योग से शारीरिक वजन को कैसे नियंत्रण में रखें- How to keep control over body weight through Yoga

योग से शारीरिक वजन को कैसे नियंत्रण में रखें (please browse down or click here to view post in English)

योग के साथ शारीरिक वजन घटता है। यहां तक ​​कि मैंने देखा है कि एक दिन के भारी काम के साथ भी मुझे अपनी पेंट के साथ बेल्ट लगाने की जरूरत महसूस होने लगती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मैं दैनिक योग अभ्यास की आदत रखता हूं। जब मैंने कड़ी मेहनत की, तब उसके साथ किए गए नियमित योग-अभ्यास से मेरी भड़की हुई भूख बहुत कम हो गई। इसलिए उस कड़ी मेहनत के साथ हुई वसा-हानि / fat loss को पुनर्निर्मित / recover नहीं किया गया, जिसके परिणामस्वरूप मेरा वजन घट गया। नियमित योग-अभ्यास के बिना सामान्य लोग भारी काम के बाद बहुत अधिक खाते हैं, इस प्रकार वे अपनी खोई हुई वसा का तुरंत पुनर्निर्माण कर लेते हैं। योग-अभ्यास दैनिक और हमेशा के लिए जारी रखा जाना चाहिए। यदि कोई अपना अभ्यास थोड़े समय के लिए जारी रखता है, जैसे कि यदि 2 महीने के लिए कहें, तो उसे अपने शरीर के वजन में कमी का अनुभव होगा। लेकिन अगर वह उसके बाद व्यायाम करना बंद कर देता है, तो उसकी योग से निर्मित शारीरिक व मानसिक शक्ति के पास भूख को उत्तेजित करने के अलावा अन्य कोई काम नहीं रहता है। इसके कारण उसे बहुत भूख लगती है, और वह बहुत भोजन, खासतौर से उच्च ऊर्जा वाले खाद्य पदार्थों को खाता है। इसके परिणामस्वरूप उसके शरीर की वसा का पर्याप्त निर्माण हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप उसके शरीर के वजन में एकाएक वृद्धि होती है, जो उसके पहले के मूल वजन को भी पार कर सकती है। तो निरंतर अभ्यास हमेशा जारी रखा जाना चाहिए। यह एक वैज्ञानिक और अनुभव से साबित तथ्य है कि खिंचाव वाली कसरतों / stretching exercises के अभ्यास से थोड़ी-बहुत कैलोरी जल जाती है। यद्यपि योग के अभ्यास से बड़ी मात्रा में कैलोरी जलाई नहीं जाती है, फिर भी ये अभ्यास शरीर को फिट, स्वस्थ और लचीला रखते हैं। यह किसी भी समय किसी भी प्रकार के साधारण या कठिन शारीरिक कार्य को कामयाबी व आसानी के साथ शुरू करने में मदद करता है, और व्यायामशाला के अभ्यास को भी अधिक कारगर बनाता है। इसके अलावा, यह पूरे शरीर में उचित अनुपात में रक्त के समान परिसंचरण में भी मदद करता है। इससे यह शरीर के रिमोट भंडारगृहों में जमा वसा की आसान निकासी में मदद करता है। उससे सभी कोशिकाओं को ऊर्जा के मुख्य स्रोत के रूप में वसा उपलब्ध हो जाती है। इसलिए शरीर भूख की कमी के लिए ऊर्जा की कमी का संदेश नहीं भेजता है, जिसके परिणामस्वरूप भारी भूख के बावजूद भारी भूख की रोकथाम होती है। परंतु आम लोगों में भारी काम के एकदम बाद भारी भूख भड़क जाती है, जिससे वे अपने खोए हुए वजन की भरपाई एकदम से कर लेते हैं। योग कुछ खास नहीं है, बल्कि भौतिक व्यायाम, सांस लेने और केंद्रित एकाग्रता को बढ़ाने का एक सहक्रियात्मक संयोजन है। फोकसड एकाग्रता / focused concentration इसके लिए विचारों के लिए नियंत्रक वाल्व / controlling valve के रूप में काम करती है, अराजक विचारों की अचानक भीड़ को रोकती है, जिससे इस प्रकार पेरानोइया/ paranoia और दिमाग को झूलने / mind swinging से रोकती है। जब अवचेतन मन में संचित विचार बहुत उत्तेजित हो जाते हैं, तो उन्हें दिमाग के अंदर ध्यान की केंद्रित छवि द्वारा धीरे-धीरे और सुरक्षित रूप से मुक्त करके छोड़ा जाता रहता है। साथ में, उन विचारों को बाँझ और गैर-हानिकारक बना दिया जाता है, या दूसरे शब्दों में कहें तो दृढ़ता से उत्तेजित विचार ध्यान की कुण्डलिनी छवि की कंपनी के कारण स्वयं ही शुद्ध हो जाते हैं। यह छवि दिन-प्रतिदिन की सांसारिक गतिविधियों से उत्पन्न होने वाली अराजक मानसिक गतिविधियों पर भी जांच रखती है। इसके कारण योग-अभ्यास के लिए एक जुनूनी शौक सा उत्पन्न हो जाता है, और इसे दैनिक कार्यक्रम से कभी भी गायब नहीं होने देता है। कुंडलिनी छवि पर केन्द्रित एकाग्रता के बिना योग-अभ्यास के साथ, योग अभ्यास के लिए शौक जल्द ही खो जाता है, और विभिन्न छिपे हुए विचारों की अराजकता की वजह से दैनिक क्रियाकलाप भी गंभीर रूप से पीड़ित हो जाते हैं।

तांत्रिक तकनीक मानसिक कुंडलिनी छवि को मजबूत करने और इस तरह से योग के प्रति लगन को बढ़ाने के लिए एक और गूढ़ चाल है। इसके परिणामस्वरूप पूरे श्वास में वृद्धि होती है, जिससे पूरे शरीर में पोषक तत्वों से समृद्ध और अच्छी तरह से ऑक्सीजनयुक्त रक्त की आपूर्ति में वृद्धि हो जाती है। इससे यह शरीर के वजन पर भी जांच रखता है। दरअसल तंत्र प्राचीन भारतीय आध्यात्मिकता से अलग कोई स्वतंत्र रूप का अनुशासन नहीं है। तभी तो वेद-शास्त्रों में इसका कम ही वर्णन आता है, जिससे इस रहस्य से अनभिज्ञ लोग महान तंत्र की सत्ता को ही नकारने लगते हैं। यह आत्मजागृति की ओर एक प्राकृतिक और सहज दौड़ / प्रक्रिया ही है। यह तो केवल विभिन्न आध्यात्मिक प्रयासों से पुष्ट की गई कुण्डलिनी को जागरण के लिए अंतिम छलांग / escape velocity ही देता है। यदि किसी की बुद्धि के भीतर कोई आध्यात्मिक उद्देश्य और आध्यात्मिक उपलब्धि नहीं है, तो अराजक बाहरी दुनिया के अंदर उपयोग में आ जाने के अलावा तांत्रिक शक्ति के लिए अन्य कोई रास्ता नहीं है। इसका मतलब है कि तांत्रिक तकनीक के लिए आवेदन से पहले कुंडलिनी छवि किसी के दिमाग में पर्याप्त रूप से मजबूत होनी चाहिए। तंत्र तो जागने के लिए कुंडलिनी को आवश्यक और अंतिम भागने की गति ही प्रदान करता है। यह आम बात भी सच है कि गुरु तांत्रिक साधना के साथ अवश्य होना चाहिए। वह गुरु दृढ़ता से चिपकने वाली मानसिक कुंडलिनी छवि के अलावा कुछ विशेष नहीं है। यही कारण है कि बौद्ध-ध्यान में, कई वर्षों के सरल सांद्रता-ध्यान के बाद ही एक योगी को तांत्रिक साधना लेने की अनुमति दी जाती है। लेकिन आज बौद्ध लोग, विषेशतः तिब्बती बुद्ध तंत्र सहित सभी रहस्यों को प्रकट करने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि अब वे लंबे समय से चल रहे बाहरी आक्रमण के कारण अपनी समृद्ध आध्यात्मिक विरासत को खोने से डर रहे हैं।

तंत्र के बारे में विस्तृत जानकारी इस वेबपोस्ट की स्रोत वेबसाईट / source website पर पढ़ी जा सकती है, व पूर्ण जानकारी के लिए निम्नांकित पुस्तक का समर्थन किया जाता है-

शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा), एक अनुपम ई-पुस्तक (हिंदी भाषा में, 5 स्टार प्राप्त, सर्वश्रेष्ठ व सर्वपठनीय उत्कृष्ट / अत्युत्तम / अनौखीरूप में समीक्षित / रिव्यूड ) को यहाँ क्लिक करके डाऊनलोड करें। यदि मुद्रित पुस्तक ही आपके अनुकूल है, तो भी, क्योंकि इलेक्ट्रोनिक डीवाईसिस / फोन आदि पर पुस्तक का निरीक्षण करने के उपरांत ही उसका मुद्रित-रूप / print version मंगवाना चाहिए, जो इस पुस्तक के लिए इस लिंक पर उपलब्ध है। धन्यवाद।

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How to keep control over body weight through Yoga

Body weight decreases with yoga. Even I have noticed my pent becoming lose at waist even with one day of heavy physical work. This occurs because I am habitual of daily yoga practice. When I worked hard, routine yoga exercise along with that depressed my appetite due to my too tiredness. So fat loss with that hard work was not rebuilt up, which resulted in my weight loss. Ordinary people without routine yoga practice eat a lot after heavy work thus rebuilding up their lost fat immediately. Yogic exercises should be continued daily and forever. If anyone continues his exercises for short time, say for 2 months, then he would experience reduction in his body weight. But if he stops exercising after that, then his built up stamina has no way to work other than to provoke the voracious appetite. Due to this he becomes too hungry and eats foods especially high energy foods abundantly. This results in substantial build up of his body fat which results in his body weight gain again that can surpass even his earlier basic body weight. So exercises continued should be kept continued always. It is a scientifically and experientially proven fact that hathyogic stretching exercises burn down a moderate amount of calories. Although stretching type yoga exercises don’t burn major amount of calories yet these exercises keep body fit, healthy, active and flexible. This helps in undertaking of any type of simple or hard physical work at any time successfully and with ease, also making gym exercises more effective. Also, it also helps in uniform circulation of blood throughout the entire body in appropriate proportions. This helps in easy withdrawal of fat deposited in the remote storehouses of the body. This in turn makes that fat available to all the body cells as the main source of energy. Therefore body doesn’t send the message of energy shortage to the appetite centre, that results in inhibition of voracious appetite just as seen commonly after a heavy work. Yoga is nothing special but a synergistic combination of stretching exercises, breathing and focused concentration. Focused concentration works as a controller valve for thoughts for it prevents sudden rush of chaotic thoughts thus preventing build up of paranoia and mind swinging. When accumulated thoughts in subconscious mind becomes too agitated then those are made to be released slowly and safely by the meditatively focused image inside the mind. Those thoughts are made sterile and non harmful or in other words get purified due to company of that strongly shimmering meditative image. That image also keeps check over the chaotic mental activities arising out of day to day worldly activities. Due to this an interest is generated inside the yoga practice and it is never missed out of daily schedule. With yoga exercises without the focused concentration on a kundalini image, interest for yoga exercises is lost soon and daily schedule severally suffers due to the chaotic rush of various hidden thoughts.

Tantric technique is another trick to reinforce the mental kundalini image and thus to enhance up the yoga-interest. It also results in enhanced breathing thus profuse supply of nutrient rich and well oxygenated blood to the entire body. This also puts a check over body weight. Actually tantra is not a separate discipline at its own independent of the ancient Indian spiritualism. It is a natural and spontaneous run / process towards the awakening. It only reinforces the spiritual efforts as a final or leaping step to awakening. If there is no spiritual motive and spiritual achievement inside one’s intellect, then there is no way for tantric power to go other than to become used up inside the chaotic external world. It means that kundalini image should be enough strong inside one’s mind prior to the application of tantric technique. Tantra provides the required and final escape velocity to kundalini to awakening. This is true for the common saying that Guru must be there with tantric sadhna. That guru is nothing other than the firmly affixed mental kundalini image. This is the reason why in Buddhist meditation, a yogi is allowed to take over the tantric sadhna after spending many years of simple concentrating meditation. But today Buddhists especially Tibetan Buddhists are trying to reveal all the secrets including the tantra to the world for they are afraid of losing for ever their rich spiritual heritage due to the long persisting external invasion.

You can learn about tantra in detail at the parent website of this web post, and for full detail following book is recommended-

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Importance of Body Chakras in Kundalini Yoga – A Scientific Discussion / कुण्डलिनीयोग में शारीरिक चक्रों का महत्त्व- एक वैज्ञानिक विवेचना

Importance of Body Chakras in Kundalini Yoga – A Scientific Discussion

Giving the importance of equality to all the chakras in the Kundalini Yoga during everyday life, Kundalini visualization / visualization is done on all the chakras turn by turn. Its advantage is that in some parts of the body the Kundalini comes into the grip. In fact, the Kundalini is associated with the chakras / parts of the body. When the activity of a chakra increases, then the blissful expression of the Kundalini, which is being visualized there upon, also increases. The activity of the body depends solely on physical blood circulation. When blood circulation increases on a chakra, then the activity of that chakra also increases. The total blood circulation of the body remains the same, only in different parts it keeps on changing only. If blood circulation increases on one chakra, then it is naturally decreased on any other chakra. By brain work, blood circulation increases in the brain, so during that time the Kundalini-visualization in the brain-chakra / Agya chakra is very simple and successful. Speech, writing, reading, colloquial etc. increases the circulation in the throat, thereby making the Kundalini’s visualization simple and effective on there / in the throat chakra / Vishuddhi chakra. When the feeling of emotions in mind increases the blood circulation in the heart, then due to visualization in the heart centre / heart chakra / Anahata Chakra, the Kundalini becomes more ignited. When the digestive tract is powerful, then there is increased blood circulation in the abdomen / naval area. Therefore visualization in naval chakra / Manipura Chakra at that time is of greater benefit. The effectiveness of sexually energizing sexual activity, the proper health of the waste-emitting organs and other physical (especially hands and feet related) actions increases the blood circulation on the sexual chakras / swadhishthana and muladhara chakra, therefore there is more activity in the Kundalini. That is why at that time those two chakras seem to get more attention.

In the household life, especially in duality and ignorance, all chakras cannot be functioning simultaneously and in common, because sometimes the tasks related to a particular area have to be emphasized, then sometimes tasks related to any other area. Therefore, in a single sitting of Kundalini Yoga, visualization of Kundalini is done on all the chakras turn by turn. Then the influential chakra itself comes under the purview of visualization, which has a greater sense of visualization-benefit. By this, visualization-gains gradually become accumulated in Kundalini Jagran / awakening. On the contrary, there is no cosmic responsibility for the ascetic-yogi or devoted yogi, so that he can easily keep stirring the activity for a long time on a particular chakra. Therefore, it is said that visualization should be done on the same chakra for a long time and then should move towards the next chakra, it has been said only for such a dedicated yogi. He is saved by a slight loss of visualization caused by chakra-change, nothing special. By continuously meditating on the same chakra, it can increase blood circulation to that chakra for a long time, because visualization on any part of the body increases blood pressures there itself. This is also the principle of spiritual healing. When someone entangled in the worldly life, by leaving his chakra, which is actively working with its naturalness, takes a forceful attention on any other chakra, then according to that need, the blood of the functioning chakra runs towards that chaotic chakra. From that necessity, the natural function of the functioning chakra will be affected by it less or more. Therefore, in the Yogasadhana / meditation-sitting under such busy worldly circumstances, the dhyana / attention should be applied on the same chakra which is easily or spontaneously meditative. Do not be forced to coax with other dormant chakras. By the way, by keeping the attention of all the chakras in the same way, all parts of the body are equally healthy; Life becomes balanced and moves forward in every field. By focusing continuously on a particular chakra, specializations can be gained quickly in the related areas of that chakra, although life can become unbalanced, and the health of the areas related to other body chakras can be questioned.

This type of perfect physical and mental balance becomes available from the advaita / non duality of Puranas / Aryan personified natural stories and through the Advaita obtained from the physiology / body science philosophy. This is because, because of non duality all things look alike, and there is no special attachment to a particular area. From this, the person meditates on all parts of his individual body as well as on the universal body, because the worldly creation (related to the world) and the individual creation (body-related) are both interconnected according to “yatpinde tatbramhaande”. The control over one is reflected itself as the control over the second one too in the same manner and same extent. From this non duality practice also, kundalini develops itself gradually and with less special efforts.

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कुण्डलिनीयोग में शारीरिक चक्रों का महत्त्व- एक वैज्ञानिक विवेचना

प्रतिदिन के लौकिक जीवन के दौरान जो कुण्डलिनीयोग किया जाता है, उसमें सभी चक्रों को बराबरी का महत्त्व देते हुए सभी चक्रों पर बारी-२ से कुण्डलिनी का ध्यान किया जाता है। इसका यह फ़ायदा होता है कि शरीर के किसी न किसी भाग में कुण्डलिनी पकड़ में आ ही जाती है। वास्तव में कुण्डलिनी शरीर के चक्रों / भागों से जुड़ी होती है। जब किसी चक्र की क्रियाशीलता बढ़ती है, तब उस पर ध्यायित की जाने वाली कुण्डलिनी की आनंदमयी अभिव्यक्ति भी बढ़ जाती है। शरीर की क्रियाशीलता शारीरिक रक्तसंचार पर ही तो निर्भर करती है। जब किसी चक्र पर रक्तसंचार बढ़ जाता है, तब उस चक्र की क्रियाशीलता भी बढ़ जाती है। शरीर का कुल रक्तसंचार तो एकसमान ही रहता है, केवल विभिन्न भागों में उसकी मात्रा घटती-बढ़ती रहती है। यदि एक चक्र पर रक्तसंचार बढ़ता है, तो किसी दूसरे चक्र पर स्वाभाविक रूप से घट जाता है। दिमागी कार्य से दिमाग में रक्तसंचार बढ़ जाता है, अतः उसके दौरान मस्तिष्क-चक्र / आज्ञा चक्र में कुण्डलिनी-ध्यान अधिक सरल व सफल होता है। भाषण, लेखन, पठन, बोलचाल आदि से गले में रक्तसंचार बढ़ जाता है, जिससे वहां / ग्रीवाचक्र / विशुद्धिचक्र पर कुण्डलिनी का ध्यान सरल व प्रभावशाली हो जाता है। मन में भावनाओं के उमड़ने के समय ह्रदय में रक्तसंचार बढ़ जाता है, जिससे उस समय हृदयक्षेत्र / हृदयचक्र / अनाहत चक्र में ध्यान करने से कुण्डलिनी अधिक प्रज्वलित हो जाती है। जब पाचनक्रिया शक्तिशाली होती है, तब उदरक्षेत्र / नाभिक्षेत्र में रक्तसंचार बढ़ा हुआ होता है। इसलिए उस समय नाभिचक्र / मणिपुरचक्र में ध्यान करने से अधिक लाभ होता है। यौनशक्तिवर्धक यौनक्रियाशीलता से, अपशिष्ट-उत्सर्जक अंगों के उत्तम स्वास्थ्य से व अन्य शारीरिक (विशेषतः हस्तपादाश्रित) कर्मों से यौनचक्र / स्वाधिष्ठानचक्र व मूलाधार चक्र पर रक्तसंचार बढ़ा हुआ होता है, अतः वहां पर कुण्डलिनी अधिक क्रियाशील होती है। इसलिए उस समय उन दोनों चक्रों पर अधिक अच्छी तरह से ध्यान लगता है।

गृहस्थजीवन में, विशेषतः द्वैत व अज्ञान से भरे गृहस्थजीवन में सभी चक्र एकसाथ व एकसमान रूप से क्रियाशील नहीं रह सकते, क्योंकि कभी किसी क्षेत्र से सम्बंधित कार्यों पर अधिक जोर देना पड़ता है, तो कभी किसी अन्य क्षेत्र से सम्बंधित कार्यों पर। इसलिए कुण्डलिनीयोग की एक अकेली बैठक में सभी चक्रों पर बारी-२ से कुण्डलिनी का ध्यान किया जाता है। उससे प्रभावशाली चक्र स्वयं ही ध्यान के दायरे में आ जाता है, जिससे ध्यान-लाभ की अधिक अनुभूति होती है। इससे ध्यान-लाभ धीरे-२ इकट्ठा होता हुआ कुण्डलिनीजागरण में परिणत हो जाता है। इसके विपरीत संन्यासी-योगी या समर्पित योगी के लिए कोई लौकिक उत्तरदायित्व नहीं होता, जिससे वह एक विशेष चक्र पर लम्बे समय तक क्रियाशीलता को आसानी से बना कर रख सकता है। इसलिए जो यह कहा गया है कि एक ही चक्र पर लम्बे समय तक ध्यान करके उसे जगा देना चाहिए और फिर अगले चक्र की ओर रुख करना चाहिए, वह ऐसे ही समर्पित योगी के लिए ही कहा गया है। वह चक्र-बदलाव से उत्पन्न थोड़ी सी ध्यान-हानि से बच जाता है, अन्य विशेष कुछ नहीं। वह एक ही चक्र पर निरंतर ध्यान लगा कर वहां पर रक्तसंचार को लम्बे समय तक बढ़ा कर रख सकता है, क्योंकि शरीर के किसी भाग पर ध्यान लगाने से वहां पर रक्तसंचार स्वयं ही बढ़ जाता है। यही स्पिरिचुअल हीलिंग / आध्यात्मिक उपचार का सिद्धांत भी है। जब सांसारिकता में उलझा हुआ कोई व्यक्ति स्वाभाविकता से क्रियाशील अपने चक्र को छोड़कर किसी अन्य चक्र पर जोर-जबरदस्ती से ध्यान लगाता है, तब उस आवश्यकतानुसार क्रियाशील चक्र का रक्त उस ध्यायित किए जा रहे चक्र की ओर दौड़ पड़ता है। उससे उस आवश्यकतानुसार क्रियाशील चक्र के स्वाभाविक कार्य तो कम या अधिक रूप से दुष्प्रभावित होंगे ही। इसलिए वैसी व्यस्ततापूर्ण सांसारिक परिस्थितियों के अंतर्गत की जाने वाली योगसाधना-बैठक में जिस चक्र पर ध्यान आसानी से या स्वयं ही लग रहा हो, वहीँ पर लगने देना चाहिए। अन्य सुप्त चक्रों के साथ अधिक जोर-जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए। वैसे तो सभी चक्रों पर समान रूप से ध्यान देने से ही शरीर के सभी अंग समान रूप से स्वस्थ रहते हैं; जीवन संतुलित बनता है और हरेक क्षेत्र में आगे बढ़ता है। एक विशेष चक्र पर ही निरंतर ध्यान देने से उस चक्र से सम्बंधित क्षेत्रों में शीघ्रता से विशेषज्ञता तो प्राप्त हो सकती है, यद्यपि उससे जीवन असंतुलित बन सकता है, और शरीर के अन्य चक्रों से सम्बंधित क्षेत्रों के स्वास्थ्य पर प्रश्नचिन्ह लग सकता है। अद्वैतमय जीवन से भी कुण्डलिनी स्वयं ही व बिना किसी विशेष प्रयास के धीरे-२ विकसित होने लगती है।

इस प्रकार का उत्तम शारीरिक व मानसिक संतुलन पुराणों से व शरीरविज्ञान दर्शन से प्राप्त अद्वैतभाव से भी उपलब्ध हो जाता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि अद्वैतभाव से सभी कुछ समान जैसा लगता है, और किसी विशेष क्षेत्र से विशेष लगाव या आसक्ति नहीं रहती। इससे व्यक्ति व्यष्टि और समष्टि के सभी अंगों पर समान रूप से ध्यान देता है, क्योंकि समष्टि (विश्व-सम्बंधित) व व्यष्टि (शरीर-सम्बंधित), दोनों आपस में जुड़े हुए हैं, “यतपिण्डे तत ब्रम्हांडे” के अनुसार। एक के भी नियंत्रण से दूसरा स्वयं ही उसी के अनुसार नियंत्रित हो जाता है।

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On the holy occasion of Gandhi anniversary / गांधी जयंती के पावन अवसर पर

Mr. M.K. Gandhi, a peaceful Indian freedom fighter was a man of practicality, not mere that of a theory. Whatever he said in his life, he proved all that practically. He translated and explained the Geeta, a Hindu sacred text, practically while he was there inside a prison. The compilation arose in the form of a book named as “Anasakti Yoga” in Hindi. He has described in that the scientific and practical meaning of the teachings of Geeta.Therein he has given full stress on the unattached attitude of living a fully functional and practical human life. He has uncovered this deep secret lying inside Geeta. Although I haven’t read that fully myself but I have read that’s modern and Tantric variety in the name of book “Shareervigyan darshan- ek aadhunik kundalini tantra (ek yogi ki premkatha)” by Premyogi vajra in Hindi. Premyogi vajra has proved scientifically that everything including every religion and philosophy exist there inside our own human body. Although there is total environment of unattached / nondual attitude there inside this micro society against the duality / attachment filled environment in our so famous day to day macro society. He has utilized the health science related knowledge fully to unveil this secret. As a result, the book appears resembling a Hindu Purana although in a more comprehensible, scientific and widely acceptable way comparatively. The full information of this book is available here at the webpage-
It’s also the birth anniversary of Mr. Laal bahaadur shaastri, the second prime minister of Independent India today, therefore salute to both of these great men.
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श्री मोहनदास कर्मचंद गांधी, एक शांतिपूर्ण भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और व्यावहारिकता से भरे हुए आदमी थे, न कि केवल एक सिद्धांतवादी। जो कुछ भी उन्होंने अपने जीवन में कहा, उसे व्यावहारिक रूप से साबित करके भी दिखाया। उन्होंने गीता का सरलीकृत अनुवाद तब किया, जब वे जेल में थे। वह संकलन हिंदी में “अनासक्ति योग” नामक पुस्तक के रूप में उभरा। उन्होंने गीता की शिक्षाओं को वैज्ञानिक और व्यावहारिक अर्थ में वर्णित किया है। उन्होंने इसमें पूरी तरह कार्यात्मक व व्यावहारिक मानव जीवन जीने के साथ अनासक्तिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाने पर पूरा जोर दिया है। उन्होंने गीता के अंदर बसने वाले इस गहरे रहस्य को उजागर किया है। यद्यपि मैंने इसे स्वयं विस्तार से नहीं पढ़ा है, केवल इसकी प्रस्तावना ही पढ़ी है, लेकिन मैंने प्रेमयोगी वज्र द्वारा “शरीरविज्ञान दर्शन-एक आधुनिक कुंडलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)” नामक किताब को अच्छी तरह से पढ़ा है, जो उपरोक्त पुस्तक का आधुनिक व तांत्रिक रूपान्तर ही प्रतीत होती है। प्रेमयोगी वज्र ने वैज्ञानिक रूप से साबित कर दिया है कि हर धर्म और दर्शन सहित सब कुछ हमारे अपने मानव शरीर के अंदर बसा हुआ है। यद्यपि इस सूक्ष्म शरीर-समाज के भीतर हमारी रोजमर्रा की मैक्रो सोसाइटी/स्थूल समाज के विपरीत पूर्ण अनासक्ति व अद्वैत का वातावरण विद्यमान है। इस रहस्य का अनावरण करने के लिए उन्होंने स्वास्थ्य विज्ञान से संबंधित ज्ञान का भी पूरी तरह से उपयोग किया है। नतीजतन, पुस्तक एक हिंदु-पुराण जैसी दिखती है, हालांकि तुलनात्मक रूप से एक अधिक समझपूर्ण, वैज्ञानिक, व्यापक व सर्वस्वीकार्य तरीके से। इस पुस्तक की सम्पूर्ण जानकारी यहां निम्नोक्त वेबपृष्ठ पर उपलब्ध है-
आज स्वतंत्र भारत के द्वितीय प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी का जन्मदिवस भी है, इसलिए इन दोनों महापुरुषों को कोटि-2 नमन।
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Kundalini versus Hypnotism/कुंडलिनी एक सम्मोहक

Kundalini/kundalini yoga is the best preventive measure and antidote for the effect of hypnotism. We think that hypnotism is a special thing, but it’s not so. All of us are hypnotizers to little or more extent. When some one is trying to become over influential among others, actually he is hypnotizing others unknowingly. In this way, all great leaders, rulers, artists etc. all are hypnotizers. Positive hypnotism leads to progress but negative hypnotism leads to downfall. Positive hypnotism means that hypnotizer is positively oriented and leads to positivity inside the hypnotized beings too. Negative hypnotism is just the reverse of it. Actually kundalini is also a positive hypnotizer and Kundalini yoga is an artificial means to amplify it. Kundalini is the mental image of a positively hypnotizing being/guru/devata/god/lover/consort inside one’s mind/brain. Therefore kundalini doesn’t allow the mental image of different street hypnotizers to occupy one’s brain for that kundalini has already occupied most of the space inside the brain of a kundalini yogi keeping no space vacant for the others/negative hypnotizers. Nondual hypnotizers like qualified guru or diety or god produces spiritual as well as material progress. Beings having uncontrolled and duality filled mind produce mostly downfall in both of these. Five Ms of tantra produce enhanced hypnotizing effect of any being. So, if used properly and under guidance, they produce very strong positive hypnotism otherwise negative one. The improper use of 5 Ms of tantra resulted into the defamation of tantra, the real science of mind/spiritualism. Religious extremism/terrorism is one of the best example of this misuse. If we take it in a positive way, stray hypnotisms give a tough competition to kundalini, so kundalini becomes more and more stronger.

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कुंडलिनी/कुंडलिनी योग सम्मोहन से बचाने वाली सबसे अच्छी युक्ति है। हम सोचते हैं कि सम्मोहन एक विशेष चीज है, पर ऐसा नहीं है। वास्तव में हम सभी एक-दूसरे को कम-अधिक मात्रा में सम्मोहित करते रहते हैं। जब कोई व्यक्ति दूसरों के बीच में अधिक ही प्रभावशाली बनने का प्रयत्न करता है, तब वह वास्तव में अनजाने में ही दूसरों को सम्मोहित कर रहा होता है। इस तरह से सभी महान नेता, शासक, कलाकार, धर्म गुरु आदि सम्मोहनकर्ता ही हैं। सकारात्मक सम्मोहन उन्नति की ओर ले जाता है, परंतु नकारात्मक सम्मोहन पतन की ओर। सकारात्मक सम्मोहन का अर्थ है कि सम्मोहनकर्ता सकारात्मक मानसिकता वाला है, जिससे वह अपने द्वारा सम्मोहित लोगों में भी सकारात्मकता भर देता है। नकारात्मक सम्मोहन इसके ठीक विपरीत होता है। वास्तव में कुण्डलिनी भी एक सकारात्मक सम्मोहक है, और कुण्डलिनी योग उसकी सम्मोहकता को बढ़ाने वाला एक अर्धकृत्रिम उपाय। कुण्डलिनी एक सकारात्मक सम्मोहनकर्ता/योग्य गुरु/देवता/प्रेमी/यौनप्रेमी का मन/मस्तिष्क में बना हुआ एक प्रगाढ़ चित्र ही है। इसलिए वह कुण्डलिनी चित्र इधर-उधर के सम्मोहनकर्ताओं के चित्रों को मन में घुसने नहीं देता, क्योंकि उस कुण्डलिनी ने पहले ही मन-मस्तिष्क की अधिकांश खाली जगह को भरा होता है, अतः नए चित्र के लिए स्थान ही नहीं बचता। अद्वैतमयी सम्मोहनकर्ता, जैसे कि गुणवान गुरु या इष्ट या देवता , आध्यात्मिक व भौतिक, दोनों प्रकार की उन्नति करवाते हैं। परंतु जिन सम्मोहनकर्ताओं का मन अनियंत्रित, अमानवीय व द्वैतपूर्ण है, वे ज्यादातर पतन ही करवाते हैं। तन्त्र के पंचमकार किसी व्यक्ति की सम्मोहकता में अत्यधिक वृद्धि करते हैं। इसलिए यदि ये ढंग से व उचित दिशा निर्देशन में प्रयोग किए जाएं, तब ये बहुत बलवान व सकारात्मक सम्मोहकता को उत्पन्न करते हैं, अन्यथा केवल नकारात्मक। इन पंचमकारों के दुरुपयोग से ही वह तंत्र दुनिया में बदनाम हुआ है, वास्तव में जो मन/आध्यात्मिकता का वास्तविक विज्ञान है। धार्मिक अतिकट्टरता/आतंकवाद इस दुरुपयोग का एक अच्छा उदाहरण है। यदि इसे सकारात्मक रूप में लें, तो इधर-उधर के सम्मोहन कुण्डलिनी को कड़ा मुकाबला देते हैं, जिससे कुण्डलिनी मजबूत होती रहती है।

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In honor of Ganesha parva/chaturthi (गणेश पर्व/चतुर्थी के सम्मान में)

Ganesh is not only an idol, but also a very good Kundalini carrier. Actually, mental Kundalini is worshipped indirectly through superimposing her over the physical structure of an idol. Otherwise how can a mental image be worshipped that is inseparable from the own self of the worshipper for one can worship the separately existing other thing only, not his own self. In this way, God Ganesha’s physical structure is simplest, semi real and non judgemental that’s why it doesn’t interfere with the process of focusing one’s mental image over it. On the other hand, too attractive/comparatively fully real idol-structures of other gods may interfere with this process little or more specially in case of an unaccustomed and novice kundalini meditator. Ganesha idol is an intermediary link between nonliving god-symbols (stone etc.) and fully personified god-statues/idols, thus having properties of both of these intermixed together. It is the Link between inanimate vedic deity symbols and full fledged personified gods of later history. His head of elephant is there only to replace that with the head of personified mental kundalini.

गणेश केवलमात्र एक मूर्ति नहीं है, अपितु एक सर्वोत्तम कुण्डलिनी वाहक भी है। वास्तव में कुण्डलिनी की  पूजा अप्रत्यक्ष रूप से, उसे देव-मूर्ति के ऊपर आरोपित करके की जाती है। नहीं तो मानसिक कुण्डलिनी की पूजा कैसे की जा सकती है, क्योंकि किसी दूसरी व बाहरी वस्तु की ही पूजा की जा सकती है, अपने आप की (मानसिक कुण्डलिनी के रूप में अभिव्यक्त) नहीं। इस मामले में, भगवान गणेश की सर्वसाधारण, कम वास्तविक व निष्पक्ष मूर्ति सर्वोत्तम प्रतीत होती है, क्योंकि वह अपने ऊपर कुण्डलिनी का आरोपण करवाने की ध्यानात्मक प्रक्रिया में अधिक व्यवधान उत्पन्न नहीं करती। दूसरी ओर अन्य देवी-देवताओं की आकर्षक व अपेक्षाकृत रूप से अधिक वास्तविक मूर्तियां उस प्रक्रिया के दौरान अपने प्रति आकर्षण पैदा करके, उस प्रक्रिया में व्यवधान उत्पन्न कर सकती हैं, विशेषकर के असहज व नए-नवेले कुण्डलिनी साधक के मामले में। गणेश की मूर्ति जड़ देव-प्रतिमाओं (पत्थर आदि) व पूर्णतः मनुष्याकृत देव-मूर्तियों के बीच की कड़ी है, अतः यह दोनों ही प्रकार की मूर्तियों के गुणों को अपने अंदर समाहित करती है। यह निर्जीव वैदिक देव प्रतिमाओं व अवांतर पूर्णमनुष्याकृत देव प्रतिमाओं के बीच की कड़ी है। इसको हाथी का शीश इसीलिए लगाया गया है, ताकि उसे मानसिक मनुष्याकृत कुण्डलिनी के शीश से मन से बदला जा सके।

Non duality and Kundalini reinforces each other/अद्वैतभाव व कुंडलिनी एक दूसरे को पुष्ट करते हैं।

Bliss originates from non duality. Kundalini awakening is semifinal bliss. Enlightenment is final/supreme bliss. Therefore, Kundalini awakening and enlightenment, both proves to be the states of semifinal and final non duality respectively. Morning Kundalini yoga strengthens Kundalini. That in turn strengthens non duality. That in turn strengthens bliss. Similar system works after evening Kundalini yoga too, so tiredness fade away immediately. Similarly, Non dual action strengthens kundalini and bliss, both together for all these three live together.

After his glimpse enlightenment, Premyogi vajra had got profound non dual attitude. So Kundalini and bliss also used to accompany that powerfully along with.

आनंद अद्वैत से उत्पन्न होता है। कुंडलिनी जागरण में उच्चतम के निकट का आनंद अनुभव होता है। आत्मज्ञान में उच्चतम आनंद की स्थिति होती है। इससे सिद्ध होता है कि कुंडलिनी जागरण लगभग उच्चतम अद्वैत से संपन्न होता है, और आत्मज्ञान पूर्णतया उच्चतम अद्वैत से सम्पन्न होता है। प्रातः कुण्डलिनी योग कुंडलिनी को पुष्ट करता है। कुंडलिनी फिर अद्वैत को पुष्ट करती है। अंत में अद्वैत आनंद को बढ़ाता है। सांयकाल के कुंडलिनी योग से भी इसी सिद्धांत से थकान दूर होती है। इसी तरह, अद्वैतमयी क्रियाकलाप कुंडलिनी व आनंद, दोनों को पुष्ट करते हैं, क्योंकि ये तीनों गुण साथ-२ रहते हैं।

अपने क्षणिकात्मज्ञान के बाद, उसके प्रभाव से प्रेमयोगी वज्र में असीम अद्वैत उत्पन्न हो गया था। इससे कुंडलिनी व आनंद, दोनों भी प्रचंड रूप से स्वयं ही उसके साथ रहते थे।

अटल जी को श्रद्धा सुमन/ Tribute to Atal ji

अटल जी की याद में कुछ पंक्तियाँ

मैं अटल जी के सम्मान में कुछ पंक्तियाँ लिखना चाहूंगा-

उठ जाग होनहार, प्रकाश हो या अंधकार।

बाँध तरकस पीठ पर, भर तीर में फुंकार।।

झुका दे शीश दोनों का, कर ना पाए फिर कभी भी वार।

उठ जाग होनहार, प्रकाश हो या अंधकार।।

यह कविता कुण्डलिनीयोग से भी स्वतः ही सम्बंधित प्रतीत होती है। यह कविता अज्ञानरूपी निद्रा में डूबे हुए एक आम साधारण मनुष्य से कहती है कि हे बहादुर मनुष्य, नींद से जाग जा और उठ खड़ा हो जा। तू डर मत, चाहे तेज रौशनी का माहौल हो या चाहे घनघोर अन्धकार ही क्यों न हो। इसका मतलब है कि तू प्रकाश व अन्धकार की परवाह न करते हुए दोनों को एक नजर से देख, अर्थात तू अद्वैतपूर्ण बन जा। बाँध तरकस पीठ पर का मतलब है कि तू कुण्डलिनीयोग साधना में जुट जा। उस साधना से जो चित्र-विचित्र विचार-संकल्प उसके मन में उभरेंगे, वे ही उस साधना रुपी तरकस के विभिन्न तीर होंगे। वह कुण्डलिनी साधना बैठकपूर्ण योग से भी की जा सकती है, और कर्मपूर्ण कर्मयोग से भी। फिर कविता कहती है कि भर तीर में फुंकार। इसका अर्थ है कि एक सबसे मजबूत व गुणसंपन्न मानसिक चित्र को तू कुण्डलिनी बना ले, और नित्य निरंतर उसका ध्यान करने लग जा। उससे वह कुण्डलिनी एक विषबुझे तीर की तरह प्रचंड हो जाएगी। “झुका दे शीश दोनों का” का अर्थ है कि उस प्रचंड कुण्डलिनी के आगे प्रकाश व अन्धकार दोनों निष्प्रभावी होने लग जाएंगे। कुण्डलिनी-जागरण से वे पूरी तरह से निष्प्रभावी हो जाएंगे, क्योंकि उस जागृत कुण्डलिनी में प्रकाश व अन्धकार दोनों के सभी उत्कृष्ट गुण विद्यमान होंगे। ऐसा इसलिए होगा क्योंकि वह परम प्रकाशमान कुण्डलिनी साधक को अपनी आत्मा से अभिन्न प्रतीत होगी। पूर्णतः निष्प्रभावी होने पर वे दोनों कभी वार नहीं कर पाएंगे, क्योंकि फिर उन दोनों के किसी भी रूप में साधक के मन में कभी आसक्ति उत्पन्न नहीं होगी।

Tribute in the memory of Atal ji

Rise up brave, whether it is light or dark grave;

Tie arrow-box on the back, fill up hiss to that pack.

Make bow down heads of both, could never then hit when you be in sloth;

Rise up brave, whether it is light or dark grave. 

This poem seems to be related to Kundalini Yoga itself. This poem says to an spiritually ignorant sleepy man means a  common man, “O brave man, wake up from sleep and rise up!” Do not be afraid, whether there is a bright light environment or a dark darkness. This means that if you do not care light and darkness, watch them both at a glance, that is, you become untainted. On the back, tie up arrow box means that you will get involved in cultivation of Kundalinioga. The painting / different ideas / thoughts that arise in his mind from that sadhana / meditation will be different arrows of that technique. The Kundalini cult can also be done through sitting yoga ie. full yoga, and also through action-yoga / karmayoga. Then the poem says that apply poison to the arrow to make that a hissing serpent. This means that you make a most qualified and beautiful mental picture as your Kundalini, and always start meditating / concentrating on it or visualizing it. From that, the Kundalini will be powerful like a poisoned arrow. “make bow down heads” means that both the light and the dark will appear to be neutral in front of that huge and all light full kundalini. With Kundalini-Jagaran / awakening, they will become completely neutral, because in that awakening of the Kundalini, all the excellent qualities of light and darkness will exist. This will be because that ultimate luminous Kundalini  will appear to be the integral to seeker’s soul. If they both are completely neutral, they will never be able to fight, because then in any form of both of them the attachment will never be generated in the mind of that seeker.