैंने चाय से दिमाग में बढ़ी हुई प्राणशक्ति को कुंडलिनी योग के माध्यम से नीचे उतारा, और उसे विशेषकर नाभि चक्र पर स्थापित किया। उससे मेरी भूख अचानक से बढ़ गई। इसी तरह प्राणशक्ति को अन्य चक्रों पर भी केंद्रित किया जा सकता है। इसे हम चाय योगा कह सकते हैं। इससे सिद्ध होता है कि हम कुण्डलिनी योग के माध्यम से अपने शरीर की बहुत सी चयापचय क्रियाओं को नियंत्रित कर सकते हैं।

भाई विनोद शर्मा द्वारा रचित कालजयी, भावपूर्ण व दिल को छूने वाली कुछ कविताएँ- भाग 3

मोक्ष नहीं मुझे लक्ष्य चाहिए

शुष्क कण्ठ की बनूं तरलता
  जटिल भूमि की बनूं सरलता
  उमड़-घुमड़ कर नभ पर छाए
  उस बादल का जल बन जाऊं।
  मोक्ष नहीं मुझे लक्ष्य चाहिए,
  जब भी मैं धरा पर आऊं।

  वीरों के माथे का चन्दन
  जग करता है जिसका वन्दन
  प्रस्फुटित हुआ है अंकुर जिसमें
  उस माटी का कण बन जाऊं।
  मोक्ष नहीं मुझे लक्ष्य चाहिए,
  जब भी मैं धरा पर आऊं।

  सुमन-सौरभ को बिखराता
  संतप्त (तप्त) हृदय को हर्षाता
  जो दग्ध वपु को कर दे शीतल
  वो समीर झोंका बन जाऊँ  मोक्ष नहीं मुझे लक्ष्य चाहिए,
  जब भी मैं धरा पर आऊं।

  सुलगाए साहस की ज्वाला
  झुलसाए आतंक का जाला
  बुझी आशा (आस) का दीप जलाए
  वो अग्नि-स्फुलिंग बन जाऊं।
  मोक्ष नहीं मुझे लक्ष्य चाहिए,
  जब भी मैं धरा पर आऊं।

  उज्ज्वल चन्द्र-सितारों वाला
  पर्वत की दीवारों वाला
  जिसके नीचे जीव सृजन हो
  उस नभ का हिस्सा बन जाऊं।
  मोक्ष नहीं मुझे लक्ष्य चाहिए
  जब भी मैं धरा पर आऊं।

  जन्म-मरण के बन्धन से
  उस दिन मुक्ति देना ईश्वर!
  पर-नयनों के अश्रु से
  जिस दिन द्रवित न होने पाऊं
  मोक्ष नहीं मुझे लक्ष्य चाहिए,
  जब भी मैं धरा पर आऊं। 

हकीकत में जिंदगी तो काँटों ने संवार दी

चाहत में हमने गुल की
उम्रें गुज़ार दी।
हकीक़त में ज़िन्दगी तो
कांटों ने संवार दी।
इल्ज़ाम क्यों दें वक्त को
हम चल न पाए साथ।
इसने दी गर ख़िज़ा तो
किसने बहार दी?

सब बन बैठे नाव खवैया

हवा चली ये कैसी भैया
कूद पड़े सब एक ही नैया
पता नहीं, पतवार चीज़ क्या?
सब बन बैठे नाव खवैया।
लय और ताल समझ न आई
नाच पड़े सब ता-ता थैया
आँख मूंद सब दौड़ लगाए
मन्ज़िल सबकी भूल-भूलैया।

पल में क्या हो? खबर नहीँ है
सबका एक ही नाच नचैया।

भाई विनोद शर्मा द्वारा रचित कालजयी, भावपूर्ण व दिल को छूने वाली कुछ कविताएँ- भाग 2

Kundalini-lingas including the Muladhar Chakra as the best one

Friends, Shiva Purana has focused most of the attention on Lord Shiva. Lord Shiva is considered to be the Kundalini in it. Throughout this Purana, there is an abundance of Lingas. When Shiva (Kundalini) is meditated on the linga, it becomes a Shivalinga or Kundalini-linga. Shivalinga is the axis of Shiv Purana, around which the whole Purana is revolving.

The symbol associated with Kundalini is called Kundalini Linga or Shivalinga

In fact, the symbol associated with the main object is called the linga or gender of that object. For example, the symbol of masculinity associated with male is called masculine gender and the symbol of femininity associated with woman is called feminine gender. Without linga, there may be some reduction in the main object, but it is not finished. If the signs of maleness in a male are eliminated, then there may be some decrease in the masculinity of man, but the man will remain the same. According to this, the lizard’s tail can also be called the lizard’s linga. When she drops it, it may cause her some difficulty in maintaining her balance, but the lizard remains the same. Similarly, the main object in spirituality is Kundalini. Kundalini gets additional strength by connecting it with the lingam in the form of symbol of any idol etc. If that symbol or lingam is removed, then there may be some decrease in Kundalini meditation, but the Kundalini still remains in the mind.

Kundalini yoga belongs to movable lingam

Shivpuran describes many types of lingas. The chara or movable linga is of special importance to the Kundalini Yogi. In this, the fundamental sensation has been considered as lingam. Different chakras of the body are the changed places of that lingam. That sensation evolves on the lower chakras, and rotates in a circular way through all the other chakras.

Our own body as the most permanent lingam

Other types of lingas are non movable. They also include lingas made of mountain or stone. Lingas made of mountain are permanent. Lingas made of stone are temporary. Lingam made of stone is better for women. Other types of lingas are subtle lingas. Mantra lingas are the main among them. Kundalini is meditated on the mantra. ॐ OM is also a perfect type of mantra linga. Subtle lingam is better known for ascetics. Mountains are called permanent lingas because they remain the same for millions of years. According to this, our own body proves to be the most permanent lingam, because it will continue to be available to us in every birth until we get liberation. It simply means that Kundalini yoga meditation is the best meditation. In fact, the second meaning of lingam is the experience of sensation, which we get with the help of different kinds of substances and feelings. Kundalini is superimposed over the same sensation. Because we get the most intense and sweet sensation from our own body, not from outside, therefore the Lingam inside the body is the best Lingam. This principle is the basic principle of Tantra Yoga. A book titled “Physiology Philosophy – A Modern Kundalini Tantra (A Yogi’s Love Story)” written in Hindi  is shown to prove this very strongly.